Tuesday, March 19, 2024

दलितोद्धारक आर्यसमाजी :श्री पंडित गंगाराम जी

 



दलितोद्धारक आर्यसमाजी :श्री पंडित गंगाराम जी
ऋषि के जीवन में एक नाई के प्रस्तुत किये भोजन का वर्णन पाया जाता है जिसे ऋषि ने भरी सभा में अंगीकार किया । यह दूसरे शब्दों में अछूत उद्धार का पहिला सूत्र पात था ।
ऋषि के अनुयायियों में इस कार्य को सब से पूर्व सामूहिक रूप देने का श्रेय मुजफ्फरगढ़ में काम कर
मुजफ्फ़रगढ़ी कहलाने वाले पं ० गंगाराम को है । पं ० गंगाराम रहने वाले तो बजवाड़े के थे परन्तु इन के जीवन का बहुत साभाग मुज़फ्फरगढ़ जिले में व्यतीत हुआ था । इस इलाके में आर्य समाज के कार्यकर्ता जिन की हड्डियाँ तक इसी इलाके के अर्पण हो गई , पण्डित जी थे । हम इन के शेष जीवन पर आगे चलकर दृष्टि डालेंगे । यहाँ केवल इतना ही कहना है कि सामूहिक अछूत उद्धार का , जिसे आगे जाकर दलितोद्धार तथा पतितोद्वार कहा जाने लगा , सूत्रपात इन्हीं के परिश्रम से हुआ था । पण्डित जी अभी सात वर्ष के थे कि एक दिन इन के गाँव के बाहर एक तालाब में , जिस से अछूत लोग पानी ले लिया करते थे , एक लड़के ने पेशाब कर दिया । पण्डित जी उस लड़के से लड़ पड़े और जब तक उस ने क्षमा न माँग ली उसे इन्हों ने छोड़ा नहीं । इन के जीवन की यह घटना आगे आने वाले इन के द्वारा किये गये अछूत उद्धार के कार्य की मानो पूर्व छाया थी ।
तीस वर्ष की आयु में जब ये मुज़फ्फरगढ़ में ओवरसियर थे , इन की दृष्टि में एक जाति ऐसी आई जो हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बीच में थी । ये अपने मृतकों को तो दबा देते , शेष देव - पूजन , तीर्थ यात्रा , पर्वों तथा मोटे मोटे संस्कारों यथा विवाह इत्यादि में पुराहितों की सहा यता लेते तथा हिन्दुओं का सा व्यवहार करते थे । परन्तु थे ये अस्पृश्य । सर्व - साधारण इन्हें " ओड " कहते थे , परन्तु इन का अपना नाम भगीरथ था ।
भगीरथ लोग अपने उद्भव का स्रोत सगर राजा को बताते थे । उनका कहना था कि सगर की सन्तान जिसकी संख्या साठ हज़ार थी , एक ऋषि की आज्ञानुसार प्रतिदिन नया कुआँ खोद कर उस के पानी से यज्ञ किया करती थी । इस से पृथिवी माता को कष्ट होता था । एक बार पृथिवी ने इन्हें पानी नहीं दिया । इस से ये अत्यन्त व्याकुल हुए । गहरी खुदाई के पश्चात् जब इन्हें पानी दिखाई दिया तो प्यास के मारे ये कुएँ में कूद पड़े । ऊपर से कुआँ बन्द हो गया और श्राद्ध आदि द्वारा इन की सद्गति न हो सकी । इस प्रकार पुरुष तो मर गए परन्तु स्त्रियाँ रह गई । एक गर्भवती स्त्री की कोख से भगीरथ नाम का बालक पैदा हुआ । बड़े हो कर उस ने कैलाश पर्वत पर तप किया और शिवजी के वर से गंगा को स्वर्ग से उतार लाया । आगे - आगे भगीरथ था और पीछे - पीछे गंगा नदी बह रही थी । जब ब्राह्मण अपने ग्राम के बाहर पहुँचा तो गंगा को वहीं छोड़ कर अपनी माता से उस ढक गये कुएँ का स्थान पूछने गया । इतने में एक ने गुम हो गई गंगा नाम की अपनी गाय को पुकारा । गंगा नदी उसे भगीरथ समझ उस के पीछे हो ली और कुएँ के स्थान से आगे निकल आई । भगीरथ पीछे से पहुँचा तो उस ने उसे लौटा ले जाना चाहा । परन्तु नदी ने कहा गंगा उलटी नहीं बहती । इस प्रकार भगीरथ का भगीरथ परिश्रम व्यर्थ गया । भगीरथ और उस की सन्तति अपने पूर्वजों की अपगति के कारण तभी से भ्रष्ट हो गई हैं । ये तभी से अस्पृश्य हैं और शोक के रूप में सारा पहरावा खुर्दरे कम्बल का ही पहनते हैं । इन के उद्धार का समय तब होगा जब इन के पितरों का उद्धार होगा ।
पं ० गंगाराम जी ओवरसियर होने के कारण उन ओडों से भी काम लेते थे । इन का हृदय उन की दीन अवस्था देख कर बार - बार द्रवित होता था । उन की पैदायश की उपर्युक्त कहानी सुन कर इन्हों ने उस पर विचार किया । एक दिन ओड जाति के मुख्य पुरुषों को बुला कर कहा : - भाई ! तुम्हारे पितरों का उद्धार हो गया है । उन्हों ने चकित हो , कर पूछा : - कैसे ? इन्हों ने उत्तर दिया : - भगीरथ के गंगा उतार लाने मात्र से। जिस गंगा के स्पर्श से करोड़ों और मनुष्य सद्गति को प्राप्त हो चुके हैं , क्या उसे स्वर्ग से नीचे ले आने वाला स्वयं उस के पुण्य - प्रताप से वञ्चित रह सकता है ? उस की तो अगली पिछली सभी पीढ़ियाँ मुक्लि - धाम को पहुँच चुकी हैं । भोले - भाले ओडों ने पण्डित जी के ये वचन सुने वे चकित रहे । पण्डित जी गम्भीर बने रहे । उन्हें और विश्वास दिलाने को कहा : - पानी का एक लोटा भर लाओ । वे पानी ले आए । पण्डित जी ने गायत्री का पाठ कर उसे पान किया । इस से ओडो को निश्चय हो गया कि वास्तव में अब वे अस्पृश्य नहीं रहे ।
पण्डित जी ने ओडो की शुद्धि का प्रश्न मुज़फ़्फ़रगढ़ समाज में रखा और मुज़फ़्फ़रगढ़ से एक मील की दूरी पर मौज़ा भूटापुर में चाह कटवाल वाला पर उन्हें यज्ञोपवीत दे कर एक बड़े समूह की शुद्धि की । इस के पश्चात् यह शुद्धि कई अन्य स्थानों पर भी हुई ।
कठिनता तब हुई जब मुलतान शहर में इस शुद्धि का प्रबन्ध किया गया । पण्डित जी ने आस - पास की सारी बस्तियों के ओडो को शुद्धि का निमन्त्रण दे दिया और नियत दिन स्वयं मुलतान जा पधारे । पण्डित जी का विचार था कि मुलतान के आर्य अधिक उदार होंगे । परन्तु वहाँ जा कर इन्हें ज्ञात हुआ कि बड़े स्थानों में बिरादरी का भय अधिक है । डर यह था कि इस प्रकार के क्रान्तिमय आन्दोलन से हिन्दुओं का विरोध , जो पहिले ही कम तीव्र न था , और अधिक बढ़ जायेगा । परन्तु पण्डित जी अपनी धुन के धनी थे । इन्हों ने हटने का पाठ पढ़ा ही न था । पहिले तो शुद्ध होने वाला कोई था ही नहीं परन्तु जब वे धीरे - धीरे आने लगे और सत्तर ओड इकट्ठे हो गए तो समाज के प्रधान ला ० चेतनानन्द ने अन्त को यह स्वीकार कर लिया कि समाज मन्दिर में नहीं , कहीं अन्यत्र शुद्धि कर ली जाय । इस निर्णय के अनुसार बोहड़ दवज़े के बाहर नहर के किनारे सिविल सर्जन ला ० जसवन्तराए के मकान में शुद्धि संस्कार हुआ ।
यह दृश्य देखने योग्य था । सदियों के बिछड़े भाई आपस में गले मिल रहे थे । समाज का एक गलित अंग स्वस्थ हो कर शरीर का जीता - जागता भाग बन गया । ये आर्य जाति के सौभाग्य के चिह्न थे । इस के पश्चात् दलितों की शुद्धि सैकड़ों अन्य स्थानों पर हुई परन्तु इस पुण्य कार्य में अग्रणी होने का श्रेय स्वनामधन्य पं ० गंगाराम को है । भगीरथ जाति के लिए वे उन के पूर्वज की खोई हुई गंगा थे । उसी गंगा के दर्शन से उन का हमेशा के लिए उद्धार हो गया । पण्डित जी ने केवल संस्कार ही नहीं करा दिया । मुज़फ्फरगढ़ में इन की शिक्षा के लिए पाठशाला भी खोली परन्तु यह अधिक समय चली नहीं । पहिला काम था । उस के सफल होने में देर लगनी ही थी । आज इस शुद्धि को सैंतालीस वर्ष हो गये । इस समय में अनेक ओड पण्डित , अनेक बाबू , अनेक बनिये बन चुके हैं और आर्य जाति से उन का कोई भेद - भाव नहीं है । ओड जाति के लिए गंगाराम के दर्शन वास्तव में " पतित - पावनी गंगा " के दर्शन थे- उस गंगा के जिस की प्रतीक्षा वे कई पीड़ियों से करते चले आते थे । १८८८ ही में हम बदायूँ जिले में गँवर नाम के ग्राम में एक जाति भ्रष्ट परिवार के पुनः प्रवेश का समाचार पाते हैं । यह संस्कार हिन्दू सभा द्वारा कराया गया है । इस से प्रतीत होता है कि आर्य जाति जो आज तक अपने व्यक्तियों तथा समूहों के पृथकरण की ही अभ्यस्त चली आती थी , अब उस के विशाल भवन में प्रवेश तथा पुनः प्रवेश का द्वार भी खुल गया । यह इस जाति के इतिहास में एक नए युग का आरम्भ था जिस के लाने का सेहरा आर्य समाज के सिर है ।
लेखक :- पंडित चमूपति एम ए
पुस्तक :- आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का इतिहास 1935
प्रस्तुतकर्ता :- अमित सिवाहा

क्रांतिकारियों के प्रेरणा स्त्रोत - महर्षि दयानंद सरस्वती




 क्रांतिकारियों के प्रेरणा स्त्रोत - महर्षि दयानंद सरस्वती

आर्याभिविनय का प्रभाव
पुस्तक - बागी दयानंद
लेखक - स्वामी विद्यानन्द सरस्वती
आर्याभिविनय के दूसरे अध्याय (प्रकाश) के पहले मन्त्र में ऋषि दयानन्द ने लिखा है-
"हे मेरे प्रभो! आपकी कृपा से हम सब लोग एकता प्रियमान, रक्षक, सहायक, परम पुरूषार्थी हैं। एक-दूसरे का दुःख न देख मित्रता। स्वदेशस्थाधिकरण को एकरूपता अत्यंत निर्वैर, प्रियतम, पाखंडभक्ति प्रदान करें।"
पुनः ३१वें मन्त्र में ऋषि परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं-
"हे महाराजाधिराज परब्राह्मण! अखंड खंड राज्य के लिए शौर्य, धैर्य, नीति, विनय, अभिनय और बलादि उत्तम गुणयुक्त कृपा से हम लोगों को यथावत पुष्ठ कर। अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों और हम लोग पराधीन कभी न हों। हे प्रभो! हमें 'दयावापृथिवीभ्यम्' = स्वर्ग अर्थात् परमोत्कृष्ट मोक्षसुख (निःश्रेयस) तथा पृथ्वी अर्थात संसार-सुख (अभ्युदय) इन दोनों के लिए हमारी कृपादृष्टि से हमारी विद्या, पुरुषार्थ, हाथी, घोड़ा, सुवर्ण, हीरादि रत्न, उत्कृष्ट शासन , उत्तम पुरुष और प्रियदियुक्तियुक्त गुण, जिससे हम लोग किसी भी पदार्थ के बिना दुःखी न हो सकें। हे सर्वाधिपते! शूद्रादि भी सेवादि गुण - ये सब स्वदेशभक्त, उत्तम, हमारे राज्य में हैं, यानि किसी भी बात के लिए हम अलोकतांत्रिक पर अभद्र न हों। रात को तैयार हो गए। बाकी अन्य लोग थे- श्यामजीकृष्ण वर्मा।
विश्वविख्यात रूसी लेखक मेक्सिम गोर्की द्वारा भारत के मेज़िनी कहे जानेवाले तथा विदेशों में रहकर ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सङ्घर्ष का गठन करनेवाले श्यामजीकृष्ण वर्मा का जन्म सन् १८५७ की ऐतिहासिक क्रान्तिवाले वर्ष में ४ अक्टूबर को सौराष्ट्र में कच्छ प्रदेश के माण्डवी नामक क़स्बे में हुआ था। भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन के वे आदि प्रवर्तक थे। भारतीय छात्रों के लिए इङ्गलैण्ड में पढ़ने के लिए सहायता के उद्देश्य से उन्होंने छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की। उन्हीं की प्रेरणा और सहायता से वीर सावरकर और लाला हरदयाल जैसे देशभक्त तैयार हुए।
स्वामी दयानन्द की प्रेरणा और सहायता से श्यामजीकृष्ण इङ्गलैण्ड पढ़ने के लिए गये। स्वामीजी ने उनका परिचय ब्रिटिश संस्कृतज्ञ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष मोनियर विलियम्स से कराया। ऑक्सफ़ोर्ड से सन् १८८३ में बी०ए० की डिग्री प्राप्त करनेवाले वे प्रथम भारतीय थे। वहाँ के बेलिओल कॉलेज में पढ़ते समय वे महारानी विक्टोरिया के शासन में इङ्गलैण्ड के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रधानमन्त्री ग्लैड्सटोन के सुपुत्र (लार्ड) ग्लैड्स्टोन के सहपाठी थे। कालान्तर में श्यामजीकृष्ण ने प्रधानमन्त्री ग्लैड्स्टोन से भारत में गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग की थी। श्यामजीकृष्ण वर्मा ने राष्ट्रीयता और ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध
सङ्घर्ष का पहला पाठ स्वामी दयानन्द से ही पढ़ा था। १८७५ में जब स्वामीजी ने आर्यसमाज की स्थापना की थी तो उसके सदस्यों की सूची में स्वामी दयानन्द के साथ श्यामजीकृष्ण वर्मा का नाम भी था। स्वामीजी ने श्यामजी को अपनी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का सदस्य मनोनीत किया था। आर्याभिविनय से प्रभावित श्यामजी ने १९०५ में रियासत के प्रधानमन्त्री पद से त्यागपत्र दे दिया और सारा जीवन एक आवारा मसीहा के रूप में व्यतीत किया।
क्रान्तिकारियों के गुरु और भारत में ब्रिटिश शासन, विशेषतः पुलीस की दृष्टि में आतङ्क‌वाद के प्रतीक चन्द्रशेखर आज़ाद जब तक आर्याभिविनय के कम-से-कम एक मन्त्र का पाठ नहीं कर लेते थे तब तक रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं तोड़ते थे। "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है", तथा "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" जैसे गीतों के गायक रामप्रसाद बिस्मिल को कौन नहीं जानता? सामान्यरूप से मनुष्य मृत्यु से भयभीत होते हैं, परन्तु बिस्मिल मृत्युञ्जय थे। फाँसी से चार दिन पहले 'स्थितधी मुनि' के समान जेल की काल कोठरी में लिखी अपनी आत्मकथा में अगले जन्मों में 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' के आदर्श की पूत्ति का सङ्कल्प प्रकट किया और १९ दिसम्बर १९२७ ईसवी को सोमवार के सबेरे 'विश्वानि देव' के वैदिक मन्त्र के उच्चारण के साथ फाँसी के फन्दे को स्वयं अपने गले में डाल लिया। उनकी अन्तिम इच्छा थी- मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे। बाक़ी न मैं रहूँ न मेरी आरज़ू रहे ॥ रामप्रसाद बिस्मिल के ये शब्द ३० अक्टूबर १८८३ को अजमेर में व्यक्त अपने आदर्श ऋषि दयानन्द की भावना 'ईश्वर ! तेरी इच्छा पूर्ण हो' के अनुरूप थे।
सन् १९२०-२१ के असहयोग के आन्दोलन के दिनों में कठोर यातनाएँ सहनेवाले सियालकोट के लाला गणेशदास ने अपने संस्मरणों में लिखा था-
"मैं बड़े गर्व और विश्वास के साथ कहता हूँ कि संसार की कोई भी शक्ति मुझे भयभीत नहीं कर सकती और बड़ी-से-बड़ी विपत्तियों में भी मैं समर्पण नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे आर्याभिविनय से अदम्य साहस, आध्यात्मिक शक्ति और मानसिक शान्ति प्राप्त हो चुकी है।"
स्वाधीनता संग्राम में आर्यों के लिए आर्याभिविनय अपूर्व शक्ति व प्रेरणा का स्रोत थी, है और रहेगी।

Vedas on World Peace

 



Vedas on World Peace


-Satyavrat Siddhantalankar

(Reproduced by Dr. Vivek Arya)

Since the dawn of creation the world is torn between two conflicting emotions and thoughts- love and hate. A person loves those, who he thinks will help him in the realization of his interests and hates those, who are likely to oppose him in the fulfilment of his ambitions. Thus two orders are created with regard to an individual, family, group, society, nation and country. Thus an individual loves and hates others on basis of his relations. The same principle applies to families, groups, societies, nation and countries. But the ultimate aim should be to bring the peace to the whole world. 

To obtain peace in the World the Vedas can act like a best guide. The message of Vedas for the World peace is 

 शृ॒ण्वन्तु॒त॑स्य पु॒त्रा विश्वे॑ऽअ॒मृऽआ ये धामा॑नि दि॒व्यानि॑ त॒स्थुः  - Yajurveda-11/5

All men, children of the Immortal Divine! Descendants of common heritage, that you are all one. 

The Rig Veda says:
 सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒ सं वो॒ मनां॑सि जानताम् । दे॒वा भा॒गं यथा॒ पूर्वे॑ संजाना॒ना उ॒पास॑ते -Rigveda- 10/ 191/2

Your thought should be in harmony with each other, your speech, should be in harmony with each other, your action should be in harmony with each other. This is how your elders realizing their responsibility played their part in society. And again :

स॑मा॒नी प्र॒पा स॒ह वो॑ऽन्नभा॒गः स॑मा॒ने योक्त्रे॑ स॒ह वो॑ युनज्मि। स॒म्यञ्चो॒ऽग्निं स॑पर्यता॒रा नाभि॑मिवा॒भितः॑ ॥- Atharva Veda- 3/30/6

You should drink together, eat together, live together as if joined in a common yoke. Just as the pokes rotate fixed in a common axle similarly you should feel yourselves fixed in social organization worshiping God who manifests himself in the form of sacrificial fire- Agni. 

And again :

यस्तु सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मन्ने॒वानु॒पश्य॑ति। स॒र्व॒भू॒तेषु॑ चा॒त्मानं॒ ततो॒ न वि चि॑कित्सति ॥- Yajurveda-40/6

One who sees all creatures as if they were his own selves and himself in others—his mind rests in peace with no doubts to disturb it. 

And again: 

अयु॑तो॒ऽहमयु॑तो म आ॒त्मायु॑तं मे॒ चक्षु॒रयु॑तं मे॒ श्रोत्र॑मयु॑तो मे प्रा॒णोऽयु॑तो मेऽपा॒नोऽयु॑तो मे व्या॒नोऽयु॑तो॒ऽहं सर्वः॑ ॥-Yajurveda 19/51/1

I am not one but am millions; myself I see in millions of beings. These millions upon millions of eyes, ears, lives are but my eyes, my ears, lives. I see myself at one with the countless lives of the earth-they are me and I am they. 

And again: 

 अभ॑यं॒ नक्त॒मभ॑यं दिवा नः॒ सर्वा॒ आशा॒ मम॑ मि॒त्रं भ॑वन्तु ॥  Atharva Veda 19/15/6

In whatever direction I turn my eyes I look upon every one as my friend.

In Atharva Veda, one of the Chapters (3/30) known as Samanjasya Sukta. Universal Harmony of mind-is entirely devoted to the cultivation of equilibrium in society. It visualizes a social organization in which there is harmony of head and heart among the. components of society and conflict सहृ॑दयं सांमन॒स्यमवि॑द्वेषं कृणोमि वः।-and in which men and women live as brothers and sisters--'मा भ्राता॒ भ्रात॑रं द्विक्ष॒न्मा स्वसा॑रमु॒त स्वसा॑। it exhorts the people of the world to love one another as the cow loves her first-born - अ॒न्यो अ॒न्यम॒भि ह॑र्यत व॒त्सं जा॒तमि॑वा॒घ्न्या ॥
And further, in Atharva Veda (12-1-45) it is stated 

जनं॒ बिभ्र॑ती बहु॒धा विवा॑चसं॒ नाना॑धर्माणं पृथि॒वी य॑थौक॒सम्। स॒हस्रं॒ धारा॒ द्रवि॑णस्य मे दुहां ध्रु॒वेव॑ धे॒नुरन॑पस्फुरन्ती ॥
Just as a household with men and women speaking different tongues and holding diverse thoughts remains a unit undivided– similarly this earth of ours people with men of different languages and different views should remain a unit undivided. And then, just as a cow standing steady yields milk in a thousand streams, so the earth will yield its wealth in a thousand different manner.

And again in Atharva Veda 12-1-60 we read :
भु॑जि॒ष्यं पात्रं॒ निहि॑तं॒ गुहा॒ यदा॒विर्भोगे॑ अभवन्मातृ॒मद्भ्यः॑ ॥

All the enjoyable wealth that is hidden in the bowels of the earth is meant to be unearthed for the enjoyment of one and all who are born of the mother's womb, those who are ‘matrimat’ .It is a very novel idea of saying that provision per head, clothing and shelter is every body's birthright.

In Atharva Veda 12-1-1 
स॒त्यं बृ॒हदृ॒तमु॒ग्रं दी॒क्षा तपो॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञः पृ॑थि॒वीं धा॑रयन्ति। सा नो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य॒ पत्न्यु॒रुं लो॒कं पृ॑थि॒वी नः॑ कृणोतु ॥

the fundamental principles that should guide the seekers of One World idea are beautifully enunciated. It says that the basic factors that can sustain the peace of the earth are : 

1. Truth-स॒त्यं
2. Law-ऋतम् 
3. Vow for service―दी॒क्षा
4. Austerity-तप:
5. Faith-ब्रह्म॑
6. Sacrifice-य॒ज्ञः 

The cementing forces that can sustain the peace of the earth are- -Truth, the irrevocable and inexorable Law, Vow for the Service of Mankind, living a Simple and Austere Life, Faith in the Universal Divine Power and Selflessness to the extent of sacrificing one's interests for the welfare of others. Conversely, untruth, Lavishness, Luxury, Denial of the Supreme Power and Violence destroy the earth. The world today is surely in need of peace which is excluding its grasp simply because we applaud Truth but practice Falsehood, we exhort others: to honor the Law but break the self-same-law where we are concerned, we preach our fellowmen to take a vow of service but ourselves we are saturated with selfishness, we admonish others to live an austere life but we roll in luxury. This contrariness in our character is due to the fact that we have no faith in the Spiritual Power which supervises over all that lives and moves and has its being.

The Preamble to the constitution of UNESCO begin with the following words: "Since wars begin in the minds of men, it is in the minds of men that defenses of peace must be constructed." 

How true. The constitution-makers of UNESCO did correctly diagnose the malady. It is very true that war and peace originate in the mind of man. But did they correctly apply the remedy? Representatives of far-flung countries sit together in Assembly halls of United Nations but though physically seated next to one another they are as distant in mind as the geographical boundaries of their countries. How could you expect of peace in such a situation?
In daily Agnihotra a devotee of  Vedas culture recites at least 25 mantras from the Vedas the burden of the song being Shanti, Shanti-Peace, Peace-one of the Mantras being

ओ३म्: द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति:
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वेदेवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:
सर्वं शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥

Let there be peace in the heavens, peace in the outer space, peace on earth, peace in oceans, peace in forests where shrubs, herbs and trees grow. Let there be, peace in the organs and minds of every living creature. Let there be peace eternal, in and out, here, there and everywhere. Let there be peace and nothing but peace in every nook and corner of the world. Let that peace enter into me-Peace, Peace and Peace.
After hearing this, need I tell you what is the contribution of Vedic thought towards world peace.
It is in the heart, it is in the mind that the seed of peace can be grown and cultivated. It is there that it sprouts, grows and bears fruits. The Upanishadic Rishis of yore proclaimed to the world from house-tops:

 मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥  कठोपनिषद् 2/1/10
One who sees maniness in the world moves from death to death. The Vedas declare :

यस्मि॒न्त्सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मैवाभू॑द्विजान॒तः। तत्र॒ को मोहः॒ कः शोक॑ऽएकत्वम॑नु॒पश्य॑तः ॥  Yajurveda 40/7

The message of this Vedic Mantra is: What personal and individual attachment there can remain in one to whom ALL become ONE and ONE becomes ALL. Personal attachment, selfish interest and Ambition only cause sorrow and suffering but peace.

In spite of the reverberating and exasperating calls for peace in the Assembly Halls of U.N.O. there can be no peace, since wars have their origin in the minds of men and not in battlefields. It were only the Vedic Rishis who carried the fight for peace in the minds of men when they repeated again and 

-तन्मे॒ मनः॑ शि॒वस॑ङ्कल्पमस्तु ॥;  Let my mind be full of purity of thought and as they were the first of mankind who discovered this truth-the truth that the seed of war and peace lies embedded in the mind-let us pay homage to them at this hour of crisis for peace, and chant with the Vedic Rishis :

 OM SHANTI, SHANTI, SHANTI.