Monday, April 30, 2018

Buddha- An Aryan Reformer




Buddha- An Aryan Reformer

Dr Vivek Arya

The teachings of Buddha are inspired from Vedic Philosphy. This article in brief will prove this fact.
1. Five Commandments of Buddha are originally found in the Yoga Darshan of Patanjali
The five commandments which are obligatory on all Buddhists monks as well as laymen, are as follows -
1 Let not one kill any living being.
2. Let not one take what is not given to him
3. Let not one speak falsely.
4 Let not one drink intoxicating drinks.
5. Let not one have unchaste sexual intercourse.
THE ORIGIN OF THESE TEAHINGS
It is quite clear that these five commandments (or Panch sheelas as they are called In Buddhist Scriptures) are directly derived from the five Yamas or rules of conduct as mentioned in the following Yoga Sutra (aphorism)
Yoga Darshan 1/2/30 says that
Not to kill any living being, not to speak falsely, not to commit theft, not to have unchaste sexual intercourse, not to indulge too much in lustful or sensual pleasures are the five Yamas.
2.Mahatma Buddh an Aryan Reformer
Mahatma Buddha did not say a word which could imply that he wished to establish a new Religion. To quote from the well Known book ‘Ancient India' written by Sh. R. C Dutt ‘He ( Buddha) had made no new discovery. He had acquired no new knowledge. Mr. Dutt further adds ‘It would be historically wrong to suppose that Gautama Buddha consciously set himself as the founder of a new religion. On the contrary, he believed to the last that he was preaching only the ancient and pure form of religion which had prevailed among the Hindus, among Brahmans, among Shamans and others but which have been corrupted at a later days.
3. Mahatma Buddha admitting that Vedas does not support animal killing in Yajna.
In Brahman Dhammik Sutta it is stated that a number of wealthy Brahmins went to Mahatma told them that the Brahman of Vedic age lived a very simple, pure and virtuous life and observed Brahmacharya for a long period. They did not kill any animals in Yajna. Buddha added that in later times Brahmans began to receive large gifts of wealth, cattle, chariots with horses and also beautiful women. Then they became licentious and began to eat meat. Then out of greed and selfishness, they composed verses supporting animal sacrifice and interpolated them in sacred books. They showed them to King Ikkavaku and obtained his permission for killing animals in Yajna. Then kings also began to perform Yajna in which thousands of animals were killed. The Brahman who had visited Mahatma
Buddha was very much satisfied with his discourse and expressed their gratitude to him.
4. Maxmuller acknowledges that the Lord Buddha didn’t establish any separate sect in Past India.
Prof. Max Muller a well known orient list in his ‘History of the Ancient Sanskrit Literature’:-
“Buddhism upon the time of Asoka was but one out of many sects established in India. There had been as yet no schism, but only controversy such as we find in the Brahmanas themselves between different schools and parties. There were as yet no Brahmans as opposed to Buddhists. In the latter sense of the word No separation had as yet taken place, and the greatest reformers at the time of Buddha were reforming Brahmans. Thus is acknowledged in Buddhist writings though they probably were not written down before
Asoka’s council. But even then Buddha is represented as the pupil of the Brahmans, and no slur is cast on the gods and the songs of the Vedas. Buddha according to his own canonical biographers learned the Rigveda and was proficient in all the branches of Brahmanic lore. His pupils were many of them Brahmans and no hostile feeling against the Brahman finds utterance in the Buddhist Canons”
“Buddhism in its original form was only a modification of Brahmanism. It grew up slowly and in perceptibly and its very founder could hardly have been aware of the final result of his doctrines”.
(Ref. History of Ancient Sanskrit Literature by Prof. Max Muller P 134)
Mahatma Buddha was very bold in condemning the social inequalities imposed on the Shudras and low castes while reading through his discourses, one feels as it one was listening to the speeches of Vedic Reforms like Swami Dayananda Saraswati.

Thursday, April 26, 2018

युवा मनीषी-पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी




युवा मनीषी-पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी

संकलनकर्ता- डॉ विवेक आर्य

पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी जी के निर्वाण दिवस 26/4/1890 पर विशेष रूप से प्रकाशित

पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी जी एक युवक दार्शनिक विद्वान् थे जिन्होंने चौबीस वर्ष (24) की अल्पायु में ही संस्कृत, अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी, वैदिक साहित्य, अष्टाध्यायी, भाषा विज्ञान, पदार्थ विज्ञान, वनस्पति शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, शरीर विद्या, आयुर्वेद, दर्शन शास्त्र, इतिहास, गणित आदि का जो समयक ज्ञान प्राप्त कर लिया था , उसे देख कर बड़े-बड़े विद्वान चकित रह जाते थे।उनके ज्ञान का अनुमान लगाना पर्वत को तोलना था।

गुरुदत्त जी का एक वर्ष(सन् 1888) का कार्य और उपलब्धियां :

-- स्वर विज्ञान का अध्ययन
-- वेद मन्त्रों के शुद्ध तथा सस्वर पाठ की विधि का प्रचलन
-- दिग्गज साधुओं को आर्यसमाजी बनाया
-- कई व्याख्यान किये तथा कई लेख और ग्रन्थ लिखे
-- पाश्चात्य लेखकों के द्वारा आर्यधर्म पर किये गये पक्षपातपूर्ण आक्षेपों के उत्तर दिए
-- शिक्षित वर्ग इस विद्यावारिधि के पास शंका समाधान के लिए आता रहा

पंडित जी गूढ़ से गूढ़ प्रश्न का उत्तर सरलता से देते थे। दार्शनिक गुत्थी उनके समक्ष गुत्थी ही न रहती।
इस नवयुवक के एक वर्ष के कार्य एवं उपलब्धियाँ महापुरुषों में उच्च स्थान दिलवाने के लिए पर्याप्त हैं।

सन्दर्भ : डॉ राम प्रकाश जी की पुस्तक -"पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी "

● वेद और योग का दीवाना - पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी ●
- स्वामी विद्यानन्द सरस्वती

किसी एक धुन के सिवा मनुष्य कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। धुन भी इतनी कि दुनिया उसे पागल कहे। पं. गुरुदत्त के अन्दर पागलपन तक पहुँची हुई धुन विद्यमान थी। उसे योग और वेद की धुन थी। जब गुरुदत्तजी स्कूल की आठवीं जमात में पढ़ते थे, तभी से उन्हें शौक था कि जिसके बारे में योगी होने की चर्चा सुनी, उसके पास जा पहुँचे। प्राणायाम का अभ्यास आपने बचपन से ही आरम्भ कर दिया था। इसी उम्र में एक बार बालक को एक नासारन्ध्र को बन्द करके साँस उतारते-चढ़ाते देखकर माता बहुत नाराज़ हुई थी। उसे स्वभावसिद्ध मातृस्नेह ने बतला दिया कि अगर लड़का इसी रास्ते पर चलता गया तो फ़क़ीर बनकर रहेगा।

अजमेर में योगी [महर्षि दयानन्द] की मृत्यु को देखकर योग सीखने की इच्छा और भी अधिक भड़क उठी। लाहौर पहुँचकर पण्डितजी ने योगदर्शन का स्वाध्याय आरम्भ कर दिया। आप अपने जीवन घटनाओं को लेखबद्ध करने और निरन्तर उन्नति करने के लिए डायरी लिखा करते थे। उस डायरी के बहुत-से भाग कई सज्जनों के पास विद्यमान थे। उनके पृष्ठों से चलता है पता चलता है कि ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, पण्डितजी की योगसाधना की इच्छा प्रबल होती गई। आप प्रतिदिन थोड़ा-बहुत प्राणायाम करने लगे। आपकी योग की धुन इतनी प्रबल हो गई कि कुछ समय तक गवर्नमैण्ट कॉलेज में साइन्स के सीनियर प्रोफेसर रहकर आपने वह नौकरी छोड़ दी। आपके मित्रों ने बहुत आग्रह किया कि आप नौकरी न छोड़िए। केवल दो घण्टे पढ़ाना पड़ता है, उससे कोई हानि नहीं। आपने उत्तर दिया कि प्रात:काल के समय में योगाभ्यास करना चाहता हूँ, उस समय को मैं कॉलेज के अर्पण नहीं कर सकता। यह पहला ही अवसर था कि पंजाब का एक हिन्दुस्तानी ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज में साइन्स का प्रोफेसर हुआ था। कॉलेज के अधिकारियों और हितैषियों ने बहुत समझाया, परन्तु योग के दीवाने ने एक न सुनी, एक न मानी।

पं. गुरुदत्तजी को दूसरी धुन थी वेदों का अर्थ समझने की। वेदों पर आपको असीम श्रद्धा थी। वेदभाष्य का आप निरन्तर अनुशीलन करते थे। जब अर्थ समझने में कठिनता प्रतीत होने लगी तब अष्टाध्यायी और निरुक्त का अध्ययन आरम्भ हुआ। धीरे-धीरे अष्टाध्यायी का स्वाध्याय पण्डितजी के लिए सबसे प्रथम कर्तव्य बन गया, क्योंकि आप उसे वेद तक पहुँचने का द्वार समझते थे। आपका शौक उस नौजवान-समूह में भी प्रतिबिम्बित होने लगा, जो आपके पास रहा करता था। सुनते हैं कि मा. दुर्गादासजी, ला. जीवनदासजी, मा. आत्मारामजी पं. रामभजदत्तजी और लाला मुन्शीरामजी की बगल में उन दिनों अष्टाध्यायी दिखाई देती थी।

अष्टाध्यायी, निरुक्त और वेद का स्वाध्याय निरन्तर चल रहा। यदि उसमें नाग़ा हो जाती तो पण्डितजी को अत्यन्त दु:ख होता। वह दु:ख डायरी के पृष्ठों में प्रतिबिम्बित है। आपकी प्रखर बुद्धि के सामने दुरूह-से-दुरूह विषय सरल हो जाते थे, और बड़े-बड़े पण्डितों को आश्चर्यित कर देते थे। श्री स्वामी अच्युतानन्दजी अद्वैतवादी संन्यासी थे। पं. गुरुदत्तजी आपके पास उपनिषदें पढ़ने आ जाया करते थे। विद्यार्थी की प्रखर बुद्धि का स्वामीजी पर यह प्रभाव पड़ा कि शीघ्र ही शिष्य के अनुयायी हो गये । स्वामीजी पं. गुरुदत्तजी को पढ़ाते-पढ़ाते स्वयं द्वैतवादी बन गये और आर्यसमाज के समर्थकों में शामिल हो गये।देहरादून के स्वामी महानन्दजी प्रसिद्ध दार्शनिक थे। आपको भी पं. गुरुदत्तजी के अध्यापक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सच्छिष्य के प्रभाव से आप भी आर्यसमाजी बन गये।

[स्रोत : विषवृक्ष, पृ. 38-40]



निरभिमानी पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी
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27 नवंबर 1887 में आर्यसमाज लाहौर का दशम वार्षिकोत्सव मनाया जा रहा था। पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी के दो अद्भुत प्रभावशाली भाषण वहाँ हुआ।

लाला जीवनदास उस भाषण से इतना प्रभावित हुए की सभास्थल पर ही अनायास उनके मुख्य से निकल पड़ा , " गुरुदत्त जी ! आज तो आपने ऋषि दयानन्द से भी अधिक योग्यता प्रदर्शित की है। "

परन्तु निरभिमानी ऋषिभक्त विद्यार्थी ने झटपट उत्तर दिया -"यह सर्वथा असत्य है। पाश्चात्य विज्ञान जहाँ समाप्त होता है , वैदिक विज्ञान वहाँ से प्रारम्भ होता है और ऋषि के मुकाबले मैं तो सौंवां भाग भी विज्ञान नहीं जानता। "

महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) ने भी यह भाषण सुना था। वे लिखते है - "मुझे सुधि न रही कि मैं पृथ्वी पर हूँ। "


पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी का संस्कृत से अद्वितीय लगाव [युवाओ के प्रेरणास्रोत]
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एक दिन गुरुदत्त अपने सहपाठी तथा चेतनानंद के घर गया। वहाँ मनुस्मृति रखी थी। उसे पाँव से ठुकराकर बोला ,"चेतनानंद ! किस गली-सड़ी एवं मातृभाषा में लिखी पुस्तक पढ़ते हो? "

ईश्वर की लीला देखिए। थोड़े ही दिनों पश्चात स्वयं गुरुदत्त पर संस्कृत का जादू हो गया। उसके ह्रदय में संस्कृत पढ़ने की लालसा पैदा हो गई। श्रेय गया स्कूल में इतिहास पढ़ाने वाले उस अध्यापक को जो इतिहास पढ़ाते समय अनेक अंग्रेजी शब्दों का मूल संस्कृत में बताया करता था।

उसके पश्चात संस्कृत की ऐसी लगन लगी कि संस्कृताध्यापक भी उनकी शंकाओं का समाधान नहीं कर पाते थे और एक दिन तो गुरुदत्त को झिड़क कर कक्षा से बाहर ही निकाल दिया।

अब जल की धारा अपना मार्ग स्वयं बनाने निकल पड़ी।

सर्वप्रथम डॉo बेलनटाइन कृत "Easy Lessons in Sanskrit Grammar " पढ़ा।

संयोगवश तभी दयानन्द सरस्वती की ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका हाथ लग गई। उसका संस्कृत भाग शब्दकोष की सहायता से पढ़ लिया। फिर क्या था ! संस्कृत पढ़ने की रूचि बढ़ती चली गई ।

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का पारायण कर आर्यसमाज मुलतान के अधिकारियों से जा कहा - "मेरी अष्टाध्यायी तथा वेदभाष्य पढ़ने का प्रबंध कर दो अन्यथा मैं जनता में प्रसिद्ध कर दूंगा कि तुम्हारे एक भी व्यक्ति में संस्कृत पढ़ाने की योग्यता नहीं है। तुम केवल संस्कृत का ढोल पीटते हो। "  विचित्र बालक है। किस चपलता से संस्कृत अध्ययन का प्रबंध करवा रहा है ?

आर्यसमाजियों में भी खूब उत्साह था। तत्काल पंडित अक्षयानंद को मुलतान बुलाया गया।

भक्त रैमलदास और गुरुदत्त आदि ने संस्कृत पढ़नी आरम्भ कर दी।

गुरुदत्त को अष्टाध्यायी पढ़ने की इतनी रूचि थी कि एक बार पूर्णचन्द्र स्टेशन मास्टर बहावलपुर के निमंत्रण पर पंडित अक्षयानंद वहां चले गए तो वह किराया खर्च कर पढ़ने के लिए बहावलपुर ही पहुँच गया परन्तु इतिहास की फिर पुनरावृत्ति हुई। पंडित अक्षयानंद भी उसे पढ़ाने में असमर्थ सिद्ध हुए।

गुरुदत्त कोई साधारण विद्यार्थी तो था नहीं। उसकी संतुष्टि न हो सकी। डेढ़ माह में डेढ़ अध्याय अष्टाध्यायी का पढ़ने के पश्चात अक्षयानंद से पढ़ना छोड़ दिया।

शेष अष्टाध्यायी सभवतः ऋषि दयानन्द के वेदांगप्रकाश की सहायता से स्वयं पढ़ी। सम्पूर्ण अष्टाध्यायी नौ मास में पढ़ लिया। कॉलेज में प्रविष्ट होने से पूर्व अष्टाध्यायी पर उनका अच्छा अधिकार था।

--सन्दर्भ : डॉ रामप्रकाश जी की पुस्तक -"पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी "


अद्भुत प्रतिभा के धनी पं. गुरुदत्त विद्यार्थी,गुरु को भी बना लिया था शिष्य-

वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने आर्यसमाज में विद्वानों की जरूरत समझी।अतः गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने स्वामी अच्युतानन्द को (जो नवीन वेदांती थे) आर्यसमाजी (आर्य सन्यासी) बनाने के लिए ठान लिया। इसके लिए गुरुदत्त जी उनके शिष्य बनकर उनके पास जाया करते थे।फिर क्या हुआ–समय बदला गुरु शिष्य बन गया और शिष्य गुरु।

स्वामी अच्युतानन्द कहा करते थे,“पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी का सच्चा प्रेम,अथाह योग्यता और अपूर्ण गुण हमें आर्यसमाज में खींच लाया।”

जिस हठीले अच्युतानन्द ने ऋषि दयानन्द से शास्त्रार्थ समर में पराजित होकर भी पराजय नहीं मानी थी,आज वही उसके शिष्य के चरणों में अपने अस्त्र-शास्त्र फेंक चुका है।आज वह उसी ऋषि का भक्त है-उसी के प्रति उसे श्रद्धा हो गयी है।
श्रद्धा भी इतनी कि जब कई वर्ष पीछे पण्डित चमूपति ने उनसे पूछा, “स्वामी जी नवीन वेदान्त विषय पर आपका शास्त्रार्थ महर्षि दयानन्द से हुआ था,इसका कोई वृत्तान्त सुनाइए।”
तो गर्व से बोले-“मैं मण्डली सहित मण्डप में पहुँचा।”
चमूपति जी पूछ बैठे - “और … और मेरा ऋषि?”

बस,एकदम बाँध टूट गया,स्वामी जी की आँखों से आँसू छलक आये।ह्रदय की श्रद्धा आँखों का पानी बनकर बह निकली,गला रूँध गया और भर्राई हुई आवाज में बोले-“ऋषि ! ऋषि ! ! वह ऋषि (दयानंद) तो केवल अपने प्रभु के साथ पधारे थे।” इतना कहते ही बिलख -बिलखकर रोने लगे।ऋषि के प्रति उनमें इतनी श्रद्धा पैदा कर दी थी गुरुदत्त ने।

स्रोत-
पुस्तक-“पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी"
लेखक-डॉ राम प्रकाश

पण्डित गुरुदत्त को योग में काफी रूचि थी। किसी योगी महात्मा के मुलतान आने का पता चला तो अपने चाचा के साथ महात्मा जी की सेवा में पहुँच गये और निम्नलिखित वार्तालाप हुआ उनसे ----

गुरुदत्त - महाराज ! योग सीखने का सर्वोत्तम विधि कौनसी है ? जो महर्षि पतंजलि ने अपनें योग सूत्रों में वर्णन की है , वह या और कोई ?

साधु - पतंजलि की विधि ही ठीक है , अन्य विधियाँ कपोल-कल्पित हैं।

गुरुदत्त - क्या आप स्वामी दयानन्द के विषय में कुछ जानते हैं ?

साधु - हाँ , हम जंगलों में इकट्ठे रहे हैं। एक बार हम एक स्थान पर भागवत पुराण बांचने वाले एक पण्डित के पास कथा सुनने जाते रहे। स्वामी दयानंद जी पुराणों की बातें सुनकर दुखी हो जाया करते थे।

गुरुदत्त --क्या वेद समस्त विद्याओं का भण्डार है ?

साधु - हाँ

गुरुदत्त -क्या सैन्य संचालन और व्यूह रचना के नियम भी वेदों में हैं।

साधु - हाँ , हैं। ये सिद्धांत मैं स्वयं भी जानता हूँ यदि कोई छह मनुष्य मेरे साथ वन में चले तो मैं उन्हें महाभारत तथा रामायण के समय की शैली पर शिक्षा दे सकता हूँ।

गुरुदत्त ने महात्मा जी से बुद्धि तीव्र बनाने का ढंग पूछा। इस पर साधु ने उसे एक नुस्खा लिखा दिया जिसमें बहुत सी औषधियाँ वे ही थी जो संस्कार्विधि में लिखी थी।

------ डॉ राम प्रकाश द्वारा लिखी पुस्तक -"पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी"

ईंट-पत्थर किसी का स्मारक नहीं बन सकते

पंडित गुरूदत्त विद्यार्थी अपने व्याख्यानों में कहा करते थे कि-

"ईंट-पत्थर पर किसी ऋषि का नाम खुदवा देने से ऋषि का स्मारक नहीं बन सकता। प्रत्युत यदि ऋषि का स्मारक स्थापित करना चाहते हो तो उन सिद्धांतों का प्रचार करके दिखाओ  जिन सिद्धांतों का प्रहार वे ऋषि करते रहे हैं। स्वामी दयानन्द का स्मारक यही है कि वेद के सिद्धांतों का समाज में प्रचार प्रसार हो जाये। "
सन्दर्भ- पंडित लेखराम आर्यपथिक संगृहीत महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र। पृष्ठ 891,संस्करण 2046

(नोट- इस लेख के लेखन में आर्य विद्वान् श्री भावेश मेरजा एवं भ्राता अनिल विभ्रांत आर्य का मुझे सहयोग प्राप्त हुआ हैं। उनका सहर्ष धन्यवाद- डॉ विवेक आर्य ) 

Wednesday, April 25, 2018

डॉ बाबासाहब अंबेडकर के दलित आन्दोलन में बाह्मणो का योगदान




डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के दलित आन्दोलन में बाह्मणो का योगदान

लेखक-डॉ. पी. जी. ज्योतिकर अनुवाद : जयंतिभाई पटेल

कुछ समय से दलित समाज में क्रांतिकारी नेता के विषय में एक मापदण्ड देखा जाता है. अनुभव किया जा रहा है, दलित समाज की सभाओं में जो ब्राह्मणों को वीभत्स गालियाँ, हिन्दू देवी-देवताओं का मज़ाक एवं महात्मा गाँधी जी का मजाक अपने भाषणों में जो करता है, वह वक्ता-नेता महान् क्रांतिकारी, उद्दामवादी प्रगतिशील माना जाए !! सभाओं में तालियाँ, और यह सब हो रहा है पू. बोधिसत्व डॉ. बाबासाहब अंबेडकर जी के नाम पर..कुछ हमारे मित्र जन तो दलितस्तान भी बाबासाहब जैसे देशभक्त के खाते में जमा कराने का अपराधजन्य कुकृत्य भी कर रहे हैं। आइए आज हम बाबासाहब के जीवन की कुछ हकीकतें जानें और गंभीरता से उसके बारे में सोचें।

1. वर्षा से भीगे हुए छोटे से भीम को अपना रूढ़िचुस्त ब्राह्मणत्व भूल कर अपने घर ले जाकर ब्राह्मण पत्नी द्वारा गरम पानी से अपने पुत्र के साथ स्नान कराने वाले शिक्षक पेंडशे गुरुजी का अपने 50वें जन्मदिन पर बोधिसत्व डॉ. बाबा साहब स्मरण करते हुए कहते हैं- 'स्कूल जीवन का यह मेरा पहला सुख था।'

2. बालक भीम का लंबा -कर्कश टाइटल अंबेडकर उनके ब्राह्मण शिक्षक कृष्णजी केशव अंबेडकर को अच्छा नहीं लगता था। अतः उन्होंने अपना टाइटल अंबडेकर को प्रदान किया।आज यह अंबडेकर टाइटल गुरु-शिष्य के प्रेम की अद्भुत मिसाल। है एवं करोड़ों किंकरों के लिए प्रेरणारूप है।

3. लश्करी केम्प स्कूल सतारा (साल्वेशन आर्मी स्कूल) में जातिभेद अल्प मात्रा में था। वहाँ पर कृष्ण जी केशव अंबेडकर (1855-1934) शिक्षक थे। (पिता केशव अंबेडकर स्थानीय शिवालय के पुजारी थे) वह अपने सारे शिष्यों के प्रति समान भाव रखते थे। माध्याह्न में छुट्टी के समय भीम भोजन करने घर पर जाता था एवं स्कूल में देर से आया करता था किन्तु गुरुजी को वह पसंद नहीं था। अतः गुरुजी हमेशा अपने टिफिन में खाना ज्यादा लाते थे और भीम को बड़े प्रेम से खिलाते । डॉ. भीमराव जी ने गुरुजी के वह खाने का स्वाद जीवन पर्यन्त याद रखा था।
अपने जन्मदिन-हीरक महोत्सव के समय नरे पार्क (मुंबई) में विशाल जन समूह के समक्ष इस प्रसंग का गौरव के साथ जिक्र करते हुए कहा था-‘स्कूल जीवन की मेरी यह द्वितीय मधुर स्मृति है।'

4. सन् 1930 को गोलमेज परिषद के लिए कार्य के लिए अभिनंदन देते हुए गरूजी के पत्र को बड़े प्रेम से संभाल के रखा है, यह कहना भी वह कभी भूलते नहीं थे। गुरुजी जब शिष्य को मिलने राजगृह (दादर) आए तब डॉ. भीमराव ने 1934 के दिन गुरुजी को दण्डवत् करते हुए श्रीफल, धोती, चादर की दक्षिणा अर्पण की थी । दिनांक 22.12.1934 के दिन गुरुजी के देहांत होने पर डॉ. भीमराव को अपार दुःख हुआ था ।

5. ब्राह्मण नारायण मल्हावराय जोषी (1879-1955) भारतीय मजदूर क्रांति के जनक (मराठी साहित्यकार वा. जोषी के अग्रज) 1902 -1906 मुंबई के एल्फिस्टन हाईस्कूल में डॉ. भीमराव के वर्ग शिक्षक थे। जिन्होंने विद्यार्थी भीम को पिछली बेंच से उठाकर प्रथम बेंच में बिठाया और ब्लैकबोर्ड पर लिखने के लिए कहा ।

6. मैट्रिक के बाद अभ्यास के लिए वडोदरा महाराजा श्रीमंत सयाजीराव की शिष्यवृत्ति लेने के लिए महाराजा से मुंबई में मुलाकात कराने वाले यान्दे भी ब्राह्मण ही थे। गोरगाँव में उनका प्रसिद्ध निर्णयसागर प्रेस था जिसमें महाराजा के राज्य का संपूर्ण साहित्य छपा था। अतः वह महाराजा के घनिष्ठों में से एक थे। दादा केलुस्कर (भंडारी जाति) उनके साथ गए थे, पहचान यान्द जी की थी।

7. दिनांक 4. 6. 1913 के दिन वडोदरा राज्य एवं भीमराव अंबेडकर के बीच स्टाम्प पेपर पर विदेश में उच्च पढ़ाई हेतु शिष्यवृत्ति-आर्थिक सहायता विषयक दस्तावेज लिखा गया। दस्तावेज के लेखक तथा दस्तावेज में अंबेडकर के पक्ष में साक्षी देकर हस्ताक्षर करने वाले त्रिभोवन जे. व्यास एवं ए. जी. जोशी नाम के ब्राह्मण थे।

8. बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1942) के अध्यक्ष चिमनलाल सेतलवाड ब्राह्मण थे । साथ में अन्य और सवर्ण हिन्दू साथी तो थे ही....

9. महाड सत्याग्रह (कोलाबा जिला बहिष्कृत परिषद 19-20 मार्च 1927) | में कार्यक्रम के अंत में डॉ. अंबेडकर की अगवानी में एक विशाल रैली निकालकर चवदार तालाब में प्रवेश करके पानी पीने का प्रस्ताव रखने वाले अनंतराव विनायक चित्रे (1894-1959) भी कायस्थ ब्राह्मण थे जिन्होंने बाद में डॉ. अंबेडकर को सामयिक जनता साप्ताहिक में एडिटर के रूप में वर्षों तक सेवा दी थी। सन् 1928 में इन्दौर में दलित छात्रावास भी चलाते थे।

10. वैदिकविधि से दलितों को यज्ञापवीत, सामूहिक भोजन का आयोजन इत्यादि कार्यक्रमों के हेतु स्थापित समाज समता संघ के महत्व के अग्रणी लोकमान्य तिलक के सुपुत्र श्रीधरपंत ब्राह्मण थे, तिलक जिन्होंने ब्राह्मणों की नगरी पूणा में गायकवाड सवर्णों के विरोध के बीच भी दलित-सवर्णों का समूह भोजन करवाया थे। श्रीधर पंत ने जब आत्महत्या की उसके एक दिन पूर्व अपने स्वजन मानते हुए डॉ. अंबेडकर को पत्र लिखकर आत्महत्या की जानकारी दी थी।

11. समाज समता संघ के मुखपत्र समता के एडिटर देवराम विष्णु नायक गोवर्धन ब्राहमण थे, जो पीछे से जनता साप्ताहिक के एडिटर भी रहे एवं बाबासाहब के अंतरंग साथी रहे।

12. महाड़ सत्याग्रह केस (20 मार्च 1927) दीवानी केस 405/1927 में शंकराचार्य डॉ. कृर्तकोटि डॉ. अंबेडकर के पक्ष में साक्षी रहे थे । उनकी साक्षी लेने वाले कोर्ट कमिशन भाई साहब महेता भी ब्राह्मण थे । डॉ. अंबेडकर के पक्ष में वह फैसला आया था। और 405-1927 केस का फैसला देने वाले न्यायमूर्ति वि. वि. पण्डित भी ब्राह्मण ही थे। दस साल बाद 17. 3. 1937 के दिन हाइकोर्ट ने डॉ. अंबेडकर के पक्ष में फैसला सुनाया था।

13. उसी काल में (9, 10-12-1927) वृहद महाराष्ट्र परिषद वेदशास्त्र पारंगत नारायण शास्त्री मराठे की अध्यक्षता में अकोला में मिली जिसमें सैंकड़ों वेद पारंगत ब्राह्मण उपस्थित थे। इस ब्राह्मण परिषद ने यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित करके सामाजिक समता की हिमायत की थी। अधिक प्रस्ताव 13 पारित कर घोषणा की गई कि 'अस्पृश्यता, शास्त्र आघारित नहीं है।' मानव मात्र को वेद अध्ययन का अधिकार है। स्कूल, धर्मशाला, कूपों, तालाव, मंदिर तमाम जगहों पर प्रवेश करना सबका समान रूप से अधिकार है। किसी को भी अस्पृश्यता को मान्यता नहीं देनी चाहिए। उक्त परिषद के प्रमुख संचालकों में से पांडुरंग भास्कर शास्त्री पालेच (ब्राह्मण) थे। डॉ. आंबेडकर को जो अपेक्षित था वह इस ब्राह्मण परिषद ने प्रस्ताव द्वारा प्रोत्साहित किया।

14. कमलकांत वासुदेव चित्रे (1894-1957) समाज समता संघ के बुनियादी कार्यकर्ता, सिद्धार्थ कॉलेज के संस्थापना एवं विकास के राहबर, पीपल्स एज्युकेशन सोसायटी के गवर्निंग बोर्ड के सदस्य, डॉ. बाबा साहब के पुनर्विवाह के समय (दिल्ली) विवाह रजिस्ट्रेशन के समक्ष वधु की ओर से) डॉ. शारदा कबीर के 'पक्ष की ओर से दो दस्तख्त करने वाले डॉ. शारदा के भाई वसंत कबीर एवं कमलकांत चित्रे ब्राह्मण थे।

15. 1945 में डॉ. अंबेडकर को सर्वप्रथम सम्मान पत्र से सम्मानित करने वाले सोलापुर म्युनिसिपल के प्रमुख डॉ. वि. वि. मूले ब्राह्मण थे। सम्मान पत्र के प्रति उत्तर में डॉ. आंबेडकर ने कहा-आज से बीस साल पूर्व डॉ. वि. वि. मूले के सहयोग के। कारण ही मैं समाज सेवा क्षेत्र में आया हूं।

16. स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्री मण्डल में डॉ. अंबेडकर के नाम का सूचन-आग्रह करने वाले चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य भी ब्राहमण ही थे।

17. डॉ.अंबेडकर ने 1954 में भारतीय बौद्ध महासभा नामक संस्था की। रजिस्ट्री करवाई। इस संस्था के ट्रस्टी में बालकृष्णराव कबीर ( डॉ.अंबेडकर के साले)
को लिया गया, जो सारस्वत ब्राह्मण थे। भारतीय बौद्ध महासभा का प्रथम नाम भारतीय बौद्ध जनसंघ (1951) था। फिर भारतीय बौद्ध जन समिति (1953) में और अंत में भारतीय बौद्ध महासभा नाम रखा गया।

18. 14 अक्टूबर 1954 की अशोक विजया दशमी के दिन नागपुर में डॉ. अंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने एडवोकेट अनंत रामचन्द्र कुलकर्णी (मंत्री बौद्ध समिति) और नागपुर के सेशन जज न्यायमूर्ति भवानीशंकर नियोगी भी ब्राह्मण ही थे। कुलकर्णी 1940 से नागपुर में बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे जबकि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नियोगी कमीशन की रिपोर्ट के इस बौद्ध कर्ता ने ईसाइयत में धर्मान्तरण के विरोध की पेशकश की थी।

इस तरह समाज सेवा की प्रवृति एवं संघर्ष में भी ब्राह्मण समाज डॉ. अंबेडकर के पास में रहा था। उनको हम डॉ. आंबेडकर और ब्राह्मणों के बीच ऋणानुबंधी संबंध कहें कि संजोग .....परन्तु सत्य तो यही है।

गौरव घोष, नवम्बर 2006 से साभार।

ये तथ्य डा. पी.जी. ज्योतिकर द्वारा लिखे 'डा. बाबासाहेब अंबेडकर के दलित आंदोलन में ब्राह्मणों का योगदान' नामक लेख, अनुवाद: जयंतिभाई पटेल, में उपलब्ध हैं। हिंदी मे अनुवादित यह लेख डा. के. वी. पालीवाल रचित पुस्तक 'मनुस्मृति और डा. अंबेडकर' के परिशिष्ट में छपा है।

प्रस्तुतकर्ता -अरुण लवानिया

Tuesday, April 24, 2018

सिख पंथ में अलगाववाद कैसे फैलाया गया?





सिख पंथ में अलगाववाद कैसे फैलाया गया?






सिख , हिन्दू नहीं होते है , इस फर्ज़ीवाड़े को सबसे पहले गढ़ने वाला मैक्स आर्थर मेकलीफ़ ( Max Arthur Macauliffe) था ।






यह गुरुमुखी का विद्वान भी था जिसने Guru Granth Sahib का English translation भी किया था ।






Max Arthur Macauliffe जिसे सिख पंथ को एक धार्मिक संस्था का रूप दिया था का हिंदूइस्म के विषय में क्या विचार थे जरा ध्यान दे-






It (Hinduism) is like the boa constrictor of the Indian forests. When a petty enemy appears to worry it, it winds round its opponent, crushes it in its folds, and finally causes it to disappear in its capacious interior....Hinduism has embraced Sikhism in its folds; the still comparatively young religion is making a vigorous struggle for life, but its ultimate destruction is, it is apprehended, inevitable without State support.






【 हिंदी अनुवाद - यह (हिंदू धर्म) भारतीय जंगलों का Boa Constrictor (उष्णकटिबंधीय अमेरिका का एक बड़ा और


शक्तिशाली सर्प, कभी-कभी बीस या तीस फुट लंबा ) की तरह है। जब एक छोटा विरोधी इसकी चिंता करता प्रतीत होता है, तो यह अपने प्रतिद्वंद्वी के चारों ओर घूमता है, इसे अपने लपेटे में ले लेता है, और आखिरकार इसे अपने विशालता में गायब कर देता है .... हिंदू धर्म ने सिख धर्म को अपने लपेटे में लिया है; अभी भी तुलनात्मक रूप से यह युवा धर्म जीवन के लिए एक सशक्त संघर्ष कर रहा है, लेकिन इसका अंतिम विनाश यह है कि इसे राज्य समर्थन के बिना अपरिहार्य माना जाता है। 】






Max Arthur Macauliffe 1864 मे इंडियन सिविल सर्विसेज से पंजाब में आया था। 1882 में ये पंजाब का डिप्टी कमीशनर बना।


मेकलीफ़ वो पहला इंसान था जिसने सिख हिन्दू नहीं है कि परिकल्पना की थी। उसने देखा कि सिख एक मार्शल कौम है। इसलिए सिख आर्मी के लिए उपयुक्त है।






इसलिए इन्होंने पंजाब मे आर्मी की नौकरी में सिखों के लिए आरक्षण लागु कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप कोई भी राम कुमार सरकारी नौकरी नही पा सकता था पर वही राम कुमार दाड़ी मूछ और पगडी रखकर राम सिंह बनकर नौकरी पा सकता था। उस समय तक इसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाता था।






इसका नतीजा ये हुआ कि पंजाब मे सिख population 1881 से 1891 के बीच 8.5% बढी।






1891 से 1901 के बीच 14% बढी।


1901 से 1911 के बीच 37% बढी।


1911 से 1921 के बीच 8% बढी।






इनके पंजाबी के ट्यूटर थे Kahn Singh Nabha जिन्होने 1889 मे "हम हिन्दू नहीं" नामक पुस्तक लिखी । जिसको Macauliffe जी ने फंड किया ।


1909 मे खुद Macauliffe साहब ने भी Sikh religion: Its Gurus, Sacred writings, and authors नामक पुस्तक लिखी । जिसकी भूमिका में इन्होंने ये भी बताया है कि किस तरह इन्होंने खालसा पूजा पद्यति आरम्भ की और सिखो के लिए आर्मी में अलग शपथ परम्परा की शुरुआत की ।






इस समय तक गुरूद्वारो ( दरबार) महंतो और साधुओं की देखरेख मे होते थे। गुरूद्वारो के लिए महंतो और हिन्दु पुरोहित की जगह खालसा सिखो की प्रबंधक कमेटी का विचार भी इन्हीं का था। इन गुरूद्वारो से जुड़ी हुई जमीन और सम्पत्ति भी थी।






1920 के शुरूआत से महंतो से गुरूद्वारो को छीनने का अकाली दल का सिलसिला चालू हुआ। इसके लिए महंतो पर तरह तरह के आरोप लगाकर( महिलाओ से दुष्कर्म, गलत कर्मकांड आदि) उन्हे बदनाम किया गया, जनता मे उनके खिलाफ छवि बनाई गयी।






सबसे पहले बाबे दी बेर गुरूद्वारा, सियालकोट जो एक महंत की विधवा की देखरेख मे था, बलपूर्वक कब्जाया गया।






फिर हरमंदिर साहिब ( स्वर्ण मंदिर) छीना गया। फिर गुरूद्वारा पंजा साहिब कब्जाया गया। इसका कब्जे के विरोध 5-6 हजार लोगो ने गुरूद्वारा घेर लिया जिन्हे पुलिस ने बलपूर्वक हटाया।






फिर गुरूद्वारा सच्चा सौदा, गुरूद्वारा तरन तारन साहिब आदि महंतो पर आरोप लगा पुलिस के सहयोग से कब्जाये गये।






इन कब्जो के लिए महंतो को पीटा गया उनकी हत्यारे की गई। जिसके लिए बाकायदा बब्बर अकाली नामक दल का गठनकर मूवमेंट चलाया गया।


ननकाना साहिब गुरूद्वारे पर कब्जा सबसे अधिक बडा खूनी इतिहास है। जिसमे दोनो के कई सैकडो लोग तक मारे गये।


फिर गुरूद्वारा गंजसर नाभा और कई अन्य हिसंक तरीके एवं पुलिस के सहयोग से महंतो से छीने गये।


1925 मे सिख गुरूद्वारा बिल पारित हुआ और कानून बना कर गुरूद्वारो के कब्जे खालसा सिखो को दिये गये। SGPC का गठन हुआ।


फिर एक रेहता मर्यादा बनाई गई जो तय करती है कि कौन सिख है और कौन नही। जिसका पूर्णरूपेण उद्देश्य सिख से हिन्दू विघटन निकाला है।


SGPC के तत्वावधान मे सिख इतिहास को नये सिरे से लिखा गया। हिन्दू परछाई को को सिख मे से जितना हो सके अलग किया गया। नये नये हिन्दू ( खासकर ब्राह्मण) विलेन कैरेक्टर सिख इतिहास में घड़े गए।






पंजाबी मे पारसी भाषा के शब्दो का अधिकधिक प्रयोग किया गया। गंगू बामन और स्वर्ण मंदिर की नीव मुसलमान के हाथो रखवाना, जिसका इससे पहले कोई प्रमाण और इतिहास नही है, घडे गये और इनका प्रचार किया गया ।






गुरू गोविंद सिंह जी की वाणी दशम ग्रंथ मे चंडी दी वार और विचित्र नाटक को इसमे ब्राह्मणी मिलावट घोषित किया गया।






हकीकत राय, सति दास, मति दास, भाई दयाल आदि के बलिदानों को सिखों के बलिदान बताकर प्रचारित किया गया। जबकि इनके वंशज तो आज की तारीख मे भी हिन्दू है।






बंदा बहादुर जिसका की उस समय तत खालसा बनाकर विरोध किया गया और मुग़लों से मिलकर मिलकर उसे पकड़वाया गया था। SGPC आज उसे सिख हीरो के रूप में बताती है।






निर्मली अखाडा जोकि गुरू गोविंद सिंह जी का ही डाला हुआ है और संस्कृत एवं वेदांत के प्रचार प्रसार को समर्पित है हिन्दू विरोध की खातिर इस तक को SGPC ने सिख इतिहास से नकार दिया।






गुरू नानक के पुत्र थे श्रीचंद जोकि अपने समय कै महानतम और प्रसिद्ध योगी थे ने उदासीन पंथ की स्थापना की थी।






गुरू राम राय जोकि गुरू हर राय के बडे पुत्र थे ने देहरादून मे अपनी गद्दी स्थापित की। इनकी जगह इनके छोटे भाई कृष्ण राय ने पिता की गद्दी सम्भाली और अगले सिख गुरू कहलाये।






ये सभी अखाडे आज भी महंतो द्वारा संचालित है। समाज सेवा मे है।






आनंद मैरिज एक्ट पास कर सिखों के लिए अलग से विवाह पद्यति आरम्भ की गई। अन्यथा 1920 से पहले तक तो हिन्दू पुरोहित ही सिख घरों में विवाह आदि वैदिक संस्कार करवाने जाते थे।


पर Max Arthur Macauliffe की नीति जिससे एक अलग खालसा सिख पंथ की नीव पड़ी की परिणति खालिस्तान आन्दोलन के रूप में सामने आई। बब्बर खालसा उग्रवादियों ने करीब 50000 हजार निरपराध हिन्दुओं की हत्या कर दी। अवसरवादी राजनीती के चलते इन हत्याओ को इस देश ने भुला दिया।






सिखों का धार्मिक ग्रन्थ है "गुरु ग्रन्थ साहिब" इसको आप उठाकर पढ़ेंगे और देखेंगे तो इसमें "हरी" शब्द 8 हज़ार से भी अधिक बार इस्तेमाल किया गया है, वहीँ "राम" शब्द 2500 से अधिक बार, जबकि "वाहेगुरु" शब्द मात्र 17 बार गुरु ग्रन्थ साहिब को ही अब सिखों का गुरु माना जाता है, चूँकि सिख के आखिरी गुरु गोबिंद सिंह ने इसे ही आगे के लिए गुरु घोषित किया था।






गोविन्द सिंह का तो नाम भी "गोविन्द है" और "सिंह" हिन्दू उपनाम है, जो सिख समूह के बनने से पहले से ही हिन्दू इस्तेमाल करते आये है ।






खालिस्तानी वो लोग हैं जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में दर्ज हिंदुओं की बानी के बावजूद अपने ही धर्म ग्रन्थ को झुठला कर कहते हैं कि "यह वो राम , वो। कृष्णा, वो जगदीश " नहीं हैं। अपने ही दसवें गुरु के लिखे चण्डी दी वार " चढ़ मैदान चण्डी महिषासुर नु मारे" को झुठलाते हैं। "देव शिवा वर मोहे इहे" को झुठलाते हैं। लाखों खालिस्तानी है आज, इनका पूरा गैंग सक्रिय है, कनाडा, ब्रिटैन जैसे देशों में तो इनका पूरा गैंग ही सक्रिय है, और पाकिस्तान से इनकी बड़ी मित्रता है


ये हिन्दुओ को गाली देते है । ये हिन्दुओ की ही संतान, इन सभी के पूर्वज हिन्दू ही थे, स्वयं नानक भी पैदा होते हुए हिन्दू थे


उनके पिता का नाम कालू चंद, (कालू, कल्याण मेहता) था ।


और ये खालिस्तानी हिन्दुओ को गाली देते है, इन खालिस्तानियों को औरंगजेब और पाकिस्तान प्यारा है ।






आईये इस अलगववदवादी मानसिकता से बचे। एकता में ही शक्ति है। यह सन्देश स्मरण करे।






source-facebook






सलंग्न चित्र-पाकिस्तान में स्थित एक गुरूद्वारे का है जिसमें पाकिस्तान सरकार ने एक इस्लामिक स्कूल में परिवर्तित कर दिया।

Monday, April 23, 2018

विधर्मियों द्वारा वीरवर अखण्ड ब्रह्मचारी हनुमान जी पर अनुचित आक्षेप।



विधर्मियों द्वारा वीरवर अखण्ड ब्रह्मचारी हनुमान जी पर अनुचित आक्षेप।

डॉ विवेक आर्य

कुछ वर्ष पहले 300 रामायण नामक रामानुजम के एक लेख की चर्चा जोरों से उठी थी। जब उसे दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्य क्रम से हटा दिया गया था। इस पुस्तक में रामायण के आदर्श पात्रों के विषय में अनुचित आक्षेप किये गए थे। जैसे प्रभु राम मांसाहारी थे, लक्ष्मण की सीता जी पर आसक्ति थी आदि। इन प्रकार के असत्य तथ्यों का मूल उद्देश्य प्रभु राम के प्रति भारतीय एवं विदेशी दोनों जनमानस के मन में उनके प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करना था। जिससे उनके छिपे हुए उद्देश्य सिद्ध हो सके। सामान्य जनता को भ्रमित करने के लिए मध्यकाल में समय समय पर रामयण के भिन्न प्रारूपों की रचना हुई। रामायण के इन विभिन्न प्रारूपों के लेखक वैदिकधर्मी न होकर वाममार्गी या नास्तिक मत जैसे बौद्ध अथवा जैन मत के थे। इसलिए उन्होंने उसे विकृत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। इसी प्रकार की दुष्ट चेष्ठा उन विधर्मियों ने हनुमान जी महाराज के चरित्र से भी करने का प्रयास किया हैं।

जहाँ सम्पूर्ण विश्व हनुमान जी से ब्रहमचर्य एवं वीरता की प्रेरणा लेता है। वही हनुमान जी के बारे में ठीक इसके विपरीत बातें थाई, जैन और मलय देश की रामायण में मिलती हैं। जैसे

फिलिप नाम के एक लेखक ने तो यह लिख दिया कि सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी के ब्रहमचर्य के विषय में कोई वर्णन नहीं हैं।

जबकि वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट लिखा है कि रावण के महलों में उसकी अति सुन्दर रानियों को कम वस्त्रों में सोते हुए देखकर भी अखंड ब्रहमचारी हनुमान अपनी जितेन्द्रियता के कारण काम के वेग से पीड़ित न हुए। - सन्दर्भ वाल्मीकि रामायण ५/११/४१-४२

एक अन्य आक्षेप लगा दिया गया कि भरत ने श्री राम की अयोध्या वापिसी पर हनुमान को 16 दासियाँ पुरस्कार के रूप में दी। -सन्दर्भ वाल्मीकि रामायण का प्रक्षिप्त भाग। वैदिक काल में गुलाम बनाने, मनुष्यों की खरीद फरोख्त आदि करने का ऐसा कोई विधान नहीं था। यह दोष तो इस्लाम के प्रचलन के बाद ही व्यवहार में आया। यह भेंट में दास-दासियों को देना एक कल्पना मात्र है। यह तो संभव है कि अपने यहाँ काया करने वाले नौकरों को हनुमान जी के यहाँ पर जाकर कार्य करने के लिए कहा गया हो। मगर मनुष्य रूप में दास-दासी कोई भेंट करने की वस्तु नहीं हैं। इसलिए यह एक कल्पना मात्र है।

थाई रामायण में हनुमान जी के बारे में लिखा है कि हनुमान जी की अनेक पत्निया थीं। जिनका नाम था स्वयंप्रभा, बेनजकाया (विभीषण की पुत्री), सुवनमच्चा एवं रावण की महारानी मंदोदरी। हनुमान जी को बहुपत्नी वाला एवं विवाहित नारी से सम्बन्ध रखने का यह एक निष्फल प्रयास है। क्यूंकि वाल्मीकि रामायण में ऐसा कोई वर्णन नहीं मिलता।



सुवनमच्चा (रावण की पुत्री) से हनुमान का एक पुत्र था जिसका नाम मच्चहनु था। (लेखक की विकृत मानसिकता का इसी से पता चलता हैं की वे हनुमान जी का अनैतिक सम्बन्ध रावण की पत्नी मंदोदरी और रावण की पुत्री से स्थापित करने में किसी भी प्रकार की कोई झिझक महसूस नहीं करता। इससे उसकी मानसिक सोच का भी पता चलता हैं की वह कैसी विकृत सोच वाला था)

जैन लेख में लिखा गया है कि हनुमान ने लंका के रक्षक वज्रमुख की पुत्री लंकासुंदरी से विवाह किया था।

एक और गप्प उड़ा दी गई कि हनुमान जी का पसीना सागर में गिर गया। जिसे एक मछली ने ग्रहण कर लिया उससे उसे मत्स्य राज नाम का पुत्र पैदा हुआ।

पाठक समझ ही गए होगे कि रामायण के आदर्शों के चरित्र को धूमिल कर, साधारण जनमानस के मन में उनके प्रति घृणा पैदा कर, अपने मत मतान्तर की शोभा बढ़ाने का प्रयास एक कुटिल षडयन्त्र है। जिसका पूरजोर विरोध सभी राम प्रेमियों को करना चाहिए और इस प्रकार का अभिव्यक्ति के नाम पर को लोग बौधिक आतंकवाद जो लोग फैला रहे है। उन्हें रोकना चाहिए।

(सन्दर्भ- wikipedia-2013 पर अंग्रेजी में मिला विवरण। आज 2018 में wikipedia पर यह विवरण सम्पादित हो चूका है।)

Hanuman became more important in the medieval period, and came to be portrayed as the ideal devotee (bhakta) of Rama. His characterization as a lifelong brahmachari (celibate) was another important development during this period.[5] The belief that Hanuman's celibacy is the source of his strength became popular among the wrestlers in India.[9] The celibacy or brahmacharya aspect of Hanuman is not mentioned in the original Ramayana.[10] The original Valmiki Ramayana mentions that Bharata presented Hanuman with 16 maidens as a reward. The non-Indian versions of Ramayana, such as the Thai Ramakien, mention that Hanuman had relationships with multiple women, including Svayamprabha, Benjakaya (Vibhisana's daughter), Suvannamaccha and even Ravana's wife Mandodari.[5] According to these versions of the Ramayana, Macchanu is son of Hanuman borne by Suvannamaccha, daughter of Ravana.[11][12][13] The Jain text Paumacariya also mentions that Hanuman married Lankasundari, the daughter of Lanka's chief defender Bajramukha.[14] Another legend says that a demigod named Matsyaraja (also known as Makardhwaja or Matsyagarbha) claimed to be his son. Matsyaraja's birth is explained as follows: a fish (matsya) was impregnated by the drops of Hanuman's sweat, while he was bathing in the ocean.[5]

Saturday, April 21, 2018

क्या वेदों में पुत्रोत्पत्ति का पक्षपात है?



क्या वेदों में पुत्रोत्पत्ति का पक्षपात है?

प्रियांशु सेठ

अथर्ववेद के तीसरे काण्ड, तेईसवें सूक्त का मन्त्र केवल 'पुत्र' उत्पत्ति का आदेश देता है अथवा क्या वेद में 'पुत्र एवं पुत्री' के प्रति भेदभाव करने का संकेत है?

समाधान- वेदों में स्त्री/पुत्री/नारी को विदुषी, वीरांगना, प्रकाश से परिपूर्ण, सुख-समृद्धि लाने वाली, इन्द्राणी, अलंकृता, वीरप्रसवा, अन्नपूर्णा, कर्त्तव्यनिष्ठ धर्मपत्नी इत्यादि आदरसूचक नामों से सम्मान दिया गया है। वेदों पर किसी भी विषय-विशेष को लेकर दोषापरण करना उचित नहीं। यह एक भ्रान्ति है कि वेदों में केवल पुत्र उत्पन्न करने को बढ़ावा दिया है। यदि इस भ्रांति का निवारण नहीं किया गया तो अन्य सम्प्रदाय वेदों पर पुनः झूठे आक्षेप करना शुरू कर देंगे।
सर्वप्रथम हम पुत्र शब्द पर चर्चा ही करेंगे ताकि सरलतापूर्वक 'पुत्र' शब्द का अर्थ तो समझ आ जाये।

प्रश्न:- पुत्र किसे कहते हो?
उत्तर:- जो आज्ञाकारी, दुःखों को दूर करनेवाला, अपने कार्यों के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ, सदाचारी, परोपकारी हो, वही पुत्र कहलाने योग्य है।

प्रश्न:- पुत्र का अर्थ पढ़ने पर तो केवल 'बेटा' ही प्रतीत होता है?
उत्तर:- नहीं। पुत्र शब्द के कई अर्थ हैं; जैसे- बेटा, त्राण इत्यादि।

१. बेटा- क्या हम केवल लड़कों को ही बेटा कहकर पुकारते हैं?

जैसे कोई अध्यापक या अध्यापिका अपने विद्यार्थियों को कोई कार्य करने के लिए पुकारते हैं तो क्या वह लड़के के लिए बेटा शब्द का प्रयोग करते हैं और लड़कियों के लिए बेटा शब्द का प्रयोग नहीं करते?
करते हैं न, छात्रा को भी बेटा नाम से पुकारा न!

२. त्राण- त्राण, पुत्र शब्द का ही पर्यायवाची है। इसका अर्थ 'दुःखों को दूर करनेवाला' होता है। दुःख को दूर पुत्र भी कर सकता है और पुत्री भी।

अब आइये! जानते हैं कि क्या वेदों में 'पुत्र व पुत्री' के प्रति भेदभाव करने का आदेश है अथवा वेदों में पुत्रोत्पत्ति पर ही जोर दिया गया है?

वेदज्ञान कालविभाग रहित सार्वकालिक, सार्वजनिक, सार्वदेशिक ज्ञान है, अतएव वेद में पुत्र, पुत्री के सम्बन्ध का पक्षपात न आदि में था, न अब है, न कभी होगा। वेदों में पुत्र व पुत्री के प्रति कोई भेदभाव नहीं है बल्कि स्त्रियों को पुरुष की भांति उचित सम्मान दिया गया है। यहां हम वेद के निम्न मन्त्रों का अवलोकन करेंगे-

पुमासं पुत्रं जनय तं पुमाननु जायताम्।
भवासि पुत्राणां माता जाताना जनयाश्च यान्।। -अथर्व० ३/२३/३

भावार्थः- हमारे घरों में वीर सन्ताने जन्म लें।
(यहां वेद में कहा है कि वीर सन्ताने जन्म लें फिर वीर पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी हो सकती है)

यास्तेऽ अग्ने सूर्य्ये रुचो दिवमातन्वन्ति रश्मिभि:।
ताभिर्नोऽ अद्य सर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि।। -यजु० १३/२२

भावार्थ:- जैसे ब्रह्माण्ड में सूर्य्य की दीप्ति सब वस्तुओं को प्रकाशित कर रुचियुक्त करती हैं, वैसे ही विदुषी श्रेष्ठ पतिव्रता स्त्रियां घर के सब कार्य्यों का प्रकाश करती हैं। जिस कुल में स्त्री और पुरुष आपस में प्रितियुक्त हों, वहां सब विषयों में कल्याण ही होता है।

कृणोमि ते प्राजापत्यमा योनिं गर्भ एतु ते।
विन्दस्व त्वं पुत्रं नारि यस्तुभ्यं शमसच्छमु तस्मै त्वम्भव।। -अथर्व० ३/२३/५

भावार्थः- प्राजापत्य कर्म से हमें सन्तान प्राप्त हों। माता सन्तान के लिए व सन्तान माता के लिए शांति देनेवाली हों।

मम पुत्रा: शत्रुहणोऽथो मे दुहिता विराट्।
उताहमस्मि संजया पत्यौ मे श्लोक उत्तम:।। -ऋ० १०/१५९/३

भावार्थः- मेरे पुत्र शत्रुओं को मारनेवाले हैं, ये कभी शत्रुओं से अभिभूत नहीं होते और निश्चय से मेरी पुत्री विशिष्टरूप से तेजस्विनी होती है और मैं सम्यक् शत्रुओं को जीतनेवाली होती हूँ, मेरे पति में उत्कृष्ट यश होता है। मेरे पति भी वीरता के कारण यशस्वी होते हैं। माता-पिता के वीरता के होने पर ही सन्तानों में भी वीरता आती है। माता-पिता का जीवन यशस्वी न हो तो सन्तानों का जीवन कभी यशस्वी नहीं हो सकता।

आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यु: शूरऽइषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशु: सप्ति: पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठा: सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नऽओषधय: पच्यन्तां योगक्षेमो न: कल्पताम्।। -यजु० २२/२२

भावार्थः- विद्वानों को ईश्वर की प्रार्थनासहित ऐसा अनुष्ठान करना चाहिए कि जिससे पूर्णविद्या वाले शूरवीर मनुष्य तथा वैसे ही गुणवाली स्त्री, सुख देनेहारे पशु, सभ्य मनुष्य, चाही हुई वर्षा, मीठे फलों से युक्त अन्न और औषधि हों तथा कामना पूर्ण हो।

स्त्री-विषय में उपनिषदों का कथन है-

नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसक:।
यद्यच्छरीरमादत्ते तेने तेने स युज्यते।। -श्वेता० उ० ५/१०

जीवात्मा स्त्रीलिंगी, पुल्लिंगी व नपुंसकलिंगी नहीं है। ये लिंग शरीर के हैं। जिस-जिस शरीर का यह ग्रहण करता है, उस-उस से वह रक्षित किया जाता है।

अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत सर्वमायुरियादिति।
तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तम् अश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै। -बृह० उ० ६/४/१७

जो चाहे कि मेरी पण्डिता कन्या हो, पूरी आयु भोगे, तो तिल तथा चावल पका कर घी डालकर पति पत्नी खाएं। ऐसा करने से पण्डिता कन्या उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं।

गृह सूत्र के वचन भी देख सकते हैं-

अमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहम्। -पार० गृ० १/६/३

अर्थात् मैं ज्ञान पूर्वक तेरा ग्रहण करता हूँ, तू भी ज्ञान पूर्वक ग्रहण करती है। तू ज्ञानवती है, मैं भी ज्ञानवान् हूं।

पं० अमरसिंह ने पुत्र पुत्री में भेद न मानते हुए लिखा है-

आत्मजस्तनय: सूनु: सूत: पुत्र:।
स्त्रियां त्वमी आहुर्दुहितरं सर्वे।। -अमरको० १/६/२७

अर्थात् आत्मज, तनय, सूनु, सूत, पुत्र शब्द जैसे पुमान् को कहते हैं वैसे ही ये शब्द स्त्रीलिंग में पुत्री का भी कथन करते हैं।

श्रदस्मै. यजु० ८/५, पुंमासं पुत्रं जनय. अथर्व० ३/२३/३, पुंमासं पुत्रमाघेहि. अथर्व० ५/२५/१०-१३ तथा स्त्रैषूयम्. अथर्व० ६/११/३ इन सभी मन्त्रों में पुत्र प्राप्ति तथा वीर पुत्रों की प्रार्थना है, पुत्री प्राप्ति के निषेध का कथन कहीं नहीं है।
इन समस्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि वेद में पुत्र पुत्री में किसी भी प्रकार का भेदभाव व पक्षपात नहीं है।

Friday, April 20, 2018

Ahoms v/s Mughals



Ahoms v/s Mughals

A legendary tale

Ahom–Mughal conflicts refer to the period between the first Mughal attack on the Ahom kingdom in 1615 and the final Battle of Itakhuli in 1682.

1st Battle - : 1615 AD

Venue -: Barnagar, Hajo , Kajali , Samdhora fort

Under the tyrant emperor Jahangir the 1st attack was made under noted mughal commanders named Abu Bakr & Raja Satrajit of Bhusna.But after some initial success the mughals Jihadis were slaughtered under the command of Pratap Singha like pigs in broad daylight.

Result : Ahom wins 1st round.

2nd Battle - : 1619 AD

Venue -: Dhanikal & Ranihat forts

Result -: Although the mughal won & regained some lost ground,But had to suffer heavy casuality.After this ,Jahangir gave up the hope of expanding Mughal Empire upto South-East Asia.Today countries like Myanmaar,Vietnaam,Thailand are not Islamic Nations,the credit goes to those valiant Ahom warriors.

The date of the 3rd battle is not properly recorded or still yet to be researched ,But the venue was Guwahati , Kamrup frontiers , Hajo.Under the Emperorship of ShahJahan the Mughals set to gain all the lost grounds but the mughals suffered so much casualities that they had to offer a cease fire & leave Kamrup proper.

The next battle took place during 1636 & 1637,where the mughals succeded to gain some grounds,But their joy was short lived as in 1638 Ahoms not won & regained all the lost grounds(Kamrup proper) But also made the mughals retreat .


From the 1642 - 1662 ,3 wars were fought between Mughals & the Ahoms .In each & every war the Mughal Jihadis had to run for their life after paying heavy war indemnity.

But in 1663,the Ahoms suffered a crushing defeat .Under the noted Ahom general Mir Jumla ,the Ahom king Jaydhwaj Singha,retreats,abandons capital but signs a treaty to regain capital with heavy war-indemnity payment.

But it didnt took much long for the tables to turn.Heavy Rain set in.The one climate for which the Jihadis were acclamatised to.Their fate swung to & fro.Their future was at the hands of either Allah(SWT) who could save them or the new Ahom king Chakradhwaj Singha who made it clear to Aurangazeb "Death is preferable to a life of subordination to foreigners"


In the battle of 1667 ,the lionhearted Ahoms broke the very spine of Mughal Empire.They slaughtered the Mughals & also forced them to retreat upto Bengal . This defeat nearly uprooted the Mughals from the soil of Assam. The words of Chakardwaj Sinha still echoes through out the hills of Assam "My ancestors were never subordinate to any other people; and I for myself cannot remain under the vassalage of any foreign power. I am a descendant of the Heavenly king and how can I pay tribute to the wretched foreigners."

Since then ,from 1967 to 1970 ,4 more wars & conflict took place.And in most of them the Mughals had to suffer setback after setback.It must also be noted that the Ahoms were crushing the mughals each time when the Mughal empire was at its zenith under the tyrant Aurangzeb.


True had been said about this land.The head shall only bow to the only God,Lord Narayan & the knee shall bend only for saluting Mother Akhom(assam) Those unsung hero who saved this motherland today are lost somewhere in the pages of history. Bollywood dimwits can make film on a mass murderer & blood thirsty maniac like Jalaluddin Akbar ,glorifing him ,but not a single film upon the sons of these soil who sacrificed & wrote our future today with their blood .As the saying goes -A country that dont remember her heroes does not stand exist for long. But India is such a country that have not only forgotten her heroes but also glorifies her invaders by making films on them & gloryfing them on their history books .



The Epic Battle of Saraighat - 1671

The Battle of Saraighat was fought in 1671 between the Mughal empire (led by the Kachwaha king, Raja Ramsingh I), and the Ahom Kingdom (led by Lachit Borphukan) on the Brahmaputra river at Saraighat, now in Guwahati. Although much weaker, the Ahom Army defeated the Mughal Army by brilliant uses of the terrain, clever diplomatic negotiations to buy time, guerrilla tactics, psychological warfare, military intelligence and by exploiting the sole weakness of the Mughal forces—its navy.

The Battle of Saraighat was the final nail on the coffins of Mughal Empire's Assam extension plan.


According to tradition, Lachit himself executed his uncle for dereliction of duty.


"My uncle is not greater than my country".


After this battle one more battle was in 1682 under of Gadhadhar Singha, Ahom King.Ahom regains Guwahati and all the western frontier posts upto Bengal and establishes firm reign over the area till advent of British in 1826.In line with the above we can understand, the Mughals or Muslims failed to crush the Ahoms even with an army & economy 10 times bigger then their opponent failing miserably in most of their campaigns & expeditions .And still the muslims beat their chests boasting of their bravery of their mythical 1000 years of rule over the Hindus .