Monday, October 19, 2015

आधुनिक वाममार्ग- ओशो ध्यान केंद्र



आधुनिक वाममार्ग- ओशो ध्यान केंद्र
इस पोस्ट के साथ सलंग्न चित्र ओशो ध्यान शिविर का हैं जिसमें स्त्री-पुरुष नंग्न हो ध्यान कर रहे हैं। जोर जोर से चिल्लाना, नाचना, कूदना, हँसना, नाचना, गाना, जानवरों जैसी हरकतें करना इसे ध्यान कहना मूर्खता हैं।
धर्मानुसार जीवन अर्पण करने में संयम विज्ञान का अपना महत्व हैं। मनुष्यों को भोग का नशेड़ी बनाने का जो यह अभियान ओशो ध्यान के नाम से चलाया जा रहा हैं उसने अनेक घरों को बर्बाद कर दिया हैं। अनेक नौजवानों को बर्बाद कर दिया हैं।
वेदों में सदाचार, पाप से बचने, चरित्र निर्माण, ब्रहमचर्य आदि पर बहुत बल दिया गया हैं जैसे-
यजुर्वेद ४/२८ – हे ज्ञान स्वरुप प्रभु मुझे दुश्चरित्र या पाप के आचरण से सर्वथा दूर करो तथा मुझे पूर्ण सदाचार में स्थिर करो।
ऋग्वेद ८/४८/५-६ – वे मुझे चरित्र से भ्रष्ट न होने दे।
यजुर्वेद ३/४५- ग्राम, वन, सभा और वैयक्तिक इन्द्रिय व्यवहार में हमने जो पाप किया हैं उसको हम अपने से अब सर्वथा दूर कर देते हैं।
यजुर्वेद २०/१५-१६- दिन, रात्रि, जागृत और स्वपन में हमारे अपराध और दुष्ट व्यसन से हमारे अध्यापक, आप्त विद्वान, धार्मिक उपदेशक और परमात्मा हमें बचाए।
ऋग्वेद १०/५/६- ऋषियों ने सात मर्यादाएं बनाई हैं. उनमे से जो एक को भी प्राप्त होता हैं, वह पापी हैं. चोरी, व्यभिचार, श्रेष्ठ जनों की हत्या, भ्रूण हत्या, सुरापान, दुष्ट कर्म को बार बार करना और पाप करने के बाद छिपाने के लिए झूठ बोलना।
अथर्ववेद ६/४५/१- हे मेरे मन के पाप! मुझसे बुरी बातें क्यों करते हो? दूर हटों. मैं तुझे नहीं चाहता।
अथर्ववेद ११/५/१०- ब्रहमचर्य और तप से राजा राष्ट्र की विशेष रक्षा कर सकता हैं।
अथर्ववेद११/५/१९- देवताओं (श्रेष्ठ पुरुषों) ने ब्रहमचर्य और तप से मृत्यु (दुःख) का नष्ट कर दिया हैं।
ऋग्वेद ७/२१/५- दुराचारी व्यक्ति कभी भी प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकता।
इस प्रकार अनेक वेद मन्त्रों में संयम और सदाचार का उपदेश हैं।
सृष्टि के आदि से लेकर अंत तो सत्य सदा एक रहता हैं। इसलिए वेदाधारित सदाचार के सार्वभौमिक एवं सर्वकालिक नियमों की अनदेखी करना अज्ञानता का बोधक हैं।
डॉ विवेक आर्य

क्या आज आपने "Rapes of India" और "RapeTimes" अख़बार पढ़ा?



क्या आज आपने "Rapes of India" और "RapeTimes" अख़बार पढ़ा?

अंग्रेजी में दो प्रसिद्द अख़बारों के नाम हैं "Times of India" और Hindustan Times भारत में जिस गति से बलात्कार या रेप की घटनाएँ बढ़ रही हैं उस हिसाब से कुछ दिनों में इन अख़बारों के नाम बदल कर "Rapes of India" और "RapeTimes" करना पड़ेगा। अचरज में मत पड़े। जब दिल्ली का नाम परिवर्तन कर उसे "Rape Capital" की संज्ञा से पुरस्कृत किया जा सकता है तो फिर यह संज्ञा देने वाले समाचार पत्रों का यथास्वरूप नामकरण क्यों नहीं हो सकता। सोचिये इन बलात्कार समाचार पत्रों के पृष्ठ कैसे होंगे?

पृष्ठ 1

आज दिल्ली में 3 और बलात्कार हुए।
तीनों बलात्कार की पीड़ित लड़कियां 5 वर्ष की आयु से कम निकली।
बलात्कार करने वाले सभी लड़के नाबालिग।
एक लड़की शौच करने निकली तब शिकार बनी।
दूसरी खेल रही थी टॉफी दिलाने के बहाने शिकार बनी।
तीसरी के किरायेदार ने उसके साथ दुष्कर्म किया।
तीनों बच्ची विभिन्न हस्पतालों के चक्कर खाते के पश्चात सफदरजंग हस्पताल में भर्ती।
तीनों की हालत गंभीर, तीनों को अनेक बार सर्जरी की आवश्यकता।
सभी नाबालिग रिमांड पर। सबसे छोटे की आयु 9 वर्ष।
पृष्ठ 2

केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस को बलात्कार के लिए दोषी बताया।
केजरीवाल द्वारा यह बयान दिया गया की दिल्ली पुलिस उनकी सलाह पर ध्यान नहीं देती।
जब तक उन्हें दिल्ली पुलिस का कार्यभार, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा और सबसे आवश्यक उन्हें भारत का प्रधान मंत्री नहीं बनाया जायेगा तब तक दिल्ली में बलात्कार नहीं रुकेंगे।
मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने आज दिल्ली पुलिस भवन के आगे प्रधान मंत्री नरेंदर मोदी का पुतला दिल्ली में हुए बलात्कारों के विरोध में फूंका। उनका कहना था जब से दिल्ली में नरेंदर मोदी जी की सरकार आई हैं तब से बलात्कार के मामलों में जबरदस्त वृद्धि हुई हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह का बयान लड़कों और लड़कियों दोनों से गलती हो जाती हैं। माँ-बाप को अपनी बच्चियों का ध्यान रखना चाहिए।
उत्तर प्रदेश के दूसरे मंत्री आजम खान का बयान की वह बढ़ते बलात्कार के लिए संयुक्त राष्ट्र को चिट्ठी लिखेंगे।
पृष्ठ 3
कुछ संगठनों ने बढ़ते बलात्कार का कारण बढ़ती फिल्मों, अश्लील साइट्स आदि के माध्यम से बढ़ती अश्लीलता बताया तो कुछ आधुनिक बुद्धिजीवी जिसमें अश्लील उपन्यास लिखकर पेट भरने वाली लेखिका, अर्धनंग और अश्लील फिल्में बनाकर पेट भरने वाले फ़िल्म निर्देशक, अपना जिस्म दिखाकर पेट भरने वाली अभिनेत्रियां मीडिया में आकर बयानबाजी करने लगे की खुले विचार हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है।
हिन्दू धर्म कामसूत्र और खजुराओ की मूर्तियों का प्रचारक हैं।
हिन्दुत्ववादी लोग नारी को कपड़ों में कैद करना चाहते हैं।
अश्लील साइट्स देखना सभी की नजदीकी स्वतंत्रता हैं।
लिव-इन-रिलेशन में रहना, समलैंगिक होना, विवाह पूर्व या पश्चात अनेकों से सम्बन्ध होना आधुनिक विचारों का प्राय: हैं।
शर्लिन चोपड़ा और पूनम पाण्डेय ने कपड़ों के स्थानों पर अजग़र लपेट का अपना प्रतीरोध प्रदर्शित किया।
महेश भट्ट ने सन्नी लियॉन को उसकी बेदाग छवि, नैतिकता, समाज को देन के लिए भारत रत्न की मांग कर डाली।
पृष्ठ 4
फुल पेज पर विज्ञापन ही विज्ञापन
पहला सन्नी लेओनी के कंडोम का विज्ञापन
दूसरा DeoSpray में एक अर्ध नग्न मॉडल के चारों और deo लगाने पर लड़कियां मक्खियों के समान भिन्नभिना रही हैं।
तीसरा एक लड़की ब्राण्डेड जीन्स पहन कर अपनी figure दिखा रही हैं।
चौथा एक पुरुष अंडरवेअर पहन कर अपनी मर्दानगी से महिलाओं को आकर्षित कर रहा हैं।
अगले दिन, अगले सप्ताह , अगले साल भर Rape Times अखबार में यही ख़बरें अपने नाम बदलकर फिर से छपती रही। नतीजा वहीं का वहीं । भारत की मासूम लड़कियां ऐसे ही पीड़ित होती रहेगी। हर रोज अनेक लड़कियां "निर्भया" के समान अत्याचार का सामना करती रहेगी। नेता अपनी राजनैतिक रोटियां सकते रहेंगे। जिनका धंधा अश्लीलता परोस कर चलता है। वो कभी मंद नहीं होगा। व्यापारी कम्पनियां NGO धंधे वालो के साथ मिलकर अभिव्यक्ति और नीज स्वतंत्रता के नाम पर अपने उत्पाद बेचकर भारी मुनाफा कमाने के लिए युवाओं की सोच को प्रदूषित करती रहेगी। हमारी सरकार अश्लीलता को रोकने का जैसे ही कोई उपाय करेगी। सेक्युलर गैंग वाले उसकी इतनी आलोचना करेंगे की वह वोट के भय के चलते अपने पांव पीछे खींच लेगी।
अंत में ---
मेरे देश की बेटी यूँ ही पिसती रहेगी !
मेरे देश की बेटी यूँ ही मरती रहेगी !

(समाज में नारी जाति को देवी कहा गया हैं। उनका सम्मान करना सभी का दायित्व हैं। आईये इस अश्लीलता रूपी दानव का देवी हाथों नाश कर एक आदर्श समाज का निर्माण करे।इस लेख को हर अश्लीलता के विरुद्ध समर्थन करने वाला मित्र शेयर अवश्य करे)

डॉ विवेक आर्य

Saturday, October 17, 2015

क्या हम आज भी गुलाम हैं?


क्या हम आज भी गुलाम हैं?

"विदेशियों के आर्यावर्त में राज्य होने का कारण आपस कि फुट-मतभेद, ब्रह्मचर्य का सेवन न करना, विद्या न पढ़ना पढ़ाना, बाल्यावस्था में अस्वयंवर विवाह, विषयासक्ति कुलक्षण, वेद-विद्या का अप्रचार आदि कुकर्म हैं"- स्वामी दयानंद।


स्वामी जी द्वारा कहे गये इस कथन पर पाठक गौर करेगए तो पायेगे कि पराधीन भारत और स्वाधीन भारत में सामाजिक और राजनैतिक परिस्तिथियों में कुछ विशेष अंतर नहीं हैं, क्यूंकि हम तब भी गुलाम थे और आज भी गुलाम हैं।

      स्वामी दयानंद अपने चित्तोड़ भ्रमण के समय चित्तोड़ के प्रसिद्द किले को देखने गए। किले की हालत एवं राजपूत क्षत्राणियों के जौहर के स्थान को देखकर उनके मुख से निकला की अगर ब्रह्मचर्य की मर्यादा का मान होता तो चित्तोड़ का यह हश्र नहीं होता। काश चित्तोड़ में गुरुकुल की स्थापना हो जिससे ब्रह्मचर्य धर्म का प्रचार हो सके।

स्वामी दयानंद के चित्तोड़ सम्बंधित चिंतन में ब्रह्मचर्य पालन से क्या सम्बन्ध था यह इतिहास के गर्भ में छिपा सत्य हैं। जेम्स टॉड के अनुसार राजपूतों की सबसे बुरी आदत अफीम खाना और अधिक विवाह करना था। अनेक विवाहों से उत्पन्न अनेक राजकुमारों में सत्ता के लिए सदा संघर्ष रहता था। अनेक बार वे राजकुमार अपने शत्रु का सहारा लेकर अपने ही भाई पर आक्रमण करते थे।

1.  राणा सांगा एक और जिस बाबर से युद्ध किया था। उसी बाबर को भारत पर हमला करने का निमंत्रण देने वाली रानी कर्मवती थी जो मारवाड़ के राव सूजा की पोती थी जिसने रत्न सिंह से मतभेद के चलते ऐसा किया था।

2. उदय सिंह ने धीरबाई से मोह के चलते उसके बेटे जगमाल चित्तोड़ का उत्तराधिकारी बना दिया जबकि राजपूत सरदारों ने प्रताप को राणा बना दिया।इससे नाराज होकर जगमाल, सगर और अगर अकबर की सेना में भर्ती हो गए और जीवन भर राणा प्रताप के विरुद्ध लड़ते रहे।

3. वीर शिवाजी का पुत्र शम्भाजी भी व्यसनी था। उसने अपने सौतेले भाई राजाराम को जेल में डाल दिया और गद्दी पर बैठ गया। उसके व्यसन के दोष के चलते वह औरंगज़ेब का कैदी बन मारा गया।

4. भरतपुर के राजा सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह और नाहर सिंह गद्दी के लिए संघर्ष हुआ। बाद में नवल सिंह और रणजीत सिंह के मध्य संघर्ष हुआ। इनके सभी के संघर्ष के चलते सम्पूर्ण राजकोष को खाली हो गया। उनका एक पुत्र रतन सिंह व्यसन के चलते सदा नर्तकियों से घिरा रहता था। उसकी हत्या भी शराब के नशे में वेशयाओं का नृत्य देखते हुई थी।

5. वीर दुर्गा दास राठोड के संरक्षण में पला बढ़ा अजित सिंह भी विलासिता का शिकार हो गया। उसी के पुत्र ने उसे उसकी विलासिता के चलते मार डाला था।

इतिहास की इन घटनाओं का उदहारण इसीलिए दिया जा रहा हैं क्यूंकि इनसे प्रेरणा लेने के स्थान पर भारत देश के युवाओं को बर्बाद करने के लिए अश्लीलता और व्यसनों का जहर उनके मस्तिष्कों में भरा जा रहा हैं। अलग अलग कुतर्क देकर शराब पीने के लिए, व्यभिचार करने के लिए युवाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा हैं। यही कारण बलात्कार, लड़कियों से छेड़छाड़, बिगड़ते घर और सामाजिक अव्यवस्था को बढ़ावा देते हैं। हमारा समाज इतना नपुंसक हो गया है की वह अपने प्राचीन ब्रह्मचर्य गौरव की रक्षा करने में असक्षम हो गया हैं। हाल ही में सरकार द्वारा अश्लील साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाने के विवाद ने इतना तूल पकड़ा की सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। मैं इसे सरकार की कमजोरी मानता हूँ जो वह अपनी बात को सक्षम रूप से रखने के स्थान पर पीछे हट गई। देश के युवाओं का चरित्र निर्माण  हमारे अस्तित्व, हमारी वैचारिक स्वतंत्रता, हमारी बुद्धि के सकारात्मक विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। क्यूंकि एक आदर्श समाज के निर्माण की बुनियाद इसी सिद्धांत पर टिकी हैं। वर्तमान के जहरीले सामाजिक परिवेश को देखकर केवल यही मन में विचार आता हैं कि "क्या हम आज भी गुलाम हैं?"

डॉ विवेक आर्य

Thursday, October 15, 2015

रामायण में सीता की अग्निपरीक्षा



रामायण में सीता की अग्निपरीक्षा

रामायण महाकाव्य में सीता अग्निपरीक्षा एक विवादित प्रसंग के रूप में जाना जाता है। इस प्रसंग के अनुसार राम द्वारा रावण को युद्ध में हराने के पश्चात लंका में सीता को स्वीकार करने से पहले सीता की अग्निपरीक्षा ली। अग्नि में प्रवेश करने के पश्चात भी सीता का शरीर भस्म नहीं हुआ। इससे सीता की पवित्रता सिद्ध हुई और श्री राम द्वारा सीता को पवित्र जानकार स्वीकार कर लिया गया।
सीता कि अग्निपरीक्षा के प्रसंग को लेकर अनेक लोगों के विभिन्न विभिन्न मत हैं। महिला अधिकारों के नाम पर दुकानदारी करने वाले इसे नारी जाति पर अत्याचार, शोषण, नारी के अपमान के रूप में देखते हैं। विधर्मी मत वाले इस प्रसंग के आधार पर हिन्दू धर्म को नारी शोषक के रूप में चित्रित करते हैं जिससे धर्मान्तरण को समर्थन मिले। अम्बेडकरवादी इसे मनुवाद, ब्राह्मणवाद के प्रतीक के रूप में उछालकर अपनी भड़ास निकालते हैं। जबकि हमारे कुछ भाई इसका श्री राम की महिमा और चमत्कार के रूप में गुणगान करते हैं। क्यूंकि उनके लिए श्री रामचन्द्र जी भगवान के अवतार है और भगवान के लिए कुछ भी संभव है।

इस लेख में सीता की अग्निपरीक्षा को तर्क की कसौटी पर पक्षपात रहित होकर परीक्षा करने पर ही हम अंतिम निष्कर्ष निकालेंगे।

1. वाल्मीकि रामायण के श्री रामचन्द्र महान व्यक्तित्व, मर्यादापुरुषोत्तम, ज्ञानी, वीर, महामानव, ज्येष्ठ-श्रेष्ठ आत्मा, परमात्मा का परम भक्त, धीर-वीर पुरुष, विजय के पश्चात् भी विनम्रता आदि गुणों से विभूषित, महानायक, सद्गृहस्थ तथा आदर्श महापुरुष थे। ऐसे महान व्यक्तित्व के महान गुणों के समक्ष सीता की अग्निपरीक्षा कर पवित्रता को निर्धारित करना एक बलात् थोपी गई, आरोपित, मिथ्या एवं अस्वीकार्य घटना प्रतीत होता हैं। श्री राम के महान व्यक्तित्व एवं आदर्श विचारों के समक्ष यह प्रसंग अत्यंत तुच्छ हैं। इससे सिद्ध हुआ कि यह प्रसंग बेमेल हैं।

2. वैदिक काल में नारी जाति का स्थान समाज में मध्य काल के समान निकृष्ट नहीं था। वैदिक काल में नारी वेदों की ऋषिकाओं से लेकर गार्गी, मैत्रयी के समान महान विदुषी थी, कैकयी के समान महान क्षत्राणी थी जो राजा दशरथ के साथ युद्ध में पराक्रम दिखाती थी, कौशलया के समान दैनिक अग्निहोत्री और वेदपाठी थी। सम्पूर्ण रामायण इस तथ्य को सिद्ध करता है कि रावण की अशोक वाटिका में बंदी सीता से रावण शक्तिशाली और समर्थ होते हुए भी सीता की इच्छा के विरुद्ध उसके निकट तक जाने का साहस न कर सका। यह उस काल की सामाजिक मर्यादा एवं नारी जाति की पत्नीव्रता शक्ति का उद्बोधक हैं। रामायण काल में सामाजिक मर्यादा का एक अन्य उदहारण इस तथ्य से भी मिलता है कि परनारी को अपहरण करने वाला रावण और परपुरुष की इच्छा करने वाली शूर्पनखा को उनके दुराचार के राक्षस कहा गया जबकि सभी प्रलोभनों से विरक्त एवं एक पत्नीव्रत श्री राम और शूर्पणखा के व्यभिचारी प्रस्ताव को ठुकराने वाले लक्ष्मण जी को देव तुल्य कहा गया हैं। ऐसे महान समाज में विदुषी एवं तपस्वी सीता का सत्य वचन ही उसकी पवित्रता को सिद्ध करने के लिए पूर्ण था। इस आधार पर भी सीता की अग्निपरीक्षा एक मनगढ़त प्रसंग सिद्ध होता है।

3. वैज्ञानिक दृष्टि से भी सोचे तो यह संभव ही नहीं है कि किसी मनुष्य के शरीर को अग्नि के सुपुर्द किया जाये और वह बिना जले सकुशल बच जाये। क्या अग्नि किसी की पवित्रता की परीक्षा लेने में सक्षम है? वैज्ञानिक तर्क के विरुद्ध सीता अग्निपरीक्षा को चमत्कार की संज्ञा देना मन बहलाने के समान हैं। केवल आस्था, विश्वास और श्रद्धा रूपी मान्यता से संसार नहीं चलता। किसी भी मान्यता को सत्य एवं ज्ञान से सिद्ध होने पर ही ग्रहण करने योग्य मानना चाहिए। इस आधार पर भी सीता की अग्निपरीक्षा एक मनगढ़त प्रसंग सिद्ध होता है।

4. सुग्रीव की पत्नी रूमा जिसे बाली ने अपना बंधक बना कर अपने महलों में रखा हुआ था को बाली वध के पश्चात जब सुग्रीव स्वीकार कर सकता है। तो श्री राम हरण की हुई सीता को क्यों स्वीकार नहीं करते? श्री राम को आदर्श मानने वाले इस तर्क का कोई तोड़ नहीं खोज सकते।

5. इसी पुस्तक में रामायण के प्रक्षिप्त (मिलावट) होने (विशेष रूप से उत्तर कांड) का वर्णन अन्य लेख में किया गया है। उस आधार पर सीता की अग्निपरीक्षा का प्रसंग प्रक्षिप्त होने के कारण अस्वीकार्य है। रामायण की महान गाथा तो युद्ध के पश्चात हनुमान द्वारा राम विजय की सीता को सूचना देने के लिए अशोक वाटिका जाने। श्री राम द्वारा सीता के पुनर्मिलन और अयोध्या वापिस लौट जाने के साथ समाप्त हो जाती हैं। रामायण में मिलावट कर श्री राम के आदर्श चरित्र को दूषित करने एवं सीता कि अग्निपरीक्षा को व्यर्थ आरोपित करने का कार्य मध्य काल की देन हैं। इस आधार पर भी सीता की अग्निपरीक्षा एक मनगढ़त प्रसंग सिद्ध होता हैं।
रामायण नारी जाति के सम्मान की भी शौर्य गाथा भी है। यह सन्देश देती है कि अगर एक अत्याचारी परनारी का हरण करता है तो चाहे सागर के ऊपर पुल भी बनाना पड़े, चाहे वर्षों तक जंगलों में भटकना पड़े, चाहे अपनी शक्ति कितनी भी सीमित क्यों न हो। मगर दृढ़ निश्चयी एवं सत्य मार्ग के पथिक नारी जाति के तिरस्कार का, अपमान का प्रतिशोध प्राण हरण कर ही लेते हैं। ऐसी महान गाथा में सीता की अग्निपरीक्षा जैसा अनमेल, अप्रासंगिक वर्णन प्रक्षिप्त या मिलावटी होने के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं।

डॉ विवेक आर्य


Wednesday, October 14, 2015

औरंगज़ेब इतिहास की दृष्टि में नायक या खलनायक





औरंगज़ेब इतिहास की दृष्टि में नायक या खलनायक

मुगल खानदान में सबसे लम्बे समय तक राज औरंगज़ेब का रहा था। जितना लम्बा औरंगज़ेब का राज था उतनी ही लम्बी उसके अत्याचारों की सूची थी। भारत के 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात पाठ्यकर्म में इतिहास के उन रक्तरंजित पृष्ठों को जिनमें मुसलमानों ने हिन्दुओं पर अथाह अत्याचार किये थे स्थान नहीं दिया गया। देश के नीतिकारों का मानना था कि इससे हिन्दू -मुस्लिम वैमनस्य फैलेगा। मेरे विचार से यह सोच अपरिपक्वता की बोधक है। देशवासियों को सत्य के दिग्दर्शन करवाने से देश के नागरिकों विशेष रूप से मुसलमानों को जितना सत्य का बोध होगा, उतने वे अपने आपको भारतीयता के निकट समझेगे। जब समस्त देशवासियों को चाहे हिन्दू हो या मुसलमान यह बोध होगा कि सभी के पूर्वज श्री राम और श्री कृष्ण जी को अराध्य रूप में मानते थें। इससे धर्म के नाम पर होने वाले विवाद अपने आप रुक जाते। सत्य की आवाज़ का गला दबाने के कारण रह रहकर यह उठती रही और इस समस्या का हल निकालने के स्थान पर उसे और अधिक विकट बनता रहा। कुछ अवसरवादी लोग अपने क्षणिक लाभों की पूर्ति के लिए उनका गलत फायदा उठाते रहते हैं। ऐसा ही अन्याय औरंगज़ेब को आलमगीर, जिन्दा पीर और महान शासक बताने वाले लोगों ने देशवासियों के साथ किया हैं।

औरंगजेब को न्यायप्रिय एवं शांतिदूत सिद्ध करने के लिए एक छोटी सी पुस्तक "इतिहास के साथ यह अन्याय: प्रो बी एन पाण्डेय" हाल ही में प्रकाशित हुई है । पुस्तक के लेखक दुनिया के सबसे अनभिज्ञ प्राणी के समान व्यवहार करते हुए लिखता है कि औरंगजेब ने अपने आदेशो में किसी भी हिन्दू मंदिर को कभी तोड़ने का हुकुम नहीं दिया। अपितु औरंगज़ेब द्वारा अनेक हिन्दू मंदिरों को दान देने का उल्लेख मिलता हैं। लेखक ने बनारस के विश्वनाथ मंदिर को दहाने के पीछे यह कारण बताया है कि औरंगजेब बंगाल जाते समय बनारस से गुजर रहा था। उसके काफिले के हिन्दू राजाओं ने उससे विनती की कि अगर बनारस में एक दिन का पड़ाव कर लिया जाये तो उनकी रानियाँ बनारस में गंगा स्नान और विश्वनाथ मंदिर में पूजा अर्चना करना चाहती हैं। औरंगजेब ने यह प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया। सैनिकों की सुरक्षा में रानियां गंगा स्नान करने गई। उनकी रानियों ने गंगा स्नान भी किया और मंदिर में पूजा करने भी गई। लेकिन एक रानी मंदिर से वापिस नहीं लौटी। औरंगजेब ने अपने बड़े अधिकारियों को मंदिर की खोज में लगाया। उन्होंने देखा की दिवार में लगी हुई मूर्ति के पीछे एक खुफियाँ रास्ता है और मूर्ति हटाने पर यह रास्ता एक तहखाने में जाता है। उन्होंने तहखाने में जाकर देखा की यहाँ रानी मौजूद है। जिसकी इज्जत लूटी गई और वह चिल्ला रही थी। यह तहखाना मूर्ति के ठीक नीचे बना हुआ था। राजाओं ने सख्त कार्यवाही की मांग की। औरंगजेब ने हुक्म दिया की चूँकि इस पावन स्थल की अवमानना की गयी है। इसलिए विश्वनाथ की मूर्ति यहाँ से हटाकर कही और रख दी जाये और मंदिर को तोड़कर दोषी महंत को सख्त से सख्त सजा दी जाये। यह थी विश्वनाथ मंदिर तोड़ने की पृष्ठभूमि जिसे डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी पुस्तक "Feather and the stones" में भी लिखा हैं। आइये लेखक के इस प्रमाण की परीक्षा करे –

1. सर्वप्रथम तो औरंगजेब के किसी भी जीवन चरित में ऐसा नहीं लिखा है कि वह अपने जीवन काल में युद्ध के लिए कभी बंगाल गया था।

2. औरंगजेब के व्यक्तित्व से स्पष्ट था कि वह हिन्दू राजाओं को अपने साथ रखना नापसंद करता था क्यूंकि वह उन्हें "काफ़िर" समझता था।

3. युद्ध में लाव लश्कर को ले जाया जाता हैं ना कि सोने से लदी हुई रानियों की डोलियाँ लेकर जाई जाती हैं।

4. जब रानी गंगा स्नान और मंदिर में पूजा करने गयी तो उनके साथ सुरक्षा की दृष्टी से कोई सैनिक थे तो फिर एक रानी का अपहरण बिना कोलाहल के कैसे हो गया?

5. दोष विश्वनाथ की मूर्ति का था अथवा पाखंडी महंत का तो सजा केवल महंत को मिलनी चाहिए थी। हिन्दुओं के मंदिर को तोड़कर औरंगजेब क्या हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ नहीं कर रहा था?

6. पट्टाभि जी की जिस पुस्तक का प्रमाण लेखक दे रहे है सर्वप्रथम तो वह पुस्तक अब अप्राप्य है। दूसरे उस पुस्तक में इस घटना के सन्दर्भ में लिखा है कि इस तथ्य का कोई लिखित प्रमाण आज तक नहीं मिला है। केवल लखनऊ में रहना वाले किसी मुस्लिम व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति ने इसका मौखिक वर्णन देने के बाद। इस का प्रमाण देने का वचन दिया था। परन्तु उसकी असमय मृत्यु से उसका प्रमाण प्राप्त न हो सका। इस व्यक्ति के मौखिक वर्णन को प्रमाण बताना इतिहास का मजाक बनाने के समान ही है। कूल मिला कर यह औरंगजेब को निष्पक्ष घोषित करने का एक असफल प्रयास के अतिरिक्त ओर कुछ नहीं है।

सत्य तो इतिहास है और इतिहास का आंकलन अगर औरंगजेब के फरमानों से ही किया जाये तो निष्पकता उसे ही कहेंगे। फ्रेंच इतिहासकार फ्रैंकोइस गौटियर (Francois Gautier) ने औरंगजेब द्वारा फारसी भाषा में जारी किये गए फरमानों को पूरे विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर सभी छदम इतिहासकारों के मुहँ पर ताला लगा दिया। जिसमे हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने और हिन्दू मंदिरों को तोड़ने की स्पष्ट आज्ञा थी। ध्यान दीजिये औरंगजेब ने “आलमगीर” बनने की चाहत में अपनी सगे भाइयों की गर्दन पर छुरा चलाने से लेकर अपने बूढ़े बाप को जेल में डालकर प्यासा मारा था। तो उससे हिन्दू प्रजा की सलामती की इच्छा रखना बेईमानी होगी।

औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारी किये गए फरमानों का कच्चा चिट्ठा

1. 13 अक्तूबर,1666- औरंगजेब ने मथुरा के केशव राय मंदिर से नक्काशीदार जालियों को जोकि उसके बड़े भाई दारा शिकोह द्वारा भेंट की गयी थी को तोड़ने का हुक्म यह कहते हुए दिया कि किसी भी मुसलमान के लिए एक मंदिर की तरफ देखने तक की मनाही है। और दारा शिको ने जो किया वह एक मुसलमान के लिए नाजायज है।

2. 12 सितम्बर 1667- औरंगजेब के आदेश पर दिल्ली के प्रसिद्द कालकाजी मंदिर को तोड़ दिया गया।

3. 9 अप्रैल 1669 को मिर्जा राजा जय सिंह अम्बेर की मौत के बाद औरंगजेब के हुक्म से उसके पूरे राज्य में जितने भी हिन्दू मंदिर थे, उनको तोड़ने का हुक्म दे दिया गया और किसी भी प्रकार की हिन्दू पूजा पर पाबन्दी लगा दी गयी। जिसके बाद केशव देव राय के मंदिर को तोड़ दिया गया और उसके स्थान पर मस्जिद बना दी गयी। मंदिर की मूर्तियों को तोड़ कर आगरा लेकर जाया गया और उन्हें मस्जिद की सीढियों में गाड़ दिया गया और मथुरा का नाम बदल कर इस्लामाबाद कर दिया गया। इसके बाद औरंगजेब ने गुजरात में सोमनाथ मंदिर का भी विध्वंश कर दिया।

4. 5 दिसम्बर 1671 औरंगजेब के शरीया को लागु करने के फरमान से गोवर्धन स्थित श्री नाथ जी की मूर्ति को पंडित लोग मेवाड़ राजस्थान के सिहाद गाँव ले गए। जहाँ के राणा जी ने उन्हें आश्वासन दिया की औरंगजेब की इस मूर्ति तक पहुँचने से पहले एक लाख वीर राजपूत योद्धाओं को मरना पड़ेगा।

5. 25 मई 1679 को जोधपुर से लूटकर लाई गयी मूर्तियों के बारे में औरंगजेब ने हुकुम दिया कि सोने-चाँदी-हीरे से सज्जित मूर्तियों को जिलालखाना में सुसज्जित कर दिया जाये और बाकि मूर्तियों को जामा मस्जिद की सीढियों में गाड़ दिया जाये।

6. 23 दिसम्बर 1679 औरंगजेब के हुक्म से उदयपुर के महाराणा झील के किनारे बनाये गए मंदिरों को तोड़ा गया। महाराणा के महल के सामने बने जगन्नाथ के मंदिर को मुट्ठी भर वीर राजपूत सिपाहियों ने अपनी बहादुरी से बचा लिया।

7. 22 फरवरी 1980 को औरंगजेब ने चित्तोड़ पर आक्रमण कर महाराणा कुम्भा द्वाराबनाएँ गए 63 मंदिरों को तोड़ डाला।

8. 1 जून 1681 औरंगजेब ने प्रसिद्द पूरी का जगन्नाथ मंदिर को तोड़ने का हुकुम दिया।

9. 13 अक्टूबर 1681 को बुरहानपुर में स्थित मंदिर को मस्जिद बनाने का हुकुम औरंगजेब द्वारा दिया गया।

10. 13 सितम्बर 1682 को मथुरा के नन्द माधव मंदिर को तोड़ने का हुकुम औरंगजेब द्वारा दिया गया। इस प्रकार अनेक फरमान औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारी किये गए।

हिन्दुओं पर औरंगजेब द्वारा अत्याचार करना

2 अप्रैल 1679 को औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया जिसका हिन्दुओं ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर शांतिपूर्वक विरोध किया परन्तु उसे बेरहमी से कुचल दिया गया। इसके साथ-साथ मुसलमानों को करों में छूट दे दी गयी जिससे हिन्दू अपनी निर्धनता और कर न चूका पाने की दशा में इस्लाम ग्रहण कर ले। 16 अप्रैल 1667 को औरंगजेब ने दिवाली के अवसर पर आतिशबाजी चलाने से और त्यौहार बनाने से मना कर दिया गया। इसके बाद सभी सरकारी नौकरियों से हिन्दू कर्मचारियों को निकाल कर उनके स्थान पर मुस्लिम कर्मचारियों की भरती का फरमान भी जारी कर दिया गया। हिन्दुओं को शीतला माता, पीर प्रभु आदि के मेलों में इकठ्ठा न होने का हुकुम दिया गया। हिन्दुओं को पालकी, हाथी, घोड़े की सवारी की मनाई कर दी गयी। कोई हिन्दू अगर इस्लाम ग्रहण करता तो उसे कानूनगो बनाया जाता और हिन्दू पुरुष को इस्लाम ग्रहण करनेपर 4 रुपये और हिन्दू स्त्री को 2 रुपये मुसलमान बनने के लिए दिए जाते थे। ऐसे न जाने कितने अत्याचार औरंगजेब ने हिन्दू जनता पर किये और आज उसी द्वारा जबरन मुस्लिम बनाये गए लोगों के वंशज उसका गुण गान करते नहीं थकते हैं।

एक मुहावरा है कि एक जूठ को छुपाने के लिए हज़ार जूठ बोलने पड़ते हैं। औरंगज़ेब को न्यायप्रिय घोषित करने वालों ने तो उसके अत्याचार और मतान्धता को छुपाने के लिए इतने कमजोर साक्ष्य प्रस्तुत किये जो एक ही परीक्षा में ताश के पत्तों के समान उड़ गए। यह भारत के मुसलमानों के समक्ष यक्ष प्रश्न है कि उनके लिए आदर्श कौन है?

औरंगज़ेब जैसा अत्याचारी अथवा उसके अत्याचार का प्रतिकार करने वाले वीर शिवाजी महाराज।

डॉ विवेक आर्य

सन्दर्भ लेख

1. फ्रैंकोइस गौटियर (Francois Gautier) द्वारा प्रकाशित औरंगज़ेब के फारसी भाषा के फरमानों की सूची

2. कोनरेड एल्स्ट (Koenraad Elst) द्वारा प्रकाशित लेख Why did Aurangzeb Demolish the Kashi Vishvanath?

3. इतिहास के साथ यह अन्याय: प्रो बी एन पाण्डेय

Tuesday, October 13, 2015

क्या अकबर महान था?




क्या अकबर महान था?



भारत में प्रचलित इतिहास के लेखक मुग़ल सल्तनत के सभी शासकों के मध्य अकबर को विशिष्ट स्थान देते हुए अकबर "महान" के नाम से सम्बोधित करते हैं। किसी भी हस्ती को "महान" बताने के लिए उसका जीवन, उसका आचरण महान लोगों के जैसा होना चाहिए। अकबर के जीवन के एक आध पहलु जैसे दीन-ए-इलाही मत चलाना, हिन्दुओं से कर आदि हटाना को ये लेखक बढ़ा चढ़ाकर बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते मगर अकबर के जीवन के अनेक ऐसे पहलु है जिनसे भारतीय जनमानस का परिचय नहीं हैं। इस लेख के माध्यम से हम अकबर के महान होने की समीक्षा करेंगे।

व्यक्तिगत जीवन में महान अकबर



कई इतिहासकार अकबर को सबसे सुन्दर आदमी घोषित करते हैं । विन्सेंट स्मिथ इस सुंदरता का वर्णन यूँ करते हैं-

“अकबर एक औसत दर्जे की लम्बाई का था । उसके बाएं पैर में लंगड़ापन था । उसका सिर अपने दायें कंधे की तरफ झुका रहता था। उसकी नाक छोटी थी जिसकी हड्डी बाहर को निकली हुई थी। उसके नाक के नथुने ऐसे दीखते थे जैसे वो गुस्से में हो। आधे मटर के दाने के बराबर एक मस्सा उसके होंठ और नथुनों को मिलाता था। वह गहरे रंग का था।”

अबुल फज़ल ने अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है- “अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थी और हर एक का अपना अलग घर था।” ये पांच हजार औरतें उसकी 36 पत्नियों से अलग थी।

बाबर शराब का शौक़ीन था, इतना कि अधिकतर समय धुत रहता था। [बाबरनामा] हुमायूं अफीम का शौक़ीन था और इस वजह से बहुत लाचार भी हो गया था। अकबर ने ये दोनों आदतें अपने पिता और दादा से विरासत में ली थी।

नेक दिल अकबर ग़ाजी का आगाज़



6 नवम्बर 1556 को 14 साल की आयु में अकबर ने पानीपत की लड़ाई में भाग लिया था। हिंदू राजा हेमू की सेना मुग़ल सेना को खदेड़ रही थी कि अचानक हेमू को आँख में तीर लगा और वह बेहोश हो गया। उसे मरा सोचकर उसकी सेना में भगदड़ मच गयी। तब हेमू को बेहोशी की हालत में अकबर के सामने लाया गया और इसने बहादुरी से बेहोश हेमू का सिर काट लिया। एक गैर मुस्लिम को मौत के घाट उतारने के कारण अकबर को गाजी के खिताब से नवाजा गया। हेमू के सिर को काबुल भिजा दिया गया एवं उसके धड़ को दिल्ली के दरवाजे से लटका दिया गया। जिससे नए बादशाह की रहमदिली सब को पता चल सके। अकबर की सेना दिल्ली में मारकाट कर अपने पूर्वजों की विरासत का पालन करते हुए काफिरों के सिरों से मीनार बनाकर जीत का जश्न बनाया गया। अकबर ने हेमू के बूढ़े पिता को भी कटवा डाला और औरतों को शाही हरम में भिजवा दिया। अपने आपको गाज़ी सिद्ध कर अकबर ने अपनी “महानता” का परिचय दिया था[i]







अकबर और बैरम खान



हुमायूँ की बहन की बेटी सलीमा जो अकबर की रिश्ते में बहन थी का निकाह अकबर के पालनहार और हुमायूँ के विश्वस्त बैरम खान के साथ हुआ था। इसी बैरम खान ने अकबर को युद्ध पर युद्ध जीतकर भारत का शासक बनाया था। एक बार बैरम खान से अकबर किसी कारण से रुष्ट हो गया। अकबर ने अपने पिता तुल्य बैरम खान को देश निकाला दे दिया। निर्वासित जीवन में बैरम खान की हत्या हो गई। पाठक इस हत्या के कारण पर विचार कर सकते है। अकबर यहाँ तक भी नहीं रुका। उसने बैरम खान की विधवा, हुमायूँ की बहन और बाबर की पोती सलीमा के साथ निकाह कर अपनी “महानता” को सिद्ध किया[ii]

स्त्रियों के संग व्यवहार

बुंदेलखंड की रानी दुर्गावती की छोटी सी रियासत थी। न्यायप्रिय रानी के राज्य में प्रजा सुखी थी। अकबर की टेढ़ी नज़र से रानी की छोटी सी रियासत भी बच न सकी। अकबर अपनी बड़ी से फौज लेकर रानी के राज्य पर चढ़ आया। रानी के अनेक सैनिक अकबर की फौज देखकर उसका साथ छोड़ भाग खड़े हुए। पर फिर हिम्मत न हारी। युद्ध क्षेत्र में लड़ते हुए रानी तीर लगने से घायल हो गई। घायल रानी ने अपवित्र होने से अच्छा वीरगति को प्राप्त होना स्वीकार किया। अपने हृदय में खंजर मारकर रानी ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अकबर का रानी की रियासत पर अधिकार तो हो गया। मगर रानी की वीरता और साहस से उसके कठोर हृदय नहीं पिघला। अपने से कहीं कमजोर पर अत्याचार कर अकबर ने अपनी “महानता” को सिद्ध किया था[iii]

न्यायकारी अकबर

थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु और पुरी के बीच पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था। दोनों ने अकबर के समक्ष विवाद सुलझाने का निवेदन किया। अकबर ने आदेश दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने वाला जगह पर कब्ज़ा कर ले। उन मूर्ख आत्मघाती लोगों ने आपस में ही अस्त्र शस्त्रों से लड़ाई शुरू कर दी। जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर ने अपने सैनिकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश दिया। और अंत में इसने दोनों तरफ के लोगों को ही अपने सैनिकों से मरवा डाला। फिर अकबर महान जोर से हंसा। अकबर के जीवनी लेखक के अनुसार अकबर ने इस संघर्ष में खूब आनंद लिया। इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ अकबर के इस कुकृत्य की आलोचना करते हुए उसकी इस “महानता” की भर्तसना करते है[iv]

चित्तौड़गढ़ का कत्लेआम

अकबर ने इतिहास के सबसे बड़े कत्लेआम में से एक चित्तौड़गढ़ का कत्लेआम अपने हाथों से अंजाम दिया था। चित्तोड़ के किले में 8000 वीर राजपूत योद्धा के साथ 40000 सहायक रुके हुए थे। लगातार संघर्ष के पश्चात भी अकबर को सफलता नहीं मिली। एक दिन अकबर ने किले की दीवार का निरिक्षण करते हुए एक प्रभावशाली पुरुष को देखा। अपनी बन्दुक का निशाना लगाकर अकबर ने गोली चला दी। वह वीर योद्धा जयमल थे। अकबर की गोली लगने से उनकी अकाल मृत्यु हो गई। राजपूतों ने केसरिया बाना पहना। चित्तोड़ की किले से धुँए की लपटे दूर दूर तक उठने लगी। यह वीर क्षत्राणीयों के जौहर की लपटे थी। अकबर के जीवनी लेखक अबुल फ़ज़ल के अनुसार करीब 300 राजपूत औरतों ने आग में कूद कर अपने सतीत्व की रक्षा करी थी। राजपूतों की रक्षा पंक्ति को तोड़ पाने में असफल रहने पर अकबर ने पागल हाथी राजपूतों को कुचलने के लिए छोड़ दिए। तब कहीं वीर राजपूत झुंके थे। राजपूत सेना के संहार के पश्चात भी अकबर का दिल नहीं भरा और उसने अपनी दरियादिली का प्रदर्शन करते हुए किले के सहायकों के कत्लेआम का हुकुम दे दिया। इतिहासकार उस दिन मरने वालों की संख्या 30,000 लिखते हैं। बचे हुए लोगों को बंदी बना लिया गया। कत्लेआम के पश्चात वीर राजपूतों के शरीर से उतारे गए जनेऊ का भार 74 मन निकला था। इस कत्लेआम से अकबर ने अपने आपको “महान” सिद्ध किया था[v]

शराब का शौक़ीन अकबर

सूरत की एक घटना का अबुल फजल ने अपने लेखों में वर्णन किया हैं। एक रात अकबर ने जम कर शराब पी। शराब के नशे में उसे शरारत सूझी और उसने दो राजपूतों को विपरीत दिशा से भाग कर वापिस आएंगे और मध्य में हथियार लेकर खड़े हुए व्यक्ति को स्पर्श करेंगे। जब अकबर की बारी आई तो नशे में वह एक तलवार को अपने शरीर में घोंपने ही वाला था तभी अपनी स्वामी भक्ति का प्रदर्शन करते हुए राजा मान सिंह ने अपने पैर से तलवार को लात मार कर सरका दिया। अन्यथा बाबर के कुल के दीपक का वही अस्त हो गया होता। नशे में धूत अकबर ने इसे बदतमीजी समझ मान सिंह पर हमला बोल दिया और उसकी गर्दन पकड़ ली। मान सिंह के उस दिन प्राण निकल गए होते अगर मुजफ्फर ने अकबर की ऊँगली को मरोड़ कर उसे चोटिल न कर दिया होता। हालांकि कुछ दिनों में अकबर की ऊँगली पर लगी चोट ठीक हो गई। मजे अपने पूर्वजों की मर्यादा का पालन करते हुए "महान" अकबर ने यह सिद्ध कर दिया की वह तब तक पीता था जब तक उससे न संभला जाता था[vi]

खूंखार अकबर



एक युद्ध से अकबर ने लौटकर हुसैन कुली खान द्वारा लाये गए युद्ध बंधकों को सजा सुनाई। मसूद हुसैन मिर्जा जिसकी आँखेँ सील दी गई थी की आँखें खोलने का आदेश देकर अकबर साक्षात पिशाच के समान बंधकों पर टूट पड़ा। उन्हें घोड़े,गधे और कुत्तों की खाल में लपेट कर घुमाना, उन पर मरते तक अत्याचार करना, हाथियों से कुचलवाना आदि अकबर के प्रिय दंड थे। निस्संदेह उसके इन विभित्स अत्याचारों में कहीं न कहीं उसके तातार पूर्वजों का खूंखार लहू बोलता था। जो उससे निश्चित रूप "महान" सिद्ध करता था[vii]

अय्याश महान अकबर

अकबर घोर विलासी, अय्याश बादशाह था। वह सुन्दर हिन्दू युवतियों को अपनी यौनेच्छा का शिकार बनाने की जुगत में रहता था। वह एक "मीना बाजार" लगवाता था। उस बाजार में केवल महिलाओं का प्रवेश हो सकता था और केवल महिलाएं ही समान बेचती थी। अकबर छिप कर मीणा बाज़ार में आने वाली हिन्दू युवतियों पर निगाह रखता था। जिसे पसन्द करता था उसे बुलावा भेजता था। डिंगल काव्य सुकवि बीकानेर के क्षत्रिय पृथ्वीराज उन दिनों दिल्ली में रहते थे। उनकी नवविवाहिता पत्नी किरण देवी परम धार्मिक, हिन्दुत्वाभिमानी, पत्नीव्रता नारी थी। वह सौन्दर्य की साकार प्रतिमा थी। उसने अकबर के मीना बाजार के बारे में तरह-तरह की बातें सुनीं। एक दिन वह वीरांगना कटार छिपाकर मीना बाजार जा पहुंची। धूर्त अकबर पास ही में एक परदे के पीछे बैठा हुआ आने-जाने वाली युवतियों को देख रहा था। अकबर की निगाह जैसे ही किरण देवी के सौन्दर्य पर पड़ी वह पागल हो उठा। अपनी सेविका को संकेत कर बोला "किसी भी तरह इस मृगनयनी को लेकर मेरे पास आओ मुंह मांगा इनाम मिलेगा।" किरण देवी बाजार की एक आभूषण की दुकान पर खड़ी कुछ कंगन देख रही थी। अकबर की सेविका वहां पहुंची। धीरे से बोली-"इस दुकान पर साधारण कंगन हैं। चलो, मैं आपको अच्छे कंगन दिखाऊंगी।" किरण देवी उसके पीछे-पीछे चल दी। उसे एक कमरे में ले गई।

पहले से छुपा अकबर उस कमरे में आ पहुंचा। पलक झपकते ही किरण देवी सब कुछ समझ गई। बोली "ओह मैं आज दिल्ली के बादशाह के सामने खड़ी हूं।" अकबर ने मीठी मीठी बातें कर जैसे ही हिन्दू ललना का हाथ पकड़ना चाहा कि उसने सिंहनी का रूप धारण कर, उसकी टांग में ऐसी लात मारी कि वह जमीन पर आ पड़ा। किरण देवी ने अकबर की छाती पर अपना पैर रखा और कटार हाथ में लेकर दहाड़ पड़ी-"कामी आज मैं तुझे हिन्दू ललनाओं की आबरू लूटने का मजा चखाये देती हूं। तेरा पेट फाड़कर रक्तपान करूंगी।"

धूर्त अकबर पसीने से तरबतर हो उठा। हाथ जोड़कर बोला, "मुझे माफ करो, रानी। मैं भविष्य में कभी ऐसा अक्षम्य अपराध नहीं करूंगा।"

किरण देवी बोली-"बादशाह अकबर, यह ध्यान रखना कि हिन्दू नारी का सतीत्व खेलने की नहीं उसके सामने सिर झुकाने की बात है।"

अकबर किरण देवी के चरणों में पड़ा थर-थर कांप रहा था। उसने किरण देवी से अपने प्राणों की भीख मांगी और मीना बाजार को सदा के लिए बंद करना स्वीकार किया। इस प्रकार से मीना बाजार के नाटक पर सदा सदा के लिए पटाक्षेप पड़ गया था। भारत के शहंशाह अकबर हिन्दू ललना के पांव तले रुदते हुए अपनी महानता को सिद्ध कर रहा था[viii]

एक कवि ने उस स्थिति का चित्र इन शब्दों में खींचा है

सिंहनी-सी झपट, दपट चढ़ी छाती पर,

मानो शठ दानव पर दुर्गा तेजधारी है।

गर्जकर बोली दुष्ट! मीना के बाजार में मिस,

छीना अबलाओं का सतीत्व दुराचारी है।

अकबर! आज राजपूतानी से पाला पड़ा,

पाजी चालबाजी सब भूलती तिहारी है।

करले खुदा को याद भेजती यमालय को,

देख! यह प्यासी तेरे खून की कटारी है।

ऐसे महान दादा के महान पोते स्वनामधन्य अकबर “महान” के जीवन के कुछ दृश्य आपके सामने रखे। इस काम में हम किसी हिन्दुवादी इतिहासकार के प्रमाण देते तो हम पर दोषारोपण लगता कि आप अकबर “महान” से चिढ़ते हैं। हमने प्रमाण रूप में अबुल फज़ल (अकबर का खास दरबारी) की आइन ए अकबरी और अकबरनामा के आधार पर अकबर के जीवन पर सबसे ज्यादा प्रामाणिक इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ की अंग्रेजी की किताब “अकबर- द ग्रेट मुग़ल” से सभी प्रमाण लिए हैं। यहाँ याद रहे कि ये दोनों लेखक सदा यह प्रयास करते रहे कि इन्होने अकबर की प्रशंसा में अनेक अतिश्योक्ति पूर्ण बातें लिखी और अकबर की बहुत सी कमियां छुपाई। मगर अकबर के "महान" कर्मों का प्रताप ही कुछ ऐसा था कि सच्चाई सौ परदे फाड़ कर उसी तरह सामने आ जाती है जैसे कि अँधेरे को चीर कर उजाला आ जाता हैं।

अब भी अगर कोई अकबर को महान कहना चाहेगा तो उसे संतुष्ट करने के लिए महान की परिभाषा को ही बदलना पड़ेगा।

डॉ विवेक आर्य




[i] Akbar the Great Mogul- Vincent Smith page No 38-40


[ii] Ibid p.40


[iii] Ibid p.71


[iv] Ibid p.78,79


[v] Ibid p.89-91


[vi] Ibid p.89-91


[vii] Ibid p.116


[viii] Glimpses of glory by Santosh Shailja, Chap. Meena Bazar p.122-124

Motive of Aryasamaj


Motive of Aryasamaj is to serve Humanity.
Swami Dayanand founded aryasamaj for the benefit of mankind.
During the days of British rules our country was flooded with famines,plagues,earthquakes etc. Any natural calamity would have caused havoc due to poor management by Britishers. Lakhs of people died and thousands orphaned.These poor souls were trapped by Christian missionaries and converted by church. Aryasamaj challenged this drama of trapping of soul. It opened orphanages and widow homes to protect fellow brothers. Aryasamaj admitted all including lower castes in these orphanages. This step of saving and serving Humanity was opposed by Hindus who followed strict castism. They agreed with conversion to Christianity but disagree to dine together. The members of aryasamaj faced social boycott, physical and personal attacks, monetary fines etc but did not swayed from the path of Dharma. Later with the continued efforts the thinking of Hindus changed. Sanatani Hindus understood the message of service.They also came forward to help the needy and downtrodden.This is the pride History of Aryasamaj of selfless and dedicated service to Humanity. And i feel pride sharing with you all.
Dr Vivek Arya
(This is Image of orphanage from famine of 1908 managed by Aryasamaj. Refer page 264 of "The Arya samaj; an account of its origin, doctrines, and activities, with a biographical sketch of the founder" (1915) authored by Lala Lajpat Rai.
Lala JI was very active in famines,earthquakes in saving orphans. Once christian missionary even dragged him to court when the vultures went empty handed without any sheep for their shepherd. )

Thursday, October 8, 2015

भारतीय इतिहास की भयंकर भूले



भारतीय इतिहास की भयंकर भूले

काला पहाड़

बांग्लादेश। यह नाम स्मरण होते ही भारत के पूर्व में एक बड़े भूखंड का नाम स्मरण हो उठता है। जो कभी हमारे देश का ही भाग था। जहाँ कभी बंकिम के ओजस्वी आनंद मठ, कभी टैगोर की हृद्यम्य कवितायेँ, कभी अरविन्द का दर्शन, कभी वीर सुभाष की क्रांति ज्वलित होती थी। आज बंगाल प्रदेश एक मुस्लिम राष्ट्र के नाम से प्रसिद्द है। जहाँ हिन्दुओं की दशा दूसरे दर्जें के नागरिकों के समान हैं। क्या बंगाल के हालात पूर्व से ऐसे थे? बिलकुल नहीं। अखंड भारतवर्ष की इस धरती पर पहले हिन्दू सभ्यता विराजमान थी। कुछ ऐतिहासिक भूलों ने इस प्रदेश को हमसे सदा के लिए दूर कर दिया। एक ऐसी ही भूल का नाम कालापहाड़ है। बंगाल के इतिहास में काला पहाड़ का नाम एक अत्याचारी के नाम से स्मरण किया जाता है। काला पहाड़ का असली नाम कालाचंद राय था। कालाचंद राय एक बंगाली ब्राहण युवक था। पूर्वी बंगाल के उस वक्‍त के मुस्लिम शासक की बेटी को उससे प्‍यार हो गया। बादशाह की बेटी ने उससे शादी की इच्‍छा जाहिर की। वह उससे इस कदर प्‍यार करती थी। वह उसने इस्‍लाम छोड़कर हिंदू विधि से उससे शादी करने के लिए तैयार हो गई। ब्राहमणों को जब पता चला कि कालाचंद राय एक मुस्लिम राजकुमारी से शादी कर उसे हिंदू बनाना चाहता है। तो ब्राहमण समाज ने कालाचंद का विरोध किया। उन्होंने उस मुस्लिम युवती के हिंदू धर्म में आने का न केवल विरोध किया, बल्कि कालाचंद राय को भी जाति बहिष्‍कार की धमकी दी। कालाचंद राय को अपमानित किया गया। अपने अपमान से क्षुब्ध होकर कालाचंद गुस्‍से से आग बबुला हो गया और उसने इस्‍लाम स्‍वीकारते हुए उस युवती से निकाह कर उसके पिता के सिंहासन का उत्‍तराधिकारी हो गया। अपने अपमान का बदला लेते हुए राजा बनने से पूर्व ही उसने तलवार के बल पर ब्राहमणाों को मुसलमान बनाना शुरू किया। उसका एक ही नारा था मुसलमान बनो या मरो। पूरे पूर्वी बंगाल में उसने इतना कत्‍लेआम मचाया कि लोग तलवार के डर से मुसलमान होते चले गए। इतिहास में इसका जिक्र है कि पूरे पूर्वी बंगाल को इस अकेले व्‍यक्ति ने तलवार के बल पर इस्‍लाम में धर्मांतरित कर दिया। यह केवल उन मूर्ख, जातिवादी, अहंकारी व हठधर्मी ब्राहमणों को सबक सिखाने के उददेश्‍य से किया गया था। उसकी निर्दयता के कारण इतिहास उसे काला पहाड़ के नाम से जानती है। अगर अपनी संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर कुछ हठधर्मी ब्राह्मणों ने कालाचंद राय का अपमान न किया होता तो आज बंगाल का इतिहास कुछ ओर ही होता[i]



कश्मीर का इस्लामीकरण



कश्मीर: शैव संस्कृति के ध्वजावाहक एवं प्राचीन काल से ऋषि कश्यप की धरती कश्मीर आज मुस्लिम बहुल विवादित प्रान्त के रूप में जाना जाता हैं। 1947 के बाद से धरती पर जन्नत सी शांति के लिए प्रसिद्द यह प्रान्त आज कभी शांत नहीं रहा। इसका मुख्य कारण पिछले 700 वर्षों में घटित कुछ घटनाएँ हैं जिनका परिणाम कश्मीर का इस्लामीकरण होना हैं। कश्मीर में सबसे पहले इस्लाम स्वीकार करने वाला राजा रिंचन था। 1301 ई. में कश्मीर के राजसिंहासन पर सहदेव नामक शासक विराजमान हुआ। कश्मीर में बाहरी तत्वों ने जिस प्रकार अस्त व्यस्तता फैला रखी थी, उसे सहदेव रोकने में पूर्णत: असफल रहा। इसी समय कश्मीर में लद्दाख का राजकुमार रिंचन आया, वह अपने पैत्रक राज्य से विद्रोही होकर यहां आया था। यह संयोग की बात थी कि इसी समय यहां एक मुस्लिम सरदार शाहमीर स्वात (तुर्किस्तान) से आया था। कश्मीर के राजा सहदेव ने बिना विचार किये और बिना उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा लिए इन दोनों विदेशियों को प्रशासन में महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिये। यह सहदेव की अदूरदर्शिता थी, जिसके परिणाम आगे चलकर उसी के लिए घातक सिद्घ हुए। तातार सेनापति डुलचू ने 70,000 शक्तिशाली सैनिकों सहित कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। अपने राज्य को क्रूर आक्रामक की दया पर छोडक़र सहदेव किश्तवाड़ की ओर भाग गया। डुलचू ने हत्याकांड का आदेश दे दिया। हजारों लोग मार डाले गये।कितनी भयानक परिस्थितियों में राजा ने जनता को छोड़ दिया था, यह इस उद्घरण से स्पष्ट हो गया। राजा की अकर्मण्यता और प्रमाद के कारण हजारों लाखों की संख्या में हिंदू लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ गया। जनता की स्थिति दयनीय थी। राजतरंगिणी में उल्लेख है-‘जब हुलचू वहां से चला गया, तो गिरफ्तारी से बचे कश्मीरी लोग अपने गुप्त स्थानों से इस प्रकार बाहर निकले, जैसे चूहे अपने बिलों से बाहर आते हैं। जब राक्षस डुलचू द्वारा फैलाई गयी हिंसा रूकी तो पुत्र को पिता न मिला और पिता को पुत्र से वंचित होना पड़ा, भाई भाई से न मिल पाया। कश्मीर सृष्टि से पहले वाला क्षेत्र बन गया। एक ऐसा विस्तृत क्षेत्र जहां घास ही घास थी और खाद्य सामग्री न थी।[ii]



इस अराजकता का सहदेव के मंत्री रामचंद्र ने लाभ उठाया और वह शासक बन बैठा। परंतु रिंचन भी इस अवसर का लाभ उठाने से नही चूका। जिस स्वामी ने उसे शरण दी थी उसके राज्य को हड़पने का दानव उसके हृदय में भी उभर आया और भारी उत्पात मचाने लगा। रिंचन जब अपने घर से ही बागी होकर आया था, तो उससे दूसरे के घर शांत बैठे रहने की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती थी? उसके मस्तिष्क में विद्रोह का परंपरागत कीटाणु उभर आया, उसने रामचंद्र के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। रामचंद्र ने जब देखा कि रिंचन के हृदय में पाप हिलोरें मार रहा है, और उसके कारण अब उसके स्वयं के जीवन को भी संकट है तो वह राजधानी छोडक़र लोहर के दुर्ग में जा छिपा। रिंचन को पता था कि शत्रु को जीवित छोडऩा कितना घातक सिद्ध हो सकता है? इसलिए उसने बड़ी सावधानी से काम किया और अपने कुछ सैनिकों को गुप्त वेश में रामचंद्र को ढूंढने के लिए भेजा। जब रामचंद्र मिल गया तो उसने रामचंद्र से कहलवाया कि रिंचन समझौता चाहता है। वात्र्तालाप आरंभ हुआ तो छल करते हुए रिंचन ने रामचंद्र की हत्या करा दी। इस प्रकार कश्मीर पर रिंचन का अधिकार हो गया। यह घटना 1320 की है। उसने रामचंद्र की पुत्री कोटा रानी से विवाह कर लिया था। इस प्रकार वह कश्मीर का राजा बनकर अपना राज्य कार्य चलाने लगा। कहते है कि अपने पिता के हत्यारे से विवाह करने के पीछे कोटा रानी का मुख्य उद्देश्य उसके विचार परिवर्तन कर कश्मीर की रक्षा करना था। धीरे धीरे रिंचन उदास रहने लगा। उसे लगा कि उसने जो किया वह ठीक नहीं था। उसके कश्मीर के शैवों के सबसे बड़े धर्मगुरु देवास्वामी के समक्ष हिन्दू बनने का आग्रह किया। देवास्वामी ने इतिहास की सबसे भयंकर भूल करी और बुद्ध मत से सम्बंधित रिंचन को हिन्दू समाज का अंग बनाने से मना कर दिया[iii]। रिंचन के लिए पंडितों ने जो परिस्थितियां उत्पन्न की थी वे बहुत ही अपमानजनक थी। जिससे उसे असीम वेदना और संताप ने घेर लिया। देवास्वामी की अदूरदर्शिता ने मुस्लिम मंत्री शमशीर को मौका दे दिया। उसने रिंचन को सलाह दी की अगले दिन प्रात: आपको जो भी धर्मगुरु मिले। आप उसका मत स्वीकार कर लेना। अगले दिन रिंचन जैसे ही सैर को निकला, उसे मुस्लिम सूफी बुलबुल शाह अजान देते मिला। रिंचन को अंतत: अपनी दुविधा का समाधान मिल गया। उससे इस्लाम में दीक्षित होने का आग्रह करने लगा। बुलबुलशाह ने गर्म लोहा देखकर तुरंत चोट मारी और एक घायल पक्षी को सहला कर अपने यहां आश्रय दे दिया। रिंचन ने भी बुलबुल शाह का हृदय से स्वागत किया। इस घटना के पश्चात कश्मीर का इस्लामीकरण आरम्भ हुआ जो लगातार 500 वर्षों तक अत्याचार, हत्या, धर्मान्तरण आदि के रूप में सामने आया।



यह अपच का रोग यही नहीं रुका। कालांतर में महाराज ;गुलाब सिंह के पुत्र महाराज रणबीर सिंह गद्दी पर बैठे। रणबीर सिंह द्वारा धर्मार्थ ट्रस्ट की स्थापना कर हिन्दू संस्कृति को प्रोत्साहन दिया। राजा के विचारों से प्रभावित होकर राजौरी पुंछ के राजपूत मुसलमान और कश्मीर के कुछ मुसलमान राजा के समक्ष आवदेन करने आये कि उन्हें मूल हिन्दू धर्म में फिर से स्वीकार कर लिया जाये। राजा ने अपने पंडितों से उन्हें वापिस मिलाने के लिया पूछा तो उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया। एक पंडित तो राजा के विरोध में यह कहकर झेलम में कूद गया की राजा ने अगर उसकी बात नहीं मानी तो वह आत्मदाह कर लेगा। राजा को ब्रह्महत्या का दोष लगेगा। राजा को मज़बूरी वश अपने निर्णय को वापिस लेना पड़ा। जिन संकीर्ण सोच वाले पंडितों ने रिंचन को स्वीकार न करके कश्मीर को 500 वर्षों तक इस्लामिक शासकों के पैरों तले रुंदवाया था। उन्हीं ने बाकि बचे हिन्दू कश्मीरियों को रुंदवाने के लिए छोड़ दिया। इसका परिणाम आज तक कश्मीरी पंडित भुगत रहे हैं[iv]

पाकिस्तान के जनक जिन्ना और इक़बाल



पाकिस्तान। यह नाम सुनते ही 1947 के भयानक नरसंहार और भारत होना स्मरण हो उठता हैं। महाराज राम के पुत्र लव द्वारा बसाई गई लाहौर से लेकर सिख गुरुओं की कर्मभूमि आज पाकिस्तान के नाम से एक अलग मुस्लिम राष्ट्र के रूप में जानी जाती हैं। जो कभी हमारे अखंड भारत देश का भाग थी। पाकिस्तान के जनक जिन्ना का नाम कौन नहीं जानता। जिन्ना को अलग पाकिस्तान बनाने का पाठ पढ़ाने वाला अगर कोई था तो वो थासर मुहम्मद इक़बाल। मुहम्मद इक़बाल के दादा कश्मीरी हिन्दू थे। उनका नाम था तेज बहादुर सप्रु। उस समय कश्मीर पर अफगान गवर्नर अज़ीम खान का राज था। तेज बहादुर सप्रु खान के यहाँ पर राजस्व विभाग में कार्य करते थे। उन पर घोटाले का आरोप लगा। उनके समक्ष दो विकल्प रखे गए। पहला था मृत्युदंड का विकल्प दूसरा था इस्लाम स्वीकार करने का विकल्प। उन्होंने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम ग्रहण कर लिया। और अपने नाम बदल कर स्यालकोट आकर रहने लगे[v]। इसी निर्वासित परिवार में मुहम्मद इक़बाल का जन्म हुआ था। कालांतर में यही इक़बाल पाकिस्तान के जनक जिन्ना का मार्गदर्शक बना।

मुहम्मद अली जिन्ना गुजरात के खोजा राजपूत परिवार में हुआ था। कहते हैं उनके पूर्वजों को इस्लामिक शासन काल में पीर सदरुद्दीन ने इस्लाम में दीक्षित किया था। इस्लाम स्वीकार करने पर भी खोजा मुसलमानों का चोटी, जनेऊ आदि से प्रेम दूर नहीं हुआ था। इस्लामिक शासन गुजर जाने पर खोजा मुसलमानों की द्वारा भारतीय संस्कृति को स्वीकार करने की उनकी वर्षों पुरानी इच्छा फिर से जाग उठी। उन्होंने उस काल में भारत की आध्यात्मिक राजधानी बनारस के पंडितों से शुद्ध होने की आज्ञा मांगी। हिन्दुओं का पुराना अपच रोग फिर से जाग उठा। उन्होंने खोजा मुसलमानों की मांग को अस्वीकार कर दिया। इस निर्णय से हताश होकर जिन्ना के पूर्वजों ने बचे हुए हिन्दू अवशेषों को सदा के लिए तिलांजलि दे दी। एवं उनका मन सदा के लिए हिन्दुओं के प्रति द्वेष और घृणा से भर गया। इसी विषाक्त माहौल में उनके परिवार में जिन्ना का जन्म हुआ। जो स्वाभाविक रूप से ऐसे माहौल की पैदाइश होने के कारण पाकिस्तान का जनक बना[vi]। अगर हिन्दू पंडितों ने शुद्ध कर अपने से अलग हुए भाइयों को मिला लिया होता तो आज देश की क्या तस्वीर होती। पाठक स्वयं अंदाजा लगा सकते है।

अगर सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में ऐसी ऐसी अनेक भूलों को जाना जायेगा तो मन व्यथित होकर खून के आँसू रोने लगेगा। संसार के मागर्दर्शक, प्राचीन ऋषियों की यह महान भारत भूमि आज किन हालातों में हैं, यह किसी से छुपा नहीं हैं। क्या हिन्दुओं का अपच रोग इन हालातों का उत्तरदायी नहीं हैं? आज भी जात-पात, क्षेत्र- भाषा, ऊंच-नीच, गरीब-अमीर, छोटा-बड़ा आदि के आधार पर विभाजित हिन्दू समाज क्या अपने बिछुड़े भाइयों को वापिस मिलाने की पाचक क्षमता रखता हैं? यह एक भीष्म प्रश्न है? क्यूंकि देश की सम्पूर्ण समस्यायों का हल इसी अपच रोग के निवारण में हैं।

एक मुहावरा की "बोये पेड़ बबुल के आम की चाहत क्यों" भारत भूमि पर सटीक रूप से लागु होती हैं।

डॉ विवेक आर्य



सन्दर्भ


[i] भट्टाचार्य, सच्चिदानन्द भारतीय इतिहास कोश, द्वितीय संस्करण-1989 (हिन्दी), भारत डिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 91

संस्‍कृति के चार अध्‍याय: रामधारी सिंह दिनकर

पाकिस्‍तान का आदि और अंत: बलराज मधोक


[ii] राजतरंगिणी,जोनाराज पृष्ठ 152-155


[iii] राजतरंगिणी, जोनराजा पृष्ठ 20-21


[iv] व्यथित कश्मीर; नरेंदर सहगल पृष्ठ 59


[v] R.K. Parimu, the author of History of Muslim Rule in Kashmir, and Ram Nath Kak, writing in his autobiography, Autumn Leaves


[vi] युगद्रष्टा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे- वीरेंदर संधु। वीरेंदर संधु अमर बलिदानी भगत सिंह जी की भतीजी है

Tuesday, October 6, 2015

क्या टीपू सुल्तान न्यायप्रिय शासक था?







क्या टीपू सुल्तान न्यायप्रिय शासक था?


बुद्धिजीवी समाज में सत्य और असत्य के मध्य भी एक युद्ध लड़ा जाता हैं। इसे बौद्धिक युद्ध कहते है। यहाँ पर तलवार का स्थान कलम ले लेती हैं और बाहुबल का स्थान मस्तिष्क की तर्कपूर्ण सोच ले लेती हैं। इसी कड़ी में इस बौद्धिक युद्ध का एक नया पहलु है टीपू सुल्तान, अकबर और औरंगजेब जैसे मुस्लिम शासकों को धर्म निरपेक्ष, हिन्दू हितैषी ,हिन्दू मंदिरों और मठों को दान देने वाला, न्याय प्रिय और प्रजा पालक सिद्ध करने का प्रयास। इस कड़ी में अनेक भ्रामक लेख प्रकाशित किये जा रहे हैं। इन लेखों में इतिहास की दृष्टी से प्रमाण कम है,शब्द जाल का प्रयोग अधिक किया गया है। परन्तु हज़ार बार चिल्लाने से भी असत्य सत्य सिद्ध नहीं हो जाता। इस लेख के माध्यम से यह सिद्ध किया जायेगा की टीपू सुल्तान मतान्ध एवं अत्याचारी शासक था। अकबर और औरंगज़ेब के विषय में अलग से लेख लिखा जायेगा। इस लेख का मूल उद्देश्य किसी भी मुस्लिम शासक के प्रति द्वेष भावना का प्रदर्शन करना नहीं अपितु जो जैसा है उसे वैसा बताना हैं। आशा हैं इस लेख को पढ़ कर हिन्दू युवकों को भ्रमित करने के लिए जो यह कवायद की जा रही हैं वह निरर्थक एवं निष्फल सिद्ध होगी।


टीपू सुल्तान के विषय में निम्नलिखित भ्रांतियां प्रचारित की जा रही हैं:-

1. टीपू सुल्तान के राज्य में हिन्दुओं को सरकारी नौकरी में भरपूर मौका मिलता था। उदहारण के रूप में टीपू के प्रधानमंत्री का नाम पूर्णया था और वह एक ब्राह्मण था।

2. टीपू सुल्तान अनेक मंदिरों को वार्षिक अनुदान दिया करता था।

3. टीपू सुल्तान के श्रंगेरी मठ के जगद्गुरू शंकराचार्य से अति घनिष्ठ मैत्री सम्बन्ध थे। दोनों के मध्य पत्र व्यवहार मिलता है।

4. टीपु सुल्तान प्रतिदिन नाश्ता करने के पहले रंगनाथ जी के मंदिर में जाता था जो श्रीरंगापटनम के क़िले में था।

5. टीपू सुल्तान ने कभी हिन्दुओं को प्रताड़ित नहीं किया। कभी हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं किया।

6. टीपू सुल्तान देश भक्त था। उसने अपने राज्य की रक्षा के लिए अपने प्राण देकर वीरगति प्राप्त की थी[i]।

भ्रांतियों का सप्रमाण निवारण

भ्रान्ति नं 1. टीपु सुल्तान के राज्य में हिन्दुओं को सरकारी नौकरी में भरपूर मौका मिलता था। उदहारण के रूप में टीपू के प्रधानमंत्री का नाम पूर्णया था और वह एक ब्राह्मण था।

निवारण- टीपू सुल्तान की नौकरी में मुसलमानों को प्राथमिकता दी जाती थी। यहाँ तक कि अयोग्य होने पर भी मुसलमान होने के कारण बड़ी से बड़ी नौकरी पर एक मुसलमान को बैठाया जाता था। इससे प्रजा की दशा ओर अधिक शोचनीय हो गई। टीपू सुल्तान के मंत्रियों में केवल पुर्णिया एकमात्र हिन्दू था। मुसलमानों को गृह कर, संपत्ति कर से छूट थी। जो हिन्दू मुसलमान बन जाता था। उसे भी यह छूट प्राप्त हो जाती थी[ii]। टीपू सुल्तान की मृत्यु के पश्चात अंग्रेजों द्वारा नियुक्त किये गए मैसूर के भू राजस्व विभाग के अधिकारी मक्लॉयड भी लिखते है कि टीपू सुल्तान के राज्य में सभी अधिकारीयों के केवल मुस्लिम नाम हैं जैसे शेख अली, शेर खान, मुहम्मद सैय्यद, मीर हुसैन,सैयद पीर आदि[iii]।

भ्रान्ति नं 2- टीपू सुल्तान अनेक मंदिरों को वार्षिक अनुदान दिया करता था।

निवारण- विलियम लोगन[iv] एवं लेविस राइस[v] के अनुसार टीपू सुल्तान के पूरे राज्य में उसकी मृत्यु के समय केवल दो मंदिरों में दैनिक पूजा होती थी। उनके अनुसार टीपू सुल्तान ने दक्षिण भारत में 800 मंदिरों का विध्वंश किया था[vi]। अनेक लेखकों ने अपने लेखों द्वारा टीपू सुल्तान द्वारा तोड़े गए मंदिरों पर विचार प्रकट किये हैं[vii]। 

टीपू द्वारा मन्दिरों का विध्वंस


दी मैसूर गज़टियर बताता है कि "टीपू ने दक्षिण भारत में आठ सौ से अधिक मन्दिर नष्ट किये थे।”

के.पी. पद्‌मानाभ मैनन[viii] और श्रीधरन मैनन[ix] द्वारा लिखित पुस्तकों में उन भग्न, नष्ट किये गये, मन्दिरों में से कुछ का वर्णन करते हैं-

“चिन्गम महीना 952 मलयालम ऐरा तदुनसार अगस्त 1786 में टीपू की फौज ने प्रसिद्ध पेरुमनम मन्दिर की मूर्तियों का ध्वंस किया और त्रिचूर ओर करवन्नूर नदी के मध्य के सभी मन्दिरों का ध्वंस कर दिया। इरिनेजालाकुडा और थिरुवांचीकुलम मन्दिरों को भी टीपू की सेना द्वारा खण्डित किया गया और नष्ट किया गया।” अन्य प्रसिद्ध मन्दिरों में से कुछ, जिन्हें लूटा गया, और नष्ट किया गया, था, वे थे- त्रिप्रंगोट, थ्रिचैम्बरम्‌, थिरुमवाया, थिरवन्नूर, कालीकट थाली, हेमम्बिका मन्दिरपालघाट का जैन मन्दिर, माम्मियूर, परम्बाताली, पेम्मायान्दु, थिरवनजीकुलम, त्रिचूर का बडक्खुमन्नाथन मन्दिर, बैलूर शिवा मन्दिर आदि।”

“टीपू की व्यक्तिगत डायरी के अनुसार चिराकुल राजा ने टीपू सेना द्वारा स्थानीय मन्दिरों को विनाश से बचाने के लिए, टीपू सुल्तान को चार लाख रुपये का सोना चाँदी देने का प्रस्ताव रखा था। किन्तु टीपू ने उत्तर दिया था, ”यदि सारी दुनिया भी मुझे दे दी जाए तो भी मैं हिन्दू मन्दिरों को ध्वंस करने से नहीं रुकूँगा [x]”

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली की कहावत आपने सुनी होगी। टीपू सुल्तान पर सटीक रूप से लागु होती है।

भ्रान्ति नं 3. टीपू सुल्तान के श्रंगेरी मठ के जगद्गुरू शंकराचार्य से अति घनिष्ठ मैत्री सम्बन्ध थे। दोनों के मध्य पत्र व्यवहार मिलता है।

निवारण- जहाँ तक श्रृंगेरी मठ से सम्बन्ध हैं डॉ ऍम गंगाधरन[xi] लिखते है की टीपू सुल्तान भूत प्रेत आदि में विश्वास रखता था। उसने श्रृंगेरी मठ के आचार्यों को धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए दान भेजा जिससे उसकी सेना पर भूत- प्रेत आदि का कूप्रभाव न पड़े।

भ्रान्ति नं 4. टीपु सुल्तान प्रतिदिन नाश्ता करने के पहले रंगनाथ जी के मंदिर में जाता था जो श्रीरंगापटनम के क़िले में था।

निवारण- पि.सी.न राजा[xii] में लिखते हैं की श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर के पुजारियों द्वारा टीपू सुल्तान के लिए एक भविष्यवाणी करी थी। जिसके अनुसार अगर टीपू सुल्तान मंदिर में एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान करवाता था जिससे उसे दक्षिण भारत का सुलतान बनने से कोई रोक नहीं सकता। अंग्रेजों से एक बार युद्ध में विजय प्राप्त होने का श्रेय टीपू ने ज्योतिषों की उस सलाह को दिया था। जिसके कारण उसे युद्ध में विजय प्राप्त हुई, इसी कारण से टीपू ने उन ज्योतिषियों को और मंदिर को ईनाम रुपी सहयोग देकर सम्मानित किया था। श्रृंगेरी मठ और श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर का नाम लेकर टीपू को उदारवादी सिद्ध करना अपने आपको धोखा देने के समान हैं।

भ्रान्ति 5. टीपू सुल्तान ने कभी हिन्दुओं को प्रताड़ित नहीं किया। कभी हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं किया।

निवारण- टीपू सुल्तान के पत्र और तलवार पर अंकित शब्दों को पढ़कर टीपू सुल्तान का असली चेहरा सामने आ जाता हैं।

टीपू के पत्र

टीपू द्वारा लिखित कुछ पत्रों, संदेशों, और सूचनाओं, के कुछ अंश निम्नांकित हैं। विखयात इतिहासज्ञ, सरदार पाणिक्कर, ने लन्दन के इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी से इन सन्देशों, सूचनाओं व पत्रों के मूलों को खोजा था।

(1) अब्दुल खादर को लिखित पत्र 22 मार्च 1788

“बारह हजार से अधिक, हिन्दुओं को इ्रस्लाम से सम्मानित किया गया (धर्मान्तरित किया गया)। इनमें अनेकों नम्बूदिरी थे। इस उपलब्धि का हिन्दुओं के मध्य व्यापक प्रचार किया जाए। स्थानीय हिन्दुओं को आपके पास लाया जाए, और उन्हें इस्लाम में धर्मान्तरित किया जाए। किसी भी नम्बूदिरी को छोड़ा न जाए[xiii]।”

(2) कालीकट के अपने सेना नायक को लिखित पत्र दिनांक 14 दिसम्बर 1788

“मैं तुम्हारे पास मीर हुसैन अली के साथ अपने दो अनुयायी भेज रहा हूँ। उनके साथ तुम सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लेना और वध कर देना…”। मेरे आदेश हैं कि बीस वर्ष से कम उम्र वालों को काराग्रह में रख लेना और शेष में से पाँच हजार का पेड़ पर लटकाकार वध कर देना।[xiv]”

(3) बदरुज़ समाँ खान को लिखित पत्र (दिनांक 19 जनवरी 1790)

“क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है निकट समय में मैंने मलाबार में एक बड़ी विजय प्राप्त की है चार लाख से अधिक हिन्दुओं को मूसलमान बना लिया गया था। मेरा अब अति शीघ्र ही उस पानी रमन नायर की ओर अग्रसर होने का निश्चय हैं यह विचार कर कि कालान्तर में वह और उसकी प्रजा इस्लाम में धर्मान्तरित कर लिए जाएँगे, मैंने श्री रंगापटनम वापस जाने का विचार त्याग दिया है।[xv]”

टीपू ने हिन्दुओं के प्रति यातना के लिए मलाबार के विभिन्न क्षेत्रों के अपने सेना नायकों को अनेकों पत्र लिखे थे।

“जिले के प्रत्येक हिन्दू का इस्लाम में आदर (धर्मान्तरण) किया जाना चाहिए; उन्हें उनके छिपने के स्थान में खोजा जाना चाहिए; उनके इस्लाम में सर्वव्यापी धर्मान्तरण के लिए सभी मार्ग व युक्तियाँ- सत्य और असत्य, कपट और बल-सभी का प्रयोग किया जाना चाहिए।[xvi]”

मैसूर के तृतीय युद्ध (1792) के पूर्व से लेकर निरन्तर 1798 तक अफगानिस्तान के शासक, अहमदशाह अब्दाली के प्रपौत्र, जमनशाह, के साथ टीपू ने पत्र व्यवहार स्थापित कर लिया था। कबीर कौसर द्वारा लिखित, ‘हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान’ (पृ’ 141-147) में इस पत्र व्यवहार का अनुवाद हुआ है। उस पत्र व्यवहार के कुछ अंश नीचे दिये गये हैं।

टीपू के ज़मन शाह के लिए पत्र

(1) “महामहिम आपको सूचित किया गया होगा कि, मेरी महान अभिलाषा का उद्देश्य जिहाद (धर्म युद्ध) है। इस युक्ति का इस भूमि पर परिणाम यह है कि अल्लाह, इस भूमि के मध्य, मुहम्मदीय उपनिवेश के चिह्न की रक्षा करता रहता है, ‘नोआ के आर्क’ की भाँति रक्षा करता है और त्यागे हुए अविश्वासियों की बढ़ी हुई भुजाओं को काटता रहता है।”

(2) “टीपू से जमनशाह को, पत्र दिनांक शहबान का सातवाँ 1211 हिजरी (तदनुसार 5 फरवरी 1789) ”….इन परिस्थितियों में जो, पूर्व से लेकर पश्चित तक, सूर्य के स्वर्ग के केन्द्र में होने के कारण, सभी को ज्ञात हैं। मैं विचार करता हूँ कि अल्लाह और उसके पैगम्बर के आदेशों से एक मत हो हमें अपने धर्म के शत्रुओं के विरुद्ध धर्म युद्ध क्रियान्वित करने के लिए, संगठित हो जाना चाहिए। इस क्षेत्र के पन्थ के अनुयाई, शुक्रवार के दिन एक निश्चित किये हुए स्थान पर सदैव एकत्र होकर इन शब्दों में प्रार्थना करते हैं। ”हे अल्लाह! उन लोगों को, जिन्होंने पन्थ का मार्ग रोक रखा है, कत्ल कर दो। उनके पापों को लिए, उनके निश्चित दण्ड द्वारा, उनके शिरों को दण्ड दो।”

मेरा पूरा विश्वास है कि सर्वशक्तिमान अल्लाह अपने प्रियजनों के हित के लिए उनकी प्रार्थनाएं स्वीकार कर लेगा और पवित्र उद्‌देश्य की गुणवत्ता के कारण हमारे सामूहिक प्रयासों को उस उद्‌देश्य के लिए फलीभूत कर देगा। और इन शब्दों के, ”तेरी (अल्लाह की) सेनायें ही विजयी होगी”, तेरे प्रभाव से हम विजयी और सफल होंगे।

टीपू द्वारा हिन्दुओं पर किया गए अत्याचार उसकी निष्पक्ष होने की भली प्रकार से पोल खोलते हैं।

1. डॉ गंगाधरन जी ब्रिटिश कमीशन कि रिपोर्ट के आधार पर लिखते है की ज़मोरियन राजा के परिवार के सदस्यों को और अनेक नायर हिन्दुओं को टीपू द्वारा जबरदस्ती सुन्नत कर मुसलमान बना दिया गया था और गौ मांस खाने के लिए मजबूर भी किया गया था।

2. ब्रिटिश कमीशन रिपोर्ट के आधार पर टीपू सुल्तान के मालाबार हमलों 1783-1791 के समय करीब 30,000 हिन्दू नम्बूदरी मालाबार में अपनी सारी धनदौलत और घर-बार छोड़कर त्रावनकोर राज्य में आकर बस गए थे।

3. इलान्कुलम कुंजन पिल्लई लिखते है की टीपू सुल्तान के मालाबार आक्रमण के समय कोझीकोड में 7000 ब्राह्मणों के घर थे जिसमे से 2000 को टीपू ने नष्ट कर दिया था और टीपू के अत्याचार से लोग अपने अपने घरों को छोड़ कर जंगलों में भाग गए थे। टीपू ने औरतों और बच्चों तक को नहीं बक्शा था। जबरन धर्म परिवर्तन के कारण मापला मुसलमानों की संख्या में अत्यंत वृद्धि हुई जबकि हिन्दू जनसंख्या न्यून हो गई[xvii]।

4. राजा वर्मा केरल में संस्कृत साहित्य का इतिहास में मंदिरों के टूटने का अत्यंत वीभत्स विवरण करते हुए लिखते हैं की हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों को तोड़कर व पशुओं के सर काटकर मंदिरों को अपवित्र किया जाता था[xviii]।

5. बिदुर, उत्तर कर्नाटक का शासक अयाज़ खान था जो पूर्व में कामरान नाम्बियार था, उसे हैदर अली ने इस्लाम में दीक्षित कर मुसलमान बनाया था। टीपू सुल्तान अयाज़ खान को शुरू से पसंद नहीं करता था इसलिए उसने अयाज़ पर हमला करने का मन बना लिया। जब अयाज़ खान को इसका पता चला तो वह बम्बई भाग गया. टीपू बिद्नुर आया और वहाँ की सारी जनता को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर कर दिया था। जो न बदले उन पर भयानक अत्याचार किये गए थे। कुर्ग पर टीपू साक्षात् राक्षस बन कर टूटा था। वह करीब 10,000 हिन्दुओं को इस्लाम में जबरदस्ती परिवर्तित किया गया। कुर्ग के करीब 1000 हिन्दुओं को पकड़ कर श्री रंगपटनम के किले में बंद कर दिया गया जिन पर इस्लाम कबूल करने के लिए अत्याचार किया गया बाद में अंग्रेजों ने जब टीपू को मार डाला तब जाकर वे जेल से छुटे और फिर से हिन्दू बन गए। कुर्ग राज परिवार की एक कन्या को टीपू ने जबरन मुसलमान बना कर निकाह तक कर लिया था[xix]।

6. मुस्लिम इतिहासकार पि. स. सैयद मुहम्मद केरला मुस्लिम चरित्रम में लिखते हैं की टीपू का केरल पर आक्रमण हमें भारत पर आक्रमण करने वाले चंगेज़ खान और तिमूर लंग की याद दिलाता हैं।

इस लेख में टीपू के अत्याचारों का अत्यंत संक्षेप में विवरण दिया गया हैं।

भ्रान्ति 6. टीपू सुल्तान देश भक्त था। उसने अपने राज्य की रक्षा के लिए अपने प्राण देकर वीरगति प्राप्त की थी।

निवारण- सर्वप्रथम तो टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली ने सर्वप्रथम तो मैसूर के वाडियार राजा को हटाकर अपनी सत्ता ग्रहण करी थी। इसलिए मैसूर को टीपू सुल्तान का राज्य कहना गलत है। दूसरे टीपू का सपना दक्षिण का औरंगज़ेब बनने का था। टीपू पादशाह बनना चाहता था। उसका स्वपन देशवासियों के लिए एक उन्नत देश का निर्माण करने नहीं अपितु दक्षिण भारत को दारुल इस्लाम में बदलना था। मालाबार जैसे सुन्दर प्रदेश का टीपू ने जिस प्रकार विनाश किया। उसे पढ़ कर कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति कह सकता है वह एक देशभक्त नहीं अपितु एक दुर्दांत, मतान्ध,कट्टर अत्याचारी का लक्षण हैं।

डॉ विवेक आर्य

सन्दर्भ सूची

[i] इतिहास के साथ यह अन्याय: प्रो बी एन पाण्डेय

[ii]MH Gopal in Tipu Sultan's Mysore: An Economic History

[iii] Tipu Sultan X-Rayed: Dr. I M Muthanna

[iv] William Logan Malabar Manual

[v] Lewis Rice Mysore Gazetteer

[vi] Colonel RD Palsokar confirms it in his writings.

[vii] Hindu Temples: What happened to them (Volumes 1 and 2), Sitaram Goel

·Indian Muslims: Who are they, K.S. Lal
·Nationalism and Distortions of Indian history, Dr. N.S. Rajaram
·Negationism in India - Concealing the Record of Islam, Dr. Koenraad Elst
·Perversion of India's Political Parlance, Sitaram Goel

[viii] हिस्ट्री ऑफ कोचीन

[ix] हिस्ट्री ऑफ केरल

[x] फ्रीडम स्ट्रगिल इन केरल:सरदार के.एम. पाणिक्कर

[xi] डॉ ऍम गंगाधरन मातृभूमि साप्ताहिक जनवरी 14-20,1990

[xii] केसरी वार्षिक 1964

[xiii] भाषा पोशनी-मलयालम जर्नल, अगस्त 1923

[xiv] उसी पुस्तक में

[xv] उसी पुस्तक में

[xvi] हिस्टौरीकल स्कैचैज ऑफ दी साउथ ऑफ इण्डिया इन एन अटेम्पट टूट्रेस दी हिस्ट्री ऑफ मैसूर- मार्क विल्क्स, खण्ड 2 पृष्ठ 120

[xvii] Elamkulam Kunjan Pillai wrote in the Mathrubhoomi Weekly of December 25, 1955

[xviii] Vatakkankoor Raja Raja Varma in his famous literary work, History of Sanskrit Literature in Kerala

[xix] पि.सी.न राजा केसरी वार्षिक 1964