Tuesday, July 31, 2018

कैलाशपति शिव के यथार्थ दर्शन



(सलंग्न चित्र में देखे कि किस प्रकार से शिव और पारवती वेश धारण कर शिव जी के महान चरित्र को कलंकित किया जा रहा हैं)

कैलाशपति शिव के यथार्थ दर्शन


(वेदों में शिव विषय ओर मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ। उस लेख को पढ़कर अनेक युवकों ने शंका पूछी कि पुराणों में वर्णित शिव के विषय में जानकारी दे। यह लेख उसी विषय पर आधारित है। इस लेख के लेखक आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक जी है। आचार्य जी महान वैज्ञानिक है जिन्होंने वेदों में विज्ञान विषय पर शोध किया है। - डॉ विवेक आर्य)


श्रावण अर्थात सावन के माह में कावड़ लाने वाले युवक आपको प्राय: शिव भक्ति के नाम पर भांग-गांजा आदि ग्रहण करते मिलेंगे। यह धर्म नहीं अपितु अन्धविश्वास है। वेदों में शिव कल्याणकारी ईश्वर का एक नाम है जिन्हें रूद्र आदि नामों से भी सम्बोधित किया गया है। भगवान् महादेव शिव एक ऐतिहासिक महापुरुष थे, जो देव वर्ग में उत्पन्न हुए थे। कैलाश क्षेत्र इनकी राजधानी थी। उनका नशा करते हुए चित्रण करना उनके पवित्र आचरण पर कलंक लगाने के समान हैं। भगवान् शिव के विषय में प्रायः शिव पुराण की कथा का वाचन होता है, जबकि महर्षि वेद व्यास जी कृत महाभारत में शिव के यथार्थ चरित्र के दर्शन होते हैं।

अब हम महादेव भगवान् शिव की चर्चा करते हैं-

महर्षि दयानन्द जी ने अपने पूना प्रवचन में महादेव जी को अग्निष्वात का पुत्र कहा है। अग्निष्वात किसके पुत्र थे, यह बहुत स्पष्ट नहीं है परन्तु वे ब्रह्माजी के वंशज अवश्य हैं। इधर महाभारत में महर्षि वैशम्पायन ने कहा है-

उमापतिर्भूतपतिः श्री कण्ठो ब्रह्मणः सुतः।।
उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः।।
शान्तिपर्व। मोक्षधर्मपर्व। अ. 349। श्लोक 67 (गीतप्रैस)

यहाँ भगवती उमा जी के पति भूतपति, जो महादेव भगवान् शिव का ही नाम है, को महर्षि ब्रह्मा जी का पुत्र कहा है। इनका पाशुपत अस्त्र विश्व प्रसिद्ध था। इस अस्त्र को नष्ट वाला कोई अस्त्र भूमण्डल पर नहीं था। महाभारत के अनुशीलन से भगवान् शिव अत्यन्त विरक्त पुरुष, सदैव योगसाधना में लीन, विवाहित होकर भी पूर्ण जितेन्द्रिय, आकाशगमन आदि अनेकों महत्वपूर्ण सिद्धियों से सम्पन्न, वेद-वेदांगों के महान् वैज्ञानिक, सुगठित तेजस्वी व अत्यन्त बलिष्ठ शरीर व वीरता के अप्रतिम धनी दिव्य पुरुष थे। वे जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त महाविभूति थे। उनके इतिहास का वर्णन तो अधिक नहीं मिलता परन्तु उनके उपदेशों को हम महाभारत में पढ़ सकते हैं। इस कारण हम इस पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे।

धर्म का गृहस्थ स्वरूप

श्रीमहेश्वर उवाच-
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम्।
शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः।। 25।।

श्रीमहेश्वरने कहा- देवी! किसी भी जीव की हिंसा न करना, सत्य बोलना, सब प्राणियों पर दया करना, मन और इन्द्रियों पर काबू रखना तथा अपनी शक्ति के अनुसार दान देना गृहस्थ-आश्रम का उत्तम धर्म है।। 25।।

परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम्।
अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम्।। 26।।
एष प४चविधो धर्मो बहुशाखः सुखोदयः।
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः।। 27।।
(महाभारत अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अध्याय 141)

परायी स्त्री के संसर्ग से दूर रहना, धरोहर और स्त्री की रक्षा करना, बिना दिये किसी की वस्तु न लेना तथा मांस और मदिरा को त्याग देना, ये धर्म के पाँच भेद हैं, जो सुख की प्राप्ति कराने वाले हैं। इनमें से एक-एक धर्म की अनेक शाखाएँ हैं। धर्म को श्रेष्ठ मानने वाले मनुष्यों को चाहिये कि वे पुण्यप्रद धर्म का पालन अवश्य करें।। 26-27।।

भगवान् शिव के इन वचनों पर सभी गृहस्थ शिवभक्त कहाने वाले गम्भीरता से विचारें कि क्या आप सभी जीवों के प्रति दया व प्रेम करते हैं। क्या शिवमंदिरों में अपने ही कथित दलित भाईयों के प्रति आत्मिक प्रेम व समानता का भाव रखते हैं? क्या आप जीवन भर मांस, मछली, अण्डा व सभी प्रकार के नशीले पदार्थों के परित्याग की प्रतिज्ञा करेंगे? क्या आप अश्लील कथाओं, मोबाइल, इण्टरनेट व पत्र-पत्रिकाओं की अश्लीलता से बचने का व्रत लेंगे? क्या आप सभी परायी स्त्रियों के प्रति कुदृष्टिपात से बच पायेंगे? क्या आप सत्य ही बोलते व उस पर आचरण करते हैं? क्या चोरी, तस्करी, रिश्वत, वस्तुओं में मिलावट तथा किसी के अधिकार छीनने की प्रवृत्ति का त्याग करेंगे? तथा अपने जीवन में श्रेष्ठ वेदानुकूल कार्यों में दान व त्याग की भावना जगायेंगे? यदि नहीं तो आपकी शिवभक्ति सर्वथा निरर्थक है, अज्ञानतापूर्ण है।

ब्राह्मणों का धर्म

स्वाध्यायो यजनं दानं तस्य धर्म इति स्थितिः।
कर्माण्यध्यापनं चैव याजनं च प्रतिग्रहः।।
सत्यं शान्तिस्तपः शौचं तस्य धर्मः सनातनः।

वेदों का स्वाध्याय, यज्ञ और दान ब्राह्मण का धर्म है, यह शास्त्र का निर्णय है। वेदों का पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना, ये सभी ब्राह्मण के कर्म हैं। सत्य, मनोनिग्रह, तप, और बाहरी व आन्तरिक पवित्रता, यह उसका सनातन धर्म है।

विक्रयो रसधान्यानां ब्राह्मणस्य विगर्हितः।।
अर्थात् रस और धान्य(अनाज) का विक्रय करना ब्राह्मण के लिये निन्दित है।
(अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अध्याय 141,गीताप्रेस)

पाठक यहाँ भगवान् शिव के वचनों पर विचारें तो स्पष्ट है कि ब्राह्मणादि वर्ण जन्म से नहीं, बल्कि कर्म व योग्यता से होते हैं। इसका स्पष्टीकरण आगे करेंगे। यहाँ यह चिन्तनीय है कि क्या शिवभक्त कहाने वाला ब्राह्मण आज वेदादि शास्त्रों के महान् ज्ञान विज्ञान को समझता है अथवा भांग पीने में मस्त है? क्या वह दान देना भी जानता है अथवा लेना ही जानता है? क्या वह मनसा वाचा कर्मणा सत्य का पालन व अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला है? क्या वह धर्म के मार्ग में सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी आदि द्वन्दों को सहन करने रूपी तप को करता है? क्या वह मन-वचन-कर्म से पवित्र आचरण करता है? क्या कोई स्वयं को ब्राह्मण अथवा साधु, संन्यासी कहाने वाला व्यापार व उद्योग आदि वैश्य-कर्मों से दूर है? यदि उसमें ये गुण नहीं है, तो वह भगवान् शिव की दृष्टि में ब्राह्मण नहीं हो सकता।

आइये, कथित ब्राह्मण बन्धुओ! सच्चे ब्राह्मण बनने का प्रयास करने का व्रत लें। सच्चे शिव के शिष्य बनेगे।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक


Monday, July 30, 2018

मुंशी प्रेमचंद और आर्यसमाज



मुंशी प्रेमचंद और आर्यसमाज

(31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद के  जन्मदिवस पर विशेष रूप से प्रकाशित)

डॉ विवेक आर्य

मुंशी प्रेमचंद। यह नाम सुनते ही 20 वीं शताब्दी के प्रसिद्द साहित्यकार का नाम स्मरण हो उठता हैं। जिन्होंने अपनी लेखनी से समाज सुधार का ऐसा सन्देश दिया जो पढ़ने वालों को आज भी प्रभावित किये बिना नहीं रहता। प्रेमचंद के साथ एक बड़ा अन्याय भी हुआ। अपना नाम चमकाने के चक्कर में अनेक लेखकों ने उनके साथ छल किया। उनके सुधारवादी दृष्टिकोण को देखते हुए कोई उन्हें साम्यवादी बताता है, कोई मार्क्सवादी, कोई गाँधीवादी बताता हैं। सत्य यह है कि मुंशी प्रेमचंद 19 वीं सदी में आरम्भ हुआ क्रांति जिसके पुरोधा स्वामी दयानन्द के क्रन्तिकारी चिंतन से प्रभावित थे। स्वामी दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना करते हुए अपनी अकाट्य तर्कों और युक्तियों से धार्मिक अन्धविश्वास और रूढ़िवादी संकीर्णताओं की बुनियादें हिला दी थी। आर्यसमाज के सामाजिक सुधारों आंदोलन में प्रेमचंद अपनी लेखनी के माध्यम से रण के शूरवीर बने। प्रेमचंद की लेखनी में सुधारवादी और शिक्षात्मक स्वर सुनाई देता है।
           
     प्रारम्भ में प्रेमचंद ने उर्दू में लिखना आरम्भ किया। असरारे माबिद, हमखुर्बा व हमसवाब और किशना उनकी प्रारंभिक उर्दू कृतियां थी। हिंदी अनुवाद गबन और प्रेमा नाम से छपे थे। इन ग्रंथों में प्रेमचंद ने धर्म के नाम पर शोषण करने वाले महंतों व पुजारियों की पोल खोली। जैसे एक आर्यसमाजी प्रचारक धर्म के नाम पर चल रही कुरीतियों का भंडाफोड़ करता हैं। कालांतर में प्रतिज्ञा के नाम से उपन्यास लिखा। इस उपन्यास का पात्र अमृतराय विधवा विवाह वह भी अंतर्जातीय करने का दुस्साहस उस काल में करता हैं। समाज अमृतराय के विरुद्ध है। पर उसके मन में तो जाति उन्नति का सपना है। जिस काल में कोई इस विषय में सोच भी नहीं सकता था। यह चिंतन प्रेमचंद को आर्यसमाज के विधवा विवाह अभियान से मिला।

प्रेमचंद के अगले उपन्यास वरदान में देशोद्धार समाहित है। उपन्यास के चरित्र नायक बालाजी है जो समाज सुधार के लिए समर्पित है। गांव के बच्चे भूखे मरते है। बालाजी उनके कल्याण के लिए गौशाला खुलवाकर उन्हें दूध पिलाते है। समाज के निर्धन बच्चों पर ऐसा उपकार करने का सन्देश स्वामी दयानन्द ने ही तो दिया था। जिसे प्रेमचंद ने अपनी लेखनी से उकेरा।

प्रेमचंद आर्यसमाज के सदस्य भी बने। फरवरी, 1913 में मझगांव से निगम को लिखा,

" मेरे जिम्मे हमीरपुर आर्यसमाज के दस रुपये बाकि हैं। बार-बार तकाज़ा हुआ है, मगर तंगदस्ती ने इजाज़त न दी कि अदा कर दूँ। आप अगर एफोर्ड कर सकें तो बरारास्त मेरे नाम से हमीरपुर आर्यसमाज के सेक्रेटरी के नाम दस रुपये का मनी आर्डर  कर दें। ममनून हूँगा। तकलीफ तो होगी मगर मेरे खातिर इतना सहना पड़ेगा क्यूंकि यहाँ अब जलसा भी अनकरीब होनेवाला है।  मुकर्रर अर्ज यह है कि यह दस रुपये जरूर भेज देवें। मैंने जनवरी में अदा करने का इतमी वायदा किया है। "

एक महीने के बाद फिर याद कराया,

"अगर आपने हमीरपुर समाज के नाम दस रुपये रवाना किए हों तो बराहे करम अब कर दीजिए, क्यूंकि मैं 14 मार्च को वहाँ जाऊँगा और तकाजा नहीं सहना चाहता।"

इस जलसे पर आर्यसमाज के प्रचारक मौलवी महेश प्रसाद आलिम फ़ाज़िल अपने साथियों के साथ प्रेमचंद के आवास पर ठहरे। उनकी वार्तालाप का विषय दो थे। पहला आर्यसमाज और उसके कार्य सम्बंधित। दूसरे महोबा में ईसाई मिशनरियों द्वारा हिन्दू लड़के-लड़कियों को ईसाई बनाना।

इसी चिंतन का परिणाम हम प्रेमचंद की अगली कृति खूने सफेद में पढ़ते है। इस कृति में एक अकाल ग्रस्त परिवार के बच्चे को ईसाई पादरी क्रिस्चियन बनाकर पढ़ने के लिए पुणे भेज देता हैं। जब वह लौट कर आता है तो उसका परिवार तो उसे अपनाना चाहता है। मगर उसका समाज उसके विधर्मी बनने के कारण उसे स्वीकार नहीं करता। वह युवक यह कहकर कि जिनका खून सफ़ेद है। मैं उनके बीच में नहीं रह सकता चला जाता है। प्रेमचंद अपनी इस कृति में ईसाई धर्मान्तरण और उसके सामाजिक प्रभाव पर एक आर्यसमाजी के समान चिंतन प्रस्तुत करते है।

आर्यसमाज के देश को स्वतंत्र करवाने के चिंतन से भी प्रेमचंद प्रभावित हुए बिना न रहे। सरकारी नौकरी में होते हुए भी प्रेमचंद ने सोजे वतन के नाम से उपन्यास लिखा जो देशप्रेम की पांच कहानियों का संग्रह था। पुस्तक जब्त हुई। प्रेमचंद को धमकी मिली कि आगे से कुछ भी लिखने से पहले सरकार से इजाज़त लेनी होगी। प्रेमचंद ने नाम बदलकर नवाब राय के नाम से वरदान लिखा। इसके चरित्र सुवामा कि इच्छा स्वामी दयानन्द के समान देशसुधार की हैं। अंग्रेजी की नाक के तले ऐसे पंगे लेने वाला कोई आर्यसमाज ही उस काल में हो सकता था। प्रेमचंद उन्हीं में से एक थे।

1920 के दशक में भारत हिन्दू-मुस्लिम दंगों में जल उठा। प्रेमचंद जानते थे कि इन दंगों के पीछे अंग्रेज है। आपने नवी का नीति निर्वाह, फातिहा, मंदिर और मस्जिद, कर्बला लिखे। कायाकल्प में उन्होंने मुसलमानों को ईद पर गौवध से रोका। कायाकल्प में हिन्दुओं और मुसलमानों के मध्य हुए संवाद का सन्देश सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में दिए गए सन्देश से मिलता हैं।

प्रेमचंद हिंदी के बड़े पक्षधर थे। उर्दू से आरम्भ कर हिंदी में आये। हिंदी के वे बड़े पक्षधर थे। स्वामी दयानन्द देवनागरी के माध्यम से देश को एक सूत्र में जोड़ने का सन्देश दे गए। प्रेमचंद उसी सन्देश को अपने उपन्यास वरदान में देते है। इस उपन्यास के पात्र मुंशी संजीवनलाल अपनी पुत्री बिरजन से कहते हैं कि "बेटी , तुम तो संस्कृत पढ़ती हो। जिस पुस्तक की तुम बात करती हो वः तो भाषा में है। " बिरजन उत्तर देती है, "तो मैं भी भाषा ही पढूंगी। इसमें कैसी अच्छी अच्छी कहानियाँ है। मेरी किताब में तो एक कहानी भी नहीं है।" प्रेमचंद कैसे सरलता से हिंदी का प्रचार कर रहे है। पाठक ध्यान दे।

मुंशी प्रेमचन्द जी ने उर्दू में “आपका चित्र” नामक एक कहानी तीन अध्यायों में लिखी थी जो लाहौर के उर्दू पत्र ‘प्रकाश’ में सन् 1929 में प्रकाशित हुई थी।  इस कहानी के पहले भाग में उन्होंने आर्यसमाज के लोगों द्वारा महर्षि दयानन्द का अपने घरों में चित्र लगाये जाने को मूर्तिपूजा से भिन्न होने या न होने पर बहुत ही मार्मिक शब्दों में प्रकाश डाला है। मूर्तिपूजा व चित्रपूजा का ऐसा सशक्त भावपूर्ण चित्रण इससे पूर्व कहीं पढ़ने को नहीं मिलता। यह उनके आर्य समाजी होने का सबसे बड़ा प्रमाण माना जा सकता है। वह लिखते हैं – ‘लोग मुझ से कहते हैं तुम भी मूर्ति-पूजक हो। तुम ने भी तो स्वामी दयानन्द का चित्र अपने कमरे में लटकारखा है। माना कि तुम उसे जल नहीं चढ़ाते हो। इसको भोग नहीं लगाते। घण्टा नहीं बजाते। उसे स्नान नहीं कराते। उसकाश्रृगांर नहीं करते। उसका स्वांग नहीं बनाते। उसको नमन तो करते ही हो। उसकी ऋषि दयानन्द की विचारयधारा को तोसिर झुकाते हो, मानते ही हो। कभी-कभी माला व फलों से भी उसका सम्मान करते हो। यह पूजा नहीं तो और क्या है?’

इन सभी प्रश्नों का उत्तर देते हुए मुंशी प्रेमचन्द जी लिखते हैं – ‘उत्तर देता हूं कि श्रीमन् इस आदर व पूजा में अन्तर है। बहुत बड़ाअन्तर है। मैं उसे अपने कक्ष में इसलिए नहीं लटकाये हुए हूं कि उसके दर्शन से मुझे मोक्ष की प्राप्ति होगी। मैं आवागमन केचक्कर से छूट जाऊगां। उसके दर्शन मात्र से मेरे सारे पाप धुल जायेंगे अथवा मैं उसे प्रसन्न करके अपना अभियोग (case)जीत जाऊगां अथवा शत्रु पर विजय प्राप्त कर लूंगा किंवा और किसी ढंग से मेरा धार्मिक अथवा सांसारिक प्रयोजन सिद्ध होसकेगा। मैं उसे केवल इस कारण से अपने कमरे में लटकाये हुए हूं कि स्वामी जी के जीवन का उच्च व पवित्र आचरण सदामेरे नयनों के सम्मुख रहे। जिस घड़ी सांसारिक लोगों के व्यवहार से मेरा मन ऊब जाये, जिस समय प्रलोभनों के कारण पगडगमगायें अथवा प्रतिशोध की भावना मेरे मन में लहरें लेने लगे अथवा जीवन की कठिन राहें मेरे साहस व शौर्य की अग्निको मन्द करने लगें, उस विकट वेला में उस पवित्र मोहिनी मूर्त के दर्शनों से आकुल व्याकुल हृदय को शान्ति हो। दृढ़ता धीरजबने रहें। क्षमा व सहनशीलता के मार्ग पर पग चलते चलें तथा मैं अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इस चित्र से मुझेलाभ पहुंचा है और एक बार नहीं कई बार।’

कहानी के दूसरे भाग में एक राजा का वर्णन किया गया है जो अपने एक विश्वसनीय सेवक को अपनी पसन्दीदा महिला के प्रेमी की हत्या का कार्य सौंपता है और उस कार्य को करने के बदले में अकूत सम्पत्ति देने का वायदा करता है। युवक प्रलोभनवश तैयार हो जाता है परन्तु घर जाकर दीवार पर स्वामी दयानन्द का चित्र देखकर अपने निर्णय को महर्षि दयानन्द के सिद्धान्तों के विपरीत जानकर पश्चाताप करता है और, परिणाम की चिन्ता न कर, साहस करके राजा साहब के पास जाकर अपनी असमर्थता व्यक्त करता है। इस पर उसे अनेक कटु बातें सुनने को मिलती है। राजा साहेब होंटों को दांतों से काटकर बोले, “बहुत अच्छा जाओ और आज ही रात को मेरे राज्य की सीमा सेबाहर निकल जाओ। सम्भव है कल तुम्हें यह अवसर न मिले।“ उसी लहर में उन्होंने उस पूर्व विश्वसनीय युवक को नमकहराम, टेढ़ी बुद्धि वाला, अधम और जाने क्या-क्या कहा। प्रणाम कर वह युवक चला जाता है।  उसी रात्रि को अकेले ही कुछ वस्त्र और कुछ रुपये एक सन्दूक में रखकर घर से निकल पड़ा।  हां ! स्वामी जी का चित्र उसके सीने से लगा हुआ था। इस कहानी में मुंशी प्रेमचन्द जी ने स्वामी दयानन्द व उनके चित्र के प्रति अपने मनोभावों को प्रस्तुत किया है।

प्रेमचंद का सबसे तीव्र प्रहार अपनी लेखनी द्वारा अगर किसी क्षेत्र में सबसे अधिक हुआ। तो वह जातिवाद के विरुद्ध था। जन्मना जातिवाद की कड़ी आलोचना की थी। नीच कहलाने वाली जातियों के सामाजिक उत्थान के लिए उनके हृदय में एक विशेष तड़प थी। जातिवाद और छुआछूत का आवाहन स्वामी दयानन्द ने किया था जिसे आर्यसमाज के शीर्घ नेताओं जैसे स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द, लाला गंगाराम ,संत राम बी.ए ने न केवल आगे बढ़ाया बल्कि रोपड़ के पंडित सोमनाथ की माँ, जम्मू के महाशय रामचंद्र, इंदौर के वीर मेघराज जाट ने अपना बलिदान तक दे दिया दिया। प्रेमचंद इसी कड़ी में स्वामी दयानन्द के एक प्रबल संदेशवाहक बनकर जातिवाद के विरुद्ध अपने लेखनी थामते दिखे। 

जहाँ एक ओर प्रेमचंद हंस पत्रिका के मुख पृष्ठ पर 1933 में डॉ अम्बेडकर का चित्र यह कहकर छापते है कि
"आपने सतत उद्योग से अनेक परीक्षाएं पास करके विद्वता प्राप्त की है और यह प्रमाणित कर दिया है कि अछूत कहलाने वाली जातियों को किन्हीं असाधारण उपकरणों से ईश्वर ने नहीं बनाया। इस समय आप विश्वविख्यात व्यक्तियों में हैं। "

वहीं दूसरी ओर आप अपने उपन्यास कर्मभूमि में एक ऊँचे परिवार में जन्मे युवक अमरकांत का वृतांत लिखते हैं। जो नीची जाति की बस्ती में जाकर रहने लगता है।  उन्हें स्वच्छता का सन्देश और शिक्षा देता है। उन्हें शराब और मुर्दा मांस खाने से विमुख करने का प्रयास करता हैं। अंत में उसकी विजय होती है।  कर्मभूमि पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रेमचंद किसी सवर्ण परिवार में जन्में आर्यसमाजी प्रचारक के जीवन वृतांत को अपनी कलम से उद्दृत कर रहे हो।

मंदिरों में चमारों के प्रवेश न कर पाने पर प्रेमचंद एक ऐसा कटाक्ष लिखते है।  जो पढ़ने वालों की आत्मा को अंदर तक झकझोर देता है। प्रेमचंद लिखते है कि चमारों के हाथ के बने जूते पहनकर कोई भी मंदिर जा सकता है।  मानों जूते पवित्र चीज थे मगर उसे बनाने वाले चमार अपवित्र थे। शांतिकुमार नामक युवक अछूतों के मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन करता है। लाठियां, गोलियां चलती है। अंत में चमारों को मंदिर प्रवेश का अधिकार प्राप्त होता हैं। एक बड़ा भारी समारोह होता है। आर्यसमाज ने अनेक बार दलितों के मंदिर में प्रवेश के लिए आंदोलन किये। यह दृष्टान्त यथार्थ में किसी घटना का साक्षात् वर्णन प्रतीत होता है।

मंदिर के महंतों के अनैतिक हरकतों को प्रेमचंद लिखकर उन्हें अपराधी सिद्ध करने में भी प्रेमचंद पीछे नहीं रहते। मठाधीशों को जुआ खेलने वाला, ईमान बेचने वाला, झूठी गवाहियां देने वाला, भीख मांगने वाला और जिनके स्पर्श तक से देवता कलंकित हो ऐसा धर्म के पाखंडी ठेकेदार प्रेमचंद लिखते हैं।  पाठक समझे कि प्रेमचंद के हृदय में अछूत कहलाने वाले लोगों से उनका धार्मिक अधिकार छीने जाने पर कितनी पीड़ा होगी जिसका वर्णन प्रेमचंद ने किया हैं। कभी प्रेमचंद अछूतों का मंदिर प्रवेश करवाते है।  कभी प्रेमचंद अछूतों और सवर्णों का एक साथ बैठकर सहभोज करने का वर्णन दर्शाते हैं। मंदिर नामक कहानी में प्रेमचंद एक चमारिन विधवा पर मंदिर में प्रवेश न करने देने वाले पुजारी को निर्दयी धर्म के ठेकेदार लिखते है।  यह लेख चाँद पत्रिका के अछूत अंक विशेष में प्रकाशित हुआ था। ठाकुर का कुआँ, दूध का दाम, सदगति, जीवन में घृणा का स्थान-साहित्य में घृणा का स्थान, कफ़न प्रेमचंद की कुछ कृतियां हैं। जिनमें उन्होंने समाज के सबसे अधिक दबे, कुचले हुए पात्रों पर हो रहे अत्याचारों का मार्मिक चित्रण किया हैं। उनके उद्धार की कामना का सन्देश दिया है।उस काल में यह सन्देश एक आर्यसमाजी हृदय के व्यक्ति की कामना के अत्तिरिक्त ओर हो भी क्या सकता था।

अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले मुंशी प्रेमचंद अप्रैल 1936 में लाहौर आर्य समाज की जुबली के अवसर पर आर्य भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष के नाते प्रसंगवशात् आर्यसमाज की सराहना करते हुये कहते है-

" आर्यसमाज ने इस सम्मलेन का नाम आर्यभाषा सम्मलेन शायद इसलिए रखा है कि यह समाज के अंतर्गत उन भाषाओं का सम्मलेन है जिनमें आर्यसमाज ने धर्म का प्रचार किया है और उनमें उर्दू और हिंदी दोनों का दर्जा बराबर है।  मैं तो आर्य समाज को जितनी धार्मिक संस्था मानता हूं उतनी ही तहज़ीबी (सांस्कृतिक) संस्था भी समझता हूं। बल्कि आप क्षमा करें तो मैं कहूँगा कि उसके तहज़ीबी कारनामे उसके धार्मिक कारनामों से भी प्रसिध्द और रोशन हैं। आर्यसमाज ने साबित कर दिया है कि समाज की सेवा ही किसी धर्म के सजीव होने के लक्षण है। कौमी जिंदगी की समस्याओं को हल करने में उसने जिस दूरदेशी का सबूत दिया है उस पर गर्व कर सकते है। हरिजनों के उध्दार में सबसे पहले आर्य समाज ने कदम उठाया। लड़कियों की शिक्षा की ज़रूरत को सबसे पहले उसने समझा।वर्ण-व्यवस्था को जन्मगत न मानकर कर्मगत सिध्द करने का सेहरा उसके सर पर है।जातिगत भेद-भाव और खान-पान में छूत-छात और चौके-चूल्हे की बाधाओं को मिटाने का गौरव उसी को प्राप्त है।यह ठीक है कि ब्रह्मसमाज ने इस दिशा में पहले कदम रखा पर वह थोड़े से अंग्रेजी पढ़े-लिखों तक ही रह गया। इस विचारों को जनता तक पहुंचाने का बीड़ा आर्यसमाज ने ही उठाया। अन्धविश्वास और धर्म के नाम पर किए जानेवाले हज़ारों अनाचारों की कब्र उसने खोदी, हालाँकि मुर्दे को उसमें दफन न  कर सका। और अभी तक उसका जहरीला दुर्गन्ध उड़कर उड़कर समाज को दूषित कर रहा है। समाज के मानसिक और बौद्धिक धरातल (सतह) को आर्यसमाज ने जितना उठाया है, शायद ही भारत की किसी संस्था ने उठाया हो।  उसके उपदेशकों ने वेदों और वेदांगो के गहन विषय को जन-साधारण की संपत्ति बना दिया, जिनपर विद्वानों और आचार्यो के कई-कई लिवर वाले ताले लगे हुये थे। आज आर्यसमाज के उत्सवों और गुरुकुलों के जलसों से हज़ारों मामूली लियाकत के स्त्री-पुरुष सिर्फ विद्वानों के भाषण सुनने का आनंद उठाने के लिए खींचे चले जाते हैं। गुरूकुलाश्रम को नया नाम देकर आर्यसमाज ने शिक्षा को सम्पूर्ण बनाने का महान उद्योग किया है। सम्पूर्ण से मेरा आशय उस शिक्षा का जो सर्वांगपूर्ण हो, जिसमें मन, बुद्धि, चरित्र और देह, सभी के विकास का अवसर मिले। शिक्षा का वर्तमान आदर्श यही है। मेरे ख्याल में वह चिरसत्य है। वह शिक्षा जो सिर्फ अक्ल तक ही रह जाये, अधूरी है। जिन संस्थाओं में युवकों में समाज से पृथक रहनेवाली मनोवृति पैदा करें, जहाँ पुरुषार्थ इतना कोमल बना दिया जाए कि उसमें मुश्किलों का सामना करने की शक्ति न रह जाए, जहाँ कला और संयम में कोई में न हो, जहाँ की कला केवल नाचने -गाने और नकल करने में ही जाहिर हो, उस शिक्षा का मैं कायल नहीं हूँ। शायद ही मुल्क में कोई ऐसी शिक्षण संस्था हो जिसने कौम की पुकार का इतना जवांमर्दी से स्वागत किया हो। अगर विद्या हममें सेवा और त्याग का भाव न लाए, अगर विद्या हमें आदर्श के लिए सीना खोलकर खड़ा होना न सिखाए, अगर विद्या हममें स्वाभिमान  पैदा करे, और हमें समाज के जीवन प्रवाह से अलग रखे तो उस विद्या से हमारी अविद्या अच्छी। और आर्यसमाज ने हमारी भाषा के साथ जो उपकार किया है कि स्वामी दयानन्द ने इसी भाषा में सत्यार्थ प्रकाश लिखा और उस वक्त लिखा जब उसकी इतनी चर्चा न थी। उनकी बारीक़ नज़र ने देख लिया कि अगर जनता में प्रकाश ले जाना है तो उसके लिए हिंदी भाषा ही अकेला साधन है, और गुरुकुलों ने हिंदी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाकर अपने भाषा प्रेम को और भी सिद्ध किया है। "

दिल्ली से प्रकाशित होने वाले मासिक पत्र ‘शुद्धि समाचार’ का जनवरी-फरवरी 1932 का संयुक्तांक श्रद्धानन्द बलिदान अंक के रूप में प्रकाशित हुआ था, जिसमें प्रेमचंद का लेख ‘स्वामी श्रद्धानन्द और भारतीय शिक्षा प्रणाली’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस लेख में प्रेमचंद ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को स्वामी श्रद्धानन्दजी की देन पर विस्तार से प्रकाश डाला है। प्रकारान्तर से इस लेख को भी स्वामी श्रद्धानन्दजी द्वारा स्थापित गुरुकुल कांगड़ी में बिताए गए तीन दिनों से प्रभावित स्वीकार किया जा सकता है। इस लेख से भी प्रेमचंद की आर्य समाजी विचारधारा ही प्रमाणित होती है।

गुरुकुल कांगड़ी की साहित्य परिषद् के जुलाई 1927 में हुए वार्षिकोत्सव की अध्यक्षता प्रेमचंद ने की थी और इस उत्सव में वहाँ निरन्तर तीन दिन तक प्रवास करके गुरुकुल कांगड़ी से पर्याप्त परिचय प्राप्त किया था। प्रेमचंद ने वहाँ के तीन दिनों के अनुभव लिपिबद्ध करके ‘गुरुकुल कांगड़ी में तीन दिन’ शीर्षक लेख के रूप में लखनऊ की मासिक पत्रिका ‘माधुरी’ के अप्रैल 1928 के अंक में प्रकाशित करा दिए थे।  प्रेमचंद के इस लेख का उर्दू अनुवाद उर्दू पत्रकारिता के युगपुरुष महाशय कृष्णजी के सम्पादन में लाहौर से प्रकाशित होने वाले उर्दू साप्ताहिक ‘प्रकाश’ के 22 अप्रैल 1928 के अंक में भी प्रकाशित हो चुका है।  गुरुकुल कांगड़ी के अनुभवों पर प्रेमचंद ने एक पूरक लेख लिखकर चार वर्ष उपरान्त पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी के सम्पादन में कलकत्ता से प्रकाशित मासिक पत्र ‘विशाल भारत’ के अगस्त 1932 के अंक में ‘पद्मसिंह शर्मा के साथ तीन दिन’ शीर्षक से प्रकाशित कराया था, जो प्रेमचंद के मानस पर आर्य समाज की स्थायी छाप का ज्वलन्त प्रमाण है।

 मुंशी जी स्वयं आर्यसमाज के सदस्य थे और दलित उद्धारक एवं हिंदी भाषा के समर्थक थे। प्रेमचंद जी के आर्यसमाज के अनेक विद्वानों से सम्बन्ध थे जैसे पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय जी उनके सहपाठी थे, महेश प्रसाद जी उनके मित्र थे, कहानीकार सुदर्शन जी भी उनके अभिन्न मित्र थे, इन्द्र विद्यावाचस्पति जी के साथ सम्बन्ध थे, आचार्य रामदेव जी के अपार स्वाध्याय के आप प्रशंसक थे। पंडित पदम् सिंह शर्मा और चंद्रमणि विद्यालंकार से आपके घनिष्ठ सम्बन्ध थे। मुंशी प्रेमचन्द जी ने अपने जीवन की अन्तिम वेला तक आर्य समाजी पत्रों में लिखते रहे। उनक लेखों में ईश्वर के सर्वव्यापक स्वरूप पर प्रकाश पड़ता है। उन्होंने इस आर्य सिद्धान्त पर डटकर लिखा है। सबको अपनाना, किसी को अस्पृश्य न मानना, आर्य धर्म के बन्द द्वार सबके लिए खोलना, दीनों की रक्षा, धेनु की रक्षा, प्राणिमात्र से प्यार , प्रेमचन्द जी ने इन सब विषयों पर लिखा है और आर्य समाज का गुणगान किया है। निष्कर्षतः कह सकते हैं कि मुंशी प्रेम चन्द जी अपने जीवन में महर्षि दयानन्द व आर्य समाज की विचारधारा से जुड़े रहे। उनकी सफलता का एक प्रमुख कारण उनका आर्य विचारधारा को अपनाना था। इसके माध्यम से उन्होंने आर्य विचारधारा का भूरिशः प्रचार-प्रसार किया।

वह आर्य समाज के गौरव थे।


मुंशी प्रेमचंद और आर्यसमाज के संबंधों पर यह एक संक्षिप्त सा लेख है। इस विषय पर शोध की अधिक आवश्यकता है। 

क्या वेद में सौतिया डाह और टोना-टोटका है?



*क्या वेद में सौतिया डाह और टोना-टोटका है?*
- कार्तिक अय्यर
( दिनांक- २९/७/१८)
।।ओ३म्।।
पाठकगण! हमने प्रतिज्ञा की थी कि वामपंथी नवबौद्ध लेखक सुरेंद्र कुमार शर्मा अज्ञात की इंग्लिश वाली पुस्तक का प्रत्याख्यान करेंगे।हमने पहले सूचित किया था कि वेदों में स्त्री विषयक अाक्षेपों को का उत्तर हम देंगे।इस खंडन-मंडन में 2-3 लेख हो जाएंगे।इस लेख में हम वादी के एक अाक्षेप की चर्चा करेंगे जो कि वेदों में सपत्नी यानी सौत को लेकर किया है । वादी ऋग्वेद १०/१४५/१-६ व अथर्ववेद ३/१८/१-६ पर प्रश्न करता है।दोनों वेदों में यही सूक्त आया हुआ है। इन मंत्रों पर अक्सर नास्तिक लोग अाक्षेप करते हैं ,कि वेद में एक पत्नी अपनी सपत्नी के विनाश के लिए तथा पति को अपने वश में करने के लिए टोना टोटका आदि करती है।
हम सबसे पहले स्वामी ब्रह्ममुनि कृत ऋग्वेद भाष्य के कुछ प्रमाण उद्धृत करते हैं।उसके बाद अथर्ववेद तथा ऋग्वेद के आधुनिक भाष्यकार पंडित हरि शरण विद्यालंकार तथा पंडित जयदेव शर्मा इनके भाष्यों की भी चर्चा करेंगे तथा लेख के अंत में यह भी बताएंगे कि वेद में सौतिया डाह के बारे में क्या कहा गया है।
सबसे पहले ऋग्वेद के १०/१४५ को लेते हैं-
ऋषि: (Rishi) :- इन्द्राणी
देवता (Devataa) :- उपनिषत्सपत्नीबाधनम्
यहां मंत्र का देवता यानी प्रतिपाद्य विषय "उपनिषत्सपत्नीबाधनम्" है- यानी उपनिषद रूपी ब्रह्मविद्या से सपत्नी को बांधना"। इसके पहले मंत्र पर ब्रह्ममुनि का भाष्य देते हैं-
इ॒मां ख॑ना॒म्योष॑धिं वी॒रुधं॒ बल॑वत्तमाम् । यया॑ स॒पत्नीं॒ बाध॑ते॒ यया॑ संवि॒न्दते॒ पति॑म् ॥
ब्रह्ममुनि का भाष्य इस लिंक पर आप देख सकते हैं-
http://www.vedakosh.com/…/m…/sukta-145/mantra-rig-10-145-001
इस सूक्त में कामवासना की नाशक अध्यात्मविद्या है, परमात्मा के साथ मेल करानेवाली भी है, इसकी सहायक सोम ओषधि भी, अध्यात्मप्रेमी को उसका भी सेवन करना है, इत्यादि विषय हैं।
(इमाम्-ओषधिम्) इस दोष पीनेवाली (बलवत्तमां वीरुधम्) बलिष्ठ विशेषरूप से रोहणसमर्थ विद्या को (खनामि) निष्पादित करता हूँ (यया) जिसके द्वारा (सपत्नीं बाधते) विरोधिनी अनिष्ट कामवासना को बाधित करती है, जो उपनिषद्-अध्यात्मविद्या की सपत्नी है (यया पतिं संविन्दते) जिस उपनिषद्-अध्यात्मविद्या द्वारा विश्वपति परमात्मा को मनुष्य प्राप्त होता है ॥१॥
भावार्थः
कामवासना को मिटानेवाली उपनिषद् अध्यात्मविद्या को निष्पादित करना चाहिए तथा जो कामवासना को मिटाकर विश्वपति परमात्मा को प्राप्त कराती है ॥१॥
(देवजूते) हे जीवन्मुक्तों के द्वारा प्रीति-चाही हुई (सहस्वति) बलवाली (सुभगे) सुभाग की निमित्तभूत (उत्तानपर्णे) उत्कृष्ट पालन जिसका है, ऐसी अध्यात्मविद्या या उसके निमित्त सोम ओषधि ! (मे) मेरी (सपत्नीं पराधम) विरोधी कामवासना को परे कर (मे पतिं केवलं कुरु) मेरे विश्वपति परमात्मा को नितान्त बना ॥२॥
भावार्थः
जीवन्मुक्तों के द्वारा अध्यात्मविद्या या उसकी निमित्तभूत सोम ओषधि सेवन की जाती है, जो कामवासना को मिटाती है, परमात्मा का सङ्ग कराती है ॥२॥
सूक्त के देवता तथा भाष्य से यह स्पष्ट हो जाता है की इन मंत्रों में सपत्नी का अर्थ विद्या की सपत्नी=दुश्मन अविद्या के नाश के लिये ब्रह्मविद्यारूपी औषधि की बात की जा रही है।
अब हम पंडित हरि शरण और पंडित जयदेव के भाष्यों से कुछ वचन को उद्धृत करते हैं:-
उपनिषद ब्रह्मविद्या की सपत्नी अविद्या का दृष्टांत से स्पष्ट करते हैं।.... यहां केवल जिस तरह सौत को सौत हटाती है वैसे ही अविद्या को विद्या दूर हट आती है। ( अथर्ववेद ३/१८/१)
मैं विपरीत मार्ग में ले जाने से रोकने वाली पाप संकल्पों को दग्ध करने वाली अत्यंत बलवती उपनिषद ब्रम्हविद्या से विद्या की सौत अविद्या का नाश करता हूं।( ऋग्वेद १/१४५/१)
( पं जयदेव कृत ऋग्वेद व अथर्ववेद भाष्य से)
आध्यात्मविद्या की सपत्नीभूत भोगवृत्ति।( ऋग्वेद १०/१४५/१,२)
इंद्राणी की सपत्नी रूप भोगवृत्ति।(अथर्ववेद ३/१८/१)
( पं हरिशरण जी के भाष्यों से)
आध्यात्मविद्या की सपत्नीभूत भोगवृत्ति।( ऋग्वेद १०/१४५/१,२)
इंद्राणी की सपत्नी रूप भोगवृत्ति।(अथर्ववेद ३/१८/१)
( पं हरिशरण जी के भाष्यों से)
इन भाष्यों से सिद्ध है कि इन सूक्तों में सपत्नी यानी अविद्या के नाश हेतु ब्रह्मविद्या रूप औषधि का नाश करना है; नाकि कोई टोना-टोटका करके अपनी सौत का विनाश करना।
वैदिक परंपरा में एकपत्नीकव्रत आदर्श माना गया है ।चारों वेदों में एक भी मंत्र में एक ही समय में एक से अधिक पत्नियां रखने की कोई आज्ञा नहीं है। हम ऋग्वेद आदि के कुछ उदाहरण देकर अपनी बात को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं;-
ऋग्वेद के तीनों मंत्र ( १।१२४।७, ४।३।२ तथा १०।७१।४) वर्णित करते हैं – ‘ जाया पत्य उशासी सुवासा ‘ अर्थात विद्या विद्वानों के पास उसी प्रकार आती है जैसे एक समर्पित हर्षदायिनी पत्नी सिर्फ अपने पति को ही प्राप्त होती है| ‘ जाया’ तथा ‘ पत्य’ क्रमशः पत्नी तथा पति का अर्थ रखते हैं | यह दोनों शब्द एकवचन में प्रयुक्त हुए हैं, जो सिर्फ एक पति और एक पत्नी के आदर्श रिश्ते को प्रस्तुत करते हैं |
ऋग्वेद १। ३ ।३ में परमात्मा को पवित्र और उच्च आचरण वाली समर्पित पत्नी की उपमा दी गई है, जिस में एक पत्नीत्व का आदर्श भी अन्तर्निहित है |
लीजिये, यहां पर यहां पर ईश्वर को ही पत्नी की उपमा दी गई है! तब फिर ईश्वर की ब्रह्मविद्या को पत्नी क्यों न कहा जाये? "पत्नी" शब्द पति का स्त्रीलिंग है। पति शब्द "पा रक्षणे" धातु से बना है। यानी जो रक्षण,पोषण करे , वो पति। इसका स्त्रीलिंग पत्नी हुआ। अतः ब्रह्मविद्या व परमात्मा को पत्नी कहा जा सकता है।
विवाह से संबंधित सभी मंत्र द्विवचन सूचक शब्द दंपत्ति को संबोधित करते हैं, जो एक ही पत्नी और एक ही पति के रिश्ते को व्यक्त करता है | जिस के कुछ उदाहरण ऋग्वेद १०।८५।२४, १०।८५।४२ तथा १०।८५।४७ हैं , अथर्ववेद के लगभग सम्पूर्ण १४ वें कांड में विवाह विषयक वर्णन में इसका उपयोग हुआ है | प्रायः मंत्रों में जीवन पर्यंत एकनिष्ठ सम्बन्ध की प्रार्थना की गई है |
कृपया ध्यान दें, संस्कृत में एकवचन और बहुवचन से पृथक द्विवचन का प्रयोग है, ताकि किसी भ्रम की गुंजाइश ना रहे |
वेदों में एक से अधिक पत्नियां रखने का हर जगह निषेध ही किया है-
a. ऋग्वेद १०। १०५।८ एक से अधिक पत्नीयों की मौजूदगी को अनेक सांसारिक आपदाओं के सादृश्य कहता है |
b. ऋग्वेद १०। १०१ ।११ कहता है – दो पत्नियों वाला व्यक्ति उसी प्रकार दोनों तरफ़ से दबाया हुआ विलाप करता है, जैसे रथ हांकते समय उस के अरों से दोनों ओर जकड़ा हुआ घोड़ा हिनहिनाता है |
c. ऋग्वेद १०। १०१ । ११ के अनुसार दो पत्नियां जीवन को निरुदेश्य बना देती हैं |
d. अथर्ववेद ३ । १८।२ में प्रार्थना है – कोई भी स्त्री सह – पत्नी के भय का कभी सामना न करे |
हम इस संदर्भ में प्रमाणों के लिये अग्निवीर साइट का धन्यवाद करते हैं नीचे दी गई लिंक में जाकर आप अग्निवीर के विस्तृत लेख को पढ़ सकते हैं:-
अगले लेख में इसी विषय को आगे बढ़ायेंगे तथा नास्तिकों के अन्य आक्षेपों की क्रमशः समीक्षा करेंगे।
.... क्रमशः ।।
।।नमस्ते।।
।।वैदिक धर्म की जय।।

Sunday, July 29, 2018

परमात्मा के प्रतिद्वन्दी








◼️परमात्मा के प्रतिद्वन्दी(Competitor)◼️
✍🏻 लेखक : पं० गंगा प्रसाद जी उपाध्याय
[पूज्य पं० गंगा प्रसादजी उपाध्याय उर्दू भाषा के भी अद्वितीय लेखक थे । ‘खुदा के रकीब' शीर्षक से उन्होंने यह विचारोत्तजक रोचक लेख लिखा था । यह एक से अधिक बार उर्दू पत्रों में छंपा । मेरी दृष्टि में यह उनके सर्वश्रेष्ठ लेखों में से एक हैं । मेरी चिरकाल से यह इच्छा थी कि इसका हिन्दी अनुवाद करके प्रकाशित करवाऊँ । आशा है । आर्य संसार के विचारशील पाठक महान् दार्शनिक लेखक के इस आध्यात्मिक एवं बौद्धिक प्रसाद को पाकर स्वयं को भाग्यशाली मानेंगे । - अनुवादक - राजेन्द्र जिज्ञासु ]
▪️ सारे आस्तिक आस्तिक नहीं हैं , न सारे नास्तिक नास्तिक हैं
सारे आस्तिक आस्तिक नहीं हैं , न सारे नास्तिक नास्तिक । नास्तिकों की संख्या तो उंगलियों पर गिनी जा सकती है और इनमें भी वास्तविक नास्तिक बहुत थोड़े हैं परन्तु यदि सब आस्तिकों के मन व मस्तिष्क को टटोला जाय तो इन आस्तिकों में ईश्वर के उपासकों की संख्या बहुत थोड़ी मिलेगी ।
▪️नास्तिकों का कोई मन्दिर नहीं : - नास्तिकों के कोई मन्दिर नहीं हैं । न उनके पुजारी , न वे चेले बनाते हैं अथवा कण्ठी माला देते हैं । आस्तिकों के मन्दिरों , मस्जिदों व गिरजाघरों की भरमार है । एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है
🔥 काशी का हर कंकर शङ्कर है
यह बात केवल काशी तक ही नहीं है । प्रत्येक देश में ऐसा बातें मिलती है । परन्तु , यदि इतने नास्तिक होते जितनी की गिनती बताई जाती है तो संसार ऐसा न होता जैसा कि आज है ।
सच्चिदानन्द परमात्मा से व्याप्त सृष्टि में आनंद का अभाव है। घर में अशान्ति , मुहल्ले में अशान्ति , नगर में , प्रान्त में , देश में और सारे संसार में अशान्ति है । एक विचारशील मनुष्य प्रश्न उठता है , क्या वास्तव में मनुष्य ईशोपासक हैं ? जो परमात्मा की सत्ता ही नहीं मानता वह प्रतिद्वन्द्विता भी क्या करेगा ? उसकी दृष्टि में कोई ऐसा प्रतिद्वन्द्वी नहीं जिसे ईश्वर कहा जा सके अथवा जिसका उसको भय हो । अथवा दूसरी शक्तियां हैं जिनको वह अपना प्रतिद्वन्द्वी समझता है । तथा जिनको वश में करने के लिए वह सदा प्रयत्नशील रहता है परन्तु जो परमेश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हैं वे तो सब प्रकार से ईश्वर को अपने वश में करने की चिन्ता करते रहते हैं ।
▪️ भक्त के वश में हैं भगवान - अर्थात भक्ति क्या है ? भगवान पर नियंत्रण करने का एक साधन । कहते हैं कि बाबा तुलसीदास जी एक मन्दिर में दर्शन के लिये गए । वह मन्दिर था कृष्ण भगवान का जिसमें कृष्ण की मूर्ति बांसुरी बजा रही थी । तुलसीदास थे राम के उपासक । राम के सच्चे भक्त थे । उनसे वह मन्दिर राम से रहित देखकर न रहा गया । ( यह कहो कि सहा न गया ) । मचल गए । “ मैं तो तब दर्शन करूंगा जब मूर्ति धनुषवाण हाथ में लेकर राम का रूप धारण करेगी ।
▪️ ईश्वर की आज्ञा या ईश्वर को आज्ञा : - कहा जाता है कि ऐसा ही हुआ । कृष्ण की मूर्ति राम की मूर्ति बन गई । इस कहानी से पता चलता है कि भक्ति का उद्देश्य ईश्वर की आज्ञा का पालन करना नहीं है । प्रत्युत्त ईश्वर से अपनी आज्ञा का पालन करवाना है । क्या यह सच्ची ईश्वर भक्ति अथवा ईश्वर की पूजा हैं ।
▪️ ईश्वर के इतने प्रतिद्वन्द्वी : - आस्तिक संसार में ईश्वर के अनेक प्रतिद्वन्द्वी हैं । जो ईश्वर के भक्तों का ध्यान ईश्वर से हटाकर अपनी ओर खीचते रहते हैं । वे सब स्थान तो ईश्वर के स्थान पर पूजे जाते हैं , ईश्रर के प्रतिद्वन्द्वी हैं ।
इन सबमें प्रथम स्थान गुरुओं का है । कहावत प्रसिद्ध है जिसने गुरु के दर्शन कर लिये उसने ईश्वर के दर्शन कर लिए । अतः गुरु का स्थान ईश्वर के स्थान से अधिक समझा जाता है ।संसार में चाहे हिन्दू धर्म , चाहे अन्य मतों में जितने भी सम्प्रदाय हैं सबमें गुरु की महत्ता पर बल दिया गया है । तर्क यह है कि तुम ईश्वर को साक्षात् नहीं देख सकते . . . . गुरु तो सामने खड़ा है अतः गुरु को पूजो ! अनेक लोगों का यह विश्वास है कि गुरु ईश्वर का साक्षात स्वरूप है । इसलिये वे गुरु की पूजा को ही ईश्वर - पूजा समझते हैं ।
🔥गुरु गिरिधर दोनों खड़े किसके लागूं पाय ।
गुरु को शीश नवाय जिन गिरिधर दिये बताय ।
इन सबका भाव यह है कि गुरु की पूजा पहले करो फिर ईश्वर की और जब गुरुओं की पूजा होने लगी तो ईश्वर की पूजा संसार से लुप्त हो गई क्योंकि गुरु की पूजा को ही पर्याप्त समझा गया । जिस गुरु ने गिरधर को बता दिया वह प्रसन्न हो जायेगा और गिरधर को भी प्रसन्न कर सकेगा ।
▪️ ईश्वर को भौतिक वस्तुयें नहीं चाहिये : - ईश्वर की पूजा में ईश्वर भौतिक वस्तु नहीं है । न ही उसको भौतिक पदार्थों की आवश्यकता है । इसलिये ईश्वर की पूजा भौतिक वस्तुओं से नहीं होती । मन से ईश्वर का ध्यान करना ही तो ईश्वर की पूजा करना है परन्तु , गुरु तो एक मनुष्य है । उसका शरीर है । उसको शारीरिक आवश्यकतायें होना स्वाभाविक व आवश्यक है । उसे भोजन चाहिये , वस्त्र चाहिये , भवन चाहिये । अन्य सुख सुविधायें चाहियें । ये सब प्राप्त होने चाहिये । उसके चेले व चेलियों से ये सभी कुछ तभी तो मिलेगा जब कुछ ढोंग किया जाय और गुरु की महिमा जताने के लिये अनेक प्रकार की व्याख्यायें गढ़ी जायें । इसलिये आप देखेंगे कि गुरुओं की प्रसन्नता के लिये कितने यत्न किये जाते हैं । उनसे मन्नतें ( कामनाये ) मांगी जाती है । उनको स्नान कराया जाता है । उनके चरण तक धोकर पिये जाते हैं
▪️ एक राधा स्वामी मित्र का विचित्र उत्तर : — मैंने एक बार अपने एक राधा स्वामी मित्र से पूछा , ' आप गुरु का जूठा क्यों खा लेते हो ? क्या यह गन्दा काम नहीं ? इससे तो गुरुओं का रोग भी लग सकता है ।
उस प्रतिष्ठित मित्र ने मुझसे एक प्रश्न पूछा , “ क्या जूठा खाने से रोग लग सकता है ? मैंने कहा , हाँ , अवश्य लग सकता है “
मेरे मित्र ने उत्तर दिया कि “ जिस प्रकार से शारीरिक रोग जूठा खाने से गुरु के शरीर से शिष्य के शरीर में आ सकता है इसी प्रकार जूठा खाने से गुरुओं की आध्यात्मिकता भी चेले भीतर प्रविष्ट हो सकती है । ' '
▪️ प्रत्येक भद्दे काम के लिये युक्ति दी जाती है : - उस दिन मुझे पता लगा कि प्रत्येक व्यक्ति का एक दर्शन है । गन्दे से गन्दे कार्य के लिये वह एक तर्क रखता है । भले ही कुतर्क हो परन्तु तर्क तो है और उस तर्क को परखना प्रत्येक छोटे - बड़े के बस की बात नहीं है । मेरे मित्र ने जो युक्ति दी थी वह में तो सुनने अच्छी ही लगती थी ।
▪️ गुरु जूठा खिलाकर विचार प्रविष्ट नहीं करा सकता : - कम से कम उस मित्र को पूर्ण विश्वास था कि वह ठीक तथा विरोधी को चुप करने वाली युक्ति दे रहा है । ऐसा लगता है कि इस प्रकार की युक्तियाँ चेलों के मध्य कहीं जाती होगी । यद्यपि युक्ति सर्वथा लचर व भ्रामक थी । रोग तो शारीरिक होने से जूठा खाने से एक शरीर से दूसरे में जा सकता है । रोग के कीटाणु थूक के साथ दूसरे शरीर में बहुत सुविधापूर्वक प्रवेश कर सकते हैं परन्तु , आध्यात्मिकता के तो कीटाणु नहीं होते । गुरु अपना जूठा खिलाकर अपने विचार तो चेले के भीतर प्रविष्ट नहीं कर सकता । यदि ऐसा होता तो विभिन्न विषयों के कालेजों के प्राध्यापक अपने शिष्यों को जूठन खिलाकर विद्वान बना दें । गुरु की जूठन खाने का व ईश्वर की पूजा का परस्पर कुछ भी सम्बन्ध नहीं है — परन्तु लोग ईश्वर के स्थान पर गुरु को पूजते हैं ।
▪️ मेरी परिभाषा में गुरु ईश्वर के प्रतिद्वन्द्वी हैं : - मेरी परिभाषा में तो जो गुरु अपने चेले से पूजा कराता है , वह ईश्वर का प्रतिद्वन्दी हैं । संसार के मन्दिरों में देवताओं अथवा पूर्वजों की जो मूर्तियाँ पूजने के लिये रखी हुई हैं , वे सब ईश्वर के प्रतिद्वन्द्वी क्योंकि उनकी पूजा करने वाला यह समझ बैठता है कि अब ईश्वर की पूजा की आवश्यकता नहीं ।
▪️ ईश्वर नहीं देखा - मूर्ति दिखाई देती हैं : - लोग कहा करते हैं कि हमने ईश्वर नहीं देखा , हम इस मूर्ति को देख रहे हैं इसलिये इसी की पूजा करते हैं । यदि ईश्वर को देख पाते तो ईश्वर को पूजते ।
▪️ सो ईश्वर की खोज क्यों करें ? : - इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि हमने उसी को अपना ईश्वर मान लिया है । हमको अब किसी दूसरे ईश्वर की खोज में भटकने की आवश्यकता नहीं । कुछ लोगों को यह पट्टी भी पढ़ाई गई है कि ईश्वर की आत्मा गुरु के आत्मा में विलीन हो जाती है अत : गुरु के दर्शन भी ईश्वर के दर्शन हैं ।
▪️ ईश्वर भक्ति का आसन रिक्त होता है : - गुरु से आगे चलिये तो अवतार अथवा पैगम्बर लोगों के सामने आते हैं उन्होने अथवा उनके अनुयायियों ने सदा यह प्रयास किया है कि इन अवतारों अथवा पैगम्बरों को ईश्वर का प्रतिनिधि स्वीकार कर लिया जाय । एक बार परमात्मा का प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाय तो उनकी ही पूजा आरम्भ हो जाती है । ईश्वर की पूजा या तो सर्वथा विलुप्त हो जाती है अथवा अपना आसन पैगम्बर पूजा ( Prophet worship ) के लिये रिक्त कर देती है और सब लोग भगवान के स्थान पर पैगम्बर को मान लेते हैं । हजरत मुहम्मद ने अपने चेलों से स्पष्ट कहा है कि जो मेरे हाथ पर बैअत करेगा वह समझ ले की खुदा की बैअत ( दीक्षा ) कर रहा है ।
▪️ और पादरी कहेगा कि ईसा के बिना मुक्ति असम्भव है : - हजरत ईसामसीह को लोगों ने खुदा का पुत्र कहा , खुदा कहा और खुदा का उत्तराधिकारी स्वीकार किया । परिणाम यह निकला कि परमात्मा को भूल गये । यदि किसी पादरी के सामने जाकर यह कहिये कि मैं ईश्वर को मानता हूँ परन्तु ईसा को नहीं तो वह अविलम्ब कहेगा कि हजरत ईसा के पास आये बिना मुक्ति का प्राप्त होना असम्भव है ।
▪️ और मूर्तियाँ भी ईश्वर की प्रतिद्वन्द्वी बन गई : - यही स्थिति अन्य मतों की है । श्रीकृष्ण की मूर्ति को पूज लो और ईश्वर की पूजा हो गई । राम की मूर्ति के सामने सिर झुका लो और ईश्वर की पूजा हो गई । इस प्रकार न केवल राम व कृष्ण हीं भगवान के प्रतिद्वन्द्वी हुए प्रत्युत उनकी मूर्तियाँ भी भगवान् की प्रतिद्वन्द्वी बन गई।
एक बार एक व्यक्ति देहली में महात्मा गाँधी की समाधि पर माला फेर रहा था । गांधीजी आजीवन स्वयं को ईश्वर का सेवक मानते रहे परन्तु , उनके चेलों ने गांधीजी को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी बना दिया । गांधी का पुजारी स्वयं को सीधा ईश्वर का पुजारी समझता है तथा आवश्यकता नहीं समझता कि दूसरे ईश्वर की खोज में यत्नशील रहे ।
▪️ आस्तिकता का कितना अंश ? : - साधारण आस्तिकों में आस्तिकता का कितना अंश है ? यह मैं एक घटना से स्पष्ट करता हूँ । प्राचीनकाल में राजाओं के सामने उनके शासन सम्बन्धी कोई शिकायत करने का किसी में साहस नहीं होता था । जब किसी को राजा का ध्यान किसी शिकायत की ओर खींचना होता था तो वह दरबार के बहुरुपिये की सहायता लेता था । केवल बहुरूपियों को यह अनुमति थी कि वे भली बुरी बातें अपने ढंग से कह सकते थे और शासक उससे परिणाम निकाल लेते थे ।
इस प्रकार अवध के नवाब के बहुरूपियों ने एक रूप बनाकर अपना खेल किया । एक बहुत बड़ा पीतल का हाण्डा भूमि पर रखा गया । उस पर एक छोटा हाण्डा , उस पर उससे एक छोटा हाण्डा — इस प्रकार से एक बड़े हाण्डे पर पच्चीस तीस छोटे हाण्डे रख दिये गए । सबसे ऊपर वाली हाण्डी बहुत छोटी थी । अब एक बहुरूपिये ने प्रश्न किया , यह नीचे का हाण्डा क्या
▪️ अवध के नवाब के कर्मचारी : - दूसरे बहुरूपिये ने उत्तर दिया , यह ग्राम के पटवारी की भेंट है । फिर दूसरे ने प्रश्न किया यह ऊपर का छोटा हाण्डा क्या है ? उत्तर मिला , यह कानूगो की भेंट है । तीसरा उससे छोटा तहसीलदार की घूस था । चौथा कोलैक्टर की और अन्त में सबसे छोटी हाण्डी के विषय में कहा गया कि यह माननीय नवाब साहेब का मालिया है । इस खेल में बहुरूपियों ने नवाब के सम्मुख यह प्रकट कर दिया कि आपके कर्मचारी सहस्रों रुपये की घूस डकार जाते है और स्वल्प राशि दरबार तक पहुँच पाती है ।
▪️ थे तो प्रतिद्वन्द्वी परन्तु निष्ठावान : - यह थी कहानी नवाब अवध के प्रबन्ध की जिसमें घूस में किसी प्रकार से कोई कमी नहीं छोड़ी गई थी । ये छोटे अधिकारी कर्मचारी नवाब के प्रतिद्वन्द्वी थे और ऐसे प्रतिद्वन्द्वी जो प्रतिद्वन्द्विता तो करते थे तथापि नवाब के आज्ञाकारी निष्ठावान कर्मचारी समझे जाते थे
परन्तु ये प्रतिद्वन्द्वी तो भीतर छुपकर भुजा को लिपटे साँप थे । उनको कैसे मारा जा सकता था ।
इस प्रकार यदि देखा जाय तो जो लोग ईश्वर पूजा की दुहाई देते हैं वहीं लोगों को ईश्वर के नाम पर अधिक ठगते हैं । जिस प्रकार मृतकों का श्राद्ध खाने वालों से कोई नहीं पूछता कि तुमने मृतकों के नाम पर जो भोजन प्राप्त किया वह मृतकों को पहुँचाया अथवा नहीं ? इसी प्रकार किसी गुरू अथवा पैगम्बर से कोई नहीं पूछता कि जो बात आप भगवान् के प्रतिनिधि के रूप में कहते हो वह कहाँ तक भगवान् का प्रतिनिधित्व करती है
▪️ कोई गुरू नहीं रोकता : - सच्चे गुरुओं का काम अपनी पूजा करवाना नहीं है । प्रत्युत अपने अनुयायियों को यह बताना है कि ईश्वर के स्थान पर किसी अन्य की पूजा मत करो । सच्चा गुरु वह है जो अपने चेलों को ऐसी कुचेष्टा से बचाये व रोकता रहे कि मैं ईश्वर नहीं हूँ और ईश्वर वह है जो आपका भी उपास्य है और मेरा भी । मैं ईश्वर का उसी प्रकार का एक पूजक हूँ जैसे तुम हो परन्तु , कोई गुरू ऐसा नहीं करता । उसका लाभ इसी में है कि लोग उसे ईश्वर का प्रतिनिधि समझते रहें । जो ईश्वर से माँगना चाहते हैं , वह उसी से माँगते रहें और विचित्रता यह है कि यह मनुष्य - पूजा लोगों को ईश्वर से बहुत दूर कर देती ।
▪️ चेले क्या माँगते हैं ? : - लोग गुरू के सामने जाकर यह नहीं कहते कि ईश्वरीय नियमों के पालन करने की विधियाँ बतायें कोई कहता है , मेरा उच्च अधिकारी रुष्ट हो गया है , प्रार्थना करें कि प्रसन्न हो जाय । कोई कहता है , मेरा बच्चा जो लम्बे समय से रोगग्रस्त हैं कैसे अच्छा हो जायेगा । कोई कहता है कि मेरे केस में मुझे सफलता मिल जाय
▪️ गुरु क्या करता है ? : - और आप जानते है कि गुरु क्या करता है ? वह दो मिनट के लिये आँखें बन्द कर लेता और फिर जो चाहे व्यवस्था दे देता है ।
▪️ मरने वाले नरक में जांय अथवा स्वर्ग में : - मुझे एक मित्र ने एक महात्मा का वृतान्त सुनाया जो बीस वर्ष पूर्व आर्यसमाजी थे परन्तु अब महात्मा बन गये हैं और लोगों को ईश्वर का दर्शन करवाने लगे और इस प्रकार उन्होने लाखों की सम्पत्ति एकत्र कर ली है । वह इसी प्रकार से कहते हैं कि तुम्हारा रोगी छ: मास में निरोग हो जायेगा । किसी से कहते हैं , विपदा तो आ पड़ी है , दूर हो जायेगी । चेले प्रसन्न होकर चले जाते हैं और सहस्रों रुपयों की भेंट चढ़ा जाते हैं ।
जहाँ वह महात्मा जाते हैं उनका राजाओं , सरीखा सन्मान होता है । ईश्वर कहाँ है ? कैसा है ? क्या चाहता है ? उसको कैसे प्रसन्न कर सकते हैं ? इनकी कतई चर्चा नहीं होती । बड़े बड़े भण्डारे होते हैं और चढ़ावे चढ़ते हैं । मरने वाला नरक में जाय अथवा स्वर्ग में , उनको अपने हलवे माण्डे से काम । ये सब भगवान् के प्रतिद्वन्द्वी और आस्तिकता के शत्रु हैं । जब तक ये पुजायें रहेंगे कोई ईश्वर - पूजक नहीं बन सकता ।
✍🏻 लेखक : पं० गंगा प्रसाद जी उपाध्याय
अनुवादक - राजेन्द्र जिज्ञासु जी
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🌻वेदों की ओर लौटें🌻
प्रस्तुति - 📚आर्य मिलन

Thursday, July 26, 2018

क्या दयानंद जी युद्ध में पकड़ी महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार करना मानते थे




शंका-क्या दयानंद जी युद्ध में पकड़ी महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार करना मानते थे?

समाधान- महर्षि दयानंद कृत सत्यार्थप्रकाश , षष्टम समुल्लास पर एक आक्षेप किया जाता है, वह ये कि महर्षि ने राजधर्म के प्रकरण में युद्ध में जिस-जिस सैनिक के हाथ में आये तोल,घी के कुप्पे , व स्त्री आदि ग्रहण करने को कहा है। यहां पर स्त्री ग्रहण करने से कुछ दुष्ट लोग अर्थ करते हैं कि उन स्त्रियों के साथ जो चाहे, वो किया जाये। उनको रखैल बनाकर कामभोग किया जाये, या फिर गुलाम बनाकर बेचा जाये।

दरअसल ये राक्षसी ,असभ्य और कबीलाई प्रथा अरबी इस्लाम वालों की है। उसका प्रमाण हम कुरान हदीस व तफसीर से दे सकते हैं। हम चकित हैं कि मुसलमान महर्षि के इस लेख पर कैसे आक्षेप कर सकते हैं, जबकि उनकी आसमानी किताब में खुद उनके अल्लाह ने काफिरों की युद्धबंदी औरतों को रखैल बनाना लिखा है।

खैर, पहले हम महर्षि दयानंद के लेख पर विचार कर लें।
विवादास्पद लेख के पहले महर्षि दयानंद लिखते हैं-

"विशेष इस पर ध्यान रक्खे कि स्त्री, बालक, वृद्ध और आतुर तथा शोकयुक्त पुरुषों पर शस्त्र कभी न चलावे। उनके लड़के-बालों को अपने सन्तानवत् पाले और स्त्रियों को भी पाले। उन को अपनी माँ बहिन और कन्या के समान समझे, कभी विषयासक्ति की दृष्टि से भी न देखे। जब राज्य अच्छे प्रकार जम जाय और जिन में पुनः पुनः युद्ध करने की शंका न हो उन को सत्कारपूर्वक छोड़ कर अपने-अपने घर व देश को भेज देवे और जिन से भविष्यत् काल में विघ्न होना सम्भव हो उन को सदा कारागार में रक्खे।।८।।"

पाठकों! इस लेख को दुबारा पढ़िये। यहां स्वामीजी ने साफ-साफ कहा है कि युद्ध में पकड़ी महिलाओं का पालन पोषण बाकायदा करे, उनके बच्चों का भी पालन करे। यह बात भी रेखांकित की है कि उनको अपनी बहन,बेची या मां के समान माने और उन पर विषयासक्ति न करें। तब फिर उनके साथ "जो चाहे वो करना, उनको रखैल बनाना" आदि कल्पना का खंडन इसी पूर्वापर के लेख से हो जाता है।

आगे विवादास्पद लेख देखिये-

"इस व्यवस्था को कभी न तोड़े कि जो-जो लड़ाई में जिस-जिस भृत्य वा अध्यक्ष ने रथ घोड़े, हाथी, छत्र, धन-धान्य, गाय आदि पशु और स्त्रियां तथा अन्य प्रकार के सब द्रव्य और घी, तेल आदि के कुप्पे जीते हों वही उस-उस का ग्रहण करे।।११।।"

यहां पर हाथ आई हुई स्त्रियों को ग्रहण करने की बात है। मगर उनको मां,बहन, बेटी की तरह पालना है और उनमें विषयासक्ति नहीं करनी है, ये दयानंद जी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है।

यही नहीं, शत्रुराज्य के जीते पदार्थों का एक भाग उन स्त्रियों व उनके बालकों को मिलेगा। तथा यदि ने असमर्थ हैं तो उनका पालन करना व उनकी संतानों के बालिग होने पर उनको यथायोग्य उनका भाग देने का वर्णन है-

"परन्तु सेनास्थ जन भी उन जीते हुए पदार्थों में से सोलहवां भाग राजा को देवें और राजा भी सेनास्थ योद्धाओं को उस धन में से, जो सब ने मिल के जीता है, सोलहवां भाग देवे और जो कोई युद्ध में मर गया हो उस की स्त्री और सन्तान को उस का भाग देवे और उस की स्त्री तथा असमर्थ लड़कों का यथावत् पालन करे। जब उसके लड़के समर्थ हो जायें तब उनको यथायोग्य अधिकार देवे। जो कोई अपने राज्य की रक्षा, वृद्धि, प्रतिष्ठा, विजय और आनन्दवृद्धि की इच्छा रखता हो वह इस मर्यादा का उल्लंघन कभी न करे।।१२।।"

इस पूरे प्रकरण को पढ़कर स्पष्ट हो गया है कि महर्षि दयानंद युद्ध में निराश्रित गई महिलाओं को यथोचित सम्मान देकर उन्हें पुनर्वास के पक्षधर थे।

- कार्तिक अय्यर