Wednesday, February 26, 2020

नास्तिक मत समीक्षा




नास्तिक मत समीक्षा

लेखक- पण्डित हरिदेव जी तर्क केसरी
प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ

प्रश्न १- नास्तिक का क्या लक्षण है? अर्थात् नास्तिक किसे कहते हैं?
उत्तर- जो ईश्वर की सत्ता से इन्कार करे वह मुख्य रूप से नास्तिक कहा जाता है। परन्तु स्वामी दयानन्द सरस्वती ने दस प्रकार के लोगों को नास्तिक संज्ञा दी है। यथा-
(१) जो ईश्वर को न माने। (२) जो आत्मा और पुनर्जन्म स्वीकार न करे और यह कहे कि अग्नि, वायु, जल तथा पृथ्वी से आत्मा उत्पन्न होता और मृत्यु के पश्चात् इसका नाश हो जाता है इसलिए परलोक की चिन्ता करना व्यर्थ है। (३) जो ईश्वरीय ज्ञान वेद को न माने अर्थात् ज्ञान का विरोधी हो। (४) जो अभाव से भाव की उत्पत्ति माने, नेस्ति से हस्ती की पैदायश पर विश्वास रखता हो। (५) जो ईश्वर को बिना कर्मों के स्वेच्छा से फल प्रदाता मानता हो अर्थात् यह कहे कि ईश्वर अपनी मर्जी से जिसको चाहे जैसा बना दे लूला-लँगड़ा, अंधा, कोढ़ी इत्यादि। (६) स्वभाव-वादी, जो कहे कि स्वभाव से ही अपने आप ही सब कुछ बन बिगड़ रहा है, बनाने बिगाड़ने वाला कोई नहीं, जैसे जैन मत। (७) जो अपने आपको ब्रह्म या भगवान माने, "अहं ब्रह्मा अस्मि" अर्थात् मैं ब्रह्म ही हूँ। खुद खुदा हूँ, जैसे नवीन वेदान्ती। (८) जो यह कहे कि संसार नित्य है, सदा से है और सदा रहेगा। जैसे चार्वाक। (९) जो केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को माने, अन्य प्रमाणों का निषेध करे। (१०) शून्यवादी, जो कहता है कि सब शून्य ही शून्य है, वास्तव में किसी वस्तु की सत्ता ही नहीं। इन दस प्रकार के नास्तिकों में सब नास्तिकों की गणना हो जाती है।

प्रश्न २- नास्तिक मत का प्रचार कब और कहाँ से चला?
उत्तर- नास्तिक मत के प्रचार का काल और स्थान भिन्न-भिन्न है, परन्तु मुख्य रूप से नास्तिक मतों का जन्मदाता भारत देश ही है। चार्वाक, बौद्ध और जैनियों ने नास्तिकवाद की नींव उस समय रखी जब कि पश्चिमी सभ्यता का अभी जन्म भी नहीं हुआ था, भारतवर्ष में मायावाद और नास्तिकवाद के विचार आदि प्राचीन काल से पाए जाते हैं। रामचन्द्रजी के जमाने में "जाबाल" ऋषि तथा तथा हरिवंश देश का राजा "बीना" भी कुछ ऐसे ही विचार रखते थे, परन्तु भारतवर्ष प्राचीनकाल से ही धर्म प्रधान देश रहा है, इसलिए नास्तिकवादी विचारधारा को यहां कभी भी सफलता प्राप्त नहीं हुई। इस देश में पुरातन काल से ही ईश्वर, जीव, प्रकृति को नित्य, अनादि तथा स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार किया जाता रहा है, इसलिए नास्तिकवाद का यहां विस्तार नहीं हो सका। परन्तु इस समय भारत में जैन, बौद्ध, कम्युनिष्ट तथा पश्चिमी विचारधारा के पोषक कुछ ग्रेजुएट इस नास्तिकवादी विचारधारा का बड़े प्राबल्य से प्रचार व प्रसार कर रहे हैं।

प्रश्न ३- नास्तिकवाद के सबसे प्रथम प्रचारक तथा विस्तारक नेता मुख्य रूप से कौन हुए हैं?
उत्तर- व्यक्तिगत रूप से नास्तिकवाद का प्रचारक कौन-कौन, कहाँ-कहाँ और कब-कब हुआ निश्चय से नहीं कहा जा सकता परन्तु नास्तिकता का मुख्य रूप से प्रचारक तथा प्रसारक चार्वाक मत को ही माना जाता है।

प्रश्न ४- चार्वाक मत कब प्रचलित हुआ? और इसका संस्थापक कौन था?
उत्तर- इस मत का जन्मदाता कौन था, यह निश्चय से नहीं कहा जा सकता, परन्तु कुछ लोग चार्वाक का अर्थ चबाने, खाने वाला करते हैं, कुछ लोग चार्वाक मीठी वाणी बोलने वाला यह अर्थ करते हैं। कुछ लोग चार्वाक का अर्थ अधिक बोलने वाला करते हैं, कुछ लोग चार्वाक को एक आचार्य बतलाते हैं, जिसने यह मत प्रचलित किया। परन्तु अन्वेषण मत के संचालक "आचार्य बृहस्पति" थे, जो बुद्ध से तीन सौ वर्ष पूर्व तथा ईसा से आठ सौ वर्ष पूर्व हुए।

प्रश्न ५- चार्वाक मत प्रचलित होने के क्या कारण थे?
उत्तर- इस मत के प्रचलित होने से पूर्व यहां वाममार्गियों का प्राबल्य था। वाम मार्ग के दो अर्थ हैं, एक तो वाम का अर्थ है सुन्दर और दूसरा अर्थ है उलटा। वाममार्गी अपने मत को सुन्दर मार्ग कहते थे परन्तु इनके कुकर्मों को देखकर वैदिक सिद्धान्तों ने इन्हें कुमार्गी या वाममार्गी अर्थात् उलटे मार्ग पर चलनेवाला कहा, वाममार्गी संज्ञा देने के कई कारण थे।
१. वाममार्गी पशुओं और मनुष्यों तक की बलियां देते थे।
२. इस मत में व्यभिचार का जोर था। मातरमपि न त्यजेत- यह इनका नारा था।
३. मांस, शराब की प्रवृत्ति लोगों में अधिक थी। यज्ञों तक में मांस, शराब का प्रयोग होता था।
४. जन्तर-मन्तर, जादू-टोना, भूतप्रेत तथा चुड़ैल आदि पर लोगों को पूर्ण विश्वास था।
५. प्रत्येक बुरी बात और अनिष्ट रीति-रिवाज को शास्त्रों के प्रमाणों से सिद्ध किया जाता था और प्रत्येक बुरी बात को लोग धर्म का अंग और मुक्ति का साधन समझते थे।

इस प्रकार के विचारों की प्रतिक्रिया और विरोध के फलस्वरूप चार्वाक या नास्तिकमत का प्रादुर्भाव हुआ। परन्तु वर्तमान समय में इस मत का खूब जोरों से प्रचार हो रहा है; बौद्ध, जैन, पाश्चात्य विद्वान् तथा मार्क्सवादी कम्युनिष्ट इस मत का जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं? इनकी मुख्य मान्यताओं का आस्तिक नास्तिक सम्वाद रूप से वर्णन किया जाता है।

नास्तिक आस्तिक सम्वाद

नास्तिक- इस संसार का कर्त्ता, धर्त्ता, संहर्त्ता, कोई नहीं। आग, हवा, मिट्टी, पानी, चारों तत्व स्वतः अपने आप स्वभाव से मिलते हैं और उससे जगत् की उत्पत्ति हो जाती है।
आस्तिक- बिना चेतन परमेश्वर के निर्माण किये जड़ पदार्थ स्वयं आपस में स्वभाव से नियमपूर्वक मिलकर उत्पन्न नहीं हो सकते। यदि स्वभाव से ही होते हों तो द्वितीय सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, नक्षत्र आदि आप से आप क्यों नहीं बन जाते।
दूसरे बनाने वाले के बिना कोई वस्तु नहीं बनती, और यह संसार बना हुआ है, कार्यरूप है अतः इसका भी कोई न कोई कर्त्ता अवश्य होना चाहिए, जो ज्ञानपूर्वक इस जड़ प्रकृति को कारण रूप से कार्य रूप में ले आए अथवा कार्यरूप से कारण रूप में परिवर्तित कर दें, ऐसा केवल सर्वज्ञासृष्टि कर्त्ता ईश्वर ही कर सकता है, दूसरा नहीं। इसलिए वेदान्त दर्शन कहता है- "जन्माद्यस्ययत:" (१/१/२) अर्थात् जो संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्त्ता है वही ईश्वर है।
तीसरे इस शरीर के एक-एक अंग को देखो, देखने से पता चलेगा कि ऐसी अद्भुत रचना कोई जीव नहीं कर सकता, जीव तो शरीर का एक रोम भी नहीं बना सकता अतः जिसने शरीर और शरीर स्थित अंग-प्रत्यंग की अद्भुत रचना की है, वही परमेश्वर है।

नास्तिक- यदि ईश्वर की रचना से ही सृष्टि होती है तो माता-पिता आदि की क्या आवश्यकता है, बिना माता-पिता के ही सन्तान हो जाए?
आस्तिक- सृष्टि रचना दो प्रकार की है; एक ऐश्वरी, दूसरी जैवी। ऐश्वरी सृष्टि का कर्त्ता ईश्वर है, जैवी सृष्टि का नहीं क्योंकि वे जीवों का कर्म है। वह जीव ही कर्त्ता है ईश्वर नहीं। जैसे वृक्ष, फल, औषधि आदि ईश्वर ने उत्पन्न किये हैं, उसी को लेकर मनुष्य यदि कुटे-पीसे नहीं, न ही रोटी आदि बनवाए और न ही खाए तो क्या मनुष्य के बदले यह कार्य भगवान करेगा? कभी नहीं क्योंकि यह कार्य जीव के हैं भगवान के नहीं। यदि यह कार्य जीव न करे तो उनका जीना भी दूभर हो जाये, इसलिए आदि सृष्टि में जीव के शरीर रूपी सांचों को बनाना ईश्वर का काम है तत्पश्चात् उनसे पुत्रादि की उत्पत्ति करना जीव का काम है, ईश्वर का नहीं।

नास्तिक- यदि कोई ईश्वर है तो उसका प्रत्यक्ष क्यों नहीं होता, जिससे लोगों को उसके प्रति विश्वास हो जाये कि वस्तुतः ईश्वर है।
आस्तिक- यह कहना सर्वथा अशुद्ध और भ्रमपूर्ण है कि ईश्वर का कभी प्रत्यक्ष नहीं होता। हां! प्रत्यक्ष दो प्रकार का है। एक बाह्य प्रत्यक्ष जो इन्द्रियों द्वारा होता है; यथा आंख से रूप का, नासिका से गंध का, कान से शब्द का, रसना से रस का, और त्वचा से स्पर्श का। दूसरा आन्तरिक प्रत्यक्ष जो अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अंहकार) द्वारा किया जाता है; जैसे सुख-दुःख, राग-द्वेष, भूख-प्यास आदि एवं आत्मा अथवा परमात्मा का प्रत्यक्ष बाह्य इन्द्रियों द्वारा नहीं, अपितु आन्तरिक इन्द्रिय शुद्ध मन द्वारा होता है। बाह्य इन्द्रिय स्थूल हैं इस कारण स्थूल वस्तुओं का ही ग्रहण करती हैं, अति सूक्ष्म वस्तुओं का नहीं। इसलिए योगीजन ही सूक्ष्म बुद्धि एवं शुद्धान्त:करण द्वारा ईश्वर को साक्षात्कार करते हैं अन्य नहीं। इसलिए सत्यार्थप्रकाश में स्वामी जी ने लिखा है-

"जैसे कान से रूप और चक्षु से शब्द का ज्ञान नहीं हो सकता, ऐसे ही बिना शुद्धान्त:करण, विद्या, योग्याभ्यास और मल विक्षेप आवरण से रहित पवित्रात्मा के बिना उस परमात्मा का प्रत्यक्ष नहीं होता। जैसे बिना पढ़े विद्या की प्राप्ति नहीं होती, वैसे ही बिना योगाभ्यास और विज्ञान के परमात्मा की भी प्राप्ति नहीं होती।"
"जैसे शब्द रूप आदि से पंच भूतों आकाश, पृथ्वी आदि का ज्ञान होता है। वैसे ही सृष्टि में परमात्मा की रचना विशेष और ज्ञान विशेष को देखकर परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है।"
"जो पापाचरणेच्छा समय में भय, लज्जा और शंका उत्पन्न होती है, वह अन्तर्यामी ईश्वर की ओर से ही होती है। इससे भी परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है।
"जब जीवात्मा शुद्ध होकर परमात्मा का विचार करता है तब उसे अपना तथा परमात्मा दोनों का साक्षात्कार होता है।"

केनोपनिषद् में भी कहा है कि-
"दृश्यते त्वग्रया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्म दर्शिभि:।"
अर्थात् सूक्ष्म दृष्टि रखनेवाले योगी और तपस्वी लोग अपनी अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि द्वारा उस परमात्मा देव का दर्शन करते हैं।

ऐसे ही श्वेताश्वतर उपनिषद् में भी कहा गया है कि-
"ते ध्यान योगानुगता अपश्यन्"
अर्थात् उन्होंने (योगियों) ने ध्यान योग में समाधिस्थ होकर उस ब्रह्म का प्रत्यक्ष किया। और जिन्होंने प्रत्यक्ष किया वह मस्ती में झूमकर पुकार उठे।

"त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि, त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि, ऋतं वदिष्यामि, सत्यं वदिष्यामि।। -तैत्तिरीयोपनिषद्
हे प्रीतम मैंने तुझे प्रत्यक्ष कर लिया है तू प्रत्यक्ष ब्रह्म है, तुझमें प्रत्यक्ष ब्रह्म को ही मैं ब्रह्म कहूंगा। ठीक-ठीक कहूंगा, सत्य ही कहूंगा।

अतः उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध है कि ब्रह्म का वास्तव में प्रत्यक्ष होता है। यह सर्वथा सत्य है परन्तु साथ ही यह भी स्मरण रहे कि-
हर जगह मौजूद है पर वह नजर आता नहीं।
योग साधन के बिना उसको कोई पाता नहीं।।

नास्तिक- कठोपनिषद् में भी कहा है कि वह परमात्मा शुद्ध मन के द्वारा जाना जाता है; यथा "मनसैवेदमाप्तव्यम्" अशुद्ध मन द्वारा नहीं, तब शुद्ध मन की पहचान क्या है?
आस्तिक- जब वित्तैषणा, पुत्रैषणा, लोकेषणा ये तीनों मन से दूर हो जाती है तो मन शुद्ध और पवित्र हो जाता है तब उस प्रभु का साक्षात्कार होता है। इसे इस प्रकार कह सकते हैं कि जब मन के दोष त्रय- मल, विक्षेप और आवरण, साधनत्रय- स्तुति, प्रार्थना और उपासना द्वारा दूर हो जाते हैं तो मन पवित्र तथा स्थिर होकर उस पवित्र ब्रह्म को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।

नास्तिक- मल, विक्षेप, आवरण किसे कहते हैं?
आस्तिक- मन में दूसरों को हानि पहुंचाने का विचार तथा आत्मा पर जो पापों का जन्म-जन्मान्तर का कुसंस्कार है, वह 'मल दोष' नाम से कहा गया है।
लगातार विषयों का चिन्तन वा ध्यान अथवा मन के स्थिर न होने का नाम 'विक्षेप दोष' है।
संसार के नाशवान पदार्थों की प्राप्ति से उत्पन्न अभिमान का पर्दा जो मन पर पड़ा रहता है उसे आवरण दोष कहते हैं।
इन दोषों के दूर होने से उस प्रभु के दर्शन होते हैं।

नास्तिक- वह परमात्मा एक है या अनेक? संसार में जब हम अनेक प्रकार की बनी वस्तुएं देखते हैं तो उनसे अनेक कर्त्ताओं का अनुमान होता है। ऐसे ही जब हम इस विविध प्रकार के संसार में नाना प्रकार की वस्तुओं को बना देखते हैं तो इससे अनुमान होता है कि इस संसार को बनाने वाले भी कई कर्त्ता हैं, एक नहीं। अतः सन्देह होता है कि इस संसार को बनाने वाले भी कई ईश्वर हैं एक नहीं- किसी ने सूर्य, चाँद बनाया होगा, किसी ने पहाड़, समुद्र और किसी ने पशु-पक्षी, मनुष्यादि बनाये होंगे।
आस्तिक- ऐसी शंका करनी उचित नहीं क्योंकि कई बार एक ही कर्त्ता विविध प्रकार की वस्तुओं का निर्माता वा रचयिता होता है, जो उसकी अद्भुत बुद्धि तथा कौशल का परिचायक होता है। जितनी प्रकार की वस्तुओं का निर्माण करना कोई जानता है उतना ही ज्ञानवान् तथा बुद्धिमान वह समझा जाता है। इसी प्रकार अनेक विध संसार की रचना ईश्वर के अद्भुत ज्ञान और बुद्धि कौशल का परिचय कराती है न कि उसके अनेक होने की। अतः वेद, दर्शन सब उसके एक होने की साक्षी देते हैं, अनेक होने की नहीं; यथा-

य: एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति।
इन्द्र: पञ्च क्षितीनाम्।। -ऋग्० १/७/९
जो प्रभु एक है और अनेकों पृथिवियों तथा विविध प्रकार के धनों का स्वामी है तथा पांच प्रकार की प्रजा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र और निषाद का संरक्षक है उसकी स्तुति करो।

भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यो -अथर्व० २/२/१
जो सारे संसार का स्वामी है और एक है, वही प्रभु नमनीय एवं उपासना करने योग्य है।

न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते,
न पञ्चमो न षष्ठ: सप्तमो नाप्युच्यते।
नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते,
य एतं देवमेकवृतं वेद। -अथर्व १३/४/१६-२१
उसे दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचवा, छठा, सातवां, आठवां, नवां, दसवां नहीं कह सकते। जो उसे एक अद्वितीय और एक वृत अर्थात् अकेला संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयादि का व्यवहार चलाने वाला जानता था मानता है वही उसे जानता है। इस प्रकार एक ईश्वर के होने का स्पष्ट एवं सुन्दर वर्णन वैदिक धर्म के अतिरिक्त किसी अन्यत्र स्थान पर मिलना असम्भव और दुष्कर है।

नास्तिक- यदि वह ईश्वर अनेक नहीं एक है तो वह व्यापक है या एक देशी?
आस्तिक- वह सर्वव्यापक है एक देशी नहीं। यदि एक देशी होता तो अनेक विध संसार का पालन पोषण एवं संरक्षण कैसे कर सकता?

नास्तिक- यदि वह सर्वव्यापक है तो पुनः दिखाई क्यों नहीं देता।
आस्तिक- दिखाई न देने के कई कारण होते हैं; जैसे सांख्या-कारिका में कहा है-
अतिदूरात सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनो ऽनवस्थनात्।
सौक्ष्म्याद् व्यवधानादभिभवाद् समानाभिहाराच्च।।

(१) दिखाई न देने का प्रथम कारण है अति दूर होना। जैसे लन्दन या अमेरिका दूर होने से दिखाई नहीं देते परन्तु दिखाई न देने पर भी उनकी सत्ता से इन्कार नहीं हो सकता।
(२) दूसरा कारण है अति समीप होना, अति समीप होने से भी कोई वस्तु दिखाई नहीं देती। जैसे आंख की लाली या आंख का सुरमा आंख के अति समीप होने पर भी दिखाई नहीं देते, अथवा पुस्तक आंख के अति समीप हो तो उसके अक्षर दिखाई नहीं देते।
(३) इन्द्रिय के विकृत या खराब होने पर भी कोई वस्तु दिखाई नहीं देती। जैसे आंख दुखने पर या आंख के फूट जाने पर यदि कोई अन्धा कहे कि सूर्य, चन्द्रादि की कोई सत्ता नहीं, तो क्या यह ठीक माना जाएगा?
(४) मन के अस्थिर होने पर भी कोई वस्तु दिखाई नहीं देती। जैसे कोई व्यक्ति सामने से होकर निकल जाय, तो उसके विषय में पूछने पर उत्तर मिलता है कि मेरा ध्यान उस ओर नहीं था। इसलिए मैं नहीं कह सकता कि वह यहां से निकला है कि नहीं।
(५) अति सूक्ष्म होने पर भी कोई वस्तु दिखाई नहीं देती। जैसे आत्मा, मन, बुद्धि, परमाणु, भूख, प्यास, सुख-दुख, ईर्ष्या, द्वेष आदि।
(६) ओट में रखी या बीच में किसी वस्तु का पर्दा होने से भी वस्तु दिखाई नहीं देती। जैसे दीवार के पीछे रखी वस्तु या ट्रक के अन्दर रखी वस्तु।
(७) समान वस्तुओं के सम्मिश्रम हो जाने या परस्पर खलत-मलत हो जाने पर भी वस्तु दिखाई नहीं देती। जैसे दूध में पानी, तिलों में तेल, दही में मक्खन, लकड़ी में आग। इसी प्रकार परमात्मा सब वस्तुओं में व्यापक होने पर भी अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण आंखों से दिखाई नहीं देता। परन्तु-
जिस तरह अग्नि का शोला संग में मौजूद है।
इस तरह परमात्मा हर रंग में मौजूद है।।
(८) अभिभव से अर्थात् दब जाने से भी कोई वस्तु दिखाई नहीं देती। यथा दिन को तारे सूर्य के प्रकाश से दब जाने के कारण दिखाई नहीं देते अथवा आग में पड़ा लोहा अग्नि के प्रभाव से दिखाई नहीं देता। परन्तु ज्ञान की आंख से वह दिखाई देते हैं- ऐसे ही परमात्मा के दर्शन के लिए भी अन्दर की आंख की आवश्यकता है। किसी ने ठीक कहा है कि-
कहाँ ढूंढ़ा उसे किस जा न पाया-कोई पर ढूंढने वाला न पाया,
उसे पाना नहीं आसां कि हमने, न जब तक आप को खोया न पाया।

नास्तिक- यदि वह सब जगह सर्वत्र व्यापक है तब तो टट्टी, पेशाब, गन्दगी, कूड़े-करकट में भी उसका वास मानना होगा, इस प्रकार तो दुर्गन्ध से उसकी बड़ी दुर्गति होती होगी।
आस्तिक- आपका यह विचार ठीक नहीं क्योंकि सुगन्ध, दुर्गन्ध इन्द्रियों द्वारा प्रतीत होती है और परमात्मा इन्द्रियातीत अर्थात् इन्द्रियों से रहित है इसलिए उसे सुगन्ध-दुर्गन्ध नहीं आती।

दूसरे जो वस्तु अपने से भिन्न दूसरे स्थान पर या अपने से पृथक बाहर दूर हो उससे सुगन्ध-दुर्गन्ध आती है, जो वस्तु अपने ही अन्दर हो उससे सुगन्ध-दुर्गन्ध नहीं आती। जैसे पखाना अपने अन्दर हो तो दुर्गन्ध नहीं आती परन्तु बाहर पड़ा हो तो दुर्गन्ध आती है। इसी प्रकार यह सारा संसार और उसकी सब वस्तुयें भी ईश्वर के भीतर विद्यमान हैं, इसलिए उसे सुगन्ध-दुर्गन्ध नहीं आती, न ही उस पर इनका कोई प्रभाव होता है। कठोपनिषद् में ठीक कहा है-

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषै:।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्य:। -अ० २, वल्ली ५, श्लो० ११
जिस प्रकार सूर्य सब संसार की चक्षु है, परन्तु चक्षु के बाह्या दोषों से प्रभावित नहीं होता इसी प्रकार सब प्राणियों का  अन्तरात्मा लोक में होने वाले दुखों से लिप्त नहीं होता क्योंकि वह सब में रहता और उसमें सब संसार रहता है। संसार में रहते हुए भी वह सब से बाह्य अर्थात् सब संसार से पृथक है, अलिप्त है।

नास्तिक- जब वह स्वयं इन्द्रिय रहित तथा इन्द्रियों से न जानने योग्य है तो उसका ज्ञान होना असम्भव है, पुनः जानने का प्रयत्न व्यर्थ है?
आस्तिक- उसके जानने का प्रयत्न करना व्यर्थ नहीं क्योंकि ईश्वर की सत्ता का उसके विचित्र ब्रह्माण्ड और उसमें विचित्र नियमानुसार कार्यों को देखकर बुद्धिमान, ज्ञानी, तपस्वी भलीभांति अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रभु-प्राप्ति का साधन इन्द्रियां नहीं अपितु जीवात्मा है। योगाभ्यास आदि क्रियाओं द्वारा जीवात्मा उनका प्रत्यक्ष अनुभव करता है तथा आनन्द का लाभ करता है। कठोपनिषद् में ठीक कहा है-

एको वशी सर्व भूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा य: करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्। -अ० २, वल्ली ५, श्लो० १२
अर्थात् वह एक, सबको वश में रखने वाला, सब प्राणियों की अन्तरात्मा में स्थित है। अपनी आत्मा में स्थित उस परमात्मा का जो ज्ञानी जन दर्शन लाभ करते हैं वे परमानन्द को प्राप्त करते हैं।

नास्तिक- ईश्वर को मानने से मनुष्य की स्वतन्त्रता जाती रहती है, इसलिए मानना व्यर्थ है?
आस्तिक- ईश्वर को मनाने तथा उसकी उपासना करने का अन्तिम फल मुक्ति है। मुक्ति स्वतन्त्रता का केन्द्र है, जहां सब प्रकार के बन्धन टूट जाते हैं; अतः ईश्वर के मानने से मनुष्य की स्वतन्त्रता के साथ दुःखों की समाप्ति तथा आनन्द की प्राप्ति भी होती है इसलिए उसका मानना तथा जानना आवश्यक है, व्यर्थ नहीं।

नास्तिक- ईश्वर को अज्ञेय अर्थात् न जानने योग्य कहा गया है तो उसके जानने का परिश्रम करना व्यर्थ है।
आस्तिक- सृष्टि और उसके विविध पदार्थों तथा उसमें काम कर रहे अनेक विध नियमों को देखकर उसके रचयिता का बोध सरलता से हो जाता है। जैसे आकाश, वायु, अणु, परमाणु आदि इन्द्रिय रहित है परन्तु उसका निश्चय बुद्धि से हो जाता है, इसी प्रकार शुद्धान्त:करण द्वारा प्रभु का ज्ञान हो जाता है। इसमें किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं, परिश्रम की आवश्यकता है।

नास्तिक- ईश्वर को सगुण कहा गया है। प्रत्येक सगुण वस्तु नाशवान् होती है, इसलिए ईश्वर को भी नाशवान् मानना पड़ेगा।
आस्तिक- प्रत्येक सगुण वस्तु नाशवान् होती है, यह कोई नियम नहीं। जब सत्व, राजस्, तमस् गुणवाली प्रकृति ही नाशवान् नहीं तो ईश्वर सगुण होने से कैसे नाशवान् माना जा सकता है। ईश्वर न्याय, दया, ज्ञानादि गुणों से सगुण और अजर, अमर, अजन्मा आदि होने से निर्गुण कहलाता है।

नास्तिक- जगत् नित्य है, इसी प्रकार अनादि काल से चला आ रहा है और इसी प्रकार अनन्त काल तक चलता रहेगा। संसार की समस्त वस्तुएं अपने स्वभाव से बनती और बिगड़ती हैं- इसलिए ईश्वर के मानने की क्या आवश्यकता?
आस्तिक- जगत् मिश्रित वस्तुओं के संग्रह का नाम है। चूंकि संसार की समस्त वस्तुएं मिश्रित हैं इसलिए ये कभी न कभी अवश्य बनी है। मिश्रित वस्तुएं नित्य नहीं हुआ करती, अपितु नाशवान् होती हैं। इसलिए जगत् नित्य नहीं बल्कि रचा हुआ है। जब रचा हुआ है तो इसका रचियता भी कोई न कोई अवश्य है। उसको जानना सत्य ज्ञान को प्राप्त करना है अतः व्यर्थ नहीं।

नास्तिक- संसार में कोई नियम दिखाई नहीं देता, समस्त घटनाएं आकस्मिक (Accidental) दिखाई पड़ती हैं इसलिए नियामक ईश्वर को मानने की भी कोई आवश्यकता नहीं?
आस्तिक- संसार एक नियम में बंधा हुआ है, आकस्मिक रूप में कभी कहीं कुछ नहीं होता। सूर्य का समय पर उदय और अस्त होना, दिन के पश्चात् रात और रात्रि के पश्चात् दिन का होना, ऋतुओं का नियम से आना और जाना, सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय किसी वस्तु पर दृष्टि डालिये नियम में बंधी दिखाई पड़ेंगी, जब नियम है तो नियामक का होना भी आवश्यक है इसलिये उपनिषद्कार कहते हैं-

भयादस्याग्रिस्तपति भयात्तपति सूर्य:।
भयादिन्द्रश्च वामुश्च मृत्युर्धावति पञ्चम:।। -कठ० अ० २, वल्ली ६, श्लोक ३
इसी ब्रह्म के भय (नियम) से अग्नि तपता है, उसके भय से सूर्य प्रकाश देता है, उसी के नियम में बंधे हुए बिजली, वायु और मृत्यु अपना-अपना कार्य नियमपूर्वक कर रहे हैं।

नास्तिक- जो गुण ईश्वर में हैं वही सारे गुण प्रकृति में हैं पुनः ईश्वर की क्या आवश्यकता?
आस्तिक- जो गुण ईश्वर में हैं वे सब गुण प्रकृति में हैं यह कहना ठीक नहीं। ईश्वर चेतन और प्रकृति जड़ है। जब तक ईश्वर उसमें गति उत्पन्न नहीं करता वह कुछ भी नहीं कर सकती। प्रकृति जब सृष्टि अवस्था में होती है, काम करती है। जब प्रलयावस्था में होती है, विश्राम करती है। जब प्रलय समाप्त होकर सृष्टि रचना का काल आता है तो ईश्वर अपनी शक्ति से परमाणुओं में गति उत्पन्न कर देता है, उससे प्रकृति सूक्ष्मावस्था से स्थूलावस्था में परिणत होना प्रारम्भ हो जाती है। प्रथम अवस्था को महत्तत्व, दूसरी को अहंकार, तीसरी को पञ्चतन्मात्रा या सूक्ष्मभूत कहते हैं, चौथी अवस्था से १० इन्द्रियां और ग्यारहवां मन बनता है, पांचवीं अवस्था से सूक्ष्म शरीर बनता है। इन्हीं पांच स्थूल भूतों से सारी वस्तुएं और सब प्राणियों के विविध शरीर बनते हैं। यदि वह ईश्वर जड़ प्रकृति में गति न दे तो कुछ भी न बन सके? इसलिए उसके माने बिना निर्वाह नहीं।

नास्तिक- उस ईश्वर को मानने में क्या युक्ति व प्रमाण है, जिससे उसे माना जाये?
आस्तिक- उसके मनाने में अनेकों युक्ति व प्रमाण हैं जिससे  उसकी सिद्धि होती है, परन्तु संक्षेप से यह कह सकते हैं कि-
(१) जो इस संसार का कर्त्ता, धर्त्ता और संहर्त्ता है वह ईश्वर है क्योंकि बिना किसी चेतन सत्ता के सृष्टि का उत्पादन, धारण, पालन-पोषण तथा प्रलय में परिणत होना असम्भव है। वेदान्त दर्शन में भी कहा है- "जन्माद्यस्यपत:" जिससे संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय होती है वह परमेश्वर है।
(२) जो जीवों के कर्मों का फल प्रदाता है वह ईश्वर है क्योंकि स्वेच्छा से कोई भी जीव पाप कर्मों का फल नहीं भोगना चाहता।
(३) जो आदि सृष्टि में जीवों का ज्ञान प्रदाता है वह ईश्वर है क्योंकि बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त हो नहीं सकता और आदि सृष्टि में उसके सिवा कोई दूसरा गुरु न था। स: सर्वेषामपि गुरु कालेनानवछेदात्।
(४) जो इस सारे संसार को नियम में चला रही है उस चेतन शक्ति का नाम ईश्वर है।
तदेजति तन्नैजति तद्द्रे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:। -यजु० अ० ४०, मं० ५
वह सबको गति देता है परन्तु स्वयं गति नहीं करता, वह दूर से दूर और समीप से समीप है। वह सबके अन्दर तथा बाहर प्रत्येक वस्तु में ओत-प्रोत हो रहा है।

(५) समाधि सुषुप्ति मोक्षेषु ब्रह्मरूपता, समाधि, सुषुप्ति और मोक्ष में जिसके सम्पर्क में आकर जीव को परमानन्द की प्राप्ति होती है वह परमात्मा है- परन्तु आज संसार उसको भूलकर महान् कष्ट पा रहा है। अकबर इलाहबादी ने ठीक ही कहा था कि-

भूलती जाती है दुनिया आसमानी बाप को
बस खुदा समझा है इसने बर्फ को और भाप को
बर्फ गिर जायेगी इक दिन उड़ जायेगी भाप
देखना अकबर बचाये रखने अपने आपको

नास्तिक- आप कहते हैं कि ईश्वर की इन्द्रियाँ वा शरीर नहीं। जब इन्द्रियां और शरीर ही नहीं, तब वह इस विविध संसार की रचना कैसे करता है?
आस्तिक- वह सारे कार्य जो इन्द्रिय शरीर तथा अन्तःकरण द्वारा किए जाते हैं, अपने सामर्थ्य से करता है। इसलिए उसे इन्द्रियों व शरीर की आवश्यकता नहीं। उपनिषद् भी कहते हैं-

अपाणिपादो जबनो ग्रहीता, पश्यत्यचक्षु स: श्र्णोत्यकर्ण:।
सवेत्ति वेद्य न च तस्यास्ति वेत्ता, तमाहुरग्रयं पुरुषं महान्तम्।।
अर्थात् वह परमात्मा बिना हाथ के सब वस्तुओं का ग्रहण करता है, तथा पैर के बिना चलने वाला है। बिना आंखों के देखता और बिना कानों के सुनता है। वह सबको जानता है परन्तु उसे पूर्ण रूप से कोई नहीं जानता। उसको ज्ञानी महान् और आदि पुरुष कहते हैं।

तुलसीदास जी भी कहते हैं-
बिनु पग चले सुने बिनु काना, कर बिनु कर्म करे बिधि नाना।
बिनु वाणी वक्ता बढ़ योगी, आनन रहित सकल रस भोगी।।

Tuesday, February 18, 2020

आदि-भाषा का प्रकाश तथा उसका स्वरूप

◼️आदि-भाषा का प्रकाश तथा उसका स्वरूप◼️
✍🏻 लेखक - पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’
अब हम आदि-भाषा के स्वरूप पर कुछ विचार उपस्थित करते हैं। जब आदि-ज्ञान के स्वरूप को जान लिया जावे, तो प्रारम्भ में भाषा का व्यवहार कैसे चला होगा? ऐसी आकाङ्क्षा प्रत्येक व्यक्ति को होनी स्वाभाविक ही है।
यह नियम है कि मनुष्यों में ज्ञान विना[१] भाषा के नहीं रह सकता, और भाषा विना ज्ञान के नहीं रह सकती। इन दोनों का परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध रहता है। एक के विना दूसरे का रहना असम्भव है।
⚠️- - ध्यान दें❗️- -⚠️
💎 १. इस विषय में पाश्चात्यों के कुछ विचार भी उपस्थित करते हैं -
▪️(i) "I therefore declare my conviction as explisively as possible that thought in the sense of reasoning is not possible without language." (साइंस प्राफ लग्वेज-मूलरकृत)
▪️(ii) "Without language, says Sheeling, it is impossible to conceive philosophical nay, even any human consciousness" (साइंस आफ लैंग्वेज-मूलरकृत)
अर्थात् बिना भाषा के विचारों का प्रकट होना सर्वथा असम्भव है, उपयुक्त दोनों का यही भाव है।
▪️(iii) "At one time Sanskrita was the one language spoken all over the world." (इण्डियन रिव्यू माग २, ३ पृ० ४२) ।
अर्थात् एक समय था जब संस्कृत विश्व भर की भाषा थी।
▪️(iv) “That Panini knew the Pratishakhyas had been indi cated long ago by professor Bohilingk, and it can be proved, by a comparison of Panini sutras with those of Pratishakhyas, at Panini largely availed himself of the works of his predecessors."
(The Sanskrit Literature by Maxmuller)
⚠️- - - - - - - -⚠️
जैसे कुल परम्परामों में ज्ञान विना सिखाये नहीं चल सकता, इसी प्रकार भाषा भी विना सिखाये नहीं आ सकती। मनुष्य वही भाषा बोलता हुआ देखा जाता है, जो कि उसके कान में पड़ती है । एक शिशु भी वही भाषा बोलता हुआ दृष्टिगोचर होता है, जो भाषा वह अपनी माता वा पिता की गोद में बैठकर सुना करता है, चाहे वह माता पिता से कान में पडे या अपने परिवार वा अन्य बाह्य व्यक्तियों से, वह वही शब्द बोलता है, जो वह सुनता है। यही कारण है कि एक-एक प्रान्त (जिले) वा प्रदेश की भाषा में निरन्तर भिन्नता पाई जाती है। तात्पर्य यही है कि कोई भी मनुष्य वा बालक विना सिखाये दूसरों की भाषा कदापि नहीं बोल सकता। जब बोल नहीं सकता, तो यह कहना कि वह भाषा स्वयं बना लेगा, किसी प्रकार भी माननीय नहीं हो सकता, यह तो उसकी शक्ति से सर्वथा बाहर की बात है। संसार में कोई भी जन्म का गूगा नहीं मिलेगा, जो बहिरा न हो। चूकि वे बहिरे होते हैं, उन्हें सुनाई कुछ देता नहीं, अत: वे गूगे भी रह जाते हैं। योरोप, अमेरिकादि में अनेक बादशाहों ने, तथा भारत में सम्राट अकबर आदि ने कुछ नवजात बच्चों को मनुष्य की बोलचाल से सर्वथा पृथक् रखकर परीक्षण करने का यत्न किया। जिसके लिये उन्होंने कड़ा पहरा लगाया। परिणाम यह हुआ कि कुछ समय के पश्चात् यही देखने में पाया कि कोई कुछ भी नहीं बोल सकता था।
कहने का तात्पर्य यह है कि बिना निमित्त अर्थात् विना शिक्षा के संसार में कोई भी भाषा बोली नहीं जा सकती। ऐसी अवस्था में हमें यही कहना पड़ेगा, अर्थात् इसी सिद्धान्त को मानना होगा कि सृष्टि के आदि में ज्ञान और भाषा साथ-साथ लेकर ही मानव-समुदाय का प्रादुर्भाव संसार में हुआ, क्योंकि विना भाषा (शब्द) के ज्ञान रह ही कैसे सकता है ? जहाँ वैदिक ज्ञान वा ईश्वरीय ज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ, वहाँ भाषा का प्रादुर्भाव होना भी अनिवार्य है।
यदि कोई कहे कि मनुष्य बहुत समय तक गूगा ही रहा और वह इशारों से वा चक्षु के व्यापार अर्थात् इङ्गित, चेष्टित से ही काम चलाता रहा, जब मनुष्य का काम इतने से न चला तो भाषा बना ली। हम पूछते हैं भाषा बनाने से पूर्व निरन्तर इतने समय तक उनमें परस्पर संवाद कैसे चलता रहा होगा? जब तक अर्थ का निश्चय नहीं कर लिया होगा, तब तक परस्पर का संवाद क्या निरर्थक ही चलता रहा होगा? जो हो नहीं सकता, क्योंकि जब तक परस्पर यह निश्चय न हो जावे कि अमुक ध्वनि का अमुक अर्थ नियत रहेगा, संवाद की प्रक्रिया का चलना ही नितान्त असम्भव है, और वह भी उस दशा में, जब कि उनके पास अर्थयुक्त कोई ध्वनि ही नहीं थी। किस प्रकार एक ने दूसरे से कहा होगा कि भाई के लिये 'भा' और बहिन के लिये 'ब' और माता के लिये 'मा' कहना और समझना चाहिये। इतना ही नहीं, दूसरों ने इस अभिप्राय को भला समझा ही कैसे होगा?
अत: यह सब बुद्धिग्राह्य नहीं हो सकता। बुद्धि में तो यही बात ठीक बंठती है, जैसा कि हम ऊपर सिद्ध कर पाये हैं, कि स्वाभाविकज्ञानमात्र से ज्ञान की वृद्धि कदापि नहीं हो सकती, जब तक उसे नैमित्तिकज्ञान की सहायता न मिले । इसी प्रकार भाषा भी विना सिखाये नहीं पा सकती। अत: इसी सिद्धान्त पर पहुंचना पड़ता है कि आदि-ज्ञान और आदि भाषा का प्रादुर्भाव परमपिता परमात्मा की ओर से हुआ, और सृष्टि के आरम्भ में, जेसे ज्ञान एक था, वैसे भाषा भी एक थी। यदि मनुष्यों की भाषा एक न होती, तो मनुष्यों का परस्पर का व्यवहार ही कैसे चलता? क्योंकि मनुष्य ऐसा प्राणी है, जो समूह (सोसाइटी) के विना रह नहीं सकता। एक भाषा न होने से उसका काम चलना कठिन ही नहीं अपितु असम्भव है।
हम ऊपर कह पाये हैं कि 'ईश्वरीय-ज्ञान-वेद' वह ज्ञान है, जो सृष्टि के आदि में मनुष्यों को परमपिता परमात्मा से प्राप्त होता है। यह ज्ञान प्रभु ने जिस भाषा के द्वारा संसार को दिया है, वह भाषा किसी भी अन्य भाषा से उत्पन्न नहीं हुई, और न ही वह आप से आप प्रगट हो गई, क्योंकि मनुष्य के मुख से जो ध्वनि नादरूप में होती हुई वर्णात्मकध्वनि के रूप में हमारे कानों तक पहुंचती है, वैसी ध्वनि संसार में मनुष्य के अतिरिक्त और कहीं से भी सुनाई नहीं देती। हम स्पष्ट देखते हैं कि पशु पक्षियों की ध्वनियां वर्णात्मक नहीं होतीं। इससे यह बात भली-भांति समझ में आ सकती है कि मनुष्य अपने वर्गों को किन्हीं बाह्यध्वनियों से अनुकरण कर लेगा, ऐसा कभी नहीं हो सकता। यदि मनुष्य ऐसा कर सकता, तो संसार में किसी देश वा जाति की वर्णमाला अपूर्ण कभी दृष्टिगोचर न होती। प्रत्येक व्यक्ति वाह्यध्वनियों से अपनी-अपनी वर्ण माला को बढ़ा लेता, इससे यह सिद्ध है कि बाह्यध्वनियों से भाषा कभी उत्पन्न नहीं हो सकती। इसी प्रकार यह भी असम्भव है कि मनुष्य के मुख से भाषा अपने आप ही निकल पड़े, क्योंकि मनुष्य वही भाषा बोलता है जो कि वह दूसरों से सुनता है।
अतः यह सिद्ध है कि भाषा अपने ही आप मुख से निकल पड़े या बाह्यध्वनियों के अनुकरण द्वारा भाषा बन जावे, यह दोनों ही प्रक्रियाएँ नहीं बन सकतीं। यही मानना पड़ेगा कि वह आदि-भाषा केवल परमात्मा की प्रेरणा से ही उत्पन्न हो सकती है जैसे कि आदि ज्ञान । दूसरे शब्दों में आदि-ज्ञान और आदि-भाषा उस परमपिता परमात्मा की ही देन हैं और वे ऋषियों द्वारा प्राप्त होते हैं। परमात्मा की प्रेरणा से ही ज्ञान और भाषा उत्पन्न हो सकते हैं, अन्य उपायों से नहीं। देववाणी किसी भाषा का अपभ्रंश हो सो भी नहीं क्योंकि इसकी उत्कृष्टता को संसार की कोई भी भाषा नहीं पा सकती। और संसार में जितनी भाषायें चलीं, वे सब देवभाषा (संस्कृत) से परम्परा से बिगड़ कर बनी, जिनका उद्गम स्थान वेद है। यह सत्य है कि एक ही मूल भाषा अनेक कारणों से अनेक शाखाओं में फैलकर अनेक विभागों में विभक्त हो जाती है, जिसका विस्तृत विवेचन यहाँ कठिन है, अर्थात् कालान्तर में वही एक देवभाषा अनेक कारणों से, अनेक शाखाओं में फैलकर अनेक विभागों में विभक्त हो गई है, जिसका विस्तृत विवेचन करना यहाँ पर कठिन है। इस देवभाषा का भी उद्गम स्थान वेदवाणी है।
अत: वेदवाणी ही सब भाषाओं की आदिजननी है। वेद की भाषा कभी बोली जाती रही हो, ऐसी बात नहीं। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में इसे भाषा शब्द से नहीं पुकारा गया है, क्योंकि अनन्त प्रभु के ज्ञान वेद में समस्त संसार के ज्ञान का समावेश होने के लिये उसकी रचना स्वभावतः ही ऐसी होनी चाहिये थी, जिसमें एक शब्द अनेक अर्थों का द्योतक हो, अनेकविध ज्ञान एक ही शब्द के द्वारा प्रकट न होने पर ईश्वर को न जाने कितनी बड़ी रचना करनी पड़ती। अतः यही मानना होगा कि आदि में वेद से ले-ले कर शब्दों का प्रयोग होने लगा। जैसा कि शास्त्र कहता है
🔥सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।
वेदशन्देभ्य एवादी पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥ मनु० १।२१
वेद से लेकर ही लौकिक शब्दों के नित्य वाच्यवाचक सम्बन्ध जाने गये। वही देववाणी अर्थात् संस्कृत के नाम से कही जानेवाली भाषा व्यवहार में चली । वेद में कहा है -
🔥देवीं वाचमननयन देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति।
ऋ० ८।१००।११
विद्वान् लोग वेदवाणी के द्वारा (नित्य शब्दार्थसम्बन्धों को जानकर) देववाणी अर्थात् संस्कृतभाषा का विस्तार करते हैं, उसी को अन्य सब साधारण मनुष्य बोलते हैं।
संसार में जितनी भाषायें हैं, उनमें सब से अधिक विस्तृत, पूर्ण और परिश्रम-साध्य उच्चारण वेदभाषा का ही है। उच्चारण-विषय में जितनी सावधानता वेदवाणी के विषय में की गई है, उतनी किसी में नहीं। इतना ही नहीं, लौकिक संस्कृत भाषा के ही उच्चारण में जितनी मौलिकता, स्वाभाविकता और सावधानता आज तक बर्ती गई है, संसार की किसी भी भाषा के उच्चारण में नहीं बर्ती गई। यह बात ध्यान देने योग्य है कि जो भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ हम सुनते हैं, वे संख्या में भी अधिक मात्रा में संस्कृतभाषा में ही पाई जाती हैं। केवल संख्या में ही अधिक पाया जाना कोई महत्त्व नहीं रखता, सबसे बड़े महत्त्व की बात तो यह है कि संस्कृतभाषा की ६३ की ६३ ध्वनियाँ अपनी स्वाभाविकता-नैसर्गिकता-मौलिकता और अनिवार्यता को लिये हुये हैं। संख्या के विषय में सब विद्वान् जानते हैं कि लातीनी-हिब्रू में २० वर्ण माने जाते हैं, फ्रांस की भाषा में २५, अङ्गरेजी में २६, स्पेन की भाषा में २७, तुर्की और अरबी में २८, फारसी में ३१, रूसी भाषा में ३५ और संस्कृत में ६३।[वायुपुराण में ६३ अक्षर मानकर भी स्वर केवल ह्रस्व, दीर्घ ही माने हैं, ६३ अक्षर पूरे नहीं गिनाये।] वर्तमान आर्यभाषा वा सामान्य संस्कृत में ४७ अक्षर बोले जाते हैं, ऐसा किन्हीं का मत है, सो ठीक नहीं। वास्तविक ६३ अक्षर ही देववाणी संस्कृत में हैं, ये ध्वनियाँ स्वाभाविक हैं, जो सार्थक हैं। इससे स्पष्ट है कि संस्कृत भाषा की ही वर्णमाला सब से पूर्ण वा विस्तृत है।
लौकिक और वैदिक भाषा का भेद भी अवश्य ध्यान देने योग्य है। थोड़ी सी संस्कृत जाननेवाला भी समझ सकता है कि वेद के व्याकरण के नियम लौकिक व्याकरण के नियमों से भिन्न होते हैं। यह बात हम अपने पाठकों को आगे बतावेंगे । धातुओं की जितनी संख्या हमें संस्कृत भाषा में मिलती है, संसार की किसी भाषा में नहीं मिलती। अत: देव वाणी (संस्कृत) के आदि भाषा होने और वेद-मूलक होने में कुछ भी संदेह नहीं रह जाता।
आशा है भाषा की उत्पत्ति और उसके स्वरूप के विषय में या संक्षेप से इतना लिखना ही पर्याप्त होगा।
✍🏻 लेखक - पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
(जन्म- १४ अक्तूबर १८९२, मृत्यु- २२ दिसम्बर १९६४)
प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’
॥ओ३म्॥

Hindu Genocide in Goa Inquisition



Hindu Genocide in Goa Inquisition

[Defence Minister Rajnath Singh issued statement that "Forceful religious conversion is the biggest sin". We thanks Rajnath ji for quoting this bitter Truth. Since last 1200 years Hindus are facing forceful religious conversion by both Islamic and Christian invaders. It would have been better if the present government would have incorporated atrocities faced by Hindus in our syllabus so that the present generation would have learned about this Truth. Nehru while appointing madrasa educated Abdul Kalam as first education minister of India especially emphasized to hide this blood stained part of History syllabus. This deliberate attempt was to white wash the young mind and to sow with poisonous seeds of Nehruvian secularism. We accept Secularism in Vedic context which says whole mankind is like a family but the Nehruvian definition of Secularism is different. It says that Hindus should never raise voice for its religious freedom and surrender its rights to minorities. It ignored the very fact that Our country was divided due to RELIGION and it became Hindu Rashtra automatically in 1947 post partition. This article is a Historical account of Hindu genocide in Goa Inquisition caused by Francis Xavier. Readers should read in details from book by Pirolkar. -Dr. Vivek Arya]


Life timeline of Francis Xavier

1541:
Francis Xavier landed in Goa – sent there by Ignatius Loyola of Jesuit order under the direction of the King João III of Portugal.

1545:
Francis Xavier comes to the following conclusions that Hindus are an “unholy race” that they are “They are liars and cheats to the very backbone.”. that”the Indians being black themselves, consider their own color the best” and also that
“they believe that their gods are black. On this account the great majority of their idols are as black as black can be, and moreover are generally so rubbed over with oil as to smell detestably, and seem to be as dirty as they are
ugly and horrible to look at.”
He writes to Rome to install inquisition in Goa immediately.

1560: Viceroy’s building modified to become the palace of inquisition with 200 cells with residence of the first inquisitor,
house of secret, house of doctrine, any number of cells, and other special ones:of secret, of penitence; of perpetual confinement; of the tortures etc. Inquisition installed with powers higher than those of viceroys.

Apr-2 1560: Viceroy D Constantine de Braganca orders that all Brahmins should be thrown out of Goa and other areas under Portuguese control.

Feb-7 1575: Governor Antonio Morez Barreto,issues orders that the properties of those Hindus whose “presence was prejudicial to Christianity” would be confiscated.

1585 : The Third Concilio Provincial adopts a resolution
asking the king of Portugal to banish from Goa ‘the Brahmins, physicians and other infidels’ who the Church finds as an obstacle to convert the ‘the heathens’ to the ‘only true faith’.

Jan-31, 1620: Portuguese government orders that “…no Hindu, of whatever nationality or status he may be, can or shall perform marriages in this city of Goa, nor in the islands or adjacent territories of His Majesty…”

1625: Governor Francisco Barreto, issues orders that ‘bar Hindus from seeking employment’ in the Portuguese held Indian territory and Portuguese officials were ordered not to ‘use the services of any infidel in matters of his office anyway’

Historian Alfredo DeMello describes the performers of
Goan inquisition as “nefarious, fiendish, lustful, corrupt religious orders which pounced on Goa for the purpose of destroying paganism and introducing the true religion of Christ”

The Goan inquisition is regarded by all contemporary portrayals as the most violent inquisition ever executed by the
Portuguese Catholic Church. It lasted from 1560 to 1812 though in Europe it ended by 1774. (briefly restarted in 1778) Given below are some of the eye-witness accounts of this genocidal Holy office:

Eye-witness accounts of Goan inquistion:

“…The inquisition of Goa, distinguished
itself on account of the greater rigors than those of the tribunals of the metropolis; thousands of victims died at the stake in flames.
-Joao Felix Pereira(19th century) in Historia de Portugal, 3rd edition, page 235

“..The inquisition, this tribunal of fire, thrown on the surface of
the globe for the scourge of humanity, this horrible institution, which will eternally cover with shame its authors, fixed its brutal domicile in the fertile plains of the Hindustan. On seeing the monster everyone fled and disappeared, Moguls, Arabs, Persians, Armenians, and Jews. The Indians even, more tolerant and pacific, were astounded to see the God of Christianism more cruel than that of Mohammed, deserted the territory of the Portuguese…”
-Memoirs of Judges Magalhães and Lousada: (Vol 2,Annaes Marítimos e Coloniais,page 59)

“…The terrors inflicted on pregnant women made them
abort….Neither the beauty or decorousness of the flower of youth, nor the old age, so worthy of compassion in a woman, exempted the weaker sex from the brutal ferocity of the supposed defenders of the religion..
..There were days when seven or eight were submitted to torture. These scenes were reserved for the inquisitors after dinner. It was a post-postprandial entertainment. Many a time
during those acts, the inquisitors compared notes in the appreciation of the beauty of the human form. While the unlucky damsel twisted in the intolerable pains of torture, or fainted in the intensity of the agony, one inquisitor
applauded the angelic touches of her face, another the brightness of her eyes,another, the voluptuous contours of her breast, another the shape of her hands.

In this conjuncture, men of blood transformed themselves into real artists !!
-Alexandre Herculano Famous writer of 19th century in his Fragment about the Inquisition

Mechanism of Inquisition as recorded by Dellon a French Roman Catholic – ‘a very mild account of inquisition’:
The cells:a fetid cell, provided with a hole for relieving himself. But it overflowed, and there were faeces all over, an abominable smell, practically no light, save for slits on the wall, well above the reach of one’s hands.

No honour even in death:

Those who died in the jail were buried inside the building,
and as they were going to be judged, the bodies were exhumed, and the bones were kept to be burnt on the next auto da fé.

Condemning the accused:

Seven witnesses were required to condemn a person. But the witnesses were never brought face to face with the hapless accused. The inquisition admitted the testimony of all kinds of people, even of those who were interested in the utter condemnation of the accused. Among the seven witnesses, was included the victim himself, who under torture had admitted the heresies that he had (not) committed.

Tortures:

Three kinds of torture were practiced: 1) the rope or the pulley, 2) water and 3) fire. The torture by rope consisted of the arms
being tied backwards and then raised by a pulley, leaving the victim hanging for some time, and then let the victim drop down to half a foot above the floor,then raised again. These continued up-and-down movement dislocated the joints
and made the prisoner emit horrible cries of pain. This torture went on for an hour.

The torture by water was as follows: the victim was made to lie across an iron bar, and was forced to imbibe water without stopping. The iron bar broke the vertebrae and caused horrible pains, whereas the water treatment provoked
vomits and asphyxia. The torture by fire was definitely the worst: the victim was hung above a fire, which warmed the soles of the feet, and the jailers rubbed bacon and other combustible materials on the feet. The feet were burned until
the victim confessed. These last two tortures lasted for about an hour, and sometimes more.The house of torments was a subterranean grotto, so that other might not hear the cries of the wretched. Many a time, the victims died under torture; their bodies were interred within the compound, and the bones were exhumed for the auto da fe, and burnt in public.

Showing them mercy by burning at stake:

By daylight, each convict was ordered to march alongside a godfather, one of the officials assigned to each victim. It was a
great honor to be appointed godfather for these ceremonies. The procession was led through the long streets of the city,so that the multitudes could watch the ugly pageant. Finally, covered with shame and confusion, tired of the long
march, the condemned reached the church of St. Francis, which was decked with great pomp and circumstance. The altar was covered with black cloth on which stood six silver candle holders. On both sides of the altar there were two kinds
of thrones: the right side for the inquisitor and his councilors, and the left side for the viceroy and his court

The convicts and godfathers were seated on benches.
Next, four man-sized statues were brought, accompanied by four men who carried boxes full of bones of the victims who had died by tortures: these statues, wearing the Samarra and
representing the dead victims would be tried too. Once the sermon was concluded, two officials went up to the pulpit to read publicly the proceedings of all the guilty, and to declare the sentences upon them.The condemned to be burnt at the stake were delivered to the secular arm, to which the Inquisition begged to use clemency and mercy with these wretched, and to impose the death penalty without effusion of blood – by burning them at stake!

Remarks of a historian:

The words Auto da fé reverberated throughout Goa, reminiscent of the furies of Hell, which concept, incidentally does not exist in the Hindu pantheon. On April 1st 1650 for instance, four people were burnt to death, the next auto da fé was on December 14, 1653, when 18 were put to the flames,
accused of the crime of heresy. And from the 8th April 1666 until the end of 1679 – during which period Dellon was tried – there were eight autos da fé, in which 1208 victims were sentenced. In November 22, 1711 another auto da fé took
place involving 41 persons. Another milestone was on December 20, 1736, when the Inquisition burnt an entire family of Raaim, Salcete, destroying their house,putting salt on their land, and placing a stone padrao, which still existed in
the place (at least in 1866)

-Alfredo De Mello (‘Memoirs of Goa’ Chapter 21)


This article is based on book named Goa Inquisition by Anant Kakba Priolkar


You can download this book from

https://archive.org/details/GoaInquisitionAnantKakbaPriolkar_201806

यजुर्वेद के पितर





यजुर्वेद के पितर

लेखक- प्रोफेसर विश्वनाथ विद्यालंकार, लाहौर भूतपूर्व वेदोपाध्याय गुरुकुल कांगड़ी
प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ

पंचमहायज्ञ प्रत्येक गृहस्थी को करने चाहियें- यह विधान मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में मिलता है। इन पञ्चमहायज्ञों में पितृयज्ञ भी है। पौराणिकों के मतानुसार पितृयज्ञ मृत-पितरों के सम्बंध में किया जाता है। परन्तु ऋषि दयानन्द का यह मन्तव्य है कि पितृयज्ञ का विधान जीवित पितरों के सम्बंध में है, नकि मृत पितरों के सम्बंध में। यजुर्वेद में पितरों का बहुत स्पष्ट रूप से वर्णन है। इस लिए इस लेख में "यजुर्वेद के पितरों" पर कुछ विचार किया जाएगा।

(१) पितर का अर्थ
'पितर' शब्द से केवल पिता-व्यक्तियों का अर्थात् केवल पुरुष-व्यक्तियों का ही ग्रहण नहीं होता, अपितु माता और पिता इन दोनों व्यक्तियों का अर्थात् पुरुष और स्त्री इन दोनों व्यक्तियों का ग्रहण होता है। व्याकरण की दृष्टि से पितृयज्ञ शब्द में "पितृ" शब्द का एक शेष मानना चाहिए। जैसे कि माता च पिता च = पितरौ; तथा मातरश्च पितरश्च = पितर:। इसलिए पितृयज्ञ का अर्थ हुआ "वह यज्ञ जो कि माता और पिता तथा इनके पूर्वजों के सम्बन्ध में किया जाय"।

(२) पितृयाण और पितर
पितरों के सम्बन्ध में "पितृयाण" शब्द का बहुत प्रयोग होता है। पितृयाण का अर्थ है "पितरों का याण", "पितरों का मार्ग" अर्थात् पितरों के जीवन का मार्ग। प्रश्नोपनिषद्, प्रथम प्रश्न ९वीं कण्डिका इस सम्बन्ध में निम्न प्रकार है-

"संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च। तद्दे ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते। त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते। एष ह वै रयिर्य: पितृयाण:।।"
अर्थात् "संवत्सर को प्रजापति कहते हैं। उस संवत्सर के दो अयन हैं। एक दक्षिण (अयन) और दूसरा उत्तर (अयन)। तो जो लोग इष्टकर्मों और + आपूर्त कर्मों को अपने कर्तव्यकर्म मानते हैं वे चन्द्रमा-सम्बन्धी लोक पर विजय पाते हैं। वे ही बार बार इस लोक की ओर आते हैं। इसलिए ये ऋषि जो कि प्रजा की कामना वाले हैं- वे दक्षिण मार्ग को (अपने जीवन मार्ग के रूप में) स्वीकार करते हैं। यह दक्षिण मार्ग ही रयि है, जिसे पितृयाण भी कहते हैं।"

इस उद्धरण में पितृयाण के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथन है-
(क) संवत्सर अर्थात् वर्ष प्रजापति है, प्रजाओं का पति है, रक्षक है।
(ख) संवत्सर के दो अयन होते हैं। एक दक्षिण अयन और दूसरा उत्तर अयन। संवत्सर इन दो अयनों के द्वारा प्रजाओं का पति अर्थात् रक्षक बना है। दक्षिण अयन शीत काल का समय है जबकि सूर्य दक्षिण की ओर अयन अर्थात् प्रयाण करता है, और उत्तर अयन ग्रीष्म काल का अयन है जबकि सूर्य उत्तर की ओर अयन अर्थात् प्रयाण करता है। संवत्सर अपने इन दोनों रूपों द्वारा प्रजाओं का पति बना हुआ है, प्रजाओं का रक्षक बना हुआ है। अर्थात् संवत्सर शीतकाल और ग्रीष्मकाल इन दो रूपों द्वारा प्रजाओं की रक्षा कर रहा है।
(ग) जो लोग "इष्ट" अर्थात् यज्ञयागों तथा होमादि कर्मों को अपना कर्तव्यकर्म समझते हैं, तथा साथ ही "आपूर्त्त" या "पूर्त्त" अर्थात् "सामाजिक उपकार के कर्मों को भी अपना कर्तव्य कर्म समझते हैं वे चन्द्रमालोक पर विजय पाते हैं।
(घ) इष्ट और आपूर्त कर्मों को अपने कर्तव्यकर्म समझने वाले लोग बार-बार गृहस्थ धर्म में आते हैं।
(ङ) ऋषि कोटि के लोग - प्रजा की कामना के कारण दक्षिण मार्ग को अपने जीवन का मार्ग मानते हैं और वे इस मार्ग पर चलते हैं।
(च) इस दक्षिण मार्ग को ही रयि भी कहते हैं और पितृयाण भी।
इन कथनों की व्याख्या यह है कि एक प्रकार के लोग तो वे होते हैं, जो कि ब्रह्मचर्य आश्रम समाप्त कर गृहस्थ धर्म में प्रवेश कर यज्ञ आदि कर्मों तथा नानाविध समाजोपकार कर्मों को करते हैं; तथा दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं जो कि ब्रह्मचर्याश्रम समाप्त कर सीधा संन्यासाश्रम में प्रवेश कर अध्यात्मचिन्तन में लगकर फिर संसार का उपकार करते हैं। इनमें से पहिले प्रकार के लोग "दक्षिणायन" मार्ग के अवलम्बी हैं, और दूसरे प्रकार के लोग उत्तरायण मार्ग के अवलम्बी हैं। संवत्सर जैसे अपने दोनों मार्गों द्वारा प्रजाओं की रक्षा करता है, केवल एक मार्ग से संवत्सर प्रजाओं की रक्षा नहीं कर सकता, इसी प्रकार मनुष्य समाज के दोनों प्रकार के व्यक्ति मिलकर ही दक्षिणायन मार्ग और उत्तरायण मार्ग का अवलम्बन कर समग्र प्रजाओं की रक्षा करते हैं, केवल एक मार्ग से अर्थात् केवल गृहस्थधर्म के मार्गों से या केवल आरम्भ से ही संन्यासधर्म के मार्ग से प्रजाओं की रक्षा नहीं हो सकती।
गृहस्थधर्मावलम्बी व्यक्तियों के जीवन मार्ग को "दक्षिण" मार्ग कहा गया है। संवत्सर का दक्षिण अयन ह्रास का अयन है। सूर्य दक्षिण दिशा में जाकर अपनी शक्ति और तेज की दृष्टि से ह्रास को प्राप्त होता है। परन्तु ह्रास को प्राप्त होकर शरत् काल में अन्नों तथा फल और फूलों और वनस्पतियों को उत्पन्न करता है। इसी प्रकार गृहस्थधर्मावलम्बी व्यक्ति गृहस्थमार्ग को प्राप्त कर अपनी शारीरिक शक्ति आदि का तो ह्रास करते हैं। परन्तु इस ह्रास के द्वारा वे संसार को नई-नई शक्तियों वाली नाना विध प्रजाओं, अर्थात् सन्तानों को देकर संसार का उपकार और भला करते हैं। बिना गृहस्थधर्म के कोई मनुष्य उत्पन्न ही नहीं हो सकता। मनुष्य कोटि के लोग भी गृहस्थधर्म के परिणाम हैं, ऋषि कोटि के लोग भी गृहस्थधर्म के परिणाम हैं, देव कोटि के लोग भी गृहस्थधर्म के परिणाम हैं। ज्ञानी, ध्यानी, विद्वान्, व्यापारी, योद्धा, देशभक्त, कलाकौशलविज्ञ, संन्यासी आदि सब व्यक्ति, गृहस्थधर्म के ही परिणाम हैं। इसलिए गृहस्थधर्म में अपनी शक्ति के ह्रास की उपेक्षा कर और इससे संसार की सत्ता और संसार के उपकार को लक्ष्य में स्थापित कर गृहस्थधर्म में प्रवेश करना चाहिए। गृहस्थधर्म का मार्ग इस ह्रास की दृष्टि से और उत्पादक की दृष्टि से दक्षिण है।

इसी प्रकार संवत्सर का उत्तर-अयन शक्ति का प्रतिनिधि है। सूर्य जब उत्तर-अयन की ओर गति करने लगता है तो इसकी शक्ति और तेज बढ़ने लगता है तो उत्तर-अयन की पूरी अवधि तक पहुंच कर सूर्य जून मास के तेज और प्रकाश से तपने और चमकने लगता है, इसका तेज शरीर को असह्य हो जाता है, प्रकाश आंखों को चुंधिया देता है। इस समय सूर्य अपने पूर्ण तेज में होता है। इस प्रकार उत्तर अयन - शक्ति संचार, शक्ति वृद्धि और शक्ति के पूर्ण यौवन का प्रतिनिधि है। यह मार्ग उन व्यक्तियों का मार्ग है जो कि ब्रह्मचर्य से ही संन्यास धर्म में चले जाते हैं और गृहस्थधर्म का अवलम्बन नहीं करते। यतिवर ऋषि दयानन्द उत्तर-अयन के व्यक्ति थे। ऐसे व्यक्तियों के बिना संसार में शक्ति और तेज का संचार नहीं होता। इस उत्तर-अयन के जीवनमार्ग का वर्णन किया जाएगा।

इसी प्रकार गृहस्थधर्मावलम्बी व्यक्तियों के जीवनमार्ग को "चन्द्रमस" कहा गया है और गृहों, शालाओं, कोठियों को चन्द्रमस लोक कहा गया है। गृहस्थों के रहने सहने के स्थान को भी "लोक" या "गृहस्थलोक" कहते हैं। विवाह हो चुकने पर पत्नी को अथर्ववेद ने "पतिलोक" में विराजने का अधिकार दिया है। पतिलोक वह स्थान है, घर है, जो कि पति का है, जहांकि पति रहता है। इसी पति लोक को चन्द्रमस लोक कहा गया है। चन्द्रमा स्पष्ट घटता, बढ़ता, नष्ट होता हुआ तथा उत्पन्न होता हुआ, पूर्णता में तथा पूर्णनाश रूप में दृष्टिगोचर होता है। पतिलोक में या गृहस्थधर्म में ये ही दृश्य दृष्टिगोचर होते रहते हैं। कोई रोग के कारण शक्ति की दृष्टि से घट रहा होता है, कोई स्वास्थ्य के कारण बढ़ रहा होता है, कोई संतान नष्ट हो जाती है, तो कोई उत्पन्न होती है, कई सन्तानों में पूर्णता दृष्टिगोचर होती है और कईयों का अमावस्या के चन्द्र की न्याय पूर्ण ह्रास दृष्टिगोचर होता है। इस साधर्म्य की दृष्टि से गृहस्थधर्म के जीवनमार्ग को "चन्द्रमस" कहा गया है और इसी दृष्टि के गृहस्थाश्रम को चन्द्रमस लोक कहा गया है। गृहस्थी यदि वेदोक्त संयम की विधि से गृहस्थ धर्म का पालन करें तो वे गृहस्थाश्रम पर विजय पा जाते हैं, नहीं तो वे गृहस्थी जो कि असंयमी हैं, विषयलोलुप हैं- वे गृहस्थ मार्ग में जाकर हार खा जाते हैं। उनके लिए जीना भी दूभर हो जाता है।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके वेदोक्त कर्मों को अपना कर्तव्य कर्म समझकर करना चाहिए। इन कर्मों में चित्त लगाकर श्रद्धा और भक्ति से कर्मों को करना चाहिए। जिन लोगों को गृहस्थाश्रम का धर्म रुचिकर है, जो कि गृहस्थाश्रम के कर्मों द्वारा अपने संस्कारों का संचय करते हैं ऐसे व्यक्ति अपने संस्कारों से प्रेरित होकर बार बार जन्म लेकर फिर गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर इस आश्रम द्वारा संसार का उपकार करते हैं। यह पुनरावर्त्तन है, अर्थात् गृहस्थधर्म में पुनः पुनः आना है।
परन्तु स्मरण रहे कि वेद ने इस सर्वोपकारी गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने का अधिकार केवल ऋषिकोटी के व्यक्तियों को दिया है। अनृषि गृहस्थी गृहस्थ की महिमा को गृहस्थ के उद्देश्य को नहीं समझ सकते। वे नहीं समझ सकते कि गृहस्थ धर्म का उद्देश्य है "प्रजोत्पादन" न कि भोग। प्रजोत्पादन का अभिप्राय है उत्तम सन्तानों को पैदा करना। अनृषियों की सन्तानें भोगवासना का परिणाम होती हैं, और ऋषियों की सन्तानें दिव्य भावनाओं का परिणाम होती हैं। ऊपर के प्रश्नोपनिषद् के उद्धरण में गृहस्थाश्रम का अधिकार केवल ऋषि कोटि के व्यक्तियों को दिया गया है।

यह दक्षिण मार्ग या चन्द्रमसलोक ही रयिमार्ग या रयिलोक है। इसको पितृयाण भी कहा गया है। इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् में गृहस्थाश्रम को दक्षिण मार्ग, चन्द्रमसलोक, रयिमार्ग और पितृयाण- इन शब्दों द्वारा कहा गया है।
इस व्याख्या द्वारा यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि "पितर" वे व्यक्ति हैं जो कि गृहस्थधर्म का जीवन व्यतीत करते हैं तथा वे भी जो कि इस गृहस्थ मार्ग से गुजर कर अगले आश्रमों में जाते हैं।

(३) देवयान
ऊपर के लेख में "पितृयाण" और "पितर"- इन शब्दों के अभिप्रायों की व्याख्या हो चुकी है। इन शब्दों के सम्बन्धी शब्द हैं "देवयान" और "देव" शब्द। इनके सम्बन्ध में प्रश्नोपनिषद्, प्रथम प्रश्न, कण्डिका १० इस प्रकार है-

"अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष् यादित्यमभिजयन्ते। एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृत मभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोध: तदेष श्लोक:।।"
अर्थात् "उत्तर मार्ग के द्वारा, तप द्वारा, ब्रह्मचर्य द्वारा, श्रद्धा द्वारा तथा विद्या द्वारा आत्म का अन्वेषण कर आदित्य पर विजय पाते हैं। यह उत्तरमार्ग प्राणों का घर है, यह अमृत है, अभय है, यह परम-अभय है, इसमें पुनरावर्त्तन नहीं होता, यह निरोध मार्ग है।"

यह वर्णन देवमार्ग का है। प्रश्नोपनिषद् के प्रथम प्रश्न की ९वीं कण्डिका में पितृयाण का वर्णन है और इस १०वीं कण्डिका में देवयान का वर्णन है। इसमें निम्नलिखित भाव दर्शाए गए हैं-
(क) देवयान के मार्ग का नाम "उत्तर मार्ग" भी है।
(ख) उत्तरमार्ग का अभिप्राय है तप का मार्ग, ब्रह्मचर्य का मार्ग, श्रद्धा का मार्ग और विद्या अर्थात् आत्मविद्या का मार्ग।
(ग) उत्तरमार्ग का उद्देश्य है "आत्मा का अन्वेषण", नकि गृहस्थ धर्म।
(घ) इस उत्तरमार्ग को आदित्यमार्ग भी कहते हैं। उत्तरमार्गगामी आदित्यमार्ग पर विजय पाते हैं।
(ङ) उत्तरमार्ग से प्राणों का या शक्ति का संचय होता है, शीघ्र मृत्यु नहीं होती अर्थात् मनुष्य दीर्घजीवी हो जाता है, तथा मनुष्य भय रहित हो जाता है।
(च) इसको पर-अयन भी कहते हैं।
(छ) इस मार्ग में जाकर पुनरावर्त्तन नहीं होता। पितृयाण मार्ग में जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति अपने संस्कारों के वश माता-पिता होने के मार्ग में फिर आता रहता है, परन्तु देवयान या उत्तरमार्ग में जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति माता पिता होने के मार्ग में कभी लौट कर नहीं आता। जब वह अपने वर्तमान जीवन में ज्ञानपूर्वक पितृयाण के मार्ग को त्याग चुका है और उसने अपने जीवन का उद्देश्य देवयान मार्ग बना लिया है, और इस वर्तमान जीवन में देवयान मार्ग सम्बन्धी संस्कार उसकी आत्मा में और भी दृढ़मूल हो चुके हैं तो वह अपने भावी जन्मजन्मान्तरों में किस प्रकार गृहस्थ मार्ग में अर्थात् पितृयाण मार्ग में पदार्पण कर सकता है। इसलिए "न पुनरावर्तन्ते" द्वारा देवयान मार्ग का वर्णन उचित ही प्रतीत होता है।
(ज) इस उत्तरमार्ग का नाम निरोधमार्ग भी है। इस मार्ग में सांसारिक वृत्तियों का निरोध कर आत्मान्वेषण के मार्ग में पदार्पण करना पड़ता है, इसलिए उत्तरमार्ग को निरोध का मार्ग कहा गया है।

(४) पितृयाण और देवयान में भेद
(१) "पितृयाण" मार्ग को दक्षिण का मार्ग कहा गया है और "देवयान" मार्ग को उत्तर का मार्ग कहा है। सूर्य जब दक्षिण मार्ग का पथिक बनता है तो वह "पितृयाण" मार्ग का प्रतिनिधि होता है, और सूर्य जब उत्तर मार्ग का पथिक बनता है तो वह "देवयान" मार्ग का प्रतिनिधि होता है। पहला मार्ग शक्तिक्षय और उत्पादकत्व का सूचक है, और दूसरा मार्ग शक्ति संचय और तेज का सूचक है।
(२) पितृयाण कर्म मार्ग है, और देवयान ज्ञानमार्ग है।
(३) पितृयाण को चन्द्रमस मार्ग कहते हैं और देवयान को आदित्यमार्ग।
(४) पितृयाण वाले बार बार गृहस्थ धर्म में आते हैं, परन्तु देवयानी लोग अपने निवृत्तिमार्ग के संस्कारों की प्रबलता के कारण बार-बार उत्पन्न होकर भी गृहस्थ में नहीं आते।
(५) पितृयाण वाले गृहस्थ में अपनी शक्ति का व्यय करते हैं परन्तु देवयान वाले इस शक्ति का संचय करते हैं, इस प्रकार देवयान मार्ग वाले दीर्घजीवी हो जाते हैं और निर्भय होकर विचरते हैं।
(६) पितृयाण "रयि मार्ग" है और देवयान "प्राण मार्ग" है।

इस प्रकार "पितर" और "देव" तथा पितृयाण और देवयान शब्दों द्वारा जीवित पितरों तथा जीवित देवों का ही वर्णन प्रतीत होता है, मृत पितर तथा मृत देवों का नहीं, यह सिद्धान्त हृदयंगत हो चुका होगा। जीवित पितरों के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रमाण उपस्थित किये जाते हैं-

(५) शतपथ ब्राह्मण और जीवित पितर
शतपथ ब्राह्मण २/४/२/२४ तथा २/६/१/४२ में लिखा है कि "गृहाणां ह पितर ईशत" अर्थात् पितर गृहों के अधीश्वर हैं, अधिपति हैं, स्वामी हैं। इस प्रमाण द्वारा ज्ञात होता है कि गृहस्थ धर्म के अवलम्बी जन पितर कहलाते हैं, और ये जीवित व्यक्ति सम्भव हैं, मृत नहीं।

(६) शांखायन श्रौतसूत्र और जीवित पितर
शांखायन श्रौतसूत्र १६/२/४-६; तथा शतपथब्राह्मण १३/४/३/६ में लिखा है कि-

यमो वैवस्वतो राजेत्याह तस्य पितरो विशस्तऽइमऽप्रासतऽइति स्थविराऽउपसमेना भवन्ति तानुपदिशति यजूँषि वेद:-
इसका अर्थ यह है कि "यम" अर्थात् प्रजाओं का नियन्त्रण करने वाला तथा स्व यमनियमों का पालन करने वाला, और "वैवस्वत" अर्थात् विवस्वान् के सदृश प्रतापी आदि ब्रह्मचारी व्यक्ति राजा होना चाहिए। उसके पितर हैं प्रजाजन, अर्थात् ये जो कि उसके सभी आसनों पर विराजते हैं, अर्थात् स्थविर व्यक्ति, जो कि वयोवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध व्यक्ति उन्हें राजा उपदेश में कहता है कि तुम्हारा वेद यजुर्वेद है।

इससे प्रतीत होता है कि राजा के सामने आसनों पर बैठे हुए, उसके सलाह स्थविर प्रजानन पितर कहलाते हैं। राजा के सम्मुख बैठे हुए स्थविर प्रजानन जीवित व्यक्ति ही हो सकते हैं, मृत व्यक्ति नहीं।
इस उद्धरण में यह भी कहा गया है कि राजा इन ज्ञानवृद्ध और वयोवृद्ध पितर को उपदेश रूप में कहता है कि तुम्हारा वेद यजुर्वेद है। इससे ज्ञात होता है कि यजुर्वेद में विशेषकर पितरों का वर्णन होगा। इसलिए यजुर्वेद के उन मन्त्रों के भी प्रमाण यहां दिए जाते हैं जिनसे कि सिद्ध होगा कि यजुर्वेद की दृष्टि से भी पितर जीवित व्यक्ति ही हैं; मृत व्यक्ति नहीं।

(७) यजुर्वेद और जीवित पितर
यजुर्वेद अध्याय २,२९ से ३४ तक के मन्त्र पिण्डपितृयज्ञपरक हैं। पौराणिक विद्वान् तो पिण्ड पितृयज्ञ में मृतपितरों के उपलक्ष में गुंदे आटे के पिण्ड का दान करते हैं और साथ ही वस्त्र दान की पद्धति को पूरा करने के लिए वस्त्रों का स्थान में धागा पिण्डों के साथ समर्पण में धर देते हैं। इन मन्त्रों में जीवित पितरों को घर बुलाकर उनके सत्कार का वर्णन है। इस सत्कार में पुत्र-पौत्र आदि अपने वानप्रस्थी तथा संन्यासी पितरों को घरों में लाकर उन्हें भोजन कराते हैं और साथ ही उनकी आवश्यकता के अनुसार उनको वस्त्रों का दान करते हैं। इस पक्ष की पुष्टि में कतिपय मन्त्र प्रमाण रूप में उद्धृत किये जाते हैं-

अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्। अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत। -यजु० २/३१
"हे पितरो! इस घर में अपने आप को आनन्दित तथा तृप्त करो तथा यथेच्छ भोजन करो। पितरों ने अपने आप को आनन्दित तथा तृप्त कर लिया है तथा यथेच्छ भोजन किया है।"

इस मन्त्र के प्रथमार्ध में गृहस्थी "पितरों" के प्रति कहते हैं कि आप हमारे घरों में पधारे हैं कृपा कर अपने आपको भोजन द्वारा तृप्त तथा आनन्दित कीजिये। मन्त्र के द्वितीयार्ध भाग में गृहस्थी परस्पर परामर्श कर रहे हैं कि पितरों ने यथेच्छ भोजन द्वारा अपने आपको आनन्दित तथा तृप्त कर लिया है। यह परामर्श उस समय होता है जबकि पितर अपना अपना भोजन समाप्त कर चुकते हैं।

इस मन्त्र का वर्णन केवल जीवित पितरों के सम्बन्ध में ही समुचित हो सकता है।

नमो व: पितरो रसाय, नमो व: पितर: शोषाय नमो व: पितरो जीवाय नमो व: पितर: स्वधायै नमो व: पितरो घोराय नमो व: पितरो मन्यवे नमो व: पितर: पितरो नमो वो गृहान्न: पितरो दत्त सतो व: पितरो देष्मैतद्व: पितरो वास:। -यजु० २/३२
"हे पितरो! तुम हमारी समाज के जीवन के लिए रस रूप हो हम तुम्हारे इस रस रूप के प्रति नमस्कार करते हैं; झुकते हैं, हे पितरो! तुम हमारे पापों और दुष्कर्मों का शोषण करने वाले हो तुम्हारे इस शोषणरूप के प्रति नमस्कार हो; हे पितरों! तुम हमें उपदेशों द्वारा जीवनदान करते हो तुम्हारे इस जीव रूप के प्रति नमस्कार हो; हे पितरो! तुम हमें सात्विक वस्त्रों का सेवन का उपदेश करते हो तुम्हारे स्वधारूप के प्रति नमस्कार हो; हे पितरो! दुष्टों और दुष्टभावों क प्रति तुम घोररूप हो तुम्हारे इस घोररूप के प्रति नमस्कार हो; हे पितरो! तुम सात्विक क्रोध करने वाले हो तुम्हारे इस मन्युरुप के प्रति नमस्कार हो; नमस्कार हो तुम्हें हे पितरो! हे पितरो! नमस्कार हो तुम्हें; हे पितरो! वानप्रस्थी हो जाने पर या संन्यासी हो जाने पर आप हमें घर दे दो, हमें घरों का उत्तराधिकारी बना दो, "मत:" अर्थात् जब तक तुम जीवित रहोगे तब तक तुमको हे पितरो! हम देते रहेंगे; हे पितरो! तुम्हारे प्रति वस्त्रों का यह समर्पण है, आप इन्हें पहनिये।"

इस मन्त्र में "पितर" समाज के प्रति कितने उपकारी हैं इसका वर्णन कर अन्य में पितरों से उनके पुत्र-पौत्र जायदाद का उत्तराधिकार मांगते हैं, और साथ ही  पितरों को आश्वासन देते हैं कि आप जब तक जीवित रहेंगे आपको हम सब जीवन सामग्री देते रहेंगे तथा वस्त्र आदि देते रहेंगे। वस्त्र देकर पुत्र-पौत्र पितरों के प्रति कहते हैं कि "आधत्त", इन वस्त्रों का आधान कर लीजिये, इन्हें पहन लीजिये। यह समग्र वर्णन मृत पितरों में कभी चरितार्थ नहीं हो सकता।

आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्त्रजम्। यथेह पुरुषोऽसत्।। यजु० २/३३
"हे गुरु पितरो! तुम इस कुमार को- जिसे कि हमने प्रसन्नता से कमल माला पहनाई है - अपने गुरुकुल में इस प्रकार रखो जैसे कि माता गर्भ को अपने उदर में रखते हैं, ताकि यह पौरुष शक्ति से सम्पन्न होकर गुरुकुल- माता से उत्पन्न हो।"

क्या मृत पितर गुरुकुलों के आचार्य हो सकते हैं और वे नवप्रविष्ट बालकों को ऐसी सुरक्षा कर सकते हैं जैसे कि माता अपने उदरस्थ बालक की सुरक्षा करती है।
यजुर्वेद के १९वें अध्याय में भी पितरों का वर्णन है। इस अध्याय के भी कतिपय उद्धरणों का यहां उल्लेख किया जाता है। यथा-

पितृभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम: प्रपितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम:। अक्षन् पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितर: पितर: शुन्धध्वम्। -यजु० १९/३६
"स्वधा अन्न का सेवन करने वाले पितरों के प्रति "स्वधा" अन्न हम देते हैं और नमस्कार करते हैं, स्वधा अन्न का सेवन करने वाले पितामहों के प्रति स्वधा अन्न हम देते हैं और नमस्कार करते हैं स्वधा अन्न का सेवन करने वाले प्रपितामहों के प्रति स्वधा अन्न हम देते हैं और नमस्कार करते हैं। पितरों ने भोजन कर लिया है, पितर प्रसन्न तथा सन्तुष्ट हो गए हैं, पितर तृप्त हो गए हैं, हे पितरों! (भोजन कर चुकने पर जल से हाथ आदि की शुद्धि द्वारा) शुद्ध होओ।"

पितरों के प्रति उनके सेवन योग्य सात्त्विक भोजन देकर उन्हें तृप्त करना तथा भोजन के उपरान्त जल द्वारा उनके हाथ आदि को शुद्ध कराना कभी भी मृत पितरों में सम्भव नहीं है।
साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि इस मन्त्र में केवल तीन पितरों का ही वर्णन है। पौराणिक पद्धति में भी तीन ही पितरों के सम्बन्ध में पितृयज्ञ के करने की परिपाटी है। ये तीन पितर हैं पिता, पितामह तथा प्रपितामह अर्थात् पिता, दादा, परदादा। यह क्यों? पितृयज्ञ जीवित पितरों के सम्बन्ध में होता है- इस सिद्धान्त में तो इस प्रश्न का हल सुलभ है, परन्तु मृत पितरों के सम्बन्ध में इस प्रश्न का कोई समुचित समाधान नहीं मिल सकता। मनुस्मृति में कहा है कि गृहस्थ पुरुष पंचमहायज्ञों का अधिकारी है। पंचमहायज्ञों में पितृयज्ञ का भी समावेश है। वैदिक विधि के अनुसार वसु ब्रह्मचर्य समाप्त करने पर जब ब्रह्मचारी गृहस्थ में प्रवेश करेगा तो उसकी आयु उस समय २४वें वर्ष की समाप्ति पर हो जाएगी। एक वर्ष के भीतर सन्तान का उत्पन्न होना भी सम्भव होगी। इस समय नव-गृहस्थी की आयु २५वें वर्ष की समाप्ति पर होगी। मनुस्मृति में लिखा है कि-

अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत्।
अर्थात् सन्तान की जब सन्तान हो जाय, तब वानप्रस्थ धारण करना चाहिए।

जब नवगृहस्थी की आयु २५ वर्षों की होगी, तब इसके पिता की आयु ५० वर्षों की होगी, और पितामह की ७५ वर्ष की और प्रपितामह की १०० वर्षों की। वेदों में मनुष्य की औसतन आयु १०० वर्षों की ही कही गई है। यथा- जीवेम शरद: शतम्।
इस प्रकार वैदिक प्रथा के अनुसार जब पुत्र पंचमहायज्ञों में पितृयज्ञ के करने का अधिकारी होता है तब वैदिक औसतन आयु के अनुसार नवगृहस्थी के पिता, पितामह और प्रपितामह का जीवित होना अधिक सम्भावित है। प्रपितामह के पूर्वजों का जीवित रहना अधिक सम्भावित नहीं। इसीलिए पितृयज्ञ में तीन पूर्वजों को ही अन्नदान की तथा उनकी सेवा की प्रथा रखी गई है। यदि पितृयज्ञ मृत पितरों के सम्बन्ध में करना वेद को अभीष्ट होता तो पितृयज्ञ में पिता, पितामह और प्रपितामह का नाम न लेकर इनके स्थान में इनके पूर्वजों का नाम लेना चाहिए था, जिनके कि मृत हो चुकने की सम्भावना अधिक है। परन्तु विधि भाग में ऐसा नहीं है। इससे स्पष्ट परिणाम निकलता है कि वैदिक विधि में केवल जीवित पितरों का ही पितृयज्ञ में यजन करने का विधान है।

उदीरतामवरऽउत्परासऽउन्मध्यमा: पितर: सोम्यास:। असुं यऽईयुरवृकाऽऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु।। -यजु० १९/४९
"अवर, पर और मध्यम पितर - जिन्होंने कि सोमव्रत लिया है, जिन्होंने अपने वीर्य की सुरक्षा का व्रत लिया है- वे हमें प्रवचन करें। जो कि सोमव्रत के कारण एक नई प्राण शक्ति को प्राप्त हुए हैं, जो वृक अर्थात् भेड़िये की न्याई क्रोध करने वाले नहीं हैं, जो सत्य के ज्ञाता हैं, वे पितर हमारे बुलाने पर हमारी रक्षा करें।"

ऊपर के तीन प्रकार के पितरों को अर्थात् पिता, पितामह और प्रपितामह को इस मन्त्र में अवर आदि शब्द द्वारा स्मरण किया गया है। अवर का अर्थ है छोटी उम्र वाले अर्थात् पिता, पर का अर्थ है बड़ी उम्र वाले अर्थात् प्रपितामह तथा मध्यम का अर्थ है मंझली उम्र वाले अर्थात् पितामह। ये तीनों गृहस्थ जीवन छोड़ने के पश्चात् पुनः ब्रह्मचर्य व्रत का धारण करते हैं- इसलिए इन्हें "सोम्यास:" कहा गया है। वेद की परिभाषा में सोम शब्द का अर्थ वीर्य भी होता है। अंग्रेजी का "semen" शब्द "सोम" शब्द का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है, वेद के सोम शब्द का पूर्वरूप "सोमन्" है जो कि "semen" के साथ अधिक सादृश्य रखता है। इस मन्त्र के अर्थ पर भी विचार करने से यही परिणाम निकलता है कि पितृयज्ञ में जीवित पितरों का ही सम्बन्ध है।
अपने पक्ष की पुष्टि में यजुर्वेद के निम्नलिखित प्रमाण और दिए जाते हैं। यथा-

बर्हिषद: पितरऽऊत्यर्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्। तऽआगतावसा शन्तमेनाथा न: शंयोररपो दधात।। -यजु० १९/५५
"वन में रहने वाले पितर हमारी रक्षा करने के लिए हमारी ओर आए हैं (हमारे घरों में आ रहे हैं), हे पितरों! तुम्हें हम ये खाने के पदार्थ देते हैं, प्रीति से इनका सेवन करो। वे पितर अपनी शान्तिमयी रक्षा के साथ आये हैं, तुम आकर हमें शान्ति दो, भावी दुःखों से हमारी रक्षा करो, और हमें निष्पाप बनाओ।"

उपहूता: पितर: सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिपु प्रियेषु। तऽआगमन्तु तऽइह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्।। -यजु० १९/५७
"सोमव्रती पितर- जो कि अपने वनस्थ के प्रिय खजानों (अर्थात् ज्ञान, ध्यान, तपस्या, विचार आदि) में विचरते हैं- श्रद्धा से बुलाए गए हैं। वे आवें, इस घर में आकर हमारे कथनों को सुनें, वे अधिकार पूर्वक हमें उपदेश दें वे हमारी रक्षा करें।"

आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभिगृणीत विश्वे। मा हिंसिष्ट पितर: केन चिन्नो यद्वऽआग: पुरुषता कराम।। -यजु० १९/६२
"हे पितरो! अपने घुटने टेक कर और दक्षिण दिशा में (बिछाए आसनों पर) बैठकर इस पितृयज्ञ में हमें उपदेश कीजिए। हे पितरों! किसी भी अपराध के कारण हमारी हिंसा न करो जिस अपराध को तुम्हारे प्रति हमने पुरुष सुलभ भ्रम के कारण किया है अर्थात् पितृयज्ञ में सत्कार आदि की न्यूनता आदि के कारण जो अपराध हमसे हो गया है।"

आसीनासोऽअरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय। पुत्रेभ्य: पितरस्तस्य वस्व: प्रयच्छत तऽइहोर्जं दधात।। -यजु० १९/६३
"हे पितरों! किरणों की गोद में अर्थात् वानप्रस्थ आश्रम आदि में खुली हवा और खुली किरण की गोद में बैठकर तुम लोग अपने दानी-भक्तों के प्रति अपने उपदेशरत्नों का प्रदान किया करो। हे पितरों! अपने पुत्रों के प्रति उनके उत्तराधिकार रूप में उन्हें जो धन मिलता है वह उन्हें दे दो।"

इदं पितृभ्यो नमोऽअस्त्वद्य ये पूर्वासो यऽउपरास ईयु:। ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु।। -यजु० १९/६८
"आज अर्थात् पितृयज्ञ में हम पितरों के प्रति नमस्कार करते हैं, उन पितरों के प्रति जो कि हमारे पूर्वज हैं अर्थात् अवर रूप पूर्वज हैं, तथा उनसे भी परे के पूर्वज अर्थात् मध्यम और पर पूर्वज हैं जो कि चले गए हैं, अर्थात् गृहस्थजीवन त्याग चुके हैं तथा जो इस पार्थिक लोक में ही अभी तक स्थित हैं, अर्थात् जीवित हैं और जो निश्चित रूप से अभी प्रजाजनों में ही विराजते हैं।"

ये मन्त्र स्पष्ट दर्शा रहे हैं कि पितृयज्ञ का वैदिक स्वरूप यही है कि जीवित पितरों की श्रद्धा से सेवा और शुश्रूषा करना, न कि मृत पितरों की।

पाद टिप्पणियां-
१. अग्निहोत्रं तप: सत्यं वेदानां चानुपालनम्। आथित्यं वैश्वदेवश्च इष्टमित्यभिधीयते।।
२. वापीकूपतडागादि देवतायतनानि च। अन्नप्रदानमारामा: पूर्त्तमित्यमिधीयते।
३. ब्रह्मापरं युज्यतां ब्रह्म पूर्वं ब्रह्मान्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वतः।
अनाव्याधां देवपुरां प्रपद्य शिवा स्योना पतिलोके वि राज।।१४/१/६४।।

-'आर्य' (साप्ताहिक) १९४४ के सिद्धान्त विशेषांक से साभार