Friday, September 21, 2018

चौदह वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम कहाँ कहाँ रहे?



चौदह वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम कहाँ कहाँ रहे?

प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह के भारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।

जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में;

1. श्रृंगवेरपुर: - राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था।

2. सिंगरौर: - इलाहाबाद से लगभग 35.2 किमी उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।

3. कुरई: - इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।

इस ग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थान पर है, जहां गंगा को पार करने के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछ देर विश्राम किया था।

4. चित्रकूट के घाट पर: - कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।

चित्रकूट में श्रीराम के दुर्लभ प्रमाण,,चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

5. अत्रि ऋषि का आश्रम: - चित्रकूट के पास ही सतना मध्यप्रदेश स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया। अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रि ऋषि की पत्नी का नाम है अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी।

अत्रि पत्नी अनुसूइया के तपोबल से ही भगीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूट में प्रविष्ट हुई और ‘मंदाकिनी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने अनसूइया के सतीत्व की परीक्षा ली थी, लेकिन तीनों को उन्होंने अपने तपोबल से बालक बना दिया था। तब तीनों देवियों की प्रार्थना के बाद ही तीनों देवता बाल रूप से मुक्त हो पाए थे। फिर तीनों देवताओं के वरदान से उन्हें एक पुत्र मिला, जो थे महायोगी ‘दत्तात्रेय’। अत्रि ऋषि के दूसरे पुत्र का नाम था ‘दुर्वासा’। दुर्वासा ऋषि को कौन नहीं जानता?

अत्रि के आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माता अनुसूइया उन राक्षसों से भयभीत रहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों का वध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है।

प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।’

राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देखर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया।

6. दंडकारण्य: - अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे।

‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।

शहडोल (अमरकंटक): - राम वहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर की ओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एक पर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट की ऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओर बिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है।

वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।

दंडक राक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा। यहां रामायण काल में रावण के सहयोगी बाणासुर का राज्य था। उसका इन्द्रावती, महानदी और पूर्व समुद्र तट, गोइंदारी (गोदावरी) तट तक तथा अलीपुर, पारंदुली, किरंदुली, राजमहेन्द्री, कोयापुर, कोयानार, छिन्दक कोया तक राज्य था। वर्तमान बस्तर की ‘बारसूर’ नामक समृद्ध नगर की नींव बाणासुर ने डाली, जो इन्द्रावती नदी के तट पर था। यहीं पर उसने ग्राम देवी कोयतर मां की बेटी माता माय (खेरमाय) की स्थापना की। बाणासुर द्वारा स्थापित देवी दांत तोना (दंतेवाड़िन) है। यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है।

इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।

स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।

दंडकारण्य क्षेत्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र की उत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। यहीं पर उनका महाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था।

7. पंचवटी, नासिक: - दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।

उस काल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 32 किमी दूर है। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है।

अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक में श्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी के तट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्ष थे- पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था।

यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। यहां पर मारीच वध स्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है। नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप में विद्यमान है।

मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।

8. सीताहरण का स्थान सर्वतीर्थ: - नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।

जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।

9.पर्णशाला, भद्राचलम: - पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था।

इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।

10. सीता की खोज तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र: - सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।

11. शबरी का आश्रम पम्पा सरोवर: - तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है।

पम्पा नदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भी जाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौर रजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यह स्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है।

12. हनुमान से भेंट: - मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया।

ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था।

ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था।

13. कोडीकरई: - हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।

तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्क स्ट्रेट से घिरा हुआ है।

लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।

14.रामेश्वरम: - रामेश्वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है।

15.धनुषकोडी: : - वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया।

छेदुकराई तथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भी मौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम में धनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों को रामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं।

धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्नार से करीब 18 मील पश्चिम में है।

इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।

दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटाने के कई प्रयास किए गए। अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगों में भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल को क्षतिग्रस्त नहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बाद में बंदरगाह बनाने के चलते इस पुल को क्षतिग्रस्त किया गया।

30मील लंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है। श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग का निर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहती है। इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुए रामसेतु पर भारत और श्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था।

16.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला: --वाल्मिकी रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।

श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिलकुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए हैं।

Tuesday, September 18, 2018

मानवता को महर्षि मनु की देन



मानवता को महर्षि मनु की देन

लेखक- डॉ० सुरेन्द्र कुमार (मनुस्मृति भाष्यकार)


प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ,डॉ विवेक आर्य

'मनुस्मृति नामक धर्मशास्त्र और संविधान के प्रणेता राजर्षि मनु 'स्वायम्भुव' न केवल भारत की, अपितु सम्पूर्ण मानवता की धरोहर हैं। आदिकालीन समाज में मानवता की स्थापना, संस्कृति-सभ्यता का निर्माण और इनके विकास में राजर्षि मनु का उल्लेखनीय योगदान रहा है। यही कारण है कि भारत के विशाल वाङ्मय के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों के साहित्य में मनु और मनुवंश का कृतज्ञतापूर्ण स्मरण तथा उनसे सम्बद्ध घटनाओं का उल्लेख प्राप्त होता है। यह उल्लेख इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि प्राचीन समाज में मनु और मनुवंश का स्थान महत्वपूर्ण और आदरणीय था। जिस प्रकार विभिन्न कालखण्डों में उत्पन्न विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने तथा उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिये उनका नाम स्थानों, नगरों आदि के साथ जोड़ दिया जाता है उसी प्रकार प्राचीन समाज ने मनु और मनुवंश का नाम सृष्टि के कालखण्डों के साथ जोड़कर चौदह मन्वन्तरों का नाम चौदह मनुओं के नाम पर रखा जिनमें प्रथम मन्वन्तर का नाम 'स्वायम्भुव मन्वन्तर' है। आदि मानव-समाज के मूल रूप से जुड़ाव का जैसा अनोखा उदाहरण मनु स्वायम्भुव का मिलता है वैसा उदाहरण समाज में विरल ही मिलता है। जैसे वणिक् वर्ग के सभी व्यक्ति महाराजा अग्रसेन के वंशज, अनुयायी अथवा प्रजाजन होने के कारण 'अग्रवाल' कहते और लिखते हैं, ठीक उसी प्रकार आदि मनु स्वायम्भुव के वंशज, अनुयायी अथवा प्रजाजन होने के कारण संस्कृत में पाए जाने वाले 'आदमी' के वाचक प्रायः सभी शब्द मनु से व्युत्पन्न हैं, जैसे- मानव, मनुष्य, मनुज, मानुष आदि। यही नहीं समस्त यूरोपीय भाषाओं में भी इस प्रकार के शब्द मनुमूलक शब्दों के ही अपभ्रंश हैं, जैसे- अंग्रेजी में Man (मैन), जर्मनी में Mann (मन्न), Manesh (मनेश), लैटिन व ग्रीक में Mynos (मायनोस), स्पेनिश में Manna (मन्ना), आदि। यह सम्बन्ध यह सिद्ध करता है कि मनु मानव समाज के आदि पुरुषों में से हैं और उनका समाज में अति महत्वपूर्ण योगदान और स्थान रहा है। दुख का विषय यह है कि मानव समाज के आदि व्यवस्थापक और मानवीय मूल्यों के आदि संस्थापक, आदि राजा और आदि संविधानप्रदाता राजर्षि एवं महर्षि मनु का क्रमबद्ध पर्याप्त इतिहास हमें उपलब्ध नहीं है, वह फुटकर रूप में उपलब्ध है। अत्यन्त प्राचीनता के कारण उनका इतिहास विस्मृति के अन्धकार में विलुप्त हो गया है। अब हमें उनके फुटकर ऐतिहासिक सन्दर्भों से इतिहास का अन्वेषण करना पड़ रहा है। जब तक हम उनका कालनिर्णय नहीं कर लेंगे तब तक मानव समाज और मानवता के लिये उनकी देन का सही सही मूल्यांकन नहीं कर पाएंगे। अतः पहले उनके कालनिर्णय पर अत्यन्त संक्षेप से विचार किया जाता है।

आज हमें यह भ्रान्तिपूर्ण निष्कर्ष पढ़ा-पढ़ा कर रटा दिया गया है कि मनुस्मृति और उसके रचयिता मनु ब्राह्मण राजा पुष्यमित्र शुङ्ग के समकालीन थे और उसका रचना काल १८५ ईस्वी पूर्व का है। इससे भी महाभ्रान्त निष्कर्ष यह दिया गया है कि मनुस्मृति जन्मना जातिवादी शास्त्र है और स्त्रियों तथा शूद्रों का विरोधी है। इन निष्कर्षों के निर्णय, प्रचार और प्रसार में कुछ उन पाश्चात्य लेखकों का षड्यन्त्र है जो 'फूट डालो और राज करो' के लक्ष्य के प्रति समर्पित थे। उन्होंने इस प्रकार के विचार दिए तो थे शैक्षिक कूटनीति के अन्तर्गत किन्तु हम लोगों ने उनको "ब्रह्मावाक्यं प्रमाणम्" के समान सम्मान्य करके गद्गद होकर स्वीकार कर लिया। ये विचार सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय, इतिहास, परम्परा और उनकी मूलभावना के विरुद्ध हैं, अतः सर्वथा अस्वीकार्य ही नहीं अपितु निन्दनीय भी हैं। किसी भी देश या समाज के समृद्ध साहित्य, संस्कृति-सभ्यता के इतिहास में वर्णित तर्कसंगत तथ्यों को तोड़ मरोड़कर, विकृत करके, निहित स्वार्थ के कारण, गलत रूप में प्रस्तुत करने का षड्यन्त्र करना एक साहित्यिक अपराध है और अपराध कभी प्रशंसनीय तथा स्वीकार्य नहीं होता।

आइए, इस निष्कर्ष का सप्रमाण विवेचन करें कि मनुस्मृति मूलतः पुष्यमित्र (१८५ ई० पूर्व०) के समकालीन ग्रन्थ है या नहीं? पाश्चात्य लेखकों के मतानुसार भी यदि इस बात की परीक्षा करें तो ३००-४०० ईस्वी पूर्व के कवि भास रचित 'प्रतिमा नाटक' में मनुस्मृति का उल्लेख एक प्रसिद्ध पठनीय धर्मशास्त्र के रूप में आता है। रावण के मुख से उच्चरित वचन है-

'काश्यप गोत्रोऽस्मि सांगोपांग वेदमधीये मानवीयं धर्मशास्त्रम्,
माहेश्वरं योगशास्त्रम् --- च ।' (पृ० ७६)

५०० ई० पूर्व महात्मा बुद्ध के उपदेशों में जो कि 'धम्मपद' के नाम से संकलित हैं मनुस्मृति २.१२१ और २.१५६ दो श्लोक पालि भाषा में यथावत् रूपान्तरित हैं। वंशावली के अनुसार, गौतम बुद्ध स्वायम्भुव मनु के वंश में उत्पन्न सातवें मनु श्रद्धादेव वैवस्वत के उपरान्त १४६ प्रमुख और प्रसिद्ध राजाओं के पश्चात् हुए। उससे पूर्व 'महाभारत' में दर्जनों स्थानों पर स्वायम्भुव मनु तथा उनसे सम्बद्ध घटनाओं का उल्लेख है और मनुस्मृति के दो सौ से अधिक श्लोक यत्र तत्र उध्दृत मिलते हैं। उससे पूर्व के ग्रन्थ यास्क रचित 'निरुक्त' नामक ग्रन्थ में मनु स्वायम्भव का 'पुत्र पुत्री समानता' का मत उध्दृत किया हुआ है जो मनु० के ९,१३०,१९२ श्लोकों में उपलब्ध है। इसका रचना काल ८०० से ५०० ई० पू० माना जाता है। इस श्लोक की दूसरी विशेषता यह है कि इसमें मनु का काल 'विसर्गादौ' अर्थात् 'सृष्टि के आदि में' वर्णित किया है। बाल्मीकीय रामायण में राम बाली के संवाद में मनु के नाम से उध्दृत दो श्लोक और 'पुत्र की निरुक्ति-वर्णक' श्लोक वर्तमान मनुस्मृति के हैं। उससे भी प्राचीन ग्रन्थ शतपथ और ऐतरेय ब्राह्मण में राजा शर्यात मानव का वर्णन है जो सातवें मनु वैवस्वत के पुत्र ईश्वाकु का वंशज है। स्वायम्भुव मनु इससे सात मनु पूर्व के हैं। इन ग्रन्थों का न्यूनतम रचनाकाल ३००० ई० पूर्व माना गया है। इनसे भी पूर्व के संहिता ग्रन्थों में मनु के विधानों की, उपदेशों की प्रशंसा मिलती है। तैत्तिरीय संहिता में कहा है-

'मनुर्वै यत्किन्चावदत् तद् भेषजं भेषजतायै।' (तै० सं० २.२.१०.२; ३.१.९.४)

अर्थात्- 'मनु ने जो कुछ विधान किया है या उपदेश दिया है, वह औषध के समान कल्याणकारी है।'

मनुस्मृति की वर्णनशैली से हमें जानकारी मिलती है कि मनु अपने विधानों और आदेशों-निर्देशों का ग्रहण सीधे वेदों से करते हैं और वेद को ही परम प्रमाण मानते हैं। वेदों के अतिरिक्त मनुस्मृति में किसी मान्य शास्त्र या ग्रन्थ का उल्लेख नहीं मिलता। इसका अभिप्राय यह है कि मनुस्मृति के रचनाकाल तक उपर्युक्त साहित्य का निर्माण नहीं हुआ था। उपर्युक्त प्रमाणों से यह सिद्ध हो जाता है कि मनुस्मृति समस्त प्राचीन वाङ्मय से भी प्राचीनतर है। आंकड़ों के अनुसार वह समय क्या हो यह एक पृथक् प्रश्न है।

कुछ लोग मनुस्मृति की भाषा के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं कि इसकी भाषा प्राचीनतर नहीं है। उनके यह जानकारी देना चाहता हूं कि मनुस्मृति की भाषा में वैदिक प्रयोग और पूर्व पाणिनीय प्रयोग आज भी मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लोकसामान्य से सम्बद्ध इस शास्त्र की वैदिक भाषा में समयानुसार परिवर्तन करके उसे लौकिक भाषा-प्रधान बना दिया है, जैसे बाल्मीकीय रामायण को बनाया गया है। मनुस्मृति में शेष कुछ वैदिक प्रयोग द्रष्टव्य हैं-

क० 'आ हैव स नरवाग्रेभ्य:' (२.१६७)
ख० 'पुत्रका इति होवाच' (२.१५१)
ग० 'पितृणामात्मनश्च ह' (९.२८)

वंशावली की दृष्टि से देखें तो मनु स्वायम्भुव स्वयम्भू अर्थात् ब्रह्मा के पुत्र (कहीं-कहीं पौत्र) हैं। ब्रह्मा भारतीय-भारोपीय समाज का अदितम पुरुष हैं। उनसे पूर्व का न कोई इतिहास मिलत है, न वंशावली। इस आधार पर भी मनु आदिकालीन समाज के व्यक्ति सिद्ध होते हैं। यदि चीनी भाषा के साहित्य में प्राप्त उल्लेखों को प्रमाण मानें तो उसमें मनुस्मृति का रचनाकाल दस बारह हजार वर्ष पूर्व का घोषित किया गया है। यह भी वर्णित है कि मनुस्मृति वैदिक संस्कृत में रचित शास्त्र है और उसमें ६८० श्लोक हैं। इन सभी प्रमाणों से मनुस्मृति की प्राचीनता की पुष्टि होती है और यह स्पष्ट हो जाता है कि ईस्वी पूर्वी १८५ वर्ष के रचनाकाल की मान्यता निराधार, मिथ्या एवं कपोलकल्पित है।

मनु और मनुस्मृति का काल आदि समाज कालीन सिद्ध होने से उनके कार्यों का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। राजर्षि मनु द्वारा आदि कालीन समाज को व्यवस्थित करना, मानवीय मूल्यों की स्थापना करना, राज्यविहीन राष्ट्र में राजकता का निर्माण करना, मर्यादाओं का निर्धारण कर समाज में सुख-शान्ति का वातावरण बनाना, ये कार्य किसी आविष्कार से कम नहीं हैं। उनके ये कार्य मानवता की संस्थापना की दृष्टि से महान् कार्य हैं। वह मनु जिसने पहले पहल इन कार्यों को किया, वह मानवता के लिए सर्वोपरि महत्वपूर्ण हैं और वह शास्त्र जिसके माध्यम से यह महान् कार्य सम्पन्न हुआ है वह मानवता की अनुपम धरोहर है।

ज्ञात भारतीय इतिहास के, राजर्षि मनु आदितम राजा हैं और उनके द्वारा रचित मनुस्मृति नामक शास्त्र आदितम संविधान है जिसके अनुसार उन्होंने अपने शासन में मानव समाज को व्यवस्थित किया। बाल्मीकीय रामायण और पुराणों में मनु को आदिराजा कहा है और महाभारत के शान्ति पर्व में आदिराजा बनने की घटना का विवरण दिया गया है। वह इस प्रकार है- अराजकता से पीड़ित प्रजाएं पितामह ब्रह्मा के पास गईं और बोली- पितामह! किसी उपयुक्त व्यक्ति को राजा नियुक्त कीजिये, नहीं तो प्रजाएं नष्ट भ्रष्ट हो जाएंगी। ब्रह्मा ने अपने पुत्र मनु को राजा बनने का आदेश दिया किन्तु मनु ने अनिच्छा प्रकट की। ब्रह्मा ने पुन: आदेश दिया तो मनु को स्वीकार करना पड़ा। ब्राह्मण वंशीय मनु वर्ण परिवर्तन करके राजा बने और प्रजा का पुत्र के समान पालन करने लगे। विष्णुपुराण में भी इस घटना का संक्षिप्त उल्लेख है। राजर्षि मनु ने मनुस्मृति के अनुसार अपने शासन में व्यवस्थाओं और मर्यादाओं का निर्धारण किया। निरुक्तकार अाचार्य यास्क आदि ने मनुस्मृति को आदि संविधान कहा है। मनु के काल की भ्रान्ति होते हुए भी जो लेखक इस मत में एकमत हैं कि मनु आदि संविधान प्रणेता (First Law Giver) हैं। वे हैं- सर्वश्री पं० जवाहरलाल नेहरू, टी० देसाई, एन० आर० राघवचारी, अरविंद घोष, डॉ० राधाकृष्णन, डॉ० अम्बेडकर, ए० ए० मैक्डानल, पी० थामस, ए० बी० कीथ आदि।

अब हम यह कहते हैं कि मनु ने समाज को संविधान के द्वारा व्यवस्थित किया तो उसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने व्यक्ति को सामाजिक बनाया, उसे समाज में रहना सिखाया, साथ मिलकर रहना और उन्नति करना सिखाया। मनु का संविधान विश्व के देशों को इतना प्रभावोत्पादक लगा कि मनु और संविधान पर्याय बन गए। अनेक देशों में वहां के संविधान निर्माता को मनु की उपाधि से गौरवान्वित किया गया और मनुस्मृति के अनुकरण पर संविधान के निर्माण में गौरव अनुभव करते रहे। श्री पी० वी० काणे के अनुसार दक्षिणी वियतनाम में खुदाई में प्राप्त अभिलेखों में मनु के श्लोक उध्दृत मिलते हैं। इन्द्रवर्मा प्रथम (1799 ई०) के अभिलेख में राजधानी का वर्णन करते हुए लिखा है कि वहां निरुपद्रव वर्णाश्रम व्यवस्थिति थी। वर्मा का संविधान मनु पर आधारित था जिसका नाम 'धम्मथट्' अथवा 'मनुसार' था। बुद्धघोष ने सोलहवीं शाताब्दी में उसका पाली अनुवाद 'मनुसार' के नाम से किया था।

कम्बोडिया के लोग स्वयं को मनुवंशी मानते रहे हैं। राजा उदयवीर वर्मा के अभिलेख में वहां के संविधान का नाम 'मानव नीतिसार' दिया है। जय वर्मा प्रथम के अभिलेख से ज्ञात होता है कि वहां 'मनुसंहिता' को आदर से पढ़ा जाता था। जय वर्मा पंचम (668 ईस्वी) के एक अभिलेख में घोषणा की है कि उसने वर्णाश्रम व्यवस्था की स्थापना दृढ़ता से की। यशोवर्मा के "प्रसम कोमनप" नामक स्थान से प्राप्त अभिलेख में मनुस्मृति का २.१३६ श्लोक उध्दृत है जिसमें सम्मान व्यवस्था के मानदण्ड वर्णित हैं।

फिलीपीन के निवासी यह मानते रहे हैं कि उनकी आचार संहिता मनु और लाओत्से की स्मृतियों पर आधारित है। इसी कारण वहां की प्राचीन विधानसभा के द्वार पर इन दोनों की मूर्तियां स्थापित की गई थीं।

इंडोनेशिया के बालिद्वीप में आज भी वर्णव्यवस्था का व्यवहार है। वहां उच्च जातियों को 'द्विज' और शूद्रों को 'एकजाति' कहा जाता है। यही मनुस्मृति के १०.४ श्लोक में वर्णित है। वहां अब तक शूद्रों के साथ छुआछूत का भाव नहीं है, जो मनुस्मृति की मौलिक व्यवस्था में था।

ब्रिटेन और अमेरिका से प्रकाशित 'इन्साइक्लोपीडिया' 'द कैम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इंडिया', श्री केवल मोटवानी द्वारा लिखित 'मनु धर्मशास्त्र: ए सोशियोलोजिकल एण्ड हिस्टोरिकल स्टडी', डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार द्वारा रचित 'दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण एशिया में भारतीय संस्कृति' नामक पुस्तकों में मनुस्मृति के विश्वव्यापी प्रभाव का वर्णन है। उनके अनुसार एशिया, यूरोप, अमेरिका और आस्ट्रेलिया द्वीपों के अधिकांश देशों में मनु के नाम और प्रभाव के प्रमाण मिलते हैं। मनु वैवस्वत के समय घटी जलप्रलय की घटना का उल्लेख प्रायः सभी प्राचीन देशों के साहित्य में मिलता है। बाइबल और कुरान में मनु का नाम विकृत होकर 'नूह' हो गया है जबकि आदिम अर्थात् 'ब्रह्मा' आदम हो गया है। यह विश्वव्यापी उल्लेख विश्व के मानव समाज को किसी न किसी प्रकार मनु के स्मरण, उनकी संस्कृति और उनके योगदान से जोड़ता है। यहां प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि मनु के इस विश्वव्यापी स्मरण का आखिर कारण क्या है? उत्तर स्पष्ट है कि तत्कालीन समाज के लिए मनु का योगदान अप्रतिम था। वह कृतज्ञता ही विश्व के लोगों के मस्तिष्क पर अभिलेख बनकर अंकित हो गई है।

विश्व मे मानवता की प्रतिष्ठापना और व्यक्ति को उससे संस्कारित करने के लिए जो विचार मनु के मन में प्रादुर्भूत हुआ, निश्चय ही वह अद्भुत था। बिना शिक्षा के आदमी 'मानव' नहीं बन सकता और मानव बने बिना मानवता की स्थापना नहीं हो सकती। इसलिए मनु ने 'सभी के लिए अनिवार्य शिक्षा' का सिद्धान्त सर्वप्रथम प्रस्तुत किया। मनु शिक्षा को कितना महत्व देते थे इसका अनुमान हम उनके विधानों से लगा सकते हैं। उन्होंने शिक्षाप्राप्ति के लिये गुरुकुल-प्रवेश के तीन तीन विकल्प दिए हैं। ब्राह्मण बनने के इच्छुक बालक के लिए ५,७ और १६; क्षत्रिय बनने के इच्छुक के लिए ६,१० और २२; वैश्य बनने के इच्छुक के लिए ८,११ और २४ वर्ष। अन्तिम विकल्प आयु में भी जो प्रवेश नहीं लेता वह 'व्रात्य' अर्थात् व्रत से पतित हो जाता है, जो निन्दनीय और बहिष्कार्य हो जाता है। यह कठोर विधान शिक्षा प्राप्ति की महत्ता और अनिवार्यता के लिए है। उनकी इस धारण की पुष्टि उन वचनों से भी होती है जहां मनु शारीरिक जन्म को गौण मानकर 'ब्रह्मजन्म' अर्थात् 'विद्याजन्म' को इस जन्म और परजन्म का कल्याण करने वाला घोषित करते हैं-

'ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम्।' (२.१५६)

राजर्षि मनु सर्वजन शिक्षा प्राप्ति के कितने उदार पक्षधर थे, उसका एक अद्वितीय प्रमाण देखिए। स्वशासित ब्रह्मावर्त प्रदेश में, पृथ्वी के सभी मानवों को शिक्षाप्राप्ति के लिए आमन्त्रित करते हुए वे कहते हैं-

एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।। (२.२०)

अर्थात- पृथिवी पर बसने वाले समस्तजनों! मेरे इस देश में उत्पन्न विद्वान धार्मिक ब्राह्मणों के पास आओ और अपने कर्तव्य तथा आचरण की शिक्षा प्राप्त करो।'

कितना सहदयता पूर्ण महान् आह्वान है। न ब्राह्मण- शूद्र का भेदभाव है, न स्त्री पुरुष का भेदभाव है, न आर्य-अनार्य का भेदभाव है, न असुर-राक्षस का भेदभाव है, न स्वदेशी-विदेशी का भेदभाव है। सबके लिए शिक्षा के द्वार खुले हैं, सबके लिए खुला आमन्त्रण है! क्यों? क्योंकि सबको श्रेष्ठ मानव बनाना है, सबको कुशल नागरिक बनाना है, सबको सभ्य और सुसंस्कृत बनाना है, और यह कार्य केवल शिक्षा से ही हो सकता है। 'सर्वजन शिक्षा और अनिवार्य शिक्षा' के सिद्धान्त की देन मानवता के लिए बहुत बड़ी देन है।

मनुष्य शिक्षा प्राप्त करके साक्षर होकर मनुष्य भी बन सकता है और राक्षस भी। सभी जन मनुष्य ही बनें इस भावना को दृष्टि में रखकर महर्षि मनु ने धर्म की अवधारणा प्रस्तुत की।धर्म वह तत्व है जो आत्मा को नियन्त्रित करता है, आत्मा को उन्नत करता है। मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म कर्मकाण्ड, पूजा पाठ अथवा सम्प्रदाय नहीं है, वह संयत, शान्त, सुखी जीवन जीने की एक पद्धति है। उसका स्वरूप शाश्वतिक और सार्वकालिक है। अपने मूल अर्थ में वह धारण करने योग्य आचरण है। ऐसा धर्म ही मानवता का उन्नायक और रक्षक हो सकता है। मनु ने उस धर्म को दस लक्षणों में समाहित कर प्रस्तुत किया है-

धृति: क्षमा दमो ऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।। (६.९२)

अर्थात् 'विपत्ति में धैर्य रखना, सहनशक्ति होना, मन पर नियन्त्रण, किसी के पदार्थ, धन आदि को अन्याय से न लेना, शरीर और अन्तःकरण की पवित्रता, इन्द्रियों को वश में रखना, बौद्धिक उन्नति करना, विभिन्न विद्याओं की प्राप्ति करना, सत्याचरण, क्रोधरहित अर्थात् शान्तभाव से व्यवहार करना' ये धार्मिकता के लक्षण हैं।

मनु का यह धर्म मनुष्य की भावनाओं का उन्नयन कर उसे ऐसा जीवन जीना सिखाता है जिससे वह निजी स्तर पर, परिवार और समाज में शान्त-सुखी रहकर उन्नति प्रगति कर सकता है। इसी को मानवीय धर्म का नाम दिया जा सकता है जो वस्तुतः मानवता का रक्षक हो सकता है। विश्व में जिन्हें आज तक धर्म कहा गया है, उनमें कोई भी ऐसा नहीं है जिसे मनु-प्रतिपादित धर्म के समकक्ष रखा जा सके। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की परिकल्पना को केवल मनु का धर्म ही साकार कर सकता है।

आदिकालीन समाज को व्यवस्थित और मर्यादित करने के लिए मनु ने जो पहली व्यवस्था इस विश्व को प्रदान की वह है- 'वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था'। वेदों से भाव ग्रहण कर मनु ने उसका स्वरूप निर्धारित किया और फिर उसे अपने शासन में क्रियान्वित किया। इस व्यवस्था में सबको रुचि अनुसार शिक्षा प्राप्त करने और यथेष्ट वर्ण को धारण कर इच्छित व्यवसाय करने की स्वतन्त्रता प्रदान की है। यह स्वतन्त्रता जीवन पर्यन्त रहती है। इसके द्वारा राष्ट्र को व्यवसाय-कुशल नागरिक प्राप्त होते हैं जो राष्ट्र की उन्नति, प्रगति, सुरक्षा के आधार बनते हैं। वर्णव्यस्था जहां समाज और राष्ट्र की उन्नति का माध्यम है वहां आश्रम व्यवस्था व्यक्ति की शारीरिक आत्मिक बौद्धिक उन्नति का माध्यम है। इस प्रकार यह एक सांगोपांग अथवा परिपूर्ण समाज व्यवस्था है। इसी के अन्तर्गत इस देश में बड़े बड़े ऋषि महर्षि, दार्शनिक, वैयाकरण, आयुर्वेदज्ञ, धनुर्धर, राजनीतिज्ञ, मर्यादा पुरुषोत्तम और भूगोलविद् आदि प्रसिद्ध हुए हैं। पौराणिक वर्णनों के अनुसार आदि काल में पृथ्वी के सात द्वीपों में यही समाज व्यवस्था प्रचलित थी। वे सात द्वीप थे- जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। भारतीय इतिहास की इस महिमा से चुंधियाकर पाश्चात्य लेखकों ने इस सबको काल्पनिक कह डाला था, किन्तु आज इतिहासज्ञों ने जम्बू, शाक और कुश इन तीन द्वीपों की और संस्कृत से वहां की भाषा समानता की प्रमाणिक खोज कर ली है। शेष खोज भी भविष्य में होने की आशा है। आदिकाल में इन सब द्वीपों में मनु स्वायम्भुव के दीर्घा पुत्र प्रियव्रत के सात पुत्रों का शासन था। इस इतिहास के ज्ञान के साथ सम्पूर्ण विश्व में मनु का नाम पाए जाने का कारण समझ में आ जाता है। क्योंकि उनका जो योगदान और सम्बन्ध था वह वैश्विक स्तर पर था।

महर्षि मनु ने इस समाज व्यवस्था में उदारता और दयालुता का ऐसा प्रतिमान स्थापित करने का प्रयास किया है जो विश्व की किसी सभ्यता में 'न भूतो न भविष्यति' न हुआ है और न होगा। मनु ने गृहस्थ दम्पति को आदेश दिया है कि वे पहले अपने सेवक वर्ग को अर्थात् सेवादार शूद्र वर्ग को भोजन कराके फिर भोजन किया करें-

भुक्तवत्सु अथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि।
भुन्जीयातां तत: पश्चात् अवशिष्ट तु दम्पति।। (३.११६)

अर्थात 'पहले विद्वान् अतिथियों और अपने भृत्यों, जो शूद्र होते थे, उनको खिलाकर तत्पश्चात् शेष भोजन को स्वयं किया करें।' देखिए, शूद्रवर्ग के प्रति कितनी मानवीय भावना थी मनु की।

स्त्रियों के प्रति मनु का दृष्टिकोण क्या था? इसकी चर्चा किए बिना यह आलेख अर्धांग ही रहेगा। यह अतिश्योक्ति नहीं किन्तु यथार्थ है कि आज तक विश्व में महर्षि मनु जैसा नारी हितैषी उनको सम्मान प्रदाता और यथायोग्य प्रशंसक कोई समाज व्यवस्थापक नहीं हुआ है। वे स्त्रियों के सम्मान और समानता के समर्थक थे। उनका एक प्रसिद्ध श्लोक है-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।। (३.५६)

कभी कभी एक ही शब्द का गलत अर्थ किसी सुन्दर विचार को महत्वहीन कर देता है, यह श्लोक उसका प्रमाण है। इसके 'देवता:' पद में अर्थ की महानता है, सही अर्थ से महान् अर्थ प्रकट होता है (जैसे, आज भी व्यवहार में महान् और श्रेष्ठ व्यक्ति को देवता कहा करते हैं)। इसके विपरीत अनर्थ से कल्पित अर्थ ज्ञात होता है। महर्षि दयानन्द ने सही अर्थ की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कर बताया है कि यह वैदिक भाषा का शब्द है और इसका सही अर्थ है- 'दिव्य गुण कर्म स्वभाव युक्त सन्तान'। इस श्लोक का अर्थ होगा- 'जिस परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है वहां दिव्य गुण कर्म स्वभाव युक्त सन्तानें होती हैं और जहां अनादर अर्थात् अपमान और कलह होता है उनका गृहस्थ असफल होता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि सम्मानपूर्ण वातावरण में श्रेष्ठ और सफल सन्तानें होती हैं और कलहपूर्ण वातावरण में बिगड़ जाती हैं। यहां मनु ने स्त्रियों के सम्मान को गृहस्थ की सफलता का आधार माना है। अन्यत्र घोषित किया है कि 'स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषो ऽस्ति कश्चन' (९.२६) अर्थात स्त्रिजन में और लक्ष्मी में कोई भेद नहीं है। आज भी प्रचलित यह महान् उक्ति कि 'स्त्रियां लक्ष्मी होती हैं' मूलतः मनु की वैचारिक देन है। मनु ही वह सर्वप्रथम संविधान दाता थे जिन्होंने पुत्री और पुत्र को समान स्तर प्रदान किया तथा सम्पति में भी समान अधिकार की घोषणा की थी। मनु कहते हैं-

'यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा।' (९.१३०)

अर्थात्- 'जैसा आत्मा रूप पुत्र होता है वैसी ही पुत्री होती है।' उनका सम्पति में समान अधिकार है-

अविशेषेण पुत्रांण दायो भवति धर्मत:।
मिथुनानां विसर्गादौ मनु: स्वायम्भुवो ऽब्रवीत्।। (निरुक्त ३.४)

उद्धरण

१ ध्यान देने का तथ्य यह है कि संस्कृत में पदरचना नियमबद्ध रूप से होती है। उसमें प्रत्ययों का भी अर्थ निर्धारित है। जो लोग यह कहते हैं कि मनुमूलक शब्दों की संरचना 'मनु' चिन्तनार्थ पद से हुई है, वे सर्वथा गलत हैं। इन शब्दों में जो प्रत्यय हुए हैं वे व्यक्तिवाचक शब्द से 'अपत्य' अर्थ में हुए हैं। 'मनु' व्यक्तिवाचक से 'अण्' प्रत्यय होकर 'मानव', 'यत्' प्रत्यय और 'षुक्' आगम होकर 'मनुष्य', 'अन्त्र्' प्रत्यय और 'षुक्' आगम होकर 'मानुष', 'जन्' धातु के योग से 'उ' प्रत्यय होकर 'मनुज' पद बना है। इन सभी का अर्थ सन्तान अथवा वंशज और प्रजा है। यही कथन अन्य ग्रन्थों में है- 'मनोरपत्यं मानव:' (निरुक्त ३.४)= मनु के वंशज को मानव कहते हैं। 'मानव्य प्रजा:'= सभी प्रजाएं मनु की वंशज हैं (काठक ब्राह्मण २.३०.२; तैत्तिरीय संहिता ५.१.५.६) आदि।

२ 'दि आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी' द्रष्टव्य 'MAN' पद तथा निम्नलिखित मन्तव्य:

(क) मेनिंग रचित 'एन्सिएन्ट एण्ड मेडिवल इंडिया' में-

"It has been remarked by various authors (as Kuhn and Zeitschrift IV 94 ff) that in analogy with Manu as the father of mankind or of the Aryas, German mythology recognises Manus as the ancestor of Tuetons. The english Man and the German Manuappear also to be akin to the word Manu as the German Manesh presents a close resemblance to Manush of Sanskrit." (Vol.1, P.118)

(ख) "The reader will not readily forget the city of the sun 'Helispolis' or 'Menes'. The first Egyptian king of the sun, the 'Menu Voivasowat' or patriarch of the solar race, nor his statue, that of the great 'Menoo', whose voice was said to salute the rising sun." (India in Greece, P.174)

३ (क) मनुस्मृति में- अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्।। (2.121)

धम्मपद में- अभिवादनसीलस्स निच्चं बुड्ढ़ापचायिनो।
चत्तारो धम्मा वड्ढन्ति आयु विद्दो यसो बलम्।। (८.१०)

(ख) मनुस्मृति में- न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिर:। (२.१५६)

धम्मपद में- न तेन थेरोसि होति येनस्स पलितं सिरो। (१६.५)

४ द्रष्टव्य- महाभारत आदिपर्व ७३. ८-९; शान्तिपर्व अ० ३६; ६७.१५-३०; ५६.३३; ३३५.४४, ४६ आदि तथा लेखक के 'मनुस्मृति-भाष्य' की भूमिका।

५ द्रष्टव्य- यास्करचित निरुक्त ३.४। इस आलेख में पृ० ६ पर उध्दृत 'अविशेषेण पुत्राणाम्......'।

६ द्रष्टव्य- किष्किन्धा काण्ड १. ३०-३२; अयोध्याकाण्ड १०७.१२। विवेचन के लिए देखिए लेखक रचित- 'महर्षि मनु बनाम डॉ० अम्बेडकर पृ० ३५, ३६।

७ द्रष्टव्य लेखक रचित- 'महर्षि मनु बनाम डॉ० अम्बेडकर' पृ० ३४,३५।

८ ऐतरेय ब्राह्मण ८.११।

९ विवेचन द्रष्टव्य लेखक के 'मनुस्मृति भाष्य' की भूमिका में 'मनु और वेद' विषय।

१० वंशावली है- ब्रह्मा -> मनु स्वायम्भुव -> प्रियव्रत -> अग्नीध्र -> मनुस्वारोचिष -> मनु उत्तम -> मनु तामस -> मनु रैवत -> मनु चाक्षुष -> मनु वैवस्वत -> इक्ष्वाकु -> सूर्यवंशी सभी क्षत्रिय। इला पुत्री से चन्द्रवंशी क्षत्रिय।

११ केवल मोटवानी रचित 'मनु धर्मशास्त्र- ए सोशियोलोजिकल एण्ड हिस्टोरिकल स्टडी' पृ० २३२, २३३

१२ 'आदिराजो मनुरिव प्रजानां परिरक्षिता' (बालकाण्ड पश्चिमी संस्करण ६.४) तथा विष्णुपुराण १.७.१६; ३.१६; भागवत पुराण ३.२२.२५,३८,३९ आदि।

१३ वही सन्दर्भ।

१४ ३.४

१५ विवरण तथा उद्धरण के लिए द्रष्टव्य है लेखक रचित- 'महर्षि मनु बनाम डा० अम्बेडकर' पृ० ६०, ६१।

१६ डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार- 'दक्षिणपूर्वी और दक्षिण एशिया में भारतीय संस्कृति' पृ० २५७।

१७ वही, पृ० २९७।

१८ वही, पृ० १४९, १९...।

१९ वही, पृ० ४७।

२० वही, पृ० १९, ११४।

२१ मनुस्मृति २.३६, ३७, ३८, ३९, ४० तथा ११.१९१, २१२, २१४।

२२ लेखकरचित- 'महर्षि मनु बनाम डॉ० अम्बेडकर' पृ० १८-२६ द्रष्टव्य है।

२३ 'तत् पत्नीं यजुर्वदन्तीं प्रत्यपद्यत। तस्या: वाग् द्यां आतिष्ठत्। (३.३०.१)

२४ मनुस्मृति २.१३८।

२५ मनुस्मृति ८.३८९; ४.१८०; ८.१८०; ८.३५२, ३५२; ९.२३२ आदि।

२६ संतुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याण तत्र वै ध्रुवम्।। (३.६०)

अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिक:।
एष: धर्म: समासेन ज्ञेय: स्त्री पुंसयो: पर:।। (९.१०१)