Thursday, June 24, 2021

ऋषि दयानंद के अनन्य भक्त चौधरी चरण सिंह जी


ऋषि दयानंद के अनन्य भक्त 
चौधरी चरण सिंह जी 
जब उन्होनें आर्यसमाज के सिद्धांत की लाज रखी 

         जब चौधरीचरण सिंह ने आर्यसमाज के सिद्धान्त की लाज रखो घटना उस समय की है जब भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति स्वानामधन्य घनश्याम दास बिड़ला का देहावसान हो गया था और दिल्ली नाग एक परिषद् ने उनकी स्मृति में एक शोक सभा का आयोजन पिक्की हाल , नई दिल्ली में किया था। 

          इस अवसर पर कुछ वक्ता थे सर्वजी अटल बिहारी वाजपेयी , डा० कर्णसिंह , कंवल लाल गुप्त , हेमवती नन्दन बहुगुणा तथा बलराज मधोक। संचालक महोदय ने सभी वक्ताओं से एक - एक करके सभी वक्ताओं से कहा कि वे स्वर्गीय बिड़ला जी की मूर्ति पर माल्यार्पण करें , सभी ने एक - एक करके उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण किया। 

         जब चौधरी चरण सिंह से माल्यार्पण हेतु कहा गया तो उन्होंने मूर्ति पर माल्यार्पण नहीं किया। हाल में बैठे हुए कुछ श्रोतागणों ने कहा कि देखो ये चौधरी भी कितना घमण्डी है। मैं भी इन्हीं श्रोताओं के बीच में बैठा हुआ था और मैं चौधरी साहब के प्रति ऐसे विचार नहीं सुन सका। मैंने उन व्यक्तियों से कहा कि चौधरी साहब ने घमण्ड के कारण नहीं , बल्कि आर्य विचारधारा से सम्बन्धित होने के कारण बिड़ला जी की मूर्ति पर माल्यार्पण नहीं किया। आर्य समाज इसे वेद विरुद्ध मानता है। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ और सभी नेतागण हाल से बाहर आ गये तब मैंने चुप चाप एक स्लिप पर यह लिखा- " आदरणीय चौधरी साहब , मैं समस्त आर्य जनों की ओर से आपका अभिनन्दन करता हूं क्योंकि आपने आर्य समाज के सिद्धान्त की रक्षा की है। " यह लिख कर वह चिट मैंने चुपचाप चौधरी साहब को देकर एक किनारे खड़ा हो गया। चौधरी साहब ने उस चिट को पढ़ कर खड़े हुए लोगों से पूछा कि मामचन्द रिवारिया कौन से हैं ? मेरा नाम सुन कर श्री बलराज मधोक ने कहा कि मामचन्द रिवारिया तो ये खड़े हैं। 

         तब चौधरी साहब ने कहा कि इतनी बड़ी भीड़ में एक ने तो मेरे आर्य होने की प्रशंसा की। उन्होंने मेरा धन्यवाद किया और उस चिट को अपनी जेब में रख लिया। आज भी मैं उस घटना का याद कर रोमांचित हो उठता हूं। सच्चा स्वामी दयानन्द का भक्त वहीं जो किसी भी कीमत पर सिद्धान्तों से समझौता नहीं करता है। संसार में उन्हीं महापुरुषों की परमगाथा को गाया जाता है जो सिद्धान्तों पर चट्टान की तरह अडिग रहते हैं। 

-मामचन्द्र रिवारिया

Wednesday, June 23, 2021

हैदराबाद सत्याग्रह बलिदानी सुनहरा सिंह आर्य


हैदराबाद सत्याग्रह के वीर बलिदानी #सुनहरा_सिंह_जी_आर्य 
(बुटाना, सोनीपत) 8 जून 1939

उसे तेज बुखार थी, शरीर में विष फैला हुआ था,जेल में उसे लाठियों से पीटा गया लेकिन वह अंतिम सांस तक भारत माता और सनातन धर्म के जयकारे लगाता रहा-----

 सुनहरा #हरियाणा के सोनीपत जिले में बुटाना गांव का एक गाभरु नौजवान था। वह हंसमुख, स्वस्थ और सुंदर एवं बलिष्ठ शरीर का धनी था। वह मल्ल युद्ध(कुश्ती) का शौकीन अपने माता पिता का एकमात्र पुत्र था। वह बहुत धार्मिक एवं देशभक्त था।

    सुनहरा सिंह जी का जन्म जिला #सोनीपत के गांव #बुटाना में एक कुलीन #जाट परिवार में चौधरी जगराम सिंह जी के घर हुआ था। पिता जी सम्पन्न थे। माता के बाल्याकाल में ही देहान्त हो जाने पर पिता ने अपना समस्त स्नेह इन पर उडेल दिया। लालन पालन बड़े प्रेम से होने के एवं घर के एकमात्र लाडले चिराग होने के कारण इन्हें पाठशाला में बैठाने की बजाय घर पर ही हिंदी भाषा की योग्यता प्राप्त की। 

  1938-39 में अंग्रेजों का अत्याचार चरम सीमा पर था। हैदराबाद के निजाम से सांठ गांठ करके हिंदुओं की पूजा अर्चना पर रोक लगा दी थी। तब आर्य समाज ने सरकार व निजाम के विरुद्ध सत्याग्रह छेड़ दिया था। इस घड़ी में धर्मभक्त सुनहरा कैसे पीछे रह सकते थे वे भी भारत माता और सनातन धर्म के जयकारे लगाते हुए आंदोलन में कूद पड़े। उस समय इनके गौने के दिन निश्चित हो चुके थे। ये उससे पहले ही सत्याग्रही जत्थे में भर्ती होकर हैदराबाद के लिए तैयार हो गये। कई सम्बन्धियो ने एकलौता पुत्र होने के कारण रोकना चाहा पर देशभक्ति से ओत प्रोत सुनहरा ने किसी की एक न सुनी। है हमेशा अपने विचारो पर दृढ़ रहते थे। जो निश्चय किया उस पर वह पूरा करके ही दम लेते थे।
 श्री महाशय कृष्ण जी के साथ 5 जून को इन्होंने औरंगाबाद में सत्याग्रह किया और सत्याग्रह से डरकर  सरकार ने इन्हें व इनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया। जेल में इन्हें तेज बुखार हो गया और उस बुखार ने शीघ्र ही भयानक रुप धारण कर लिया था। उनकी बगल में एक फोड़ा भी निकल आया। ज्वर 105° डिग्री तक पहुंच चूका था। और उनकी इस स्तिथि में  उन्हें खाना तक न दिया गया 30 घण्टे बाद मात्र ज्वार की आधी रोटी दी गयी और उनके शरीर पर लाठियों से अनेकों प्रहार किए गए अनेक यातनाएं दी गई लेकिन वे यह सब सहते हुए भी सनातन धर्म और भारत माता के जयकारे लगाते रहे। बाद में लोक दिखावे के लिए इन्हें सिविल अस्पताल भेजा गया। सरकार ने अपनी निर्दयता छिपाते हुए बताया कि फोड़े का विष शरीर में फैल गया और उनको सन्निपात हो गया और रोग दानवी गति से बढ़ गया। अस्पताल में 8 जून 1939 को सुबह 7 बजे सुनहरा सिंह जी देश व धर्म हेतु वीरगति को प्राप्त हो गए। महाशय कृष्ण जी तथा अन्य सत्याग्रहियों को उनकी मृत्यु की सूचना कई घण्टो बाद दी गई। 

  माननीय श्री अणे ने औरंगाबाद जेल में हुए लाठी चार्ज पर वक्तव्य देते हुए लिखा था कि - 5 जून को महाशय कृष्ण के साथ 700 सत्याग्रही गिरफ्तार हुए थे। इतने व्यक्तियों के एकाएक आ पहुंचने से जेल के अधिकारी घबरा गये और उनके लिए रहन सहन और भोजन की व्यवस्था का करना कठिन हो गया।  गिरफ्तार हो जाने के 30 घण्टे के बाद उनको ज्वार कि सिर्फ आधी रोटी दी गई। इसके विरुद्ध असन्तोष होना स्वभाविक था। असन्तोष फैला तो जेलर ने मुंह बन्द करना चाहा। उसे सफलता नहीं मिली। इस पर वह झल्ला उठा। उसने पुलिस को लाठी चलाने की आज्ञा दी। पुलिस ने हाथ खोलकर लाठियां चलाई और बाद में घायलों को घसीट कर कोठरी में बन्द कर दिया। 
   इसके आगे लिखते हैं हैदराबाद सरकार को कुछ सलाह देते हुए लिखते हैं - कि मैने देखा के - श्री सुनहरा जी की मृत्यु बड़ी सन्दिग्ध अवस्था में हुई है। उनके शव पर गम्भीर चोटों के चिन्ह थे।

     जिस समय नगर औरंगाबाद में सुनहरा की मृत्यु का पता लगा तब बहुत से प्रतिष्ठित पुरुष वहां पहुंच गए। उनकी इच्छा थी कि हम शव को शहर में से ले जाएगें। कर्मचारी इससे सहमत न थे। अन्त में यह समझोता हुआ कि जिस मार्ग से कर्मचारी चाहते हैं महाशय कृष्ण और सत्याग्रही उसी मार्ग से शव को श्मशान भूमि में ले जायें।  नगर निवासी पुन: अन्तिम दर्शन के लिए श्मशान भूमि में आये।  ऐसा ही किया गया। श्मशान भूमि के सहस्त्रों नगर निवासी उस वीरात्मा की अंत्येष्टि में उपस्थित हुए। सुनहरा के शव को विभावसु की शिखाओं को भेंट करके सत्याग्रही अपने साथी के भाग्य के साथ ईर्ष्या करते हुए जेल वापिस आ गये। हुतात्मा श्री सुनहरा को शत शत नमन।

आज इन्हें और कहीं तो छोड़िए इनके गांव तक में कोई न जानता। न ही इनका कोई स्मारक है। हमें शर्म आनी चाहिए बलिदानियों के कर्ज को खाते हुए उन्हें स्मरण भी न करते।

प्रस्तुतकर्ता- अमित सिवहा, चौधरी जयदीप सिंह नैन

पंजाब का हिन्दी रक्षा आंदोलन - श्री स्वामी भीष्म जी का सत्याग्रह


पंजाब का हिन्दी रक्षा आंदोलन 
श्री स्वामी भीष्म जी का सत्याग्रह 

 प्रस्तुति :- श्री सहदेव समर्पित 

                 स्वामी रामेश्वरानंद जी की गिरफ्तारी के पश्चात् हरयाणे की आर्य जनता उग्र हो उठी। आचार्य भगवानदेव जी दक्षिण ओर मध्य हरयाणे की कमान संभाली तथा श्री स्वामी भीष्म जी महाराज ने जीटी रोड़ बेल्ट तथा उत्तरी हरयाणे की, आन्दोलन में स्वामी जी ने बढ़ चढ़ कर भाग हुआ लिया। स्वामी जी अपने जत्थे का नेतृत्व करते अम्बाला से दिल्ली चले। पानीपत में जत्था पहुंचा तो दो पुलिसकर्मी स्वामी जी को पकड़ने के लिए आगे बढ़े, स्वामी जी जवानी में जाने माने पहलवान रहे, स्वामी जी ने दांव लगाकर उन दोनों की गर्दन को दबोच लिया। पुलिसकर्मियों की सांसे फुलने लगी। अन्य सत्याग्रहियों के कहने पर स्वामी जी ने उनको छोड़ा। 

              वहां से चण्डीगढ़ पहुंच कर आर्य समाज मन्दिर में पहुंचे। वहां भोजन इत्यादि किया। वहीं पर पता लगा कि 3 बजे मोर्चा लगेगा। 3 बजे स्वामी जी सचिवालय के सामने डट गये। स्वामी जी के जत्थे में स्वामी जी के साथ 126 व्यक्ति थे। वहीं पर लाला जगत नारायण भी खड़े थे उन के साथ 10-11 व्यक्ति थे। सिपाहियों ने लाठियों से घेरा बना रखा था। वे किसी को अन्दर घुसने नहीं देते थे। जब स्वामी जी ने लाला जगत नारायण से पूछा कि क्या आप इस घेरे को तोड़ेगें तो लाला जगत नारायण ने यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि हम तो गान्धी जी के शिष्य हैं , तोड़ फोड़ में विश्वास नहीं करते। 

          स्वामी जी ने , अपने तीन पहलवान साथियों सहित , धक्का मार कर सिपाहियों की पंक्ति तोड़ डाली। आगे भी सिपाहियों की पंक्ति लगी थी। स्वामी जी को पुलिस कप्तान ने पीछे से पकड़ लिया। किन्तु स्वामी जी के आगे उसकी एक न चली। स्वामी जी ने झटका देकर उसे अलग कर दिया। इसी कार्यक्रम में उसका टोप पास पड़े पानी में जा पड़ा। इससे वह कप्तान बड़ा लज्जित हुआ। स्वामी जी को पकड़ने का आदेश देकर एक तरफ चला गया। जो थानेदार स्वामी जी को पकड़ने आया वह स्वामी जी का बचपन में शिष्य था। वह बोला कि स्वामी जी यदि पापको पकड़ता हूं तो बड़ी कृतघ्नता होगी यदि नहीं पकड़ता तो नौकरी को खतरा है। आप इस समस्या का हल करें। स्वामी जी बोले कि तू ही बता। तब उसने कहा कि आप को गाड़ी में बिठा कर कहीं पास ही छोड़ आएंगे। उस थानेदार पर रहम खा कर स्वामी जी ने यह बात मान ली। गाड़ी में साथियों सहित बैठ गये। एक अन्य थानेदार चार सिपाही आदि लेकर चला। 

           वर्षा हो रही थी चण्डीगढ़ से 30-32 कि० मीटर आने पर थाने दार ( अन्य ) बोला कि स्वामी जी बड़ी देर हो गई आप को बैठे - बैठे , उतर कर पेशाब आदि कर लो। स्वामी जी बोले - कि मुझे पता है तुम हमें नीचे उतार कर भाग जाओगे हम यहां धक्के खाते रहेंगे , हम नीचे नहीं उतरते। एक नौजवान , नातजुबें कार इंस्पैक्टर बोला कि फिर हम नीचे उतारेंगे , अगर खुद नहीं उतरोगे तो। स्वामी जी बोले कि आ जा , यदि तू मुझे उतार दे तो सब स्वयंमेव उतर जायेंगे। थानेदार बोला कि स्वामी जी , कुछ तो समाधान करो , इस बात का। स्वामी जी बोले , वापिस ले चल। चण्डीगढ़ से 1 कि.मी. बाहर छोड़ देना। इस बात पर सहमति हो गई , किन्तु यह शर्त रखी गई कि नारेबाजी नहीं की जाएगी। वापिस लाकर एक कि० मीटर के पत्थर पर उतार दिये गये। जत्थे के साथियों ने खूब नारे लगाये। पुनः आर्यसमाज के मन्दिर में आकर खाना आदि खाया। अगले दिन फिर सत्याग्रह किया। 

           फिर स्वामी जी को हवालात में बन्द कर दिया गया किन्तु तीन दिन बाद उन्हें छोड़ दिया गया। अब स्वामी जी सिकन्दराबाद की ओर प्रचार हेतु चले गये। यहां उन्हें पता चला कि उनकी गिरफ्तारी का वारन्ट निकल गया है। उन्होंने सोचा कि लोग कहेंगे कि वारन्ट के डर से भाग रहा है। यह सोच स्वामी जी वापिस घरोण्डा आ गये। घरौण्डे के थानेदार स्वामी जी को थाने ले आये वहां से उन्हें नाभा ( पंजाब ) जेल में भेज दिया गया। उन्हें ' बी ' क्लास में रखा गया। स्वामी जी का प्रबन्ध अलग से कर दिया गया क्योंकि बैरक में लोग बीड़ी सिगरेट इत्यादि पीते थे। 

            रोज हवन यज्ञ होता , उपदेश होता। स्वामी जी अपने भजनों के क्रान्तिकारी विचार लोगों को देते। जेल में स्वामी जो अन्य सत्याग्रहियों के साथ हवन यज्ञ किया करते थे किन्तु एक व्यक्ति जिसका नाम ' तपस्वी ' था यज्ञ के समय , शोर करके विघ्न डाला करता था। एक दिन स्वामी जी को बड़ा गुस्सा आया। उन्होंने उसे उठा कर भट्ठी में डालने की सोची। ऐसा करते देख बलराम जी दास टण्डन ने उसे बचाया। फिर कभी उसने शोर नहीं किया। जब सब लोग जेल से छूट रहे थे , तो स्वामी जी ने सोचा कि यह जो कम्बल , जुराब आदि जेल से मिला है , इसे अपने साथ लेकर जाना है। जब जेल के दरवाजे पर पहुंचे , तो पुलिस कर्मचारी कपड़े वापिस ले रहा था। स्वामी जी ने ' न ' कर दी। सब सिपाहियों को पता था कि बाबा क्रान्तिकारी है , बगावत कर देगा। जब दो बार कहने पर भी नहीं दिया और स्वामी जी बोले कि - अरे मुर्दे पर भी कफ़न डाल देते हैं , तुम इस ठण्ड में कपड़े लेकर मुझे मारोगे। आदमी हो कि कसाई। 

         चण्डीगढ़ हैड क्वार्टर पर टेलीफोन किया गया। पता लगा कि रसीद पर हस्ताक्षर करवा कर दे दो तथा जाने दो। इस चक्कर में 5 घण्टे लग गये। स्वामी जी ने देखा कि बाहर अन्धेरा है। स्टेशन अढ़ाई मील दूर है पैदल ठण्ड में जाना कठिन है। स्वामी जी फिर अड़ गये। स्वामी जी बोले कि पहले हमारे लिए तांगा मंगवाओ तब जायेंगे। जेलर बोला कि बाहर बेंच पड़ी है , उन पर बैठ जाओ। स्वामी जी ने सोचा कि यदि गेट पर हम चले गये तो ये पूछेगे भी नहीं , फिर पैदल जाना पड़ेगा। इन्होंने साफ इन्कार कर दिया। तंग होकर तांगा मंगवाया गया , तब स्वामी जी अपने साथियों सहित स्टेशन पर आए।

      हिन्दी सत्याग्रह, हैदराबाद सत्याग्रह की तरह आर्यसमाज का सफल सत्याग्रह रहा। आर्यसमाज का प्रचार ओर अत्यधिक हुआ।

Monday, June 21, 2021

पंजाब का हिन्दी रक्षा आन्दोलन - गुरुकुल झज्जर का महातप


पंजाब का हिन्दी रक्षा आन्दोलन 
गुरुकुल झज्जर का महा तप 

लेखक :- डॉ रघुवीर वेदालंकार 
         श्री विरजानंद देैवकरणि जी 
प्रस्तुति :- अमित सिवाहा 

              आचार्य भगवान्देव जी आर्यप्रतिनिधि सभा पंजाब के उपप्रधान एवं कार्यकर्ता प्रधान भी थे। ऐसी परिस्थिति में हिन्दी आन्दोलन को हरयाणा से चलाने का उत्तरदायित्व भी इन्हीं पर आ गया। इसी कार्य में तीव्रता लाने के लिए २८ जुलाई १८५७ को रोहतक में हिन्दी आन्दोलन के विषय में बृहत् सम्मेलन हुआ। उस सम्मेलन के पश्चात् आर्यसमाज के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी की सम्भावना थी अतः श्री जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती तो दिल्ली चले गये। आचार्य भगवान्देव जी वैद्य बलवन्तसिंह जी की मोटर साईकल पर बैठकर सायंकाल बोहर से पूर्व बांई ओर पीपल के पेड़ के नीचे एक कोटड़ा बना हुआ है उसकी छत पर दोनों ने रात व्यतीत की। 

        प्रात: काल आचार्य जी रोहणा गांव में श्री दरियावसिंह जी के पास गये। वहां आचार्य जी को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस पहुंच गई। आचार्य जी पीछे के दरवाजे से मोटर साईकल पर बैठकर निकल गये। वहां से चौ० हीरासिंह जी के पास मुखमेलपुर ( दिल्ली ) गये। कुछ दिन पश्चात् जमना के खादर के खेतों में बनी झोंपड़ियों में रहे। वहां पतला ग्राम निवासी फूलसिंह जी उनके पास भोजन , समाचारपत्र आदि पहुंचाते थे। वहां भी गिरफ्तारी की शंका हुई तो आचार्य जी मेरठ जिले की टटीरी मंडी आदि होते हुए साईकल पर ही मुजफ्फरनगर के निकट रसूलपुर जट्ट गांव में चौ० आशाराम के घर पर गये और वहां से सत्याग्रह का संचालन किया। वहां ब्र० वेदपाल शास्त्री ने आचार्य जी की सेवा और सुरक्षा की थी। अकेले हरयाणा से ही ५० हजार सत्याग्रही इस आन्दोलन में भेजे थे। यद्यपि सत्याग्रह का केन्द्र चण्डीगढ़ था किन्तु हरयाणावासियों के प्रबल उत्साह को देखते हुए दयानन्द मठ रोहतक में भी इसका एक केन्द्र खोल दिया गया था।३० जुलाई १९५७ को रोहतक के जिलाधीश सरदार लालसिंह की कोठी पर सात जत्थों द्वारा सत्याग्रह का दूसरा मोर्चा खुल गया। 

       इन जत्थों का नेतृत्व विधान सभा के सदस्य डॉ० मंगल आचार्य शिवकरण , चौधरी रामकला , श्री रामनारायण बी० ए० , ची भरतसिंह , मास्टर बीरबल , चौधरी ज्ञानसिंह ने किया। सत्याग्रहियों के साथ २० हजार के लगभग अन्य जनता भी थी। पुलिस थोड़ी थी , अत : भीड़ पर नियन्त्रण न कर सकी। पुलिस के लाठी प्रहार से सात सत्याग्रही सख्त घायल हो गये। इस द्वितीय मोर्चे के उद्घाटन से पूर्व एक विराट सभा २८ जुलाई १९५७ को अनाज मण्डी रोहतक में हुई , जिसमें हरयाणा के सभी प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उसी दिन स्वामी रामेश्वरानन्द जी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। स्वामी जी की गिरफ्तारी से जनता में बड़े जोश और रोष की लहर विजली की तरह दौड़ गई। 

       अत: चण्डीगढ़ और रोहतक के मोचें को तन मन धन से सर्वप्रकारेण सफल बनाने की तैयारियां प्रारम्भ कर दी गई। अब प्रतिदिन हजारों की संख्या में सत्याग्रही रोहतक जाकर सत्याग्रह करते थे। " हिन्दी भाषा अमर रहे " " देश का बच्चा बच्चा होगा , हिन्दी भाषा पर बलिदान " " कैरोंशाही नहीं चलेगी " इत्यादि भांति भांति के नारे जिस जोश के साथ लगाए जाते थे वह दृश्य तो वास्तव में स्वयं दर्शनीय होता था। उसको देखकर सभी व्यक्ति यह कहते थे कि हरयाणा वाले पंजाबी को बलपूर्वक कभी नहीं पढ़ेंगे। ६ अगस्त १९५७ को झज्जर में मध्याह्न १२ बजे पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री चौ० सूरजमल जी आर रणवीरसिंह जी हुड्डा एम.पी. पधारे। तहसील में उन्होंने ग्रामों के पंच और सरपंचों को बुलाया। जनता को प्रोग्राम का ठीक - ठीक पता भी न दिया गया । फिर भी पर्याप्त जनता वहां पहुंच गई। जब चौधरी रणवीरसिंह जी हिन्दी के विरुद्ध में बोलने लगे तब उनको काले झंडे दिखाये गये और भाषण भी ठीक नहीं होने दिया। इसी प्रकार चौधरी सूरजमल ने भी हिन्दी भाषा के विपरीत बोलना प्रारम्भ किया। 

         तब उनको भी काले झण्डे दिखाये गये तथा " हिन्दी भाषा अमर रहे ' " " देश का बच्चा - बच्चा होगा हिन्दी भाषा पर बलिदान " " सूरजमल गद्दी के लिए डूब गया " इत्यादि नारे उच्च स्वर से लगाये गये और तालियाँ पीटकर लोग चल पड़े। जब चलते समय चौधरी सूरजमल अपनी कार में जाकर बैठे तब कार के अन्दर उनके सिर के ऊपर भी एक काला झण्डा लहरा कर " हिन्दी भाषा अमर रहे ' ' का नारा लगाया। इस विरोध प्रदर्शन में गुरुकुल का सक्रिय योगदान था। फतेहसिंह भण्डारी तथा वेदव्रत आदि अनेक गुरुकुलीय लोग वहां सक्रिय थे। उन्होंने माइक का तार भी काट दिया था। इस सत्याग्रह के कारण चौ० सूरजमल ने अपनी मानसिक व्यथा एक बार इस प्रकार व्यक्त की मुझे बुढ़ापे में वजारत मिली थी , इस पर यह ' हिन्दगी ' आगे अड़ गई। इसके पश्चात् चौधरी सूरजमल बोहर ( रोहतक ) आयुर्वेद विद्यालय में गये। वहाँ भी इसी भांति काले झण्डों से स्वागत किया गया। एक और विशेष घटना घटी - चौधरी रणवीरसिंह हुड्डा एम० पी० जनता के भय के कारण अपना आसन छोड़कर खिड़की से भाग निकले , इस पर भी जनता ने उनका पीछा किया। २६ अगस्त १९५७ को पंजाब के निर्माण मंत्री राव वीरेन्द्रसिंह सिलानी ग्राम में पधारे । जब उन्होंने हिन्दी रक्षा आन्दोलन के विरुद्ध विष वमन प्रारम्भ किया और जाति के आधार पर फूट डालने का प्रयत्न किया , तब ग्रामीण जनता ने उनको काले झण्डे दिखलाये और हिन्दी भाषा अमर रहे आदि नारे लगाये। गुरुकुल झज्जर इस आन्दोलन से अछूता कैसे रह सकता था। 

         गुरुकुल झज्जर तथा कन्या गुरुकुल नरेला दोनों ने इस आन्दोलन में अपने जत्थे भेजे। अन्याय की यह पराकाष्ठा थी कि इस आन्दोलन में भाग लेने के कारण कन्या गुरुकुल नरेला की भूमि भी सरकार ने जब्त कर ली थी। आचार्य जी की पैत्रिक सम्पत्ति पर भी १२ अगस्त १९५७ को जब्त करने का नोटिस लगा दिया गया तथा इनकी गिरफ्तारी के वारंट जारी कर दिये गये। आचार्य भगवान्देव जी हरयाणा में हिन्दी आन्दोलन के प्राण ही थे। उन्होंने इन धमकियों की कुछ परवाह नहीं की। आन्दोलन में कूदने के कारण आपने गुरुकुल झज्जर के आचार्य पद से लिखित त्याग पत्र देकर रात दिन अपने आपको आन्दोलन के अर्पित कर दिया। इनके स्थान पर वेदव्रत जी को कुछ समय के लिए आचार्य बना दिया गया तथा गुरुकुल की विद्यार्यसभा के प्रधान कप्तान रामकला जी बने। आचार्य जी को इस आन्दोलन में रातदिन अथक परिश्रम करना पड़ा। अनेक दिनों तक भूमिगत भी रहना पड़ा तथा लम्बी लम्बी यात्राएं भी करनी पड़ी जिस कारण आपका स्वास्थ्य भी बिगड़ गया। 

            आचार्य जी का व्रत गोघृत तथा गोदुग्ध सेवन करने का एवं नमक , मिर्च , मीठे के बिना भोजन करने का था। आन्दोलन के दिनों में भागते दौड़ते रहने के कारण खान - पान की समुचित व्यवस्था न हो सकने के कारण स्वास्थ्य खराब होना स्वाभाविक ही था। भूमिगत अवस्था में आचार्य जी उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रसूलपुर जाटान नामक ग्राम में छिप कर रहे। वहां उड़द की दाल खाने के कारण आपका पेट खराब हो गया। उड़द की दाल पश्चिमी उत्तरप्रदेश को प्रिय दालों में से है। यह पौष्टिक भी है। अतिथि के लिए उड़द की दाल तथा चावल बनाना उसके स्वागत के लिए विशेष भोजन माना जाता है। रसूलपुर में भी गृह स्वामिनी माता जी आदर सत्कार के कारण ही आचार्य जी को लगातार उड़द की दाल खिलाती रही। 

         आचार्य जी हरी सब्जी तथा मूंग की दाल के अभ्यासी थे , अत : पेट खराब होना स्वाभाविक ही था । यहां आचार्य जी गुप्त रूप में रह कर सत्याग्रह का संचालन रहे थे। पंजाब सरकार उनको गिरफ्तार करना चाहती थी । समाचार पत्रों में घोषणा कर दी गयी थी कि आचार्य भगवान्देव को पकड़ कर लाने वाले को पचास हजार रुपये ईनाम में दिये जायेंगे। इतने पर भी पंजाब सरकार आचार्य जी को पकड़ नहीं सकी। आचार्य जी की अनुपस्थिति में भी गुरुकुल से हिन्दी रक्षा सत्याग्रह के लिए जत्थे जाते रहे। ११ अक्तूबर १९५७ को ११ व्यक्तियों का जत्था गुरुकुल से गया। इसके बाद भी लगातार जत्थे जाते रहे। इस सत्याग्रह में गुरुकुल के सभी ब्रह्मचारियों तथा कर्मचारियों ने भाग लिया। 

         बीस अक्तूबर १९५७ को झज्जर नगर का थानेदार बलायाराम गुरुकुल में आचार्य जी को निगृहीत करने आया। आचार्य जी इन दिनों रसूलपुर जाटान गये थे। अत : थानेदार को खाली हाथ वापस आना पड़ा। वह इक्कीस तारीख को पुनः आया। उसे आशंका थी कि आचार्य जी कहीं पास में ही छिपे हुए होंगे तो पकड़ में आ जायेंगे। उसे दोबारा भी असफलता मिली तथा ' लौटकर बुद्धू घर को आए ' के अनुसार उसे पुनः खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। आचार्य जी के रसूलपुर जाटान प्रवास के दिनों में वेदव्रत जी उनसे मिलने रसूलपुर गये तथा वहां जाकर आचार्य जी से जत्थे भेजने के विषय में परामर्श किया। किसी न किसी भांति वेदव्रत जी रसूलपुर पहुंच तो गये किन्तु वापस गुरुकुल आने में पर्याप्त परिश्रम करना पड़ा। इसके लिए वे मुजफ्फरनगर से दिल्ली तक रेलगाड़ी द्वारा पहुंचे। दिल्ली स्टेशन से सराय रोहिल्ला साईकिल द्वारा गये। इस प्रकार चलने से विलम्ब हो गया था। 

       फलत: ट्रेन या बस आदि कोई भी साधन आगे जाने के लिए न मिल सकने के कारण सराय रोकि से ट्रक में बैठकर बहादुरगढ़ पहुंचे। यहां पहुंचने तक तो पर्याप्त विलम्ब हो चुका था अत: यहां से आगे गुरु जाने के लिए कोई भी साधन उपलब्ध न था। ' त्याज्यं न धैर्य विधुरेऽपि काले ' के अनुसार वेद्रवत जी हार न मानी तथा रात्री में ही गुरुकुल के लिए पैदल चल दिये। २० मील की यात्रा करने के पश्चात् ११ को गुरुकुल में पहुंचे। ग्यारह अक्तूबर १ ९ ५७ को गुरुकुल का जत्था सत्याग्रह के लिए प्रस्थान कर ही चुका था। जत्थे की झज्जर कस्बे में प्रवेश करते ही पकड़ लिया गया जिसे पहले झज्जर हवालात में रखकर बाद में रोहतक जेल भेज दिया गया। पूर्वचर्चित थानेदार महाशय गुरुकुल में २३ अक्तूबर को पुनः आए। जत्थे के विषय में वेदव्रत जो से सामान्य पूछताछ की किन्तु इस बार भी आचार्य जी को यहां न पाकर निराश होकर वापस लौट गया। वेदव्रत जो रोहतक जेल में बन्द जत्थे से निरन्तर सम्पर्क बनाए हुए थे तथा २८ अक्तूबर १९५७ को वे जेल में जत्थे के लिए आवश्यक वस्तुएं दे आए। थानेदार ने अपना उद्यम नहीं छोड़ा , उसने सात नवम्बर १९५७ को गुरुकुल में हैड कांस्टेबल तथा कुछ सिपाही पुनः भेजे। इस बार थानेदार स्वयं नहीं आया। इन सब का प्रयोजन तो आचार्य जी के विषय में पूछताछ करना था। पूछने पर कोई भी उत्तर अपने पक्ष में न पाकर ये भी खाल्ली हाथ , निराश वापस लौट गये। 

       १९ अक्तूबर १९५७ को वेदव्रत जी आचार्य जी मिलने के लिए रसूलपुर जट्ट ( उत्तरप्रदेश ) गये थे तब आचार्य जी का स्वास्थ्य ठीक था। १० नवम्बर को विद्यार्य सभा की बैठक गुरुकुल झज्जर में हुई। उसमें ज्ञात हुआ कि आचार्य जी बीमार होगये हैं। ११ नवम्बर को प्रातःकाल ६ बजे गुरुकुल झज्जर से चलकर वेदव्रत जी बस द्वारा सायंकाल आचार्य जी के पास पहुंचे। आचार्य जी ने बताया कि हलका ज्वर और दमे की शिकायत होगई है। सर्दी का मौसम है। तर इलाका है , ऊपर से उड़द की दाल में घी डालकर भोजन में दे देते हैं। किसी शुष्क स्थान पर जाने से स्वास्थ्य सुधर सकता है। वेदव्रत जी ने कहा कि मेरी जन्मभूमि घासीकाबास झुंझनूं ( राजस्थान ) सब से बढ़िया शुष्क और सुरक्षित स्थान है। वहां चलो। आचार्य जी सहमत होगये। किन्तु राजस्थान जाने के लिए देहली और रेवाड़ी में पकड़े जाने की सम्भावना। पंजाब सरकार आचार्य जी को जीवित या मृत किसी भी रूप में पकड़ना चाहती थी। गिरफ्तारी से बचने के लिए लम्बा रास्ता चुना। १२ नवम्बर को रसूलपुर से शाहपुर , मुजफ्फरनगर , मेरठ , हाथरस , मथुरा , भरतपुर , बांदीकुई होते हुए १३ को रात्रि में जयपुर पहुंचे। १४ तारीख को प्रातःकाल जयपुर से वापस सीकर , झुंझनू होते हुए नारी खेतड़ी रेलवे स्टेशन पर उतरकर पैदल ही घासीकाबास ( अजीतपुरा ) पहुंच गये। वहां सत्याग्रह की समाप्ति ( २८ दिसम्बर १ ९ ५७ ) तक पुराने साथी बृजलाल आर्य के खेत के कुएं पर रहे। उसी ने सेवा और सुरक्षा की। सत्याग्रह समाप्ति पर उसी दिन गुरुकुल के ब्रह्मचारियों का जत्था रोहतक जेल से वापिस गुरुकुल पहुंचा। उसी दिन वेदव्रत जी आचार्य जी को अपने घर से वापिस लेने के लिए गये। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रतापसिंह कैरों ने भड़काऊ भाषण के आरोप लगवाकर १९५८ में सत्याग्रह समाप्ति के पश्चात् आचार्य जी को गिरफ्तार करवाकर जेल में डलवाया था। प्रतापसिंह कैरों और आचार्य भगवान्देव सैंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली में एक साथ पढ़े थे। दोनों का एक दूसरे के घर पर आना जाना भी था। सत्याग्रह का कार्य पूरे जोर के साथ चल रहा था। गुरुकुल वासी , हरयाणा निवासी तथा अन्य सभी हिन्दी प्रेमी सत्याग्रह को सफल बनाने में जुटे हुए थे। 

        कुछ हिन्दी भक्त सत्याग्रह करके गिरफ्तारियां दे रहे थे तो अन्य व्यक्ति जनता में प्रचार करके जन सामान्य में उत्साह का संचार कर रहे थे। सत्याग्रहियों का सत्याग्रह भी विभिन्न प्रकार का होता था। अधिकांश सत्याग्रही आर्यसमाजी होते थे अत: सत्याग्रह के दिनों में भी वे यज्ञ करना न भूलते थे। चण्डीगढ़ में चौधरी नौनन्दसिंह ( कलोई सुहरा ) ने सड़क के किनारे ही तम्बू लगाकर यज्ञ करना प्रारम्भ किया किन्तु सरदार प्रतापसिंह ' कैरो'ने तम्बू को उखड़वा दिया। पुनरपि चौधरी साहब ने अपना यज्ञ करके ही छोड़ा। 

          आन्दोलन अबाधगति से चलता रहा। हिन्दी प्रेमियों का उत्साह बढ़ता ही जा रहा था। गुरुकुलवासी भी हर प्रकार से इसमें अपनी आहुति देने में लगे हुए थे। एतदर्थ कुछ तो जत्थे बनाकर सत्याग्रह करते थे तथा शेष व्यक्ति जनता में घूमकर आन्दोलन के पक्ष में प्रचार कर रहे थे। सरकार प्रयास था कि सत्याग्रह असफल हो जाए। इसी उद्देश्य से सरकारी मन्त्री तथा अन्य व्यक्ति भी जगह - जगह आन्दोलन के विपक्ष में प्रचार कर रहे थे। इस सत्याग्रह में गुरुकुल के योगदान की चर्चा करते हुए डॉक्टर सत्यकेतु विद्यालंकार ने आर्यसमाज के इतिहास में लिखा है ' रोहतक जिले में गुरुकुल झज्जर आर्यसमाज की प्रमुख शिक्षण संस्था है। वहां के कितने ही ब्रह्मचारियों ने सत्याग्रह में भाग लिया। केवल ब्रह्मचारी ही नहीं अपितु वहां के कितने ही कर्मचारी भी हिन्दी की रक्षा के लिए जेल गये। 

          आन्दोलन अपना उग्ररूप धारण करता जा रहा था , इसके साथ ही सरकार का दमनचक्र भी तेज हो रहा था। फिरोजपुर जेल में सत्याग्रहियों पर योजनाबद्ध रूप से आक्रमण कराकर अनेक सत्याग्रहियों को इंडियां तोड़ दी गयी तथा अनेक वीरों को प्राणाहुति देनी पड़ी। रोहतक जिले के नयाबास ग्रामवासी युवक सत्याग्रही सुमेरसिंह का प्राणान्त भी इसी लाठीचार्ज में हुआ था। ८ नवम्बर १९५७ को जवाहरलाल नेहरू चण्डीगढ गये। वहां पहुंचकर उन्होंने विधानसभा में घोषणा की कि हिन्दीरक्षा समिति की ९० प्रतिशत मांगें मान ली गयी हैं और शेष १० प्रतिशत मांगों का आपसी बातचीत द्वारा निर्णय किया जा सकता है। गृहमंत्री पंडित गोविन्दवल्लभ पंत ने बातचीत के लिए भाषा स्वातन्त्र्य समिति के अध्यक्ष श्री घनश्यामसिंह गुप्त को बातचीत के लिए आमन्त्रित किया इसके परिणाम स्वरूप गुप्त जी ने गृहमंत्री के अनुरोध पर सत्याग्रह समाप्ति की घोषणा कर दी। इस प्रकार ६ मास तथा ८ दिन बाद सत्याग्रह समाप्त  हुआ।

पुनर्जन्म


पुनर्जन्म

-सहदेव समर्पित

1  सृष्टि के जड़ पदार्थों में भी पुनर्जन्म है। यथा- पानी गर्म होकर भाप बन जाता है। वह ऊपर जाकर बादल के रूप में बरसता हुआ पुनः पृथ्वी पर आ जाता है। अधिक शीतलता पाकर वही बर्फ का रूप ले लेता है। अर्थात् सृष्टि के आरम्भ से अब तक पानी की एक बूंद भी कम नहीं हुई है। वैज्ञानिकों का कथन है कि कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं होता, केवल स्वरूप बदल जाता है।
2   प्राणी का किसी भी योनी में जन्म लेने का आधार क्या है? क्योंकि सूअर, पशु, कीड़ा आदि कोई भी प्राणी स्वेच्छा से नहीं बनता। अर्थात् कोई अन्य सत्ता उसे ऐसा बनाती है। अन्य सत्ता भी स्वेच्छा से नहीं बनाती है, इसमें निश्चित रूप से आत्मा के पूर्वजन्म कृत कर्म ही कारण बनते हैं। क्योंकि बिना कारण कार्य नहीं होता।
3 पैदा होते ही प्राणी अपनी योग्यता के अनुसार क्रिया करता है। वह निश्चित रूप से उसके पूर्व अभ्यास का परिणाम है,क्योंकि इस जन्म में तो उसे किसी ने सिखाया नहीं होता। जैसे मनुष्य या पशु का बच्चा माँ के स्तन से दूद्द चूसता है।
4  प्रत्येक प्राणी मृत्यु से सदा भयभीत रहता है। इसका कारण यह है कि मृत्यु उसका अनुभूत विषय है। वह मृत्यु के समय होने वाली पीड़ा को अनुभव कर चुका है। तभी तो वह उससे बचना चाहता है। 
5 कर्मफल भोगने के लिए पुनर्जन्म आवश्यक है। जैसे किसी व्यक्ति ने कुछ लोगों की हत्या कर दी और इसके कुछ समय बाद वह मर गया। ऐसी अवस्था में न्यायालय तो उसे दण्ड नहीं दे सका। तो उसे दण्ड कैसे मिलेगा। निश्चित रूप से पुनर्जन्म होगा। 
6 यदि यह कहें कि यह जन्म तो ईश्वर ने स्वेच्छा से दिया है तो किसी को सुख और किसी को दुःख क्यों दिए हैं। यदि कोई कहे कि परीक्षा करने के लिए दिए हैं, तो ईश्वर अज्ञानी ठहरता है, क्योंकि परीक्षा की आवश्यकता उसको होती है जिसको पता न हो। ईश्वर अन्यायकारी भी ठहरता है क्योंकि किसी की परीक्षा ली, किसी की नहीं।
7 यदि यह भी मान लिया जाए और यह भी कि वह कर्मों के फल कयामत के दिन देता है तो यह भी अन्याय है कि अधिकतम 100 वर्षों का जीवन और सजा अनन्त काल तक! और न्याय के लिए अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा!
8 पं0 रामचन्द्र देहलवी का तर्क- जब कयामत के दिन न्याय के दिन सभी मनुष्य उठ खड़े होंगे तो उनको दूसरा शरीर मिलता है या यही? उत्तर दिया गया- दूसरा। क्योंकि यह  शरीर तो कहा नहीं जा सकता। यह तो मिट्टी और कीड़े खा गए। यदि दूसरा शरीर मिलता है तो पुनर्जन्म से क्यों इन्कार करते हो? यही तो पुनर्जन्म है कि आत्मा को दूसरा शरीर प्राप्त होना।
9 वस्तुतः आत्मा को अनादि न मानना ऐसा ही है जैसे एक झूठ छुपाने के लिए हजार झूठ बोलना। जो अनादि नहीं है वह अनन्त भी नहीं हो सकता। कयामत के दिन सबका न्याय करके सबको बहिश्त या दोजख में भेजकर खुदा क्या करेगा? और यह दुनिया बनाने से पहले क्या कर रहा था? 
10  वैदिक सिद्धान्त के अनुसार तीन सत्ताएँ अनादि हैं- ईश्वर जीव और प्रकृति। जीव बार बार जन्म लेता है। परमात्मा शरीर धारण नहीं करता। यही सत्य है।
(शांतिधर्मी में प्रकाशित)

सरदार घुन्नासिंह जी


आर्यसमाज के बलिदान 
सरदार घुन्नासिंह जी                   लुधियाना पंजाब 

पुस्तक :- आर्यसमाज के बलिदान 
लेखक :- स्वामी ओमानन्द जी महाराज 
प्रस्तुति :- अमित सिवाहा 

     मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्।। 
  अच्छे बुरे सभी पर ही , एक संकट का दिन प्राता है। 
दुःख सुख चक्र समान फिरे,यह सभी विधान विधाता है।।

         घुन्नासिंह का जन्म स्थान लताला जि ० लुधियाना है। यह ग्राम खंगूडे जाटों का है। इनका जन्म संवत् १९३८ सन् १८८१ ईस्वी में हुआ था। घुन्नासिंह अपने पिता थम्मरणसिंह के एकमात्र पुत्र थे। इनकी माता का नाम श्रीमती भागण देवी था। सात वर्ष की आयु में इनको ग्राम में ही एक उदासी साधु के पास गुरुमुखी पढ़ने भेजा गया। इन्होंने कुछ गुरुमुखी का अभ्यास किया , पश्चात् घरवालों ने पढ़ाई बन्द कर दी। ९ वें वर्ष में इनका विवाह शेरसिंह जी की कन्या जयकौर देवी से ग्राम बुरज लिटा में हो गया और १४ वें वर्ष में मुकलावा अर्थात् गौणा हो गया। 

       इनके ६ सन्तानें हुईं जिनमें चार पुत्र तथा दो कन्यायें थीं। ज्येष्ठ पुत्र का देहान्त १८ वर्ष की आयु में आर्य स्कूल लुधियाना में जब कि वह १० बी श्रेणी में पढ़ता था हो गया। उसका नाम भजन सिंह था। शेष तीन पुत्र बख्तावरसिंह , सुखदेव , बलभद्र अब हैं। बड़ी कन्या का विवाह डॉक्टर इन्द्र सिंह ग्राम बुरज नकलीया में हुआ जो सुखपूर्वक गृहस्थ बिता रही है। छोटी कन्या का स्वर्गवास हो गया। 

      इनके गृह में कृषि का काम होता था। ग्राम में इनका परिवार कृषिपटु समझा जाता था। अतः इनके पिता ने अपने पिता श्री भगवान्सिंह जी की सम्मति से घुन्नासिंह को कृषि के काम में लगा लिया । अब यह कृषक हो गये। 

       सत्संग का अभ्यास आरम्भ से ही था। अब यह पं० यमुनादास जी एवं पं० विष्णुदास जी की संगति में आने लगे। यह दोनों महानुभाव उदासी साधु थे। पं० यमुनादास जी अपने समय के उत्तम वैय्याकरण तथा नैय्यायिक माने जाते थे। पण्डित विष्णुदास जी अपने काल के अद्वितीय वैद्य थे। पं० यमुनादास जी तो बाहर आर्यसमाजी हो गये और पं० विष्णुदास जी को सरदार हरिसिंह जी भैरणीरोडा वाले ने प्रथम पं० लेखराम जी की पुस्तकें पश्चात् ऋषि की पुस्तकें देकर आर्यसमाजी विचारों का बनाया। इनकी संगति से धुन्नासिंह आर्यसमाजी हुये। आर्यसमाजी होकर नागरी लिपि सीखी तथा हिन्दी भाषा पढ़ी। आर्यसमाज के ग्रन्थ नाममात्र पढ़े परन्तु वंगवासी या भारतमित्र के ग्राहक नियम पूर्वक रहे। इससे संसार के सामान्य ज्ञान में विशेष वृद्धि हो गई। 

        इनके आर्यसमाजी होने का ज्ञान इनकी पूज्या माता के देहावसान पर हुआ। क्योंकि इन्होंने उस समय किसी पौराणिक कृत्य का अनुष्ठान नहीं किया। इनका परिवार सम्पन्न था। ये किसी को रुपया देकर उस पर वृद्धि ( सूद ) नहीं लेते थे। जिसको जितना रुपया देते थे उससे उतना ही लेते थे। जिस समय गृह कार्य इनके हाथ में आया उस समय इन्होंने धन को भूमि में न दबाकर डाकघर में रखकर उस पर वृद्धि प्राप्त की। पिता की मृत्यु के पश्चात् आपने कृषि का कार्य छोड़कर पनसारी की दुकान करली। साथ ही जरूमों , आंखों की बीमारियों और छोटे छोटे रोगों की दवायें भी मुफ्त में देनी शुरू कर दी।

      ग्राम इन्होंने अपनी कन्या का विवाह वैदिक रीति से किया। किसी पण्डित के न आने पर यह विवाह श्री पं० विष्णुदास जी उदासीन ने पढ़ाया था। इस विवाह में घुन्नासिंह ने सुधार भी किया। बारात में एक वर दूसरा भाई , तीसरा नापित और चौथा गाड़ीवान ये चार ही व्यक्ति प्राये थे। रात को विवाह करके प्रातःकाल कन्या को विदा कर दिया। कोई दहेज न दिया। इस से लोगों को इनके प्रार्यसमाजी होने का विश्वास हो गया और यह आर्यसमाजी प्रसिद्ध होगये। 

         यदि कोई समीप में आर्यसमाज का उत्सव हो जैसे लुधियाना , रायकोट आदि में तो यह सम्मिलित हुआ करते थे। लताला में भी इन्होंने एक या दो उत्सव करवाये थे। ग्राम में कुछ अकाली भी थे। अब यह आर्यसमाजी हो गये थे। दोनों अपने अपने पक्ष के पोषक थे। गांव में एक कन्या पाठशाला खुली। इस पर पक्ष बन गये। कई बार बाहर के सज्जन भी समझौते के लिये गये। धुन्नासिंह का दल कहता था - कि धन राशि नियत कर दो। जो उतना धन दे उसका एक सदस्य हो। अकाली पार्टी वाले कहते थे कि जितने घुन्नासिंह दल के सदस्य हों उतने ही हमारे हो परन्तु धन हम एक चौथाई देंगे और तीन चौथाई यह दें। यद्यपि इस प्रकार समझौता असम्भव था परन्तु धुन्नासिंह ने स्वीकार कर लिया और यह शर्त रखी कि पाठशाला में स्त्री अध्यापिका हो। उस समय पाठशाला का अध्यापक एक अकाली था। अकालियों ने इस शर्त को स्वीकार नहीं किया और समझौता टूट गया। घुन्नासिंह दल ने स्त्री अध्यापिका रख कर एक अलग पाठशाला खोली। घुन्नासिंह के प्रभाव से वह पाठशाला खूब चल निकली। पीछे इस पाठशाला को इन लोगों ने डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अधीन कर दिया। अब तक यह पाठशाला अच्छी तरह चल रही है और अब मिडिल बन चुकी है। पाठशाला में स्त्री अध्यापिका रखने की शर्त पर समझौता टूट जाने पर कई अकाली इनके दल में आ मिले थे जिनमें हवलदार वीरसिंह , रसाईदार भोलासिंह , जमादार चन्दनसिंह इनमें मुख्य थे। ये लोग घुन्नासिंह के मित्र बन गये और पाठशाला के कार्यों में सहयोग दिया। 

         अनुचित हठ को लेकर पराजित होने पर अकालियों ने अपने यश को कलंकित करने वाला षड्यन्त्र रचा। उन्होंने घुन्नासिंह के जीवन को समाप्त करने के लिये एक व्यक्ति को तैयार कर लिया। सामान्य रूप से घुन्नासिंह को भी पता लग गया। यह बात श्री रामलाल जी , प्रिसिंपल आर्य स्कूल लुधियाना ने बतलाई। मास्टरजी ने बतलाया , -एक दिन घुन्नासिंह ने उनसे कहा - अकाली कुछ बिगड़ रहे हैं। आर्यसमाज और पाठशाला मुख्य विषय हैं। मुझे सन्देह है कि कभी आक्रमण होगा। मास्टर जी को तब भी विश्वास न हुआ उन्होंने कहा - ऐसा असम्भव है परन्तु कुछ दिन पीछे जिस दिन धुन्ना सिंह जी शहीद हुये तब उनकी बात पर विश्वास हुआ , परन्तु उससे अब कोई लाभ न था। 

        अकालियों ने जिस व्यक्ति को उकसाया था उसका घर घुन्नासिंह की दुकान के पास ही था। घुन्नासिंह भी कुछ सावधान रहते थे। इस व्यक्ति ने ग्राम का एक घोगड़ नाम का मुसलमान साथ मिला लिया और दो व्यक्ति किसी अन्य ग्राम के बुलाये। 

        घटनावाले दिन धुन्नासिंह प्रातःकाल ही अर्थात् उषःकाल में शर्बत बनाने के लिये दुकान पर गये। वह अभी ताला ही खोल रहे थे कि वचनसिंह ने पीछे से आकर पकड़ लिया। वह उससे छूटना ही चाहते थे तब तक दूसरे साथी ने आकर केसों से पकड़े लिया। ये खींच कर अपने मकान में ले गये। वहां दो और भी उनके सहायक थे। चारों ने मिलकर डण्डों लाठियों से मारना प्रारम्भ किया। हल्ला सुनकर जनता भी आगई। कुछ व्यक्ति उस घर पर पहुंचे। उस समय वे लोग इन्हें छोड़कर भाग गये। घुन्नासिंह के पास सवले प्रथम ज्वालासिंह दर्जी पहुंचा। उसने बतलाया वीर घुन्नासिंह ने जो सबसे पहली बात कही वह यह थी- " ज्वालासिंह देखले प्रांख में आंसू नहीं हैं" । 

       लोग घुन्नासिंह को उठाकर बाहर लाये। यदि वचनसिंह आदि न भागते तो लड़ाई हो जाती , उनके भाग जाने से न हुई। शफट पर घुन्नासिंह को डाल कर थाना डेहलों को ले चले। जब छपार पहुंचे तो घुन्नासिंह ने कहा - ठहर जावो। शकट टहराया गया । कोई पाँच मिनट के पश्चात् वीर घुन्नासिंह ने कहा - अब काम समाप्त है । पूछा - क्या है ? उसने कहा - अब आत्मा शरीर छोड़ने वाला है। यह कहकर आँखें बन्द की और एक बार ओ३म् कहा तथा वीर आत्मा ने भौतिक शरीर से ११ मई १९३० के प्रातःकाल विदा ली। 

        डॉक्टरी परीक्षा में डाक्टर ने लिखा था - हाथ , टाँग , कमर , छाती की कोई भी अस्थि साबत नहीं है। आश्चर्य है , यह कुछ समय भी कैसे जीवित रहे। 

       अभियोग में वचनसिंह भाग गया। घोगड़ पकड़ा गया। दूसरे दो व्यक्तियों को ठीक ठीक पहचाना ही नहीं गया। घोगड़ कालापानी ( अण्डेमान ) भेजा गया। वहां जाकर कुछ समय पश्चात् उसको वहीं मृत्यु हो गई। वचनसिंह १६ मई १९३१ को फिरोजपुर जिले में पकड़ा गया और उसे फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया गया। वचनसिंह की सजा को तबदील करने के लिये जस्टिस जयलाल की अदालत में लाहौर अपील की गई। जस्टिस जयलाल ने १२ जनवरी १६३२ को फैसला लिखते हुये अन्त में लिखा है - जहां तक आज्ञा का प्रश्न सम्बन्ध रखता है , वचनसिंह का व्यवहार किसी अनुकम्पा के योग्य नहीं है। यह साफ है कि पहली दुश्मनी की वजह से उसने तीन आदमियों को अपने साथ मिलाया ताकि इस मरने वाले पर पाशविक आक्रमण किया जाये और उसे लगभग मार दिया। यह सच है कि सर पर सिवाय एक के और कोई जख्म नहीं था। लेकिन यह बात अपील करने वाले की सहायता नहीं करती। इसके विरुद्ध आक्रमण की निपुणता को सिद्ध करती है। 

       मेरी सम्मति में मृत्यु की आज्ञा वचनसिंह के बिलकुल अनुरूप है। मैं उसकी अपील खारिज करता है और पहले हुक्म को कायम रखता हूं। 

         वचनसिंह के मित्र से मालूम हुआ कि वह अफसोस करता था कि मैं अकालियों के बहकाने में या गया। मैंने घुन्नासिंह को निरपराध मारा है। मुझे उससे कोई दुश्मनी न थी। शहीद घुन्नासिंह उत्तम मित्र और भयानक शत्रु था। वह धैर्यवान् , निडर , अपनी धुन का पक्का और धर्मप्रेमी था । सम्भव है धर्मप्रेम माता से लिया हो और शेष गुण पिता से। 

                                  धैर्य 

       इनका ज्येष्ठ पुत्र भजनसिंह आर्य स्कूल लुधियाना में पढ़ता था। वह रोगी हो गया। रोग से उसे मूर्छा हो गई। यह पं० विष्णुदास जी को साथ लेकर आये। लुधियाना के सिविल सर्जन ५० गोकुल चन्द्र जी वैद्य श्री तारवाला हकीम प्रभृति अनेक वैद्य बुलाये गये। परन्तु लाभ न हुआ। उस दिनों मैं अचानक लुधियाना पाया। पता लगने पर उनसे मिला। वे तथा परिवार से उनके भ्राता हरनामसिंह जी वहां थे। भजना मूच्छित था। दूसरे दिन मैं बोडिङ्ग हाउस में गया। मास्टर श्री कृष्ण जी भी वहाँ थे। रोगी की जिह्वा कुछ खुश्क हुई थी। श्री कृष्ण जी को बादाम रोगन लाने के लिये भेजा , वह लगाया गाया परन्तु कुछ पल पश्चात् भजने की आत्मा ने शरीर को छोड़ दिया। स्कूल उस दिन बन्द हो गया। अन्त्येष्टि संस्कार उसका किया गया। घुन्नासिंह से मैंने पूछा - लताला रेल से जाना है वा पंदल ? उन्होंने उत्तर दिया पैदल जाने से शीघ्र पहुंच जाऊँगा। अतः पैदल जाऊंगा। मैंने मास्टर रामलाल जी से पूछा - भोजन तैयार है ? उन्होंने कहा घर में नहीं है परन्तु बोडिङ्ग हाउस में है। मैंने कहा - घुन्नासिंह को भोजन करवा दो। वह बोले - इस अवस्था में मेरे मन में भोजन के लिये कहने का उत्साह नहीं है। वह काम मैंने अपने ऊपर लिया। मैंने घुन्नासिंह से कहा - यदि पैदल जाना है तो भोजन कर लें , क्योंकि आप २० मील पैदल जायेगे , घर में रोना आरम्भ होगा , आपको भोजन किसने देना है। उन्होंने मुझ से कहा - आपकी इच्छा है कि मैं भोजन करलू ? मैंने हां में उत्तर दिया । उसने कहा - बहुत अच्छा। भोजन करके वे ग्राम को चल दिये। चलते समय मुझे केवल ये शब्द कहे - कुछ समय के लिये बोर्डिंग हाउस से सम्बन्ध विच्छेद होगया। 

       उनके जाने पर श्री रामलाल जी ने मुझे तो उलाहना दिया कि आपने संन्यासी होने से ही भोजन के लिये कह दिया और घुन्नासिंह के धैर्य्य की प्रशंसा की कि १८ वर्षीय युवक पुत्र का देहान्त हुआ , चिकित्सा पर मुक्तहस्त होकर व्यय किया , परन्तु अन्त्येष्टि के समाप्त होते ही २० मील की यात्रा के लिये चल दिये और भोजन भी कर लिया। 

                                दृढ़ता 

        आर्यसमाजी होने पर माता जी का संस्कार , कन्या का विवाह वैदिक रीति से किया। अपनी दुकान पर अछूतपन मिटा दिया। सब विरोध सहकर सब कुछ किया। अन्त समय में जब कि लाठियों की मार से अस्थिपंजर चूर हो गया था तब भी कहते हैं - देखले आंख से अश्रुपात नहीं हुवा है। कठोर वेदना को सहकर दृढ़ता का परिचय दिया। 

                              धर्म - प्रेम

           ग्राम में आर्यसमाज का प्रचार किया। वैदिक धर्म का झण्डा ऊंचा रखने का पूर्ण प्रयत्न किया। कार्य क्षेत्र में सफल हुये। उस सफलता से चिढ़कर ही विपक्षियों ने प्राण लेने का षड्यन्त्र किया। वीर श्रात्मा ने वैदिकधर्म के लिये वीरगति प्राप्त की।

अज्ञात योद्धा पं० जगतराम हरियाणवी


अज्ञात योद्धा 
पं० जगतराम हरियाणवी

लेखक :- स्वामी ओमानन्द सरस्वती 
प्रस्तुति :- अमित सिवाहा 

           पं० जगतराम का जन्म हरयाणा जिला होशियारपुर के नगमापरू नाम के कस्बे में हुआ। आप सदैव प्रसन्नवदन और मस्त रहते थे। मैट्रिक पास करके दयानन्द कालेज लाहौर में प्रविष्ट हुए , किन्तु परीक्षा देने से पूर्व आप उच्च शिक्षा प्राप्त करने के विचार से अमेरिका पहुंच गए। वहां पहुंचने पर देशभक्त ला० हरदयाल से आपकी भेंट हो गई। दोनों के हृदय में देशभक्ति की आग पहले ही विद्यमान थी। दोनों के मिलते ही और गुल खिल गया। दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध हो गया और दोनों मिलकर व्याख्यान तथा लेख द्वारा प्रचार करने लगे। अमेरिका में निवास करने वाले भारतीयों में देशभक्ति की आग लगा दी। कुछ दिन पश्चात् पं० जगत राम जी की यह धारणा हो गई कि भारत की सेवा में रहकर अच्छी हो सकती है। इसी विचार से वे अमेरिका से अपने देश - बन्धुनों से विदाई लेकर भारत को चल दिए। 

         भारत में आकर अपने विचार के कुछ युवकों का सङ्गठन बनाया और कार्य प्रारम्भ कर दिया। सन् १९१४ में पुलिस ने लाहौर षड्यन्त्र का केस पंजाब के अनेक नवयुवकों पर चलाया , इनमें पं० जगतराम भी थे। एक दिन पेशावर जाते हुए रावलपिण्डी में गिरफ्तार कर लिए गए। आप पर हत्या आदि का अभियोग चलाकर अदालत ने आपको फांसी का दण्ड दिया। आपने हंसते - हंसते फांसी का दण्ड सुना। इस समय एक बड़ी कारुणिक घटना घटी। इनके पिता और पत्नी दोनों दुःखी होकर अन्तिम भेंट करने जेल में आये। पण्डित जी जेल में भी बड़े प्रसन्न रहते थे। अपने पिता जी को देखकर बोले - पिता जी क्या आप मुझ से प्रसन्न हैं ? पिता जी की प्रांखों से अश्रुधारा बह निकली और कहने लगे - " पुत्र ! कल तुम फांसी के तख्ते पर लटकने जाते हो । मेरी आशाओं पर वज्रप्रहार होने वाला है। मेरा सर्वस्व लुट रहा है और तुम मुझ से ऐसा प्रश्न कर रहे हो।

       " पं० जगतराम ने उसी प्रकार प्रसन्नतापूर्वक कहा " क्या आपने गुरु गोविन्दसिंह के पुत्रों की बलिदान की कथा नहीं पढ़ी ? ऐसे वीरों के लिये क्या आपके मुख से वाह ! वाह ! नहीं निकलता ? फिर आप आज रो क्यों रहे हैं ? यह वही नाटक तो है जो आपके ही घर खेला जा रहा है। इस पर तो आपको प्रसन्न होना चाहिए। मैं अपना यौवन मातृभूमि के चरणों पर अर्पण करने जा रहा हूं। क्या यह आपके लिये प्रसन्नता की बात नहीं है ? " यह बातें सुनकर उनके पिता जी मौनभाव से पुत्र के मुख की ओर देखते रहे। वृद्ध पिता के अत्यन्त आग्रह करने पर पंडित जी ने हाईकोर्ट में अपील की। अपील में फांसी का दण्ड कालापानी के रूप में बदल दिया। पंडित जी की हजारों रुपये की सम्पत्ति जब्त कर ली गई। परिवार वालों को कहीं खड़े होने को स्थान नहीं था। पंडित जी का स्वास्थ्य सर्वथा नष्ट हो रहा था। 

      आपकी चिकित्सा के लिए डा० अन्सारी , डा० खानचन्द्रदेव और डा० गोपीचन्द आदि को गुजरात के जेलखाने तक जाना पड़ा। रोग से छुटकारा पाने पर अधिकारियों की कृपादृष्टि आप पर हुई और कई वर्षों तक लगातार जेल की अन्धेरी कोठरी में ' डण्डे गारद ' में रखे गये। यहां तक कि छः वर्ष तक दीपक का प्रकाश भी देखने को नहीं मिला। सात वर्षों तक पहनने को जुता नहीं मिला , जिससे बिवाई फटने से आपको असह्य पीड़ा सहनी पड़ी। इस प्रकार से नाना कष्ट आपको सहने पड़े । किन्तु इन भयङ्कर कष्टों का पंडित जी के मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इन कण्टों को अपना तप समझकर पंडित जी मस्त रहते थे। ज्यों - ज्यों आपको कष्ट दिये गये त्यों - त्यों आपका तपोबल बढ़ता गया। जिस जेलखाने में आप आते उसी के कैदी पंडित जी की ओर खिंचे चले आते थे। 

         पंडित जी के व्यक्तित्व में महान आकर्षण था। सभी कैदी आपके शिष्य बन जाते थे। आपके जीवन और उपदेशों का प्रभाव ऐसा पड़ता था कि कैदियों के जीवन में परिवर्तन होकर धार्मिकता आती थी। पंडित जी कैदियों के चरित्र को सुधारने का सदैव यत्न करते थे। जो उनको सदाचार का महत्त्व समझाया करते थे। जो कैदी रोगी हो जाते थे उनकी आप बडी लगन से सेवा किया करते। पीछे तो आपके इस व्यवहार से जेल के अधिकारी भी सदैव आप से प्रसन्न रहते थे।

         यह गुण उनमें आर्यसमाज की कृपा से आये थे। यह दयानन्द कालिज के छात्र रह चुके थे। स्वामी दयानन्द सरस्वती के उपदेशों का आपके मानस पट पर गहरा प्रभाव पड़ा था। स्वामी विवेकानन्द ओर रामतीर्थ में भी आप श्रद्धा रखते थे। किन्तु आर्यसमाज की शिक्षा ने आपकी काया पलट दी थी। इसी कारण आपका चरित्र बड़ा उच्च और व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली था। आप में प्रचार और सेवा की लगन थी। आप मनुष्यमात्र से प्रेम करते थे। सब को अपने सगे भाई के समान देखते थे। आपका मानस द्वेषरहित था। पंडित जी श्रमद्भगवद्गीता से भी प्रेम रखते थे। आपने जेल में ही संस्कृत , गुरुमुखी और हिन्दी भाषा का अभ्यास किया था। 

           आप इन भाषाओं में सुन्दर गद्य और पद्य लिख लेते थे। आप अपने उपदेशों में गीता के उद्धरणों का प्रयोग किया करते थे। गुजरात जेल में खान अब्दुल गफ्फार खां , डा० अन्सारी साहब , मौलवी मुफती किफायत , उल्ला साहब , खानचन्द्रदेव , डा. गोपीचन्द जी और चौधरी कृष्ण गोपाल आदि विद्वान आपका गीतोपदेश सुनकर मुग्ध हो जाते थे। अब्दुल गफ्फार खां साहब तो आपकी गीता की व्याख्या पर इतने मुग्ध रहते थे कि प्रतिदिन एक घण्टा आप से गीता की व्याख्या सुना करते थे। आज आप जीवित हैं वा नहीं यह कोई नहीं जानता। उधर पंजाब में भयंङ्कर हत्याकाण्ड हो जाने से बहुत प्रयत्न करने पर भी उनका पता नहीं चला। पंडित जी की एक कविता जो अधूरी है , दी जाती है। उनका “ खाको " उपनाम तखुलुस था।

       गर मैं कहूं तो क्या कहूं कुदरत के खेल को। 
       हैरत से तकती है मुझे दीवार जेल की।। 
       हम जिन्दगी से तंग हैं तिस पर भी आशना 
       कहते हैं और देखियेगा धार तेल की। 
       जकड़े गये हैं किस तरह हम गम में क्या कहें , 
       बल खा के हम पे चढ़ गया , मानिन्द बेल की ।। ' 
       खाकी ' को रिहाई तु दोनों जहां से दे। 
       आ ऐ आञ्जल तू फांद के दीवार जेल की।।