Monday, February 25, 2019

महामृत्युञ्जय मन्त्र में खरबूजे की उपमा का मार्मिक सन्देश



प्रियांशु सेठ

वेदों की विश्व-विश्रुति का अन्यतम कारण यह भी है कि जिस किसी भी कोण से हम इस अद्भुत ग्रन्थ का अध्ययन करें, यह अपने प्रस्तार से अमाप्य है। इसके एक मन्त्र का सम्पूर्ण आकलन समग्र जीवन-साधना की अपेक्षा रखता है। ईश्वर प्रदत्त ज्ञान की यही तो विशेषता रही है कि यह ज्ञान के अक्षय मधुकोष से सम्पृक्त होकर हृदय व आत्मा दोनों को आह्लादित कर देता है। यदि वेद-मन्त्रों के अलंकरण पर दृष्टि किया जाए तो यह अलंकारों का कुबेर कोष प्रतीत होगा। जिस प्रकार सुन्दर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित और अलंकृत स्त्री और भी अधिक शोभायमान प्रतीत होती है तथा पति के चित्त को आह्लादित करती है, उसी प्रकार वेद के मन्त्र भी अलंकृत होने से अत्यधिक सुन्दर और हृदय-ग्राह्य होती है। इसी सम्बन्ध में एक कवि-उक्ति भी है-
युवतेरिव रूपमंग काव्यं स्वदते शुद्धगुणं तदप्यतीव।
विहितप्रणयं निरन्तराभि: सदलंकारविकल्पकल्पनाभि:।।

अलम् पूर्वक कृ धातु से भाव का कारण अर्थ में धञ् प्रत्यय करके अलंकार शब्द निष्पन्न होता है, इस प्रकार जो भूषित करे वह अंलकार है। अलंकारों का मुख्य कार्य है, किसी की सुन्दरता का संवर्धन करना। हमारे परस्पर सम्भाषण में भी अलंकार बिना प्रयास किये ही स्वतः आ जाते हैं। यद्यपि वैदिक ऋषि आलंकारिकों द्वारा निर्दिष्ट किये गए अलंकारों से परिचित नहीं थे, परन्तु अलंकार शब्द और उसके कार्य से वे भली भांति परिचित थे। हम उपनिषदों की ही बात करें तो उनमें भी अलंकार आपाततः आ गए हैं। ईशावास्योपनिषद् में जहां हिरण्यमय पात्र से सत्य के मुख को ढका हुआ बताया गया है (हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। -१५), वहां भी एक प्रकार से अलंकार की महत्ता को ध्वनित कर दिया गया है। ब्राह्मण ग्रन्थों में "असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मा अमृतं गमय" एक सार्वभौम, सार्वजनीन प्रार्थना है। जीवन-संघर्ष में पड़े व्यक्ति के सामने सदा से दो पक्ष खुले रहे हैं- असत्-सत्-तमस्-ज्योति, मृत्यु-अमृत। विवेकशील व्यक्ति पहले को छोड़ दूसरे को अपनाता है। मन्दमति व्यक्ति ही सत्य की तुलना में असत्य का, ज्योति की तुलना में अन्धकार का और अमृत की तुलना में मृत्यु का वरण करेगा। इस उपर्युक्त उपदेश का सार उसका अन्तिम चरण 'मृत्योर्मा अमृतं गमय' ही है। इसी तथ्य को ईश्वरीय वाणी वेद में "मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्" ऐसा कहा है- 'हे प्रभो! मुझे मृत्यु-बन्धन से छुड़ा, अमृतत्व से नहीं। यह टेक जिस मन्त्र की है, उसे वैदिक वांग्मय में "महामृत्युञ्जय" नाम दिया गया है। मन्त्र का पूर्ण स्वरूप निम्नलिखित है-

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्। उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुत:।। -यजु० ३/६०

महर्षि दयानन्दजीकृत भाष्य- इस मन्त्र में उपमालंकार है। मनुष्य लोग ईश्वर को छोड़कर किसी का पूजन न करें, क्योंकि वेद से अविहित और दुःखरूप फल होने से परमात्मा से भिन्न दूसरे किसी भी उपासना न करनी चाहिए। जैसे खर्बूजा फल लता में लगा हुआ अपने आप पक कर समय के अनुसार लता से छूट कर सुन्दर स्वादिष्ट हो जाता है, वैसे ही हम लोग पूर्ण आयु को भोग कर शरीर को छोड़ के मुक्ति को प्राप्त होवें। कभी मोक्ष की प्राप्ति के लिए अनुष्ठान वा परलोक की इच्छा से अलग न होवें और न कभी नास्तिक पक्ष को लेकर ईश्वर का आनन्द भी करें। जैसे व्यवहार के सुखों का लिए अन्न, जल आदि की इच्छा करते हैं, वैसे ही हम लोग ईश्वर, वेद, वेदोक्तधर्म और मुक्ति होने के लिए निरन्तर श्रद्धा करें।

यहां एक प्रश्न मन में उठना स्वभावतः है कि इस मन्त्र में उपमा अलंकार ही क्यों विद्यमान है? इसका बहुत ही सरल उत्तर यह है कि उपमा सादृश्य-मूलक अलंकारों की बीजभूत है, उपजीव्य है, मेरुदण्ड है, प्राण-स्पंदन है। उपमा भिन्न स्तरीय वस्तुओं को एक स्नेह सूत्र में बांधती है, वैसा दृश्य में सादृश्य का अन्वेषण करती है, दो पदार्थों को बराबर-बराबर तोल (उप+मा) देने का यत्न करती है। भावनाओं के अयत्नज आप्लावन के साथ उपमा जिस सहजता से वह निकलती है, वैसा अन्य अलंकार में नहीं। यही कारण है कि वेद-मन्त्रों में उपमा अलंकार की ही अधिकता दिखलाई पड़ती है।

मैं प्रायः सोचा करता था कि जब सृष्टि पर खर्बूजे की तुलना में एक-से-एक उत्तम फल विद्यमान हैं तो ईश्वर ने खर्बूजे को ही उपमा क्यों बनाया? उर्वारुकमिव बन्धनात् ही क्यों? आम्रमिव, नारिकेलमिव, कदलीमिव, द्राक्षमिव क्यों नहीं? इनमें से किसी एक फल को उपमा बनाया होता तो क्या ही अच्छा होता! विचारने पर ज्ञात हुआ कि मनुष्य को इस बात का बोध कराने के लिए कि वह अपने जीवन को कैसे सफल करे, इससे बढ़िया उपमा दी ही नहीं जा सकती थी। वास्तव में इस वेद-मन्त्र में खर्बूजे को ही उपमा देना परमेश्वर का चमत्कार है। मनुष्य मृत्यु के बन्धन से तभी छूट सकता है जब तक वह पक न जाए और पकने के लिए जुड़ना आवश्यक है। मनुष्य के जीवन-फल के परिपक्व होने की पहचान खर्बूजे फल से जानी जा सकती है क्योंकि यही एक ऐसा फल है जो पकने के बाद डाल से स्वतः पृथक् हो जाता है। कच्चा फल तो किसी के उपयोग का नहीं रहता। वह सर्वथा नीरस, निर्गन्ध, नीरूप, स्वयं सड़ जाये, सम्पर्क में आने वालों को भी सड़ा दे, ऐसा रहता है। मनुष्य का कच्ची अवस्था में छूट जाना भी ऐसा ही है जैसे फल का कच्चा टूट जाना। हे मुमुक्षो! आओ खर्बूजे फल के पकने की पहचान कर उससे अपने जीवन की तुलना करें। जब उस पहचान-कसौटी पर हम अपने को कसकर खरा बना लेंगे तो हमारी परिपक्वता में कोई सन्देह नहीं रहेगा अर्थात् परिपक्व होते ही मुक्ति हो जाएगी।

पहली पहचान-
खरबूजे के फल के पकने की पहली पहचान यह है कि डाल सर्वथा बेल के साथ चली जाये, फल के साथ न आए। डाल अथवा डाल के किसी भाग का फल के साथ आना उसके कच्चेपन की निशानी है। पके फल में यह सम्भव नहीं। मुमुक्षु व्यक्ति भी यह देखे कि संसार से मुक्त होते हुए कोई वासना मेरे साथ तो नहीं आई। यदि वासना का एक तार भी मेरे साथ आयेगा तो वह पुनर्बन्धन का कारण होगा। झटका देकर कच्चे फल को तोड़ने से डाल के किसी भी तन्तु का साथ आना सम्भव है। इसलिए हे मुमुक्षो! किसी घबराहट से, अथवा किसी आधि-व्याधि से, उतावलेपन से झटका देने का साहस न करना। अन्यथा वासनाओं के ये तार तेरे-पीछे चले आयेंगे और कहीं-न-कहीं उलझा लेंगे।

दूसरी पहचान-
मुमुक्षो! खरबूजे फल के पकने की दूसरी पहचान है उसकी गन्ध। परिपक्व फल अपने पकने की सूचना गन्ध से देने लगता है। उसकी गन्ध से आसपास का वातावरण सुवासित हो उठता है। यह सुगन्ध तब तक रुकी हुई थी जब तक डाल जुड़ी हुई थी। डाल पृथक् हुई कि सुगन्ध फूट पड़ी। जिस प्रकार शीशी में बन्द पड़े हुए इत्र का कुछ पता नहीं कि इसमें क्या है, परन्तु जैसे ही डाट खुली कि सारा वातावरण सुवासित हो गया। अतः वातावरण को सुगन्धित करने के लिए डाल का पृथक् होना आवश्यक है। निष्कर्ष यह निकला कि बिना बंधे सुगन्ध उत्पन्न हो नहीं सकती और बिना छूटे सुगन्ध फैल नहीं सकती।
प्रायः देखा गया है कि घर में खरबूजे लाए गए और उन्हें बच्चों की आंख से बचाकर रख दिया गया। बच्चों ने घर में प्रवेश करते ही ताड़ लिया कि आज तो घर में खरबूजे आए हैं! देखकर नहीं, सूंघकर।

इसी प्रकार हे मुमुक्षो! तू मुक्ति का अधिकारी हुआ है या नहीं, इसकी जांच करनी हो तो खरबूजे फल को उपमा बना लेना। देखना कि तेरे जीवन-फल की पुण्य गन्ध दिग्दिगन्त में व्याप्त हुई है या नहीं; यदि हो गई है तो अपने को मुक्ति का पात्र मानना, अन्यथा समझना कि अभी मैं कच्चा हूं; डाल पृथक् नहीं हुई है। वासना-डाल ने अभी तेरी गन्ध को रोका हुआ है। इसलिए निरन्तर पकने के प्रयास करते रहना, उस समय तक जब तक तेरी पुण्य गन्ध सर्वत्र फैल नहीं जाती। यह जीवन-फल के पकने की दूसरी पहचान है। लोग सुगन्ध पाकर तेरी ओर खिंचे चले आएं। लाख छुपा हुआ हो, तुझे ढूंढ ही निकालें।

तीसरी पहचान-
खरबूजे के पकने की तीसरी पहचान है उसका रंग-रूप। जहां उसकी अन्तरात्मा सुगन्ध से परिपूर्ण हो, वहां बाहर का रूप-रंग भी आकर्षक हो, इतना कि साथी पर रंग छोड़े बिना न रहे।
फल की सुगन्ध जहां दूर जाते व्यक्ति को समीप लाती है, वहां उसका रूप समीप आए व्यक्ति को प्रभावित करता है, अपना रंग छोड़ने लगता है, हिलने नहीं देता। इसलिए प्रायः खरबूजा खरीदते समय लोग जहां बार-बार गन्ध लेकर फल पकने की पहचान करते हैं, वहां उसकी रंगत भी देखते हैं।
ऐ मुमुक्षो! अपने पकने की जांच करने के लिए खरबूजे फल को कसौटी बनाना। तू यह अवश्य देखना कि तेरे जीवन-फल की पुण्य गन्ध ने वातावरण को सुवासित किया अथवा नहीं? लोग तेरे पास खिंचे चले आ रहे हैं अथवा नहीं? तेरी संगति में बैठने को लालायित हैं वा नहीं? यह भी देखना कि तेरे निकट आये व्यक्तियों पर कुछ रंग चढ़ा वा नहीं? यदि तेरा रंग पड़ोसी पर चढ़ गया तो अपने को मुक्ति का अधिकारी समझना, यदि नहीं चढ़ा तो समझ लेना कि अभी तू कच्चा है, मृत्यु-बन्धन से छुटकारा न हो पाएगा। यह सर्वथा असम्भव है कि पके हुए व्यक्ति की संगति में कोई आए और उसपर रंग न चढ़े। कहावत है 'खरबूजा खरबूजे को देखकर रंग पकड़ता है।' यह मानना कि खरबूजे के समीप लगे करेले पर रंग चढ़ना असम्भव है, परन्तु समीप लगे खरबूजे पर तो रंग छोड़ ही देना। तेरी संगति में यदि मनुष्य आए तो तुझसे प्रभावित हुए बिना न लौटे। इसलिए अपने जीवनफल की परिपक्वता की जांच करने के लिए यह देख लेना कि पड़ोसी पर तू रंग छोड़ता है या नहीं? यह फल के पलने और जीवन को परखने की तीसरी पहचान है।

चौथी पहचान-
परिपक्व खरबूजे की चौथी विशेषता यह है कि खरबूजे में उसका रस समा नहीं पाता, वह फूटकर बहने लगता है। मानो निकट आए व्यक्ति को कहता हो कि मेरी सुगन्ध और रूप पर ही मोहित न होओ, मेरे हृदय को टटोलकर देखो, उसमें रस-ही-रस भरा हुआ है, मैंने अपना हृदय आपके सामने खोलकर रख दिया है। यदि फिर भी मुझे न पहचान पाओ तो यही समझूंगा कि मेरे पारखी दुनिया में नहीं रहे।
साधक! तुझे भी देखना होगा कि तेरा हृदय-स्त्रोत जनता-जनार्दन की प्यास बुझाने को फूटा पड़ा है कि नहीं? यदि तेरा हृदय नीरस है तो यह दूर तक गन्ध पहुंचाना और आकर्षक रूप दिखावा मात्र है, पाखण्ड है। इसलिए जैसे बाहर से हो वैसे अन्दर से भी रहो! हृदय में सरसता हो जिससे सरस्वती फूट पड़े, जिसका पान करके लोग तृप्त हो उठें। 'यदन्तरं तद् बाह्यम् (अथर्व० २/३०/४)'- बाहर से भी आकर्षक, अन्दर से भी सरस।

पांचवीं पहचान-
खरबूजे में यह रस इतना परिपूर्ण हो जाता है कि वह फूट पड़ता है। प्रायः इसीलिए लोग फटे हुए खरबूजे को खरीदना पसन्द करते हैं। उनको यह भरोसा होता है कि वह बड़ा मधुर होगा, और जैसे ही तराशकर एक फांक जिह्वा पर रक्खी कि सहसा मुंह से निकला- वाह! मिश्री-सा मीठा है! शहद-सा शीरीं है!
इसी प्रकार हे जिज्ञासो! यह व्यक्त होने वाली वाणी ही मधुर न हो, उसका मूल स्रोत हृदय भी माधुर्य से भरा हो। सरस्वती का प्रवाह जहां अक्षय हो, वहां माधुर्य से भरा होना चाहिए- 'जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम् (अथर्व० १/३४/२)'।
खरबूजे के पकने की पांचवीं पहचान से अपनी जांच कर लेना। ठीक इसी के तुल्य अन्तः करण को मधुर बना लेना। फिर कहीं मृत्यु से छूटने का नाम लेना।

छठी पहचान-
ऐ भक्त! खरबूजे के अन्दर जहां रस होता है, जहां माधुर्य होता है, वहां एकरूपता भी होती है। उसके पकने की यह छठी पहचान है। वह अन्दर से एकरस, एकरूप, एकरंग है। बाहर की विविधता का उसके अन्तःकरण पर कोई प्रभाव नहीं।
ऐ मुमुक्षो! अपने हृदय को जांचना, वहां इसी प्रकार की भावना की स्थापना कर लेना! अपने-पराये की भावना को उसमें स्थान न देना! समस्त वसुधा को अपने हृदय में संजो रखना! फिर तू अमृत का अधिकारी होगा। बिना हाथ छुआए सहज ही पृथक् हो जाएगा।

सातवीं पहचान-
सातवीं पहचान है उसके अन्दर के बीजों का गूदे में खुभे न रहना; गूदे को छोड़कर अलग हो जाना।
प्रत्येक जिज्ञासु को इस उपमा से यह उपदेश लेना होगा कि मृत्यु-बन्धन से छूटने के लिए जहां बाह्य विषय-वासनाएं उसे छोड़ जाएं, वहां अन्तःकरण में पड़े हुए गुप्त और सुप्त संस्काररूप बीज भी उसे छोड़ जाएं। जिस प्रकार बाह्य वासनाओं का एक भी कच्चा तार पुनर्बन्धन का कारण बन सकता है, वैसे ही अन्तःकरण में पड़े हुए संस्कार-बीज भी मृत्यु-बन्धन का कारण बन सकते हैं। इसलिए जीवन-फल को परिपक्व करने के लिए जहां बाह्य वासनाओं से छुटकारा पा लेना आवश्यक है, वहां अन्तःकरण में पड़े हुए संस्कार-बीज को निश्शेष कर देना भी आवश्यक है।

आठवीं पहचान-
हम खरबूजे फल के अन्दर की एकरसता, एकरूपता का वर्णन कर आए हैं। परन्तु खरबूजे का बाहरी रूप-रंग ठीक उससे भिन्न है। आप खरबूजे के ऊपर की फांकों की गणना कीजिए। वे गिनती में दस निकलेंगे। खरबूजे को दशांगुल कहने का कारण यही प्रतीत होता है। खरबूजे के ऊपर बनी दस फांकें दश अंगुल का प्रतीक है, मानो खरबूजा फल कहता है कि ऐ भक्त! अपने जीवन-फल को पकाने के लिए तेरे दोनों हाथों की ये दस अंगुलियां काम आनी चाहिए। इनकी छाप स्पष्ट नजर आनी चाहिए। किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा पकाए फल के उपभोग की कामनामात्र भी तेरे लिए अभिशाप है। पुण्य कोई करे और फल तू खाए, यह पुरुष के लिए उचित नहीं। तुझे तो गर्व से ये शब्द कहने चाहिए- 'कृतं मे दक्षिणे हस्ते, जयो मे सव्य आहित: (अथर्व० ७/५०/८)' अर्थात् मेरे दाहिने हाथ में पुरुषार्थ है और बाएं हाथ में सफलता। जिस फल पर मेरे पुरुषार्थरूप दस अंगुलियों की छाप पड़ेगी, उसी का स्वयं उपभोग करूँगा और अन्यों को भी कराऊंगा। उसी फल को पाकर सफल बनूंगा।

खरबूजे फल पर बनी दस फांकें जहां दस अंगुलियों का प्रतीक है, जहां पुरुषार्थ की छाप का प्रतीक है, वहां पञ्च ज्ञानेन्द्रियों और पञ्च कर्मेन्द्रियों की छाप का भी प्रतीक है। जीवन-फल की उपलब्धि इन्हीं इन्द्रियों के माध्यम से सम्भव है। परन्तु पुरुषोत्तम व्यक्ति वह है जो इस फल की कामना से ऊपर रहता है। पुरुष-सूक्त में ऐसे ही व्यक्ति का वर्णन करते हुए कहा है- 'अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् (ऋ० १०/९०/१)'- वह पुरुष दश अंगुल का अतिक्रमण करके ठहरता है। इसी वास्तविकता के दर्शन खरबूजे फल में भी किये जा सकते हैं। उसमें अन्तर्निहित रस और माधुर्य ऊपर के दशाङ्गुल छिलके का अतिक्रमण करके बहाता है।
उपासक! इस रस का आस्वादन छिलके को पृथक् करके ही किया जाता है। देखना, तुझे भी प्रकृतिरूपी छिलके को पृथक् करना होगा, तभी तू ब्रह्मानन्द-रस का आस्वाद ले पायेगा। निस्सन्देह परम रस और परम गन्ध, प्रकृति, छिलके में ही बन्द रहती है। तेरे अन्तर्हृदय में बहनेवाला रस भी नाभि-केन्द्र से ठीक दस अंगुल अतिक्रमण करके रहता है। यदि कहीं उसका स्त्रोत मस्तिष्क को मान लें, तो भी वह त्रिकुटि से दशाङ्गुल ऊपर सहस्त्रार चक्र में रहता है। अहा! खरबूजे के पकने की यह पहचान क्या सुन्दर उपदेश दे रही है।

नवीं पहचान-
वनस्पति-जगत् में वृक्षों की अपेक्षा बेलों में यह विशेषता है कि वे अपने समीपस्थ आश्रय पर फैल जाती हैं। वृक्षादि का सहारा पाकर लिपटती और चढ़ती चली जाती हैं। बेलों के हर जोड़ और फटाव पर कुछ तन्तु निकलते रहते हैं जो उनके जमाव में सहायता देते हैं। यह विशेषता खरबूजे की बेल में भी है। जहां हर जोड़ से निकले हुए ये तन्तु जड़ जमाते हैं, वहां भोजन भी ग्रहण करते हैं। इन्हीं के कारण बेल पनपती, फूलती, फलती है।
फल के मूल में भी इसी प्रकार का एक तन्तु लगा रहता है जिसे आप खरबूजे की मूंछ कह सकते हैं। इसका काम न पंजा जमाना है न खुराक लेना है; इसका काम फल पकने की सूचना देना है। जैसे ही फल के मूल में लगा हुआ यह तन्तु सूखा कि माली समझ गया कि फल पक गया। तरबूज फल, जिसकी डाल अन्तिम समय तक फल को नहीं छोड़ती, पकने की सूचना मूल में लगा हुआ यह तन्तु सूखकर ही देता है। इस प्रकार खरबूजे फल के पकने की यही नवीं पहचान है।

प्रिय मित्र! मृत्यु की यह बेल, जिसमें हम सब खरबूजे फल की भांति जुड़े हुए हैं, निकट की हर वस्तु पर छा जाने के लिए है और बराबर अपना पंजा जमाने के लिए है। तू भी अपने प्रकृति-पंजे को जमाना, भोजन लेना, पानी लेना, परिपक्व होना; और जब तेरे जीवन-फल के तृष्णा-तन्तु सूखने लगें, मूंछें पकने लगें तो समझ लेना कि अब छूटने के समय निकट है। गृहस्थाश्रम से मुक्त होकर वानप्रस्थ बनने की एक पहचान यह बाल पकना भी तो है। मनु महाराज लिखते हैं-

"गृहस्थस्तु यथा पश्येद् वलीपलितमात्मनः।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत्।। -मनु० ६/२
अर्थात् (गृहस्थः तु) गृहस्थ (यदा) जब (आत्मनः) अपने (वली पलितम्) शरीर को कमजोर (पश्येत्) देखे। (अपत्यस्य च अपत्यम्) और पुत्र के पुत्र को देखे (तथा) तब (अरण्यं समाश्रेयत्) वानप्रस्थी हो जावे।

ऐ साधक! बालों के साथ-साथ तेरी वासनाएं भी पक जानी चाहिए। जैसे बाल पककर स्वतः झड़ जाते हैं, वैसे ही जब तेरी वासनाएं पककर झड़ जायेंगी, तो तू मोक्ष का अधिकारी बन जायेगा।

ऐ मुमुक्षो! तुझे मुक्त होने के लिए पकना होगा, और पकने के लिए उक्त पहचानों का अनुष्ठान करना होगा। उसके बाद तू मृत्यु-बन्धन से छूटकर अमृतत्व का उपभोग करेगा और 'मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात' की प्रार्थना सफल होगी। सावधानी बरतना, जीवन-फल के पूर्ण परिपक्व होने तक फूंक-फूंककर कदम रखना! कहीं कोई ऐसा कार्य न कर बैठना कि लोगों की अंगुली तेरी ओर उठने लगे! देखना अंगुली उठी कि तेरा जीवन-फल मुरझाया। व्यक्ति तेरी ओर अंगुली न उठाकर तेरे से हाथ मिलाने, पञ्जा बढ़ाने अथवा दोनों हाथ मिलाकर नमस्ते करने में प्रसन्नता अनुभव करें। बस अंगुली न उठवाना। साधक! सावधान रहना।

सहायक ग्रन्थ-: 'मृत्युञ्जय सर्वस्व'- दीक्षानन्द सरस्वती

Saturday, February 23, 2019

वेद ही क्यों?



वेद ही क्यों?

पं० क्षितिश कुमार वेदालंकार

[संसार के सभी मत वाले अपने-अपने धर्म ग्रन्थों को ईश्वरीय ज्ञान कहते हैं, तब प्रश्न उठता है कि वेद ही क्यों? इस प्रश्न का सुलझा उत्तर आर्यसमाज के उच्च कोटि के विद्वान्, वक्ता और पत्रकार लेखक की लेखनी से पढ़िए। -डॉ० सुरेन्द्र कुमार]

इस प्रश्न को उपस्थित करने वाले दो प्रकार के वर्ग हैं। एक वर्ग को हम आस्तिक या धार्मिक लोगों का वर्ग कह सकते हैं और दूसरे वर्ग को नास्तिक या अधार्मिक लोगों का वर्ग।
जो नास्तिक या अधार्मिक लोग हैं वे तो ईश्वर या धर्ममात्र के विरोधी हैं। उनकी दृष्टि में सभी धर्मग्रन्थ त्याज्य हैं, इसलिए वे किसी भी धर्मग्रन्थ के गुणावगुण पर विचार करने को भी तैयार नहीं, परन्तु जो धार्मिक लोग हैं, वे भी नाना सम्प्रदायों और अनेक मत-मतान्तरों में बँटे हुए हैं और हरेक मतवादी अपने ही धर्मग्रन्थ को सर्वश्रेष्ठ मानता है। ऐसा मानना स्वाभाविक भी है। मतवादियों को अपने मत से मोह होता ही है। इस मोह के वशीभूत होकर यदि कोई अपने मत को अन्य मतों से तथा अपने धर्मग्रन्थ को अन्य धर्मग्रन्थों से उत्कृष्ट समझे तो इसे अनुचित कैसे कहा जाए? प्रत्येक माता को अपना पुत्र ही संसार में सबसे सुन्दर लगता है न!

विभिन्न मतवादी लोग अपने मत की उत्कृष्टता सिद्ध करने में इस सीमा तक आगे बढ़ गए हैं कि वे अपने धर्मग्रन्थ को ही ईश्वर-कृत मानते हैं और अपने धर्मग्रन्थ की भाषा को भी ईश्वरीय या दैवीय भाषा मानते हैं। प्राचीन यहूदी लोगों का विश्वास था कि परमात्मा को केवल हिब्रू भाषा ही आती है, उसी हिब्रू भाषा में उसने संसार को धर्म का उपदेश दिया। जैनी लोग चिरकाल तक यह मानते रहे हैं कि तीर्थंकरों की भाषा केवल मागधी थी। यही दिव्य भाषा है इसलिए उसी में उपदेश दिया गया है। यहां तक कि उनके विश्वास के अनुसार संसार भर के पशु-पक्षी भी मागधी भाषा ही जानते हैं।
अधार्मिक या नास्तिक लोगों की बात फिलहाल छोड़ दें। उनकी आवाज में जितना कोलाहल का जोर है उतना तर्कों का औचित्य नहीं। नास्तिकता एक फैशन बन गया है और फैशन तर्कातीत होता है, परन्तु जो आस्तिक हैं और धार्मिक हैं, उनमें भी परस्पर इतने मतभेद हैं कि बहुत बार इनकी परस्पर सिर फुटव्वल देखकर यही मन में आता है कि इनसे तो नास्तिक ही अच्छे!
परन्तु नास्तिकता से भी मनुष्य की बुद्धि को सन्तोष नहीं होता। वह ऊहापोह करती ही रहती है। मनुष्य के मन में मोह का समावेश भी होता ही रहता है- परन्तु उस मोह के कारण क्या वह इतना अन्धा हो जाए कि सत्य और असत्य तथा न्याय और अन्याय में विवेक करना भी छोड़ दे!
तो फिर सत्य को पहचानने का उपाय क्या है? हरेक धर्मावलम्बी अपने धर्मग्रन्थ के ही सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करे तो उन दावों की परीक्षा कैसे की जाए?

एक अचूक उपाय

इसका उपाय बड़ा सरल है। कोई भी इतिहास का विद्यार्थी यदि अपनी आंखों पर से पक्षपात की ऐनक उतार कर संसार भर के धर्मग्रन्थों का अध्ययन करे तो वह एक बात देखकर चकित रह जाएगा। उसे उन सब धर्मग्रन्थों की कुछ बातों में परस्पर समानता प्रतीत होगी। (यहां यह कहने का हमारा अभिप्राय नहीं है कि सब धर्मग्रन्थों में सब बातें समान हैं। परस्पर विरोध भी है, भयंकर विरोध है। पर कुछ बातें मिलती-जुलती अवश्य हैं- इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता।) यह समानता मानव-बुद्धि की समान चिन्तन-प्रणाली की द्योतक हैं। यदि ऐसी बात न होती तो अच्छी बात को सारा संसार अच्छा और बुरी बात को सारा संसार बुरा न कहता। न्याय और अन्याय की कसौटी भी नहीं रहती।
सहज और सरल उपाय यही है कि सब धर्मग्रन्थों में जितनी बातें समान हैं उन्हें एकत्र कर लीजिए और जिन बातों में परस्पर विरोध है, उन्हें छोड़ दीजिए। सब धर्मग्रन्थों की परस्पर समान बातें ही धर्म हैं, ग्राह्य हैं, आदेय हैं और परस्पर-विरुद्ध बातें अधर्म हैं, अग्राह्य हैं और हेय हैं।

स्वभावतः प्रश्न होगा कि वेद ही क्यों- इस प्रश्न के साथ उक्त कथन की क्या संगति है? उत्तर से पहले हम पूछते हैं कि विभिन्न धर्मग्रन्थों से चुन-चुनकर जो परस्पर समान बातें आपने एकत्र की हैं- जिन्हें धर्म का शुद्ध स्वरूप कहा जा सकता है, उन सबका मूल आधार क्या है?
क्या कुरान? क्या पुराण? क्या बाइबिल! क्या जेंद अवस्ता? क्या त्रिपिटक? क्या कोई अन्य धर्मग्रन्थ?

उत्तर में वितण्डा की आवश्यकता नहीं। यह सीधा इतिहास का प्रश्न है। इतिहास की शरण लीजिए और सही उत्तर को खोजिए।
संसार के समस्त इतिहासज्ञ जानते हैं कि अब से लगभग १४०० (१४४७) वर्ष पहले हजरत मुहम्मद साहब इस संसार में नहीं थे। जब इस्लाम के पैगम्बर ही नहीं थे तो उनके पैरोकार कहां से होते? कहां से होती उनकी कुरान? स्पष्ट है कि अबसे लगभग १४०० (१४४७) साल पहले इस दुनियां में हजरत मुहम्मद साहब, कुरान शरीफ और इस्लाम का नाम लेने वाला कोई नहीं था, उनका अस्तित्व नहीं था।
फिर रही बाइबिल। बाइबिल को अधिक से अधिक १९६६ (अब २०१९) साल पुराना माना जा सकता है क्योंकि ईसा के साथ सम्बद्ध ईस्वी सन् इससे आगे बढ़ने की अनुमति नहीं देता। यद्यपि सत्य तो यह है कि बाइबिल का कोई भी भाग ईसा के समय नहीं बना था, वह उनके शिष्यों की कृति है, ठीक वैसे ही जैसे कि त्रिपिटक महात्मा बुद्ध की नहीं प्रत्युत उनके शिष्यों की कृति है। जो भी हो, बाइबिल का या न्यू टेस्टामेन्ट का समय और पीछे नहीं ले जाया जा सकता। जब १९६६ (अब २०१९) वर्ष पहले हजरत ईसामसीह ही नहीं थे तो ख्रीस्ती धर्म या उनका धर्मग्रन्थ बाइबिल भी कहां से होता।
तो क्या यहूदियों का धर्मग्रन्थ 'तनख' उस समानता का आधार है? परन्तु यहूदियों के पैगम्बर हजरत मूसा का काल ३५०० वर्ष से अधिक पीछे नहीं जा सकता। स्वयं यहूदी भी वैसा ही मानते हैं। जब हजरत मूसा का ही प्रादुर्भाव नहीं हुआ था, तब यहूदी मत के प्रादुर्भाव का प्रश्न ही नहीं। इसलिए यह निर्विवाद है कि अब से लगभग ३५०० वर्ष पहले संसार में यहूदी मत का अस्तित्व नहीं था।
क्या जेंद अवस्ता-पारसियों का धर्मग्रन्थ- उसका आधार है? पारसी मत के प्रवर्तक हजरत जरदुश्त का समय अब से ३८०० वर्ष पूर्व माना जाता है। कुछ विद्वान् हजरत मूसा और हजरत जरदुश्त की समकालीनता, परस्पर भेंट, कुछ काल तक एक ही शहर में निवास और परस्पर विचारों के विनिमय की बात को सर्वथा प्रामाणिक नहीं मानते और वे हजरत जरदुश्त का समय खींच कर ४१०० साल पहले तक ले जाते हैं, परन्तु इसके आगे उनकी भी गति नहीं है। कहने का भाव यह है कि हजरत जरदुश्त और उनके द्वारा प्रचलित पारसी मत तथा उनके धर्मग्रन्थ को किसी भी हालत में ४१०० वर्ष से अधिक पुराना सिद्ध नहीं किया जा सकता।

भारतीय मत

जहां तक भारत में प्रचलित मतों का प्रश्न है- उनमें बौद्ध और जैन मत प्रमुख हैं, जिनको वैदिक परम्परा से भिन्न परम्परा में गिना जा सकता है। शैव, शाक्त या वैष्णव आदि सम्प्रदाय तथा उनकी अनेकानेक शाखाएं वैदिक परम्परा के ही अंग हैं- उनमें विकार चाहे कितना ही आ गया हो, किन्तु इन सम्प्रदायों ने वेद के प्रामाण्य का खण्डन करने का कभी साहस नहीं किया। कबीरपन्थ, नानकपन्थ अर्थात्- सिख मत या राधास्वामी मत आदि मत इतने अर्वाचीन हैं कि प्राचीनों की सभा में इन अर्वाचीनों का प्रवेश समीचीन नहीं प्रतीत होता। ब्रह्मकुमारी आदि सम्प्रदाय तो विशुद्ध गुरुडम की उपज हैं- ये भारतभूमि की उस उर्वरा शक्ति के द्योतक हैं जिसके कारण हर बरसात में जगह-जगह खुम्बीयाँ या अन्य झाड़-झँखाड़ स्वतः उग आते हैं और किसी भी कुशल किसान को अपनी अनाज की फसल बोन से पहले खेत से उन्हें साफ करना ही पड़ता है। प्राचीनों की सभा में इन झाड़-झंखाड़ों का प्रवेश तो क्या, उन्हें दौवारिक की योग्यता का पात्र भी नहीं समझा जा सकता।
महात्मा बुद्ध का समय प्रायः सभी इतिहासकारों की दृष्टि में ईसा से लगभग ४०० वर्ष पूर्व माना जाता है। इस प्रकार उनका समय हुआ- १९६६ (२०१९) +४००= २३६६ वर्ष पूर्व (अब के अनुसार २४१९)। स्थूल रूप से हम कह सकते हैं कि महात्मा बुद्ध का समय अबसे लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व है अर्थात् ढाई हजार वर्ष से पहले महात्मा बुद्ध या बौद्ध मत की कल्पना नहीं की जा सकती।
रहा जैन मत। यदि जैन मत का प्रवर्तक महावीर स्वामी को माना जाए तो वर्धमान महावीर और गौतम बुद्ध दोनों समकालीन थे, उनकी परस्पर भेंट भी हुई, दोनों ही राजकुमार थे और दोनों ने अपने समय की राजनीति को भी काफी प्रभावित किया था। यदि राजनीतिक दृष्टि से तत्कालीन इतिहास का अध्ययन किया जाए- जिसकी कि परम्परा अपने देश में बहुत कम है, तो कदाचित् वैशाली को अपना कार्यक्षेत्र बनाने वाले इन दोनों महात्माओं की सामन्तोचित कूटनीतियों के परस्पर घात-प्रतिघात का भी आकलन किया जा सके। पर वह विषयान्तर है। कहने का भाव केवल यह है कि वर्धमान महावीर और शाक्यपुत्र गौतम के समकालीन अर्थात् ढाई हजार वर्ष पुराना ही माना जा सकता है।
परन्तु आजकल के जैनियों की प्रवृत्ति अपने मत को इससे बहुत प्राचीन सिद्ध करने की है। वे वेद के अन्दर भी अपने तीर्थंकरों का वर्णन खोजते हैं। परन्तु जैसे "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्"- इस मन्त्रखण्ड के आधार पर वेद में हजरत ईसामसीह का उल्लेख सिद्ध करना उपहासास्पद है या "पश्येम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतम्"- इस मन्त्रखण्ड में मक्का मदीना का उल्लेख सिद्ध करना उपहासास्पद  है, वैसा ही उपहासास्पद है "त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति" और "घनाघन: क्षोभणश्चषणीनाम्"- आदि मन्त्रखण्डों में से भगवान् ऋषभदेव का वर्णन निकलना, परन्तु यहां हम इस विवाद में नहीं पड़ते। यदि जैनी लोग अपने मत को ढाई हजार वर्ष पुराना नहीं उससे अधिक पुराना मानते हैं, तो मानें। उससे हमारे युक्तिक्रम में कोई अन्तर नहीं आता। अपने मतप्रवर्तक और मत के प्रादुर्भाव की जो भी तिथि वे निर्धारित करना चाहें करें। इतना निश्चित है कि इतिहास में उन्हें ऐसा काल-निर्धारण अवश्य करना पड़ेगा जब उनके मत-प्रवर्तक या मत का अस्तित्व संसार में नहीं था और उसके बाद वे अस्तित्व में आए।

युक्ति का आधार

हमारे युक्तिक्रम का आधार यह है कि संसार के ये जितने मतमतान्तर हैं और जितने उनके धर्मग्रन्थ हैं, वे भले ही अपने आप में ईश्वरीय ज्ञान होने का दावा करें, परन्तु वे ईश्वरीय नहीं, मानवकृत हैं। इन मतों के विशिष्ट पैगम्बर हैं, उन पैगम्बरों की विशिष्ट जन्मतिथियाँ हैं, उन धर्मग्रन्थों के तैयार होने का विशिष्ट समय है। इतिहास इसका साक्षी है। इतिहास के इन तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता और इन धर्मग्रन्थों में कुछ बातों में समानता है, यह भी निर्विवाद है। उदाहरणार्थ- मनुस्मृति के अनुसार धृति, क्षमा, अस्तेय, इन्द्रियनिग्रह, अक्रोध आदि जिन तत्त्वों को धर्म का लक्षण बताया गया है, क्या ईसा का गिरि-प्रवचन (सर्मन ऑन द माउण्ट), मूसा के दस आदेश (टैन कमाण्डमेंट्स) और महात्मा बुद्ध द्वारा वर्णित अष्टांगिक मार्ग या आर्य सत्य तथा कुरान द्वारा वर्णित सच्चे मुसलमानों के रोजा, जकात आदि कर्त्तव्यों में कोई विशेष अन्तर है? योगदर्शन में
"तत्राहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:" और "शौचसन्तोषतप: ,स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा:"
कहकर जिन यमों और नियमों का उल्लेख किया गया है, वे प्रकारान्तर से सार्वत्रिक नियम हैं और संसार के सभी धर्मों में इन गुणों को समान रूप से आदर की दृष्टि से देखा गया है। अन्तर है तो सामाजिक विधि-विधानों में, सृष्टिरचना की प्रक्रिया के वर्णन में या मतवादी साम्प्रदायिक मान्यताओं में। इसी कारण महात्मा गांधी कहा करते थे कि किसी धर्मात्मा हिन्दू में, या धर्मात्मा मुसलमान में या धर्मात्मा ईसाई में जीवन की पवित्रता की दृष्टि से कोई अन्तर नहीं होता। कोई धर्म ऐसा नहीं हो सकता जो सत्य, अहिंसा, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को धर्म का अंग न माने, उन्हें अधर्म बताए।

हमारी स्थापना यह है कि धर्मग्रन्थों में पाई जाने वाली समानताओं का आधार (प्रत्युत कहना चाहिए कि असमानताओं का आधार भी, क्योंकि असमानताएं भी बहुत बार किन्हीं समानताओं का विकृत रूप ही होती हैं) वेद हैं, क्योंकि समस्त उपलब्ध धर्मग्रन्थों में वेद सबसे प्राचीन है। मैक्समूलर ने जब यह कहा था: "वेद हमारे लिए मनुष्य-बुद्धि के सबसे पुराने परिच्छेद के परिचायक हैं"- तब से आज तक इस उक्ति का खण्डन नहीं किया जा सका, प्रत्युत दिन-प्रतिदिन इसी बात की पुष्टि होती गई कि संसार के पुस्तकालय में सबसे प्राचीन पुस्तक 'वेद' है।
विशुद्ध तर्क की खातिर यह भी कहा जा सकता है कि यदि किसी दिन पुरातत्त्वान्वेषियों को कहीं किसी अज्ञात स्थान की खुदाई में से कोई ऐसा ग्रन्थ मिल जाए जो वेदों से अधिक प्राचीन सिद्ध हो सके और इस ग्रन्थ का वर्ण्य-विषय वेदों से ही मेल खाता हो, तो तर्कप्रवण वेदाभिमानियों को यह मानने में संकोच नहीं करना चाहिए कि वेद का आधार वह नव-उपलब्ध ग्रन्थ होगा, परन्तु जब तक संसार के विद्वान् इस बात पर सहमत हैं कि वेद सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं- तब तक यह निष्कर्ष निकालना सर्वथा तर्कसंगत है कि इन सब समानताओं का आधार वेद है, क्योंकि वही सबसे प्राचीन है।

वेदों का निर्माण-काल

पूछा जा सकता है कि वेदों का निर्माण काल क्या है? हम स्वीकार करते हैं कि इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं, परन्तु एक बात असंदिग्ध रूप से कही जा सकती है और वह यह कि ज्यों-ज्यों अनुसन्धान की गहराई बढ़ती जाती है त्यों-त्यों वेद का समय लगातार पीछे ही पीछे खिसकता जाता है। विषय के संक्षिप्त निदर्शन के लिए हम यहां एक तालिका दे रहे हैं, जिससे बात और स्पष्ट हो जाएगी।

वेदों का आनुमानिक काल

मैक्समूलर ८०० वर्ष ई.पू. (कम से कम) १,५०० वर्ष ई.पू. (अधिक से अधिक)
मैक्डॉनल्ड १००० वर्ष ई.पू. (कम से कम) २,००० वर्ष ई.पू. (अधिक से अधिक)
हॉग १,४०० वर्ष ई.पू. (कम से कम) २,००० वर्ष ई.पू. (अधिक से अधिक)
विटसन १,५०० वर्ष ई.पू. (कम से कम) २,००० वर्ष ई.पू. (अधिक से अधिक)
ग्रिफिथ १,५०० वर्ष ई.पू. (कम से कम) २,००० वर्ष ई.पू. (अधिक से अधिक)
ह्विटनी १,५०० वर्ष ई.पू. (कम से कम) २,००० वर्ष ई.पू. (अधिक से अधिक)
जैकोबी १,५०० वर्ष ई.पू. (कम से कम) ४,००० वर्ष ई.पू. (अधिक से अधिक)
तिलक १,५०० वर्ष ई.पू. (कम से कम) ८,००० वर्ष ई.पू. (अधिक से अधिक)

इसका अभिप्राय यह है कि पाश्चात्य विद्वान् वेदों का काल अधिक से अधिक अब से ६,००० वर्ष पूर्व तक ले जाते हैं, जबकि लोकमान्य तिलक इस समय को १०,००० वर्ष पूर्व तक ले जाते हैं। अन्य भारतीय विद्वान् इस काल को दस हजार वर्ष से और बहुत पीछे तक ले जाते हैं।
पाश्चात्य विद्वानों के सामने कदाचित् वेदों के काल को ६,००० वर्ष से अधिक पीछे ले जाने में मानसिक बाधा है। मनोविज्ञान की दृष्टि से विचार करने पर इस मानसिक बाधा को पहचानने में देर नहीं लगती। वह मानसिक बाधा यह है कि बाइबिल के संकेत के अनुसार उनके मन में यह संस्कार बैठा हुआ है कि वर्तमान सृष्टि को बने केवल ६,००० साल हुए हैं। उनके आन्तरिक मन्तव्य के अनुसार जब ६,००० साल पहले सृष्टि ही नहीं थी तो कोई ग्रन्थ इससे पहले कैसे हो सकता है? वास्तव में तो पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किसी चीज को ६,००० साल पूर्व का कहने का अभिप्राय भी 'सृष्टि के आदि का' समझना चाहिए, क्योंकि उनकी दृष्टि में ६,००० वर्ष पूर्व ही सृष्टि का आरम्भ है, परन्तु विज्ञान की खोज ने बाइबिल द्वारा वर्णित सृष्टि के आगाज को मिथ्या सिद्ध कर दिया है और जब से रेडियम का आविष्कार हुआ है तब से वैज्ञानिकों को इस बात का निश्चय हो गया है कि सृष्टि को बने करोड़ों (लगभग दो अरब) वर्ष हो गए हैं, क्योंकि इससे कम अवधि में कार्बन रेडियम में रूपान्तरित नहीं हो सकता।
और क्या वेदों के निर्माण की अभी तक कोई तिथि निर्धारित न होना स्वयं इस बात की निशानी नहीं है कि यह सृष्टि के आदि की रचना है? परन्तु वेद को सृष्टि की आदि-रचना मानना भी हमारे युक्ति-क्रम का ऐसा अंग नहीं है कि इसके बिना हमारी स्थापना विश्रृंखलित हो जाएगी। संसार के लोग वेद को सृष्टि की आदि-रचना मानें या न मानें, जब तक सब यह मानते हैं कि वेद संसार के पुस्तकालय का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है तब तक हमारे युक्तिक्रम का प्रसाद अक्षुण्ण है। संसार का कोई धर्मग्रन्थ प्राचीनता में वेद की तुलना में खड़ा नहीं हो सकता। आर्यजाति के प्रारम्भ के साथ वेद प्रारम्भ हुआ, यदि किसी को इस स्थापना की स्वीकार करने में संकोच हो तो भी उसे इतना तो मानना ही पड़ेगा कि संसार के धर्मरूपी भवन की पहली ईंट वेद है।

अन्तः साक्षी का महत्त्व

आश्चर्य का बात यह है कि वेद के सिवाय संसार के किसी अन्य धर्मग्रन्थ ने सृष्टि के आदि में होने का दावा नहीं किया। करें भी कैसे? विभिन्न धर्मावलम्बी अपने धर्मग्रन्थों को ईश्वरीय ज्ञान तो सहज ही मान लेते हैं, परन्तु सृष्टि के आदि में अपने धर्मग्रन्थों की सत्ता सिद्ध करने की उनकी हिम्मत नहीं होती। सृष्टि के आदि में न होने पर भी अपने धर्मग्रन्थ को ईश्वरीय ज्ञान मानना परस्पर विरोधी बात ठहरती है। क्योंकि ईश्वरीय ज्ञान वही हो सकता है जो सृष्टि के आदि में हो। जिस परमात्मा ने मनुष्य को आंख दी है उसी ने सूर्य भी दिया है। सूर्य या सूर्य के प्रतिनिधि के बिना आंख देख नहीं सकती। यदि केवल आंख ही परमात्मा ने दी होती, सूर्य नहीं, तो आंख देना भी व्यर्थ था, क्योंकि प्रकाश के अभाव में आंख देखने का काम नहीं कर सकती थी। इसी प्रकार परमात्मा ने मनुष्य को अन्दर की आंख या बुद्धि दी तो उसकी सार्थकता के लिए वेद रूपी ज्ञान का सूर्य भी दिया, अन्यथा बुद्धि का दान व्यर्थ हो जाता। फिर सृष्टि बनने के हजारों साल बाद बनने वाले धर्मग्रन्थों में ही यदि ईश्वरीय ज्ञान प्रकट होना था तो उन धर्मग्रन्थों के प्रादुर्भाव से पहले मनुष्य जाति की जो सैकड़ों पीढियां गुजर चुकीं उनको ईश्वर ने ईश्वरीय ज्ञान से वंचित क्यों रखा? वेद को छोड़कर किसी अन्य धर्मग्रन्थ को ईश्वरीय ज्ञान मानने वाले व्यक्ति के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं हो सकता। ऐसा परमात्मा पक्षपाती सिद्ध होता है, अन्यायी भी, निर्दयी भी। ईश्वर को ऐसे आरोपों से बचाने का एक ही उपाय है कि मानवकृत ग्रन्थों को ईश्वरीय ज्ञान की कोटि में न रखा जाए।
वेद के सृष्टि के आदि में होने की अन्तः साक्षी स्वयं वेद देता है। ऋग्वेद (१०.९०.९) में मन्त्र आता है,

तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत।।

यह मन्त्र यजुर्वेद (३१,७) में भी आया है। भावार्थ है- "उसी सर्वपूज्य परमात्मा से ऋग्, साम, अथर्व और यजुर्वेद उत्पन्न हुए।"

अथर्ववेद (१०.७.२०) में मन्त्र आता है-

यस्मादृचो अपातक्षन् यजुर्यस्मादपाकषन्।
सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखम्।
स्कम्भं तं ब्रूहि कतम: स्विदेव स:।

-"जिस जगदाधार परमात्मा से ऋग्, यजु, साम और अथर्व उत्पन्न हुए उसका यथार्थ स्वरूप बताओ।"

अब तक हमने जो कुछ कहा है उसका सार यह है:
संसार के धर्मग्रन्थों में कुछ बातों में समानता पायी जाती है। उस समानता का कोई एक आधार होना चाहिए। वह आधार वेद ही हो सकता है क्योंकि वही सबसे प्राचीन है। इतना ही नहीं, ईश्वरीय ज्ञान के दावे की कसौटी को भी वेद ही पूरा कर सकता है, क्योंकि ईश्वरीय ज्ञान की एक कसौटी है- सृष्टि के आदि में होना और यह शर्त सिवाय वेद के और कोई धर्मग्रन्थ पूर्ण नहीं कर सकता।

नास्तिकों के लिए भी उपयोगी

यह समस्त विवेचन केवल आस्तिक और धार्मिक लोगों की दृष्टि से किया गया है। जो धर्म को मनुष्य जाति 
के लिए अफीम बताते हैं उनकी किसी भी धर्मग्रन्थ में आस्था नहीं। ईश्वर में ही आस्था नहीं तो धर्म या धर्मग्रन्थ को लेकर क्या होगा?
परन्तु अब हम कहते हैं कि वेद नास्तिकों और धर्म-विरोधियों के लिए भी उतना ही उपयोगी है जितना धर्मप्रेमियों के लिए। नास्तिक लोग भी विज्ञान और विज्ञानेतर विषयों की पुस्तकें तो पढ़ते ही हैं। हम कहते हैं कि वेद केवल धर्मग्रन्थ नहीं है, वह विज्ञान और विज्ञानेतर विषयों का भी अगाध भण्डार है। वह समस्त सत्य विद्याओं का आगार है। मानव-जीवन के लिए जो भी कुछ उपयोगी है, उस सबका निदर्शन वेद के अन्दर है। अन्य धर्मग्रन्थों में से उन मतों के प्रवर्तकों का जीवन-वृत्त निकाल दीजिए, उन महान् पुरुषों के जीवन के साथ दन्तकथाओं के रूप में जुड़े आख्यानों को निकाल दीजिए, सामाजिक विधि-विधानों के सम्बन्ध में देश-काल और परिस्थिति के अनुसार दी गई व्यवस्थाओं को निकाल दीजिए, तो आप देखेंगे कि उन धर्मग्रन्थों में इसके बाद जो कुछ बचता है वह नगण्य है या ऐसा कुछ है जिसे उससे पूर्ववर्ती धर्मग्रन्थ कह चुके हैं। धर्मग्रन्थों की इन्हीं व्यक्तिवादिताओं और दुर्बलताओं को देखकर तो अधर्मियों को उनसे अश्रद्धा हुई है, परन्तु वेद में किसी व्यक्ति विशेष का, देश-विशेष का या काल-विशेष का इतिहास नहीं, वहां तो शाश्वत इतिहास है। अन्य मत-मतान्तरों में से उन मतों के प्रवर्तकों को निकाल दें तो वे मत धराशायी हो जाते हैं क्योंकि वे अपने पैगम्बरों के बिना नहीं टिक सकते, परन्तु वेद के साथ ऐसी बात नहीं। किसी भी व्यक्ति पर आधारित नहीं है। वेद समस्त मनुष्य जाति के लिए है। सच तो यह है कि वेद व्यक्तिपरक है ही नहीं, वह तो ज्ञानपरक ही है। वेद शब्द का अर्थ भी सिवाय ज्ञान के और कुछ नहीं है। सांसारिक ज्ञान की पुस्तकों में केवल ऐहिक ज्ञान का विवेचन होगा, परन्तु वेद में ऐहिक के साथ पारलौकिक ज्ञान, भौतिक के साथ आध्यात्मिक ज्ञान और अभ्युदय के साथ निःश्रेयस का भी विवेचन है।
यदि मानव जीवन के लिए वेद की इतनी उपयोगिता न होती तो भारत के ब्राह्मणों ने अपने प्राण देकर भी उनकी रक्षा का प्रयत्न न किया होता, वेदों को कण्ठाग्र करना अपने जीवन का लक्ष्य न बनाया होता और "ब्राह्मणेन निष्कारणं षडङ्गो वेदोऽध्येय:" के नियम के अनुसार बिना किसी भौतिक लाभ की आशा के वेदों के पठन-पाठन में ही अपना समस्त जीवन न लगाया होता। न ही चतुर्वेदी, त्रिवेदी या द्विवेदी की वंशपरम्परा चली होती। न ही भारतवर्ष ने अतीतकाल में ज्ञान-विज्ञान में इतनी उन्नति की होती। न ही आज देश-विदेश के विद्वानों ने इतनी बड़ी संख्या में वेद के स्वाध्याय में अपना जीवन खपाया होता।

जैसे हिमालय का सर्वोच्च शिखर मानवात्मा को चुनौती देता है, जैसे महासागर की गहराइयाँ वैज्ञानिकों का आह्वान करती हैं, जैसे मंगल और चन्द्रमा आदि ग्रह-उपग्रह किसी साहसी अन्तरिक्ष-यात्री की प्रतीक्षा करते हैं और मानव की चिर-जिज्ञासु आत्मा उस चुनौती को स्वीकार कर अज्ञात के अनन्त रहस्यों को खोजने के लिए अपने विजय-पथ पर निकल पड़ती है, वैसे ही क्या ज्ञान का यह सर्वोच्च शिखर, ज्ञान का यह महासागर, ज्ञान का यह सूर्य-वेद भी मानव की बुद्धि और परिश्रम के लिए चुनौती नहीं है? किसी नास्तिक के लिए भी इस अज्ञात को सुज्ञात बना देने से बढ़कर जीवन की कृतकार्यता और क्या हो सकती है? ज्ञान का भण्डार वेद ज्ञान के नए आयाम अपने पक्ष में छिपाए साहसी व्यक्तियों की प्रतीक्षा में है। -आर्योदय 'हिन्दी साप्ताहिक' के वेदांक से साभार।

[स्त्रोत- परोपकारी : महर्षि दयानन्द सरस्वती की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का मुख पत्र का फरवरी द्वितीय २०१९ का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Friday, February 22, 2019

भेड़ बनाम सूअर



भरपेट विष्ठा खा नाली में उसने तीन-चार गोते लगाए फिर निढाल होकर पसर गया और अतीत की उन यादों में खो गया जब वह #भेड़ हुआ करता था,
सूअरों, से भीषण युद्ध में हार के बाद जंगल के हजारों जीवों को बंदी बना लिया गया था,, सुअर #ऊल्लू" के उपासक थे,,उनका मानना था कि पूरी दुनिया सूअरों की है और किसी भी अन्य जीव को यहां जीने का कोई अधिकार नहीं है ।
सभी जानवरों को दो ही विकल्प दिए गए कि या तो वे 'सूअर' बन जाए अथवा अपनी 'गर्दन कटवाने' को तैयार रहें ।
शेर, चीते और भालू जैसे अधिकांश जानवर तो पहले ही युद्ध में मारे गए थे।
वह किसी भी सूरत में "सूअर" नहीं बनना चाहता था। हरी घास खाने के बजाए, टट्टी को सपड़-सपड़ चाटने की कल्पना मात्र से ही उसे उल्टी आ जाती।
अपने शरीर की ऊन पर कभी मिट्टी तक नहीं लगने दी थी उस भेड़ ने। कीचड़ और विष्ठा में हरगिज़ नहीं नहाएगा वह।
उसनें पक्का फैसला कर लिया, 'वह गर्दन कटवा लेगा लेकिन सूअर नहीं बनेगा,
फिर एक दिन, उसे पकड़ कर मैदान में लाया गया। चारों ओर खून ही खून फैला हुआ था, हिरन, लोमड़ी, बंदर और कई भेडों तक के सिर कटे पड़े थे।
उसे पेश किया गया, तो उसकी टांगे थर थर कांप रही थी। एक #विशालकाय "सूअर" ने उससे पूछा,
"तुम्हें भेड़ रह कर सर कटवाना है या 'सूअर' बन कर जिंदा रहना है ?"
तत्काल दिमाग में विचार कौंधा 'जान है तो जहांन है, जिंदा रहूंगा तो किसी दिन वापिस भेड़ बन जाऊंगा।' 💭 💭
"हां ! मुझे बाकी मूर्खों की तरह मरना नहीं चाहिए। मैं बाद में हर हाल में पुनः भेड़ बन जाउंगा और मौका मिला तो इन 'सूअरों' से अपने सबंधियों की हत्या का बदला भी लूगां !'
'जीना ही श्रेयस्कर है।
वह तत्काल जोर से चीखा,
"मुझे ऊल्लू की दासता स्वीकार है!" 🗯️🗯️
एक दुबले पतले "काले सूअर" ने विष्ठा का पात्र उसके सामने रख दिया और खाने को कहा, उसे ऊबकाई आने को ही थी कि नज़र लपलपाती तलवार पर गई । जैसे तैसे कर जरा सी चाट ली।
अब 'कालिए सूअर' ने उसके कान में कहा "ऊंची आवाज में तीन बार बोल ...#ऊल्लू तू बक-बर'
जैसे ही उसनें पहली दफा बोला, उसके शरीर की सारी ऊन झड़ गई !!! दूसरी और तीसरी बार बोलते ही थूथंन निकल कर सूअर बन गया !!
अचानक एक अज़ीब सी खुशबू उसके नथूनों से टकराई, जो सामने पड़े "विष्ठा पात्र" से आ रही थी। वह तत्काल टूट पड़ा खाने पर,
कुछ सालों बाद 'एक काली टोपी' वाला #शेर" उसके पास आया था, जिसने उसे 'घर वापसी' कर वापिस भेड़ बनने का प्रस्ताव दिया ।
ऐसी बात नहीं कि वापिस भेड़ बनने का संकल्प उसे याद नहीं था!
पर उसनें सोच विचार के लिए कुछ समय देने को कहा। शेर अपने नंबर दे कर चला गया।
वह सोच विचार करने लगा ...
'वापिस भेड़ बनकर कहाँ नीरस घास खानी होगी, और यहां '#सबकुछ' खाने की छूट !! अकाल, के समय घास के लिए इधर-उधर भटकना और यहां जितनी चाहे 'स्वादिष्ट विष्ठा'!
वहां "एक" मादा भेड़ से काम चलाना और यहां "चार चार #सूअरनियां," उनसे भी मन भर जाएं तो तीन बार 'क्लिक', 'क्लिक' बोलकर भगाओ और नई ले आओ!! कोई रोकटोक नहीं!! 'अगर भेड़ होता तो दो चार बच्चे होते, यहां तो पहले साल में ही "चालीस" हो गए थे !! उन 'चालीस' के भी अब तो चालीस-चालीस है !!
वहां पाप पुण्य के सौ तरह के बंधन और यहां किसी भी जीव को मारो काटो .. सब कुछ जायज़ !!'
'नहीं! मुझे कोई भेड़ वेड़ नहीं बनना !!'
अगली बार जब 'शेर' आया, तो उसनें साफ मना कर दिया !!
पिछले कई सालों से वह अपनी दुनिया में मस्त था और "पक्का सूअर" बन चुका था और चाहता है कि पूरी दुनिया में "ऊल्लू" की उपासना हो और जंगलों के सारे जानवर "सूअर" बन जाएं।
अपने बच्चों को भी यही कहता है कि कहीं भी कोई अन्य 'जानवर' मिले तो घेर कर उसे सूअर बनाओ अथवा काट डालो! बकरियों, भेड़ों को बहला फुसलाकर #सुअरनी बनाओ और बच्चे पैदा करो!! किसी भी झुंड पर हमला करो और लूट लो!! तुम्हारे लिए लूट का माल और सभी मादाएं '#जायज़' हैं!
अचानक उंची चट्टान से 'कालिए' की आवाज़ गूंजी "ऊल्लू तू बक-बर, ऊल्लू तू ~बक-बर,
वह अतीत की यादों से बाहर आया और तुरंत कीचड़ से बाहर निकल आया अपना पिछवाड़ा ऊंचा कर थूथंन जमीन से रगडऩे लगा
नोट: --उपरोक्त कहानी का किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय, जीवित अथवा मृत व्यक्ति से कोई सबंध नहीं है। किसी भी धर्म के नियम, प्रथा या घटना से समानता केवल संयोग हो सकता है !!
Source Facebook

नमाज़ ए जनाज़ा और कुर्फ



नमाज़ ए जनाज़ा और कुर्फ

आर्यवीर पूर्व नाम मुहम्मद अली

हिन्दू समाज की एक पुरानी आदत है। वह है जल्दी भूल जाना और अपने इतिहास से सबक न लेना। अब देखिये 1947 में पाकिस्तानी क्षेत्र वाले पंजाब में हिन्दुओं पर असंख्य अत्याचार हुए। कितनों की बेटियां उठा ली गई। कितने अपना सब कुछ लुटवा कर भारत आ गए। मगर उन्हीं के वंशज आज अपने आपको सेकुलर सिद्ध करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। क्यूंकि हम सब कुछ भूलने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम यह भी भूल गए कि जब ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने सुपुर्दे-खाक किया था और जब पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब को भारतीय सरकार ने फाँसी पर लटका दिया गया था। तब उनकी आत्मा की शांति के लिए भारतीय मस्जिदों में नमाज़ ए जनाज़ा अर्थात अंतिम नमाज़ पढ़ी गई थी। ओसामा बिन लादेन का भारत से क्या सम्बन्ध था? प्रत्यक्ष कुछ भी नहीं। वह एक सऊदी मूल का अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी था जिसके षड़यंत्र से अमरीका के ट्विन टावर गिरे। उस ईमारत में उस वक्त कुछ भारतीय मूल के लोग भी अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए। अजमल कसाब पाकिस्तानी नागरिक था। जिसने मुंबई में हमला कर अनेक निर्दोष भारतीयों को क़त्ल किया। भारतीय न्याय व्यवस्था के अनुसार उसे यमलोक पंहुचा दिया गया। इन दोनों के लिए  नमाज़ ए जनाज़ा पढ़ने वाले भारतीय मुसलमान थे।
     कश्मीर के पुलवामा में आतंकवादियों ने सीआरपीएफ के जत्थे पर हमला कर 44 भारतीय सैनिकों को मार डाला। क्या आपने सुना की भारत की कितनी मस्जिदों में उनके बलिदान को स्मरण करते हुए याद किया गया। उस जत्थे में एक देशभक्त मुस्लिम कश्मीर निवासी  नसीर अहमद भी था।  कितनी मस्जिदों ने उनकी आत्मा की शांति के लिए नमाज़ ए जनाज़ा पढ़ा गया। बहुत कम। कुछ अपवादों को छोड़ दीजिये तो बहुत कम। इसका मुख्य कारण क्या है कि ओसामा बिन लादेन और कसाब के लिए तो नमाज़ ए जनाज़ा भारतीय मस्जिदों में पढ़ा जा सकता हैं।  मगर भारतीय सैनिकों की आत्मा की शांति के लिए अंतिम प्रार्थना करने से भारतीय मुसलमान हिचकते हैं। इसका उत्तर जानने के लिए आपको क़ुरान की मूल विचारधारा और मौलानाओं के द्वारा दिए गए फतवों के इतिहास को जानना होगा।

  इस्लाम में गैर मुस्लिम किसी भी प्रकार से सम्मान का पात्र नहीं हैं। क़ुरान की कुछ आयतें देखिये-

-काफिरों की मित्र नहीं समझना चाहिए।- क़ुरान 3/28

-तो वे (काफिर) तुम्हें जहाँ कहीं दिखाई दें, उन्हें मार डालो और जिस जगह से उन्होंने तुम्हें निकला है, तुम उन्हें वहां से निकाल दो। - कुरान 2/186 

-उनसे लड़ाई करो और उन्हें अपनी निष्ठुरता से परिचित होने दो- क़ुरान 9/125 

-यह सुनिश्चित का लो कि वे जहाँ कहीं भी तुम्हें मिलें, उन सबका वध कर दिया जाये।- क़ुरान 23.60-4-64

जब काफ़िरों से तुम्हारी मुठभेड़ हो, तो उनकी गर्दनें उड़ा दो और तब तक ऐसा करते रहो जब तक, उनमें से बहुत-सों का वध न हो जाए और बाकियों को जल्दी से बंधनों में जकड़ दो....(क़ुरान 47.4-5)

(सन्दर्भ- अरुण शौरी, फतवें, उलेमा और उनकी दुनिया, वाणी प्रकाशन, 2001, पृष्ठ 163-164)

मुस्लिम समाज में क़ुरान के पश्चात हदीसों और उनके आधार पर दिए गए फतवें मुसलमानों का सबसे अधिक मार्गदर्शन करते हैं।  लोकमान्य तिलक की मृत्यु पर ख़िलाफ़त समिति के सदस्य शोक प्रकट करते हुए एक पोस्टर छापते हैं।  दसवें दिन कुछ मस्जिदों में सभाएं होती हैं जिनमें दिवंगत नेता के लिए प्रार्थनाएं की जाती हैं। जिन लोगों ने पोस्टर छापा और जिन लोगों ने प्रार्थना सभाओं आयोजन किया और उनमें भाग लिया, उनके बारे में क्या हुकुम है?

मौलाना शमद रज़ा ने घोषणा की - ऐसे प्रार्थना सभाओं में शामिल होना हराम है. जो उनमें शामिल होता है, वह भर्तस्ना का पात्र है. वह नमाज़ नहीं करवा सकता। ईमान के दुश्मनों से खबरदार रहना फर्ज है।  एक मुशरिक (काफिर) के लिए दुआ करना और उसके लिए जनाज़ा नमाज़ और फ़ातिहा पढ़ना कतई कुफ्र है।
        इन लोगों ने एक मुशरिक के लिए मस्जिद में अपने सिरों को उघाड़ा और अल्लाह की नमाजगाह को एक मातम-स्थल में बदल दिया। जिन मुसलमानों ने ऐसा किया वे मुशरिकों की गाड़ी के बैल बन गए हैं। जिसने एक ग़ैर मुस्लिम का सम्मान किया है, वह इस्लाम को नष्ट करने में सहायक हुआ है। जिन लोगों ने पोस्टर छापे हैं, वे धर्मत्यागी हो चुके हैं। वे इस्लाम से बाहर हो चुके हैं और उनके साथ उनकी बीवियों का उनसे निकाह भी टूट गया है।
(सन्दर्भ-फ़तवा-ए-रिजविया, खंड 9, पुस्तक 2, पृष्ठ 270-271)

जो लोग ख़िलाफ़त के दौर में तिलक महोदय जैसे लोगों के महान योगदान को दरकिनार कर केवल गैर मुसलमान होने के नाते उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना पढ़ने को कुफ्र मानते हैं। वही लोग आज कश्मीर में बलिदान देने वाले सैनिकों के लिए कैसे प्रार्थना करेंगे? क्यूंकि उन्हें प्रेरणा तो इन्हीं मौलानाओं से मिलती हैं। उनके लिए कसाब और लादेन के लिए नमाज़ पढ़ने में कोई रूकावट नहीं हैं। क्यूंकि दोनों के मज़हब इस्लाम है।  मगर भारतीय सैनिकों के लिए प्रार्थना पढ़ना नाजायज हैं।

हिन्दू-मुस्लिम को गंगा-जमुनी एकता का बखान करने वाले इस विषय में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दे कि क्या वाकई में किसी गैर मुसलमान के नेक कार्यों को देखते हुए उसकी स्मृति में प्रार्थना पढ़ना कुफ्र है?  

ऋषि की मथुरा जन्म-शताब्दी का ऐतिहासिक भाषण श्री पं० चमूपति जी का व्याख्यान



ऋषि की मथुरा जन्म-शताब्दी का ऐतिहासिक भाषण श्री पं० चमूपति जी का व्याख्यान

देवियो और भद्र पुरुषो!

मैं तो मथुरा नगरी में शिष्य रूप से आया था, न कि इस वेदी पर खड़ा होकर व्याख्यान देने के लिए। मैं तो यह विचार मन में रखकर आया था कि अब गुरु की नगरी में चलता हूं। वहां पद-पद पर शिक्षा ग्रहण करूंगा और उन शिक्षाओं को अपने जीवन का आधार बनाकर घर को लौटूंगा, परन्तु अब यह कार्य सौंपा गया है कि इस वेदी पर खड़ा होऊं। मैं लिखने प्रयत्न कर अपने को उपदेशक नहीं बना सका। मेरे हृदय का इस समय यही भाव है जो इधर-उधर प्रचार करके अपने माता-पिता के घर पर पहुंचने वाले व्यक्ति का होता है। मैं लाखों बार उपदेशक बनने का विचार करता हूं, परन्तु नहीं बन पाता। यह वही स्थान है, जहां मैंने उपदेश धारण किया और हमारे गुरु ने उपदेश दिया था। यह स्थान कृष्ण का मकसूद समझा जाता है। जब यहां कंस राजा था, तब यहां की प्रजा दुखी थी और प्रजा के कष्ट निवारणार्थ एक तंग कोठरी में कृष्ण ने जन्म लिया था। वे ब्रजपाल थे। लोगों के ऊपर होने वाले बलात्कारों और अत्याचारों को दूर करने के लिए उनका जन्म हुआ था। मुरली द्वारा स्वाधीनता के सन्देश को सुमधुर ध्वनि में गुंजायमान करने के लिए उनका जन्म हुआ था। यह ध्वनि कुरुक्षेत्र में गूंजी थी। उसने रुद्र रूप धारण किया और पापों का नाश किया कि कृष्ण को ब्रजपाल कहा जाता है और इसीलिए कहा जाता है कि उन्होंने मथुरा में जन्म लिया था। आज का समय इसलिए नहीं है कि कृष्ण पर कुछ विचार किया जाए, क्योंकि यह पुराना स्वप्न हो गया और इसे कई प्रकार से लांछित किया जा चुका है। लोगों ने प्यार करते-करते अपने प्यारे को प्यार के योग्य नहीं रखा।

श्रीकृष्ण ने पहला जन्म लिया, तो स्वामी दयानन्द ने दूसरा जन्म लिया और संसार में दूसरा जन्म ही असली जन्म है। कृष्ण ने अपनी माता के गर्भ से जन्म लिया, तो स्वामी दयानन्द ने अपने गुरु से जन्म लिया। शास्त्र में लिखा है कि जब लड़का गुरुकुल में प्रवेश करता है, तब आचार्य उसको उसी प्रकार लेता है, जिस प्रकार माता अपनी गोद में लेती है। यदि श्रीकृष्ण ने जेल में जन्म लिया, तो स्वामी दयानन्द छोटी सी कोठरी में पैदा हुए। अंधेरे से रोशनी का जन्म होता है। रात में से दिन का उदय होता है। उसी प्रकार तंग कोठरी में प्रकाश होता है। वेद में लिखा है कि आत्मशक्ति का जन्म आग की भट्ठी में से होता है।
जब स्वामी जी पाठशाला में थे, तब उन्हें झाडू देने का काम सौंपा गया था। उन्होंने गुरु की कोठरी में झाडू दी और संसार को शिक्षा दी कि वह भी झाडू दे। गुरु विरजानन्द समझते थे कि वही झाडू संसार की कुरीतियों को बुहार देगी। यह वही स्थान है, जहां ऋषि दयानन्द पानी भरकर लाते थे और गुरु को स्नान कराते थे। आज उनकी बहाई हुई यमुना में समस्त संसार स्नान करता हुआ दीख पड़ता है। आज हमको यह दिखाना है कि यह स्थान एक समुद्र है और लोग इसमें बहे चले जाते हैं। कृष्ण ने अपना जीवन लीला में बिताया था। ऋषि दयानन्द ने अपना समय भट्टी में बिताया था।

स्वामी दयानन्द के आने से पूर्व सब ज्ञानियों ने समझा था कि हमें काम नहीं करना है। स्वामी दयानन्द ने कहा कि वेद में लिखा है कि आत्मा कर्म करने के लिए है। और वह कर्म करते-करते जाएगा। स्वामी दयानन्द के जीवन से यदि कोई शिक्षा मिलती है तो वह यह है कि आत्मा को कर्म करते-करते जाना है। स्वामी दयानन्द का जीवन कर्ममय जीवन है। प्रोफेसर मैक्समूलर एक स्थान पर धर्म व मतों का भाग करते हुए कहते हैं- धर्म के दो रूप हैं। एक प्रचारक धर्म और दूसरा अप्रचारक धर्म। मिशनरी का धर्म प्रचारक धर्म है। संसार में जो भी मिशनरी जन्म लेता है, वह समझता है कि संसार पर अपने धर्म की ज्योति डाल दे। अप्रचारक धर्म वह है जिसके अनुयायी यह चाहें कि हमारे धर्म का संसार में प्रचार न हो। प्रोफेसर मैक्समूलर लिखता है कि ईसाई और इस्लाम ही प्रचारक धर्म हैं। बौद्ध और हिन्दू धर्म अप्रचारक धर्म हैं। वैदिक धर्म भी अप्रचारक है।

यदि स्वामी दयानन्द के उपदेशों को हम छोड़ देते, तो सचमुच हमारा धर्म अप्रचारक धर्म था। हम कहते थे, हम दया करते हैं, परन्तु दया का स्वरूप नहीं जानते थे। आज आर्य जाति का बच्चा-बच्चा जानता है कि जो हिन्दू मुसलमान हो गया हो, उसे हम अपनी जाति में पुनः ले सकते हैं। बात यह है कि लोगों ने धर्म के स्वरूप को शुद्धि के स्वरूप में नहीं पहचाना। इसका स्वरूप समझा है मौलाना मुहम्मद अली ने। काकीनाड़ा कांग्रेस में उन्होंने कहा था कि हिन्दू और मुसलमानों में केवल इतना ही भेद है कि "मुसलमान एक हण्डिया पकाते हैं। वे बड़े से बड़े आदमी को इसमें से खिलाना चाहते हैं। वे सब इस विषय में एक हैं। विपरीत इसके हिन्दू समझता है कि उसने एक बड़ा चौका तैयार कर लिया है और उसके भोजन पर हरेक की दृष्टि नहीं पड़ सकती है।" हम यह समझते हैं कि मुसलमान को मुसलमान रहने दें। ईसाई को ईसाई रहने दें। असल में हम आलसी थे। हम स्ट्रगल (संघर्ष) में आने से डरते थे। स्वामी दयानन्द आया। उसने अपने नाम को सार्थक किया। दया को क्रिया का रूप दिया।
बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ राजकुमार चीन में गया था। वर्मा में गया था, परन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि आज बौद्ध धर्म को भी अप्रचारक धर्म कहा जाता है। स्वामी दयानन्द आये और उन्होंने वेद के शब्दों में नाद बजाया और कहा कि हमें सबको आर्य बनाना है। ऐसे नहीं जैसे मौ० ख्वाजा हसन निजामी चाहते हैं। आज स्वामी दयानन्द का नाम लेते हैं तो उनके जीवन की क्रिया मालूम हो जाती है कि किस प्रकार उन्होंने अपने मत को फैलाया था।

जिस दिन मैं लाहौर से रावलपिंडी आया, उस दिन लोगों ने मुझे कहा कि यह वही स्थान है, जहां स्वामी दयानन्द भटकता था और लोग उसे बैठने नहीं देते थे। यह वही स्थान है, जहां पर लोगों ने ईंट-पत्थरों से स्वामी जी का स्वागत किया था। अब लोग उसे खोजते हैं, परन्तु वह नहीं मिलता है। आज वह दिन है कि जिस दिन संसार बदला है। जमीन आसमान बन गयी है और आसमान जमीन बन गया है। आज लोग कहते हैं "स्वामी दयानन्द! आओ और अपने चरणों से हमारी आंखों को तृप्त करो।" लाहौर में जगह नहीं मिलती थी। एक मुसलमान भाई ने जगह दी थी। जिस समय मैं लाहौर के मुसलमानों का विचार करता हूं तो सबसे पहले रहनुमा खां का ध्यान आता है। सब लोग कहते हैं कि यह वही मुसलमान है, जिसने स्वामी जी से अपने मकान के पास ठहरने को कहा था। उस समय मैं मुहम्मद अली का नजारा भूल जाता हूं। मैं उसका बड़ा कृतज्ञ हूं। स्वामी दयानन्द उस मुसलमान के कोठे पर जा उतरे। रात्रि में लैक्चर होता है। विषय है "कुरान का खंडन।" आवाज उठती है "विचित्र प्रकार का आदमी है।" पौराणिक अपने घर में स्थान नहीं देते हैं, ब्रह्मसमाजियों ने उसे अपनी वेदी से नीचे उतार दिया है, बड़ी कृपा से रहनुमा ने स्थान दिया है, पर उस उपकार का बदला यह है कि स्वामी कुरान का खंडन करता है। स्वामी दयानन्द कहता है- "इसमें सन्देह नहीं कि जब मुझे कहीं स्थान न मिला, तब रहनुमा खां ने अपने घर में बसाया और सहायता के लिए आसन बिछाया। मैं भी उसे मानता हूं, परन्तु मैंने तो घरबार छोड़ दिया है। आकाश की छत के नीचे बसेरा करता हूं। समस्त पृथ्वी मेरा घर है। कुछ दे नहीं सकता हूं। रुपया नहीं, माल नहीं, राज्य नहीं। मैं क्या दे सकता हूं? एक चीज है जिसके लिए माता की तपश्चर्या को पीछे छोड़ा है। पिता के प्रेम को छोड़ आया हूं। मित्रों की मित्रता को त्याग आया हूं। अनाथ हो गया हूं। अकिंचन हो गया हूं। जंगलों में फिरता हूं। पहाड़ों में फिरता हूं। झाड़ियों के अन्दर कांटों को लांघकर फिरता हूं। किसलिए? एक सत्य की खोज के लिए। किसी योगी के विषय में सुनता हूं कि जंगलों में रहते हैं और वहीं पहुंचता हूं।"

एक स्थान पर एक पादरी स्वामी जी का भक्त बन गया है। वह गिरजा में उनकी प्रार्थना किया करता है। एक ईसाई पादरी स्वामी दयानन्द के चरणों में गिरता है और उसका नाम पढ़ता है भक्त स्कॉट। वह प्रतिदिन आता है। एक दिन स्कॉट भक्त नहीं आया। क्यों नहीं आया? आज रविवार है। एक दिन ऋषि दयानन्द गिरजा में आते हैं और वहां उपदेश बन्द हो जाता है। स्वामी जी को उपदेश देने के लिए खड़ा किया जाता है। वह उपदेश देते हैं। यह उपदेश क्या है? वेद कहता है कि सारे संसार को आर्य बनाओ।

दूसरे धर्मों ने अपना-अपना प्रचार किया। किसी ने तलवार से और किसी ने धन से। स्वामी दयानन्द ने धर्म के मार्ग से किया। वह अधर्म के मार्ग से नहीं कर सकते थे। यह क्रियात्मक उपदेश है। आज तो राजनीतिक क्षेत्र में उपदेश दिया जाता है कि यदि धर्मोपदेश होगा तो मतभेद उत्पन्न होगा। आप विचार करें कि इतना झगड़ा बढ़ गया है, अतः हमें उदार बनना आवश्यक है। स्वामी दयानन्द के आने से पहले आर्यों की आंखें नीची थीं। स्वामी ने उन्हें ऊंचा कर दिया। हम आज मथुरा नगरी में शिष्य भाव से आए हुए हैं। अतः यह विचार लेकर जाएं कि ऋषि सारे संसार के लिए था। हम भी समस्त संसार के हो जाएं, भारत के लिए ही नहीं, एशिया के लिए ही नहीं।

एण्ड्रयूज लिखता है कि फिजी, मॉरीशस और इंग्लैण्डादि द्वीपों में स्वामी का नाम रोशन है इससे मैं समझता हूं कि उसका नाम सार्वभौम होने वाला है। अब आर्यों का यह कर्तव्य हो गया है कि वे अपने जीवन को प्रचार के अर्पण कर दें और जिएं तो इसलिए जिएं कि वेदों के सन्देश का प्रचार करना है। जब मुसलमान मेरी आंखों के सामने आते हैं तब मुझे उनके अगुआ रहनुमा खां की याद आती है और जब ईसाई सामने आते हैं, तब भक्त स्कॉट की याद आती है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि लोग इसी प्रकार लोगों का उपकार करते हुए ईश्वर के भक्त बनें।

[स्त्रोत- आर्यावर्त केसरी पत्रिका का सितम्बर २०१८ का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Thursday, February 21, 2019

यह कैसा सेक्यूलरिज्म है?



यह कैसा सेक्यूलरिज्म है?
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भारतीय संविधान इस अर्थ में अटपटा बना दिया गया है कि इसका एक आधारभूत सिद्धांत ‘सेक्यूलरिज्म’ नितांत अस्पष्ट है। प्रथम पृष्ठ पर यह शब्द लिख कर संविधान में जोड़ दिया गया, किन्तु कहीं परिभाषित नहीं किया गया। न अलग से कोई कानून बनाकर, न सुप्रीम कोर्ट के किसी निर्णय में इसका कोई स्पष्ट अर्थ दिया गया है। सबसे लाक्षणिक बात तो यह कि इसे पारिभाषित करने के प्रयास को भी बाधित किया जाता है। नेतागण, सुप्रीम कोर्ट और प्रभावी बुद्धिजीवी वर्ग सब ने इसे अस्पष्ट रहने देने की सिफारिश की है। यह सामान्य बात नहीं, क्योंकि इसी के सहारे भारत में एक विशेष प्रकार ही राजनीति का दबदबा बना, जिसकी धार हिन्दू-विरोधी है। और इसी को कवच बनाकर देश-विदेश की भारत-विरोधी शक्तियाँ भी अपने कारोबार करती हैं।
ध्यान देने पर यह किसी को भी दिख सकता है। कुछ पहले मधु किश्वर ने तवलीन सिंह (दोनों प्रसिद्ध पत्रकार) का ध्यान इस बात पर आकृष्ट कराया कि विचार-विमर्श में "हिंदू" शब्द केवल गाली के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। तवलीन जी ने ध्यान देना शुरू किया और पाया कि बात सच है। उन्हें स्थिति ऐसी गंभीर लगी कि सेक्यूलरिज्म ‘हिंदू सभ्यता के विरुद्ध चुनौती’ बन गया है। भारतीय सभ्यता अपने उत्कर्ष पर हिंदू सभ्यता ही थी, जिसने संपूर्ण विश्व को गणित से लेकर दर्शन, धर्म, साहित्य और विज्ञान तक हर क्षेत्र में अनमोल उपहार दिए, किंतु आज भारत में यह बात कहना "हिंदू सांप्रदायिकता" है। इसीलिए किसी पाठ्य-पुस्तक में ऐसी बातों का संकेत भी अवांछित है। विश्व-प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर "भगवतगीता" को नैतिक राजनीति का विश्व में एकमात्र ग्रंथ कह सकते थे, किंतु कोई भारतीय आज यह लिखे तो उसे ‘भगवा लेखक’ बताकर अपमानित किया जाता है। अतः सेक्यूलरिज्म को हिंदू-विरोध का दूसरा नाम कहकर तवलीन जी ने कड़वी सच्चाई बयान की थी।
सच पूछें तो ऐसे प्रसंग हमारे देश के बौद्धिक वातावरण पर एक टिप्पणी है कि किस तरह एक विकृत मतवाद ने लोगों को इतना दिग्भ्रमित कर दिया है कि वे देखकर भी नहीं देख पाते। अन्यथा तवलीन सिंह को यह समझने में इतने दशक न लगे होते। प्रसिद्ध इतिहासकार रमेशचंद्र मजूमदार ने 1965 में ही स्पष्ट देखा था कि, “इस देश में "मुस्लिम संस्कृति" और "भारतीय संस्कृति" की चर्चा की जा सकती है, मगर "हिंदू संस्कृति" की नहीं। हिंदू शब्द केवल नकारात्मक अर्थों में प्रयोग किया जाता है”। याद रहे, यह तब की बात है जब न राम-जन्मभूमि आंदोलन था, न विश्व-हिंदू परिषद थी, मगर तब भी ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग पोंगापांथी, सांप्रदायिक, फासिस्ट संदर्भ में ही होता था। चार दशक में आज वह ‘विष’ भी बन गया, जिससे विवध पुस्तकों, पदों, संस्थानों को मुक्त करने का ‘डि-टॉक्सिफिकेशन’ चलाना पड़ता है!!
दुनिया के सबसे बड़े हिन्दू देश में हिन्दू-विरोध ही बौद्धिकता की कसौटी कैसे बन गया! यह सोचने की बात है। आरंभ यह जैसे भी हुआ, किन्तु दिनों-दिन इसकी बढ़त अपरिभाषित सेक्यूलरिज्म के कारण ही हुई। इसी से संभव होता है कि एक समुदाय के मजहबी शिक्षा-संस्थानों को भी अनुदान, सम्मान, पहचान मिले, जबकि दूसरे को अपनी औपचारिक शिक्षा में महान दार्शनिक ग्रंथों को भी पढ़ने की अनुमति न दी जाए। अपरिभाषित सेक्यूलरिज्म के डंडे से ही हिंदू मंदिरों पर सरकारी कब्जा कर लिया जाता है, जबकि मस्जिदों, गिरजाघरों को संबंधित समुदाय को मनमर्जी से चलाने के लिए छोड़ दिया जाता है। इतना ही नहीं, कई बड़े हिन्दू मंदिरों की आमदनी से दूसरे समुदाय की हज यात्रा को करोड़ों का अनुदान दिया जाता है (कर्नाटक, आंध्र)।
यहाँ अवैध धर्मांतरण कराने वाले विदेशी ईसाई को राष्ट्रीय सम्मान दिया जाता है, जबकि अपने धर्म में रहने या वापस आने की अपील करने वाले हिंदू समाजसेवी को सांप्रदायिक कहकर लांछित किया जाता है। अप्रमाणित आरोप पर भी एक शंकराचार्य दीवाली के दिन गिरफ्तार कर अपमानित किए जाते हैं, जबकि मौलवियों-इमामों को देश-द्रोही बयान देने, संरक्षित पशुओं को अवैध रूप से अपने घर में लाकर बंद रखने, न्यायालयों की उपेक्षा करने पर भी छुआ तक नहीं जाता। उल्टे राजनीतिक निर्णयों में उन्हें विश्वास में लेकर उनकी शक्ति बढ़ा दी जाती है। भयंकर आतंकवादी तक ‘लादेन जी’ का सम्मानित संबोधन पाता है, जबकि लब्ध प्रतिष्ठित योगाचार्य को ‘रामदेव ठग’ कहा जाता है।
यदि सेक्यूलरिज्म वैधानिक रूप से परिभाषित हो गया तो यह सभी राजनीतिक मनमानियाँ और वैचारिक गुंडागर्दी नहीं हो सकेगी। इस सेक्यूलरिज्म की अस्पष्टता का ही करिश्मा है कि शिक्षा, संस्कृति और राजनीति – हर क्षेत्र में भारत में अन्य समुदायों को हिंदुओं से अधिक अधिकार मिले हुए हैं। इस अत्याचार पर जानकार हिंदू कसमसाते हैं, पर कुछ कर नहीं पाते, क्योंकि उन पर यह जुल्म हिंदू कुल में जन्मे, किंतु सेक्यूलरिज्म में दीक्षित हो गए नेता व बुद्धिजीवी ही करते रहे हैं, कोई और नहीं।
कहने को अभी देश में सेक्यूलरिज्म की कम से कम चार परिभाषाएं हैं, यद्यपि कोई वास्तविक नहीं। विभिन्न लोग इच्छानुसार इनका उपयोग करते हैं। एक परिभाषा 1973 में न्यायाधीश एच. आर. खन्ना ने दी कि “राज्य मजहब के आधार पर किसी नागरिक के विरुद्ध पक्षपात नहीं करेगा”। कुछ बाद दूसरी परिभाषा कांग्रेस पार्टी ने दी, “सर्वधर्म समभाव”। तीसरी परिभाषा भाजपा की, “न्याय सबको, पक्षपात किसी के साथ नहीं”। चौथी एक टिप्पणी है, किंतु सुप्रीम कोर्ट के पूर्व-मुख्य न्यायाधीश एम. एन. वेंकटचलैया की होने के कारण इसका महत्व है। इनके अनुसार, “सेक्यूलरिज्म का अर्थ बहुसंख्यक समुदाय के विरुद्ध नहीं हो सकता”। यह टिप्पणी प्रकारांतर स्वीकारती है कि व्यवहार में इसका यही अर्थ हो गया है। यहाँ याद करें कि स्वयं संविधान निर्माता डॉ. अंबेदकर ने भारतीय संविधान को सेक्यूलर नहीं माना था क्योंकि “यह विभिन्न समुदायों के बीच भेद-भाव करती है”।
उपर्युक्त परिभाषाओं में सबसे विचित्र बात यही है कि इनमें से किसी को वैधानिक रूप नहीं दिया गया। कांग्रेस ने 1976 में इमरजेंसी के दौरान 42वाँ संशोधन करके संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्यूलर’ शब्द जबरन जोड़ दिया, किंतु बिना कोई अर्थ दिए। जबरन इस रूप में कि तब विपक्ष जेल में डाला हुआ था और प्रेस पर अंकुश था। बाद में आई जनता सरकार ने 1978 में 45वें संशोधन द्वारा कांग्रेस वाली परिभाषा को ही वैधानिक रूप देने की कोशिश की। लोकसभा में यह पारित भी हो गया। पर राज्यसभा में कांगेस ने ही इसे पारित नहीं होने दिया!
यह इसका पक्का प्रमाण था कि संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्यूलर’ शब्द गर्हित उद्देश्य से जोड़ा गया था। इसीलिए उसे जान-बूझ कर अपरिभाषित रखा गया, ताकि जब जैसे चाहे, दुरुपयोग किया जाए। यह अन्याय सुप्रीम कोर्ट ने भी दूर नहीं किया। उलटे 1992 में ‘एस. आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार’ वाले निर्णय में इसने लिख डाला कि सेक्यूलरिज्म लचीला शब्द है, जिसका अपरिभाषित रहना ही ठीक है। जबकि ऐसा कहना कानून की धारणा के ही विरुद्ध है। कानून का अर्थ ही निश्चित रूप से लागू होने वाला आदेश होता है। पर जो स्पष्ट ही नहीं, वह मनमानी के सिवा और लागू कैसे होता? [विस्तार से जानने के लिए देखें, इस लेखक की पुस्तक ‘भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद’, अक्षय प्रकाशन, दिल्ली]
दुर्भाग्य से राष्ट्रीय चेतना वाले लोगों ने न तो 1978 में, न बाद में कभी इस गड़बड़ी के विरुद्ध कोई आंदोलन चलाना आवश्यक समझा। वे अपरिभाषित सेक्यूलरिज्म के दूरगामी घातक परिणामों को समझने में विफल रहे। जिस भाजपा को ‘स्यूडो-सेक्यूलरिज्म’ के विरुद्ध लंबे समय से शिकायत थी, उसने भी अपने शासन काल (1998-2004) में सेक्यूलरिज्म को परिभाषित करने पर कोई विचार तक नहीं किया। उल्टे वह ‘हम भी सेक्यूलर’ की होड़ में लग गई, अन्यथा उसने इसे कानूनी रूप से परिभाषित करना-करवाना अपना प्रधान कर्तव्य समझा होता। पर हिंदू समुदाय के गले में फंदे की तरह पड़े इस अस्पष्ट सेक्यूलरिज्म को परिभाषित करने की जरूरत पर उनके हाथ-पैर भी ठंढे हो गए। यह चिर-परिचित हिंदू भीरुता थी। इसी कारण "स्यूडो-सेक्यूलरिज्म" के खिलाफ रोने-धोने वाले नेताओं को इस ‘स्यूडो’ को ‘रीयल’ रूप देने का साहस न हुआ। इसीका प्रमाण था कि संविधान कार्यचालन की समीक्षा का आयोग तो बनाया गया, किंतु उसने भी इस पर कोई अनुशंसा नहीं दी। यह भी हिंदू महानुभावों पर लाक्षणिक टिप्पणी ही है कि इस आयोग के अध्यक्ष वही न्यायमूर्ति एम. एन. वेंकटचलैया थे। स्पष्टतः उन्होंने भी सेक्यूलरिज्म को ‘बहुसंख्या के विरुद्ध प्रयोग किए जाने’ के चलन को रोकने के लिए कुछ करना आवश्यक नहीं समझा!
यह मानना गलत है कि सेक्यूलरिज्म को परिभाषित करने का विधेयक संसद से पास नहीं होता या नहीं होगा। ऐसा विधेयक आने पर उसका विरोध करने पर भी जो राष्ट्र-व्यापी बहस होगी, उसी में उस की बड़ी सफलता निश्चित है। भारतीय जनता – हिंदू, मुस्लिम दोनों – ही यह देखेगी कि अपरिभाषित सेक्यूलरिज्म राजनीतिक दुष्टताओं की जड़ है। जिस चीज को संविधान और शासन का आधारभूत सिद्धांत कहा जाता है, उसे परिभाषित होने से किस आधार पर रोका जाएगा? एक अर्थ पसंद नहीं तो दूसरा सही, पर कोई पक्का, वैधानिक अर्थ तो होना ही चाहिए। इस से हीला-हवाला करने पर लोगों को समझने में कठिनाई नहीं होगी कि सेक्यूलरिज्म को अपरिभाषित रखना विभिन्न समुदायों के बीच दूरी को बनाए रखने का औजार है। इसलिए यदि सेक्यूलरिज्म को परिभाषित करने का गंभीर प्रयास हो तो इसका कोई न कोई कानूनी अर्थ तय करवाना बिलकुल संभव है। यदि प्रयास शुरू में विफल भी हो तब भी उस पर राष्ट्रीय बहस भारतीय समाज को जागृत करेगा।
लेखक : डॉ. शंकर शरण

Wednesday, February 20, 2019

देवभाषा व राष्ट्रभाषा के प्रति क्रान्तिकारी वीर सावरकर के अमूल्य विचार



देवभाषा व राष्ट्रभाषा के प्रति क्रान्तिकारी वीर सावरकर के अमूल्य विचार

प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ

"संस्कृतनिष्ठ हिंदी जो संस्कृत से बनायी गयी है और जिसका पोषण संस्कृत भाषा से हो, वह हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा होगी। संस्कृत भाषा संसार की समस्त प्राचीन भाषाओं में सब से अधिक संस्कृत और सब से अधिक सम्पन्न होने के अतिरिक्त हम हिंदुओं के लिए सब से अधिक पवित्र भी है। हमारे धर्मग्रन्थ, इतिहास, तत्वज्ञान और संस्कृति, संस्कृत भाषा से इतनी अधिक परस्पर मिली हुई है और इसके अंतर्भूत है कि यही हमारी हिंदू जाति का वास्तविक मस्तिष्क है। हमारी अधिकांश मातृ-भाषाओं की यह माता है, इस ने उन्हें अपने वक्ष का दूध पिलाया है। आज हिंदुओं की समस्त भाषाएं जो या तो संस्कृत से ही निकली हैं या उसमें दूसरी भाषा मिला कर बनायी गयी हैं, वे सब तभी उन्नत और संवृद्ध हो सकती हैं जब वे संस्कृत-भाषा से पोषित की जायें। इसलिये प्रत्येक हिंदू युवक के प्राचीन भाषा के पाठ्यक्रम में संस्कृत भाषा आवश्यक रूप से रहनी चाहिये। संस्कृत हमारी देवभाषा है और हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा।

हिंदी को राष्ट्रीय भाषा स्वीकार करने में अन्य प्रांतों की भाषा के सम्बन्ध में कोई अपमान की भावना या ईर्षालू भावना नहीं है। हमें अपनी प्रांतीय भाषाओं से भी उतना ही अधिक प्रेम है जितना कि हिंदी से। ये सब भाषाएं अपने अपने क्षेत्र में उन्नत होती रहेंगी। वास्तव में कुछ प्रांतीय भाषाएं हिंदी भाषा की अपेक्षा साहित्य में अधिक उन्नत और अधिक सम्पन्न हैं परंतु फिर भी हिंदी अखिल हिंदुत्व की राष्ट्रभाषा होने के लिये सब प्रकार से सर्वश्रेष्ठ है। यह बात भी ध्यान में रखने की है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा-व्यवस्था के लिये नहीं बनाया गया है। वास्तविक बात यह है कि मुसलमान और अंग्रेजों के आने के बहुत पहले से ही हिंदी ने समस्त हिंदुस्थान में राष्ट्रीय भाषा का स्थान ग्रहण कर लिया था। हिंदू तीर्थ यात्री, व्यापारी और यात्रा करनेवाले देश के एक छोर से दूसरे छोर तक घूमते थे- बंगाल से सिंधु तक और काश्मीर से लेकर रामेश्वर तक वे जाया करते थे और वे अपना मनोगत भाव प्रत्येक स्थान में हिंदी में ही व्यक्त कर अपना काम चलाते थे। जिस भांति संसार के बुद्धिमान हिंदुओं की भाषा संस्कृत थी, उसी भांति कम से कम एक हजार वर्षों से साधारण हिंदुओं की राष्ट्रीय भाषा हिंदी रही है। इसके अतिरिक्त आज भी हम यह देखते हैं कि भारत में जितने लोग हिंदी समझ सकते हैं या जितने लोग हिंदी को मातृभाषा के रूप में बोलते हैं, उतनी अन्य किसी भाषा को न तो समझते हैं और न बोलते हैं। इसलिये प्रत्येक हिंदू विद्यार्थी के लिए यह आवश्यक कर दिया जाये कि सेकेण्डरी स्कूलों में प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी प्रांतीय भाषा की शिक्षा के साथ साथ हिंदी भी आवश्यक रूप से पढ़ाई जाये।

हिंदी से हमारा अभिप्राय शुद्ध 'संस्कृतनिष्ठ' हिंदी से है; उदाहरण के लिये महर्षि दयानंद सरस्वती ने जैसी हिंदी अपने सत्यार्थप्रकाश में लिखी है। सत्यार्थ-प्रकाश की हिंदी कितने सरल है, उस में अनावश्यक रूप से एक भी विदेशी भाषा का शब्द नहीं डाला गया और साथ ही उस में अपनी भावना को कितने सुन्दर रूप से स्पष्ट किया गया है। यहां यह बता देना ठीक होगा कि स्वामी दयानंद सरस्वती ऐसे पहले हिंदू नेता हुए हैं जिन्होंने पहले-पहल यह बात कही थी कि अखिल हिंदुत्व की राष्ट्र-भाषा हिंदी होनी चाहिये।

हमारी इस 'संस्कृतनिष्ठ' हिंदी का सम्बन्ध उस हिंदूस्थानी से कुछ भी नहीं है जो वर्धा की योजना के अनुसार ज़बरदस्ती दूसरी भाषा के शब्द ठूंस कर बनायी गयी है। यह नीति भाषा को दलदल में फँसाने से कुछ भी कम नहीं और हमें इस आंदोलन को दृढ़तापूर्वक दबा देनी चाहिये। इतना ही नहीं, हमारा यह भी अनिवार्य कर्तव्य है कि हम अपनी प्रांतीय भाषाओं में से और बोलचाल की भाषा में से भी वे सब विदेशी शब्द बीन डालें जो उनमें अंग्रेजी अथवा अरबी के हैं। हम अंग्रेजी भाषा के विरोधी नहीं हैं, इस के विपरीत हमारा आग्रह है कि अंग्रेजी भाषा नितांत आवश्यक है और विश्व-साहित्य में प्रवेश करने के लिए यह एक पासपोर्ट या साधन है। परंतु हम अपनी देशी भाषाओं में विदेशी भाषाओं के बढ़न्त हुए प्रवाह को बिना आवश्यकता और बिना रोकटोक के नहीं होने देंगे। इस के लिए हमें अपने बंगाली बन्धुओं को विशेष रूप से बधाई देना चाहिये कि उन्होंने अपनी भाषा को अनावश्यक विदेशी शब्दों से बिलकुल स्वच्छ रखा है। हमारी अन्य प्रान्त की भाषाओं के सम्बन्ध में यह बात नहीं कही जा सकती।

हिंदूडम की राष्ट्रीय लिपि नागरी होगी:- हमारी संस्कृत की वर्ण माला ध्वनि की दृष्टि से संसार की समस्त वर्णमालाओं में सबसे अधिक परिपूर्ण है और हमारी भारतीय लिपिओं ने इस का अनुकरण पहले ही से कर लिया है। नागरी लिपि भी उसी क्रम में है। हिंदी की भांति नागरी लिपि भी समस्त भारत में गत दो हजार वर्षों से साहित्यिक लोगों में प्रचलित है। इसे "शास्त्री लिपि" के नाम से भी पुकारते हैं क्योंकि इस में हमारे धर्म-शास्त्र लिखे गये हैं। थोड़ा सा इधर उधर फेर फार करने से यह लिपि छपाई इत्यादि के लिए रोमन लिपि के समान सरल हो सकती है। इस प्रकार का लिपि-सुधार का आंदोलन महाराष्ट्र में गत ४० वर्षों से प्रचलित है। इसे श्री वैद्य तथा अन्य लोगों ने प्रचलित किया था। बाद में मेरी अध्यक्षता में यह संघटित रूप से चला और क्रियात्मक रूप से इस में हमें बड़ी सफलता प्राप्त हुई। नागरी लिपि को राष्ट्रीय लिपि बनाने के लिये मैं समस्त प्रान्तों के हिन्दू पत्रों से ज़ोरदार सिफ़ारिश करता हूँ कि वे अपने पत्रों में कम से कम एक या दो कालम अपनी प्रान्तीय भाषा के नागरी लिपि में प्रकाशित किया करें। यह बात सब लोग जानते हैं कि यदि गुजराती, बंगला भाषा भी नागरी लिपि में प्रकाशित हो तो उसे अन्य प्रान्त के लोग भी समझ सकते हैं। समस्त हिन्दुस्थान में एक भाषा तुरंत कर देना अक्रियात्मक और मूर्खतापूर्ण है। परन्तु समस्त हिन्दूडम में नागरी लिपि कर देना बहुत सरल और संभव है। फिर भी यह बात तो ध्यान में रखनी ही होगी, कि विभिन्न प्रान्तों में हिन्दुओं के धर्म ग्रन्थ विभिन्न हिन्दू लिपियों में लिखे गये हैं और प्रचलित हैं, इसलिये इन लिपियों का अपना भविष्य है और नागरी लिपि के साथ साथ इन की उन्नति भी होनी चाहिये। इस समय तुरंत आवश्यकता इस बात की है कि समस्त हिन्दू विद्यार्थियों को हिन्दी भाषा के साथ नागरी लिपि की अनिवार्य्य रूप से शिक्षा दी जाया करे।

यहां आप को यह बताना भी बड़ा रोचक होगा कि कांग्रेस के पूर्व दो प्रेसिडेंटों ने राष्ट्र भाषा और राष्ट्र लिपि की समस्या को किस प्रकार हल करने का यत्न किया था। मौलाना अबुलकलाम आज़ाद कहते हैं कि राष्ट्रीय भाषा हिन्दुस्थानी ऐसी हो जो उर्दू के समान हो; परन्तु पंडित जवाहरलाल नेहरू उनसे भी आगे बढ़ कर कहते हैं कि राष्ट्र भाषा अलीगढ़ स्कूल की या उस्मानिया युनिवर्सिटी की हो- वही २८ करोड़ हिन्दुओं के लिये भी सब से अधिक उपयुक्त होगी। देश गौरव श्री सुभाष बाबू अपने पूर्वाधिकारी पण्डित जवाहरलाल नेहरू से भी बुद्धि मत्ता में बाजी ले गये हैं। वे कांग्रेस के सभापति पद से कहते हैं कि भारत के लिये सब से उपयुक्त राष्ट्र-लिपि रोमन लिपि होगी। इस प्रकार से कांग्रेस की विचार धारा राष्ट्रीय बातों का विचार करती है। यह कितनी क्रियात्मक हो सकती है, इसके सम्बन्ध में जितना थोड़ा कहा जाये उतना ही अच्छा है। आपके वसुमती, आनंद बाज़ार पत्रिका और समस्त बंगाली पत्र अब प्रतिदिन रोमन लिपि में प्रकाशित होंगे। इस नई लिपि में 'वंदेमातरम्' इस प्रकार लिखा जायेगा:-

"ट्रोमारॉ प्रटिमा घडिबे मण्डिरे मण्डिरे"। और फिर गीता किस बढ़िया रूप में लिखी जायेगी-

"ढर्म क्षेट्रे कुरु क्षेट्रे, शमवेटा युयुट्वा"। बस इसी प्रकार समझ लीजिये। यह ठीक है कि मुस्तफा कमाल पाशा ने अरबिक लिपि को छापने के अयोग्य समझ कर उसके स्थान में रोमन-लिपि स्वीकार की है। परंतु इस बात से हमारे उन भारतीय मुसलमानों को पाठ सीखना चाहिये जो भारत में उर्दू लिपि को [जो अरबी लिपि के ही समान है] हम हिन्दुओं पर यह कह कर जबरदस्ती ठोंकना चाहते हैं, कि यह लिपि आधुनिक रूप की है और इस का हिन्दुओं से कोई सम्बन्ध नहीं है? कमाल पाशा को इसलिये रोमन लिपि का आश्रय लेना पड़ा क्योंकि उन की अपनी लिपि इस से अच्छी नहीं थी। अण्डमान द्वीप में वहां के निवासी कौड़ियों का हार बना कर पहनते हैं- इसलिए क्या धन-कुबेरों को भी कौड़ियों का हार पहनना चाहिये। हम हिन्दुओं को तो यूरोप और अरबिया के लोगों को भी नागरी लिपि हिन्दी भाषा स्वीकार करने के लिये कहना चाहिये। हमारा यह प्रस्ताव वे हठी और आशावादी लोग तो असंभवनीय नहीं समझ सकते जो उर्दू को राष्ट्र भाषा बनाने की कल्पना कर यह संभवनीय समझते हैं कि मरहठे उर्दू पढ़ेंगे और आर्य समाज के गुरुकुलों में वेदों को रोमन लिपि में पढ़ाया जायेगा!


[सन्दर्भ- हमारी समस्याएं; लेखक- वीर सावरकर; प्रकाशक- राजपाल एण्ड सन्स, नई सड़क, दिल्ली; आवृत्ति- प्रथम; पृष्ठ- ३०-३४]