Saturday, August 31, 2013

पंडित लेखराम के जीवन के विषय में कुछ रोचक संस्मरण




पंडित लेखराम के विषय में जितना अधिक में जानता जाता हूँ उतनी ही अधिक उन्हें जानने की मेरी इच्छा बलवती होती जाती हैं। पंडित जी के जीवन कुछ अलभ्य संस्मरण मुझे मिले जिन्हें मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।



१. आचार्य रामदेव जी की पंडित लेखराम जी से प्रथम भेंट


उन्हीं दिनों बच्छो वाली आर्य समाज के एक साप्ताहिक अधिवेशन में मैंने देखा की एक हट्टा कट्टा रोबदार पंजाबी रौबदार जवान व्याख्यान देने के लिए समाज की वेदी पर आया। वह लुधियाना के कपड़े का बंद गले का कौट पहने था , परन्तु कोट के ऊपर वाले बटन खुले हुए थे। सर पर पगड़ी थी। उसका शमला बहुत लम्बा था। देखने में वह व्यक्ति पहलवान प्रतीत होता था। वेदी पर आते ही उसने व्याख्यान शुरू कर दिया। वह बड़ी ऊँची आवाज़ में और बड़ी जल्दी जल्दी बोलता था। अपने पास बैठे हुए एक महाशय से मैंने पूछा  "यह कौन हैं ?" उसने आश्चर्य से यह उत्तर  दिया। यह आर्य समाज के सुप्रसिद्ध विद्वान प्रचारक पंडित लेखराम जी हैं। मैं व्याख्यान सुनने लगा। सुनने क्या लगा, व्याख्यान ने मुझे अपनी तरफ आकृष्ट कर लिया। पंडित जी एक घंटा बोले। उनका भाषण सचमुच ज्ञान का भण्डार था। अपने व्याख्यान में उन्होंने इतने अधिक वेद मन्त्रों, फारसी अरबी के वाक्यों तथा यूरोपियन विद्वानों के प्रमाण और उद्दरण दिये की मैं आश्चर्य चकित रह गया। मेरे दिल में आया यदि व्याख्याता बनना हो तो इसे आदर्श मानना  चाहिए। मैंने सचमुच उन्हें अपना आदर्श बनाया। उस दिन के बाद से मैं जो कुछ पढ़ता उसे जज्ब करने की कोशिश करता। पुस्तकों पर निशान लगाने की आदत भी मैंने उसी दिन से डाली। दस-बारह वर्षों के बाद पढ़े हुए उद्वरणों को मैं अपने रजिस्टर में लिखने लगा। आज इस प्रकार के रजिस्टर मेरे पास बहुत अधिक संख्या में हैं, और मैं इन्हें अमूल्य संपत्ति समझता हूँ।

 पंडित जी का व्याख्यान सुनकर मुझ पर यह प्रभाव पड़ा था की वे संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी और अरबी के प्रकाण्ड विद्वान हैं , परन्तु पीछे से यह जानकार मेरे आश्चर्य की सीमा न रही की वे संस्कृत बहुत थोड़ी जानते हैं और अंग्रेजी तो बिलकुल ही नहीं जानते। हाँ अरबी और फारसी के अभिज्ञ तो वे अवश्य थे।

मैं चकित था की एक भाषा का ज्ञान न होते हुए भी वे उसके इतने अधिक प्रमाण वे किस तरह सुनाते हैं।

मजा तो यह हैं की उन प्रमाणों में एक भी अशुद्ध नहीं होता। यह रहस्य भी एक दिन खुल गया।

एक दिन मैं रविवार के अतिरिक्त किसी और दिन बच्छोवाली आर्य समाज के मंदिर में गया। वहां एक टोली जमा थी। कोटहलवश मैं भी उसी में शामिल हो गया। वहां देख की पंडित लेखराम जी दो ग्रेजुएटों को घेर कर बैठे हैं। एक ग्रेजुएट को वे बड़ी जोर से डांट बता रहे थे ,"बी ए पास करके भी तुमने अंग्रेजी नहीं सीखी, मैक्स मूलर के एक उद्दरण का तुमने अशुद्ध अनुवाद किया हैं। " वह ग्रेजुएट बिलकुल सतपटाया हुआ था। तथापि उसे मालूम था की पंडित जी अंग्रेजी बिलकुल नहीं जानते। साहस करके उसने बोला यह आपको कैसे मालूम? पंडित जी ने दुसरे ग्रेजुएट से पुछा ,'बताओ भी इसमें क्या गलती हैं' दोनों नये नये ग्रेजुएट एक दूसरे से पिल पड़े। थोड़ी देर के मुबाहिसे के बाद पहले ग्रेजुएट ने स्वीकार किया की उसका अनुवाद अशुद्ध था। पीछे से मुझे मालूम पड़ा की पंडित जी सदैव ऐसा ही करते हैं। संस्कृत उद्दरणों के लिए संस्कृतज्ञों को और अंग्रेजी के उद्दरणों के लिए अंग्रेजीज्ञों लोगों को एक दूसरे से भिड़ाकर इस दोनों भाषायों के प्रमाण जमा करते हैं। मुझ पर पंडित जी के इस सत्य प्रेम और स्व पक्ष पुष्ठी की निष्ठा ने बहुत गहरा प्रभाव डाला। मैंने सोचा जो व्यक्ति एक भाषा बिलकुल न जानते हुए भी इतने  अध्यवसाय से उसके प्रमाण जमा कर सकता हैं, उसके मार्ग में कोई कठिनाई अंकुरित नहीं हो सकती।


२. पंडित जी की निर्भीकता

पंडित जी जहाँ एक ओर असाधारण विद्वान थे वहां दूसरी और वे एक वीर शहीद की भांति निर्भीक और साहसी भी थे। मेरे एक मित्र ब्रहम समाज के नेता ने उनका नाम "आर्यसमाज का अली" रखा था।

अपने विवाह के बाद एक दिन मैं लाला मुंशीराम जी के निवास स्थान पर बैठा था। उन दिनों वे लाला जी कहलाते थे। उसी समय पंडित लेखराम जी उनसे मिलने उनके घर आये। लाला मुंशीराम जी उनदिनों आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान थे और पंडित लेखराम जी उस सभा के एक वैतनिक उपदेशक। आज आर्य समाज के अनेक अधिकारी आर्यसमाज के वास्तविक आजन्म सेवक को, जो असल में आर्यसमाज के प्राण हैं, केवल इसलिए सभा का वेतन भोगी सेवक समझते हैं क्यूंकि अपना सम्पूर्ण समय आर्यसमाज की सेवा में व्यय कर देने के कारण उनके लिए सभा से आजीविका मात्र वृति लेना आवश्यक होता हैं, परन्तु उन दिनों यह बात न थी। प्रतिनिधि सभा उन दिनों उपदेशकों का मान करना जानती थी। यहाँ तक की सभा के अधिकारी प्रभावशाली प्रचारकों से चुपचाप डांट खाने में भी अपनि मानहानि नहीं सनाझते थे। जब पंडित लेखराम जी माकन पर आये तब प्रधान जी उठे और पंडितजी के उठने के बाद ही बैठे। 

नमस्कार आदि के बाद प्रधान जी ने कहा "सभा के कार्यालय से सूचना दी गई थी की इस सप्ताह आप .....नगर में प्रचार के लिये जावेंगे, परन्तु अब आपका प्रोग्राम बदल दिया हैं, अब आप ... जायेगा।"

पंडित जी ने पुछा "यह किसलिए" ?

प्रधान जी ने उत्तर दिया की " मुझे विश्वस्त सूत्र से विदित हुआ हैं की ..... के मुस्लमान आपके प्राण लेने का कुचक्र रच रहे हैं। यदि आपको अपने जीवन की चिंता नहीं तो मुझे तो उसकी चिंता करनी चाहिए न।


न मालूम क्यूँ पंडित जी को क्रोध आ गया। वे असाधारण जोश में आकर बोले लाला जी," आप जैसे डरपोक यदि संस्था में बहुत अधिक बढ़ गये, तो आर्यसमाज का बेड़ा अवश्य डूब जायेगा"। मैं मरने से नहीं डरता। अब तो मैं अवश्य ही वहीँ जाऊँगा।

प्रधान जी तब भी मुस्कुरा रहे थे। इस बार उन्होंने नियंत्रण से काम लेना चाहा। उन्होंने कहा ,"मैं सभा के प्रधान की हैसियत से आपका ..... जाना आवश्यक समझता हूँ, इसलिए मैंने आपका प्रोग्राम बदल दिया हैं। मेरी आपसे प्रार्थना हैं की अब आप बताये हुए प्रोग्राम का ही अनुसरण करे"।

इस पर पंडित जी ने जरा नर्म आवाज़ में जवाब दिया, परन्तु उनकी जिद्द उसी तरह कायम थी। उन्होंने कहा ,"मुझे मालूम हैं की आपको मुझसे बहुत मोह हैं, उस मोह में कायरता पूर्ण वकालत मिलकर आप मुझे ...... न जाने के लिए बाधित करना चाहते हैं, परन्तु मैं यह स्पष्ट शब्दों में कह देता हूँ की अब तो जरुर वहीँ जाऊँगा। यदि आप मुझे सभा की तरफ से नहीं भेजेगे तो मैं अवैतनिक अवकाश लेकर अपने किराये से वहाँ जाऊँगा"।

मुझे स्मरण हैं की उन दिनों पंडित जी सभा से केवल ५० रुपये मासिक वेतन पाते थे।

प्रधान जी भला उनकी इस निर्भीक घोषणा का क्या जवाब देते?

उन्होंने केवल इतना ही कहा।

 "आप जहाँ चाहे जा सकते हैं अब मैं आपको किसी भी बात के लिए बाधित नहीं करूँगा। सचमुच हमारी सभा का यह सौभाग्य हैं की आप जैसे वीर पुरुष की सेवा उसे प्राप्त हैं।"



३. पंडित जी का विपक्षी के साथ व्यवहार


एक दिन लाहौर की सनातन धर्म सभा में किसी सनातनी पंडित का व्याख्यान था।

मैं भी यह व्याख्यान सुनने गया था। वह व्याख्यान मैंने बड़े ध्यान से सुना था और उसका सार मुझे याद हो गया था।

भाषण सुनने के बाद घर की तरफ लौटते हुए राह में अचानक पंडित लेखराम जी से मुलाकात हो गई।

वे मेरा नाम जानते थे। उन्होंने मुझसे पुछा "कहाँ से आ रहे हो"।

मैंने कहा सनातन धर्म सभा के भवन से। उन्होंने पुछा ,"वहां क्या करने गये थे?"

मैंने उत्तर दिया ,"व्याख्यान सुनने।"

पंडित जी ने पुछा ,"व्याख्यान में क्या क्या बातें सुनी?"

मैंने उस भाषण का सारांश पंडित जी को सुना दिया।

पंडित जी ने मेरी पीठ पर हाथ रखकर मुझे शाबासी दी और कहा ," शाबाश प्रत्येक चीज को इसी तरह ध्यान से सुना करो।

मैंने पूछा ,"क्या इस व्याख्यान की बातें ठीक हैं?"

पंडित जी ने एक डीएम उत्तर नहीं दिया और कहा,"मेरे यहाँ आना, मैं तुम हें इस सभी बातों का विस्तृत उत्तर दूँगा।"

पंडित लेखराम जी सचमुच अपने विश्वास के इतने ही पक्के थे।

उन्हें कभी यह आशंका नहीं होती थी की मेरे विचारों में कभी कोई अशुद्धि या भ्रान्ति भी हो सकती हैं।

अपने विपक्षियों की बातें तो वे बड़ी सभ्यता और शांति से सुनते थे, परन्तु उनके दिल में तो यही होता था की यह व्यक्ति गुमराह और अशुद्ध विचारों का हैं।

(सन्दर्भ- ग्रन्थ विशाल भारत मासिक जनवरी-जून अंक १९३० पृष्ठ संख्या २१४-२१६)  


४. पंडित लेखराम जी की सिंह गर्जना


एक बार अपने बलिदान से ३,४ वर्ष पूर्व पंडित लेखराम जी आर्य समाज लुधियाना में प्रचार के लिये पधारे। इस अवसर पर बाहर से आये हुए अन्य महाभुनाव भी पधारे थे। लुधियाना का यह पहला ही अवसर था की पंडित लेखराम जी ने इस्लाम के खंडन पर समाज द्वारा खुला व्याख्यान देने की घोषणा की थी। व्याख्यान से १५,२० मिनट पहले पंडित लेखराम जी के पेट में ऐसा सख्त दर्द उठा की उनको उत्सव मंडप छोड़ना पड़ा। उस समय कई डॉक्टर पंडित लेखराम

जी की चिकित्सार्थ पहुँचे।उस समय उनको दर्द से इतना बैचैन देखकर इतना आश्चर्य होता था की ऐसे धीर और वीर पुरुष दर्द से इतना व्याकुल क्यूँ हो रहे हैं। परन्तु पता चला की इस बैचनी का कारण केवल पेट का दर्द ही नहीं था। परन्तु उन्हें यह ख्याल बैचैन किये हुए था की जो मुस्लमान व्याख्यान सुनने के लिए आये हुए हैं वह सब निराश होकर लौट जायेगे। उन्होंने डॉक्टरों से यही निवेदन किया की उन्हें शीघ्र ही व्याख्यान देने के योग्य कर दे। और डॉक्टरों के इंजेक्शन द्वारा इस योग्य कर दिया की वह खड़े होकर व्याख्यान दे सके। उनका यह व्याख्यान आर्यसमाज के इतिहास में चिर स्थायी रहेगा। व्याख्यान क्या था शेर की गर्जना थी।


(सन्दर्भ-आर्यसमाज लुधियाना का सचित्र ५० वर्षीय इतिहास-बाबुराम गुप्त पृष्ठ संख्या ७)



5. पंडित लेखराम जी पर जब पत्थर फेंके गये

सन १८९४ में करतारपुर, तब जालंधर के अंतर्गत आर्य समाज की स्थापना के समय पंडित लेखराम जी का व्याख्यान हो रहा था तो पौराणिकों ने उन पर पत्थरों से वर्षा आरंभ कर दी। इस पर पंडित लेखराम जी ने कहा की मुझे यह पत्थर खाने में बड़ा आनंद आ रहा हैं। ऐसा भी समय आयेगा जब मेरे मिशन के प्रचारकों पर लोग फूल बरसायेंगे।
पंडित जी का कथन १९२१ में सही साबित हुआ जब सुदूर केरल में मोपला दंगों के समय आर्यसमाज द्वारा किये गये राहत और शुद्धि कार्य के कारण सम्पूर्ण हिन्दू समाज ने आर्य समाज का खुले दिल से स्वागत किया था।

 सन्दर्भ- आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का सचित्र इतिहास- पंडित भीमसेन विद्यालंकार
6. हिन्दू कब सुरक्षित होँगे?

पं॰विष्णुदत्तजी ने अपने संस्मरण मेँ लिखा है कि पण्डित लेखराम जी कहा करते थे कि जब हिन्दृ इतने दृढ़ हो जावेगेँ कि वे मुसलमान पुरूष या स्त्री को अपना सहधर्मी बना सकेगेँ तो वे सुरक्षित हो जावेँगे। वह अमृतसर के दरबार साहिब का उदाहरण दिया करते थे कि वहाँ मुसलमान रबाबी कई पीढ़ियोँ से गुरूग्रन्थ साहिब के भजन गाते हैँ किन्तु फिर भी मुसलमान हैँ, इसके विपरीत स्थिति मेँ हिन्दू यदि किसी मस्जिद मेँ प्रतिदिन दीपक जलाता हो या कुरान का पाठ करता हो तो सम्भव नहीँ कि वह एक पीढ़ी मेँ भी अपने धर्म पर टिका रहे। हिन्दुओँ को कट्टरता अपनाने के साथ-साथ विधर्मियोँ के ग्रन्थोँ की कमियोँ का भी अध्धयन करना चाहिए।
7.
दाढ़ी तो बकरे रखते हैँ?

एक बार घासीपुर जिला मुजफ्फरनगर(उ॰प्र) के सब बड़े-बड़े चौधरियोँ ने मुसलमान बनने का निर्णय कर लिया। तिथि भी निश्चित हो गई। श्री पं॰लेखरामजी को किसी ने सूचना दे दी। पण्डित जी भागदौड़ करके येन-केन प्रकारेण उसी दिन ठीक समय घासीपुर पहुँचे। मौलवियोँ का जमघट लगा हुआ था। अधिक यात्राओँ के कारण पण्डितजी को हजामत का समय न मिला था जिससे उनकी दाड़ी बढ़ी हुई थी। हाँलाकि वो हमेशा केवल मूंछ रखते... थे। मौलवियोँ नेँ बड़ी दाढ़ी के कारण उनको भी मौलवी समझ अपने पास बिठाया और पूछा "दाढ़ी तो हुई, ये मूंछे कैसे?"

पण्डितजी हंसकर बोले "दाढ़ी तो बकरोँ की होती है, मूँछे सिँह की होती हैँ"

मौलवियोँ के कान खड़े हो गये, तब तक पण्डितजी नेँ मंच पर चढ़कर अपना नाम बताया और शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। और हमेशा की तरह पण्डितजी के सामने कोई टिक न सका। उनके भाषण सुनकर घासीपुर के सब चौधरी वैदिकधर्मी बन गये।

मित्रोँ, जो घासीपुर मुसलमान होने जा रहा था वहीँ पण्डितजी की वजह से गुरूकुल की स्थापना हुई।
8.
पं॰लेखराम और वेद मेँ मांस भक्षण !

पंजाब मेँ जब मांस भक्षण के प्रश्न को लेकर एक विवाद बड़ी उग्रता से चल रहा था, पण्डित लेखराम जी आगरा पधारे। पण्डितजी चारपाई पर बैठे हुए आगरा कालेज के कुछ विद्यार्थियोँ से बात कर रहे थे, इतन मेँ पं॰घासीराम जो तब छात्र ही थे, उन्होनेँ लेखरामजी कहा कि "मांस खाने वाले कहते हैँ कि वेदोँ मेँ मांस खाने का विधान है।"

इतना सुनते ही पण्डितजी ने गुस्से से भरकर कहा "जो ऐसा कहत...े हैँ वे झूठ बोलते हैँ"।

घासीराम फिर बोले "अच्छा पण्डितजी अगर वे यह सिद्ध कर देँ तो क्या आप मांस खायेगेँ?"

पण्डितजी उत्तर दिया "प्रथम तो यह असम्भव है परन्तु यदि कोई किसी प्रकार से मांस भक्षण का औचित्य सिद्ध कर दे तो मैँ मांस इसी समय बाजार से मंगवा कर खाऊँगा।"

मित्रोँ, पण्डितजी की वेद-वाणी पर ऐसी अडिग श्रद्वा थी कि मांस-भक्षण जैसे निकृष्ट कर्म को भी करने को तैयार थे यदि कोई वेद से सिद्ध करके दिखा दे।
9. थूकता तो है पर जूता क्योँ लगाता है?

डेरा इसमाईल खाँ नगर मेँ एक 'शेख युसफ' की कबर थी, जिससे सैकड़ोँ हिन्दू पुरूष व स्त्रियाँ मुरादेँ माँगने जाते थे, वहाँ के मजावर(कबर पर रहनेवाले मौलवी) मजारपोशी करने वाले के मुख पर थूकते फिर जूते लगाते। एक बार एक हिन्दू नेँ पं॰लेखरामजी से पूछा "वे थूकते तो हैँ परन्तु जूते क्योँ लगाते हैँ?"
पण्डितजी बोले "थूकते इस कारण हैँ कि तुम पारब्रह्म परमात्मा को तजकर कबर पर सिर रगड़ने आए हो और क्योँकि थूक शीध्र सूख जाती है इसलिए जूते भी लगाते हैँ ताकि तुम शीध्र भूल न जाओ"
हिन्दू उत्तर सुनकर लज्जित हुआ।

नोट- ये थूक परम्परा आज भी कई मजारो पर बदस्तूर जारी है।


 डॉ विवेक आर्य

Friday, August 30, 2013

Swami Dayanand, Aryasamaj and his contribution in dalit upliftment





Swami Dayanand, Aryasamaj and his contribution in Dalit upliftment


Dr Vivek Arya

Swami Dayanand, great scholar of his times who started reformation movement in our country in view of degradation of Vedic values and propagation of various myths on name of dharma. Child marriage, polygamy, casteism, Brahmins supremacy, ignorance towards Vedic scriptures, killing of cow, lack of education, poverty, unemployment, superstitions etc. were common and widely prevalent during his time. Worst among them was Casteism or Jativad which had created differences between humans. Almighty God gave birth to all of us; the humans degraded themselves by claiming themselves as superior or inferior on basis of birth in certain caste. During his times a rigid caste system was in practice, the Brahmins enjoyed supremacy over others. The condition of the shudras was deplorable and womanhood was also considered as inferior. The Muslims and Christians were proselytizing the Hindus and consequently the Hindu fold was becoming thinner day by day. Dayanand minutely observed these ill practices and founded that casteism was not even mentioned in Vedas and whatever thing was anti Vedic was false for Dayanand.

Casteism denied a great number of shudras from social justice. It caused a great loss to society. Casteism had shut the door to competition and had given rise to class jealousies and animosities.
Swami Dayanand was first in modern India to claim that we all are one Jati i.e. humans and there exists no castes, what exists is Varn Vyastha which is entirely based on qualities, merits of any person not on basis of birth.

Ignorant pundits started misinterpretations of famous mantra of purush sukt to prove casteism in Vedas. The mantra was translated as “Brahmans were born out of the Brahma’s mouth, Kshatriyas out of the arms, Vaishyas out of his stomach and Shudras out of Brahma’s feet. ” so, Shudras being Brahma’s feet are inferior in society.

Swami Dayanand, great Vedic scholar propagated that Brahmins are like head as they guides the society, Kshatriyas are like arms as they protects the society, Vaishyas are like stomach as they prospers the society and Shudras are like feet as they serves the society. This classification is based on actions not on the basis of birth.
Swami Ji acknowledged the division of society into four classes. He in chapter four of his famous work Satyarth Prakash writes that a Brahmin must be righteous, truthful, learned of the Vedas and of all knowledge. A Kshatriya must be endowed with the virtue of protecting people, fearlessness, boldness and dutifulness. A Vaishya should serve society by doing business, going overseas, farming etc. A shudras should serve Brahmin, Kshatriya and Vaishya without disrespect, jealousy and conceit and they all must respect each other with equal honor and rights.
All these are Varna’s not castes and they are not based on basis of birth. The individuals should be placed in different classes according to their qualifications, accomplishments and character.

According to Swami Dayanand shudras can be promoted to Brahmins on basis of his qualities. A person who is born to a Brahmin and if engaged in meat eating, adultery and is uneducated is a Shudra while a person born to a Shudra and is educated, qualified and learned in Vedas should be promoted to be a Brahmin. In olden days there was no casteism and society was based on Varn Vyastha and so our country Aryavrata was supreme in the world. Later on when people left learning Vedas, few Brahmins started this ill practice of casteism. They even confined the Vedic knowledge to their own families only so that no others will ever know the truth.

Swami Ji holds that people will advance by adopting this system as higher class will be in constant fear of their sons being degraded into lower classes whilst the lower class will be promoted to exert them to enlist into the superseding classes. He also exhorted the rulers and responsible persons to see that all the four classes performed their duties honestly. The caste system according to swami ji was not religious or natural distinction but a socio-economic institution, castes were not created by god. The Varn Vyastha is a social order for better discharge of different functions.

Swami Ji was so much perturbed by the degrading condition of the depressed classes that he sometimes spent sleepless nights worrying over their lot. “The Christians are doing all they can to convert the kolis and bhils, depressed classes of the Hindus, while the religious leaders of the Hindus are sleeping like kumbhkaran.” He condemned the atrocious treatment meted out to the lower classes and publically declared that all men are equal. He taught the truth that none was born to rule and none to be ruled. He explained that crores of people had become Muslims or were being converted to Christianity and unless the nation was aroused by candid advice and unless the society was purged of evils, there was little doubt that the Hindu race would die. He advocated that Brahmans, Kshatriyas and Vaishyas should eat food cooked by shudras.

Swami Ji life history gives us many examples that although he was himself born in a Brahmin family he rejected casteism. In 1867 we find swami ji eating half bread from hands of a manjhi (boatman). In 1869 in farrukhabad we find him eating from hands of Shri Sukhwasilal sadh. In 1872 in Anoop sahar we find him eating from hands of a barber in general public. In pune when shri Govind Mang, Gopal Chamar, Raghu Mahar requested him for a lecture in Sudra school on Vedas he willingly accepted their proposal and went for lecture on Vedas on 16th July 1875. In 1879 in a during a public lecture a Muslim postman criticized a majhabi Sikhs presence among general public calling him as shudras are not allowed among high castes. Swami Ji called that person and asked him to daily attend his lectures. In 1878 in Ajmer when swami ji got news that the huts of poor Chamars near Anasagar lake had burned he urgently appealed to public to collect funds for the poor one so that they could rehabilitate, his appeal was widely accepted by all Hindus.

In 1880 in Banaras one Brahmin debated with swami ji giving a shalok from Mahabharata 4/1/48 that Brahmin caste is based on knowledge, practice and birth. Even if a person is having no knowledge and no practice he can be Brahmin on basis of his birth. Swami ji replied a shalok from Manu Smriti 2/157 that as a toy made of wood in form of elephant , as toy made of leather in form of deer are name sake toys only similarly an uneducated person is a Brahmin by name sake only.
In Banaras again when a person debated with him on casteism on basis of birth he said if two sons of a Brahmin are not considered as Brahmin if they are converted to Islam or Christianity then how you could say that son of a Brahmin is a Brahmin.

In a letter dated 13th November 1903 Pandita Ramabai accepted that I was disciple of swami ji in 1880 in Meerut and I was deeply impressed from his teaching as his teachings allows reading of Vedas by womanhood.

In brief Swami Dayanand had propagated the following measures for Dalit upliftment

Swami Ji was first in modern times to raise voice for right of women and shudras to chant Gayatri mantra. The ignorant Brahmins had banned women and shudras to listen Vedic mantras from centuries.

Swami Ji was first in modern times who advocated right of wearing yagnopavit for women and shudras.

Swami Ji was first in modern times who advocated right to perform yajnas by shudras and women hood.

Swami Ji was first in modern times who advocated inter-dinning of all high castes with shudras.

Swami Ji was first in modern times who advocated 100% education for all irrespective of caste or gender or status in society. He even advised that those parents who did not admit their kids to schools for education must be punished by the king. He even advised that son of a king and son of a poor should be given same cloths and same facilities in his teaching Gurukul.

Swami Ji was first to advocate that marriage of a girl and boy must be done on basis of their qualities not on basis of their caste.

Swami ji was first to reject interpolations in Manu smriti. He said I do not believe in interpolations in Manu smriti which supports casteism and inferior status for womanhood and are thus not in accordance with the Vedas. This stand of swami Dayanand on Manu smriti is also applies on other texts like Ramayana, Mahabharata and Puranas.

Due to his demise swami Dayanand was not able to do much work at ground level for Dalit upliftment but his writings, his speech, his organization Aryasamaj caused great consciousness among general public and the organization Aryasamaj and its leaders carried his agenda of Dalit upliftment to ground level.

DALIT UPLIFTMENT WORK BY ARYASAMAJ

After swami Dayanand leaders of Aryasamaj paid special attention or upliftment of depressed classes.

The first notable worker in this field was pundit Ganga Ram of Muzaffargarh. He started work in odes, a low caste. He offered sacred threads to them and opened a school name Arya Dalitoddhar Pathshala.

Lala Munshi Ram later Swami Sharddhananda was forerunner among Vedic missionaries. He first started eradication of untouchability from his own home. In 1910 He married his own daughter Amrit Kala out of caste despite objections from his own family.

Swami Sharddhananda opened Gurukul Kangri near Hardwar in view of fulfilling the dreams of Swami Dayanand that son of a king or a poor farmer should get education from one common platform with equal facilities for both and without any discrimination of caste. He got his both sons admitted in the same Gurukul. Later thousands of Gurukul were established all over country following his example which imparted education of Vedas and other streams for all irrespective of castes.

In 1920 Swami Sharddhananda most important work among untouchables was to secure for them permission to draw water from wells. Swami Ji went with his several followers and untouchables in a procession outside Ajmeri Gate at the Angoori wala well. His procession was first attacked by both castist Hindus and Muslims but with his continuous effort many wells and temples were opened for untouchables.

In 1921 Swami Sharddhananda established Dalitoddhar Sabha at Delhi. Its aim was to preach true conduct among the untouchables, to safe guard them from onslaughts especially from Christians and Muslims, to make them offer the right hitherto lost by them, to open Pathshala for them and to educate them. The biggest problem was of unemployment which was mostly in Zamindari areas.

Zamindars treated the depressed classes very badly. This Sabha severely denounced this atrocity and succeeded a great deal in diminishing the misery of the depressed classes.

In 1924 a great conference was organized in Delhi which was attended by thousands of people. Ten proposals in connection with social reforms were passed by this conference. At the end, a big feast was organized in which the leading public men of the city participated and partook the food cooked by Bhangis, Chamars and Jatavas. Dalitoddhar Sabha instigated the untouchables to draw water from wells; where this was not possible new wells were constructed.

In 1923 in Bulandsahar Pundit Sohan Lal Gaur got depressed classes to join Ramlila Procession. The sweepers offered arti to Lord Ram with singing of bhajans.

On 4th Jan 1924 in Palwal a great panchayat was organized in which depressed classes pledged not to touch meat and wine and also not to eat food cooked by Muslims.

In 1924 in Raysina Valmiki Aryasamaj Chaudhary Jai mal Singh Gujar, a rais of dist. Saharanpur permitted the Jatavas to draw water from his three wells even in the teeth of the opposition of the others.

In 1926 in fifth Dalitoddhar conference presided by Motilal Nehru, pundit Nehru said “none else, before Aryasamaj, had taught of making an attempt to eradicate this inequality.”

Mahashaya Ramchandra was great social worker among untouchables in Jammu region. His work was not appreciated among high caste Hindus. They attacked him with sticks and beat him to death on 20th Jan 1920. His death changed the mind of all high caste Hindus. They adopted the mission left by him and started upliftment work in his memory among dalits. Several Pathshala were opened in Jammu, Butcher and Udhampur for educating dalits.

In 1922 at famous freedom fighter Bhai Parmanand residence in Lahore Jat Pat Todak Mandal was established with Bhai Parmanand, Swami Bhuamanand and Pundit Sant Ram as its prominent members. The aim was to promote intercaste marriages among different castes so that the conflict of castes could be eradicated. The Mandal was able to perform thousands of intercaste marriages.
In 1941 census Sardeshik Arya Pratinidhi Sabha the apex body of Aryasamaj urged to fill column of caste as Arya (Vedic dharmi) to discard casteism.

His highness maharaja of Baroda Sayaji Rao Gaekwad 111 was deeply impressed by Dalit upliftment work of Aryasamaj. He was personally impressed by Swami Nityanand of Aryasamaj and did constitutional amendment to give equal rights for all dalits as higher caste in his reign. He also opened schools and hostels for free education of dalits. His reformation drive was criticized by upper caste Hindus. The biggest problem was that no upper caste Hindu was ready to teach Dalit students in those schools. The Muslims and Christians teachers were more interested in conversion of poor dalits in way of education. Maharaja of Baroda discussed this problem with Swami Nityanand ji. Nityanand ji send master Atma ram Amritsari from Amritsar for Dalit upliftment work. Master Atma ram was appointed as warden of Dalit hostel and inspector to all schools for dalits. Despite being upper caste Hindu master Atma ram faced social boycotts by high caste Hindus being inspector to Dalit schools. He was constantly denied accommodation in high caste communities. At last he made his office in a building which was considered as ghost house from decades. With his missionary reformation work he succeeded despite many difficulties. The high caste students in different schools insulted him by verbal abuse for his missionary work but he ignored all of them. Well known writer Saint Nihal Singh was so much impressed from master Atma ram work that he got some articles printed in British newspapers praising Atma ram’s work. Pundit Atma ram get students who had passed primary classes to admit for higher classes in cities and few of his students became even engineers. Once maharaja Baroda sends Mr. Shinde his officer for reposts of Dalit schools and hostels. Mr. Shinde reported that all the food was being cooked by Dalit girls and Dalit boys were seen chanting Vedic mantras. The person whom you had appointed as inspector is true Dalit sympathizer in every sense. Master Ji success can be easily understood by the fact that number of schools he opened was 400 in number with over 20000 dalits as students including both boys and girls. Pundit ji family also continued his work his daughter Smt. Sushila kumar was president of first Bhangi parishad of Baroda.

Master Atma ram ji is considered as forefather of Dalit upliftment work in Gujarat.

Kohla pur Naresh Chatrapati Rajshri Sahu ji Maharaj adopted similar measures in his state after inspiring from views of swami Dayanand. Sahu maharaj is credited with doing much to further the lot of the lower castes, and indeed this assessment is warranted. He did much to make education and employment available to all: he not only subsidized education in his state, eventually providing free education to all, but also opened several hostels in Kolhapur for students hailing from many different non-Brahmin communities, thereby facilitating the education of the rural and low-caste indigent. He also ensured suitable employment for students thus educated, thereby creating one of the earliest affirmative action programs in history. Many of these measures were affected in the year 1902.
Shahu’s other initiatives included restricting child marriage in his state and the encouragement of intercaste marriage and widow remarriage. He long patronized the satya shodhak samaj but later moved towards the Aryasamaj. Under the influence of these social-reform movements, Sahu arranged for several non-Brahmin youths to be trained to function as priests, in defiance of timeless convention which reserved the priesthood for those of the Brahmin caste. However, he faced opposition from many, including Lokamanya Bal Gangadhar Tilak , the very famous patriot of that time.

In 1911 a thread giving ceremony was performed among Vashisht, a Dalit community in khairpur, nathamshah in Sind. The upper caste Hindus out casted many Aryasamaj members and they branded one vashistha with symbol of sacred thread with hot iron. Aryasamaj condemned this animal act on national level in its newspapers.

The education work of Aryasamaj also got large success in whole country. In Bombay presidency in 1912 there were 27 educational institutions working in Dalit societies with 1231 students enrolled.
Four middle schools and over thirty five upper and lower primary schools, a few girl schools and a few night schools for adults were running to impart education to the namasudra and other communities in districts of Dacca, Mymensingh, Noakhali, Chittagong, Jessore and Barisal.

In Punjab region hundreds of schools were established under D.A.V. school chain which imparted
education to thousands of pupils from each fraction of society.

In Jalandhar pundit Somdat started Dalit upliftment work. He was socially boycotted from Brahmin community and denied use of water from well. He started using impure water from river. His mother fell ill. Doctors advised use of clean water from well. He was in confusion what to do. One is way to say sorry to his community members and stop all Dalit upliftment work. But his own consciousness does not permit to stop this mission. But life of own mother is also important. His mother understood whole situation and asked her to carry his mission saying that one day she have to die why he stops his mission because of her. She sacrificed her life but Dalit upliftment work was not stopped. How great mother she was.

Nayak community in united provinces engaged their daughters in prostitution. Aryasamaj distributed pamphlets to stop this evil. Aryasamaj married those girls in respectable families and send other girls to schools. It offered scholarships to boys to educate them. Nayak girl’s protection act was passed by efforts of Thakur Mashal Singh and just whole community was uplifted with efforts of Aryasamaj.
Reforms were done in so called criminal tribes in united provinces. More than fifty thousand criminal tribe members were rehabilitated outside luck now in colony name Arya nagar settlements. They were educated and a dispensary was also opened.

The reformation drive by Aryasamaj also influenced others. In kumbh fair of 1927 Pundit Madan Mohan Malviya in All India Sanatan Dharma Sabha passed proposal of permission of all untouchables to go to temples and also to draw water from public wells.

On 17th April 1927 an All India achhutoddhar conference was organized under the president ship of Lala Lajpat Rai wherein he appealed to the people to allow the untouchable to draw water from public wells.

On 17th July 1932 the untouchability removal day was celebrated at Bombay by Aryasamaj. The
untouchables drew water from the wells and the Brahmins, Kshatriyas and Vaishyas drank it willingly.

On 19th sept 1933 at a grand meeting organized at Bombay Aryasamaj appealed to the people to treat untouchables as their equal and to assure them that they were parts of Hindu community only.

Swami Sharddhananda and congress

Since his joining politics Swami Sharddhananda was continuously motivating Indian national congress to deal with the problem of untouchability at national level with extensive measures. In his chairman address of Amritsar congress (1919) he strongly expressed his feelings as “Is it not true that so many among you who make the loudest noises about the acquisition of political rights, are not able to overcome their feeling of revulsion for those sixty millions of India who are suffering injustice, your brothers whom you regard as untouchable ? How many are there who take these wretched brothers of theirs to their heart?…give deep thought…and consider how your sixty million brothers-broken fragments of your own hearts which you have cut off and thrown away- how these millions of children of mother India can well become the anchor of the ship of a foreign government. I make this one appeal to all of you, brothers and sisters. Purify your hearts with the water of the love of the motherland in this national temple, and promise that these millions will not remain for you untouchables, but become brothers and sisters. Their sons and daughters will study in our schools, their men and women will participate in our societies, in our fight for independence they will stand shoulder-to-shoulder with us, and all of us will join hands to realize the fulfilment of our national goal” (Quotations from original Hindi texts of the swami’s Amritsar conference address obtained from Gandhi memorial museum, Delhi)

Swami Ji difference with Gandhi Ji increased with the passage of time when he draw attention of the congress towards the harassment of Christian Chamars by police in environs of Delhi who had accepted Shuddhi and returned back to Hinduism by Aryasamaj. In April 1919 he published a booklet of eighty pages entitled ‘jati ke dinon ko mat tyago’ (do not abandon the poor of our nation). Books first seventy pages dealt with the methods used by Christian missionaries in India. Nearly half of the book was taken up by translations from an article in the theosophist about the nefarious activities of Portuguese missionaries and the inquisition, followed by an indictment of protestant missionary work, in particular that of the Delhi Cambridge mission. Thus nearly ninety percent of the pamphlet was aimed at demonstrating missionaries had always used unfair, immortal and underhand mean. The last ten pages deled with constructive point. Since the untouchables were becoming Christians for other than religious reasons, the way to prevent those happenings was by educating their children, by protecting them from the police, and by helping them to achieve social uplift. Since the orthodox would not take up that task, it had become a duty of the aryas to be a crucial one because the greatest danger of the conversion of the untouchables to Christianity was that they became denationalized and supporters of the raj. The swami wrote “if the seven crores of untouchables of India, exasperated by the attitude of the twice born, become Christian , then our orthodox leaders, supporters of independence, will not be able to do anything, except be very sorry.” (Jati ke dinon ko mat tyago. P-72)

In 1920 Calcutta congress session Swami Ji proposed three-point program with special section on the untouchables, but congress declared consideration of this inopportune.(shraddha 13 august,14,17 sept. 1920). Swami Ji writes in liberator that “even Mahatma Gandhi had not realized its importance and was taken up with his resolution of non-violent non-cooperation resolution had been passed by the khilafat committee and Mahatma Ji threatened to sponsor it outside the congress, if it was not passed there. I thought it to be a misfortune if Mahatma Ji would be obliged to sever his connection with the oldest political movement in India” (INCON-p 121)

Swami Ji was surprised on hearing Maulana Shaukat Ali’s doings in Calcutta session in hearing of more than 50 persons, while the merits of non-violence were being discussed. Maulana said “Mahatama Gandhi is a shrewd bania. You do not understand his real object. By putting you under discipline, he is preparing you for guerrilla warfare. He is not such an out-an-out non-violencist as you all suppose” (INCO P-122) Swami Ji forwarded his message to Gandhi Ji secretary that his motives were being misrepresented by his trusted colleagues. The next year 1921 Nagpur session Swami Ji again noticed the same pranks being played by the big Ali brothers. In Delhi the Aryasamaj had been working for the depressed classes, and the swami tried to get the local congress to allow them access to the wells. But it was in vain………..

Swami Ji reached Delhi on 17th august, 1921 and found that the question of removal of untouchability was becoming very acute. He called a few of chief chaudharies and asked the full story. They gave the following story- “The secretary of the Delhi congress committee called the chaudharies of the Chamars and requested them to give to the congress as many as four-Anna paying members as they could. The reply of the elders was that unless their grievance as regards the taking of water from the public wells was removed, they could not induce their brethren to join the congress. The secretary was a choleric man of hasty temper and said they wanted Swarajya at once but the grievance of the Chamars could wait and would be removed by and by. One of the young men got up and said-our trouble from which we are suffering for centuries must wait solution, but the laddu of Swarajya must go into your mouth at once! We shall see how you obtain Swarajya immediately!!”

He wrote to Gandhi Ji after Nagpur session in sept. 1921-

“I wired from Lahore that I would apply for financial aid through the Delhi provincial congress committee but on reaching the deli I found that the uplift of the depressed classes through the congress was difficult. The Delhi and Agra Chamars simply demand that they be allowed to draw water from wells used by the Hindus and Mohammedans and that water be not served to them through bamboos and leaves. Even that appears impossible for the congress committee to accomplish. Not only this; a Muslim trader of sadr went to the length of saying that even if Hindus allowed (these man) to draw water from common wells, the Muslims would forcibly restrain them from drawing water because they (the Chamars) ate carrion. I know that there are thousands of these Chamars who do not either drink wine or eat flesh of any kind and few of them who eat carrion are being weaned by the aryasamajists from that filthy habit. But I ask – do Hindu and Muslim meat eaters devour flesh of living cattle? Do they not eat the flesh of the cattle when they are dead?

At Nagpur you laid down that one of the conditions for obtaining Swarajya within 12 months was to give their rights to the depressed classes and without waiting for the accomplishment of their uplift, you have decreed that if there is a complete boycott of foreign cloth up till 30th September, Swarajya will be an accomplished fact on the 1st of October. The extension of the use of Swadeshi cloth is absolutely necessary but as long as six and half crores of our suppressed classes are taking refuge with the British bureaucracy so long will the extension of Swadeshi be impossible”. (INCO.P-134,135)

Swami Ji in his letter dated June 30th 1922 wrote to general secretary of all India congress committee that the following demands of the depressed classes ought to be complied with at once namely that -

1. They are allowed to sit on the same carpet with citizens of other classes
2.They get the right to draw water from common wells and
3.Their children get admission into national schools and colleges and are to mix freely with students drawn from the so-called higher castes.

Swami Ji went to the Luck now A.I.C.C. meeting of June 1922 especially to push a plan of action for the removal of untouchability. His proposal to appoint a sub-committee on untouchability was accepted, but some parts of it were amended. The sum of two lakhs of rupees was first substituted for the original five lakhs proposed and then even that was watered down by substituting the phrase ‘as much as could be spared’. But misunderstandings kept cropping orally, but when he started preparatory work and asked for some money, he was informed that the working committee had appointed until a report had been received from the sub-committee. It was all a sorry mess, letters came and went, nothing was being done, and the swami resigned in disgust. His postscript to the whole story as follows- The subcommittee did no business in placing the annul report of the congress before its session at Gaya; the secretary simply remarked that no work could be done by the sub-committee as no substitute for Swami Shraddhananda could be found. (INCO.P-181) Swami Shraddhananda did not receive any support from the congress and Mahatama Gandhi for eradicating the sin of untouchability. Instead of that he received the message from cocanada session of congress in which Maulana Mohammad Ali the president of that session proposed to divide the so-called untouchables in equal halves between Hindus and the Muslims. (INCO.p-188)

Palghat court verdict

On 13th Nov. 1925 name of aryasamaj and swami ji published in all major newspapers of south India. On the opening day of car festival the divisional magistrate promulgated an order prohibiting aryasamaj converts from entering the orthodox Hindu streets. This led to a public protest meeting, which passed among others the following resolution. That “this meeting begs to express its unqualified condemnation of the utterly illegal procedure and policy of religious interference adopted by the madras government in extending its order of prohibition to the aryasamaj converts from the depressed classes while such converts to Christianity and Mohammedanism are not so prohibited ” (leader 19.nov,1924)

The leader of 21st Nov., 1925 condemned the intolerant and wholly short sighted attitude of the orthodox Hindus and praised Swami Sharddhananda for taking up their cause and valiantly leading the movement.

Swami Ji in response started a new weekly name liberator in English for special purpose of communicating his views to the intelligentsia of south India where the evil of untouchability existed in most objectionable and inhuman form (leader 5, April 1925) Its aim was strongly stated by swami ji- The uplift of the untouchables and their assimilation in the Hindu polity is the very plinth on which alone the edifice of free India can be constructed. Therefore, the liberator will make the cause of the so-called untouchables its main concern. This doctrine of untouchability is the gangrene of Hindu polity. Die hard vanity, deep- rooted prejudice, degenerating ignorance and doping superstition are the germs that feed this gangrene. Each one of these has to be attacked for getting rid of this gangrene. (Leader 4, April 1926)

Thus we reach an inference that the later part of swami ji life was devoted entirely for the upliftment of the depressed Hindus.

The above mentioned are few glimpses of work of aryasamaj and its great leaders after Swami Dayanand. The foremost point is that many those who were born in high castes were out casted, faced social boycott, physical and death threat, prevented from using wells , prevented from marrying in community , they faced all sort of consequences but did not stopped their missionary work. They were true soldiers of Swami Dayanand. Many reformers had arrived in last centuries to eradicate the evil of untouchability like Jyotiba Phule, Dr Ambedkar etc but most unique about soldiers of swami Dayanand is that they are only examples of high caste Hindu working for down trodden and untouchables.

डॉ अम्बेडकर के सवर्ण मार्गदर्शक – मास्टर आत्माराम अमृतसरी

                                                 



२० वि शताब्दी के आरंभ में हमारे देश में न केवल आज़ादी के लिए संघर्ष हुआ अपितु सामाजिक सुधार के लिए भी बड़े-बड़े आन्दोलन हुए। इन सभी सामाजिक आन्दालनों में एक था शिक्षा का समान अधिकार। प्रसिद्द समाज सुधारक स्वामी दयानंद द्वारा अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में उद्घोष किया गया कि राजा के पुत्र से लेकर एक गरीब व्यक्ति का बालक तक नगर से बाहर गुरुकुल में समान भोजन और अन्य सुविधायों के साथ उचित शिक्षा प्राप्त करे एवं उसका वर्ण उसकी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात ही निर्धारित हो और जो अपनी संतान को शिक्षा के लिए न भेजे उसे राजदंड दिया जाये। इस प्रकार एक शुद्र से लेकर एक ब्राह्मण  तक सभी के बालकों को समान परिस्थियों में उचित शिक्षा दिलवाना और उसे समाज का एक जिम्मेदार नागरिक बनाना शिक्षा का मूल उद्देश्य था।
                  स्वामी दयानंद के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा पाकर बरोदा नरेश शयाजी राव गायकवाड ने अपने राज्य में दलितों के उद्धार का निश्चय किया. आर्यसमाज के स्वामी नित्यानंद जब बरोदा में प्रचार करने के लिए पधारे तो महाराज ने अपनी इच्छा स्वामी जो को बताई की मुझे किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता हैं जो शिक्षा सुधार के कार्य को कर सके। पंडित गुरुदत विद्यार्थी जो स्वामी दयानंद के निधन के पश्चात नास्तिक से आस्तिक बन गए थे से प्रेरणा पाकर नये नये B.A.बने आत्माराम अमृतसरी ने अंग्रेजी सरकार की नौकरी न करके स्वतंत्र रूप से कार्य करने का निश्चय किया। स्वामी नित्यानंद के निर्देश पर अध्यापक की नौकरी छोड़ कर उन्होंने बरोदा जाकर दलित विद्यार्थियों को शिक्षा देने का निश्चय किया।  एक पक्की सरकारी नौकरी को छोड़कर गुजरात के गाँव गाँव में दलितों के उद्धार के लिए धुल खाने का निर्णय स्वामी दयानंद के सच्चा भक्त ही कर सकता था।
                 आत्माराम जी बरोदा नरेश से मिले तो उनको दलित पाठशालाओं को खोलने विचार महाराज ने बताया और उन्हें इन पाठशालाओं का अधीक्षक बना दिया गया। मास्टर जी स्थान तलाशने के लिए निकल पड़े। जैसे ही मास्टर आत्माराम जी किसी भी स्थान को पसंद करते तो दलित पाठशाला का नाम सुनकर कोई भी किराये के लिए उसे नहीं देता।  अंत में विवश होकर मास्टर जी ने एक भूत बंगले में पाठशाला स्थापित कर दी। गायकवाड महाराज ने कुछ समय के बाद अपने अधिकारी श्री शिंदे जी को भेजकर पाठशाला का हाल चाल पता कराया। शिंदे जी ने आकर कहाँ महाराज ऐसा दृश्य देख कर आ रहा हूँ जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।  दलितों में भी अति निम्न समझने वाली जाति के लड़के वेद मंत्रो से ईश्वर की स्तुति कर रहे थे और दलित लड़कियां भोजन पका रही थी जिसे सभी स्वर्ण-दलित बिना भेदभाव के ग्रहण कर रहे थे। सुनकर महाराज को संतोष हुआ। पर यह कार्य ऐसे ही संभव नहीं हो गया।  मास्टर जी स्वयं अपने परिवार के साथ किराये पर रहते थे, जैसे ही मकान मालिक को पता चलता की वे दलितों के उत्थान में लगे हुए हैं वे उन्हें खरी खोटी सुनाते और मकान खाली करा लेते। इस प्रकार मास्टर जी अत्यंत कष्ट सहने रहे पर अपने मिशन को नहीं छोड़ा। महाराज के प्रेरणा से मास्टर जी ने बरोदा राज्य में ४०० के करीब पाठशालाओं की स्थापना करी जिसमे २०,००० के करीब दलित बच्चे शिक्षा ग्रहण करते थे। महाराज ने प्रसन होकर मास्टर जी के सम्पूर्ण राज्य की शिक्षा व्यस्था का इंस्पेक्टर बना दिया। मास्टर जी जब भी स्कूलों के दौरों पर जाते तो स्वर्ण जाति के लोग उनका तिरस्कार करने में कोई कसर नहीं छोड़ते पर मास्टर जी चुपचाप अपने कार्य में लगे रहे। सम्पुर्ण गुजरात में मास्टर आत्माराम जी ने न जाने कितने दलितों के जीवन का उद्धार किया होगा इसका वर्णन करना कठिन हैं। अपने बम्बई प्रवास के दौरान मास्टर जी को दलित महार जाति का B.A. पड़ा हुआ युवक मिला जो एक पेड़ के नीचे अपने पिता की असमय मृत्यु से परेशान बैठा था। उसे पढने के लियें २५ रूपए मासिक की छात्रवृति गायकवाड महाराज से मिली थी जिससे वो B .A . कर सका था। मास्टर जी उसकी क़ाबलियत को समझकर उसे अपने साथ ले आये। कुछ समय पश्चात उसने मास्टर जी को अपनी आगे पढने की इच्छा बताई।  मास्टर जी ने उन्हें गायकवाड महाराज के बम्बई प्रवास के दौरान मिलने का आश्वासन दिया। महाराज ने १० मेघावी दलित छात्रों को विदेश जाकर पढने के लियें छात्रवृति देने की घोषणा करी थी। उस दलित युवक को छात्रवृति प्रदान करी गयी जिससे वे अमरीका जाकर आगे की पढाई पूरी कर सके। अमरीका से आकर उन्हें बरोदा राज्य की १० वर्ष तक सेवा करने का कार्य करना था। अपनी पढाई पूरी कर वह लगनशील युवक अमरीका से भारत आ गए और उन्होंने महाराजा की अनुबंध अनुसार नौकरी आरंभ कर दी। पर स्वर्णो द्वारा दफ्तर में अलग से पानी रखने, फाइल को दूर से पटक कर टेबल पर डालने आदि से उनका मन खट्टा हो गया। वे आत्माराम जी से इस नौकरी से मुक्त करवाने के लियें मिले। आत्माराम जी के कहने पर गायकवाड महाराज ने उन्हें १० वर्ष के अनुबंध से मुक्त कर दिया।  इस बीच आत्माराम जी के कार्य को सुन कर कोहलापुर नरेश साहू जी महाराज ने उन्हें कोहलापुर बुलाकर सम्मानित किया और आर्यसमाज को कोल्हापुर का कॉलेज चलने के लिए प्रदान कर दिया। आत्माराम जी का कोहलापुर नरेश से आत्मीय सम्बन्ध स्थापित हो गया।

                         आत्माराम जी के अनुरोध पर उन दलित युवक को कोहलापुर नरेश ने इंग्लैंड जाकर आगे की पढाई करने के लिए छात्रवृति दी जिससे वे Phd करके देश वापिस लौटे। उन दलित युवक को आज के लोग डॉ अम्बेडकर के नाम से जानते हैं जो कालांतर में दलित समाज के सबसे लोक प्रिय नेता बने और जिन्होंने दलितों के लिए संघर्ष किया। मौजदा दलित नेता डॉ अम्बेडकर से लेकर पंडिता रमाबाई तक (जिन्होंने पूने में १५००० के करीब विधवाओं को ईसाई मत में सम्मिलित करवा दिया था) उनसे लेकर ज्योतिबा फुले तक (जिन्होंने सत्य शोधक समाज की स्थापना करी और दलितों की शिक्षा के लिए विद्यालय खोले) का तो नाम बड़े सम्मान से लेते हैं पर स्वर्ण जाति में जन्मे और जीवन भर दलितों का जमीनी स्तर पर शिक्षा के माध्यम से उद्धार करने वाले मास्टर आत्माराम जी अमृतसरी का नाम नहीं लेते। सोचिये अगर मास्टर जी के प्रयास से और स्वामी दयानंद की सभी को शिक्षा देने की जन जागृति न होती तो डॉ अम्बेडकर महार जाति के और दलित युवकों की तरह एक साधारण से व्यक्ति ही रह जाते। मास्टर जी के उपकार के लिए दलित समाज को सदा उनका ऋणी रहेगा ।

डॉ विवेक आर्य

दलितौद्धार के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले हुतात्मा वीर मेघराज जी



वीर मेघराज जी स्वामी दयानंद की उसी शिष्य परम्परा के अनमोल रत्न थे जो दलितौद्धार जैसे पवित्र कार्य के लिए अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटे. स्वामी दयानंद द्वारा जातिवाद के उनर्मुलन एवं पिछड़े और निर्धन वर्ग के उद्धार के सन्देश को हजारों आर्यों ने सम्पूर्ण देश में घर घर पहुचायाँ. अनेक कष्ट सहते हुए भी, अनेक प्रकार के दुखों को सहते हुए भी इस पवित्र यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले आर्यों में वीर मेघराज का नाम विशेष स्थान रखता हैं. आपका जन्म १८८१ में इंदौर के नारायणगढ़ में एक स्वर्ण जाट परिवार में हुआ था. बचपन से पौराणिक संस्कारों में पले बढे मेघराज की जिज्ञासु प्रवृति थी.एक वर्ष आपके क्षेत्र में आर्यसमाज के प्रचारक श्री विनायकराव जी का आगमन हुआ. विनायक जी ने अन्धविश्वास, सच्चे ईश्वर की भक्ति, जातिवाद उनर्मुलन आदि का प्रचार किया तो अज्ञानी पौरानिकों ने उन पर ईट पत्थर आदि से वर्षा कर उन्हें घायल करने की कोशिश करी. मेघराज का इस अमानवीय व्यवहार से ह्रदय परिवर्तन हो गया और वे समाजसेवी और तपस्वी विनायक राव को अपने घर ले आए. उनकी सेवा करी, उनसे वार्तालाप किया , शंका समाधान किया. उनसे प्रेरणा पाकर मेघराज जी ने स्वामी दयानंद के ग्रंथों का स्वाध्याय किया और सैद्धांतिक रूप से अपने को समृद्ध कर आप सच्चे आर्य और वैदिक धर्मी बन गए.
अब मेघराज जी दीन दुखियों, दलितों और अनाथों की सेवा और रक्षा में सदा तत्पर रहने लगे. इस कार्य के लिए आप मपने मित्रों के साथ कोसों दूर दूर तक प्रचार करते थे. सन १९३८ में इंदौर के महाराज ने अपने राज्य के सभी दलितों को मंदिर में प्रवेश देने की साहसिक घोषणा कर दी. इस घोषणा से अज्ञानी पौराणिक समाज में खलबली मच गई. पोंगा पंडितों ने घोषणा कर दी की वे किसी भी दलित को किसी भी मंदिर में प्रवेश नहीं करने देंगे. उनके प्रतिरोध से राजकीय घोषणा कागजों तक सिमित रह गई.
वीर मेघराज से यह अनर्थ न देखा गया. करुणासागर दयालु दयानंद का शिष्य मेघराज दलितों को समान नागरिक अधिकार दिलवाने के लिए तत्पर हो उठा.
उन्होंने दलित बंधुयों में घोषणा कर दी की में आपको आपका अधिकार दिलाने के लिए आगे लगूंगा आप मेरे साथ मंदिर में प्रवेश करना. जो कोई मुझे या आपको रोकने की कोशिश करेगा उसे में इंदौर नरेश के पास ले जाऊँगा. वीरवर की हुंकार से पौराणिक दल में शोर मच गया. वे मेघराज को कष्ट देने के लिए उनके पीछे लग गए.
 मेघराज किसी कार्य से जंगल में गए तो उन्हें अकेले में घेर लिया और लाठियों से उन पर वार कर उन्हें घायल अचेत अवस्था में छोड़कर भाग गए. जैसे ही यह समाचार उनकी पत्नी और मित्रों को मिला तो वे भागते हुए उनके पास गए. वीर मेघराज को अपनी अवस्था पर तनिक भी दुःख नहीं हुआ. उन्होंने यहीं अंतिम सन्देश दिया की “भगवान इन भूले भटके लोगों की ऑंखें खोलें. यह सुपथगामी हो और आर्य जाति का कल्याण हो ” इतना कहकर सदा सदा के लिए अपनी ऑंखें मूंदकर अमर हो गए.
उन समय आर्य मुसाफिर आदि पत्रों में उनकी पत्नी का यही सन्देश छपा की अपने पति की मृत्यु के पश्चात भी वे दलितोद्धार जैसे पवित्र कार्य से पीछे नहीं हटेंगी. सरकार ने कुछ लोगों को दंड में जेल भेज दिया. कुछ काल बाद वे आर्यसमाज के साथ मिलकर वीर मेघराज के अधुरें कार्यों में लग गए. जिन्हें मेघराज जीते जी न बदल सके उन्हें उनके बलिदान ने बदल दिया.
वीर मेघराज के बलिदान पर हमे एक ही सन्देश देना चाहते हैं -

आज भी उनकी मुहब्बत कौम के सीने में हैं.
मौत ऐसी हो नसीबों में तो क्या जीने में हैं..
डॉ विवेक आर्य

स्वामी श्रद्धानंद के जीवन के कुछ प्रेरणादायक संस्मरण







स्वामी श्रद्धानंद , इस नाम का स्मरण होते ही मस्तिष्क में ऊँचा कद,चेहरे पर गंभीरता, वाणी में दृढ़ता लिए एक महामानव का नाम स्मरण हो जाता हैं जिन्हें जाति निर्माता कहूँ या फिर अमर शहीद कहूँ या फिर त्याग और तपस्या की मूर्ति कहूँ या मार्ग दर्शक कहूँ या फिर दलितौद्धारक कहूँ । स्वामी जी का विशाल जीवन कदम कदम पर प्रेरणा दे हैं। उन महामानव के जीवन के कई ऐसे मोती हैं जो जीवन की अविचल धारा में लुप्त से हो गये हैं। पर हर बहुमूल्य मोती एक महाधन से कम नहीं हैं, उनकी प्रेरणा से न जाने कितनो के जीवन बदले हैं और न जाने कितनो के बदल सकते हैं।





ऐसे महान आत्मा के जीवन के कुछ अलभ्य संस्मरणों को एकत्र कर उनका लेखबध करने का सौभाग्य प्रदान करने के लिए ईश्वर का कोटि कोटि धन्यवाद। आशा हैं की जीवन में इसी प्रकार ईश कृपा हम पर बनी रहेगी।





१. एक रात्रि भोजन के पश्चात हम दोनों भाइयों ने प्रधान जी (पिता जी) से प्रार्थना कि की हम दोनों अकेले में उनसे कुछ बातें करना चाहते हैं, गुरुकुलीय जीवन शायद यह पहला अवसर था,जब हमने पिताजी से अलग बात करने का समय माँगा हो, अन्यथा वह दोनों को सदा अन्य ब्रह्मचारियों के समान भाव से ही देखते रहे। हमारी प्रार्थना से पिताजी को आश्चर्य हुआ, तो भी उन्होंने हमारी प्रार्थना स्वीकार कर ली। और हम दोनों को साथ लेकर उसी समय गुरुकुल वाटिका में लेकर चले गये। वहा टहलते टहलते भाई जी ने पिताजी से अपने मन का भाव कहा। भाव यह था की हम दोनों गुरुकुल की शिक्षा से संतुष्ट नहीं हैं। इस शिक्षा से हम दोनों पंडित नहीं बन सकेगे। पंडित बनने के लिए काशी में शिक्षा आवश्यक हैं। हमें पंडित शिव कुमार मिश्र,पंडित जयदेव मिश्र और श्री भागवताचार्य जैसे पंडितों से शिक्षा पाने का अवसर मिलेगा। आप हमें गुरुकुल से उठा कर बनारस भेज दीजिये।





हमारे उस प्रस्ताव से पिताजी को जो मानसिक धक्का लगा होगा, उसका अनुमान लगाकर मेरा दिल अब भी काँप उठता हैं। जिस व्यक्ति ने गुरुकुल शिक्षा की स्थापना के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया हो। उसके लड़के ही निष्फलता और निराशा का सन्देश लेकर आये तो उस व्यक्ति के ह्रदय पर आघात होना स्वाभाविक ही हैं, पिता जी हमारा प्रस्ताव सुनकर चुप हो गए। बहुत देर तक तीनों मौन मुद्रा में घूमते रहे। यह अनुभव करके की हमारे शब्दों ने पिताजी को बहुत दुखी किया हैं, हम दोनों स्तब्द से हो गये। पिता जी मन में क्या विचार उठ रहे होगे इसका अनुमान ही लगाया जा सकता हैं।





कुछ देर चुप चाप टहलने के पश्चात पिता जी ने बड़े शान्त भाव से कहा,"मैं तुम्हारी बातों का उत्तर कल दूँगा"





दुसरे रोज हम बड़ी उत्सुकता से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगे।





तरह तरह के विकल्प मन में उठ रहे थे।





कभी सोचते की पिताजी बनारस भेज देंगे, न भेजना होता तो उसी दिन इन्कार कर देते। फिर विचार उठता की भेजना होता तो उसी समय मान भी तो सकते थे अवश्य इन्कार करेंगे। इसी तरह संकल्प-विकल्प करते साँय काल का समय आ गया। साँयकाल पढाई से छुट्टी होने पर कमरे से बाहर निकले तो प्रधान जी का चपरासी हाथ में एक कागज लेकर आता हुआ दिखाई दिया। उस कागज में निम्न लिखित आशय की आज्ञा लिखी हुई थी," भोजन से निवृत होकर दो बड़ी श्रेणियों के सब ब्रहमचारी मुख्याधिस्थाता जी के निवास स्थान पर एकत्र हो।" इस आज्ञा से हम दोनों भाइयों की दुविधा और भी बढ़ गई। क्या हमारे प्रस्ताव का उत्तर सभी के सामने दिया जायेगा।





भोजन के उपरांत ऊपर की श्रेणियों के सब ब्रहमचारी प्रधान जी के स्थान पर एकत्र हुए। प्रधान जी ने बड़े प्रसन्न भाव से ब्रहमचारियों को यह समाचार सुनाया की दोनों बड़ी श्रेणियों को देहरादून यात्रा करवाने का निश्चय किया गया हैं। इतना समाचार मात्र हम पिंजरे के पक्षियों को फड़काने के लिए प्रयाप्त था। हमने अभी हरिद्वार भी अच्छी तरह नहीं देखा था। देहरादून की यात्रा होगी यह जानकर हम दोनों बहुत ही प्रसन्न हुए।





प्रधान जी ने अत्यंत आकर्षक शब्दों में यात्रा का सार कार्यकर्म हमारे सामने रखा। साँय काल के समय चलेगे। रात को मायापुर वाटिका में ठहरेंगे। सुबह स्टेशन पर पहुँच कर तुम लोगों को यह समझाऊंगा की इंजन से रेल कैसे चलती हैं। देहरादून पहुँच कर जंगलात का ऑफिस, ऑब्जर्वेटरी आदि संस्थायें देखने को मिलेगी। फिर सहस्त्र धारा चलेंगे, इत्यादि इतनी नई चीजें इकट्ठी देखने की आशा उत्पन्न करने के अनन्तर प्रधान जी ने हमारे जिम्मे कई काम लगा दिए। कल कागज मँगवा दिए जायेंगे। तुम लोग यात्रा के नोट लेने के लिए स्वयं जिल्द वाली डायरिया तैयार कर लो। सब मैले कपड़ो को धो डालो। चार दिन के लिए खैर की दातुनों को इकट्ठी कर लो। यात्रा के लिए भंडारी, सहायक भंडारी उसी समय नियत कर दिए गए। इस प्रकार यात्रा और यात्रा की तैयारी का पूरा कार्यकर्म हमारे दिल और दिमाग में भरकर प्रधान जी ने हमें सोने के लिए आश्रम में भेज दिया।





मेरे अध्ययन और निजी अनुभव से जितने मनोवैज्ञानिक परिक्षण आये हैं, उनमें शायद ही कोई इतना सफल हुआ हो। जितना पिताजी का यह मनोरंजक परिक्षण हुआ, मैं इसे उनकी नेतृत्व शक्ति का सबसे प्रबल प्रमाण मानता हूँ। मनुष्यों का नेता वही हो सकता हैं, जो उनके मनों को अपनी इच्छा अनुसार सांचे में ढाल सके और ढाल भी ऐसे सके की उनके अनुयायियों को यह भी मालूम न हो की उन्हें कुछ का कुछ बना दिया गया हैं। देहरादून की यात्रा के प्रस्ताव ने हम दोनों के मन में से बनारस जाने की इच्छा के खंडरों तक को निकल कर बाहर फेंक दिया। रात को जब हम सोने के लिए आश्रम में पहुँचे तो हमारे ह्रदयों में से निराशा विदा ले चुकी थी और उत्साह भरा हुआ था। हमारे कल रात के प्रस्ताव का पिताजी की ओर से यह क्रियात्मक उत्तर था।





देहरादून की यात्रा हम दोनों भाइयों के जीवन में एक पड़ाव की हैसियत रखती थी। उस यात्रा का ब्रहमचारीयों के मन और ह्रदय पर बहुत गहरा असर हुआ, बाहर की दुनिया से अलग रहने के कारण हमारे मन की पस्लेट लगभग साफ थी। उस पर ब्राह्य संसार के जो पहले अक्षर लिखे गये, वह बहुत ही स्पष्ट और गहरे थे। हम लोग केवल संस्कृत ज्ञान के श्रद्धालु रूप में यात्रा के लिए चले थे। जन वापिस आये तो विज्ञान कला आदि की जिज्ञासा से पूर्ण थे। यह वह मनोवैज्ञानिक परिक्षण था जो पिताजी ने ब्रहाम्चारियों के मन पर किया था।





सन्दर्भ- गुरुकुल पत्रिका दिसम्बर १९५२-लेखक पंडित इन्द्र विद्यावाचस्पति जी













स्वामी श्रद्धानन्द - धर्म और सम्प्रदाय में क्या अंतर हैं ?













संसार के सम्प्रदाय धर्म की रक्षा के लिए स्थापन किये गए थे , परन्तु आज वे ही सम्प्रदाय मूल धर्म को भूल कर गौण मतभेद के धर्म के वादानुवाद में लगे हुए हैं। जिस प्रकार शरीर को जीवित रखने के लिए अन्न-फल आदि के आहार की आवश्यकता हैं , इसी प्रकार आत्मिक जीवन की संरक्षा के लिए भी धर्म रुपी आत्मिक आहार की आवश्यकता होती हैं। शरीर रक्षा के लिए अन्न और फल मुख्य है, परन्तु उसी अन्न और फल की रक्षा के लिए खेत वा वाटिका के इर्द-गिर्द बाड़ लगानी पड़ती हैं। कैसा मुर्ख वह इंसान हैं, जो अन्न-फल को भुलाकर अन्य किसानों की बाड़ो से ही अपनी बाड़ का मुलाबला कर उनका तिरस्कार करता हैं? इसी प्रकार जीवात्मा का आहार धर्म अर्थात प्रकृति के संसर्ग से छुट कर परमात्मा में स्वतंत्र रूप से विचरण मुख्य हैं। उसकी रक्षा के लिए जो सांप्रदायिक विधियां नियत की गई हैं, वे खेतों की बाड़ों के सदृश ही गौण हैं। कितना मुर्ख वह सांप्रदायिक पुरुष हैं, जो गौण नियमों के विवाद में फंसकर अपने मुख्य धर्म को भूल जाता हैं।









आचार परमो धर्म अर्थात धर्म की सबसे उत्तम परिभाषा आचार अर्थात आचरण को कहा गया हैं। इसलिए आचरण को पवित्र बनाने पर जोर दीजिये साम्प्रदायिकता पर नहीं।





(सन्दर्भ- राष्ट्रवादी दयानंद - लेखक सत्यदेव विद्यालंकार से साभार)

















स्वामी श्रद्धानंद की सबसे बड़ा गुण था संगठन निर्माण करता





आर्य समाज के कार्यकर्ताओं को जब भी वे किसी भी प्रकार की विपत्ति में पाते तो झट उनकी सहायता को निकल पड़ते। लाला लाजपत राय के देश निर्वासन के समय आपने उनके समर्थन में लेख लिखकर ब्रिटिश सरकार को खुलेआम चुनौती दी थी जबकि लाला जी आपके प्रमुख आलोचकों में से थे। बहुत कम लोगों को ज्ञात हैं की आपने महाशय चिरंजीलाल जी के लिए अभियोग लड़ा था। आर्यसमाज के अनन्य प्रचारक महाशय चिरंजीलाल जी पंडित लेखराम के समान वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार में अपना तन,मन, धन समर्पित करने वाले प्रचारक थे। १९ वर्ष की आयु में आपने १८७७ में स्वामी दयानंद के दर्शन लुधियाना में किये थे। बस तभी से आपने वैदिक धर्म का प्रचार करने की ठान ली थी। परन्तु एक तो आपका विवाह हो चूका था ऊपर से आपके पिताजी की मृत्यु होने से घर का सार बोझ आपके ककंधो पर आ चूका था। १०-१२ वर्ष तक आपने किसी प्रकार धैर्य किया और दुकानदारी से कुटुम्ब का भरण पोषण करने लगे। जब छोटा भाई कार्य भार सँभालने योग्य हो गया तो आप प्रचार कार्य में निकल पड़े। इनके प्रचार का साधन इन्ही की बनाई हुई पंजाबी की सी हर्फियाँ होती थी। उन्हें यह उर्दू में छपवा लेते और गा-गा कर उनका प्रचार करते थे। आप पर एक अभियोग भी चला जिसके कारण आपको ४ मास की सजा हुई और ५० रुपये का दंड मिला। आपके लिए महात्मा मुंशीराम ने अपील की जिससे आप छूट गए पर कुछ काल तक आपको जेल में रहना पड़ा था। कारावास की कहानी करुणाजनक हैं। इस कारावास ने आपके प्रचार को द्विगुणित कर दिया।





संगठन निर्माणकर्ता वही बन सकता हैं जो अपने सहयोगियों के दुःख और दर्द में उनका साथ दे।





सन्दर्भ आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का इतिहास---पंडित चमूपति

















व्यक्ति बड़ा अपने तप और त्याग से बनता हैं

गुरुकुल कांगड़ी भारतीय शिक्षा इतिहास में मील के पत्थर के समान हैं। गुरुकुल केवल मात्र शिक्षण संस्था न होकर स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा किया गया महान यज्ञ था जिसकी प्रत्येक आहुति के रूप में स्वामी जी ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। जिस समय स्वामी जी (तब मुंशीराम) गुरुकुल खोलने की जब योजना बना रहे थे तो उस समय पंजाब प्रतिनिधि सभा के लाला रलाराम और राय ठाकुरदत्त से गुरुकुल के स्थान को लेकर मतभेद था। उनका प्रस्ताव था की गुरुकुल पंजाब में खोला जाना चाहिए। जबकि महात्मा जी का विचार उसे हरिद्वार में खोलने का था। गुरुकुल के लिए उस काल में ३०००० रुपये एकत्र करना एक भारी कार्य था जिसे महात्मा जी ने अनेक कष्टों को सहते हुए पूरा किया। महात्मा जी ने धन एकत्र करने के पीछे से उनके परिवार पर भारी कर्ज का भोझ लद गया। इस पर राय ठाकुर दत्त ने उन्हें सलाह दी की महात्मा जी कुछ समय सार्वजानिक जीवन से अवकाश लेकर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति संभाल ले। महात्मा मुंशीराम इस बात के लिए तैयार हो गए और अपने निजी कार्य में लग गये। इस बीच महात्मा जी की अनुपस्थिती का लाभ उठाकर रायठाकुर दत्त ने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब में गुरुकुल की निति के समक्ष में अपनी ओर से कुछ परिवर्तन प्रस्तावित कर दिये। जब महात्मा मुंशीराम जी को इस बात का पता चला तो वे सभी कार्यों को छोड़कर आर्य प्रतिनिधि सभा के अधिवेशन में जा उपस्थित हुए। यह महात्मा जी का व्यक्तित्व था जिसके कारण राय ठाकुर दत्त का एक भी प्रस्ताव पास नहीं हुआ। मुंशी राम जी ने अपनी सूझ बुझ से गुरुकुल की रक्षा उसके खुलने से पहले कितने कष्टों को सहते हुए की , इसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उत्तम कार्यों को करने में जो कष्ट होते हैं उनको सहन करना ही तप कहलाता हैं।

साभार-आचार्य रामदेव जी के लेख













एक राष्ट्रवादी मुस्लिम का स्वामी श्रद्धानन्द से प्रेम









स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज के स्वाभाव, मृदुता, शालीनता और सोम्यता से प्रभावित होकर उनके अनेक प्रशंसक बन गए थे जिनमे न केवल हिन्दू थे अपितु ईसाई और मुसलमान दोनों थे। ऐसे ही स्वामी जी एक भगत थे जिनका नाम था मौलाना आसफ अली बार एट लॉ। आप दिल्ली के मशहूर वकील थे और क्रान्तिकारी अरुणा आसफ अली के पति थे। आपने हिन्दुस्तान रिव्यु नामक अखबार में स्वामी जी की शहादत के पश्चात एक लेख लिखा था जिसमे आप लिखते हैं









"१९१८ में दिल्ली में कांग्रेस के अधिवेशन में स्वामी जी को स्वागत कारिणी समिति का उपप्रधान चुना गया और मुझे सहकारी मंत्री चुन गया था। मुझे स्वामी जी के साथ कार्य करने का बहुत अवसर मिला। आपकी स्नेहमह उदारता, अपूर्व सज्जनता, नम्रता और निष्कपट मैत्री ने शीघ्र ही मुझे वशीभूत कर लिया। उन की गुरुजन सुल्म सौम्यता और स्नेह और मेरी ओर से भक्ति और सम्मान के भावों ने हमारे बीच में एक ऐसा प्रगाड़ सम्बन्ध उत्पन्न कर दिया जो अनेक विषयों पर हम में तात्विक विरोध होने पर भी अंत तक बना रहा।"





मियावाली जेल में भी स्वामी जी गीता, रामायण या दर्शन पर उपदेश देते थे। कैदियों को जिस सत्संग का सुअवसर और कहीं न मिल सकता वह इस जेल में हाथ आता। प्रेमियों की एक मण्डली रोज जमा हो जाती थी। मौलाना आसफ अली ने बड़े शौक से गीता रहस्य माँग कर पढ़ा और जब कभी उन्हें कोई शंका होती तो स्वामी जी बड़े हर्ष से समाधान कर देते थे। कभी राजनीति पर बात चल पड़ती, कभी दर्शन पर और कभी फारसी साहित्य पर। स्वामी जी फारसी साहित्य के बड़े अच्छे मर्मज्ञ थे। मौलाना रूम की मसनवी से आपको बहुत प्रेम था।

मौलाना आसफ अली का स्वास्थ्य उन दिनों कुछ अच्छा न था। शरीर मैं रक्त की कमी थी। चेहरा पिला पड़ गया था। स्वामी जी को उनकी दशा देख कर चिंता हुई। वाह! कितना सच्चा वात्सल्य भाव था। खुद जेल में थे, सभी प्रकार के कष्ट सह रहे थे, पर मौलाना अली के यह दशा देखकर अपने उनके लिए एक दूसरी कोठरी चुन दी जिसमे धुप और प्रकाश स्वछंद रूप से मिल सकता था। उनके आहार के सम्बन्ध में भी जेलर से सिफारिश कर दी, जो स्वामी जी का बहुत लिहाज़ करता था। यह सद्व्यवहार था, यह सज्जनता थी जो परिचितों को भी उनका भगत बना देती थी।









सन १९२२ में लेखक की मियावाली जेल में स्वामी जी से फिर भेंट हुई, जिनकी सजा के अब थोड़े ही दिन बाकि रह गए थे। जैसे ही आपको मालूम हुआ की स्वामी जी वहाँ हैं-"मैं उनकी कोठरी की और बेतहाशा दौड़ पड़ा।स्वामी जी ने दोनों बाहें फैला कर मेरा स्वागत किया और बड़े स्नेह से मुझे गले लगाकर अपने पास बैठा लिया। "





मियावाली जेल में भी स्वामी जी गीता, रामायण या दर्शन पर उपदेश देते थे। कैदियों को जिस सत्संग का सुअवसर और कहीं न मिल सकता वह इस जेल में हाथ आता। प्रेमियों की एक मण्डली रोज जमा हो जाती थी। मौलाना आसफ अली ने बड़े शौक से गीता रहस्य माँग कर पढ़ा और जब कभी उन्हें कोई शंका होती तो स्वामी जी बड़े हर्ष से समाधान कर देते थे। कभी राजनीति पर बात चल पड़ती, कभी दर्शन पर और कभी फारसी साहित्य पर। स्वामी जी फारसी साहित्य के बड़े अच्छे मर्मज्ञ थे। मौलाना रूम की मसनवी से आपको बहुत प्रेम था।





मौलाना आसफ अली का स्वास्थ्य उन दिनों कुछ अच्छा न था। शरीर मैं रक्त की कमी थी। चेहरा पिला पड़ गया था। स्वामी जी को उनकी दशा देख कर चिंता हुई। वाह! कितना सच्चा वात्सल्य भाव था। खुद जेल में थे, सभी प्रकार के कष्ट सह रहे थे, पर मौलाना अली के यह दशा देखकर अपने उनके लिए एक दूसरी कोठरी चुन दी जिसमे धुप और प्रकाश स्वछंद रूप से मिल सकता था। उनके आहार के सम्बन्ध में भी जेलर से सिफारिश कर दी, जो स्वामी जी का बहुत लिहाज़ करता था। यह सद्व्यवहार था, यह सज्जनता थी जो परिचितों को भी उनका भगत बना देती थी।





























बड़े आदमी और छोटे आदमी में क्या अंतर होता हैं









(स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज के विषय में मेरे प्रेरणादायक संस्मरण-पंडित देवराम जी)









एक बार स्वामी श्रद्धानन्द जी के दांत में अत्यंत पीड़ा उठी। पीड़ा से उन्हें तीव्र ज्वर भी हो गया। डॉ सुखदेव ने उन्हें दवा आदि देकर आराम करने को कहा और उनकी देखरेख के लिए दो-दो घन्टे की बारी रात्रि में गुरुकुल में पढ़ने वाले ब्रहमचारियों की लगा दी।









तीन बजे से पाँच बजे तक में मेरी बारी थी। मैं तीन बजे से कुछ पहले स्वामी जी के कक्ष में पहुच गया। पिछली बारी वाला मुझे आया देख चला गया। मैं चुपचाप कुर्सी पर बैठ गया की महात्मा जी की नींद में कोई बाधा न हो। मैंने विचित्र बात देखी की तीन बजे का घंटा बजते ही महात्मा जी उठ गए। मैंने उनसे पुछा की रात को दर्द का क्या हाल रहा। उत्तर मैं उन्होंने इन्हीं शब्दों में कहा-भाई दर्द तो बहुत था पर मैं चुपचाप पड़ा रहा। नींद भी नहीं आई। मैं देखता था, ब्रहमचारी आते थे। अपनी नींद पूरी करके चले जाते थे। मुझे तो आदत नहीं अपनी तकलीफ दुसरे को कहूँ और कष्ट दूँ। अच्छा जाओ, अब तो मैं जग गया,तीन बजे तो मैं उठ ही जाया करता हूँ। इस घटना ने मुझ पर असर किया। मैंने देख लिया की बड़े आदमी और छोटे आदमी में की अंतर होता हैं। बड़े आदमी अपने कष्ट को कुछ नहीं मानते और दूसरों के कष्टों को दूर करने की उनमें फिक्र रहती हैं। और छोटे आदमी को दुसरे के कष्ट की कोई फिक्र नहीं होती अपने ही कष्ट की ही सदा चिन्ता रहती हैं।









स्वामी जी के अलंकारों की यह उज्जवल वृति उनके सारे जीवन में चमकती दिखती हैं।कष्ट में भी व्रत का पालन करने से मनुष्य मनुष्य बनता हैं, पक्का बनता हैं , समाज सेवक बनता हैं। स्वामी जी की उज्जवल वृति पक्ष हमारे अँधेरे अंतकरण में उजाला करे।

















स्वामी श्रद्धानंद को अपने जीवन में सफलता कैसे मिली ?









संसार का भला करने वाले केवल वे मनुष्य नहीं हैं जो केवल विद्वान हैं और न वे मनुष्य हैं जो बड़े बड़े शब्द रटकर लम्बे लम्बे व्याख्यान दे सकते हैं क्यूंकि वे मनुष्य जो कुछ कहते हैं उनको मन से अनुभव नहीं करते।









उन ही मनुष्यों के जीवन से जगत का कल्याण हुआ हैं और हो सकता हैं जो सदाचारी हैं, नेक हैं और जिनका मन पवित्र हैं।









स्वामी श्रद्धानंद ने जो अपने जीवन में सफलता प्राप्त की उसका कारण उनकी विद्या न थी, उनका वकील होना न था और न ही उनकी मीठी वाणी थी, बल्कि विशेष कारण उनका आचारवान होना था। वे जो कुछ कहते थे उस पर आचरण भी करते थे। उनकी आत्मा सुद्ध थी इसलिए उनके कथन का प्रभाव पड़ता था। जो कोई भी मनुष्य उनका सत्संग करते थे वे अत्यंत प्रभावित होते थे। स्वामी जी अपने कर्तव्य को अनुभव करते हुए ईश्वरीय नियमों और सच्चाई का निडरता से प्रचार करते थे। वह अपने असल अमूल से कभी नहीं डगमगाए। उनका वैदिक धर्म प्रचार इस कारण से प्रभावित करता था की वे दृढ़ता से अपने जीवन में उसका पालन करते थे। उनका ईश्वर के प्रति विश्वास दृद था। घोर निराशा में भी उन्होंने बलवती आशा का संचार किया था और कितने ही भटकते हुओं को सन्मार्ग पर लगाया था।









(सन्दर्भ- स्वामी जी के सहयोगी लब्भूराम नैय्यड़ कृत धर्मोपदेश की भूमिका)













स्वामी श्रद्धानन्द के अनन्य भक्त एवं शिष्य पंडित धर्म देव विद्या मार्तण्ड जी के स्वामी जी के विषय में अलभ्य संस्मरण









सन्दर्भ- सार्वदेशिक दिसम्बर १९४६ अंक









सन १९२६ का संभवत अप्रैल मास था। मैं उन दिनों मुल्तान गुरुकुल में आचार्य था। सन १९०९ में गुरुकुल मुल्तान के लिए भूमि दान देने वाले चौधरी रामकृष्ण ने कुसंगति में पढ़कर पीछे से गुरुकुल के अधिकारीयों को इतना तंग कर दिया था की उन्हें उस भूमि और मकानों को छोड़ कर दूसरी जगह गुरुकुल को ले जाने को बाधित होना पड़ा था। सन १९२६ में चौधरी रामकृष्ण से उन मकानों का दाम प्राप्त करने के लिए गुरुकुल मुल्तान के संचालकों ने मुकदमा किया था और गुरुकुल की स्थापना के समय जो पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा के अधिकारी थे जिनमे श्रदेय स्वामी श्रद्धानन्द जी प्रमुख थे उन्हें साक्षी के लिये आमंत्रित किया गया था।









स्वामी जी महाराज का बड़ा विशाल यहाँ तक की मुल्तान के इतिहास में अभूत पूर्व जुलुस निकला गया। हमें पीछे से ज्ञात हुआ की चौधरी रामकृष्ण भी स्टेशन से कुछ दूरी पर किसी जगह खड़े खड़े उस विशाल जुलुस को देख और श्रदेय स्वामी जी के प्रभाव को देख कर दंग हो रहा था। उसने सब जगह यह बात फैला रखी थी की संसार में कोई शक्ति नहीं जो मुझे इस अभियोग में पराजित कर सके। यहाँ की छोटी मोटी अदालतों की तो बात ही क्या हैं, मैं हाई कोर्ट में हारने पर भी प्रिवी कौंसिल तक मुकदमा लडूँगा। मेरा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।









आदालत में मुकदमा प्रारंभ हुआ। सबसे पहले साक्षी श्रदेय स्वामी जी महाराज की थी। मैं उस अदालत मैं उपस्थित था। श्री स्वामी जी महाराज ने अपने सरल स्वाभाव से मुलतान गुरुकुल के लिए चौधरी रामकृष्ण द्वारा भूमि मिलने और उस पर मकान आदि बनवाने का सारा विवरण सुनाया। हम लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब हमने देखा की स्वामी जी की साक्षी समाप्त होते ही चौधरी राम कृष्ण ने १० हजार रुपये नकद वही दे दिये और शेष राशी के लिए स्टाम्प पेपर लिख दिया तथा कुछ ही समय में उसे चुका दिया। यह था 'ऋतस्य श्लोको बधिरा ततर्द' इस वेद वाक्य तथा 'सत्यमेव जयते नानृतम' इस उपनिषद वाक्य कि सत्यता क प्रत्यक्ष उदहारण जो उपस्थित सज्जनों ने बड़े आश्चर्य के साथ देखा।













स्वामी श्रद्धानन्द के अनन्य भक्त एवं शिष्य पंडित धर्म देव विद्या मार्तण्ड जी के स्वामी जी के विषय में अलभ्य संस्मरण









सन्दर्भ- सार्वदेशिक दिसम्बर १९४६ अंक









सन १९१८ में जब गढ़वाल में अकाल पड़ा था तो स्वामी जी महाराज ने अकाल पीड़ितों की सहायता का विशाल आयोजन किया और अपने मानसिक पुत्रों (जिन मे हम सब गुरुकुल के विद्यार्थी सम्मिलित थे) को इस यज्ञ में अपनी अपनी आहुति देने के लिए निमंत्रित किया। इस आदेश के समय हम उस समय महा विद्यालय विभाग के प्राय : सब ब्रहमचारी सेवा कार्यार्थ वहा पहुच गए और श्रदेय स्वामी जी की अधीनता में कार्य करने लगे। मुझे क्यूंकि पूज्य आचार्य जी के साथ पौड़ी, रूद्रप्रयाग, उत्तर काशी, केदारनाथ आदि अनेक स्थानों में जाने और कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था अत: मैं जानता हूँ की उनका ह्रदय कितन सहानुभूति और संवेदन शील था, किस प्रकार पीड़ितों की अवस्था को देखकर उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे तथा उनके दुःख निवारणार्थ वे आतुर रहते थे। कई बार वे १८,२० मील तक हमारे साथ चलते थे। और अपने आराम की तनिक भी चिन्ता न करते थे। उन्हीं दिनों की बात हैं की गढ़वाल के एक स्थानीय पत्र में किसी आर्यसमाजी सज्जन ने वहा की सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक लेख लिखा जिससे गढ़ वाली जनता में खलबली मच गई और कुछ अविवेकी गढ़वालियों ने आर्यसमाज के सर्व मान्य नेता के रूप में स्वामी श्रद्धानन्द जी पर ही आक्रमण करने का निश्चय किया और इस उद्देश्य से पौड़ी (गढ़वाल की राजधानी में) एक सभा बुलवाई। इसकी सुचना अपने कुछ भक्तों द्वारा पाते ही (जिन्होंने जिन्होंने उनसे निवेदन किया की वे पौड़ी न जाये ताकि दुष्ट उन पर किसी प्रकार का आक्रमण उस उत्तेजित अवस्था में न कर बैठे). वीर केसरी स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज न केवल रूद्र प्रयाग से पौड़ी पहुचे बल्कि उस सभा में भी जा पहुचे जहाँ उनके विरुद्ध बड़ी भयंकर उत्तेजना फैलाई जा रही थी। वीर नर सिंह के उस सभा में पहुचते ही सारा वायु मंडल परिवर्तित हो गया और स्वामी जी के निंदासूचक प्रस्ताव के स्थान में चारों और से उनकी सेवाओं के लिए अभिनन्दन किया जाने लगा। यह था निर्भयता का आदर्श जो ईश्वर के सच्चे भगत उन वीर सन्यासी ने प्रत्येक समय दिखाया था और जिसके कारण सब विरोधिनी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने में वे सफल हुए थे।









कविराज पंडित धर्मदत्त जी विद्या अलंकार जी के संस्मरण









सन्दर्भ गुरुकुल पत्रिका दिसम्बर १९७४









१. जब तक मैं विद्यालय में रहा मुझे स्मरण हैं की हर इतवार के प्रात: काल छात्रों के हवन के बाद उनका उपदेश हुआ करता था। जब मैं कॉलेज में आ गया तब उनके वह सिलसिला तो टूट गया पर उन्होंने ऐसा प्रबंध किया था की महीने में एक उपदेश छात्रों को किसी महान व्यक्ति का हो जाया करे। इससे मैं देखता था की छात्रों को चरित्र बनाने में सहायता मिलती थी।









२. दूसरे वे प्रात: काल के व्यायाम पर या ड्रिल पर विशेष ध्यान देते थे। उस समय कोई व्यायाम शिक्षक या ड्रिल मास्टर जरुर रहता था जो लड़को को व्यायाम की शिक्षा देता था। उन्होंने एक अच्छा gymnasium भी गुरुकुल में बनवाया हुआ था जहाँ लड़के व्यायाम करते थे। साँय काल के समय किसी न किसी खेल या games या अखाड़े कुश्ती करना भी उन्होंने अनिवार्य किया हुआ था। कभी कभी वे स्वयं अखाड़े में आते थे तथा खेल के मैदान में भी जाकर कभी कभी वे स्वयं लड़कों को खेलता हुआ देखते थे और खेल के लिए उत्साहित करते थे।









३. उन दिनों कॉलेज में एक हिंदी वाग्वर्धिनी , एक संस्कृत प्रोत्सहिनी तथा एक English club ये तीन सभाएँ समय समय पर हुआ करती थी, जिनमें लड़के बोलने का अभ्यास करते थे। मुझे संस्मरण हैं की मैंने उन्हें English club में एक बार भाषण देने की प्रार्थना की थी। उन्होंने एक सुन्दर भाषण दिया था जिसका विषय Nationalism था।









4. उन दिनों कॉलेज के लड़के हर मास एक हस्त लिखित पत्रिका निकलते थे। एक बार एक पत्रिका संपादकत्व में भी निकली थी। पुस्तकालय में रखने से पहले उस पर आचार्य के हस्ताक्षर जरुरी थे। मैं उनके हस्ताक्षरों के लिए पत्रिका उनको दे आया। अगले दिन जब मैं उस पत्रिका को लेने गया तो देखा की वे बड़े क्रोध में थे, बोले की क्या तुमने गुरुकुल में हत्यारों की बड़ाई करना सीखा हैं? तुम इन पन्नों को फाड़कर फिर इस पत्रिका को लाओ। मैंने उस पत्रिका में बंगाल के क्रांतिकारी लड़को की जिन्होंने कुछ अफसरों का खून किया था की बड़ाई की हुई थी। यह बात जब कि हैं जब महात्मा गाँधी अभी हिंदुस्तान आये भी न थे, जब गाँधी जी के सत्य और अहिंसा की कोई चर्चा भी न थी। जब मैंने उन पन्नों को फाड़ दिया तब उन्होंने उस पर हस्ताक्षर किये।









(मेरे विचार से स्वामी जी की यहाँ पर दूरदर्शिता प्रदर्शित होती हैं क्यूंकि गुरुकुल पर अंग्रेज अफसर सदा से ही देश द्रोही होने की सम्भावना व्यक्त करते थे-लेखक)









५. एक बार एक गुरुकुल जन्मोत्सव की सभा में जिसके सभापति महात्मा मुंशीराम जी थे, औरों के अतिरिक्त मैंने भी भाषण दिया था और कहा था की गुरुकुल की विशेषता यह हैं की यहाँ पर पूर्व और पश्चिम का अच्छा मिश्रण हुआ हैं। सभा के अंत में सभापति के भाषण में उन्होंने मेरी बात का उल्लेख देते हुए कहा की वर्तमान शिक्षा प्रणाली में यहाँ तक की डीएवी कॉलेज में भी पाश्चात्य विषयों की शिक्षा पर ज्यादा बल दिया जाता हैं। दूसरी और बनारस आदि की प्राचीन पाठशालाओं में प्राचीन शिक्षा पर बल दिया जाता हैं। परन्तु इस दोनों प्रकार के विषयों के सम्मिश्रण करने की शिक्षा प्रणाली के उद्देश्य से मैंने इस गुरुकुल की स्थापना की थी।




६. जब वाइसराय साहब ने उन्हें मिलने के लिए दिल्ली बुलाया था तब वह से लौट कर उन्होंने अक्षरश: जो दोनों की बातें हुई थी वह सब सभा में सुनवाई थी। उनकी स्मृति शक्ति इतनी की उन्होंने अक्षरश: सारी बात दुहराई थी। उनका अभीप्राय: यह था की वाइसराय साहब को यह रिपोर्ट दी जा रही हैं की गुरुकुल में बगावत की शिक्षा दी जाती हैं। महात्मा जी का जवाब था की आपको जो रिपोर्ट दी जा रही हैं वह गलत हैं। गुरुकुल की स्थापना इसलिए हुई हैं की वह से सदाचारी, पूर्ण शिक्षित विद्वान निकले न की हत्या करने वाले हत्यारे। इस पर चेम्सफोर्ड साहब को संतोष हो गया था और बाद में वे गुरुकुल में पधारे भी थे। हमने देखा की वे तथा संयुक्त प्रान्त के गवर्नर सर जेम्स मेस्टन जो लीचे लार्ड मेस्टन हो गये उनके कितना सम्मान करते थे। उन्होंने गुरुकुल को आर्थिक सहायता देने की बात छेड़ी पर महात्मा जी ने पूरी तरह इनकार कर दिया।




७. शायद १९१५ की बात हैं, मैंने देखा की शहर कनखल की और से एक साधारण सा व्यक्ति एक लड़के के साथ महात्मा जी के बंगले की ओर जा रहा हैं। उधर महात्मा जी बड़ी जल्दी में अपने बंगले से ऑफिस की और जा रहे थे। उस आदमी ने आगे बढ़कर महात्मा जी के चरण छुए। महात्मा जी जल्दी में थे, वे बिना रुके आगे बढ़ गये। तब आगंतुक व्यक्ति का लड़का दौड़ा और उसने महात्मा जी से कुछ कहा, फिर क्या था, महात्मा जी पीछे की ओर लपके और उस व्यक्ति को गले से लगा लिया। पीछे हमें मालूम हुआ की आगंतुक व्यक्ति महात्मा गाँधी थे। वे अभी कर्मवीर गाँधी कहलाते थे,महात्मा नहीं बने थे। हिन्दुस्तान में उन्हें अभी कम ही लोग जानते थे।




८. एक दफा एक बौद्ध भिक्षु श्री लंका से गुरुकुल आकर ठहरे थे। वे हिंदी या अंग्रेजी दोनों भाषाएँ नहीं जानते थे केवल संस्कृत या पाली भाषाएँ ही बोल सकते थे।एक दिन मैंने देखा की स्वामी जी उनसे खड़े बात कर रहे हैं। मुझे कोतहुल हुआ की स्वामी जी उससे किस भाषा में बात कर रहे होगे, परन्तु पास जाने में डर भी लगता था। फिर भी में उनके पास से गुजर गया। मैंने देखा की महात्मा जी उनसे संस्कृत में बात कर रहे हैं। मुझे आश्चर्य हुआ की बिना पढ़े उन्होंने कामलायक संस्कृत बोलना कैसे सिख लिया?




९. वे अपने लड़को का कितना ख्याल रखते थे इसका एक उदहारण मुझे याद आता हैं। हमारी क्लास में एक लड़का सत्यप्रिय था। उसको किसी अपराध पर उन्होंने गुरुकुल से निकाल दिया था। कुछ काल बाद रंगून से उनके किसी व्यापारी मित्र ने उन्हें लिखा की उसे एक लेखक की आवश्यकता हैं, वे किसी को भेज दे। उन्होंने सत्य प्रिय को लिखा की वे उनका पत्र लेकर रंगून चला जाये। उसकी नियुक्ति वहा ८० या १०० रुपये में कर दी हैं।




१०. १९१७ मई मास के लगभग सन्यास लेते समय जिस समय श्वेत वस्त्र उतार कर उन्होंने भगवे वस्त्र डाले, हम सबकी आँखों में आंसू आ गये थे। हमारे पास एक पंजाबी भाई खड़ा था। वह बोल की यह वह आदमी था जो अपनी पेन्ट पर शिकन नहीं आने देता था , आज इसने सर्वस्व त्याग कर भगवा दाल दिया। वक्त क्या नहीं कराता।










स्वामी जी का अस्पृश्यता के विरुद्ध क्रांतिकारी भाषण




२० मई सन १९२४ को मद्रास के गोखले हाल में मर्म स्पर्शी भाषण देते हुए स्वामी श्रद्धानन्द ने कहा था की ,"पुरोहित आदि के अहंकार के कारण आपके यहा ब्राह्मण ब्राह्माणेतरो का झगड़ा तो चल ही रहा था की अब उससे भी अधिक बुरा एक झगड़ा आपके सामने खड़ा होने वाला हैं। यदि आपने अस्पृश्य कहे जानेवाले भाईयों के उद्धार की और विशेष ध्यान न दिया तो मैं आपको सचेत करता हूँ की वह दिन दूर नहीं , जब आपके दलित भाई जिन्हें आप पंचम कहते हैं, आप से सब तरह का सम्बन्ध तोड़ देंगे। यस तो सब के सब दूसरे सम्प्रदायों में चले जायेंगे अथवा अपनी जाति ही अलग बना लेगे। मैं स्वयं कमजोर,रोगी और वृद्ध होता हुआ सारे देश में घूम जाऊँगा।दलित भाईयों का संगठन करूँगा और उनसे कहूँगा की वे हर ब्राह्मण और अब्राह्मण को स्पर्श करके वैसा ही भ्रष्ट कर दे जैसा आप उनको मानते हैं। तब निश्चय ही आप उनके पैरों में माथा टेक देंगे। " इस प्रकार की क्रन्तिकारी विचार रखने वाले स्वामी श्रद्धानंद के अस्पृश्यता को बढ़ावा देने वाले लोगो के मुँह पर करारा तमाचा मारा था।
















गुरुकुल में आयुर्वेद विद्यालय खोलने के पीछे स्वामी जी की धारणा




सन्दर्भ- संस्मरण - विद्या मार्तण्ड डॉ धर्मानन्द केसरवानी- गुरुकुल पत्रिका दिसम्बर १९७५




स्वामी जी अपने बलिदान से दो माह पूर्व अंतिम बार अक्टूबर माह १९२६ में गुरुकुल काँगड़ी पधारे थे। अपने ८-१० दिन के निवास काल के समय स्वामी जी ने इच्छा प्रकट की कि वे आयुर्वेद महाविद्यालय के छात्रों से मिलना चाहते हैं। आयुर्वेद विद्यालय में एक खटुए का वृक्ष था। हम सब उस वृक्ष के नीचे एकत्र हो गये। स्वामी जी अपने निवास स्थान से बाहर आये और हम सबने उनके चरण स्पर्श किये। बैठने पर छात्रों से पढ़ाई लिखाई के बारे में हाल चाल पूछा और आयुर्वेद महाविद्यालय की स्थापना के विषय में अपने उद्गार प्रकट किये। उन्होंने बताया की किस प्रकार बौद्ध भिक्षु चिकित्सा में पारंगत होकर तिब्बत, बर्मा, श्री लंका, चीन , कम्बोडिया और मंगोलिया प्रबृति देशों में आर्य संस्कृति की वैजन्ती फैलाई थी।गुरुकुल एक सौदेश्य संस्था हैं। ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के साथ ही विश्व में वैदिक संस्कृति का विस्तार हो जिससे विश्व एकनीड़ होकर प्रेम से रह सके। यही आयुर्वेद महाविद्यालय की स्थापना का हेतु था।




जीविका के प्रश्न को लेकर स्वामी जी ने काशी के प्रसिद्द दार्शनिक "भारत रत्न" बाबू भगवान दास जी से हुए एक वार्तालाप का भी जिक्र किया। बाबू जी ने स्वामी जी से जिक्र किया की आपके छात्र स्नातक बनकर क्या करेगे? इन्हें नौकरियाँ तो मिल न सकेंगी। उत्तर में स्वामी जी ने भगवानदास जी से ही एक प्रश्न किया की आप ही बताये कि अब पढ़े लिखे कितने लोगो को नौकरिया मिल पाती हैं? तो उत्तर मिला की ५ से १० प्रतिशत। स्वामी जी ने हँस कर कहा की अब ९० से ९५ प्रतिशत को नौकरियाँ नहीं मिल पाती हैं तो मेरे यहाँ शत प्रतिशत को नहीं मिलेंगी। बस यही अंतर हैं।




इस वार्तालाप को श्री बाबु भगवानदास जी ने काशी से प्रकाशित होने वाले दैनिक आज में भी प्रकाशित किया था।




स्वामी जी महाराज ने १९२२-१९२३ में बर्मा जाकर , वहाँ से प्रचुर धन प्राप्त कर आयुर्वेद महाविद्यालय की स्थापना की थी, जिससे गुरुकुल के स्नातक जीविका उपार्जन के साथ देश और जाती की सेवा कर सके।




इसी वार्तालाप में स्वामी जी ने सभी छात्रों को साहसी बन ने का उपदेश दिया और प्रेरित किया की देश-विदेश में जाकर ज्ञान उपार्जन के लिए कुछ साहसिक कार्य भी करे।




उन्होंने ग्लोब ट्रैवलर शब्द (पृथ्वी पद यात्री) शब्द का भी प्रयोग किया तथा पैदल या साइकिल पर चढ़कर ऐसा करने के लिए अपेक्षा प्रकट की थी।
















दीनानाथ सिद्धान्तालंकार जी के संस्मरण




जब मैं छठी कक्षा के विद्यार्थी था तब मेरे पिताजी का स्वर्गवास हो गया।




महात्मा मुंशी राम जी तब हिंदी में सद्दर्म प्रचारक निकालते थे। इस पत्र में मैंने पिताजी की मृत्यु का समाचार और आचार्य की उन पर टिपण्णी पढ़ी। पिताजी आचार्य जी के विशिष्ट मित्रों में से एक थे और ऊँची सरकारी नौकरी से छुट्टी लेकर गुरुकुल में मुफ्त सेवा किया करते थे। पिताजी अपनी वसीयत मिएन यह लिख गये की मेरी मृत्यु पर मेरे पुत्र को गुरुकुल से न बुलाया जाये और न ही उसे यह सूचना दी जाये की उसके पिता का देहांत हो गया हैं अन्यथा उसकी माता उसे गुरुकुल में पढ़ने नहीं जाने देगी। पिताजी की मृत्यु पर मुझे दुःख होना तो स्वाभाविक ही था। आचार्य जी ने मुझे बुलाया और बढ़े प्रेम से छाती से लगाते हुए कहा की तुम चिंता न करो, तुम्हारी पढ़ाई में कोई विघ्न नहीं पड़ेगा। और सचमुच ही सनातक बन ने तक मेरी पढ़ाई में किसी भी प्रकार का कोई विघ्न नहीं आया। गुरुकुल में अन्य भी ब्रहमचारी थे जिन पर पारिवारिक संकट आये पर आचार्य जी ने उनकी पढ़ाई में कोई विघ्न नहीं आने दिया। गुरुकुल के २ ० ० -२ ५ ० छात्रों में से कई अमीर घरों के थे पर आचार्य जी का व्यवहार सभी के साथ एक समान था। व्यवहार का यह परणाम की गुरुकुल के सभी छात्रों में आपस में स्नेह का व्यवहार था।










छात्रों की अनुशासनहीनता का हल




श्रद्धानंद जी का तरीका




गुरुकुल में छात्रों की अनुशासनहीनता का दंड देने का स्वामी जी का तरीका अत्यंत निराला था। शारीरिक दंड तो वह किसी को देते ही न थे। छात्रों के साथ निकट सम्बन्ध होने के कारण उन पर पूर्ण विश्वास करते थे। ऐसे अवसरों पर वे उपदेश में छात्रों से स्पष्ट कहते- 'मुझे तुम सब पर पूरा विश्वास हैं। तुममें से जिससे यह अपराध हुआ हैं, वह मुझसे एकांत में मिल ले अपराध स्वीकार कर ले और उसका प्रायश्चित करे। महात्मा जी की इस पद्यति का अचूक प्रभाव पड़ता।




सन्दर्भ- दीनानाथ सिद्धांत अलंकार जी के संस्मरण -गुरुकुल पत्रिका फरवरी १९७३










आचार्य रामदेव एवं स्वामी श्रद्धानंद




सब जानते हैं की स्वामी श्रद्धानंद और आचार्य रामदेव का आपस में कैसा सम्बन्ध था। स्वामी जी ने गुरुकुल की स्थापना की थी तो आचार्य रामदेव ने उसे संस्कृत पाठशाला से आधुनिक रूप में परिवर्तित किया था। बहुत कम लोग यह जानते हैं की आचार्य रामदेव जब कुँवारे थे तब उनका सम्बन्ध डीएवी संस्था से था। आप महात्मा हंसराज के सम्बन्धी भी थे। इसलिए आप कॉलेज पार्टी के समर्थक थे। आपका विवाह १३ वर्ष की आयु में ही हो गया था। आपकी पत्नी कन्या पाठशाला जालंधर की छात्रा थी। इसलिए आपके विवाह में महात्मा मुंशीराम और लाला देवराज भी शामिल हुए थे। अपने जब पहली बार महात्मा मुंशीराम को देखा तो आपकी प्रतिक्रिया भी यह थी की "अच्छा यह हैं पंजाब के सभी समाजों में झगड़ों की जड़"। किन्तु समय का फेर देखिये यही महात्मा मुंशीराम बाद में रामदेव जी के प्रेरणा स्रोत्र बन गए।




विवाह के १०-१५ दिन के पश्चात ही आपको ५-६ दिन के लिए अपनी ससुराल में रहना पड़ा। इससे पूर्व पंडित गुरुदत्त के संपर्क में आने के कारण आपकी स्वाध्याय की प्रवृति पहले से ही बन चुकी थी। ससुराल में खाली बैठे बैठे आप जब बोर हो गये तो महात्मा मुंशीराम के पुस्तकालय में स्वाध्याय के लिए पहुँच गये। यहाँ आपका परिचय महात्मा मुंशीराम से हुआ और आप उनसे मिलकर अत्यंत प्रभावित हुए तथा उनसे मिलकर आपके मन में जो गलत भ्रान्ति थी उसका निराकरण हो गया। इसी अवसर पर जालंधर कन्या विद्यालय के अन्य प्रमुखों से मिलने से आपको आर्यसमाज के आदर्शों और स्त्री शिक्षा के महत्व का भली भांति ज्ञान हो गया।




महात्मा मुंशीराम के त्याग और तपस्या की भट्टी में आचार्य रामदेव सरीखे आर्य नौजवान कुंदन बनकर निकले। अपने विरोधियों की जीत लेना मुंशीराम जी की स्वाभाविक प्रवृति थी।




सन्दर्भ- गुरुकुल पत्रिका दिसम्बर १९८४










स्वामी जी की निर्भीकता




उन दिनों की बात हैं जब १९२० के दशक में हिन्दू मुस्लिम दंगों ने जोर पकड़ लिया था। स्वामी श्रद्धानन्द जी एक स्थान पर भाषण दे रहे थे। तभी कहीं पर गोली चल पड़ी। औहदेदार ने स्वामी जी से पूछा की इसकी जिम्मेवारी किस पर हैं। स्वामी जी ने निर्भीकता से उत्तर दिया की "यदि सरकारी कर्मचारी कुछ गड़बड़ न करे तो मुझ पर हैं अन्यथा वह स्वयं जिम्मेदार हैं।"




औहदेदार चुप चाप वहा से चला गया।




(दरअसल में देश में हो रहे दंगो के लिए एक जाँच कमेटी मोती लाल नेहरु की अध्यक्षता में बनाई गई थी जिसने अपनी रिपोर्ट में यह लिखा था की स्वामी श्रद्धानन्द के शुद्धि आन्दोलन के कारण देश में दंगे हुए थे। स्वामी जी ने स्पष्ट रूप से कहा था की जिस आधार पर मुसलमानों को गैर मुसलमानों को इस्लाम की दावत देने का अधिकार हैं उसी आधार पर हिन्दुओं को अपने बिछड़े हुए भाईयों को अपने घर में वापिस लाने का अधिकार हैं। महात्मा गाँधी ने जोश में आकर सत्यार्थ प्रकाश और स्वामी श्रद्धानंद के विरुद्ध लेख लिख डाला और मुसलमानों के समर्थन में लिखा। जिससे आर्यसमाज का तो कुछ न बिगड़ा परंतु मुसलमानों ने यही सोचना आरंभ कर दिया की उनकी जायज और नाजायज माँगों को महात्मा गाँधी का समर्थन प्राप्त हैं)




सन्दर्भ गुरुकुल पत्रिका १९४० दिसम्बर




स्वामी श्रद्धानन्द एवं वैदिक संस्कार





महात्मा मुंशीराम एवं कुछ अन्य सज्जनों के सहयोग से कपूरथला में १८९४ में आर्य समाज की स्थापना हुई।

पहले पहल आर्यसमाज की कार्य वही लाला अमरनाथ सरना जी की दुकान पर होती थी। शहर का कोतवाल सैदेव लाला जी को तंग करने के मंशा से पीछे पड़ा रहता था और उन्हें धमकी तक दे डालता था की अगर प्रचार किया तो किसी न किसी दिन जेल जाना पड़ेगा। कुछ काल पश्चात सुल्तानपुर में आर्यसमाज किराये पर ले लिया गया एवं साप्ताहिक सत्संग वही लगने लगा। १९१० में आर्य समाज के मंदिर का भी निर्माण हो गया। १९२४ में इसी समाज मंदिर में स्वामी जी द्वारा सैकड़ों हरिजनों की शुद्धि की गई थी।

इस समाज की दो घटनाएँ प्रसिद्द हैं।

१९०१ में लाला अमरनाथ सरना जी की माता जी का देहांत हो गया। उन्होंने अपनी माता जी का दाह संस्कार वैदिक रीती से करने की घोषणा कर दी। इस समाचार को सुनते ही नगर में हलचल मच गई। लाला जी के घर पर पुलिस आ गई और कहा की यदि आपने वैदिक रीति से संस्कार किया तो आपको जीवन भर कारागार में रहना पड़ेगा। यह समाचार जालंधर और लुधियाना के समाजों तक फैल गया। महात्मा मुंशी राम जी कई अन्य आर्यों के साथ सांय चार बजे लाला जी के यहाँ पर पहुँच गये। अर्थी उठाई गई और बाज़ार में लाई गई। कोतवाल ने अर्थी को रोक लिया। महात्मा जी ने झट कहा- आपने किस विधान से अर्थी को रोका हैं? क्या आपको यह नहीं मालूम की अर्थी को रोकना मना हैं? यह सुनकर कोतवाल पीछे हट गया। इतने में बाज़ार से लेकर शमशान भूमि तक पुलिस ने घेराबंदी कर दी। अर्थी के शमशान में पहुँचने के समय वहाँ पर पर्याप्त पुलिस की पलटन थी। रियासत के सब एहल कार लोग हाथियों पर चढ़कर इस संस्कार को देखने आये थे। दर्शक लोग वहाँ पर सैकड़ों की संख्या में उपस्थित थे। दाह संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न हो गया। संस्कार के पश्चात पौराणिक पंडितों ने आर्यसमाज के सदस्यों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। आर्यों केलिए खाने-पिने का सामान दो माह तक जालंधर से आता था।

इसी प्रकार लाला बुटामल सराफ की माता जी का भी उनकी अनुपस्थिति में देहांत हो गया। उनके सम्बन्धियों ने पौराणिक रीत से उनकी माता जी का संस्कार कर दिया। जब वे वापिस लौटे तो उन्हें अत्यंत खेद हुआ। उन्होंने शमशान से राख को एकत्र कर उसके वैदिक रीति से संस्कार सम्पन्न किया।

इन घटनाओं से न केवल उस काल में आर्यों द्वारा किस प्रकार से उस काल में सामाजिक विरोध को सहा गया उसका विवरण मिलता हैं अपितु ऐसे संकट काल में महात्मा मुंशी राम द्वारा किस प्रकार से आर्यों का मनोबल बढ़ाया गया इसका भी विवरण मिलता हैं।

महात्मा मुंशी राम जी के भागीरथ प्रयास से ही उत्तर भारत विशेष रूप से पंजाब में गली गली में आर्यों का निर्माण हुआ जिनकी सहयोग से ही महात्मा जी गुरुकुल कांगड़ी जैसी वैभव शाली क्रांतिकारी संस्था का निर्माण करने में सक्षम हुए थे।

सन्दर्भ- आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का सचित्र इतिहास- पंडित चमूपति




डॉ विवेक आर्य