Thursday, May 17, 2018

महाभारत का एक प्रसंग : तब तेरा धर्म कहाँ था?



महाभारत का एक प्रसंग : तब तेरा धर्म कहाँ था?
महाभारत के युद्ध के 17वें दिन जब वीरवर अर्जुन और महावीर कर्ण के बीच भीषण संग्राम हो रहा था, तब लड़ते-लड़ते कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धँस गया। कर्ण रथ से उतरकर पहिये को निकालने लगा। तब अर्जुन ने मौका अच्छा जानकर बाण तान लिया और छोड़ने ही वाला था कि मौत सामने देखकर कर्ण चिल्लाया- ‘क्या कर रहे हो, अर्जुन? यह धर्म युद्ध नहीं है, मैं निहत्था हूँ!’
यह सुनकर अर्जुन ठिठक गया, लेकिन जबाब दिया भगवान कृष्ण ने-
‘अच्छा तो, महाशय, अब तुझे धर्म की याद आ रही है! तू क्या जानता है धर्म क्या होता है?
तब तेरा धर्म कहाँ था, जब तुमने दुर्योधन के साथ मिलकर वारणावत में पांडवों को जीवित ही जलाकर मारने की कोशिश की थी?
तब तेरा धर्म कहाँ गया था, जब तुमने शकुनि के साथ मिलकर द्यूतक्रीड़ा के बहाने पांडवों का सर्वस्व हरण कर लिया था?
तब तेरा धर्म कहाँ चला गया था, जब तुमने महारानी द्रोपदी को भरी सभा में नंगा करने की सलाह दी थी?
तब तेरा धर्म कहाँ उड़ गया था, जब तुम सात मुस्टंडों ने एक निहत्थे बालक को घेरकर मार डाला था?’
भगवान कृष्ण एक-एक करके कर्ण की करतूतें गिना रहे थे और बार-बार पूछते थे- ‘कु ते धर्मस्तदा गतः?’ बता तब तेरा धर्म कहाँ चला गया था?
कर्ण के पास कोई उत्तर नहीं था। भगवान ने फिर उसे फटकारा- ‘तू नीच, तू हमें क्या धर्म सिखाएगा? हमें अच्छी तरह मालूम है कि हमारा धर्म क्या है!’
तब भगवान ने अर्जुन से कहा- ‘अर्जुन, तुम इस दुष्ट की बातों में मत आओ। आजीवन पाप करने वाला और पापियों का साथ देने वाला यह आदमी धर्म की बात करने का अधिकारी नहीं है। इसे धर्म का नाम तक लेने का अधिकार नहीं है। तुम अभी इसका सिर काट दो, ताकि इसे पता चल जाये कि सच्चा धर्म क्या होता है।’
तब अर्जुन ने कर्ण को धर्म का जो सबक सिखाया, वह सबको मालूम है।
जब हम आज कश्मीर की परिस्थिति में इस प्रसंग पर विचार करते हैं, तो समानता स्पष्ट हो जाती है।
आतंकवादियों को प्रोत्साहन देने वाले अलगाववादी संगठन से लेकर कश्मीर की मुख्य-मंत्री रमजान के अवसर पर एकतरफा वीराम करने का पक्ष ले रहे हैं। ये लोग क्यों भूल जाते है कि यही वो आतंकवादी हैं जो कश्मीर में चंद वर्षों पहले आये भूकंप के बाद भी नहीं रुके , कश्मीर में आई बाढ़ में भारतीय सेना के हेलीकाप्टर पर पत्थर फेंकने से पीछे नहीं हटे, अमरनाथ यात्रा पर हमला करते से पीछे नहीं हटे, जम्मू के मंदिरों पर हमला करने से पीछे नहीं हटे, चेन्नई से घूमने आये बेकसूर पर्यटक को मारकर भी नहीं रुके, स्कूल के बस में घर जा रहे बच्चों पर पत्थर फेंकने से नहीं रुके। जिनमें नैतिकता नाम की कोई चीज नहीं है। वे आज नैतिकता और लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं। मोदी जी और भारतीय सेना को इनकी चिंता नहीं करनी चाहिए और देश के हित में जो आवश्यक हो वही करना चाहिए।
इन आतकंवादियों और अलगाववादियों को एक ही बात कहनी चाहिए।
तब तेरा धर्म कहाँ था?

Tuesday, May 15, 2018

सृष्टि उत्पत्ति विषयक वैदिक सिद्धान्त और महर्षि दयानन्द



सृष्टि उत्पत्ति विषयक वैदिक सिद्धान्त और महर्षि दयानन्द

सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में महाभारत काल के बाद उत्पन्न मत-मतान्तरों के साहित्य में अनेक प्रकार की अवैज्ञानिक व अविश्वनीय विचार पायें जाते हैं। महर्षि दयानन्द इन सबमें अपवाद हैं। उनके जीवन में शिवरात्रि को घटी चूहे की घटना बताती है कि उन्होनें किशोरावस्था में ही जीवन की सभी बातों को तर्क व युक्ति के आधार पर सिद्ध होने पर ही स्वीकार करने का मन बना लिया था। यही कारण था कि वइ ईश्वर, जीव, प्रकृति व सृष्टि विषयक सत्य ज्ञान की खोज में अनेक वर्षों तक अध्ययन व अनुसंधान आदि करते रहे। उन्होंने सृष्टि की उत्पत्ति विषयक अपने विचार मुख्यतः सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में व्यक्त किये हैं जिनका आधार वेद, दर्शन व उपनिषद आदि ग्रन्थ हैं। हमनें भी महर्षि दयानन्द के इस विषय के विचारों का अनेक बार पाठ व मनन किया है और हमारा विश्वास है कि आने वाले समय में विज्ञान इन विचारों को पूर्णतः स्वीकार कर लेगा जिसका कारण वेदों का ईश्वर प्रदत्त होने से निर्भ्रांत होना व वैदिक साहित्य अल्पज्ञ वैज्ञानिकों से भी कहीं अधिक उच्च ज्ञान व विज्ञान के उच्च कोटि के चिन्तक मनीषी ऋषियों की देन है।
सत्यार्थप्रकाश में ऋग्वेद 12/129/7 मन्त्र के आधार पर महर्षि दयानन्द कहते हैं कि यह विविध सृष्टि इस जगत के स्वामी ईश्वर से प्रकाशित हुई है। वह इस जगत् का धारण व प्रलयकर्त्ता है। इस सृष्टि को बनाने वाला ईश्वर इस जगत में व्यापक है। उसी से यह सब जगत उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय को प्राप्त होता है। मनुष्यअर्थात् आत्मा को उस परमात्मा को जानना चाहिये और उसके स्थान पर किसीअन्य को सृष्टिकर्त्ता नहीं मानना चाहिये। ऋग्वेद के मन्त्र 10/29/3 में बताया गया है कि जगत की रचना से पूर्व सब जगत् अन्धकार से आवृत, रात्रिरूप मेंजानने के अयोग्य, आकाशरूप तथा तुच्छ अर्थात् अनन्त परमेश्वर के सम्मुखएकदेशी आच्छादित था। पश्चात् परमेश्वर ने अपने सामर्थ्य से इस कारणरूपजगत् को कार्यरूप कर दिया अर्थात् बना दिया। ऋग्वेद के मन्त्र 10/129/1 में कहा गया है कि सब सूर्यादि तेजस्वी पदार्थो का आधार और जो यह जगत् हुआ है औरहोगा उस का एक अद्वितीय पति परमात्मा इस जगत् की उत्पत्ति के पूर्वविद्यमान था और जिस ने पृथिवी से लेके सूर्यपर्यन्त जगत् को उत्पन्न किया है, हेमनुष्य ! उस परमात्म देव की प्रेम से भक्ति किया करें। यजुर्वेद के मन्त्र 31/2 में ईश्वर ने बताया है कि जो ईश्वर सब सृष्टिगत पदार्थों में पूर्ण पुरुष है, जो नाशरहितकारण जड़ प्रकृति और जीव का स्वामी है तथा जो पृथिव्यादि जड़ और जीव सेअतिरिक्त है, हे मनुष्य ! वही पुरुष इस सब भूत, भविष्यत् और वर्तमानस्थ जगत्का बनाने वाला है, ऐसा सब मनुष्यों को जानना चाहिये। तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है कि जिस परमात्मा द्वारा रचना करने से ये सब पृथिव्यादि भूत व पदार्थउत्पन्न होते हैं, जिस से जीते और जिससे व जिसमें प्रलय को प्राप्त होते हैं, वहब्रह्म है। उस को जानने की इच्छा सभी मनुष्यों को करनी चाहिये। शारीरिक सूत्रों में कहा गया है कि इस जगत् का जन्म, स्थिति और प्रलय जिस से होता है, वहब्रह्म है और वह जानने के योग्य है।
प्राचीन वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार यह समस्त जगत् इसको बनाने वाले निमित्त कारण परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है। परमेश्वर ने इस जगत् को उपादान कारण अर्थात् सत्व, रज व तम गुणों वाली सूक्ष्म व मूल प्रकृति से बनाया है। इस मूल प्रकृति को ईश्वर ने उत्पन्न नहीं किया। यह भी जानने योग्य है कि संसार में ईश्वर, जीव व प्रकृति, यह तीन पदार्थ अनादि व नित्य हैं। इन जीव और ब्रह्म में से एक जो जीव है वह इस संसार में पापपुण्यरूप फलों को अच्छे प्रकार भोक्ता है और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को न भोक्ता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर व बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है। जीव से ईश्वर, ईश्वर से जीव और दोनों से प्रकृति भिन्न स्वरूप व तीनों अनादि हैं। उपनिषद् में बताया गया है कि प्रकृति, जीव और परमात्मा तीनों अज अर्थात् जिन का जन्म कभी नही होता और न कभी यह तीन पदार्थ जन्म लेते हैं अर्थात् ये तीन पदार्थ सब जगत् के कारण हैं। इन का कारण कोई नहीं। इस अनादि प्रकृति का भोग अनादि जीव करता हुआ शुभ व अशुभ कर्म के बन्धनों में फंसता है और उस में परमात्मा नहीं फंसता क्योंकि वह प्रकृति व उसके पदार्थों का भोग नहीं करता।
प्रकृति क्या है, इसका वर्णन सांख्य दर्शन में है। इसके अनुसार प्रकृति (सत्व) शुद्ध (रजः) मध्य (तमः) जाड्य अर्थात् जडता गुणों से युक्त है। यह तीन गुण मिलकर इनका जो संघात है उस का नाम प्रकृति है अर्थात् सत्व, रज व तम गुणों का संघात प्रकृति के सूक्ष्तम कण की एक इकाई के समान है। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर इस प्रकृति के सूक्ष्म सत्व, रज व तम कणों में अपनी मनस शक्ति से विकार व विक्षोभ उत्पन्न कर इनसे महत्तत्व बुद्धि, उससे अर्थात् उस महतत्व बुद्धि से अहंकार, उस से पांच तन्मात्रा सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन, पांच तन्मात्राओं से पृथिव्यादि पांच भूत ये चौबीस पदार्थ बनते हैं। पच्चीसवां पुरुष अर्थात् जीव और परमेश्वर हैं। इनमें से सत्व, रज व तम गुणों वाली प्रकृति अधिकारिणी और महतत्व बुद्धि, अहंकार तथा पांच सूक्ष्म भूत प्रकृति का कार्य हैं। यही पदार्थ इंद्रियों, मन तथा स्थूल भूतों के कारण हैं। पुरुष अर्थात् जीवात्मा न किसी की प्रकृति, न किसी का उपादान कारण और न किसी का कार्य है। एक उपनिषद वचन में कहा गया है कि हे श्वेतकेतो ! यह जगत् सृष्टि के पूर्व सत्, असत्, आत्मा और ब्रह्मरूपथा। वही परमात्मा अपनी इच्छा से प्रकृति व जीवों के द्वारा बहुरूप वा जगतरूप होगया।
जगत् की उत्पत्ति के तीन कारण क्रमशः निमित्त, उपादान तथा साधारण, यह तीन कारण होते हैं। निमित्त कारण उसको कहते हैं कि जिसके बनाने से कुछ बने, न बनाने से न बने, आप स्वयं बने नहीं और दूसरे को प्रकारान्तर बना देवे। दूसरा उपादान कारण उस को कहते हैं जिस के बिना कुछ न बने, वही अवस्थान्तर रूप होकर बने व बिगड़े भी। तीसरा साधारण कारण उस को कहते हैं कि जो बनाने में साधन और साधारण निमित्त हो। निमित्त कारण दो प्रकार के होते हैं। एक-सब को कारण से बनाने, धारण करने और प्रलय करने तथा सब की व्यवस्था रखने वाला मुख्य निमित्त कारण परमात्मा। दूसरा-परमेश्वर की सृष्टि में से पदार्थों को लेकर अनेकविध कार्यान्तर बनाने वाला साधारण निमित्त कारण जीव। सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को कहते हैं। प्रकृति वा परमाणुरूप प्रकृति जिस को सब संसार के बनाने की सामग्री कहते हैं। वह जड़ होने से अपने आप न बन और नबिगड़ सकती है किन्तु दूसरे के बनाने से बनती और बिगाड़ने से बिगड़ती है। कहीं–कही जड़ के निमित्त से जड़ भी बन और बिगड़ भी जाता है। जैसे परमेश्वर केरचित बीज पृथिवी से गिरने और जल पाने से वृक्षाकार हो जाते हैं और अग्नि आदिजड़ के संयोग से बिगड़ भी जाते हैं। परन्तु इनका नियमपूर्वक बनना और वाबिगड़ना परमेश्वर और जीव के आधीन है।
जब कोई वस्तु बनाई जाती है तब जिन-जिन साधनों का प्रयोग करते हैं वह ज्ञान, दर्शन, बल, हाथ और नाना प्रकार के साधन कहलाते हैं और दिशा, काल और आकाश साधारण कारण होते हैं। जैसे घड़े का बनाने वाला कुम्हार निमित्त कारण, मिट्टी उपादान कारण और दण्ड चक्र आदि सामान्य कारण। दिशा, काल, आकाश, प्रकाश, आंख, हाथ, ज्ञान, क्रिया आदि साधारण और निमित्त कारण भी होते हैं। इन तीन कारणों के बिना कोई भी वस्तु नहीं बन सकती और न बिगड़ सकती है।
इस प्रकार से यह समस्त जगत् जिसमें सूर्य, चन्द्र, तारें, पृथिवी व पृथिवी के सभी पदार्थ तथा प्राणी जगत सम्मिलित है निमित्त कारण ईश्वर द्वारा उपादान कारण परमाणु रूप प्रकृति से बनाये गये हैं। परमात्मा के सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, अनादि, नित्य आदि गुणों से युक्त होने से उसके द्वारा सृष्टि बनाने व उसे संचालित करने में असम्भव जैसा कुछ भी नहीं है। यह वर्णन पूर्णतः सत्य, वैज्ञानिक, तर्क संगत, विश्वसनीय, निभ्र्रान्त व वेदों के प्रमाणों से पुष्ट है। अतः इस सिद्धान्त को सभी आध्यात्मवादियों व भौतिक विज्ञान के वैज्ञानिकों को मानना चाहिये। इसके विपरीत वैज्ञानिकों के पास अभी तक सृष्टि उत्पत्ति का कोई सन्तोषजनक उत्तर इसलिए नहीं है कि यह सृष्टि अनादि निमित्त कारण ईश्वर द्वारा अनादि उपादान कारण प्रकृति से निर्मित की गई है जिसका उद्देश्य अनादि जीवात्माओं को उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का सुख व दुःखरूपी फल प्रदान करना है। सृष्टि रचना विषयक इस ज्ञान के विस्तार व संशयों के निवारण के लिए महर्षि दयानन्द कृत सत्यार्थप्रकाश का आठवां समुल्लास व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के सृष्टि की रचना व उत्पत्ति के प्रकरणों को देखना चाहिये। वेद, उपनिषदों व दर्शनों का अध्ययन भी इस विषय की सभी शंकाओं को दूर करता है। योग का अभ्यास, ध्यान व समाधि से भी ईश्वर द्वारा सृष्टि रचना का यह गुप्त व सूक्ष्म विषय जाना जा सकता है।

Saturday, May 12, 2018

पुष्यमित्र शुंग के नाम पर बौद्धिक आतंकवाद



पुष्यमित्र शुंग के नाम पर बौद्धिक आतंकवाद

डॉ विवेक आर्य

मित्रों कुछ अम्बेडकरवादी दुष्पचार करते रहते है कि पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण ने बौद्ध राजा बृहद्रथ की हत्या की थी। यह स्वामी द्रोह था। सत्य क्या है। यह जानना अत्यंत आवश्यक है। पुष्यमित्र शुंग महाराज बृहद्रथ का सेनापति था। वह अत्यंत योग्य एवं राष्ट्रहित में चिंतित रहता था। उस काल में अशोक का वंशज राजा बृहद्रथ मगध का राजा था। जो अयोग्य होने के साथ साथ दूरदृष्टि संपन्न भी नहीं था। मोर्य वंश के महान सम्राट चन्द्रगुप्त के पौत्र अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक ने एक बौध सम्राट के रूप में लगभग २० वर्ष तक शासन किया। अहिंसा का पथ अपनाते हुए उसने पूरे शासन तंत्र को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में लगा दिया। अत्यधिक अहिंसा के प्रसार से भारत की वीर भूमि बौद्ध भिक्षुओ व बौद्ध मठों का गढ़ बन गई थी। कहते है कि अशोक ने 84000 बुद्ध विहारों का निर्माण करवाया था। उसके इस कदम से सारा राजकोष समाप्त हो गया। मगध साम्राज्य के मंत्रिमंडल ने अशोक को गद्दी से उतारकर उसके पौत्र को राजा बना दिया। अशोक यहाँ तक भी नहीं रुका। उसने सैनिकों के कवच और अस्त्र उतरवाकर उन्हें बौद्ध भिक्षु बना दिया। इससे राज्य की रक्षा पंक्ति टूट गई। इस कारण भी आगे चलकर मगध राज्य कमजोर हुआ। उससे भी आगे जब मोर्य वंश का नौवा अन्तिम सम्राट व्रहद्रथ मगध की गद्दी पर बैठा ,तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, पंजाब व लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था । जब सिकंदर व सैल्युकस जैसे वीर भारत के वीरों से अपना मान मर्दन करा चुके थे, तब उसके लगभग ९० वर्ष पश्चात् जब भारत से बौद्ध धर्म की अहिंसात्मक निति के कारण वीर वृत्ति का लगभग ह्रास हो चुका था, ग्रीकों ने सिन्धु नदी को पार करने का साहस दिखा दिया।
सम्राट व्रहद्रथ के शासनकाल में ग्रीक शासक मिनिंदर जिसको बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा गया है ,ने भारत वर्ष पर आक्रमण की योजना बनाई। मिनिंदर ने सबसे पहले बौद्ध धर्म के धर्म गुरुओं से संपर्क साधा,और उनसे कहा कि अगर आप भारत विजय में मेरा साथ दें तो में भारत विजय के पश्चात् में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लूँगा। बौद्ध गुरुओं ने राष्ट्र द्रोह किया तथा भारत पर आक्रमण के लिए एक विदेशी शासक का साथ दिया।
सीमा पर स्थित बौद्ध मठ राष्ट्रद्रोह के अड्डे बन गए। बोद्ध भिक्षुओ का वेश धरकर मिनिंदर के सैनिक मठों में आकर रहने लगे। हजारों मठों में सैनिकों के साथ साथ हथियार भी छुपा दिए गए। दूसरी तरफ़ सम्राट व्रहद्रथ की सेना का एक वीर सैनिक पुष्यमित्र शुंग अपनी वीरता व साहस के कारण मगध कि सेना का सेनापति बन चुका था । बौद्ध मठों में विदेशी सैनिको का आगमन उसकी नजरों से नही छुपा । पुष्यमित्र ने सम्राट से मठों कि तलाशी की आज्ञा मांगी। परंतु बौद्ध सम्राट वृहद्रथ ने मना कर दिया। किंतु राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत प्रोत शुंग , सम्राट की आज्ञा का उल्लंघन करके बौद्ध मठों की तलाशी लेने पहुँच गया। मठों में स्थित सभी विदेशी सैनिको को पकड़ लिया गया,तथा उनको यमलोक पहुँचा दिया गया,और उनके हथियार कब्जे में कर लिए गए। राष्ट्रद्रोही बौद्धों को भी ग्रिफ्तार कर लिया गया। परन्तु वृहद्रथ को यह बात अच्छी नही लगी।

पुष्यमित्र जब मगध वापस आया तब उस समय सम्राट सैनिक परेड की जाँच कर रहा था। सैनिक परेड के स्थान पर ही सम्राट व पुष्यमित्र शुंग के बीच बौद्ध मठों को लेकर कहासुनी हो गई।सम्राट वृहद्रथ ने पुष्यमित्र पर हमला करना चाहा परंतु पुष्यमित्र ने पलटवार करते हुए सम्राट का वध कर दिया। वैदिक सैनिको ने पुष्यमित्र का साथ दिया तथा पुष्यमित्र को मगध का सम्राट घोषित कर दिया।
सबसे पहले मगध के नए सम्राट पुष्यमित्र ने राज्य प्रबंध को प्रभावी बनाया, तथा एक सुगठित सेना का संगठन किया। पुष्यमित्र ने अपनी सेना के साथ भारत के मध्य तक चढ़ आए मिनिंदर पर आक्रमण कर दिया। भारतीय वीर सेना के सामने ग्रीक सैनिको की एक न चली। मिनिंदर की सेना पीछे हटती चली गई । पुष्यमित्र शुंग ने पिछले सम्राटों की तरह कोई गलती नही की तथा ग्रीक सेना का पीछा करते हुए उसे सिन्धु पार धकेल दिया। इसके पश्चात् ग्रीक कभी भी भारत पर आक्रमण नही कर पाये। सम्राट पुष्य मित्र ने सिकंदर के समय से ही भारत वर्ष को परेशानी में डालने वाले ग्रीको का समूल नाश ही कर दिया। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण वैदिक सभ्यता का जो ह्रास हुआ,पुन:ऋषिओं के आशीर्वाद से जाग्रत हुआ। डर से बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले पुन: वैदिक धर्म में लौट आए। कुछ बौद्ध ग्रंथों में लिखा है की पुष्यमित्र ने बौद्दों को सताया। किंतु यह पूरा सत्य नही है। शुंग ने उन राष्ट्रद्रोही बौद्धों को सजा दी ,जो उस समय ग्रीक शासकों का साथ दे रहे थे। पुष्यमित्र शुंग ने राष्ट्ररक्षा की थी। वह बोद्ध धर्म के प्रति सहिष्णु था। इसका प्रमाण मिलता है साँची में पुष्यमित्र द्वारा बड़ा बुद्ध स्तूप का निर्माण करवाया गया था। शुंग ने ग्रीकों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात अश्वमेध यज्ञ कर मंडलों को एकजुट कर संसार का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना भी की थी। समय की आवश्यकता एक महान शासक की थी न की एक अयोग्य शासक की थी।

अम्बेडकरवादी इतिहासकार शुंग को नकारात्मक रूप में पेशकर इतिहास से खींचातानी कर रहे हैं। यह एक प्रकार का बौद्धिक आतंकवाद है।

Friday, May 11, 2018

आर्य महापुरुषों के रोचक प्रसंग।



आर्य महापुरुषों के रोचक प्रसंग।

“जब गांधी जी का नकली अहिंसावाद फीका पड़ गया”।

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जब सिंध की मुस्लिम लीगी सरकार ने सत्यार्थ प्रकाश के चौदहवें समुल्लास पर प्रतिबन्ध लगाने का विचार किया तो सार्वदेशिक सभा के तत्कालीन प्रधान स्व० घनश्यामसिंह गुप्त महात्मा गांधी से विचार-विमर्श करने के लिए १६ नवम्बर १९४४ को उनसे मिले। दोनों में जो वार्तालाप हुआ, वह इस प्रकार था –

गुप्त जी – बापू जी ! हमारे सत्याग्रह को आपका आशीर्वाद चाहिए।

गांधी जी – मैं आशीर्वाद कैसे दे सकता हूँ ? सत्यार्थप्रकाश के १४वें समुल्लास में तो इस्लाम की बहुत कटु तथा नाजायज आलोचना की गयी है जो अहिंसा की परिधि से कोसों दूर है। उस समुल्लास को तो उस पुस्तक से निकाल देना चाहिए।

गुप्त जी – बापू जी ! आप इस पुस्तक को अपनी आज की तराजू से तोल रहे हैं। किन्तु १४वां समुल्लास आपकी आज की भावना के अनुसार नहीं लिखा गया है। उसकी तुलना तो कुरआन शरीफ में जो काफिरों (गैर-मुसलमान) के प्रति उद्गार हैं, उनसे करनी चाहिए। कुरआन और हदीसों में कई ऐसे वाक्य हैं जिनमें काफिरों और गैर-मुस्लिमों की हत्या करना न केवल जायज अपितु फर्ज बतलाया गया है।

गांधी जी – मैं तो चाहूंगा कि उक्त १४वां समुल्लास आप लोग निकाल दो।

गुप्त जी – बापू जी ! सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान के नाते, बिना सभा के प्रस्ताव किये ही मैं उक्त १४वां समुल्लास निकालने को तैयार हूँ, बशर्ते कि आप मुसलमान मुल्ला-मौलवियों को इस बात पर राजी कर लें कि वे कुरआन शरीफ से भी उक्त आयतों को निकाल लें।

महात्मा जी – तूने तो मुझे चुप करा दिया ! बोल, कया चाहता है ?

गुप्त जी – मैं तो आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप सिंध के मुख्यमंत्री (सर गुलाम हुसैन हिदायतुल्ला) को एक पत्र लिख दें कि जिससे उक्त १४वें समुल्लास पर लगाया हुआ प्रतिबन्ध निरस्त कर दिया जावे।

 महात्माजी ने ऐसा कोई पत्र नहीं लिखा।  आर्यसमाज को सिंध में सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिबन्ध को हटवाने के लिए सत्याग्रह करना पड़ा। आर्य नेताओं ने खुलेआम घोषणा कर सत्यार्थ प्रकाश को प्रचारित किया।  किन्तु १९४७ में देश-विभाजन के साथ ही परिस्थितियाँ बदल गईं। जब पाकिस्तान में हिन्दुओं का अस्तित्व ही समाप्त हो रहा था तो सत्यार्थप्रकाश की तो चिन्ता ही किसे थी।

[‘घनश्यामसिंह गुप्त की आत्मकथा’]

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स्रोत - बिखरे मोती।
लेखक – डॉ भवानी लाल भारतीय।
प्रस्तुति – आर्य रमेश चन्द्र बावा।

Sunday, May 6, 2018

मुहम्मद अली जिन्ना , सर सैयद खान और एमयू




मुहम्मद अली जिन्ना , सर सैयद खान और एमयू
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आप सभी मे से बहोत कम लोगो को ही शायद यह पता होगा कि पाकिस्तान में जिन्ना , इकबाल और सर सैय्यद अहमद खान तीनों व्यक्ति ‘पाकिस्तान के जनक’ के रूप में माने जाते हैं।
वहां के स्कूली पाठ्यक्रमों में तीनों हिंदू-मुस्लिम अलगाववाद पर बल देने और पाकिस्तान निर्माण के लिए आवश्यक विभाजनकारी मानसिकता को प्रोत्साहन देने वाले नेताओं के रूप में वर्णित हैं।
जिन्ना और इकबाल प्रारंभ में जहां स्वतंत्रता के आंदोलन से जुड़े और बाद में औपनिवेशिक प्रपंच का महत्वपूर्ण हिस्सा बने वहीं सैयद अहमद खान ने 19वीं शताब्दी के मध्य के बाद भारत में ‘दो राष्ट्र’ के सिद्धांत का समर्थन किया था ।
पाकिस्तान ने अपनी अलग पहचान को रेखांकित करने के लिए गांधीजी, नेताजी बोस या फिर भगत सिंह के सम्मान में अपने किसी भी सार्वजनिक भवन, संस्था या फिर सड़क का नाम नहीं रखा है।
वहां सैयद अहमद खान के नाम पर कई संस्थान और भवन हैं जिनमें कराची का सर सैयद अहमद इंजीनियरिंग प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, सर सैयद सरकारी कॉलेज और रावलपिंडी स्थित प्रख्यात एफजी सर सैयद अहमद कॉलेज आदि शामिल हैं।
सर सैयद अहमद की 200वीं जयंती पर पाकिस्तान ने उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया और आज भारत में उनकी विरासत को राष्ट्रवाद का प्रतीक बताया जा रहा है। सैयद अहमद खान के भ्रामक और मिथकीय महिमामंडन की पृष्ठभूमि में सत्य की खोज आवश्यक है।
17 अक्टूबर, 1817 को जन्मे सैयद अहमद खान 1838 में ईस्ट इंडिया कंपनी से जुड़े। अंग्रेजो का विश्वास जीतकर वह 1867 में एक न्यायालय के न्यायाधीश भी बने और 1876 में सेवानिवृत्त हुए। अप्रैल 1869 में सैयद अहमद खान अपने बेटे के साथ इंग्लैंड गए, जहां छह अगस्त को उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया’ से सम्मानित किया गया। 1887 में उन्हें लॉर्ड डफरिन द्वारा सिविल सेवा आयोग के सदस्य के रूप में भी नामित किया गया। इसके अगले वर्ष उन्होंने अंग्रेजो के साथ राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा देने और अंग्रेजी शासन में मुस्लिम भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अलीगढ़ में ‘संयुक्त देशभक्त संघ’ की स्थापना की। खान बहादुर के नाम से प्रख्यात सैयद अहमद की वफादारी से खुश होकर ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें वर्ष 1898 में नाइट की उपाधि भी दी।
वर्ष 1885 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के साथ देश में पूर्ण स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग उठनी शुरू हुई तब उन्होंने हिंदू बनाम मुस्लिम, हिंदी बनाम उर्दू, संस्कृत बनाम फारसी का मुद्दा उठाकर मुसलमानों की मजहबी भावनाओं का दोहन किया। उन्होंने यह विचार स्थापित किया कि मुसलमान का दैवीय कर्तव्य है कि वे कांग्रेस से दूर रहें। अपने इस अभियान में वह काफी हद तक सफल भी हुए।
ऐसा अनुमान है कि उस कालखंड में देश के बहुत कम मुस्लिम ही गांधीजी के अखंड भारत के सिद्धांत के साथ खड़े रहे। शेष मुस्लिम समाज की सहानुभूति पाकिस्तान के साथ थी। यह ठीक है कि उनमें से अधिकांश भारत में ही रह गए।
16 मार्च, 1888 को मेरठ में दिए सैयद अहमद खान के भाषण ने भारत में मजहब आधारित विभाजन के वैचारिक दर्शन का शिलान्यास कर दिया।
उनके अनुसार,
‘सोचिए यदि अंग्रेज भारत में नहीं हों तो कौन शासक होगा? क्या दो राष्ट्र-हिंदू और मुसलमान एक ही सिंहासन पर बराबर के अधिकार से बैठ सकेंगे? निश्चित रूप से नहीं। आवश्यक है कि उनमें से एक-दूसरे को पराजित करें। जब तक एक कौम दूसरे को जीत न ले तब तक देश में कभी शांति स्थापित नहीं हो सकती। मुस्लिम आबादी हिंदुओं से कम हैं और अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त मुस्लिम तो और भी कम, किंतु उन्हें कमजोर नहीं समझा जाए। वे अपने दम पर मुकाम पाने में सक्षम हैं। ’
सैयद अहमद के अनुसार, ‘सात सौ वर्षों तक हमने जिन पर शासन किया, उनके अधीन रहना हमें अस्वीकार्य है। अल्लाह ने कहा है कि मुसलमानों का सच्चा मित्र केवल ईसाई ही हो सकता है, अन्य समुदाय के लोगों से दोस्ती संभव नहीं है। हमें ऐसी व्यवस्था को अपनाना चाहिए जिससे वे हमेशा के लिए भारत में राज कर सकें और सत्ता कभी भी ‘बंगालियों’ के हाथों में न जाए।’ वह कांग्रेसियों को अक्सर ‘बंगाली’ कहकर संबोधित करते थे, क्योंकि उस समय कोंग्रेसी नेतृत्व के बड़े हिस्से पर बंगाली काबिज थे।
अपने एजेंडे के तहत सर सैयद अहमद खान ने 1875 में एक शैक्षणिक संस्था की शुरुआत की जो बाद में मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज और अंतत: वर्ष 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय यानी एएमयू के रूप में स्थापित हुआ। यह एक तथ्य है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने वर्ष 1941 में इस विश्वविद्यालय को ‘पाकिस्तान की आयुधशाला’ की संज्ञा दी थी।
इसी तरह 31 अगस्त, 1941 को एएमयू छात्रों को संबोधित करते हुए मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली खान ने कहा था,
‘हम मुस्लिम राष्ट्र की स्वतंत्रता की लड़ाई जीतने के लिए आपको उपयोगी गोला-बारूद के रूप में देख रहे हैं।’
बाद में लियाकत अली खान पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने थे।
वर्ष 1954 में आगा खान ने अलीगढ़ के छात्रों के लिए कहा था,
‘सभ्यता के इतिहास में विश्वविद्यालय देश के बौद्धिक और आध्यात्मिक जागरण में मुख्य भूमिका निभाते हैं। हम यह गौरव के साथ दावा कर सकते हैं कि संप्रभु पाकिस्तान का जन्म अलीगढ़ के मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुआ।
सैयद अहमद खान मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार इसलिए चाहते थे ताकि मुस्लिम समाज औपनिवेशिक साम्राज्य की बेहतर तरीके से खिदमत कर सके और अंग्रेजो के साथ मिलकर हिंदुओं के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाए।
सर सैयद के समय से लेकर जिन्ना के समय तक मुसलमान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहकर आलोचना करते रहे। क्रांग्रेस ने मुसलमानों की आम भागीदारी अल्प रही। 1946 का अंतरिम चुनाव ने मुस्लिम मतदाताओं का मुस्लिम लीग के प्रति भारी समर्थन दर्शाया। मुस्लिम लीग साधारणत: अग्रेजों का वफादार रहा। फिर भी क्या कारण है कि मुस्लिम लीग स्वतंत्र भारत में कई दशकों तक यह मुसलमानों का सर्वाधिक प्रिय पार्टी बनी रही। यह बात तय हैं कि स्वतंत्रता-सह-बंटवारा की सुबह मुसलमान हिंदुओं के प्रति कोई विशेष प्रेम विकसित नहीं कर पाए। कांग्रेस शासन के दौरान अनेक बड़े दंगे भारत को अपने चपेट में लेता रहा। इस विरोधाभास का उत्तर तब मिलता है, जब हम सुविधा के गठजोड़ की तरफ देखें।
एक तथ्य यह भी है कि अल्पसंख्यक दर्जा के बिना ही यूनिवर्सिटी के 90 प्रतिशत छात्र और शिक्षक मुस्लिम हैं।
फखरूद्दीन अली अहमद के जीवनीकार रहमानी बंटबारे में अलीगढ़ की भूमिका के बारे में कहते हैं, ‘… 1940 के बाद मुस्लिम लीग ने अपने राजनैतिक सिध्दांतों के प्रसार के लिए इस यूनिवर्सिटी को एक सुविधाजनक और उपयोगी मीडिया के रूप में इस्तेमाल किया और द्विराष्ट्र सिध्दांत का जहरीली बीज बोया।… यूनिवर्सिटी के अध्यापक व छात्र सारे देश में फैल गए और मुसलमानों को यह समझाने की कोशिश की कि पाकिस्तान बनने का उद्देश्य क्या है और उससे फायदे क्या हैं।
अक्टूबर 1947 में ऐसा पाया गया कि पाकिस्तानी सरकार ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अपनी सेना के लिए अफसरों की नियुक्ति की। उस समय उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को यूनिवर्सिटी के उप-कुलपति को आदेश देना पड़ा कि कोई पाकिस्तानी अफसर यूनिवर्सिटी न आने पाए। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संदिग्ध इतिहास के बावजूद सेक्युलर गुट कानून बनवाने में व्यस्त हैं कि मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए।
आगा खां ने 1954 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों को निम्न शब्दों में भेंट दी:
‘प्राय: विश्वविद्यालय ने राष्ट्र के बौध्दिक व आध्यात्मिक पुनर्जागरण के लिए पृष्ठभूमि तैयार की है।…अलीगढ़ भी इससे भिन्न नहीं है। लेकिन हम गर्व के साथ दावा कर सकते हैं कि यह हमारे प्रयासों का फल है न कि किसी बाहरी उदारता का। निश्चित तौर यह माना जा सकता है कि स्वतंत्र, सार्वभौम पाकिस्तान का जन्म अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ही हुआ था।’
मार्च 16, 1888 को मेरठ में दिए गए सर सैयद अहमद के भाषण का संक्षिप्त उल्लेख जरूरी है:
क्या इन परिस्थितियों में संभव है कि दो राष्ट्र-मुसलमान व हिंदू-एक ही गद्दी पर एक साथ बैठे और उनकी शक्तियां बराबर हों। ज्यादातर ऐसा नहीं। ऐसा होगा कि एक विजेता बन जाएगा और दूसरा नीचे फेंक दिया जाएगा। ऐसी उम्मीद रखना कि दोनों बराबर होंगे, असंभव और समझ से परे है। साथ ही इस बात को भी याद रखना चाहिए कि हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों की संख्या कम है। हालांकि उनमें से काफी कम लोग उच्च अंग्रेजी शिक्षा हासिल किए हुए हैं, लेकिन उन्हें कमजोर व महत्वहीन नहीं समझना चाहिए। संभवत: वे अपने हालात स्वयं संभाल लेंगे। यदि नहीं, तो हमारे मुसलमान भाई, पठान, पहाड़ों से असंख्य संख्या में टूट पड़ेंगे और उत्तरी सीमा-प्रांत से बंगाल के आखिरी छोर तक खून की नदी बहा देंगे। अंग्रेजों के जाने के बाद कौन विजेता होगा, यह ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करेगा। लेकिन जब तक एक राष्ट्र दूसरे को नहीं जीत लेगा और उसे आज्ञाकारी नहीं बना लेगा, तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकेगी। यह निष्कर्ष ऐसे ठोस प्रमाणों पर आधारित है कि कोई इसे इनकार नहीं कर सकता।
आखिर इस सब सच की अनदेखी करने का क्या मतलब?

जिन्नाह महान सावरकर गद्दार: भ्रम का निवारण



जिन्नाह महान सावरकर गद्दार: भ्रम का निवारण
हमारे देश में एक विशेष जमात यह राग अलाप रही है कि जिन्नाह अंग्रेजों से लड़े थे इसलिए महान थे। जबकि वीर सावरकर गद्दार थे क्यूंकि उन्होंने अंग्रेजों से माफ़ी मांगी थी। वैसे इन लोगों को यह नहीं मालूम कि जिन्नाह इस्लाम की मान्यताओं के विरुद्ध सारे कर्म करते थे। जैसे सूअर का मांस खाना, शराब पीना, सिगार पीना आदि। वो न तो पांच वक्त के नमाजी थे। न ही हाजी थे। न ही दाढ़ी और टोपी में यकीन रखते थे। जबकि वीर सावरकर। उनका तो सारा जीवन ही राष्ट्र को समर्पित था। पहले सावरकर को जान तो लीजिये।
1. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी देशभक्त थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? क्या किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर ब्रिटेन में शोक सभा हुई है.?
2. वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ...
3. विदेशी वस्त्रों की पहली होली पूना में 7 अक्तूबर 1905 को वीर सावरकर ने जलाई थी...
4. वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने पत्र 'इन्डियन ओपीनियन' में गाँधी ने निंदा की थी...
5. सावरकर द्वारा विदेशी वस्त्र दहन की इस प्रथम घटना के 16 वर्ष बाद गाँधी उनके मार्ग पर चले और 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया...
6. सावरकर पहले भारतीय थे जिनको 1905 में विदेशी वस्त्र दहन के कारण पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया और दस रूपये जुर्माना लगाया ... इसके विरोध में हड़ताल हुई... स्वयं तिलक जी ने 'केसरी' पत्र में सावरकर के पक्ष में सम्पादकीय लिखा...
7. वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफादार होने की शपथ नही ली... इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नही दिया गया...
8. वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा ग़दर कहे जाने वाले संघर्ष को '1857 का स्वातंत्र्य समर' नामक ग्रन्थ लिखकर सिद्ध कर दिया...
9. सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे जिनके लिखे '1857 का स्वातंत्र्य समर' पुस्तक पर ब्रिटिश संसद ने प्रकाशित होने से पहले प्रतिबन्ध लगाया था...
10. '1857 का स्वातंत्र्य समर' विदेशों में छापा गया और भारत में भगत सिंहने इसे छपवाया था जिसकी एक एक प्रति तीन-तीन सौ रूपये में बिकी थी... भारतीय क्रांतिकारियों के लिए यह पवित्र गीता थी... पुलिस छापों में देशभक्तों के घरों में यही पुस्तक मिलती थी...
11. वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे...
12. सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला, मगर ब्रिटेन और फ्रांस की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नही मिला और बंदीबनाकर भारत लाया गया...
13. वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी...
14. सावरकर पहले ऐसे देशभक्त थे जो दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले- "चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया."
15. वीर सावरकर पहले राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सजा के समय 10 साल से भी अधिक समय तक आजादी के लिए कोल्हू चलाकर 30 पौंड तेल प्रतिदिन निकाला...
16. वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकड़ और कोयले से कवितायें लिखी और 6000 पंक्तियाँ याद रखी...
17. वीर सावरकर पहले देशभक्त लेखक थे, जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आजादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगा रहा...
18. आधुनिक इतिहास के वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक थे जिन्होंने हिन्दू को परिभाषित करते हुए लिखा कि-'आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका.पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितीस्मृतः.'अर्थात समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभू है जिसके पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं व यही पुण्य भू है, जिसके तीर्थ भारत भूमि में ही हैं, वही हिन्दू है...
19. वीर सावरकर प्रथम राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सत्ता ने 30 वर्षों तक जेलों में रखा तथा आजादी के बाद 1948 में नेहरु सरकार ने गाँधी हत्या की आड़ में लाल किले में बंद रखा पर न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा कर दिया... देशी-विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारोंसे डर लगता था...
20. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जब उनका 26 फरवरी 1966 को उनका स्वर्गारोहण हुआ तब भारतीय संसद में कुछ सांसदों ने शोक प्रस्ताव रखा तो यह कहकर रोक दिया गया कि वे संसद सदस्य नही थे जबकि चर्चिल की मौत पर शोक मनाया गया था...
21.वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त स्वातंत्र्य वीर थे जिनके मरणोपरांत 26 फरवरी 2003 को उसी संसद में मूर्ति लगी जिसमे कभी उनके निधनपर शोक प्रस्ताव भी रोका गया था....
22. वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद भवन में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा लेकिन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र अनावरण राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से किया...
23. वीर सावरकर पहले ऐसे राष्ट्रभक्त हुए जिनके शिलालेख को अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल के कीर्ति स्तम्भ से UPA सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने हटवा दिया था और उसकी जगह गांधी का शिलालेख लगवा दिया...वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने कालापानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया....
24. महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी-देशभक्त, उच्च कोटि के साहित्य के रचनाकार, हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्थान के मंत्रदाता, हिंदुत्व के सूत्रधार वीर विनायक दामोदर सावरकर पहले ऐसे भव्य-दिव्य पुरुष, भारत माता के सच्चे सपूत थे, जिनसे अन्ग्रेजी सत्ता भयभीत थी, आजादी के बाद नेहरु की कांग्रेस सरकार भयभीत थी...
25. वीर सावरकर माँ भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया... पर आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अँधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर के राष्ट्रवादी विचारों का सूर्य उदय हो रहा है..
।।वन्देमातरम।।

Friday, May 4, 2018

आर्यसमाज और सर सैय्यद अहमद खान




आर्यसमाज और सर सैय्यद अहमद खान

डॉ विवेक आर्य

AMU अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय जिन्नाह की तस्वीर को लेकर चर्चा में है। इस अवसर पर इसके संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान का नाम आना स्वाभाविक है। सर सैय्यद ने 1857 के काल में अंग्रेजों का भरपूर सहयोग किया। जिसके बदले उन्हें अंग्रेजों ने सर आँखों पर उठा लिया। सर सैय्यद मुसलमानों को अंग्रेजी पढ़ने एक अंग्रेजों के प्रति वफ़ादारी दिखाने के पक्षधर थे। इसके लिए उन्होंने एक पुस्तक का लेखन भी किया था जिसका शीर्षक था 'The Loyal Mohammadans of India '

आर्यसमाज के शीर्घ लोगों से सर सैय्यद अहमद खान के सम्बन्ध रहे। सर्वोपरि स्वामी दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द और लाला लाजपत राय आदि। स्वामी दयानन्द और सर सैय्यद अहमद खान की प्रथम भेंट अलीगढ में जनवरी 1874 में हुई थी। उस समय वे वहां के न्यायाधीश थे। स्वामी जी के विचारों से वे प्रभावित हुए और दोनों के बीच आत्मीयता स्थापित हुई। दूसरी भेंट उसी वर्ष बनारस में हुई। उस समय वे बनारस में जज के रूप में नियुक्त थे। उस समय उन्होंने स्वामी जी का एक व्याख्यान अपने बंगले पर करवाया था। उनके माध्यम से स्वामी जी की बनारस के न्यायाधीश शेक्सपियर से भी भेंट हुई। 1877 में स्वामी दयानन्द ने दिल्ली में धर्म सम्मेलन का आयोजन किया था जिसमें सर सैय्यद अहमद खान ने भाग लिया था। स्वामी जी के निधन पर सर सैय्यद ने अपने शोक सन्देश में अलीगढ इंस्टिट्यूट गजट 18 संख्या 79 में लिखा था, "मैं स्वामी दयानन्द सरस्वती से भली-भांति परिचित था। तथा मेरा उनके प्रति आदर भाव भी था। इसका कारण इतना ही है कि वे नितांत उच्चाशय तथा विद्वान् पुरुष थे कि जिनके प्रति प्रत्येक मतालम्बी को अपना सम्मान प्रकट करना चाहिए। वे इतने महान पुरुष थे कि जिनके तुल्य भारत में किसी अन्य का मिलना मुश्किल है। अत: उनकी मृत्यु का शोक मनाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है। ऐसा अद्वितीय पुरुष हमारे बीच से उठ गया, यह नितांत शोकजनक है। " प्रसंग में उन्होंने लिखा था- "स्वामी दयानन्द संस्कृत के गंभीर विद्वान् तथा वेदों के सतर्क अध्येता थे। एक उच्च विद्वान होने के साथ साथ वे उच्च चरित्र तथा आध्यात्मिक वृति के पुरुष भी थे। उनके अनुयायी उन्हें ईश्वर के तुल्य सम्मान देते थे तथा निश्चय ही वे उस सम्मान के पात्र भी थे। उन्हीने हिन्दू धर्म में अनेक सुधार किये। वे मूर्तिपूजा के कट्टर विरोधी थे तथा इस विषय को लेकर उनके पंडितों से अनेक शास्त्रार्थ भी हुए थे। जिनमें उन्होंने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध किया था कि मूर्तिपूजा के लिये वेदों में स्वीकृति नहीं है। वे निराकार से भिन्न किसी अन्य ईश्वर की उपासना को अनुचित मानते थे। उन्होंने यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया था कि वेदों में जड़ तत्वों की पूजा का विधान नहीं है। मेरे विचार के अनुसार स्वामी जी प्रकृति को अनादि शाश्वत मानते थे तथा उसे माया कहकर भी सम्बोधित करते थे। यदि वे प्रकृति की अनादिता में विश्वास नहीं रखते तो संभवत: ईश्वर के स्वरुप को लेकर उनके तथा मुसलमानों के विचारों में कोई अंतर नहीं रह जाता। "

सर सैय्यद के अंतिम कथन का भाव इतना मात्र ही है कि ईश्वर के सम्बन्ध में इस्लाम की मान्यता तथा स्वामी दयानन्द की मान्यता में अधिक अंतर नहीं है। दोनों ही ईश्वर को निराकार तथा सर्वशक्तिमान मानते है। अंतर यदि कुछ है तो यदि कि इस्लाम में जड़ प्रकृति (माद्दा) को भी ईश्वर से ही उत्पन्न माना गया है जबकि स्वामी जी की धारणा के अनुसार ईश्वर तथा जीव की ही भांति प्रकृति भी अनादि, अनुत्पन्न तथा शाश्वत है।

(सन्दर्भ- महर्षि दयानन्द के भक्त, प्रशंसक और सत्संगी - प्रो भवानीलाल भारतीय)

स्वामी श्रद्धानन्द (मुंशी राम) के जीवन में भी सर सैय्यद से सम्बन्ध मिलता हैं। मगर यह सम्बन्ध अन्य रूप में है। स्वामी जी अपनी जीवनी कल्याण मार्ग का पथिक में इस सम्बन्ध में पर्याप्त प्रकाश डालते है। उन दिनों संयुक्त प्रान्त में सर सैय्यद की तूती बोलती थी। स्वामी जी के पिताजी उस समय बलिया में पुलिस में कार्यरत थे।एक मुसलमान वकील के यहाँ एक लड़की मर गयी। मुखबिर ने कोतवाली में रपट दी कि लड़की मार डाली गयी। नायब कोतवाल ने लाश शव परिक्षण के लिए रुकवा दी। वकील सर सैय्यद के हामी थे। सर सैय्यद की सहायता से वकील ने कचहरी में तहकीकात बंद करा दी और उनके पिताजी, नायब कोतवाल और मुखबिर पर फौजदारी नालिश दायर कर दी। स्वामी जी ने अंग्रेजी में पत्र आदि लिखे। पहले बनारस में मुकदमा चला फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट में गया। इलाहबाद हाई कोर्ट ने तीनों के कदम को सही करार दिया। तीनों निर्दोष सिद्ध हुए। इस घटना का मुंशी राम के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। उनके मन में यह भावना स्थिर हो गई कि सर सैय्यद निष्पक्ष नहीं अपितु मुसलमानों के हिमायती है। सर सैय्यद की मुस्लिम परस्ती को सिद्ध करने के लिए स्वामी जी ने कभी अपने पत्र सद्धर्म प्रचारक में भी लेख लिखा था।

लाला लाजपत राय के सर सैय्यद से सम्बन्ध जानने योग्य है। लाला जी के पिताजी सर सैय्यद के बड़े प्रशंसक थे। सर सैय्यद जहां अंग्रेजों के अमसर्थक थे वही उन्होंने भारतीय मुसलमानों को कांग्रेस से जुड़ने से रोकने का भरपूर प्रयास किया। लाला जी उस समय कांग्रेस के मंच से देशहित की बात करना चाहते थे। सर सैय्यद के विरोध में उन्होंने चार पत्र उर्दू में लिखे थे जो कोहिनूर पत्रिका में छपे थे। 1888 में कांग्रेस के इलाहाबाद सत्र से पहले कांग्रेस के संस्थापक ए.ओ. ह्यूम ने इन्हें अंग्रेजी में अनुवादित कर छपवाया था। उस दौर में ये पत्र अत्यंत लोकप्रिय हुए। इससे न केवल लाला जी ने देशव्यापी स्तर पर प्रशंसा प्राप्त की .अपितु उस काल में सर सैय्यद को गलत भी सिद्ध किया। ये पत्र आप इंटरनेट पर इस लिंक पर पढ़ सकते है।

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00islamlinks/txt_lajpatrai_1888/txt_lajpatrai_1888.html

पंडित गंगा उपाध्याय आर्यसमाज के दार्शनिक विद्वान् थे एवं इस्लाम के मर्मज्ञ थे। आपने सितम्बर 1943 के सार्वदेशिक पत्रिका के अंक में सिंध में सत्यार्थ प्रकाश रक्षा आंदोलन में सत्यार्थ प्रकाश और इस्लाम शीर्षक से लेख लिखा था। इस लेख में सर सैय्यद की इस्लामिक मान्यताओं में स्वामी दयानन्द के चिंतन का प्रभाव विषय भी आया है। गंगा प्रसाद जी लिखते है, "स्वामी दयानन्द सैय्यद साहिब को बताया होगा कि हिन्दू धर्म की वर्तमान कुरीतिया पुराणों के कारण है। वेद में उनका उल्लेख नहीं है। इसी का अनुसरण सर सैय्यद ने किया। उन्होंने कहना आरम्भ किया कि हम शुद्ध क़ुरान को मानते है। हदीसों को नहीं। हदीसों में इस्लाम के सिद्धांत के विरुद्ध भी बहुत सामग्री है। सर सैय्यद के लेखों वह आज के इस्लामिक साहित्य का यदि सौ वर्ष पहले के इस्लामी पुस्तकों से मिलान किया जाये तो पता चलेगा कि सत्यार्थ प्रकाश की छाप उन पर लगी हुई है। "

सर सैय्यद शैतान के बारे में लिखते है-

"अब ख्याल करो कि क़ुरान में शैतान का लफ्ज़ या नाम आया है। मगर इसकी हकीकत या माहियत(स्वरुप) कुछ बखान नहीं हुई। दिन रात हमको शैतान बहकता है और गुनाहों में फंसाता है। मगर वजूद खारिजी महसूस नहीं होता। बल्कि हम बिल यकीन पाते है कि खुद हम ही में एक शक्ति है जो हमें सीधे रास्ते पर फेरती है। हमको बेइन्ताह अनेक प्रलोभनों से बहकाती हैं। शैतान समझ कर उसकी दाढ़ी पकड़ लेते है और जोर के तमाचा मारते है। मगरजब आंख खुलती है तो अपनी ही सफ़ेद दाढ़ी अपने हाथ में और अपना ही गाल लाल देखते है। आयतों को मिलाओ और गौर करो कि यह सब अलंकार है। इनसे मानीहकीकी मुराद नहीं है। "

जिन्होंने ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका में अहिल्या की कथा पढ़ी है वो कह सकते हैं कि सर सैय्यद पर ऋषि का कितना प्रभाव था। सर सैय्यद अगर मुस्लिम कौम की राजनीतिक परिस्थिति सुधारने में न लगे रहते तो अवश्य हमसे बहुत आगे बढ़ गए होते। जैसे पुराणों में निष्कलंक अवतार का उल्लेख है। उसी प्रकार से इस्लाम में मेहंदी अखिरूज जमा का भी है। इसके विषय में सर सैय्यद लिखते है-

"उन गलत किस्सों में से जो मुसलमानों का ही मशहूर है एक किस्सा इमाम मेहंदी अखिरूज जमा के पैदा होने का है। इस किस्से की बहुत से हदीसें लिखित है। मगर सब जूठी और बनावटी है। "

सर सैय्यद के धार्मिक चिंतन पर स्वामी दयानन्द के क्रांतिकारी चिंतन का परिणाम स्पष्ट दीखता है। आर्यसमाज और उनसे शीर्घ नेताओं के साथ उनके खट्टे-मीठे सम्बन्ध रहे। पाठकों के ज्ञान वर्धन हेतु यह लेख प्रकाशित किया गया है।

(इस लेख को रिसर्च सेंटर फॉर वैदिक स्टडीज के अंतर्गत डॉ देवेश आर्य द्वारा अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक समारोह में दिनांक 7 मई,2018 को पढ़ा जायेगा। )