Thursday, July 22, 2021

क्या स्वामी दयानन्द कृत संस्कार विधि फलित ज्योतिष पर आधारित है?


भ्रमोच्छेदन
संस्कार विधि पर ज्योतिषाचार्य श्री कृष्ण चन्द्र शास्त्री का गर्हित आक्षेप
[क्या स्वामी दयानन्द कृत संस्कार विधि फलित ज्योतिष पर आधारित है?]

प्रियांशु सेठ (वाराणसी)

सोशल मीडिया के माध्यम से पौराणिक ज्योतिषाचार्य श्री कृष्ण चन्द्र शास्त्री का "ज्योतिष और आर्यसमाज" नामक शीर्षक से एक लेख प्राप्त हुआ है। इसमें शास्त्रीजी ने स्वामी दयानन्द के प्रसिद्ध ग्रन्थ संस्कार विधि से कुछ सन्दर्भ उठाकर यह सिद्ध करने की कुचेष्टा की है कि स्वामी दयानन्दजी को अपने ग्रन्थ में फलित ज्योतिष अभीष्ट है। उन्होंने कहीं फलित ज्योतिष का खण्डन नहीं किया है।
शास्त्रीजी ने यदि सत्यार्थप्रकाश ही ठीक से पढ़ लिया होता तो वह ऐसे आक्षेप कदापि न करते। स्वामी दयानन्द ज्योतिष को खगोलीय घटना, ग्रहों का विज्ञान, मौसमी विज्ञान, संवत्सर गणना, रश्मियों का प्रभाव, ऋतु परिवर्तन आदि की गणना करने वाला विज्ञान मानते थे। उन्होंने अपने कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में स्पष्टतः फलित ज्योतिष पर प्रहार किया है। मगर ज्योतिष को फलित रूप देकर जनसामान्य को लूटने वाले लुटेरों को ढपोरशंख की भांति बजने का अभ्यास है। हम इस लेख में शास्त्रीजी के आक्षेपों का क्रमानुसार खण्डन करते हैं-

आक्षेप १- प्रत्येक गर्भाधान आदि संस्कार के लिए उत्तम मुहूर्त लिया जाना चाहिए। इसमें एकादशी, त्रयोदशी वर्जित हैं।
उत्तर- आपको दो रात्रियाँ ही वर्जित दिखती हैं, गर्भशास्त्र (Eugenics) तो छः रात्रियों को वर्जित मानता है और यही महर्षि दयानन्द ने भी कहा है। स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल सोलह रात्रि का है- "ऋतु: स्वाभाविक: स्त्रीणां रात्रय: षोडश: स्मृता: (मनु० ३/४६)"। इन सोलह रात्रियों में प्रथम की चार रात्रियाँ तथा एकादशी व त्रयोदशी- ये छः रात्रियाँ निन्दित हैं। शेष दश रात्रियाँ ऋतुदान के लिए श्रेष्ठ हैं। मनुस्मृति (३/४७) में इन छः रात्रियों को महारोगकारक होने से निन्दित बताया है।

डॉ० बोध कुमार झा 'ब्रह्मबन्धु' (लब्धस्वर्णपदकत्रय-रजतपदकत्रय-कांस्यपदकद्वय, प्रवक्ता- संस्कृत दर्शन वैदिक अध्ययन विभाग, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान) एवं पं० गेय कुमार झा 'गङ्गेश' (लब्धस्वर्णपदक, वेदाचार्य, गवेषक- स्ना० व्या० विभाग का० सिं० दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, बिहार) ने एक पुस्तक लिखी है- "षोडश संस्कार (एक वैज्ञानिक विवेचना)"। इसमें वे उपरोक्त प्रकरण के सम्बन्ध में लिखते हैं-
"वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर ये वर्ज्य तिथि एवं दिन तर्क संगत प्रतीत होते हैं। आरम्भ के जो चार दिन प्रतिषिद्ध माने गये वे तो सर्वजनसंवेद्य हैं। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं आनी चाहिये। पूर्णिमा और अमावस में क्रमशः सोमतत्त्व का आधिक्य और अल्पता वातावरण में निहित होती है, अतः ये दोनों तिथियाँ जातक सम्बन्धी स्वास्थ्य-परक दृष्टि के कारण वर्जित मानी गई हैं। जहां तक ११वीं और १३वीं रात्रि का प्रश्न है, वह भी शारीरिक विज्ञान सम्मत प्रतीत होता है। इन दोनों ही कालांशों में स्त्री का गर्भाशय जीवाणु को सर्वथा स्वीकार करने हेतु तैयार नहीं होता। फलतः विरुद्ध आचरण करने पर जातक के विकलांग होने की ज्यादा सम्भावना रहती है।[१]"

चरकसंहिता, शरीरस्थान (८/६) में इस सन्दर्भ में वर्णन आता है-
"६,८,१०,१२,१४,१६ ये युग्म रात्रियाँ हैं जो पुत्र की इच्छा हेतु श्रेष्ठ हैं। ५,७,९,१५ ये अयुग्म रात्रियाँ हैं जो पुत्री इच्छा के लिए श्रेष्ठ हैं।" इससे स्पष्ट है कि शेष छः रात्रियों में स्त्रीसमागम रोगकारी होने से निन्दित हैं। वास्तव में गर्भाधान विधि के इस प्रसंग में शास्त्रीजी का फलित ज्योतिष ढूंढना बौद्धिक दिवालियापन से कम नहीं है।

इसी भांति अग्निवेशगृह्यसूत्र (२/७/६) में आया है-
"षोडश्यां लभते पुत्रं ब्रह्मकीर्त्तनतादृशं तदूर्ध्वमुपयमं नास्ति कामभोगैव केवलम्।"
अर्थात् १६वीं रात्रि में स्त्री से समागम करने से ब्रह्मकीर्तन जैसा पुत्र मिलता है। उसके पश्चात् सन्तानार्थ स्त्रीसमागम वर्जित है। तब स्त्रीसमागम करना केवल कामचेष्टा है। अतः आपकी शंका का सम्बन्ध पदार्थविद्या, आयुर्वेद और गर्भशास्त्र (Eugenics) से है। किन्तु खेद है कि आपकी योग्यता शरीर विज्ञान (Physiology) में बिल्कुल शून्य है।

आक्षेप २- सीमन्तोन्नयन संस्कार में शुक्ल पक्ष हो तथा चंद्रमा पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा आदि पुल्लिंग नक्षत्रों में हो।
उत्तर- शुक्लपक्ष के चन्द्रमा से गर्भगत बालक की मानसिक उन्नति का प्रयोजन है। मूल, हस्त, श्रवण आदि नक्षत्र पुल्लिंग बोधक हैं और जब चन्द्रमा पुरुष नक्षत्र से युक्त होता है तब ऋतु प्रायः विषम नहीं होती। चन्द्रमा का किसी पुरुषवाची नक्षत्र से युक्त होने से ऋतु में समता रहती है, कारण यह है कि पुरुषवाची नक्षत्र अपने प्रभाव से चन्द्रमा की कोमलता का शोषण करता है। कोमलता तथा कठोरता एवं जलशक्ति तथा तेजशक्ति मिलकर ऋतु को विषमता रहित करते हैं।
जैसे भूमि में बीज बोने के लिए वर्षा होने का दिन अनुकूल होता है, उसी प्रकार चन्द्र का प्रकाश मानसिक शक्ति की वृद्धि के लिए उपयोगी होता है। मनुष्य का मन देवसंज्ञक है। मन के साथ चन्द्रमा का विशेष सम्बन्ध है। ऋग्वेद के "पुरुषसूक्त" के मन्त्र "चन्द्रमा मनसो जातश्च..." में भी यही सन्देश है। अतः आपका आक्षेप निर्मूल है।

आक्षेप ३- नामकरण संस्कार में कन्या का नाम रोहिणी, रेवती आदि नक्षत्रों के नाम पर नहीं रखना चाहिए।
उत्तर- आप नक्षत्रवाची नाम रखकर क्या सिद्ध करना चाहते हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि आपको नक्षत्र की सामान्य जानकारी भी नहीं है। नक्षत्र असंख्य हैं तथापि हमारे सौरमण्डल का व्यवहार २७ नक्षत्रों से अति विशेष है। अश्विनी आदि नक्षत्र देवता- नक्षत्र पुंज हैं और इनके अश्विनी आदि नाम इनकी आकृति पर रखे गए हैं। जैसे कृत्तिका नक्षत्र का देवता अग्नि है, सो दूरबीन से देखने पर इसकी आकृति अग्नि सदृश मालूम होती है। इसी प्रकार अन्यान्य कई नक्षत्रों के देवता हैं; अतः आकृति परक होने से ये नक्षत्र पुंज की आकृति बोधक नाम हैं।
अब बताइये, क्या कन्याओं की आकृति नक्षत्रों से मिलती है जो उनके नक्षत्रवाची नाम रखे जाएं? यदि अपने मनुस्मृति के अध्याय ३ का ९वां श्लोक पढ़ा होता तो आप जड़वाची नामों के सम्बन्ध में कदापि शंका न होती।

आक्षेप ४- निष्क्रमण संस्कार भी शुक्ल पक्ष की तृतीया आदि तिथियों में करें।
उत्तर- शुक्लपक्ष की तृतीया अभ्युदयारम्भ की सूचक है। तृतीया में करने का यह प्रयोजन है कि बालक का उत्तरोत्तर अभ्युदय होता रहे। यह निष्क्रमण की न्यूनतम अवधि है।

आक्षेप ५- ब्राह्मणादि का उपनयन संस्कार वसंत, ग्रीष्म आदि ऋतुओं में करें।
उत्तर- वसन्त ऋतु सौम्य गुण प्रधान होने से ब्राह्मण-भावना, ग्रीष्म ऋतु तेजस्वी होने से क्षत्रिय-भावना तथा शरद् ऋतु शीतल होने से वैश्य भावना की प्रतीक है। इसलिए ये ऋतुएं क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए उपयुक्त हैं।

आपके सभी आक्षेपों के उत्तर दिए जा चुके हैं। कृष्ण चन्द्र जी तो अपने फलित ज्योतिष से यह भी नहीं बता सकते थे कि उनके इस लेख का खण्डन कोई करेगा, अन्यथा वह अपने लेख में मेरा वर्णन कर सकते थे? आशा है, अब आप ऐसे ऊट-पटांग लेख नहीं लिखेंगे जो आपको हास्य का पात्र बनाये। 

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१. "षोडश संस्कार (एक वैज्ञानिक विवेचना)"; पृष्ठ ३-४; संस्करण १९९७; सिंहसन्स ऑफसेट जयपुर से मुद्रित एवं हंसा प्रकाशन ५७ नाटाणी भवन मिश्रराजाजी का रास्ता, चांदपोल बाजार, जयपुर से प्रकाशित।

Monday, July 19, 2021

धैर्य, दृढ़ता व वीरता की प्रतीक आदर्श महिला वीर सावरकर की सहर्धामणी माई


नारी जगत् 
धैर्य , दृढ़ता व वीरता की प्रतीक आदर्श महिला  
वीर सावरकर की सहर्धामणी माई
 -सत्यवती गोयल 

     माई की आयु केवल ११ वर्ष थी कि उसके पिता चिपलूणकर ने उसके माहाथ पीले करने की तैयारियां प्रारम्भ कर दीं। श्री चिपलूणकर जाव्हार राज्य के दीवान थे। अच्छे , खाते - पीते परिवार के सम्पन्न ब्राह्मण थे माई का विवाह सन् १६०१ में चितपावन ब्राह्मणवंशीय भगूर निवासी श्री दामोदर सावरकर के पुत्र १८ - वर्षीय युवक विनायक ' तात्याराव ' के साथ कर दिया गया। तात्याराव ' ने पूना के फग्र्युसन कालिज से बी० ए० किया। श्री तिलक जी के प्रयास से कानून की पढ़ाई के लिये लन्दन जाने की शिवाजी छात्रवृत्ति ' श्यामजी कृष्ण वर्मा से मिल गयी। तात्या के श्वसुर श्री विपलूणकर ने अपने दामाद को कानून की पढ़ाई के लिये विदेश जाते देखा तो उनका हृदय खुशी से भर गया। उन्होंने तुरन्त दो हजार रुपये अपने दामाद को अपनी ओर से भेंट किये।

    ' माई ' की आयु उस समय १६ वर्ष की थी। वह अपने सम्बन्धियों व परिजनों के साथ अपने पति ' तात्या ' को लन्दन के लिये विदाई देने बन्दरगाह तक गई थी। विदाई देते समय माई के हृदय में यही आशा थी कि यह बिछुड़ना क्षणिक ही है तथा कुछ ही वर्षों में जब उसके पति उच्चकोटि के बैरिस्टर बनकर लौटेंगे , तत्र कितने सुखद क्षण होंगे। ' माई ' भविष्य के सुखद जीवन की कल्पना में लीन थी कि एक दिन उसे समाचार मिला कि तात्याराव ने तो कानून की पढ़ाई के बदले लंदन में दूसरा कांटों का मार्ग , तेज छुरी की धार का रास्ता अपना लिया है। उसे लन्दन की तरह - तरह की घटनायें सुनने को मिलने लगीं। माई का अपने पति को बैरिस्टर के रूप में देखने का स्वप्न चकनाचूर हो गया। २३ मार्च १९१० को ' तात्या ' लन्दन में बन्दी बना लिये गये तो ' माई ' को अपने पति के जेल में कष्ट सहन करने के समाचार से भारी आघात लगा। 

उसने अपने पतिदेव की मुक्ति के लिये परमात्मा से प्रार्थना प्रारम्भ कर दी। तात्या भारत लाये जाते समय समुद्र में कूद पड़े व पुनः बन्दी बनाकर भारत लाये गये। समुद्र में कूद जाने की साहसिक व रोमांचकारी घटना से एक बार तो माई का सिर गौरव से ऊंचा हो उठा। अपने पति के अदम्य साहस की कथा सुनकर वह फूली न समाई। किन्तु जब बम्बई के न्यायालय ने ' तात्या ' को एक नहीं दो , आजीवन कारा वासों का दण्ड दिया , ५० वर्ष के लिये अण्डमान की काल - कोठरी में भेजने का आदेश दिया तो ' माई ' दहाड़ मारकर रो पड़ी। 

       उसकी समस्त आकांक्षाओं पर पानी फिर गया। माई अपने भाई के साथ डोंगरी के कारागृह में अपने पूज्य पति के दर्शनों के लिये गई तो उसके हृदय में यही आशंका थी कि वह उनके अन्तिम दर्शन कर रही है। बैरिस्टर की वेशभूषा में देखने की आकांक्षा रखने वाली आंखों ने तात्या को लोहे के मोटे सींखचों के पीछे लोहे की जंजीरों एवं हथकड़ी - बेड़ियों से जकड़ा हुआ पाया तो उसकी आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई। 

       माई का हृदय चीत्कार कर उठा। ' बेटे - बेटियों की संख्या बढ़ाना और चार तिनके ( लकड़ी ) बचा करके घर बांध लेना यदि संसार व सुख कहलाता है तो ऐसा संसार कौवे , कुत्ते व चिड़ियां भी बनाती रहती हैं। किन्तु अपने सुखों को मातृभूमि के चरणों पर न्यौछावर कर देना यह मानव का वास्तविक सुखद संसार है। तुम धैर्य करो , हमारा यह त्याग भविष्य में अन्य सैकड़ों घरों में तो आनन्द की वर्षा करेगा ही। ' १६ - वर्षीय तरुणी माई ने अपने बन्दी पति ' तात्या ' के मुख से ये शब्द सुने तो वह राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत भावनाओं को देख कर हृदय में प्रफुल्लित हो उठी। भीगी आंखों से वह पति से विदा हुई। 

       तात्याराव के अण्डमान रवाना होने के बाद माई ने पति के जीवन की रक्षा के लिये । रिहा होकर पुनः मिलन के लिये व्रत उपवास व ईश्वराराधना प्रारम्भ कर दी। वह पातिव्रत धर्म का पूर्णतः पालन करती रही। हृदय में केवल एक ही आशा - आकांक्षा थी कि एक दिन पतिदेव के साथ रहने का सौभाग्य अवश्य मिलेगा। १३ वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद आशा का सूर्य प्रकट हुआ , निराशा के अन्धकार को उसने भगा दिया। तात्याराव ' को अण्डमान से लाकर रत्न गिरि में स्थानबद्ध कर दिया गया। पति - पत्नी दोनों मिले। माई का हृदय पति के चरणों में नतमस्तक हो उठा। उन्होंने अपने मृत्युंजयी बीर पति के मृत्यु को पराजित करके वापस आने पर भगवान् को धन्यवाद दिया। 

       माई का त्याग , माई का धैर्य एवं पातिव्रत धर्म , ' तात्या ' के त्याग - बलिदान से , समुद्र में कूद , पड़ने के अदम्य साहस से किसी भी प्रकार कम न रहा। माई के पातिव्रत धर्म के बल पर ही तो तात्या विश्व को अपने अदम्य साहस व त्याग के ' चमत्कार ' से चमत्कृत कर सके थे। माई सीता , सावित्री , पद्मिनी की तरह महान् पतिव्रता हिन्दू नारी थीं। उन्होंने अपने पातिव्रत धर्म का पालन जीवन के अन्तिम क्षण तक किया। उनके इष्टदेव ने ' मैं अपने पति के सम्मुख ही उनकी सेवा करती - करती मर जाऊ ' उनकी इस अन्तिम अभिलाषा को भी पूर्ण किया। सन् १९३३ में माई तात्या से बिछुड़ गई। उन्होंने अपने महान् पातिव्रत धर्म के पालन से हिन्दू नारियों के गौरवमय इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया।

पिता का प्रेम


कहानी
पिता का प्रेम
-निशाकान्त मिश्र 

        किसी गांव में एक बूढ़ा आदमी रहा करता था। उसकी कोई सन्तान न थी। वृद्धावस्था में उसके एक लड़का हुआ। लड़का धीरे - धीरे बढ़ने लगा। बड़े होने पर उसने मकान बनाने वाले कारीगर का काम सीख लिया। उसी गांव में एक धनी सेठ रहा करता था। उसके एक लड़की थी। सेठ ने लड़की के विवाह का आयोजन किया। विवाह के पूर्व उसने अपना घर ईंट का बनवाना चाहा। कारीगर के रूप में बूढ़े का लड़का नियुक्त हुआ। जब दो मंजिलें बन चुकी तो सेठ ने कहा- “ तीसरी अन्तिम मंजिल शीघ्र बन जानी चाहिए - बेटी के विवाह वाला दिन समीप है। अतः दोपहर भी काम जारी रहता तो अच्छा था इसके लिए दो गुनी मजदूरी मिलेगी। " गर्मी का मौसम तो था ही । सूर्य अपनी किरणों से पूरी पृथ्वी को जला रहा बूढ़े ने देखा — काफी देर हो गयी है , अभी भी उसका लड़का काम करके नहीं आया- -तो वह उसके पास गया। उसने बड़े ही मीठे स्वर में आवाज दी " वेटे ! चला आ — काफी देर हो गई — अभी तक तू काम कर रहा है। लड़के ने नीचे खड़े पिता की ओर देखकर जबाब दिया- " पिताजी ! सेठ की लड़की की शादी नजदीक है अतः सेठ ने कहा है कि दोपहर को भी यदि काम जारी रहता तो अच्छा था । " लड़के ने आगे कहा- " इस लिए आ नहीं सकता। ' बूढ़े पिता ने कहा — बड़ा हठ किया कि वह काम न करे। किन्तु लड़के ने कोई ध्यान नहीं दिया। बूढ़ा चुप - चाप घर चला गया। जब बूढ़ा वापस पुनः लड़के के पास आया तो उसकी गोद में छह महीने का एक नन्हा शिशु था। लड़के ने जब अपने बच्चे को धूप में लेकर पिता को खड़े देखा तो आग बबूला हो उठा। उसने कहा- " पिता जी ! आप इतने मूर्ख हैं कि इस छोटे से बच्चे को धूप में लेकर खड़े हैं। " बूड़े ने जबाब में कह दिया— “ मैं नहीं जाऊंगा। " लड़का उत्तेजित हो उठा और उसने कहा- " क्यों नहीं जाओगे ? देख नहीं रहे कि इसे कितनी गर्म धूप लग रही है ? - " बूढ़े ने कहा " जब मेरा लड़का धूप में है , तो तेरा भी धूप में रहेगा। " यह कहकर बूढ़ा चुप हो गया। पिता की बात सुनकर लड़का प्रेम विह्वल हो उठा। उसने पिता की बात समझ ली थी। मन में सोचने लगा " जिस प्रकार मुझे अपने बच्चे को धूप में देखकर दुःख हो रहा है उसी प्रकार पिता जी को मुझे धूप में काम करते देख कर दुःख हो रहा है ...। उसने काम करने का सारा सामान फेंक दिया। तीसरी मंजिल से लड़खड़ाता नीचे आया और पिता के चरणों में गिर पड़ा। बूढ़े ने उठाकर उसे छाती से लगा लिया . दोनों का चेहरा आंसुओं से भीग गया।

तालस्ताय की वेदों में श्रद्धा


तालस्ताय की वेदों में श्रद्धा 
-स्वर्गीय फतेहचन्द शर्मा ' आराधक ' 

युगस्त्रष्टा लियो तालस्ताय भारतीय साहित्य के प्रति विशेष अभिरुचि रखत थे। उनकी भारत के प्राचीनतम साहित्य और महाकाव्यों के प्रति अगाव अद्ध थी। वेदों के नम्बन्ध में उनका ध्यान सबसे पहले आकर्षित हुआ था। वैदिक ज्ञान की उपलब्धि उन्हें गुरुकुल विश्वविद्यालय कांगड़ी से प्रकाशित वैदिक पत्रिका में मिली थी। यह पत्रिका गुरुकुल के भूतपूर्व आचार्य स्व० प्रो० रामदेव के सम्वादकत्व में निकलती थी। पत्रिका में आर्यसमाज के सिद्धान्तों की अपेक्षा वेदविषयक जानकारी विशेष रूप से दी जाती थी। इस कारण महपि तालस्ताय का पत्र - व्यवहार समय - समय पर प्रो० रामदेव से चलता रहता था और प्रो० रामदेव तालस्ताय के भारतीय मित्रों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते थे। लियो तालस्ताय के संग्रहालय के एक विशेष अधिकारी अलेक्जेण्डर शिफमान के अनुसार तालस्ताय वेदों के गम्भीर ज्ञान पर मुग्ध थे। वे वेदों के उन खण्डों पर विशेष ध्यान देते थे जिनका सम्बन्ध नीतिशास्त्र सम्बन्धी समस्याओं से है। यह एक ऐसा विषय था जिसमें उनकी प्रगाढ़ अभिरुचि थी। वेदों में व्याप्त मानवीय प्रेम के सिद्धान्त , मानववाद तथा शान्तिमय श्रम की प्रशस्ति के वे समर्थक थे। दमा अनुभव करते थे कि मानव आत्मा में निहित गुणसम्बन्धी उनके अपने सिद्धान की इससे पुष्टि होती है।

      तालस्ताय के सम्बन्ध में बनाया जाता है कि वे वेद तथा उसके भाप्य एवं उप निपदों को विव्व की सर्वागपूर्ण रचनाओं की श्रेणी में मानते थे क्योंकि इस साहित्य ने कई गताब्दियों ने देश और धर्म की परम्परा को छोड़कर हजारों हृदयों को अपने उत्कृष्ट माहित्य द्वारा विमोहित किया है , जो इस देश के नागरिक भी नहीं। इस दृष्टि से तालस्ताय इस साहित्य को सच्ची कला का अंश मानते थे। उन्होंने अपने एक निबन्ध में लिखा था कि शाक्य मुनि का इतिहास और वेद की कथाएं अपने उदात्त भाव के कारण हमारे लिए अत्यन्त बोधगम्य हैं , चाहे हम विक्षित हों या नहीं। उस युग के लोग हमारी श्रमिक जनता की तुलना में अल्प शिक्षित थे। किन्तु बोधगम्य थे।

     तालस्ताय ने केवल वेदों को पढ़ा ही नहीं , वरन् उनकी शिक्षाओं का भी इस प्रकार से प्रचार किया जिससे उनके बहुत से अनुयायी वेद और उपनिषदों के ज्ञान को भली प्रकार जान सकें। तालस्ताय ने वेद और उपनिषद् दोनों की अनेक सूक्तियों और उक्तियों का संग्रह " पठन विस्तार तथा बुद्धिमान् मनुष्यों के विचार " नाम से किया है। वेदों के अतिरिक्त तालस्ताय अन्य भारतीय प्राचीन कृतियों से विशेषकर ' महाभारत ' और ' रामायण ' से परिचित थे। तालस्ताय ने रूसी और पश्चिमी यूरोप की भाषाओं के श्रेष्ठ अनुवादों के माध्यम से इन उत्कृष्ट कृतियों का ज्ञान प्राप्त किया। यास्नाया पोल्याना के पुस्तकालय में अब भी ' रामायण ' का दो भागों का संस्करण है जो १८६४ में पैरिस से प्रकाशित हुआ था। तालस्ताय श्रीमद्भगवद्गीता के विशेष उपासक थे। महाभारत के सभी भागों की अपेक्षा उन्हें गीता अधिक प्रिय थी। गीता प्रिय होने की जानकारी तालस्ताय के पत्रों और डायरी में लिखे गए समय - समय के उल्लेखों से होती है और पता है चलता कि वे उस पर कितनी श्रद्धा रखते थे। भारतीय महाकाव्यों के कवित्व की भी प्रशंसा उन्होने अपने मित्रों से की थी। भारत के एक प्रसिद्ध विद्वान् को तालस्ताय ने अपने एक पत्र में लिखा था कि महाभारत के सभी भागों की अपेक्षा गीता के प्रति मेरी विशेष आस्था इसलिए भी है कि उसमें पूरे मनोयोग के साथ कर्तव्य पालन करने की प्रेरणा की गई है। उसके प्रति मेरी पूरी निष्ठा रही है और अपने जीवन में मैंने उसका उपयोग करने का प्रयत्न किया है। उन्होंने यह भी लिखा था कि उसका प्रभाव मेरे जीवन पर यहां तक हुआ है कि मैंने अपनी रचनाओं में भी यत्र - तत्र उसका उपयोग किया है। तालस्ताय के पत्र और डायरी के साहित्य से यह पूरी तरह से पता चलता है कि उन्होंने महाभारत और रामायण की सैकड़ों सूक्तियां संग्रहीत की थों और बहुत - सी लोक - कथाएं भी संकलित की थीं। 

         उन्होंने इन कथाओं का पढ़ने योग्य रूसी पुस्तकों में प्रयोग किया था। बाद में उन्होंने इन और तरुणवर्ग के लिए इसी तरह का साहित्य लिखा। तालस्ताय का स्वप्न था कि भारतीय साहित्य का रसास्वादन सोवियत रूस के नागरिक भली प्रकार कर सकें। उनके इस प्रयत्न से हजारों रूसी नागरिकों को भारतीय साहित्य और दर्शन सम्बन्धी विचारधारा को जानने का अवसर मिला। रूसी नागरिक तालस्ताय के माध्यम से शंकराचार्य , रामकृष्ण परमहंस , स्वामी विवेका नन्द आदि भारतीय महापुरुषों और उनके विचारों को जान सके।

सरदार नाहर खाँ



सरदार नाहर खाँ ! 
-जयनारायण व्यास

         इन्सान की कमजोरियों में एक बड़ी कमज़ोरी यह है कि वह दूसरों को अपने से अधिक देखना पसन्द नहीं करता। अगर कोई व्यक्ति बलवान होता है , तो दूसरे लोग उससे डाह करने लगते हैं। इतना ही नहीं वे इस ताक में रहते हैं कि ऐसे व्यक्ति का खातमा कर दिया जाये। कई श्रेष्ठ और महान् गुणी व्यक्ति इसी डाह के कारण खटपटियों के जाल में दुनियां से विदा हो गये और उनके चले जाने से दुनिया गरीब ही हुई है। अपना विकास करके , संसार में श्रेष्ठ बनने के बदले लोगों का नाश करके श्रेष्ठों की श्रेणी में आने की चेष्टा कर चाहे कुछ समय के लिए मान और पूजा प्राप्त कर सकते हैं , पर सही मान और स्थायी प्रतिष्ठा के अधिकारी वे ही हो सकते हैं , जिनमें खुद की कुछ शक्ति हो। यद्यपि महाराजा जसवंतसिंह को बादशाह औरंगजेब ने पठानों का शासन करने के लिए अफ़गानिस्तान भेजा था और उनको रुतबा भी बहुत बड़ा दिया गया था , तथापि वे उनसे भयभीत रहते थे। इसका कारण महाराज की वीरता और चतुराई के अलावा उनके वे स्वामी भक्त सिपाही थे , जो महाराज के लिए प्राण विसर्जन करने को सदैव तत्पर रहते थे। 

ऐसा ही एक वीर था नाहरसिंह ! - ऐसे वीर योद्धाओं के प्रति घृणा या ईर्ष्या करना उन लोगों के लिए स्वाभाविक था , जिनके शरीर में बल और हृदय में साहस का अभाव हो। ऐसे लोगों ने मन - ही - मन महाराजा जसवन्तसिंह से जलने वाले बादशाह औरंगजेब के सामने राठौर नाहरसिंह के लिए कुछ जा बेजा बात की तो क्या अचरज ? " 

अगर नाहरसिंह सचमूच अपने को नाहर या शेर समझते हैं तो उसे राजमहल के पिंजड़े में बंद शेर से कुश्ती लड़नी होगी। " बादशाह ने अपने मुंह लगे लोगों के बहकाने पर निश्चयपूर्वक कहा। उन्होंने सुना और हाँ कह दिया। कुश्ती की घोषणा कर दी गई। शेर के पिंजड़े के चारों ओर दर्शकों की भीड़ थी , उनमें प्रमुख थे बादशाह औरंगजेब खुद। सभी मन में यही कल्पना कर रहे थे कि पिजड़े के सामने आते ही नाहरसिंह का चेहरा पीला पड़ जायेगा और कुछ क्षणों के बाद पिंजड़े में बंद किया हुआ शेर उसकी बोटियों को नोच - नोचकर खाता हुआ नजर आयेगा। 

       पिंजड़े का फाटक खुला और नाहरसिंह उसमें घुस गया। उसके अंग पर एक धोती के सिवा कोई कपड़ा नहीं था। उसके हाथ में अपनी मजबूत अंगुलियों के सिवा कोई शास्त्र नहीं था। वह अन्दर घुसा। घुसने से पहले बादशाह ने पूछा , " क्यों नाहरसिंह , तुम्हें इस शेर से डर तो नहीं मालूम होता ? " " जसवंत का शेर किसी शेर से नहीं डरता। " उस साहसी वीर ने गर्व के साथ उत्तर दिया।

      पिंजड़े में इस समय दो ही प्राणी हैं - बंदी शेर और हत्या के लिए भेजा सिंह ने आवाज कसी- " आजा ऐ बहादुर शेर , हो जायें दो - दो हाथ दोनों शेरों में ! ' , शेर टकटकी लगाये नाहर की तरफ देखने लगा। दर्शकों में सन्नाटा छा गया। सभी मन में यही सोच रहे थे कि एक ही झपट्टे यह भीमकाय इन्सान उस प्रबल पशु के तेज़ दाँतों से फाड़ा जाता हुआ दिखाई देगा , परन्तु सबकी कल्पना के विरुद्ध शेर पिछले पॉबों में दुम दबाकर नाहरसिंह से प्रांख चुराता हुआ पीछे की ओर चला गया। " जहाँपनाह आपके शेर ने जसवन्त के शेर को पीठ दिखाई हैं। पीठ दिखा कर जाने वाले पर हमला करना तो राजपूती शान नहीं है। " उस सन्नाटे को तोड़ते हुए नाहरसिंह ने कहा ! बादशाह ने कोई उत्तर नहीं दिया , पर जब लाख प्रयत्न करने पर भी यह शेर नाहरसिंह की ओर न जा सका और उस तरफ गुर्राने लगा , जिस तरफ़ बादशाह खड़ा था तो औरंगजेब के दिल में निश्चय हो गया कि मौत के सामने जाकर भी बहादुर हिम्मत के साथ खड़े रहते हैं। गर्व के साथ अपने स्वामी की शान बढ़ाने वाले वीर को अब शेर के पिंजड़े बंद रखने का कोई लाभ नहीं था। पिंजड़ा खुला। वीर नाहरसिंह उसी शांति के साथ बाहर निकला , जिसके साथ अंदर घुसा था।  बादशाह अपने हाथों से उसकी कड़ी भुजाओं को पकड़ कर हिलाने लगा। पूछा बादशाह ने , “ ऐ साहसी वीर ! लड़के भी इतने ही साहसी और मजबूत होंगे ; कितने बच्चे हैं तुम्हारे ? " " बच्चे ? ' नाहरसिंह ने मुस्करा कर उत्तर दिया- ' बच्चे कैसे होते हैं शाह ? " मैं शादी के बाद ही पठानों से युद्ध करने चला गया था ! " " तो शादी बाद ही ? ' बादशाह ने ताज्जुब से पूछा। " हाँ राजपूतों को यही शिक्षा मिलती है कि स्त्री और कुटुंब का खयाल क्षेत्र के रास्ते में दीवार न बने ! नाहरसिंह ने सरलता के साथ जवाब दिया । " शाबाश , जसवंतसिंह के शेर ! शाबाश , आज से जसवंतसिंह औरंगजेब का नाहर खाँ होगा। सभी उसे ' सरदार नाहरखाँ कहकर उसकी इज्जत करेंगे। " बादशाह ने कहा। जसवंतसिंह के शेर ने वस्त्र पहने और बादशाह को सलाम किया। बादशाह के हुक्म से सभी दर्शक एक ही कतार में खड़े हुए। वे एक एक करके झुक - झुक कर सरदार नाहरसिंह को सलाम करने लगे। उन लोगों में वे लोग भी थे , जो नाहरसिंह की बहादुरी देखने के बहाने उसकी बोटियां शेर के जबड़ों से चाबी जाती हुई देखना चाहते थे। वे मन ही मन यह बात सोचकर पछता रहे थे कि उनकी इस खटपट ने उनके ईर्ष्या के पात्र नाहर सिंह की टोपी में एक और चाँद लगवा दिया , पर जिस समय वह बहादुर जवान उनके सामने से निकला तो उनको भी झुक कर सलाम करना पड़ा और जवान से कहना पड़ा: सलाम ! सरदार नाहरखाँ।

बाल ब्रह्मचारिणी वीरांगना राणाबाई


महिला जगत 
बाल ब्रह्मचारिणी वीरांगना राणाबाई
 -किशनाराम आर्य 

       राणाबाई नामक एक देवी महान् ईश्वर भक्त थी। उनकी गणना सीता , सावित्री , मदालसा , दमयन्ती , अनसूया , गार्गी , लोपामुद्रा , किशोरी , सती , कौशल्या , किरण , तारा , पद्मावती , लाजवन्ती , और रत्नावली से की जाती है। मरु प्रदेश जोधपुर के हरनावा गाँव के चौधरी श्री जालिम सिंह जी सरदार के जो बिसियों गांवों की सरदारी करते थे यहां विक्रम संवत् सोलह सौ में राणाबाई का जन्म हुआ था। 

वीरांगना राणाबाई ने अनेक दु:ख झेल कर तथा अपने माता - पिता भाई भौजीइयों के अनेक प्रकार से समझाया पर फिर भी विवाह नहीं किया था। राणाबाई बाल्यकाल से ही ईश्वर भक्ति में समय बिताती थी। उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर रखा था। जब 15 या 16 वर्ष की उम्र मे उनके माता - पिता ने विवाह की चर्चा की तो राणाबाई ने अपने जननी जनक के समक्ष हाथ जोड़ अपनी भीष्म प्रतिज्ञा बताते हुए कहा कि मैं अविवाहित रहूंगी। आप मेरे विवाह करने की चिन्ता न करें। चौधरी जालिम सिंह जी ने कहा कि बेटी इस समय हमारी मातृ भूमि के बहुत बड़े भू भाग पर विधर्मी मुसलमानों का राज्य है। मैं उनसे तुम्हारी रक्षा कैसे करूंगा ? राणा बाई ने जवाब दिया कि कृपालु ईश्वर मेरी रक्षा करेगा।


       हरनामा गांव से दो कोस उत्तर दिशा में गाछोलाव नामक का तालाब था। उस तालाब के पास दिल्ली के बादशाह अकबर का सूबेदार हाकिम रहता था। उसके पास पांच सौ सवार रहते थे। वह मुसलमान था। अन्यायी और व्यभिचारी था। राणाबाई के रूप लावण्य युवावस्था और अति सुन्दरता की बात सुन कर उसने अपने मन में ठान ली कि मैं येनकेन प्रकारेण राणा बाई को प्राप्त कर उससे विवाह करूंगा। एक दिन चौधरी जालिम सिंह जी सरकारी लगान लेकर गाछोलाव तालाब के पास से होकर छिवाला के चौधरी के पास जा रहा था। 


किसी ने बता दिया कि यही चौधरी जालिम सिंह जी राणाबाई के पिता हैं। उस छलिया हाकिम ने धोखे से जालिम सिंह को पकड़ लिया और मीठी - मीठी बातों से अनेक तरह के लालच देकर कहा कि तुम अपनी पुत्री राणाबाई का विवाह मेरे साथ कर दो। पहले तो जालिमह जी ने नम्रता से उत्तर दिया कि मेरी लड़की जब अपने धर्म के योग्य वर से विवाह करने से इनकार कर रही है , तो फिर विधर्मी मुसलमान से विवाह कैसे कर सकती है। इस बात को सुनकर वह राजदूत हाकिम बहुत गरम हुआ ; और उसने जालिम सिंह को नजरबंद कर लिया। चौधरी जालिम सिंह ने क्रोधित होकर उसे खूब फटकारा।

 इस पर वह अपनी सेना लेकर हरनामा गांव पर चढ़ गया। सेना ने हरनामा गाँव को चारों तरफ से घेर लिया , नाकेबंदी कर दी फिर वह अपने अंगरक्षक व चुने हुए सैनिक साथ लेकर राणाबाई को लाने उनके घर पहुंचा। ईश्वरीय भक्त राणाबाई उस समय भी प्रभु भजन में शान्तचित्त योगियों की तरह मन व लीन थी। वह दुष्ट राक्षस जब उनके सामने जाकर खड़ा हो गया तो बिजली की चमक जितनी देर में वीरांगना खड़ी हुई और सिंहनी की तरह झपटी। खूंटी से ढाल - तलवार उतार कर म्यान से निकाल ली और एक ही वार से उस हाकिम का सिर काट दिया। फिर उसे बाएं पैर से ठोकर मारी। यवन सैनिक राणाबाई का यह भयंकर रूप देखकर थर थर कांपने लगे। सामना भी किया , परन्तु राणाबाई तो सिंहनी जैसे बकरे पर निडर और निःशंक होकर झपटती है। वैशे ही काट - काट कर उसने लाशों के ढेर लगा दिये। राणाबाई की तलवार की मार से शत्रु प्राण बचा कर भागे। बादशाह अकबर ने फिर हमला नहीं किया। वह अनेक वीरांगनाओं के तलवारों के जौहर देख चुका था। अकबर बड़ा दगाबाज था। उसने रामा कृष्ण और ऋषि महर्षियों की संतान को झूठ , कपट , छल , लोभ , लालच , पद , जागीर नौकरियां और रिश्तेदारियां आदि मीठे विष पिला कर हमेशा के लिए पगु बना देने के प्रयत्न शुरू किये थे। 

     राणाबाई की इस विजय से हिन्दुओ का सिर ऊंचा हो गया । दुःखिया बहिनों को उस समय सिंहनी सदृश वीरांगना बन अपने सतीत्व की रक्षा करने का पद प्रदर्शन मिला। उनकी कीर्ति फैल गई। चौधरी जालिम सिंह छुड़ा लिये गए। राजाओं के जमाने की बात है। कुछ राज पुरुष जोधपुर राजबाई जी की सगाई जयपुर महाराज से करने के लिए जा रहे थे। रात में ये लोग राणाबाई के धाम पर ठहरे और मंद में चूर हो कर के मद्य मांस का सेवन करने लगे। जब जोधपुर महाराजा को मालूम हुआ कि सरकारी उन्मत्त नौकरी ने राणाबाई के धाम की पवित्रता बिगाड कर मद्य मांस का सेवन किया तो तत्कालीन जोधपुर नरेश ने सरकारी नौकरों को सजा दी , और राणाबाई से क्षमा मांगी।

      आज भी राणाबाई की वीरता उनका संगमी जीवन , ईश्वर भक्ति , गोसेवा , निर्भयता , ब्रह्मचर्य पालन और स्वदेश भक्ति के गीत गाये जाते हैं। मारवाड़ में उनकी गाथा चाव से कही और सुनी जाती है। प्रभु , ऐसी महिमामयी वीरगांनाए भारत के घर घर में पैदा करे।

क्रांतिवीरों की अमर ओजस्वी वाणी


क्रांतिवीरों की अमर ओजस्वी वाणी 
-संकलयिता राधेलाल मित्तल 


( १ ) " भाइयों ! बगावत करो। अब देर नहीं करनी चाहिये। ( मंगल पाडे , २६ मार्च १ ९ ५७ ) ( २ ) ( शिवाजी श्लोक ) -केवल बैठे - बैठे शिवाजी की गाथा की आवृत्ति करने से किसी को आजादी नहीं मिल सकती। हमें तो शिवाजी और बाजी राव की तरह कमर कसकर भयानक कृत्यों में जुट जाना पड़ेगा। दोस्तो ! अब आजादी के निमित्त ढाल - तलवार उठा लेनी पड़ेगी। हमें अब शत्रुओं के सैकड़ों गुंडों को काट डालना पड़ेगा। सुनो , हम राष्ट्रीय युद्ध के मैदान में अपने जीवन का बलिदान कर देंगे और आज उन लोगों के रक्तपात से जो हमारे धर्म को नष्ट कर रहे हैं या आघात पहुंचा रहे हैं , पृथ्वी को रंग देंगे। हम मारकर ही मरेंगे और तुम लोग घर बैठे औरतों की तरह हमारा किस्सां सुनोगे ।

       ' आर्य भ्राताओं के दिल में उत्साह की लहर पैदा हो और हम लोग विद्रोह का टीका माथे पर लगायें। ” ( क्रांतिकारी हुतात्मा चाफेकर बधु , जून १८९७ )।

 ( ३ ) मैं मानता हूं कि मैंने एक अंग्रेज का रक्त बहाने का प्रयास किया। किन्तु उसका उद्देश्य यही था कि अंग्रेजों ने जिस प्रकार भारतवर्ष के देशभक्त युवकों को फांसी , कालापानी या लम्बी सजायें देने का क्रम जारी कर रखा है , उसके प्रतिकारात्मक विरोध प्रकट करूं। ऐसा करते समय मैंने अपनी आत्मा के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति से नहीं पूछा न उसको राय ली। मैंने जो कुछ किया , कर्तव्य के नाते ही किया। 

हिन्दू होने के नाते मेरा विश्वास है कि आत्मा कभी मरती नहीं अतः शरीर गिरने के पूर्व प्रत्येक भारतीय दो अंग्रेजों को समाप्त करता चले तो 
देश की स्वतन्त्रता एक दिन में प्राप्त की जा सकती है। जब तक भारत स्वतंत्र न हो जाये , 

श्रीकृष्ण का देशवासियों के लिए यही कर्म संदेश है। मेरी अंतिम कामना है कि मैं फिर से भारत की ही गोद में जन्म लू तथा पुन: देश को स्वतंत्र कराने के कार्य में संलग्न हो जाऊं। मैं चाहूंगी कि मेरी पुन: मृत्यु होने तक मेरा प्रिय देश स्वतन्त्र हो जाये। भारत के स्वतन्त्र होन तक मैं इसी ध्येय के लिए बार - बार जन्म लूं और मृत्यु का वरण करू। प्रभु मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करें। मेरी यही कामना है। वन्दे मातरम्।.. " मदनलाल ढींगरा ( १७ अगस्त १६०९ ' पेन्टन विले कारागार , लन्दन )

 ( ४ ) " तुम रोती हो तो रोओ , किन्तु इस रोने से क्या मिलेगा ? दुःख तो मुझे भी है। मैंने किस बात का बेड़ा उठाया था और उसे कितना सिद्ध कर पाया। मर तो मैं रहा हूँ , पर जिस कारण मैं मर रहा है , वह पूरा कहां हुआ। मैं यह देखकर मर रहा हूँ कि मैंने जो कुछ भी किया वह छिन्न भिन्न हो गया। मुझे दु.ख है कि मैं माता पर अत्याचार करने वालों से बदला नहीं ले सका। जो मन की बात थी वह मन में ही रह गयी। मेरा यह शरीर नष्ट हो जायेगा , किन्तु मैं मोक्ष नहीं चाहता। मैं तो चाहता है। कि बार - बार इसी भूमि में जन्म लूं और बार - बार इसी के लिए मरूं ' ऐसा तब तक करता रहूं , जब तक देश पराधीनता के पाश से मुक्त हो जाये ... " ( महान क्रांतिकारी पं० गेंदालाल दीक्षित का मृत्यु पूर्व पत्नी के प्रति संदेश , २१ दिसम्बर , १९२० )। 

    ' है देश को स्वाधीन करना जन्म मम संसार में , 
     तत्पर रहूंगा में सदा अंग्रेज दल संहार में।
     अन्याय का बदला चुकाना मुख्य मेरा धर्म है ;
      मद - दलन अत्याचारियों का यह प्रथम शुचिकर्म है। 
     मेरी अनेकों भावनायें उठ रही हृद्धनाम में ,
     बस शांत केवल कर सकुंगा में उन्हें संग्राम में। 
     स्वाधीनता का मूल्य बढ़कर है सभी संसार से, 
     बदला चुकेगा हरणकर्ता के रुधिर की धार से। 
    अंग्रेज रुधिर प्रवाह में निज पितृगण तर्पण करूं।
    हो तुष्ट दुःशासन रुधिर के स्नान से यह द्रौपदी , 
   हो सहस्त्रावाहु विनाश से यह रेणुका सुख में पड़ी। 
    है कठिन अत्याचार का ऋण ब्रिटिश ने हमको दिया ,
    सह ब्याज उसके उऋण का हमने कटिन प्रण है किया। 
    मैं अमर हूं मेरा कभी भी नाश हो सकता नहीं , 
    है देह नश्वर त्राण इसका हो नहीं सकता कहीं होते हमारे मातृ जग में , 
    पद - दलित होगी नहीं , रहते करोड़ों पुत्र के जननी दुखित होगी नहीं। 
    उद्धार हो जब देश का इस क्लेश से तलवार से। 
    भयभीत होंगे नहीं हम जेल - कारागार से। 
     रहते हुए तन प्राण रण से मुख न छोड़गे कभी ,
     कर शक्ति है जब तक न अपने शस्त्र छोड़ेगे कभी। 
     परतंत्र होकर स्वर्ग के भी वास की इच्छा नहीं , 
     स्वाधीन होकर नरक में रहना भला उससे कहीं। 
     है स्वर्ण पिजर वास अति दुख पूर्ण सुन्दर कीर को , 
     वह चाहता स्वच्छंद वितरक अति विपिन गंभीर को चाण। 
     जंजीर की झनकार में शुभ गीत गाते जाएंगे , 
     तलवार के आधात में निज जया मनांते जायेंगे। 
    हे ईश ! भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो , 
    कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो।
    ( महान क्रांतिकारी पं० गेंदालाल दीक्षित , अध्यापक व उनके साथियों की प्रतिज्ञा के स्वर , ) 

( ५ ) दिनांक १६ दिसम्बर १६२७ को जो कुछ होने वाला है उसके लिए मैं अच्छी तरह तैयार है। यह है ही क्या ? शरीर का बदलना मात्र है। मुझे विश्वास है कि मेरी आत्मा मातृभूमि तथा उसकी दीन संतति के लिए नये उत्साह और ओज केप साथ काम करने के लिए शीघ्र ही फिर लोट आयेगी। 

  यदि देश हित मरना पड़े मुझको सहस्रों बार भी , 
  तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाऊ कभी। 
    ( काकोरी कांड के नायक पं० रामप्रसाद बिस्मिल का फांसी के दिन १६ दिसम्बर , १६२७ के पूर्व एक मित्र को लिखा पत्र )

( ६ ) मैंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नालदार जूतों के नीचे अपने देश आसियों को रोंदे जाते देखा है। इस प्रकार अपना प्रतिवाद प्रस्तुत करते हुए मुझे कोई दु:ख नहीं है। मुझे इस बात में इंच भर भी शंका नहीं है कि मुझे आप फांसी दे देंगे या और सजा देंगे। मृत्यु का भय मुझमें नहीं रह गया। बुढ़ापे तक लड़खड़ाते हुए जीने का कोई अर्थ नहीं होता। देश के लिए जवानी में मर जाना कहीं अधिक अच्छा है । ( महाक्रांतिकारी सरदार ऊधमसिंह का लन्दन के न्यायालय में बयान , बलिदान ( फांसी ) [ ३१-७-१९४० ]। 

( ७ ) ' कल मैंने सुना कि प्रिवी कौंसिल ने मेरी अपील अस्वीकार कर दी। आप लोगों ने हम लोगों की प्राण रक्षा के लिए बहुत - कुछ किया , कुछ उठा नहीं रखा पर मालूम होता है कि देश की बलिवेदी को हमारे रक्त की आवश्यकता है। मृत्यु क्या है ? जीवन की दूसरी दिशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसलिए मनुष्य मृत्यु से दुःख और भय क्यों माने ? वह तो नितान्त स्वाभाविक अवस्था है। उतनी ही स्वाभाविक जितना प्रभात कालीन सूर्योदय। यदि यह सच है कि इतिहास पलटा खाया करता है तो मैं समझता हूं कि हमारी बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा। सबको मेरा अंतिम नमस्कार। 
[ क्रांति के दीवाने राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी का बलिदान ( फांसी ) १७-१२-१९२७ के तीन दिन पूर्व लिखा पत्र। .