Wednesday, February 26, 2014

सच्चे शिव के प्राप्त होने पर ही मनुष्य को आनंद की प्राप्ति होती है।


सच्चे शिव के प्राप्त होने पर ही मनुष्य को आनंद की प्राप्ति होती है। आज बोध दिवस शिवरात्रि का पावन पर्व ज्ञान, भक्ति और उपासना का दिवस है। महर्षि दयानंद सरस्वती का बोध दिवस 27 फरवरी को शिवरात्रि के दिन मनाया जाएगा। माना जाता है कि 176 साल पहले शिवरात्रि के तीसरे प्रहर में 14 वर्षीय बालक मूलशंकर के हृदय में सच्चे शिव को पाने की अभिलाषा जगी थी। शिव’ विद्या और विज्ञान का प्रदाता स्वरूप है परमात्मा का। इसी दिन मूलशंकर को बोद्ध-ज्ञान प्राप्त हुआ था और वह महर्षि दयानन्द सरस्वती बन सके।इस दिन को याद करते हुए दयानंद बोध दिवस के रूप में हर साल मनाया जाता है। शिवरात्रि का अर्थ है वह कल्याणकारी रात्रि जो विश्व को सुख, शांति और आनंद की प्राप्ति कराने वाली है। मनुष्य के जीवन में न जाने कितनी शिवरात्रियां आती हैं किन्तु उसे न ज्ञान होता है और न परमात्मा का साक्षात्कार, न उनके मन में सच्चिदानंद परमात्मा के दर्शन की जिज्ञासा ही उत्पन्न होती है। बालक मूलशंकर ने अपने जीवन की प्रथम शिवरात्रि को शिव मंदिर में रात्रि जागरण किया। सभी पुजारिओं और पिता जी के सो जाने पर भी उन्हें नींद नहीं आई और वह सारी रात जागते रहे। अर्ध रात्री के बाद उन्होंने शिव की मूर्ति पर नन्हे चूहे की उछल कूद करते व मल त्याग करते देखकर उनके मन में जिज्ञासा हुई की यह तो सच्चा शिव नहीं हो सकता … । जो शिव अपनी रक्षा खुद ना कर सके वो दुनिया की क्या करेगा और उन्होंने इसका जबाब अपने पिता व पुजारिओं से जानना चाहा लेकिन संतोषजनक उत्तर न मिल पाने के कारण उन्होंने व्रत तोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने 21 वर्ष की युवा अवस्था में घर छोड़ कर सच्चे शिव की खोज में सन्यास लेकर दयानंद बने व मथुरा में डंडी स्वामी विरजानंद के शिष्य बनने हेतु पहुचे । गुरू का द्वार खटखटाया तो गुरू ने पूछा कौन? स्वामी जी का उत्तर था कि यही तो जानने आया हूं। शिष्य को गुरू और गुरू को चिरअभिलाषित शिष्य मिल गया। तीन वर्ष तक कठोर श्रम करके वेद, वेदांग दर्शनों का अंगों उपांगों सहित अध्ययन किया और गुरु दक्षिणा के रूप में स्वयं को देश के लिए समर्पित कर दिया । इसके बाद आर्य समाज की स्थापना की। आज विश्व भर में अनेकों आर्यसमाज हैं जो महर्षि के सिद्धांतों, गौरक्षा और राष्ट्र रक्षा आदि के कार्यो में संलग्न है। महर्षि की जिंदगी का हर पहलु संतुलित और प्रेरक था। एक श्रेष्ठ इंसान की जिंदगी कैसी होनी चाहिए वे उसके प्रतीक थे। उनकी जिंदगी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। इस लिए उनके संपर्क में जो भी आता था, प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। वे रोजाना कम से कम तीन-चार घंटे आत्म-कल्याण के लिए ईश्वर का ध्यान करते थे। इसका ही परिणाम था कि बड़े से बड़े संकट के वक्त वे न तो कभी घबराए और न तो कभी सत्य के रास्ते से पीछे ही हटे। उनका साफ मानना था, सच का पालन करने वाले व्यक्ति का कोई दोस्त हो या न हो, लेकिन ईश्वर उसका हर वक्त साथ निभाता है। पूरे भारतीय समाज को वे इसी लिए सच का रास्ता दिखा सके, क्योंकि उन्हें ईश्वर पर अटल विश्वास था और वे हर हाल में सत्य का पालन करते थे। वे कहते थे, इंसान द्वारा बनाई गयी पत्थर की मूर्ति के आगे सिर न झुकाकर भगवान की बनाई मूर्ति के आगे ही सिर झुकाना चाहिए। हम जैसा विचार करते हैं हमारी बुद्धि वैसे ही होती जाती है। पत्थर की पूजा करके कभी जीवंत नहीं बना जा सकता है। वे स्त्रियों को मातृ-शक्ति कहकर सम्मान करते थे। दयानंद जी ने लोगों को समझाया कि तीर्थों की यात्रा किए बिना भी हम अपने हृदय में सच्चे ईश्वर को उतार सकते हैं। उन्होंने जाति-पाति का घोर विरोध किया तथा समाज में व्याप्त पाखण्डों पर भी डटकर कटाक्ष किए। जाति-पाति और वर्ण व्यवस्था को व्यर्थ करार दिया और कहा कि व्यक्ति जन्म के कारण ऊँच या नीच नहीं होता। व्यक्ति के कर्म ही उसे ऊँच या नीच बनाते हैं । समाज को हर बुराई, कुरीति, पाखण्ड एवं अंधविश्वास से मुक्ति दिलाने के लिए डट कर सत्य बातों का का प्रचार-प्रसार किया, उनकी तप, साधना व सच्चे ज्ञान ने समाज को एक नई दिशा दी और उनके आदर्शों एवं शिक्षाओं का मानने वालों का बहुत बड़ा वर्ग खड़ा हो गया। महर्षि दयानंद जी की बातें आज भी उतनी ही कारगर और महत्वपूर्ण हैं, जितनी की उस काल में थीं । यदि मानव को सच्चे ईश्वर की प्राप्ति चाहिए तो उसे महर्षि दयानंद जी के मार्ग पर चलते हुए उनकी शिक्षाओं एवं ज्ञान को अपने जीवन में धारण करना ही होगा। महर्षि दयानंद जी के चरणों में सहस्त्रों बार साष्टांग नमन।।
डॉ विवेक आर्य

Monday, February 24, 2014

ईश्वर के संबंध में महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के विचार



मदन शर्मा

चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा जिससे अनेक ईश्वर सिद्ध हों। किन्तु यह तो लिखा है कि ईश्वर एक है। देवता दिव्य गुणों के युक्त होने के कारण कहलाते हैं जैसा कि पृथ्वी, परन्तु इसको कहीं ईश्वर तथा उपासनीय नहीं माना है।जिसमें सब देवता स्थित हैं, वह जानने एवं उपासना करने योग्य देवों का देव होने से महादेव इसलिये कहलाता है कि वही सब जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्ता, न्यायाधीश, अधिष्ठाता है।

ईश्वर दयालु एवं न्यायकारी है। न्याय और दया में नाम मात्र ही भेद है, क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से।

दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंध होकर दुखों को प्राप्त न हो, वही दया कहलाती है। जिसने जैसा जितना बुरा कर्म किया है उसको उतना है दण्ड देना चाहिये , उसी का नाम न्याय है। जो अपराध का दण्ड न दिया जाय तो न्याय का नाश हो जाय। क्योंकि एक अपराधी को छोड़ देने से सहस्त्रों धर्मात्मा पुरुषों को दुख देना है। जब एक को छोड़ने से सहस्त्रों मनुष्यों को दुख प्राप्त होता हो तो वह दया किस प्रकार हो सकती है? दया वही है कि अपराधी को कारागार में रखकर पाप करने से बचाना। निरन्तर एवं जघन्य अपराध करने पर मृत्यु दण्ड देकर अन्य सहस्त्रों मनुष्यों पर दया प्रकाशित करना।

संसार में तो सच्चा झूठा दोनों सुनने में आते हैं। किन्तु उसका विचार से निश्चय करना अपना अपना काम है। ईश्वर की पूर्ण दया तो यह है कि जिसने जीवों के प्रयोजन सिद्ध होने के अर्थ जगत में सकल पदार्थ उत्पन्न करके दान दे रक्खे हैं। इससे भिन्न दूसरी बड़ी दया कौन सी है? अब न्याय का फल प्रत्यक्ष दीखता है कि सुख दुख की व्याख्या अधिक और न्यूनता से प्रकाशित कर रही है। इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सबको सुख होने और दुख छूटने की इच्छा और क्रिया करना है वह दया और ब्राह्य चेष्टा अर्थात बंधन छेदनादि यथावत दण्ड देना न्याय कहलाता है। दोनों का एक प्रयोजन यह है कि सब को पाप और दुख से प्रथक कर देना।

ईश्वर यदि साकार होता तो व्यापक नहीं हो सकता। जब व्यापक न होता तो सर्वाज्ञादि गुण भी ईश्वर में नहीं घट सकते। क्योंकि परिमित वस्तु में गुण, कर्म, स्वभाव भी परिमित रहते हैं तथा शीतोष्ण, क्षुधा, तृष्णा और रोग, दोष, छेदन, भेदन आदि से रहित नहीं हो सकता। अतः निश्चित है कि ईश्वर निराकार है। जो साकार हो तो उसके नाक, कान, आँख आदि अवयवों को बनाने वाला ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरा होना चाहिये। क्योंकि जो संयोग से उत्पन्न होता हो उसको संयुक्त करने वाला निराकार चेतन आवश्य होना चाहिये। कोई कहता है कि ईश्वर ने स्वैच्छा से आप ही आप अपना शरीर बना लिया। तो भी यही सिद्ध हुआ कि शरीर बनाने के पूर्व वह निराकार था। इसलिये परमात्मा कभी शरीर धारण नहीं करता। किन्तु निराकार होने से सब जगत को सूक्ष्म कारणों से स्थूलाकार बना देता है।

सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि ईश्वर अपने काम अर्थात उत्पत्ति, पालन, प्रलय आदि और सब जीवों के पाप पुण्य की यथा योग्य व्यवस्था करने में किंचित भी किसी की सहायता नहीं लेता अर्थात अपने अनंत सामर्थ्य से ही सब अपना काम पूर्ण कर लेता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है की परमेश्वर वह सब कर सकता है जो उसे नहीं करना चाहिये। जैसे- अपने आपको मारना, अनेक ईश्वर बनाना, स्वयं अविद्वान, चोरी, व्यभिचारादि पाप कर्म कर और दुखी भी हो सकना। ये काम ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव से विरूद्ध हैं।

ईश्वर आदि भी है और अनादि भी। ईश्वर सबकी भलाई एवं सबके लिये सुख चाहता है परन्तु स्वतंत्रता के साथ किसी को बिना पाप किये पराधीन नहीं करता।

ईश्वर की स्तुति प्रार्थना करने से लाभः- स्तुति से ईश्वर से प्रीति, उसके गुण, कर्म, स्वभाव से अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुधारना। प्रार्थना से निरभयता, उत्साह और सहाय का मिलना। उपासना से परब्रह्म से मेल और साक्षात्कार होना।

ईश्वर के हाथ नहीं किन्तु अपने शक्ति रूपी हाथ से सबका रचन, ग्रहण करता। पग नहीं परन्तु व्यापक होने से सबसे अधिक वेगवान। चक्षु का गोलक नहीं परन्तु सबको यथावत देखता। श्रोत नहीं तथाकथित सबकी बातें सुनता। अंतःकरण नहीं परन्तु सब जगत को जानता है और उसको अवधि सहित जानने वाला कोई भी नहीं। उसको सनातन, सबसे श्रेष्ठ, सबमें पूर्ण होने से पुरुष कहते हैं। वह इन्द्रियों और अंतःकरण के बिना अपने सब काम अपने सामर्थ्य से करता है।

न कोई उसके तुल्य है और न उससे अधिक। उसमें सर्वोत्तम शक्ति अर्थात जिसमें अनंत ज्ञान, अनंत बल और अनंत क्रिया है। यदि परमेश्वर निष्क्रिय होता तो जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय न कर सकता। इसलिये वह विभू तथापि चेतन होने से उस क्रिया में भी है।

ईश्वर जितने देश काल में क्रिया करना उचित समझता है उतने ही देशकाल में क्रिया करता है। न अधिक न न्यून क्योंकि वह विद्वान है।

परमात्मा पूर्ण ज्ञानी है, पूर्ण ज्ञान उसे कहते हैं जो पदार्थ जिस प्रकार का हो उसे उसी रूप में जानना।

परमेंश्वर अनंत है। तो उसको अनंत ही जानना ज्ञान, उसके विरुद्ध अज्ञान अर्थात अनंत को सांत और सांत को अनंत जानना भ्रम कहलाता है। यथार्थ दर्शन ज्ञानमिति, जिसका जैसा गुण, कर्म, स्वभाव हो उस पदार्थ को वैसा जानकर मानना ही ज्ञान और विज्ञान कहलाता है और उससे उल्टा अज्ञान।

ईश्वर जन्म नहीं लेता, यदुर्वेद में लिखा है ‘अज एकपात्’ सपथर्यगाच्छुक्रमकायम।

यदा यदा…………..सृजाम्यहम्।

यह बात वेद विरुद्ध प्रमाणित नहीं होती। ऐसा हो सकता है कि श्रीकृष्ण धर्मात्मा धर्म की रक्षा करना चाहते थे कि मैं युग युग में जन्म लेके श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों का नाश करूँ तो कुछ दोष नहीं। क्योंकि ‘परोपकाराय सतां विभूतयः’ परोपकार के लिये सत्पुरुषों का तन, मन, धन होता है। किन्तु इससे श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं हो सकते।

वेदार्थ को न जानने, सम्प्रदायी लोंगो के बहकावे और अपने आप अविद्वान होने से भ्रमजाल में फँसके ऐसी ऐसी अप्रमाणिक बातें करते और मानते हैं।

जो ईश्वर अवतार शरीर धारण किये बिना जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करता है उसके लिये कंस और रावणादि एक कीड़ी के समान भी नहीं हैं। वह सर्वव्यापक होने से कंस रावणादि के शरीर में भी परिपूर्ण हो रहा है। जब चाहे उसी समय मर्मच्छेदन कर नाशकर सकता है। भला वह अनंत गुण, कर्म स्वभावयुक्त परमात्मा को एक शूद्र जीव को मारने के लिये जन्म मरण युक्त कहने वाले को मूर्खपन से अन्य कुछ विशेष उपमा मिल सकती है और जो कोई कहे कि भक्तजन के उद्धार करने के लिये जन्म लेता है तो भी सत्य नहीं है। क्योंकि जो भक्तजन ईश्वर की आज्ञानुकूल चलते हैं उसके उद्धार करने का पूरा सामर्थ्य ईश्वर में है। क्या ईश्वर पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रादि जगत के बनाने से कंस रावाणादि का वध और गोवर्धनादि का उठाना बड़े कार्य हैं।

जो कोई इस सृष्टि में परमेश्वर के कर्मों का विचार करे तो ‘न भूतो न भविष्यति’ ईश्वर के सद्श्य न कोई है न होगा। इस युक्ति से भी ईश्वर का जन्म सिद्ध नहीं होता। जैसे कोई अनंत आकाश को कहे कि गर्भ में आया और मुठ्ठी में भर लिया, ऐसा कहना कभी सच नहीं हो सकता। क्योंकि आकाश अनंत और सब में व्यापक है इससे न आकाश बाहर आता और न भीतर जाता, वैसे ही अनंत सर्वव्यापक परमात्मा के होने से उसका आना जाना कभी सिद्ध नहीं हो सकता। आना और जाना वहाँ हो सकता है जहाँ न हो। क्या परमेशवर गर्भ में व्यापक नहीं था जो कहीं से आया और बाहर नहीं था जो भीतर से निकला। ऐसा ईश्वर के विषय में कहना और मानना विद्याहीनों के सिवाय कौन कह और मान सकेगा। इसलिये परमेश्वर का आना जाना और जन्म-मरण कभी सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिये ईसा आदि को ईश्वर का अवतार नहीं समझना चाहिये। वे राग, द्वेष, क्षुधा, तृष्णा, भय, शोक, दुख, सुख, जन्म,मरण आदि गुणायुक्त होने से मनुष्य थे।

ईश्वर पाप क्षमा नहीं कर सकता। ऐसा करने से उसका न्याय नष्ट हो जाता है और मनुष्य क्षमा दान मिलने की आशा से महापापी बन सकता है। तथा वह निर्भय एवं उत्साह पूर्वक पाप कर्म करने में संलग्न हो जायगा।

जिस प्रकार अपराधी को यह भरोसा हो जाय कि कानून के द्वारा उसके अपराध करने पर कोई सजा नहीं मिल सकती तो वह निर्भय पूर्वक अपराध करता है।

सभी प्रणियों को कर्मानुसार फल देना ईश्वर का कार्य है, क्षमा करना नहीं। मनुष्य अपने कर्मों में स्वतंत्र एवं ईश्वर की व्यवस्था में परतंत्र है।

मजदूर ने पहाड़ से लोहा निकाला, दुकानदार ने खरीदा, लौहार ने तलवार बनाई, सिपाही ने तलवार ली, उसने किसी को मार दिया। अब अपराधी लोहे का निकालने वाला मजदूर, खरीदने वाला दुकानदार और बनाने वाला लौहार नहीं होगा। बल्कि केवल वह सिपाही होगा जिसने किसी की हत्या की। इसलिये शरीर आदि की उत्पत्ति करने वाला ईश्वर व्यक्ति के कार्यों का भोक्ता नहीं होगा। क्योंकि कर्म करने वाला परमेशवर नहीं होता। यदि ऐसा होता तो क्या किसी को पाप करने की प्रेरणा देता। अतः मनुष्य कार्य करने के लिये स्वतंत्र है। उसी तरह ईश्वर भी कर्मानुसार फल देने के लिये स्वतंत्र है।

जीव और ईश्वर दोंनो चेतन स्वरूप हैं। स्वभाव दोनों का पवित्र, अविनाशी एवं धार्मकिता आदि है। परन्तु परमेश्वर के सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, सबको नियम में रखना, जीवों का पाप पुण्य के फल देना आदि धर्मयुक्त कार्य हैं। और जीव में पदार्थों को पाने की अभिलाषा (इच्छा), द्वेष दुखादि की अनिच्छा, बैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, बल, (सुख) आनन्द, (दुख) विलाप, अप्रसन्नता, (ज्ञान) विवेक पहचानना ये तुल्य हैं। किन्तु वैशेषिक में प्राण वायु को बाहर निकालना, फिर उसे बाहर से भीतर लेना, (निमेष) आँख को मींचना, (उन्मेष) आँखों को खोलना, (जीवन) प्राण धारण करना, (मनन) निश्चय स्मरण अहंकार करना, (गति) चलना, (इन्दिय) सब इन्दियों को चलाना, (अंतर्विकार) भिन्न-भिन्न सुधा, तृष्णा, हर्ष, शोकादि युक्त होना, ये जीवात्मा के गुण परमात्मा से भिन्न हैं।

ईश्वर को त्रिकालदर्शी कहना मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं। क्योंकि जो ईश्वर होकर न रहे वह भविष्यकाल कहलाता है। क्या ईश्वर को कोई ज्ञान रहके नहीं रहता? तथा न होके होता है? इसलिये परमात्मा का ज्ञान एक रस अखण्डित वर्तमान रहता है। भूत, भविष्यत् जीवों के लिये है। जीवों के कर्म की अपेक्षा से त्रिकालज्ञाता ईश्वर में है, स्वतः नहीं। जैसा स्वतंत्रता से जीव करता है, वैसा ही सर्वज्ञता से ईश्वर जानता है और जैसा ईश्वर जानता है वैसा जीव करता है अर्थात् भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञान और फल देने में ईश्वर स्वतंत्र और जीव किंचित वर्तमान और कर्म करने में स्वतंत्र है। ईश्वर का अनादि ज्ञान होने से जैसा कर्म का ज्ञान है वैसा ही दण्ड देने का भी ज्ञान अनादि है। दोनों ज्ञान उसके सत्य हैं। क्या कर्म ज्ञान सच्चा और दण्ड ज्ञान मिथ्या कभी हो सकता है। इसलिये इसमें कोई भी दोष नहीं आता।

परमेश्वर सगुण एवं निर्गुण दोनों है। गुणों से सहित सगुण, गुणों से रहित निर्गुण। अपने अपने स्वाभाविक गुणों से सहित और दूसरे विरोधी के गुणों से रहित होने से सब पदार्थ सगुण और निर्गुण हैं। कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है जिसमें केुवल निर्गुणता या केवल सगुणता हो। किन्तु एक ही में निर्गुणता एवं सगुणता सदा रहती है। वैसे ही परमेश्वर अपने अनंत ज्ञान बलादि गुणों से सहित होने से सगुण रूपादि जड़ के तथा द्वेषादि के गुणों से प्रथक होने से निर्गुण कहलाता है। यह कहना अज्ञानता है कि निराकार निर्गुण और साकार सगुण है।

परमेश्वर न रागी है, न विरक्त। राग अपने से भिन्न प्रथक पदार्थों में होता है, सो परमेश्वर से कोई पदार्थ प्रथक तथा उत्तम नहीं है, अतः उसमें राग का होना संभव नहीं है। और जो प्राप्त को छोड़ देवे उसको विरक्त कहते हैं। ईश्वर व्यापक होने से किसी पदार्थ को छोड़ ही नहीं सकता। इसलिये विरक्त भी नहीं है।

ईश्वर में प्राणियों की तरह की इच्छा नहीं होती।

जो स्वयंभू, सर्वव्यापक, शुद्ध, सनातन, निराकार परमेश्वर है वह सनातन जीवरूपी प्रजा के कल्याणार्थ यथावत् रीतिपूर्वक वेद द्वारा सब विद्याओं का उपदेश करता है।

परमेश्वर के सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक होने से जीव को अपनी व्याप्ति से वेदविद्या के उपदेश करने में कुछ भी मुखादि की अपेक्षा नहीं है। क्योंकि मुख जिव्हा से वर्णोंच्चारण अपने से भिन्न को बोध होने के लिये किया जाता है, कुछ अपने लिये नहीं। क्योंकि मुख जिव्हा के व्यावहार करे बिना ही मन के अनेक व्यावहारों का विचार और शब्दोंच्चारण होता रहता है। कानों का उँगुलियों से मूँद कर देखो, सुनों कि बिना मुख जिव्हा ताल्वादि स्थानों के कैसे कैसे शब्द हो रहे हैं?

जब परमात्मा निराकार, सर्वव्यापक है तो अपनी अखिल वेद विद्या का उपदेश जीवस्थ स्वरूप से जीवात्मा में प्रकाशित कर देता है। फिर वह मनुष्य अपने मुख से उच्चारण करके दूसरे को सुनाता है। इसे ही वेद ज्ञान कहते हैं जो समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए ईश्वर द्वारा दिया गया हैं.

Sunday, February 23, 2014

Contribution of Swami Dayanand to Hindu Society

CONTRIBUTIONS OF SWAMI DAYANAND TO HINDU SOCIETY
 
 
1. Swami Dayanand, Yug Pravartak / Yug Drashta, Founder of Arya Samaj, rebuilt the entire Indian nation & HINDU Society in a NEW Mould where every Hindu & Arya had to believe firmly that this country ” BHARAT” is their own land & No person of FOREIGN BIRTH could ever become HEAD of its affairs in any way.

2. He believed & proved that in our Vedas there was no such thing as Untouchability . He & through his Arya Samaj succeeded in launching a Great movement against Untouchability which was followed up & taken up by Gandhiji & Congress in a BIG way during our Freedom struggle & post -independence.

3. Child Marriages : In Maharishi Dayanand’s days, the child marriages were a very common factor. Maharishi Dayanand & his Arya Samaj propagated against this curse from our Hindu Society. Even now , it is prevalent in certain regions & amongst backward Hindus.

4. Maharishi Dayanand & its Arya Samaj launched yet another related curse of Hindu Society , namely, marrying more than one wife or Polygamy: Arya Samaj through “Magic Lantern ” Arya Pracharaks who travelled widely deep into the villages & towns successfully removed this evil from our Hindu society. (Subsequently, it was lawfully abolished under Hindu Code bill ).Still there are examples of this curse of Polygamy amongst our Hindus, which is spreading like a menace which requires to be controlled at all levels, specially our Politicians & Affluent class require some Ved Prachar for it.

5.AryaSamaj successfully fought with the orthodox Brahmin Community & established that there was No example in the Vedas to worship the idol as God is Omnipotent, Omnipresent and formless, once it is omnipresent, it cannot be confined under lock & key any where NOR evn in their so called Temples which have become Nothing more that “Religious shops ” for the pandits.

6. Dayanand preached & pleaded with the Orthodox Hindu Community to return to Vedas in true sense & to follow its dictates. He organized to obtain the Original Vedas from Germany & translated them in simple Sanskrit & Hindi along with his famous Book , ” Rigveda Bhashya” , “Solah Sanaskars”etc.

7. Swami Dayanand propagated that all people are born equal & No one is Brahmin, Vaishya, Shatriya or Shudra by birth , but these are according to the profession one chooses and each of these sects are complimentary to each other & None is superior or inferior to the other.

8.Dayanand infused a thought amongst our Hindu Society that the West has not contributed anything towards the emancipation of our Country’s welfare, rather the West owe to us for everything, every progress which they unjustifiably claim of theirs, including the invention of “Zero”.

9. Dayanand strongly believed in a National Religion , based on intense dedicated, true, selfless, fearless nationalism , a thought which he propagated amongst all the Hindus of India, preparing for Self-Rule & Freedom, based on equality ; its details are enshrined in " Sstyarth Prakash” by Maharishi Dayanand Saraswati. This was his life’s greatest mission

10. Brought about widows re-marriages amongst the Hindus.

11. Pleaded & Stopped the most barbaric & most orthodox “Sati- Pratha” amongst the Hindus of our country.

12. Dayanand & Its Arya Samaj hit hard on the Blind faiths of Hindu Society & awakened them of these fake/ false Blind faiths which were spread amongst Hindu Society falsely by various orthodox Hindu organizations.

13. Shuddhi Prachaar of Dayanand Saraswati & Arya Samaj was & still the Greatest contribution to Hindu Society , thereby bringing back our brothers & sisters whom we had lost to other religions owing to our orthodox beliefs.

14. Spread of education to all irrespective of one being a boy or girl, of being a Brahmin or of other so called castes. Dayanand & its Arya Samaj played its greatest role in starting women’s Education every where in India & to every one irrespective of Caste,Creed, Sex etc.

15. In the field of Education again Maharishi Dayanand played its greatest role in strengthening Hindu Society.

16. Dayanand’s Arya Samaj opened its First Orphanage in Firozepore , followed by a chain of Orphanages all over the country so that our orphans may not adopt other religions like Islam or Christianity.

17. In the same way, Dayanand’s Arya Samaj opened Homes for the widows & Destitude womens to accommodate , train them in some useful profession & to get them married to suitable partners in course.

18. Dayanand / Arya Samaj succeeded in removing the Pardha System from our Hindu Society and Brought Hindu women at par with men-folk.

19.Dayanand launched a movement successfully that studying of Sanskrit , Vedas & Upnishidas is Not restricted to Brahamins alone but every caste had equal Rights to study these including women-folk .

20. Dayanand & its Arya Samaj gave Rights to wear Yagopaveet to every Hindu irrespective of one’s birth.

21. In those days, any Hindu Travellers overseas, had to undergo penance & give away a lot of gifts to Orthodox Brahmins for allowing them to re-admit to Hindu Dharma, but Dayanand got rid of such ills from Orthodox Hindu Society.

22. Maharishi Dayanand Saraswati, first time, told the Hindu Society the difference of the meaning of good Governance & “own Independent Rule ” & instigated people to demand self /own independent rule & to throw away the foreign yoke of slavery of the Britrishers. Maharishi Dayanand was the First Indian who announced for the First Time that Bharatvarsh is only of Bharatvasies & we should have our own Self Independent Rule.

23. Maharishi Dayanand & its Arya Samaj emphasized on Swadeshi & patronising of Swadeshi Products only amongst all the Hindu Community .

24 . If Hindi remained the main stay of our freedom struggle, it was because of Maharishi Dayanand , even today, Dayanand’s Arya Samaj can take this credit for the Promotion of Hindi as a National language all over the country .

25. Dayanand & its Arya Samaj gave to Hindu Orthodox Society , great thinkers, National Leaders & Revolutionaries like : Lala Lajpat Rai, Lokmanya Bal Gangadhar Tilak, Bipin Chandra Pal, Shri Arvind Ghosh, Bhai Parmanand, Bhai Shyamji Krishna Verma, Bhagat Singh, Ram Prasad Bismil, Bhai Bal Mukund, Madanlal Dhingra,Madan Mohan Malviye, Swami Shraddhanand & Pandit Lekhram & others as well as Most of the revolutionaries, who defacto brought about our Independence .

26. Dayanand & Arya Samaj always believe that begging is a worst thing , it is never liked by any one , rather it demoralizes the beggar, hence Dayanand insisted the Hindu Society as a whole to stand on its own feet , on its own good deeds & to come forward to sacrifice one’s life for the Nation .

27. Hindu Women have to pay back to Swami Dayanand Saraswati the Greatest , if he had not come forward to improve their Social Rights, rights to educate themselves, right to read Vedas , Upnishads, Remarriages , equal rights as per men’s , abolition of Dowry system, equal opportunity to select their partners etc.the Indian womens could never have attained their emancipation & would have remained as backword as Muslim women of the world.

And Many- many more Contributions of Arya Samaj to the Hindu Society
 
Dr Vivek Arya

Thursday, February 20, 2014

महाभारत में यज्ञ में पशु बलि का निषेध

हमारे कुछ मित्र अज्ञानता वश माँसाहार का समर्थन करने के लिए महाभारत के कुछ प्रमाण देते हैं जिसमें यज्ञ आदि में पशुबलि का वर्णन होता हैं। स्वामी दयानंद के अनुसार रामायण, महाभारत, मनु स्मृति पुराण आदि में जो कुछ वेदानुकूल हैं वह मान्य हैं एवं जो कुछ वेद विरुद्ध हैं वह त्यागने योग्य हैं। इस लेख में प्रसिद्द वैदिक विद्वान एवं अथर्ववेद भाष्यकार श्री विश्वनाथ जी विद्यालंकार जी द्वारा लिखित पुस्तक वैदिक पशु यज्ञ मीमांसा से महाभारत में यज्ञ में पशु बलि का निषेध करने वाले प्रमाणों का संग्रह किया गया हैं। पाठक लाभान्वित होगे यही आशय हैं।










Monday, February 17, 2014

‘धर्म प्रचार’ – पण्डित लेखराम जी आर्य पथिक

‘धर्म प्रचार’ – पण्डित लेखराम जी आर्य पथिक

पंडित लेखराम शहीदी दिवस 6 मार्च के अवसर पर पंडित जी के लेखों का संग्रह “कुलयात आर्य मुसाफिर” से उनका प्रसिद्द लेख धर्म प्रचार प्रकाशित किया जा रहा हैं। यह लेख पंडित जी द्वारा 1890 के दशक लिखा गया था। यह लेख भारत देश में विधर्मी मत के इतिहास और उनके समाधान को एतिहासिक प्रमाण देकर हमें मार्ग दर्शन देता हैं। पंडित जी को सच्ची श्रद्धान्जलि उनके मिशन और उनके अंतिम सन्देश “तहरीर (लेखन) और तकरीर(शास्त्रार्थ) का कार्य बंद नहीं होना चाहिए” को यथार्थ करके ही होगी। आज के युवा देश का भविष्य हैं। आशा हैं पंडित जी के जीवन से धर्म, जाति और देश की सेवा का सभी युवा आज के दिन संकल्प लेगे।
धर्म प्रचार
हमारी आर्य जाति अविद्यान्धकार की निद्रा में सो गई है। अब इसे जागते हुए संकोच होता है कहां वह ऋषि मुनियों का पवित्र युग और कहाँ उनकी वर्तमान संतति की यह दुर्गति। त्राहि माम् त्राहि माम्।
प्रिय‌ भाईयो ! 4990 वर्ष हुए जबकि महाराजा युधिष्ठर का चक्रवर्ती धर्मराज पृथ्वी में वर्त्तमान था। उस समय कोई मुसलमान, कोई ईसाई, कोई बौद्ध, कोई जैन इस भारतवर्ष में विद्यमान नहीं था।प्रत्युत सारे संसार में भी कहीं उनका चिन्ह तक न था। समस्त प्रजा वैदिकधर्म और शास्त्रोक्त कर्म में संलग्न थी।सदियों पश्चात जब अविद्या के कारण मद्यमाँस, व्याभिचार आदि इस देश में बढ़ने लगा।तब 2490 वर्ष बीते कि नेपाल प्रान्त में एक साखी सिंह नामक व्यक्ति ने जो नास्तिक था बुद्धमत चलाया।राजबल भी साथ था। उसी लोभ से बहुत से पेट पालक ब्राह्मण उसके साथ हो गए जिससे बुद्धमत सारे भारत में फैल गया। काशी, कश्मीर, कन्नौज के अतिरिक्त कोई नगर भारत में ऐसा न रहा जो बौद्ध न हो गया हो।जब यह मत बहुत बढ़ गया और लोग वेदधर्म से पतित हुए। यज्ञोपवीत आदि संस्कार छोड़ बैठे।तब दो सौ वर्ष के लगभग हुए कि एक महात्मा शंकर स्वामी (जिसे लोग स्वामी शंकराचार्य भी कहते हैं) ने कटिबद्ध हो शिष्यों सहित बौद्धों से शास्त्रार्थ करने आरम्भ किये। भला नास्तिक लोगों के हेत्वाभास वेद शास्त्रज्ञ के सम्मुख क्या प्रभाव डाल सकते थे ?
एक दो प्रसिद्ध स्थानों पर विजयी होने के कारण शंकर स्वामी का सिंहनाद दूर 2 तक गुंजायमान हो उठा। बहुत से राजाओं ने वैदिक धर्म स्वीकार कर लिया। दस बारह वर्ष में ही शंकराचार्य के शास्त्राथों के कारण समस्त देश के बौद्धों में हलचल मच गई। शंकराचार्य के शास्त्रार्थों में यह शर्तें होती थीं कि :-
(1) जो पराजित हो अर्थात शास्त्रार्थ में हारे वह दूसरे का धर्म स्वीकार करे।
(2) यदि साधू हो तो संन्यासी का शिष्य हो जाए।
(3) यदि यह दोनों बातें स्वीकार नहीं तो आर्यावर्त देश छोड़ जाये।
इन तीन नियमों के कारण करोड़ों बौद्ध और जैन पुनः वैदिक धर्म में आए और प्रायश्चित किया। उनको शंकर स्वामी ने गायत्री बताई। यज्ञोपवीत पहनाए। जो बहुत हठी थे और पक्षपात की अग्नि में जल रहे थे। इस प्रकार के लाखों व्यक्ति आर्यावर्त्त से निकल गए।राजाओं की ओर से कश्मीर, नैपाल, केपकुमारी, सूरत, बंगाल आदि भारत के सीमान्त स्थानों पर संन्यासियों के मठ बनाए गए और वहाँ सेना भी रही जिससे बौद्ध वापिस न आ सकें।
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि भारत, जिससे व‌ह धर्म उत्पन्न हुआ और एक समय ऐसा भी आया जबकि सारा भारत बौद्ध था परन्तु अब उस भारत में उस मत का व्यक्ति भी दृष्टिगोचर नहीं होता।| भारत के चारों ओर लंका, ब्रह्मा, चीन, जापान, रूस, अफगानिस्तान, बलोचिस्तान आदि में करोडों बौद्ध हैं। जैनी अब भी भारत में बहुत न्यून अर्थात् 6-7 लाख हैं। यह लोग छिप छिप कर कहीं गुप्तरूप से रह गए। महात्मा शंकराचार्य जी 32 वर्ष की अवस्था में परलोक सिधार गए। अन्यथा देखते कि वही ऋषि मुनियों का युग पुनः लौट आता।शंकराचार्य की ओर से जन्म के जैनियों और बौद्धों के लिये केवल यही प्रायश्चित था कि एक दो दिन व्रत रखवा कर उन्हें यज्ञोपवीत पहनाया जाए और गायत्री मन्त्र बताया जाए। परिणामस्वरूप 25 करोड़ मनुष्य प्रायश्चित कर, गायत्री पढ़, यज्ञोपवीत पहन वर्णाश्रम धर्म में आ गये। जब कि चार पांच सौ वर्षों तक वह बौद्ध और जैन रहे थे। बौद्ध लोग वर्णाश्रम को नहीं मानते। खाना पीना भी उनका वेद विरुद्ध है। वह सब प्रकार का माँस खा लेते हैं। चीन के इतिहास और ब्रह्मा के वृत्तान्त से यह बात सब लोग ज्ञात कर सकते हैं। 1200 वर्ष हुए कि यहां पर मुसलमानों ने सूरत और अफगानिस्तान की ओर से चढ़ाई की। आर्यावर्त्त में वैदिक धर्म छूट जाने और पुराणों के प्रचार के कारण सैकड़ों मत थे। इन वेद विरुद्ध मतों के कारण घर घर में फूट हो रही थी। धर्म के न रहने और वाममार्ग के फैलने से व्याभिचार भी बहुत फैला हुआ था। व्याभिचार प्रसार तथा अल्पायु के विवाहों के कारण बल, शक्ति, ब्रह्मचर्य और उत्साह का नाश हो रहा था। ऐसी अवस्था में एक जंगली जाति का हमारे देश पर विजयी होना कौन सा कठिन कार्य था ? हमारी निर्बलता का एक स्पष्ट प्रमाण यह है कि सोमनाथ के युद्ध में महमूद के साथ 10-15 हजार सेना थी और हिन्दु राजाओं के पास 10-15 लाख सेना थी। परन्तु हिन्दु ही पराजित हुए और महमूद विजयी हुआ। आप जानते हैं कि सौ हजार का एक लाख होता है। मानो एक अफगान के सम्मुख सौ हिन्दु थे। ऐसे अवसर पर पराजित होने का कारण ब्रह्मचर्य की हानि और धर्माभाव ही था और कारण इसके अतिरिक्त न था।आप ध्यान से विचार कर ले। तारीखे हिन्द में लिखा है कि इस देश में सर्वप्रथम बापा (राजा चित्तौड़) एक मुसलमानी पर आसक्त होकर मुसलमान हो गया। परन्तु लज्जा से खुरासान चला गया और वहाँ ही मर गया। उसके पीछे उसका हिन्दु बेटा राजगद्दी पर बैठा।
दूसरा इस देश में सुखपाल (राजा लाहौर‌) धन और राज्य के लोभ से महमूद के समय में मुसलमान हो गया। जिस पर महमूद उसको राजा बना कर चला गया। महमूद के जाने के पश्चात वह पुनः हिन्दु हो गया और ब्राह्मणों ने उसे मिला लिया।
कश्मीर एक बादशाह के अत्याचार से बलपूर्वक मुसलमान किया गया था। अभी तक उनकी उपजातियां भट्ट कौल आदि हैं।
ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन सब में से जो-जो मुसलमान हुए, प्रायः बल प्रयोग से हुए। कोई भी प्रसन्नता, आनन्द अथवा इसलाम को पसन्द करके मुसलमान‌ नहीं हुआ।
बहुत से लोग जागीर आदि के लोभ से मुसलमान हुए जिनकी वंशावलियां स्पष्ट बताती हैं कि पिता पितामह अथवा दो तीन पीढ़ी से ऊपर वे हिन्दु थे।
बहुत से हिन्दु युवक मुसलमानी वैश्याओं के प्रेमपाश में बन्दी हो कर विधर्मीं हुए। जो अपने प्रेमियों को इसी दीन की शिक्षा दिया करती हैं।जिनके पहले और अब भी सहस्त्रों उदाहरण प्रत्येक प्रान्त और भाग में मिलते हैं।
बड़े-बड़े योग्य पण्डित भी वेश्याओं के अन्धकूप में डूब गये। उदाहरणार्थ गंगा लहरी के रचयिता जगन्नाथ शास्त्री हैं।
लाखों सूरमा वीर हृदय वाले महात्मा जान पर खेल कर धर्म पर बलि दे गये। शीश दिये किन्तु धर्म नहीं छोड़ा। दाहरणार्थ देखो शहीदगंज और टाड राजस्थान।
आप जानते हैं जब मुसलमान नहीं आए थे। तो उनकी जियारतें, कबरें, मकबरे, खानकाहें और गोरिस्तान भी इस देश में न थे जब 8-9 सौ वर्ष से मुसलमान आए तब से ही भारत में कबरपरस्ती शुरू हुई। अत्याचारी मुसलमान हिन्दु वीरों के हाथ से मारे गए। मुसलमानों ने उनको शहीद बना दिया और हिन्दुओं को जहन्नुम (नारकीय) शोक। शत सहस्त्र शोक |
हमारे पिता पितामहों की रक्तवाहिनी असिधारा ने जिन अत्याचारियों का वध किया, हमारे पूर्वजों के हाथों से जो लोग मर कर दोजख (नरकाग्नि) में पहुँचाए गए। हम अयोग्य सन्तान और कपूत पुत्र उन्हें शहीद समझ कर उन पर धूपदीप जलाते हैं। इस मूर्खता पर शोकातिशोक! अपमान की कोई सीमा नहीं रही। परमेश्वर ! यह दुर्गति कब तक रहेगी ?
ऐ हिन्दु भाइयो ! सारे भारत में जहां पक्के और ऊँचे कबरिस्तान देखते हो, वह लोग तुम्हारे ही पूर्वजों के हाथों से वध किये गये थे। उनके पूजने से तुम्हारी भलाई कभी और किसी प्रकार सम्भव नहीं। थ‌म अच्छी प्रकार सोच लो।
अगर पीरे मुर्दा बकारे आमदे।
जि शाहीन मुर्दा शिकार आमदे।।
यदि मरा हुआ पीर काम आ सकता तो मृत बाज भी शिकार कर सकते। मुसलमानों ने मन्दिर तोड़े, बुत तोड़े। लाखों का वध किया। इस कठोर आघात के कारण लोग मुसलमान हुए। देखो तैमूर का रोजनामचा (डायरी)
परन्तु भारत ऐसा दुर्भाग्यशाली न था कि ईरान, रोम, मिश्र और अरब की भाँति कभी न जागता। च 2 में जगाने वाले उसे जगाते रहे।
मुसलमानों के अत्याचार से ही सती प्रथा प्रचलित हुई ताकि ऐसा न हो कि वे निर्दयी देवियों को पकड़ कर खराब करें। रानी पद्ममनी का सती होना और अलाउद्दीन का अत्याचार। स घटना से सम्बन्धित इतिहास ध्यान से पढ़ो।
पहला प्रायश्चित – सबसे प्रथम आर्यावर्त में शंकराचार्य जी ने 25 करोड़ बौद्धों का प्रायश्चित करा उनको वैदिक धर्म में प्रविष्ट कराया।
दूसरा प्रायश्चित – महाराजा चन्द्रगुप्त ने किया अर्थात सल्यूकस-बावल के अधिपति (युनान के राजा) की पुत्री से विवाह किया जिसको आज दो सहस्त्र एक सौ वर्ष हुए।
तीसरा प्रायश्चित – राना उदयपुर ने किया जिसने ईरान के राजा नौशेरवां पारसी की कन्या से, जो कि कुस्तुन्तुनिया के राजा सारस की दोहती (दुहित्री) थी, उस से विवाह किया जिसे 13 सौ वर्ष हुए हैं।
चौथा प्रायश्चित – लाहौर के पण्डितों ने राजा सुखपाल का कराया जिसको आठ सौ वर्ष हुए हैं।
पाँचवां प्रायश्चित – मरदाना मुसलमान का बाबा नानक जी ने कराया जिस को चार पाँच सौ वर्ष हुए और उस के शव को खुर्जा में अग्नि में जलाया।
छठा प्रायश्चित – पण्डित बीरबल और राजा टोडरमल ने अकबर बादशाह का कराया, और उसका नाम महाबलि रखा। गायत्री सिखाई, पढ़ाई, यज्ञोपवीत पहनाया और हिन्दु बनाया। गोवध निषेध और मांसाहार से घृणा हो गई। उसने दाड़ी के साथ इसलाम को सलाम कर दिया। फुट नोट : वर्तमान इतिहासकारों ने अकबर का हिन्दु होना कहीं नहीं माना – अनुवादक|]आज्ञा दी कि जो हिन्दू भूल से, अज्ञान से, प्रेमपाश में बन्ध कर अथवा लोभ से मुसलमान हो गया हो।यदि वह अपने हिन्दु धर्म में आना चाहता हो तो वह स्वतन्त्र है। उसे मत रोको। यदि कोई हिन्दु स्त्री किसी मुसलमान के फन्दे में मुसलमान होना चाहे तो उसे कदापि मुसलमानी न बनने दिया जाए। प्रत्युत सम्बन्धियों को सौंपी जाए। विस्तार से देखो।(दबिस्ताने मजाहिब पृ.334, 338 शिक्षादश नवल किशोर)
सातवाँ प्रायश्चित – गुरु गोविन्द सिंह जी ने कराया। अत्याचारी औरंगजेब के समय में उन्होंने समस्त मजहबियों को सिंह बना कर वैदिक धर्म में सम्मिलित किया। इस के अतिरिक्त उन के दो सिख एक बार मुसलमानों नें पकड़ कर बलात् मुसलमान कर दिये थे। जब समय पाकर वह उन के पास आए तो उन को पुनः हिन्दु बना लिया। सिंह बनाया और धर्म में मिलाया।
आठवाँ प्रायश्चित -प्रतापमल ज्ञानी ने कराया। यह कार्य भी औरंगजेब बादशाह के समय में हुआ। जबकि एक हिन्दु लड़का मुसलमान हो गया था। उस को शुद्ध कर के वैदिक धर्म में मिलाया।(देखो दबिस्तान मजाहिब शिक्षा 10 पृ.239 सन् 1296 हिजरी नवल किशोर)
नवाँ प्रायश्चित – महाराजा रणजीत सिंह ने कराया। अपने और अपने कई सरदारों के लिए मुसलमानों की लड़कियां लीऔर उनको हिन्दु बनाया।
दसवाँ प्रायश्चित – महाराजा रणवीर सिंह जम्मू कश्मीर ने किया जब कि तीन राजपूत सिपाही लद्दाख में मुसलमान हो गए थे | बड़ी प्रसन्नता पूर्वक तीनों को पुनः हिन्दु धर्म में सम्मिलित किया। जम्मू के विद्वान पण्डितों ने रणवीर प्रकाश एक ग्रन्थ बनाया, जिस की दृष्टि से चालीस पचास वर्ष से मुसलमान हुए लोगों को हिन्दुधर्म में सम्मिलित किया जा सकता है। काशी के पण्डितों ने भी इस से सहमति प्रकट की और व्यवस्था दी। एक बहुत बड़ी पुस्तक प्रत्येक सभा को जम्मु से बिना मूल्य मिल सकती है।
ग्यारहवाँ प्रायश्चित – श्रीमान् स्वामी दयानन्द जी महाराज ने कराया अर्थात काजी मुहम्मद उमर साहिब सहारनपुर निवासी को मुसलमान से आर्य बनाया और वैदिक धर्म पर चलाया।वह अब देहरादून में ठेकेदार है। जिनका नाम अलखधारी है, और वह देहरादून समाज के सदस्य हैं।
बारहवाँ प्रायश्चित – स्वामी जी के परलोक गमन के पश्चात श्रीमती परोपकारिणी सभा ने कराया अर्थात श्री अबदुल अजीज साहिब को जो पंजाब यूनिवर्सिटी की मौलवी कालिज की डिग्री प्राप्त कर चुके हैं और जो अब गुरदासपुर (पंजाब) में असिस्टैंट कमिश्नर हैं [फुट नोट -‍ यह घटना आर्य पथिक की अपने काल की है - अनुवादक] शुद्ध किया और आर्य बनाया जिन का शुभ नाम अब राय बहादुर हरदस राम जी है।
तेरहवाँ प्रायश्चित – सन्त ज्वाला सिंह जी ने कराया जिन्होंने न्यूनातिन्यून चालीस मुसलमानों को वैदिक धर्म में लाकर शुद्ध किया।
चौदहवाँ प्रायश्चित – 14 वर्ष हुए श्री रामजी दास ईसाई ने सात लड़कों को ईसाई बनाया था। कसूर के पण्डितों और महात्मा लोगों ने उनको शुद्ध किया। ब वे लड़के अच्छे 2 पदों पर हैं।
पन्द्रहवाँ प्रायश्चित – आर्य समाज के सदस्यों ने किया अर्थात राजपुताना, पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्तादि में न्यूनातिन्यून दो सहस्त्र मुसलमानों, ईसाईयों और जैनियों को शुद्ध करके वैदिक धर्म में लाकर आर्य बनाया। सन्ध्या, गायत्री सिखा कर प्रायश्चित्त कराया। गौ ब्राह्मण का हितैषी बनाया। अन्धकार से निकलवाया। क्योंकि यह संख्या प्रतिदिन उन्नति पर है। अतः ठीक संख्या बताना कठिन है।
प्रिय भाईयो ! इस विनम्र प्रार्थना को पढ़ कर पांच मिनिट तक हृदय में विचार करो कि यदि आप इसी प्रकार बेसुध रहे तो आप की क्या अवस्था होगी।
आठ सौ वर्ष के अन्दर आप 24 करोड़् से न्यून होते होते 20 करोड़ रह गए।आप गणित विद्या जानते हैं।अरब अ मुतनासिब को कार्य में लाएं :-
प्रश्न
चार करोड़ हिन्दु आठ सौ वर्षों में मुसलमान हो गए तो 20 करोड़ कितने वर्षों में होंगे ?
उत्त
800 वर्ष * 20 करोड़्/ 4 करोड़ = उत्तर 4000 वर्ष में .भाइयो ! अवश्य सम्भलो। आँखें खोल कर देख लो। कुम्भकरण की निद्रा मत सोवो। धर्म नष्ट हो रहा है।
लोग वेद के धर्म को नष्ट कर रहे हैं।लोभ, लालच, धोखे में फंसा कर तुम्हारे बच्चों को म्लेच्छ बना रहे हैं। यदि आप इसी प्रकार सोते रहे।करवट न बदली तो 4000 वर्ष के पश्चात एक भी वैदिक धर्म का अनुयायी न रहेगा .सब म्लेच्छ हो जाएंगे। केवल यही एक नदी आप के धार्मिक भवन को गिराने वाली नहीं है .एक और नद भी अभी जारी हुआ है। उसका नाम ईसाई धर्म है।
दो सौ वर्ष का समय हुआ कि ईसाई पादरियों ने यहां आकर इंजील सुनानी शुरू की। उस समय इस देश में एक भी ईसाई न था। तुम्हारे बहुत से अकाल पीड़ित लोगों को मद्रास और अन्य भिन्न भागों में इन पादरियों ने लोभ देकर ईसाई बना लिया। सामायिक जन गणना से ज्ञात हुआ कि इस समय इसाई बीस लाख हैं।
क्या कभी आपने सोचा कि इस समय तक कितने ईसाई हो चुके हैं ? भाईयो ! परमेश्वर के लिये आँखें खोलो। नींद से जागो।मुख प्रक्षालन करके स्नान करो। अपनी अवस्था सम्भालो। तुम्हारे धर्मरूपी पेड़ को दोनों ओर से दीमक लग रही है। अपने आप को बचा लो। अन्यथा तुम्हारा ठिकाना न मिलेगा। चिह्न तक न रहेगा।
मद्रास आज कल सौभाग्यशाली है। जहां सैंकड़ों घरों ने, जो अकाल के कारण ईसाई हो गये थे, ईसाई धर्म छोड़ दिया है। ब्राह्मणों ने न सहस्त्र व्यक्तियों को वैदिक धर्म में मिला लिया है। ईसाई रो रहे हैं। कुछ बस नहीं चलता। तुम्हें भी चाहिए। दया करो। कृपा करो। अपने भोले भाले बेसमझ बच्चों का जीवन व्यर्थ न गंवाओ। जो शरण आये उसे ठीक कर लो। प्रायश्चित करा के शास्त्रोक्त रीति से शंकर स्वामी की भाँति, बाबा नानक की भाँति, चाणक्य ऋषि की भाँति, महाराजा रणवीर सिंह की भाँति मिला लो। अन्यथा स्मरण रखो कि मुसलमान और ईसाई रह करके वे जितनी हत्यायें करेंगे, उन सब का पाप तुम्हारे गले पर होगा। परोपकारी बनो। जगत् का भला करो। पिछड़े हुए भाईयों को प्रायश्चित से शुद्ध करके मिलाओ।
सन्दर्भ ग्रन्थ- कुलयात आर्य मुसाफिर

Thursday, February 13, 2014

वैलेंटाइन डे पर युवाओं को सन्देश

 
 
वैलेंटाइन डे पर युवाओं को सन्देश

(व्यभिचारी एवं चरित्रहीन व्यक्ति नष्ट हो जाता हैं)

आज समाज में अश्लीलता को आधुनिकता के नाम पर परोसा जा रहा हैं। इसे एक प्रकार से बौद्धिक आतंकवाद भी कहा जा सकता हूँ। युवावस्था के अपरिपक्व मस्तिष्क को अफीम के समान व्यभिचार कि लत के लिए प्रेरित कर उसे भोगवाद के अंधे कुँए में धकेल दिया जाता हैं जिससे वह जीवन भर कस्तूरी मृग के समान भागता रहता हैं और अपने लक्ष्य तक कभी न पहुँच सकता। घर से भाग कर बेमेल विवाह करना और फिर तलाक, चरित्रहीनता, समलेंगि...कता, लिव इन रिलेशनशिप सभी विषयासक्ति नामक सिक्के के ही अनेक पहलु हैं। खेद हैं कि समाज में जितनी अधिक भौतिक और आर्थिक प्रगति हो रही हैं उतनी अधिक चरित्र हीनता बढ़ रही हैं। हमारे धार्मिक उपदेशों को पुराने और दकियानूसी कह कर जो लोग नकार देते हैं, उन्हीं ग्रंथों में इस बीमारी का हल भी हैं।

रामायण महाकाव्य का तो सन्देश ही यही हैं कि जो परनारी पर बुरी दृष्टि डालता हैं उसे परलोक पहुँचा कर ही दम लेना चाहिए। इसी रामायण में हमें रावण जैसे परम बलशाली कि श्री राम के हाथों मृत्यु का कारण भी पता चलता हैं। जब वीरवर हनुमान लंका में प्रवेश कर लंका नगरी का भ्रमण कर रहे होते हैं तब उषा काल में वे रावण के महल कि और जाते हुए रावण राज्य के द्विजों को वेद मन्त्रों का स्वाध्याय करते हुऐ एवं अग्निहोत्र करते हुए देखा। तब उनके मन में विचार आया कि उषा काल में जिस नगरी के जन वेदोक्त नित्य कर्म करते हैं उस नगरी को जीत पाना कठिन ही नहीं असम्भव भी हैं।जब वे रावण के महल में पहुँचते हैं तब उन्हें मद्य, माँस और व्यभिचार में लिप्त रावण और रावण कि स्त्रियों को सोते देखा तो उन्होंने विचार किया कि रावण तो जीवित ही मरे के समान हैं। इससे युद्ध में विजय प्राप्त करना कठिन नहीं हैं। वीरवर हनुमान के सन्देश से एक ही आशय सिद्ध होता हैं कि वेद मार्ग का परित्याग कर भोगमार्ग का वरण करने वाला व्यक्ति नष्ट हो जाता हैं।

योगिराज श्री कृष्ण जी महाराज भी गीता के श्लोक १६/२३ में कहते हैं :-

जो पुरुष वेद कि आज्ञा को छोड़कर अपनी स्व इच्छानुसार चलता हैं , वह पुरुष न सिद्धि को प्राप्त होता हैं, न सुख को प्राप्त होता हैं, न मुक्ति को प्राप्त होता हैं, अतएव मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य हैं कि वेद कि आज्ञा का पालन करते हुए चले।
अंतिम सन्देश यही हैं कि भोगवाद में लिप्त व्यक्ति कभी उन्नति नहीं कर सकता।

स्वामी दयानंद का इतिहास चिंतन



स्वामी दयानंद का इतिहास चिंतन


क्रांतिगुरु स्वामी दयानंद के विशाल चिंतन में एक महत्वपूर्ण कड़ी इतिहास रुपी मिथ्या बातों का खंडन एवं सत्य इतिहास का शंखनाद हैं। स्वामी जी का भागीरथ प्रयास था कि विदेशी इतिहासकारों द्वारा अपने स्वार्थ हित एवं ईसाइयत के पोषण के लिए विकृत इतिहास द्वारा  भारत वासियों को असभ्य, जंगली, अंधविश्वासी आदि सिद्ध करने के लिए किया जा रहा था उसे न केवल सप्रमाण असत्य सिद्ध करे अपितु उसके स्थान पर सत्य इतिहास कि स्थापना कर भारत वासियों को संसार कि श्रेष्ठतम, वैज्ञानिक, अध्यात्मिक रूप से सबसे उन्नत एवं प्रगतिशील सिद्ध करे। इसी कड़ी में स्वामी जी द्वारा अनेक तथ्य अपनी लेखनी द्वारा प्रस्तुत किये गये जिन पर आधुनिक रूप से शौध कर उन्हें संसार के समक्ष सिद्ध कर अनुसन्धान कर्ताओं कि सोच को बदलने कि  कि अत्यंत आवश्यकता हैं।

स्वामी जी द्वारा स्थापित कुछ इतिहास अन्वेषण तथ्यों को यहाँ पर प्रस्तुत कर रहे हैं।

१. आर्य लोग बाहर से आये हुए आक्रमणकारी नहीं थे, जिन्होंने यहाँ पर आकर यहाँ के मूल निवासियों पर जय पाकर उन पर राज्य किया था। वे यही के मूल निवासी थे और इस देश का नाम आर्यव्रत था।

२. वेदों में आर्य दस्यु युद्ध का किसी भी प्रकार का कोई उल्लेख नहीं हैं और यह नितांत कल्पना हैं क्यूंकि वेद इतिहास पुस्तक नहीं हैं।
३. प्राचीन काल में नारी जाति अशिक्षित एवं घर में चूल्हे चौके तक सिमित न रहने वाली होकर गार्गी, मैत्रयी जैसी महान विदुषी एवं शास्त्रार्थ करने वाली थी। वेदों में तो मंत्र द्रष्टा ऋषिकाओं का भी उल्लेख मिलता हैं। 

४. वेदों में एक ईश्वर कि पूजा और अर्चना का विधान हैं। एक ईश्वर के अनेक गुणों के कारण अनेक नाम हो सकते हैं और यह सभी नाम गुणवाचक हैं मगर इसका अर्थ यह हैं कि ईश्वर एक हैं और अनेक गुणों द्वारा जाना जाता हैं।

५. वेदों का उत्पत्ति काल २०००-३००० वर्ष नहीं हैं अपितु सूर्य सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथों के आधार पर अरबों वर्ष पुराना हैं।

६. रामायण, महाभारत आदि काल्पनिक ग्रन्थ नहीं हैं अपितु राजा परीक्षित के पश्चात आर्य राजाओं कि प्राप्त वंशावली से सिद्ध होता हैं कि वह सत्य इतिहास हैं।

७. श्री कृष्ण का जो चरित्र महाभारत में वर्णित हैं वह आपत अर्थात श्रेष्ठ पुरुषों वाला हैं। अन्य सब गाथायें मनगढ़त एवं असत्य हैं।

८. पुराणों के रचियता व्यास जी नहीं हैं अपितु पंडितों ने अपनी अपनी बातें इसमें मिला दी थी और व्यास जी का नाम रख दिया था।

९. रामायण, महाभारत, मनु स्मृति आदि में जो कुछ वेदानुकूल हैं वह मान्य हैं  प्रक्षिप्त अर्थात मिलावटी हैं।

१०. वैदिक ऋषि मन्त्रों के रचियता नहीं अपितु मंत्र द्रष्टा थे।

११. वेदों में यज्ञों में पशु बलि एवं माँसाहार आदि का कोई विधान नहीं हैं। वेदों कि इस प्रकार कि व्याख्या मध्य कालीन पंडितों का कार्य हैं जो वाममार्ग से प्रभावित थे।

१२. मूर्ति पूजा कि उत्पत्ति जैन मत द्वारा आरम्भ हुई थी। न वेदों में और न ही इससे पूर्व काल में मूर्ति पूजा का कोई प्रचलन था।

१३. वेदों में जादू टोना,काला जादू आदि का कोई विधान नहीं हैं। यह सब मनघड़त कल्पनाएँ हैं।

१४. वेदों में अश्लीलता आदि का कोई वर्णन नहीं हैं। यह सब मनघड़त कल्पनाएँ हैं।

१५. सृष्टि कि उत्पत्ति के काल में बहुत सारे युवा पुरुष और नारी का त्रिविष्टप पर अमैथुनी प्रक्रिया से जन्म हुआ था और चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा को ह्रदय में ईश्वर द्वारा वेदों का ज्ञान प्राप्त करवाया गया था।

१६.  वेदों का ज्ञान बहुत काल तक श्रवण परम्परा द्वारा सुरक्षित रहा, कालांतर में इक्ष्वाकु के काल में वेदों को सर्वप्रथम लिखित रूप में उपलब्ध करवाया गया था।

१७. आर्य वैदिक सभ्यता प्राचीन काल में सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित थी और आर्यव्रत देश संसार का विश्व गुरु था।

१८. प्राचीन काल में विदेश गमन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था और न ही विदेश जाने से कोई भी धर्म से च्युत हो जाता था।
१९. शुद्धि आदि का विधान गोभिल आदि ग्रंथों में विद्यमान था इसलिए जो भी कोई वैदिक धर्म त्याग कर विधर्मी हो चुके हैं उन्हें वापिस स्वधर्मी बनाया जा सकता हैं।

२०. गुजरात के सोमनाथ में मुसलमानों कि विजय का कारण मूर्ति पूजा एवं अवतारवाद से सम्बंधित पाखंड था नाकि हिंदुओं में वीरता कि कमी था।

ऐसे और उदहारण देकर एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती हैं जिसका उद्देश्य स्वामी दयानंद को अपने समय का सबसे बड़े इतिहासकार, अनुसन्धान कर्ता के रूप में सिद्ध करना होगा।

डॉ विवेक आर्य

Monday, February 3, 2014

Vir Haqiqat Rai – 12 year old martyr



Haqiqat Rai was born at Sialkot in 1724 to Mata Durga Devi and Bhag Mal ji. Haqiqat Rai was very sharp in studies as well as in his bravery. In those days of Muslim rule Hindus used to read Urdu and Persian from Muslim maulvis. Haqiqat Rai used to go to local school and was the only Hindu in a class while his other classmates were Muslims. He used to pass with top rank and so was dear to everyone. One day, some of his Muslim classmates who were jealous of his studies ridiculed Hindu goddess Devi Ma. Haqiqat Rai first remained silent but after repeated abuses the brave boy dared his classmates and tried to stop them but as he was alone he was overpowered. They did not stop using abusive languages for Hindu Goddess and he responded finally by ridiculing Fatima, daughter of Prophet Muhammad.

The Muslim boys complained to the maulvis about Haqiqat Rai blaspheming the prophet and Islam, which enraged the maulvis. Maulvis first punished Haqiqat Rai and then had him arrested by the local police.

Haqiqat Rai was arrested and sent to Amir Beg, the administrator of Sialkot. Those were the days of Muslim rule, Hindus were frequently targeted by Muslims and they were having inferior status in society. There was no one to listen to this young Hindu boy. Amir who was known for his cruelty immediately ordered killing of innocent Hindu boy. He did not even spare time to hear the pleas of Haqiqat Rai. Haqiqat Rai’s parents started weeping and asked for sparing his life. Amir said Haqiqat Rai had committed a sin and he can be pardoned only if he accepts Islam as punishment for blasphemy. Haqiqat Rai refused conversion to Islam. Haqiqat Rai’s parents tried to change his mind. They said, if he accepts Islam, his life will be saved. The Brave boy Haqiqat accepted death but not Islam. He was then sent to Zakaria Khan, the Governor of Lahore. But Haqiqat Rai did not agree to convert even under further torture. His 10 year old wife Laxmi Devi also arrived and pleaded for his life but no one under the Muslim rule listened to Hindus. Haqiqat Rai was executed by the orders of the Governor on 20 January, 1735 at the tender age of 12.The day of his execution used to be marked by a ‘mela’ (fair) on Vasant Panchami day in Lahore, around his ‘samadhi’ (Baway di marrhi), before India’s partition. It appears his ‘samadhi’ was wrecked during riots in Lahore.

The young boy died for his religion. Today he is an idol for us all what we can do is to observe but not give up Vedic dharma whole heartedly and propagate it throughout the world.

Dr Vivek Arya



हकीकत को फिर ले गए कत्लगाह में
हजारों इकठ्ठे हुए लोग राह में|

चले साथ उसके सभी कत्लगाह को
हुयी सख्त तकलीफ शाही सिपाह को|

किया कत्लगाह पर सिपाहियों ने डेरा
हुआ सबकी आँखों के आगे अँधेरा|

जो जल्लाद ने तेग अपनी उठाई
हकीकत ने खुद अपनी गर्दन झुकाई|

फिर एक वार जालिम ने ऐसा लगाया
हकीकत के सर को जुदा कर गिराया|

उठा शोर इस कदर आहो फुंगा का
के सदमे से फटा पर्दा आसमां का|

मची सख्त लाहौर में फिर दुहाई
हकीकत की जय हिन्दुओं ने बुलाई|

बड़े प्रेम और श्रद्दा से उसको उठाया
बड़ी शान से दाह उसका कराया|

तो श्रद्दा से उसकी समाधी बनायी
वहां हर वर्ष उसकी बरसी मनाई|

वहां मेला हर साल लगता रहा है
दिया उस समाधि में जलता रहा है|

मगर मुल्क तकसीम जब से हुआ है
वहां पर बुरा हाल तबसे हुआ है|

वहां राज यवनों का फिर आ गया है
अँधेरा नए सर से फिर छा गया है|

अगर हिन्दुओं में है कुछ जान बाकी
शहीदों बुजुर्गों की पहचान बाकी|


शहादत हकीकत की मत भूल जाएँ
श्रद्दा से फुल उस पर अब भी चढ़ाएं|

कोई यादगार उसकी यहाँ पर बनायें
वहां मेला हर साल फिर से लगायें|

(डा. गोकुल चाँद नारंग द्वारा वीर हक़ीक़त बलिदान पर श्रद्धांजलि देने एवं हिन्दू समाज को प्रेरणा देने हेतु यह कविता लिखी गई थी )