Monday, June 19, 2017

*🌷निन्दा से विचलित न हों🌷*



*🌷निन्दा से विचलित न हों🌷*

सुभाषिनी आर्य

अपनी निन्दा, आलोचना, उपहास और अपमान को सुनकर सहन करना भी कोई सरल बात नहीं है। इसको वही सहन कर सकते हैं जिनका मस्तिष्क बहुत शान्त हो और जिनमें बहुत सहनशक्ति हो। ब्राह्मण के लिए तो मनु महाराज का स्पष्ट आदेश है कि―

*सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ।*
*अमृतस्येव चाकांक्ष्येदवमानस्य सर्वदा ।।*
―(मनु० 2/162)

*भावार्थ―*_ब्राह्मण सम्मान से सदा विष के समान व्याकुल रहे (डरे) और अपमान की इच्छा सदा अमृत के समान करता रहे।_

महाभारत में कहा है―

*जीवन्तु मे शत्रुगणाः सदैव, येषां प्रसादात्सुविचक्षणोऽहम् ।*
*यदा-यदा मे विकृतिं लभन्ते, तदा-तदा मां प्रतिबोधयन्ति ।।*

*भावार्थ―*_मेरे शत्रु सदा जीवित रहें जिनकी कृपा से मैं बहुत चतुर हो गया हूँ। जब-जब वे मेरी त्रुटियाँ देखते हैं, तब-तब मुझे जगाते हैं।_

सन्त कबीर ने कहा है―

*निन्दक नियरे राखिए, आसन कुटि छवाय ।*
*बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ।।*

_अपनी कुटिया को निन्दक के निकट बनाकर रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के ही व्यक्ति के स्वभाव को निर्मल बना देता है।_

यह स्थिति विशेष व्यक्तियों की है। सामान्य व्यक्ति इस स्थिति तक बहुत अभ्यास के पश्चात् पहुँच पाता है।स्वामी दयानन्द के जीवन में अनेक ऐसे प्रसंग मिलते है। एक बार वे गंगा तट पर कुटिया बनाकर साधना कर रहे थे। उनकी समीप ही एक अन्य बाबा अपनी कुटिया बनाकर बैठा था। वह रोज स्वामी जी के प्रति सुबह सुबह असभ्य भाषा का प्रयोग करता था। स्वामी जी उसकी बात का कोई उत्तर नहीं देते थे। एक दिन जब वह अपनी कुटिया से बहार नहीं निकला और स्वामी जी को कोई आवाज नहीं आई। तब स्वामी जी ने अपने एक शिष्य को फल आदि देकर उसके समीप भेजा। उसने जब पूछा कि यह फल किसने भेजे है। तब उस भक्त ने बताया कि आपके समीप रहने वाले स्वामी दयानन्द जी ने भेजे है और कहा की आज सम्भवत पड़ोस वाले बाबाजी की तबियत सही नहीं है। आज उनके उपदेश सुनने को नहीं मिले। यह सुनते ही वह बाबा अपने किये पर शर्मिंदा हुआ और स्वामी दयानन्द से आकर क्षमा याचना करने लगा। स्वामी दयानन्द ने उसे क्षमा कर दिया और आगे से सभ्य भाषा में वार्तालाप करने का उपदेश दिया।

आलोचना और निन्दा को सहन करने का एक और भी उपाय है कि व्यक्ति अपने सम्बन्ध में ऐसी बातें सुने तो विचार करे कि ये बातें सत्य हैं या मिथ्या? यदि ये बातें सत्य हैं तो सत्य का क्या बुरा मानना, क्योंकि सत्य को तो सदा स्वीकार करना ही चाहिए। यदि कही हुई बातें असत्य हैं तो उनका क्या बुरा मानना? क्योंकि वे तो हैं ही असत्य। झूठी बात का क्या बुरा मानना? परन्तु यह भी ऊँची स्थिति है, इस तक पहुँचना सरल नहीं है। पर्याप्त अभ्यास के पश्चात् ही इस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है।

*महापुरुष तो अपने प्रति की गई निन्दा, आलोचना और अपमान को मन में स्थान ही नहीं देते, परन्तु सामान्य व्यक्ति के लिए इसका सहन करना बहुत कठिन हो जाता है।*

मानवता के सद्गुण











🌹मानवता के सद्गुण

मानवता के लक्षणों का वर्णन गीता में दैवी सम्पदा के अन्तर्गत किया है, सच्चे आदर्श रुप में ढल कर मानव अधिकारी बन सकते हैं।

*अभयं सत्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: ।*
*दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ।।*
*अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् ।*
*दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ।।*
*तेज: क्षमाधृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता ।*
*भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ।।*
―(गीता १३/१-३)

*भावार्थ―*_जिन व्यक्तियों को दैवी सम्पदाएँ प्राप्त हैं, उनके लक्षण इस प्रकार हैं―
१. *"अभयम्"* मन में भय का अभाव सर्वथा हो।
२. *"सत्वसंशुद्धि"* अन्त:करण की अच्छी प्रकार से स्वच्छता हो।
३. *"ज्ञानयोगव्यवस्थिति:"* तत्व-ज्ञान के लिए ध्यानयोग में निरन्तर दृढ़ स्थिति हो।
४. *"दानम्"* बिना फल की इच्छा किये देश-कालपात्रानुसार सात्विक दान हो।
५. *"दम:"* इन्द्रियों का दमन हो।
६. *"यज्ञ"* ईश्वर-भक्ति और अग्निहोत्रादि उत्तम कर्मों का आचरण हो।
७. *"स्वाध्याय"* वेद-शास्त्रों के पठन पूर्वक ईश्वर के "ओ३म्" नाम और गुणों का कीर्तन हो।
८. *"तप:"* स्वधर्म पालन के लिये कष्ट एवं प्रतिकूलताएं सहन करना,
९. *"आर्जवम्"* शरीर और इन्द्रियों सहित अन्त:करण की सरलता,
१०. *"अहिंसा"*–मन, वाणी और शरीर किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना।
११. *"सत्यम्"*–यथार्थ और प्रिय भाषण।
१२. *"अक्रोध:"*―अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोधित न होना।
१३. *"त्याग"*–कर्मों में कर्त्तापन के अभिमान का त्याग।
१४. *"शान्ति"*–चित्त की चञ्चलता का अभाव।
१५. *"अपैशुनम्"*–किसी की निन्दा न करना।
१६. *"भूतेषुदया"*–सब भूत-प्राणियों में हेतुरहित दया।
१७. *"अलोलुप्त्वम्"*–इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी आसक्ति का न होना।
१८. *"मार्दवम्"* मन-वाणी, कर्म और स्वभाव की कोमलता।
१९. *"ह्री:"*–लोक और शास्त्र के विरुद्ध आचरण में लज्जा।
२०. *"अचापलम्"*–व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव।
२१. *"तेज:"*–वह शक्ति जिसके प्रभाव से श्रेष्ठ पुरुषों के सामने विषयासक्त और नीच प्रवृति वाले मनुष्य भी प्राय: अन्यायाचरण से रुक कर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत होते हैं।
२२. *"क्षमा"*–अपने अपकार करने वाले के दोष को क्षमा करके उसका भला करना।
२३. *"धैर्य"*–किसी भी विपत्ति में धैर्य रखना।
२४. *"शौच"*–बाहर-भीतर की पवित्रता।
२५. *"अद्रोह"*–किसी भी प्राणी में शत्रु-भाव न होना।
२६. *"नातिमानिता"*–अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव
दीर्घकालीन अभ्यास से इनका निश्चय ही आप में विकास होगा और आप सच्चे मानव बन सकेंगे।

Was Mahatma Gandhi a failed “Bania”?



Was Mahatma Gandhi a failed “Bania”?

Dr. Vivek Arya

Recently Amit Shah talked about the Bania title of Mahatma Gandhi. This created lot of furor and upheavel. My aim here is to draw attention of readers about the right connotation of the term 'Bania' - which means a wise man. In this sense did Mahatma Gandhi qualify the aforesaid term or not is left to the judgement of readers.

It was Kolkata congress special session in 1920 presided over by Lala Lajpat Rai. Swami Shraddhananda visited this session. Those were Khilafat movement days. Mahatma Gandhi unnecessarily tagged Indian freedom struggle with the Khilafat Movement of Turkey. The delegates of Congress especially the Muslims were interested more in discussing about Khilafat rather than Indian freedom struggle. Swami Shraddhananda witnessed in the above session,a group meeting being held by Maulana Shaukat Ali, one among famous Ali brothers. In the presence of more than 50 persons (all Muslims), while the merits of non-violence were being discussed, Shaukat Ali said "Mahatma Gandhi is shrewd Bania. You do not understand his real object. By putting you under discipline, he is preparing you for guerilla warfare. He is not such an out-and-out non-violent as you all suppose".

Swami Shraddhanda was shocked to listen to the views of Shaukat Ali and he wanted such views should draw the attention of Mahatma Gandhi. However, he was unable to communicate to him directly due to his illness. He sent his message through Mahadeva Desai that Gandhiji's objectives were being misrepresented by his trusted colleagues. In between there was another episode. In Khilafat Conference at Nagpur, the Ayats (verses) of Quran were recited by Maulanas. These verses referred to Jihad and suggested the killing of infidels or non-Muslims. Swami Shraddhanda drew the attention of Mahatma Gandhi to study and analyse such verses of Quran. Gandhiji smiled and said, "They are alluding to the British bureaucracy". On this, Swamiji replied that it was all about propagation of non-violence and when an opportunate movement comes, Mohammeden Maulanas would not desist from using these verses against the Hindus.

Swami Shraddhanand also observed that Ali brothers had no scholastic achievements in the study of Quran. They were also not able to communicate either in Arabic or Persian language. They were given Honorary Maulana title by Firangi Mahal Lucknow for their extraordinary duties of Tabligh (Conversion of Non-Muslims to Islam). On the question of untouchability, Ali brothers' ill advice in Cocanada(Kakinada) session of congress regarding division of Dalits into two parts, one for Hindus and another parts for Muslims speaks volumes about the evil intention of Maulanas. However, this move of Maulanas had no impact on Mahatma Gandhi who as usual remained sympathetic towards them. Once he only smiled when same Maulana said

“However pure Mr. Gandhi’s character may be, he must appear to me from the point of view of my religion inferior to any Musalman, even though he be without character… Yes, according to my religion and creed, I do hold an adulterous and a fallen Musalman to be better than Mahatma Gandhi.”

Mahatma Gandhi was simply living in a fools paradise as he dreamt of Swarajya with the support of such radical preachers of Islam. Swami Shraddhanda alarmed him that he must not have blind faith in the fundamentalists. At long last Hindus had to pay a heavy price for the silly mistake of Gandhi. Khilafat movement raised the aspirations of Muslim leaders. They started dreaming of Muslim Rule over India and started considering the country under British rule as Darul-Harb. Dozens of riots broke out all over the country. During the Moplah rebellion in Kerala in 1921, thousands of Hindu men, women and children were killed by the Muslims. Hundreds of women were raped. And yet Gandhi supported the Moplahs and not the Hindu victims of the riots. On the other hand Mahatma Gandhi wrote in his “Young India”, “It’s wrong to say that Islam has employed force. No religion in this world has spread through the use of force. No Musalman, to my knowledge, has ever approved of compulsion.”

Does this not show that Gandhi practiced political deception? According to Gandhi, the Moplah Muslims were guilty of no crime. Post Moplah, Multan, Kohat, Saharanpur, Kanpur, Delhi burned with Hindu-Muslim riots. It will not be wrong to say that this massacre of helpless Hindus lead to the 1947 partition of the country. Had Mahatma Gandhi listened to sane advice of Swami Shraddhanda, the situation would not have gone out of his control. Further, had Mahatma Gandhi not tagged Khilafat Movement with the poles apart Indian freedom struggle, the Islamic fundamentalists would not have talked about Darul-Aman (the land of Islam). Had Mahatma Gandhi visited Moplah and witnessed the inhuman acts done in the name of Islam and criticized them, the ugly approach of the radical preachers could have been easily neutralized. Had Mahatma Gandhi learned from his mistakes, Hindus would not have faced such a humiliation in their own motherland.

The term 'Bania' stands for a wise person. In the light of above, I once again leave it to the judgement of readers to decide whether Mahatma Gandhi is fit to be called a “Bania”?

Saturday, June 17, 2017

स्वामी दयानन्द और अल्लोपनिषद्



स्वामी दयानन्द और अल्लोपनिषद्

1200 वर्षों से मुसलमानों ने हिंसा के साथ साथ छल से भी हिन्दुओं के धर्मान्तरण करने का प्रयास अनेक बार किया है। मुस्लिम समाज के कुछ मौलवियों ने जब यह देखा कि हिन्दू समाज में उपनिषदों की बड़ी मान्यता है तो उन्होंने अल्लोपनिषद् के नाम से एक फर्जी ग्रन्थ की रचना कर डाली। इस ग्रन्थ में क़ुरान की शिक्षाओं का संस्कृत भाषा में संकलन किया गया था। स्वामी दयानन्द जैसे अनुभवी प्रकांड पंडित की नजरों से यह षड़यंत्र बच नहीं पाया। उन्होंने इस छल का भंडाफोड़ कर दिया। 

स्वामी दयानंद द्वारा अल्लोपनिषद् के नाम से रचे गए ग्रंथ रूपी छल के विषय में सत्यार्थ प्रकाश में प्रश्न उत्तर संवाद रूप में दिया गया है। 

(प्रश्न) क्या तुम ने सब अथर्ववेद देखा है ? यदि देखा है तो अल्लोपनिषद् देखो। यह साक्षात् उसमें लिखी है। फिर क्यों कहते हो कि अथर्ववेद में मुसलमानों का नाम निशान भी नहीं है।

अथाल्लोपनिषदं व्याख्यास्यामः
अस्मांल्लां इल्ले मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते।
इल्लल्ले वरुणो राजा पुनर्द्ददु ।
ह या मित्रे इल्लां इल्लल्ले इल्लां वरुणो मित्रस्तेजस्काम ।।१।।
होतारमिन्द्रो होतारमिन्द्र महासुरिन्द्रा ।
अल्लो ज्येष्ठं श्रेष्ठं परमं पूर्णं ब्रह्माणं अल्लाम्।।२।।
अल्लोरसूलमहामदरकबरस्य अल्लो अल्लाम्।।३।।
आदल्लाबूकमेककम्।। अल्लाबूक निखातकम्।।४।।
अल्लो यज्ञेन हुतहुत्वा। अल्ला सूर्यचन्द्रसर्वनक्षत्र ।।५।।
अल्ला ऋषीणां सर्वदिव्याँ इन्द्राय पूर्वं माया परममन्तरिक्षा ।।६।।
अल्ल पृथिव्या अन्तरिक्षं विश्वरूपम्।।७।।
इल्लां कबर इल्लां कबर इल्लाँ इल्लल्लेति इल्लल्ला ।।८।।
ओम् अल्ला इल्लल्ला अनादिस्वरूपाय अथर्वणा श्यामा हुं ह्रीं
जनानपशूनसिद्धान् जलचरान् अदृष्टं कुरु कुरु फट्।।९।।
असुरसंहारिणी हुं ह्रीं अल्लोरसूलमहमदरकबरस्य अल्लो अल्लाम्
इल्लल्लेति इल्लल्ला ।।१०।।

इत्यल्लोपनिषत् समाप्ता।।

जो इस में प्रत्यक्ष मुहम्मद साहब रसूल लिखा है इस से सिद्ध होता है कि मुसलमानों का मत वेद मूलक है।

(उत्तर) यदि तुम ने अथर्ववेद न देखा हो तो हमारे (स्वामी दयानन्द) पास आओ आदि से पूर्त्ति तक देखो । अथवा जिस किसी अथर्ववेदी के पास बीस काण्डयुक्त मन्त्रसंहिता अथर्ववेद को देख लो। कहीं तुम्हारे पैगम्बर साहब का नाम वा मत का निशान न देखोगे। और जो यह अल्लोपनिषद् है वह न अथर्ववेद में, न उस के गोपथ ब्राह्मण वा किसी शाखा में है। यह तो अकबरशाह के समय में अनुमान है कि किसी ने बनाई है। इस का बनाने वाला कुछ अर्बी और कुछ संस्कृत भी पढ़ा हुआ दीखता है क्योंकि इस में अरबी और संस्कृत के पद लिखे हुए दीखते हैं। देखो! 

(अस्माल्लां इल्ले मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते) इत्यादि में जो कि दश अंक में लिखा है, जैसे-इस में (अस्माल्लां और इल्ले) अर्बी और (मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते) यह संस्कृत पद लिखे हैं वैसे ही सर्वत्र देखने में आने से किसी संस्कृत और अर्बी के पढ़े हुए ने बनाई है। यदि इस का अर्थ देखा जाता है तो यह कृत्रिम अयुक्त वेद और व्याकरण रीति से विरुद्ध है। जैसी यह उपनिषद् बनाई है, वैसी बहुत सी उपनिषदें मतमतान्तर वाले पक्षपातियों ने बना ली हैं। जैसी कि स्वरोपनिषद्, नृसिहतापनी, रामतापनी, गोपालतापनी बहुत सी बना ली हैं।

(प्रश्न) आज तक किसी ने ऐसा नहीं कहा अब तुम कहते हो। हम तुम्हारी बात कैसे मानें?

(उत्तर) तुम्हारे मानने वा न मानने से हमारी बात झूठ नहीं हो सकती है। जिस प्रकार से मैंने इस को अयुक्त ठहराई है उसी प्रकार से जब तुम अथर्ववेद, गोपथ वा इस की शाखाओं से प्राचीन लिखित पुस्तकों में जैसे का तैसा लेख दिखलाओ और अर्थसंगति से भी शुद्ध करो तब तो सप्रमाण हो सकता है।

(प्रश्न) देखो! हमारा मत कैसा अच्छा है कि जिस में सब प्रकार का सुख और अन्त में मुक्ति होती है ।

(उत्तर)-ऐसे ही अपने-अपने मत वाले सब कहते हैं कि हमारा ही मत अच्छा है, बाकी सब बुरे। विना हमारे मत के दूसरे मत में मुक्ति नहीं हो सकती।
अब हम तुम्हारी बात को सच्ची मानें वा उन की? हम तो यही मानते हैं कि सत्यभाषण, अहिंसा, दया आदि शुभ गुण सब मतों में अच्छे हैं और बाकी वाद, विवाद, ईर्ष्या, द्वेष, मिथ्याभाषणादि कर्म सब मतों में बुरे हैं। यदि तुम को सत्य मत ग्रहण की इच्छा हो तो वैदिक मत को ग्रहण करो।

Friday, June 16, 2017

महान क्रांतिकारी शहीद महाराजा नाहर सिंह



महान क्रांतिकारी शहीद महाराजा नाहर सिंह

#वल्लभगढ़(फरीदाबाद-हरियाणा) एक बहुत ही शक्तिशाली #रियासत थी जिसके संस्थापक हिन्दू वीर महाराजा #बलराम सिंह थे।वल्लभगढ़ और भरतपुर रियासतों ने मिलकर जिहादियों से धर्म की रक्षा की थी।

महाराजा बलराम सिंह की 7 वीं पीढ़ी में 6 #अप्रैल 1821 को इस महान प्रतापी राजा नाहर सिंह ने #जन्म लिया था।उस समय देश पर अंग्रेजो का शाशन था।
नाहर सिंह के बचपन का नाम #नर सिंह था इनके ऊपर शिकार करते वक्त एक #शेर ने हमला कर दिया था।तब नर सिंह और इनके अंगरक्षक #हरचन्द गुर्जर ने शेर से टक्कर ली पर हरचन्द की मृत्यु हो गयी फिर #नर_सिंह ने शेर को #मार गिराया।उस समय ये मात्र 16 साल के ही थे।तब इनका नाम नर सिंह से नाहर सिंह हुआ।

उसके बाद उनका विवाह #कपूरथला रियासत के #सिख जाट #राजा की पुत्री #किशन कौर से कर दिया गया। 20 जनवरी 1839 को छोटी सी उम्र में उनका #राजतिलक हुआ और राजा बनते ही उन्होंने सेना को मजबूत करना शुरू कर दिया।बल्लभगढ़ रियासत का उस समय नाम बलरामगढ़ था जो इसके संस्थापक महाराजा बलराम सिंह के नाम पर पड़ा था।इस रियासत की ओर आँख उठाने की अंग्रेजों हिम्मत भी नही पड़ती थी।

महाराजा नाहर सिंह के नाम से अंग्रेज थर थर कांपते थे।

उन्होंने अंग्रेजो के अपनी रियासत में #घुसने पर भी #प्रतिबंध का फरमान जारी कर दिया था जो उस समय बड़े बड़े राजाओं के भी बस की बात नही थी।इसी बीच 1857 की क्रांति की योजना शुरू हुई उन्होंने गुड़गांव रेवाड़ी ग्वालियर फरुखनगर के राजाओं को एक #झंडे तले लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
18 मार्च 1857 को #मथुरा में राजाओं की एक गुप्त मीटिंग हुई जिसमें नाहर सिंह को शिरमौर बनाया गया और इस मीटिंग के आयोजक व अध्यक्ष वही थे।इस मीटींग में #तात्या टोपे भी शामिल थे।और बहादुर शाह जफर ने उन्हें दिल्ली के पश्चिमी हिस्से को चाक चौबंद रखने के लिए कहा।

क्रांति की तारीख 31 #मई रखी गई थी ताकि सब तक खबर पहुंचाकर पुरे देश में एक साथ क्रांति की जाये।मगर क्रांति पहले ही शुरू हो गई।जिससे अचानक से सब गड़बड़ा गया।मंगल पांडे शहीद हो गए।और उसके बाद उस बटालियन के ज्यादातर सैनिक नाहर सिंह की सेना में शामिल हो गए।

क्रांति शुरू होते ही नाहर सिंह ने अंग्रेजो के काफिले रोकने शुरू कर दिए।और कई बार अंग्रेजो को मकर पिता और भगाया।इस तरह वीर क्रांतिकारियों ने दिल्ली को अंग्रेजो के कब्जे से छुड़ा लिया व बहादुर शाह जफर को दिल्ली का बादशाह बना दिया गया।

दिल्ली 132 #दिन तक आजाद रही।

महाराजा ने आगरा से आती हुई अंग्रेज टुकड़ियों को भी काट दिया।जहाँ से अंग्रेज उनके सामने पहुंचे वही अंग्रेजी सेना का लहू नाहर की तलवार से लगा और विजय हुई।

नाहर सिंह ने दिल्ली की सीमा की सुरक्षा की और अंग्रेजो को वहां से नही घुसने दिया।इसलिए अंग्रेज उन्हें #आयरन_गेट_ऑफ़_दिल्ली कहने लगे।

अंग्रेजो ने फिर कुछ गद्दारो के साथ मिलकर योजना बनाई और दूसरी तरफ से जाकर बहादुर शाह जफर ने आत्मसमर्पण कर दिया और अंग्रेजो ने युद्ध विराम का का सफेद झंडा लहरा दिया ।और बहादुर शाह के खास आदमी इलाहीबख्श जो #गद्दार था को नाहर सिंह के पास भेजा गया।नाहर सिंह इन सब से अनजान थे।तो उस गद्दार ने महाराज को कहा कि आपको बहादुर शाह जफर ने बुलाया है अंग्रेजो से संधि की जायेगी।जब महाराज वहां पहुंचे तो नजारा कुछ और ही था।मौके का फायदा उठाकर धोखे से उन्हें 6 दिसम्बर 1857 को #बंदी बना लिया गया।

उन्हे अंग्रेजो ने कहा कि सत्ता वापिस कर दी जायेगी अगर अंग्रेजों की #अधीनता स्वीकार करो तो नाहर सिंह ने तेवर दिखाकर जवाब दिया कि मैं वो राजा नही जो देश के दुश्मनों के आगे झुक जाऊं।और जो देश धर्म से गद्दारी करे वो #जाट क्षत्रीय ही क्या?

फिर #चांदनी चौक पर उन्हें फांसी देने का प्रबंध किया गया।दिल्ली की जनता वहां खचाखच भर गई और भारत माता की जय और महाराजा नाहर सिंह की जय के नारों से #दिल्ली गूंज उठी।

अंग्रेज घबरा गए उन्होंने फांसी के फंदे पर भी राजा के सामने वही बात दोहराई।

पर उन्होंने साफ कहा इस देश का दुश्मन मेरा दुश्मन और मैं कभी दुश्मनों के आगे झुकता नही राज ही चाहिए होता तो मैं विद्रोह करता ही नहीं।
और दिल्ली की जनता को आह्वाहन करते हुए उन्होंने कहा कि देशवासियों एक चिंगारी पैदा करके जा रहा हूँ इससे आजादी की मशाल जलाए रखना।

एक नाहर सिंह मरेगा लाखो पैदा होंगे और इस अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकेगे।माँ भारती के हाथों में भारत का झंडा शान से लहराना चाहिए।
और फिर भारत माँ की जय का नारा लगाकर उन्होंने हंसते हुए ख़ुशी से फांसी का फंदा चूम लिया।

इस तरह एक महान क्रन्तिकारी महाराजा नाहर सिंह अपनी वीरता और देशभक्ति का किस्सा हमारे बीच छोड़ गए। उनके नाम पर हर साल मेला भी लगता है।

जय वीर नाहर सिंह।जय भारत माता।

आर्यसमाजियों की इफ्तार पार्टी



आर्यसमाजियों की इफ्तार पार्टी

एक मुसलमान ने अपनी आदत से लाचार होकर मुझसे बदमाशी करनी चाही। बोला रमजान का  महीना चल रहा है। आर्यसमाजियों को हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए इफ्तार पार्टी देनी चाहिए।

मैंने कहा, अच्छी बात है, लेकिन पार्टी मैं दूंगा तो अपने ही तरीके से दूंगा, जिसे स्वीकार करना चाहिए, जिसमें हिन्दू मुस्लिम एकता का पूरा ख्याल रखा जाएगा।

उसने पूछा, तुम्हारा तरीका क्या होगा?

मैंने कहा, ‘‘इफ्तार पार्टी में खानपान से पहले वैदिक मंत्रो से संध्या हवन होगा और सत्यार्थ प्रकाश के 14 समुल्लास का सामूहिक पाठ, जिसे मुस्लिमों को करना चाहिए और फिर जल-पान और अंत में शांति पाठ.....और उपहार में सत्यार्थ प्रकाश...ऐसा यदि वे मान लें तो मैं रोजा इफ्तार पार्टी हर शहर में देने के लिए तैयार हूं....
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-तेजपाल सिंह धामा

प्रातःकालीन मंत्राः



● प्रातःकालीन मंत्राः ●
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प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना ।
प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातस्सोममुत रुद्रं हुवेम ॥ १ ॥[ऋग्वेद : मण्डल ७, सूक्त ४१, मंत्र १-५]
भावना - हे ईश्वर ! आप स्वप्रकाशस्वरूप – सर्वज्ञ हैं । परम ऐश्वर्य के दाता और परम ऐश्वर्य युक्त हैं । आप प्राण और उदान के समान हमें प्रिय हैं । आप सर्वशक्तिमान् हैं । आपने सूर्य और चन्द्र को उत्पन्न किया है । हम आपकी स्तुति करते हैं । आप भजनीय हैं, सेवनीय हैं, पुष्टिकर्त्ता हैं । आप अपने उपासक, वेद तथा ब्रह्माण्ड के पालनकर्त्ता हैं । आप हमारे अन्तर्यामी और प्रेरक हैं । हे जगदीश्वर ! आप पापियों को रुलानेवाले तथा सर्वरोगनाशक हैं । हम प्रातः वेला में आपकी स्तुति-प्रार्थना करते हैं ।
प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता ।
आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥ २ ॥
भावना - हे ईश्वर ! आप जयशील हैं । आप ऐश्वर्य के दाता हैं । आप तेजस्वी – ज्ञानस्वरूप हैं । आपने अन्तरिक्ष के पुत्र-रूप सूर्य को उत्पन्न किया है । आप ही ने सूर्यादि लोकों को विशेष रूप से – सब ओर से धारण किया है । आप सभी को जानते हो । आप दुष्टों को दण्ड देते हो । आप सब के प्रकाशक हो । मैं आपके भजनीय स्वरूप का सेवन करता हूं – उपासना करता हूं । आप सबको उपदेश करते हैं कि – ‘मैं सूर्यादि जगत् को बनाने और धारण करते वाला हूं, आप लोग मेरी उपासना किया करो, मेरी आज्ञा में चला करो ।’ हे भगवान् ! इसलिए हम आपकी स्तुति करते हैं ।
भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः ।
भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम ॥ ३ ॥
भावना - हे ईश्वर ! आप भजनीय स्वरूप, सबके उत्पादक और सत्याचार में प्रेरक हैं । आप ऐश्वर्यप्रद हैं । आप सत्य धन को देनेवाले हैं । आप सत्याचरण करनेवालों को ऐश्वर्य देनेवाले हैं । हे परमेश्वर ! आप हमें प्रज्ञा का दीजिए । प्रज्ञा के दान से आप हमारी रक्षा कीजिए । आप हमारे लिए गाय, अश्व आदि उत्तम पशुओं के योग से राज्य-श्री को उत्पन्न कीजिए । आपकी कृपा से हम लोग उत्तम मनुष्य बनें, वीर बनें ।
उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्‌नाम्‌ ।
उतोदिता मघवन्त्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम ॥ ४ ॥
भावना - हे ईश्वर ! आपकी कृपा से और अपने पुरुषार्थ से हम लोग इसी समय – प्रातःकाल में तथा दिनों के मध्य में प्रकर्षता अर्थात् उत्तमता प्राप्त करें, ऐश्वर्ययुक्त और शक्तिमान् होवें । हे परम पूजित ! आप असंख्य धन देनेवाले हो । आप हम पर कृपा कीजिए कि हम सूर्यलोक के उदय काल में पूर्ण विद्वान् धार्मिक आप्त लोगों की अच्छी उत्तम प्रज्ञा और सुमति में सदा प्रवृत्त रहें ।
भग एव भगवां अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम ।
त्वं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुर एता भवेह ॥ ५ ॥
भावना - हे जगदीश्वर ! आप सकल ऐश्वर्य सम्पन्न हैं । इसलिए सब सज्जन आपकी निश्चय करके प्रशंसा – स्तुति करते हैं । आप ऐश्वर्यप्रद हैं । इस संसार में तथा हम जिस किसी ब्रह्मचर्य, गृहस्थ आदि आश्रम में स्थित हैं, उसमें आप अग्रगामी और आगे-आगे सत्य कर्मों में बढ़ानेवाले हूजिए । आप सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त और समस्त ऐश्वर्य के दाता हैं । अतः आप ही हमारे ‘भगवान्’ – पूजनीय देव हूजिए । उसी हेतु से हम विद्वान् लोग सकल ऐश्वर्य सम्पन्न होके सब संसार के उपकार में तन-मन-धन से प्रवृत्त होवें । यही आपसे प्रार्थना है !
[नोट – यहां मन्त्र की 'भावना' स्वामी दयानन्द सरस्वती जी रचित ‘संस्कारविधिः’ के आधार पर संकलित कर प्रस्तुत की गई है । मन्त्र के शब्दों के अर्थ जानने के लिए ‘संस्कारविधिः’ का गृहाश्रम-प्रकरणम् द्रष्टव्य है । - भावेश मेरजा ]

Monday, June 12, 2017

ओंकार–स्तोत्र




*🌿🌿🌿🌿ओ३म्🌿🌿🌿🌿*
🌱🌹🌿🌺🌻🌹🌼🌺🍃🌹
*🌿🌺🌹ओंकार–स्तोत्र🌹🌺🌿*
*सुखे वा दुःखे वा परिषदि नृणां वाति विजने,*
*गृहे वा वाह्ये वा गिरि-सुशिखरे वा सुपुलिने।*
*दिने वा रात्रौ वा उषसि दिवसान्तेऽथ रमणे,*
*भजध्वं हे धीराः सुमति विमला ओं ह्रदि सदा।।1।।*
*अर्थ:* सुख में वा दुःख में, मनुष्यों की सभा में वा निर्जन स्थान में घर वा बाहर, पर्वत के सुन्दर शिखर पर या नदी के मनोहर तट पर, दिन में या रात्रि में, प्रातःकाल वा रमणीय सायंकाल में, हे सुमति से विमल, धैर्यशील विद्वान् पुरुषों ! तुम सदा ओम् की ही स्तुति, प्रार्थना और उपासना किया करो।
*रवौ चन्द्रे ज्योतिर्विविध–गण–रम्ये वियति च,*
*समीरेऽग्नौ भूमाविह निखिल–देहे स्वसुयुते।*
*वयं पश्यामस्ते शुभं–महिमानं समुदितं,*
*भजध्वं हे धीराः सुमति विमला ओं ह्रदिसदा।।2।।*
*अर्थ:* सूर्य में, चन्द्रमा में, विविध नक्षत्रगणों में, रमणीय आकाश में, वायु, अग्नि और भूमि में सुन्दर प्राणी संयुक्त अखिल शरीर में हम लोग आपकी ही सुभग महिमा को प्रकाशित देखते हैं। हे उत्तम बुद्धि वाले सज्जन पुरुषो ! तुम सदा इस ओम् की ही पूजा करने वाले बनो।
*स नो बन्धुः पाता भुवनमखिल यो रचयति,*
*प्रजानां संहारे पुनरपि स एवाति बलवान्।*
*तमेकं जानीध्वं सकल सुखदं, दुःख हरणं,*
*भजत्वं हे धीराः सुमति विमला ओं ह्रदि सदा।।3।।*
*अर्थ:* वही हम लोगों का बन्धु और पालक है, जो कि अखिल भुवन को रचता है और जो कि सब प्रजाओं का पालन एवं संहार भी करता है। हे पुरुषों ! तुम उसी एक प्रभु को जानो वही सब सुखों का दाता और सब के, सब प्रकार के दुःखों को हरण करने वाला है। हे विद्वानो ! तुम उसी 'ओम्' प्रभु का भजन करो।
*इमं देवं रुद्रं गणपतिमजं विष्णुमजरं,*
*सुपर्णं ब्रह्माणं शिविदतिमीशानमनघम्।*
*तमेक व्याचष्टे बहुविध सुनाम्ना कुशलधी,*
*मजध्वं हे धीराः सुमति विमला ओं ह्रदि सदा।।4।।*
*अर्थ:* इस एक देव को रुद्र, गणपति, अज, विष्णु, अजर, सुपर्ण, ब्रह्म, शिव, अदिति, ईशान, अनघ, आदि विविध नामों से विद्वान् लोग जानते और बखानते हैं। हे सज्जनों ! यह ओंकार ही भजन करने योग्य है। इसी का भजन करो।
*त्वमेकः पूज्योऽसि त्वमिह सदस्यत्वं हितकर,*
*त्वमेको ध्येयोऽसि त्वमसि रमणो योगि ह्रदये।*
*रमस्व त्वं चित्ते त्वमसि मम चित बहुमतं,*
*मजध्वं हे धीराः सुमति विमला ओं ह्रदि सदा।।5।।*
*अर्थ:* हे भगवान् ! तू ही पूज्य है। तू ही करुणाकर है। तू ही सबका हितकारी है। तू ही एक ध्येय है। योगियों के ह्रदयों में तेरा ही प्रकाश होता है। हे भगवन् ! मेरे चित्त में भी तू सदा ही विराजमान रहे। तू ही मेरा महान् धन है। हे धैर्यवान् विद्वानों आओ, इस ओंकार का भजन करके आत्म-कल्याण को प्राप्त करो।
*[श्री पं. शिवशंकरजी, काव्यतीर्थ कृत]*

Sunday, June 11, 2017

Aryasamaj and Social awakening



Aryasamaj and Social awakening
Dr. Vivek Arya

Swami Dayanand Saraswati(1824-1883), the founder of Aryasamaj clearly stated in the ten principles of Aryasamaj that the prime object of the Aryasamaj is to do good to the world, that is, to promote physical, spiritual and social good of everyone. This message was widely accepted by the followers of Aryasamaj. Aryasamaj indeed became the most active religious and social organization of 19th century which dedicated its heart and soul in the service of deprived sections of the society particularly the women as well as dalits. Taking cue from the life and teachings of Swami Dayanand many reforms of women empowerment and social justice were initiated. In this regard, the prominent stalwarts of Arya Samaj who came forward can be named as Swami Shraddhananda, Lala Lajpat Rai, Bhai Parmanand, Sant Ram B.A., Ram Chand Mahajan, Master Atmaram Amritsari, Mahatma Hansraj, Lala Ruliya Ram, Lala Ganga Ram, etc.


Swami Shraddhananda(1856-1926) pointed out that fundamental reasons for the poor plight of women and dalits were lack of education, early marriage leading to girls becoming widow while in their childhood, obnoxious practice of untouchability as well as poverty. In his work, 'Satyartha Prakash' Swami Dayanand has advocated compulsory education for all irrespective of caste, creed and religion. Based on a Shloka of Manusmriti, Swami Dayanand also emphasized that the state must punish those parents who do not send their children to educational institutions for learning. Swami Ji opined that in the school-gurukul, all the students were to be given equal facilities whether they are children of a king or that of a poor man. This secular idea of education was adopted by Swami Shraddhananda and given a practical shape even before starting of his political carrier. He was instrumental in starting Gurukul Kangri, Haridwar for Boys and Kanya Vidyalaya Jalandhar for Girls respectively. These models of education are live examples of social awakening. Soon, the awareness about education gained momentum throughout the country. Educating girls was considered a taboo in those days. However, with the pioneering efforts of Aryasamaj thousands of schools, colleges and Gurukuls for both boys and girls were opened especially in Northern India. Undoubtedly, the credit for pioneering the idea of educational movement goes to Maharishi Dayananda and followers of Aryasamaj.

Due to the death of a young husband, many girls used to become widows even before they had crossed their childhood age. The condition of the state of Bengal in this respect was particularly very bad. So much so that in those days, in the event of the death of an infant husband his so called infant wife still on breast feed would be declared as a widow. According to an estimate at that time there were about fifteen lakhs child widows in our country. Hence, Aryasamaj started campaign for the widow remarriage. Initially this reform movement was opposed by the narrow-minded orthodox Hindus. They considered widow remarriage as a sin. Facing all odds, Aryasamaj got success in its mission and gained public sympathy. The mind sets of masses started changing gradually. The lives of widows changed from hell to heaven. They womenfolk in India should particularly be indebted to Swami Dayanand and his Arya Samaj movement for bringing complete transformation in their life.


Among important pioneers who paved the way for stopping child marriage was Hari Singh Gour, who, through his repeated appeals to recognize the standards of modern clinical psychology, was able to get the law passed that raised the age of consent within marriage for girl children from 12 to 14. This war for raising the marriage age of women and prohibition of child marriage was carried on further by Harbilas Sarda. The Child Marriage Restraint Act, also known as the Sarda Act, was passed on October 1, 1929. Setting the minimum age for marriage for girls at 14 and boys at 18, it was a crowning glory for the social reform movement in India. The fight against child marriage and the triumph in increasing the legal marriage age of women were definitely the single greatest achievement of Arya Samaj towards gender equality and women empowerment.
Aryasamaj started a crusade against Untouchability - a social evil alien to ancient Vedic culture. However, due to mis-interpretation of the Varna Vyavastha loosely called as caste system particularly during the medieval period, a section of the Hindu population was mal-treated and graded as untouchables by the upper caste. These untouchables suffered lot of miseries at the hand of so called upper caste who believed in hereditary caste system. Swami Dayanand Saraswati who put the right perspective of Varna Vyavastha, said that the Varna was based on worth rather than birth and thus opened the doors for upward mobility of the persons born in so called lower castes. According to Prof.K.V. Paliwal says it was a common thing to change one's Varna during the Vedic period.
For ascending the social order flexibility has been shown even to a chandala and many examples can be cited from the scriptures. Mahabharta says "A man cannot be a brahmin on account of his family. Even a Chandal who exercises restraint and has a good conduct is a brahmin"(Mahabharata Van Parva). There are numerous instances of children of non-Brahmana parents attaining the status of Brahminhood by virtue of their merit, action, learning and temperament like Parashara who originally hailed from a chandala family became a Rishi. Swami Dayananda Saraswati in Chapter IV of his magnum opus Satyartha Prakasha says Sage Matunga belonged to a very low Chandala family but became Brahmana and called a Rishi". Likewise there are examples of downgrading a person for neglecting his prescribed duties like 'Trishanku', originaly a king was categorised as a Chandala.

Initially Swami Shraddhananda - a great Sanyasi of Arya Samaj, tried to create interest of Congress leaders in eradication of untouchability. Swami ji advised that all Congress members should employ Dalit persons for their household works for eradication of untouchability. His advised fell on deaf ears. He met a delegation of Dalits for their right to fetch water from community wells. Swami Ji proposed this matter before Congress leadership. However, Congress party at that time did not consider this proposal seriously beyond giving it a lip service. Swami Shraddhanand carried out a possession in Delhi. He marched to the community well for the right of dalits to fetch water without any discrimination.

As expected the high caste Hindus and Muslims resisted and threw stones and mud. Muslims pointed out that as Dalits pig flesh eaters so they were not allowed to draw water from the community well. Swami Shraddhananda announced that due to impact of Arya Samaj, many of the Dalits had stopped eating meat. In the end Dalits succeeded in getting their right to fetch water from the wells. Swami ji was hoping against hope that Congress would cooperate in this holy mission for Dalit upliftment. However, Swami ji was proved wrong.

In a letter written to Mahatma Gandhi is 1921 (September) Swami Shraddhananda drew the attention of the Mahatma to the fact that in Delhi and Agra Dalits were simply demanding their right to draw water from the wells used both by Hindus and Muslims and water served to them through bamboos pipes. Even here Congress Committee failed to accomplish this task. In a letter written In 1922 to Congress leader Vithalbhai Patel, Swami Shraddhanand mentioned that how Gandhiji had relegated the cause of Dalit upliftment to the background.

Swami Shraddhanand was also against the conversion of Dalits. In this regard, Dalit’s women especially became an easy prey. Swami Ji was very well informed about the attitude of Muslims towards Dalits. Ali brothers in Cocanada Congress session advised to divide Dalits into two parts. One part to Muslims and the other part for Hindus. Swami Shraddhanand criticized Ali Brothers for their divisive approach. Soon series of riots in all parts of the country especially in Moplah, Multan, Saharanpur and Kohat took place. It shattered Mahatma Gandhi’s dream of Hindu-Muslim unity. Swami Shraddhanda was annoyed by the deep silence of Mahatma Gandhi on such a crucial issue. He resigned from the congress and started Shuddhi and Hindu Sangthan movement. He proclaimed that if Muslims had a right to convert Hindus to their fold than Hindus also enjoyed full rights to defend themselves as well as bring back the lost brothers through Shuddhi. Swami ji brought back thousands of Malkana Rajputs who were converted forcibly in the past to the Hindu fold. He also advised Hindus to get united and form Hindu Sangthan to protect themselves.

Mahatma Gandhi opposed the Shuddhi and Sangthan movement carried out by Swami Shraddhananda. He wrote articles against Swami ji and Aryasamaj in Young India. Muslims got a supporter in the form of Gandhi. Their leaders started spitting venom against Aryasamaj especially Swami Shraddhanand. Provoked by such speeches Abdul Rashid killed Swami ji when he was lying on his bed due to illness. Swami Shraddhanda was paid tributes by none other than Dr. Ambedkar on his martyrdom who described him as ‘the greatest and the most sincere champion of Dalits'. Very few people know that it was Swami ji that coined the term Dalit.

Aryasamaj worked for social awakening under the British rule in our country. The British were alarmed. So much so that from Lucknow Sir Harcourt Butler, the Lieutenant Governor of Oudh and North West Provinces wrote to Sir Dunlop Smith in London that ‘Arya Samaj was a dangerous movement’. Why? Because it combined ‘an appeal to national feeling with a tendency to elevate the low castes’. Why? Because the women education was taken up by ‘Arya Samaj’ and ‘our position in the country will be almost hopeless, if the women are trained up in hostility to us’. There was historical precedent too, noted the colonial administrator, ‘Shivaji did that and so has every Hindu leader…’[iii]

It’s not difficult to conclude that, in spite of all obstacles, all opposition Aryasamaj contribution for social awakening of our country is an inspiring story. It is a matter of proud and glory. Sorry to say that none of the NCERT History book mentions about this inspiring and glorious chapter of Arya Samaj and its contribution towards Dalits' upliftment.. Hope such inspiring thoughts will get their due place in the History books.

References:

[i] Swami Shraddhanand, Inside the Congress: a collection of 26 articles, Vol.1, Dayanand Sansthan, 1984:reprint, p.134, pp.179-80
[ii] Mohandas Karamchand Gandhi, Navajivan, March 27, 1927
[iii] Sir James Robert Dunlop Smith, Edited by Martin Gilbert, Servant of India: A Study of Imperial Rule from 1905 to 1910 as Told Through the Correspondence and Diaries of Sir James Dunlop Smith, Longmans, 1966, p.97

सिख गुरु और यज्ञ





सिख गुरु और यज्ञ




प्रसिद्द क्रिकेट खिलाडी एवं राजनीतिज्ञ नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा अपने घर पर हवन-यज्ञ करवाया गया। कुछ सिखों ने उनका यह कहकर आलोचना करी कि हवन-यज्ञ का सिख पंथ में कोई स्थान नहीं हैं। हम अपने सिख भाइयों को अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित करवाना चाहते है कि सिख गुरुओं की हवन-यज्ञ में पूर्ण आस्था थी। स्मरण रहे कि गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा की स्थापना करते समय यज्ञ करने के पश्चात ही पञ्च प्यारों का आवाहन किया था।

सिख पंथ में यज्ञ (होम) का वैसा ही महत्त्व स्वीकार किया गया है जैसा कि हिंदू धर्म के अन्य वर्ग संप्रदायों में प्रचलित हैं।
गुरुवाणी में यज्ञ- महिमा का उल्लेख अनेकों स्थानों पर मिलता है जैसे


तित धोए "होम" जदा सद पूजा।
पइयै कारण सो है॥
(वार माफ म०१ गु०प्र० साहिब)

अर्थात्- इस घृत से हवन, यज्ञ और पूजा कार्य सुसंपन्न होता है।

होम जग उरब तप पूजा,
कोटि तीर्थ इसनान करीजा।
चरण कमल निमला रिदै धारे,
गोविंद जपत सभि कारज॥
(प्रभाती म०५गु०प्र०)

अर्थात्- पवित्र हवन, यज्ञ, तप, पूजा, तीर्थ स्नान आदि शुभकर्म मनुष्यों को करने चाहिए।

गुरुदास जी ने अपनी रचना ‘इकतालीसवीं बार’ में गुरु गोविंदसिंह से संबंधित संस्मरण में लिखा है-

निज फते बुलाई सति गुरु, कीनी उज्यारा।
झूठ कपट सब छिप गए, सब सज वरतारा॥
फिर जप "होम" ठहराए कर निज धर्म सँवारा।
तुर्क दुंद स्तभ उठ गयो, रुचियो जैकारा॥२८॥

अर्थात्- दसवें श्री गुरु गोविंदसिंह जी ने अपनी विजय की घोषणा की। अंधेरगर्दी समाप्त की, न्याय का प्रकाश फैलाया और हवन- यज्ञ का प्रचार किया।

चीफ खालसा दीवान के उपदेशक श्री हरनामसिंह ने अपनी पुस्तक ‘सच्ची मुहब्बत’ में लिखा है-

"यज्ञ" "होम" हीवना न हिंद में भूल पाता,
फूलते निशान नहीं आज हिंदुस्तान के॥
कहत हरनाम सिंह न इसमें झूठ जानो,
तीर जो न छूटते गोविंदसिंह जवान के॥

अर्थात्- यदि योद्धा गुरु गोविंदसिंह के तीर न छूटते तो यज्ञ, होम और धर्म के फलने- फूलने का चिह्न दिखाई न पड़ता।

नामधारी सिखों के ‘नित्यनियम गुटके’ में लिखा है- ‘‘साहिब गुरु गोविंदसिंह की हवन- यज्ञ के साथ ऐसी प्रीति थी कि आपने सवा लाख दमड़े की सामग्री एकत्र करके नैना देवी के मंदिर में हवन किया था।’’

‘पंथ प्रकाश निवास’ में भाई केशवदास जी ने गुरु गोविंदसिंह का अभिमत व्यक्त करते हुए लिखा है-

जब हम हवन यज्ञ करवै हैं,
खुश हो जल बहु बरसै हैं।
दुर्भिक्ष नसै अन्न बहु थैहै।
सुकृत सब करदे लग जैहै।
नसै अविद्या विद्या अईहै।
शूरवीरता दृढ़ प्रगटईहै।
वर्ण आगामी जन है जेते।
कायरता कर पर्ण तेते।
उन्हें हवन की पवन लगे जब।
शेर विघा उन से होइये सब।
प्रभुता देह आरोग्य क्रांति विजय।
ज्ञान संतति सुखदाती गुण सब।
बालक भाग्यवान प्रकटैहै।
रोग शीतला आदि नसैहै।
कामादि जो आसुरी संपत्ति।
यज्ञ को लखकर कंपति।
उत्तम गुण सत्यादिक जे है।
बावन कह वेद ऋग में है।
सो अवश्य जग में प्रकटे हैं।
होम यज्ञ विधिवत् जब ये हैं॥

उपर्युक्त पद सरल हैं। उनका भावार्थ समझने पर पता चलता है कि सिख धर्म के गुरुओं को यज्ञ- हवन में कितनी सघन आस्था थी।