Thursday, January 17, 2019

महर्षि दयानन्द के अनुयायी क्यों बनें?



महर्षि दयानन्द के अनुयायी क्यों बनें?
1. दयानन्द का सच्चा अनुयायी भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी आदि कल्पित पदार्थों से कभी भयभीत नहीं होता ।
2. आप फलित ज्योतिष, जन्म-पत्र, मुहूर्त, दिशा-शूल, शुभाशुभ ग्रहों के फल, झूठे वास्तु शास्त्र आदि धनापहरण के अनेक मिथ्या जाल से स्वयं को बचा लेंगें ।
3. कोई पाखण्डी साधु, पुजारी, गंगा पुत्र आपको बहका कर आपसे दान-पुण्य के बहाने अपनी जेब गरम नहीं कर सकेगा ।
4. शीतला, भैरव, काली, कराली, शनैश्चर आदि अप-देवता, जिनका वस्तुतः कोई अस्तित्व ही नहीं है, आपका कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकेंगे । जब वे हैं ही नहीं तो बेचारे करेंगे क्या ?
5. आप मदिरापान, धूम्रपान, विभिन्न प्रकार के मादक से बचे रह कर अपने स्वास्थ्य और धन की हानि से बच जायेंगे ।
6. बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, नारी-प्रताडना, पर्दा-प्रथा, अस्पृश्यता आदि सामाजिक बुराइयों से दूर रहकर सामाजिक सुधार के उदाहरण बन सकेंगे ।
7. जीवन का लक्ष्य सादगी को बनायेंगे और मित व्यवस्था के आदर्श को स्वीकार करने के कारण दहेज, मिलनी, विवाहों में अपव्यय आदि पर अंकुश लगाकर आदर्श उपस्थित करेंगे ।
8. दयानन्द का अनुयायी होने के कारण अपने देश की भाषा, संस्कृति, स्वधर्म तथा स्वदेश के प्रति आपके हृदय में अनन्य प्रेम रहेगा ।
9. आप पश्चिम के अन्धानुकरण से स्वयं को तथा अपनी सन्तान को बचायेंगे तथा फैशन परस्ती, फिजूलखर्ची, व्यर्थ के आडम्बर तथा तडक-भडक से दूर रहेंगे ।
10. आप अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डालेंगे ताकि आगे चलकर वे शिष्ट, अनुशासन प्रिय, आज्ञाकारी बनें तथा बडों का सम्मान करें ।
11. आप अपने कार्य, व्यवसाय, नौकरी आदि में समय का पालन, ईमानदारी, कर्त्तव्यपरायणता को महत्त्व देंगे ताकि लोग आपको मिसाल के तौर पर पेश करें ।
12. वेदादि सद् ग्रन्थों के अध्ययन में आपकी रुचि बढेगी, फलतः आपका बौद्धिक क्षितिज विस्तृत होगा और विश्व-बन्धुता बढेगी ।
13. जीवन और जगत् के प्रति आपका सोच अधिकाधिक वैज्ञानिक होता चला जायेगा । इसे ही स्वामी दयानन्द ने 'सृष्टिक्रम से अविरुद्ध होना' कहा है । आप इसी बात को सत्य मानेंगे जो युक्ति, तर्क और विवेक की कसौटी पर खरी उतरती हो । मिथ्या चमत्कारों और ऐसे चमत्कार दिखाने वाले ढोंगी बाबाओं के चक्कर में दयानन्द के अनुयायी कभी नहीं आते ।
14. दयानन्द की शिक्षा आपको एक परिपूर्ण मानव बना देगी । आप जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति के भेदों से ऊपर उठकर मनुष्य मात्र की एकता के हामी बन जायेंगे ।
15. निन्दा-स्तुति, हानि-लाभ, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करने की क्षमता आप में अनायास आ जायेगी ।
16. शैव, शाक्त, कापालिक, वैष्णव, ब्रह्माकुमारी आदि सम्प्रदायों के मिथ्या जाल से हटकर आप एक अद्वितीय सच्चिदानन्द परमात्मा के उपासक बन जायेंगे ।
17. आपकी गृहस्थी में पंच महायज्ञों का प्रवर्त्तन होगा जिससे आप परमात्मा, सूर्यादि देवगण, माता-पिता आदि पितृगण, अतिथि एवं सामान्य जीवों की सेवा का आदर्श प्रस्तुत करेंगे ।
क्या दयानन्द के अनुयायी बनने से मिलने वाले उपर्युक्त लाभ कोई कम महत्त्व के हैं ?
तो फिर देर क्यों ?
आज ही दयानन्द के सैनिकों में अपना नाम लिखायें ।
[सन्दर्भ - 'दयानन्द-सन्देश' का फरवरी २००३ अंक]

Wednesday, January 16, 2019

मेरे भाई 'बिस्मिल'

मेरे भाई 'बिस्मिल'

श्रीमती शास्त्री देवी (अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की बहिन)




मेरा जन्म सन् १९०२ में हुआ था। भाई रामप्रसाद बिस्मिल के चार साल बाद मैं पैदा हुई थी। भाई जी मुझ पर बहुत स्नेह रखते थे। मेरे पिता के खानदान में लड़कियों को होते ही मार डालते थे। मेरे मारने के लिये बाबा और दादी ने मेरी माताजी को कहा, मगर माताजी ने नहीं मारा। भाई बहुत रोते थे कि बिटिया को मत मारो। मैं तीन महीने की हो गई थी, तब दादी ने माता जी से फिर ताना मार कर कहा कि क्या लड़का है, जो इसकी इतनी हिफाजत करती है। माताजी ने बाबा के यहां से अफीम मंगाकर मुझे पिला दी। पड़ोस में थानेदार का मकान था। उनकी पत्नी हमारे घर आती थीं। उन्होंने मेरी खराब हालत देखी और कहा कि इसे क्या दे दिया? मैं दरोगाजी से कहूंगी। उन्होंने दरोगाजी से कह भी दिया। दरोगाजी ने दादी को बुलाकर कहा कि मैं सबको गिरफ्तार करा दूंगा। तुम लोगों ने कन्या की हत्या क्यों की? तब बहुत से इलाज किए। तीसरे दिन मुझे होश आया। फिर मां का दूध नहीं पिलाने दिया। कभी-कभी गाय का दूध छिपकर माताजी पिला देती थीं। तीन साल तक अफीम के नशे में रखा। मुझे बैठना तक नहीं आया। एक मुंसिफ साहब पड़ोस में रहते थे। उनके कोई बच्चा न था। मुंसिफ की पत्नी मेरे ही यहां से दूध मोल लेकर मुझे पिलाती रहीं। मैं चंगी होती गई। दो साल के बाद उनके भी बालक हुआ, मगर वे मेरी हिफाजत करती रहीं। कहने लगीं, इसी कन्या के भाग्य से मेरे पुत्र हुआ। उनकी बदली हुई, तो मुझे मांगा और कहा मैं ही शादी करूंगी, मगर घरवालों ने नहीं दिया। भाई ने रोना शुरू किया कि मैं अपनी बिटिया को नहीं दूंगा। भाई को स्त्री समाज से बहुत प्रेम हो गया। मुझे भी बराबर साथ-साथ सन्ध्या-हवन सिखाया। आप क्रान्तिकारियों के साथ चले जाते थे। मेरे से कह जाते थे किसी से कुछ न कहना। जो कह दिया तो जान से मार दूंगा। मैं डर से किसी से नहीं कहती थी। मैं लोअर मिडिल में जब पढ़ती थी, तब आपने रात को इश्तहार छपवाकर सरकारी जगहों पर अड़तालीस जिलों में लगवा दिए। पुलिस को पता चल गया कि रामप्रसाद ही सब में शामिल है। तब तक आप चार मित्र सलाह करके वायसराय को मारने कलकत्ते को रवाना हुए। बीच में इलाहाबाद ठहरे। गंगासिंह, राजाराम, देवनारायण और रामप्रसाद। इन चारों में बहुत झगड़ा हो गया। रामप्रसाद का कहना था कि एक वायसराय को मारने से स्वराज्य नहीं हो सकता। जिस तरह एक रात में इश्तहार लगा दिए, इसी तरह सारे हिन्दुस्तान के अंग्रेज खतम कर दिए जायें तो अच्छा हो। इन लोगों ने सलाह करके कहा कि पहले रामप्रसाद को ही खतम कर दो, यही काम नहीं चलने देगा। सब अंग्रेज किस तरह खतम हो सकते हैं। प्रातः काल त्रिवेणी के तट पर श्री रामप्रसाद जी सन्ध्या कर रहे थे कि --- ने तमंचा छोड़ दिया। पहली गोली न मालूम हुई, क्योंकि ध्यान प्राणायाम में था।दूसरी गोली कान के नजदीक से होकर निकली। कुछ सनसनाहट मालूम होने पर आंख खोलकर देखा, तो सामने- तमंचा ताने खड़े हैं। उठकर भागे। कपड़े अपना तमंचा वहीं छूट गया। जान बचाकर एक पंडित तिवारी जी के यहां पहुंचे। पंडित जी ने धीरज बंधाया, कहा कि क्या आफत आ गई; वे अपनी पहिचान के थे। कुछ देर ठहर कर गायब हो गए। तब तक ये सब तिवारी जी के यहां पहुंच गए। पूछा कि रामप्रसाद आए हैं। उन्होंने कहा दिया कि यहां नहीं आये। इन लोगों ने बहुत ढूंढ़ा, मगर कहीं पता न मिला। ये लोग वापिस शहाजहांपुर आ गए। रामप्रसाद बंगाल की तरफ चले गए। इन लोगों ने समझा मारे गए। हमारे घरवालों ने सच मान लिया कि मर गए। उनका सब कारज भी कर दिया, फिर पिताजी बहुत घबराए कि लड़कियों की शादी भी करनी है। मैं अकेला कमाने वाला हूं। उन्होंने मेरा पढ़ना बन्द कर दिया, अपने देश में आकर शादी का इन्तजाम किया। जिला आगरा में पिनाहट के पास एक मौजा है। उसमें मेरे पिता की ननसाल थी, उसी के पास मेरी भी ननसाल थी। वहीं से शादी का प्रबन्ध किया। भाई का कहना कि खूब पढ़ाकर अच्छे घर शादी करूंगा, मगर भाई के न होने से एक गरीब किसान के यहां कोसमा में शादी की। मैं भला क्या कह सकती थी। जिस दिन शादी थी, उसी दिन भाई शाहजहांपुर आ गये। दादी ने कहा कि आज तुम्हारी बहन की शादी है, तो बहुत घबराये और उसी समय चल दिये। दूसरे दिन वहां पहुंच गये। शादी हो चुकी थी। माता-पिता तो खुशी में देखने को आये कि रामप्रसाद आ गये, सब लोग खुशी मनावें, मगर वह अफसोस में बैठे आंसुओं से मुंह धो रहे थे। लोगों ने कहा कि क्या बात है? बहुत पूछने पर बोले कि मेरी बहन की तकदीर फूट गई, जो ऐसे घर शादी हुई। मैंने तो अच्छा घर देखा था। अभी तो बहन की पढ़ाई भी तो बाकी है। खैर जो हुआ सो अच्छा ही है। आप एक दिन ठहरें। माता जी से कुछ रुपये लेकर विदा हो पहले लश्कर को चले गये, वहां हथियारों को तलाश कर तय करके पिनाहट आये। मेरी चौथी चला कर शाजहांपुर को वापिस आये। आप फिर लश्कर से तमंचे लाये। इतने में शाहजहांपुर में हद से ज्यादा चोरियां होने लगीं। पुलिस चोर-बदमाशों से मिल गई; तब इन लोगों ने तथा सेवा समितियों ने अपने सिर इन्तजाम रक्खा। मिर्जापुर से लाठियां मंगाईं। बल्लमें बढ़वाईं, रात रात भर पहरा दिया। तब चोरियां बंद हुईं, फिर आप लश्कर गये। दो बन्दूक लाए। कोसमा में आकर मेरी विदा कराई, स्टेशन पर जाकर एकान्त जगह में मेरी दोनों जांघों में बन्दूक बांधकर भारी लहंगे में छिपा दी। फिर फर्रुखाबाद धर्मशाला में ठहरे। बिस्तर में बन्दूक बांध मेरे सिरहाने रात भर रखीं। आप दूर लेटे। सवेरे फिर उसी तरह बांध दीं। मैं कुछ खड़ी रहूं, कुछ सहारे से पैर फैलाकर बैठ भी जाती थी। बारह बजे दिन के बरेली पहुंच गए, वहां स्टेशन मास्टर ने भाई को पहचान कर उतार लिया। उनकी मित्रता थी। बहुत कहा कि अभी मत रोको, फिर आऊंगा, मगर वह मुझे पकड़कर ले चले। मैंने बहुत कहा कि गठिया से मेरी टांगों में दर्द होता है। चलने से मजबूर हूं, मगर वह लिवा ले गए। धीरे-धीरे चले गए। भाई कुछ उदास हो गये। मगर मैं तो समझ गई। उन्होंने खाना बनवाया। मैं बाहर निकल आई और चल पड़ी। मैंने कहा- "मैं नहीं रहूंगी", उन्होंने बहुत कहा, खाना खाकर चली जाना। मैं रोने लग गई। मेरी टांगों में दर्द से बैठने में बहुत तकलीफ होती है, घर ही जाऊंगी। मैं चल पड़ी। पीछे से भाई भी चल दिए। जब गाड़ी में बैठ गए, तब बोले- "बिट्टो तुम बहुत होशियार निकली। अब तो मैंने समझ लिया कि तुम सहायता दोगी।" शाहजहांपुर स्टेशन से तांगे में बैठ घर पहुंच गए। मगर माताजी को कुछ न बताया। मुझसे भी मना कर दिया कि किसी को न बताना।
एक महीने बाद मैं कोसमा फिर आ गई। फिर माताजी से फुसला कर कुछ रोजगार करना चाहता हूं पिताजी से न कहना, रुपये लेकर फिर हथियार लाना शुरू कर दिया। मैं शाहजहांपुर तक पहुंचा देती थी। एक दिन अचानक पुलिस ने घर पर छापा मारा। भाई खाना खाने बैठे ही थे कि राजाराम को गिरफ्तार करके मेरे दरवाजे को जो आए, सो मैंने भागकर कहा कि पुलिस आ गई। भाई बोले कि कुण्डी बन्द करके मेरी सन्दूक में जितनी किताबें हों, सब मिट्टी का तेल डालकर जल्दी जला दो। मैं तो जाता हूं। आप छतों-छतों सड़क पर कूद गए, सीधे स्टेशन से गाड़ी में बैठकर आगरा आ गए। फिर पिनाहट पहुंच गए। वहां कौन पकड़ सकता था? पुलिसवालों ने किवाड़ तोड़ डाले। कुण्डी खोल दी। "यह क्या जला दिया?" घुड़की दी। "रामप्रसाद कहां है? जल्दी बताओ।" हम लोगों ने कहा कि पता नहीं ढूंढ़ लो। सारे सन्दूक खोल डाले। जो मिला ले गए, साइकिल उठा ले गए। पिताजी कचहरी में थे, दादी भी नहीं थीं। अकेली माताजी और लड़कियां रोती रह गईं। छोटा भाई सुशीलचन्द्र गोदी में था। हम चार बहन दो भाई थे। तीन बहनों की शादी हो गईं, एक दस बरस की मर गईं, दो बहन विवाह के बाद मर गईं, एक छोटी बहन तो जहर खाकर मर गई। भाई को फांसी का हुक्म हुआ, सुनकर उसने जहर खा लिया। उसकी शादी भाई ने एक जमींदार के साथ की थी। वह हम से छह मील की दूरी पर थी; कुचेला के मौज में। छोटा भाई बीमार हो गया, तपेदिक हो गई थी। पिता जी अस्पताल में भर्ती कर आए, डाक्टर ने कहा कि दो सौ रुपये दो, तो हम ठीक कर सकते हैं। पिताजी ने कहा कि मेरे पास अगर रुपये होते तो यहां क्यों आता? मुझे तो गवर्नमेंट ने भेंट दिया; लड़का भी गया, पैसा भी गया। अब तो बहुत दिन हो गये। गणेशशंकर विद्यार्थी पन्द्रह रुपये मासिक देते हैं, उससे गुजर करता हूं। एक हफ्ता अस्पताल में रहा, उसे खून के दस्त हुए, चौबीस घण्टे में खतम हो गया। दसवां दर्जा पास था। वह भी बोलने में अच्छा था। लोग कहते थे कि यह भी रामप्रसाद की तरह काम करेगा। अब इस समय मायके के सारे खानदान में मैं ही अकेली अभागिनी रह गई हूं। फिर भाई तो कुछ दिन कोसमा, कुछ दिन रूहर बरबाई रहे। उनके साथी बहुत पकड़े गये। मैनपुरी षड्यन्त्र केस चला। आपके साथी मैनपुरी में भी थे। जो हथियार आप लाते थे मेरे यहां रखे रहते थे। मैं इसी तरह पहुंचा देती थी। साथियों को भी लाया करते थे। फिर माता-पिता बहुत दुःखी होकर वह भी पिनाहट में रहने लगे। आप भी दो साल गायब रहे। वहां खेती भी की और वहीं आप कविता भी करते थे। आपने छह किताबें छपाई- मन की लहर, वोलशेविकों की करतूत, कैथोरायन, स्वदेशी रंग एवं दो बंगला से अनुवादित कीं। बंगला में बहुत निपुण थे। कुछ दिनों आगरे में डाक्टरी भी की। अपना नाम यहां बदल दिया था, रूपसिंह रखा था। विरोधी लोगों को नहीं ज्ञात हुआ कि यह फरार हैं, नहीं तो पकड़वा देते। वारंट में दो हजारा रुपये का इनाम था। एक दिन माता जी को क्रोध आ गया कि हम सब तेरे ही पीछे बरबाद हो गये। सो घर-बार से भी भेंट दिया, तेरे होने का क्या सुख, मुसीबत ही है। उसी समय आप चल पड़े। न कुछ कहा, खाली धोती आधी ओढ़े आधी पहने। सर्दी का मौसम था। शाहजहांपुर तीसरे दिन रात को पहुंचे। एक पैसा भी पास न था। अठारह कोस आगरा पैदल गये। रास्ते में शेर मिला। आप एक बबूल के पेड़ के साथ खड़े होकर ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि मेरा कोई कसूर है तो काल आ गया। ईश्वर की कृपा से शेर उलटा ही लौट गया। आप खड़े-खड़े देखते रहे कि वह फिर न लौट पड़े, मगर वह चला गया। आप कुछ देर बाद वहां से फिर चल दिये। आगरा पहुंच कर बिना टिकट छिपकर गाड़ी में बैठ गए। रात के बारह बज रहे थे। दादी ने समझा कि कोई पुलिस का आदमी है। बोलीं, 'क्यों मुझे सताते हो?' आपने कहा कि मैं रामप्रसाद हूं। खोल दो, मैं पिनाहट से आया हूं। दादी ने कूंडी खोली। बोले- "दादी आआग जला दो, कुछ खाने को रख हो तो दे दो, भूख के मारे दम निकल रहा है, तब बात कहूंगा।"
दादी ने कहा कि एक रोटी छीके पर रखी है, वह सूख गई होगी। बोले मुझे जल्दी दे दो, वह खाकर पानी पी लिया, तब बात निकली। कहा- माता जी नाराज हुई इससे चला आया। दादी ने कहा- तेरा तो वारण्ट जारी है। उन्होंने कहा कि मैं हाजिर हो जाऊंगा, जो कुछ ईश्वर की इच्छा होगी वह होगा। दूसरे दिन कप्तान साहब के सामने हाजिर हुए। कप्तान बोला कि आप तो खतम थे, अब जिन्दा कहाँ से आ गए। कहाँ रहे? तब जवाब दिया कि मैं आगरा रहा। क्या काम करते रहे? कहा कि कुछ दिन इलाज करते रहे। अस्पताल में डाक्टर को ऐवजी में रहे थे। डाक्टर का मेल था, वह छुट्टी पर चला गया था, कुछ दिनों कविता करते रहे, वह किताबें भी दिखाईं। कप्तान ने छह महीने को नजरानी बोल दी। इतने में आपने एक रेशम के कारखाने में 60 रुपये की नौकरी कर ली। पहली तनखा पिताजी के नाम भेज दी। लिख दिया कि माता जी मेरे अपराध को क्षमा कीजिये। यह रुपये रख लीजिये। अब मैं आपके ऋण को ही चुकता करूँगा। माता जी को बहुत दुःख हुआ कि रामप्रसाद को मेरा कहना बुरा मालूम हुआ। इसलिये नंगा-भूखा चला गया। कुछ दिनों पता नहीं दिया। माता जी बहुत दुखित रहती थीं। पत्र तथा रुपये आने पर शान्ति आई। आपने छह महीने नौकरी की। बाद को आधे के हिस्सेदार बन गये। --- के साझे में कारखाना था। उस समय हम तीनों बहन मौजूद थीं। बढ़िया तीन साड़ी बनारसी कामदार बनाई। कातिक दौज को बहनों को दूंगा। बड़े बहनोई को साफा बनवाया। काफी पैसा पैदा किया, फिर मां-बाप को भी बुलवा लिया क्रान्तिकारियों का काम बराबर करते रहे। फिर दो पिस्तौल बढ़िया, दो तमंचे एवं दो बंदूकें लश्कर से ले गए। शाहजहांपुर तक मैं पहुंचा आई। दो बार मैं पहुंचा सकी। एक वकील के यहां रखीं और रकम भी उन्हीं के यहां रखते थे। घर खर्चे को ही देते थे। वकील साहब से पिता जी और उनकी पत्नी से माता जी कहते थे। उनके दो लड़के थे। वह भाई के समान थे। बहुत ही विश्वास था। कारखाने का नाम छोटे भाई सुशीलचन्द्र के नाम से रखा और सुशील माला भी छपवाई थी। भाई रामप्रसाद दयावान् भी अधिक थे। कोई गरीब भिक्षा मांगे तो पांच रुपये से लगाकर दस रुपये तक दे देते थे। किसी को जाड़े से ठिठुरता देखते, तो अपने तन से कपड़ा उतार देते थे, चाहे कितना ही कीमती क्यों न हो। एक दिन दादी नाराज हुईं कि क्या अपनी बहन का भी ख्याल है, जो गरीब है? इतनी कीमत की लोई तू क्यों फकीरों को दे आया? कोई हलके मोल का कपड़ा दे देता। लोई बहन को ही दे आता। वैसे तो हथियारों के लाने को बड़ी बिटिया है। औरों को दुशाले। अगर वह पकड़ जाए, तो जेल ही में तो सड़े। इतना पैसा भी नहीं, जो छूट सके। आप बोले कि बिटिया का मुझे बहुत खयाल है। मैं दिवाली पर जाऊंगा, तब उसका सारा कर्जा निबटा दूंगा और जो साड़ी बनी रखी हैं वह तीनों को दे आऊंगा। बड़ी बिटिया से हिसाब पूछ आया हूँ कि कुल कितना दर्जा है। 400 रुपये बताए हैं। उसे तो मैं रेशम ही पहनाऊंगा। उसने मेरे बहुत काम निकाले, हथियार लाना, उनकी हिफाजत करना, मेरे न होने से भी संभाल रखना। जब मैं शाहाजहांपुर रहती थी, तब एक चौड़ा गड्ढा था, उसमें सारे सामान रखे रहते थे। ऊपर एक तख्ता डाल दिया और मिट्टी डाल दी। 8 वें दिन सफाई, तेल लगाना, सुखाना पड़ता था। जब कहीं ले गये तो निकाल लिए, कुछ सामान बंब का भी रखते थे। एक दिन बारूद में रगड़ से जोर से आवाज हुई। आप बच गए, निकल कर भाग गए। हम लोग बहुत ही डरे, मगर मिट्टी से सब ढक दिया। एक छोटा-सा मकान अलग था। उसी में सब रहता था। उसी में उनके साथी भी छिपे रहते थे। मैं सबको खाना खिलाती थी। दूसरा कोई उस घर में नहीं जाता था। कुछ लोग आवाज सुनकर जग पड़े। बंदूकें कहां चलीं, हम लोग भी कहने लगे, देखो कहां से आवाज हुई। हम लोग तो सोते से जग पड़े। रामप्रसाद कहां है मालूम नहीं, वह तो कल से ही नहीं आया, गांव गया है, आप खडहर गांव में पहुंचे गए। पांच दिन बाद आए। थाना नजदीक था। सिपाही भी आ गए। फिर मोती चौक में एक खाली मकान था, उसमें अपना काम करने लगे। बनारसीलाल बढ़ई तथा विष्णु शर्मा, चौदह साल की जेल भुगत आ गए- काकोरी केस में। फिर रामप्रसाद सावन में मुझे लेने आए। यहां से मुझे नहीं भेजा। आप कार्तिक की कह गए कि हम आवेंगे तब तक आप कुंआर की नौदुर्गा में गिरफ्तार हो गए। नौमी का दिन था। प्रातः समय आप दातून कर रहे थे कि पुलिस ने छापा मारा। रामप्रसाद जल्दी निकले। आपने किवाड़ खोल दिये। एक पर्चा दे दिया, उसे आप पढ़ कर बोले अभी चलता हूं! माता जी से कुछ बातें करनी हैं। अच्छी यहीं जो कुछ कहना हो कह दीजिए। माता-पिता दोनों खड़े ही थे। पिताजी के पैर छूकर कहा माफी दीजिए। माता जी के पैरों पर सर रखकर बोले, "मैंने आपकी सेवा कुछ न कर पाई, माता धीरज रखना, छोटे भाई सुशीलचन्द्र को हृदय लगाया, मैं तो जाता हूं, न जाने फिर आया या न आया। देश-सेवा पर चाहे मेरा बलिदान ही क्यों न हो, मगर काम यही करूंगा। मरने से मुझे कोई डर नहीं। जेल से डर नहीं, शेर ही कटहरे में फांसे जाते हैं न कि गीदड़। सब को प्रणाम करते हुए आप हंसते हुए चल दिए। सन् 1924 में गिरफ्तार हुए। ढाई साल मुकदमा चला। सन् 25 में छोटी बहन खतम हो गई। मेरे पुत्र पैदा हुआ। आप लखनऊ ही जेल में थे, भानजे का जन्म सुनकर उत्सव मनाया। बहन की जहर खाकर आत्म-हत्या की बात सुन कर शोक भी किया। अपनी जीवनी में उन्होंने सारी बातें लिखी हैं, जो उनके हाथ की लिखी हुई है। उसमें से कुछ बात छोड़ दी हैं, हां मुख्य, मुख्य बातें आत्मकथा में है। आपके मुकदमे में जो कुछ था पिता जी ने लगा दिया, फिर पिता जी बहुत दुखित हुए। रामप्रसाद जी ने कहा कि अब तो बिलकुल ही रोटी को भी तबाह हो चुके, मैं परवश हूं। तब आपने --- को पत्र लिखा कि जो कुछ पैसा मेरे हिस्से का हो यह मेरे पिता जी को देना, कुल सब कारखाने का हिसाब 20,000 रुपये का था, आधा दस हजार चाहिए, उसमें 1700 रुपये का कपड़ा कलकत्ता, 1200 रुपये का मद्रास, 1500 रुपये का लाहोर, 2000 रुपये का शाहजहांपुर में उधार बंटा हुआ था। उन्होंने लिखा कि लाहोर से जो पैसा मिले वह हमारी बहन को देना। मैंने उसको देने को कहा था, बाकी थोड़ा-थोड़ा करके मेरे पिता जी को देते रहना। मगर --- ने एक पैसा नहीं किया। कारखाने का सामान उनके पकड़े जाने के बाद सब अपने घर को लदवा ले गये। मेरी माता जी ने कहा कि एक चरखा मेरी पुत्री को दे दो। वह अपने हाथ से ही कात कर कपड़ा बुनती है, उसी को पहनती है, मगर कुछ भी ध्यान न दिया। पछता कर बैठना पड़ा। फिर भी रामप्रसाद जी ने कई बार लिखा; कुछ भी न दिया, बल्कि अकड़ कर पिता जी से लड़े। फिर वकील को लिखा कि अब मैं तो जेल में हूं, मेरे जो कुछ रुपये आप के यहां है, वह मेरे पिता जी को दे दीजिए। पांच हजार जमा थे। दो हजार अभी दे देना। फिर मैं लिखूं तब देना। उन्होंने एक पाई भी न दी। कहते रहे कि दे देंगे। अब पिताजी बहुत दुखित हुए। माताजी बिलकुल दुःख से कमजोर हो गईं। गणेशशंकर जी विद्यार्थी ने कानपुर में 2000 रुपये चन्दा करके मुकदमे में सहायता की। फिर भी मेरे भाई को फांसी की सजा मिली। वकील साहब को अन्तिम पत्र में लिखा "पिताजी, माताजी आप लोगों ने मुझसे अच्छा प्यार किया। अब एक अन्तिम निवेदन है कि एक बन्दूक मेरी बहन को दे देना। बाकी छह हथियार आपके यहां रह जायेंगे। मेरे लिये आपने एक पत्र में लिखा, माताजी को दिया कि बड़ी बिटिया को दे देना और उसे धीरज बंधाती रहना। वह पत्र माताजी से कहीं किसी ने ले लिया। फिर न दिया। माताजी से मालूम होने पर मुझे बहुत ही दुःख हुआ, पिता जी की हालत दुःख से खराब हुई। तब विद्यार्थी जी 15 रुपये मासिक खर्च देने लगे। उससे कुछ गुजर चलती रही। फिर विद्यार्थी जी भी शहीद हो गये। मुझे भी बहन से ज्यादा समझते थे। समय-समय खर्चा भेजते थे। माता-पिता दादी भाई दो गाय थीं। रहने की जगह हरगोबिन्द ने एक टूटा-फूटा मकान बता दिया था। उसमें गुजर करने लगे। वर्षा में बहुत मुसीबत उठानी पड़ी। फिर पांच सौ रुपये पं० जवाहरलाल जी ने भेजे। तब माताजी ने कहा कि कुछ जगह ले लो इस तरह के दुःख से तो बचें। नई बस्ती में जमीन अस्सी वर्ग गज ले ली। एक छप्पर एक कोठरी थी। उसमें गुजर की। पिताजी भी चल बसे। माताजी बहुत दुखित हुई। एक महीने के बाद मैं भी विधवा हो गई। अब दोनों मां-बेटी दुखित थीं। मेरे पास एक पुत्र तीन साल का था, माता जी बोलीं कि मैं तो शरीर से कमजोर हूं किस तरह दूसरे की मजदूरी करूं। बिटिया अब क्या करना चाहिए। मैंने कहा कि जहाँ तक मुझसे होगा, माताजी आपकी सेवा करूंगी, आप धीरज बांधो। ईश्वर की यही इच्छा थी। माताजी के पास रामप्रसादजी के बटन सोने के तीन तोले के थे। उन्होंने किसी को नहीं बताए, छिपाए रहीं, जाने कैसा समय हो, इसलिए कुछ तो पास रखना चाहिए। पिताजी के स्टाम्प खजाने में दाखिल किए, दो सौ रुपये वह मिले, फिर बटन बेच दिए। फिर मैंने ईंट-लकड़ी लगाकर एक तिवारा तथा उसके ऊपर एक अटारी बनवाई। ऊपर माताजी ने गुजर की। नीचे आठ रुपये में किराए पर उठा दिए। आठ रुपये में मैं, माताजी तथा बच्चे रहते थे बहुत ही मुसीबत से। एक समय कभी-कभी खाना प्राप्त होता था, मैंने एक डाक्टर के यहां खाना बनाने का काम छह रुपये में कर लिया। कपड़े की कमी से बहुत ही दुखित रहे। बच्चा स्याना हुआ। माताजी ने सबसे फरियाद की कि कोई इस बच्चे को पढ़ा दो। कुछ कर खाएगा। मगर शाहजहांपुर में किसी ने ध्यान नहीं दिया। मैंने अपनी मेहनत में पांचवां दर्जा पास करा दिया, फिर तो पैसे का काम था। मजबूर होकर मजदूरी से गुजर की। कोसमा में तीन बीघा खेत था, वह भी कर्जे में रखा, कभी-कभी कोसमा मैं भी रह जाती थी। बिना पैसे कौन किसका होता है? यहां के लोगों में कोई भी मुंह से नहीं बोलता था। मैं अपनी मुसीबतों को लिख नहीं सकती। बहुत ही दुःख उठाए। मेरी माताजी भी बहुत दुखित रहीं। मेरा दुःख उनको सताता था। विष्णु शर्मा चौदह साल जेल काटकर छुटकर आए तो माताजी के दर्शन को आए। माताजी जाड़े के मारे ठिठुर रही थीं। उनका दुःख देखकर चकित रह गए, पूछा आप को किसी भाई ने भी मदद नहीं दी। माताजी रोकर बोलीं कि मदद देने वाला तो परमात्मा है। आंसुओं की धारा लग गई। बोलना बड़ी देर में निकला कि मेरी पुकार ईश्वर भी नहीं सुनते, जो इस शरीर से छुटकारा दे। विष्णु शर्मा ने अपना कम्बल उतार कर उन्हें उढ़ा दिया। बोले माताजी मैं आपकी सेवा जो होगी करूंगा। फिर उन्होंने बहुत कोशिश की। स्वराज होने और माताजी की पेंशन 60 रुपये हो गई। फिर माता जी के साथ मेरी भी गुजर होने लगी। मोटा खाना-पहनना चलता रहा। पर माताजी के स्वर्गवास के बाद पेंशन बन्द हो गई और मुझ पर आफत का पहाड़ टूट पड़ा। लड़के को पढ़ाने को पैसा न हो सका। फिर मैंने मैनपुरी के नेता लोगों से भी फरियाद की कि आप लोग मेरे लड़के को पढ़ा दें, तो इसका जीवन सम्हल जाय। मगर अपने सुख के सामने गरीबों की कौन सुनता है? यह तो कोई नहीं सोचता कि कितने भाई कुर्बान हो गये, कितने जेलों में सड़े, तब आप आज एम.एल.ए. और मिनिस्टर बने बैठे हैं। जिन्होंने अपने को बलिवेदी पर चढ़ा दिया, उनके खानदान वाले भूखे मर रहे हैं, आज दिन जो मैं अनाथ दुखिता हूं। मेरे भाई रामप्रसाद जी होते तो अपने भानजे को कितना पढ़ाते। मेरी सहायता करते। स्वराज्य में आज मैं हर तरह की मुसीबत उठा रही हूं। पर मेरी बात किसी ने भी न सुनी। मगर ईश्वर की महिमा कोई नहीं जानता। मैं बहुत दुःखी फाके कर रही थी। मेरा लड़का कुसंग में फंस गया था। वह घर से निकल गया था। एक महीने तक पता न मिला। मैं और मेरी बहू दोनों अपने मन में सलाह कर रहे थे कि चलो दोनों गंगाजी में डूब जाएं, कहां तक भूखों मरें? कपड़े से नंगे, एक दिन तो है नहीं जो काट लें। इतने में किसी ने आवाज दी कि माताजी आपको कोई मिलने आया है। मैं फटी धोती पहने थी। शर्म से ढक कर उठी और बोली, भाई साहब! कैसे तकलीफ उठाई? उन्होंने कहा- चतुर्वेदी ओंकारनाथ पाण्डे मेरा नाम है। बहनजी, मैं आपके ही दर्शन को आया हूं। फिर मैंने बार-बार धन्यवाद दिया। फिर पाण्डेजी ने कहा कि मेरे पास भाई बनारसीदास चतुर्वेदी जी का पत्र आया है कि कोसमा में शहीद रामप्रसाद बिस्मिल जी की बहिनजी हैं। उनके यहां आप खुद जाकर देखो कि वह किस तरह गुजर करती हैं? कितनी जमीन हैं? वह सब देखकर मेरे लिये लिखे। मैंने अपना घर दिखाया कि आप भीतर जाकर देख सकते हैं कि मेरे पास तो पांच सेर दाने भी न होंगे, ज्यादा क्या कहूँ। मेरी हालत देखकर पाण्डेजी ने पांच रुपये दिये। मैंने चार रुपये की धोती ले ली, एक रुपया और खर्च में किया। उन्होंने चतुर्वेदी जी को सारा हाल लिखा, जो कुछ खुद देख गये थे। फिर चतुर्वेदीजी ने मेरे लिए पत्र लिखा कि अपना कुछ हाल लिखो। मैंने पत्र में थोड़ा-सा समाचार अपना दिया। भाई बनारसीदास चतुर्वेदीजी ने मुझ दीन की पुकार सुनी। आपने अपील निकाली, तो अनेक भाइयों को दया आ गई। सहायता भी मिलने लगी। राष्ट्रपति महोदय और श्री कृष्णकुमार बिड़ला से लगाकर छोटे-बड़े सबने मुझपर दया की। पर मैं संकोच से उसमें से पैसा न खर्च कर सकी। चतुर्वेदीजी ने लिखा कि आप संकोच न करें, यह पैसा आपका ही है। आप कपड़ा बनवा लीजिए। अन्न भी लेकर रख लीजिए। अब आप मुसीबत न उठाइये। बहुत दुःख आपने सहे। मैं आप को दुःख न होने दूंगा। फिर चतुर्वेदीजी ने बहुत कोशिश करके मेरी पेंशन चालीस रुपया करवा दी है। उनको मैं कहां तक धन्यवाद दूं। उसी से हम तीनों प्राणियों की जैसे-तैसे गुजर बसर हो रही है। (यह घटना 1960 ई० तक की है)

[स्रोत- सुधारक: गुरुकुल झज्जर का लोकप्रिय मासिक पत्र का दिसम्बर २०१८ का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ, डॉ विवेक आर्य]

Tuesday, January 15, 2019

विश्व पुस्तक मेले में वेदों की मनमानी व्याख्या करने पर आर्यसमाज के गुरुकुल के विद्यार्थियों ने जताया विरोध



विश्व पुस्तक मेले में वेदों की मनमानी व्याख्या करने पर आर्यसमाज के गुरुकुल के विद्यार्थियों ने जताया विरोध

डॉ विवेक आर्य

विगत कुछ वर्षों से विश्व पुस्तक मेले में इस्लामिक मान्यता वाले कुछ लोग वेद और क़ुरान को समान बताने का एक षड़यंत्र चला रहे हैं। इस षड़यंत्र के तहत हर वर्ष विभिन्न नामों से एक स्टाल पर वेदों के मनमाने अर्थ कर उन्हें  क़ुरान समान बताने का असफल प्रयास करते हैं। आर्यसमाज के गुरुकुल के ब्रह्मचारियों ने जब उनके इस चाल का विरोध किया तो बहानेबाजी करने लगे। उनके ज्ञान की गहराई इस कथन से ही स्पष्ट हो जाती है कि उन्हें यह तक नहीं मालूम कि वेद में श्लोक नहीं मंत्र होते हैं। इस लेख में उनके द्वारा फैलाये कुछ भ्रम को उजागर करेंगे।

भ्रम नंबर 1- क्या वेदों में मुहम्मद साहिब का वर्णन है?

इस्लामिक स्टाल वाले अथर्ववेद के कुंताप सूक्त में नराशंस के नाम पर मुहम्मद साहिब को दर्शाना का असफल प्रयास कर रहे हैं।  यह छल नहीं तो क्या हैं? इस भ्रम के इतिहास को जानना आवश्यक हैं। अहमदिया जमात से सम्बन्ध रखने वाले अब्दुल हक विद्यार्थी ने 1940 में एक पुस्तक लिखी थी।  जिसका नाम था  Muhammad in world scriptures  अर्थात विश्व ग्रंथों में मुहम्मद साहिब।  इस पुस्तक में अब्दुल हक़ ने यह दर्शाने का असफल प्रयास किया था कि विश्व के प्रत्येक धर्मपुस्तक में मुहम्मद साहिब का वर्णन हैं। अब्दुल हक़ को उस काल के आर्यसमाज के विद्वानों ने यथोचित उत्तर दिया था। तब यह मामला दब गया। लगभग एक दशक पहले इस विस्मृत प्रकरण को दोबारा उछाला गया। डॉ वेद प्रकाश उपाध्याय के नाम से एक लेखक ने "नराशंस और अंतिम ऋषि" नामक एक पुस्तक लिखी।  इस पुस्तक में अब्दुल हक़ का बिना नाम लिए अथर्ववेद के कुंताप सूक्त से वेदों में मुहम्मद साहिब का होना टेप लिया गया। अब हक़ का नाम लेना उनके लिए हराम था।  क्यूंकि मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी के अहमदी सम्प्रदाय को इस्लाम में  मुसलमान ही नहीं माना जाता। डॉ ज़ाकिर नाइक ने भी यही नकल उतारी। वेदों में नराशंस शब्द  से मुहम्मद की कल्पना कर इस्लामिक जगत में खूब प्रशंसा बटोरी। मगर इस भ्रम की उत्पत्ति कहाँ से हुई यह भेद किसी को नहीं बताया। वेद मन्त्रों के साथ इस प्रकार की खींचातानी कर भ्रम फैलाना गलत है।  ऐसी खींचातानी तो क़ुरान की आयतों के साथ भी की जा सकती है। आपको दिखाता हूँ। क़ुरान पिछले 1400 वर्षों से स्वामी दयानंद का एक नहीं, दो नहीं अपितु 114 बार गुणगान कर रही हैं। "दया" शब्द का अरबी अनुवाद होता है रहम और रहम करने वाला रहीम। इसलिए दयानन्द का अरबी नाम हुआ रहीम और स्वामी दयानंद का अरबी अनुवाद हुआ दरवेश-ए-रहमत। रहीम शब्द क़ुरान में 114 बार आया है। इससे यही सिद्ध हुआ कि क़ुरान स्वामी जी का मुहम्मद साहिब से भी अधिक गुणगान करती है। क़ुरान की अनेक आयतों से आर्यसमाज के अनेक महान विद्वानों के नाम को इस प्रकार से सिद्ध किया जा सकता हैं। 

भ्रम नंबर 2- क्या वेदों में वर्णित ईश्वर और क़ुरान में वर्णित अल्लाह एक है?

स्टाल लगाने वालों ने यह दावा किया है कि वेद और क़ुरान दोनों में एक ईश्वर का वर्णन है।  यह सही है कि वेदों में एकेश्वरवाद अर्थात एक ईश्वर का वर्णन मिलता है।  मगर वेदों में मनुष्य रूपी आत्मा और ईश्वर दोनों के मध्य वेदों में कोई मध्यस्थ नहीं हैं। इस्लाम में मनुष्य और ईश्वर के मध्य लाखों फरिश्ते, पैगम्बर मुहम्मद, जिन्न, शैतान न जाने क्या क्या हैं। क़ुरान में मध्यस्थ की सिफारिश से ईश्वर का प्रभावित होना भी है। यह क़ुरान के ईश्वर की अन्य पर निर्भरता सिद्ध करता है जबकि वेदों का ईश्वर किसी पर भी आश्रित नहीं है। वेदों का ईश्वर एक भी है और सर्वशक्तिमान भी है। उसे किसी क़ुरान के ईश्वर के समान मध्यस्थ की आवश्यकता ही नहीं है। अगर क़ुरान को मानने वाले इस वेदों की इस मान्यता को स्वीकार कर ले इस्लाम में क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकता हैं। क्यूंकि पुरे विश्व में इस्लाम के नाम पर विवाद का मुख्य कारण ही मध्यस्त हैं। इस्लामिक स्टाल वालों को यह पढ़कर अपना भ्रम दूर कर लेना चाहिए।

भ्रम नंबर 3- इस्लामिक बहिश्तऔर वैदिक स्वर्ग। क्या दोनों एक है?

इस्लाम में जन्नत को प्राप्त करना जीवन का उद्देश्य बताया गया है। जबकि वैदिक मान्यता में मोक्ष जीवन का उद्देश्य हैं। अनेक इस्लामिक विद्वानों के अनुसार इस्लामिक जन्नत की हसीन हूरें, अंगूर की रसीली शराब, मीठा पानी, चश्मे किसी भीष्म गर्मी से त्रस्त रेगिस्तानी गडरिये की अनोखी कल्पना मात्र प्रतीत होते हैं। वैदिक स्वर्ग किसी सृष्टि में विशेष स्थान का नाम नहीं हैं। अपितु इसी धरती पर सुख पूर्वक रहना, सकल सृष्टि के प्राणी मात्र  सामान समझना स्वर्गमय जीवन का अंग हैं। इस्लामिक जन्नत के चक्कर में विश्व में पिछले 1400 वर्षों से इतना खून-खराबा होता आया है। जन्नत के चक्कर में इस धरती को नरक अर्थात दोज़ख ही  बनाकर रख दिया गया हैं। वर्तमान में विश्व के अधिकांश इस्लामिक देश हिंसा और फिरकापरस्ती के झगड़े के चलते मनुष्य के रहने लायक नहीं रहे हैं। इसलिए इस्लाम की मिथक जन्नत के चक्कर में धरती को नर्क न बनाये। इसे स्वर्ग बनाने में योगदान दे। वेदों का यह सन्देश न केवल व्यवहारिक है अपितु सत्य भी हैं।     

भ्रम नंबर 4-  क्या क़ुरान के ईश्वर और वेद के ईश्वर दोनों निराकार हैं?

इस्लामिक बुक स्टाल वाले क़ुरान के ईश्वर और वेद के ईश्वर दोनों को निराकार बता रहे हैं। यह बड़ी गड़बड़ है। वेदों का ईश्वर निराकार, सर्वदेशीय और सर्वव्यापक है।  जबकि क़ुरान का ईश्वर एकदेशीय अर्थात एक स्थान पर रहने वाला एवं साकार हैं। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार क़ुरान का अल्लाह सातवें आसमान पर रहता है।  मुहम्मद साहिब लड़की के सर वाले और पंख वाले बराक गधे पर बैठकर उससे मिलने रोज़ रात में जाते थे। वह अनेक पर्दों के भीतर रहता हैं। अल्लाह एक तख़्त पर विराजमान है जिसके नीचे पैर रखने की चौकी हैं। उस तख़्त को फ़रिश्ते उठाये हुए हैं। इस्लामिक साहित्य में अल्लाह के ऐसे वर्णन से यह सिद्ध हो जाता है कि अल्लाह साकार है। अब साकार सत्ता एकदेशी अर्थात एक स्थान तक सीमित होती है। एक स्थान पर सीमित सत्ता सर्वव्यापक अर्थात सृष्टि में हर स्थान पर नहीं होगी। इसके विपरीत वेदों में दर्जनों मन्त्र ईश्वर को निराकार सिद्ध करते है। निराकार सत्ता ही सर्वदेशीय और सर्वव्यापक होगी। इसलिए वेदों में ईश्वर विषयक कथन सत्य और ग्रहण करने योग्य हैं। मेरे विचार से इस्लामिक स्टाल वालों को वेदों में वर्णित ईश्वर का गहन स्वाध्याय करना चाहिए।

भ्रम नंबर 5- क्या वेद और इस्लाम दोनों एकेश्वरवाद की बात करते है?

इस्लामिक स्टाल वाले कह रहे है कि वेद और इस्लाम में एकेश्वरवाद है जो बहुदेवतातवाद के विरुद्ध हैं। इसलिए दोनों समान है। पैगम्बर मुहम्मद रसूल साहिब से लेकर लाखों फरिश्तों को मानने वाला इस्लाम बहुदेवतावाद का समर्थक नहीं तो क्या है? वेदों में वर्णित देव शब्द को समझे।  देव शब्द दा, द्युत और दिवु इस धातु से बनता हैं। इसके अनुसार ज्ञान,प्रकाश, शांति, आनंद तथा सुख देने वाली सब वस्तुओं को देव कहा जा सकता हैं। यजुर्वेद[14/20] में अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र वसु, रूद्र, आदित्य, इंद्र इत्यादि को देव के नाम से पुकारा गया हैं।  देव शब्द का प्रयोग सत्यविद्या का प्रकाश करनेवाले सत्यनिष्ठ विद्वानों के लिए भी होता हैं क्यूंकि वे ज्ञान का दान करते हैं। देव का प्रयोग जीतने की इच्छा रखनेवाले व्यक्तियों विशेषत: वीर, क्षत्रियों, परमेश्वर की स्तुति करनेवाले विद्वानों, ज्ञान देकर मनुष्यों को आनंदित करनेवाले सच्चे ब्राह्मणों, प्रकाशक, सूर्य,चन्द्र, अग्नि, सत्य व्यवहार करने वाले वैश्यों के लिए भी होता हैं। वेदों के अनुसार केवल पूजा के योग्य केवल एक सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, भगवान ही हैं। जबकि सम्मान के योग्य जनों को देव कहा गया है। इस्लामिक स्टाल वाले यहाँ भी गच्चा खा गए।

यहाँ पर मैंने कुछ उदहारण देकर यह सिद्ध किया है कि कैसे इस्लामिक स्टाल वाले स्वयं भ्रमित हैं। वेदों को बिना जाने व्यर्थ खींचतान करने उन्हें क़ुरान के साथ नत्थी कर भ्रम ही फैला रहे हैं।

NDTV द्वारा पुस्तक मेले में हुए विवाद का समाचार इस लिंक पर प्रकाशित किया गया हैं।

https://khabar.ndtv.com/news/india/world-book-fair-pragati-maidan-dispute-between-two-groups-on-vedas-and-quran-1975305

Saturday, January 12, 2019

ईसाई धर्मान्तरण: एक ज्वलंत समस्या



ईसाई धर्मान्तरण: एक ज्वलंत समस्या

डॉ विवेक आर्य


दिल्ली हाई कोर्ट ने बयान दिया है कि ईसाई मिशनरी द्वारा किये जाने वाले कार्य भारतीय संविधान के अंतर्गत वैध हैं। डॉ क्रिस्टो थॉमस मूलरूप से भारत के रहने वाले है जो वर्षों पहले अमरीका चले गए थे। कुछ समय पहले वह भारत आकर चिकित्सा सेवा देने लगे। उन पर आरोप लगा कि वह सेवा की आड़ में ईसाई मिशनरी के धर्मान्तरण कार्य को कर रहे हैं। आपका वीजा निलंबित कर विदेश वापिस भेज दिया गया। आपने दिल्ली हाई कोर्ट में अपने निलंबन को चुनौती दी। कोर्ट ने आपके पक्ष में फैसला सुनाते हुआ कहा कि मिशनरी द्वारा किये जाने वाला कार्य संविधान के अंतर्गत आता हैं। संविधान में कोई धारा ऐसी नहीं है जो उन्हें अपने कार्यों को करने से रोकती हो।
     कोर्ट के फैसले से जहाँ ईसाई मिशनरियों की मानो लाटरी निकल गई मगर कोर्ट ने भारत देश की अखंडता और सुरक्षा की अनदेखी कर दी। कोर्ट ने धर्मान्तरण से होने वाले दूरगामी परिणामों की भी अनदेखी कर दी। कोर्ट ने वर्तमान एवं पूर्व में ईसाई मिशनरियों द्वारा देशविरुद्ध किये गए कार्यों को भी नहीं देखा। कोर्ट ने यह भी नहीं देखा कि तमिलनाडु के कुंडमकुलम के परमाणु संयंत्र का विरोध करने वालों में चर्च से सम्बंधित लोग संलिप्त पाए गए थे। कोर्ट ने यह भी नहीं देखा कि ओडिसा में स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या में चर्च समर्थक आतंकवादियों का हाथ था। कोर्ट ने यह भी नहीं देखा कि उत्तरपूर्वी राज्यों में रियांग वनवासी चर्च समर्थित हिंसा के कारण ही निर्वासित जीवन जी रहे हैं। कोर्ट ने यह भी नहीं देखा कि देश में होने वाले चुनावों में चर्च सरकार के चयन के लिए एकतरफ़ा फतवे जारी कर ईसाई समाज को प्रभावित करता हैं। कोर्ट ने यह भी नहीं देखा कि किस प्रकार देश में ईसाई मिशनरी धर्मान्तरण के कार्यों को प्रलोभन देकर कर रहे हैं। धर्मान्तरण पर बनी नियोगी कमेटी की रिपोर्ट को भी कोर्ट ने संज्ञान में नहीं लिया। संसद में ओमप्रकाश त्यागी द्वारा धर्मान्तरण के विरोध में प्रस्तुत किये गए विधेयक पर आज तक दोबारा चर्चा न होना भी चिंता का विषय हैं।

ईसाई धर्मान्तरण के विरुद्ध सबसे अधिक मुखर स्वर हमारे ही देश के गणमान्य व्यक्तियों ने उठाया हैं। महात्मा गाँधी, स्वामी दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, स्वामी विवेकानंद, लाला लाजपत राय, डॉ अम्बेडकर, वीर सावरकर आदि ने चर्च द्वारा किये जाने वाले धर्मान्तरण के विरुद्ध अपना व्यक्तव्य दिया था।  उनका मानना था कि धर्मांतरण से आस्थाएं बदल जाती है, पूर्वजों के प्रति भाव बदल जाता है। जो पूर्वज पहले पूज्य होते थे, धर्मांतरण के बाद वही घृणा के पात्र बन जाते हैं। खान पान बदल जाता है, पहनावा बदल जाता है। नाम बदल जाते हैं, विदेशी नाम, जिसका अर्थ स्वयं उन्हें ही मालूम नहीं हो ऐसे नाम धर्मांतरण के बाद रखे जाते हैं। इसलिए धर्मांतरण का वास्तविक अर्थ राष्टांतरण है।

  धर्मांतरण के प्रति महात्मा गाँधी का भाव क्या था? यह उन्होंने अपनी आत्मकथा में उल्लेख किया है। यह तब की बात है जब वह विद्यालय में पढते थे। उन्होंने लिखा कि “ उन्हीं दिनों मैने सुना कि एक मशहूर हिन्दू सज्जन अपना धर्म बदल कर ईसाई बन गये हैं। शहर में चर्चा थी कि बपतिस्मा लेते समय उन्हें गोमांस खाना पडा और शराब पीनी पडी। अपनी वेशभूषा भी बदलनी पडी तथा तब से हैट लगाने और यूरोपीय वेशभूषा धारण करने लगे। मैने सोचा जो धर्म किसी को गोमांस खाने शराब पीने और पहनावा बदलने के लिए विवश करे वह तो धर्म कहे जाने योग्य नहीं है। मैने यह भी सुना नया कनवर्ट अपने पूर्वजों के धर्म को उनके रहन सहन को तथा उनके देश को गालियां देने लगा है। इस सबसे मुझसे ईसाइयत के प्रति नापसंदगी पैदा हो गई। ” ( एन आटोवाय़ोग्राफी आर द स्टोरी आफ माइं एक्सपेरिमेण्ट विद ट्रूथ, पृष्ठ -3-4 नवजीवन, अहमदाबाद)

गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि ईसाई मिशनरियों का मूल लक्ष्य उद्देश्य भारत की संस्कृति को समाप्त कर भारत का यूरोपीयकरण करना है। उनका कहना था कि भारत में आम तौर पर ईसाइयत का अर्थ है भारतीयों को राष्टीयता से रहित बनाना और उसका यूरोपीयकरण करना।

गांधीजी ने धर्मांतरण के लिए मिशनरी प्रयासों के सिद्धांतों का ही विरोध किया। गांधी जी मिशनरियों आध्यात्मिक शक्तिसंपन्न व्यक्ति नहीं मानते थे बल्कि उन्हें प्रोपगेण्डिस्ट मानते थे। गांधी जी ने एक जगह लिखा कि “ दूसरों के हृदय को केवल आध्यात्मिक शक्तिसंपन्न व्यक्ति ही प्रभावित कर सकता है। जबकि अधिकांश मिशनरी बाकपटु होते हैं, आध्यात्मिक शक्ति संपन्न व्यक्ति नहीं। “ ( संपूर्ण गांधी बाङ्मय, खंड-36, पृष्ठ -147)

गांधी जी ने क्रिश्चियन मिशन पुस्तक में कहा है कि "भारत में ईसाइयत अराष्ट्रीयता एवं यूरोपीयकरण का पर्याय बन चुकी है।"(क्रिश्चियम मिशन्स, देयर प्लेस इंडिया, नवजीवन, पृष्ठ-32)। उन्होंने यह भी कहा कि ईसाई पादरी अभी जिस तरह से काम कर रहे हैं उस तरह से तो उनके लिए स्वतंत्र भारत में कोई भी स्थान नहीं होगा। वे तो अपना भी नुकसान कर रहे हैं। वे जिनके बीच काम करते हैं उन्हें हानि पहुंचाते हैं और जिनके बीच काम नहीं करते उन्हें भी हानि पहुंचाते हैं। सारे  देश को वे नुकसान पहुंचाते हैं। गाधीजी धर्मांतरण (कनवर्जन) को मानवता के लिए भयंकर विष मानते थे। गांधी जी ने बार -बार कहा कि धर्मांतरण महापाप है और यह बंद होना चाहिए।"

उन्होंने कहा कि “मिशनरियों द्वारा बांटा जा रहा पैसा तो धन पिशाच का फैलाव है।“ उन्होंने कहा कि “ आप साफ साफ सुन लें मेरा यह निश्चित मत है, जो कि अनुभवों पर आधारित हैं, कि आध्यात्मिक विषयों पर धन का तनिक भी महत्व नहीं है। अतः आध्य़ात्मिक चेतना के प्रचार के नाम पर आप पैसे बांटना और सुविधाएं बांटना बंद करें।"

1935 में एक मिशनरी नर्स ने गांधी जी से पूछा “क्या आप धर्मांतरण के लिए मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगा देना चाहते है? गांधी जी ने उत्तर दिया “मैं रोक लगाने वाला कौन होता हूँ, अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं, तो मैं धर्मांतरण का यह सारा धंधा ही बंद करा दूँ।मिशनरियों के प्रवेश से उन हिन्दू परिवारों में, जहाँ मिशनरी पैठे हैं, वेशभूषा, रीति-रिवाज और खान-पान तक में परिवर्तन हो गया है। आज भी हिन्दू धर्म की निंदा जारी हैं ईसाई मिशनों की दुकानों में मरडोक की पुस्तकें बिकती हैं। इन पुस्तकों में सिवाय हिन्दू धर्म की निंदा के और कुछ है ही नहीं। अभी कुछ ही दिन हुए, एक ईसाई मिशनरी एक दुर्भिक्ष-पीडित अंचल में खूब धन लेकर पहुँचा वहाँ अकाल-पीडितों को पैसा बाँटा व उन्हें ईसाई बनाया फिर उनका मंदिर हथिया लिया और उसे तुडवा डाला। यह अत्याचार नहीं तो क्या है, जब उन लोगों ने ईसाई धर्म अपनाया तो तभी उनका मंदिर पर अधिकार समाप्त। वह हक उनका बचा ही नहीं। ईसाई मिशनरी का भी मंदिर पर कोई हक नहीं। पर वह मिशनरी का भी मंदिर पर कोई हक नहीं। पर वह मिशनरी वहाँ पहुँचकर उन्हीं लोगों से वह मंदिर तुडवाला है, जहाँ कुछ समय पहले तक वे ही लोग मानते थे कि वहाँ ईश्वर वास है। ‘‘ ( संपूर्ण गांधी बांङ्मय खंड-61 पृष्ठ-48-49)

स्वामी दयानन्द ने एक बार कहा था कि देखो जयपुर आदि नगरों में गिरिजाघर बन  गए है जहाँ पर आर्यों के पुरोधा श्री राम और श्री कृष्ण की निंदा की जाती हैं। इस पर शासक वर्ग को ध्यान देना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में अनेक ईसाई पादरियों से शास्त्रार्थ कर वेदों के पक्ष को बाइबिल के सिद्धांतों से बेहतर सिद्ध किया। सत्यार्थ प्रकाश रूपी ग्रन्थ में उन्होंने 13 वें समुल्लास में ईसाई मत की तार्किक विवेचना कर हिन्दू समाज पर जो अप्रतिम उपकार किया। वह उसके लिए धन्य हैं।लाला लाजपत राय द्वारा प्राकृतिक आपदाओं में अनाथ बच्चों एवं विधवा स्त्रियों को मिशनरी द्वारा धर्मान्तरित करने का पुरजोर विरोध किया गया जिसके कारण यह मामला अदालत तक पहुंच गया। ईसाई मिशनरी द्वारा किये गए कोर्ट केस में लाला जी की विजय हुई एवं एक आयोग के माध्यम से लाला जी ने यह प्रस्ताव पास करवाया की जब तक कोई भी स्थानीय संस्था निराश्रितों को आश्रय देने से मना न कर दे तब तक ईसाई मिशनरी उन्हें अपना नहीं सकती। डॉ अम्बेडकर को ईसाई समाज द्वारा अनेक प्रलोभन ईसाई मत अपनाने के लिए दिए गए मगर यह जमीनी हकीकत से परिचित थे की ईसाई मत ग्रहण कर लेने से भी दलित समाज अपने मुलभुत अधिकारों से वंचित ही रहेगा। वीर सावरकर कहते थे “यदि कोई व्यक्ति धर्मान्तरण करके ईसाई या मुसलमान बन जाता है तो फिर उसकी आस्था भारत में न रहकर उस देश के तीर्थ स्थलों में हो जाती है जहाँ के धर्म में वह आस्था रखता है, इसलिए धर्मान्तरण यानी राष्ट्रान्तरण है।
इस प्रकार से प्राय: सभी देशभक्त नेता ईसाई धर्मान्तरण के विरोधी रहे है एवं उसे राष्ट्र एवं समाज के लिए हानिकारक मानते है।

भारत में वर्तमान में प्रत्येक राज्य में बड़े पैमाने पर ईसाई धर्मप्रचारक मौजूद है जो मूलत: ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय हैं। अरुणालच प्रदेश में वर्ष 1971 में ईसाई समुदाय की संख्या 1 प्रतिशत थी जो वर्ष 2011 में बढ़कर 30 प्रतिशत हो गई है। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय राज्यों में ईसाई प्रचारक किस तरह से सक्रिय हैं। इसी तरह नगालैंड में ईसाई जनसंख्‍या 93 प्रतिशत, मिजोरम में 90 प्रतिशत, मणिपुर में 41 प्रतिशत और मेघालय में 70 प्रतिशत हो गई है। चंगाई सभा और धन के बल पर भारत में ईसाई धर्म तेजी से फैल रहा है।

 वर्ष 2011 में भारत की कुल आबादी 121.09 करोड़ है। जारी जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में ईसाइयों की आबादी 2.78 करोड़ है। जो देश की कुल आबादी का 2.3% है। ईसाइयों की जनसंख्या वृद्धि दर 15.5% रही, जबकि सिखों की 8.4%, बौद्धों की 6.1% और जैनियों की 5.4% है। ध्यान दीजिये ईसाईयों की वृद्धि दर का कारण केवल ईसाई समाज में बच्चे अधिक पैदा होना नहीं हैं। अपितु हिन्दुओं का ईसाई मत को स्वीकार करना भी हैं।

इसलिए राष्ट्रहित को देखते हुए धर्मान्तरण पर लगाम देश में अवश्य लगनी चाहिए। 




Wednesday, January 9, 2019

रामायणकालीन वैदिक संस्कृति



🌷रामायणकालीन वैदिक संस्कृति🌷


सन्ध्या और अग्निहोत्र:

बाल्मीकि रामायण से विदित होता है कि उस काल में आर्यों की उपासना सन्ध्या के रुप में होती थी।जप, प्राणायाम तथा, अग्निहोत्र के भी विपुल उल्लेख मिलते हैं। पौराणिक मूर्तिपूजा, व्रत, तीर्थ, नामस्मरण या कीर्तन रुप में धार्मिक कृत्य का वर्णन मूलतः नहीं है। क्षणिक उल्लेख जो इस सम्बन्ध में मिलते भी हैं वे अप्रासङ्गिक प्रक्षेप या मूलकथा से असम्बद्ध हैं।

ईशस्तुति, सन्ध्या, गायत्री जप, अग्निहोत्र और प्राणायाम के कुछ प्रसंग द्रष्टव्य हैं―

कौशल्या-सुप्रजा-राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते ।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल ! कर्तव्यं दैवमाह्रिकम् ।।―(बालकाण्ड ३३/२)
भावार्थ―महर्षि विश्वामित्र ने कहा―हे कौशल्या नन्दन राम ! प्रातः कालीन सन्ध्या का समय हो रहा है। हे नरशार्दूल ! उठो और नैत्यिक कर्तव्य-सन्ध्या और देवयज्ञ करो।


तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ ।
स्नात्वा कृतोदकौ वीरौ जेपतुः परमं जपम् ।।―(बाल०का० २३/३)
भावार्थ―ऋषि विश्वामित्र के इस उदार वचनों को सुनकर दोनों भाई (राम और लक्ष्मण) उठे, स्नान आदि से निवृत्त होकर परम जप (गायत्री का जाप) किया।


कुमारावपि तां रात्रिमुषित्वा सुसमाहितौ ।
प्रभातकाले चोत्थाय पूर्वां सन्ध्यामुपास्य च ।। ३१ ।।
प्रशुची परमं जाप्यं समाप्य नियमेन च ।
हुताग्निहोत्रमासीनं विश्वामित्रमवन्दताम् ।। ३१ ।।―(बाल० का० २९वां सर्ग)
भावार्थ―राम,लक्ष्मण दोनों राजकुमार सावधानी के साथ रात्रि व्यतीत करके प्रातःकाल उठे और सन्ध्योपासना की। अत्यन्त पवित्र होकर परम जप गायत्री का नियमपूर्वक उन्होंने जप किया और उसके बाद अग्निहोत्र करके बैठे हुए गुरु विश्वामित्र को अभिवादन किया।


आश्वासितो लक्ष्मणेन रामः सन्ध्यामुपासत ।―(युद्धकाण्ड ५/२३)
भावार्थ―सीता के शोक से दुःखी राम ने लक्ष्मण द्वारा धैर्य बंधाने पर (आश्वासित) सन्ध्योपासना की।


सीता को खोजते हुए हनुमान् अशोकवाटिका में एक पवित्र सुन्दर नदी को देखकर सोचते हैं―

सन्ध्याकालमनाः श्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी।
नदीं चेमां शुभजलां सन्ध्यार्थे वरवर्णिनी ।।―(सुन्दरकाण्ड १४/४९)
भावार्थ―यदि सीता जीवित होंगी तो प्रातःकालीन सन्ध्या के लिए इस सुन्दर जलवाली नदी के तट पर, सन्ध्या के योग्य इस स्थल पर अवश्य आयेंगी।


तस्मिन् कालेपि कौशल्या तस्थावामीलितेक्षणा ।
प्राणायामेन पुरुषं ध्यायमाना जनार्दनम् ।।―(अयो० ४/३२-३३)
भावार्थ―श्रीराम जब कौशल्या जी के भवन में गये उस समय कौशल्या नेत्र बन्द किये ध्यान लगाए बैठी थीं और प्राणायाम के द्वारा परमपुरुष परमात्मा का ध्यान कर रही थीं।


सा क्षौमवसना ह्रष्टा नित्यं व्रतपरायणा ।
अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत्कृतमङ्गला ।।―(अयो० २०/१५)
भावार्थ―रेशमी वस्त्र पहनकर राममाता कौशल्या प्रसन्नता के साथ निरन्तर व्रतपरायण होकर मङ्गल कृत्य पूर्ण करने के पश्चात् मन्त्रोचारणपूर्वक उस समय अग्नि में आहुति दे रही थीं।


गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः ।
सह पत्न्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागतम् ।।―(अयो० ६/१)
भावार्थ―पुरोहित के चले जाने पर श्रीराम ने स्नान करके नियत मन से विशाललोचना पत्नि सीता सहित परमात्मा की उपासना की।


(२) वेद वेदाङ्ग का अध्ययन:

रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता।
वेदवेदाङ्गत्तत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः।।―(बाल० १/१४)
भावार्थ―राम स्वधर्म और स्वजनों के पालक वेद-वेदाङ्गों के तत्त्ववेत्ता तथा धनुर्वेद में प्रवीण थे।


सर्वविद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित् ।।―(अयो० १/२०)
भावार्थ―श्रीराम सर्वविद्याव्रतस्नातक तथा छहों अङ्गों सहित सम्पूर्ण वेदों के यथार्थ ज्ञाता थे।


अस्मिन् च चलते धर्मो यो धर्म नातिवर्तते।
यो ब्राह्ममस्रं वेदांश्च वेदविदां वरः।।―(युद्धकाण्ड २८/१९)
भावार्थ―धर्म श्रीराम से कभी अलग नहीं होता। श्रीराम धर्म का कभी उल्लंघन नहीं करते। वे ब्रह्मास्र और वेद दोनों के ज्ञाता थे तथा वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ थे।


(३) रावण भी वेदविद्याव्रत स्नातक था:

वेदविद्यावर्तस्नातः स्वकर्मनिरतस्तथा।
स्रियः कस्माद् वधं वीर ! मन्यसे राक्षसेश्वर।।―(युद्धकाण्ड ९२/६४)
भावार्थ―सुपार्श्व नामक बुद्धिमान् रावण के मन्त्री ने रावण से कहा―हे रावण ! तू वेदविद्याव्रतस्नातक तथा स्वकर्मपरायण होकर स्रीवध (सीता का वध) क्यों करना चाहता है?


इस प्रकार रावण वेदविद्यावित् होने पर भी पापी क्यों माना जाता है? इसका उत्तर हनुमान् के निम्न कथन से मिलता है―

अह रुपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः।
अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता।। १७ ।।
यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः।
स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता।। १८ ।।―(सुन्दर०का० ४९वां सर्ग)

भावार्थ―रावण को देखकर हनुमान् मुग्ध हो जाते हैं। वे कहते हैं―अहो रावण का रुप सौन्दर्य ! अहो धैर्य ! कैसी अनुपम शक्ति ! और कैसा आश्चर्यजनक तेज ! राक्षसराज रावण का राजोचित सर्वलक्षणों से सम्पन्न होना कितने आश्चर्य की बात है । यदि इसमें अधर्म प्रबल न होता तो यह इन्द्रसहित देवलोक का भी स्वामी बन सकता था।

अतः वेदवेत्ता होने पर भी अपनी आचारहीनता से रावण अधर्मी और पापी माना गया।

कहा भी गया है―
आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः ।―(मनुस्मृति ६/३)

आचार से हीन दुराचारी व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते।

आर्य शब्द के प्रमाण



आर्य शब्द के प्रमाण

*_सृष्टि की समकालीन पुस्तक ऋग्वेद में_:-*

*(१) कृण्वन्तो विश्वमार्यम ।*

*अर्थ*- सारे संसार को 'आर्य' बनाओ।

*_मनुस्मृति में_:-*

*(२) मद्य मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः।*
*आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः।।*

*अर्थ*- वे ग्राम व नगरवासी जो मद्य, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं वे 'आर्य' कहे जाते हैं।

*_वाल्मीकि रामायण में_-*

*(३) सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।*
*आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।-(बालकाण्ड)*

*अर्थ*- जिस तरह नदियाँ समुद्र के पास जाती हैं उसी तरह जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं वे 'आर्य' हैं जो सब पर समदृष्टि रखते हैं हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं।

*(५) _महाभारत में_:-*

*न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति।*
*न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या।।(उद्योग पर्व)*

*अर्थ*:- जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते उन शील पुरुषों को 'आर्य' कहते हैं।

*(६) _वशिष्ठ स्मृति में_-*
*कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।*
*तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।*

*अर्थ*:- जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्ठता, धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो उसे 'आर्य' कहते हैं।

*(७) _निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं_-*
*आर्य ईश्वर पुत्रः।*

*अर्थ―*'आर्य' ईश्वर के पुत्र हैं।

*(८) _विदुर नीति में_-*
*आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।*
*हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।-(अध्याय १ श्लोक ३०)*

*अर्थ*:- भरत कुल भूषण! पण्डित जन्य जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं वही 'आर्य' हैं।

*(९) _गीता में_-*
*अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन।*
–(अध्याय २ श्लोक २)

*अर्थ*:- हे अर्जुन तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है (यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं)।

*(१०) _चाणक्य नीति में_-*

*अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते।*
*गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते।।-(अध्याय ५ श्लोक ८)*

*अर्थ*:- सतत् अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल-उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है,आर्य-श्रेष्ठ मनुष्य गुणों के द्वारा जाना जाता है।

*(११) _नीतिकार के शब्दों में_-*

*प्रायः कन्दुकपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि।*
*तथा त्वनार्ष पतति मृत्पिण्ड पतनं यथा।।*

*अर्थ*:- आर्य पाप से च्युत होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है अर्थात् पतन से अपने आपको बचा लेता है,अनार्य पतित होता है तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता।

*(१२) _अमरकोष में_:-*

*महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः।-(अध्याय२ श्लोक६ भाग३)*

*अर्थ*:- जो आकृति,प्रकृति,स
भ्यता,शिष्टता,धर्म,कर्म,विज्ञा
न,आचार,विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो उसे 'आर्य' कहते हैं।

*(१३) _कौटिल्य अर्थशास्त्र में_-*

*व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः।*

*अर्थ*:- आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके वही 'आर्य' राज्याधिकारी है।

*(१४) _पंचतन्त्र में_-*

*अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा।*

*अर्थ*:- सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं।

*(१५) _धम्म पद में_:-*

*अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो।*

*अर्थ*:- पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है।

*(१६) _पाणिनि सूत्र में_:-*

*आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः।*

*अर्थ*:- ब्राह्मणों में 'आर्य' ही श्रेष्ठ है।

*(१७) _काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर_-*

*आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः।*

*अर्थ*:- आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है।

*(१८) _आर्यों के सम्वत् में_:-*

*जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते।*

ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं अर्थात् यह आर्यों का देश 'आर्यावर्त्त' है।

*(१९) _आचार्य चतुरसेन और आर्य शब्द_:-*

उठो आर्य पुत्रो नहि सोओ।
समय नहीं पशुओं सम खोओ।
भंवर बीच में होकर नायक।
बनो कहाओ लायक-लायक।।

*अर्थ*:- तुम्हारा जीवन पशुओं के समान निद्रा के वशीभूत होने के लिए निर्माण नहीं हुआ है।यह समय तुम्हें पुरुषार्थ करने का है,यदि जीवन में तुम पुरुषार्थ करोगे तो किसी कहानी के नायक बनकर समाज के आगे उपस्थित होवोगे।

*(२०) _पं. प्रकाशचन्द कविरत्न के शब्दों में:-_*

आर्य-बाहर से आये नहीं,
देश है इनका भारतवर्ष।
विदेशों में भी बसे सगर्व,
किया था परम प्राप्त उत्कर्ष।।
आर्य और द्रविड जाति हैं,
भिन्नचलें यह विदेशियों की चाल।
खेद है कुछ भारतीय भी,
व्यर्थ बजाते विदेशियों सम गाल।।

*(२१) _पं. राधेश्याम कथावाचक बरेली वाले और आर्य शब्द_:–*

जब पंचवटी में सूर्पणखा राम के पास मोहित होकर अपना विवाह करने की बात राम से कहती है,तब राम उत्तर देते हैं―
हम आर्य जाति के क्षत्रीय हैं,
रघुवंशी वैदिक धर्मी हैं।
जो करें एक से अधिक विवाह,
कहते वेद उन्हें दुष्कर्मी हैं।

अब आप तय करो कि यह सब त्याग कर हिंदू कहलाना पसंद करोगे या मूल वैदिक सनातन धर्म के लिये हिंदू शब्द को त्यागकर आर्य कहलाना ?

जय आर्य जय आर्यावर्त्तआर्य' शब्द के प्रमाण*

*_सृष्टि की समकालीन पुस्तक ऋग्वेद में_:-*

*(१) कृण्वन्तो विश्वमार्यम ।*

*अर्थ*- सारे संसार को 'आर्य' बनाओ।

*_मनुस्मृति में_:-*

*(२) मद्य मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः।*
*आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः।।*

*अर्थ*- वे ग्राम व नगरवासी जो मद्य, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं वे 'आर्य' कहे जाते हैं।

*_वाल्मीकि रामायण में_-*

*(३) सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।*
*आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।-(बालकाण्ड)*

*अर्थ*- जिस तरह नदियाँ समुद्र के पास जाती हैं उसी तरह जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं वे 'आर्य' हैं जो सब पर समदृष्टि रखते हैं हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं।

*(५) _महाभारत में_:-*

*न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति।*
*न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या।।(उद्योग पर्व)*

*अर्थ*:- जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते उन शील पुरुषों को 'आर्य' कहते हैं।

*(६) _वशिष्ठ स्मृति में_-*
*कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।*
*तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।*

*अर्थ*:- जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्ठता, धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो उसे 'आर्य' कहते हैं।

*(७) _निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं_-*
*आर्य ईश्वर पुत्रः।*

*अर्थ―*'आर्य' ईश्वर के पुत्र हैं।

*(८) _विदुर नीति में_-*
*आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।*
*हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।-(अध्याय १ श्लोक ३०)*

*अर्थ*:- भरत कुल भूषण! पण्डित जन्य जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं वही 'आर्य' हैं।

*(९) _गीता में_-*
*अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन।*
–(अध्याय २ श्लोक २)

*अर्थ*:- हे अर्जुन तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है (यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं)।

*(१०) _चाणक्य नीति में_-*

*अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते।*
*गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते।।-(अध्याय ५ श्लोक ८)*

*अर्थ*:- सतत् अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल-उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है,आर्य-श्रेष्ठ मनुष्य गुणों के द्वारा जाना जाता है।

*(११) _नीतिकार के शब्दों में_-*

*प्रायः कन्दुकपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि।*
*तथा त्वनार्ष पतति मृत्पिण्ड पतनं यथा।।*

*अर्थ*:- आर्य पाप से च्युत होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है अर्थात् पतन से अपने आपको बचा लेता है,अनार्य पतित होता है तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता।

*(१२) _अमरकोष में_:-*

*महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः।-(अध्याय२ श्लोक६ भाग३)*

*अर्थ*:- जो आकृति,प्रकृति,स
भ्यता,शिष्टता,धर्म,कर्म,विज्ञा
न,आचार,विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो उसे 'आर्य' कहते हैं।

*(१३) _कौटिल्य अर्थशास्त्र में_-*

*व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः।*

*अर्थ*:- आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके वही 'आर्य' राज्याधिकारी है।

*(१४) _पंचतन्त्र में_-*

*अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा।*

*अर्थ*:- सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं।

*(१५) _धम्म पद में_:-*

*अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो।*

*अर्थ*:- पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है।

*(१६) _पाणिनि सूत्र में_:-*

*आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः।*

*अर्थ*:- ब्राह्मणों में 'आर्य' ही श्रेष्ठ है।

*(१७) _काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर_-*

*आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः।*

*अर्थ*:- आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है।

*(१८) _आर्यों के सम्वत् में_:-*

*जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते।*

ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं अर्थात् यह आर्यों का देश 'आर्यावर्त्त' है।

*(१९) _आचार्य चतुरसेन और आर्य शब्द_:-*

उठो आर्य पुत्रो नहि सोओ।
समय नहीं पशुओं सम खोओ।
भंवर बीच में होकर नायक।
बनो कहाओ लायक-लायक।।

*अर्थ*:- तुम्हारा जीवन पशुओं के समान निद्रा के वशीभूत होने के लिए निर्माण नहीं हुआ है।यह समय तुम्हें पुरुषार्थ करने का है,यदि जीवन में तुम पुरुषार्थ करोगे तो किसी कहानी के नायक बनकर समाज के आगे उपस्थित होवोगे।

*(२०) _पं. प्रकाशचन्द कविरत्न के शब्दों में:-_*

आर्य-बाहर से आये नहीं,
देश है इनका भारतवर्ष।
विदेशों में भी बसे सगर्व,
किया था परम प्राप्त उत्कर्ष।।
आर्य और द्रविड जाति हैं,
भिन्नचलें यह विदेशियों की चाल।
खेद है कुछ भारतीय भी,
व्यर्थ बजाते विदेशियों सम गाल।।

*(२१) _पं. राधेश्याम कथावाचक बरेली वाले और आर्य शब्द_:–*

जब पंचवटी में सूर्पणखा राम के पास मोहित होकर अपना विवाह करने की बात राम से कहती है,तब राम उत्तर देते हैं―
हम आर्य जाति के क्षत्रीय हैं,
रघुवंशी वैदिक धर्मी हैं।
जो करें एक से अधिक विवाह,
कहते वेद उन्हें दुष्कर्मी हैं।
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
जय आर्य जय आर्यावर्त्त

Tuesday, January 8, 2019

Sai Baba Or Chand Miya? What is Truth



Sai Baba Or Chand Miya? What is Truth

[Attached Pic- Defamation of Lord Ganesha by making him to sit in the lap of Sai Baba]

D.S.Balaji Arya

The great Vedic Religion is governed by the Supreme Vedas; the one and the only word of God. The knowledge gifted by the supreme lord for the guidance and governance for an ideal life. We once ruled the whole world through its intellect and wisdom of Knowledge. We achieved this great credits due to the Philosophy of Vedas.
Unfortunately, with the time passing by, especially in the past 5 thousand years, we have almost forgotten the true message of God. We even forgot that our country was names as Aryavarta. The great Vedic culture degenerated to multiple self-proclaimed cults and sects. Truly speaking the whole world including our country suffered a lot due to these man-made Religions.The cults originated in our country brought our great nation to ignorant society suffering from sins like caste system and superstitions. Today numerous God-man and self claimed Avatars of God are mushrooming in our Country.

Presently most famous among many is Sai Baba. The real name of Sai Baba was Chand Miya. Yes dear readers i am saying Chand Miya, a Muslim. Hindus are blindly following Chand Miya hearing his multiple stories of miracles. Hindus like a sheep following sheep are visiting Shirdi thinking that their wishes will be fulfilled by his miracles. Sadly they even forgot the message of Lord Krishna in Gita that As you sow so shall you reap.

Based on many logical facts available from his biography named Sai Sat Charita i am producing many unknown aspects.

Fact #1 - His name was definitely not Sai; so he can't be called that.

Fact #2 - He was a Muslim so he can be called Miya. So, we will be addressing him as Miya throughout the article.

Fact #3 - He himself never said he is God or an Avatar.

Fact #4 - He never asked anybody to make his idols and worship him.

Fact #5 - He never said - Sabka Maalik Ek. He clearly said Sabka Maalik Allah!

Fact #6 - He used to live in a mosque in Shirdi and used to eat meat Biryani.

Fact #7 - He after his death was buried in a Muslim Grave.

Chand Miya was neither a trained Acharya nor a Rishi. Even he did not possessed any knowledge of religious scripture. He had absolutely no credibility to preach about religion or spirituality. Spirituality is not an area where amateurs have any place. Would anybody allow an illiterate to teach physics? Do we allow an unqualified person to train an athlete? Then why do we take credit and qualifications for granted when it comes to spiritual teaching? One has to be a trained, qualified scholar to teach spirituality.

Sai Baba was nothing more than an a fraud who confused people in the name of spirituality and religion. I am asking all readers an open question. What is contribution of Sai Baba to our Hindu Religion? Nothing. Except that on his name superstitions are being promoted blindly. If we closely watch in almost all temples of Hindus Sai Idol is established. Slowly we are forgetting our Rama and Krishna. We can see huge gatherings of every Thursday in Sai temples.

Now, lets us observe few life events of Sai Baba which proves he was neither God nor a spiritual man.

(1). Sai Baba Was A Meat Eater - Sai Satcharit Chapter 38 - Sai Baba, not only ate meat but he also encouraged his blind followers into eating meat. He regularly served meat to his followers in his mosque. This self-proclaimed god-man, who is today worshipped as a god didn't even possess the intellect of a common human being. How can somebody who killed innocent animals for food be worshipped as a god?

(2). Sai Baba Was a Muslim Extremist - Chapter 4- Like the commonly propagated slogan by Sai Bhakts "Sabhka Maalik Ek" Sai never said "Sabka Maalik Ek". Sai Baba always said "Sabhka Maalik Allah". He did regular Namaj, he sacrificed animals on Bakra Id and practised Islam. He was a practising Muslim throughout his life. He even asked his followers to bury him with all Islamic practices after he dies.

(3). Sai Baba Fooled People - In Chapter 7 of Sai Satcharit, comes an event where it's written that Sai Baba pulled out his intestines and hanged it on a tree. Like all the fraud babas Sai propagated such non-sense for fooling innocent people into believing him as some supernatural deity. And, his ignorant followers did everything in their power to spread such stupidity.

(4). Sai Baba was a Smoker - Chapter - 47 and 50 - Sai daily smoked Chillam(Weed) and was badly addicted to it. This self-proclaimed god man smoked weed just
like an addict. He used to spend all his day and night indulging in these addictions.

This Sai Baba spread superstitions. People in huge numbers visit Shirdi every day with their prayers. They pray for jobs, marriage, blessings and all kind of materialists things; standing in front of Sai's Stone Carved Statue. Millions of such prayers are never fulfilled. But one prayer which gets fulfilled out of a mere coincidence is propagated with full intensity just to drive more crowd to Sai Baba. Bollywood actors had a huge hand into propagating Sai Baba. During 1990's Shirdi Sai Baba was promoted in many movies, Shirdi Sai was visited by many actors just to propagate this agenda.


Many TV series, stories were spread all around the country to pose Sai as the new God. Unfortunately, they succeeded and today, a drug addict, meat-eating fraud Sai is being worshipped more than Shri Ram, Shri Krishna or any Mahapurusha.

Sai Baba was planted by Anti-national, Anti Dharma forces just to divert the Hindu Crowd from real spirituality. A Sai Bhakt will never raise his voice against animal sacrifice or cow killing. Sai Bhakts will never speak against addiction. A Sai Bhakt will never bother to read any Vedic scripture. Sai Bhakt just like Sai Himself will live in oblivion with no spiritual knowledge, with no action to improvise their lives.

We need to raise our voices against such Anti-Hindu forces. We need to move towards our scriptures,the Vedas. we need to remember our true Great ancestors like Shri Ram, Shri Krishna who lived and died for Dharma.