Thursday, April 11, 2019

Science In Vedas



Science In Vedas
Vedic knowledge is a form of Pure science. Read few mantras from Vedas which speaks about Science in Vedas.
MOTION OF EARTH
Rig Veda 10.22.14
“This earth is devoid of hands and legs, yet it moves ahead. All the objects over the earth also move with it. It moves around the sun.
In this mantra,
Kshaa = Earth (refer Nigantu 1.1)
Ahastaa = without hands
Apadee = without legs
Vardhat = moves ahead
Shushnam Pari = Around the sun
Pradakshinit = revolves
Rig Veda 10.149.1
“The sun has tied Earth and other planets through attraction and moves them around itself as if a trainer moves newly trained horses around itself holding their reins.”
In this mantra,
Savita = Sun
Yantraih = through reins
Prithiveem = Earth
Aramnaat = Ties
Dyaam Andahat = Other planets in sky as well
Atoorte = Unbreakable
Baddham = Holds
Ashwam Iv Adhukshat = Like horses
GRAVITATIONAL FORCE
Rig Veda 8.12.28
“O Indra! by putting forth your mighty rays, which possess the qualities of gravitation and attraction-illumination and motion – keep up the netire universe in order through the Power of your attraction.”
Rig Veda 1.6.5, Rig Veda 8.12.30
“O God, You have created this Sun. You possess infinite power. You are upholding the sun and other spheres and render them steadfast by your power of attraction.
Yajur Veda 33.43
“The sun moves in its own orbit in space taking along with itself the mortal bodies like earth through force of attraction.”
Rig Veda 1.35.9
“The sun moves in its own orbit but holding earth and other heavenly bodies in a manner that they do not collide with each other through force of attraction.
Rig Veda 1.164.13
“Sun moves in its orbit which itself is moving. Earth and other bodies move around sun due to force of attraction, because sun is heavier than them.
Atharva Veda 4.11.1
“The sun has held the earth and other planets”
LIGHT OF MOON
Rig Veda 1.84.15
“The moving moon always receives a ray of light from sun”
Rig Veda 10.85.9
“Moon decided to marry. Day and Night attended its wedding. And sun gifted his daughter “Sun ray” to Moon.”
ECLIPSE
Rig Veda 5.40.5
“O Sun! When you are blocked by the one whom you gifted your own light (moon), then earth gets scared by sudden darkness.”
SCIENCE OF TELEGRAPHY
Rig Veda 1.119.10
“With the help of bipolar forces (Asvins), you should employ telegraphic apparatus made of good conductor of electricity. It is necessary for efficient military operations but should be used with caution.”
Source-Facebook

Tuesday, April 9, 2019

देश में बस रहे बंगलादेशी और रोहिंग्या मुसलमान की समस्या



सलंग्न चित्र-रोहिंग्या मुस्लिम

देश में बस रहे बंगलादेशी और रोहिंग्या मुसलमान की समस्या
डॉ विवेक आर्य
चुनावी माहौल है। राजनीतिक दल दुकानों पर लगने वाली सेल के समान रेवड़ियां बाँट रहे है। मगर देश में बस रहे बंगला देशी और रोहिंग्या मुसलमान की समस्या को लेकर गंभीरता जो दिखनी चाहिए। वह नहीं दिख रही है। केवल आसाम में इस समस्या को लेकर कुछ प्रयास हुए है। पर उसका भी संतोषजनक परिणाम आना बाकि है। असम में घुसपैठ के खिलाफ चले आंदोलन के कारण 1981 के बाद घुसपैठिये असम की बजाय प.बंगाल और उत्तर प्रदेश में जाकर बसने लगे। 1981 से 1991 के बीच राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम जनसंख्या वृद्धिदर 32.90 प्रतिशत थी पर प. बंगाल के जलपाईगुड़ी जिला में यह 45.12 प्रतिशत, दार्जिलिंग जिला में 58.55 प्रतिशत, कोलकाता जिला में 53.75 प्रतिशत तथा मेदनीपुर जिला में 53.17 प्रतिशत थी। पश्चिम बंगाल की ही तरह उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिला में यह 46.77 प्रतिशत, मुजफ्फरनगर जिला में 50.14 प्रतिशत, गाजियाबाद जिला में 46.68, अलीगढ़ 45.61, बरेली में 50.13 प्रतिशत तथा हरदोई जिला में 40.14 प्रतिशत थी। सबसे आश्चर्यजनक उप्र का सीतापुर जिला, जहां मुस्लिम जनसंख्या प्रतिशत 129.66 प्रतिशत था।
1991 से 2011 के बीच राष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या वृद्धि दर 44.39 प्रतिशत, हिंदू वृद्धि दर 40.51 प्रतिशत तो मुस्लिम जनसंख्या वृद्धिदर 69.53 प्रतिशत थी, पर अरुणाचल में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 126.84 प्रतिशत, मेघालय में 112.06, मिजोरम में 226.84, सिक्किम में 156.35, दिल्ली में 142.64, चण्डीगढ़ में 194.36 तथा हरियाणा में 133.22 प्रतिशत थी। मुस्लिम जनसंख्या में हुई यह अप्रत्याशित वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि बांग्लादेश और म्यांमार से मुस्लिम घुसपैठिये भारतीय राज्यों में बस रहे हैं। 1961 में देश की जनसंख्या में मुस्लिम जनसंख्या 10.7 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 14.22 प्रतिशत हो गई है। यानी 50 वर्ष में मुस्लिम जनसंख्या में 3.52 प्रतिशत की वृद्धि तब हुई है जबकि इसमें घुसपैठियों को भी शामिल किया गया है। इसी दौर में प. बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या 20 प्रतिशत से बढ़कर 27.01 प्रतिशत, तो बिहार के पूर्णिया, किशनगंज, अररिया और कटिहार जिला में 37.61 प्रतिशत से बढ़कर 45.93 प्रतिशत हो गई है।
जैसे ही यह मुद्दा उठता है। वामदल, तृणमूल कांग्रेस से लेकर शहरी नक्सली आदि यथासंभव शोर मचाने लगते हैं। उन्हें लगता है कि अवैध शरणार्थी उनके वोट बैंक हैं। यह सत्य है कि अनेक नेताओं ने अवैध शरणार्थियों के राशन कार्ड ,आधार कार्ड एवं वोटर कार्ड बनवाकर उन्हें देश में बसाने के लिए पुरजोर प्रयास किया हैं। इन लोगों ने देश को सराय बना डाला हैं क्यूंकि ये लोग केवल तात्कालिक लाभ अपनी कुर्सी के लिए केवल तात्कालिक लाभ देखते है। भविष्य में यही अवैध शरणार्थी एकमुश्त वोट-बैंक बनकर इन्हीं नेताओं की नाक में दम कर देंगे। इससे भी विकट समस्या यह है कि बढ़ती मुस्लिम जनसँख्या भारत के गैर मुसलमानों के भविष्य को लेकर भी एक बड़ी चुनौती उपस्थित करेगी। क्यूंकि इस्लामिक सामाज्यवाद की मुहीम के तहत जनसँख्या समीकरण के साथ मुसलमानों का गैर मुसलमानों के साथ व्यवहार में व्यापक परिवर्तन हो जाता हैं।
2005 में समाजशास्त्री डा. पीटर हैमंड ने गहरे शोध के बाद इस्लाम धर्म के मानने वालों की दुनियाभर में प्रवृत्ति पर एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है ‘स्लेवरी, टैररिज्म एंड इस्लाम-द हिस्टोरिकल रूट्स एंड कंटेम्पररी थ्रैट’। इसके साथ ही ‘द हज’के लेखक लियोन यूरिस ने भी इस विषय पर अपनी पुस्तक में विस्तार से प्रकाश डाला है। जो तथ्य निकल करआए हैं, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि चिंताजनक हैं।
उपरोक्त शोध ग्रंथों के अनुसार जब तक मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश-प्रदेश क्षेत्र में लगभग 2 प्रतिशत के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसंद अल्पसंख्यक बन कर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते। जैसे अमरीका में वे (0.6 प्रतिशत) हैं, आस्ट्रेलिया में 1.5, कनाडा में 1.9, चीन में 1.8, इटली में 1.5 और नॉर्वे में मुसलमानों की संख्या 1.8 प्रतिशत है। इसलिए यहां मुसलमानों से किसी को कोई परेशानी नहीं है।
जब मुसलमानों की जनसंख्या 2 से 5 प्रतिशत के बीच तक पहुंच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलंबियों में अपना धर्मप्रचार शुरू कर देते हैं। जैसा कि डेनमार्क, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन और थाईलैंड में जहां क्रमश: 2, 3.7, 2.7, 4 और 4.6 प्रतिशत मुसलमान हैं।
जब मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश या क्षेत्र में 5 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है, तब वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलंबियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिए वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर ‘हलाल’ का मांस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि ‘हलाल’ का मांस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यताएं प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में खाद्य वस्तुओं के बाजार में मुसलमानों की तगड़ी पैठ बन गई है। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्कीट के मालिकों पर दबाव डालकर उनके यहां ‘हलाल’ का मांस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी धंधे को देखते हुए उनका कहा मान लेते हैं।
इस तरह अधिक जनसंख्या होने का फैक्टर यहां से मजबूत होना शुरू हो जाता है, जिन देशों में ऐसा हो चुका है, वे फ्रांस, फिलीपींस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, त्रिनिदाद और टोबैगो हैं। इन देशों में मुसलमानों की संख्या क्रमश: 5 से 8 फीसदी तक है। इस स्थिति पर पहुंचकर मुसलमान उन देशों की सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके क्षेत्रों में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाए। दरअसल, उनका अंतिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व शरीयत कानून के हिसाब से चले।
जब मुस्लिम जनसंख्या किसी देश में 10 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, तब वे उस देश, प्रदेश, राज्य, क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा करना शुरू कर देते हैं, शिकायतें करना शुरू कर देते हैं, उनकी ‘आॢथक परिस्थिति’ का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़-फोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ्रांस के दंगे हों डेनमार्क का कार्टून विवाद हो या फिर एम्सटर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवादको समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है। ऐसा गुयाना (मुसलमान 10 प्रतिशत), इसराईल (16 प्रतिशत), केन्या (11 प्रतिशत), रूस (15 प्रतिशत) में हो चुका है।
जब किसी क्षेत्र में मुसलमानों की संख्या 20 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न ‘सैनिक शाखाएं’ जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरू हो जाता है, जैसा इथियोपिया (मुसलमान 32.8 प्रतिशत) और भारत (मुसलमान 22 प्रतिशत) में अक्सर देखा जाता है। मुसलमानों की जनसंख्या के 40 प्रतिशत के स्तर से ऊपर पहुंच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याएं, आतंकवादी कार्रवाइयां आदि चलने लगती हैं। जैसा बोस्निया (मुसलमान 40 प्रतिशत), चाड (मुसलमान 54.2 प्रतिशत) और लेबनान (मुसलमान 59 प्रतिशत) में देखा गया है। शोधकत्र्ता और लेखक डा. पीटर हैमंड बताते हैं कि जब किसी देश में मुसलमानों की जनसंख्या 60 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है, तब अन्य धर्मावलंबियों का ‘जातीय सफाया’ शुरू किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोडऩा, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है। जैसे अल्बानिया (मुसलमान 70 प्रतिशत), कतर (मुसलमान 78 प्रतिशत) व सूडान (मुसलमान 75 प्रतिशत) में देखा गया है।
किसी देश में जब मुसलमान बाकी आबादी का 80 प्रतिशत हो जाते हैं, तो उस देश में सत्ता या शासन प्रायोजित जातीय सफाई की जाती है। अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है। सभी प्रकार के हथकंडे अपनाकर जनसंख्या को 100 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है। जैसे बंगलादेश (मुसलमान 83 प्रतिशत), मिस्र (90 प्रतिशत), गाजापट्टी (98 प्रतिशत), ईरान (98 प्रतिशत), ईराक (97 प्रतिशत), जोर्डन (93 प्रतिशत), मोरक्को (98 प्रतिशत), पाकिस्तान (97 प्रतिशत), सीरिया (90 प्रतिशत) व संयुक्त अरब अमीरात (96 प्रतिशत) में देखा जा रहा है।
यह आकड़ें सब कुछ स्पष्ट कर रहे हैं।
विकास, गरीबी हटाओ, शिक्षा, नौकरी, स्वास्थ्य , सेना, व्यापार,GST जैसे मुद्दों पर राजनीतिक दल से लेकर मीडिया अनेक प्रकार के चिंतन और मंथन करते दीखते हैं। मगर बंगलादेशी और रोहिंग्या मुसलमान की इस अति महत्वपूर्ण समस्या पर यथोचित कदम उठाने वाली दृढ़ 9राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरा बनकर उभरेगा। इसमें मुझे कोई शंका नहीं हैं।

Sunday, April 7, 2019

कश्मीर का इस्लामीकरण: हिन्दुओं को सीख



कश्मीर का इस्लामीकरण: हिन्दुओं को सीख

डॉ विवेक आर्य

कश्मीर: शैव संस्कृति के ध्वजावाहक एवं प्राचीन काल से ऋषि कश्यप की धरती कश्मीर आज मुस्लिम बहुल विवादित प्रान्त के रूप में जाना जाता हैं। 1947 के बाद से धरती पर जन्नत सी शांति के लिए प्रसिद्द यह प्रान्त आज कभी शांत नहीं रहा। इसका मुख्य कारण पिछले 700 वर्षों में घटित कुछ घटनाएँ हैं जिनका परिणाम कश्मीर का इस्लामीकरण होना हैं। कश्मीर में सबसे पहले इस्लाम स्वीकार करने वाला राजा रिंचन था। 1301 ई. में कश्मीर के राजसिंहासन पर सहदेव नामक शासक विराजमान हुआ। कश्मीर में बाहरी तत्वों ने जिस प्रकार अस्त व्यस्तता फैला रखी थी, उसे सहदेव रोकने में पूर्णत: असफल रहा। इसी समय कश्मीर में लद्दाख का राजकुमार रिंचन आया, वह अपने पैत्रक राज्य से विद्रोही होकर यहां आया था। यह संयोग की बात थी कि इसी समय यहां एक मुस्लिम सरदार शाहमीर स्वात (तुर्किस्तान) से आया था। कश्मीर के राजा सहदेव ने बिना विचार किये और बिना उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा लिए इन दोनों विदेशियों को प्रशासन में महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिये। यह सहदेव की अदूरदर्शिता थी, जिसके परिणाम आगे चलकर उसी के लिए घातक सिद्ध हुए। तातार सेनापति डुलचू ने 70,000 शक्तिशाली सैनिकों सहित कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। अपने राज्य को क्रूर आक्रामक की दया पर छोडक़र सहदेव किश्तवाड़ की ओर भाग गया। डुलचू ने हत्याकांड का आदेश दे दिया। हजारों लोग मार डाले गये।कितनी भयानक परिस्थितियों में राजा ने जनता को छोड़ दिया था, यह इस उद्घरण से स्पष्ट हो गया। राजा की अकर्मण्यता और प्रमाद के कारण हजारों लाखों की संख्या में हिंदू लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ गया। जनता की स्थिति दयनीय थी। राजतरंगिणी में उल्लेख है-‘जब हुलचू वहां से चला गया, तो गिरफ्तारी से बचे कश्मीरी लोग अपने गुप्त स्थानों से इस प्रकार बाहर निकले, जैसे चूहे अपने बिलों से बाहर आते हैं। जब राक्षस डुलचू द्वारा फैलाई गयी हिंसा रूकी तो पुत्र को पिता न मिला और पिता को पुत्र से वंचित होना पड़ा, भाई भाई से न मिल पाया। कश्मीर सृष्टि से पहले वाला क्षेत्र बन गया। एक ऐसा विस्तृत क्षेत्र जहां घास ही घास थी और खाद्य सामग्री न थी।

इस अराजकता का सहदेव के मंत्री रामचंद्र ने लाभ उठाया और वह शासक बन बैठा। परंतु रिंचन भी इस अवसर का लाभ उठाने से नही चूका। जिस स्वामी ने उसे शरण दी थी उसके राज्य को हड़पने का दानव उसके हृदय में भी उभर आया और भारी उत्पात मचाने लगा। रिंचन जब अपने घर से ही बागी होकर आया था, तो उससे दूसरे के घर शांत बैठे रहने की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती थी? उसके मस्तिष्क में विद्रोह का परंपरागत कीटाणु उभर आया, उसने रामचंद्र के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। रामचंद्र ने जब देखा कि रिंचन के हृदय में पाप हिलोरें मार रहा है, और उसके कारण अब उसके स्वयं के जीवन को भी संकट है तो वह राजधानी छोडक़र लोहर के दुर्ग में जा छिपा। रिंचन को पता था कि शत्रु को जीवित छोडऩा कितना घातक सिद्ध हो सकता है? इसलिए उसने बड़ी सावधानी से काम किया और अपने कुछ सैनिकों को गुप्त वेश में रामचंद्र को ढूंढने के लिए भेजा। जब रामचंद्र मिल गया तो उसने रामचंद्र से कहलवाया कि रिंचन समझौता चाहता है। वार्तालाप आरंभ हुआ तो छल करते हुए रिंचन ने रामचंद्र की हत्या करा दी। इस प्रकार कश्मीर पर रिंचन का अधिकार हो गया। यह घटना 1320 की है। उसने रामचंद्र की पुत्री कोटा रानी से विवाह कर लिया था। इस प्रकार वह कश्मीर का राजा बनकर अपना राज्य कार्य चलाने लगा। कहते है कि अपने पिता के हत्यारे से विवाह करने के पीछे कोटा रानी का मुख्य उद्देश्य उसके विचार परिवर्तन कर कश्मीर की रक्षा करना था। धीरे धीरे रिंचन उदास रहने लगा। उसे लगा कि उसने जो किया वह ठीक नहीं था। उसके कश्मीर के शैवों के सबसे बड़े धर्मगुरु देवास्वामी के समक्ष हिन्दू बनने का आग्रह किया। देवास्वामी ने इतिहास की सबसे भयंकर भूल की और बुद्ध मत से सम्बंधित रिंचन को हिन्दू समाज का अंग बनाने से मना कर दिया। रिंचन के लिए पंडितों ने जो परिस्थितियां उत्पन्न की थी, वे बहुत ही अपमानजनक थी। जिससे उसे असीम वेदना और संताप ने घेर लिया। देवास्वामी की अदूरदर्शिता ने मुस्लिम मंत्री शमशीर को मौका दे दिया। उसने रिंचन को सलाह दी की अगले दिन प्रात: आपको जो भी धर्मगुरु मिले। आप उसका मत स्वीकार कर लेना। अगले दिन रिंचन जैसे ही सैर को निकला, उसे मुस्लिम सूफी बुलबुल शाह अजान देते मिला। रिंचन को अंतत: अपनी दुविधा का समाधान मिल गया। उससे इस्लाम में दीक्षित होने का आग्रह करने लगा। बुलबुलशाह ने गर्म लोहा देखकर तुरंत चोट मारी और एक घायल पक्षी को सहला कर अपने यहां आश्रय दे दिया। रिंचन ने भी बुलबुल शाह का हृदय से स्वागत किया। इस घटना के पश्चात कश्मीर का इस्लामीकरण आरम्भ हुआ जो लगातार 500 वर्षों तक अत्याचार, हत्या, धर्मान्तरण आदि के रूप में सामने आया।

यह अपच का रोग यही नहीं रुका। कालांतर में महाराज गुलाब सिंह के पुत्र महाराज रणबीर सिंह गद्दी पर बैठे। रणबीर सिंह द्वारा धर्मार्थ ट्रस्ट की स्थापना कर हिन्दू संस्कृति को प्रोत्साहन दिया। राजा के विचारों से प्रभावित होकर राजौरी पुंछ के राजपूत मुसलमान और कश्मीर के कुछ मुसलमान राजा के समक्ष आवदेन करने आये कि उन्हें मूल हिन्दू धर्म में फिर से स्वीकार कर लिया जाये। राजा ने अपने पंडितों से उन्हें वापिस मिलाने के लिया पूछा तो उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया। एक पंडित तो राजा के विरोध में यह कहकर झेलम में कूद गया की राजा ने अगर उसकी बात नहीं मानी तो वह आत्मदाह कर लेगा। राजा को ब्रह्महत्या का दोष लगेगा। राजा को मज़बूरी वश अपने निर्णय को वापिस लेना पड़ा। जिन संकीर्ण सोच वाले पंडितों ने रिंचन को स्वीकार न करके कश्मीर को 500 वर्षों तक इस्लामिक शासकों के पैरों तले रुंदवाया था। उन्हीं ने बाकि बचे हिन्दू कश्मीरियों को रुंदवाने के लिए छोड़ दिया। इसका परिणाम आज तक कश्मीरी पंडित भुगत रहे हैं।

विडंबना यह है कि आज भी हिन्दू समाज अपने पूर्वजों द्वारा की गई गलतियों से कोई सीख नहीं ले रहा। जैसे कश्मीर में गैर हिन्दुओं का इस्लामीकरण हो गया। आज केरल, असम, बंगाल भी उसी राह पर चल रहे है। न हिन्दुओं में एकता है। न संगठन। न कोई दूरगामी नीति। अधिकांश हिन्दू समाज जातिवाद में विभाजित हैं। बचा हुआ धन के भोग में लीन। किसे पड़ी है धर्म, देश और संस्कृति की रक्षा की। अभी भी समय है। जागो। 

Friday, April 5, 2019

कश्मीर से केरल: सर से लेकर पैर तक एकसमान चुनौती




सलंग्न चित्र- केरल में एक रैली में मुस्लिम लीग समर्थक

कश्मीर से केरल: सर से लेकर पैर तक एकसमान चुनौती
डॉ विवेक आर्य
आजकल केरल का वायनाड चर्चा में है. उत्तर भारत में रहने वाले लोगों को यह संभवत प्रथम बार ज्ञात हुआ कि केरल में एक ऐसा भूभाग है जहाँ पर अहिन्दू (मुस्लिम +ईसाई) जनसँख्या हिन्दुओं से अधिक हैं। बहुत कम हिन्दुओं को यह ज्ञात होगा कि उत्तरी केरल के कोझिकोड, मल्लपुरम और वायनाड के इलाके दशकों पहले ही हिन्दू अल्पसंख्यक हो चुके थे। इस भूभाग में हिन्दू आबादी कैसे अल्पसंख्यक हुई? इसके लिए केरल के इतिहास को जानना आवश्यक हैं।
1. केरल में इस्लाम का आगमन अरब से आने वाले नाविकों के माध्यम से हुआ। केरल के राजपरिवार ने अरबी नाविकों की शारीरिक क्षमता और नाविक गुणों को देखते हुए उन्हें केरल में बसने के लिए प्रोत्साहित किया। यहाँ तक की ज़मोरियन राजा ने स्थानीय मलयाली महिलाओं के उनके साथ विवाह करवाए। इन्हीं मुस्लिम नाविकों और स्थनीय महिलाओं की संतान मपिल्ला/ मापला/मोपला अर्थात भांजा कहलाई। ज़मोरियन राजा ने दरबार में अरबी नाविकों को यथोचित स्थान भी दिया। मुसलमानों ने बड़ी संख्या में राजा की सेना में नौकरी करना आरम्भ कर दिया। स्थानीय हिन्दू राजाओं द्वारा अरबी लोगों को हर प्रकार का सहयोग दिया गया। कालांतर में केरल के हिन्दू राजा चेरुमन ने भारत की पहले मस्जिद केरल में बनवाई। इस प्रकार से केरल के इस भूभाग में मुसलमानों की संख्या में वृद्धि का आरम्भ हुआ। उस काल में यह भूभाग समुद्री व्यापार का बड़ा केंद्र बन गया।
2. केरल के इस भूभाग पर जब वास्को दी गमा ने आक्रमण किया तो उसकी गरजती तोपों के समक्ष राजा ने उससे संधि कर ली। इससे समुद्री व्यापार पर पुर्तगालियों का कब्ज़ा हो गया और मोपला मुसलमानों का एकाधिकार समाप्त हो गया। स्थानीय राजा के द्वारा संरक्षित मोपला उनसे दूर होते चले गए। व्यापारी के स्थान पर छोटे मछुआरे आदि का कार्य करने लगे। उनका सामाजिक दर्जा भी कमतर हो गया। उनकी आबादी मुलत तटीय और ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता में जीने लगी।
3. केरल के इस भूभाग पर जब टीपू सुल्तान की जिहादी फौजों ने आक्रमण किया तब स्थानीय मोपला मुसलमानों ने टीपू सुल्तान का साथ दिया। उन्होंने हिन्दुओं पर टीपू के साथ मिलकर कहर बरपाया। यह इस्लामिक साम्राज्यवाद की मूलभावना का पालन करना था। जिसके अंतर्गत एक मुसलमान का कर्त्तव्य दूसरे मुसलमान की इस्लाम के नाम पर सदा सहयोग करना नैतिक कर्त्तव्य हैं। चाहे वह किसी भी देश, भूभाग, स्थिति आदि में क्यों न हो। टीपू की फौजों ने बलात हिन्दुओं का कत्लेआम, मतांतरण, बलात्कार आदि किया। टीपू के दक्षिण के आलमगीर बनने के सपने को पूरा करने के लिए यह सब कवायद थी। इससे इस भूभाग में बड़ी संख्या में हिन्दुओं की जनसंख्या में गिरावट हुई। मुसलमानों के संख्या में भारी वृद्धि हुई क्यूंकि बड़ी संख्या में हिन्दू केरल के दूसरे भागों में विस्थापित हो गए।
4. अंग्रेजी काल में टीपू के हारने के बाद अंग्रेजों का इस क्षेत्र पर अधिपत्य हो गया। मोपला मुसलमान अशिक्षित और गरीब तो था। पर उसकी इस्लाम के प्रचार प्रसार के उद्देश्य को वह भूला नहीं था। 1919 में महात्मा गाँधी द्वारा तुर्की के खलीफा की सल्तनत को बचाने के लिए मुसलमानों के विशुद्ध आंदोलन को भारत के स्वाधीनता संग्राम के साथ नत्थी कर दिया गया। उनका मानना था कि इस सहयोग के बदले मुसलमान भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ उनका साथ देंगे। गाँधी जी के आह्वान पर हिन्दू सेठों ने दिल खोलकर धन दिया, हिन्दुओं ने जेलें भरी, लाठियां खाई। मगर खिलाफत के एक अन्य पक्ष को वह कभी देख नहीं पाए। इस आंदोलन ने मुसलमानों को पूरे देश में संगठित कर दिया। इसका परिणाम यह निकला कि इस्लामिक साम्राज्यवाद के लक्ष्य की पूर्ति में उन्हें अंग्रेजों के साथ साथ हिन्दू भी रूकावट दिखने लगे। 1921 में इस मानसिकता को परिणीति मोपला दंगों के रूप में सामने आयी। मोपला मुसलमानों के एक अलीम के यह घोषणा कर दी कि उसे जन्नत के दरवाजे खुले नजर आ रहे हैं। जो आज के दिन दीन की खिदमत में शहीद होगा वह सीधा जन्नत जायेगा। जो काफ़िर को हलाक करेगा वह गाज़ी कहलायेगा। एक गाज़ी को कभी दोज़ख का मुख नहीं देखना पड़ेगा। उसके आहवान पर मोपला भूखे भेड़ियों के समान हिन्दुओं की बस्तियों पर टूट पड़े। टीपू सुल्तान के समय किये गए अत्याचार फिर से दोहराये गए। अनेक मंदिरों को भ्रष्ट किया गया। हिन्दुओं को बलात मुसलमान बनाया गया, उनकी चोटियां काट दी गई। उनकी सुन्नत कर दी गई। मुस्लिम पोशाक पहना कर उन्हें कलमा जबरन पढ़वाया गया। जिसने इंकार किया उसकी गर्दन उतार दी गई। ध्यान दीजिये कि इस अत्याचार को इतिहासकारों ने अंग्रेजी राज के प्रति रोष के रूप में चित्रित किया हैं जबकि यह मज़हबी दंगा था। 2021 में इस दंगे के 100 वर्ष पूरे होंगे। अंग्रेजों ने कालांतर में दोषियों को पकड़ कर दण्डित किया मगर तब तक हिन्दुओं की व्यापक क्षति हो चुकी । ऐसे में जब हिन्दु समाज की सुध लेने वाला कोई नहीं था। तब उत्तर भारत से उस काल की सबसे जीवंत संस्था आर्यसमाज के कार्यकर्ता लाहौर से उठकर केरल आये। उन्होंने सहायता डिपों खोलकर हिन्दुओं के लिए भोजन का प्रबंध किया। सैकड़ों की संख्या में बलात मुसलमान बनाये गए हिन्दुओं को शुद्ध किया गया। आर्यसमाज के कार्य को समस्त हिन्दू समाज ने सराहा। विडंबना देखिये अंग्रेजों की कार्यवाही में जो मोपला दंगाई मारे गए अथवा जेल गए थे उनके कालांतर में केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने क्रांतिकारी घोषित कर दिया। एक जिहादी दंगे को भारत के स्वाधीनता संग्राम के विरुद्ध संघर्ष के रूप में चित्रित कर मोपला दंगाइयों की पेंशन बांध दी गई। कम्युनिस्टों ने यह कुतर्क दिया कि मोपला मुसलमानों ने अंग्रेजों का साथ देने धनी हिन्दू जमींदारों और उनके निर्धन कर्मचारियों को दण्डित किया था। कम्युनिस्टों के इस कदम से मोपला मुसलमानों को 1947 के बाद खुली छूट मिली। मोपला 1947 के बाद अपनी शक्ति और संख्याबल को बढ़ाने में लगे रहे। उन्होंने मुस्लिम लीग के नाम से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नाम से अपना राजनीतिक मंच बनाया।
5. 1960 से 1970 के दशक में विश्व में खाड़ी देशों के तेल निर्यात ने व्यापक प्रभाव डाला। केरल के इस भूभाग से बड़ी संख्या में मुस्लिम कामगार खाड़ी देशों में गए। उन कामगारों ने बड़ी संख्या में पेट्रो डॉलर खाड़ी देशों से भारत भेजे। उस पैसे के साथ साथ इस्लामिक कट्टरवाद भी देश ने आयात किया। उस धन के बल पर बड़े पैमाने पर जमीने खरीदी गई। मस्जिदों और मदरसों का निर्माण हुआ। स्थानीय वेशभूषा छोड़कर मोपला मुसलमान भी इस्लामिक वेशभूषा अपनाने लगे। मज़हबी शिक्षा पर जोर दिया गया। जिसका परिणाम यह निकला कि इस इलाके का निर्धन हिन्दू अपनी जमीने बेच कर यहाँ से केरल के अन्य भागों में निकल गया। बड़ी संख्या में मुसलमानों ने हिन्दू लड़कियों से विवाह भी किये। इस्लामिक प्रचार के प्रभाव, धन आदि के प्रलोभन में अनेक हिन्दुओं ने स्वेच्छा से इस्लाम को स्वीकार भी किया। केरल से छपने वाले सालाना सरकारी गजट में हम ऐसे अनेक उदहारणों को पढ़ सकते हैं। इस धन के प्रभाव से संगठित ईसाई भी अछूते नहीं रहा। असंगठित हिन्दू समाज तो इस प्रभाव को कैसे ही प्रभावहीन करता। ऐसी अवस्था में इस भूभाग का मुस्लिम बहुल हो जाना स्वाभाविक ही तो है।
वर्तमान स्थिति यह है कि धीरे धीरे इस इलाके में इस्लामिक कट्टरवाद बढ़ता गया। इन मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व मुस्लिम लीग करती हैं। जी हाँ वही मुस्लिम लीग जो 1947 से पहले पाकिस्तान के बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी। हिन्दुओं का केरल में असंगठित होने के कारण कोई राजनीतिक रसूख नहीं हैं। वे कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के मध्य विभाजित हैं। जबकि ईसाई और मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि नेताओं से खूब मोल भाव कर वोट के बदले अपनी मांगें मनवाते हैं। इसलिए केरल की जनसँख्या में आज भी सबसे अधिक होने के बाद भी जाति, सामाजिक हैसियत, धार्मिक विचारों में विभाजित होने के कारण हिन्दु अपने ही प्रदेश में एक उपेक्षित है। यही कारण है कि शबरीमाला जैसे मुद्दों पर केरल की सरकार हिन्दुओं की अपेक्षा कर उनके धार्मिक मान्यताओं को भाव नहीं दे रही हैं। जिन अरबी मुसलमानों को केरल के हिन्दू राजा ने बसाया था। उन्हें हर प्रकार से संरक्षण दिया। उन्हीं मोपला की संतानों ने हिन्दुओं को अपने ही प्रदेश के इस भूभाग में अल्पसंख्यक बनाकर उपेक्षित कर दिया। समस्या यह है कि वर्तमान में इस बिगड़ते जनसँख्या समीकरण से निज़ात पाने के लिए हिन्दुओं की कोई दूरगामी नीति नहीं हैं। हिन्दुओं को अब क्या करना है। इस पर आत्मचिंतन करने की तत्काल आवश्यकता है। अन्यथा जैसा कश्मीर में हुआ वैसा ही केरल में न हो जाये।

Monday, March 25, 2019

लोक कवि कुंवर जौहरी सिंह जसराणा (सोनीपत)


लोक कवि कुंवर जौहरी सिंह जसराणा (सोनीपत)
-अमित सिवाहा
ओ३म् है जग का नियंता ओ३म् ही करतार है ओ३म् राजा न्यायकारी ओ३म् भव भंडार है।
ओ३म् कहने का मजा जिसकी जबां पर आ गया वो मुक्त जीवन हो गया चारों पदार्थ पा गया।
प्रेम से मिलकर चलो बोलो ज्ञानी बनो पूर्वजों की भांती तुम कर्त्तव्य के मानी बनो।
हरियाणा प्रदेश की जनता संगीत प्रेमी रही है। यहां की जनता गाने बजाने लय सुर ढोलक, हारमोनियम ,चिमटे की ताल पर मोह उठती है। हरियाणा का वाद्द संगीत बीन बांसुरी अति प्रसिद्ध है। जनता की भावनाओं से प्रेरित होकर यहां पर अनेकों संगीतज्ञ हूए हैं। जिनमें काव्य सम्राट ईश्वर सिंह गहलोत काकरोला निवासी का नाम अति प्रसिद्ध है। ये पिंगल शास्त्र के उत्कृष्ट विद्वान थे। इन्होने ता उम्र वैदिक धर्म व स्वामी दयानंद सरस्वती जी के सिद्धांत का प्रचार किया। इनकी भजन मंडली में शिष्यों की बात करें तो स्वामी नित्यानंद (सुरा किलोई झज्झर ), कुंवर जौहरी सिंह जी जसराणा, श्री सत़्यवीर सिंह भैंसवाल कलां सोनीपत शिरोमणि शिष्य थे। हरियाणा के लोक कवियों में जौहरी सिंह जी चमकते सितारों की भांती थे।
जन्म
कुंवर जौहरी सिंह जी का जन्म 9अगस्त 1913 को गांव जसराणा तहसील गोहाणा जिला सोनीपत में पिता श्री जुगलाल जी के कृषक परिवार में हूआ। ये अपने पिता की तीन संतानों में सबसे बड़े थे। व शिक्षित भी यही थे। इनके दो छोटे भाई श्री महासिंह व चन्द्र भान जी कृषि कार्य करते थे।
आर्य समाज व उपदेशकों से प्रभावित
जब कुंवर साहब 12वर्ष के थे तो गुरुकल भैंसवाल की तरफ से चौधरी भोलाराम त्योडी निवासी जसराणा में प्रचार करने आए। बाल्यावस्था होने के कारण ये तो पता नहीं क्या प्रचार किया लेकिन इसी प्रचार से इनके चाचा देशराज पुत्र जयराम चंदगी राम पुत्र दुलीचंद ने जनेऊ धारण किये। जिस से गांव वाले कहने लगे ये दोनों बिगड़ गए। इसके बाद भोलाराम भजनोपदेशक आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब में काम करने लगे ओर दोबारा श्री पंडित समर सिंह वेदालंकार को लेकर जसराणा गांव में वेद प्रचार करने आए।
उस प्रचार का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ा, कुंवर साहब समेत अनेकों ने जनेऊ धारण किया। लेकिन फिर भी वे आर्य समाज, वेद धर्म के महत्व को समझ नहीं पाए। इन्हीं दिनों आप 1928 में आठवीं कक्षा में (फरमाणा मिडल स्कूल) पढ़ रहे थे तो ईश्वर सिंह गहलोत जाट मिडल स्कूल के चंदे हेतू प्रचार करने आए। कुंवर साहब लिखते हैं की मैने लगातार एक महिना फरमाणा ,रिढाऊं, आंवली ,भैंसवाल कलां, माजरा में प्रचार सुना। ओर मन ही मन ख्याल आया की इनसे गाने की कला सिखनी चाहिए। गाने का शौक बचपन से ही था भगवान ने इतना सुंदर स्वस्थ शरीर, कोकिल जैसा कंठ भी बाल्यावस्था में दिया था। आपने चौधरी ईश्वर सिंह जी से गाना सीखने के लिए निवेदन किया। परंतु चौधरी साहब ने इनकी कम उम्र होने के कारण (बच्चा मान कर) मना कर दिया
सन् 1929 में मिडल पास करने के बाद ये दो साल ओर पढ़े, हिंदी विश्वविद्यालय दादरी से हिन्दी रत्न की परीक्षा उतीर्ण की ।
सन् 1931 में चौधरी ईश्वर सिंह जी जो पिंगल शास्त्र के ज्ञानी थे, उनकी जितनी भी कथाएं, भजन जो पिंगल शास्त्र पर थी सभी का लगातार सात साल तक स्वाध्याय किया। 1938 तक वे अच्छे प्रचार बन गए, ओर गुरू ईश्वर सिंह जी से आज्ञा लेकर,हैदराबाद सत्याग्रह में अलग पार्टी बनाकर प्रचार करने लग गए
समूचे हरियाणा में कुंवर साहब ने हैदराबाद सत्याग्रह के दौरान प्रचार किया व जत्थे भेजे। जसराणा से हैदराबाद सत्याग्रह में चौधरी अखेराम, चौधरी फुलसिंह, चौधरी मांगेराम, चौधरी बनी सिंह महाशय कृष्ण जी के साथ जत्थे में जेल गए। बाद में ये आजादी की जंग में कुद पड़े, ओर इनको भारत सरकार की तरफ से पैंशन भी मिली।
विवाह
कुंवर साहब का विवाह शादीपुर जुलाना (जींद) निवासी भोला नंबरदार की पुत्री फुलपती के साथ सन् 1936 में हूआ। जो की एक धार्मिक प्रवृत्ति, अतिथि सेवक महिला थी। इन को इन से नौ संताने हूई ,पांच लड़के, चार लड़कियां
कुंवर जी को इनके ही गांव के चौधरी रुपचंद होते थे जिन्होने सत्यार्थ प्रकाश, श्रग्वेदादिभाष्यभूमिका का काफी अध्ययन किया, जिसका इन पर अधिक प्रभाव पड़ा।
जसराणा आर्य समाज आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब संबंध हो चुकी थी। आपने गांव में बड़े उत्सव करवाए जिसमे चौधरी ईश्वर सिंह जी, श्री मोजीराम मांडी, हरिजन श्री गेलाराम भजनोपदेशको समेत शामिल हूए। ओर आपने लोगों के साथ साथ स्त्रीयों को भी जनेऊ धारण करवाए। आर्य समाजियों के घर हरिजनों को खाना खिलाया, जिससे जमींदारों में काफी रोष हूआ, लेकिन आप घभराए नहीं, मास्टर नान्हूराम का भरपुर सहयोग मिला।
कुंवर साहब समय समय पर आचार्य भगवान देव जी, आचार्य विष्णु मित्र जी, श्री सुखवीर शास्त्री जी, श्री जयलाल, स्वामी इन्द्र वेश जी, श्री नत्था सिंह जी, श्री मुंशीराम जी, वीरेन्द्र वीर आदि भजनोपदेशको को बुलाते ओर वेद प्रचार करवाते। सन् 1957 में कुंवर साहब ने हिंदी सत्याग्रह में बढ़ चढ़कर भाग लिया ओर प्रोफेसर शेर सिंह आदि सज्जनों के साथ तीन महिने जेल में रहे।
कुंवर साहब ने आजादी से पहले व बाद में कांग्रेस पार्टी खुब प्रचार किया। चौधरी सुलतान सिंह जी तो इनके भजनो के दिवाने हो गए। ओर आर्य समाज के मंच पर व अन्य मंचो पर जौहरी सिंह जी का नाम अदब के साथ लेते।
जौहरी सिंह जी अनेको संस्थाओ का प्रचार करते, जिससे लोग हस्थ मुक्त होकर दान देते। आर्य कन्या पाठशाला जसराणा, डी ए वी स्कूल सांघी, हाई स्कूल खंरैटी, डी ए वी हाई स्कूल मोखरा, कन्या हाई स्कूल भैंसवाल कलां, आर्य कन्या पाठशाला आहुलाना, गुरुकुल खानपुर कलां, हिंदी विश्वविद्यालय दादरी आदि संस्थानों में जम कर प्रचार किया।
आर्य समाज के प्रचार के दौरान आपको एक हुतात्मा भक्त फुल सिंह जी के साथ मुलाकात ने आपको ओर बुलंदियो पर पहूंचाया। आपको गुरुकल भैसंवाल, गुरुकुल खानपुर कलां का प्रचारी नियुक्त कर दिया। ओर आपने भी जी जान से मृत्युः पृयंत तक इन संस्थानों का निस्वार्थ भाव से प्रचार किया। इनके साथ साथ आपने, हैदराबाद सत्याग्रह, आर्य वीर दल, स्वाधीनता आंदोलन, कांग्रेस पार्टी, कुंडली बूचड़खाना, जमींदार पार्टी, हिंदी सत्याग्रह, शराबबंदी आंदोलन तथा विभिन्न संस्थानों के निर्माण में धन संग्रह हेतु प्रंशसनीय कार्य किया।
गायकी
आकाशवाणी दिल्ली से आपके गीत प्रसारित होते रहे हैं। समय समय पर विभिन्न विषयो के साथ श्री कपिल देव शास्त्री जी, व श्री सुखदेव शास्त्री जी व चौधरी रतन देव जी के साथ आपकी वार्ताएं प्रचारित हूई हैं।
आपने विभिन्न प्रकार की कविताएं पद्द रुप में लिखी हैं। जिनमे आल्हा, सवैया, दादरा, कव्वाली, हा हा, ख्याल, दोहा, राग, माल घोस, राग महैय्या, राग प्रभाती, गजल चौपाई, कुब्त, कुंडल, मुशायरा सम्मिलित हैं।
इनके संगीत से प्रभावित होकर सन् 1970 में गुरुकुल विद्यापीठ भैंसवाल कलां के दीक्षांत समारोह के अवसर पर आपको "संगिताचार्य" की प्रतिष्ठित उपाधी से विभूषित किया गया।
गुरुकुल सिंहपुरा में विभिन्न भजनोपदेशको की प्रतियोगिता में आपने प्रथम स्थान हासिल किया। 1972 में हरियाणा सरकार ने लोक कवि के नाते भाषा विभाग द्वारा सम्मानित किया गया।
आपकी भजन मंडली में कांशीराम चिमटे वाला, भिखन सिंह, इन्द्र सिंह ढोलकिया, कंवल सिंह, प्रभातिराम का महत्वपूर्ण स्थान है। इनके शिष्य की बात करें तो स्व रतन सिंह आर्य घिलोड कलां ,रामचन्द्र आर्य जसराणा, महाशय दयानंद रावलधी, कुंवर सुखलाल काकरोला, कुलदीप सिंह जसराणा, स्व श्री सरदार सिंह नंगली सकरावती ने उन्हीं तर्जों पर वेद प्रचार किया व कर रहे हैं।
कुंवर साहब आप वाकई धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होने जीवन के 45 वर्ष वेद प्रचार व महर्षि दयानंद सरस्वती जी के मंतव्यो में लगाए।
आप एक निर्भीक कवि व उपदेशक थे जो लगातार एक एक महिना घर से बाहर ओर गांव गांव में सात आठ दिन लगातार, 9,9 घंटे नई नई कथाएं सुनाकर लोगों को वैदिक धर्म के प्रति लोटने के लिए आग्रह करते। आप की ओजस्वी वाणी तो वयोवृद्ध सन्यासी आर्य भद्र पुरुषों को आज भी याद हैं। बताते हैं 2/3 मील दुर से आपके गाने आवाज आती थी। न कोई साऊंड सिस्टम न माईक वगैरा। गुरुकुल भैसंवाल कलां की बात करें तो रात को भी लगभग गांव गुवांडो से प्रचार सुनने के लिए लगभग 20000से 25000 लोग इकट्टा होते थे। स्त्री व पुरुष कच्चे रास्तों से जाकर चौधरी जौहरी सिंह जी के व्याख्यान सुनते। कौन भूल सकता है वो टाईम
इन्होने जीवन के अंतिम वर्ष गुरुकुल भैसंवाल कलां अध्यापन में बिताए, वहीं रह कर महर्षि दयानंद सरस्वती जी के जीवन चरित्र को पद्द शैली में लिखा। उन्हीं में से एक भजन है :- आए थे उसी रास्ते चलेगें महाकाल सबको डसतें चलेगें, जौहरी सिंह भी एक दिन कर नमस्ते चलेगें। ऐसा प्रभावशाली भजनोपदेशक बीमार होने के कारण 16 जुलाई 1981 को हम से सदा के लिए विदा हो गए। सिर्फ यादें बाकी रह गई।
शुभ करनी करता चलिये, जश के दीपक चसते रह जाएगें। पूरा कृतव्य जो पा लेगा, अग्रिम विमान भी आ लेगा। जौहरी सिंह भी चढ चालेगा, पीछे लोग तरसते रह जाएगें। शत शत नमन महान आत्मा दादा जौहरी सिंह जसराणा जी को। वैदिक धर्म की जय।

ईश्वरोपासना


🌿🌹ईश्वरोपासना🌹🌿
क्या शरीर की पुष्टि ही जीवन का लक्ष्य है?
पौष्टिक आहार, व्यायाम और संयम द्वारा मनुष्य को अपना शरीर तो पुष्ट करना ही चाहिए, परन्तु इसी की पुष्टि मात्र ही जीवन का लक्ष्य नहीं है। भर्तृहरि जी महाराज ने शरीर की स्थिति का बहुत सुन्दर शब्दों में चित्रण किया है―
यदा मेरु: श्रीमान्निपतति युगान्ताग्निनिहित:
समुद्रा: शुष्यन्ति प्रचुरनिकर-ग्राह-निलया:।
धरा गच्छत्यन्तं धरणिधरपादैरपि धृता
शरीरे का वार्ता करिकलभकर्णाग्रचपले।
―(वै० श० ६०)
भावार्थ― जब प्रलयाग्नि से सुमेरु पर्वत गिर पड़ता है, बड़े-बड़े मगर और ग्राहों का घर समुद्र भी सुख जाता है तथा पहाड़ों से दबी हुई पृथिवी का भी नाश हो जाता है तो हाथी के कान के समान चञ्चल मनुष्य के शरीर की क्या गणना है?
इस प्रकार मनुष्य-शरीर जो अस्थायी है उसकी पुष्टि मानव-जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता।
क्या विषयों की पूर्ति और इन्द्रियों की तृप्ति जीवन का लक्ष्य है? आइए, इस बात पर विचार करें।
विषय-भोग के तीन प्रमुख लक्षण हैं―खाना, पीना और मौज उड़ाना। मनुष्य कितना भी खा ले, परन्तु वह पशुओं से अधिक नहीं खा सकता। कितना भी अधिक पी ले, परन्तु वह पशुओं से अधिक नहीं पी सकता। विषयों को भोगने की भी कोई सीमा है। बड़े-से-बड़े विषय-भोगी के जीवन में एक दिन आ जाता है जब उसकी इन्द्रियाँ विषय-भोग में अपनी असमर्थता प्रकट कर देती हैं। विषय-पूर्ति की साधन इन्द्रियाँ ही जवाब दे देती हैं। मनुष्य इच्छा रखते हुए भी इच्छा-पूर्ति में असफल हो जाता है।
कवि के शब्दों में―
हम फूल चुनने आये थे बागे-हयात में।
दामन को ख़ारज़ार में उलझा के यह गये।।
(ख़ारज़ार=काँटो वाली झाड़ियां)
गीता में इन्द्रियों से होने वाले सुख को राजसिक सुख माना है―
विषयेन्द्रियसंयोगात् यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।
―(गीता १८/३८)
जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होने वाला, आरम्भ में अमृत के समान और अन्त में विष के समान है, वह सुख रजोगुणी सुख माना गया है। यह इन्द्रियजन्य सुख पहले अमृत के समान सुखद प्रतीत होता है, परन्तु उसका परिणाम जहरीला होता है।
मनु महाराज ने इसी की पुष्टि में कहा है―
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेण दोषमृच्छत्यसंशयम्।
सन्नियम्य तु तान्येव तत: सिद्धिं नियच्छति।।
―(मनु० २/९३)
आत्मा इन्द्रियों के सङ्ग से निस्सन्देह दोष को प्राप्त होता है और उन्हें वश में करके सिद्धि प्राप्त करता है। आत्मा को यदि इन्द्रियों के पीछे चलाया जाएगा तो आत्मा निश्चितरूप से पतन को प्राप्त होगा।
अत: विषयों की पूर्ति और इन्द्रियों की तृप्ति ही जीवन का लक्ष्य नहीं है।
इसी प्रकार केवल धन की प्राप्तिमात्र ही जीवन का लक्ष्य नहीं है। महर्षि याज्ञवल्क्य से उनकी पत्नी मैत्रेयी ने पूछा―
सा होवाच मैत्रेयी―यन्नु म इयं भगो: सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति। नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्यात् अमृतत्वस्य तु नाऽऽशाऽस्ति वित्तेनेति।
―(बृहदार०उप० २/४/२)
भावार्थ― मैत्रेयी याज्ञवल्क्य से कहने लगी कि यदि मेरे लिए यह सारी पृथिवी धन से परिपूर्ण हो जाए तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी? इसपर महर्षि याज्ञवल्क्य कहने लगे कि जिस प्रकार धनवानों का जीवन होता है वैसे ही तेरा जीवन होगा। धन से अमृतत्व की आशा तो नहीं की जा सकती।
इसी प्रकार सांसारिक प्रेम, शानो-शौकत और साम्राज्य की प्राप्ति भी जीवन के लक्ष्य नहीं हैं।
यहाँ हमें इहलोकवाद और परलोकवाद का समन्वय करना होगा। हम शरीर की पुष्टि करें, उदरपूर्ति का साधन जुटाएँ, घर-गृहस्थी के काम भी करें, परन्तु आत्मा और परमात्मा का भी चिन्तन न भूलें। इसके विपरित यदि हम केवल शरीर की पुष्टि, इन्द्रियों की तृप्ति, विषयों की पूर्ति, धन-ऐश्वर्य, घर-गृहस्थी के कामों में ही उलझे रहते हैं तो मानो हम जीवन के लक्ष्य से भटक रहे हैं। हम जीवन के आधे लक्ष्य को पूरा कर रहे हैं। हमारी स्थिति बीजगणित के उस प्रश्न के समान है जो बड़ी लम्बी-चौड़ी रकम के साथ आरम्भ होता है, परन्तु उसका उत्तर शून्य '०' आता है। कवि के शब्दों में―
हो गये बरबाद हम पढ़कर किताबे-ज़िन्दगी।
कुछ वरक हमने फाड़ डाले कुछ हवा में उड़ गये।।
इसलिए ईशोपनिषद् में कहा गया है―
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।।
―(ईशोप० १५)
भावार्थ― सत्य का मुख स्वर्ण के पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन् ! उस सत्यधर्म के दिखाई देने के लिए तू उस आवरण को हटा दे। प्रार्थना की गई है कि इन भौतिक पदार्थों की चकाचौंध ने मनुष्य की आँख से सत्य को ओझल कर दिया है। भक्त सत्य के दर्शन करना चाहता है। सांसारिकता सोने का ढक्कन है और आत्म-परमात्म-चिन्तन वह सत्य है जिसे सांसारिकता छिपा देती है।
मानव-जीवन की सार्थकता इसी में है कि जीवन के सब कामों को करते हुए हम परमेश्वर का भी चिन्तन करते रहें। उपनिषत्कार ने क्या सुन्दर कहा है―
शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्न: पप्रच्छ।
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति।।
―(मुण्ड० १/१/३)
बड़े घरवाले शौनक ने मर्यादा के साथ अङ्गिरा ऋषि के समीप जाकर पूछा―हे भगवन् ! निश्चय किसके जानने पर यह सब जाना हुआ हो जाता है?
ऋषि ने ईश्वर के विषय में वर्णन किया और कहा―
अस्मिन् द्यौ: पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मन: सह प्राणैश्च सर्वे:।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतु: ।।
―(मुण्डक० २/२/५)
जिस परमेश्वर में प्रकाशवाले लोक, प्रकाशरहित लोक, आकाश और समस्त प्राणों के साथ मन समर्पित है, उस परमात्मा को ही जानो और उससे भिन्न अन्य बातों को छोड़ो। यही अमृत का पुल है।
उपनिषत्कार ऋषि ने कहा है―
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि:।
भूतेषु भूतेषु विचिन्त्य धीरा: प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति।।
―(केन० २/५)
यदि इस जन्म में परमेश्वर को जान लिया तो ठीक, परन्तु यदि उसे यहाँ न जाना तो सर्वनाश हो गया। धीर पुरुष प्रत्येक भूत में उसकी खोज करके अमरत्व को प्राप्त करते हैं।
संसार में निकृष्ट व्यक्ति वे नहीं हैं जो धन-धान्य से रहित हैं, अपितु वे निकृष्ट (नीच) हैं जो प्रभु की उपासना नहीं करते। संसार में वे व्यक्ति निकृष्ट नहीं हैं जो भूमि और सम्पत्ति से रहित हैं, अपितु वे व्यक्ति निकृष्ट हैं जो प्रभु का स्मरण नहीं करते। महर्षि व्यास जी ने इस विषय में बहुत सुन्दर कहा है―
केचिद् वदन्ति धनहीनजनो जघन्य:।
केचिद् वदन्ति जनहीनजनो जघन्य:।।
केचिद् वदन्ति दलहीनजनो जघन्य:।
केचिद् वदन्ति बलहीनजनो जघन्य:।।
व्यासो वदत्यखिलवेदविशेषविज्ञ:।
नारायणस्मरणहीनजनो जघन्य:।।
भावार्थ― कुछ लोग कहते हैं कि जिसके पास धन नहीं है, वह व्यक्ति निकृष्ट है। कुछ कहते हैं कि जिस व्यक्ति के साथ पारिवारिक जन नहीं है, वह निकृष्ट है। कुछ व्यक्ति कहते हैं कि जिसके साथ कोई दल नहीं है, वह निकृष्ट है। कुछ कहते हैं कि जिसकी भुजाओं में शक्ति नहीं है, वह घटिया है। वेदविशेष अर्थात् ईश्वर को जाननेवाले महर्षि वेदव्यास ने कहा है कि जो ईश्वर को स्मरण नहीं करता वह नीच है।
जीवन में ईश्वर की प्राप्ति ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। कवि के शब्दों में―
हँसके दुनिया में मरा कोई तो कोई रोके भरा।
ज़िन्दगी पाई मगर उसने जो कुछ होके मरा।।
जी उठा मरने से वह जिसकी प्रभु पर थी नज़र।
जिसने दुनिया ही को पाया था वह सब कुछ खोके मरा।।
[साभार: 'वेद सन्देश' पुस्तक से, लेखक: प्रा. रामविचार एम.ए.]

Thursday, March 21, 2019

कत्लेआम पर वेद और क़ुरान की गवाही




कत्लेआम पर वेद और क़ुरान की गवाही

-आर्यवीर आर्य पूर्वनाम मुहम्मद अली 

(शास्त्रार्थ महारथी अमर स्वामी जी के ट्रैक्ट जिहाद के नाम पर कत्लेआम नामक ट्रैक्ट पर आधारित)

सोशल मीडिया के माध्यम से एक वीडियो मेरे देखने में आया। इसमें एक मोमिन यह दिखा रहा है कि वेदों में कत्लेआम, मारकाट, हिंसा का सन्देश दिया गया हैं। मोमिन का कहना है कि जो लोग क़ुरान पर हिंसा का आरोप लगाते है। वे कभी अपने वेदों को नहीं देखते। यह मोमिन अथर्ववेद और ऋग्वेद के कुछ उदहारण देकर अपनी बात को सिद्ध करने का प्रयास कर रहा हैं।  इसके वीडियो को देखकर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि उल्लू को दिन में न दिखे तो यह सूर्य का दोष नहीं हैं। वेद रूपी ईश्वरीय ज्ञान को मानव कृत क़ुरान की रोशनी में देखने कुछ ऐसा ही हैं।

आईये वेद और क़ुरान में दिए गए सन्देश के अंतर को समझने का प्रयास करे।

 मोमिन श्री क्षेमकरण त्रिवेदी जी के वेदभाष्य से अथर्ववेद 12/5/62 का उदहारण देते हुए कहता है कि ," तू वेदनिंदक को काट डाल, चीर डाल,फाड़ दे, जला दे, फूंक दे, भस्म कर दे।  "

अथर्ववेद 12/5/68 का उदहारण देते हुए कहता है कि "वेद विरोधी के लोमों को काट डाल, उसके मांस के टुकड़ों की बोटी बोटी कर दे, उसके नसों को ऐंठ दे, उसकी हड्डियां मिसल कर, उसकी मिंग निकाल दे, उसके सब अंगों को, जोड़ों को ढीला कर दे।"

इन वेदमंत्रों के आधार पर मोमिन वेदों का हिंसा का समर्थक सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है। जो शंका मोमिन ने उठाई है। यह कोई नवीन शंका नहीं हैं। पिछले 125 वर्षों में अब्दुल गफूर, सन्नाउल्लाह अमृतसरी, मौलवी असमतउल्लाह खां आदि ने यह शंका अनेक बार उठाई हैं। आर्यसमाज के विद्वानों ने उसका  यथोचित उत्तर भी समय समय पर दिया है।

मोमिन के चिंतन में गंभीरता की कमी देखिये जो वह यह न देख पाया कि वेदमंत्र वेद निंदक के विषय में ऐसा कह रहे हैं। वेद की आज्ञा धर्म का पालन है। धर्म  क्या है? सार्वजनिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म है। स्वामी दयानंद के अनुसार धर्म की परिभाषा -जो पक्ष पात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार है। उसी का नाम धर्म और उससे विपरीत का अधर्म है। साधारण भाषा में सत्य बोलना, ईश्वर की पूजा करना, शिष्टाचार, सदाचार यह धर्म है और चोरी,हत्या, असत्य भाषण, बलात्कार, अत्याचार आदि करना अधर्म है। अब मोमिन साहिब ही बताये कि क्या चोरी, लूट-पाट, हत्या, बलात्कार, हिंसा आदि करने वाले को दंड नहीं मिलना चाहिए? अवश्य मिलना चाहिए।  वेद यही तो कह रहा है। फिर भी आपके पेट में दर्द हो रहा है।

चलो एक अन्य तर्क देते है। वैदिक काल में कोई मत-मतान्तर, मज़हब आदि कुछ नहीं था। केवल वैदिक धर्म था। इसलिए इन वेद मन्त्रों को इस प्रकार से लेना कि वेदों में ये मुसलमानों के लिए हैं। केवल आपकी अज्ञानता है। वैदिक काल में इस्लाम ही नहीं था तो इस्लाम के मानने वालों पर अत्याचार की बात करना केवल ख्याली पुलाव है।

एक अन्य महत्वपूर्ण बात समझे। वेदों की शत्रु के नाश की आज्ञा किसके लिए हैं। वेदों की आज्ञा राजा, शासक, प्रशासन, न्यायाधीश के लिए हैं। वेद उन्हें अपने कर्त्तव्य निर्वाहन की आज्ञा दे रहा है। क्या भारतीय संविधान में आज किसी अपराधी को अपराध के लिए दंड देने, जेल भेजने, फांसी लगाने का विधान नहीं हैं? अवश्य है। तो क्या आप कभी यह कहते है कि हमारा संविधान हिंसा को बढ़ावा देता हैं। नहीं। फिर वेदों पर यह आक्षेप लगाना क्या आपकी मूर्खता नहीं है? इसी प्रकार से वेद गौहत्या करने वाले को सीसे की गोली से भेदने का आदेश देते हैं। पर यह सन्देश भी राजा या शासक के लिए हैं। गौ जैसे कल्याणकारी पशु के हत्यारे को राजा दण्डित करे। इस सन्देश में भला क्या गलत है?

अब जरा मोमिन अपने घर भी झांक ले। एक कहावत है। जिनके घर शीशे के होते है। वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते। आपकी क़ुरान की कुछ आयतों में खुदा की आज्ञा देखिये-

और जब इरादा करते हैं हम ये कि हलाक़ अर्थात क़त्ल करें किसी बस्ती को, और हुकुम करते हैं हम दौलतमंदों को उसके कि, पस! नाफ़रमानी करते हैं, बीच उसके! बस। साबित हुई ऊपर उसके मात गिजब की, बस! हलाक करते हैं हम उनको हलाक करना। -कुरान मजीद सूरा 7, रुकू 2, आयत 6
इसकी अगली आयत देखिये-

और बहुत हलाक किये हैं हमने क्यों मबलगो? तुम्हारा खुदा तो जब उसे किसी बस्ती के हलाक करने का शौक चढ़ आये तब उसमें रहने वाले दौलतमंदों को नाफ़रमानी करने का अर्थात आज्ञा न मानने वाले का हुक्म दे! या यूँ कहते हैं कि इसके इस हुक्म की तालीम करें की नाफ़रमानी करो तो उन्हें और उनके साथ बस्ती में रहने वाले बेगुनाहों, मासूम बच्चों तक को अपना शोक पूरा करने के लिए हलाक अर्थात क़त्ल करें।

स्वयं की रक्षा करना और अपनी सामाजिक व्यवस्था की रक्षा करने का नियम सामान्य ईश्वरीय नियम है। यह संसार के हर जीव का अधिकार है। और क़ुरान सूरा माइदा आयत 45 में  क्या लिखा है। प्रमाण देखिये-

हमने उन लोगों के लिए यह हुकुम लिख दिया कि- जान के बदले जान, आंख के बदले आंख, नाक के बदले नाक, कान के बदले कान, दाँत के बदले दाँत और सब जख्मों का इसी तरह बदला हैं।

अब वेद ने शत्रु के संहार की अनुमति दे दी तो क्या गज़ब कर दिया। क्या कोई मुसलमान यह कहेगा कि अपनी रक्षा करना क्या कोई अपराध है। नहीं। कोई समाज के नेक मनुष्यों को पीड़ित करें तो क्या उसे दण्डित न किया जाये। 

अब इस लेख के सबसे महत्वपूर्ण भाग को पढ़े। अगर एक मनुष्य उच्च चरित्र वाला हो, पूजा करने वाला हो, दानी हो, आस्तिक विचारों वाला हो, सब बुराइयों से बचा हुआ हो, ईश्वर को मानने वाला हो परन्तु किसी रसूल, किसी नबी, किसी पैग़म्बर, किसी मध्यस्थ, किसी संदेशवाहक, किसी मुख्तयार, किसी कारिंदा को न मानने वाला हो। तो क्या वह मनुष्य क़त्ल करने योग्य है? और जैसे भी, जहाँ भी मिले उसे मार दो, क़त्ल कर दो। क्या कोई व्यक्ति ईश्वर को छोड़कर किसी अन्य मध्यस्थ को न माने तो क्या वह क़त्ल के लायक है?  वेदों में अनेक मन्त्रद्रष्टा ऋषियों का वर्णन है। क्या कोई व्यक्ति केवल ईश्वर को मानता हो और सदाचारी जीवन व्यतीत करता हो पर किसी ऋषि को न मानता हो। क्या वह मारने योग्य है? नहीं। जबकि क़ुरान के अनुसार वह काफ़िर है। इसलिए मारने योग्य है। इस विषय में क़ुरान क्या कहती हैं। देखिये-

1. और क़त्ल कर दो यहां तक की न रहे बाकि फिसाद, यानि ग़लबा कफ़्फ़ार का। क़ुरान मजीद, सूरा अन्फाल,आयत 39 
2. मुशिरकों को जहां पाओ, क़त्ल कर दो और पकड़ लोऔर घेर लो और हर घात की जगह पर उनकी ताक में बैठे रहो। - क़ुरान मजीद, सूरा तौबा,आयत 5
3. ऐ नबी! मुसलमानों को कत्लेआम अर्थात जिहाद के लिए उभारों। - क़ुरान मजीद, सूरा अन्फाल,आयत 65
4. जब तुम काफिरों से भीड़ जाओ तब तुम उनकी गर्दनें उड़ा दो, यहां तक की जब उनकी खूब क़त्ल कर चुको , और जो जिन्दा पकड़े जायें, उनको मजबूती से कैद कर दो। - क़ुरान मजीद, सूरा मुहम्मद,आयत 4
5. ऐ पैगम्बर१ काफिरों और मुनाफिकों से लड़ो और उन पर सख्ती करो, उनका ठिकाना दोज़ख है, और बहुत ही बुरी जगह हैं। - क़ुरान मजीद, सूरा तहरीम,आयत 9

अब आप क्या कहेंगे मोमिन साहिब। इन आयतों में किसके क़त्ल की आज्ञा हैं। किसी डाकू-चोर, बलात्कारी को मारने की आज्ञा नहीं है। बल्कि कोई व्यक्ति चाहे कितना नेकदिल हो, कितने सत्कर्म करने वाला हो। उसे केवल मुहम्मद साहिब और रसूल पर विश्वास न लाने के कारण  मारने की बात करना क्या सही हैं? इसके विपरीत किसी आदमी में दुनिया की चाहे तमाम बुराइयां हो, उसका आचरण चाहे दुष्ट मनुष्य वाला हो। वह केवल पैगम्बर पर विश्वास लाने वाला हो। तो वह काफिर नहीं बल्कि मोमिन है। अब आप ही बताये दुनिया में किसी मज़हबी किताब में ऐसी बेइन्साफी, जुल्म, निरपराध का खून बहाने की आज्ञा होगी? हरगिज-हरगिज नहीं। दुनिया में इस्लाम और क़ुरान को छोड़कर ऐसा सन्देश कहीं नहीं है। पूरी क़ुरान ही ऐसी आज्ञाओं से भरी पड़ी हैं। जबकि इसके विरपित वेदों की शिक्षाओं पर जरा ध्यान दो। वेद कहते है-

1. हे मनुष्यों! तुम सब एक होकर चलो! एक होकर बोलो। तुम ज्ञानियों के मन एक प्रकार हो। तुम परस्पर इस प्रकार व्यवहार करो, जिस प्रकार तुमसे पूर्व पुरुष अच्छे ज्ञानवान, विद्वान, महात्मा करते हैं। -ऋग्वेद 10/191/2

2. हे मनुष्यों तुम सब आपस में ऐसे प्रेम करो जैसे एक गौ अपने बछड़े से करती है। -अथर्ववेद 3/30/4

3. हे मनुष्यों! तुम्हारे घरों में ये वेद  का ज्ञान दिया जाता है।   जिसके ज्ञान से विद्वान, परमात्मा लोग एक दूसरे से अलग नहीं होते। और न आपस में शत्रुता करते है। --अथर्ववेद 3/30/5

4. न कोई बड़ा है, न छोटा है।  सब भाई भाई आपस में मिलकर आगे बढ़ो। -यजुर्वेद 36/18

वेदों की शिक्षा सकल मानव जाति के लिए है। क़ुरान में ऐसे शिक्षाओं का स्थान ही नहीं हैं। जो थोड़ी बहुत है। वो केवल अन्य मुसलमानों के लिए है। क़ुरान की इन्हीं संदेशों के कारण सभी जानते है कि पिछले 1200 वर्षों में इस पवित्र भारत भूमि पर मुस्लिम आक्रांताओं ने इस्लाम के नाम पर असंख्य अत्याचार किये। 1947 में देश के दो टुकड़े करने, एक करोड़ लोगों का विस्थापन करने, लाखों निरपराध स्त्रियों का बलात्कार करने, लाखों बच्चों को अनाथ करने और लाखों की हत्या करने के बाद भी मुसलमान कभी यह स्वीकार नहीं करते कि इस्लाम के नाम पर उन्होंने सदा अत्याचार किया हैं। क्या इतिहास में लाखों हिन्दू मंदिरों को लूटना, तोड़ना, आग लगाना, उन्हें मस्जिद में तब्दील नहीं किया गया? इसके उलटे कुछ स्वयंभू मोमिन हिन्दुओं पर कट्टरवादी होने का दोष लगाते हैं। क्या आपने कभी सुना कि हिन्दुओं ने किसी इस्लामिक देश पर आक्रमण कर वहाँ के बाशिंदों के साथ ठीक वैसा ही व्यवहार किया जैसा मुसलमानों ने यहाँ के हिन्दुओं के साथ किया हैं। नहीं। फिर भी मुस्लिम समाज यह अपेक्षा करता है कि लोग उसे शांतिप्रिय कौम के नाम से जाने। सभी मुसलमानों को हठ और दुराग्रह छोड़कर गम्भीरतापूर्वक इस विषय पर विचार करना चाहिए कि कत्लेआम वेद सिखाते है अथवा क़ुरान।