Saturday, January 23, 2016

दूध का दूध पानी का पानी !



दूध का दूध पानी का पानी !

6 दिसंबर 1956 को माननीय डा. अंबेडकर जी का देहावसान हुआ । कानपुर के वैदिक गवेषक पंडित शिवपूजन सिंह जी का चर्चित 'भ्रांति निवारण' सोलह पृष्ठीय लेख 'सार्वदेशिक ' मासिक के जुलाई-अगस्त 1951अंक में उनके देहावसान के पांच वर्ष तीन माह पूर्व प्रकाशित हुआ । डा. अंबेडकर जी इस मासिक से भलीभांति परिचित थे और तभी यह चर्चित अंक भी उनकी सेवा में.भिजवा दिया गया था । लेख डा. अंबेडकर के वेदादि विषयक विचारों की समीक्षा में 54 प्रामाणिक उद्धरणों के साथ लिखा गया था। इसकी प्रति विदर्भ के वाशिम जनपद के आर्य समाज कारंजा के प्राचीन ग्रंथालय में सुरक्षित है।
आशा थी कि अंबेडकर जी जैसे प्रतिभाशाली विद्वान या तो इसका उत्तर देते या फिर अपनी पुस्तकें बताये गये अकाट्य तथ्यों की रोशनी में संपादित करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। ऐसा इसलिये कि जो जातिगत भेदभाव और अपमान उन्होंने लगातार सहा उसकी वेदना और विद्रोह ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
डा. अंबेडकर जी की दोनों पुस्तकें - अछूत कौन और कैसे तथा शूद्रों की खोज - पर लेख शंका समाधान शैली में लिखा गया था पर डा. कुशलदेव शास्त्री जी ने इसे सुविधा और सरलता हेतु संवाद शैली में रुपांतरित किया है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इस लेख को स्वामी जी द्वारा लिखित 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' के आलोक में पढ़कर सत्यासत्य का निर्णय सहर्ष लिया जा सकता है ।

1 - ' अछूत कौन और कैसे '

डा. अंबेडकर- आर्य लोग निर्विवाद रूप से दो हिस्सों और दो संस्कृतियों में विभक्त थे,जिनमें से एक ऋग्वेदीय आर्य और दूसरे यजुर्वेदीय आर्य , जिनके बीच बहुत बड़ी सांस्कृतिक खाई थी।ऋग्वेदीय आर्य यज्ञों में विश्वास करते थे,अथर्ववेदीय जादू-टोना में।

पंडित शिवपूजन सिंह- दो प्रकार के आर्यों की कल्पना केवल आपके और आप जैसे कुछ मस्तिकों की उपज है।यह केवल कपोल कल्पना या कल्पना विलास है।इसके पीछे कोई ऐसा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।कोई ऐतिहासिक विद्वान भी इसका समर्थन नहीं करता।अथर्ववेद में किसी प्रकार का जादू टोना नहीं है।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद में आर्यदेवता इंद्र का सामना उसके शत्रु अहि-वृत्र (सांप देवता) से होता है,जो कालांतर में नाग देवता के नाम से प्रसिध्द हुआ।

पं. शिवपूजन सिंह- वैदिक और लौकिक संस्कृत में आकाश पाताल का अंतर है।यहाँ इंद्र का अर्थ सूर्य और वृत्र का अर्थ मेघ है।यह संघर्ष आर्य देवता और और नाग देवता का न होकर सूर्य और मेघ के बीच में होने वाला संघर्ष है।वैदिक शब्दों के विषय में.निरुक्त का ही मत मान्य होता है।वैदिक निरूक्त प्रक्रिया से अनभिज्ञ होने के कारण ही आपको भ्रम हुआ है।

डा. अंबेडकर- महामहोपाध्याय डा. काणे का मत है कि गाय की पवित्रता के कारण ही वाजसनेही संहिता में गोमांस भक्षण की व्यवस्था की गयी है।

पं. शिवपूजन सिंह- श्री काणे जी ने वाजसनेही संहिता का कोई प्रमाण और संदर्भ नहीं दिया है और न ही आपने यजुर्वेद पढ़ने का कष्ट उठाया है।आप जब यजुर्वेद का स्वाध्याय करेंगे तब आपको स्पष्ट गोवध निषेध के प्रमाण मिलेंगे।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद से ही यह स्पष्ट है कि तत्कालीन आर्य गोहत्या करते थे और गोमांस खाते थे।

पं. शिवपूजन सिंह- कुछ प्राच्य और पाश्चात्य विद्वान आर्यों पर गोमांस भक्षण का दोषारोपण करते हैं , किंतु बहुत से प्राच्य विद्वानों ने इस मत का खंडन किया है।वेद में गोमांस भक्षण विरोध करने वाले 22 विद्वानों के मेरे पास स-संदर्भ प्रमाण हैं।ऋग्वेद से गोहत्या और गोमास भक्षण का आप जो विधान कह रहे हैं , वह वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के अंतर से अनभिज्ञ होने के कारण कह रहे हैं । जैसे वेद में'उक्ष' बलवर्धक औषधि का नाम है जबकि लौकिक संस्कृत में भले ही उसका अर्थ 'बैल' क्यों न हो ।

डा. अंबेडकर- बिना मांस के मधुपर्क नहीं हो सकता । मधुपर्क में मांस और विशेष रूप से गोमांस का एक आवश्यक अंश होता है ।

पं. शिवपूजन सिंह- आपका यह विधान वेदों पर नहीं अपितु गृह्यसूत्रों पर आधारित है । गृहसूत्रों के वचन वेद विरूध्द होने से माननीय नहीं हैं । वेद को स्वत: प्रमाण मानने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनुसार," दही में घी या शहद मिलाना मधुपर्क कहलाता है । उसका परिमाण 12 तोले दही में चार तोले शहद या चार तोले घी का मिलाना है ।"

डा. अंबेडकर- अतिथि के लिये गोहत्या की बात इतनी सामान्य हो गयी थी कि अतिथि का नाम ही 'गोघ्न' , अर्थात् गौ की हत्या करना पड़ गया था ।

प. शिवपूजन सिंह- 'गोघ्न' का अर्थ गौ की हत्या करने वाला नहीं है । यह शब्द 'गौ' और 'हन' के योग से बना है। गौ के अनेक अर्थ हैं , यथा - वाणी , जल , सुखविशेष , नेत्र आदि। धातुपाठ में महर्षि पाणिनि 'हन' का अर्थ 'गति' और 'हिंसा' बतलाते हैं।गति के अर्थ हैं - ज्ञान , गमन , और प्राप्ति । प्राय: सभी सभ्य देशों में जब किसी के घर अतिथि आता है तो उसके स्वागत करने के लिये गृहपति घर से बाहर आते हुये कुछ गति करता है , चलता है,उससे मधुर वाणी में बोलता है , फिर जल से उसका सत्कार करता है और यथासंभव उसके सुख के लिये अन्यान्य सामग्रियों को प्रस्तुत करता है और यह जानने के लिये कि प्रिय अतिथि इन सत्कारों से प्रसन्न होता है नहीं , गृहपति की आंखें भी उस ओर टकटकी लगाये रहती हैं । 'गोघ्न' का अर्थ हुआ - ' गौ: प्राप्यते दीयते यस्मै: स गोघ्न: ' = जिसके लिये गौदान की जाती है , वह अतिथि 'गोघ्न' कहलाता है ।

डा. अंबेडकर- हिंदू ब्राह्मण हो या अब्राह्मण , न केवल मांसाहारी थे , किंतु गोमांसहारी भी थे ।

प. शिवपूजन सिंह- आपका कथन भ्रमपूर्ण है, वेद में गोमांस भक्षण की बात तो जाने दीजिये मांस भक्षण का भी विधान नहीं है ।

डा. अंबेडकर- मनु ने गोहत्या के विरोध में कोई कानून नहीं बनाया । उसने तो विशेष अवसरों पर 'गो-मांसाहार' अनिवार्य ठहराया है ।

पं. शिवपूजन सिंह- मनुस्मृति में कहीं भी मांसभक्षण का वर्णन नहीं है । जो है वो प्रक्षिप्त है । आपने भी इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिया कि मनु जी ने कहां पर गोमांस अनिवार्य ठहराया है। मनु ( 5/51 ) के अनुसार हत्या की अनुमति देनेवाला , अंगों को काटने वाला , मारनेवाला , क्रय और विक्रय करने वाला , पकाने वाला , परोसने वाला और खानेवाला इन सबको घातक कहा गया है ।

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2- ' शूद्रों की खोज '

डा. अंबेडकर- पुरूष सूक्त ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थ सिध्दि के लिये प्रक्षिप्त किया है।कोल बुक का कथन है कि पुरूष सूक्त छंद और शैली में शेष ऋग्वेद से सर्वथा भिन्न है।अन्य भी अनेक विद्वानों का मत है कि पुरूष सूक्त बाद का बना हुआ है।

पं. शिवपूजन सिंह- आपने जो पुरूष सूक्त पर आक्षेप किया है वह आपकी वेद अनभिज्ञता को प्रकट करता है।आधिभौतिक दृष्टि से चारों वर्णों के पुरूषों का समुदाय - 'संगठित समुदाय'- 'एक पुरूष' रूप है।इस समुदाय पुरूष या राष्ट्र पुरूष के यथार्थ परिचय के लिये पुरुष सूक्त के मुख्य मंत्र ' ब्राह्मणोSस्य मुखमासीत्...' (यजुर्वेद 31/11) पर विचार करना चाहिये।
उक्त मंत्र में कहा गया है कि ब्राह्मण मुख है , क्षत्रिय भुजाएँ , वैश्य जङ्घाएँ और शूद्र पैर। केवल मुख , केवल भुजाएँ , केवल जङ्घाएँ या केवल पैर पुरुष नहीं अपितु मुख , भुजाएँ , जङ्घाएँ और पैर 'इनका समुदाय' पुरुष अवश्य है।वह समुदाय भी यदि असंगठित और क्रम रहित अवस्था में है तो उसे हम पुरूष नहीं कहेंगे।उस समुदाय को पुरूष तभी कहेंगे जबकि वह समुदाय एक विशेष प्रकार के क्रम में हो और एक विशेष प्रकार से संगठित हो।
राष्ट्र में मुख के स्थानापन्न ब्राह्मण हैं , भुजाओं के स्थानापन्न क्षत्रिय हैं , जङ्घाओं के स्थानापन्न वैश्य और पैरों के स्थानापन्न शूद्र हैं । राष्ट्र में चारों वर्ण जब शरीर के मुख आदि अवयवों की तरह सुव्यवस्थित हो जाते हैं तभी इनकी पुरूष संज्ञा होती है । अव्यवस्थित या छिन्न-भिन्न अवस्था में स्थित मनुष्य समुदाय को वैदिक परिभाषा में पुरुष शब्द से नहीं पुकार सकते ।
आधिभौतिक दृष्टि से यह सुव्यवस्थित तथा एकता के सूत्र में पिरोया हुआ ज्ञान , क्षात्र , व्यापार- व्यवसाय , परिश्रम-मजदूरी इनका निदर्शक जनसमुदाय ही 'एक पुरुष' रूप है।
चर्चित मंत्र का महर्षि दयानंद जी इसप्रकार अर्थ करते हैं-
"इस पुरूष की आज्ञा के अनुसार विद्या आदि उत्तम गुण , सत्य भाषण और सत्योपदेश आदि श्रेष्ठ कर्मों से ब्राह्मण वर्ण उत्पन्न होता है । इन मुख्य गुण और कर्मों के सहित होने से वह मनुष्यों में उत्तम कहलाता है और ईश्वर ने बल पराक्रम आदि पूर्वोक्त गुणों से युक्त क्षत्रिय वर्ण को उत्पन्न किया है।इस पुरुष के उपदेश से खेती , व्यापार और सब देशों की भाषाओं को जानना और पशुपालन आदि मध्यम गुणों से वैश्य वर्ण सिध्द होता है।जैसे पग सबसे नीचे का अंग है वैसे मूर्खता आदि गुणों से शूद्र वर्ण सिध्द होता है।"
आपका लिखना कि पुरुष सूक्त बहुत समय बाद जोड़ दिया गया सर्वथा भ्रमपूर्ण है।मैंने अपनी पुस्तक " ऋग्वेद दशम मण्डल पर पाश्चात्य विद्वानों का कुठाराघात " में संपूर्ण पाश्चात्य और प्राच्य विद्वानों के इस मत का खंडन किया है कि ऋग्वेद का दशम मण्डल , जिसमें पुरूष सूक्त भी विद्यमान है , बाद का बना हूआ है ।

डा. अंबेडकर- शूद्र क्षत्रियों के वंशज होने से क्षत्रिय हैं।ऋग्वेद में सुदास , तुरवाशा , तृप्सु,भरत आदि शूद्रों के नाम आये हैं।

पं. शिवपूजन सिंह- वेदों के सभी शब्द यौगिक हैं , रूढ़ि नहीं । आपने ऋग्वेद से जिन नामों को प्रदर्शित किया है वो ऐतिहासिक नाम नहीं हैं । वेद में इतिहास नहीं है क्योंकि वेद सृष्टि के आदि में दिया गया ज्ञान है ।

डा. अंबेडकर- छत्रपति शिवाजी शूद्र और राजपूत हूणों की संतान हैं (शूद्रों की खोज , दसवां अध्याय , पृष्ठ , 77-96)

पं. शिवपूजन सिंह- शिवाजी शूद्र नहीं क्षत्रिय थे।इसके लिये अनेक प्रमाण इतिहासों.में भरे पड़े हैं । राजस्थान के प्रख्यात इतिहासज्ञ महामहोपाध्याय डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा , डी.लिट् , लिखते हैं- ' मराठा जाति दक्षिणी हिंदुस्तान की रहने वाली है । उसके प्रसिद्ध राजा छत्रपति शिवाजी के वंश का मूल पुरुष मेवाड़ के सिसौदिया राजवंश से ही था।' कविराज श्यामल दास जी लिखते है - ' शिवाजी महाराणा अजय सिंह के वंश में थे। ' यही सिध्दांत डा. बालकृष्ण जी , एम. ए. , डी.लिट् , एफ.आर.एस.एस. , का भी था।

इसी प्रकार राजपूत हूणों की संतान नहीं किंतु शुध्द क्षत्रिय हैं । श्री चिंतामणि विनामक वैद्य , एम.ए. , श्री ई. बी. कावेल , श्री शेरिंग , श्री व्हीलर , श्री हंटर , श्री क्रूक , पं. नगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य , एम.एम.डी.एल. आदि विद्वान राजपूतों को शूद्र क्षत्रिय मानते हैं।प्रिवी कौंसिल ने भी निर्णय किया है कि जो क्षत्रिय भारत में रहते हैं और राजपूत दोनों एक ही श्रेणी के हैं ।

- ' आर्य समाज और डा. अंबेडकर,

डा. कुशलदेव शास्त्री

(अरुण लवानिया)

Tuesday, January 19, 2016

Rohith Vemula: Activist or Puppet



Rohith Vemula: Activist or Puppet

National media channels are running news of suicide by Rohith Vemula to pump adrenaline in their TRP rating. Politician from different parties are busy flying Hyderabad to show sympathy with the family of Rohith Vemula and as expected to secure Dalit votes. Secularist scholars of our country are busy writing blogs, articles and editorials to prove that Rohith Vemula was killed by Right wing Politics. But very few concentrated on educational carrier and activities of Rohith before his suicide.

I personally visited his facebook profile.

https://web.facebook.com/rohith352

I found Rohith posts related to these Topics.

1. Rohith was protesting against ABVP for preventing screening of Film “Muzaffarnagar Baaqi Hain”.
2. He was active in celebrating Manu Smriti Dahan Divas (Burning Day)
3. He was active in celebrating Babri Masjid demolition day along with Muslims in Campus.
4. He was active in organizing Beef festival in campus.
5. He was seen cheering Owaisi of AIMIM on intolerance issue.
6. He was seen cheering Muslim spokesperson on support to Tipu Sultan
7. Last but not the least he was foremost in speaking against hanging of Yakub Menon (This is not on FB but in News)

There was no Post on any education related activity on the wall of Rohith.

After reading this anyone can easily reach this interpretation that he was pro-Ambedkarite, pro-Muslims, anti-Hindus and against all system and traditions of our country.

Speaking against caste-system is not wrong. Even I am against it. But the motive should be well defined. My motive against caste system is to eradicate the evil and unite Hindus. Consider everyone as equal and son of almighty God.

1. The motive of Pro-Ambedkarite seems to spit venom against all higher caste Hindus (Even if they are not following caste system). This mentality only divides never unites any society.

2. Speaking against Manu Smriti (Even after this fact is established that Manu Smriti was adulterated with verses supporting caste system in the middle ages. This was done by ignorant class of people. Still people with vested interests are trying milking the barren cow again and again without any success.)

3. Support Muslims appeasement politics (Even by ignoring the Views of Dr Ambedkar in Islam. Read Dr. Ambedkar views on Islam in his book on Pakistan. Dr Ambedkar was offered millions to convert to Islam. He rejected all such offers considering Islam as foreign and impractical in approach. His followers just follow opposite to him. They team-up with Muslims and try to show that they are near to Islam than Hinduism. While it’s my personal opinion that they must collaborate with those Hindus who are against Caste system)

4. Organize Beef festivals to hurt Hindu sentiments. (A step to promote disunity and hatred in society. It’s common sense. Will dalits like to organize Pork Festival in front of Muslim students in University campus?)

5. Support fanatics like Tipu Sultan (Ignoring the fact that he ruined villages after villages of Hindus even belonging to dalits. No lesson learned from history.)

6. Support to movie on Muzaffarnagar (It came as a surprise to me as this man completely ignored the ground reality. This movie depicts Hindus as rioters and Muslims as victims. The ground reality is that in the Muzaffarnagar riot Muslim devastate Dalits from many Villages and the proclaimed savior of dalits in UP ex CM Mayawati did not come for any help. The reason being the main accused among rioters was related to her prestigious party BSP. How come this man ignored such Hard Fact?)

7. Support to Yakub Menon is silliest mistake. Menon was killer of innocent Indians in Mumbai. How come any one supports such anti national terrorist? This is quite mean and unworthy. No wise person will ever support such wrong act. One question always comes in my Mind. Will anyone among these Human Right activists dare to come forward if instead of Yakub Menon any person with Hindu Origin would have been hanged? Answer is a big “No”. This double standard criterion is quite prevalent in our secular country in name of Activism.

In short I consider this Activism as Anti-nation, Anti-humanity, Anti-cultural and Anti-social.

I have no second opinion to consider that these persons are puppets in the hands of Anti National forces.
(The author views are personal and its motive is not to hurt the sentiments of anyone living of dead but to propagate what is Truth and only Truth!)

Dr Vivek Arya


Saturday, January 16, 2016

क्या ऋग्वेद का दशम मंडल पीछे से मिलाया गया है?



क्या ऋग्वेद का दशम मंडल पीछे से मिलाया गया है?

पश्चिमी लेखकों का यह मत हैं कि ऋग्वेद का दशम मंडल अर्वाचीन है एवं उसे बाद में मिलाया गया है। उनकी इस मान्यता का आधार दसवें मंडल में भाषा की भिन्नता है।
शंका 1- पश्चिमी लेखकों की मान्यता की ऋग्वेद का दसवां मंडल बाद में मिलाया गया है का आधार क्या हैं?
समाधान- पश्चिमी लेखक मक्डोनेल[i] द्वारा अपनी पुस्तक में अपनी इस मान्यता के समर्थन में कुछ युक्तियाँ दी गई हैं। जैसे
१. ऋग्वेद के दशम मंडल की भाषा भिन्न है।
२. मन्यु और श्रद्धा जैसे अमूर्त विचारों की अधिकता हैं।
३. विश्वेदेवा की प्रधानता हो गई है।
४. उषा देवी का मान कम होता दीखता है।
५. 20-26 सूक्तों का कर्ता अग्निमीले से आरम्भ करता हैं, अत पहिले 9 मंडल पुस्तक रूप में भी आ चुके थे।
६.  क्यूंकि यह सोम अध्याय के पश्चात रखी गई हैं।
७. क्यूंकि इसके सूक्तों की संख्या प्रथम मंडल के बराबर हैं।
८. यहाँ तक की दशम मंडल के सूक्त अन्य मंडलों में की गई मिलावट से अधिक प्राचीन प्रतीत होते हैं।
पश्चिमी के साथ साथ अनेक भारतीय विद्वान भी इस विचार को सही मानते हैं। जैसे
ऋग्वेद का दशम मंडल स्पष्टया पीछे की मिलावट है जिसमें अथर्ववेद जैसी जादू-टोने की बातें पाई जाती हैं[ii]
दशम मंडल पहले ९ मंडलों की अपेक्षा पीछे बना, यह बात भाषा की साक्षी से पूर्णतया निश्चित है[iii]
ऋग्वेद का दशम मंडल अर्वाचीन माना जाता हैं[iv]
ऋग्वेद मंडल १०, सूक्त ९० मंत्र ११,१२ का पुरुष सूक्त अपनी भाषा और भावना से अर्वाचीन प्रतीत होता है[v]
दशम मंडल में लोक, मोघ, विसर्ग, गुप् इत्यादि अनेक शब्द आते हैं जो सिवाय प्रक्षिप्त भागों और बालखिल्य सूक्तों के ऋग्वेद के अन्य भागों में नहीं पाये जाते हैं[vi]

शंका 2- इस मान्यता को आप सही मानते है अथवा गलत मानते है?
समाधान- पश्चिमी लेखकों की मान्यता का विश्लेषण करते समय हमने यह पाया कि वास्तव में इस मान्यता का समाधान शुष्क एवं दुरूह हैं क्यूंकि यह भाषाविदों का विषय हैं। अधिक जानकारी के लिए शोध में रूचि रखने वाले विद्वान पंडित भगवत दत्त रिसर्च स्कॉलर[vii], पंडित शिवपूजन सिंह कुशवाहा[viii], पंडित धर्मदेव विद्यामार्तण्ड[ix] द्वारा कृत लेख एवं पुस्तकें देख सकते हैं।
इस लेख में हम केवल लोक, मोघ, विसर्ग आदि शब्दों का विश्लेषण करेंगे।
'लोक' शब्द पर विचार
लोक: शब्द ऋग्वेद के दशम मंडल के अतिरिक्त ऋग्वेद 1/93/6, 2/30/6,3/2/9,4/17/17,6/23/7,6/47/8,6/73/2,7/20/2, 7/33/5, 7/60/9, 7/84/2,7/99/4, 8/100/12, 9/92/6 आदि मन्त्रों में आया हैं फिर यह अयथार्थ एवं तथ्य विरुद्ध बात कैसे लिख दी।
'मोघ' शब्द पर विचार
मोघं का प्रयोग ऋग्वेद के दशम मंडल के अतिरिक्त ऋग्वेद के सप्तम मंडल में दो मन्त्रों 7/104/14, 7/104/15  में मिलता हैं फिर यह अयथार्थ एवं तथ्य विरुद्ध बात कैसे लिख दी।
'विसर्ग' शब्द पर विचार
विसर्ग का प्रयोग ऋग्वेद के दशम मंडल के अतिरिक्त ऋग्वेद के सप्तम मंडल में 103  सूक्त में मिलता है फिर यह अयथार्थ एवं तथ्य विरुद्ध बात कैसे लिख दी।
पंडित सत्यव्रत जी सामश्रमी ने त्रयीपरिचय ग्रन्थ में भाषा भेद की मान्यता का स्पष्ट रूप से निष्काशित करते हुए लिखते है कि हमारे सुनने में तो दशममण्डल और दूसरे मंडलों की भाषा एक ही तरह की है और हमारी बुद्धि में उनका तात्पर्य भी एक ही जैसा (अन्य मंडलों के सदृश) है। हम नहीं जानते कि किनकी बुद्धि मलिन है और कौन हठी हैं[x]?
इस प्रकार से अनेक तर्कों और प्रमाणों द्वारा ऋग्वेद को अर्वाचीन बताने का जो प्रयास किया जा रहा है वह असत्य सिद्ध लिया जा सकता है।
शंका 3- पश्चिमी लेखक वेदों में बाद में मिलावट की कल्पना से क्या सिद्ध करना चाहते हैं?

समाधान- पश्चिमी लेखकों की वेदों पर मान्यता का आधार ईसाई मत की मान्यताओं के पूर्वाग्रह से प्रभावित रहा हैं। इन्हीं मान्यताओं के चलते वेदों में बहुदेवतावाद्, वेदों में इतिहास, वेदों में जादू टोना, विकासवाद आदि को बलात सिद्ध करने का प्रयास किया गया। वेदों को जंगली लोगों की निकृष्ठ मान्यता एवं बाइबिल को सभ्य लोगो की उच्च मान्यता इसी प्रदूषित सोच का परिणाम था। जब उन्होंने ऋग्वेद के दसवें मंडल में हिरण्यगर्भ सूक्त में प्रतिपादित एकेश्वरवाद, नासदीय सूक्त आदि में ईश्वर द्वारा सृष्टि उत्पत्ति एवं पालन, श्रद्धा सूक्त, मन्यु सुक्तादि में आध्यात्मिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विषयों को देखा तो उन्होंने बच निकलने  रास्ता सोचा और इस मंडल को पीछे का बनाया हुआ प्रचारित कर दिया। भाषा-भेद तो एक बहाना भर था। उदहारण के लिए हम मैक्समूलर की मान्यता का विश्लेषण करते है।
हिरण्यगर्भ सूक्त को मैक्समूलर महोदय ने यूरोपियन व्याख्याकारों द्वारा नवीन होना बताया है[xi]। इस सूक्त के अंतिम मंत्र ''प्रजापते न तवदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव' पर मैक्समूलर महोदय लिखते है कि मेरे विचार में यह अंतिम मंत्र तो अत्यंत  संदिग्ध है[xii]
सत्य यह है कि ऋग्वेद के इस सूक्त में एकेश्वरवाद अर्थात 'ईश्वर एक है' के मन्त्रों को देखकर मैक्समूलर ईसाईमत जन्य पक्षपात के शिकार हुए। पर वेदों के अनेक मंडलों में 'ईश्वर के एक' होने के पर्याप्त प्रमाण वर्णित हैं[xiii]
शंका 4-क्या वेदों में मिलावट की जा सकती है?
समाधान- वेद नित्य ईश्वर का नित्य ज्ञान है। इसलिए जिस रूप में वेद इस कल्प में आज उपलब्ध होते हैं, उसी रूप में में वे पिछले कल्पों में भी अनादिकाल से ईश्वर द्वारा प्रकट किये जाते रहे हैं तथा भविष्य में आने वाले अनंत कालों में भी वे इसी रूप में प्रकट किये जाते रहेंगे।  स्वामी दयानंद इस विषय को स्पष्ट रूप से लिखते है कि "जैसे इस कल्प की सृष्टि में शब्द, अक्षर और सम्बन्ध वेदों में हैं, इसी प्रकार से पूर्व कल्प में थे और आगे भी होंगे। क्यूंकि जो ईश्वर की वोद्या है सो नित्य एक ही रस बनी रहती है। उनके एक अक्षर का भी विपरीत भाव कभी नहीं होता। सो ऋग्वेद से लेके चारों वेदों की संहिता अब जिस प्रकार की है, इनमें शब्द, अर्थ, सम्बन्ध, पद और अक्षरों का जिस क्रम से वर्तमान है, इसी प्रकार का क्रम सब दिन बना रहता है। क्यूंकि ईश्वर का ज्ञान नित्य है। उसकी वृद्धि, क्षय और विपरीतता कभी नहीं होती[xiv]।"
इस तथ्य को पाणिनि ने अष्टाध्यायी में भी नित्य माना हैं  'वेद में स्वर तथा वर्णानुपूर्वी भी नित्य होती है[xv]  निरुक्त में यास्क भी वेदमंत्रों की शब्द रचना और उनकी आनुपूर्वी को नियत मानते हैं[xvi]। 
वेदों की नित्यता के पश्चात वेदों की शुद्धता की रक्षा का प्रबंध भी इतना वैज्ञानिक है कि उसमें प्रक्षेप करना असंभव हैं। क्रम के अतिरिक्त जटा, माला, शिक्षा, लेखा, ध्वजा, दण्ड, रथ, घन इन आठ प्रकारों से वेद मन्त्रों के उच्चारण का विधान किया गया हैं। इस पाठ्क्रम का विधान ऐतरेय अरण्यक, प्रतिशाख्यादि में भी उसका उल्लेख है। इन जटा, माला, शिखा के नियम व्याड़ी ऋषि प्रणीत विकृति वल्ली[xvii] नामक ग्रन्थ में पाये जाते हैं। वेदों के शुद्ध पाठ को सुरक्षित रखने के लिए इसी प्रकार से अनुक्रमणियां भी पाई जाती है।

विदेशी से लेकर स्वदेशी विद्वान वेदों की शुद्धता की रक्षा पर मोहित होकर अपने विचार लिखते है।

मैक्समूलर महोदय - ऋग्वेद की अनुक्रमणी से हम उसके सूक्तों और पदों की पड़ताल करके निर्भीकता से कह सकते हैं कि अब भी ऋग्वेद के मन्त्रों, शब्दों और पदों की वही संख्या है जो कात्यायन के समय थी[xviii]
वेदों के पाठ हमारे पास इतनी शुद्धता से पहुंचायें गए है कि कठिनाई से कोई पाठभेद अथवा स्वरभेद तक सम्पूर्ण ऋग्वेद में मिल सके[xix]
मक्डोनेल महोदय लिखते है-
आर्यों ने प्राचीन काल से असाधारण सावधानता का वैदिक पाठ की शुद्धता रखने और उसे परिवर्तन अथवा नाश से बचाने के लिए उपयोग किया। इसका परिणाम यह  इतनी शुद्धता से सुरक्षित रखा गया है जो साहित्यिक इतिहास में अनुपम है[xx]
इस प्रकार से पश्चिमी विद्वान वेदों में बाद के काल में हुई मिलावट की कल्पना ल स्वयं खंडन कर अपनी परिकल्पना को स्वयं सिद्ध कर रहे हैं।



[i] MacDonnell Sanskrit literature p. ४३-४५ 
[ii] Vedic age P. 228
[iii] Vedic age P. 229
[iv] संस्कृत साहित्य का इतिहास पृष्ठ २१ लेखक बलदेव उपाध्याय
[v] हिन्दू जाति का उत्थान और पतन पृष्ठ २५५ लेखक श्री रजनीकान्त शास्त्री
[vi] Vedic age
[vii] भारत वर्ष का इतिहास प्रथम संस्करण पृष्ठ 77-78
[viii] सन्दर्भ लेख ऋग्वेद के 10 वें मंडल पर पश्चिमी विद्वानों का कुठाराघात प्रकाशक -सार्वदेशिक पत्रिका मई, जून, जुलाई अंक 1949
[ix] वेदों का यथार्थ स्वरुप नवम अध्याय- वेदों के अंगभंग (कांट-छांट) का अनुचित प्रयास पृष्ठ 261-269
[x] त्रयीपरिचय पृष्ठ ४९-५१
[xi] This is one of the hymns which have always been suspected as modern by European interpreters.- Vedic Hymns by Prof. Max Muller
[xii] The last verse is to my mind the most suspicious of all.- Vedic Hymns by Prof. Max Muller
[xiii] ऋग्वेद 1/164/46, ऋग्वेद 2/1/3, ऋग्वेद 2/1/4, ऋग्वेद 3/30/4, ऋग्वेद 3/30/5, ऋग्वेद 4/17/5, ऋग्वेद 5/32/11, ऋग्वेद 6/45/16, ऋग्वेद 2/26/3,
[xiv] ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका वेद संज्ञा विषय प्रकरण
[xv] सूत्र 5/2/59
[xvi] निरुक्त 1/5/1   
[xvii] विकृति वल्ली 1/5
[xviii] Ancient Sanskrit Literature p. 117
[xix]Origin of Religion p. 131
[xx] A History of Sanskrit Literature by MacDonnell p. 50