Saturday, November 17, 2018

भारत के प्राचीन आर्य राजा एवं सम्राट



भारत के प्राचीन आर्य राजा एवं सम्राट

लेखक पं.भगवतदत्त रिसर्च स्कॉलर

सन्दर्भ ग्रन्थ- भारतवर्ष का वृहद इतिहास द्वारा पं.भगवतदत्त सत्यश्रवा

वैवस्वत मनु- महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति से विवस्वान अर्थात सूर्य का जन्म हुआ था| इन्ही सूर्य के पुत्र का नाम वैवस्वत मनु था| इन्हें महर्षि वाल्मीकि ने पृथ्वी का प्रथम राजा भी माना है|अर्थशास्त्रकार कौटिल्य भी इनको प्रथम राजा मानते हैं| मनु का वंश विश्व में बहुत व्यापक हुआ| भारतीय प्रजा को मानवी अथवा आदित्य की प्रजा कहा गया है| मनु के नौ पुत्र थे और एक पुत्री इला थी| मनु के पुत्रों का वंश सुर्यवंश कहाता है और पुत्री का वंश ऐल वंश कहाता है| मनु के नवें पुत्र इक्ष्वाकु का कुल बड़ा प्रसिद्ध हुआ है| मनु की पुत्री इला का विवाह ऋषि अत्री के पुत्र सोम अथवा चन्द्र के पुत्र बुध से हुआ जिससे पुरुरवा का जन्म हुआ था| यहाँ से चन्द्रवंशी क्षत्रियों का राज्य शुरू होता है|


महाराज सम्राट इक्ष्वाकु- इनको आधिकारिक रूप से भारतवर्ष का प्रथम सम्राट कहा जाता है, हालाँकि ये सप्तदीप के शासक नही कहे गए हैं| इनके ही वंश
में भगवान श्रीरामचन्द्र का जन्म हुआ था, और महात्मा बुद्ध भी इन्हीं के वंशज हैं|

महाराज सम्राट पुरुरवा- पुरुरवा प्रतिष्ठान के राजा थे, ये राज्य इनकोअपनी माता इला की कृपा से प्राप्त हुआ था| ये सभी द्वीप को जीतने वाले बड़े पराक्रमी और महाविद्वान राजा थे| ये मन्त्रदृष्टा थे| इनको ब्रह्मवादी, तेजस्वी, सत्यवाक्, अप्रितमरूप और दानशील कहा गया है|

महाराज सम्राट पुरंजय(ककुत्स्थ)- ये इक्ष्वाकु के पुत्र शशाद का पुत्र था| ये बड़ा पराक्रमी राजा था| इसके नाम से इक्ष्वाकु कुल को काकुत्स्थ भी कहा जाता है|

महाराज सम्राट नहुष- ये पुरुरवा का पौत्र था, ये बड़े शूरवीर और विद्वान राजा थे|

महाराज सम्राट यताति- ये सार्वभौम राजा थे, समस्त पृथ्वी को जीतने वाले| यताति की दो स्त्रियाँ थी| एक उशना काव्य की पुत्री देवयानी और दूसरी महाराज वर्षपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा | यताति को रूद्र ने एक दिव्यागुणयुक्त रथ दिया था| जनमेजय द्वितीय तक ये पौरवों के पास था| फिर ये जरासंध को मिला| वहां से ये देवकी-पुत्र भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त हुआ था| यताति के पांच पुत्र थे| देवयानी से यदु और तुर्वसु तथा शर्मिष्ठा से पुरु आदि तीन| यताति ने अपने राज्य का सर्वश्रेष्ठ भाग पुरु को दिया था| शेष चार उत्तर-पश्चिम और पूर्व में राज्य करने लगे|

महाराज सम्राट अनरण्य- ये सम्राट पुरंजय का पुत्र था, कभी इसकी शूरता बहुत प्रसिद्ध होगी, महाभारतकार ने प्रसिद्ध राजाओं में इनकी गिनती की है| रामायण में इनको महातेज कहा गया है| इनके राज्य में कभी अनावृष्टि अतिवृष्टि नही होती थी और राज्य चोरों और तस्करों से मुक्त था|

महाराज सम्राट कुवलाश्व- ये बड़े प्रतापी राजा थे और गुणों में अपने पिता बृहदश्व से भी बढ़कर थे, ज्ञात रहे सम्राट कुवलाश्व को धुन्धु नामक भयंकर राक्षस का वध करने के कारण इनको धुन्धुमार भी कहा जाता है| ये चक्रवर्ती सम्राट थे| इनके दादा महाराज श्रावस्त ने श्रावस्ती नगरी की स्थापना की थी जो बौद्धकाल में कोसल राज्य की राजधानी बनी| ईरान के फिरदौसी ने शाहनामा में भी इनका उल्लेख किया है|

महाराज सम्राट जनमेजय प्रथम- ये महाराज पुरु के पुत्र थे| इन्होंने अपने जीवनकाल में तीन अश्वमेध यज्ञ किये| अतः ये चक्रवर्ती राजा थे| इन्होने वानप्रस्थ धारण किया|

महाराज सम्राट शशबिन्दु- ये महाराज यदु के वंशज होने से यदुवंशी हैं| इनके पिता का नाम चित्ररथ था| ये चक्रवर्ती और महापराक्रमी राजा थे|

महाराज सम्राट मान्धाता- महाराज मान्धाता सम्राट शशबिन्दु के दामाद थे| ये युवनाश्व द्वितीय के पुत्र और सुप्रसिद्ध सम्राट थे| ज्ञात रहे मान्धाता चक्रवर्ती ही अपितु सार्वभौम राजा थे अर्थ समस्त पृथ्वी के विजेता| इनका नाम ऋग्वेद १/१२/१३ से लेकर रखा गया था|

महाराज सम्राट मरुत्त- ये सुप्रसिद्ध मरुत्त मनु-पुत्र प्रांशु के कुल से हैं| मरुत्त ने एक महान अश्वमेघ यज्ञ | उस यज्ञ का उल्लेख शतपथ और ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है|

महाराज सम्राट महामना- ये महाराज महाशाल का पुत्र था और सम्राट पुरंजय का प्रपौत्र था, दुखद है कि इस महान इक्ष्वाकुवंशी चक्रवर्ती राजा का अब नाम
ही शेष है|

महाराज सम्राट दुष्यंत- संस्कृत साहित्य में ये राजा बड़ा सुविख्यात है| कालिदास की अमरकृति ने ये नाम संसार भर में प्रसिद्ध कर दिया है| इस
चन्द्रवंशी सम्राट ने लगभग सारी पृथ्वी जीत ली थी|

चक्रवर्ती सम्राट भरत- महाराज दुष्यंत का पुत्र भारतीय इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है| 6 वर्ष की आयु में ही ये अत्यंत बलवान था| इन्हें सर्वदमन भी कहा जाता था| महाराज भरत के दो पौत्र नर व गर्ग ऋषिपद को प्राप्त किये थे| महाराज भरत एक सर्वभौम शासक थे अर्थात समस्त पृथ्वी के विजेता|

महाराज सम्राट सुहोत्र- सम्राट भरत के प्रपौत्र और सकलपृथ्वी पति थे महाराज सुहोत्र| इनका राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण था| सुहोत्र के पुत्र हस्ती ने प्रसिद्ध हस्तिनापुर नगरी की स्थापना की थी|

महाराज सम्राट हरीशचन्द्र- त्रिशंकु अथवा सत्यव्रत पुत्र हरिश्चंद्र भारतीय इतिहास का अति-प्रसिद्ध राजा हुआ है| हरिश्चन्द्र समस्त पृथ्वी के विजेता था| इनके राजसूय यज्ञ के कारण बड़ी संख्या में क्षत्रिय का विनाश हुआ था|

महाराज सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन- जब कोशल में इक्ष्वाकुवंशी हरीशचंद्र का शासन था, उसके पश्चात नर्मदा के तट पर एक महान विजेता का राज्य शुरू
होता है| ये था यदुनंदन कार्तवीर्य अर्जुन| यदु का पुत्र सहस्त्रजीत था| सहस्त्रजीत का पुत्र शतजीत था| उसके पश्चात् हैहय राजा हुआ| इसी हैहय के
कारण कार्तवीर्य अर्जुन को हैहयवंशी कहा जाता है| इसने सारी पृथ्वी को जीत लिया था| इसकी मृत्यु का कारण अति अभिमान था और ये जामदग्न्य राम के
हाथों मारा गया|

महाराज सम्राट रोहित- ये सम्राट हरीशचंद्र का पुत्र था और चक्रवर्ती राजा हुआ | इसने रोहितपुर नगर बसाया जो वर्तमान बंगाल के शाहाबाद जिले का
रोहतास स्थान वही पुर है|

चक्रवर्ती महाराज सगर- कार्तवीर्य अर्जुन की मृत्यु के पश्चात् परशुरामजी के भय से उसके पुत्र, पौत्र और सामंत इत्यादि हिमाद्री वनगहर में चले गए| जब परशुरामजी हिमालय तपस्या के लिए गए तो हैहयवंशी राजा और सामंत इत्यादि अपनी माहिष्मतीपुरी को आये | वहां आकर उन्होंने अयोध्या पर भारी आक्रमण
किया| उस समय उन हैहयवंशी क्षत्रियों का साथ पांच क्षत्रिय गणों ने दिया| वे थे—शक, यवन, पारद, कम्बोज और पल्लव| उस समय अयोध्या में महाराज बाहु
का शासन था| बाहु वृद्ध थे पर कुछ काल तक उनसे लड़ते रहे फिर पराजय होने पर अपनी यादवी पत्नी के साथ वन को चले गए| जहाँ महापराक्रमी सगर का जन्म हुआ| उसने बहुत शीघ्र ही अपनी राजधानी अयोध्या हस्तगत करली | उसने अयोध्या में शत्रु-नाश का संकल्प लिया और हैहयवंशी समेत उनके सामंत और
सहायक सभी क्षत्रियों का नाश किया| इसमें शक और यवन को ऋषि वशिष्ठ के परामर्श पर वेद-विहीन करके आर्याव्रत की सीमा से निकाल दिया | सगर समस्त
पृथ्वी का विजेता स्वामी हुआ| मथुरा के यादव शूरसेनी उसके मामा थे|

महाराज सम्राट दिलीप प्रथम- ये महाराज अन्शुमान के पुत्र और सम्राट सगर के प्रपौत्र थे| इन्होंने चिरकाल तक समस्त पृथ्वी का पालन किया|

चक्रवर्ती महाराज भागीरथी- यह नाम भारतीय इतिहास बड़ा ख्याति-प्राप्त नाम है| महाराज भागीरथी के पुण्य प्रयास से पुण्य-सलिला गंगा भारत की भूमि पर बहने लगीं|

महाराज सम्राट अम्बरीश- महाराज भागीरथी का पुत्र श्रुत था और श्रुत का पुत्र नाभाग था और इन्ही नाभाग का पुत्र अम्बरीश हुआ| इसने अनेक क्षत्रियों को पराजित किया और चक्रवर्ती हुआ|

महाराज सम्राट रघु- महाराज रघु को कहीं कहीं दीर्घबाहु भी कहा गया है| इनके पिता महाराज दिलीप द्वितीय थे| रघु ने चारो दिशाओं में विजय प्राप्त की थी| इनको किवदंतियों बड़ा दानवीर भी कहा जाता है|

महाराज सम्राट दशरथ- इनके बारे में अधिक बताने की आवश्यकता नही है| ये एक प्रतिष्ठित चक्रवर्ती सम्राट थे|

भगवान रामचन्द्रजी- रामजी के नाम के साथ भगवान विशेषण लिखने का अलग आनन्द होता है| इनके बारे बताने की कोई आवश्यकता नही है| रामराज्य समस्त भारतवासियों की आस में रहता है| कोसल का राज्य रामजी के पुत्र कुश को मिला और लव ने श्रावस्ती को अपनी राजधानी बनाया| मथुरा शत्रुघ्न पुत्र सुबाहु को मिली और दूसरा पुत्र शत्रुघाती विदिशा का राजा हुआ| कुश सभी भाइयों में बड़ा था, सभी उसके अनुसार चलते थे| लव के वंश में कौशल्य-राज बृहदबल था जो महाभारत युद्ध में अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु के हाथों मारा गया था| बुद्ध के समय में प्रसेनजित श्रावस्ती का राजा था| इसकी बहन मगध नरेश
बिम्बसार को ब्याही थी| इसकी पत्नी बुद्ध की उपासिका थी| इसने बौद्ध मत के विकास में बड़ा योगदान दिया था|

राजराजेश्वर शान्तनु- महाराज शान्तनु चक्रवर्ती सम्राट थे| इनके पुत्र देवव्रत(भीष्म) का इतिहास ही महाभारत कहा जाता है|

चक्रवर्ती उग्रायुध- पौरव कुल में उत्पन अजमीढ़ के कुल कृत का पुत्र उग्रायुध जन्मा | ये बड़ा विजयी राजा हुआ| महाराज शान्तनु की मृत्यु के पश्चात् इसने हस्तिनापुर में देवव्रत को सन्देश भेजा कि अपनी सौतेली माता का सत्यवती का विवाह उससे कर दो अन्यथा तुम्हारे राज्य पर आक्रमण होगा| ये केवल अपमान का सूचक था| पुरोहितों की अनुमति से पिता के शोककाल में भीष्म कुछ दिन शांत रहा| फिर भीष्म निश्चयपूर्वक रण के लिए निकला और तीन दिन तक उग्रायुध के साथ भीषण युद्ध करके उसका वध का दिया|

चक्रवर्ती महाराज पांडु- महाराज पांडु उच्च कोटि के धनुर्धर थे| इन्होने मगध, काशी, विदेह, सुम्ह, पुंड्र इत्यादि जीते| मगध में राजगृह पर दार्व को मारा| कुरु राज्य के जितने भाग गत वर्षों में कई राजाओं ने ले लिए थे,उन्हें पुनः प्राप्त किया|

महाराज धृतराष्ट्र- महाराज पांडु की आकस्मिक मृत्यु के कारण कुरु-राज्य की व्यवस्था बिगड़ने लगी तो भीष्म ने धृतराष्ट्र को राजा बना दिया| महाभारत-युद्ध पर्यन्त इनका राज्य कहा गया|

महाराज सम्राट युधिष्ठिर- भारत-युद्ध में विजय पाकर ये इंद्रप्रस्थ नरेश पुनः हस्तिनापुर के भी राजा हुए| फिर अपने भाइयों की सहायता से इन्होने समस्त पृथ्वी पर विजय प्राप्त की|

विशेष नोट- सूची में दिए गए राजाओं के काल-निर्णय को सूची में दिए गए उनके स्थान के अनुसार न समझा जाये| उसके लिए सभी आर्ष-इतिहास और साहित्य का अवलोकन करें|



Thursday, November 15, 2018

Kashi Shastrarth: Debate between truth and ignorance




Kashi Shastrarth: Debate between truth and ignorance

(Published on the occasion of 149th Anniversary of Kashi Shastrarth)

Reproduced from Bawa C. Singh's Life and Teachings of Swami Dayanand Saraswati's
Edited by Dr. Vivek Arya

Kashi (Benares) been the seat of learning in India, and the center of religious influences. Ever since the birth-hour of Jainism Kashi has been the stronghold of Idolatry. Swami Dayanand felt that if he was to deal with ignorance he need to propagate the true message of Vedas. He reached Kashi and challenged Pundits to debate on Idol Worship and Vedas. The so called learned Pundits instead of accepting his challenge start abusing him. The news of this most unbecoming behavior to the Maharaja of Benares, he announced that everyone was welcome to have a Shastrarth with Dayanand, but that no one was to abuse him under any circumstances. He called together a meeting of his Pundits and emphasized the necessity of their holding a Shastrarth with him without further delay.

After much deliberation the necessity of a discussion was admitted, but it was hinted that a discussion with Dayanand could not be held till it had been first ascertained what books he believed in. "He is in the habit of setting down this and that book as utter nonsense," complained the Pundits, " and who knows but that he may try with the same trick just when we are on the point of running him to earth!" Very modest this of the Pundits, but, for all that, the Maharaja could not but admit the justness of their contention, and authorized them to take the necessary steps towards finding out what constituted authoritative literature and Dayanand's opinion. Accordingly, five Pundits - Shalig Ram Shastri, Dhondi Raj Shastri, Damodar Shastri, Bharadwaj and Ram Krishn Shastri were deputed for the purposes. When these gentlemen put in an appearance, some one form among the numerous students, who surrounded the Swami at the time, gave out that students from the opposite party were approaching, and the result was, that when the Pundits disclosed their errand, the Swami indifferently replied that the discussion should come off in few days, and under the supervision of the City Kotwal. As to what Shastras he believed in as authoritative, he would give a written answer to the question as soon as the Pundits from the opposite party saw him.

The five Pundits not quite clear as to what the reply meant, returned to their chiefs, but soon discovering the mistake that had been committed in ignorance, they once more waited upon the Swami, and informing him of their status, begged for an answer to their question. This time the Swami, gave them the needed answer, telling them to put down, in writing that he believe in, as authoritative the four Vedas, the four Upavedas, the six Angas, the six Upangas and the Manu Smriti. The Pundits asked on what authority the Swami believed these books to be authoritative. "I will answer this question at the time of the Shastrarth," replied the Swami, "if you Pundits desire to have its answer." Again the Pundits asked to be informed as to what particular verses in the Manu Smriti the Swami regarded as meaningless interpolations, and false. The answer of the Swami was the same as before.

The leaders of orthodoxy could not reasonably take exception to their opponent's reply, and consequently they set about making preparations for a "tussle." Monday, November 16, 1869, was fixed as the date of the Shastrarth, by mutual consent. Knowing how much depended upon the issue of the struggle, the Pundits resolved that the learning of the city should be completely represented on the occasion. The news of the discussion was received in the various parts of the city, and in the neighborhood of Benares, with mixed feelings, profoundly stirring whatever side arrayed, that a crisis was at hand.

The officials of the city, yielding to natural curiosity, sharpened by the intense prevailing excitement, suggested an alteration in the date fixed, but the Maharaja of Benares, for reasons of his own, expressed his inability to adopt their suggestion, and desired that the Shastrarth should come off on the day specified instead of on - Sunday.

The specified day came, and at the hour appointed Anandbag presented a spectacle superbly grand and imposing. Some affirm that no less than fifty thousand persons were present on the occasion, while others put the number at a considerably lower figure, asserting that the gathering did not exceed ten thousand souls. Whatever the actual number, there is reason to believe that it made up the biggest assembly of its kind ever witnessed in Benares.

Besides many other famous Pundits there were many of the richest and most influential local men, many Thakurs from the villages around, and several ministers of the Gospel (Bible) who formed part of the surging mass of humanity assembled. The police arrangements were satisfactory, the Kotwal with fifty of his men being in attendance, but in spite of all that they could do, a large number of the rowdies of the town, notorious characters, out and out, found their way to the very spot where they were least wanted, - the spot reserved for the controversialists and the pick of cream of the locality.

The well-wishers of the Swami, apprehending personal violence, made known their anxiety to him, adding that had the discussion taken place at Farrukhabad, there would have been not fear of a disturbance. At this the Swami burst out laughing, and replied. "It is always the firm conviction of genuine Yogis that the sun of truth is stronger than any forces which darkness can muster. He, who following the Will Divine, is above all partially and preaches the truth, what has he to fear? Men of truth hide not the truth through fear. They will risk their lives rather than be false to a Divine Commandment. I have nothing to be afraid of, for I live for the Ishwara (God) and the Dharma (duty). Let us wait and see what happens." After uttering these words the Swami desired a barber to summoned, and having got himself thoroughly shaved, he had a bath and spent some moments in contemplation and meditation, and then taking his meal repaired to the meeting.

The Maharaja of Kashi and his son soon followed. As soon as His Highness entered the assembly, the orthodox Pundits rose and give him their blessing, and disregarding all discipline, followed at his heels and surrounded the Swami, thus largely usurping the place which, in all fairness, belonged to the Swami's supporters. They further had an order issued by the Maharaja that no more men should be allowed to come near the Swami or the Pundits, which meant nothing less than the exclusion of the Swami's admirers from where they had every right to be present! Of this move the Swami was duly informed, and he, in his turn informed the Kotwal of what had been done.

That good official perceived the justice of the complaint, and at once conducted Pundit Jyoti Saroop and other sympathizers and followers of the Swami to him. The latter received them with every mark of respect, and desired them to take a seats near himself. Nothing could be more distasteful to the orthodox Pundits, who made a significant sign to the Maharaja, as much as to say that the addition to Dayanand's ranks was wholly undesirable, as Dayanand alone was more than a match for them all! The chief understood the sign, desired that the Pundits should take the front places, and the Jyoti Saroop should retire to a distant seat. Similar shameful treatment was meted out to the other supporters of the Swami, but it was no time to grumble, for a Shastrarth must be had at any cost, and so he kept quiet and let the Maharaja and his Pundits please themselves.

Before the Shastrarth began, Swami Dayanand asked the Maharaja of Benares if he had brought the Vedas with him. The reply was, that the Pundits present knew the Vedas by heart, and hence it had been deemed unnecessary that they or the Maharaja should come provided with the Books of question. Upon this the Swami observed that, in the absence of the Vedas, the import and drift of an authority could not be fully understood, as the passages preceding and following a quotation cited had often an important bearing on the quotation, and minimized the chances of its being twisted and distorted to suit a present purpose.

Presently after this remark from the Swami, the rule was laid down and proclaimed by the Kotwal, Pundit Raghu Nath Sahay,that only one Pundit Tara Charan Naiyayak came forward to open the discussion. On his admission that all who were faithful to the requirements of varna and ashrama believed in the Vedas as the final authority, the Swami desired him to cite, from the Scripture, a passage which enjoined the worship of Shaligram and other images, and to declare, if no such passage existed, the truth.

To this the Pundit making no satisfactory reply - indeed, he did little more than seek to evade the question, Swami Vishuddhanand cried out: "Vyas says in a Sutra that the Creator of the world is a conscious, intelligent Being and not inanimate; where is the authority for this in the Vedas?" The Swami answered that the question was wholly irrelevant, adding that nothing should be said by either party that hand not something to do with the subject under discussion.

Vishuddhanand, compelled to come to the point, rejoined that since the worship of Brahma was allowable in the mind in and the sun, there could be nothing objectionable in worshipping the Shaligram also. To this the Swami replied that, although such expressions as - mano Brahm iti upasit and aditya Brahm iti upasit, were to be met with in the Brahmans (which, in the opinion of the orthodox, were identical with the Vedas!), no such injunctions -pashan Brahmiti upasit, were to be found in these works, and under these circumstances, how could the worship of Shaligram be justifiable?

Swami Vishuddhanand made no answer to this, but another Pandit Madhvacharya came forward and, quoting a mantra asked what it dealt with. "With clouds, wells, tanks, etc." was the reply, and the Swami cited authorities from the Nirukta and Brahmans in support of his reply. On being thus answered the Pundit turned his attention to the word 'Purana', asking of the words was to be found in the Vedas. The Swami replied in the affirmative, adding that although the world occurred in many places in the Vedas, yet nowhere had it any reference to the Bhagvat or any other so-called Purana.

Many minutes were spent in discussing this point, Swami Vishuddhanand, Pandit Bal Shastri and others, speaking one after another, and Swami Dayanand replying to each all alone. Once while the Swami was quoting a passage from the Upanishads, the orthodox Pundits in a body shouted out that the passage was nowhere to be found in the Upanishads, upon which their opponents observed that if what the Pundits asserted should be found to be true, he would acknowledge that he was defeated.

The Pundits readily signed the agreement, but it was on their part of a huge blunder, as they found out a minute later. The Swami opened the Upanishads and showed them the passage, covering them with shame and convincing those present that their knowledge of the Shastras was far from being perfect. Finding themselves checkmated everywhere and displaying lamentable ignorance of the Shastric teaching (the great Swami Vishuddhanand could not tell so much as what dharma and adharma consisted in), and discovering further that their adversary could quote whole chapters of the Vedas and other works by heart, and could furnish lucid and comprehensive expositions of the same, the Pundits made haste to sound the Swami's knowledge of Vyakarna, and, upon their arrogating superiority in that branch of Science, the Swami asked "What is the Kalma Sangya (retained object?") Vushuddhanand remained silent, but Bal Sahstri essayed to make an answer, only to fall back crest-fallen. Baffled at every point exasperated beyond measure, the Pundits now hit upon a plan, which was nothing but a foul trick, to circumvent Swami Dayanand.

It was now 7 P.M. and rapidly growing dark. Madhvacharya, seein his opportunity, took out two leaves from a manuscript, and placing them before the Pundits said: "This is the Veda (Samhita), and here it is written that on the tenth day after the termination of yajna, the yajman should hear the Purana read. What the word 'Purana' means here?" Swami Dayanand desired him to read out the passage, but before he could do it, Vishuddhanand (in accordance, no doubt with a pre-concerted plan) took the leaves and handed them to the Swami.

The Swami desired him to read out the passage, but before he could do it, the famous man of Kashi excused himself from doing it, on the ground that had not his spectacles with him, and begged the Swami to take the duty upon himself. Suspecting no deceit, the Swami took up the leaves and silently began to go over them.

He had hardly been looking them two minutes, and was just going to reply, when Swami Vishuddhanand exclaiming that he was being unduly detained, the whole host of Pundits, with the Maharaja of Kashi at their head, stood up, and, clapping their hands, shouted out, at the top of their voice, that the dearly-earned victory might be celebrated in a becoming fashion, the notorious characters in attendance commenced raining down stones, old shoes and dung on the Swami. The life of the Swami was in jeopardy, but thanks to his own activity and the vigilance of the Police, the place was soon cleared of the goons.
Thus ended the Shastrarth at Kashi. Swami Dayanand did not leave the town at once. On the contrary, he stayed for three months longer, proclaiming the falseness of idolatry with the beat of drums, and preaching to all the true doctrine. Perhaps the Maharaja of Kashi and the Pundits were not prepared for this they sought vengeance in sending forth the flat that henceforth no true follower of orthodoxy should visit the Swami under pain of incurring the penalty that attends the omission of a great crime. Foul-play was also had recourse to.


Wednesday, November 14, 2018

केरल के हिन्दू सम्राट पष़श्शि राजा


11 नवम्बर – केरल के हिन्दू सम्राट पष़श्शि राजा के नेतृत्व में अंग्रेजो के खिलाफ आज ही हुई थी रक्तरंजित “कुण्डरा विद्रोह” की घोषणा, जिसमें बलिदान हुए थे अनगिनत योद्धा ।
विदित हो कि अन्याय और अत्याचारी यूरोपीय देशों की तरह ब्रिटिश ईस्ट न्डिया कंपनी भी व्यापार को लक्ष्य बनाते हुए पहुँची थी । कपनी ने सन् 1664 में कोष़िक्कोड में व्यापार केन्द्र की स्थापता की । सन् 1684 में उन्होंने तिरुवितांकूर का उस भाग, जो अंचुतेंगु नाम से जाना जाता था, को आट्टिन्गल रानी से ले लिया । सन् 1695 में वहाँ एक दुर्ग बनवाया । इसी समय उन्होंने तलश्शेरी में भी अपना सिक्का जमाया । एप्रिल 1723 में ब्रिटिश ईस्ट इन्डिया कंपनी और तिरुवितांकूर के बीच संधि हो गई । सन् 1792 में जो श्रीरंगपट्टणम संधि हुई उसके तहत टीपू का मलाबार ब्रिटिशों को प्राप्त हो गया । सन् 1791 में कंपनी ने कोच्चि के साथ भी संधि कर ली । इस के अनुसार ब्रिटिशों को वार्षिक कर देकर कोच्चि राजा ब्रिटिशों का सामंत बना ।
1800 से कोच्चि मद्रास की ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया । 1795 की संधि के अनुसार तिरुवितांकूर ने भी ब्रिटिश प्रभुता स्वीकार की । अतः एक ब्रिटिश रेसिडेन्ट तिरुवनन्तपुरम में रहते हुए शासन का निरीक्षण किया । ब्रिटिशों को प्रतिवर्ष आठ लाख रुपये तिरुवितांकूर कर रूप में देता था । 1805 में हुई संधि के अनुसार तिरुवितांकूर में यदि कोई गृह कलह या हंगामा होता हो तो उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार भी ब्रिटिशों को प्राप्त हो गया । इस प्रकार समूचा केरल ब्रिटिशों के अधिकार में आ गया । ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वदेश पर अभिमान करने वालों का विरोध उठना स्वाभाविक था । केरल वर्मा पष़श्शि राजा, वेलुत्तम्पि दलवा और पालियत्तच्छन ने ब्रिटिशों के विरुद्ध हथियार उठाया । यद्यपि उनका विद्रोह विफल हो गया था तथापि वह जनता में ब्रिटिशों के प्रति दुश्मनी एवं देश भक्ति जगाने में सहायक हुआ ।
ब्रिटिशों ने मलाबार में जो कर प्रणाली चलाई थी उसके विरोध में कोट्टयम राजवंश के पष़श्शि राजा ने सशस्त्र विद्रोह किया । ब्रिटिशों ने राजा – रजवाडों से कर वसूल किया । राजा तो सीधे जनता से कर वसूल करते थे । कोट्टयम में कर वसूली का अधिकार ब्रिटिशों ने पष़श्शि राजा को न देकर उसके मातुल कुरुम्ब्रा रियासत के शासक को दिया था । इस का विरोध करते हुए सन् 1795 में पष़श्शि राजा ने कर वसूली का सारा काम बन्द कर दिया । सन् 1793 – 1797, 1800 – 1805 वर्षों में वीर पष़श्शि राजा के सैनिकों की ब्रिटिश सैनिकों के साथ मुठभेड हुई । पष़श्शि राजा ने वयनाड के वनों में प्रवेश कर युद्ध करना शुरू किया । किन्तु 30 नवम्बर 1805 को ब्रिटिश तोपों ने उन्हें उडा दिया । ब्रिटिशों के विरुद्ध उन्होंने प्रतिरक्षा की जो दीवार खडी की थी, वह टूट गई ।
तिरुवितांकूर के गृह कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप करके रेसिडेन्ट मेकाले वेलुत्तम्पि दलवा के विरोध का पात्र बना । यह विरोध खुली लडाई में परिणत हुआ । वेलुत्तम्बि ने कोच्चि के प्रधानमंत्री पालियत्तच्छन के साथ ब्रिटिश सेना पर आक्रमण किया । वेलुत्तम्पि ने 11 नवंबर 1809 को ब्रिटिश आधिपत्य के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए लोगों का आह्वान करते हुए एक घोषणा निकाली जो ‘कुण्डरा घोषणा’ नाम से जानी जाती है । तो भी ब्रिटिश सेना ने तिरुवितांकूर सेना के शक्ति दुर्गों को एक-एक करके अधीन कर लिया । अपने को पराजित होते देख वेलुत्तम्पि ने आत्महत्या कर ली ।यद्यपि सन् 1812 में वयनाडु के कुरिच्यर और कुरुम्पर नामक आदिवासी वर्गों ने ब्रिटिशों के विरुद्ध हथियार उठाए तथापि विद्रोह को दबाया गया .. आज उन सभी ज्ञात और अज्ञात वीर बलिदानियों को इस शौर्य दिवस के दिन बारम्बार नमन और वन्दन है।

Tuesday, November 13, 2018

श्रीगुरु नानकदेव का अवतरण



श्रीगुरु नानकदेव का अवतरण


मुस्लिम आक्रान्ताओं ने अपनी एक विशिष्ट प्रकृति के साथ शताब्दियों पूर्व भारतवर्ष में पदार्पण किया था। उनकी विशिष्ट प्रकृति का नाम है : इस्लाम और उसकी शरीअत। भारत के दुर्भाग्य ने रज-तमगुणी प्रकृति से ओत-प्रोत मुस्लिम आक्रान्ताओं को शासक बनने का अवसर दिला दिया। उन्होंने अपने शासन- काल में बृहद् हिन्दू समाज को विविध रूप से अत्यन्त पीड़ित किया। उनके विरुद्ध भारतीय शूरवीरों ने अनेक शताब्दियों तक निरन्तर संघर्षरत रहकर अपने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया, किन्तु दुर्भाग्यवश भारत राष्ट्र को उक्त पीड़ा से मुक्ति न मिल पाई।
आततायी विधर्मी सत्ता द्वारा आए दिन दी जा रही कष्टकारी विपदाओं को झेलते-झेलते सामान्य हिन्दू अपना मनोबल क्षीण होता अनुभव कर रहा था। ऐसी संकटमयी वेला में दयालु परमेश्वर की प्रेरणा से भारत के विभिन्न प्रदेशों में अनेक महान् विभूतियों का अवतरण हुआ। उन महानात्माओं ने अपनी तपस्या द्वारा अर्जित विवेक के बल पर हिन्दू समाज को प्राण-वान् बनाया। उनसे प्रेरणा पाकर वह आततायी सत्ता के विरुद्ध कटिबद्ध हो उठा।
बृहत्तर पंजाब में अवतरित होने वाली महान् विभूति १५२६ विक्रमी की कार्त्तिक पूर्णिमा के शुभ दिन श्री नानकदेव जी के रूप में अवतरित हुई।
इतिहासकार ज्ञानी ज्ञान सिंह (१८७९-१९७८ वि•) अपनी प्रसिद्ध रचना तवारीख़ गुरू ख़ालसा (भाग-१, गुरु गोविन्द सिंह प्रेस, बेर बाबा नानक, सियालकोट, १९४८ विक्रमी) के पृष्ठ ४५ पर मुसलमान आक्रान्ता और शासकों के अत्याचारों का विश्लेषण करते हुए श्रीगुरु नानकदेव के अवतरण का कारण इस प्रकार दर्शाते हैं :
"वस्तुतः तो उस समय (श्रीगुरु जी के अवतरण से पूर्ववर्ती समय) में सारे भारतवर्ष को तुर्कों=मुसलमानों के ज़ुल्मों ने तड़पा रक्खा था। किसी हिन्दू के घर सुन्दर लड़का-लड़की, ६ महीना का अन्न, ज़र-ज़ेवर, अच्छी गाय-भैंस, बैल-घोड़ा नहीं रहने देते थे, मुसलमान धक्के के साथ छीन लेते थे, हिन्दुओं की कोई फ़रियाद नहीं सुनता था। इन्साफ़ का काम क़ाज़ियों के हाथ में था। क़ाज़ी यही चाहते थे कि सब प्रकार से तंग होकर हिन्दू हमारा दीन मान लें।
उस समय सचमुच ऐसा ही हाल गुज़रता था जैसा कि गुरु महाराज का वचन है :
कलि काती राजे कासाई, धरमु पंख करि उडरिआ।
कूड़ु अमावस सचु चंद्रमा, दीसै नाही कह चड़िआ।।
(- श्री आदिग्रन्थ, माझ की वार,
सलोक महला १, पृष्ठ १४५)
[ यह कलियुग=तमोगुणी-युग एक तीखी छुरी है और बादशाह क़साई हैं जिनके अत्याचार से धर्म पंख लगा कर उड़ गया है। अब अमावस की अन्धेरी रात की भांति झूठ सर्वत्र फैल गया है और सत्य का शुक्ल पक्षीय चन्द्रमा कहीं चढ़ता दिखाई नहीं देता ]।
यद्यपि उस समय सारी हिन्दुवाइन मुसलमानों के ज़ोर-ज़ुल्म की सड़ती-जलती भट्ठी में पड़ी भुन रही थी, तब भी भक्तों-सन्तों को तुर्कों ने जब सन्ताप दिया को ख़ालिक़=सृष्टिकर्ता का सिंहासन डोल उठा। परमेश्वर अपनी निरादरी और प्रजा की पीड़ा सह सकता है परन्तु अपने भक्तों और सन्तों का सन्ताप नहीं सह सकता। उसी वक़्त भक्तों-सन्तों की रक्षा के वास्ते और वैदिक धर्म-मर्यादा की पालना हेतु सर्व-शक्तिवान् भगवान् की प्रेरणा से गुरु नानक साहिब प्रकट हुए।"
इस प्रकार मुस्लिम शासकों के दुराचार से व्याप्त प्रतिकूल परिस्थितियों में गुरु नानकदेव ने भारतवर्ष के सस्य श्यामला प्रदेश तत्कालीन बृहत्तर पंजाब में १५२६ विक्रमी की कार्त्तिक पूर्णिमा के शुभ दिन जन्म लिया।
ऐसी महान् विभूति के अवतरण-दिवस पर सभी सच्चे राष्ट्रभक्तों को हार्दिक शुभ कामनाएं ! ०
चित्र परिचय :
तपस्या करते हुए गुरु नानकदेव
स्रोत : बी-४० जनमसाखी (१७९० विक्रमी)

हिन्दू वीर कान्हा रावत का अमर बलिदान



हिन्दू वीर कान्हा रावत का अमर बलिदान

सुरेंद्र चौहान, पलवल

मुगल सम्राट औरंगजेब के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाने वाले वीर कान्हा रावत का नाम आज भी इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज है। 1682 ईसवी में शहीद हुए दादा कान्हा रावत का नाम आज भी लोग गर्व से लेते हैं और युवा उनके जीवन चरित्र से राष्ट्र रक्षा की प्रेरणा लेते हैं।

उनके पैतृक गांव बहीन में स्थित कान्हा गोशाला में उनके शहीद दिवस पर हर साल मेला लगता है। मेले में लोगों को धर्म, संस्कृति और राष्ट्र रक्षा के अलावा सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूक किया जाता है। इस बार यह मेला 21 व 22 मार्च को लगेगा।

कान्हा रावत का जन्म 1640 ईसवी में गांव बहीन में बीरबल व लीला देवी के घर हुआ था। कान्हा के छोटे भाई का नाम दलशाह था। कान्हा रावत का विवाह अलवर रियासत के गांव छीका निवासी कपूरी देवी था। उनके दो पुत्र हुए थे। छोटे पुत्र रघुनाथ के जन्म के बाद कपूरी देवी का निधन हो गया। फिर उनका विवाह हथीन के ही घर्रोंट निवासी उदय ¨सह बड़गुर्जर की पुत्री तारावती से हुआ।

मुगल सम्राट औरंगजेब ने 1679 में ¨हदुओं पर जजिया कर लगा दिया और लोगों को जबरन ¨हिन्दू से मुसलमान बनाया जाने लगा। बहुत से लोगों ने औरंगजेब के प्रताड़ना से तंग आकर इस्लाम स्वीकार भी कर लिया। उस समय कान्हा रावत के नेतृत्व में रावत पाल के पांच गांवों के लोगों ने महापंचायत की और जजिया कर के विरोध करने का निर्णय लिया। औरंगजेब को जब इस बात का पता चला तो उसने अब्दुल नबी को बहीन पर आक्रमण करने के लिए भेजा।

अब्दुल नबी ने फिरोजपुर झिरका में अपना पड़ाव डाला और अपने जासूसों द्वारा बहीन के बारे में जानकारी हासिल की। 1682 में फाल्गुण माह में बहीन पर आक्रमण कर दिया। रावत पाल के नौजवानों ने कान्हा रावत के नेतृत्व में अब्दुल नबी की टुकड़ी से जमकर लोहा लिया और उनकी जीत लगभग होने ही वाली थी, तभी फिरोजपुर झिरका से एक और शाही टुकड़ी वहां पहुंच गई। इस लड़ाई में रावतों के करीब दो हजार नौजवान शहीद हो गए और दादा कान्हा को गिरफ्तार कर लिया गया था।

दादा कान्हा को दिल्ली में अजमेरी गेट के पास कैद करके रखा गया और उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी गई। समाचार सुनकर उनका छोटा भाई दलशाह दिल्ली गया, उसने देखा की कान्हा को आधा मिट्टी में गाड़ा हुआ था और कोड़ों से मारा जा रहा था। दादा कान्हा का शरीर लहूलुहान हो चुका था, पर उन्होंने औरंगजेब के सामने झुकने से इंकार कर दिया। दादा कान्हा ने दलशाह से वापस लौट जाने के लिए कहा और कहा कि उनकी आत्मा को तभी शांति मिलेगी, जब रावत अब्दुल नबी को मौत के घाट उतार देंगे।

दलशाह ने वापस लौटकर नौजवानों को दादा कान्हा का संदेश सुनाया, जिस पर नौजवानों ने अब्दुल नबी को पलवल के पास घेर लिया और मौत के घाट उतार दिया। अब्दुल नबी की मौत की खबर सुनकर औरंगजेब ने 1682 ईसवी में चैत्र की अमावस्या को दादा कान्हा को ¨जदा जमीन में गड़वा दिया



Monday, November 12, 2018

वेदों में वर्णित सूर्य एवं छठ पर्व



वेदों में वर्णित सूर्य एवं छठ पर्व

डॉ विवेक आर्य

आज छठ पर्व है। सूर्योपासना का यह पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है। सूर्यषष्ठी व्रत होने के कारण इसे 'छठ' कहा जाता है। सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल देने वाले इस पर्व को पुरुष और महिला समान रूप से मनाते हैं, लेकिन आमतौर पर व्रत करने वालों में महिलाओं की संख्या अधिक होती है। कुछ वर्ष पूर्व तक मुख्य रूप से यह पर्व बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में मनाया जाता था, लेकिन अब यह पर्व पूरे देश में मनाया जाता है।

                   वेदों में सूर्य की उपासना और महत्व के अनेक मन्त्र आये हैं। आज मानव केवल भौतिक सूर्य की उपासना कर रहा हैं। जबकि वेदों में सूर्य केवल भौतिक सूर्य के लिए ही प्रयुक्त नहीं हुआ। वेदों में सूर्य ईश्वर, राजा, ज्ञानी विद्वान, परिव्राजक सन्यासी, नवविवाहिता वधु आदि के लिए प्रयुक्त हुआ हैं। इसलिए छठ पर्व को केवल भौतिक सूर्य तक न सीमित करे।  वृहद् अर्थों में सूर्य को समझने में सभी का कल्याण हैं। आईये वेद वर्णित सूर्य के कुछ उदहारण अपने ज्ञानवर्धन हेतु पढ़े।

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ।दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥३॥ ऋग्वेद मण्डल १०/सूक्तं १०.१९०

इस मंत्र में सूर्य भौतिक सूर्य के लिए प्रयुक्त हुआ है।

अर्थ-परमेश्वर ने पूर्व कल्प में सूर्य, चन्द्र, विद्युत्, पृथिवी, अन्तरिक्ष आदि बनाये। वैसे ही अब बनाये है और आगे भी वैसे ही बनावेगा। इसलिये परमेश्वर के काम विना भूल चूक के होने से सदा एक से ही हुआ करते हैं। जो अल्पज्ञ और जिस का ज्ञान वृद्धि क्षय को प्राप्त होता है उसी के काम में भूल चूक होती है; ईश्वर के काम में नहीं।


विश्व राष्ट्र निर्माण हो जाने पर विद्या के प्रकाश बिना वह नष्ट हो जायेगा। इसलिए वेदों में लिखा है कि सूर्य के समान ऐसी विद्या सब पढ़े जो सत्यपरायणता लावे।

 यदद्य सूर्य ब्रवोऽनागा उद्यन्मित्राय वरुणाय सत्यम्।
वयं देवत्रादिते स्याम तव प्रियासो अर्यमन्गृणन्तः ॥१॥ ऋग्वेद मण्डल ७/सूक्तं ७.६०

 हे मनुष्यों आप सूर्य के समान वर्तमान अविनाशी और न्यायकारी जगदीश्वर की प्रार्थना करो।  जैसे ईश्वर ने मित्र और श्रेष्ठजन (वरुण) के लिए यथार्थ ज्ञान का उपदेश दिया है , वैसा ही उपदेश आपको करे।

एष स्य मित्रावरुणा नृचक्षा उभे उदेति सूर्यो अभि ज्मन् ।
विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च गोपा ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन् ॥२॥ऋग्वेद मण्डल ७/सूक्तं ७.६०

अर्थात वह सूर्य रूपी ईश्वर/विद्वान/ज्ञानी ऋजुमार्ग अर्थात सरल सच्चा मार्ग और वृजिन मार्ग अर्थात पापमार्ग क्या है यह बताने वाला हैं।

इमे चेतारो अनृतस्य भूरेर्मित्रो अर्यमा वरुणो हि सन्ति ।
इम ऋतस्य वावृधुर्दुरोणे शग्मासः पुत्रा अदितेरदब्धाः ॥५॥ ऋग्वेद मण्डल ७/सूक्तं ७.६०

विद्या के अधिष्ठता की कृपा से अनृत क्या है और ऋत की वृद्धि कैसे हो।  यह जानने वाले अदिति के पुत्र सर्वत्र सत्य का प्रकाश करे।

इमे दिवो अनिमिषा पृथिव्याश्चिकित्वांसो अचेतसं नयन्ति ।
प्रव्राजे चिन्नद्यो गाधमस्ति पारं नो अस्य विष्पितस्य पर्षन् ॥७॥ ऋग्वेद मण्डल ७/सूक्तं ७.६०

अर्थात जो विद्वान जानते है वे अचेतस को अर्थात अनजानों को ठीक मार्ग पर चलाते हैं। अपने कर्तव्यपालन में कभी झपकी नहीं लेते। राष्ट्र को गहरे अन्धकार में नहीं जाने देते।


उत्सूर्यो बृहदर्चींष्यश्रेत्पुरु विश्वा जनिम मानुषाणाम् ।
समो दिवा ददृशे रोचमानः क्रत्वा कृतः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् ॥१॥ ऋग्वेद मण्डल ७ सूक्तं ७.६२

अर्थात- वह सूर्य अर्थात विद्वान सत्य का प्रचार करे। विद्वान ज्ञान को इतना आकर्षक बनाकर प्रचार करे कि सब उसकी ओर खींचे चले आवें। धन्य है उन गुरुओं को जिन्होंने ऐसा विद्वान (सूर्य) बनाया।

स सूर्य प्रति पुरो न उद्गा एभि स्तोमेभिरेतशेभिरेवैः ।
प्र नो मित्राय वरुणाय वोचोऽनागसो अर्यम्णे अग्नये च ॥२॥ ऋग्वेद मण्डल ७ सूक्तं ७.६२

अर्थात यह विद्वान रूपी सूर्य सूर्य के सामने खड़ा होकर उससे आगे निकल जाता है क्यूंकि वह सूर्य बोलता नहीं है, किन्तु यह सूर्य तो सबको अर्थात मित्र,वरुण, अर्यमा और अग्नि उपदेश देता हैं। 

 नू मित्रो वरुणो अर्यमा नस्त्मने तोकाय वरिवो दधन्तु ।
सुगा नो विश्वा सुपथानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥६॥ ऋग्वेद मण्डल ७ सूक्तं ७.६२

ज्ञान प्रचारक सूर्य तथा मित्र, वरुण आदि की कृपा से हमारे सब मार्ग सुपथ सुगम हो जावें।


साधारणः सूर्यो मानुषाणाम् ॥१॥ऋग्वेद - मण्डल ७ सूक्तं ७.६३
अर्थात यह सूर्य मनुष्य का सूर्य है।

उद्वेति प्रसवीता जनानां महान्केतुरर्णवः सूर्यस्य ।
समानं चक्रं पर्याविवृत्सन्यदेतशो वहति धूर्षु युक्तः ॥२॥ऋग्वेद - मण्डल ७ सूक्तं ७.६३

अर्थात इस सूर्य का विशाल झंडा जन जन को उसके कर्त्तव्य का आदेश करता है।

 नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता अयन्नर्थानि कृणवन्नपांसि ॥४॥ ऋग्वेद - मण्डल ७ सूक्तं ७.६३

अर्थात देव सविता ने जो नियम बनाये हैं उन्हें सूर्य घर-घर तक पहुँचाता है।

अधि श्रिये दुहिता सूर्यस्य रथं तस्थौ पुरुभुजा शतोतिम् ।
प्र मायाभिर्मायिना भूतमत्र नरा नृतू जनिमन्यज्ञियानाम् ॥५॥ ऋग्वेद मण्डल ६ सूक्तं ६.६३

अर्थात वे हर सूर्या अर्थात पतिलोक को जाने वाली नवविवाहिता कन्या को पुष्टि पहुँचाकर बड़े प्रसन्न होते हैं तथा सैकड़ों उपाय से उसकी सहायता करते हैं।

इस प्रकार से वेदों में सूर्य को भौतिक सूर्य, विद्वान, ज्ञानी, उपदेशक आदि अनेक नामों से सम्बोधित किया गया हैं। छठ पर्व पर सभी की स्तुति करे। केवल भौतिक सूर्य की स्तुति वेदों की शिक्षा को पूर्ण रूप से पालन नहीं करना हैं। 

Sunday, November 11, 2018

तीर्थ



तीर्थ

✍🏻 लेखक - स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी

🤔 प्रश्न-तीर्थस्नान से पाप का नाश और पुण्य की उत्पत्ति अथवा आत्मा की शुद्धि होती है वा नहीं?

🌹 उत्तर-पाप का नाश पुण्य की उत्पत्ति और आत्मा की शुद्धि का विचार तो पीछे करेंगे, प्रथम तीर्थ क्या है यही सोचना चाहिए।

🤔 प्रश्न-गंगादि जो अनेक पवित्र स्थान हैं वही तीर्थ हैं, इसको तो सब
लोग जानते हैं। इसमें सोचने की कौन सी गुह्य बात है?

🌹 उत्तर-इतना तो ठीक है, साधारण लोग गङ्गादि स्थानों को तीर्थ कहते हैं, किन्तु सोचने की बात यह है, कि ये स्थान वास्तव में तीर्थ हैं वा नहीं? और धर्म-पुस्तकों में इनको तीर्थ लिखा भी है वो नहीं ?

🤔 प्रश्न-क्या लोग बिना लिखे ही कहते हैं ? पुराणों में, महाभारत में तीर्थों का वर्णन है। वेद में तीर्थ शब्द आता है, अतः यह निर्विवाद विषय है। इस पर सोचने की आवश्यकता नहीं है। हाँ पाप-नाश और पुण्य उत्पत्ति की बात कहो।

🌹 उत्तर-वह भी कहेंगे, किन्तु प्रथम तो तीर्थ ही चिन्तनीय है, क्योंकि तीर्थ शब्द के अर्थ हैं, जिसके द्वारा लोग तर जाएं। क्या गंगादि स्नान से वा गंगा से ही लोग तर जाते हैं ? देखा तो यह जाता है, यदि किसी को तैरना न आता हो, वह किसी समय गंगा के गहरे जल में पड़ जाए तो डूब जाता है। और गंगास्नान से भी पाप का नाश और पुण्य की उत्पत्ति प्रतीत नहीं होती। इसलिए न तो यह तीर्थ है और न ही गंगा आदि स्नान से पाप का नाश और पुण्य की उत्पत्ति होती है। इसी कारण मनुस्मृति में मनु जी ने साफ लिखा है।

🔥 अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ।
-मनु ५।१०९

जल के स्नान से शरीर शुद्ध होता है, मन सत्य बोलने, सत्य व्यवहार से शुद्ध होता है, विद्या और तप से आत्मा शुद्ध होता है बुद्धि यथार्थ ज्ञान से शुद्ध होती है।

मनु जी ने इस श्लोक में स्नान से शरीर के बाह्य अवयवों की शुद्धि लिखी है, आत्मा की शुद्धि के कारण विद्या और तप ही बताये हैं। आप गंगादि स्नान से आत्मा की शुद्धि कहते हैं, सो बात ठीक नहीं है। जो मनुस्मृति में लिखा है, वही युक्तियुक्त और ठीक है।

आपने कहा था कि महाभारत में तीर्थ का वर्णन है सो महाभारत में ऐसा लेख है, जब महाभारत युद्ध समाप्त हो गया, भीष्मपितामह जी शरशय्या पर विराजमान थे। उस समय श्री कृष्ण जी की सम्मति से पाण्डव उनकी सेवा में गये, वहाँ जाकर युधिष्ठिर जी ने भीष्मपितामह जी से अनेक विषयों के प्रश्न पूछे थे, उन प्रश्नों के भीष्मपितामह जी ने जो उत्तर दिये थे, वह महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखे हुए हैं। वहाँ तीर्थ विषयक भी एक प्रश्न का उस समय भीष्म जी ने जो उत्तर दिया था, उसमें से कुछ श्लोक यहाँ लिखते हैं, जिससे महाभारत में तीर्थ विषयक सिद्धान्त का पता लग जाएगा।

युधिष्ठिर उवाच

🔥 यद्वरं सर्वतीर्थानां तन्मे ब्रूहि पितामह।
यत्र चैव परं शौचं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥१॥

युधिष्ठिर जी ने कहा-हे पितामह सब तीर्थों में जो श्रेष्ठ है और जो उत्तम शौच, अर्थात् पवित्रता होती है, वह आप मुझे बतलायें।

भीष्म उवाच-

🔥 सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणाम्।
यत्तु तीर्थं च शौचं च तन्मे शृणु समाहितः ॥ २ ॥

सब तीर्थ मनीषियों के लिए गुणवान् हैं, उनमें जो पवित्र तीर्थ है। वह समाहित होकर सुन।

🔥 अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिहदे।
स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्यमाश्रित्य शाश्वतम् ॥ ३॥

🔥 तीर्थं शौचमनर्थित्वमार्जवं सत्त्वमार्दवम्।
अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दमः शमः ॥ ४॥

🔥 निर्ममा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहा।
शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुञ्जते ॥ ५ ॥

गम्भीर, दोषरहित, पवित्र सत्यरूपी जल और धैर्य रूपी तालाब युक्त मानस तीर्थ में शाश्वत सत्य का अवलम्बन करके स्नान करना चाहिए। (अनर्थत्वं) किसी को अर्थी न होना, (आर्जवं) सरलता, (मार्दवं) नरमचित्त, सब जीवों की अहिंसा, अनृशंसता और शम (मन को वश में रखना) दम (इन्द्रिय दमन करना) ही पवित्र तीर्थ हैं।

जो लोग ममतारहित, निरहंकारी, अर्थात् अहंकार शून्य, सुख, दु:ख, शीत, आतप आदि द्वन्द्व सहन करनेवाले और निष्परिग्रह, अर्थात् संग्रह रहित, दानादि के लालच से रहित हैं और जो लोग भिक्षा धन से जीवन व्यतीत करनेवाले संन्यासी हैं, वे ही पवित्र तीर्थरूप हैं।

इस प्रकरण में भीष्म जी ने आपके कहे गंगादि स्नान को कहीं तीर्थ नहीं बताया है। उसके विपरीत सत्य, धैर्घ्य, निर्लोभतो, सरलता, नम्र चित्त, अहिंसा, दया, शम, दम, ममतारहित, अहंकार वर्जित, द्वन्द्वों के सहन करनेवाले तपस्वी और भिक्षा से निर्वाह करनेवालों को ही तीर्थ बताया है। इससे सिद्ध है कि वास्तव में यही सच्चे तीर्थ हैं। जो मनुष्य को पवित्र करनेवाले हैं, यही वे तीर्थ हैं, जिनके सेवन से मनुष्य संसार-सागर से तर जाता है, गंगादि तीर्थ तो स्वार्थी लोगों ने साधारण प्रजा को ठगने के लिए बना लिये हैं और ये गंगादि तीर्थ तारनेवाले तो किसी अवस्था में भी नहीं होते हैं।

उसी प्रकरण में स्नान के विषय में भी भीष्म जी ने कहा है।
यथा-

🔥 नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते।
स स्नातो यो दमस्नातः स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

🔥 मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च।
स्नाति यो मानसे तीर्थे तत्स्नानं तत्त्वदर्शिनाम्॥
(महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय १०८)

जल से स्नान करनेवाले मनुष्य को स्नान (स्नान किया हुआ) नहीं कहते हैं। जो लोग दमस्नात हैं उन्हीं ने स्नान किया है और वे ही बाहर तथा भीतर पवित्र होते हैं।

ज्ञान से निर्मल किये हुए मन और ब्रह्म ज्ञान के जल के सहारे जो लोग मानस तीर्थ में स्नान करते हैं, उनका नहाना ही स्नान है। तत्त्वदर्शियों को ऐसा ही स्नान अभिमत है।

यहाँ भीष्मपितामह जी ने जल स्नान से आत्मशुद्धि का सर्वथा ही निषेध किया है, अतः जलादि के स्नान से मनु जी के लिखे अनुसार केवल शरीर की शुद्धि होती है। आत्मशुद्धि के लिए जल स्नान का कोई प्रयोजन नहीं है।

🤔 प्रश्न-यदि महाभारत में इस प्रकार निषेध है तो लोग गंगादि तीर्थों में स्नान करने क्यों आते हैं ? और पण्डे तीर्थों पर रहते हैं और वे बाहर जाकर तीर्थों का प्रचार भी करते हैं। क्या वे महाभारत नहीं पढ़े हैं?

🌹 उत्तर-महाभारत तो वे पढ़े हैं, परन्तु उन्हें तीर्थ स्नान करनेवालों को तीर्थ का माहात्म्य बताकर बहकाना है और उनका धनहरण करके अपनी जीविका चलानी है। और इसलिए वे तो स्वार्थी हैं, उनका कथन प्रमाण नहीं है।

🤔 प्रश्न-किसी आचार्य्य ने तीर्थ विषयक कुछ लिखा है ?


🌹 उत्तर-हाँ लिखा है।

🤔 प्रश्न-वह बतलाओ, क्या लिखा है?

🌹 उत्तर-महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में तीर्थ विषयक निम्न पाठ लिखा है-और ये तीर्थ (प्रथम भारतवर्ष में) नहीं थे, जब जैनियों ने गिरनार, पालिटाना शिखर शत्रुञ्जय और आबू आदि तीर्थ बनाये। उनके अनुकूल इन लोगों ने भी बना लिये। जो कोई इनके आरम्भ की परीक्षा करना चाहे, वे पण्डों की पुरानी से पुरानी बही और तांबे के पत्र आदि लेख देखें तो निश्चय हो जाएगा कि ये सब तीर्थ पांच सौ अथवा एक सहस्र वर्ष से इधर ही बने हैं, सहस्र वर्ष से उधर का लेख किसी के पास नहीं निकलता, इससे आधुनिक हैं।

🤔 प्रश्न-जो जो तीर्थ का माहात्म्य, अर्थात् 🔥 'अन्यक्षेत्रे कृतं पापं काशीक्षेत्रे विनश्यति।' इत्यादि बातें हैं, वे सच्ची हैं वो नहीं ?

🌹 उत्तर-नहीं, क्योंकि यदि पाप छूट जाते हों तो दरिद्रों को धन, राजपाट, अन्धों को आँखें मिल जातीं, कोढ़ियों का कोढ़ आदि रोग छूट जाता, ऐसा नहीं होता, इसलिए पाप वा पुण्य किसी का नहीं छूटता।।

🤔 प्रश्न-🔥 गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥ जो सैकड़ों सहस्रों कोस दूर से भी गंगा-गंगा कहे तो उसके पाप नष्ट हो कर वह विष्णु लोक, अर्थात् वैकुण्ठ को जाता है। क्या झूठ हो
जाएगा?

🌹 उत्तर-मिथ्या होने में क्या शङ्का?, क्योंकि गङ्गा.......नाम स्मरण से पाप कभी नहीं छूटता, जो छूटे तो दु:खी कोई न रहे और पाप करने से कोई भी न डरे। वैसे आजकल पोपलीला में पाप बढ़कर हो रहे हैं। मूढ़ों को विश्वास है कि हम.......तीर्थयात्रा करेंगे तो पापों को निवृत्ति हो जाएगी। इसी विश्वास पर पाप करके इस लोक और परलोक का नाश करते हैं, परन्तु किया हुआ पाप भोगना ही पड़ता है।


🤔 प्रश्न-तो कोई तीर्थ.......सत्य है वा नहीं?

🌹 उत्तर-है, वेदादि सत्यशास्त्रों का पढ़ना, पढ़ाना, धार्मिक विद्वानों का संग, परोपकार, धर्मानुष्ठान, योगाभ्यास, निर्वैर, निष्कपट, सत्यभाषण, सत्य का मानना, सत्य करना, ब्रह्मचर्य्य, आचार्थ्य, अतिथि, मातापिता की सेवा करना, परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना, शान्ति, जितेन्द्रियता, सुशीलता, धर्मयुक्त, पुरुषार्थ, ज्ञान, विज्ञान आदि शुभ गुण, कर्म दुःखों से तारनेवाले होने से तीर्थ हैं। और जो जलस्थलमय हैं। वे तीर्थ कभी नहीं हो सकते, क्योंकि 🔥 ‘जना यैस्तरन्ति तानि तीर्थानि' मनुष्य जिसे करके दुःखों से तरें उनका नाम तीर्थ है। जलस्थल तरानेवाले नहीं, किन्तु डुबोकर मारनेवाले हैं।

🌺 पूर्वपक्षी-महर्षि दयानन्द जी का लेख सुनकर तो अब पूरा-पूरा निश्चय हो गया कि गङ्गादि तीर्थ केवल पोपों के बनाये हुए हैं। आगे को मैं भी जैसा महर्षि ने उपदेश किया है, वैसा करने का यत्न करूंगा।

(‘‘वेदपथ'' से साभार)

✍🏻 लेखक - स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी


प्रस्तुति - 📚 अवत्सार