Thursday, July 22, 2021

क्या स्वामी दयानन्द कृत संस्कार विधि फलित ज्योतिष पर आधारित है?


भ्रमोच्छेदन
संस्कार विधि पर ज्योतिषाचार्य श्री कृष्ण चन्द्र शास्त्री का गर्हित आक्षेप
[क्या स्वामी दयानन्द कृत संस्कार विधि फलित ज्योतिष पर आधारित है?]

प्रियांशु सेठ (वाराणसी)

सोशल मीडिया के माध्यम से पौराणिक ज्योतिषाचार्य श्री कृष्ण चन्द्र शास्त्री का "ज्योतिष और आर्यसमाज" नामक शीर्षक से एक लेख प्राप्त हुआ है। इसमें शास्त्रीजी ने स्वामी दयानन्द के प्रसिद्ध ग्रन्थ संस्कार विधि से कुछ सन्दर्भ उठाकर यह सिद्ध करने की कुचेष्टा की है कि स्वामी दयानन्दजी को अपने ग्रन्थ में फलित ज्योतिष अभीष्ट है। उन्होंने कहीं फलित ज्योतिष का खण्डन नहीं किया है।
शास्त्रीजी ने यदि सत्यार्थप्रकाश ही ठीक से पढ़ लिया होता तो वह ऐसे आक्षेप कदापि न करते। स्वामी दयानन्द ज्योतिष को खगोलीय घटना, ग्रहों का विज्ञान, मौसमी विज्ञान, संवत्सर गणना, रश्मियों का प्रभाव, ऋतु परिवर्तन आदि की गणना करने वाला विज्ञान मानते थे। उन्होंने अपने कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में स्पष्टतः फलित ज्योतिष पर प्रहार किया है। मगर ज्योतिष को फलित रूप देकर जनसामान्य को लूटने वाले लुटेरों को ढपोरशंख की भांति बजने का अभ्यास है। हम इस लेख में शास्त्रीजी के आक्षेपों का क्रमानुसार खण्डन करते हैं-

आक्षेप १- प्रत्येक गर्भाधान आदि संस्कार के लिए उत्तम मुहूर्त लिया जाना चाहिए। इसमें एकादशी, त्रयोदशी वर्जित हैं।
उत्तर- आपको दो रात्रियाँ ही वर्जित दिखती हैं, गर्भशास्त्र (Eugenics) तो छः रात्रियों को वर्जित मानता है और यही महर्षि दयानन्द ने भी कहा है। स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल सोलह रात्रि का है- "ऋतु: स्वाभाविक: स्त्रीणां रात्रय: षोडश: स्मृता: (मनु० ३/४६)"। इन सोलह रात्रियों में प्रथम की चार रात्रियाँ तथा एकादशी व त्रयोदशी- ये छः रात्रियाँ निन्दित हैं। शेष दश रात्रियाँ ऋतुदान के लिए श्रेष्ठ हैं। मनुस्मृति (३/४७) में इन छः रात्रियों को महारोगकारक होने से निन्दित बताया है।

डॉ० बोध कुमार झा 'ब्रह्मबन्धु' (लब्धस्वर्णपदकत्रय-रजतपदकत्रय-कांस्यपदकद्वय, प्रवक्ता- संस्कृत दर्शन वैदिक अध्ययन विभाग, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान) एवं पं० गेय कुमार झा 'गङ्गेश' (लब्धस्वर्णपदक, वेदाचार्य, गवेषक- स्ना० व्या० विभाग का० सिं० दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, बिहार) ने एक पुस्तक लिखी है- "षोडश संस्कार (एक वैज्ञानिक विवेचना)"। इसमें वे उपरोक्त प्रकरण के सम्बन्ध में लिखते हैं-
"वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर ये वर्ज्य तिथि एवं दिन तर्क संगत प्रतीत होते हैं। आरम्भ के जो चार दिन प्रतिषिद्ध माने गये वे तो सर्वजनसंवेद्य हैं। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं आनी चाहिये। पूर्णिमा और अमावस में क्रमशः सोमतत्त्व का आधिक्य और अल्पता वातावरण में निहित होती है, अतः ये दोनों तिथियाँ जातक सम्बन्धी स्वास्थ्य-परक दृष्टि के कारण वर्जित मानी गई हैं। जहां तक ११वीं और १३वीं रात्रि का प्रश्न है, वह भी शारीरिक विज्ञान सम्मत प्रतीत होता है। इन दोनों ही कालांशों में स्त्री का गर्भाशय जीवाणु को सर्वथा स्वीकार करने हेतु तैयार नहीं होता। फलतः विरुद्ध आचरण करने पर जातक के विकलांग होने की ज्यादा सम्भावना रहती है।[१]"

चरकसंहिता, शरीरस्थान (८/६) में इस सन्दर्भ में वर्णन आता है-
"६,८,१०,१२,१४,१६ ये युग्म रात्रियाँ हैं जो पुत्र की इच्छा हेतु श्रेष्ठ हैं। ५,७,९,१५ ये अयुग्म रात्रियाँ हैं जो पुत्री इच्छा के लिए श्रेष्ठ हैं।" इससे स्पष्ट है कि शेष छः रात्रियों में स्त्रीसमागम रोगकारी होने से निन्दित हैं। वास्तव में गर्भाधान विधि के इस प्रसंग में शास्त्रीजी का फलित ज्योतिष ढूंढना बौद्धिक दिवालियापन से कम नहीं है।

इसी भांति अग्निवेशगृह्यसूत्र (२/७/६) में आया है-
"षोडश्यां लभते पुत्रं ब्रह्मकीर्त्तनतादृशं तदूर्ध्वमुपयमं नास्ति कामभोगैव केवलम्।"
अर्थात् १६वीं रात्रि में स्त्री से समागम करने से ब्रह्मकीर्तन जैसा पुत्र मिलता है। उसके पश्चात् सन्तानार्थ स्त्रीसमागम वर्जित है। तब स्त्रीसमागम करना केवल कामचेष्टा है। अतः आपकी शंका का सम्बन्ध पदार्थविद्या, आयुर्वेद और गर्भशास्त्र (Eugenics) से है। किन्तु खेद है कि आपकी योग्यता शरीर विज्ञान (Physiology) में बिल्कुल शून्य है।

आक्षेप २- सीमन्तोन्नयन संस्कार में शुक्ल पक्ष हो तथा चंद्रमा पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा आदि पुल्लिंग नक्षत्रों में हो।
उत्तर- शुक्लपक्ष के चन्द्रमा से गर्भगत बालक की मानसिक उन्नति का प्रयोजन है। मूल, हस्त, श्रवण आदि नक्षत्र पुल्लिंग बोधक हैं और जब चन्द्रमा पुरुष नक्षत्र से युक्त होता है तब ऋतु प्रायः विषम नहीं होती। चन्द्रमा का किसी पुरुषवाची नक्षत्र से युक्त होने से ऋतु में समता रहती है, कारण यह है कि पुरुषवाची नक्षत्र अपने प्रभाव से चन्द्रमा की कोमलता का शोषण करता है। कोमलता तथा कठोरता एवं जलशक्ति तथा तेजशक्ति मिलकर ऋतु को विषमता रहित करते हैं।
जैसे भूमि में बीज बोने के लिए वर्षा होने का दिन अनुकूल होता है, उसी प्रकार चन्द्र का प्रकाश मानसिक शक्ति की वृद्धि के लिए उपयोगी होता है। मनुष्य का मन देवसंज्ञक है। मन के साथ चन्द्रमा का विशेष सम्बन्ध है। ऋग्वेद के "पुरुषसूक्त" के मन्त्र "चन्द्रमा मनसो जातश्च..." में भी यही सन्देश है। अतः आपका आक्षेप निर्मूल है।

आक्षेप ३- नामकरण संस्कार में कन्या का नाम रोहिणी, रेवती आदि नक्षत्रों के नाम पर नहीं रखना चाहिए।
उत्तर- आप नक्षत्रवाची नाम रखकर क्या सिद्ध करना चाहते हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि आपको नक्षत्र की सामान्य जानकारी भी नहीं है। नक्षत्र असंख्य हैं तथापि हमारे सौरमण्डल का व्यवहार २७ नक्षत्रों से अति विशेष है। अश्विनी आदि नक्षत्र देवता- नक्षत्र पुंज हैं और इनके अश्विनी आदि नाम इनकी आकृति पर रखे गए हैं। जैसे कृत्तिका नक्षत्र का देवता अग्नि है, सो दूरबीन से देखने पर इसकी आकृति अग्नि सदृश मालूम होती है। इसी प्रकार अन्यान्य कई नक्षत्रों के देवता हैं; अतः आकृति परक होने से ये नक्षत्र पुंज की आकृति बोधक नाम हैं।
अब बताइये, क्या कन्याओं की आकृति नक्षत्रों से मिलती है जो उनके नक्षत्रवाची नाम रखे जाएं? यदि अपने मनुस्मृति के अध्याय ३ का ९वां श्लोक पढ़ा होता तो आप जड़वाची नामों के सम्बन्ध में कदापि शंका न होती।

आक्षेप ४- निष्क्रमण संस्कार भी शुक्ल पक्ष की तृतीया आदि तिथियों में करें।
उत्तर- शुक्लपक्ष की तृतीया अभ्युदयारम्भ की सूचक है। तृतीया में करने का यह प्रयोजन है कि बालक का उत्तरोत्तर अभ्युदय होता रहे। यह निष्क्रमण की न्यूनतम अवधि है।

आक्षेप ५- ब्राह्मणादि का उपनयन संस्कार वसंत, ग्रीष्म आदि ऋतुओं में करें।
उत्तर- वसन्त ऋतु सौम्य गुण प्रधान होने से ब्राह्मण-भावना, ग्रीष्म ऋतु तेजस्वी होने से क्षत्रिय-भावना तथा शरद् ऋतु शीतल होने से वैश्य भावना की प्रतीक है। इसलिए ये ऋतुएं क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए उपयुक्त हैं।

आपके सभी आक्षेपों के उत्तर दिए जा चुके हैं। कृष्ण चन्द्र जी तो अपने फलित ज्योतिष से यह भी नहीं बता सकते थे कि उनके इस लेख का खण्डन कोई करेगा, अन्यथा वह अपने लेख में मेरा वर्णन कर सकते थे? आशा है, अब आप ऐसे ऊट-पटांग लेख नहीं लिखेंगे जो आपको हास्य का पात्र बनाये। 

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१. "षोडश संस्कार (एक वैज्ञानिक विवेचना)"; पृष्ठ ३-४; संस्करण १९९७; सिंहसन्स ऑफसेट जयपुर से मुद्रित एवं हंसा प्रकाशन ५७ नाटाणी भवन मिश्रराजाजी का रास्ता, चांदपोल बाजार, जयपुर से प्रकाशित।

Monday, July 19, 2021

धैर्य, दृढ़ता व वीरता की प्रतीक आदर्श महिला वीर सावरकर की सहर्धामणी माई


नारी जगत् 
धैर्य , दृढ़ता व वीरता की प्रतीक आदर्श महिला  
वीर सावरकर की सहर्धामणी माई
 -सत्यवती गोयल 

     माई की आयु केवल ११ वर्ष थी कि उसके पिता चिपलूणकर ने उसके माहाथ पीले करने की तैयारियां प्रारम्भ कर दीं। श्री चिपलूणकर जाव्हार राज्य के दीवान थे। अच्छे , खाते - पीते परिवार के सम्पन्न ब्राह्मण थे माई का विवाह सन् १६०१ में चितपावन ब्राह्मणवंशीय भगूर निवासी श्री दामोदर सावरकर के पुत्र १८ - वर्षीय युवक विनायक ' तात्याराव ' के साथ कर दिया गया। तात्याराव ' ने पूना के फग्र्युसन कालिज से बी० ए० किया। श्री तिलक जी के प्रयास से कानून की पढ़ाई के लिये लन्दन जाने की शिवाजी छात्रवृत्ति ' श्यामजी कृष्ण वर्मा से मिल गयी। तात्या के श्वसुर श्री विपलूणकर ने अपने दामाद को कानून की पढ़ाई के लिये विदेश जाते देखा तो उनका हृदय खुशी से भर गया। उन्होंने तुरन्त दो हजार रुपये अपने दामाद को अपनी ओर से भेंट किये।

    ' माई ' की आयु उस समय १६ वर्ष की थी। वह अपने सम्बन्धियों व परिजनों के साथ अपने पति ' तात्या ' को लन्दन के लिये विदाई देने बन्दरगाह तक गई थी। विदाई देते समय माई के हृदय में यही आशा थी कि यह बिछुड़ना क्षणिक ही है तथा कुछ ही वर्षों में जब उसके पति उच्चकोटि के बैरिस्टर बनकर लौटेंगे , तत्र कितने सुखद क्षण होंगे। ' माई ' भविष्य के सुखद जीवन की कल्पना में लीन थी कि एक दिन उसे समाचार मिला कि तात्याराव ने तो कानून की पढ़ाई के बदले लंदन में दूसरा कांटों का मार्ग , तेज छुरी की धार का रास्ता अपना लिया है। उसे लन्दन की तरह - तरह की घटनायें सुनने को मिलने लगीं। माई का अपने पति को बैरिस्टर के रूप में देखने का स्वप्न चकनाचूर हो गया। २३ मार्च १९१० को ' तात्या ' लन्दन में बन्दी बना लिये गये तो ' माई ' को अपने पति के जेल में कष्ट सहन करने के समाचार से भारी आघात लगा। 

उसने अपने पतिदेव की मुक्ति के लिये परमात्मा से प्रार्थना प्रारम्भ कर दी। तात्या भारत लाये जाते समय समुद्र में कूद पड़े व पुनः बन्दी बनाकर भारत लाये गये। समुद्र में कूद जाने की साहसिक व रोमांचकारी घटना से एक बार तो माई का सिर गौरव से ऊंचा हो उठा। अपने पति के अदम्य साहस की कथा सुनकर वह फूली न समाई। किन्तु जब बम्बई के न्यायालय ने ' तात्या ' को एक नहीं दो , आजीवन कारा वासों का दण्ड दिया , ५० वर्ष के लिये अण्डमान की काल - कोठरी में भेजने का आदेश दिया तो ' माई ' दहाड़ मारकर रो पड़ी। 

       उसकी समस्त आकांक्षाओं पर पानी फिर गया। माई अपने भाई के साथ डोंगरी के कारागृह में अपने पूज्य पति के दर्शनों के लिये गई तो उसके हृदय में यही आशंका थी कि वह उनके अन्तिम दर्शन कर रही है। बैरिस्टर की वेशभूषा में देखने की आकांक्षा रखने वाली आंखों ने तात्या को लोहे के मोटे सींखचों के पीछे लोहे की जंजीरों एवं हथकड़ी - बेड़ियों से जकड़ा हुआ पाया तो उसकी आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई। 

       माई का हृदय चीत्कार कर उठा। ' बेटे - बेटियों की संख्या बढ़ाना और चार तिनके ( लकड़ी ) बचा करके घर बांध लेना यदि संसार व सुख कहलाता है तो ऐसा संसार कौवे , कुत्ते व चिड़ियां भी बनाती रहती हैं। किन्तु अपने सुखों को मातृभूमि के चरणों पर न्यौछावर कर देना यह मानव का वास्तविक सुखद संसार है। तुम धैर्य करो , हमारा यह त्याग भविष्य में अन्य सैकड़ों घरों में तो आनन्द की वर्षा करेगा ही। ' १६ - वर्षीय तरुणी माई ने अपने बन्दी पति ' तात्या ' के मुख से ये शब्द सुने तो वह राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत भावनाओं को देख कर हृदय में प्रफुल्लित हो उठी। भीगी आंखों से वह पति से विदा हुई। 

       तात्याराव के अण्डमान रवाना होने के बाद माई ने पति के जीवन की रक्षा के लिये । रिहा होकर पुनः मिलन के लिये व्रत उपवास व ईश्वराराधना प्रारम्भ कर दी। वह पातिव्रत धर्म का पूर्णतः पालन करती रही। हृदय में केवल एक ही आशा - आकांक्षा थी कि एक दिन पतिदेव के साथ रहने का सौभाग्य अवश्य मिलेगा। १३ वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद आशा का सूर्य प्रकट हुआ , निराशा के अन्धकार को उसने भगा दिया। तात्याराव ' को अण्डमान से लाकर रत्न गिरि में स्थानबद्ध कर दिया गया। पति - पत्नी दोनों मिले। माई का हृदय पति के चरणों में नतमस्तक हो उठा। उन्होंने अपने मृत्युंजयी बीर पति के मृत्यु को पराजित करके वापस आने पर भगवान् को धन्यवाद दिया। 

       माई का त्याग , माई का धैर्य एवं पातिव्रत धर्म , ' तात्या ' के त्याग - बलिदान से , समुद्र में कूद , पड़ने के अदम्य साहस से किसी भी प्रकार कम न रहा। माई के पातिव्रत धर्म के बल पर ही तो तात्या विश्व को अपने अदम्य साहस व त्याग के ' चमत्कार ' से चमत्कृत कर सके थे। माई सीता , सावित्री , पद्मिनी की तरह महान् पतिव्रता हिन्दू नारी थीं। उन्होंने अपने पातिव्रत धर्म का पालन जीवन के अन्तिम क्षण तक किया। उनके इष्टदेव ने ' मैं अपने पति के सम्मुख ही उनकी सेवा करती - करती मर जाऊ ' उनकी इस अन्तिम अभिलाषा को भी पूर्ण किया। सन् १९३३ में माई तात्या से बिछुड़ गई। उन्होंने अपने महान् पातिव्रत धर्म के पालन से हिन्दू नारियों के गौरवमय इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया।

पिता का प्रेम


कहानी
पिता का प्रेम
-निशाकान्त मिश्र 

        किसी गांव में एक बूढ़ा आदमी रहा करता था। उसकी कोई सन्तान न थी। वृद्धावस्था में उसके एक लड़का हुआ। लड़का धीरे - धीरे बढ़ने लगा। बड़े होने पर उसने मकान बनाने वाले कारीगर का काम सीख लिया। उसी गांव में एक धनी सेठ रहा करता था। उसके एक लड़की थी। सेठ ने लड़की के विवाह का आयोजन किया। विवाह के पूर्व उसने अपना घर ईंट का बनवाना चाहा। कारीगर के रूप में बूढ़े का लड़का नियुक्त हुआ। जब दो मंजिलें बन चुकी तो सेठ ने कहा- “ तीसरी अन्तिम मंजिल शीघ्र बन जानी चाहिए - बेटी के विवाह वाला दिन समीप है। अतः दोपहर भी काम जारी रहता तो अच्छा था इसके लिए दो गुनी मजदूरी मिलेगी। " गर्मी का मौसम तो था ही । सूर्य अपनी किरणों से पूरी पृथ्वी को जला रहा बूढ़े ने देखा — काफी देर हो गयी है , अभी भी उसका लड़का काम करके नहीं आया- -तो वह उसके पास गया। उसने बड़े ही मीठे स्वर में आवाज दी " वेटे ! चला आ — काफी देर हो गई — अभी तक तू काम कर रहा है। लड़के ने नीचे खड़े पिता की ओर देखकर जबाब दिया- " पिताजी ! सेठ की लड़की की शादी नजदीक है अतः सेठ ने कहा है कि दोपहर को भी यदि काम जारी रहता तो अच्छा था । " लड़के ने आगे कहा- " इस लिए आ नहीं सकता। ' बूढ़े पिता ने कहा — बड़ा हठ किया कि वह काम न करे। किन्तु लड़के ने कोई ध्यान नहीं दिया। बूढ़ा चुप - चाप घर चला गया। जब बूढ़ा वापस पुनः लड़के के पास आया तो उसकी गोद में छह महीने का एक नन्हा शिशु था। लड़के ने जब अपने बच्चे को धूप में लेकर पिता को खड़े देखा तो आग बबूला हो उठा। उसने कहा- " पिता जी ! आप इतने मूर्ख हैं कि इस छोटे से बच्चे को धूप में लेकर खड़े हैं। " बूड़े ने जबाब में कह दिया— “ मैं नहीं जाऊंगा। " लड़का उत्तेजित हो उठा और उसने कहा- " क्यों नहीं जाओगे ? देख नहीं रहे कि इसे कितनी गर्म धूप लग रही है ? - " बूढ़े ने कहा " जब मेरा लड़का धूप में है , तो तेरा भी धूप में रहेगा। " यह कहकर बूढ़ा चुप हो गया। पिता की बात सुनकर लड़का प्रेम विह्वल हो उठा। उसने पिता की बात समझ ली थी। मन में सोचने लगा " जिस प्रकार मुझे अपने बच्चे को धूप में देखकर दुःख हो रहा है उसी प्रकार पिता जी को मुझे धूप में काम करते देख कर दुःख हो रहा है ...। उसने काम करने का सारा सामान फेंक दिया। तीसरी मंजिल से लड़खड़ाता नीचे आया और पिता के चरणों में गिर पड़ा। बूढ़े ने उठाकर उसे छाती से लगा लिया . दोनों का चेहरा आंसुओं से भीग गया।

तालस्ताय की वेदों में श्रद्धा


तालस्ताय की वेदों में श्रद्धा 
-स्वर्गीय फतेहचन्द शर्मा ' आराधक ' 

युगस्त्रष्टा लियो तालस्ताय भारतीय साहित्य के प्रति विशेष अभिरुचि रखत थे। उनकी भारत के प्राचीनतम साहित्य और महाकाव्यों के प्रति अगाव अद्ध थी। वेदों के नम्बन्ध में उनका ध्यान सबसे पहले आकर्षित हुआ था। वैदिक ज्ञान की उपलब्धि उन्हें गुरुकुल विश्वविद्यालय कांगड़ी से प्रकाशित वैदिक पत्रिका में मिली थी। यह पत्रिका गुरुकुल के भूतपूर्व आचार्य स्व० प्रो० रामदेव के सम्वादकत्व में निकलती थी। पत्रिका में आर्यसमाज के सिद्धान्तों की अपेक्षा वेदविषयक जानकारी विशेष रूप से दी जाती थी। इस कारण महपि तालस्ताय का पत्र - व्यवहार समय - समय पर प्रो० रामदेव से चलता रहता था और प्रो० रामदेव तालस्ताय के भारतीय मित्रों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते थे। लियो तालस्ताय के संग्रहालय के एक विशेष अधिकारी अलेक्जेण्डर शिफमान के अनुसार तालस्ताय वेदों के गम्भीर ज्ञान पर मुग्ध थे। वे वेदों के उन खण्डों पर विशेष ध्यान देते थे जिनका सम्बन्ध नीतिशास्त्र सम्बन्धी समस्याओं से है। यह एक ऐसा विषय था जिसमें उनकी प्रगाढ़ अभिरुचि थी। वेदों में व्याप्त मानवीय प्रेम के सिद्धान्त , मानववाद तथा शान्तिमय श्रम की प्रशस्ति के वे समर्थक थे। दमा अनुभव करते थे कि मानव आत्मा में निहित गुणसम्बन्धी उनके अपने सिद्धान की इससे पुष्टि होती है।

      तालस्ताय के सम्बन्ध में बनाया जाता है कि वे वेद तथा उसके भाप्य एवं उप निपदों को विव्व की सर्वागपूर्ण रचनाओं की श्रेणी में मानते थे क्योंकि इस साहित्य ने कई गताब्दियों ने देश और धर्म की परम्परा को छोड़कर हजारों हृदयों को अपने उत्कृष्ट माहित्य द्वारा विमोहित किया है , जो इस देश के नागरिक भी नहीं। इस दृष्टि से तालस्ताय इस साहित्य को सच्ची कला का अंश मानते थे। उन्होंने अपने एक निबन्ध में लिखा था कि शाक्य मुनि का इतिहास और वेद की कथाएं अपने उदात्त भाव के कारण हमारे लिए अत्यन्त बोधगम्य हैं , चाहे हम विक्षित हों या नहीं। उस युग के लोग हमारी श्रमिक जनता की तुलना में अल्प शिक्षित थे। किन्तु बोधगम्य थे।

     तालस्ताय ने केवल वेदों को पढ़ा ही नहीं , वरन् उनकी शिक्षाओं का भी इस प्रकार से प्रचार किया जिससे उनके बहुत से अनुयायी वेद और उपनिषदों के ज्ञान को भली प्रकार जान सकें। तालस्ताय ने वेद और उपनिषद् दोनों की अनेक सूक्तियों और उक्तियों का संग्रह " पठन विस्तार तथा बुद्धिमान् मनुष्यों के विचार " नाम से किया है। वेदों के अतिरिक्त तालस्ताय अन्य भारतीय प्राचीन कृतियों से विशेषकर ' महाभारत ' और ' रामायण ' से परिचित थे। तालस्ताय ने रूसी और पश्चिमी यूरोप की भाषाओं के श्रेष्ठ अनुवादों के माध्यम से इन उत्कृष्ट कृतियों का ज्ञान प्राप्त किया। यास्नाया पोल्याना के पुस्तकालय में अब भी ' रामायण ' का दो भागों का संस्करण है जो १८६४ में पैरिस से प्रकाशित हुआ था। तालस्ताय श्रीमद्भगवद्गीता के विशेष उपासक थे। महाभारत के सभी भागों की अपेक्षा उन्हें गीता अधिक प्रिय थी। गीता प्रिय होने की जानकारी तालस्ताय के पत्रों और डायरी में लिखे गए समय - समय के उल्लेखों से होती है और पता है चलता कि वे उस पर कितनी श्रद्धा रखते थे। भारतीय महाकाव्यों के कवित्व की भी प्रशंसा उन्होने अपने मित्रों से की थी। भारत के एक प्रसिद्ध विद्वान् को तालस्ताय ने अपने एक पत्र में लिखा था कि महाभारत के सभी भागों की अपेक्षा गीता के प्रति मेरी विशेष आस्था इसलिए भी है कि उसमें पूरे मनोयोग के साथ कर्तव्य पालन करने की प्रेरणा की गई है। उसके प्रति मेरी पूरी निष्ठा रही है और अपने जीवन में मैंने उसका उपयोग करने का प्रयत्न किया है। उन्होंने यह भी लिखा था कि उसका प्रभाव मेरे जीवन पर यहां तक हुआ है कि मैंने अपनी रचनाओं में भी यत्र - तत्र उसका उपयोग किया है। तालस्ताय के पत्र और डायरी के साहित्य से यह पूरी तरह से पता चलता है कि उन्होंने महाभारत और रामायण की सैकड़ों सूक्तियां संग्रहीत की थों और बहुत - सी लोक - कथाएं भी संकलित की थीं। 

         उन्होंने इन कथाओं का पढ़ने योग्य रूसी पुस्तकों में प्रयोग किया था। बाद में उन्होंने इन और तरुणवर्ग के लिए इसी तरह का साहित्य लिखा। तालस्ताय का स्वप्न था कि भारतीय साहित्य का रसास्वादन सोवियत रूस के नागरिक भली प्रकार कर सकें। उनके इस प्रयत्न से हजारों रूसी नागरिकों को भारतीय साहित्य और दर्शन सम्बन्धी विचारधारा को जानने का अवसर मिला। रूसी नागरिक तालस्ताय के माध्यम से शंकराचार्य , रामकृष्ण परमहंस , स्वामी विवेका नन्द आदि भारतीय महापुरुषों और उनके विचारों को जान सके।

सरदार नाहर खाँ



सरदार नाहर खाँ ! 
-जयनारायण व्यास

         इन्सान की कमजोरियों में एक बड़ी कमज़ोरी यह है कि वह दूसरों को अपने से अधिक देखना पसन्द नहीं करता। अगर कोई व्यक्ति बलवान होता है , तो दूसरे लोग उससे डाह करने लगते हैं। इतना ही नहीं वे इस ताक में रहते हैं कि ऐसे व्यक्ति का खातमा कर दिया जाये। कई श्रेष्ठ और महान् गुणी व्यक्ति इसी डाह के कारण खटपटियों के जाल में दुनियां से विदा हो गये और उनके चले जाने से दुनिया गरीब ही हुई है। अपना विकास करके , संसार में श्रेष्ठ बनने के बदले लोगों का नाश करके श्रेष्ठों की श्रेणी में आने की चेष्टा कर चाहे कुछ समय के लिए मान और पूजा प्राप्त कर सकते हैं , पर सही मान और स्थायी प्रतिष्ठा के अधिकारी वे ही हो सकते हैं , जिनमें खुद की कुछ शक्ति हो। यद्यपि महाराजा जसवंतसिंह को बादशाह औरंगजेब ने पठानों का शासन करने के लिए अफ़गानिस्तान भेजा था और उनको रुतबा भी बहुत बड़ा दिया गया था , तथापि वे उनसे भयभीत रहते थे। इसका कारण महाराज की वीरता और चतुराई के अलावा उनके वे स्वामी भक्त सिपाही थे , जो महाराज के लिए प्राण विसर्जन करने को सदैव तत्पर रहते थे। 

ऐसा ही एक वीर था नाहरसिंह ! - ऐसे वीर योद्धाओं के प्रति घृणा या ईर्ष्या करना उन लोगों के लिए स्वाभाविक था , जिनके शरीर में बल और हृदय में साहस का अभाव हो। ऐसे लोगों ने मन - ही - मन महाराजा जसवन्तसिंह से जलने वाले बादशाह औरंगजेब के सामने राठौर नाहरसिंह के लिए कुछ जा बेजा बात की तो क्या अचरज ? " 

अगर नाहरसिंह सचमूच अपने को नाहर या शेर समझते हैं तो उसे राजमहल के पिंजड़े में बंद शेर से कुश्ती लड़नी होगी। " बादशाह ने अपने मुंह लगे लोगों के बहकाने पर निश्चयपूर्वक कहा। उन्होंने सुना और हाँ कह दिया। कुश्ती की घोषणा कर दी गई। शेर के पिंजड़े के चारों ओर दर्शकों की भीड़ थी , उनमें प्रमुख थे बादशाह औरंगजेब खुद। सभी मन में यही कल्पना कर रहे थे कि पिजड़े के सामने आते ही नाहरसिंह का चेहरा पीला पड़ जायेगा और कुछ क्षणों के बाद पिंजड़े में बंद किया हुआ शेर उसकी बोटियों को नोच - नोचकर खाता हुआ नजर आयेगा। 

       पिंजड़े का फाटक खुला और नाहरसिंह उसमें घुस गया। उसके अंग पर एक धोती के सिवा कोई कपड़ा नहीं था। उसके हाथ में अपनी मजबूत अंगुलियों के सिवा कोई शास्त्र नहीं था। वह अन्दर घुसा। घुसने से पहले बादशाह ने पूछा , " क्यों नाहरसिंह , तुम्हें इस शेर से डर तो नहीं मालूम होता ? " " जसवंत का शेर किसी शेर से नहीं डरता। " उस साहसी वीर ने गर्व के साथ उत्तर दिया।

      पिंजड़े में इस समय दो ही प्राणी हैं - बंदी शेर और हत्या के लिए भेजा सिंह ने आवाज कसी- " आजा ऐ बहादुर शेर , हो जायें दो - दो हाथ दोनों शेरों में ! ' , शेर टकटकी लगाये नाहर की तरफ देखने लगा। दर्शकों में सन्नाटा छा गया। सभी मन में यही सोच रहे थे कि एक ही झपट्टे यह भीमकाय इन्सान उस प्रबल पशु के तेज़ दाँतों से फाड़ा जाता हुआ दिखाई देगा , परन्तु सबकी कल्पना के विरुद्ध शेर पिछले पॉबों में दुम दबाकर नाहरसिंह से प्रांख चुराता हुआ पीछे की ओर चला गया। " जहाँपनाह आपके शेर ने जसवन्त के शेर को पीठ दिखाई हैं। पीठ दिखा कर जाने वाले पर हमला करना तो राजपूती शान नहीं है। " उस सन्नाटे को तोड़ते हुए नाहरसिंह ने कहा ! बादशाह ने कोई उत्तर नहीं दिया , पर जब लाख प्रयत्न करने पर भी यह शेर नाहरसिंह की ओर न जा सका और उस तरफ गुर्राने लगा , जिस तरफ़ बादशाह खड़ा था तो औरंगजेब के दिल में निश्चय हो गया कि मौत के सामने जाकर भी बहादुर हिम्मत के साथ खड़े रहते हैं। गर्व के साथ अपने स्वामी की शान बढ़ाने वाले वीर को अब शेर के पिंजड़े बंद रखने का कोई लाभ नहीं था। पिंजड़ा खुला। वीर नाहरसिंह उसी शांति के साथ बाहर निकला , जिसके साथ अंदर घुसा था।  बादशाह अपने हाथों से उसकी कड़ी भुजाओं को पकड़ कर हिलाने लगा। पूछा बादशाह ने , “ ऐ साहसी वीर ! लड़के भी इतने ही साहसी और मजबूत होंगे ; कितने बच्चे हैं तुम्हारे ? " " बच्चे ? ' नाहरसिंह ने मुस्करा कर उत्तर दिया- ' बच्चे कैसे होते हैं शाह ? " मैं शादी के बाद ही पठानों से युद्ध करने चला गया था ! " " तो शादी बाद ही ? ' बादशाह ने ताज्जुब से पूछा। " हाँ राजपूतों को यही शिक्षा मिलती है कि स्त्री और कुटुंब का खयाल क्षेत्र के रास्ते में दीवार न बने ! नाहरसिंह ने सरलता के साथ जवाब दिया । " शाबाश , जसवंतसिंह के शेर ! शाबाश , आज से जसवंतसिंह औरंगजेब का नाहर खाँ होगा। सभी उसे ' सरदार नाहरखाँ कहकर उसकी इज्जत करेंगे। " बादशाह ने कहा। जसवंतसिंह के शेर ने वस्त्र पहने और बादशाह को सलाम किया। बादशाह के हुक्म से सभी दर्शक एक ही कतार में खड़े हुए। वे एक एक करके झुक - झुक कर सरदार नाहरसिंह को सलाम करने लगे। उन लोगों में वे लोग भी थे , जो नाहरसिंह की बहादुरी देखने के बहाने उसकी बोटियां शेर के जबड़ों से चाबी जाती हुई देखना चाहते थे। वे मन ही मन यह बात सोचकर पछता रहे थे कि उनकी इस खटपट ने उनके ईर्ष्या के पात्र नाहर सिंह की टोपी में एक और चाँद लगवा दिया , पर जिस समय वह बहादुर जवान उनके सामने से निकला तो उनको भी झुक कर सलाम करना पड़ा और जवान से कहना पड़ा: सलाम ! सरदार नाहरखाँ।

बाल ब्रह्मचारिणी वीरांगना राणाबाई


महिला जगत 
बाल ब्रह्मचारिणी वीरांगना राणाबाई
 -किशनाराम आर्य 

       राणाबाई नामक एक देवी महान् ईश्वर भक्त थी। उनकी गणना सीता , सावित्री , मदालसा , दमयन्ती , अनसूया , गार्गी , लोपामुद्रा , किशोरी , सती , कौशल्या , किरण , तारा , पद्मावती , लाजवन्ती , और रत्नावली से की जाती है। मरु प्रदेश जोधपुर के हरनावा गाँव के चौधरी श्री जालिम सिंह जी सरदार के जो बिसियों गांवों की सरदारी करते थे यहां विक्रम संवत् सोलह सौ में राणाबाई का जन्म हुआ था। 

वीरांगना राणाबाई ने अनेक दु:ख झेल कर तथा अपने माता - पिता भाई भौजीइयों के अनेक प्रकार से समझाया पर फिर भी विवाह नहीं किया था। राणाबाई बाल्यकाल से ही ईश्वर भक्ति में समय बिताती थी। उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर रखा था। जब 15 या 16 वर्ष की उम्र मे उनके माता - पिता ने विवाह की चर्चा की तो राणाबाई ने अपने जननी जनक के समक्ष हाथ जोड़ अपनी भीष्म प्रतिज्ञा बताते हुए कहा कि मैं अविवाहित रहूंगी। आप मेरे विवाह करने की चिन्ता न करें। चौधरी जालिम सिंह जी ने कहा कि बेटी इस समय हमारी मातृ भूमि के बहुत बड़े भू भाग पर विधर्मी मुसलमानों का राज्य है। मैं उनसे तुम्हारी रक्षा कैसे करूंगा ? राणा बाई ने जवाब दिया कि कृपालु ईश्वर मेरी रक्षा करेगा।


       हरनामा गांव से दो कोस उत्तर दिशा में गाछोलाव नामक का तालाब था। उस तालाब के पास दिल्ली के बादशाह अकबर का सूबेदार हाकिम रहता था। उसके पास पांच सौ सवार रहते थे। वह मुसलमान था। अन्यायी और व्यभिचारी था। राणाबाई के रूप लावण्य युवावस्था और अति सुन्दरता की बात सुन कर उसने अपने मन में ठान ली कि मैं येनकेन प्रकारेण राणा बाई को प्राप्त कर उससे विवाह करूंगा। एक दिन चौधरी जालिम सिंह जी सरकारी लगान लेकर गाछोलाव तालाब के पास से होकर छिवाला के चौधरी के पास जा रहा था। 


किसी ने बता दिया कि यही चौधरी जालिम सिंह जी राणाबाई के पिता हैं। उस छलिया हाकिम ने धोखे से जालिम सिंह को पकड़ लिया और मीठी - मीठी बातों से अनेक तरह के लालच देकर कहा कि तुम अपनी पुत्री राणाबाई का विवाह मेरे साथ कर दो। पहले तो जालिमह जी ने नम्रता से उत्तर दिया कि मेरी लड़की जब अपने धर्म के योग्य वर से विवाह करने से इनकार कर रही है , तो फिर विधर्मी मुसलमान से विवाह कैसे कर सकती है। इस बात को सुनकर वह राजदूत हाकिम बहुत गरम हुआ ; और उसने जालिम सिंह को नजरबंद कर लिया। चौधरी जालिम सिंह ने क्रोधित होकर उसे खूब फटकारा।

 इस पर वह अपनी सेना लेकर हरनामा गांव पर चढ़ गया। सेना ने हरनामा गाँव को चारों तरफ से घेर लिया , नाकेबंदी कर दी फिर वह अपने अंगरक्षक व चुने हुए सैनिक साथ लेकर राणाबाई को लाने उनके घर पहुंचा। ईश्वरीय भक्त राणाबाई उस समय भी प्रभु भजन में शान्तचित्त योगियों की तरह मन व लीन थी। वह दुष्ट राक्षस जब उनके सामने जाकर खड़ा हो गया तो बिजली की चमक जितनी देर में वीरांगना खड़ी हुई और सिंहनी की तरह झपटी। खूंटी से ढाल - तलवार उतार कर म्यान से निकाल ली और एक ही वार से उस हाकिम का सिर काट दिया। फिर उसे बाएं पैर से ठोकर मारी। यवन सैनिक राणाबाई का यह भयंकर रूप देखकर थर थर कांपने लगे। सामना भी किया , परन्तु राणाबाई तो सिंहनी जैसे बकरे पर निडर और निःशंक होकर झपटती है। वैशे ही काट - काट कर उसने लाशों के ढेर लगा दिये। राणाबाई की तलवार की मार से शत्रु प्राण बचा कर भागे। बादशाह अकबर ने फिर हमला नहीं किया। वह अनेक वीरांगनाओं के तलवारों के जौहर देख चुका था। अकबर बड़ा दगाबाज था। उसने रामा कृष्ण और ऋषि महर्षियों की संतान को झूठ , कपट , छल , लोभ , लालच , पद , जागीर नौकरियां और रिश्तेदारियां आदि मीठे विष पिला कर हमेशा के लिए पगु बना देने के प्रयत्न शुरू किये थे। 

     राणाबाई की इस विजय से हिन्दुओ का सिर ऊंचा हो गया । दुःखिया बहिनों को उस समय सिंहनी सदृश वीरांगना बन अपने सतीत्व की रक्षा करने का पद प्रदर्शन मिला। उनकी कीर्ति फैल गई। चौधरी जालिम सिंह छुड़ा लिये गए। राजाओं के जमाने की बात है। कुछ राज पुरुष जोधपुर राजबाई जी की सगाई जयपुर महाराज से करने के लिए जा रहे थे। रात में ये लोग राणाबाई के धाम पर ठहरे और मंद में चूर हो कर के मद्य मांस का सेवन करने लगे। जब जोधपुर महाराजा को मालूम हुआ कि सरकारी उन्मत्त नौकरी ने राणाबाई के धाम की पवित्रता बिगाड कर मद्य मांस का सेवन किया तो तत्कालीन जोधपुर नरेश ने सरकारी नौकरों को सजा दी , और राणाबाई से क्षमा मांगी।

      आज भी राणाबाई की वीरता उनका संगमी जीवन , ईश्वर भक्ति , गोसेवा , निर्भयता , ब्रह्मचर्य पालन और स्वदेश भक्ति के गीत गाये जाते हैं। मारवाड़ में उनकी गाथा चाव से कही और सुनी जाती है। प्रभु , ऐसी महिमामयी वीरगांनाए भारत के घर घर में पैदा करे।

क्रांतिवीरों की अमर ओजस्वी वाणी


क्रांतिवीरों की अमर ओजस्वी वाणी 
-संकलयिता राधेलाल मित्तल 


( १ ) " भाइयों ! बगावत करो। अब देर नहीं करनी चाहिये। ( मंगल पाडे , २६ मार्च १ ९ ५७ ) ( २ ) ( शिवाजी श्लोक ) -केवल बैठे - बैठे शिवाजी की गाथा की आवृत्ति करने से किसी को आजादी नहीं मिल सकती। हमें तो शिवाजी और बाजी राव की तरह कमर कसकर भयानक कृत्यों में जुट जाना पड़ेगा। दोस्तो ! अब आजादी के निमित्त ढाल - तलवार उठा लेनी पड़ेगी। हमें अब शत्रुओं के सैकड़ों गुंडों को काट डालना पड़ेगा। सुनो , हम राष्ट्रीय युद्ध के मैदान में अपने जीवन का बलिदान कर देंगे और आज उन लोगों के रक्तपात से जो हमारे धर्म को नष्ट कर रहे हैं या आघात पहुंचा रहे हैं , पृथ्वी को रंग देंगे। हम मारकर ही मरेंगे और तुम लोग घर बैठे औरतों की तरह हमारा किस्सां सुनोगे ।

       ' आर्य भ्राताओं के दिल में उत्साह की लहर पैदा हो और हम लोग विद्रोह का टीका माथे पर लगायें। ” ( क्रांतिकारी हुतात्मा चाफेकर बधु , जून १८९७ )।

 ( ३ ) मैं मानता हूं कि मैंने एक अंग्रेज का रक्त बहाने का प्रयास किया। किन्तु उसका उद्देश्य यही था कि अंग्रेजों ने जिस प्रकार भारतवर्ष के देशभक्त युवकों को फांसी , कालापानी या लम्बी सजायें देने का क्रम जारी कर रखा है , उसके प्रतिकारात्मक विरोध प्रकट करूं। ऐसा करते समय मैंने अपनी आत्मा के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति से नहीं पूछा न उसको राय ली। मैंने जो कुछ किया , कर्तव्य के नाते ही किया। 

हिन्दू होने के नाते मेरा विश्वास है कि आत्मा कभी मरती नहीं अतः शरीर गिरने के पूर्व प्रत्येक भारतीय दो अंग्रेजों को समाप्त करता चले तो 
देश की स्वतन्त्रता एक दिन में प्राप्त की जा सकती है। जब तक भारत स्वतंत्र न हो जाये , 

श्रीकृष्ण का देशवासियों के लिए यही कर्म संदेश है। मेरी अंतिम कामना है कि मैं फिर से भारत की ही गोद में जन्म लू तथा पुन: देश को स्वतंत्र कराने के कार्य में संलग्न हो जाऊं। मैं चाहूंगी कि मेरी पुन: मृत्यु होने तक मेरा प्रिय देश स्वतन्त्र हो जाये। भारत के स्वतन्त्र होन तक मैं इसी ध्येय के लिए बार - बार जन्म लूं और मृत्यु का वरण करू। प्रभु मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करें। मेरी यही कामना है। वन्दे मातरम्।.. " मदनलाल ढींगरा ( १७ अगस्त १६०९ ' पेन्टन विले कारागार , लन्दन )

 ( ४ ) " तुम रोती हो तो रोओ , किन्तु इस रोने से क्या मिलेगा ? दुःख तो मुझे भी है। मैंने किस बात का बेड़ा उठाया था और उसे कितना सिद्ध कर पाया। मर तो मैं रहा हूँ , पर जिस कारण मैं मर रहा है , वह पूरा कहां हुआ। मैं यह देखकर मर रहा हूँ कि मैंने जो कुछ भी किया वह छिन्न भिन्न हो गया। मुझे दु.ख है कि मैं माता पर अत्याचार करने वालों से बदला नहीं ले सका। जो मन की बात थी वह मन में ही रह गयी। मेरा यह शरीर नष्ट हो जायेगा , किन्तु मैं मोक्ष नहीं चाहता। मैं तो चाहता है। कि बार - बार इसी भूमि में जन्म लूं और बार - बार इसी के लिए मरूं ' ऐसा तब तक करता रहूं , जब तक देश पराधीनता के पाश से मुक्त हो जाये ... " ( महान क्रांतिकारी पं० गेंदालाल दीक्षित का मृत्यु पूर्व पत्नी के प्रति संदेश , २१ दिसम्बर , १९२० )। 

    ' है देश को स्वाधीन करना जन्म मम संसार में , 
     तत्पर रहूंगा में सदा अंग्रेज दल संहार में।
     अन्याय का बदला चुकाना मुख्य मेरा धर्म है ;
      मद - दलन अत्याचारियों का यह प्रथम शुचिकर्म है। 
     मेरी अनेकों भावनायें उठ रही हृद्धनाम में ,
     बस शांत केवल कर सकुंगा में उन्हें संग्राम में। 
     स्वाधीनता का मूल्य बढ़कर है सभी संसार से, 
     बदला चुकेगा हरणकर्ता के रुधिर की धार से। 
    अंग्रेज रुधिर प्रवाह में निज पितृगण तर्पण करूं।
    हो तुष्ट दुःशासन रुधिर के स्नान से यह द्रौपदी , 
   हो सहस्त्रावाहु विनाश से यह रेणुका सुख में पड़ी। 
    है कठिन अत्याचार का ऋण ब्रिटिश ने हमको दिया ,
    सह ब्याज उसके उऋण का हमने कटिन प्रण है किया। 
    मैं अमर हूं मेरा कभी भी नाश हो सकता नहीं , 
    है देह नश्वर त्राण इसका हो नहीं सकता कहीं होते हमारे मातृ जग में , 
    पद - दलित होगी नहीं , रहते करोड़ों पुत्र के जननी दुखित होगी नहीं। 
    उद्धार हो जब देश का इस क्लेश से तलवार से। 
    भयभीत होंगे नहीं हम जेल - कारागार से। 
     रहते हुए तन प्राण रण से मुख न छोड़गे कभी ,
     कर शक्ति है जब तक न अपने शस्त्र छोड़ेगे कभी। 
     परतंत्र होकर स्वर्ग के भी वास की इच्छा नहीं , 
     स्वाधीन होकर नरक में रहना भला उससे कहीं। 
     है स्वर्ण पिजर वास अति दुख पूर्ण सुन्दर कीर को , 
     वह चाहता स्वच्छंद वितरक अति विपिन गंभीर को चाण। 
     जंजीर की झनकार में शुभ गीत गाते जाएंगे , 
     तलवार के आधात में निज जया मनांते जायेंगे। 
    हे ईश ! भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो , 
    कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो।
    ( महान क्रांतिकारी पं० गेंदालाल दीक्षित , अध्यापक व उनके साथियों की प्रतिज्ञा के स्वर , ) 

( ५ ) दिनांक १६ दिसम्बर १६२७ को जो कुछ होने वाला है उसके लिए मैं अच्छी तरह तैयार है। यह है ही क्या ? शरीर का बदलना मात्र है। मुझे विश्वास है कि मेरी आत्मा मातृभूमि तथा उसकी दीन संतति के लिए नये उत्साह और ओज केप साथ काम करने के लिए शीघ्र ही फिर लोट आयेगी। 

  यदि देश हित मरना पड़े मुझको सहस्रों बार भी , 
  तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाऊ कभी। 
    ( काकोरी कांड के नायक पं० रामप्रसाद बिस्मिल का फांसी के दिन १६ दिसम्बर , १६२७ के पूर्व एक मित्र को लिखा पत्र )

( ६ ) मैंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नालदार जूतों के नीचे अपने देश आसियों को रोंदे जाते देखा है। इस प्रकार अपना प्रतिवाद प्रस्तुत करते हुए मुझे कोई दु:ख नहीं है। मुझे इस बात में इंच भर भी शंका नहीं है कि मुझे आप फांसी दे देंगे या और सजा देंगे। मृत्यु का भय मुझमें नहीं रह गया। बुढ़ापे तक लड़खड़ाते हुए जीने का कोई अर्थ नहीं होता। देश के लिए जवानी में मर जाना कहीं अधिक अच्छा है । ( महाक्रांतिकारी सरदार ऊधमसिंह का लन्दन के न्यायालय में बयान , बलिदान ( फांसी ) [ ३१-७-१९४० ]। 

( ७ ) ' कल मैंने सुना कि प्रिवी कौंसिल ने मेरी अपील अस्वीकार कर दी। आप लोगों ने हम लोगों की प्राण रक्षा के लिए बहुत - कुछ किया , कुछ उठा नहीं रखा पर मालूम होता है कि देश की बलिवेदी को हमारे रक्त की आवश्यकता है। मृत्यु क्या है ? जीवन की दूसरी दिशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसलिए मनुष्य मृत्यु से दुःख और भय क्यों माने ? वह तो नितान्त स्वाभाविक अवस्था है। उतनी ही स्वाभाविक जितना प्रभात कालीन सूर्योदय। यदि यह सच है कि इतिहास पलटा खाया करता है तो मैं समझता हूं कि हमारी बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा। सबको मेरा अंतिम नमस्कार। 
[ क्रांति के दीवाने राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी का बलिदान ( फांसी ) १७-१२-१९२७ के तीन दिन पूर्व लिखा पत्र। .

औरंगजेब के नाम गुरु गोविन्द सिंह का ऐतिहासिक पत्र


इतिहास की अमूल्य निधि 
औरंगजेब के नाम गुरु गोविन्द सिंह का ऐतिहासिक पत्र -वि० स० बिनोद

      आजकल कुछ सिख उग्रवादियों और औरंगजेब के अनुयायियों के बीच बहुत गाढ़ी छन रही है। उन्हें गुरु गोविन्द सिंह का वह पत्र पढ़ना चाहिये जो गुरुजी ने औरंगजेब को लिखा था। मूल पत्र गुरुमुखी में लिखा गया था , इसलिए इस पत्र का उपयोग पश्चिमी इतिहासकार न कर सके। यहां प्रस्तुत हैं उक्त पत्र के कुछ अंश। सिक्खों के दशम गुरु श्री गोविन्द सिंह ने तत्कालीन भारतीय सम्राट औरंगजेब के नाम जो पत्र लिखे थे , उन के सम्बन्ध में जनसामान्य को बहुत कम मालूम है। छत्रपति शिवाजी महाराज का राजा जयसिंह के नाम लिखा हुआ महान् और ऐतिहासिक पत्र पर्याप्त प्रकाश में आ चुका है परन्तु गुरु गोविन्द सिंह जी द्वारा सम्राट औरंगजेब को लिखे हुए पत्र अभी तक गुरुमुखी अक्षरों में बद्ध होने के कारण हिन्दी संसार के समक्ष नहीं आ पाये। फारसी भाषा में लिखा हुआ शिवाजी का पत्र सन् १६२२ के अगस्त मास की नागरी प्रचारिणी सभा , काशी की ' नागरी प्रचारिणी पत्रिका ' में बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर की ओर से प्रकाशित हुआ था। 

        इसकी भूमिका में रत्नाकर जी ने लिखा था कि उन्होंने तब से लगभग तीस वर्ष पूर्व पटना गुरुद्वारे के महन्त स्वर्गत बाबा सुमेरसिंह के पास दो पत्र देखे थे। इनमें से एक तो गुरु गोविन्द सिंह का वह पत्र था जो उन्होंने दक्षिण जाने के पूर्व औरंगजेब के नाम लिखा था , और दूसरा मिर्जा राजा जयसिंह के नाम लिखा हुवा शिवाजी का पत्र था। रत्नाकर जी ने इन दोनों पत्रों की प्रतिलिपियां प्राप्त कर ली थी। 

       गुरु गोविन्द सिंह का औरंगजेब के नाम लिखा हुआ पत्र वह नहीं या जो इतिहास में " जफरनामा ' के नाम से विख्यात है। रत्नाकर जी का कथन है कि जफरनामे में आठ - नौ सौ शेर थे , जबकि इस पत्र में जो उन्होंने बाबा सुमेर सिंह से प्राप्त किया था , सौ से अधिक शेर नहीं थे। ये दोनों पत्र दुर्भाग्यवश रत्नाकर जी से गुम हो गये। पर्याप्त समय पश्चात् शिवाजी वाला पत्र उन्हें अपने पुराने कागजों में मिल गया जिसे उन्होंने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में प्रकाशित करा दिया। गुरु गोविन्द सिंह का पत्र रत्नाकर जी से खो चुका था और उस समय तक बाबा सुमेर सिंह की मृत्यु हो चुकी थी। इस कारण उसे पुनः प्राप्त करने का मार्ग अवरुद्ध हो चुका था। 

       रत्नाकरजी ने उस पत्र के कुछ बंद अपनी स्मृति से सरदार उमराव सिंह मजीठिया को भेजे थे। सरदार जी ने उन्हें अपनी ओर से क्रमबद्ध कर उसकी एक प्रतिलिपि पंजाबी के वयोवृद्ध विद्वान भाई वीरसिंह बी को भेजी। भाई वीरसिंह ने उन बन्दों को ' उच्च का पी नामक लेख में खालसा समाचार के १६ जुलाई १६४२ अंक में प्रकाशित करा दिया। 

      इस सम्पूर्ण पत्र में कितने शेर थे और किस क्रम में थे यह आज तक ज्ञात नहीं हो सका। अभी तक २४ शेर ही प्राप्त हो सके हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से पत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस पत्र में जितने शेर अभी तक प्राप्त हुए हैं , वे आंशिक रूप है उसकी महत्ता प्रकट करने में सर्वथा समर्थ हैं। उन्हें यहां दिया जा रहा है 

१ तलवार और कटार के स्वामी का स्मरण कर और धनुष - बाण तथा ढाल के कर्ता का नाम लेकर , 

२ युद्ध क्षेत्र में वीरगति प्राप्त शेर वीरों के इष्ट का और वायु के समान गतिशील अश्वों के निर्माता का , 

३ उसका जिसने तुझे बादशाहत दी और हमें धर्म रक्षा का गौरव प्रदान किया। 

४. तुझको दिया विश्वासघात और धोखे का क्षेत्र और मुझे सत तथा स्वच्छ हृदय से युक्त उपाय। 

५ . औरंगजेब नाम तुझे शोभा नहीं देता। राज सिंहासन को शोभा यमान करने वाले द्वारा विश्वासघात और धोखा अच्छा नहीं लगता। 

६ . तेरी तसबीह मनके और धागे से अधिक कुछ नहीं क्योंकि तू उन मनकों को चुगने के दाने बनाता है और धागे को अपना जाल। 

७. तूने अपने पिता की मिट्टी निकृष्ट कर्म करके अपने भाई के लहू से गूधी है।

८. और उसके साथ अपने साम्राज्य के लिए काच्चे भवन की नींव रखी है। 

९. मैं अब ईश्वर कृपा से लोहे के पानी ( तलवार की धार की तरह वर्षा करूंगा। 

१०. जिससे इस पवित्र भूमि पर उस अशुभ साम्राज्य का चिह्न भी शेष न रहे । 

११. दक्षिण के पर्वतों से तू प्यासा जौटा है। मेवाड़ से भी कड़वा चखा है। 

१२. तेरे तलवों के नीचे मैं इस तरह आग रखूगा कि कि तू पंजाव का पानी मीनपी सके। 

१३ . क्या हुआ जो गीदड़ ने विश्वासघात करके सिंह के बच्चे को मार डाला। 

१४. जवकि खू ख्बार शेर अभी तक जिन्दा है और वह तुझसे बदला लेगा। 

१५ मैं अब तेरे खुदा ( के नाम पर खाई सौगन्ध ) पर कोई विश्वास नहीं करूंगा , क्योंकि मैं तेरे खुदा के कलाम ( के नाम पर किये गये कार्यो ) को देख चुका हूं। तेरी सौगन्ध पर विश्वास नहीं रहा और अन तलवार पकड़ने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा है। 

१७ . यदि तू चतुर बाच है तो मैं भी एक सिंह को कठघरे से छोडूगा। 

१८. यदि मेरे साथ तेरी बातचीत हुई तो मैं तुझे उचित मार्ग प्रदर्शित करूंगा।

१९. युद्ध क्षेत्र में दोनों सेनाएं पंक्तिबद्ध हो जाएं और शीघ्र ही आप में परिचित हों। 

२०. दोनों के मध्य दो फरसंग ( सात या साढ़े सात मील ) क अन्तर हो ।

 २१ . रण क्षेत्र में मैं अकेला आऊंगा और तू दो अश्वारोही साथ ला सकता है। 

२२. तूने लाड़ - प्यार और सुख के फल खाए हैं , युद्धरत शूरों सम्मुख नहीं आया है। 

२३ . तू स्वयं तलवार लेकर युद्धक्षेत्र में आ , ईश्वर की सृष्टि का नाश मत कर। 

   इन शेरों से सम्पूर्ण पत्र की भावना तथा शैली का ज्ञान हो जाता है। रत्नाकर जी के अनुसार इस पत्र में सौ से अधिक शेर थे। इस प्रकार इसका तीन चौथाई भाग अभी अन्धकार में है जिसकी खोज करना आवश्यक है। यह पत्र कब लिखा गया तथा यह इतिहासप्रसिद्ध जफरनामे से पहले का है अथवा बाद का , इसका निर्णय करना कठिन है , किन्तु इतन निश्चित है कि तब तक गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों का बलिदान है चुका था। 

  चमकौर के युद्ध ( २३ दिसम्बर १७०४ ) के पश्चात् गुरु गोविन्द सिंह जब भटिंडे की ओर जा रहे थे , तब दीने नामक स्थान पर उन्हें औरंगजेब का पत्र प्राप्त हुआ था जिसमें उन्हें मिलने के लिए दक्षिण आमंत्रित किय गया था। उस पत्र में खुदा तथा कुरान की सौगंधों सहित इस बात का विश्वास दिलाया गया था कि उन्हें किसी प्रकार का कष्ट या धोखा न दिया जाएगा। साथ ही धमकियों के भी कुछ वाक्य इस पत्र में थे।

गुरु गोविन्द सिंह ने शाही हरकारों को उत्तर दिया था कि हम इस पत्र का उत्तर विस्तार सहित भेजेंगे और फिर हमें बादशाह का कोई पत्र प्राप्त होना तो हम उनसे मिलने अवश्य अवश्य आयेंगे।


 औरंगजेब के पत्र के उत्तर में लिखे गए फारसी भाषा के जफरनामा नामक पत्र में , कुछ इतिहासकारों के मतानुसार , एक हजार चार के लगन ही शेर थे , और जिस पत्र का ऊपर उल्लेख किया गया है उसमें केवल सो के के लगभग शेर थे। अतः प्रतीत होता है कि यह पत्र उन्होंने जफरनामे वाले विस्तृत पत्र की भूमिकास्वरूप उससे पूर्व ही लिखा होगा। इस पत्र में तत्कालीन परिस्थितियों का बहुत स्पष्ट विवरण मिल जाता है। औरंगजेब तथा गुरु गोविन्द सिंह के पारस्परिक सम्बन्ध कैसे थे , इस बात का भी ज्ञान होता है। यह पत्र इतिहास की अमूल्य निधि है।

वीरांगना कर्मादेवी


महिला जगत् 
वीरांगना कर्मादेवी -
विनोदकुमार भारद्वाज 

         आज से लगभग 750 वर्ष पूर्व की बात है । मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किया और अपनी विशाल सेना के बल पर लूट - मार मचाता हुआ जब वह गौर वापस चला गया , तब अपने पीछे कुतुबुद्दीन ऐबक नाम के एक गुलाम को अपने जीते हुए राज्यों का सूबेदार नियुक्त कर गया। कुतुबुद्दीन चाहता था कि मुहम्मद गौरी द्वारा विजयी राज्यों को सम्मिलित शक्ति से अन्य छोटे - छोटे राज्यों को अपने अधिकार में कर लिया जाये। उन दिनों मेवाड़ का शासन - भार एक नारी कर्मादेवी के कन्धों पर था। मेवाड़ के महाराणा समर सिंह एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे और उनके पुत्र कर्णसिंह के बहुत छोटे होने के कारण शासन की बागडोर विधवा महारानी कर्मादेवी ने संभाली थी। कुतुबुद्दीन ऐबक ने जब देखा कि मेवाड़ का राज्य एक अबला नारी के अधिकार में है , तब उसने एक विशाल सेना लेकर वहाँ आक्रमण करने की सोची । इस आक्रमण की योजना की सूचना महारानी कर्मादेवी के पास पहुंची , तो वह चिन्ता में पड़ गई। फिर भी ऐसी कठिन परिस्थिति में उन्होंने धैर्य से काम लिया। व्यर्थ के रक्तपात से बचने के लिए उन्होंने ऐबक को अपने दूत द्वारा यह सूचना भिजवाई- " आप एक योग्य पुरुष हैं। इस समय मेवाड़ पर एक स्त्री शासन कर रही है। अतः आप जैसे वीर पुरुषों का एक स्त्री से युद्ध करना उचित नहीं है। 

        मेरा पुत्र कर्णसिंह जब युवा हो जायेगा , तब हम आपका सामना वीरता के साथ कर सकते हैं। " ऐबक ने जब यह संदेश सुना , तब वह खिलखिला कर हंस पड़ा। उसने सोचा - ' हो न हो , महारानी कर्मादेवी उसकी ताकत से भयभीत हो गई है। ' त मी तो युद्ध न करने की भीख माँग रही है। ' अत : उसने महारानी के नाम एक सन्देश भिजवाया , जिसका आशय था कि या तो तुम इस्लामी मजहब स्वीकार करके मेरी बेगम बन जाओ अथवा तुम्हें युद्ध की आग में कूदना होगा। 

       महारानी कर्मादेवी ने यह संदेश सुना तो उन्होंने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया। एक भारतीय वीरांगना भला अपना अपमान कैसे सहन कर सकती थी ? तत्काल ही उन्होंने मेवाड़ की सेना को युद्ध के लिए संगठित करना आरम्भ कर दिया। सम्पूर्ण मेवाड़ में युद्ध का बिगुल बजने लगा। ऐबक की सेना जब आगे बढ़ी , तब मेवाड़ के सैनिक भी रण - भूमि में सिर पर कफन बांध कर कूद पड़े भला ऐसी कठिन परीक्षा की घड़ी में महारानी कहाँ चुप रह सकती थीं ? उन्होंने मर्दाना वेश धारण किया और एक बढ़िया नस्ल के घोड़े पर सवार होकर वह युद्ध - स्थल में आ पहुंचीं। राजपूतों ने जब अपनी रानी को स्वयं आगे बढ़ कर युद्ध करते देखा , तब उनका उत्साह पहले से दुगुना हो गया। 
        भंयकर युद्ध हुआ। महारानी ने कुतुबुद्दीन के छक्के छुड़ा दिये। कुतुबुद्दीन ऐबक को एकाएक विश्वास न हुआ कि महारानी के सम्मुख उसकी सेना को झुकना पड़ रहा है। आखिर उसकी विशाल सेना युद्ध - भूमि से भाग खड़ी हुई । इस प्रकार महारानी कर्मादेवी ने मेवाड़ की लाज रख ली अपने जीवनकाल में फिर कभी ऐबक का साहस न हुआ कि वह मेवाड़ को जीतने की सोचता। जब तक भारत में महारानी कर्मादेवी जैसी वीर स्त्रियाँ जन्म लेती रहेंगी , तब तक निःसन्देह कोई भी देश हमें पराजित नहीं कर सकता। भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी है कि आवश्यकता पड़ने पर भारतीय नारियाँ भी चूड़ियां उतार कर हाथों में तलवार लिए रणचण्डी का रूप धारण कर लेती हैं।

कर्तव्यनिष्ठ वीरांगना वीरमती


ऐतिहासिक कहानी 
कर्तव्यनिष्ठ वीरांगना वीरमती
 डॉ.रतनलाल ' रतनेश

         चौदहवीं शताब्दी को कोई युद्धों को शताब्दी कहे तो कोई असंगत बात नहीं , क्योंकि उस समय सारे भारत में छोटे - छोटे राज्य वैमनः स्यवश या राज्य लिप्सा के कारण निरंतर युद्धों में लीन रहते थे। 

           उसी समय उत्तर में दिल्ली की सल्तनत पर अलाउद्दीन खिलजी अधिपत्य था। अलाउद्दीन एक अन्यायी शासक था। उसने अपने चाचा और ससुर जलाउद्दीन को मार कर राज्य पर अधिकार कर लिया था। मुस्लिम संस्कृति में माता - पिता , भाई और बहिन का कोई मूल्य नहीं होता। सल्तनत के सामने सब कुछ हेच है । सुलतान अलाउद्दीन ने कई लड़ाईयां लड़ीं , कही राज्य लिप्सा है तो कहीं रूप लिसा। उसने दक्षिण के अनेक राज्य तहस नहस करके अपनी इन्द्र धनुषी अभिलाषाओं के रंगीन महल बसाए थे दक्षिण में देवगिरि नामक एक छोटा - सा राज्य था। वहाँ का राजा रामदे बहुत वीर , साहसी और बहादुर था। राजपूतों में एक बहुत बड़ा गुण था वे चारपाई पर मरने की अपेक्षा युद्ध भूमि में मरना स्वर्ग के समान समझ थे। सोलह - सत्रह वर्ष में हो राजपूतों का वीरगति के लिए आमन्त्रण आ जाता था। राजपूत किसी की पराधीनता में जीना कभी स्वीकार नहीं करते थे। 

       राजा रामदेव के पास एक मराठा सरदार था। वह स्वामिभक्त वीर और साहसी सरदार था। गत वर्ष ही अपने प्राणोत्सर्ग कर देश रक्षार्थ वीर गति को प्राप्त हुआ था। उसकी पांच - वर्षीय बालिका का नाम वीरमती था। वीरमती की मां बीमार रहती थी। पिता के देहान्त के एक वर्ष के पश्चात् मां भी संसार को छोड़ कर चल बसी थी। अब अनाथ वीरमती का लालन - पालन राजा रामदेव पर आ पड़ा । रामदेव ने सोचा कि जिसके पिता ने मेरे राज्य की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी , उसकी रक्षा करना मेरा प्रयम पर्तव्य है। इसलिए राजा ने अपना कर्तव्य पालन करने के लिये उस बालिका का पालन - पोषण अपने महलों में राजकुमारों के साथ ही किया। उसे राज कुमारी की तरह रखा। राजा - रानी ने उसके प्रति कोई लेश मात्र भेदभाव नहीं किया। जैसे - जैसे राजकुमारी बड़ी होती गई उसका रूप रंग निखरता गया। राजा को उसके विवाह की चिन्ता सताने लगी। राजा ने सोचा कि वीरमती का विवाह साधारण तरह से करना मेरे लिए कलंक की बात होगी। उस मृतक सरदार की आत्मा को कभी शान्ति नहीं मिलेगी। 

        संसार मुझे विश्वासघाती बतायेगा ! मैंने वीरमती को अपनी पुत्री के रूप में पाला है। उसका विवाह किसी सुयोग्य वर के साथ धूम - धाम से करूंगा उनकी सेना का ही एक सरदार कृष्ण राव था , जो अत्यन्त सुन्दर , वीर और साहसी था ! प्रत्येक पहलू पर विचार करने के पश्चात् वीरमती से सहमति भी प्राप्त कर कर ली गई थी। वीरमती से साक्षात्कार करा दिया गया। वीरमती की सगाई कृष्णराव के साथ कर दी गई। ' में वीरमती के पिता का ऋण चुका कर ही रहूंगा । तभी मुझे प्रसन्नता होगी। ' राजा के हृदय में वात्सल्प उमड़ पड़ा। अन्तर की हूक रोकी नहीं जा सकती। कृत्वय ने विजय पाई। राजा ने धूम धाम से विवाह की तैयारियाँ प्रारम्भ कर दी । कृष्ण में एक दोष था। वे बहुत लोभी थे। परन्तु उन्होंने इस लोभी को अपनी चतुराई के अन्धेरे में ऐसी जगह छिपा रखा , जिस से उसे कोई जान नहीं सका। राजा यदि किसी प्रकार यह जान पाते तो वे वीरमती की सगाई कभी कृष्ण रान के साथ तहीं करते। 

        वारमती को राजा पर पूर्ण विश्वास था। इसलिए वह मन ही मन मुग्ध हो रही थी। राजा ने यह जानकर कि वीरमती पूर्ण रूप से संतुष्ट है , अपना अहोभाग्य वाला कि भविष्य में मेरा नाम संसार में उज्ज्वल होगा। अब विवाह में एक मास ही शेष रह गया था। राजा वीरमती की वैवाहिक गतिविधियों में तल्लीन थे। उसी समय दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी का राजा के पास संदेश था कि मेरी अधीनता स्वीकार कर लो या युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। वीर साहसी राजा रामदेव अपनी स्वाधीनता को बेच कर दूसरों को सौंप दे , यह असम्भव था। राजा ने उत्तर दे दिया कि मुझे युद्ध की चुनौती स्वीकार है। एक यवन को अपना बादशाह स्वीकार करके अपने पूर्वजों के मुख पर कलंक की स्याही पोतना कदापि स्वीकार नहीं। 

      आइये , आपका स्वागत युद्ध के मैदान में चमचमाती तलवारी से किया जायेगा। सन्देशवाहक को पत्र लिखकर भेज दिया गया। वह घोड़े पर स्वार होकर चला गया। सुल्तान ने पत्र पढ़ा। पढ़ते ही उसके तन - बदन में आग लग गई। मारे क्रोध के तिलमिला उठा। तुरन्त उसने एक विशाल सेना तैयार की और देवगिरि की ओर कूच कर दिया। इधर वीरमती के विवाह की तैयारी हो रही थी। राजा ने यह जान कर कि अलाउद्दीन दलबल के साथ युद्ध के लिए आ रहा है , विवाह को स्थगित कर दिया , क्योंकि अब मातृभूमि की रक्षा का प्रश्न है। विवाह की तैयारी युद्ध की तैयारी में बदल गई। युद्ध के बाजे बजने लगे। सेनायें युद्ध स्थल की ओर कूच करने लगी। हाथी घोड़े और रथ धूल की आंधियां उड़ाते हुए आगे बढ़े। युद्ध प्रारम्भ हो गया। देवगिरि के योद्धाओं ने रण कौशल दिखाया। सुलतान ' के सिपाही गाजर - मूली की भांति काट - काट कर युद्ध भूमि पर धराशायी कर दिए गए। अलाउद्दीन के छक्के छूट गए। सुलतान अलाउद्दीन युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हुआ। एक सरदार ने सुलतान का पीछा किया। भागते - भागते सुलतान थक गया था। सरदार ने उसे घोड़े से गिरा दिया। घोड़े से गिरते ही सुलतान हाथ जोड़ कर प्राणों की भीख माँगने लगा । सरदार को दया आ गई। सरदार लोग प्राणों की भिक्षा मांगने वालों पर हथियार नहीं उठाते। अतः उसने सुलतान को प्राणदान दे दिया । सुलतान थोड़ी देर चुप रहा , कुछ सोचा , फिर सरदार ने कहा , पापी बहादुरी की तहे दिल से तारीफ करता हूं । मुझे अजहद खुशी है कि जनाब ने मेरी जान बख्शी है। मैं तुम्हारी कुछ इमदाद कर सकता हूं। ' सरदार , तुम मेरी क्या सहायता कर सकते हो ? जब तुमने एक भिखारी बन कर मुझसे प्राणो की भीख मांगी। तुम मेरी सहायता करोगे ? 
सुलतान - नहीं सरदार तुप नहीं जान सकते , मैं तुम्हारी बहुत बड़ी मदद कर सकता हूं। आज तुम एक सरदार हो , कल तुम एक राजा बन सकते हो। सरदार - कहाँ के राजा ? सुलतान -- देवगिरि के। 
सरदार- ( क्रोध से ) क्या कहते हो , मैं राजा के प्रति देशद्रोही बनकर विश्वासघात करूं ? 
सुलतान- अभी समय है। अच्छी तरह सोच लो।
सरदार - चुप रहो , मैं अपने स्वामी के साथ धोखा नहीं कर सकता। जिसका मैंने नमक खाया है , उसके साथ विश्वास घातकरूं। मुझसे ऐसा पाप कभी नहीं हो सकता। मैं राजपूत हूँ। ऐसा राज्य प्राप्त करना मेरे लिए घोर पाप है। इस प्रकार स्वर्ग का राज्य भी मुझे स्वीकार नहीं। तुमने राज्य के लिए अपने चाचा का खून बहाया है। मैं ऐसा स्वप्न में भी नहीं कर सकता , अब आगे कुछ कहने का साहस किया तो परिणाम भयंकर होगा। सुलतान भय से कांपने लगा । फिर दबी आवाज से बोला , खैर जाने हो , मैंने तुम्हारी भलाई सोची थी। क्योंकि तुमने मेरी जान बख्शी थी। काश मैं भी तुम्हें इस भलाई का कुछ बदला देता तो मुझे कुछ करार मिलता । ' इतना सुनते ही सरदार ने तलवार म्यान से बाहर खींच ली , सुलतान थर - थर कांप रहा था। हाथ जोड़ कर क्षमा मांगने लगा। पैरों पर सिर रख दिया। सरदार का वार रूक गया । सुलतान कुछ देर तक सोचता रहा। ' मैंने तुम्हारी भलाई सोची थी। ' यह वाक्य सुलतान के हृदय पर चिंगारियाँ छोड़ गया। यद्यपि सरदार ने उन चिनगारियों पर अपनी सद् भावना का शीतल जल उड़ेल दिया था पर एक दो चिनगारियां अवशिष्ठ रह गई थी जो सरदार के मन में अशान्ति की ज्वाला धधकाने का काम कर रही थी। ये वही सरदार थे , जिनकी सगाई वीरमती के साथ हो चुकी थी। कृष्ण राव अलाउद्दीन से पराजित नहीं हुए , पर लोभ ने एक क्षण में उन्हें परास्त कर दिया था। बेशक , कृष्ण राव बोले , ' क्या यह सच है कि मैं देवगिरि का राजा का सकता हूँ ? सुलतान - यह सुनकर गद्गद हो गया। चिड़िया जाल में फंस गई है। यदि तुम मेरी सहायता करो। 

    ' ' मैं क्या सहायता करूं। ' ' यही कि तुम मुझे किले में दाखिल होने का राज बता दो। ऐसा करने से आपके लिए देवगिरि के राजा होने का द्वार खुल जायेगा। कृष्ण राव के मन में राजा होने का स्वप्न जाग उठा। कृष्ण राव ने किले में प्रवेश होने का राज तो बताया ही , साथ ही ऐसे गुप्त भेद भी बताये , जिनसे देवगिरि को अति शीघ्र परास्त किया जा सके। इसके प्रश्चात् प्रसन्न होकर वापिस आये। तीन दिवस के पश्चात् ही सुलतान ने देवगिरि पर पुनः धावा बोल दिया। देवगिरि में विजय का उत्सव मनाया जा रहा था। इस अप्रत्याशित आक्रमण ने राजा को भयभीत कर दिया। राजा घबरा गया। राजा ने धैर्यपूर्वक साहस सजोया। सेनाओं को जोश लिया। सरदारो और वीर जवानो , युद्ध से भागना कायरता है। अपनी मातृभूमि के लिए प्राण देना वीरगति पाना है । इस तरह स्वर्ग मिलेगा , आदि - आदि। अब राजा का ध्यान कृष्ण राव की ओर गया। सरदार कृष्ण राव के तौर कुछ बदले - बदले दिखाई दिये। उनमें युद्ध के लिए कोई जोश - खरोश का भाव प्रदर्शित नहीं हो रहा था। वही कृष्ण राव राजा से कह रहे थे कि सुलतान की विशाल सेना के सामने विजय सम्भव नहीं। जिसने अपनी मातृ भूमि की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करना पहला कर्तव्य समझा था। वही यह कहे ! मन में सन्देह उत्पन्न हो गया। अवश्य कोई गुप्त समझौता हुआ है। राजा ने छानबीन प्रारम्भ कर दी। कृष्ण राव ने सुलतान का पीछा किया था। पीछा करने के पश्चात् सुलतान जीवित कैसे लौट गया ? वीरमती को भी संदेह हुआ। वीरमती ने एक बार सरदार से मिलना चाहा। उसने अपनी सेविका द्वारा कृष्ण राव को तुरन्त बुलवाया। उधर राजा ने कृष्ण रात को तुगत गिरफ्तार करने का देश दे दिया। 

        इस समय कृष्ण राव वीरमती के महल में पहुंच चुके थे। वीरमती से पूछा , ' मैंने आपको क्यों बुलाया ? ' ज्ञात नही ? क्या तुम बता सकते हो कि सुलतान ने इतनी जल्दी आक्रमण क्यों किया। कृष्ण राव अपराधी की भांति खड़े थे , कोई उत्तर देते नहीं बना। कुछ देर ठहर कर बोले । ' मुझे इसका पता नहीं कहते हुए चुप हो गए। वीरमती की आँखें क्रोध से लाल हो रही थीं ! कृष्ण राल वीरमती के सामने इस प्रकार खड़े थे , जैसे सिंहनी के सामने बकरा । वीरमती ने जोर से कहा , ' बोलते क्यों नहीं ? ' देश के साथ गद्दारी करने वाले सरदार तुम्हें ऐसा करने में शर्म नहीं आई ? ' कृष्ण राव भयभीत होकर बोले , ' देवी , मेरा अपराध क्षमा करो । " ' तुम पुरुष होकर नारी से क्षमा मांगते हो , मेरी चूड़ियों को कलंकित करने वाले सरदार तुम्हें क्षमा ? तुम्हारा अपराध कभी क्षमा के योग्य नहीं। तुम्हें तो पुरस्कार मिलना चाहिये । ' ' मैं तुम्हारा ही ...। ' ' तुम मेरे कायर सरदार , वीरमती के भावी पति तुम नहीं जान सके कि मैं उस सरदार की बेटी हूं , जिसने देश की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी थी । एक तुम हो विश्वासघाती सरदार। जिस देश का नमक खाया , उसी को यवनों को सौंपने का सौदा कर बैठे। छि : छिः। राजा ने तुम्हें कुछ और ही समझा था। तुम आस्तीन के सांप निकले। मुझे बहुत धोखा हुआ। मैं ऐसे कलंकित कायर पति को वरण नहीं करूंगी। मैं आर्य कन्या हूं। अब मैं दूसरा पति श्री वरण नहीं कर सकती। मैं अपना कर्तव्य पालन कगी , यह कहते हुए अपनी कटार कृष्ण राव के सीन्द में पोप दी , और वही कतार अपने गले पर फेर ली। दोनों वहीं धराशायी हो गए। उसी समय कृष्ण रायको बन्दी बनाने के लिए दो सिपाही महल में दाखिल हुए । लाशें देख कर सन्नाटे में आ गए। अब तो यहाँ सरदार कृष्ण राव और वीरमती की लाशें शेष हैं। सिपाही विस्मय से चुपचाप खड़े थे। उधर राजा रामदेव और अलाउद्दीन में घोर घमासान युद्ध हो रहा था।

बाइबिल पर सप्रमाण ३१ प्रश्न


बाइबिल पर सप्रमाण ३१ प्रश्न       - डॉ श्रीराम आर्य
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प्रश्न-१
जो खुदा अपनी गलतियों पर पछताता हो, वह आगे गलती नहीं करेगा, इसकी क्या गारंटी है? व उसके न्याय पर भी कैसे भरोसा किया जा सकता है?(उत्पत्ति६-६)

प्रश्न-२
जो खुदा अपनी बात पर भी कायम ना रहने वाला हो, उसके आश्वासन व कानूनों पर भरोसा करने वाले धोखा नहीं खाएंगे इसकी क्या गारंटी है?( शैमुएल-२
 
प्रश्न-३
जब  बाईबिल के अनुसार ईश्वर बहुत से है तो इसाई उनमें से कौन से ईश्वर को मानते हैं? और उसकी पहचान व उसका हुलिया क्या है?( भजन संहिता ८२)

प्रश्न-४
ईशा कौन से ईश्वर का इकलौता बेटा था? ईशा ईश्वर का इकलौता बेटा था, इसका क्या सबूत है? क्योंकि मरियम ने कभी नहीं बताया कि ईश्वर से उसे गर्भ रहा था और बाइबिल में ईश्वर ने भी अपने से मरियम को गर्भ रहने की बातें नहीं कहीं है। (युहन्ना ३)

प्रश्न-५
ईसाई संप्रदाय में बाप बेटी आपस में शादी कर सकते हैं क्या यह बात बाइबल के खिलाफ है?(१कुरैन्थियो ७)

प्रश्न-६
विज्ञान ने तारों को पृथ्वी से भी दोगुनी बड़े लोक के बराबर सिद्ध किया है तो बाइबिल में तारों का पृथ्वी पर अंजीर के फलों की तरह गिर पड़ना क्या यह सिद्ध नहीं करता है कि बाईबिल का लेखक बे-पढ़ा लिखा व्यक्ति था?(प्रकाशित वाक्य ६-१३)

प्रश्न-७
एक कुंड की शराब की लहरें गजो उची सौ कोस तक बहना गप्प क्यों ना माना जाए क्या यह बात किसी तर्क या प्रमाण से साबित की जा सकती है?(प्रकाशित वाक्य पैरा १४)
 
प्रश्न-८
गर्भवती मां के पेट में 2 बच्चों की कुश्ती का करना क्या इसे बाइबिल की गप्प ना मानी जाए?(उत्पत्ति २५)

प्रश्न-९
किस प्रकार यह संभव हो सकता है कि गर्भ के अंदर बैठा हुआ बालक गर्भाशय में से हाथ बाहर निकालकर डोरा बन्धवाकर, फिर अंदर गर्भाशय में स्वयं हाथ भीतर खींच ले? यह भी बाइबिल की गप्प क्यों ना मानी जाए क्योंकि गर्भस्थ बालक मे इतनी चेतना वह शक्ति संभव नहीं है।( बाईबल उत्पत्ति ३८)

प्रश्न-१०
जब ईसाई खुदा मनुष्य की फौजी मदद साथ में रहते हुए भी विपक्ष की फौजियों से हार गया वह उन्हें पराजित नहीं कर सका तो ऐसे खुदा को सर्वशक्तिमान कैसे साबित किया जा सकता है?(न्यायियो १-१९)

प्रश्न- ११
इसाईं खुदा के पास 20 करोड़ घुड़सवार फौज किससे लड़ने को व अपनी किससे रक्षा करने के लिए रहती है ?( प्रकाशित वाक्य पैरा १०

प्रश्न- १२
खुदा की 12 से भी ज्यादा फौजी पलटन ऊनपर कितना वार्षिक व्यय होता है इन फौजियों का कमांडर कौन है यह  कभी लड़ने भी गई है या निकम्मी पड़ी-पड़ी एक ही जगह पर खाती रहती है उसका बायबिल से विवरण पेश करें?(मत्ती २६-५३)

प्रश्न- १३
जब खुदा याकूब से कुश्ती में रात भर जोर करने पर भी ना जीत सका तो ऐसे कमजोर खुदा से उसके अनुयाई बड़े-बड़े युद्ध में मदद कि आशा क्यों रखते हैं-?
उत्पत्ति प्रकरण ३२)

प्रश्न-१४
पैगंबर लूट के द्वारा अपनी पुत्रियों से व्यभिचार को सारी बाइबिल में कहीं भी पाप क्यों नहीं माना गया है और उसे कहीं भी धिक्कारा कर्मों नहीं गया है?  -(उत्पत्ति-१९)

प्रश्न-१५
जब खुदा भी मेहनत करने से थक जाता है और आराम करके अपना जी ठंडा करता है तो उसे सर्वशक्तिमान कैसे माना जा सकता है? -(निर्गमन ३१)

प्रश्न-१६
जो खुदा याददाश्त के लिए डायरी वा रजिस्टर लिख कर रखता हो वह सर्वज्ञ खुदा कैसे माना जा सकता है?
(निर्गमन ३२)
प्रश्न-१७
जिस व्यक्ति को इतनी भी पदार्थ विद्या ना आती हो कि पीतल पत्थर से बनती है या तांबा जस्ता मिलाने से बनती है उसके द्वारा लिखी गई पुस्तक धर्म पुस्तक कैसे मानी जा सकते हैं?-(बाइबिल अय्यूब प्रकरण२८)

प्रश्न-१८
जिस धर्म पुस्तक लिखने वाले को इतना भी भूगोल ना आता हो कि विश्व पृथ्वी के खंभों पर धरा है या परस्पर आकर्षणानुकर्षरण के आधार पर परमात्मा उसे धारण करता है उसकी लिखी पुस्तक प्रमाणित कैसे मानी जा सकती है
 जिस पुस्तक में ऐसी  बे सर पैर की बातें हो उसे गप्प पुस्तक यदि माना जाए तो क्या गलत होगा/?
बाईबल १शैमुएल २-८)

प्रश्न 19
क्या साउल को राजा बना कर बाद में पछताना इसाई खुदा की अनुभवहीनता वा सरवज्ञता का खुला उपहास नहीं है?
(बाइबल १ सैमुएल१५-३५)

प्रश्न 20
क्या इसाई खुदा को खुले मैदान में पृथ्वी पर रहने में चोर डाकुओं का भय लगता था जो वह बेचारा बिना मकान के इधर-उधर मारा मारा फिरता रहता था?, (बाइबिल १ इतिहास १७)

प्रश्न 21
जब इसाई खुदा के बहुत से बेटे थे तो उसकी बीवियां कितनी थी वे सभी बेटे सदा कुवारे ही रहे थे या उनके कभी विवाह भी हुए थे बतावें कि खुदा का परिवार कितना बड़ा था ?(अय्यूब-१-६)

प्रश्न 22
जब चर्बी खाते-खाते खुदा का पेट भर गया तो उसके बाद भी जो लोग उसे चर्बी खिलाते रहते थे उसको पचाने के लिए खुदा ने में कोई चूर्ण या दवा खाई थी या कोई आसन
 लगाकर हाजमा ठीक किया था?( याशायह 1)

प्रश्न 23
जो खुदा अपने शत्रुओं से परेशान रहता हो उन्हीं से लड़कर बदले झुकाता हो वह भी क्या खुदा माना जा सकता है ईर्ष्या द्वेष रखना क्या खुदा का गुण है या उसमें दोष है? (याशायाह 1-24)

प्रश्न नं 24
जब खुदा युद्ध करने को स्वर्ग से उतरता है युद्ध के बाद फिर स्वर्ग चला जाता है तो वह सर्व व्यापक नहीं रह सकता क्या खुदा में इतनी भी ताकत नहीं कि स्वर्ग में बैठे-बैठे अपनी फौज से जमीन के अपने दुश्मनों पर विजय प्राप्त कर सके वह भी क्या खुदा है जिसे स्वयं पैदा किए लोगों से युद्ध करने को आना पड़ता है और उनसे भी हार जाता है ?
(याशायाह ३१-४)

प्रश्न 25
खुदा चर्बी बाकून जैसी चीजें क्यों खाता है फल मेवा घी दूध आदि उसे क्यों पसंद नहीं है क्या इनको खाने से वह बीमार पड़ जाता है?(यहेजकेल ४४ वाक्य १५)

प्रश्न 26
खुदा ने इसराइलीओं को पखाने से रोटी पका कर खाने की गंदी आज्ञा क्यों दी थी(यहेजकेल ४ वाक्य १२-१३)

प्रश्न 27
खुदा फाटक बंद मकान अर्थात बहिस्त में क्यों रहता है क्या डर लगा रहता है कि जमीन के लोग वहां जाकर खुदा को खत्म ना कर दें?(यहेजकेल ११)

प्रश्न 28
खुदा मुकदमा लोगों के खिलाफ लड़ता था तो फैसला करने वाला जज तथा खुदा का वकील पैरवी करने के लिए कौन होता था?(यहेजकेल 17)

प्रश्न 29
खुदा का गुस्से बाज हो ना उसे दिमाग की कमजोरी का बीमार साबित करता है क्या कोई ऐसा तरीका भी है जिससे खुदा की इस बीमारी के दोष को दूर किया जा सके?(याशायह 54)

प्रश्न 30
जब शराब (दाख मधु) पीने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है तो खुदा और मसीही लोगों को शराब पिलाकर उनको बर्बाद क्यों करते थे तथा मसीह स्वयं शराब क्यों छ् था क्या लोगों को नुकसान पहुंचाने से भी गुनहगार नहीं थे?(याशायह 25)

प्रश्न 31
संसार में दूसरों को गाली देना पाप माना जाता है तो ईशा ने अपने से पहले पैदा हुए महापुरुषों को चोर डाकू बताकर गाली क्यों दी क्या इससे मसीह का गुनहगार होना प्रमाणित  सिद्ध नहीं है?(युहन्ना 10)

स्टेशन मास्टर लाला गंगाराम


सच्चे आदमी का चरित्र चित्रण 
स्टेशन मास्टर लाला गंगाराम 

लेखक :- स्वामी स्वतंत्रानन्द जी महाराज 


            आचार की दृष्टि से अपने स्वभाव में कट्टरपन की दृष्टि से और अपने नियमों पर अटल रहने की दृष्टि से ला० गंगाराम जी विशेष व्यक्ति थे। इसलिए उनके जीवन की कुछ घटनाएं लिखता हूं। संभव है कोई सज्जन इनसे लाभ प्राप्त करें। 

 ( १ ) लाला गंगाराम जी सहायक स्टेशन मास्टर थे। स्टेशन मास्टर अंग्रेज था। लालाजी जिला गुजरांवाला के कानेवाली ग्राम के निवासी थे। इस समय की यह घटना है। उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। वह स्टेशन मास्टर से पूछ कर अपने ग्राम चले गए। दैवयोग से उसी दिन एक रेलवे का अफसर आ गया। उसने और बातों के साथ - साथ यह भी पूछा कि लाला गंगाराम जी कहां हैं ? स्टेशन मास्टर ने उस दिन उनकी हाजिरी लगा दी थी इसलिए कहा — यहां ही हैं। कहीं इधर उधर होंगे। बात समाप्त हो गई दूसरे दिन अपने ग्राम से आ गए ; तब उस अफसर ने इनसे पूछ लिया ,कि  आप नहीं मिले , कहां गए थे इन्होंने उत्तर दिया , मेरी माता का स्वर्गवास हो गया था , इसलिए मैं ग्राम गया हुआ था ; यहां न था। उसने कहा , स्टेशन मास्टर जी तो कह रहेथे कि आप यहां ही हैं। इन्होंने उत्तर दिया कि, उन्होंने मेरे बचाव के लिए ऐसा कह दिया था ; वास्तव में मैं अपने घर गया हुआ था ।वह अफसर इनका सत्य वचन सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ। 


( २ ) एक बार लाला गंगाराम जी से लाइन क्लियर देने में विशेष भूल गई। जब उसका पता लगा , तो लाला जी से वक्तव्य मांगा गया। स्टेशन मास्टर ने इन्हें उत्तर लिखित देने को कहा। इन्होंने चार दिन पीछे लिखकर दिया कि मुझ से भूल हो गई। इस भूल के कारण दुर्घटना हो सकती थी। दुर्घटना नहीं हुई तो रेल यात्रियों के सौभाग्य के कारण नहीं हुई। अतः इस भूल से मुझे जो दण्ड दिया जाये , मैं प्रसन्नता से स्वीकार करूंगा। जब स्टेशन मास्टर ने उसे पढ़ा , तो इनसे कहा कि क्या नौकरी छोड़ने अभिलाषा है ? इन्होंने उत्तर दिया कि नहीं। तब उसने समझाया और -कुछ और लिखकर लाओ। 

        वह कागज ले गये। तीन दिन पश्चात् वही लाकर पुनः दे दिया। स्टेशन मास्टर ने कहा , यह तो पूर्व वाला ही उत्तर है। लालाजी ने कहा कि सत्य यही है ; अतः यही उतर ठीक है। झूठ कैसे लिखू ? स्टेशन मास्टर ने वह उत्तर भेज दिया। ऊपर से आज्ञा मिली कि गंगाराम की चेतावनी दे दो कि आगे ऐसी भूल न करें। स्टेशन मास्टर तथा अन्य रेल कर्मचारी आश्चर्यवन्त थे कि यह क्या हुआ। अपराध स्वीकार करने पर केवल चेतावनी दी गयी। उस अधिकारी से किसी ने पूछा कि आप छोटे - छोटे अपराधों पर अधिक दण्ड दे देते हैं , परन्तु लाला गंगाराम ने अपराध किया और इन्होंने स्वीकार भी कर लिया , तब भी आपने चेतावनी देकर छोड़ दिया। उसने उत्तर दिया कि मुझे ऐसा व्यक्ति कभी मिला ही नहीं। उसने अपराध स्वीकार किया , उसका कारण अपनी भूल बताई और उसका दण्ड लेने के लिए तैयार हो गया। लोग अपराध करते हैं , पुनः उसे न मानकर झूठ बोलते हैं। गंगाराम ने सत्य कहा , अत : उसे कोई विशेष दण्ड न दिया गया भूल सबसे हो सकती है। उससे भी हुई। 

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सद्व्यवहार
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 ( ३ ) लाला गंगाराम जी की बदली किला अबदुल्लापुर ( बिलोचिस्तान ) हो गई। वहां से फलों के टोकरे बाहर भेजे जाते थे। दस्तूरी का चलन वहां भी था, फलों वाले जब दस्तूरी देना चाहें तो यह न लें। प्रथम तो उनको सन्देह हुआ कि ये अधिक लेना चाहते हैं । परन्तु जब इन्होंने कहा , मुझे रेलवे से वेतन मिलता है उसी से मुझे वह काम करना होता है। आप जिसे दस्तूरी कहते हैं , वह रिश्वत है। तब वह चुप हो गए। एक बार स्वर्गीय पडित विश्वम्भरनाथ आदि वहां आ गए। इनके पास ठहरे। एक दिन वे एक ग्राम में फल खाने चले गए। बागबान से फल लेकर खाते रहे। उस बिलोच ने इनसे पूछा , आप यहां कैसे आए हैं ? इन्होंने उत्तर दिया — लाला गंगाराम जी स्टेशन मास्टर के पास आये हुए हैं। जब फलों से पेट भरकर ये उसे फलों का दाम देने लगे तो उसने दाम लेने से इन्कार कर दिया और बलपूर्वक कहा , जब स्टेशन मास्टर दस्तूरी तक भी नहीं लेता , तो मैं उसके मित्रों से फलों का दाम लूं , यह उचित बात नहीं। आप प्रतिदिन इस बाग से जो फल चाहें , आकर खाया करें , आप से कुछ दाम न लिया जाएगा। आप जैसे गंगाराम के मित्र हैं , वैसे ही हमारे भी मित्र हैं। 

( ४ ) उसी स्टेशन पर एक बार एक अंग्रेज रेलवे अफसर आया हुआ था, और वह प्रतीक्षा - गृह ( Wating room ) में ठहरा हुआ था। दैवयोग से उस समय एक पुरुष ओर एक स्त्री अर्थात् पति पत्नि जो बिलोच थे। वो सैकंड क्लास का टिकट लेकर जब प्रतीक्षा गृह में गए तो अंग्रेज ने उन्हें वहां घुसने न दिया। गंगाराम ने उस अंग्रेज से कहा कि यह प्रतीक्षा गृह है और प्रथम और द्वितीय दर्जे के यात्रियों के लिए है। आप इसे खाली कर दें। वह न माना। इन्होंने पुलिस द्वारा उसका सामान बाहर रखवा कर उस दम्पत्ति को ठहराया। उसके पश्चात् एक बार इन्हें सूचना मिली कि इधर डाकू आए हुए हैं , आप सावधान रहें। उस दिन किला अब्दुल्ला पर कुछ न हुआ , एक और स्टेशन को डाकुओं ने लूटा। तदनन्तर गाजियों का एक नेता पकड़ा गया। जब उसे रेल में ले जा रहे थे उसने इच्छा प्रकट की कि मैं किला अब्दुल्ला के स्टेशन मास्टर से मिलना चाहता हूं। पुलिस वालों ने स्टेशन आने पर लालाजी से कहा , वे आ गए। वह पठान बड़ी श्रद्ध से मिला और कहा कि लालाजी , आप निश्चिन्त रहें। जहां आप होंगें , वहां कोई गाजी या डाकू , जो पठान है , आपको कुछ न कहेगा। उस दिन हम आपके पास अमुक स्थान पर बैठे रहे। पुलिस वालों ने कहा , खान साहिब , लालाजी में क्या बात है ? उसने कहा कि ये देवता हैं। इन्होंने सैकण्ड क्लास टिकट वाले पठान को स्थान दिलाया। ये गरीबों के सहायक हैं , इसलिए हमने निश्चय कर लिया है कि जहां ये होंगे ; इनकी रक्षा की जायेगी। सब पठान इनके दोस्त हैं। 

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मित्रता
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 ( ५ ) जब लाला जी वजीराबाद में थे , उस समय गुजरांवाला में धर्मपाल जी आर्य बने। उस समय कालेज में पढ़ने वाले कई विद्यार्थियों ने उस शुद्धि में भाग लिया था। उनमें से एक के पिता ने रुष्ट होकर उससे कहा कि आप हरिद्वार जाकर प्रायश्चित्त करें। अन्यथा हम व्यय नहीं देंगे और आप गृह पर न आवें। इस बात की सूचना इनको दी गई , इन्होने उस विद्यार्थी से कहा कि आप पढ़ते रहें , आपका सारा व्यय मैं दूंगा। जब इस प्रकार कई मास व्यतीत हो गए , तब उसके पिता ने पता लिया कि लड़का निर्वाह कैसे करता है। जब उन्हें पता चला तो वह गंगाराम जी के पास आया और कि आप लड़के को कहें कि वह गृह पर आजाये। आर्यसमाजी अच्छे होते हैं , हमारा लड़का आर्यसमाजी हो गया तो ठीक ही है। तब उनके पिता और उस विद्यार्थी का पूर्ववत् मिलाप हो गया और अपनी इच्छानुसार पढ़ते रहे। 

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दृढ़ता 
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( ६ ) क - जब वह पठानकोट स्टेशन पर थे , उस समय आर्यसमाज मन्दिर बनवाया। जस स्थान पर जो थानेदार थे , वो बिना टिकट रेल पर आए , लाला जी ने उनसे टिकट के पैसे प्राप्त किये जब कि वो जानते थे कि यह थानेदार है। 

ख – एक बार एक अंग्रेज रेलवे अफसर आया उसके पास एक कुत्ता था , गंगाराम जी ने कहा कि कुत्ते का पास वा टिकट दो। उसने कहा कि मैं रेलवे में ही काम करता हूं। लाला जी ने कहा मैं जानता हूं कि आपके पास पास है , किन्तु मैं कुत्ते का किराया मांगता हूं , आपका नहीं। अन्त में उसे कुत्ते का किराया देना ही पड़ा। पहले थानेदार ने शिकायत कर दी कि यह आर्यसमाजी है , लाला लाजपतराय जी का साथी है। इन सब कारणों से बिलोचिस्तान बदल दिये गए। 

ग — किला अब्दुल्ला में एक बार सीनीयर सुपरिन्टेडैन्ट की धर्मपत्नी अपनी सहेलियों सहित आ गई। इन्होंने टिकट मांगा उसने कहा - जाते समय दे जाऊंगी , वह सायंकाल बिना टिकट दिये चली गई। इन्होने रिपोर्ट करदी। उस समय श्री ज्ञानचन्द मेहता और श्री गणेशदास जी विज वहां पुलिस में थे। ईन्होंने गंगाराम से कहा , आपको बदल कर यहां भेजा , यहां भी आप वैसे ही काम करते हैं। इन्होंने उत्तर दिया - आप लिखकर दिला दें , इनसे टिकट न लिया जाये , मैं न माँगूगा यह धन मेरी जेब में तो जाता नहीं , रेलवे कोष में जाता है। 

घ – एक इनके परिचित अंग्रेज ने ( जो किसी काम पर आगे जा रहा था ) इन्हे समाचार - पत्र चिह्न , कर से दिया , जहां आर्यसमाज के विरुद्ध लेख था। इन्होंने उसे पढ़ा और जब वह लौटकर आया तो अंग्रेज को आर्य पत्रिका के कुछ अंक चिह्न लगाकर दिये , आर्यसमाज की सत्यता प्रकट करते थे। इन्हें पढ़कर वह लाला जी का भक्त बन गया। इनके असली रूप को समझ गया। 

इ - एक स्पेशल ट्रैन में रेलवे अफसर उधर गए। जब रेल गाड़ी किला अब्दुल्ला ठहरी तो एजेन्ट साहिब ने पूछा , गंगाराम क्या हाल हैं ? इन्होंने उत्तर दिया , ठीक है। उसने कहा , कहां जाना चाहते हो ? इन्होंने कहा , कंधार में लाइन बना दो वहां जाऊंगा। उसने कहा हम तुम्हें पंजाब  भेजना चाहता है । ये बोले , आर्यसमाजी होने से मुझे , पजाब से यहां भेजा था, अब तोमैं पहले से भी अधिक आर्यसमाजी हूँ। पर आप मानते हैं ( Yes , we want Arya Samajist for that placc) ( हाँ हम उस स्थानक लिए आर्यसमाजी ही चाहते हैं। ) तब वो अमृतसर स्टेशन पर बदल दिये गए। 
इनके काम से प्रसन्न होकर अमृतसर का माल उतारने और चढाने का ठेका भी इन्हें ही दिया गया था। 

( ७ ) एक बार लाहौर के आर्यसमाजी , जिन में इनके सुपुत्र लाला फकीरचन्द जी स्वर्गीय पं० भूमानन्द जी , पं० परमानन्द जी आदि अनेक सज्जन थे , गुरुकुल कांगड़ी जा रहे थे। अमृतसर स्टेशन पर एक अंग्रेज रेल अफसर उस डिब्बे में और आदमी बिठाने लगा। वहां प्रथम ही भीड़ थी। भूमानन्द जी ने विरोध किया उसने भूमानन्द को उतार दिया। लाला जी को सूचना दी गई ये आगए। यह गाड़ी तो चली गई , इन्होंने भूमानन्द जी की जमानत करवाकर फ्रंटियर मेल से उन्हें भेज दिया , वो सहारनपुर अपने साथियों से जा मिले। दोनों पक्षो ने अभियोग किया जिस समय उस अफसर को पता लगा कि इस अभियोग में लाला गंगाराम जी साक्षी होंगे , वह इनके पास आया और कहा कि मेरा उनसे समझौता करा दो क्योंकि अमृतसर में सब आपको सत्यवक्ता जानते हैं आपकी साक्षी से वह दोषी सिद्ध न होकर मै ही दोषी बनूंगा। इन्होंने समझौता करबा दिया। देश वासियों को स्वर्गीय ला० गंगाराम जी की जीवन की घटनाएं पढ़कर उन पर विचार करना चाहिए। जैसे की वो थे वैसे ही दृढ़ आर्य , सत्यवक्ता तथा कर्त्तव्यपालक बनने का प्रयन्न करना चाहिए।

Thursday, July 1, 2021

युद्ध महाभारत का एतिहासिक है


युद्ध 
महाभारत का एतिहासिक है। 

लेखक :- पूज्य स्वामी ओमानन्द सरस्वती 
संस्थापक पुरातत्व संग्रहालय गुरुकुल झज्जर हरयाणा
प्रस्तुति :- अमित सिवाहा 

           अनेक विद्वानों का मत है कि महाभारत का युद्ध कोई एक घटना विशेष से सम्बन्धित नहीं है , अपितु यह विभिन्न कालों में हुई अनेक धटनाओं का समूह है। इसमें तर्क यह दिया जाता है कि विद्वान् लोग महाभारत युद्ध की निश्चित् तिथि न मानकर विभिन्न तिथियां मानते हैं , अत: जिस महाभारत की विभिन्न तिथियाँ मानी जाती हैं , वह एक काल में हुई एक घटना नहीं हो सकती। इसी प्रकार उन्होंने यह भी सिद्ध करने का यत्न किया है कि कौरव - पाण्डव आदि एक कुल के नहीं थे। इतना सब लिखते हुए कतिपय विद्वानों ने अपने लेख में कोई भी ऐतिहासिक और ठोस प्रमाण नहीं दिया है। 

         सर्वमान्य है कि संवत् उसी का चलता है , जिसकी सत्ता ( विद्यमानता ) रही हो , जैसे यह सृष्टि उत्पन्न हुई तो इसका संवत् चला , जिसे सृष्टि संवत् कहते हैं। इसी प्रकार युधिष्ठिर संवत् , कलिसंवत् , विक्रमसंवत् , मूसा का ईसवी , शत संवत् आदि हैं। ये सभी इनकी सत्ता को सिद्ध करते हैं। कलि संवत् को हो युधिष्ठिरी संवत् कहते हैं। पाण्डव संवत् भी इसी का नाम है। वराहमिहिर कृत ' बृहत्संहिता ' , ' आइने अकबरी ' , माधवाचार्य कृत ' राजावली , ' द्वारका मन्दिर ताम्रलेख और बूंदी - स्थित स्तोर ग्राम के शिलालेख से यह सुतरां सिद्ध है।

              ' आइने अकबरी ' में लिखा है- " कलियुग के आरम्भ होते ही पहला राजा युधिष्ठिर हुआ , जिसको ( अकबर तक ) ४६९६ वर्ष हो चुके हैं और विक्रम तक यह ३०४४ वर्ष होते हैं। " ( इसके अनुसार अब वर्तमान २०२८ विक्रम संवत् तदा युधिष्ठिर को ५०७२ वर्ष होते है )। इसी प्रकार महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी महाभारत युद्ध के पश्चात कलियुग के प्रारम्भ में जो राजा हुए हैं , उनमें सर्वप्रथम युधिष्ठर को ही माना है। महर्षि दयानन्द ने ' सत्यार्थ प्रकाश , में जो राजवंशावली दी है, उसके अनुसार महाराज युधिष्ठिर से लेकर महाराज यशपाल पर्यन्त अर्थात् कलियुग के प्रारम्भ से विक्रम संवत् १२४६ तक ४२६३ वर्ष व्यतीत होते हैं। एतदनुसार भी आज विक्रम संवत् २०२८ तक युधिष्ठिर संवत् अथवा पलि संवत् को  ५०७२ वर्ष होते हैं। अभी कुछ वर्ष पूर्व हरयाणा सरकार के भाषा विभाग को डोगरी लिपि में लिखी एक प्राचीन राजवंशावली मिली है , उसमें राजाओं का जो कालमान दिया है , वह महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा लिखित काल से ही मिलता - जुलता है, उसके अनुसार भी आज संवत् २०२८ विक्रम् तक युधिष्ठिर संवत् ५०७२ ही सिद्ध होता है। ' राजावली ' नामक ग्रन्थ में सुप्रसिद्ध ज्योतिष शास्त्रज्ञ पं० माधवाचार्य ने लिखा है - ' कलियुग के प्रारम्भ से विक्रम् तक ३०४४ वर्ष होते हैं। कलियुगी संवत् ३०४४ में विक्रम का राज्य आरम्भ हुआ और संवत् ३१७६ में शाल वाहन का राज्य प्रारम्भ हुआ।

          " इसके अनुसार भी वर्तमान १८९३ शका संवत् तक कलियुगी संवत् को ५०७२ वर्ष व्यतीत होते हैं। इसके अतिरिक्त बूंदी के अन्तर्गत स्तोर ग्राम में विद्यमान पाषाण लेखों का परीक्षण सर विलियम म्यूर साहिब ने करवाया था। उनके मतानुसार इस लेख में भी युधिष्ठिरी संवत् लिखा है। एक बार सूरत के एक मन्दिर में दो शंकराचार्यों का शास्त्रार्थ हुआ था। उस शास्त्रार्थ में द्वारका के मन्दिर से प्राप्त एक ताम्र लेख दिखाया गया था। उस लेख की तिथि २६६३ युधिष्ठिरी संवत् में दी हुई है। वह लेख ईसा मसीह से ४३८ वर्ष पूर्व लिखा गया था। इस लेख के अनुसार भी वर्तमान ईसवी संवत् १९७१ तक युधिष्ठिरी संवत् के ५०७२ वर्ष व्यतीत होते हैं। 

        ऐसे ही अन्य भी अनेक प्रमाण हैं , जिनसे कलिसंवत् अथवा युधिष्ठिरी संवत् का काल नितान्त एक सा और निश्चित है। अत: महाभारत युद्ध काल को अनिश्चित कहना बुद्धिसंगत नहीं है। इन लिखित प्राचीन प्रमाणों के अतिरिक्त पुरात्विक और ऐतिहासिक प्रमाण भी हैं , जिनसे सिद्ध है कि महाभारत का युद्ध एक ऐतिहासिक युद्ध था और वह एक ही समय की घटना थी, तथा कौरव - पाण्डव आदि भी समकालीन थे और यह युद्ध कौरव - पाण्डव तथा उनके ही सहयोगियों में हुआ था।

           . महाभारत युद्ध के निकटवर्ती समय में जो ग्राम और नगर विद्यमान थे , विधमान हैं। इसी की पुष्टि में कुछेक प्रमाण नीचे दिये जाते हैं। इनमें से अनेक आज भी उसी नाम से अथवा कुछ नामभेद ( विकृत नाम ) महाभारत नामक ग्रन्थ में जो कथा वर्णित हैं , वह आज तक ज्यों की त्यों भारत के सभी प्रान्तों में जन श्रुति के रूप में विद्यमान हैं। यदि महाभारत का अस्तित्व नहीं होता तो यह जनश्रुति सर्वत्र क्योंकर मिलती ? महाभारत का युद्ध कुरूक्षेत्र के मैदान में हुआ था। महाभारत युद्ध  कलयुग से ३६वर्ष पूर्व हुआ था। तद्नुसार महाभारत युद्ध को आज विक्रम संवत् २०२६ में ५१०६ वर्ष व्यतीत होते हैं। सभी प्रमाणों से यही काल निश्चित है। महाभारत में नकुल की पश्चिम दिग्विजय में रोहीतक , शैरिशक , और महत्यम का वर्णन है , सो इन्द्रप्रस्थ ( दिल्ली ) के पश्चिम में रोहतक , सिरसा और महम आज भी विद्यमान हैं। 


        महाभारत का युद्धस्थल कुरुक्षेत्र तो आज उसी नाम से ही है। युद्ध के अन्तिम दिन जब दुर्योधन तालाब में छिपा और उसे ढूंढने के लिये युधिष्ठिर , कृष्ण आदि गये थे , उस स्थान का नाम ढूंढू जोहड़ और ईक्कस आज तक भी है। संस्कृत के “ ईश दर्शने " धातु से विकृत होकर यह ' ईकस ' शब्द बना है। महाभारत में वर्णित परशुराम ने जिस तालाब में अपना परशु धोया था , वह रामराहद भी आज रामरा नाम से प्रसिद्ध है।  पाण्डु के नाम से पाण्डुपिण्डारा और पाण्डुखरक भी विद्यमान हैं , जो कि कौरव - पाण्डवों की सत्ता के द्योतक हैं। पाण्डवों का किला भी इसी की पुष्टि करता है। महाभारत के इन्द्रप्रस्थ से तो आज सभी परिचित हैं ही। विराट के महाराज की गायें कौरवों ने इसी लिये भगाई थीं कि अज्ञातवासी पाण्डवों का पता चल सके। उन गायों को पाण्डवों ने जिस स्थान पर छुड़ाया , वहाँ आज छुड़ानी नाम का ग्राम विद्यमान है , यह बहादुरगढ़ और झज्जर के मध्य है।

         द्रोपदी की जन्मभूमि अहिच्छत्र ( पाण्चाल प्रदेश ) आज भी खण्डहर रूप में विद्यमान है। पाण्डवों की राजधानी कौशाम्बी ( प्रयाग ) भी आज ध्वस्त रूप में पड़ी हैं। महाभारत में वर्णित योधेय , कुणिन्द आर्जुनायन , वृष्णि आदि गणों की मुद्रायें आज भी प्राप्त हैं। इसी प्रकार बहुधान्यक प्रदेश का वर्णन भी महाभारत में आया है , जिसके नाम वाले यौधेयों के सिक्के आज भी उस प्रदेश की सत्ता जतला रहे हैं। जब महर्षि वेदव्यास रचित इस महाभारत ग्रन्थ में उल्लिखित ये सब तथ्य प्रस्तुत हैं तो उसी में वर्णित कौरव - पाण्डव और उनका युद्ध अनैतिहासिक कैसे हो सकता है ? कैसे उसकी सत्ता को अस्वीकार किया जा सकता है ? 

        इसी प्रकार पाण्डवों ने दुर्योधन से जो पांच ग्राम मांगे थे वे भी भाज किचन्नाम भेद से देखे जा सकते हैं। बिना इन ऐतिहासिक तथ्यों की खोज किये महाभारत युद्ध और कौरव पाण्डवों की अनैतिहासिकता की घोषणा करना ठीक नहीं है। महाभारत के अध्ययन से स्पष्ट ज्ञात होता है कि श्री कृष्ण और कौरव पाण्डव आदि का परस्पर रक्त का सम्बन्ध भी था। महर्षि व्यास ने श्री कृष्ण को बार बार वार्ष्णेय ( वृष्णिकुलोत्पन्न ) नाम से सम्बोधित किया है। इसी वृष्णिकुल की कुछ प्राचीन मोहरें मुझे प्राप्त हुई हैं , जिनसे इस कुल की सत्ता का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। यदि यह कुल न होता तो इसकी मोहरें कहां से आतीं। यदि इसी भांति इन्द्रप्रस्थ , पाण्डुकिला , अहिच्छत्र और कौशाम्बी आदि की पूर्ण खुदाई करवाई जाए तो कौरव - पाण्डवों से सम्बन्धित विशिष्ट सामग्री भी मिल सकती है। जैसे कि अहिच्छत्र से कौरव - पाण्डव युद्ध के दृश्यों से अंकित विशाल मृण्मूर्तियां उपलब्ध हुई हैं जो कि महाभारत युद्ध की वास्तविकता का ठोस प्रमाण हैं।


      नीचे स्वामी ओमानन्द जी महाराज द्वारा खोजा गया महाभारत युद्ध का एक हथियार है। बढ़ती सैक्यूलरता तथा नये नये इतिहासकार आज के नवयुवकों में यह संदेश पहुंचा रहे हैं की महाभारत का युद्ध काल्पनिक गाथा है। ऐसा करके आप कहां तक ठहरोगे ? आजकल के पैड वर्कर इतिहासकार केवल हिन्दु ग्रंथो को नीचा दिखाने मात्र हेतु ऐसा घिनौना कार्य कर रहे हैं। उनकी भावना साफ साफ समझी जाती है। यें छद्मी लोग कुरान बाईबल पर चूं न करते।  स्मरण रहे आप आर्यसमाज को चुनौती कर रहे हैं।

आर्य समाज का प्रभाव


आर्य समाज का प्रभाव 

    
       लगभग सत्तर वर्ष पुरानी घटना है। पंडित भूराराम जी (चिड़ी वाले) अपनी भजन मंडली के साथ प्रचार करने जा रहे थे। बीच रास्ते में दो पुलिसकर्मी आए। ओर उनकी भजन मंडली को परेशान करने लग गए। आरोप लगाते हुए बोले की आप नशे का सामान बेचते हो। पंडित श्री भूराराम जी ने उनको बहुत समझाया, की भाई हम तो आर्य समाज के प्रचारी हैं। भजन गाकर लोगों को सत्य मार्ग पर चलने की प्ररेणा देते हैं। वैदिक धर्म का प्रचार करते हैं। आर्य समाज के सिद्धांत लोगों को बताते हैं। हमारा ओर नशे का तो दूर तक कोई संबंध नहीं हैं। 

 पंडित जी ने पुलिस वालों को बहुत समझाया पर ना समझो ने पंडित जी एक न सुनी। उनको भजन मंडली सहीत थाने में ले गए। उन्होनें थानेदार को एक की दो बातें लगाकर सुनाई। थानेदार ने कहा चलो देखते हैं। 

 सज्जनों ये आर्य समाज की शिक्षा का प्रभाव ही कहो की जैसे ही थानेदार साहब ने पंडित भूराराम जी को देखा तो उनके पैरों में जा गीेरे। नमस्ते प्रणाम् दोनों की हुई। अब ये दृश्य देखकर वो दोनो सिपाही सन्न रह गए। ये क्या हो रहा है।  सज्जनों ये थानेदार कोई ओर नहीं बल्कि पंडित भूराराम जी का विद्यार्थी था। पंडित जी की पाठशाला में पढ़ता था।  गुरु ओर शिष्य दोनों ने एक दुसरे को पहचाना। थानेदार ने पंडित जी का अतिथि सत्कार किया। 

इस घटिया हरकत के लिए थानेदार ने उन सिपाहियों को कड़ी फटकार लगाई। उनको नौकरी से बर्खास्त करने तक की बात कह दी। ऐसे में वो सिपाही थानेदार से माफी के लिए गिड़गिड़ाने लगे। थानेदार बोले तुम्हारी इस नीच हरकत के लिए मैं माफी का हकदार नहीं, अपितु गुरु जी से माफी मांगो। माफ करने का हक उन्हीं को है।  सिपाहियों ने नम आंखो से पंडित जी के पैर पकड़ कर माफी मांगी। पंडित जी ने कहा एक शर्त पर तुम्हें माफ कर सकता हूं, सिपाहियों ने हामी कर दी। 

  पंडित जी ने उनको एक महिने तक गांवो में हमारी प्रचार की मुनियादी करने को कहा। सिपाहियों ने भी ऐसा ठीक समझा। लम्बी बात क्या है वो सिपाही घोड़ो पर जाते, पंडित जी उनको पहले की सूचित करते आज प्रचार इस गांव में होगा कल उसमें, गांव में भजन पार्टी के लिए रहने खाने की सारी व्यवस्था करके वे सिपाही वापिस पंडित जी को सूचित करते। 

जब महिना पुरा होने वाला था तब पंडित भूराराम जी ने उनको कहा, तुम्हें ये दंड देने का मेरा कोई प्रायोजन नहीं था, बल्कि मैने ऐसा इस लिए किया ताकि ये हरकत तुम ओर तुम्हारे साथी आर्य समाज के किसी भजनोपदेशक के साथ न करो। 

 सज्जनों ऐसी ऐसी अनेकों घटनाएं हैं, जो प्रचार में हमारे भजनोपदेशकों के साथ घटित होती रहती थी। पंडित भूराराम जी जैसे उपदेशक विरले ही जन्म लेते हैं। यें भजनोपदेशक तूजर्बे वाले थे। जनता के मन को भांप कर उपदेश करते। 90 वर्ष की आयु तक आर्य समाज का प्रचार करके पुन्य कमाया। 

          ।इन महान विभुतियों को श्रद्धा पूर्वक नमन।

Monday, June 28, 2021

मेरे प्रेरणास्त्रोत स्वामी भीष्म जी महाराज लेखक - स्वामी ओमानंद सरस्वती


मेरे प्रेरणास्त्रोत स्वामी भीष्म जी महाराज 
लेखक :- स्वामी ओमानंद सरस्वती 
स्त्रोत :- स्वामी भीष्म अभिनन्दन ग्रंथ 

        हरियाणा प्रदेश में आर्य समाज का जितना भी प्रचार प्रसार हुआ उसका सबसे अधिक श्रेय आर्य समाज के भजनोपदेशकों को है। क्योंकि इस प्रदेश में पहले व्याख्यान को कोई सुनता ही नहीं था। अच्छे से अच्छे विद्वान व्याख्याता के 5-7 मिनट से अधिक व्याख्यान को कोई नहीं सुनता था। कुछ ही मिनट में सुनने के पश्चात हरियाणा की अशिक्षित जनता कोलाहल करके उपदेशक को बैठने के लिए विवश कर देती थी। क्योकिं उनको व्याख्यानो में कोई रुची नहीं थी। 

     एक सच्ची घटना है। महात्मा भक्त फूल सिंह जी ने गुरुकुल भैंसवाल के उत्सव पर स्वामी श्रद्धानन्द जी को व्याख्यान देने के लिए बुलाया। उन्होने दो चार मिनट ही भाषण दिया कि एक चौधरी खड़ा होकर बोला - बाबा जी " आपकी बात तो अच्छी हैं!! हमने सुनली!  अब चौधरी ईश्वर सिंह के भजन होने दे! विवश होकर स्वामी श्रद्धानंद जी को बैठना पड़ा। उनके देखते देखते आर्यसमाज के एक बड़े महात्मा का तिरस्कार हुआ, यह उनके लिए असह्य था, इससे दुखी होकर पुन: उन्होने ईश्वर सिंह को कभी नहीं बुलाया। हजारों वर्षों से वेदादिशा स्त्रों के प्रचार करने वाले विद्वान उपदेशकों का इस प्रांत में अभाव चला आ रहा था। स्वांग, नाच, रासलीला, रामलीला, आदि नृत्यगान लोगों की रुचिकर थे। इस लिए अच्छे गाने वाले भजनोपदेशक ही आर्य समाज के प्रचार कार्य में आरंभिक काल में सफल उपदेशक सिद्ध हुये। उस समय के आर्य भजनोपदेशक अपनी धुन के धनी थे। वे प्राय: सभी त्यागी तपस्वी, श्रद्घालु,और अत्यंत पुरुषार्थी थे। सब प्रकार के दुख सहकर भी आर्य समाज के प्रचार में दिन रात जुटे रहते थे। 

      ऐसे ही पुराने उपदेशको में श्री स्वामी भीष्म जी महाराज हैं। उन्होने भी अपना सारा जीवन आर्यसमाज के प्रचार में लगाया है। आज से पचास वर्ष से भी अधिक पुरानी बात है। आप अपनी भजन मंडली सहित नरेला ग्राम में बड़े बड़े चौधरी नम्बरदार आदि प्राय: सभी आर्यसमाजी थे। इसलिए इनके प्रचार की व्यवस्था बहुत अच्छी हो गई थी और इनका प्रचार नरेला के पाना उद्यान में चौधरी हीरासिंह और चौधरी जोतराम के मोहल्ले में लगातार कई दिन से हो रहा। उन्हीं दिनों इसी पाने में हस्पताल के सन्मुख रामलीला भी हो रही थी और सारा पाना देखने जाता था। किंतु दो तीन दिन तक श्री स्वामी भीष्म जी का प्रचार होने पर सारा ग्राम प्रचार सुनने के लिए आने लगा और रामलीला वाले भागने के लिए विवश हो गए। स्वामी भीष्म जी उन दिनों रामलीला को "हरामलीला" कहकर उसका खंडन किया करते थे। 
   

      मैं भी उन दिनों रामलीला देखने जाता था। किंतु अपने आर्यसमाजी वृद्धों की प्रेरणा पर उसे छोड़कर स्वामी भीष्म जी के प्रचार में जाने लगा। संस्कार तो पहले भी आर्य समाजी ही थे। किंतु उस समय ज्ञात नहीं था रामलीला देखना आर्य सिद्धांतो के खिलाफ है। स्वामी भीष्म जी के प्रचार से हमारी आंखे खुली। इनके प्रचार का इतना अच्छा प्रभाव पड़ा कि बहुत से विद्यार्थी और युवकों ने नये यज्ञोपवित धारण किये और आर्यसमाज में प्रवेश किया। आर्य समाज के प्रति मेरी श्रद्धा अधिक बढ़ गई। स्वामी भीष्म जी उस समय अपनी भरी हुई जवानी में थे। इनका अत्यंत मीठा और ऊंचा स्वर था। इनके पीछे भजनों की टेक आदि बोलने वाले इनके शिष्य 15-16 वर्ष की आयु के ही थे। मुझे ऐसा याद पड़ता है कि वे रामचन्द्र जी, हरिदत्त जी, श्री ज्ञानेन्द्र जी थे। उनमें से श्री हरिदत्त जी तो आज भी अच्छा गाते हैं। 

     श्री स्वामी भीष्म जी महाराज एक दिन प्रचार करते करते बीच में ही रुक गए। और कहने लगे कि मुझे कई दिन यहां प्रचार करते हो गए। मुझे यह भी पता पड़ गया की यहां बहुत से आर्यसमाजी हैं। यहां मुख्य मुख्य चौधरी भी प्राय आर्य समाजी ही हैं। इसलिए प्रचार तब करुंगा जब आप लोग यहां आर्यसमाज की स्थापना करोगे। स्वामी जी ने गाना बंद कर दिया। प्रचार बंद हो गया। लोग बड़ी रुची व श्रद्धा से सुन रहे थे, स्तब्ध रह गये। सारी सभा में शांति और सन्नाटा छाया हुआ था। सभी मौन होकर आश्चर्य से देख रहे थे। यह क्या हुआ  ??
सामान्य लोगों को तो यह भी नहीं पता था कि आर्य समाज की स्थापना होती कैसे है। मैं ओर मेरे साथी इस घटना को आश्चर्य और ध्यान से देखते रहे। मैं बार बार यही सोच रहा था कि स्वामी भीष्म जी की बात ये लोग मानते क्यों नहीं!! 
चुपचाप क्यों बैठे हैं?? आर्यसमाज की स्थापना क्यों नहीं करते। इस प्रकार के अनेक प्रश्न मेरे मन में उठ रहे थे। मैं विचार कर रहा था कि आर्य समाजी तो बहुत कायर कमजोर नपुसंक और भीरु हैं। इन्हें अभी आर्यसमाज बना देना चाहिए। मैं बालक होने के कारण विवश था। नहीं तो खड़ा होकर कुछ कहने की इच्छा होती। ऐसे ही समय एक आर्यसमाजी सज्जन उठकर नम्रतापूर्वक कहने लगा - स्वामी जी महाराज!  हमने यहां आर्यसमाज बनाया था। कुछ दिन तो उसका कार्य चला। हम सब किसान है। हमें अपनी खेड़ी बाड़ी के धंधे से अवकाश नहीं मिलता। हम में पढ़े लिखे भी बहुत कम हैं। नगरों के समान यहां आर्य समाज का कार्य बहुत कठिन हैं। तो हम आपके समान उपदेशको का प्रचार यहां करवाते हैं। हमारी पीढ़ी जब पढ़ लिखकर आयेगी तो वह आर्य समाज की स्थापना करेगी। यही विचार मेरे मन में आये हुए थे कि हम आर्य समाज बनाएगें। हमारे अनेक साथियों ने यज्ञोपवित धारण किये हुए थे। मैने उनसे परामर्श किया और दिन में पूज्य स्वामी भीष्म जी से मेैं मिला। 

      रात्री को गाने से पूर्व प्रतिदिन गाकर ईश्वर भजन दोहा बोलते थे ----------

     सब जगह मोजुद है पर नजर आता नहीं। 
    योग साधना के बिना कोई उसे पाता नहीं।। 

     मैं इस दोहे को सुनता था तो यह सोचता था कि आर्य समाज के सभी उपदेशक योगी होते हैं।  मैं उससे पूर्व उर्दूं की तहकीके धर्म पुस्तक पढ़ चुका था।  योग में रुची भी थी। मैने जिज्ञासु रुप में स्वामी जी से अनेक प्रशन्न किये। पते भी पूछे। पूज्य स्वामी जी ने मुझे संध्या रहस्य, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका और संस्कार विधि पढ़ने को कहा। ये पुस्तकें मैने उन्हीं दिनों खरीद ली। मेरी इच्छा स्वामी इच्छा स्वामी भीष्म जी से यज्ञोपवित लेने की थी। मैने उन दिनों तक जनेऊ धारण नहीं किया था। मुझे यह भी पता नहीं था कि यज्ञोपवित किस आयु में धारण किया जाता है ?? मैने यज्ञोपवित लेने के लिए पिता जी के सन्मुख इच्छा प्रकट की। क्योकिं उस समय मात पिता की आज्ञा को कुछ नहीं कर सकते थे। मात पिता का बड़ा आतंक होता था। इसलिए जब मैने यज्ञोपवित लेने की आज्ञा मांगी तो उन्होने कहा --- नहीं!  "यज्ञोपवित संस्कार हम अपने घर करवाएगें"।  और उन्होने किया भी ऐसा ही। कुछ समय पीछे आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली के महोपदेशक पं. गंगाशरण जी को बुलाकर घर पर ही मेरा तथा बनवारी लाल जी (भाणजे) का यज्ञोपवित संस्कार करवाया। 

      इस प्रकार मुझे स्वामी भीष्म जी से आर्य समाज का कार्य करने कि प्रेरणा बचपन से ही मिली और एक दो वर्ष पीछे ही आर्य समाज की स्थापना करके स्वामी जी की इच्छा पूरी कर दी। मैने नरेला आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर स्वामी जी को बुलाने का यत्न किया किंतु वो किसी कारणवश न आ सके। मैं स्वंय उनको बुलाने गाजियाबाद करहैड़ा आश्रम भी गया। स्वामी जी महाराज को अनेक उत्सवों पर हम बुलाते रहे ओर प्रचार करवाते रहे। लगातार अनेक वर्षों तक हमारा इनके साथ संबंध रहा। इनकी कृपा दृष्टि बनी रही। 

    इस प्रकार स्वामी जी महाराज ने 99 साल अपने जीवन के आर्य समाज था वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार में लगाए हैं। अनेक शिष्यों ने भारतवर्ष का भ्रमण कर आर्यसमाजों की स्थापना करके देश के लिए अनेक बलिदानियों को तैयार किया।  खूद स्वामी जी महाराज अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेते रहे।  गुलाम भारत में घरौंडा स्थान पर गुरुकुल खोलकर तिंरगा फहरा दिया। 1957 के हिंदी आंदोलन, गौरक्षा आंदोलन में जेल की यात्रा की। लगभग दस हजार से अधिक भजन लिखे। 250 से अधिक पुस्तकें लिख कर किर्तीमान स्थापित कर दिया। 

प्रस्तुती :- श्री सहदेव समर्पित, अमित सिवाहा 

स्वामी भीष्म जी महाराज को शत शत नमन

वर्ष 1966 का गोरक्षा आंदोलन हरयाणे की आर्य जनता का सत्याग्रह


वर्ष 1966 का गोरक्षा आंदोलन 
हरयाणे की आर्य जनता का सत्याग्रह 

लेखक :- श्री विरजानंद दैवकरणि, डॉ० रघुवीर वेदालंकार 
प्रस्तुति :- अमित सिवाहा 

            गोरक्षार्थ हरयाणा से जत्थे निरन्तर जा रहे थे। ९ सितम्बर १९६६ को जत्थेदार स्वामी सन्तोषानन्द जी ( रेवाड़ी ) के नेतृत्व के कुछ व्यक्तियों ने सत्याग्रह किया। गुरुकुल झज्जर के ब्रह्मचारी तथा कर्मचारी पूर्णरूपेण इस आन्दोलन के प्रति समर्पित थे। आचार्य भगवान्देव जी तो अपना समस्त समय गुरुकुल से बाहर रह कर सत्याग्रह के लिए लगा रहे थे , गुरुकुल से भी ब्रह्मचारियों तथ कर्मचारियों के जत्थे निरन्तर जा रहे थे। १२ अक्तूबर १९६६ को गुरुकुल झज्जर के ब्रह्मचारी यज्ञवीर किसरेंटी , रणवीर आसन , हरिदेव गौरीपुर और राजेन्द्र भालौठ रात को भागकर झज्जर से बहादुरगढ़ तक पैदल गये। सत्यार्थप्रकाश तथा ओम्ध्वज लिए हुए इन्होंने प्रात: काल इन्दिरा गांधी की कोठी पर सत्याग्रह किया और सात दिन तक तिहाड़ जेल में रहे। पुनः छोड़ दिये गये। ये दुबारा सत्याग्रह करना चाह रहे थे , किन्तु गुरुकुल से ब्रह्मचारी इन्द्रदेव मेधार्थी इनको लेने आगये और कहा कि आप अभी विद्यार्थी हैं , पढ़ाई करो , सत्याग्रह में हम बड़ी आयु के व्यक्ति जायेंगे। 

          ३० अक्तूबर १९६६ को ' हरयाणा गोरक्षा सम्मेलन रोहतक ' में आचार्य भगवान्देव जी ने भी सत्याग्रह कर जेल जाने की घोषणा कर दी। तभी से हरयाणो में उत्साह की लहर दौड़ गई और भारी संख्या में सत्याग्रह के लिये नाम आने प्रारम्भ हो गये। 

          ३ नवम्बर १९६६ को दुर्गाभवन रोहतक में सत्याग्रहियों का विदाई समारोह हुआ। जिस में हजारों की संख्या में उपस्थित जनता के समक्ष आचार्य जी ने घोषणा करते हुए कहा कि - " जब तक भारत में पूर्णरूप से गौ वंश की हत्या बन्द नहीं होगी तब तक हरयाणा से सत्याग्रहियों के जत्थे इसी प्रकार चलते रहेंगे। अब हम निश्चय कर चुके हैं कि हमारी गोमाता जीवित रहेगी तो हम जीयेंगे। यदि गौ के लिए हमें अपना सर्वस्व न्यौछावर करना पड़े तो सौभाग्य समझेंगे। " उपस्थित जनता ने उच्च जयघोषों के साथ इस घोषणा का स्वागत किया। 

         ४ नवम्बर १९६६ को आचार्य जी के नेतृत्व में ४०० सत्याग्रहियों का यह विशाल जत्था दयानन्दमठ रोहतक से रेलवे स्टेशन की ओर उत्साह का संचार करता हुआ जुलूस के रूप में आगे बढ़ा। मार्ग में रोहतक की जनता ने स्थान - स्थान पर इन धर्मवीरों का अभिनन्दन फलों , फूलों , मालाओं और जयकारों से किया। सत्याग्रह में भाग लेने हेतु गुरुकुल झज्जर के ६० ब्रह्मचारी , १० अध्यापक एवं कार्यकर्ता झज्जर से सीधे आर्यसमाज करोल बाग दिल्ली में पहुंच रहे थे। इस प्रकार कुल मिलाकर यह जत्था ४७० वीरों का हो गया था। इस जत्थे में ब्रह्मचारियों का उत्साह विशेष श्लाघनीय था।

          ४ नवम्बर १९६६ को सायंकाल करोल बाग आर्यसमाज मन्दिर में सत्याग्रहियों के स्वागत में एक विशाल सभा हुई। जिसका उद्घाटन आर्य नेता पंडित जगदेवसिंह सिद्धान्ती संसद् सदस्य ने किया। अध्यक्ष पद से श्री प्रकाशवीर जी शास्त्री एम० पी० ने बोलते हुये कहा कि - " अब सारा देश जाग चुका है। अत: सरकार को गोहत्या बन्द करनी ही पड़ेगी। " ५ नवम्बर १९६६ को प्रात: काल यह सत्याग्रही जत्था करोलबाग आर्यसमाज दिल्ली से जयघोषों से गगन को गुंजाता हुआ बाहर निकला। सत्याग्रह का नेतृत्व स्वामी धर्मानन्द जी एवं आचार्य भगवान्देव जी कर रहे थे। इस विशाल जत्थे के अनेक विभाग थे , जिनके विभागाध्यक्ष भी पृथक् - पृथक् थे। जैसे गुरुकुल झज्जर तथा तहसील झज्जर के सत्याग्रहियों के अध्यक्ष स्वामी शान्तानन्द जी , महम चौबीसी के जत्थे के वैद्य बलराज जी , पाकस्मा मण्डल के जत्थे के पं० रामचन्द्र जी आर्य ( भालोठ ) , गुरुकुल सिंहपुरा से सम्बन्धित जत्थे के श्री राममेहर जी एडवोकेट ( मकड़ौली ) , तथा रोहणा और निस्तौली आदि सत्याग्रहियों के श्री दरयावसिंह तथा पहलवान् बदनसिंह थे । 

          " गोरक्षा आन्दोलन में अब तक यह जत्था सब से विशाल तथा अपूर्व था। जिस भी बाजार से सत्याग्रही गोमाता की जय बोलते हुये निकलते थे वहीं की जनता इन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ती थी। इस प्रकार ५ , ६ मील पैदल चलकर ये हरयाणे के वीर गृहमंत्री श्री गुलजारीलाल जी नन्दा की कोठी पर पहुंचे। जहां पुलिस पहले से ही भारी संख्या में पंक्ति बद्ध मोटा रस्सा पकड़े खड़ी थी। पुलिस के एक उच्च अधिकारी ने आचार्य जी से कहा कि आप से नन्दा जी मिलना चाहते हैं अत: थोड़ी देर आप लोग शान्ति से बैठे। दो घण्टे प्रतीक्षा करने के बाद नन्दा जी आये और आचार्य जी को वार्ता के लिए अन्दर ले गये। आचार्य जी के साथ रामगोपाल शालवाले , स्वामी धर्मानन्द जी आर्यसमाज करौलबाग दिल्ली और राममेहर वकील ( रोहतक ) भी थे। बातचीत में श्री गृहमंत्री जी ने सहानुभूति एवं विवशता प्रकट की। जिस पर आचार्य जी ने बाहर आकर सत्याग्रहियों को सत्याग्रह करने का आदेश दे दिया। हरयाणे के वीर गोमाता की जय बोल कर नन्दा जी की कोठी की ओर बढ़े। जिस पर पुलिस ने निर्दयता के साथ लाठी चार्ज कर के पीछे धकेलने का असफल प्रयास किया। सत्याग्रहियों को नितान्त अहिंसात्मक सत्याग्रह करने का आदेश था और वे इसका पालन भी पूर्ण निष्ठा से कर रहे थे। इधर पुलिस लाठी चूंसे तथा शिर के लोहे के टोप आदि का प्रयोग कर रही थी। यह हिंसा और अहिंसा का संघर्ष दर्शनीय था। जो हरयाणे के वीर डोगराई क्षेत्र में पाकिस्तान के गोले गोलियों की अग्निवर्षा में भी आगे बढ़ने का अभ्यास कर चुके थे वे इन बेचारे पुलिस वालों की लाठियों की क्या परवाह करते। इस संघर्ष में दिलीपसिंह मकड़ोली एवं खेमराज जी झज्जर को काफी चोटें आई और उन्हें बेहोश अवस्था में जेल ले जाया गया। 

           सत्याग्रहियों का उत्साह विशेष प्रशसनीय था। ५ नवम्बर १९६६ को रात्रि तक सब सत्याग्रही तिहाड़ जेल में पहुंचा दिये गये। वहां जेल अधिकारियों का व्यवहार नितान्त निन्दनीय था। प्रात: ३ , ४ बजे से सायंकाल तक सत्याग्रहियों को निराहार रहना पड़ता था। कभी आटा कम मिलता तो कभी लकड़ी कम होती थी। ७ नवम्बर १९६६ को यह जत्था निरपराधी मानकर जेल से छोड़ दिया। सब लोग ८ , ९ मील दौड़ते हुए रात्रि को पटेल नगर आर्यसमाज में पहुंचे। नगर में कर्फयू होने से भोजन की व्यवस्था न हो सकी अतः कुछ चने चबाकर ही सो गये। हरयाणे के इस वीर जत्थे से सरकार अधिक भयभीत थी अतः अगले दिन प्रात : काल ही पुलिस ने आर्यसमाज मन्दिर पटेल नगर , दिल्ली का घेरा डाल लिया तथा सबको बन्द गाड़ियों में बैठाकर तिहाड़ जेल भेज दिया। 

        जो सत्याग्रही कार्यवश आर्यसमाज मन्दिर से बाहर गये होने से गिरफ्तार न हो सके उन्होंने स्वामी धर्मानन्द जी के नेतृत्व में करोलबाग आर्यसमाज मन्दिर से सत्याग्रह किया। जिन पर पुलिस ने क्रूरता से लाठी चलाई। १३ सत्याग्रहियों को घातक चोटें लगी। जिन में स्वामी धर्मानन्द , श्री बनीसिंह आसन , श्री ब्रह्मचारी निजानन्द , कसानसिंह गांधरा , प्रीतसिंह आर्य पौली एवं राममेहर एडवोकेट का नाम विशेष उल्लेखनीय है। 

        गोरक्षा सत्याग्रह में ७ नवम्बर १९६६ का दिन सर्वदा स्मरण रहेगा जबकि देश भर के लगभग दस लाख गो भक्तों ने दिल्ली आकर संसद् भवन पर गोवध बन्दी की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। लोकसभा भवन के सामने मंच पर साधु महात्मा और नेता बैठे थे। स्वामी रामेश्वरानन्द जी ( घरौंडा ) ने अपील की कि यदि सरकार नहीं सुनती है तो पार्लियामेंट को घेर लो। यह सुनते ही लोग संसद् भवन के द्वार पर लगे सीखचों पर चढ़ने लगे। तभी किसी ने माईक का तार काट दिया और आंसू गैस , लाठी तथा गोली चलने लगी। इस भीड़ में गुरुकुल झज्जर के ७ व्यक्ति थे। जैसे वैद्य बलवन्तसिंह ( बलियाना ) , मनुदेव ( फरमाणा ) , धर्मदेव ( हुमायूंपुर ) , योगानन्द शास्त्री ( भदानी ) , विरजानन्द ( भगड्याणा ) , धर्मपाल महाराष्ट्र आदि। इस गोलीकांड में शतश : साधु तथा अन्य लोग मारे गये , जिन्हें रात में ही कहीं ले जाकर जला दिया गया। गोभक्तों पर इतना बड़ा अत्याचार पहले कभी नहीं हुआ था। जब गोली चली तो भगदड़ मच गई। इसी अफरा - तफरी में गुरुकुल के सभी लोग बिछुड़ गये। योगानन्द शास्त्री और विरजानन्द लोकसभा भवन से कश्मीरी गेट , बस अड्डे तक पैदल आये और रात को गुरुकुल पहुंचे। शेष लोग दूसरे दिन प्रात: काल झज्जर पहुंचे।

          जेल के अन्दर अनेक सम्प्रदायों के महात्मा एवं भारत के कोने - कोने से आये गोभक्त सत्याग्रहियों का अति प्रेम से सत्संग होता था। प्रत्येक वार्ड में यज्ञ , सन्ध्या , कथा , व्याख्यान , सत्संग की व्यवस्था थी। अनेक प्रकार की कठिनाइयों के होते हुये भी सत्याग्रही एक अद्भुत मस्ती का अनुभव करते थे। जेल अधिकारियों के दुर्व्यवहार से दुखित होकर स्वामी रामेश्वरानन्द जी ने अनशन आरम्भ कर दिया। सात दिन होने पर भी जब अधिकारियों ने कोई ध्यान नहीं दिया तो जेल के सभी सत्याग्रहियों ने भी अनशन आरम्भ कर दिया जिस पर सरकार को झुकना पड़ा।

           इस जत्थे की पेशी २२ नवम्बर १९६६ को थी किन्तु मजिस्ट्रेट ने अचानक १९ नवम्बर को ही जेल से बाहर कर दिया। जेल में ब्रह्मचारी नियम पूर्वक व्यायाम , स्नान , संध्या , स्वाध्याय करते रहे। वहां का वातावरण गुरुकुल के समान ही पवित्र बन गया था। लोग उसे जेल न कहकर सत्संग भवन कहा करते थे और किसी प्रकार का कष्ट अनुभव नहीं करते थे। जेल के भीतर प्रतिदिन सायं चार बजे धार्मिक , भजन , उपदेश आदि होते थे। महात्मा रामचन्द्र वीर विराटनगर ( अलवर ) के सुपुत्र आचार्य धर्मेन्द्रनाथ जी के व्याख्यान तथा #श्री_नत्थासिंह आर्य भजनोपदेशक के भजन नित्यप्रति होते थे। 

          इसके बाद सत्याग्रह निरन्तर चलता रहा , गिरफ्तारियां होती रही। आचार्य भगवानदेव जी ने ३०० गोभक्तों के साथ १८ जनवरी १९६७ को तीसरी बार सत्याग्रह किया। इस बार भी गरुकुल झज्जर के अनेक ब्रह्मचारी इस सत्याग्रह में सम्मिलित थे। इस प्रकार ६ मास तक चलने वाले गोरक्षा आन्दोलन में गुरुकुल के ब्रह्मचारी तथा कार्यकर्ता कई बार सत्याग्रह करके जेल गये । न केवल गुरुकुल के ब्रह्मचारी ही अपितु गुरुकुल की विद्यार्य सभा के अधिकारी भी कई बार जेल गये थे । इस सत्याग्रह में गुरुकुल झज्जर तथा अन्य हरियाणा वासियों के योगदान के विषय में डॉ० सत्यकेतु ने लिखा है हिन्दी सत्याग्रह के समान अब गोरक्षा सत्याग्रह में भी हरयाणा का कर्त्तव्य प्रमुख रहा। हरियाणा के अनेक गुरुकुलों के प्राध्यापकों , ब्रह्मचारियों तथा कर्मचारियों ने भी सत्याग्रह में भाग लिया।

         इस बार आचार्य भगवानदेव जी के सत्याग्रही जत्थे को फिरोजपुर ( पंजाब ) की जेल में भेजा गया तथा एक मास की कैद की गई। इस जत्थे में गुरुकुल झज्जर के ब्रह्मचारियों के साथ रोहणा ग्राम के ५२ सत्याग्रही भी थे। तीन दिन बाद दिल्ली से सूचना आई कि सत्याग्रह के विषय में सरकार समझौता करना चाहती है अतः आचार्य जी को फिरोजपुर से दिल्ली बुलाया गया। इनके साथ दरयावसिंह आर्य रोहणा और ब्रह्मचारी दयानन्द कितलाना भी गये। दिल्ली जाकर पता लगा कि गोरक्षा की सफलता हेतु कोई समझौता न होकर केवल राजनीतिक दृष्टि से लाभ उठाने के लिए तत्कालीन जनसंघ के नेताओं ने गोरक्षा आन्दोलन के सूत्रधार चारों शंकराचार्य , स्वामी करपात्री , जैनमुनि सुशील कुमार आदि को झांसा देकर प्रभुदत्त ब्रह्मचारी और शंकराचार्य का अनशन तुड़वाया क्योंकि १९६७ के चुनाव निकट थे अत: गोरक्षा के कारण जनमत को कांग्रेस के विरुद्ध हुआ जानकर जनसंघ ने सत्ता प्राप्त करने का अवसर ढूंढा। सरसंघ चालक गुरु गोलवलकर को बीच में डालकर यह दांव खेला गया। गोरक्षा आन्दोलन के प्राण आचार्य भगवान्देव जी और प्रोफेसर रामसिंह इस चाल को समझ गये और उन्होंने समझौता करने से निषेध कर दिया। परन्तु जनसंघ के नेताओं को चुनाव की जल्दी थी , इसलिए जनता से विश्वासघात करके सत्याग्रह बन्द कर दिया और ये बलिदान तथा पुलिस के अत्याचार सहने वाले लोगों का तप , त्याग सब व्यर्थ होगया। 

            एक मास पश्चात् जब फिरोजपुर जेल से गुरुकुल के अध्यापक और ब्रह्मचारी छूटने थे तब श्री योगानंद शास्त्री और श्री बलवानसिंह इंजीनियर ( झाड़ली ) इनके पास फिरोजपुर गये और इन्हें लेकर भगतसिंह आदि के समाधि स्थल दिखाने ले गये। वहां उस स्थल की दुर्दशा देखकर सभी को कष्ट हुआ कि जिन वीरों ने देश की स्वतन्त्रता हेतु बलिदान दिया उनका समाधि स्थल उजाड़ जैसा पड़ा हो उनके फोटो फटे हुए हों। वहां कोई दार्शनीय स्थल जैसा कुछ नहीं था। अत: योगानन्द शास्त्री ने ज्ञानी जैलसिंह को पत्र लिखकर प्रार्थना की कि ऐसे वीरों की यादगार को भव्य रूप दिया जाना चाहिए। फलतः इस विषय में सरकार ने पूरा ध्यान दिया और अब वह स्थान अत्यन्त भव्य और दार्शनीय हो गया है।

नीचे फोटो में श्री आचार्य भगवान देव जी (स्वामी ओमानन्द जी) एवं महाशय रामपत वानप्रस्थी जी आसन्न वाले हैं।