Wednesday, July 18, 2018

क्या सैन्ट थॉमस कभी भारत आया ?



क्या सैन्ट थॉमस कभी भारत आया ?

-हिमांशु शुक्ला

ईसायत में थॉमस को लगभग जीसस के जुड़वा भाई की तरह आइडेंटिफाय किया जाता है । Andropolis की यात्रा के दरम्यान जीसस उसे गुलाम के रूप में खरीदता है । आरंभिक काल मे चर्च यही प्रचार करते थे कि थॉमस सीरिया और पर्शिया की यात्रा किया और फारस में एक चर्च स्थापित किया । ईसाई मिशनरियों द्वारा ऐसा कहा जाता है कि , भारत मे
ईसाइयत का आगमन ईसा मसीह के बारह प्रेरितों (शिष्यों) में से एक थॉमस द्वारा अरब की खाड़ी पार कर भारत में आने के साथ ही शुरु हो गया था। सन् 52 ईं. मे केरल के क्रान्गानोर नामक जगह पर पहुँचे; जहाँ से उन्होंने भारत के तटीय इलाकों में सुसमाचार प्रचार किया। सर्वप्रथम मालावार तट के ब्राह्मणों के बीच उसने प्रचार किया और उनके प्रभाव से कई ब्राह्मणों ने इसाईयत को ग्रहण किये।

और जीसस के इंडिया में भी होने वाली बात Nicolas Notovitch नामक एक फ्रॉड रूसी पादरी ने 1894 ईसवी में अपनी पुस्तक ‘The Unknown Life of Jesus' में प्रकाशित किया जिसे ईसाई दुनिया विद्वानो और इतिहासकारो ने काफी पसंद किया ।

ये Nicolas Notovitch बहोत ही चालक किस्म का कहानीकार था । उसके द्वारा जीसस के कश्मीर में अध्ययन और मरने की कहानी गढ़ना उन सैकड़ो कहानियों में से एक है जो जीसस को भारत या कश्मीर से जोड़ती है । ब्रिटिश एजेंट अहमदिया आंदोलन के संस्थापक Mirza Ghulam Ahmad कादियान ने 1899 ई में यह दावा किया Roza Bal श्राइन ही जीसस की कब्र है , जिसे वहां के सुन्नी मौलानाओं ने विरोध किया और इससे इस्लाम निंदा के रूप में जाना ।

वही दूसरी ओर एक सच यह भी है कि सेंट थॉमस के विषय मे कोई भी कुछ भी नही जानता सिवाय उसके कब्रिस्तान के Edessa (मेसोपोटामिया) नामक जगह पर होने के ।

दोनों ही काल्पनिक कथाओं ने यूरोपीय ईसाई मिशनरियों के विद्वानो और पादरियों का ध्यान खींचा ।

भोले भाले हिन्दुओ इस विचार से बहोत खुश होते है कि जीसस भारत आए वे इस बात की ओर ध्यान नही देते कि इन काल्पनिक कथाओं में जीसस को भारत के अध्यात्म , धर्म और संस्कृति के प्रशसंक के रूप में नही बल्कि एक superior गुरु के रूप में प्रचारित किया जाता है । जिसने भारतीय समाज में सुधार किया और बहुजनो को ब्राह्मणों के अत्याचार से बचाया ।

थॉमस के साथ दक्षिण भारत के पालायुर या मालायुर , और जीसस के साथ बनारस , कश्मीर और पूरी में होने की कथा का फैलाई जाती है जिनके साथ एक जैसा शोषण और बलिदान की कथा प्रचारित है ।
जिसमे थॉमस का मद्रास के हिल टॉप पर , दुष्ट ब्राह्मण द्वारा वध करना हो या जीसस का क्रुसिफिक्सन के बाद जीवित हो कर भारत मे आना और कश्मीर की राजकुमारी से विवाह करना और भारतवासियों द्वारा पत्थरबाजी करके जीसस को भारत से भगा देना ।

ये सभी कहानियों केवल ब्राह्मणों और हिन्दुओ को बदनाम करने के लिए गढ़ी गई ।
दूसरी ओर ऐसी कहानियां प्रचारित करने का एक यह भी उद्देश्य था कि ईसायत कोई पाश्चात्य साम्राज्यवादी देशो द्वारा नही लाई गई अपितु भारतीय परंपरा से निकला sect है जैसे बौद्ध आदि मत निकले , जिसमे सेंट थॉमस मालाबार में पहले चर्च की स्थापना की और यही तमिल वासियों और बहुजन (गैर ब्राह्मण हिन्दुओ) का ओरिजनल धर्म है ।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सीरियन चर्च ने भी सेंट थॉमस को पैतृक जमीन भारत पर अपना अधिकार जताता है , क्योकि सेंट थॉमस भारत मे जीसस के लिए क्रुसेड किया और बलिदान दिया ।
रोमन चर्च इस बात से इनकार करता है कि सेंट थॉमस कभी भारत आया यहां तक पोप बेनेडिक्ट 16 वा ने स्पष्ट रूप से इनकार किया था , कि थॉमस कभी भारत यात्रा किया ।
कोंग्रेसी वामपंथियो द्वारा संचालित
The Archaeological Survey of India ने भी कभी भी भारत मे ईसायत के आगमन के इस दावे की कभी जांच नही की ।

सच बताउ तो मित्रो , मुझे इस बात का दुख होता है , कि हिन्दुओ के पास ज्ञान , विज्ञान , अध्यात्म , आयुर्वेद के अगाध मनीषा और विदुषा वाले ग्रन्थ होने के बाद भी कुछ हिन्दू आकर मुझे बताते है कि जीसस भारत मे पढ़े और भारतीय ज्ञानियों की तरह वे रहे । कुछ लोग योगिराज कृष्ण की तुलना जीसस से करते है कहते है कि कृष्ण ने भारत मे गाय चराई और जीसस ने बेथलहम में भेड चराई दोनों ही अपने कौम के रक्षक थे दोनों की शिक्षा एक ही थी न जाने क्या क्या अनगढ़ अप्रमाणिक बाते बताते है । ऐसे भोले मूर्ख हिंदू दया के पात्र है । सीरियन चर्च यह प्रचारित करते है कि सर्वप्रथम मालावार तट के नम्बूदरी ब्राह्मणों के बीच थॉमस ने प्रचार किया और उनके प्रभाव से कई ब्राह्मणों ने पहली शताब्दी में इसाईयत को ग्रहण किये ।

जबकि यह एक झूठ बात है क्योकि पहली शताब्दी में मालाबार में कोई भी नम्बूदरी ब्राह्मण नही रहते थे और न ही भारत मे चौथी शताब्दी से पूर्व कोई क्रिश्चियन हुआ ।

ईसाई शरणार्थी , Thomas of Cana नामक पादरी के नेतृत्व 345 ईसवी में भारत आये और Tiruvanchikulam के आस पास के क्षेत्रों में बस गए धीरे धीरे उन्होंने हिन्दुओ के नैय्यर जाती के बराबर सामाजिक स्थिति को प्राप्त कर लिया ।
इन्हीं लोगो ने ईसायत को the religion of martyrs के रूप में प्रचारित करना शुरू किया था ।

16 वि शताब्दी में इसी को जेसुइट और फ्रांसिस ईसाई मिशनरियों ने Mylapore में हिन्दुओ के नरसंघार और मन्दिर विध्वंश को ढकने के लिए कथाओ को और भी ज्यादा मिर्च मसाला लगाकर प्रचारित करना शुरू किया ।

सेंट थॉमस भारत या पूर्व का धर्मोपदेशक है वाली बात को 1953 ई में रोम द्वारा गढ़ा गया था ।

दुख की बात यह है कि कोंग्रेस समर्थित The Archaeological Survey of India ने कभी भी वहां के चर्चो पर शोध नही कराया कि कैसे वहां चर्च आये जबकि उसी समकालीन की मस्जिदों और इस्लामिक स्मारकों पर शोध किया गया । लेकिन यह काम जर्मन आर्कियोलॉजिस्टो और इतिहासकारो ने किया ।
और कहा , most sixteenth and seventeenth century churches in India contain temple rubble and are built on temple sites.

(भारत में 16 वीं और 17 वीं सदी के चर्च , हिन्दू मन्दिरो के मलबों पर और मन्दिर के स्थानों पर बने है । )

जिसके प्रमाण में वह कपिलेश्वर मन्दिर ,Mylapore beach का प्रमाण देते है ।

Dr. J.N. Farquhar जिन्होंने इस विषय पर दो पुस्तके लिखी है : - ‘The Apostle Thomas in North India’ दूसरी ‘The Apostle Thomas in South India’ . जितमे उन्होंने यह स्वीकार किया है कि हम यह सिद्ध नही कर सकते कि सेंट थॉमस कोई ऐतिहासिक पत्र है ।

Dr. A. Mingana ने भी दो पुस्तके लिखी है : -
‘The Early Spread of Christianity in Asia And the Far East’ और दूसरी ‘The Early Spread of Christianity in India’ जिसमे उन्होंने सेंट थॉमस के विषय मे निर्बद्ध रवैया अपनाया है। उसमें उन्होंने यह कहते हुए उद्धृत किया है :-

"भारत वास्तव इन कथाओं के बीच में ईसाई धर्म के बारे में हमें क्या देता है , यह वास्तव में सिवाय दन्तकथाओ के कुछ नही है । "

A.D. Burnell ने मई 1875 ई में भारतीय पुरातत्व के अपने एक आर्टिकल में लिखा ,

"प्रेरित थॉमस को दक्षिण भारतीय ईसाई धर्म के मूल के रूप में लोगो द्वारा कुछ धार्मिक राय धारण करना बहुत ही आकर्षक है , लेकिन असली सवाल यह है कि, इसके क्या प्रमाण है ? बिना पर्याप्त प्रमाणों के यह असम्भव नही है , कि इसे किसी के द्वारा रद्द कर दिया जाय । दंतकथाओं के लिए इतिहास में कोई जगह नही है । "

Prof. Jarl Charpentier , St. Thomas the Apostle and India में लिखते है कि , " इस बात का कोई भी स्पष्ट प्रमाण नही है कि जीसस के अनुयायी थॉमस या कुछ भी , ने कभी भी दक्षिण भारत या श्रीलंका का भ्रमण किया हो ।

Rev. J. Hough, Christianity in India में लिखते है कि यह कहना सही नही है कि हमारे लॉर्ड जीसस के कोई भी उपदेशक /शिष्य कभी भारत की यात्रा पर आये ।

कुछ आर्कियोलॉजीकल एविडेन्स भी इस ओर इशारा करती है कि मालाबार में बने चर्च 9 वि शताब्दी में पर्सिया से आये Nestorian शरणार्थियों द्वारा निर्मित है ।

इसी तरह न जाने कितने फ्रोड्स इन चर्च द्वारा किये गए यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि बेथलेहम से जीसस का कभी कोई लेना देना नही था , यहां तक बेथलेहम चर्च 4 थी शताब्दी में जबरन पैगन देवता Tammuz-Adonis को हटाकर बनाई गई थी । बेथलेहम को कई बार क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा जीसस का जन्मस्थान के रूप में प्रचारित किया जाता है , जो कि एक निराधार कल्पना मात्र है । Cambridge के historian Michael Arnheim के अनुसार , यह विरोधाभासों और त्रुटिपूर्ण तथ्यों से भरी बात है कि जीसस का जन्म बेथलेहम में हुआ , ओल्ड टेस्टामेंट में उद्धरित यहुदियों के भविष्यवक्ता को जीसस सिद्ध करने के लिए जबरन इस कथा को गढा गया ।

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Monday, July 16, 2018

अरबियों का प्रचीन धर्म कौन सा था ?



अरबियों का प्रचीन धर्म कौन सा था ?

येरुश्लम ( ईज़राईल ) जिसको अरबी में "बैत् अल मुकद्दस" यानी कि पवित्र स्थान बोला जाता है । ईसाई, यहूदी और मुसलमान इसे पवित्र स्थान मानते हैं । जिसमें एक ८ लाख दिनार का एक पुस्तकालय है जो कि तुर्की के गवर्नर ने सुल्तान अब्दुल हमीद के नाम पर बनवाया था ।
# इस पुस्तकालय में हज़ारों की संख्या में प्राचीन पाण्डुलिप्पियाँ संगर्हित हैं जो कि ऊँट की झिल्लियों, खजूर के पत्तों , जानवर के चमड़ों पर लिखी हुईं हैं । इनमें अरबी, इब्रानी, सिरियानी, मिश्री भाषाओं में लिखे भिन्न काल के सैंकड़ों नमूने हैं ।
# इनमें ऊँट कि झिल्ली पर लिखी एक पुस्तक है जिसका नाम है "सैरुलकूल" जो कि अरब के प्रचीन कवियों का इतिहास है । जिसका लेखक है "अस्मई" ।
# इस्लाम के इतिहास में जगद्विख्यात बादशाह हुए हैं जो कि अलिफ लैला की कहानियों के कारण प्रसिद्ध हुए हैं । इनका नाम था "खलीफा हारूँ रशीद" आज से करीब 1336 वर्ष पहले ।
# और यही "अस्मई" नामक लेखक खलीफा के दरबार में शोभायमान था जिसने प्राचीन अरबीयों का इतिहास बड़ी मेहनत से अपनी पुस्तक "सैरुलकूल" में लिखा था ।


तो अस्मई ने बादशाह को दरबार में जो लिखा हुआ इतिहास था वह कुछ ऐसे सुनाया :--

(१) मक्का नगर में एक मंदिर था । जिसको सभी अरबवासी पवित्रस्थान मानते थे । वहाँ दर्शन करने को जाने वाले यत्रीयों के साथ बहुत लूटपाट होती रहती थी और कई बार हत्याएँ होती रहती थीं । जिससे कि यात्रीयों की संख्या में कमी ही देखने को मिलती थी तो ऐसे में अरब की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना ही था । जिसे रोकने के लिए अरब वासियों ने चार ऐसे महीने निश्चित किया जिसे कि "अशहरुलहराम" ( पवित्र मास ) कहा जाता है । इन महीनों में मेला लगता था जिसे कि "अकाज़ " कहा जाता था ।
(२) अकाज़ में कवि सम्मेलन रखा जाता था । दूर दूर से अरबी कवि अपनी कविताएँ ( कसीदे ) पढ़ने के लिए आया करते थे । जिन १० कवियों की कविताएँ सबसे श्रेष्ठ और उत्तम होती थीं । उनको सोने की पट्टियों पर खुदवा कर या फिर ऊँट की झिल्लियों पर या खजूर के पत्तों पर लिखवाकर मक्का मंदिर में सुरक्षित रखा जाता था । और कवि शिरोमणियों को बहुत भारी ईनाम दिए जाते थे ।
(३) ऐसे ही हर वर्ष कवि सम्मेलन होते रहते थे और अरबी कसीदे मक्का के अंदर सुरक्षित रखे जाते थे ।
(४) जब मुहम्मद साहब ने ईस्लाम का झंडा बुलंद करके यहूदियों की खैबर की बस्ती उजाड़ कर मक्का पर आक्रमण किया तो तब वहाँ पर पड़ी 360 मूर्तीयाँ और अरबी कसीदे तहस नहस करवाने शुरू कर दिए । लेकिन मुहम्मद साहब के लशकर में एक "हसन बिन साबित" नाम का अरबी कवि भी था । जो कि साहित्य प्रेमी होने के कारण मुहम्मद साहब के द्वारा हो रहे कसीदों के नाश को सहन न कर सका । और बहुत से बहुमूल्य कसीदे अपने साथ लेकर सुरक्षित मक्का से निकल गया । और उन कसीदों को अपने पास सुरक्षित रखा ।
(५) ये कसीदे "हसन बिन साबित" के देहान्त के बाद उसकी तीसरी पीढ़ी में "मस्लम बिन अस्लम बिन हसान" के पास परम्परा से आए । और उसी समय में बगदाद में एक "खलीफा हारूँ रशीद" नाम का विख्यात साहित्य प्रेमी था । जिसकी चर्चा दूर दूर तक थी । उससे प्रभावित होकर मस्लम ये कसीदे लेकर मदीना से बगदाद रवाना हुआ ।
(६) मसल्म ने वे कसीदे मुझे ( अस्मई को ) दिखाए । जिनकी संख्या 11 हैं । तीन कसीदे तो एक ही कवि जिसका नाम "लबी बिन अख़्तब बिन तुर्फा" के हैं जो सोने के पत्रों पर अंकित हैं । बाकी 8 कसीदे ऊँट की झिल्लियों पर अन्य कवियों के हैं । ये लबी नामक कवि मुहम्मद साहब से 2300 साल पुराना है । { यानि कि आज से 1336 + 2300 = 3636 वर्ष पुराना हुआ }
(७) मस्लम को 'हजरत अमीरुलमोमीन' ने इसके लिए बहुत बड़ा ईनाम दिया है ।

लबि बिन अख़्तब बिन तुर्फा ने जो अरबी शेयर लिखे हैं उनमें से पाँच शेर इस पुस्तक "सैरुलकूल" में लिखे हैं जिनको अस्मई ने बादशाह के दरबार में पेश किया था :-

(1) अया मुबारक -अल- अर्जे युशन्निहा मिन-अल-हिन्द । व अरदिकल्लाह यन्नज़िजल ज़िक्रतुन ।।
अर्थात :- अय हिन्द की पुन्य भूमि तूँ स्तुति करने के योग्य है क्योंकि अल्लाह ने अपने अलहाम अर्थात् दैवी ज्ञान को तुझ पर उतारा है ।

(2) वहल बहलयुतुन अैनक सुबही अरब अत ज़िक्रू । हाज़िही युन्नज़िल अर रसूलु मिन-आल-हिन्दतुन ।।
अर्थात् :- वो चार अलहाम वेद जिनका दैवी ज्ञान ऊषा के नूर के समान है हिन्दुस्तान में खुदा ने अपने रसूलों पर नाज़िल किए हैं ।

(3) यकूलून-अल्लाहा या अहल- अल- अर्ज़े आलमीन कुल्लहुम । फत्तबाऊ ज़िक्रतुल वीदा हक्क़न मालम युनज्ज़िलेतुन ।
अर्थात् :- अल्लाह ने तमाम दुनिया के मनुष्यों को आदेश दिया है कि वेद का अनुसरण करो जो कि निस्सन्देह मेरी ओर से नाज़िल हुए हैं ।

(4) य हुवा आलमुस्साम वल युजुर् मिनल्लाहि तन्ज़ीलन् । फ़-ऐनमा या अख़ीयु तबिअन् ययश्शिबरी नजातुन् ।।
अर्थात् :- व ज्ञान का भँडार साम और यजुर हैं जिनको अल्लाह ने नाज़िल किया है । बस भाईयों उसी का अनुसरण करो जो हमें मोक्ष का ज्ञान अर्थात् बशारत देते हैं ।

(5) व इस्नैना हुमा रिक् अथर नाहिसीना उख़्वतुन् । व अस्ताना अला ऊँदव व हुवा मशअरतुन् ।।
अर्थात् :- उसमें से बाकी के दो ऋक् और अथर्व हैं जो हमें भ्रातृत्व का ज्ञान देते हैं । यो कर्म के प्रकाश स्तम्भ हैं, जो हमें आदेश देते हैं कि हम इन पर चलें ।

अब इन पाँच शेयरों से स्पष्ट है कि लबी नामक कवि वेदों के प्रती कितना आस्थावान था । और उन प्रमाणों को पढ़कर कोई मुसलमान भी नहीं मुकर सकता है क्योंकि वेदों न नाम स्पष्ट आया है । और न हि ये कह सकता है कि ये वो वाले वेद नहीं जिसको आर्य लोग मानते हैं । भारत में ही ब्राह्मणों की पतित शाखा थी जिसको शैख बोला जाता था । वही ईरान होते हुए अरब में बसी है । क्योंकि अरब में घोड़े उत्तम नसल के पाए जाते हैं ( आज भी ) । तो जिस देश में उत्तम घोड़े हों उस स्थान को शैख ब्राह्मणों ने अर्व नाम दिया था । अर्वन् संस्कृत नाम है घोड़े का । और अर्व कहते हैं अश्वशाला को । मुहम्मद साहब के कुछ समय पहले तक अरब में शैवमत, बौद्धमत और वाममार्ग का प्रचार रहा है जिस कारण मुहम्मद साहब को बौद्धों के मूर्तीयों से उग्र घृणा हो गई थी । जिसको उन्होंने बुतपरस्त कहा है । इसका प्रमाण हम अगले लेख में डालेंगे कि मुहम्मद साहब के समय में अरब में कौनसा धर्म प्रचलित था ।

वैदिक साहित्य में बलि



वैदिक साहित्य में बलि

कई बार अम्बेडकर वादी प्रश्न करते है कि सनातन धर्म में बलि प्रथा है. अश्वमेध यज्ञ में घोड़े को मार कर बलि दी जाती ही.
.
इसका उत्तर महर्षि दयानन्द जी के शब्दों में.

(प्रश्न) अश्वमेध, गोमेध, नरमेध आदि शब्दों का अर्थ क्या है?
(उत्तर) इन का अर्थ तो यह है कि—
राष्ट्रं वा अश्वमेधः। अन्नं हि गौः। अग्निर्वा अश्वः। आज्यं मेधः॥
—शतपथब्राह्मणे॥

घोड़े, गाय आदि पशु तथा मनुष्य मार के होम करना कहीं नहीं लिखा। केवल वाममार्गियों के ग्रन्थों में ऐसा अनर्थ लिखा है। किन्तु यह भी बात वाममार्गियों ने चलाई। और जहाँ-जहाँ लेख है वहाँ-वहाँ भी वाममार्गियों ने प्रक्षेप किया है।

देखो! राजा न्याय धर्म से प्रजा का पालन करे, विद्यादि का देनेहारा और यजमान द्वारा अग्नि में घी आदि का होम करना अश्वमेध, अन्न, इन्द्रियां, किरण, पृथिवी आदि को पवित्र रखना गोमेध; जब मनुष्य मर जाय तब उसके शरीर का विधिपूर्वक दाह करना नरमेध कहाता है।

सत्यार्थ प्रकाश ११वे स्म्मुलास से.

मेध शब्द का अर्थ बढ़ाना भी है.

बलि -

बलि का अर्थ भाग निकालना, बलिदान देना है.
गोबलि पूर्णतः वैदिक है क्योंकि उसका एक ही अर्थ है गौ की लिए अंश भाग निकालना. बलि का अर्थ ही है अंश भाग .
राजा यानी शासक बलिह्रत है यानी वह कर भाग लेता है .

बलि का अर्थ वध केवल मूर्ख करते हैं देव बलि भी वैदिक कर्म है तो क्या हिन्दू लोग देवताओं की हत्या करते हैं ? श्वान बलि , काक बलि , पिपीलिका बलि सब नित्य कर्म हैं यानी इनके लिये नित्य अंश भाग निकालना अनिवार्य है .जो लोग गोबलि का अर्थ गो वध करते हैं वे शत प्रतिशत गलत हैं.

-- राष्ट्र के लिए बलिदान

*वयं तुभ्यं बलिहृत: स्याम(अथर्ववेद 12/1/62)*

हम सब मातृभूमि के लिए बलिदान देने वाले हों।..
*अधि श्रियो दधिरे पृश्निमातर: ( ऋ. 1/85/2)*

पृथ्वी को माता मानने वाले देशभक्त सम्मान को अपने अधिकार में रखतेहै।
*उग्रा हि पृश्निमातर:( ऋ.1/23/10)* (पृश्निमातर:) देशभक्त (हि) सचमुच (उग्रा:) तेजस्वी होते है।

*यस्मान्नानयत् परमस्ति भुतम् (अथर्ववेद 10/7/31)*
स्वराज्य से बढ़कर और कुछ उत्तम नहीं है।

*यतेमहि स्वराज्ये(ऋग्वेद 5/66/6)*
हम स्वराज्य के लिए सदा यत्न करें

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इसलिए अर्थ का अनर्थ करने वालों से सावधान रहें.

The Mangarh Massacre and Govind Guru



The Mangarh Massacre and Govind Guru

Reproduced by Dr Vivek Arya

Six years before the infamous Jallianwala Bagh massacre in 1919 there was another brutal repression and massacre which took place on the border of Rajasthan and Gujarat. While this tragedy never seems to have reached our history textbooks, over 1,000 people, all members of Bhil tribe, lost their lives. Mangarh, in the Aravali hills was washed in blood on 17th November 1913.

Bhils, a tribal community living across Maharashtra, Gujarat, Rajasthan and Madhya Pradesh faced great harassment under the old feudal structure and British rule made it worse. By the early 20th century, the Bhils especially in Rajasthan and Gujarat, mostly worker as bonded labour. The great famine of 1899-1900 across the Deccan and the Bombay Presidency claimed over 6 lakh victims and the tribals were among the worst affected. The princely states such as Banswara and Santrampur were particularly affected by the drought.

From this tragedy emerged a social reform movement that aimed at bettering the lot of the marginalised. The movement was led by social reformer Govind Giri, who was also popularly called as Govind Guru. Govind Giri was born to a Banjara family near Dungarpur, Rajasthan in 1874. He served as a bonded labourer in the princely state of Santrampur. It was during the great famine that he started working with the Bhil community. During this time, desperate Bhils had resorted to banditry for survival. He realised that the socio-economic setup and a prevalence of alcohol addiction among the Bhils was to blame for their desperate plight.

Govind Giri was although less educated. But he possessed vision for upliftment if his community. In those days Swami Dayanand, the founder of Aryasamaj and great scholar of Vedas was on a trip to Rajasthan. Govind Giri become disciple of Swami Dayanand and stayed with his wife in the service of him. Swami Dayanand taught him about spirituality and knowledge as mentioned in Vedas. It is worth mentioning that it was Swami Dayanand vision of social upliftment which Govind Giri implemented in Bhil tribe of Rajasthan.

To address the challenges faced by the community, Govind Giri started the Bhagat Movement in 1908. This was a movement to propagate orthodox Hindu practices like vegetarianism and abstaining from alcohol among the Bhils. He also encouraged them to reject bonded labour and fight for their rights.

The princely states of Dungarpur, Banswara and Santrampur where this movement was strongest were quiet vary of this Bhil 'awakening'. The growing awareness among the local Bhils meant that they demanded better wages from the rulers and the British. As they took up arms and stopped work, the local economy suffered.

In October 1913, Govind Giri and his followers reached Mangarh, which was situated in middle of dense forests, on the border of Banswara and Santrampur state. Giri sent out a call to all his followers to gather there for a religious fair on the day of the waning moon in the month of Kartik, corresponding to 13 November. A large havan or sacrificial fire known as Dhuni was to be organised on that day. It is estimated that one and a half lakh Bhils began to gather on Mangarh hill. Rumour spread that they were planning to revolt against the princely states of Banswara and Santrampur, and establish a Bhil state. The worried rulers, turned to the British for help.

The British political representative to the region, R.E Hamilton, decided to take action. The combined forces of the princely states of Banswara, Dungarpur and Santrampur, along with the Bhils Corps of Mewar state (Udaipur) were asked to surround the hill. The operation was commanded by a British army officer, Colonel Sherton, along with Major S. Bailey and Captain E. Stiley. The forces surrounded Mangarh hill on all sides, machine guns and artillery were deployed. An ultimatum was given to the gathered Bhils to disperse by 15th November 1913. When the Bhils refused to surrender and disperse, the gathering was literally bombarded with bullets and artillery fire from all sides. Even automatic machine guns loaded on mules and donkeys were let loose on the crowds at Mangarh hill. Around 1000 to 1500 people are said to have been killed on that day.

After the massacre, hundreds of Bhil protesters including Govind Giri were arrested. On 11th February 1914, a special court found him guilt of waging war against Santrampur and Banswara states. He was sentenced to life imprisonment. Because of his popularity and good conduct, he was however released from jail in 1919 but was banned from entering many of the princely states where he had a strong following. Govind Giri died in 1931 near Limbdi in Gujarat. As a tribute to his legacy and his teachings, the Govind Guru University was established in Godhra, Gujarat in 2015.

Mangarh witnessed one of the bloodiest massacres in the history of British India. And what’s worse, here it wasn't just the British at fault. The princely states turned against their own. Govind Guru contribution in upliftment of society by bringing social reforms in Bhil community is even more remarkable in the aspect that he did not rejected Vedas,Yajna, Yajnopavit etc by saying them as Brahmanical identities. But he tried to implemented them as a reform movement. This is a take home message for Dalits of today who falsely believed that rejecting Vedic Dharma is equivalent to eradication of caste system. they should learn that Vedas neither support caste system nor discriminates between Human on basis of Birth.

Thursday, July 12, 2018

वेद शान्तिप्रद है



वेद शान्तिप्रद है

ओ३म् अयं ते स्तोमो अग्रियो हृदिस्पृगस्तु शन्तम:।
अथा सोमं सुतं पिब।। -ऋ० १/१६/७

शब्दार्थ- (अयम्) यह (अग्रिय:) सबसे पहला, पूर्वजों का भी हितकारी (स्तोम:) स्तुति समूह= वेद-ज्ञान (हृदिस्पृक्) हृदय को स्पर्श करता हुआ (ते) तेरे लिए (शन्तम:) अत्यन्त शान्तिदायक (अस्तु) हो। (अथ:) इसके पश्चात् अर्थात् वेद ज्ञान प्राप्त करके (सुतम्) तय्यार किया गया (सोमम्) संसार का ऐश्वर्य (पिब) पान कर।

व्याख्या- पक्षपातरहित सभी विद्वान् इस बात में सहमत हैं कि वेद संसार में सबसे पुराना ग्रन्थ है। इसलिए इसे अग्रिय कहा है। यह अग्रों का, पहलों का भी हितकारी है। सबसे पहला ज्ञान भगवान्, से मिलना चाहिए, वह वेद है। कणाद महर्षि तो इसी कारण तो वेद की प्रमाणिकता मानते हैं- तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ईश्वरवचन होने से वेद ही प्रमाणता है।

यह वेद 'स्तोम' है, स्तुतिसमूह है। तृण से ब्रह्मपर्यन्त सभी पदार्थों की स्तुति-गुणगाथा- इसमें है। उदाहरण के लिए जीव के सम्बन्ध में कहा है- अपश्यं गोपामनिपद्यमानम्- मैंने अविनाशी और गोप-इन्द्रियों के स्वामी को देखा है। आत्मा को इन्द्रियों से पृथक् तथा अविनाशी कहा है। इसी प्रकार परमात्मा के सम्बन्ध में कहा है- वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमस: परस्तात् (यजु० ३१/१८)= मैंने उस महान्, सूर्यों के प्रकाशक, अज्ञान-अन्धकार से विरहित सर्वव्यापक के दर्शन किये हैं प्रकृति का निरूपण इन शब्दों में हुआ है- एषा सनत्नी सनमेव जातैषा पुराणी परि सर्वं बभूव (अ० १०/८/३०)= यह सदा रहनेवाली प्रकृति सदा से ही विद्यमान है, यह पुराणी= पुरानी होती हुई भी नई सब कार्य्यों में विद्यमान है। इसी भाँति जीवोपयोगी सभी पदार्थों का ज्ञान वेद में कराया गया है, और यह शन्तम: अत्यन्त शान्ति प्रदान करता है। शान्ति तो परमात्मा के दर्शन से होती है, जैसा कि कठोपनिषद् में है-

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा य: करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्।। ५/१२
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहुनां यो विदधाति कामान्।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्ति: शाश्वती नेतरेषाम्।। ५/१३

जो सब पदार्थों का अन्तरात्मा, सबको नियन्त्रण में रखनेवाला, अकेला ही एक प्रकृतिरूपी बीज को अनेक प्रकार का बना देता है, आत्मा में रहनेवाले उस परमात्मा के जो ध्यानी दर्शन करते हैं, उन्हें ही शाश्वत सुख मिलता है, दूसरों को नहीं। वह नित्यों में नित्य, अर्थात् सदा एकरस और चेतनों का चेतन अर्थात् सर्वज्ञ है, वह अकेला सभी की कामनाएं पूरी करता है। उस आत्मस्थ के, जो धीर दर्शन करते हैं, उन्हें ही अखण्ड शान्ति मिलती है, दूसरों को नहीं।

ठीक है, शान्ति परमात्मा के दर्शन से मिलती है किन्तु परमात्मा के सम्बन्ध में यथार्थ ज्ञान वेद से ही मिलता है। तभी तो औपनिषद् महर्षियों ने कहा है- नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्= वेद न जानने वाला उस महान् भगवान् का मनन नहीं कर पाता, अतः वेद का श्रवण, अध्ययन, मनन, चिन्तन, धारण प्रत्येक शान्ति के अभिलाषी का कर्त्तव्य है। इस भाव को लेकर कहा है- हृदिस्पृक्= हृदय को स्पर्श करनेवाला; केवल वाणी से ही वेदमन्त्र को न रटे, हृदय में उनका स्पर्श भी हो। वेद तो है ही परमात्मा का वर्णन
करने के लिए- ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् (१/१६४/३९)- वेद सर्वव्यापक, अविनाशी परमात्मा का ज्ञान कराने के लिए है। भगवान् का आदेश है कि जब इस प्रकार तू इस अग्रिय ज्ञान को हृदयस्पर्शी कर ले, अथा सोम सुतं पिब= तब निष्पादित सोम का-ऐश्वर्य का-पान कर। बहुत सुन्दर बात कही है। पहले ज्ञान, पीछे अनुष्ठान। पहले पदार्थों को जान, पश्चात् उनका यथायोग्य उपयोग कर। ऋषि इसलिए ज्ञान को कर्म से पूर्व स्थान देते हैं।

ध्वनि निकलती है कि यतः वेद तुझे पदार्थों का ज्ञान कराने के लिए तथा तदनुसार कर्म करने के लिए दिया गया है, अतः तू वेद का अध्ययन करके उसके अनुसार जीवन बना और बिता। इसी में सफलता है।

वैदिक कर्मफल सिद्धान्त





वैदिक कर्मफल सिद्धान्त

वैदिक मान्यता है कि जीवात्माएँ कर्म करने में स्वतन्त्र हैं क्योंकि प्रत्येक जीवात्मा को ईश्वर की न्यायव्यवस्था में अपने अच्छे तथा बुरे किए कर्मों का फल भोगना पड़ता है। शुभ कर्मों का फल सुख तथा अशुभ कर्मों का फल दुःख जीवात्माएं भोगती हैं। प्रश्न है कि कर्म क्या है। कर्म शब्द "कृ" धातु से बना है जिसका अर्थ होता है क्रिया करना। संस्कृत के विद्वानों ने कर्म की परिभाषा की है 'यत्क्रियते तत्कर्म' अर्थात् जो किया जाता है उसे कर्म कहते हैं। कर्म का अभिप्राय है चेतन द्रव्य की सोची समझी क्रिया। जड़ द्रव्य की क्रिया कर्म नहीं कहलाती। पृथ्वी का अपनी धूरी पर घूमना, सूर्य की ग्रहों द्वारा परिक्रमा करना क्रिया तो है कर्म नहीं। कर्म उन्हें ही कहते है जो चेतन द्रव्य-आत्मा द्वारा निश्चयपूर्वक क्रिया (रूप में) किये जाते हैं। आंख का झपकना, दिल का धड़कना आदि नैसर्गिक क्रियाएं कर्म के अन्तर्गत नहीं आती।

प्रश्न यह होता है कि कर्म का आरंभ कब से हुआ? इसका सीधा उत्तर है कि जब से शरीर तथा आत्मा का सम्बन्ध हुआ। यहां यह जानना आवश्यक है कि जिस प्रकार सृष्टि प्रवाह से अनादि है इसी प्रकार जीव तथा शरीर का सम्बन्ध अनादि है इसलिए कर्म भी प्रवाह से अनादि है। अत: कर्म का आरम्भ नहीं होता। कर्म और जीवात्मा का स्वाभाविक सम्बन्ध है अतः जीवात्मा बिना कर्म के नहीं रह सकता। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में 'स्वतंत्र कर्त्ता' सूत्र द्वारा कहा कि कर्त्ता कर्म करने में स्वतन्त्र है। कर्त्ता यदि चाहे तो कल्याण का कार्य अर्थात् परोपकार करे, दीन-दुखियों की सेवा करे अथवा अशिव अर्थात् अन्याय, अत्याचार, चोरी, बलात्कार करे। परन्तु उसका फल उसके हाथ में नहीं है। जैसा कि महाभारत में कहा है: 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'। कर्म करना अधिकार में है परन्तु उसका फल नहीं है। फल दाता दूसरा है।

वेद में एक मन्त्र में स्पष्ट कहा है:-

न किल्विषमत्र नाधारो अस्ति न यन्मित्रै: समममान एति।
अनूनं निहितं पात्रं न एतत् पक्तारं पक्व: पुनराविशति।। -अथर्व १२/३/४८

अर्थ- "कर्मफल के विषय में कोई त्रुटि कभी नहीं होती और किसी की सिफारिश भी नहीं सुनी जाती, ऐसी बातें नहीं होती। यह भी नहीं है कि मित्रों के साथ सङ्गति करता हुआ जा सकता है। कर्मफल रूपी तराजू पूर्ण है बिना किसी घटा-बढ़ी के सुरक्षित रखी है। पकाने वाले को पकाया हुआ पदार्थ, कर्मफल के रूप में आ मिलता है, प्राप्त हो जाता है।"

उपर्युक्त मन्त्र में स्पष्ट किया गया है कि ईश्वरीय न्याय व्यवस्था में प्रत्येक को उसके कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होता है। यदि धर्म के मार्ग पर चलकर कल्याणार्थ कर्म है तो इसका फल पुण्य तथा अधर्मपूर्ण कार्य है तो पाप फल प्राप्त होगा। जिसे हम दूसरे शब्दों में धर्म वाले कार्य का फल स्वर्ग (सुख) तथा अधर्म वाले कार्य का फल नरक (दुःख) भोगना पड़ेगा ऐसा कहते हैं। कहा भी है-

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।

प्रत्येक जीव को अपने किये हुए अच्छे एवं बुरे कर्मों के फल को भोगना पड़ता है।

कर्म कितने प्रकार के हैं यदि हम इस विषय में विचार करें तो कर्म का साधन मन, वाणी और शरीर हैं। इनकी दृष्टि से कर्म तीन प्रकार के होते हैं- मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक। प्रकृति के तीन गुण होते हैं- सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण। इन्हीं गुणों के आधार पर जो कर्म किये जाते हैं उन्हें सात्विक, राजसिक, सामसिक कर्म कहते हैं। मनु महाराज ने सात्विक कर्मों की व्याख्या इस प्रकार की है-

वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धर्मक्रियात्मचिंता च सात्विकं गुण लक्षणम्।। -मनु. १२/३१

अर्थ- जो वेदों का अभ्यास, धर्मानुष्ठान, ज्ञान की वृद्धि, पवित्रता की इच्छा, इन्द्रियों का निग्रह, धर्म के कार्य और आत्मा का चिंतन होता है यही सत्वगुण का लक्षण है। (स. प्र. नवम समु.)

जो कर्म अहंकार और फल की कामना से अति प्रपण के साथ किया जाता है वह रजोगुणी कहा जाता है। (गीता १८/२४)

लोभ, अत्यन्त आलस्य और निद्रा, धैर्य का अभाव, अत्याचार, नास्तिकता, एकात्मता का अभाव, जिस किसी से मांगना, प्रमोद अर्थात् मद्यपानादि और दुष्ट व्यसनों में फंसना यह तमोगुण के लक्षण हैं। -मनु. १२/३३

कुछ कर्मों का फल दृष्य होता है जो इस लोक और इस जन्म में प्राप्त होता है, और अन्य कर्मों का फल अदृष्य है जन्म-जन्मान्तर में मिलता है। जिसे जीव उपर्युक्त कर्मानुसार भोगता है।

फल की दृष्टि से कर्म का एक अन्य विभाजन तीन प्रकार से किया गया है- संचित, प्रारब्ध तथा क्रियमाण। मनुष्य जो कर्म करता है उसे क्रियमाण कहते हैं। जन्म जन्मान्तर के किये हुए तथा उन कर्मों का कोष जिनका फल नहीं प्राप्त हुआ है उन्हें संचित कर्म कहते हैं। संचित कर्मों से जिन कर्मों का फल हम वर्तमान में भोग रहे हैं उसे ही प्रारब्ध कहते हैं इसी प्रारब्ध को लोग दूसरे शब्दों में 'भाग्य' कहते हैं। भाग्य ईश्वर की ओर से नहीं होता अपितु जीवों के कर्मों का कर्मफल ही भाग्य है।

कुछ विचारकों ने कर्म के दो रूप बताये हैं- सकाम कर्म तथा निष्काम कर्म। इस संसार में कामना के बिना कोई कर्म नहीं होता, मनुष्य जो भी कर्म करता है वह कामना के द्वारा ही करता है। संसार में कोई कर्म निष्काम नहीं होता। उसे भले ही मनोभावों से निष्काम बनाया जाय। जैसे माता-पिता अपने सन्तान का जन्म से पालन-पोषण करते हैं एवं ईश्वर की भक्ति पावन कर्म है किन्तु स्वार्थ एवं मुक्ति की कामना न रख कर किया जाए। लोग इन्हें ही निष्काम कर्म की संज्ञा देते हैं।

कतिपय लोगों का मानना है कि ईश्वर ही जीवों से अच्छे बुरे कर्म करवाता है। परन्तु यह भ्रांत धारणा है क्योंकि जीव कर्म करने में स्वतन्त्र है। यदि ईश्वर कर्म कराता होता, जीव कोई भी पाप कर्म न करता क्योंकि परमात्मा पवित्र एवं धार्मिक होने से किसी जीव को पाप करने की प्रेरणा नहीं करता है अतः जीव कर्म करने में पूर्ण स्वतन्त्र है। जीवात्मा और कर्म का स्वाभाविक सम्बन्ध है अतः जीवात्मा बिना कर्म किये नहीं रह सकता इसलिए वेद में कहा है-

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समा:।
एवन्त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे। -यजु ४०/२

अर्थ- "परमात्मा आदेश करते हैं कि ऐ मनुष्यो आलस्य त्यागकर सत्कर्मों को करते हुए सौ वर्ष या उससे अधिक जीने की शुद्ध मन से कामना करो। क्योंकि यही मनुष्य के लिए श्रेष्ठ मार्ग है। ऐसा करने वाला मनुष्य कर्म में लिप्त नहीं होता। इसके अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं है।"

उपर्युक्त मन्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य निष्क्रिय या निष्कर्म होकर जीने की कभी इच्छा न करे। जीवन भर सत्कर्म करते हुए, सेवा कर्म करते हुए जीवे। निठल्ला, निष्क्रिय या निष्कर्म होकर न जीवे क्योंकि कर्म ही मनुष्य की शोभा है। मानव जीवन की सार्थकता है। कर्म ही पूजा है, कर्म ही उन्नति का मार्ग है और सफलता की कुंजी है। चारों वेदों में सर्वत्र मनुष्य को श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देते हुए जीवन में उन्नति, सौभाग्य और धन अर्जन कर दानादि देकर समाज, देश तथा राष्ट्र के कल्यार्थ कर्म करना उसका परम कर्तव्य बताया गया है। महर्षि दयानंद जी श्रेष्ठ कर्म करने के लिए सदैव प्रेरित करते रहे, उनका मानना था कि मानव धर्म श्रेष्ठ है तथा मानवता के कल्याण में मनसा, वाचा, कर्मणा संलग्न रहना चाहिए। वह देश ही सुखी, सम्पन्न तथा स्वस्थ माना जाता है जहां के लोग कर्मशील व धार्मिक हों। इसलिए ही ज्ञान, कर्म तथा उपासना को भौतिक सुख तथा अध्यत्मिक आनन्द प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन माना गया है। इससे हम जहां सांसारिक जीवन को सुखी बना सकते हैं वहीं हम ईश्वर प्राप्ति कर मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। कर्मफल का मूल उद्देश्य सद्गुणों का विकास कर सुधार करना है।

कई लोग यह प्रश्न करते हैं कि ईश्वर ने जीव को क्यों बनाया? न जीव को बनाता, न जीव इस ईश्वर की दुःखमयी सृष्टि में दुःख भोगता। उन्हें जानना चाहिए कि ईश्वर ने जीव को नहीं बनाया बल्कि ईश्वर, जीव तथा प्रकृति तीन अनादि सत्ताएं हैं। जिन्हें न कोई बना सकता है न नष्ट कर सकता है। ईश्वर की सृष्टि व्यवस्था में जीव को शरीरधारी बनाकर उसको भोग और कर्म करने का अवसर प्रदान किया गया है। जीव स्वतन्त्रता पूर्वक पुण्य का कार्य करके सुख प्राप्त करे तथा यदि पाप कर्म करे तो उसे दुःख प्राप्त होगा। इसी प्रकार जो लोग जीव को ईश्वर का अंश मात्र मानते हैं वह कर्मवाद पर पूर्ण विचार नहीं करते। जीव को ईश्वर का अंश मानना तो ईश्वर को अखण्ड तथा अखण्डनीय मानने से इन्कार करना है। यह दोष ईश्वर पर लागू होगा। जैसे ईश्वर का एक अंश, ईश्वर के दूसरे अंश के यहां चोरी करे, बलात्कार करे, हत्या करे आदि बुरे कर्म को दूसरा अंश पुलिस में रिपोर्ट करे, ईश्वर का अंश पकड़ा जाए, वाद न्यायालय जाए में एक अंश उसे दोषी माने और दण्ड दे। ईश्वर का एक अंश पाप कर्म करे और दूसरा अंश दण्ड दे। जीव को ईश्वर का अंश मानना न तर्कपूर्ण है न वैज्ञानिक है। हां ऐसी काल्पनिक बात तो कल्पना मात्र ही है। ईश्वर पर दोषारोपण है। सत्यता यह है कि जीव सूक्ष्म है, परमात्मा सूक्ष्मतम है, दोनों में व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है।

ईश्वर की सृष्टि में जीव को सुख और दुःख दोनों प्राप्त होते रहते हैं क्योंकि दोनों की आवश्यकताएं हैं। यदि जीव को केवल सुख प्राप्त हो तो वह भी कुछ दिनों के बाद दुःख लगने लगता है और दुःख तो दुःख ही है। "सुख तो आत्मा का भोजन एवं वरदान है और दुःख अमृत और औषध।" सुखी होकर आत्मा अच्छे एवं इष्ट काम करने को उत्साहित होता है और दुःख दोनों आत्म विकास के श्रेष्ठ साधन हैं। अतः सुख-दुःख जीव के कर्मों का फल है।

लेखक- कामता प्रसाद मिश्र

वेद में राष्ट्र का मानचित्र



वेद में राष्ट्र का मानचित्र

भद्रसेन

आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्य: शूरऽइषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशु: सप्ति: पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठा: सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नऽओषधय: पच्यन्तां योगक्षेमो न: कल्पताम्।। -यजु० २२/२२

विशेष- वेद इस मन्त्र में राष्ट्र का मानचित्र चित्रित कर रहा है, कि इस प्रशासनिक व्यवस्था के किस-किस विभाग का कैसा-कैसा रूप रंग हो? जैसे कि नक्शे में मिट्टी के भेद से प्रदेशों का रूप दर्शाया जाता है अथवा मैदानी, पहाड़ी, रेतीले, पठारी, समुद्रीय स्थलों को भिन्न-भिन्न रूपों में प्रदर्शित किया जाता है अथवा रेलों, सड़कों, नदियों को विशेष संकेतों से संकेतित किया जाता है। ऐसे ही इस मंत्र में राष्ट्र के जीवन को शब्दगत रूप दिया गया है। राष्ट्र शब्द देश के अर्थ में प्रचलित हो गया है, पर मूल रूप में वह एक प्रशासनिक व्यवस्था है। जीवन शब्द किसी के जीवन्त=जीते-जागते, चाहे जाने वाले रूप को दर्शाता है।

शब्दार्थ- ब्रह्मन्!= हे सब से महान्! बड़ों से भी बड़े! [हमारे] राष्ट्रे= नियम, व्यवस्था में चलने वाले देश में ब्राह्मण= बुद्धिजीवी, योजनाओं को सोचने वाले ब्रह्मवर्चसी= ब्रह्म तेज युक्त, अपने ज्ञान के अनुकूल जीने वाले, अपने ज्ञान को सार्थक करने में समर्थ, साक्षर [स+अक्षर] अक्षर= ज्ञान के अनुरूप आ जायताम्= शोभायमान हों। ऐसे ही राजन्य:= राज-काज का कार्य करने वाले शूर:= आगे बढ़ कर कार्यकर्ता, निर्भय, साहसी, बिना डरे निर्णय लेने वाले इषव्य:= निशानची [जरूरत होने पर] रक्षा की व्यवस्था के लिए अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में कुशल अतिव्याधी= हर प्रकार के रोगों से दूर अर्थात् पूर्णतः स्वस्थ महारथ:= अच्छे से अच्छे वाहनों से युक्त आ जायताम्= [इन गुणों से] अच्छी प्रकार से युक्त हों। धेनु:= दूध देने वाले पशु दोग्ध्री:= अच्छा दोहन करें, अच्छी मात्रा में दूध दें या वाले हों। अनड्वान= भार ढोने वाले [पशु, बैल] वोढा= भार वाहन के कार्य में सफल हों। सप्ति:= यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाले वाहन आशु:= शीघ्र गति से चलने वाले हों। योषा= नारी, देश की महिलायें पुरन्धि= पुरं [अपने] शरीर, परिवार, नगर को धि:= संभालने में समर्थ हों। अस्य= इस यजमानस्य= राष्ट्र यज्ञ के कर्ता-धर्ता के युवा= जवान, पुत्र, नागरिक जिष्णु:= जय की, सफलता की भावना से भरे हुए रथेष्ठा:= रथ, वाहन युक्त, उसके चलाने में सक्षम सभेय:= सभा के योग्य अर्थात् सामाजिक जीवन में उठने-बैठने, रहने-सहने, बोलने-वर्तने में सफल, सिद्ध और वीर:= दुष्टता को हटाने वाले, अपनेपन में अडिग, सत्य पर अटल जायताम्= [इन गुणों से भरे हुए] हों। हम राष्ट्रवासी कामे-कामे= जब-जब, जहां-जहां चाहें वहां-वहां इच्छानुसार न:= हमारी पर्जन्य:= जल व्यवस्था [का कर्ता बादल] निनि वर्षतु= निश्चित रूप से पहुंचे, सफल हो, वर्षा बरसे। जिससे न:= हमारी ओषधय:= गेहूं, चना ,धान, जौ, तिल, सौंफ आदि अन्न फलवत्य:= पकें फलें जिससे न:= हम सब देशवासियों के लिए योग= अप्राप्त की प्राप्ति, क्षेम= प्राप्त का संरक्षण। रूपी अर्थशास्त्र के सिद्धांत। कल्पन्ताम्= सार्थक हों, पूर्ण हों, चरितार्थ हों। अर्थात् हमारा राष्ट्र भौतिक और नैतिक प्रगति से भरपूर हो।

व्याख्या- मन्त्र में राष्ट्र शब्द सप्तमी विभक्ति में है। जिसमें ['आधारो ऽधिकरणम्' पा.१/४/४५] आधार= सहारा बनने वाले का संकेत है। अतः उसी का यह सारा अंग-उपांग सहित वर्णन है। यहां राष्ट्र का अर्थ (जो कि सीमित रूप में लें तो) होगा- अच्छी प्रशासनिक व्यवस्था, ईकाई। प्रत्येक अपनी और अपनों के जान-माल की सुरक्षा चाहता है। वहीं सभी तरह की प्रगतियाँ होती हैं। शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते। और कोई वहीं ही रहना चाहता है। राष्ट्र= (प्रशासनिक व्यवस्था) का विपरीत शब्द है अराजकता= राज्य, राजा का अभाव अर्थात् जहां जान-माल असुरक्षित हो, जहां व्यवस्था का अभाव हो, सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जहां।

ब्राह्मण:- जन्मना वर्ग विशेष के लिए रूढ़ प्रसिद्ध हो गया है। पर ब्रह्म से ब्राह्मण बनता है और ब्रह्म= ईश्वर, वेद= ज्ञान के अर्थ में प्रसिद्ध है। अतः ईश्वर-विश्वासी, पढ़ा-लिखा, समझदार ही ब्राह्मण है। मन्त्र में ब्राह्मण के साथ ब्रह्मवर्चसी युक्त होकर आया है अर्थात् ब्रह्मतेज से युक्त। अपनी विद्या को सार्थक करने वाला। इस एक विशेषण से ही उसका सारा परिचय दे दिया गया है। जिसको सिद्ध या सिद्धहसत भी कह सकते हैं। राजन्य:- राज= प्रशासन से सम्बद्ध विधान-कार्य-न्यायपालिका आते हैं। वैसे 'सप्तांग राज्यमुच्यते' कहा गया है। न्याय-कार्य के अंतर्गत ही सुरक्षा, सेना-पुलिस को लिया जा सकता है। मन्त्र में राजन्य के चार विशेषण आये हैं। शूर:= विधान को लागू करने में निर्भय, साहसी इषव्य:= सुरक्षा की दृष्टि से हथियारों के प्रयोग में प्रवीण अतिव्याधी-रोगरहित, स्वस्थ, सुदृढ़ महारथ:- वाहन संचालन, रख-रखाव-सुधार में कुशल। जिससे सारी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए सर्वत्र सरलता से समुपस्थित होना सक्षम हो।

अस्य यजमानस्य- यजमान= यज्ञ करने वाले को कहते हैं और अस्य सर्वनाम है, अतः वह यजमान या उसके यज्ञ को स्पष्ट कर रहा है। क्योंकि ऊपर राष्ट्रे शब्द आया है। अतः अस्य से उस राष्ट्रयज्ञ की ही चर्चा है। इस राष्ट्रयज्ञ के करने वाले के युवा= जवान, पुत्र, नागरिक राष्ट्र के विशेष पदों पर आसीनों की दृष्टि से सारे नागरिक युवा पुत्र रूप हैं। हां, राष्ट्र के भविष्य की दृष्टि से युवा शब्द विशेष महत्त्वपूर्ण है, वे ही कल के नेता हैं। युवा के जिष्णु, रथेष्ठा, सभेय और वीर रूप से चार विशेषण हैं। अतः राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक इन गुणों से युक्त हो। युवा-शिक्षा द्वारा ही शिशु शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त करके कुमार से युवा वय को प्राप्त होते हैं। अतः शिक्षा का संचलन इस प्रकार से हो कि स्नातक बनने तक शिक्षार्थी में ये गुण साकार हो जायें।

जिष्णु:- जयशील, जीत की भावना से भरा हुआ। यह स्थिति व्यक्ति में आत्मविश्वास से ही आती है। अन्यथा व्यक्ति निराश, उदास, हताश होता है और वह तब रचनात्मक सोच वाला न होकर निराशावादी ही हो जाता है।

रथेष्ठा:- रथ में बैठने वाला और रथ शब्द उस वाहन के लिए प्रयुक्त होता है जो तेज गति वाला तथा बैठने में आरामदायक हो। जैसे कि आजकल की कारें। पुराने रथ भी बैलगाड़ी से तेज गति वाले और बैठने में सुविधाजनक होते हैं।

सभेय:- सभा के योग्य को सभेय कहते हैं। जो कि शिष्ट, विनीत, अनुशासित, सामाजिक के लिए आता है। यह शब्द सभा शब्द के ढक्>एय प्रत्यय लगने पर बनता है। सभा- स+सभा= साथ-साथ चमकना, रहना, वर्तना अर्थात् समाज, समूह में जीने में निपुण। अतः जो समाज में रहने ,उठने-बैठने, वर्तने-बोलने, जीने में सक्षम।

वीर:- आगे बढ़ने की भावना से भरा हुआ, न घबराने वाला, धैर्यशील कर्म विपदा-शत्रु से जूझने वाला। दोग्ध्री: धेनु:- गाय को धेनु उन दिनों कहा जाता है, जिन दिनों वह दूध देती है। अतः हमारे दुधारू पशु पर्याप्त दूध देने वाले हों। कौन दूध कितना गुणकारी है तथा किस प्रकार प्रभूतमात्रा में प्राप्त होता है। ये विचार स्वतः इसके अंतर्गत आ जाते हैं।

वाहन दोनों प्रकार के प्रारम्भ से प्रचलित रहे हैं। मन्त्र वोढानड्वान्, आशु सप्ति: शब्दों से यही चित्रित कर रहा है। भार और यात्रियों को इधर-उधर लाने ले जाने की भावना मन्त्र के अनुरूप आज भी प्रचलित है। योषा पुरन्धि:- राष्ट्र की महिलाएं अपने पुर= देह, परिवार, नगर, देश आदि को संभालने में सब प्रकार से समर्थ हों। धि- संभाल शब्द बहुत ही व्यापक अर्थ वाला है। जैसे सन्तान की संभाल में सन्तान का उत्पादन-पालन विकास और विकासार्थ शिक्षा, चिकित्सा आदि सभी आते हैं। ऐसे ही पुर के सभी सदस्यों की सभी तरह की जरूरतों की सम्भाल को पुरन्धि शब्द अपने में समेटे हुए हैं।

पर्जन्य:न:कामे-कामे नि वर्षतु- हम जहां-जहां, जब-जब चाहें, वहां-वहां तब-तब बादल (जल) बरसे। यहां जहां इच्छा के अनुरूप बरसने की प्रार्थना है। वहां इससे यह संदेश भी है, कि हम अपनी इच्छा, सुविधा के अनुसार जल की व्यवस्था करें। जैसे कि आजकल आधुनिक भवनों में जल की योजना दृगोचर उपलब्ध होती है।

न: ओषधय: फलवत्य: पच्यन्ताम्- जल की व्यवस्था हो जाने पर हमारी फसलें दानों से भरकर पकें। प्राचीन संस्कृतभाषा में ओषधि शब्द जड़ी-बूटियों की अपेक्षा अनाजों- जौ, धान आदि के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। जैसे कि ओषधय: फलपाकान्ता: मनुस्मृति १/४६, चरक सूत्र १/७३ में आया है अर्थात् फल पकने के साथ जिस का पौधा, बूटा सुख जाए। वैसे फलवत्य: विशेषण और पच्यन्ताम् क्रिया जहां आई हुई हैं। जो कि इस अर्थ को पुष्ट करती हैं क्योंकि फसलें इन दोनों स्थितियों में अधिक सार्थक होती है।

योगक्षेमो न: कल्पताम्- मन्त्र निर्दिष्ट सारी व्यवस्थाएं चरितार्थ हो जाने पर हम राष्ट्रवासियों को योग= अप्राप्त की प्राप्ति और क्षेम प्राप्त का संरक्षण रूपी अर्थशास्त्र में प्रतिपादित भौतिक विज्ञान तभी सामने आता है। कल्पन्ताम् क्रिया कायाकल्प की परिभाषा को चरितार्थ करती है, स्मरण दिलाती है। राष्ट्र एक भौतिक रूप की भी संरचना है। भौतिक रूप भौतिक पदार्थों से ही प्रत्यक्ष होता है। अतः मन्त्र में योजनाओं को बनाने वाले योजनाकार, उन योजनाओं को पूर्व के रूप देने वाले कारीगर, सक्रिय कार्यकर्ता, देशनागरिक, महिलाएं, पशु, वाहन, जल-अन्नव्यवस्था जैसे-जैसे हों, इन सब का मानचित्र मंत्र के यौगिक अर्थ रखने वाले शब्द अभिव्यक्त कर रहे हैं। अंत में इन सारी व्यवस्थाओं के सुपरिणाम को दर्शाते हुए कहा कि ऐसा होने पर ही किसी देश की समृद्धि सुरक्षित रूप में उसके कायाकल्प को प्रत्यक्ष कराती है।