Tuesday, September 18, 2018

मानवता को महर्षि मनु की देन



मानवता को महर्षि मनु की देन

लेखक- डॉ० सुरेन्द्र कुमार (मनुस्मृति भाष्यकार)


प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ,डॉ विवेक आर्य

'मनुस्मृति नामक धर्मशास्त्र और संविधान के प्रणेता राजर्षि मनु 'स्वायम्भुव' न केवल भारत की, अपितु सम्पूर्ण मानवता की धरोहर हैं। आदिकालीन समाज में मानवता की स्थापना, संस्कृति-सभ्यता का निर्माण और इनके विकास में राजर्षि मनु का उल्लेखनीय योगदान रहा है। यही कारण है कि भारत के विशाल वाङ्मय के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों के साहित्य में मनु और मनुवंश का कृतज्ञतापूर्ण स्मरण तथा उनसे सम्बद्ध घटनाओं का उल्लेख प्राप्त होता है। यह उल्लेख इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि प्राचीन समाज में मनु और मनुवंश का स्थान महत्वपूर्ण और आदरणीय था। जिस प्रकार विभिन्न कालखण्डों में उत्पन्न विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने तथा उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिये उनका नाम स्थानों, नगरों आदि के साथ जोड़ दिया जाता है उसी प्रकार प्राचीन समाज ने मनु और मनुवंश का नाम सृष्टि के कालखण्डों के साथ जोड़कर चौदह मन्वन्तरों का नाम चौदह मनुओं के नाम पर रखा जिनमें प्रथम मन्वन्तर का नाम 'स्वायम्भुव मन्वन्तर' है। आदि मानव-समाज के मूल रूप से जुड़ाव का जैसा अनोखा उदाहरण मनु स्वायम्भुव का मिलता है वैसा उदाहरण समाज में विरल ही मिलता है। जैसे वणिक् वर्ग के सभी व्यक्ति महाराजा अग्रसेन के वंशज, अनुयायी अथवा प्रजाजन होने के कारण 'अग्रवाल' कहते और लिखते हैं, ठीक उसी प्रकार आदि मनु स्वायम्भुव के वंशज, अनुयायी अथवा प्रजाजन होने के कारण संस्कृत में पाए जाने वाले 'आदमी' के वाचक प्रायः सभी शब्द मनु से व्युत्पन्न हैं, जैसे- मानव, मनुष्य, मनुज, मानुष आदि। यही नहीं समस्त यूरोपीय भाषाओं में भी इस प्रकार के शब्द मनुमूलक शब्दों के ही अपभ्रंश हैं, जैसे- अंग्रेजी में Man (मैन), जर्मनी में Mann (मन्न), Manesh (मनेश), लैटिन व ग्रीक में Mynos (मायनोस), स्पेनिश में Manna (मन्ना), आदि। यह सम्बन्ध यह सिद्ध करता है कि मनु मानव समाज के आदि पुरुषों में से हैं और उनका समाज में अति महत्वपूर्ण योगदान और स्थान रहा है। दुख का विषय यह है कि मानव समाज के आदि व्यवस्थापक और मानवीय मूल्यों के आदि संस्थापक, आदि राजा और आदि संविधानप्रदाता राजर्षि एवं महर्षि मनु का क्रमबद्ध पर्याप्त इतिहास हमें उपलब्ध नहीं है, वह फुटकर रूप में उपलब्ध है। अत्यन्त प्राचीनता के कारण उनका इतिहास विस्मृति के अन्धकार में विलुप्त हो गया है। अब हमें उनके फुटकर ऐतिहासिक सन्दर्भों से इतिहास का अन्वेषण करना पड़ रहा है। जब तक हम उनका कालनिर्णय नहीं कर लेंगे तब तक मानव समाज और मानवता के लिये उनकी देन का सही सही मूल्यांकन नहीं कर पाएंगे। अतः पहले उनके कालनिर्णय पर अत्यन्त संक्षेप से विचार किया जाता है।

आज हमें यह भ्रान्तिपूर्ण निष्कर्ष पढ़ा-पढ़ा कर रटा दिया गया है कि मनुस्मृति और उसके रचयिता मनु ब्राह्मण राजा पुष्यमित्र शुङ्ग के समकालीन थे और उसका रचना काल १८५ ईस्वी पूर्व का है। इससे भी महाभ्रान्त निष्कर्ष यह दिया गया है कि मनुस्मृति जन्मना जातिवादी शास्त्र है और स्त्रियों तथा शूद्रों का विरोधी है। इन निष्कर्षों के निर्णय, प्रचार और प्रसार में कुछ उन पाश्चात्य लेखकों का षड्यन्त्र है जो 'फूट डालो और राज करो' के लक्ष्य के प्रति समर्पित थे। उन्होंने इस प्रकार के विचार दिए तो थे शैक्षिक कूटनीति के अन्तर्गत किन्तु हम लोगों ने उनको "ब्रह्मावाक्यं प्रमाणम्" के समान सम्मान्य करके गद्गद होकर स्वीकार कर लिया। ये विचार सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय, इतिहास, परम्परा और उनकी मूलभावना के विरुद्ध हैं, अतः सर्वथा अस्वीकार्य ही नहीं अपितु निन्दनीय भी हैं। किसी भी देश या समाज के समृद्ध साहित्य, संस्कृति-सभ्यता के इतिहास में वर्णित तर्कसंगत तथ्यों को तोड़ मरोड़कर, विकृत करके, निहित स्वार्थ के कारण, गलत रूप में प्रस्तुत करने का षड्यन्त्र करना एक साहित्यिक अपराध है और अपराध कभी प्रशंसनीय तथा स्वीकार्य नहीं होता।

आइए, इस निष्कर्ष का सप्रमाण विवेचन करें कि मनुस्मृति मूलतः पुष्यमित्र (१८५ ई० पूर्व०) के समकालीन ग्रन्थ है या नहीं? पाश्चात्य लेखकों के मतानुसार भी यदि इस बात की परीक्षा करें तो ३००-४०० ईस्वी पूर्व के कवि भास रचित 'प्रतिमा नाटक' में मनुस्मृति का उल्लेख एक प्रसिद्ध पठनीय धर्मशास्त्र के रूप में आता है। रावण के मुख से उच्चरित वचन है-

'काश्यप गोत्रोऽस्मि सांगोपांग वेदमधीये मानवीयं धर्मशास्त्रम्,
माहेश्वरं योगशास्त्रम् --- च ।' (पृ० ७६)

५०० ई० पूर्व महात्मा बुद्ध के उपदेशों में जो कि 'धम्मपद' के नाम से संकलित हैं मनुस्मृति २.१२१ और २.१५६ दो श्लोक पालि भाषा में यथावत् रूपान्तरित हैं। वंशावली के अनुसार, गौतम बुद्ध स्वायम्भुव मनु के वंश में उत्पन्न सातवें मनु श्रद्धादेव वैवस्वत के उपरान्त १४६ प्रमुख और प्रसिद्ध राजाओं के पश्चात् हुए। उससे पूर्व 'महाभारत' में दर्जनों स्थानों पर स्वायम्भुव मनु तथा उनसे सम्बद्ध घटनाओं का उल्लेख है और मनुस्मृति के दो सौ से अधिक श्लोक यत्र तत्र उध्दृत मिलते हैं। उससे पूर्व के ग्रन्थ यास्क रचित 'निरुक्त' नामक ग्रन्थ में मनु स्वायम्भव का 'पुत्र पुत्री समानता' का मत उध्दृत किया हुआ है जो मनु० के ९,१३०,१९२ श्लोकों में उपलब्ध है। इसका रचना काल ८०० से ५०० ई० पू० माना जाता है। इस श्लोक की दूसरी विशेषता यह है कि इसमें मनु का काल 'विसर्गादौ' अर्थात् 'सृष्टि के आदि में' वर्णित किया है। बाल्मीकीय रामायण में राम बाली के संवाद में मनु के नाम से उध्दृत दो श्लोक और 'पुत्र की निरुक्ति-वर्णक' श्लोक वर्तमान मनुस्मृति के हैं। उससे भी प्राचीन ग्रन्थ शतपथ और ऐतरेय ब्राह्मण में राजा शर्यात मानव का वर्णन है जो सातवें मनु वैवस्वत के पुत्र ईश्वाकु का वंशज है। स्वायम्भुव मनु इससे सात मनु पूर्व के हैं। इन ग्रन्थों का न्यूनतम रचनाकाल ३००० ई० पूर्व माना गया है। इनसे भी पूर्व के संहिता ग्रन्थों में मनु के विधानों की, उपदेशों की प्रशंसा मिलती है। तैत्तिरीय संहिता में कहा है-

'मनुर्वै यत्किन्चावदत् तद् भेषजं भेषजतायै।' (तै० सं० २.२.१०.२; ३.१.९.४)

अर्थात्- 'मनु ने जो कुछ विधान किया है या उपदेश दिया है, वह औषध के समान कल्याणकारी है।'

मनुस्मृति की वर्णनशैली से हमें जानकारी मिलती है कि मनु अपने विधानों और आदेशों-निर्देशों का ग्रहण सीधे वेदों से करते हैं और वेद को ही परम प्रमाण मानते हैं। वेदों के अतिरिक्त मनुस्मृति में किसी मान्य शास्त्र या ग्रन्थ का उल्लेख नहीं मिलता। इसका अभिप्राय यह है कि मनुस्मृति के रचनाकाल तक उपर्युक्त साहित्य का निर्माण नहीं हुआ था। उपर्युक्त प्रमाणों से यह सिद्ध हो जाता है कि मनुस्मृति समस्त प्राचीन वाङ्मय से भी प्राचीनतर है। आंकड़ों के अनुसार वह समय क्या हो यह एक पृथक् प्रश्न है।

कुछ लोग मनुस्मृति की भाषा के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं कि इसकी भाषा प्राचीनतर नहीं है। उनके यह जानकारी देना चाहता हूं कि मनुस्मृति की भाषा में वैदिक प्रयोग और पूर्व पाणिनीय प्रयोग आज भी मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लोकसामान्य से सम्बद्ध इस शास्त्र की वैदिक भाषा में समयानुसार परिवर्तन करके उसे लौकिक भाषा-प्रधान बना दिया है, जैसे बाल्मीकीय रामायण को बनाया गया है। मनुस्मृति में शेष कुछ वैदिक प्रयोग द्रष्टव्य हैं-

क० 'आ हैव स नरवाग्रेभ्य:' (२.१६७)
ख० 'पुत्रका इति होवाच' (२.१५१)
ग० 'पितृणामात्मनश्च ह' (९.२८)

वंशावली की दृष्टि से देखें तो मनु स्वायम्भुव स्वयम्भू अर्थात् ब्रह्मा के पुत्र (कहीं-कहीं पौत्र) हैं। ब्रह्मा भारतीय-भारोपीय समाज का अदितम पुरुष हैं। उनसे पूर्व का न कोई इतिहास मिलत है, न वंशावली। इस आधार पर भी मनु आदिकालीन समाज के व्यक्ति सिद्ध होते हैं। यदि चीनी भाषा के साहित्य में प्राप्त उल्लेखों को प्रमाण मानें तो उसमें मनुस्मृति का रचनाकाल दस बारह हजार वर्ष पूर्व का घोषित किया गया है। यह भी वर्णित है कि मनुस्मृति वैदिक संस्कृत में रचित शास्त्र है और उसमें ६८० श्लोक हैं। इन सभी प्रमाणों से मनुस्मृति की प्राचीनता की पुष्टि होती है और यह स्पष्ट हो जाता है कि ईस्वी पूर्वी १८५ वर्ष के रचनाकाल की मान्यता निराधार, मिथ्या एवं कपोलकल्पित है।

मनु और मनुस्मृति का काल आदि समाज कालीन सिद्ध होने से उनके कार्यों का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। राजर्षि मनु द्वारा आदि कालीन समाज को व्यवस्थित करना, मानवीय मूल्यों की स्थापना करना, राज्यविहीन राष्ट्र में राजकता का निर्माण करना, मर्यादाओं का निर्धारण कर समाज में सुख-शान्ति का वातावरण बनाना, ये कार्य किसी आविष्कार से कम नहीं हैं। उनके ये कार्य मानवता की संस्थापना की दृष्टि से महान् कार्य हैं। वह मनु जिसने पहले पहल इन कार्यों को किया, वह मानवता के लिए सर्वोपरि महत्वपूर्ण हैं और वह शास्त्र जिसके माध्यम से यह महान् कार्य सम्पन्न हुआ है वह मानवता की अनुपम धरोहर है।

ज्ञात भारतीय इतिहास के, राजर्षि मनु आदितम राजा हैं और उनके द्वारा रचित मनुस्मृति नामक शास्त्र आदितम संविधान है जिसके अनुसार उन्होंने अपने शासन में मानव समाज को व्यवस्थित किया। बाल्मीकीय रामायण और पुराणों में मनु को आदिराजा कहा है और महाभारत के शान्ति पर्व में आदिराजा बनने की घटना का विवरण दिया गया है। वह इस प्रकार है- अराजकता से पीड़ित प्रजाएं पितामह ब्रह्मा के पास गईं और बोली- पितामह! किसी उपयुक्त व्यक्ति को राजा नियुक्त कीजिये, नहीं तो प्रजाएं नष्ट भ्रष्ट हो जाएंगी। ब्रह्मा ने अपने पुत्र मनु को राजा बनने का आदेश दिया किन्तु मनु ने अनिच्छा प्रकट की। ब्रह्मा ने पुन: आदेश दिया तो मनु को स्वीकार करना पड़ा। ब्राह्मण वंशीय मनु वर्ण परिवर्तन करके राजा बने और प्रजा का पुत्र के समान पालन करने लगे। विष्णुपुराण में भी इस घटना का संक्षिप्त उल्लेख है। राजर्षि मनु ने मनुस्मृति के अनुसार अपने शासन में व्यवस्थाओं और मर्यादाओं का निर्धारण किया। निरुक्तकार अाचार्य यास्क आदि ने मनुस्मृति को आदि संविधान कहा है। मनु के काल की भ्रान्ति होते हुए भी जो लेखक इस मत में एकमत हैं कि मनु आदि संविधान प्रणेता (First Law Giver) हैं। वे हैं- सर्वश्री पं० जवाहरलाल नेहरू, टी० देसाई, एन० आर० राघवचारी, अरविंद घोष, डॉ० राधाकृष्णन, डॉ० अम्बेडकर, ए० ए० मैक्डानल, पी० थामस, ए० बी० कीथ आदि।

अब हम यह कहते हैं कि मनु ने समाज को संविधान के द्वारा व्यवस्थित किया तो उसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने व्यक्ति को सामाजिक बनाया, उसे समाज में रहना सिखाया, साथ मिलकर रहना और उन्नति करना सिखाया। मनु का संविधान विश्व के देशों को इतना प्रभावोत्पादक लगा कि मनु और संविधान पर्याय बन गए। अनेक देशों में वहां के संविधान निर्माता को मनु की उपाधि से गौरवान्वित किया गया और मनुस्मृति के अनुकरण पर संविधान के निर्माण में गौरव अनुभव करते रहे। श्री पी० वी० काणे के अनुसार दक्षिणी वियतनाम में खुदाई में प्राप्त अभिलेखों में मनु के श्लोक उध्दृत मिलते हैं। इन्द्रवर्मा प्रथम (1799 ई०) के अभिलेख में राजधानी का वर्णन करते हुए लिखा है कि वहां निरुपद्रव वर्णाश्रम व्यवस्थिति थी। वर्मा का संविधान मनु पर आधारित था जिसका नाम 'धम्मथट्' अथवा 'मनुसार' था। बुद्धघोष ने सोलहवीं शाताब्दी में उसका पाली अनुवाद 'मनुसार' के नाम से किया था।

कम्बोडिया के लोग स्वयं को मनुवंशी मानते रहे हैं। राजा उदयवीर वर्मा के अभिलेख में वहां के संविधान का नाम 'मानव नीतिसार' दिया है। जय वर्मा प्रथम के अभिलेख से ज्ञात होता है कि वहां 'मनुसंहिता' को आदर से पढ़ा जाता था। जय वर्मा पंचम (668 ईस्वी) के एक अभिलेख में घोषणा की है कि उसने वर्णाश्रम व्यवस्था की स्थापना दृढ़ता से की। यशोवर्मा के "प्रसम कोमनप" नामक स्थान से प्राप्त अभिलेख में मनुस्मृति का २.१३६ श्लोक उध्दृत है जिसमें सम्मान व्यवस्था के मानदण्ड वर्णित हैं।

फिलीपीन के निवासी यह मानते रहे हैं कि उनकी आचार संहिता मनु और लाओत्से की स्मृतियों पर आधारित है। इसी कारण वहां की प्राचीन विधानसभा के द्वार पर इन दोनों की मूर्तियां स्थापित की गई थीं।

इंडोनेशिया के बालिद्वीप में आज भी वर्णव्यवस्था का व्यवहार है। वहां उच्च जातियों को 'द्विज' और शूद्रों को 'एकजाति' कहा जाता है। यही मनुस्मृति के १०.४ श्लोक में वर्णित है। वहां अब तक शूद्रों के साथ छुआछूत का भाव नहीं है, जो मनुस्मृति की मौलिक व्यवस्था में था।

ब्रिटेन और अमेरिका से प्रकाशित 'इन्साइक्लोपीडिया' 'द कैम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इंडिया', श्री केवल मोटवानी द्वारा लिखित 'मनु धर्मशास्त्र: ए सोशियोलोजिकल एण्ड हिस्टोरिकल स्टडी', डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार द्वारा रचित 'दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण एशिया में भारतीय संस्कृति' नामक पुस्तकों में मनुस्मृति के विश्वव्यापी प्रभाव का वर्णन है। उनके अनुसार एशिया, यूरोप, अमेरिका और आस्ट्रेलिया द्वीपों के अधिकांश देशों में मनु के नाम और प्रभाव के प्रमाण मिलते हैं। मनु वैवस्वत के समय घटी जलप्रलय की घटना का उल्लेख प्रायः सभी प्राचीन देशों के साहित्य में मिलता है। बाइबल और कुरान में मनु का नाम विकृत होकर 'नूह' हो गया है जबकि आदिम अर्थात् 'ब्रह्मा' आदम हो गया है। यह विश्वव्यापी उल्लेख विश्व के मानव समाज को किसी न किसी प्रकार मनु के स्मरण, उनकी संस्कृति और उनके योगदान से जोड़ता है। यहां प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि मनु के इस विश्वव्यापी स्मरण का आखिर कारण क्या है? उत्तर स्पष्ट है कि तत्कालीन समाज के लिए मनु का योगदान अप्रतिम था। वह कृतज्ञता ही विश्व के लोगों के मस्तिष्क पर अभिलेख बनकर अंकित हो गई है।

विश्व मे मानवता की प्रतिष्ठापना और व्यक्ति को उससे संस्कारित करने के लिए जो विचार मनु के मन में प्रादुर्भूत हुआ, निश्चय ही वह अद्भुत था। बिना शिक्षा के आदमी 'मानव' नहीं बन सकता और मानव बने बिना मानवता की स्थापना नहीं हो सकती। इसलिए मनु ने 'सभी के लिए अनिवार्य शिक्षा' का सिद्धान्त सर्वप्रथम प्रस्तुत किया। मनु शिक्षा को कितना महत्व देते थे इसका अनुमान हम उनके विधानों से लगा सकते हैं। उन्होंने शिक्षाप्राप्ति के लिये गुरुकुल-प्रवेश के तीन तीन विकल्प दिए हैं। ब्राह्मण बनने के इच्छुक बालक के लिए ५,७ और १६; क्षत्रिय बनने के इच्छुक के लिए ६,१० और २२; वैश्य बनने के इच्छुक के लिए ८,११ और २४ वर्ष। अन्तिम विकल्प आयु में भी जो प्रवेश नहीं लेता वह 'व्रात्य' अर्थात् व्रत से पतित हो जाता है, जो निन्दनीय और बहिष्कार्य हो जाता है। यह कठोर विधान शिक्षा प्राप्ति की महत्ता और अनिवार्यता के लिए है। उनकी इस धारण की पुष्टि उन वचनों से भी होती है जहां मनु शारीरिक जन्म को गौण मानकर 'ब्रह्मजन्म' अर्थात् 'विद्याजन्म' को इस जन्म और परजन्म का कल्याण करने वाला घोषित करते हैं-

'ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम्।' (२.१५६)

राजर्षि मनु सर्वजन शिक्षा प्राप्ति के कितने उदार पक्षधर थे, उसका एक अद्वितीय प्रमाण देखिए। स्वशासित ब्रह्मावर्त प्रदेश में, पृथ्वी के सभी मानवों को शिक्षाप्राप्ति के लिए आमन्त्रित करते हुए वे कहते हैं-

एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।। (२.२०)

अर्थात- पृथिवी पर बसने वाले समस्तजनों! मेरे इस देश में उत्पन्न विद्वान धार्मिक ब्राह्मणों के पास आओ और अपने कर्तव्य तथा आचरण की शिक्षा प्राप्त करो।'

कितना सहदयता पूर्ण महान् आह्वान है। न ब्राह्मण- शूद्र का भेदभाव है, न स्त्री पुरुष का भेदभाव है, न आर्य-अनार्य का भेदभाव है, न असुर-राक्षस का भेदभाव है, न स्वदेशी-विदेशी का भेदभाव है। सबके लिए शिक्षा के द्वार खुले हैं, सबके लिए खुला आमन्त्रण है! क्यों? क्योंकि सबको श्रेष्ठ मानव बनाना है, सबको कुशल नागरिक बनाना है, सबको सभ्य और सुसंस्कृत बनाना है, और यह कार्य केवल शिक्षा से ही हो सकता है। 'सर्वजन शिक्षा और अनिवार्य शिक्षा' के सिद्धान्त की देन मानवता के लिए बहुत बड़ी देन है।

मनुष्य शिक्षा प्राप्त करके साक्षर होकर मनुष्य भी बन सकता है और राक्षस भी। सभी जन मनुष्य ही बनें इस भावना को दृष्टि में रखकर महर्षि मनु ने धर्म की अवधारणा प्रस्तुत की।धर्म वह तत्व है जो आत्मा को नियन्त्रित करता है, आत्मा को उन्नत करता है। मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म कर्मकाण्ड, पूजा पाठ अथवा सम्प्रदाय नहीं है, वह संयत, शान्त, सुखी जीवन जीने की एक पद्धति है। उसका स्वरूप शाश्वतिक और सार्वकालिक है। अपने मूल अर्थ में वह धारण करने योग्य आचरण है। ऐसा धर्म ही मानवता का उन्नायक और रक्षक हो सकता है। मनु ने उस धर्म को दस लक्षणों में समाहित कर प्रस्तुत किया है-

धृति: क्षमा दमो ऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।। (६.९२)

अर्थात् 'विपत्ति में धैर्य रखना, सहनशक्ति होना, मन पर नियन्त्रण, किसी के पदार्थ, धन आदि को अन्याय से न लेना, शरीर और अन्तःकरण की पवित्रता, इन्द्रियों को वश में रखना, बौद्धिक उन्नति करना, विभिन्न विद्याओं की प्राप्ति करना, सत्याचरण, क्रोधरहित अर्थात् शान्तभाव से व्यवहार करना' ये धार्मिकता के लक्षण हैं।

मनु का यह धर्म मनुष्य की भावनाओं का उन्नयन कर उसे ऐसा जीवन जीना सिखाता है जिससे वह निजी स्तर पर, परिवार और समाज में शान्त-सुखी रहकर उन्नति प्रगति कर सकता है। इसी को मानवीय धर्म का नाम दिया जा सकता है जो वस्तुतः मानवता का रक्षक हो सकता है। विश्व में जिन्हें आज तक धर्म कहा गया है, उनमें कोई भी ऐसा नहीं है जिसे मनु-प्रतिपादित धर्म के समकक्ष रखा जा सके। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की परिकल्पना को केवल मनु का धर्म ही साकार कर सकता है।

आदिकालीन समाज को व्यवस्थित और मर्यादित करने के लिए मनु ने जो पहली व्यवस्था इस विश्व को प्रदान की वह है- 'वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था'। वेदों से भाव ग्रहण कर मनु ने उसका स्वरूप निर्धारित किया और फिर उसे अपने शासन में क्रियान्वित किया। इस व्यवस्था में सबको रुचि अनुसार शिक्षा प्राप्त करने और यथेष्ट वर्ण को धारण कर इच्छित व्यवसाय करने की स्वतन्त्रता प्रदान की है। यह स्वतन्त्रता जीवन पर्यन्त रहती है। इसके द्वारा राष्ट्र को व्यवसाय-कुशल नागरिक प्राप्त होते हैं जो राष्ट्र की उन्नति, प्रगति, सुरक्षा के आधार बनते हैं। वर्णव्यस्था जहां समाज और राष्ट्र की उन्नति का माध्यम है वहां आश्रम व्यवस्था व्यक्ति की शारीरिक आत्मिक बौद्धिक उन्नति का माध्यम है। इस प्रकार यह एक सांगोपांग अथवा परिपूर्ण समाज व्यवस्था है। इसी के अन्तर्गत इस देश में बड़े बड़े ऋषि महर्षि, दार्शनिक, वैयाकरण, आयुर्वेदज्ञ, धनुर्धर, राजनीतिज्ञ, मर्यादा पुरुषोत्तम और भूगोलविद् आदि प्रसिद्ध हुए हैं। पौराणिक वर्णनों के अनुसार आदि काल में पृथ्वी के सात द्वीपों में यही समाज व्यवस्था प्रचलित थी। वे सात द्वीप थे- जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। भारतीय इतिहास की इस महिमा से चुंधियाकर पाश्चात्य लेखकों ने इस सबको काल्पनिक कह डाला था, किन्तु आज इतिहासज्ञों ने जम्बू, शाक और कुश इन तीन द्वीपों की और संस्कृत से वहां की भाषा समानता की प्रमाणिक खोज कर ली है। शेष खोज भी भविष्य में होने की आशा है। आदिकाल में इन सब द्वीपों में मनु स्वायम्भुव के दीर्घा पुत्र प्रियव्रत के सात पुत्रों का शासन था। इस इतिहास के ज्ञान के साथ सम्पूर्ण विश्व में मनु का नाम पाए जाने का कारण समझ में आ जाता है। क्योंकि उनका जो योगदान और सम्बन्ध था वह वैश्विक स्तर पर था।

महर्षि मनु ने इस समाज व्यवस्था में उदारता और दयालुता का ऐसा प्रतिमान स्थापित करने का प्रयास किया है जो विश्व की किसी सभ्यता में 'न भूतो न भविष्यति' न हुआ है और न होगा। मनु ने गृहस्थ दम्पति को आदेश दिया है कि वे पहले अपने सेवक वर्ग को अर्थात् सेवादार शूद्र वर्ग को भोजन कराके फिर भोजन किया करें-

भुक्तवत्सु अथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि।
भुन्जीयातां तत: पश्चात् अवशिष्ट तु दम्पति।। (३.११६)

अर्थात 'पहले विद्वान् अतिथियों और अपने भृत्यों, जो शूद्र होते थे, उनको खिलाकर तत्पश्चात् शेष भोजन को स्वयं किया करें।' देखिए, शूद्रवर्ग के प्रति कितनी मानवीय भावना थी मनु की।

स्त्रियों के प्रति मनु का दृष्टिकोण क्या था? इसकी चर्चा किए बिना यह आलेख अर्धांग ही रहेगा। यह अतिश्योक्ति नहीं किन्तु यथार्थ है कि आज तक विश्व में महर्षि मनु जैसा नारी हितैषी उनको सम्मान प्रदाता और यथायोग्य प्रशंसक कोई समाज व्यवस्थापक नहीं हुआ है। वे स्त्रियों के सम्मान और समानता के समर्थक थे। उनका एक प्रसिद्ध श्लोक है-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।। (३.५६)

कभी कभी एक ही शब्द का गलत अर्थ किसी सुन्दर विचार को महत्वहीन कर देता है, यह श्लोक उसका प्रमाण है। इसके 'देवता:' पद में अर्थ की महानता है, सही अर्थ से महान् अर्थ प्रकट होता है (जैसे, आज भी व्यवहार में महान् और श्रेष्ठ व्यक्ति को देवता कहा करते हैं)। इसके विपरीत अनर्थ से कल्पित अर्थ ज्ञात होता है। महर्षि दयानन्द ने सही अर्थ की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कर बताया है कि यह वैदिक भाषा का शब्द है और इसका सही अर्थ है- 'दिव्य गुण कर्म स्वभाव युक्त सन्तान'। इस श्लोक का अर्थ होगा- 'जिस परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है वहां दिव्य गुण कर्म स्वभाव युक्त सन्तानें होती हैं और जहां अनादर अर्थात् अपमान और कलह होता है उनका गृहस्थ असफल होता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि सम्मानपूर्ण वातावरण में श्रेष्ठ और सफल सन्तानें होती हैं और कलहपूर्ण वातावरण में बिगड़ जाती हैं। यहां मनु ने स्त्रियों के सम्मान को गृहस्थ की सफलता का आधार माना है। अन्यत्र घोषित किया है कि 'स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषो ऽस्ति कश्चन' (९.२६) अर्थात स्त्रिजन में और लक्ष्मी में कोई भेद नहीं है। आज भी प्रचलित यह महान् उक्ति कि 'स्त्रियां लक्ष्मी होती हैं' मूलतः मनु की वैचारिक देन है। मनु ही वह सर्वप्रथम संविधान दाता थे जिन्होंने पुत्री और पुत्र को समान स्तर प्रदान किया तथा सम्पति में भी समान अधिकार की घोषणा की थी। मनु कहते हैं-

'यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा।' (९.१३०)

अर्थात्- 'जैसा आत्मा रूप पुत्र होता है वैसी ही पुत्री होती है।' उनका सम्पति में समान अधिकार है-

अविशेषेण पुत्रांण दायो भवति धर्मत:।
मिथुनानां विसर्गादौ मनु: स्वायम्भुवो ऽब्रवीत्।। (निरुक्त ३.४)

उद्धरण

१ ध्यान देने का तथ्य यह है कि संस्कृत में पदरचना नियमबद्ध रूप से होती है। उसमें प्रत्ययों का भी अर्थ निर्धारित है। जो लोग यह कहते हैं कि मनुमूलक शब्दों की संरचना 'मनु' चिन्तनार्थ पद से हुई है, वे सर्वथा गलत हैं। इन शब्दों में जो प्रत्यय हुए हैं वे व्यक्तिवाचक शब्द से 'अपत्य' अर्थ में हुए हैं। 'मनु' व्यक्तिवाचक से 'अण्' प्रत्यय होकर 'मानव', 'यत्' प्रत्यय और 'षुक्' आगम होकर 'मनुष्य', 'अन्त्र्' प्रत्यय और 'षुक्' आगम होकर 'मानुष', 'जन्' धातु के योग से 'उ' प्रत्यय होकर 'मनुज' पद बना है। इन सभी का अर्थ सन्तान अथवा वंशज और प्रजा है। यही कथन अन्य ग्रन्थों में है- 'मनोरपत्यं मानव:' (निरुक्त ३.४)= मनु के वंशज को मानव कहते हैं। 'मानव्य प्रजा:'= सभी प्रजाएं मनु की वंशज हैं (काठक ब्राह्मण २.३०.२; तैत्तिरीय संहिता ५.१.५.६) आदि।

२ 'दि आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी' द्रष्टव्य 'MAN' पद तथा निम्नलिखित मन्तव्य:

(क) मेनिंग रचित 'एन्सिएन्ट एण्ड मेडिवल इंडिया' में-

"It has been remarked by various authors (as Kuhn and Zeitschrift IV 94 ff) that in analogy with Manu as the father of mankind or of the Aryas, German mythology recognises Manus as the ancestor of Tuetons. The english Man and the German Manuappear also to be akin to the word Manu as the German Manesh presents a close resemblance to Manush of Sanskrit." (Vol.1, P.118)

(ख) "The reader will not readily forget the city of the sun 'Helispolis' or 'Menes'. The first Egyptian king of the sun, the 'Menu Voivasowat' or patriarch of the solar race, nor his statue, that of the great 'Menoo', whose voice was said to salute the rising sun." (India in Greece, P.174)

३ (क) मनुस्मृति में- अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्।। (2.121)

धम्मपद में- अभिवादनसीलस्स निच्चं बुड्ढ़ापचायिनो।
चत्तारो धम्मा वड्ढन्ति आयु विद्दो यसो बलम्।। (८.१०)

(ख) मनुस्मृति में- न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिर:। (२.१५६)

धम्मपद में- न तेन थेरोसि होति येनस्स पलितं सिरो। (१६.५)

४ द्रष्टव्य- महाभारत आदिपर्व ७३. ८-९; शान्तिपर्व अ० ३६; ६७.१५-३०; ५६.३३; ३३५.४४, ४६ आदि तथा लेखक के 'मनुस्मृति-भाष्य' की भूमिका।

५ द्रष्टव्य- यास्करचित निरुक्त ३.४। इस आलेख में पृ० ६ पर उध्दृत 'अविशेषेण पुत्राणाम्......'।

६ द्रष्टव्य- किष्किन्धा काण्ड १. ३०-३२; अयोध्याकाण्ड १०७.१२। विवेचन के लिए देखिए लेखक रचित- 'महर्षि मनु बनाम डॉ० अम्बेडकर पृ० ३५, ३६।

७ द्रष्टव्य लेखक रचित- 'महर्षि मनु बनाम डॉ० अम्बेडकर' पृ० ३४,३५।

८ ऐतरेय ब्राह्मण ८.११।

९ विवेचन द्रष्टव्य लेखक के 'मनुस्मृति भाष्य' की भूमिका में 'मनु और वेद' विषय।

१० वंशावली है- ब्रह्मा -> मनु स्वायम्भुव -> प्रियव्रत -> अग्नीध्र -> मनुस्वारोचिष -> मनु उत्तम -> मनु तामस -> मनु रैवत -> मनु चाक्षुष -> मनु वैवस्वत -> इक्ष्वाकु -> सूर्यवंशी सभी क्षत्रिय। इला पुत्री से चन्द्रवंशी क्षत्रिय।

११ केवल मोटवानी रचित 'मनु धर्मशास्त्र- ए सोशियोलोजिकल एण्ड हिस्टोरिकल स्टडी' पृ० २३२, २३३

१२ 'आदिराजो मनुरिव प्रजानां परिरक्षिता' (बालकाण्ड पश्चिमी संस्करण ६.४) तथा विष्णुपुराण १.७.१६; ३.१६; भागवत पुराण ३.२२.२५,३८,३९ आदि।

१३ वही सन्दर्भ।

१४ ३.४

१५ विवरण तथा उद्धरण के लिए द्रष्टव्य है लेखक रचित- 'महर्षि मनु बनाम डा० अम्बेडकर' पृ० ६०, ६१।

१६ डॉ० सत्यकेतु विद्यालंकार- 'दक्षिणपूर्वी और दक्षिण एशिया में भारतीय संस्कृति' पृ० २५७।

१७ वही, पृ० २९७।

१८ वही, पृ० १४९, १९...।

१९ वही, पृ० ४७।

२० वही, पृ० १९, ११४।

२१ मनुस्मृति २.३६, ३७, ३८, ३९, ४० तथा ११.१९१, २१२, २१४।

२२ लेखकरचित- 'महर्षि मनु बनाम डॉ० अम्बेडकर' पृ० १८-२६ द्रष्टव्य है।

२३ 'तत् पत्नीं यजुर्वदन्तीं प्रत्यपद्यत। तस्या: वाग् द्यां आतिष्ठत्। (३.३०.१)

२४ मनुस्मृति २.१३८।

२५ मनुस्मृति ८.३८९; ४.१८०; ८.१८०; ८.३५२, ३५२; ९.२३२ आदि।

२६ संतुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याण तत्र वै ध्रुवम्।। (३.६०)

अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिक:।
एष: धर्म: समासेन ज्ञेय: स्त्री पुंसयो: पर:।। (९.१०१)

पेरियार लिखित सच्ची रामायण-जुठ का पुलिंदा


पेरियार लिखित सच्ची रामायण-जुठ का पुलिंदा
लेखक -कार्तिक अय्यर
कुछ दिन पहले तमिलनाडु से एक खबर थी । कुछ लोगों ने सड़कों पर प्रदर्शन करने निकले और उन्होंने श्री राम जी के चित्र को जूते लगाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना है जो पूर्ण रूप से विघटनकारी राजनीती से प्रेरित है। तमिलनाडु के दिवंगत नेता पेरियार को इस विघटनकारी मानसिकता का जनक कहा जाये, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। पेरियार ने दलित वोट-बैंक को खड़ा करने के लिए ऐसा घृणित कार्य किया था। ये लोग भी अपनी राजनीतिक हितों को साधने के लिए उन्हीं का अनुसरण कर रहे है। पेरियार ने अपने आपको सही और श्री राम जी को गलत सिद्ध करने के लिए एक पुस्तक भी लिखी थी जिसका नाम था सच्ची रामायण।
सच्ची रामायण पुस्तक वाल्मीकि रामायण की समान कोई जीवन चरित्र नहीं है। बल्कि हम इसे रामायण की आलोचना में लिखी गयी एक पुस्तक कह सकते है। इस में रामायण के हर पात्र के बारे में अलग अलग लिखा गया है। उनकी यथासंभव आलोचना की गई है। इस में राम ,सीता ,दशरथ हनुमान आदि के बारे में ऐसी ऐसी बाते लिखी गई है। जिनका वर्णन करने में लेखनी भी इंकार कर दे। सब से बड़ी बात सच्ची रामायण में पेरियार ने जबरन कुछ पात्रों को दलित सिद्ध करने का प्रयास किया है। इन (स्वघोषित) दलित पात्रों का पेरियार ने जी भरकर महिमामंडन किया। यहाँ तक की रावण की इस पुस्तक में बहुत प्रशंसा की गई है। यहाँ तक कहा गया है कि राम उसे आसानी से हरा नहीं सकते थे। इसलिए उसे धोखे से मार गया। इसी पुस्तक में लिखा है के सीता अपनी इच्छा से रावण के साथ गयी थी क्यों के उन्हें राम पसंद नहीं थे।
पेरियार श्री राम के विषय में लिखते है कि तमिलवासियों तथा भारत के शूद्रों तथा महाशूद्रों के लिये राम का चरित्र शिक्षा प्रद एवं अनुकरणीय नहीं है।
राम इस कल्पना के विपरीत है।
रामायण का प्रमुख पात्र राम मनुष्य रूप में आदर्श और मर्यदापुर्षोत्तम थे। इसलिए वाल्मीकि ने स्पष्ट लिखा है कि श्री राम विश्वासघात, छल, कपट, लालच, कृत्रिमता, हत्या,आमिष-भोज,और निर्दोष पर तीर चलाने की साकार मूर्ति थे।
*एतदिच्छाम्यहं श्रोतु परं कौतूहलं हि मे।महर्षे त्वं समर्थो$सि ज्ञातुमेवं विधं नरम्।।* (बालकांड सर्ग १ श्लोक ५)
आरंभ में वाल्मीकि जी नारदजी से प्रश्न करते है कि “हे महर्षि ! ऐसे सर्वगुणों से युक्त व्यक्ति के संबंध में जानने की मुझे उत्कट इच्छा है,और आप इस प्रकार के मनुष्य को जानने में समर्थ हैं।
महर्षि वाल्मीकि ने श्रीरामचंद्र को *सर्वगुणसंपन्न* कहा है।
*अयोध्याकांड प्रथम सर्ग श्लोक ९-३२ में श्री राम जी के गुणों का वर्णन करते हुए वाल्मीकि जी लिखते है।
*सा हि रूपोपमन्नश्च वीर्यवानसूयकः।भूमावनुपमः सूनुर्गुणैर्दशरथोपमः।९।कदाचिदुपकारेण कृतेतैकेन तुष्यति।न स्मरत्यपकारणा शतमप्यात्यत्तया।११।*
अर्थात्:- श्रीराम बड़े ही रूपवान और पराक्रमी थे।वे किसी में दोष नहीं देखते थे।भूमंडल उसके समान कोई न था।वे गुणों में अपने पिता के समान तथा योग्य पुत्र थे।९।।कभी कोई उपकार करता तो उसे सदा याद करते तथा उसके अपराधों को याद नहीं करते।।११।।
आगे संक्षेप में इसी सर्ग में वर्णित श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हैं।देखिये *श्लोक १२-३४*।इनमें श्रीराम के निम्नलिखित गुण हैं।
१:-अस्त्र-शस्त्र के ज्ञाता।महापुरुषों से बात कर उनसे शिक्षा लेते।
२:-बुद्धिमान,मधुरभाषी तथा पराक्रम पर गर्व न करने वाले।
३:-सत्यवादी,विद्वान, प्रजा के प्रति अनुरक्त;प्रजा भी उनको चाहती थी।
४:-परमदयालु,क्रोध को जीतने वाले,दीनबंधु।
५:-कुलोचित आचार व क्षात्रधर्मके पालक।
६:-शास्त्र विरुद्ध बातें नहीं मानते थे,वाचस्पति के समान तर्कशील।
७:-उनका शरीर निरोग था(आमिष-भोजी का शरीर निरोग नहीं हो सकता),तरूण अवस्था।सुंदर शरीर से सुशोभित थे।
८:-‘सर्वविद्याव्रतस्नातो यथावत् सांगवेदवित’-संपूर्ण विद्याओं में प्रवीण, षडमगवेदपारगामी।बाणविद्या में अपने पिता से भी बढ़कर।
९:-उनको धर्मार्थकाममोक्ष का यथार्थज्ञान था तथा प्रतिभाशाली थे।
१०:-विनयशील,गुरुभक्त,आलस्य रहित थे।
११:- धनुर्वेद में सब विद्वानों से श्रेष्ठ।
कहां तक वर्णन किया जाये? वाल्मीकि जी ने तो यहां तक कहा है कि *लोके पुरुषसारज्ञः साधुरेको विनिर्मितः।*( वही सर्ग श्लोक १८)
अर्थात्:- *उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था कि संसार में विधाता ने समस्त पुरुषों के सारतत्त्व को समझनेवाले साधु पुरुष के रूपमें एकमात्र श्रीराम को ही प्रकट किया है।*
अब पाठकगण स्वयं निर्णय कर लेंगे कि श्रीराम क्या थे? लोभ,हत्या,मांसभोज आदि या सदाचार और श्रेष्ठतमगुणों की साक्षात् मूर्ति।
श्री राम तो रामो विग्रहवान धर्मः अर्थात धर्म के मूर्त रूप है।

महाराजा सयाजी गायकवाड़ का प्रेरक वक्तव्य



दलित नेता जब बाबा साहब डाॅ अम्बेडकर पर भाषण देते है तब बड़ी धूर्तता से उस व्यक्ति का नाम ही नही लेते जिसने उन्हें "बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर" बनाया |
महाराजा सयाजी गायकवाड़ ने उन्हें ब्रिटेन और अमेरिका पढने के लिए पूरा खर्चा दिया | यहाँ तक भी रहने का इंतजाम भी महाराजा ने किया था और तो और जब बाबा साहब डाॅ अम्बेडकर PhD करके वापस आये तो कोई भी उन्हें नौकरी नही दे रहा था, तब एक बार फिर महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने उनका साथ दिया और उन्हें अपनी रियासत का महामंत्री नियुक्त किया और उस जमाने में उन्हें दस हजार रुपये महीने वेतन दिया जो आज दस करोड़ के बराबर है |
लेकिन गाँव गाँव जो तथाकथित अम्बेडकरवादी घूमते है वो दलितों को ये बात नही बताते | वो तो छोड़िए उनका पूरा नाम तक नहीं बताते।
.
वड़ोदरा नरेश श्रीमान् महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ [1863-1939 ई.] का प्रेरक वक्तव्य ●
------------------------
● जो धर्म समाज का हित करता है वह आदरणीय होता है।
● जहां बुद्वि का प्रमाण नहीं माना जाता उस धर्म को प्रजा मान्य नहीं करती।
● आज जिसे हम हिन्दू धर्म मानते हैं वह वस्तुतः हिन्दू धर्म नहीं।
● वैदिक काल में हमारे धर्म में मूर्त्तिपूजा नहीं थी।
● आत्म समर्पण बिना समाज सेवा नहीं होती।
● धर्म निमित्त हमारे देश में बहुत धन व्यय होता है, परन्तु उसका फल कुछ नहीं।
● ठीक पूछिये तो धर्माचार्य भी पुलिस की तरह प्रजा के नौकर हैं।
● शास्त्रों में बहुत-सी उत्तम बातें हैं, परन्तु बिना विचारे ‘बाबा वाक्यं प्रमाणं’ के न्यायानुसार नहीं चलना चाहिये।
----------------------------
श्री पण्डित श्रीराम शर्मा द्वारा लिखित तथा श्री भगवद्दत्त शर्मा, कारेली बाग, बड़ौदा द्वारा [सम्भवतयाः 1915 ई. में] प्रकाशित हिन्दी पुस्तक ‘सयाजी चरितामृत’ के प्रथम संस्करण में पृ. 82 पर लिखा है 
“इसी [1911 ई.] वर्ष 26 फरवरी को आप [अर्थात् वड़ोदरा नरेश श्री महाराजा सयाजीराव गायकवाड़] बम्बई प्रान्त की आर्य धर्म परिषद् में परिषद् के सभ्यों के आग्रह पर पधारे और सभापति के आसन को ग्रहण कर एक महत्त्वपूर्ण, समयोचित, प्रभावशालिनी वक्तृता दी, जिसका उपस्थित जनों पर अकथनीय प्रभाव पड़ा। रणोली बड़ौदे के निकट ही राज्य का एक ग्राम है।”
इसी ‘सयाजी चरितामृत’ पुस्तक में आगे पृ. 158-161 पर वड़ोदरा नरेश श्री महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ की उपर्युक्त वक्तृता के कतिपय निम्नलिखित अंश दिए गए हैं –
“जो धर्म मनुष्य समाज की स्थिति उच्चतम नहीं करता और अज्ञान नहीं हटाता वह धर्म जन समाज में कभी आदर नहीं पाता। जो धर्म समाज का हित करता है वह आदरणीय होता है। धर्म ईश्वर कृत है अथवा मनुष्य कृत इस विषय की चर्चा करना व्यर्थ है; कुछ भी हो, उसकी आवश्यकता महती है। किन्तु वह ऐसी वस्तु नहीं कि एकदम स्वेच्छानुसार बदल दी जाय। वह सैंकड़ों वर्षों का परिणाम है और उसके बदलने में भी सदियां हो जाती हैं। धर्म यह कुछ अपना वस्त्र नहीं जो हम इच्छानुसार उसको बदल लेवें और जैसा चाहें वैसा लें। मुझे कहना चाहिये कि अपना धर्म स्वीकार करने से प्रथम विचार करना चाहिये।
जहां बुद्धि का प्रमाण नहीं माना जाता उस धर्म को प्रजा मान्य नहीं करती। यहां मैं भिन्न भिन्न धर्मों के सारासार की तुलना नहीं करता। हिन्दू धर्म यह आज का विषय है, इसलिये इतना ही कहूँगा, आज जिसे हम हिन्दू धर्म मानते हैं वह वस्तुतः हिन्दू धर्म नहीं। आज का हमारा धर्म हमारे मूल वेद धर्म से विकृत होकर अनेक प्रकार से बदल गया है।
हम इस समय विकृत धर्म को वास्तविक धर्म मान रहे हैं, जिसका कारण हमारा अज्ञान ही है।
आर्य समाज मेरे विचार में वेदिज़म [Vedism] – वेद धर्म का अवलम्बन करने वाली संस्था है। मुझे कहना चाहिये कि वह वैदिक धर्म कालान्तर में अनेक प्रकार से विकृति को प्राप्त हुआ है, उस समय का धर्म उस समय के सांसारिक और राज्य के जीवन का यथार्थ चित्र खींचता है।
वैदिक काल में हमारे धर्म में मूर्त्तिपूजा नहीं थी। तथा पशुयज्ञादि कुछ क्रियायें नहीं थीं। पीछे से ब्राह्मणों ने यज्ञ में पशुओं का होम करना आरम्भ किया। धर्म के नाम पर पशु, प्राणी और कभी कभी मनुष्यों का भी वध होने लगा; और तदनुसार धर्म के निमित्त जीव हत्या प्रविष्ट हुई। बकरे, भैंसे आदि का वध करना देश सेवा और पुण्य समझा जाने लगा। ऐसी स्थिति कई सदियों तक रहने पर कुछ बुद्धिमान् लोगों में विचार जागृति हुई कि पशु प्राणियों के वध करने की अपेक्षा आत्म समर्पण में ही पुण्य है; आत्म समर्पण बिना समाज सेवा नहीं होती और समाज सेवा बिना वास्तविक उन्नति नहीं होती। सद्-वर्तन, शान्ति और इन विचारों का प्रचार करने के लिये महात्मा बुद्ध ने जन्म धारण किया। जिन्होंने बाह्य शुद्धि की अपेक्षा आन्तर्य [आन्तरिक] शुद्धि की आवश्यकता पर विशेष उपदेश देकर लोगों को सिद्धान्त पर चलाया और संसार की उन्नति के लिये भारी प्रयास किया। सज्जनो ! मुझे कहना चाहिये कि चाहे जैसे बड़े सुधार हो और उसके लिये बड़े बड़े कार्य किये जाये, परन्तु जब तक प्रजा के नेता और महान् नर उसके अनुमोदक और सहायक नहीं होते तब तक वह कार्य नहीं चल सकते। (हियर हियर [सुनिए-सुनिए] की ध्वनि) हमारे हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में भी ऐसा ही हुआ। प्रजा को सहायता नहीं मिली और वह स्थिति फिर बदली; अज्ञानता और भ्रमों ने घर घेरना आरम्भ किया; उससे परिणाम क्या हुआ? हिन्द के चित्र की ओर ऐतिहासिक दृष्टि डालो। हिन्द में राजकीय द्वेष हुआ। धार्मिक अवनति हुई और सामाजिक स्थिति छिन्न भिन्न हो गई। प्रजा के बड़े भाग ने पुरुषार्थ खोया और नपुंसकों की तरह दैववादी हुए। प्रयत्न करने की शक्ति गई और कार्यसिद्धि के लिये ईश्वर की सहायता निमित्त नाम की भक्ति ओर मिथ्या निवृत्ति बढ़ी। ऐसी शोकजनक स्थिति हुई है। आपको जानना चाहिये कि ईश्वरीय नियम सदा एक से ही हैं। …
ईश्वरीय नियमानुसार वर्तन करना और जगत् के विकास में आगे बढ़ना हमारा कर्तव्य है (करतल ध्वनि) मैं जानता हूं कि हमारी शक्ति परिमित अर्थात् सीमा वाली है, परन्तु वह सीमा कहां तक है – यह कहना अति कठिन है। यदि बुद्धि और शक्ति की सीमा मानते होते तो वर्तमान जगत् सीनेमेटोग्राफ, वायुयान, बिना तार के तार आदि जो हमको आवश्यक मालूम होते हैं, वह साधन कहां से उत्पन्न होते? (करतल ध्वनि) यह सिद्ध कर सकते हैं कि मानवी शक्ति की सीमा नहीं। परिश्रम और बुद्धि से प्रत्येक मनुष्य कार्यसिद्धि कर सकता है। आप केवल हाथ जोड़ कर इच्छा और याचना करने की अपेक्षा दृढ़ श्रद्धा से निरन्तर यत्नशील रहेंगे तो अपनी स्थिति में बहुत सुधार और वृद्धि कर सकेंगे।
धर्म निमित्त हमारे देश में बहुत धन व्यय होता है, परन्तु उसका फल कुछ नहीं। कथा पुराण आदि हम लोग श्रद्धा से सुनते हैं, परन्तु Why and Wherefore अर्थात् ‘क्यों और किस लिये' आदि प्रश्नों से स्वयं बुद्धि का उपयोग नहीं करते; यह शोक की बात है। हमारे धर्माचार्य और महन्त इस विषय पर क्यों न ध्यान दें? प्रजा की धार्मिक स्थिति पर दृष्टि डालना उनका कर्तव्य है; अतएव महन्त और पुजारी आदि धर्माचार्यों की स्थिति सुधारने के लिये मैंने अपने राज्य में धारा नियत की है। …ठीक पूछिये तो धर्माचार्य भी पुलिस की तरह प्रजा के नौकर हैं।”
दूसरी वक्तृता में श्री. महाराज ने अपने श्रीमुख से वर्णन किया –
“सज्जनो ! कितने ही ऐसा समझते होंगे कि महाराज विलायत हो आये हैं इसलिये सबको भ्रष्ट करने का विचार रखते हैं। (‘नहीं नहीं’ का शब्द) मैं कहूंगा कि – ‘मैं चुस्त हिन्दू हूं’ और हिन्दू धर्म के प्रति मेरा जितना वास्तविक अभिमान थोड़ों ही को होगा। (करतल ध्वनि) …आप जिन रीतियों को धर्म मानते हैं उन सबको मैं अन्ध श्रद्धा से मानने कि लिये तैयार नहीं। ईश्वर का पारितोषिक (Reason) विचार शक्ति छोड़ने के लिये मैं तैयार नहीं। अन्त में आपको यही बोध देता हूं कि शास्त्रों में बहुत-सी उत्तम बातें हैं, परन्तु बिना विचारे ‘बाबा वाक्यं प्रमाणं’ के न्यायानुसार नहीं चलना चाहिये।”
[संकलन एवं प्रस्तुति : भावेश मेरजा]
● ● ●

हम किसकी भक्ति करें





हम किसकी भक्ति करें

यहाँ पर प्रश्न उत्पन्न होता है कि हम परमात्मा की भक्ति क्यों करें? ईश्वरभक्ति की हमें क्या आवश्यकता है? हम जड पदार्थों अथवा अल्प मनुष्यों की भक्ति क्यों न करें? ईश्वर की भक्ति से हमें क्या लाभ हो सकता है? यह प्रश्न वास्तव में बड़ा गम्भीर तथा विचारणीय है।

शास्त्र कहते हैं, कि जो जिसकी भक्ति करता है, वह तद्रूप हो जाता है। जो जिसका चिन्तन करता है वह उसी के रंग में रंगा जाता है, जो जिसका अधिक ध्यान करता है वह उसी का स्वभाव ग्रहण करता जाता है। जैसे लोहे का गोला अधिक काल तक अग्नि में रखे रहने से पहिले गर्म और फिर गर्म से लाल और फिर लाल से तद् रूप अर्थात् अग्नि का रूप ग्रहण करता जाता है, इसी प्रकार जो मनुष्य जिस चीज या वस्तु का अधिक ध्यान करता है वह उसी के रंग में रंगा जाता है।

यदि हम मनुष्यों की भक्ति करते हैं तो इसमें सन्देह नहीं कि हममें उन उपास्य देवताओं के गुण आवेंगे। क्योंकि मनुष्य सारे के सारे ही अल्पज्ञानी होते हैं उनमें कमजोरियाँ होती हैं इसलिए यह स्वाभाविक है कि मनुष्यों की पूजा और भक्ति करने से जहाँ हम उनके गुणों को ग्रहण करते हैं वहाँ अवगुण भी हममें आ जाते हैं। जड़ पदार्थों की पूजा करने से मनुष्य के अन्तरीय सूक्ष्म विचारों का नाश हो जाता है, और वह जड़ की न्याईं जड़ बन जाता है। इसलिए वेद भगवान् कहता है

अन्धंतमः प्रविशन्ति ये ऽविद्यामुपासते" (यजु० 40.9)

कई मनुष्य जो जड़ पदार्थों की पूजा करते हैं उनका हृदय जड़ पदार्थों के समान प्रकाशशून्य हो जाता है, और वे अन्धकार में ठोकरें खाते फिरते हैं। इसलिए पूजा का परिणाम यही है कि मनुष्य जिसकी पूजा करता है वह उसके रंग में रंगा जाता है। यदि जड़ पदार्थों की पूजा करने से मनुष्य को शांति मिल सकती तो इस संसार में जो सबसे ज्यादा जड़ पदार्थों की पूजा करते हैं अर्थात् जो सबसे अधिक धनी हैं, जो सबसे अधिक यश रखते हैं, वह कदापि दुःखी न देखे जाते।

वेद में भक्ति

परन्तु जिस अवस्था में जड़ पदार्थ प्रकाशशून्य हैं, शांति और शक्तिशून्य हैं, इस अवस्था में उनकी पूजा तथा भक्ति करने से मनुष्य को शान्ति क्यों कर मिल सकती है? पूजा के लिए आवश्यकता है एक महाशक्ति की, भक्ति के लिए आवश्यकता है एक महाशक्ति की, भक्ति के लिए आवश्यकता है एक सर्वव्यापक सर्व शक्तिमान् पापनाशक शान्ति के भण्डार परमात्मा की, भक्ति के लिए आवश्यक है एक शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव सच्चिदानन्द की। वेद भगवान् कहता है -

“स पर्थ्यगच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरँ् शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ”
(यजु० 40.8 )

परमात्मा शुक्र अर्थात् आनन्द है, वह घावों आदि क्लेशों से रहित है, दु:ख का नाशक है, सुख का दाता है, वह निराकार है, वह आवरण अर्थात् रोग रहित है, वह अस्नाविर अर्थात् नस-नाड़ी के बन्धनों से मुक्त है, उसकी कोई मूर्ति नहीं है, वह शुद्ध पवित्र है, और पवित्र कर्ता है, वह पापाविद्ध अर्थात् पाप रहित और मनुष्य को पापों से मुक्ति देने वाला है, वह कवि अर्थात् अन्तर्यामी है, वह मनीषी अर्थात् मनुष्यों के मनों को देखने वाला है, वह परिभूः अर्थात् सर्वव्यापक है वह स्वयंभूः अर्थात् अपनी सत्यता में उपस्थित है, वही इस सृष्टि का हर्ता कर्ता और धर्ता है। वेद भगवान् कहता है कि ऐसे ही परमात्मा की भक्ति और पूजा करके मनुष्य का जीवन सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं। यह एक साधारण नियम है कि एक महाशक्तिमान् की पूजा मनुष्य को स्वाभाविक शक्तिमान् बनाती है। जिस कदर हम इस सर्वशक्तिमान् की पूजा करते हैं और हृदय से पूजा करते हैं। अथवा प्रेम से भक्ति करते हैं उसी कदर हमारा आत्मा बलवान् होता जाता है और पुष्ट होता जाता है। वेद भगवान् कहता है:

“य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः।
यस्य च्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा
विधेम।” (यजु० 25.13)

आत्मा का बल वही परमात्मा है। ऐसा क्यों हैं, इसलिए कि आत्मा एक चेतन वस्तु है, आत्मा जीवन है, एक चेतन वस्तु को जड़ वस्तु से बल नहीं मिला करता। जड पदार्थों की पूजा से आत्मा को कदापि बल प्राप्त नहीं हो सकता, प्रत्युत चेतन परमात्मा से ही बल पा सकता है। क्योंकि यह ईश्वरीय नियम है कि जहां जीवन होता है वहाँ से ही दूसरों को जीवन मिला करता है, जहाँ शक्ति होती है वहाँ से ही दूसरों को शक्ति मिला करती है। जड़ पदार्थों में जब जीवन ही नहीं है तो उनकी पूजा करके एक चेतन आत्मा कैसे जीवन पा सकता है? इसको क्या बल या ढाढस मिल सकता है? कुछ भी नहीं। इसलिए वेद भगवान् कहता है कि भक्ति के योग्य केवल एक परमात्मा ही है। अज्ञानी अज्ञानता के वश होकर जड़ पदार्थों की पूजा करते हैं परन्तु वे जो ज्ञानी हैं, वे जो देवता हैं, वे जिनका हृदय ज्ञान से दीप्यमान हैं वे कदापि जड़ वस्तुओं की पूजा नहीं कर सकते, किन्तु वे रात-दिन उसी परमपूज्य परमात्मा की भक्ति में मग्न रहते हैं। वेद भगवान् कहता है कि उसकी भक्ति में मग्न रहना मनुष्य को मृत्यु से बचा सकता है।

मृत्यु क्या है? साधारण शब्दों में हम आत्मा से शरीर की पृथक्ता का नाम 'मृत्यु' रखते हैं। यदि यह सत्य है कि आत्मा की पृथक्ता से शरीर की मृत्यु हो जाती है तो जब परमात्मा आत्मा के भी आत्मा है और वह आत्मा में इस तरह निवास करते हैं जिस तरह शरीर में आत्मा निवास करता है तो वह आत्मा चेतन होता हुआ भी मुर्दा नहीं होगा, जिसमें ईश्वर प्रेम नहीं है। ईश्वर ही तो आत्मा का जीवन है।

उपनिषद् कहता है:

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचः स उ प्राणस्य प्राणः॥ (केनोप० १.२)
परमात्मा ही आत्मा के श्रोत्र का श्रोत्र है, परमात्मा ही आत्मा के मन का मन है, परमात्मा ही आत्मा की वाक्यशक्ति है और परमात्मा ही आत्मा का प्राणाधार है। इसलिए वेद भगवान कहता है:-

“यस्य च्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः” ।

अर्थात् परमात्मा को अपने आत्मा में अनुभव करना और उसी को हर्ता-कर्ता अनुभव करते हुए रात-दिन उसी की शरण में और उसी की भक्ति में अपने आपको लीन रखना ही आत्मा का जीवन है, और उससे दूर हो जाना अर्थात् उसकी भक्ति से शून्य हो जाना, उसके प्रेम से खाली हो जाना मानो आत्मा से आत्मा का खाली हो जाना है। इस आत्मिक मृत्यु से मनुष्य उसी अवस्था में बच सकता है जबकि वह अमर परमात्मा को प्राप्त हो। मनुष्य जोकि स्वयं मृत्यु के मुँह में फंसा हुआ है उसकी पूजा करने से आत्मा इस आत्मिक मृत्यु से नहीं बच सकता। जड़ पदार्थ जो कि स्वयं शून्य हैं, उनकी पूजा करने से भी आत्मा आत्मिक मृत्यु से नहीं बच सकता। आत्मा का जीवन परमात्मा है। उसकी भक्ति करने से, उसी की शरण लेने से, उसी के प्रेम में मग्न होने से, उसकी शरण लेने से आत्मा जीवन पा सकता है, मुक्त हो सकता है। उपनिषद् कहती है:-

एतदालम्बनःश्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।(कठो० 2.17)

परमात्मा ही एक आत्मा का आधार है और परमात्मा ही आत्मा के लिए सबसे श्रेष्ठ और परम पवित्र आधार है, परमात्मा ही आत्मा के लिए शरण है, वही इसके लिए मृत्यु के विरुद्ध एक सुरक्षित ढाल है जो इस आधार को अपना आधार बनाता है। जो इस आधार को अपने आत्मा का आधार बनाता है, जो इस Asylum को अपने आत्मा के लिए मौत के विरुद्ध Asylum बनाता है, वही है जो मृत्यु से ऊपर हो जाता है, अर्थात् ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है या दूसरे शब्दों में मुक्ति को प्राप्त होता है। मैंने कहा था कि लोग प्रश्न करते हैं कि ईश्वरभक्ति की क्या आवश्यकता है? क्यों आवश्यकता है यह अब पता लग गया कि यदि हम जड़ पदार्थों की भक्ति करते हैं तो हम जड़ की न्याईं विचारशून्य, जीवनशून्य, उत्साहशून्य हो जाते हैं। यदि हम परमात्मा की भक्ति करते हैं तो हममें जीवन आता है, उत्साह आता है, तेज आता है, बल और पराक्रम आता है क्योंकि यह एक साधारण बात है कि जितना हम अल्प वस्तुओं की भक्ति करेंगे उतना ही हमारा विचार, हमारा जीवन, हमारा तेज, हमारा बल भी अल्प होगा परन्तु जहाँ तक एक महान् और प्रभावशाली जीवन के आधार, आत्मा के आधार, सर्वशक्तिमान् तेजोमय परमात्मा की पूजा करेंगे उतने ही हम महान् होते जावेंगे। अपने ज्ञान के भण्डार वेद में ईश्वर में हमें शिक्षा देते हैं कि हे मनुष्यो! पदार्थों की पूजा छोड़ कर नित्य प्रति तुम यह प्रार्थना किया करो-

तेजो असि तेजो मयि धेहि।
वीर्यमसि वीर्यं मयि देहि।
बलमसि बलं मयि धेहि।
ओजोऽस्योजो मयि धेहि।
सहोऽसि सहो मयि धेहि॥ (यजु० 12.9)

अर्थात्-हे परमात्मन्! मैं तेरी भक्ति इसलिए करता हूं, क्योंकि तू तेज है, तेरी भक्ति द्वारा तेरे तेज को प्राप्त कर सकें। हे परमात्मन्! मैं तेरी भक्ति इसलिए करता हूँ कि तू शक्ति है, मैं तेरी भक्ति के द्वारा इस शक्ति को प्राप्त कर सकें। हे परमात्मन्! मैं तेरी भक्ति इसलिए करता हूँ क्योंकि तू बलपुंज है, मैं तेरी भक्ति के द्वारा इस बल को प्राप्त कर सकें। हे परमात्मन्! मैं तेरी भक्ति इसलिए करता हूँ क्योंकि तू जीवनाधार है, मैं तेरी भक्ति के द्वारा इस आधार को प्राप्त कर सकें। हे परमात्मन्! मैं तेरी भक्ति इसलिए करता हूँ क्योंकि तू सहनशील है, मैं तेरी भक्ति के द्वारा सहनशील बन सकें। हे परमात्मन्! मैं तेरी भक्ति इसलिए करता हूँ क्योंकि तू सबको यथावत् फल देने वाला है, मैं तेरी भक्ति के द्वारा इस न्यायशीलता को ग्रहण कर सकें, इत्यादि।

॥ ओ३म् ॥

साभार - स्वामी सत्यानंद जी (पुस्तक - सत्योपदेशमाला)
राजेंद्र जिज्ञासु जी

प्रस्तुति - आर्य मिलन