Saturday, November 30, 2013

बिस्मिल का मशहूर उर्दू मुखम्मस



bismil

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर,
हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुःख सह-सह कर ,
वक्ते-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कह कर,
गोद में अश्क जो टपकें कभी रुख से बह कर ,
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को !

अपनी किस्मत में अजल ही से सितम रक्खा था,
रंज रक्खा था मेहन रक्खी थी गम रक्खा था ,
किसको परवाह थी और किसमें ये दम रक्खा था,
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था ,
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को !

अपना कुछ गम नहीं लेकिन ए ख़याल आता है,
मादरे-हिन्द पे कब तक ये जवाल आता है ,
कौमी-आज़ादी का कब हिन्द पे साल आता है,
कौम अपनी पे तो रह-रह के मलाल आता है ,
मुन्तजिर रहते हैं हम खाक में मिल जाने को !

नौजवानों! जो तबीयत में तुम्हारी खटके,
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ,
आपके अज्वे-वदन होवें जुदा कट-कट के,
और सद-चाक हो माता का कलेजा फटके ,
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को !

एक परवाने का बहता है लहू नस-नस में,
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ,
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में,
भाई खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में ,
बहने तैयार चिताओं से लिपट जाने को !

सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं,
पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं ,
खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं!
खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं ,
जा के आबाद करेंगे किसी वीराने को !

नौजवानो ! यही मौका है उठो खुल खेलो,
खिदमते-कौम में जो आये वला सब झेलो ,
देश के वास्ते सब अपनी जबानी दे दो ,
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएँ ले लो ,
देखें कौन आता है ये फ़र्ज़ बजा लाने को ?

(बिस्मिल का मशहूर उर्दू मुखम्मस)

रामायण में उत्तर कांड के प्रक्षिप्त होने का प्रमाण



कौन ऐसा भारतीय हैं जो रामायण महाकाव्य और रचियता आदि कवि वाल्मीकि से परिचित न हो ? रामायण हम भारतियों के प्राण हैं। उसकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही व्यवहारिक हैं जितनी कि प्राचीन काल में थी। उसमें जीवन कि गहन और गम्भीर समस्यों का सुलझा हुआ स्वरुप दृष्टिगोचर होता हैं। एक ओर श्री राम आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श शिष्य, आदर्श पति,  आदर्श सेवक एवं आदर्श राजा हैं वही दूसरी ओर सीता आदर्श पत्नी, आदर्श वधु, आदर्श भाभी और आदर्श नारी हैं। जहाँ एक ओर आदर्श माता के रूप में कौशलया का चित्रण हैं वही दूसरी और आदर्श भाई के रूप में लक्ष्मण का वर्णन हैं। जहाँ एक ओर भारत जैसे तपस्वी आदर्श अनुज का वर्णन हैं वही दूसरी और हनुमान जैसे आदर्श सेवक का वर्णन हैं। जहाँ एक ओर सुग्रीव जैसे आदर्श सहयोगी का वर्णन हैं वही दूसरी ओर जटाऊ जैसे आदर्श त्यागी का भी वर्णन हैं। रामायण में क्या नहीं हैं? जीवनदर्शन हैं, जीवन का सार हैं, तात्पर्य यह हैं कि रामायण में हमें जीवन जीने के लिए उच्चतम आचार के दृष्टान्त मिलते हैं। रामायण से पूर्वकाल में जनमानस को प्रेरणा और मार्गदर्शन मिला, आज भी मिल रहा हैं और आगे भी मिलता रहेगा।
आज प्राप्त रामायण के विभिन्न संस्करणों में कुछ कुछ भिन्नता हैं।  इस समय प्राप्त रामायण में ७ कांड हैं- बाल कांड, अयोध्याय कांड, अरण्य कांड, किष्किन्धा कांड, सुंदर कांड, युद्ध कांड और उत्तर कांड।
सबसे अधिक विवादस्पद उत्तर कांड को माना जाता हैं क्यूंकि इस कांड में श्री राम का अंतिम जीवन, सीता कि निंदा और वन गमन, सीता शोक, लव कुश का जन्म, शम्बूक वध आदि वर्णित हैं।
उत्तर कांड के प्रक्षिप्त होने के कारण
१. छठे कांड को समाप्त करते समय कवि वाल्मीकि ने फलश्रुति रावणवध के साथ रामायण का अंत कर दिया हैं फिर सातवें कांड के अंत में दोबारा से फलश्रुति का होने संदेहजनक हैं क्यूंकि एक ही ग्रन्थ में दो फलश्रुति नहीं होती।
२. श्री रामचंद्र जी को आरंम्भ के ६ कांडों में (कुछ एक प्रक्षिप्त श्लोकों को छोड़कर) वीर महापुरुष दर्शित किया गया हैं, केवल सातवें में उन्हें विष्णु का अवतार दर्शाया गया हैं जोकि विषयांतर होने के कारण प्रक्षिप्त सिद्ध होता हैं।
३. सातवें कांड में ऐसे अनेक उपाख्यान हैं जिनका रामायण कि मूल कथा से किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं हैं जैसे ययाति नहुष कि कथा, वृत्र वध, उर्वशी-पुरुरवा कि कथा आदि।  रावण और अन्य राक्षसों का वध पहले ही हो चूका था फिर सातवें कांड में रावण का इंद्र से युद्ध, राक्षसों कि उत्पत्ति का वर्णन हैं। हनुमान राम मिलन पहले ही हो चूका था फिर सातवें कांड में हनुमान के यौवन काल का उल्लेख अप्रासंगिक प्रतीत होता हैं।
४. सीता कि अग्निपरीक्षा एवं वन निर्वासन कि घटना का वर्णन सातवें कांड में मिलता हैं। अगर समग्र रूप से सम्पूर्ण रामायण को देखे तो हमें यही सन्देश मिलता हैं कि श्री रामचंद्र जी ने अपनी पत्नी सीता का अपहरण करने वाले दुष्ट रावण को खोजकर उसे यथोचित दंड दिया। उस काल कि सामाजिक मर्यादा भी देखिये कि सीता का अपहरण करने के बाद भी रावण में इतना शिष्टाचार था कि बिना सीता कि अनुमति के रावण कि सीता को स्पर्श करने का साहस न हुआ। फिर यह कैसे सम्भव हैं कि मर्यादापुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी महाराज जो उस काल में  आर्य शिरोमणि कहे जाते थे, सीता पर एक अज्ञानी के समान शक करते, अग्निपरीक्षा करवाते, प्रतिज्ञा करवाते, धोबी के कहने पर वन में जाने का आदेश देते हैं। रामायण में पहले से लेकर छठे कांड तक नारी जाति के सामाजिक अधिकारों का वर्णन प्रभावशाली रूप में मिलता हैं जैसे कौशलया का महलों में रहकर वेद पढ़ना एवं अग्निहोत्र करना, कैकई का दशरथ के साथ सारथि बनकर युद्ध में भाग लेना, सीता द्वारा शिक्षा ग्रहण कर स्वयंवर द्वारा अपने वर को चुनना आदि। नारी के इस सम्मानजनक स्थान के ठीक विपरीत सातवें कांड में पुरुष द्वारा नारी जाति पर संदेह करना, उसकी परीक्षा करना, उसे घर से निष्काशित करना यही दर्शाता हैं कि मध्य काल में जब नारी को हेय कि वस्तु समझा जाता था यह उसी काल का प्रक्षेप किया गया हैं। इससे भी यही सिद्ध होता हैं कि रामायण का उत्तर कांड प्रक्षिप्त हैं।
५. विदेशी विद्वान हरमन जैकोबी अपनी पुस्तक दास रामायण (Das Ramayan) में लिखते हैं कि "जैसे हमारे अनेक पूजनीय पुराने गिरिजाघरों में एक नई पीढ़ी ने कुछ न कुछ नया भाग बढ़ा दिया हैं और कुछ पुराने भाग कि मरम्मत करवा दी हैं और फिर भी असली गिरिजाघर कि रचना को नष्ट नहीं होने दिया हैं इसी प्रकार भाटों के अनेक पीढ़ियों ने असली रामायण में बहुत कुछ बढ़ा दिया हैं, जिसका एक एक अवयव अन्वेषण के आँख से छुपा हुआ नहीं हैं। "  जैकोबी साहिब भी स्पष्ट रूप से रामायण में प्रक्षिप्त भाग को मान रहे हैं।
६.  एक और रामायण में श्री राम का केवट, निषाद राज, भीलनी शबरी के साथ बिना किसी भेद भाव के साथ सद व्यवहार हैं वही दूसरी और सातवें कांड में शम्बूक पर शुद्र होने के कारण अत्याचार का वर्णन हैं। दोनों बातें आपस में मेल नहीं खाती इसलिए इससे यही सिद्ध होता हैं कि शम्बूक वध वाली उत्तर कांड कि कथा प्रक्षिप्त हैं।
इस प्रकार से अन्य उदहारण उत्तर कांड को प्रक्षिप्त सिद्ध करने के लिए दिए जा सकते हैं। उत्तर कांड श्री रामचंद्र जी के महान रामायण का उनके गुणों के विपरीत होने के कारण भी अंग नहीं हैं।

डॉ विवेक आर्य

Saturday, November 23, 2013

अमर बलिदानी बालक वीर हकीकत राय



पंजाब के सियालकोट मे सन् 1719  में जन्में वीर हकीकत राय जन्म से ही कुशाग्र बुद्धि के बालक थे। आप बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के बालक थे। बड़े होने पर आपको उस समय कि परम्परा के अनुसार फारसी पढ़ने के लिये मौलवी के पास मस्जिद में भेजा गया। वहाँ के कुछ शरारती मुस्लमान बालकों ने हिन्‍दू बालको तथा हिन्‍दू देवी देवताओं को अपशब्‍द कहते रहते थे। बालक हकीकत उन सब के कुतर्को का प्रतिवाद करता और उन मुस्लिम छात्रों को वाद-विवाद मे पराजित कर देता। एक दिन मौलवी की अनुपस्तिथी मे मुस्लिम छात्रों ने हकीकत राय को खूब मारा पीटा। बाद मे मौलवी के आने पर उन्‍होने हकीकत की शिकायत कर दी कि उन्होंने मौलवी के यह कहकर कान भर दिए कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। यह सुनकर मौलवी नाराज हो गया और हकीकत राय को शहर के काजी के सामने प्रस्‍तुत कर दिया। बालक के परिजनो के द्वारा लाख सही बात बताने के बाद भी काजी ने एक न सुनी और  शरिया के अनुसार दो निर्णय सुनाये एक था एक था सजा-ए-मौत है या दूसरा था इस्लाम स्वीकार कर मुसलमान बन जाना ।माता पिता व सगे सम्‍बन्धियों ने हकीकत को प्राण बचाने के लिए मुसलमान बन जाने को कहा मगर धर्मवीर बालक अपने निश्‍चय पर अडि़ग रहा और बंसत पंचमी २० जनवरी सन 1734 को जल्‍लादों ने 12 वर्ष के निरीह बालक का सर कलम कर दिया। वीर हकीकत राय अपने धर्म और अपने स्वाभिमान के लिए बलिदानी हो गया।और जाते जाते इस हिन्दू कौम को अपना सन्देश दे गया। वीर हकीकत कि समाधी उनके बलिदान स्थल पर बनाई गई जिस पर हर वर्ष उनकी स्मृति में मेला लगता रहा। 
1947 के बाद यह भाग पाकिस्तान में चला गया परन्तु उसकी स्मृति को अमर कर उससे हिन्दू जाति को सन्देश देने के लिए डा. गोकुल चाँद नारंग ने उनका स्मारक यहाँ पर बनाने का आग्रह अपनी कविता के माध्यम से इस प्रकार से किया हैं।
हकीकत को फिर ले गए कत्लगाह में हजारों इकठ्ठे हुए लोग राह में|

चले साथ उसके सभी कत्लगाह को हुयी सख्त तकलीफ शाही सिपाह को|

किया कत्लगाह पर सिपाहियों ने डेरा हुआ सबकी आँखों के आगे अँधेरा|

जो जल्लाद ने तेग अपनी उठाई हकीकत ने खुद अपनी गर्दन झुकाई|

फिर एक वार जालिम ने ऐसा लगाया हकीकत के सर को जुदा कर गिराया|

उठा शोर इस कदर आहो फुंगा का के सदमे से फटा पर्दा आसमां का|

मची सख्त लाहौर में फिर दुहाई हकीकत की जय हिन्दुओं ने बुलाई|

बड़े प्रेम और श्रद्दा से उसको उठाया बड़ी शान से दाह उसका कराया|

तो श्रद्दा से उसकी समाधी बनायी वहां हर वर्ष उसकी बरसी मनाई|

वहां मेला हर साल लगता रहा है  दिया उस समाधि में जलता रहा है|

मगर मुल्क तकसीम जब से हुआ है  वहां पर बुरा हाल तबसे हुआ है|

वहां राज यवनों का फिर आ गया है  अँधेरा नए सर से फिर छा गया है|

अगर हिन्दुओं में है कुछ जान बाकी शहीदों बुजुर्गों की पहचान बाकी|

शहादत हकीकत की मत भूल जाएँ श्रद्दा से फुल उस पर अब भी चढ़ाएं|

कोई यादगार उसकी यहाँ पर बनायें  वहां मेला हर साल फिर से लगायें|

डॉ विवेक आर्य

Thursday, November 21, 2013

No Idolatry in Vedas- Western Indologists





Swami Dayanand was first scholar in modern times to proclaim that idolatry or worship of God in forms of idols is not sanctioned in the Holy Vedas. Although many reformers in past like Adi Shankracharya, Guru Basava, Guru Nanak, Sant Kabir, Dadu, Raja Ram Mohan Roy etc have openly disagreed with the Idol worship but swami Dayanand view of idolatry is based not merely on observations of demerits of idolatry as his predecessors but also on proofs and evidences mentioned in different Vedic texts. In same age of swami Dayanand a class of scholars in west also tried to explore The Vedas and other texts with special interest and different motives. Many of them were influenced by Christian upbringings and political pressure of their Christian state, while some of them were real truth seekers too. Overall their views are acceptable up to that extent until they are with the truth and nothing else. In this article we will read different quotations by European scholars on idolatry and our main motive is to give message to the readers for their spiritual elevation by giving them lesson of worship of one supreme formless God.
Maxmuller- It has sometimes been asserted that the Vedic religion is extinct in India, that the modern Brahmanic religion as founded on the puranas and tantras consists in a belief in Vishnu, Shiva and Brahama and manifests itself in the worship of the most hideous idols – Origin and Growth of religions page 154
Monier Williams says – It is very doubtful whether idolatry existed in the time of Manus compilation of the smriti- Indian wisdom page 226
H.H.Wilson says- There is (in the Vedas), no mention of any temple, nor any reference to public place of worship and it is clear that the worship was entirely domestic – Wilson’s Rigveda- Introduction, volume 1, page xv
H.H.Wilson says–And yet Manu notices no Avatara, no Rama and no Krishna and is consequently admitted to belong anterior to the growth of their worship as set forth in the Ramayana and Mahabharata- Wilson’s Rigveda- introduction, volume 1, page xi, xii
H.H.Wilson says – But the worship of defied heroes is no part of that system, nor are the incarnations of deities suggested in any other portion of the text, which I have yet seen, though such are sometimes hinted at by the commentators.
It is also true that the worship of the Vedas is for the most part, domestic worship, consisting of prayers and oblations offered in their own houses, not in temples by individuals, for individuals good and addressed to unreal presences, not to visible types.
In a word, the religion of the vedas is not idolatry. *(H.H.Wilson- Vishnu purana preface page 111)
J.I.Wheeler says- They appear to have had no temples but either performed their sacrifices in the open air or else in a sacrificial chamber set apart in each dwelling- Wheeler’s History of India introduction page 11
Mr Mill says- Idolatry is an altogether after growth springing from the mind incapable of entertaining the elevated abstract notions of the permitive creed- Mills History of British India, quoted in the Vedic magazine may 1918 page 117
Mr Mill says but they (Brahmanas) never, like the priests of other pagan nations, or those of the Jews, conducted public worship, worship for individuals indiscriminately, worship in temples or make offerings to idols is held as degraded and unfit to be invited to religious feasts- (Manu II 152,180) Mills History of British India vol II page 192 F.N.
M. Elphinstone- There seems to have been no images and no visible types of the objects of worship.-History of India page 40
M. Elphinstone-At the same time, they erected no temple and addressed no worship to the true god-History of India page 93, 94
M. Elphinstone-Mr. Colebrooke avowedly confines himself to the five sacraments which existed in Manu’s time; but there is a new sort of worship never alluded to in the institutes, which now forms one of the principle duties of every Hindu. This is the worship of images before which many prostration and other acts of adoration must daily be performed.-History of India page 40
There are many more quotes from different scholars to prove that the Idol worship is not sanctioned in The Vedas.
We must accept truth and follow the message of the vedas as ultimately : “Truth only will be Victorious”

Wednesday, November 20, 2013

स्वामी दयानंद कि शिक्षाओं कि आज के युग में प्रासंगिकता



"विदेशियों के आर्यावर्त में राज्य होने का कारण आपस कि फुट-मतभेद, ब्रह्मचर्य का सेवन न करना, विद्या न पढ़ना पढ़ाना, बाल्यावस्था में अस्वयंवर विवाह,  विषयासक्ति कुलक्षण,  वेद-विद्या का अप्रचार आदि कुकर्म हैं"- स्वामी दयानंद।
स्वामी जी द्वारा कहे गये इस कथन पर पाठक गौर करेगए तो पायेगे कि पराधीन भारत और स्वाधीन भारत में सामाजिक और राजनैतिक परिस्तिथियों में कुछ विशेष अंतर नहीं हैं, क्यूंकि हम तब भी गुलाम थे और आज भी गुलाम हैं।
   स्वामी जी द्वारा प्रथम कारण भारतियों में एकता कि कमी होना बताया गया हैं। भारतदेश कि जन व्यवस्था का अगर वृहद् रूप से आंकलन किया जाये तो हम पायेगे कि यहाँ पर अनेक स्थलों पर भिन्न भिन्न प्रकार से फुट और भेद प्रचलित हैं। कहीं हिन्दू-मुस्लिम के बीच में धर्म के नाम पर भेद हैं, कहीं स्वर्ण-दलित के नाम पर जातिगत भेद हैं , कहीं हिंदी अथवा प्रांतीय भाषा के आधार पर भेद हैं, कहीं तेलंगाना, गोरखालैंड, हरित प्रदेश आदि के नाम पर प्रान्त भेद हैं, कहीं इतिहास के नाम पर आर्य-अनार्य अथवा उत्तर भारतीय बनाम दक्षिण भारत का भेद हैं, कहीं क्षेत्रवाद के नाम पर नागालैंड आदि प्रांतों में भेद हैं, कहीं नक्सलवाद के नाम पर आदिवासी, शहरी आदि का भेद हैं , कहीं अधिकार के नाम पर दक्षिणपंथी अथवा साम्यवादी आदि का भेद हैं, कहीं आस्तिक और नास्तिक का भेद हैं, कहीं विभिन्न सम्प्रदायों अथवा मत मतान्तरों का आपसी भेद हैं, कहीं बहुसंख्यक अथवा अल्पसंख्यक का आपसी भेद हैं। कहने का अर्थ हैं कि जितने भेद, उतनी दूरियाँ, जितनी दूरियाँ उतने मन मुटाव, जितने मन मुटाव, उतनी आपसी कड़वाहट, जितनी आपसी कड़वाहट उतना विरोध, जितना विरोध उतना परस्पर मेल कि कमी, जितनी मेल कि कमी उतनी एकता कि कमी और अंत में जितनी एकता कि कमी, उतना मुट्ठी भर स्वार्थी, संकीर्ण मानसकिता रखने वाले, अवसरवादी, दूर दृष्टि से रहित, गैर ईमानदार, गैर जिम्मेदार लोगों द्वारा सामाजिक एकता कि कमजोरी का फायदा उठाते हुए देश कि जनता पर राज करने का और अपनी मनमानी करने का अवसर प्राप्त होना हैं। यह किसकी कमी हैं पाठक निष्पक्ष भाव से अगर चिंतन करेगे तो उत्तर मिलेगा कि स्वयं का ही दोष हैं। इन सभी भेदों को विभिन्न विभिन्न स्तरों पर प्रोत्साहन दिया जाता हैं जिससे भेद बने रहे और फुट डालो और राज करो कि नीति फलती फूलती रहे।
   स्वामी जी द्वारा दूसरा कारण ब्रह्मचर्य का सेवन न करना, बाल्यावस्था में अस्वयंवर विवाह और विषयासक्ति कुलक्षण आदि बताया गया हैं। इतिहास कि एक घटना मुझे स्मरण होती हैं। चीन देश पर राज करने के लिये अंग्रेजों ने वहाँ के नागरिकों को अफीम कि लत लगा दी थी, जिससे उस देश के वासी अफीमची बन जाये और उनमें प्रतिरोध करने कि क्षमता न रहे। अंत में चीन के सम्राट ने अंग्रेजों कि इस कुटिल नीति का विरोध किया जिसके स्वरुप अंग्रेजों और चीनी सम्राट के बीच में युद्ध हुआ था। इस युद्ध को opium war अर्थात अफीम युद्ध भी कहते हैं। आज भी उसी नीति का अनुसरण किया जा रहा हैं। पहले मीडिया के विभिन्न प्रकल्पों समाचार पत्र, सिनेमा, पत्रिकाए, टेलीविज़न आदि के माध्यम से अश्लीलता का नशा आधुनिकता के नाम पर परोसा जाता हैं। इसके अनेक दुष्प्रभाव होते हैं। इस अंधी दौड़ का कोई अंत नहीं हैं। इस सनक के पीछे पड़ने वाला स्वयं को बर्बाद कर लेता हैं और बर्बाद व्यक्ति भला क्या राष्ट्रहित की बात करेगा? जो खुद से चलने में आत्म निर्भर नहीं हैं वह क्या दूसरे को सहारा देगा? अश्लीलता के दुष्प्रभाव के कारण 2  माह कि बच्ची से लेकर 85 वर्ष कि वृद्धा तक को दरिंदगी का शिकार बनाया जाता हैं। फिर उस दरिंदगी को न्यूज़ बनाकर ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में चटकारे लेकर दिखाया जाता हैं।  बात जहाँ आरम्भ होती हैं वही रह जाती हैं। युवक युवतियाँ जिन्हें देश कि शक्ति के रूप में विकसित होना था, अंतत भोगवाद कि अंधी गलियों में फँस कर समाप्त अथवा प्रभावहीन हो जाते हैं।  इन्हीं के सरों पर पाँव रखकर कुछ अवाँछित लोग आगे बढ़कर देश का नेतृत्व ग्रहण कर लेते हैं। इस भोगवाद के कितने दुष्परिणाम हैं सोचिये। शिक्षा काल में अपने लक्ष्य से भटक कर, अपनी क्षमता को पूरा मौका देने से पहले, दोनों के गुण, कर्म और स्वाभाव के प्रतिकूल, अनैतिक सम्बन्ध बनाते हैं और इस सम्बन्ध में माता पिता कि इच्छा के विरुद्ध घर से भागने से लेकर, विवाहपूर्व माँ बनने से लेकर, आर्थिक स्तर पर कमी होने के कारण पति पत्नी के दांपत्य में सामंजस्य कि कमी से लेकर, तलाक तक कि आपदा आना सामान्य सी बात बन गई हैं। ऐसे परिवार जो खुद का भला नहीं कर पा रहे हैं वह भला देश और समाज का क्या भला करेगे?
कहने का अर्थ यह हुआ कि आधुनिकता के नाम पर भोगवाद का नशा युवक युवतियों को पिलाया जा रहा हैं जिससे वे आपकी मनमानी के आगे कभी प्रतिरोध न बन सके और राज करने वाले आसानी से अपना कार्य करते रहे।
 
स्वामी दयानंद ने तीसरा कारण विद्या न पढ़ना पढ़ाना एवं वेद-विद्या का अप्रचार बताया हैं।
विद्या से सबसे बड़ा परिवर्तन मनुष्य कि सोचने समझने कि शक्ति का विकास होना हैं। मनुष्य उसी को कहते हैं जो चिंतनशील हैं, मनन करने वाला हैं। मनन करने वाला व्यक्ति समाज के हित कि सोचता हैं। समाज में जो कुछ भी अन्याय, अत्याचार हो रहा हैं उसका समाधान करना उसकी स्वाभाविक प्रवृति हो जाती हैं। वेद विद्या के ज्ञाता के चिंतन में राष्ट्रवाद और जनकल्याण कि भावना सर्वोपरि होती हैं। सर्वहित के स्थान पर परहित उनका मुख्या ध्येय बन जाता हैं। अंग्रेज जाति बड़ी चालाक थी। उन्हें ज्ञात था कि अगर सोई हुई आर्य जाति को अपने धर्म ग्रंथों में वर्णित राष्ट्रवाद और अध्यात्मवाद के विषय में ज्ञात हो गया तो वे दो दिन भी इस देश पर राज्य नहीं कर सकेगे। इसलिए उन्होंने सुनियोजित षड्यंत्र रचा। उन्होंने वेदों को जादू टोने कि पुस्तक, यज्ञ में पशुबली का समर्थन करने वाली, आर्य और दस्यु के मध्य युद्ध का वर्णन करने वाली, अश्लीलता को प्रोत्साहन देने वाली, बहुदेवतावाद और कर्म कांड कि पुस्तक घोषित करने का कुटिल प्रयास किया जिससे भारतीयों को वेदों से आस्था समाप्त हो जाये और वे लक्ष्य विहीन नौका के समान भटकते रहे। भला हो स्वामी दयानंद का जिन्होंने अंग्रेजों के इस षड्यंत्र का पर्दाफाश कर दिया। स्वतंत्र भारत में स्वामी दयानंद द्वारा बताये गई शिक्षा प्रणाली का अनुसरण नहीं किया गया। जिस अन्धकार से भारतवासियों को निकालने का स्वामी जी ने आवाहन किया था उसी अविद्या के अन्धकार में जनता को दोबारा से धकेल दिया गया। स्वामी दयानंद कि शिक्षाओं से जन जागरण तो हुआ जिससे भारत देश स्वतंत्र तो हो गया मगर इस जन चेतना को स्वतंत्रता के पश्चात प्रोत्साहन देने के स्थान पर उसे पीछे कि और धकेला जाने लगा। वेदों को भारत देश के पाठ्य क्रम में वह स्थान में नहीं दिया गया। उसके स्थान पर पाश्चात्य शिक्षा विधि को अपनाया गया जो मैकाले के कुटिल मस्तिष्क कि उपज थी और जिसका उद्देश्य पढ़े लिखे क्लर्क रुपी गुलाम बनाना था।
     आज का समय में भी अंग्रेजों कि व्यवस्था सुचारु रूप से जारी हैं। जिससे पैदा हुआ पढ़ा लिखा समाज बौद्धिक गुलाम होने के कारण किसी भी प्रकार का विरोध करने कि योग्यता नहीं रखता।
संक्षेप में भारत देश कि समर्थ जनता कि सोच को मानसिक गुलाम बना लिया गया, जो गुलाम नहीं बन सके उन्हें आपसी फूट और भेदभाव के खेल में उलझा दिया गया, नवीन पीढ़ी इस व्यवस्था को देखकर विरोधी न हो जाये इसलिये उन्हें भोगवाद कि अंधी दौड़ में उलझा दिया गया। बाकि जो बचे वे असमर्थ हैं और खाने कमाने के ही फेर में उलझे उलझे उनका जीवन निकल जाता हैं।
१३५ वर्ष पूर्व कहे गये स्वामी दयानंद का कथन आज भी कितना प्रासंगिक और व्यवहारिक हैं, यह न केवल स्वामी जी कि दूर दृष्टि का उद्बोधक हैं अपितु ऋषि चिंतन का साक्षात प्रमाण हैं।
हमने एक बार स्वामी जी के सन्देश का पालन किया हम स्वराज्य प्राप्त कर गये, हम एक बार और स्वामी जी के सन्देश का पालन कर ले हम सुराज भी प्राप्त कर लेगे।
  
डॉ विवेक आर्य

“आर्य” हिन्दू राजाओं का चारित्रिक आदर्श

26_ Maharana Pratap

(इस चित्र में महाराणा प्रताप अपने पुत्र अमर सिंह को अब्दुर रहीम खानखाना परिवार कि स्त्रियों को ससमान वापिस लौटने का आदेश दे रहे  हैं)



वेदों में चरित्र को सबसे उत्तम आदर्श के रूप में स्थापित किया गया हैं। मानव को न केवल अपने कर्म से अपितु अपने विचारों से भी पाप-वासना से दूर रहने कि प्रेरणा दी गई हैं। वेद चरित्र कि महता का वर्णन इस प्रकार से करते हैं-

हे मानव इस प्रकार जीने के लिए मैं तुझे बल देता हूं। इस जीवनरूपी रथ पर चढ़कर उन्नति को प्राप्त कर और संसार में अपने चरित्र के बल पर प्रशंसित होकर दूसरों को भी प्रेरणा दे।

मानव तुम अपने आत्मबल के साथ इस शरीर, मन और इंद्रियों के शासक हो। अपने सर्वश्रेष्ठ मित्रों के साथ तुम पाप वासना का त्याग करने के लिए तैयार हो जाओ। इस पाप के विरूद्घ संग्राम को जीतकर अपने जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करो।

वेदों के इस महान सन्देश को प्राचीन काल से अनेक आर्य राजा अपने जीवन का अंग बनाया। मध्य काल में जब देश पर इस्लामिक राज्य स्थापित हो गया था तब पतन का दौर आरम्भ हो गया और नारी जाति को जोर-जबर्दस्ती से मुस्लिम शासकों द्वारा अपने हरम कि शोभा बनाया जाने लगा। कुछ उदहारण हमारे इस कथन कि पुष्टि करते हैं।

सभी मुग़ल शासकों में अकबर को सबसे न्यायप्रिय बताया जाता हैं, अगर सभी मुस्लिम शासकों का उदहारण देंगे तो एक पूरी पुस्तक बन जायेगी इसलिए केवल अकबर का ही वर्णन करते हैं।

१. चौलागढ़, जिला नरसिंघपुर कि छोटी सी रियासत पर अकबर के सरदार आसफ खान ने हमला किया। वहाँ के राजा बीर नारायण ने वीरता से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हो गये। महल कि सभी स्त्रियों ने सामूहिक जौहर में भाग लिया और जब चार दिन पश्चात जौहर कक्ष को खोला गया तो उसमें से दो स्त्रियाँ जीवित निकली, सयोग से उनके ऊपर लकड़ी का एक तख़्त गिर गया था जिससे उनकी प्राण रक्षा हो गई। उनमें से एक रानी दुर्गावती कि बहन कमलावती थी और दूसरी राजा कि नववधु थी। दोनों को अकबर के हरम में भिजवा दिया गया।

(Ref -Page 72 Akbar the Great Mogul - Vincent Smith )

 

२. अकबर के हरम में ५,००० औरतें थी। (Ref -Page 359  Akbar the Great Mogul - Vincent Smith )

पाठक स्वयं सोच सकते हैं कि अकबर द्वारा ये ५००० औरतें किस प्रकार से जोर जबर्दस्ती द्वारा हिन्दू एवं गैर हिन्दू घरों से एकत्र कि गई थी। जहाँगीर ने अपने शासन काल में इनकी संख्या बड़ा कर ६००० कर दी थी।

 

जहां एक और मुस्लिम शासको ने हिन्दू लड़कियों से अपने हरम भरने कि हौड़ लगा रखी थी वही दूसरी और हिन्दू राजाओं जैसे महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, वीर दुर्गा दास राठोड़ ने अपने चरित्र के आदर्श से संसार के समक्ष एक ऐसा अनुसरणीय उदहारण स्थापित किया था जिसकी आज पूरे विश्व को नारी जाति के सम्मान के लिए आवश्यकता हैं। यह गौरव और मर्यादा उस कोटि के हैं ,जो की संसार के केवल सभ्य और विकसित जातियों में ही मिलते हैं। महाराणा प्रताप के मुगलों के संघर्ष के समय स्वयं राणा के पुत्र अमर सिंह ने विरोधी अब्दुर रहीम खानखाना के परिवार की औरतों को बंदी बना कर राणा के समक्ष पेश किया तो राणा ने क्रोध में आकर अपने बेटे को हुकुम दिया की तुरंत उन माताओं और बहनों को पूरे सम्मान के साथ अब्दुर रहीम खानखाना के शिविर में छोड़ कर आये एवं भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न करने की प्रतिज्ञा करे। खानखाना महाराणा प्रताप के चरित्र गुण से अत्यंत प्रभावित हुआ एवं उसने महाराणा कि प्रशंसा में ये शब्द कहे

 

धर्म रहसि रहसि धारा खास जारो खुरसन

अमर विशम्बर उपराओं राखो न जो रण

 

(Ref. Maharana Pratap - Dr Bhawan Singh Rana  Page 85 ,86 )

 

ध्यान रहे महाराणा ने यह आदर्श उस काल में स्थापित किया था जब मुग़ल अबोध राजपूत राजकुमारियों के डोले के डोले से अपने हरम भरते जाते थे। बड़े बड़े राजपूत घरानों की बेटियाँ मुगलिया हरम के सात पर्दों के भीतर जीवन भर के लिए कैद कर दी जाती थी। महाराणा चाहते तो उनके साथ भी ऐसा ही कर सकते थे पर नहीं उनका आर्य स्वाभिमान ऐसी उनहें कभी नहीं करने देता था।

 

 

 

औरंगजेब के राज में हिन्दुओं पर अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था। धर्मान्ध औरंगजेब के अत्याचार से स्वयं उसके बाप और भाई तक न बच सके , साधारण हिन्दू जनता की स्वयं पाठक कल्पना कर सकते हैं। औरंगजेब की स्वयं अपने बेटे अकबर से किसी बात को लेकर अनबन हो गयी थी। इसी कारण उसका बेटा आगरे के किले को छोड़कर औरंगजेब के प्रखर विरोधी राजपूतों से जा मिला था जिनका नेतृत्व वीर दुर्गादास राठोड़ कर रहे थे।

 

कहाँ राजसी ठाठ बाठ में किलो की शीतल छाया में पला बढ़ा अकबर , कहाँ राजस्थान की भस्म करने वाली तपती हुई धुल भरी गर्मियाँ। शीघ्र सफलता न मिलते देख संघर्ष न करने के आदि अकबर एक बार राजपूतों का शिविर छोड़ कर भाग निकला। पीछे से अपने बच्चों अर्थात औरंगजेब के पोता-पोतियों को राजपूतों के शिविर में ही छोड़ गया। जब औरंगजेब को इस बात का पता चला तो उसे अपने पोते पोतियों की चिन्ता हुई क्यूंकि वह जैसा व्यवहार औरों के बच्चों के साथ करता था कहीं वैसा ही व्यवहार उसके बच्चों के साथ न हो जाये। परन्तु वीर दुर्गा दास राठोड़ एवं औरंगजेब में भारी अंतर था। दुर्गादास की रगो में आर्य जाति का लहू बहता था। दुर्गादास ने प्राचीन आर्य मर्यादा का पालन करते हुए ससम्मान औरंगजेब के पोता पोती को वापिस औरंगजेब के पास भेज दिया जिन्हें पाकर औरंगजेब अत्यंत प्रसन्न हुआ। वीर दुर्गादास राठोड़ ने इतिहास में अपना नाम अपने आर्य व्यवहार से स्वर्णिम शब्दों में लिखवा लिया।

 

(Ref. The House of Marwar Published in 1994 ,Dhananjay Singh page 94 )

 

वीर शिवाजी महाराज का सम्पूर्ण जीवन आर्य जाति की सेवा,रक्षा, मंदिरों के उद्धार, गौ माता के कल्याण एवं एक हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के रूप में गुजरा जिन्हें पढ़कर प्राचीन आर्य राजाओं के महान आदर्शों का पुन: स्मरण हो जाता हैं। जीवन भर उनका संघर्ष कभी बीजापुर से, कभी मुगलों से चलता रहा। किसी भी युद्ध को जितने के बाद शिवाजी के सरदार उन्हें नजराने के रूप में उपहार पेश करते थे। एक बार उनके एक सरदार ने कल्याण के मुस्लिम सूबेदार की अति सुन्दर बीवी शिवाजी के सम्मुख पेश की। उसको देखते ही शिवाजी महाराज अत्यंत क्रोधित हो गए और उस सरदार को तत्काल यह हुक्म दिया की उस महिला को ससम्मान वापिस अपने घर छोड़ आये। अत्यंत विनम्र भाव से शिवाजी उस महिला से बोले माता आप कितनी सुन्दर हैं , मैं भी आपका पुत्र होता तो इतना ही सुन्दर होता। अपने सैनिक द्वारा की गई गलती के लिए मैं आपसे माफी मांगता हूँ। यह कहकर शिवाजी ने तत्काल आदेश दिया की जो भी सैनिक या सरदार जो किसी भी ऊँचे पद पर होगा अगर शत्रु की स्त्री को हाथ लगायेगा तो उसका अंग छेदन कर दिया जायेगा।

(Ref Page No. 4 Shivaji the Great Published in 1940 -Bal Krishna )

 

कहाँ औरंगजेब की सेना के सिपाही जिनके हाथ अगर कोई हिन्दू लड़की लग जाती या तो उसे या तो अपने हरम में गुलाम बना कर रख लेते थे अथवा उसे खुलेआम गुलाम बाज़ार में बेच देते थे और कहाँ वीर शिवाजी का यह पवित्र आर्य आदर्श।

 

इतिहास में शिवाजी की यह नैतिकता स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गई हैं।

 इन ऐतिहासिक प्रसंगों को पढ़ कर पाठक स्वयं यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं की महानता और आर्य मर्यादा व्यक्ति के विचार और व्यवहार से होती हैं। धर्म की असली परिभाषा उच्च कोटि का पवित्र और श्रेष्ठ आचरण हैं। धर्म के नाम पर अत्याचार करना तो केवल अज्ञानता और मुर्खता हैं।
डॉ विवेक आर्य









 

Monday, November 18, 2013

फलित ज्योतिष पाखंड से जयादा कुछ नहीं हैं




दुसरो का भविष्य बताने वाले आशु भाई ज्योतिष आचार्य , वरुण एन्क्लेव रोहिणी के यहाँ से ५० लाख रूपए की चोरी हो गयी हैं। गौर तलब हैं कि आशु भाई ज्योतिष आचार्य लोगों को किसी भी प्रकार की विपत्ति अथवा कठिनाई न आये अथवा कोई कठिनाई आ जाये तो उससे निपटने का समाधान बताते हैं। आशु भाई महाराज एवं उनके जैसे अन्य ज्योतिषियों से हमारे कुछ प्रश्न हैं-

१. सभी ज्योतिषी दुसरो का भविष्य भली प्रकार से बताने का दावा करते हैं जबकि वे खुद का भविष्य नहीं बता पाते, आखिर क्यूँ?...

२. आशु भाई अपनी ही जन्मपत्री, हस्त रेखा, माथा आदि देखकर यह क्यूँ नहीं बता सके की उनके यहाँ पर चोरी होने वाली हैं?

३. चोरो को पकड़ने के लिए उन्हें थाने में जाने की क्यूँ जरुरत पड़ी वे अपनी दिव्य शक्तियों से चोर कहाँ छिपे हैं उनका पता क्यूँ नहीं लगा सके?

४. दो व्यक्तियों पर चोरी का अंदेशा लगाया जा रहा हैं वे दोनों तीन वर्ष से आशु भाई के पास कर्मचारी के रूप में रह रहे थे। जब उनको आशु भाई ने नौकरी पर रखा तो उनकी जन्म पत्री देख कर आशु भाई यह क्यूँ नहीं जान पाए की यह भविष्य में चोरी करेगे?

५. आशु भाई एक विपदा निवारक यन्त्र यह कह कर बेचते हैं कि इससे आपके घर विपदा नहीं आयेगी। ये जो ५० लाख रुपये उनके ऑफिस हुए हैं ये उसी यन्त्र को बेच कर कमाये थे। उनका तो पूरा ऑफिस इन्हीं यंत्रों से भरा पड़ा हैं फिर भी उनके यहाँ पर चोरी कैसे हो गई?

सत्य यह हैं कि आशु भाई या इनके जैसे अन्य ज्योतिषी केवल मात्र साधारण जनता को मूर्ख बनाने का कार्य करते हैं।

इनसे सावधान रहे और अन्य को भी इस प्रकार की ढोंगियों से सावधान करे।

(पाखंड खंडन के लिए जनहित में जारी)

TIMES OF INDIA newspaper link

http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2011-03-07/delhi/28665156_1_rs-50l-office-door





Sunday, November 17, 2013

स्वराज्य केसरी -आर्य नेता लाला लाजपत राय


स्वराज्य केसरी -आर्य नेता लाला लाजपत राय


आर्यसमाज मेरे लिए माता के सामान हैं और वैदिक धर्म मुझे पिता तुल्य प्यारा हैं- लाला लाजपत राय

आज़ादी के महानायकों में लाला लाजपत राय का नाम ही देशवासियों में स्फूर्ति तथा प्रेरणा का संचार कराता है। अपने देश धर्म तथा संस्कृति के लिए उनमें जो प्रबल प्रेम तथा आदर था उसी के कारण वे स्वयं को राष्ट्र के लिए समर्पित कर अपना जीवन दे सके। भारत को स्वाधीनता दिलाने में उनका त्याग, बलिदान तथा देशभक्ति अद्वितीय और अनुपम थी। उनके बहुविधि क्रियाकलाप में साहित्य-लेखन एक महत्वपूर्ण आयाम है। एक साधारण से परिवार में लाला जी का जन्म 28-जनवरी-1865 को पंजाब राज्य के मोंगा जिले के दुधिके गाँव में हुआ था ! उनके पिता श्री लाला राधा किशन आजाद जी सरकारी स्कूल में उर्दू के शिक्षक थे जबकि उनकी माता देवी गुलाब देवी धार्मिक महिला थी ! लाला राधा किशन जी के विषय में लाला जी स्वयं लिखते हैं की मेरे पिता पर इस्लाम का ऐसा रंग चढ़ा था की उन्होंने रोजे रखना शुरू कर दिया था.सौभाग्य से मुझे आर्यसमाज का साथ मिला जिसके कारण मेरा परिवार मुस्लमान बनने से बच गया. लाला जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे व धन , आदि की अनेक कठिनाइयों के पश्चात् भी उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की ! 1880 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी व पंजाब यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षाएं पास करने के बाद उन्होंने लाहोर गवर्नमेंट कॉलेज में दाखिला ले लिया व कानून की पढाई प्रारंभ की ! लेकिन घर की माली हालत ठीक न होने के कारन दो वर्ष तक उनकी पढाई बाधित रही ! लाहोर में बिताया गया समय लाला जी के जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ और यहीं उनके भावी जीवन की रूप-रेखा निर्मित हो गयी ! उन्होंने भारत के गौरवमय इतिहास का अध्ययन किया और महान भारतीयों के विषय में पढ़कर उनका हृदय द्रवित हो उठा ! यहीं से उनके मन में राष्ट्र प्रेम व राष्ट्र सेवा की भावना का बीजारोपण हो गया !कानून की पढाई के दौरान वह लाला हंसराज जी व पंडित गुरुदत्त जी जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आये ! यह तीनों अच्छे मित्र बन गए और 1882 में आर्य समाज के सदस्य बन गए ! उस समय आर्य समाज समाज-सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था और यह पंजाब के युवाओं में अत्यधिक लोकप्रिय था !

30 अक्टूबर, 1883 को जब अजमेर में ऋषि दयानन्द का देहान्त हो गया तो 9 नवम्बर, 1883 को लाहौर आर्यसमाज की ओर एक शोकसभा का आयोजन किया गया। इस सभा के अन्त में यह निश्चित हुआ कि स्वामी जी की स्मृति में एक ऐसे महाविद्यालय की स्थापना की जाये जिसमें वैदिक साहित्य, संस्कृति तथा हिन्दी की उच्च शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेजी और पाश्चात्य ज्ञान -विज्ञान में भी छात्रों को दक्षता प्राप्त कराई जाये। 1886 में जब इस शिक्षण की स्थापना हुई तो आर्यसमाज के अन्य नेताओं के साथ लाला लाजपतराय का भी इसके संचालन में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा तथा वे कालान्तर में डी0ए0वी0 कालेज, लाहौर के महान स्तम्भ बने।

1885 में उन्होंने लाहोर के गवर्नमेंट कॉलेज से द्वितीय श्रेणी में वकालत की परीक्षा पास की और हिसार में अपनी कानूनी प्रैक्टिस प्रारंभ कर दी ! प्रेक्टिस के साथ-साथ वह आर्य समाज के सक्रीय कार्यकर्ता भी बने रहे ! स्वामी दयानंद जी की म्रत्यु के पश्चात् उन्होंने अंग्लो-वैदिक कॉलेज हेतु धन एकत्रित करने में सहयोग किया ! आर्य समाज के तीन कक्ष्य थे : समाज सुधार, हिन्दू धर्म की उन्नति और शिक्षा का प्रसार ! वह अधिकांश समय आर्य समाज के सामाजिक कार्यों में ही लगे रहते ! वह सभी सम्प्रदायों की भलाई के प्रयास करते थे और इसी का नतीजा था की वह हिसार म्युनिसिपल्टी हेतु निर्विरोध चुने गए जहाँ की अधिकांश जनसँख्या मुस्लिम थी !1888 में वे प्रथम बार कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन में सम्मिलित हुए जिनकी अध्यक्षता मि0 जार्ज यूल ने की थी। उनका जोरदार स्वागत हुआ और उनके उर्दू भाषण ने सभी का मन मोह लिया ! अपनी योग्यता के बल पर वह जल्द ही कांग्रेस के लोकप्रिय नेता बन गए ! लगभग इसी समय जब सर सैयद अहमद खान ने कांग्रेस से अलग होकर मुस्लिम समुदाय से यह कहना शुरू किया की उसे कांग्रेस में जाने की बजाय अंग्रेज सरकार का समर्थन करना चाहिए तब लाला जी ने इसके विरोध में उन्हें “कोहिनूर” नामक उर्दू साप्ताहिक में खुले पत्र लिखे . इन पत्रों में लाला जी ने सर सैयद अहमद खान को उन्ही के पुराने लेखों की याद दिलवाई जिसमे उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता की हिमायत करी थी और आज वहीँ सर सैयद अहमद खान हिन्दू और मुसलमान के बीच में दरार उत्पन्न कर रहे हैं. लाला जी को इन लेखों से काफी प्रशंसा मिली! उनके पिता जी ने प्रसन्न होकर उन लेखों को दोबारा छपवा कर वितरित तक किया.
युवाओं को राष्ट्र भक्ति का सन्देश देने के लिए उन्होंने अपनी लेखनी द्वारा शिवाजी, स्वामी दयानंद, मेजिनी, गैरीबाल्डी जैसे प्रसिद्ध लोगों की आत्मकथाएं अनुवादित व प्रकाशित कीं ! इन्हें पढ़कर अन्य लोगों ने भी स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु संघर्ष की प्रेरणा प्राप्त की !लाला जी जन सेवा के कार्यों में तो सदैव ही आगे रहते थे इसीलिए 1896 में जब सेन्ट्रल प्रोविंस में भयानक सूखा पड़ा तब लाला जी ने वहां अविस्मर्णीय सेवाकार्य किया ! जब वहां सैकड़ों निर्धन, अनाथ, असहाय मात्र इसाई मिशनरियों की दया पर निर्भर थे और वह उन्हें सहायता के बदले अपने धर्म में परिवर्तित कर रहीं थीं तब लाला जी ने अनाथों के लिए एक आन्दोलन चलाया व जबलपुर, बिलासपुर,आदि अनेक जिलों के अनाथ बालकों को बचाया और उन्हें पंजाब में आर्य समाज के अनाथालय में ले आये ! उन्होंने कभी भी धन को सेवा से ज्यादा महत्व नहीं दिया और जब उन्हें प्रतीत हुआ की वकालत के साथ-साथ समाज सेवा के लिए अधिक समय नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने अपनी वकालत की प्रेक्टिस कम कर दी !
इसी प्रकार 1899 में जब पंजाब, राजस्थान, सेन्ट्रल प्रोविंस, आदि में और भी भयावह अकाल पड़ा और 1905 में कांगड़ा जिले में भूकंप के कारन जन-धन की भारी हानि हुई तब भी लालाजी ने आर्य समाज के कार्यकर्त्ता के रूप में असहायों की तन,मन,धन से सेवा-सहायता की !
अकाल,प्लेग, बाढ़ आदि अकाल परिस्तिथियों में सेवा करते समय लाला जी ने पाया की ईसाई समाज निर्धन हिन्दुओं की आपातकाल में सेवा इस उद्देश्य से नहीं करता की यह मानवता की सेवा कर रहा हैं बल्कि इसलिए करता हैं ताकि अनाथ हुए बच्चों अथवा निराश्रित हुए परिवारों को सहायता के नाम पर ईसाई बनाया जा सके. लाला जी ने इस अनैतिक कार्य को रोकने का प्रयास किया तो ईसाई मिशनरी ने उन पर कोर्ट में केस तक कर दिया था. लाला जी सत्य कार्य कर रहे थे इसलिए विजयश्री उन्हीं को मिली.
उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया ! भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में उन्होंने रचनात्मकता, राष्ट्र निर्माण व आत्मनिर्भरता पर जोर दिया ! कांग्रेस में वह बाल गंगाधर तिलक जी व बिपिनचंद्र पाल जी के साथ उग्रवादी विचारधारा से सहमत थे और यह तीनों ” लाल-बाल-पाल ” नाम से प्रसिद्ध थे ! जहाँ उदारवादी कांग्रेसी अंग्रेज सरकार की कृपा चाहते थे वहीँ उग्रवादी कांग्रेसी अपना हक़ चाहते थे ! लाला जी मानते थे की स्वतंत्रता भीख और प्रार्थना से नहीं बल्कि संघर्ष और बलिदान से ही मिलेगी ! 1885 में अपनी स्थापना से लेकर लगभग बीस वर्षो तक कांग्रेस ने एक राजभवन संस्था का चरित्र बनाये रखा था। इसके नेतागण वर्ष में एक बार बड़े दिन की छुट्टियों में देश के किसी नगर में एकत्रित होने और विनम्रता पूर्वक शासनों के सूत्रधारों (अंग्रेजी) से सरकारी उच्च सेवाओं में भारतीयों को अधिकाधिक संख्या में प्रविष्ट युगराज के भारत-आगमन पर उनका स्वागत करने का प्रस्ताव आया तो लालाजी ने उनका डटकर विरोध किया। कांग्रेस के मंच ये यह अपनी किस्म का पहला तेजस्वी भाषण हुआ जिसमें देश की अस्मिता प्रकट हुई थी। 1907 में जब पंजाब के किसानों में अपने अधिकारों को लेकर चेतना उत्पन्न हुई तो सरकार का क्रोध लालाजी तथा सरदार अजीतसिंह (शहीद भगतसिंह के चाचा) पर उमड़ पड़ा और इन दोनों देशभक्त नेताओं को देश से निर्वासित कर उन्हें पड़ोसी देश बर्मा के मांडले नगर में नजरबंद कर दिया, किन्तु देशवासियों द्वारा सरकार के इस दमनपूर्ण कार्य का प्रबल विरोध किये जाने पर सरकार को अपना यह आदेश वापस लेना पड़ा। लालाजी पुन: स्वदेश आये और देशवासियों ने उनका भावभीना स्वागत किया। लालाजी के राजनैतिक जीवन की कहानी अत्यन्त रोमांचक तो है ही, भारतीयों को स्वदेश-हित के लिए बलिदान तथा महान् त्याग करने की प्रेरणा भी देती है।
1907-08 में उड़ीसा मध्यप्रदेश तथा संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) से भी भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा और लालाजी को पीडितों की सहायता के लिए आगे आना पड़ा। पुन: राजनैतिक आन्दोलन में 1907 के सूरत के प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन में लाला लाजपतराय ने अपने सहयोगियों के द्वारा राजनीति में गरम दल की विचारधारा का सूत्रपात कर दिया था और जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गये थे कि केवल प्रस्ताव पास करने और गिड़गिड़ाने से स्वतंत्रता मिलने वाली नहीं है। हम यह देख चुके हैं कि जनभावना को देखते हुए अंग्रेजों को उनके देश-निर्वासन को रद्द करना पड़ा था। वे स्वदेश आये और पुन: स्वाधीनता के संघर्ष में जुट गये।लाला जी मानते थे की राष्ट्रिय हित के लिए विदेशों में भी भारत के समर्थन में प्रचार करने हेतु एक संगठन की जरूरत है ताकि पूरी दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखा जा सके और अंग्रेज सरकार का अन्याय उजागर किया जा सके ! प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) के दौरान वे एक प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य के रूप में पुन: इंग्लैंड गये और देश की आजादी के लिए प्रबल जनमत जागृत किया। वहाँ से वे जापान होते हुए अमेरिका चले गये और स्वाधीनता-प्रेमी अमेरिकावासियों के समक्ष भारत की स्वाधीनता का पथ प्रबलता से प्रस्तुत किया।यहाँ से वह अमेरिका गए जहाँ उन्होंने ” इन्डियन होम लीग सोसायटी ऑफ़ अमेरिका ” की स्थापना की और ” यंग इण्डिया ” नामक पुस्तक लिखी ! इसमें अंग्रेज सरकार का कच्चा चिटठा खोला गया था इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रकाशित होने से पूर्व ही इंग्लॅण्ड और भारत में प्रतिबंधित कर दिया ! 20 फरवरी, 1920 को जब वे स्वदेश लौटे तो अमृतसर में जलियावाला बाग काण्ड हो चुका था और सारा राष्ट्र असन्तोष तथा क्षोभ की ज्वाला में जल रहा था। इसी बीच महात्मा गांधी ने सहयोग आन्दोलन आरम्भ किया तो लालाजी पूर्ण तत्परता के साथ इस संघर्ष में जुट गये। 1920 में ही वे कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष बने। उन दिनों सरकारी शिक्षण संस्थानों के बहिस्कार विदेशी वस्त्रों के त्याग, अदालतों का बहिष्कार, शराब के विरुद्ध आन्दोलन, चरखा और खादी का प्रचार जैसे कार्यक्रमों को कांग्रेस ने अपने हाथ में ले रखा था, जिसके कारण जनता में एक नई चेतना का प्रादुर्भाव हो चला था। इसी समय लालाजी को कारावास का दण्ड मिला, किन्तु खराब स्वास्थ्य के कारण वे जल्दी ही रिहा कर दिये गये। 1924 में लालाजी कांग्रेस के अन्तर्गत ही बनी स्वराज्य पार्टी में शामिल हो गये और केन्द्रीय धारा सभा (सेंटल असेम्बली) के सदस्य चुन लिए गये। जब उनका पं0 मोतीलाल नेहरू से कतिपय राजनैतिक प्रश्नों पर मतभेद हो गया तो उन्होंने नेशनलिस्ट पार्टी का गठन किया और पुन: असेम्बली में पहुँच गये। अन्य विचारशील नेताओं की भाँति लालाजी भी कांग्रेस में दिन-प्रतिदिन बढऩे वाली मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से अप्रसन्नता अनुभव करते थे, इसलिए स्वामी श्रद्धानन्द तथा पं0 मदनमोहन मालवीय के सहयोग से उन्होंने हिन्दू महासभा के कार्य को आगे बढ़ाया। 1925 में उन्हें हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष भी बनाया गया। ध्यातव्य है कि उन दिनों हिन्दू महासभा का कोई स्पष्ट राजनैतिक कार्यक्रम नहीं था और वह मुख्य रूप से हिन्दू संगठन, अछूतोद्धार, शुद्धि जैसे सामाजिक कार्यक्रमों में ही दिलचस्पी लेती थी। इसी कारण कांग्रेस से उसे थोड़ा भी विरोध नहीं था। यद्यपि संकीर्ण दृष्टि से अनेक राजनैतिक कर्मी लालाजी के हिन्दू महासभा में रुचि लेने से नाराज भी हुए किन्तु उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की और वे अपने कर्तव्यपालन में ही लगे रहे।
सन् 1925 में कलकत्ता (अब कोलकाता) तथा देश के अन्य भागों में मजहबी जुनूनियों ने साम्प्रदायिक दंगे भड़काकर बहुत से निर्दोष हिन्दुओं की हत्या कर दी थी। कलकत्ता में तो मुस्लिम लीगियों ने सभी सीमाएं पार कर असंख्य हिन्दुओं के मकानों-दुकानों को जला डाला था। तब 1925 में ही कलकत्ता में हिन्दू महासभा का अधिवेशन आयोजित किया गया। लाला लाजपतराय ने इसकी अध्यक्षता की थी तथा महामना पं.मदन मोहन मालवीय ने उद्घाटन। इसके कुछ दिनों पहले ही आर्य समाज के एक जुलूस के मस्जिद के सामने से गुजरने पर मुस्लिमों ने “अल्लाह हो अकबर” के नारे के साथ अचानक हमला बोल दिया था तथा अनेक हिन्दुओं की हत्या कर दी थी। आर्य समाज तथा हिन्दू महासभा ने हिन्दुओं का मनोबल बनाए रखने के उद्देश्य से इस अधिवेशन का आयोजन किया था। अधिवेशन में डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी, श्रीमती सरलादेवी चौधुरानी तथा आर्य समाजी नेता गोविन्द गुप्त भी उपस्थित थे। सेठ जुगल किशोर बिरला ने विशेष रूप से इसे सफल बनाने में योगदान किया था। लाला जी तथा मालवीय जी ने इस अधिवेशन में हिन्दू संगठन पर बल देते हुए चेतावनी दी थी कि यदि हिन्दू समाज जाग्रत व संगठित नहीं हुआ तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता की मृग मरीचिका में भटककर सोता रहा तो उसके अस्तित्व के लिए भीषण खतरा पैदा हो सकता है। लालाजी ने भविष्यवाणी की थी कि मुस्लिमबहुल क्षेत्रों में हिन्दू महिलाओं का सम्मान सुरक्षित नहीं रहेगा।
स्वाधीनता सेनानी तथा पंजाब की अग्रणी आर्य समाजी विदुषी कु.लज्जावती लाला लाजपतराय के प्रति अनन्य श्रद्धा भाव रखती थीं। लाला लाजपतराय भी उन्हें पुत्री की तरह स्नेह देते थे। कु.लज्जावती का लालाजी संबंधी संस्मरणात्मक लेख हाल ही में श्री विष्णु शरण द्वारा संपादित ग्रंथ “लाल लाजपतराय और नजदीक से” में प्रकाशित हुआ है। इसमें लज्जावती लिखती हैं- “लालाजी के व्यक्तित्व को यदि बहुत कम शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास करूं तो उपयुक्त शब्द होंगे कि वे देशभक्ति की सजीव प्रतिमा थे। उनके लिए धर्म, मोक्ष, स्वर्ग और ईश्वर पूजा- सभी का अर्थ था देश सेवा, देशभक्ति और देश से प्यार।
विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के सिलसिले में अमृतसर की एक विराट सभा में व्यापारियों की इस बात का कि उनके पास करोड़ों रुपये का विदेशी कपड़ा गोदामों में भरा पड़ा है, अत: उनके लिए विदेशी कपड़ों के बहिष्कार कार्यक्रम का समर्थन करना संभव नहीं है, उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था, “आप करोड़ों रुपये के कपड़े की बात कर रहे हैं। मेरे सामने यदि तराजू के एक पलड़े में दुनियाभर की दौलत रख दी जाए और दूसरे में हिन्दुस्थान की आजादी, तो मेरे लिए तराजू का वही पलड़ा भारी होगा जिसमें मेरे देश की स्वतंत्रता रखी हो।”
1928 में सात सदस्यीय सायमन कमीशन भारत आया जिसके अध्यक्ष सायमन थे ! इस कमीशन को अंग्रेज सरकार ने भारत में संवेधानिक सुधारों हेतु सुझाव देने के लिए नियुक्त किया था जबकि इसमें एक भी भारतीय नहीं था ! इस अन्याय पर भारत में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस ने पूरे देश में सायमन कमीशन के शांतिपूर्ण विरोध का निश्चय किया ! इसीलिए जब 30-अक्टूबर-1928 को सायमन कमीशन लाहोर पहुंचा तब वहां उसके विरोध में लाला जी ने मदन मोहन मालवीय जी के साथ शांतिपूर्ण जुलूस निकाला ! इसमें भगत सिंह जैसे युवा स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल थे ! पुलिस ने इस अहिंसक जुलूस पर लाठी चार्ज किया ! इसी लाठीचार्ज में लालाजी को निशाना बनाकर उन पर जानलेवा हमला किया गया जिस से उन्हें घातक आघात लगा और अंतत: 17-नवम्बर-1928 को यह सिंह चिर-निद्रा में सो गया ! अपनी म्रत्यु से पूर्व लाला जी ने भविश्यवाणी की थी की ” मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी अंग्रेज सरकार के ताबूत में अंतिम कील साबित होगी ! ” , जो की सच साबित हुई ! लाला जी की इस हत्या ने भगत सिंह, आदि क्रांतिकारियों को उद्वेलित कर दिया ! अभी तक वह गाँधी जी के अहिंसक आन्दोलन में जी-जान से जुड़े थे किन्तु जब उन्होंने देखा की शांतिपूर्ण विरोध पर भी दुष्ट अंग्रेज सरकार लाला जी जैसे व्यक्ति की हत्या कर सकती है तो उन्होंने इस अन्याय व अत्याचार का बदला लेने की ठान ली और लाला जी के हत्यारे अंग्रेज अधिकारी सौन्ड़ेर्स को मारकर ही दम लिया !
डॉ विवेक आर्य

Saturday, November 16, 2013

गुरु नानक एवं उनका प्रकाश उत्सव



आज गुरु नानक जी का प्रकाश उत्सव हैं। हर साल की भांति सिख समाज गुरु नानक के प्रकाश उत्सव पर गुरुद्वारा जाते हैं, शब्द कीर्तन करते हैं, लंगर छकते हैं, नगर कीर्तन निकालते हैं। चारों तरफ हर्ष और उल्लास का माहौल होता हैं।

एक जिज्ञासु के मन में प्रश्न आया की हम सिख गुरु नानक जी का प्रकाश उत्सव क्यूँ बनाते हैं?

एक विद्वान ने उत्तर दिया की गुरु नानक और अन्य गुरु साहिबान ने अपने उपदेशों के द्वारा हमारा जो उपकार किया हैं, हम उनके सम्मान के प्रतीक रूप में उन्हें स्मरण करने के लिए उनका प्रकाश उत्सव बनाते हैं।

जिज्ञासु ने पुछा इसका अर्थ यह हुआ की क्या हम गुरु नानक के प्रकाश उत्सव पर उनके उपदेशों को स्मरण कर उन्हें अपने जीवन में उतारे तभी उनका प्रकाश उत्सव बनाना हमारे लिए यथार्थ होगा।

विद्वान ने उत्तर दिया आपका आशय बिलकुल सही हैं , किसी भी महापुरुष के जीवन से, उनके उपदेशों से प्रेरणा लेना ही उसके प्रति सही सम्मान दिखाना हैं।

जिज्ञासु ने कहा गुरु नानक जी महाराज के उपदेशों से हमें क्या शिक्षा मिलती हैं।

विद्वान ने कुछ गंभीर होते हुए कहाँ की मुख्य रूप से तो गुरु नानक जी महाराज एवं अन्य सिख गुरुओं का उद्दश्य हिन्दू समाज में समय के साथ जो बुराइयाँ आ गई थी, उनको दूर करना था, उसे मतान्ध इस्लामिक आक्रमण का सामना करने के लिए संगठित करना था। जहाँ एक ओर गुरु नानक ने अपने उपदेशों से सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध जन चेतना का प्रचार किया वही दूसरी ओर गुरु गोविन्द सिंह ने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए हिन्दू जाति में शक्ति का प्रचार किया।

गुरु साहिबान के मुख्य उपदेश इस प्रकार हैं:-



१. हिन्दू समाज से छुआछुत अर्थात जातिवाद का नाश होना चाहिए।

२. मूर्ति पूजा आदि अन्धविश्वास एवं धर्म के नाम पर पाखंड का नाश होना चाहिए।

३. धुम्रपान, मासांहार आदि नशों से सभी को दूर रहना चाहिए।

४. देश, जाति और धर्म पर आने वाले संकटों का सभी संगठित होकर मुकाबला करे।



गुरु नानक के काल में हिन्दू समाज की शक्ति छुआछुत की वीभत्स प्रथा से टुकड़े टुकड़े होकर अत्यंत क्षीण हो गयी थी जिसके कारण कोई भी विदेशी आक्रमंता हम पर आसानी से आक्रमण कर विजय प्राप्त कर लेता था। सिख गुरुओं ने इस बीमारी को मिटाने के लिए प्रचण्ड प्रयास आरम्भ किया। ध्यान दीजिये गुरु गोविन्द सिंह के पञ्च प्यारों में तो सवर्णों के साथ साथ शुद्र वर्ण के भी लोग शामिल थे। हिन्दू समाज की इस बुराई पर विजय पाने से ही वह संगठित हो सकता था। गुरु कि खालसा फौज में सभी वर्णों के लोग एक साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर शत्रु से संघर्ष करते थे, एक साथ बैठकर भोजन करते थे, खालसा कि यही एकता उनकी अपने से कही ज्यादा ताकतवर शत्रु पर विजय का कारण थी। विडंबना यह हैं कि आज का सिख समाज फिर से उसी बुराई से लिप्त हो गया हैं। हिन्दू समाज के समान सिख समाज में भी स्वर्ण और मजहबी अर्थात दलित सिख , रविदासिया सिख आदि जैसे अनेक मत उत्पन्न हो गए जिनके गुरुद्वारा, जिनके ग्रंथी, जिनके शमशान घाट सब अलग अलग हैं। कहने को वे सभी सिख हैं अर्थात गुरुओं के शिष्य हैं मगर उनमें रोटी बेटी का किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं हैं। जब सभी सिख एक ओमकार ईश्वर को मानते हैं, दस गुरु साहिबान के उपदेश और एक ही गुरु ग्रन्थ साहिब को मानते हैं तो फिर जातिवाद के लिए उनमें भेदभाव होना अत्यंत शर्मनाक बात हैं। इसी जातिवाद के चलते पंजाब में अनेक स्थानों पर मजहबी सिख ईसाई बनकर चर्च की शोभा बड़ा रहे हैं। वे हमारे ही भाई थे जोकि हमसे बिछुड़ कर हमसे दूर चले गए। आज उन्हें वापस अपने साथ मिलाने की आवश्यकता हैं और यह तभी हो सकता हैं,जब हम गुरु साहिबान का उपदेश मानेगे अर्थात छुआछुत नाम की इस बीमारी को जड़ से मिटा देगे।

अन्धविश्वास, धर्म के नाम पर ढोंग और आडम्बर ,व्यर्थ के प्रलापों आदि में पड़कर हिन्दू समाज न केवल अपनी अध्यात्मिक उन्नति को खो चूका था अपितु इन कार्यों को करने में उसका सारा सामर्थ्य, उसके सारे संसाधन व्यय हो जाते थे। अगर सोमनाथ के मंदिर में टनों सोने को एकत्र करने के स्थान पर, उस धन को क्षात्र शक्ति को बढ़ाने में व्यय करते तो न केवल उससे आक्रमणकारियों का विनाश कर देते बल्कि हिन्दू जाति का इतिहास भी कलंकित होने से बच जाता। अगर वीर शिवाजी को अपने आपको क्षत्रिय घोषित करने में उस समय के लगभग पञ्च करोड़ को खर्च न पड़ता तो उस धन से मुगलों से संघर्ष करने में लगता।

सिख गुरु साहिबान ने हिंदुयों की इस कमजोरी को पहचान लिया था इसलिए उन्होंने व्यर्थ के अंधविश्वास पाखंड से मुक्ति दिलाकर देश जाति और धर्म कि रक्षा के लिए तप करने का उपदेश दिया था। परन्तु आज सिख संगत फिर से उसी राह पर चल पड़ी हैं।

सिख लेखक डॉ महीप सिंह के अनुसार गुरुद्वारा में जाकर केवल गुरु ग्रन्थ साहिब के आगे शीश नवाने से कुछ भी नहीं होगा। जब तक गुरु साहिबान की शिक्षा को जीवन में नहीं उतारा जायेगा तब तक शीश नवाना केवल मूर्ति पूजा के सामान अन्धविश्वास हैं। आज सिख समाज हिंदुयों की भांति गुरुद्वारों पर सोने की परत चढाने , हर वर्ष मार्बल लगाने रुपी अंधविश्वास में ही सबसे ज्यादा धन का व्यय कर रहा हैं। देश के लिए सिख नौजवानों को सिख गुरुओं की भांति तैयार करना उसका मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

गुरु साहिबान ने स्पष्ट रूप से धुम्रपान, मांसाहार आदि के लिए मना किया हैं ,जिसका अर्थ हैं की शराब, अफीम, चरस, सुल्फा, बुखी आदि तमाम नशे का निषेध हैं क्यूंकि नशे से न केवल शरीर खोखला हो जाता हैं बल्कि उसके साथ साथ मनुष्य की बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती हैं और ऐसा व्यक्ति समाज के लिए कल्याणकारी नहीं अपितु विनाशकारी बन जाता हैं। उस काल में कहीं गयी यह बात आज भी कितनी सार्थक और प्रभावशाली हैं। आज सिख समाज के लिए यह सबसे बड़े चिंता का विषय भी बन चूका हैं की उसके नौजवान पतन के मार्ग पर जा रहे हैं। ऐसी शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार कौम धर्म, देश और जाति का क्या ही भला कर सकती हैं?

जब एक विचार, एक आचार , एक व्यवहार नहीं होगा तब तक एकता नहीं होगी, संगठन नहीं होगा। जब तक संगठित नहीं होगे तब देश के समक्ष आने वाली विपत्तियों का सामना कैसे होगा? खेद हैं कि सिख गुरुओं द्वारा जो धार्मिक और सामाजिक क्रांति का सन्देश दिया गया था उसे सिख समाज व्यवहार में नहीं ला रहा हैं। जब तक गुरुओं कि बात को जीवन का अंग नहीं बनाया जायेगा तब तक किसी का भी उद्धार नहीं हो सकता।

जिज्ञासु - आज गुरु नानक देव के प्रकाश उत्सव पर आपने गुरु साहिबान के उपदेशों को अत्यंत सरल रूप प्रस्तुत किया जिनकी आज के दूषित वातावरण में कितनी आवश्यकता हैं यह बताकर आपने सबका भला किया हैं, आपका अत्यंत धन्यवाद।



डॉ विवेक आर्य

Friday, November 15, 2013

अत्याचारी व्यक्ति जीवन में दुःख का ही भागी बनता है




अत्याचारी व्यक्ति जीवन में दुःख का ही भागी बनता है

डॉ विवेक आर्य


बाबर और औरंगजेब ने अपने जीवन में हिन्दू जनता पर अनेक अत्याचार किये थे। हमारे मुस्लिम भाई उनकी धर्मान्ध नीति का बड़े उत्साह से गुण गान करते हैं। पर सत्य यह है कि अपनी मृत्यु से पहले दोनों को अपने जीवन में किये गए गुनाहों का पश्चाताप था। अपने पुत्रों को लिखे पत्रों में उन्होंने अपनी व्यथा लिखी हैं।

बाबर ने जीवन भर मतान्धता में हिन्दुओं पर अनेक अत्याचार किये। एक समय तो ऐसा आया की हिन्दू जनता बाबर के कहर से त्राहि माम कर उठी।

बाबर की मतान्धता को गुरु नानक जी की जुबानी हम भली प्रकार से जान सकते है। भारत पर किये गये बाबर के आक्रमणों का नानक ने गंभीर आकलन किया और उसके अत्याचारों से गुरु नानक मर्माहत भी हुए। उनके द्वारा लिखित बाबरगाथा नामक काव्यकृति इस बात का सबूत है कि मुग़ल आक्रान्ता ने किस तरह हमारे हरे-भरे देश को बर्बाद किया था।

बाबरगाथा के पहले चरण में लालो बढ़ई नामक अपने पहले आतिथेय को संबोधित करते हुए नानकदेव ने लिखा है:-

 हे लालो,बाबर अपने पापों की बरात लेकर हमारे देश पर चढ़ आया है और ज़बर्दस्ती हमारी बेटियों के हाथ माँगने पर आमादा है। धर्म और शर्म दोनों कहीं छिप गये लगते हैं और झूठ अपना सिर उठा कर चलने लगा है। हमलावर लोग हर रोज़ हमारी बहू-बेटियों को उठाने में लगे हैं, फिर जबर्दस्ती उनके साथ निकाह कर लेते हैं। काज़ियों या पण्डितों को विवाह की रस्म अदा करने का मौका ही नहीं मिल पाता। हे लालो, हमारी धरती पर खून के गीत गाये जा रहे हैं और उनमे लहू का केसर पड़ रहा है। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि बहुत जल्दी ही मुग़लों को यहाँ से विदा लेनी पड़ेगी, और तब एक और मर्द का चेला जन्म लेगा।

कविता के दूसरे चरण में नानक ने लिखा:

हे ईश्वर, बाबर के शासित खुरासान प्रदेश को तूने अपना समझ कर बचा रक्खा है और हिन्दुस्तान को बाबर द्वारा पैदा की गयी आग में झोंक दिया है। मुगलों को यम का रूप प्रदान कर उनसे हिन्दुस्तान पर हमला करवाया, और उसके परिणामस्वरूप यहाँ इतनी मारकाट हुई कि हर आदमी उससे कराहने लगा। तेरे दिल में क्या कुछ भी दर्द नहीं है?

तीसरे चरण का सारांश है:

जिन महिलाओं के मस्तक पर उनके बालों की लटें लहराया करती थीं और उन लटों के बीच जिनका सिन्दूर प्रज्ज्वलित और प्रकाशमान रहता था, उनके सिरों को उस्तरों से मूंड डाला गया है और चारों ओर से धूल उड़ उड़ कर उनके ऊपर पड़ रही है। जो औरतें किसी ज़माने में महलों में निवास करती थीं उनको आज सड़क पर भी कहीं ठौर नहीं मिल पा रही है। कभी उन स्त्रियों को विवाहिता होने का गर्व था और पतियों के साथ वह प्रसन्नता के साथ अपना जीवन-यापन करती थीं। ऐसी पालकियों में बैठ कर वह नगर का भ्रमण करती थीं जिन पर हाथी दाँत का काम हुआ होता था। आज उनके गलों में फांसी का फन्दा पड़ा हुआ है और उनके मोतियों की लड़ियाँ टूट चुकी हैं।

चौथे चरण में एक बार फिर सर्वशक्तिमान का स्मरण करते हुए नानक ने कहा है:

यह जगत निश्चित ही मेरा है और तू ही इसका अकेला मालिक है। एक घड़ी में तू इसे बनाता है और दूसरी घड़ी में उसे नष्ट कर देता है। जब देश के लोगों ने बाबर के हमले के बारे में सुना तो उसे यहाँ से भगाने के लिये पीर-फकीरों ने लाखों टोने-टोटके किये, लेकिन किसी से भी कोई फ़ायदा नहीं हो पाया। बड़े बड़े राजमहल आग की भेंट चढ़ा दिये गये, राजपुरूषों के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें मिट्टी में मिला दिया गया। पीरों के टोटकों से एक भी मुग़ल अंधा नहीं हो पाया। मुगलों ने तोपें चलायीं और पठानों ने हाथी आगे बढ़ाये। जिनकी अर्ज़ियाँ भगवान के दरबार में फाड़ दी गयी हों, उनको बचा भी कौन सकता है? जिन स्त्रियों की दुर्दशा हुई उनमें सभी जाति और वर्ग की औरतें थीं। कुछ के कपड़े सिर से पैर तक फाड़ डाले गये,कुछ को श्मशान में रहने की जगह मिली। जिनके पति लम्बे इन्तज़ार के बाद भी अपने घर नहीं वापस लौट पाये, उन्होंने आखिर अपनी रातें कैसे काटी होंगी?

ईश्वर को पुनः संबोधित करते हुए गुरू नानकदेव ने कहा था:

 तू ही सब कुछ करता है और तू ही सब कुछ कराता है। सारे सुख-दुख तेरे ही हुक्म से आते और जाते हैं, इससे किसके पास जाकर रोया जाये, किसके आगे अपनी फ़रियाद पेश की जाये? जो कुछ तूने लोगों की किस्मत में लिख दिया है, उसके अतिरिक्त कोई दूसरी चीज़ हो ही नहीं सकती। इससे अब पूरी तरह तेरी ही शरण में जाना पड़ेगा। उसके अलावा अन्य कोई पर्याय नहीं।

(सन्दर्भ- स्टॉर्म इन पंजाब – क्षितिज वेदालंकार)

बाबर मतान्धता में जीवन भर अत्याचार करता रहा। जब अंत समय निकट आया तब उसे समझ आया की मतान्धता जीवन का उद्देश्य नहीं हैं अपितु शांति, न्याय, दयालुता, प्राणी मात्र की सेवा करना जीवन का उद्देश्य हैं।

अपनी मृत्यु से पहले बाबर की आँखें खुली ,उसे अपने किये हुए अत्याचार समझ मैं आये। अपनी गलतियों को समझते हुए उसने अपने बेटे हुमायूँ को एक पत्र लिखा जिसे यहाँ उद्धृत किया जा रहा हैं।

“जहीर उद्दीन मोहम्मद बादशाह गाज़ी का गुप्त मृत्यु पत्र राजपुत्र नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ के नाम जिसे खुद जिंदगी बक्शे सल्तनत की मजबूती के लिए लिखा हुआ। ए बेटे हिंदुस्तान की सल्तनत मुखत लीफ़ मज़हबों से भरी हुई हैं। खुद का शुक्र हैं की उसने तुझे उसकी बादशाही बक्शी है। तुझ पर फर्ज है कि अपने दिल के परदे से सब तरह का मज़हबी तअस्सुब धो दाल। हर मज़हब के कानून से इंसाफ कर। खास कर गौ की कुरबानी से बाज आ जिससे तू लोगों के दिल पर काबिज़ हो सकता है और इस मुल्क की रियाया तुझसे वफादारी से बंध जाएगी। किसी फिरके के मंदिर को मत तोड़ जोकि हुकूमत के कानून का पायबंद हो।इन्साफ इस तरह कर की बादशाह से रियाया और रियाया से बादशाह खुश रहे। उपकार की तलवार से इस्लाम का काम ज्यादा फतेयाब होगा बनिस्पत जुल्म की तलवार के। शिया और सुन्नी के फरक को नजरंदाज कर वरना इस्लाम की कमजोरी जाहिर हो जाएगी।और मुख्तलिफ विश्वासों की रियाया को चार तत्वों के अनुसार (जिनसे एक इन्सानी जिस्म बना हुआ है) एक रस कर दे, जिससे बादशाहत का जिस्म तमाम बिमारियों से महफूज रहेगा।खुश किस्मत तैमुर का याददाश्त सदा तेरी आँखों के सामने रहे जिससे तू हुकूमत के काम में अनुभवी बन सके। “

इस मृत्यु पत्र पर तारीख 1 जमादिल अव्वल सन 395  हिज्री लिखा है।

(सन्दर्भ- अलंकार मासिक पत्रिका, 1924 मई अंक )

हुमायूँ ने अपने पिता बाबर की बात को कई मायने में अनुसरण किया। उसके बाद अकबर ने भी इस बात को नजरअंदाज नहीं किया।

इसी से अकबर का राज्य बढ़ कर पूरे हिंदुस्तान में फैल सका था। बाद के मुग़ल शराब, शबाब के ज्यादा मुरीद बन गए थे। जब औरंगजेब का काल आया तो उसने ठीक इसके विपरीत धर्मान्ध नीति अपनाई। पहले गद्दी पाने के लिए अपने सगे भाइयों को मारा।  फिर अपने बाप को जेल में डालकार प्यासा और भूखा मार डाला। मद में चूर औरंगजेब ने हिन्दुओं पर बाबर से भी बढ़कर अत्याचार किये। जिससे उसी के जीवन में अपनी चरम सीमा तक पहुँचा मुग़ल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया।

औरंगजेब के अत्याचार से हिन्दू वीर उठ खड़े हुए। महाराष्ट्र में वीर शिवाजी,पंजाब में गुरु गोविन्द सिंह , राजपूताने में वीर दुर्गा प्रसाद राठोड़, बुंदेलखंड में वीर छत्रसाल, भरतपुर और मथुरा में जाट सरदार, असम में लचित बोर्फुकान। चारों ओर से औरंगजेब के विरुद्ध उठ रहे विद्रोह को दबाने में औरंगजेब की संगठित सारी शक्ति खत्म हो गयी। न वह जिहादी उन्माद में हिन्दुओं पर अत्याचार करता, न उसके विरोध में हिन्दू संगठित होकर उसका प्रतिरोध करती। उसका मज़हबी उन्माद ही मुगलिया सल्तनत के पतन का कारण बना।

अपनी मृत्यु से कुछ काल पहले औरंगजेब को अक्ल आई तो उसने अपने मृत्यु पत्र में अपने बेटों से उसका बखान इस प्रकार किया हैं।

शहजादे आज़म को औरंगजेब लिखता है-

बुढ़ापा आ गया, निर्बलता ने अधिकार जमा लिया और अंगों में शक्ति नहीं रही। मैं अकेला ही आया, और अकेला ही जा रहा हूँ। मुझे मालूम नहीं की मैं कौन हूँ और क्या करता रहा हूँ। जितने दिन मैंने इबादत में गुजारे हैं, उन्हें छोड़कर शेष सब दिनों के लिए मैं दुखी हूँ। मैंने अच्छी हुकूमत नहीं की और किसानों का कुछ नहीं बना सका। ऐसा कीमती जीवन व्यर्थ ही चला गया। मालिक मेरे घर में था पर मेरी अन्धकार से आवृत आँखें उसे न देख सकी।

छोटे बेटे कामबख्श को बादशाह ने लिखा था -”मैं जा रहा हूँ और अपने साथ गुनाहों और उनकी सजा के भोझ को लिये जा रहा हूँ। मुझे आश्चर्य यही है कि मैं अकेला आया था, परन्तु अब इन गुनाहों के काफिले के साथ जा रहा हूँ। मुझे इस काफिले का खुदा के सिवाय कोई रहनुमा नहीं दिखाई देता। सेना और बारबरदारीकी चिंता मेरे दिल को खाये जा रही हैं। “

(सन्दर्भ मुग़ल साम्राज्य का क्षय और उसके कारण- इन्द्र विद्या वाचस्पति )

अलमगीर यानि खुदा के बन्दे के नाम से औरंगजेब को मशहूर कर दिया गया जिसका मुख्य कारण उसकी धर्मान्धता थी। पर सत्य यह है कि हिन्दुओं पर अत्याचार करने के कारण अपराध बोध उसे अपनी मृत्यु के समय हो गया था।

इस लेख को लिखने का मेरा उद्देश्य बाबर या औरंगजेब के विषय में अपने विचार रखना नहीं हैं अपितु यह सन्देश देना है कि

“अत्याचारी व्यक्ति जीवन में दुःख का ही भागी बनता है ”

यही अटल सत्य है और सदा रहेगा।

Saturday, November 9, 2013

धर्म के विषय में भ्रांतियाँ और उनका निवारण




मेरे कुछ मुस्लिम मित्रों द्वारा धर्म विषय पर अनेक शंकाएँ प्रस्तुत कि गई हैं। जिनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक हैं क्यूंकि शंका का निवारण न होना अज्ञानता को जन्म देता हैं और अज्ञानता मनुष्य को पाप कर्म में सलिंप्त करती हैं। और पापी व्यक्ति देश, धर्म और जाति के लिए अहितकारक होता हैं।↤
उनकी शंकाएँ और उनका समाधान इस प्रकार हैं

शंका 1:-  धर्म का अर्थ क्या हैं?

उत्तर:-
१. धर्म संस्कृत भाषा का शब्द हैं जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना हैं। "धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म हैं। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म हैं। दूसरे शब्दों में यहभी कह सकते हैं की मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति हैं वह धर्म हैं।

२. जैमिनी मुनि के मीमांसा दर्शन के दूसरे सूत्र में धर्म का लक्षण हैं लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु गुणों और कर्मों में प्रवृति की प्रेरणा धर्म का लक्षण कहलाता हैं।

३. वैदिक साहित्य में धर्म वस्तु के स्वाभाविक गुण तथा कर्तव्यों के अर्थों में भी आया हैं। जैसे जलाना और प्रकाश करना अग्नि का धर्म हैं और प्रजा का पालन और रक्षण राजा का धर्म हैं।

४. मनु स्मृति में धर्म की परिभाषा

धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ६/९

अर्थात धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के दस लक्षण हैं।

दूसरे स्थान पर कहा हैं आचार:परमो धर्म १/१०८  अर्थात सदाचार परम धर्म हैं

५. महाभारत में भी लिखा हैं

धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा: अर्थात

जो धारण किया जाये और जिससे प्रजाएँ धारण  की हुई हैं वह धर्म हैं।
 ६. वैशेषिक दर्शन के कर्ता महा मुनि कणाद ने धर्म का लक्षण यह किया हैं
यतोअभयुद्य निश्रेयस सिद्धि: स धर्म:

अर्थात जिससे अभ्युदय(लोकोन्नति) और निश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि होती हैं, वह धर्म हैं।

शंका 2:- स्वामी दयानंद के अनुसार धर्म कि क्या परिभाषा हैं?

उत्तर:- जो पक्ष पात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार हैं उसी का नाम धर्म और उससे विपरीत का अधर्म हैं।-सत्यार्थ प्रकाश ३ सम्मुलास
पक्षपात रहित न्याय आचरण सत्य भाषण आदि युक्त जो ईश्वर आज्ञा वेदों से अविरुद्ध हैं, उसको धर्म मानता हूँ - सत्यार्थ प्रकाश मंतव्य

इस काम में चाहे कितना भी दारुण दुःख प्राप्त हो , चाहे प्राण भी चले ही जावें, परन्तु इस मनुष्य धर्म से पृथक कभी भी न होवें।- सत्यार्थ प्रकाश

शंका 3:- क्या हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्म सभी समान हैं अथवा भिन्न हैं? धर्म और मत अथवा पंथ में क्या अंतर हैं?

उत्तर: -हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्म नहीं अपितु मत अथवा पंथ हैं।  धर्म और मत में अनेक भेद हैं।

१.  धर्म ईश्वर प्रदत हैं और जिसे ऊपर बताया गया हैं, बाकि मत मतान्तर हैं जो मनुष्य कृत हैं।
२. धर्म लोगो को जोड़ता हैं जबकि मत विशेष लोगो में अन्तर को बढ़ाकर दूरियों को बढ़ावा देते हैं।
३. धर्म का पालन करने से समाज में प्रेम और सोहार्द बढ़ता हैं, मत विशेष का पालन करने से व्यक्ति अपने मत वाले को मित्र और दूसरे मत वाले को शत्रु मानने लगता हैं।
४. धर्म क्रियात्मक वस्तु हैं मत विश्वासात्मक वस्तु हैं। 
५. धर्म मनुष्य के स्वाभाव के अनुकूल अथवा मानवी प्रकृति का होने के कारण स्वाभाविक हैं और उसका आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम हैं परन्तु मत मनुष्य कृत होने से अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक हैं।
६. धर्म एक ही हो सकता हैं , मत अनेक होते हैं।
७. धर्म सदाचार रूप हैं अत: धर्मात्मा होने के लिये सदाचारी होना अनिवार्य हैं। परन्तु मत अथवा पंथ में सदाचारी होना अनिवार्य नहीं हैं।
८. धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं अथवा धर्म अर्थात धार्मिक गुणों और कर्मों के धारण करने से ही मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करके मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता हैं जबकि मत मनुष्य को केवल पन्थाई या मज़हबी अथवा अन्धविश्वासी बनाता हैं। दूसरे शब्दों में मत अथवा पंथ पर ईमान लाने से मनुष्य उस मत का अनुनायी बनता हैं नाकि सदाचारी या धर्मात्मा बनता हैं।
९. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़ता हैं और मोक्ष प्राप्ति निमित धर्मात्मा अथवा सदाचारी बनना अनिवार्य बतलाता हैं परन्तु मत मुक्ति के लिए व्यक्ति को पन्थाई अथवा मटी का मानने वाला बनना अनिवार्य बतलाता हैं। और मुक्ति के लिए सदाचार से ज्यादा आवश्यक उस मत की मान्यताओं का पालन बतलाता हैं।
१०. धर्म सुखदायक हैं मत दुखदायक हैं।
 ११. धर्म में बाहर के चिन्हों का कोई स्थान नहीं हैं क्यूंकि धर्म लिंगात्मक नहीं हैं -न लिंगम धर्मकारणं अर्थात लिंग (बाहरी चिन्ह) धर्म का कारण नहीं हैं परन्तु मत के लिए बाहरी चिन्हों का रखना अनिवार्य हैं जैसे एक मुस्लमान के लिए जालीदार टोपी और दाड़ी रखना अनिवार्य हैं।
१२. धर्म दूसरों के हितों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना सिखाता हैं जबकि मज़हब अपने हित के लिए अन्य मनुष्यों और पशुयों की प्राण हरने के लिए हिंसा रुपी क़ुरबानी का सन्देश देता हैं।
 धर्म और मत के अंतर को ठीक प्रकार से समझ लेने पर मनुष्य अपने चिंतन मनन से आसानी से यह स्वीकार करके के श्रेष्ठ कल्याणकारी कार्यों को करने में पुरुषार्थ करना धर्म कहलाता हैं इसलिए उसके पालन में सभी का कल्याण हैं।

शंका 4:- क़ुरान के समान वेदों में शत्रु का संहार करने का आदेश अनेक मन्त्रों में बताया गया हैं । आप लोग क़ुरान कि यह कहकर आलोचना करते हैं कि क़ुरान हिंसा का आदेश देता हैं, फिर वेद भी ऐसा ही सन्देश हैं तो फिर क़ुरान और वेद कि शिक्षा में क्या अंतर हैं?

उत्तर:- इस शंका का समाधान बहुत सरल हैं। वेद और क़ुरान दोनों शत्रु मारने आदेश देते हैं, मगर दोनों के अनुसार शत्रु भिन्न भिन्न हैं। क़ुरान के अनुसार जो इस्लाम को ना मानता हो और जो मुहम्मद साहिब को अंतिम पैगम्बर न मानता हो, वह शत्रु हैं अथवा जो आपके फिरके से अलग दूसरे फिरके का हो, वह शत्रु हैं जैसे एक शिया के लिए एक सुन्नी, एक वहाबी के लिए एक अहमदी, एक देवबंदी के लिए एक बरेलवी वगैरह वैगरह। रोजाना ईराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान , अफ़्रीकी देशों में यह बात सामान्य रूप से देखने को मिलती हैं कि इस्लाम को मानने वाले फिरके एक दूसरे के प्राण लेने में हिंसक रूप से आमदा हैं। जबकि वेदों के अनुसार शत्रु वह हैं जो धर्म मार्ग पर नहीं चलता, जिसके कर्म, आचार, विचार,व्यवहार उत्तम नहीं हैं, जो दुराचारी हैं, पापी हैं, दुष्ट हैं। इस्लाम के अनुसार शत्रु कि परिभाषा अत्यंत संकीर्ण हैं,  गैर मुस्लिम चाहे कितना भी श्रेष्ठ कार्य क्यूँ न हो, उसके विचार उत्तम से उत्तम हो, उसका आचार उत्तम से उत्तम चाहे क्यूँ न हो मगर वह इसलिए मारने योग्य हैं, क्यूंकि वह इस्लाम को नहीं मानता और मुहम्मद पर विश्वास नहीं लाता। दुनिया में इससे संकीर्ण मानसिकता आपको कही भी देखने को नहीं मिलती। जबकि वैदिक धर्म कि यह विशेषता हैं कि चाहे कोई हिन्दू हो, चाहे मुस्लिम हो ,चाहे ईसाई हो, चाहे नास्तिक ही क्यूँ न हो अगर वह धर्म मार्ग पर चलेगा तो उसका सर्वदा कल्याण होगा। सही मायनों में वेद कि शिक्षा सारभौमिक, व्यवहारिक एवं प्रासंगिक हैं।
वेद के अनुसार शत्रु धर्म मार्ग पर न चलने वाला दुष्ट हैं जबकि क़ुरान के अनुसार शत्रु क़ुरान कि मान्यताओं को न मानने वाला हैं। जिस दिन समाज वेदों में वर्णित शत्रु और क़ुरान में वर्णित शत्रु में भेद समझ जायेगा उस दिन विश्वभर में शांति का राज हो जायेगा क्यूंकि आज मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु वह स्वयं हैं, मनुष्य का दुराचार, उसका दुष्ट व्यवहार सबसे बड़ा शत्रु हैं इसीलिए वेद इस शत्रु समाप्त करने का आदेश देता हैं। आप सुधरोगे जग सुधरेगा, आप बिगड़ोगे जग बिगड़ेगा।

शंका 5:- अपने आपको विद्वान कहने वाला इस्लामिक प्रचारक डॉ ज़ाकिर नायक द्वारा इस विषय में एक तर्क इस प्रकार से देता हैं कि कक्षा आठ में पढ़ने वाले एक छात्र का उदहारण लीजिये। अगर वह पाँच विषय में से चार में १००/१०० और एक विषय में अनुतीर्ण हो जाये तो क्या आप उसे उतीर्ण कहेगे? नहीं ना, बस ऐसा ही इस्लाम को न मानने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ हैं, चाहे वह कितना भी उत्तम कर्म करता हो, चाहे कितना भी श्रेष्ठ उसका आचरण हो मगर वह इस्लाम को नहीं मानता और अंतिम पैगम्बर मुहम्मद साहिब पर विश्वास नहीं लाता इसलिए वह अनुतीर्ण कहलायेगा।

उत्तर:- डॉ ज़ाकिर नायक के कुतर्क पर मुझे हँसी आती हैं। यह कुछ ऐसा हैं कि मुदद्दई भी तुम और गवाह भी तुम। एक बात बताओ इस्लामिक मत कि स्थापना और मुहम्मद साहिब के जन्म लेने से पहले क्या कोई धार्मिक ही नहीं था या फिर ऐसा था कि तब आठवीं कक्षा के छात्र के लिए विषय ही चार होते थे पाँचवा विषय ही नहीं था। सत्य यह हैं कि धर्म यानि कि श्रेष्ठ आचरण तो तभी से हैं जबसे मनुष्य कि उत्पत्ति हुई हैं और ज़ाकिर नायक के साथ-साथ विश्व के सभी विद्वान यह स्पष्ट रूप से मानते हैं कि विश्व का सबसे प्रथम ईश्वरीय ज्ञान अथवा इल्हाम अगर कोई हैं तो वह वेद ही हैं और ईश्वरीय ज्ञान का विशेष गुण भी यही हैं कि वह अपने आप में पूर्ण होता हैं, सृष्टि के आदि से लेकर अंत तक वह एक समान रहता हैं, उसमें किसी भी प्रकार के परिवर्तन करने कि आवश्यकता नहीं हैं क्यूंकि उस ज्ञान को प्रदान करने वाला ईश्वर हैं। वेद स्पष्ट रूप से आचरण को परम धर्म कहता हैं जैसा ऊपर शंका में बताया गया हैं। इसलिए यह केवल एक भ्रान्ति भर हैं कि केवल इस्लाम को मानने वाला धार्मिक हैं, बाकि सब अधार्मिक। इस्लाम को मानने वाला जन्नत में जायेगा बाकि सब के सब दोजख़ में जायेगे। 

शंका 6:- क्या धर्म अफीम हैं जैसा कि कार्ल मार्क्स ने बताया हैं?
उत्तर:- कार्ल मार्क्स ने धर्म के स्थान पर मत को धर्म का स्वरुप समझ लिया। जैसा उन्होंने देखा और इतिहास में पढ़ा उसको देख कर तो हर कोई धर्म के विषय में इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा जैसा मार्क्स ने बतलाया। उन्होंने अपने चारों और क्या देखा?  मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा यूरोप, एशिया में इस्लाम के नाम पर भयानक तबाही, चर्च के अधिकारीयों द्वारा धर्म के नाम पर सामान्य जनता पर अत्याचार को देखने पर उनका धर्म से विश्वास उठ गया और उन्होंने धर्म को अफीम कि संज्ञा दे दी क्यूंकि अफीम ग्रहण करने के पश्चात जैसे मनुष्य को सुध-बुध नहीं रहती वैसा ही व्यवहार धर्म के नाम पर मत को मानने वाले करते हैं। धर्म अफीम नहीं हैं अपितु उत्तम आचरण हैं, इसलिये धर्म को अफीम कहना गलत हैं , मत को अफीम कहने में कोई बुराई नहीं हैं।

शंका 7:- वेद के अनेक मन्त्रों में स्वर्ग के विषय पर प्रकाश डाला गया हैं जबकि वैदिक मान्यता के अनुसार स्वर्ग नाम कि कोई भी भिन्न सत्ता नहीं हैं। ऐसा विरोधाभास क्यूँ हैं?

उत्तर:-  जितनी बड़ी यह शंका दिखती हैं उतना ही सरल इसका समाधान हैं । वेदों के अनुसार सरल शब्दों में स्वर्ग मनुष्य कि उस अवस्था को कहते हैं जिस अवस्था में वह सुखी हैं, प्रसन्न हैं और नरक मनुष्य कि उस अवस्था को कहते हैं जिसमें वह सबसे अधिक दुखी हैं, पीड़ित हैं, त्रस्त हैं। अब वैदिक कर्मव्यस्था के अनुसार जो जैसा करेगा वो पायेगा, यह अटल सिद्धांत हैं। मनुष्य अपने ही द्वारा किये गये कर्मों से सुखी हैं, मनुष्य अपने ही द्वारा किये गये कर्मों से दुखी हैं। मनुष्य अपने कर्म धरती पर करता हैं और उसका फल भी धरती पर ही भोगता हैं, इसलिए उसका सुखी या दुखी होना भी धरती पर होना चाहिए अर्थात स्वर्ग भी यही हैं और नरक भी यही हैं। वेदों में स्वर्ग प्राप्ति के लिए मन्त्रों में इसीलिए कामना कि गई हैं क्यूंकि उसका उद्देश्य मनुष्य को उत्तम कर्म करते हुए, धर्म मार्ग पर चलते हुए, सुख कि प्राप्त करने का सन्देश देना हैं । क़ुरान में स्वर्ग प्राप्ति के लिए कर्म के स्थान पर मत के संकीर्ण विश्वास  को प्राथमिकता दी गई हैं। एक ऐसे स्वर्ग कि कल्पना कि गई हैं , जहा पर भोग के लिए हूरें हो, मीठे पानी के चश्मे हो, शराब कि नदियाँ हो, वैसे इस्लामिक स्वर्ग कि कल्पना करने वाले लेखक और रेगिस्तान में रहने वाली चरवाहें कि इच्छा में कोई विशेष अंतर न होना क्या सन्देश देता हैं, पाठक समझ सकते हैं। इस्लामिक स्वर्ग कि प्राप्ति के लिए चाहे निरपराध कि हत्या क्यूँ न करनी पड़े, चाहे निरीह पशुओं कि गर्दन पर वार क्यूँ न करना पड़े परन्तु सब जायज हैं, जबकि वैदिक स्वर्ग उत्तम से उत्तम कर्म करने कि उच्च मर्यादा का सन्देश हैं। विश्व भर में होने वाले इस्लामिक आतंकवाद का उस दिन सफाया हो जायेगा जिस दिन वैदिक स्वर्ग और इस्लामिक बहिशत के मूलभूत अंतर का पाठ इस्लाम को मानने वालो को पढ़ाया जायेगा।

शंका 8:- हिन्दू समाज ईश्वर को कण कण में मानता फिर  मूर्ति में ईश्वर कि पूजा करने में आपत्ति हैं?

समाधान:- आर्यसमाज के यशस्वी दार्शनिक विद्वान् श्री पंडित गंगा प्रसाद जी उपाध्याय जी एक बार अपने उपदेश में ईश्वर की सर्वव्यापकता का मंडन व मूर्ति पूजा पर अपने विचार प्रकट कर रहे थे कि एक श्रोता ने खड़े होकर प्रश्न कर दिया
तुम वेद के ठेकेदारों से हैं, यह मेरा सवाल
कण-कण में खुदा हैं तो मूर्ति में क्यूँ नहीं?
श्री उपाध्याय जी ने प्रश्न सुनकर पूछा कि प्रश्न का उत्तर तुम्हारी तरह पद्य में दूँ या गद्य में? प्रश्नकर्ता ने कहा कि मजा तो इसी में हैं कि आप उत्तर भी मेरी तरह पद्य में ही दें.
तब पंडित जी ने उत्तर देते हुए कहाँ:-
तुम पुराण के ठेकेदारों को हैं यह मेरा जवाब,
मूर्ति में खुदा तो हैं पर तुम तो उसमें हो नहीं।
प्रश्नकर्ता पौराणिक था व उसका तात्पर्य यह था कि जब ईश्वर सर्वव्यापक हैं, तो वह मूर्ति में भी स्वत: सिद्ध होता हैं।  जब मूर्ति में ईश्वर का होना सिद्ध हो गया, तो मूर्ति कि पूजा, ईश्वर कि पूजा हो तो सिद्ध होती हैं।  फिर मूर्ति पूजा का विरोध या निषेध क्यूँ किया जाता हैं?
इस प्रश्न का उत्तर हैं कि ईश्वर अति सूक्षम हैं। वह दृश्यमान नहीं हैं , साकार नहीं है।  रंग, रूप व आकार आदि गुण प्रकृति से बनाए सृष्टि के दृश्यमान पदार्थों के हैं।  ईश्वर के नहीं हैं।
साकार मूर्ति ईश्वर ने नहीं बनाई. ईश्वर ने प्रकृति से पत्थर बनाए तथा मनुष्य ने पत्थर से मूर्ति बनाई. प्रकृति, पत्थर व मूर्ति में अपने अन्तर्यामी व सर्वव्यापक गुणों के कारण से ईश्वर तो विद्यमान हैं, यह सत्य हैं परन्तु इन सब में से कोई भी ईश्वर नहीं हैं, यह भी सत्य हैं. इसे इस प्रकार भी कहाँ जा सकता हैं कि मूर्ति में ईश्वर हैं, परन्तु मूर्ति- मूर्ति ही हैं, वह ईश्वर नहीं हैं। सर्वव्यापक निराकार ईश्वर कि मूर्ति बन भी नहीं सकती क्यूंकि एक मूर्ति में न सिमट सकने वाले ईश्वर को आप कैसे सीमित कर सकते हैं।
इसके विपरीत आत्मा ईश उपासना या भक्ति करना चाहता हैं।  वह ईश्वर कि तरह न तो अन्तर्यामी हैं तथा न ही सर्वव्यापक हैं। हमारे ह्रदय में आत्मा हैं,आत्मा ईश्वर के निकट विद्यमान हैं, आत्मा का ईश्वर से मिलना, योग व समाधी में अनुभूति द्वारा ही संभव हैं। ह्रदय से बाहर मूर्ति में विराजमान ईश्वर का मिलन विभिन्न स्थान होने से कैसे संभव हैं ? दो व्यक्तियों का मिलना पृथक- पृथक स्थानों पर होने से संभव ही नहीं हैं। जब दोनों व्यक्ति एक स्थान पर आये तो ही उनका मिलन होगा. प्रत्यक्ष: में भी हम यही देखते हैं.
मनुष्य में आत्मा केवल और केवल उसके ह्रदय में ही हैं और ह्रदय में ही रहेगी। आत्मा सर्वव्यापक नहीं हैं ,वह पत्थर कि मूर्ति में भी नहीं हैं और अन्यत्र कहीं नहीं जा सकती अत: आत्मा और परमात्मा का मिलन मूर्ति में नहीं हो सकता।  जब एक वस्तु हमारे निकटतम हो तो उसे प्राप्त करने के लिए दूर जाने कि आवश्यकता ही नहीं हैं।  अल्पज्ञों को यह बात समझ नहीं आती व वे मूर्ति को ही ईश्वर मानकर उसकी पूजा करते हैं.
गीता में १८/६१ में कहाँ भी गया हैं कि हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के ह्रदय में स्थित हैं।
यजुर्वेद ४०/५ में ईश्वर के विषय में कहाँ गया हैं- वह दूर भी हैं, वह समीप भी हैं, वह भीतर भी हैं, वह बाहर भी हैं।
अज्ञानी लोग ईश्वर को आत्मा से दूर मानते हैं इसीलिए ईश्वर को वे पत्थरों में, पेड़ों में, चित्रों में,नदियों में,तीर्थों में,चौथें आसमान पर, सातवें आसमान पर, कैलाश पर, क्षीर सागर पर, गोलोक में होना मानते हैं।
किन्तु सच्चे आस्तिकों, योगियों व विद्वानों के विचार में ईश्वर हमारे भीतर आत्मा में ही मिलते हैं।
हम उसमें हैं और वह हममें हैं. इससे अधिक निकटता- समीपता अन्य किसी भी दो वस्तुयों में नहीं हैं ,अत: ईश्वर को प्राप्त करने के लिए आत्मा से बाहर जाने कि आवश्यकता नहीं हैं, हमारा ईश्वर हमारी आत्मा में ही हैं, आत्मा बाहर मूर्ति में जा नहीं सकती, उपासना का सही अर्थ हैं निकट बैठना और हमारे ह्रदय में आत्मा ही ईश्वर के समीप बैठ सकती हैं।  मूर्ति कि आकृति को व्यक्त किया जा सकता हैं जबकि ईश्वर के निराकार होने के कारण उनके रूप को व्यक्त नहीं किया जा सकता।  वेदांत दर्शन के ३/२/२३ में और कठोपनिषद २/३/१२ में लिखा हैं कि ईश्वर वाणी, मन , नेत्रों से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
इस सम्बन्ध में सुप्रसिद्द शास्त्रथ महारथी पंडित राम चन्द्र दहेलवी का कथन कि “हम ईश्वर को मूर्ति के भीतर तो बाहर स्वीकार करते हैं ,हम मूर्ति का खंडन नहीं अपितु मूर्ति पूजा का खंडन करते हैं।  जब ईश्वर सर्वत्र हैं तो मूर्ति के भीतर वाले ईश्वर को ही आप क्यों पूजना चाहते हैं? मूर्ति के बाहर वाले ईश्वर को आप क्यों नहीं पूजना चाहते? मान लीजिये, आप मुझे मिलने आये हैं तथा मैं आपको अपने द्वार के बाहर ही मिल जाऊ तो मुझसे मिलने में आपको अधिक सुविधा होगी अथवा मेरे भीतर होने पर होगी।  भगवान् तो सब जगह हैं उससे बाहर ही मिल लीजिये, व्यर्थ में मूर्ति के अन्दर वाले के पीछे क्यों पड़े हैं? आप मूर्ति में दाखिल नहीं हो सकते और मूर्ति वाला ईश्वर बाहर नहीं आ सकता।  क्यों मुश्किल में पड़ते हो? सरल काम कीजिये और मूर्ति से बाहर वाले कि पूजा कर लीजिये।
मूर्ति में ईश्वर को व्यापक मानकर मूर्ति कि पूजा करने वालों से हमारा यह अनुरोध हैं कि ईश्वर मूर्ति से बाहर भी सर्वत्र हैं व हमारे ह्रदय में तो वह अन्तर्यामी होने से अत्यंत निकट हैं. ईश्वर को बाहर तलाशने वालों के लिए यह भजन कि पंक्तियाँ प्रेरणादायक हैं।
तेरे पूजन को भगवान बना मन मंदिर आलीशान
किसने देखी तेरी सूरत, कौन बनाए तेरी मूरत ?
तू ही निराकार भगवान् बना मन मंदिर आलीशान।।

शंका 9 :- वेद का ज्ञान ईश्वर ने कैसे दिया?

समाधान:- एक बार एक मेले में हिन्दू समूह के सामने एक मौलाना इस्लामिक प्रचार करते हुए जोर जोर से चिल्ला रहा था और कह रहा था कि क्या यहाँ कोई हिन्दू हैं जो मुझे यह बता सके कि वेदों का ज्ञान ऊपर वाले ने आदम जात को कैसे दिया क्यूंकि  वेद जब इस धरती पर आये तो न कोई आकाशवाणी हुई और न ही कोई पैगम्बर आया हिन्दू समाज में हुआ फिर यह ज्ञान आदम को कैसे नसीब हुआ था। इससे तो यही मालूम चलता हैं कि वेद भगवान का दिया ज्ञान नहीं हैं अपितु मानव कि स्वयं कि कल्पना हैं, इससे पाक तो अल्लाह का दिया क़ुरान हैं जिसे स्वयं अल्लाह ने मुहम्मद साहिब के माध्यम से दिया था।
श्रोताओं में गुरुकुल कांगड़ी का एक स्नातक भी था जो कुछ दूरी पर खड़ा था, उसने मौलाना से जोर से पूछा कि मौलाना कि क्या शंका हैं, मौलाना ने दोबारा अपनी शंका ऊँची आवाज़ में दोहरा दी, वह स्नातक अब मंच के कुछ समीप आ गया और उसने पहले से धीमी आवाज़ में दोबारा मौलाना से उसकी शंका पूछी, मौलाना ने वही शंका दोबारा से मगर पहले से धीमी आवाज़ में दोहरा दी, स्नातक अब मंच के और समीप आ गया और उसने पहले से भी धीमी आवाज़ में दोबारा मौलाना से उसकी शंका पूछी, मौलाना ने वही शंका दोबारा से मगर पहले से भी धीमी आवाज़ में दोहरा दी, स्नातक अब मंच पर आकर मौलाना के बिलकुल निकट खड़ा हो गया और फिर से उनकी शंका को पूछा , इस बार मौलाना ने सामान्य आवाज़ में अपनी शंका प्रस्तुत कर दी। अब स्नातक ने मौलाना से पूछा बताये मौलाना जी पहले आप जोर से चिल्ला कर अपनी बात कह रहे थे, अब आप अपनी बात उतने जोर से नहीं कह रहे ऐसा क्यूँ? मौलाना ने कहा कि पहले आप दूर थे इसलिए ज्यादा जोर से आवाज़ लगनी पड़ रही थी, अब आप पास हैं इसलिए सामान्य आवाज़ से कार्य सम्पन्न हो जाता हैं। स्नातक ने उत्तर दिया बस मौलाना जी यही तो आपको समझाना था चूँकि वैदिक ईश्वर हमारी आत्मा के भीतर ही वास करता हैं इसलिए हमारे अंतर्मन में ही ईश्वर ने ज्ञान को दे दिया था, इसलिए न कोई आकाशवाणी कि आवश्यकता पड़ी और न ही कोई पैगम्बर कि आवश्यकता पड़ी। मौलाना उसका कथन सुनकर चुप हो गये और उनका मज़हबी बुखार उतर गया।
पाठकों वैदिक सिद्धांतों के अनुसार ईश्वर एक देशीय अर्थात एक स्थान पर वास करने वाला अथवा किसी एक लोक में वास करने वाला नहीं हैं जैसा कि पौराणिक समाज गोलोक, क्षीर सागर, कैलाश पर मानता हैं अथवा सातवें या चौथे आसमान पर जैसा कि सैमितिक मतों का मानना हैं। वेदों के अनुसार ईश्वर सर्वव्यापक अर्थात सभी स्थानों पर हैं, ईश्वर अपनी बनाई सृष्टि में सभी स्थानों पर तभी हो सकता हैं जब वह निराकार हैं अर्थात जिसका कोई आकार नहीं हैं। मनुष्य के भीतर आत्मा जिसे रूह अथवा soul भी कुछ लोग कहते हैं, सभी मानते हैं। ईश्वर का वास सभी प्राणियों में उनके भीतर अर्थात उनकी आत्मा में होता हैं। जब ईश्वर हमारे भीतर ही हैं, तब तो ईश्वर हमें अपना ज्ञान अर्थात वेद भीतर से ही दे सकता हैं? सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा वेदों का ज्ञान चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा को इसी प्रकार से उनकी आत्मा में विराजमान ईश्वर द्वारा भीतर ही दिया गया था। इसलिये न किसी प्रकार कि आकाशवाणी कि, न किसी पैगम्बर कि ईश्वर को सहायता कि आवश्यकता हैं।  ईश्वर का एक गुण सर्वशक्तिमान भी हैं अर्थात जो जो कर्म ईश्वर के हैं , वो वो कर्म करने के लिए ईश्वर किसी अन्य पर आश्रित नहीं हैं, वह स्वयं से सक्षम एवं समर्थ हैं। इसलिए किसी पैगम्बर आदि से ज्ञान देने कि बात बनावटी सिद्ध होती हैं और ईश्वर द्वारा अन्तरात्मा में ज्ञान देना ज्यादा तर्क संगत सिद्ध होता हैं।
डॉ विवेक आर्य