Thursday, July 28, 2016

मूर्तिपूजा पर निष्पक्ष विचार




मूर्तिपूजा पर निष्पक्ष विचार

मेरे अनेक मूर्तिपूजक मित्र है। सभी जानते है कि मैं मूर्तिपूजा नहीं करता क्यूंकि ईश्वरीय ज्ञान वेद में मूर्तिपूजा को अमान्य कहा है। कारण ईश्वर निराकार और सर्वव्यापक है। इसलिए सृष्टि के कण कण में व्याप्त ईश्वर को केवल एक मूर्ति में सीमित करना ईश्वर के गुण, कर्म और स्वाभाव के विपरीत है। ईश्वर हमारे ह्रदय में स्थित आत्मा में वास करते है। इसलिए ईश्वर कि स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना के लिए मूर्ति अथवा मंदिर कि कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए अपने भीतर ही ईश्वर को खोजना चाहिए।

आज एक मित्र ने मुझसे मूर्तिपूजा को लेकर शंका पूछी। उन्होंने कहा मूर्तिपूजा अध्यात्म जगत में प्रथम सीढ़ी है। जो अल्पमति लोग है उनके लिए मूर्तिपूजा का प्रावधान किया गया था। मैंने उत्तर दिया फिर तो पहली सीढ़ी चढ़ने के पश्चात अगली सीढ़ी चढ़कर निराकार ईश्वर कि स्तुति-प्रार्थना एवं उपासना तक अनेक लोगों को पहुँचना चाहिए। मगर हम किसी भी मूर्तिपूजक की ऐसी प्रगति नहीं देख पाते। उल्टा हम उनकी अवनति देखते है। उदहारण के लिए वैदिक काल में केवल निराकार ईश्वर कि उपासना का प्रावधान था। मध्यकाल में बुद्ध और जैन मत वालों ने बुत पूजा आरम्भ करी। उन्हें देखकर श्री राम जी और श्री कृष्ण जी की मूर्तियां बनाई जाने लगी। मध्य काल के अग्रिम भाग में विभिन्न पुराणों की रचना हुई। जिससे अनेक कल्पित अवतार प्रचलित हुए। विभिन्न अवतारों की मूर्तियां बनने लगी। कालांतर में देवियों का प्रवेश हुआ। मूर्तिपूजा में विभिन्न मतों के प्रवर्तकों, गुरुओं आदि जुड़ गए। अगली सीढ़ी तो अभी बहुत दूर थी। कलियुग में केवल मूर्ति का सहारा ऐसा सिखाया गया। इसका प्रभाव ऐसा हुआ कि मूर्तिपूजा में अब एक ऐसा दौर आया कि लोग श्री राम, श्री कृष्ण और वीरवर हनुमान जी को भी भूलने लग गए। महान पुरुषों का स्थान अब साईं बाबा उर्फ़ चाँद मियां एवं अजमेर वाले गरीब नवाज़ की कब्र ने ले लिया। बुत परस्ती अब कब्र परस्ती में बदल गई। जिन हिन्दुओं को अगली सीढ़ी चढ़ना था वो जमीन के अंदर समा गए। अक्ल में दखल देना बंद हुआ। हिन्दुओं को इतनी भी मति न रही कि साईं बाबा और गरीब नवाज सभी बिगड़े काम बनाने वाले बन गए। राम और कृष्ण के मंदिरों खाली हो गए। रामायण-महाभारत और गीता का पाठ छूट गया। वेद, दर्शन और स्मृतियों का स्वाध्याय तो अतीत कि बात हो गई। साईं संध्या गाई जा रही है। अब कब्रों पर कलमा पढ़ सुन्नत की तैयारी हो रही है।

आगे ईश्वर ही इस हिन्दू समाज का रक्षक होगा। इसलिए मित्रों इस काल्पनिक तर्क से बाहर निकले कि मूर्तिपूजा अध्यात्म की पहली सीढ़ी है। मूर्तिपूजा सीढ़ी नहीं अपितु गहरा गड्ढा है। इसमें जो एक बार गिरा। तो निकलने के लिए बहुत प्रयास करना होगा।

आईये वेद विदित निराकार ईश्वर कि स्तुति, प्रार्थना और उपासना अपने ह्रदय में स्थित आत्मा में ही करें। इसी में हिन्दू समाज का भला है।

(इस लेख का उद्देश्य हिन्दू समाज में मूर्तिपूजा के कारण हो रही दुर्दशा से सभी को परिचित करवाना है। कृपया निष्पक्ष रूप से अपनी प्रतिक्रिया दीजिये)

डॉ विवेक आर्य

Monday, July 18, 2016

श्रावणी पर्व की महत्ता



श्रावणी पर्व की महत्ता

डॉ विवेक आर्य

सावन मास श्रावण का परिवर्तित नाम है। इस मास की वैदिक महत्ता ऋषि मुनियों के समय से प्रचलित है।विक्रमी संवत के अनुसार श्रावण पांचवा मास है।  प्राचीन काल में श्रवण मास को जीवन का अभिन्न अंग समझा जाता था। कालांतर में विदेशी संस्कृति के प्रचार से जनमानस इसे भूल गया है।
श्रावणी पर्व के तीन लाभ है।

आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं सामाजिक

आध्यात्मिक पक्ष-

श्रावण का अर्थ होता है जिसमें सुना जाये। अब सुना किसे जाता है। संसार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण ईश्वरीय ज्ञान वेद है। इसलिए इस मास में वेदों को सुना जाता है। श्रावण में गर्मी के पश्चात वर्षा आरम्भ होती है। वर्षा में मनुष्य को राहत होती है। चित वातावरण के अनुकूल होने के कारण शांत हो जाता है। मन प्रसन्न हो जाता है। वर्षा होने के कारण मनुष्य अधिक से अधिक समय अपने घर पर व्यतीत करता है। ऐसे अवसर को हमारे वैज्ञानिक सोच रखने वाले ऋषियों ने वेदों के स्वाध्याय, चिंतन, मनन एवं आचरण के लिए अनुकूल माना। इसलिए श्रावणी पर्व को प्रचलित किया। वेदों के स्वाध्याय एवं आचरण से मनुष्य अपनी आध्यात्मिक उन्नति करे। यही श्रावणी पर्व का आध्यात्मिक प्रयोजन है।

वैज्ञानिक पक्ष-

श्रावण में वर्षा के कारण कीट, पतंगे से लेकर वायरस, बैक्टीरिया सभी का प्रकोप होता हैं। इससे अनेक बीमारियां फैलती है। प्राचीन काल से अग्निहोत्र के माध्यम से बिमारियों को रोका जाता था। श्रावण मास में वेदों के स्वाध्याय के साथ साथ दैनिक अग्निहोत्र का विशेष प्रावधान किया जाता है। इसीलिए वेद परायण यज्ञ को इसमें सम्मिलित किया गया था। इससे न केवल श्रुति परम्परा को जीवित रखते वाले वेद-पाठी ब्राह्मणों का संरक्षण होता है अपितु वेदों के प्रति जनमानस की रूचि में वृद्धि भी होती है। श्रावणी पर्व का वैज्ञानिक पक्ष पर्यावरण रक्षा के रूप में प्रचलित है।

सामाजिक पक्ष

श्रावण मास में वर्षा के कारण सन्यासी, वानप्रस्थी आदि वन त्यागकर नगर के समीप स्थानों पर आकर वास करते है। गृहस्थ आश्रम का पालन करने वाले लोग अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए महात्माओं का सत्संग करने के लिए उनके पास जाते है। महात्माओं के धर्मानुसार जीवन यापन, वैदिक ज्ञान, योग उन्नति एवं अनुभव गृहस्थियों को जीवन में मार्गदर्शन एवं प्रबंध में लाभदायक होता हैं। श्रवण पर्व का सामाजिक पक्ष ज्ञानी मनुष्यों द्वारा समाज को दिशा-निर्देशन एवं धर्म भावना को समृद्ध करना है।

इस प्रकार से श्रावणी पर्व मानव के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व है। 

प्रेमचंद की कहानी "ईदगाह" बचपन में सभी ने पढ़ी होगी



प्रेमचंद की कहानी "ईदगाह" बचपन में सभी ने पढ़ी होगी

अब प्रेमचंद द्वितीय उर्फ आशीष छारी की आधुनिक ईदगाह फिर से पढ़ लीजिए

रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आयी है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। लड़के सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना ख़ज़ाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारह सौ हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह सौ हैं। और सबसे ज़्यादा प्रसन्न है हामिद। वह उन्नीस-बीस साल का भोली सी सूरत का दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप कुछ साल पहले सीरिया भाग गया था isis के लिए लड़ने और वहां वह लड़ता हुआ मारा गया, माँ ने दूसरा निकाह कर लिया, बच्चे पे बच्चे जनती हुयी जाने क्यों पीली होती गयी और एक दिन बच्चा पैदा करती हुयी मर गयी। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना के पास रहता है, उसकी गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। गाँव के ही एक मौलवी साहब जाकिर नाइक ने उसे बताया कि उसके अब्बाजान जन्नत अता फरमाये गए हैं, शराब के दरियाओं में डुबकी लगाते हैं, अलग अलग फ्लेवर वाले झरनों से शराब लेकर पीते हैं, काजू, मेवा, खजूर खाते हैं और 72 हूरों के साथ रात गुजारते हैं, यहां तो वे 2-3 मिनिट में चुक जाते थे लेकिन जन्नत में जितना मर्ज़ी उतने समय में खाली होते हैं। अम्मीजान जहन्नुम में डाल दी गयी है, वहां उनके लिए न शराब है न कबाब और न कोई मर्द, बस दोजख की आग में सेंकी जा रही हैं भुट्टे की माफिक........ खैर हामिद प्रसन्न है।
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हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है— 'तुम डरना नहीं अम्माँ, मैं सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना।' हज़ार-बारह सौ हामिद की जेब में, हज़ार-पांच सौ अमीना के बटुवे में। साल भर का त्यौहार है। बच्चा खुश रहे, उनकी तक़दीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को खुदा सलामत रखे, ये दिन भी कट जायँगे। गाँव से मेला चला और लड़कों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों का इंतज़ार करते। सहसा ईदगाह नज़र आयी।
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सबने ईदगाह पहुँच कर वुज़ू किया और नमाज़ अता की और एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकवाद दी। तब मोबाइलों, कपड़ों और खाने-पीने की दुकानों पर धावा होता है। सब लड़के हर दूकान पर जाकर मोलभाव कर रहे हैं, अपनी अपनी पसंद की चीजें खरीद रहे हैं, पर हामिद नहीं, हामिद लड़कों की टोली से गायब है, दो-चार घण्टे के बाद अच्छे से खा-पीकर, कपडे, मोबाइल खरीदकर सब वापस चलने को तैयार है, हामिद भी आ चुका है, सब पश्चिम में गिरते सूरज की चाल को समझकर गाँव लौटने लगे हैं.......
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दरवाजे पर हामिद की आवाज़ सुनते ही अमीना दौड़ी और उसे गले से लगाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में एक बोरा देखकर वह चौंकी.....
‘यह बोरा, कहाँ से लिया?’
‘मैंने मोल लिया है।
‘कै रूपये का?’
‘तीन हज़ार दिये।'
'क्या है इसमें?'

हामिद ने बोरा जमीन पर खाली कर दिया..... अमोनियम नाइट्राइट, बारूद, पोटाश, सल्फर डाई ऑक्साइड, पुरानी जैकेट, कुछ गज मीटर लम्बा कपड़ा, आठ-दस हाथ सूतली, लम्बी नोकदार पीतल की कीलें, कांच के टुकड़े...... अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, ये कबाड़! ‘सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह कबाड़ उठा लाया।
हामिद ने गर्व के भाव से कहा— "अम्मा मैं काफिरों को मारूँगा, जिहाद पे जाऊँगा, अल्लाह के रास्ते मजहब की खातिर कुर्बान होऊंगा, बम बनाऊगा, सुसाइड जैकेट पे फिट करूँगा, कुछ पेट से भी बांधुगा और किसी एअरपोर्ट, शौपिंग मॉल, मन्दिर, स्कूल में अलाह हू अकबर चिल्लाते हुए खुद को उड़ा लूंगा और काफिरों को मार कर अब्बा की तरह जन्नत जाऊँगा..."

बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, बच्चे में दीन के लिए कितना त्याग, कितना ‍सद्‌भाव और कितना विवेक है! दूसरों को नया मोबाइल लेते, पिज़्ज़ा बर्गर खाते, मिठाइयां उड़ाते, ब्रांडेड कपड़े खरीदते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? लेकिन मजहब पे सब कुर्बान कर दिया उसने.... वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएं देती जाती थी, अल्लाह ताला से उसके लिए जन्नत में आला मुकाम देने की गुजारिश करती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य खूब समझता.....!

क्योंकि वह जन्नत जाने, शराब की नदियों में डुबकी लगाने, अलग-अलग फ्लेवर की शराब पीने और 72 हूरों के साथ सोने के लिए बेकरार था

#ArrestZakirNaik

#BanZakirNaik

बून्द बून्द से सागर बनता है!



बून्द बून्द से सागर बनता है!

एक आदमी समुद्र तट पर चल रहा था। उसने देखा कि कुछ दूरी पर एक युवक ने रेत पर झुककर कुछ उठाया और आहिस्ता से उसे पानी में फेंक दिया। उसके नज़दीकपहुँचने पर आदमी ने उससे पूछा – “और भाई, क्या कर रहे हो?”

युवक ने जवाब दिया – “मैं इन मछलियों को समुद्र में फेंक रहा हूँ।”

“लेकिन इन्हें पानी में फेंकने की क्या ज़रूरत है?”- आदमी बोला।

युवक ने कहा – “ज्वार का पानी उतर रहा है और सूरज की गर्मी बढ़ रही है।अगर मैं इन्हें वापस पानी में नहीं फेंकूंगा तो ये मर जाएँगी”।

आदमी ने देखा कि समुद्रतट पर दूर-दूर तक मछलियाँ बिखरी पड़ी थीं। वह बोला – “इस मीलों लंबे समुद्रतट पर न जाने कितनी मछलियाँ पड़ी हुई हैं। इस तरह कुछेक को पानी में वापस डाल देने से तुम्हें क्या मिल जाएगा? इससे क्या फर्क पड़ जायेगा?”

युवक ने शान्ति से आदमी की बात सुनी, फ़िर उसने रेत पर झुककर एक और मछली उठाई और उसे आहिस्ता से पानी में फेंककर वह बोला :

आपको इससे कुछ मिले न मिले
मुझे इससे कुछ मिले न मिले
दुनिया को इससे कुछ मिले न मिले
लेकिन “इस मछली को सब कुछ मिल जाएगा”।

एक छोटा सा प्रयास अनेकों का भविष्य सदा के लिए बदल सकता है।

वीर शिवा जी, महाराणा प्रताप और बन्दा बैरागी जैसे महान क्षत्रियों का जीवन भी कुछ ऐसा ही था। शिवाजी ने छोटे छोटे पहाड़ी किलों को जीत कर बीजापुर रियासत को हिला दिया।  शिवाजी का प्रताप इतना बढ़ा कि एक दो शताब्दी पुरानी मुगलिया सल्तनत के शासक औरंगज़ेब की रातों की नींद उड़ गई। अपनी झेप मिटाने के लिए औरंगज़ेब ने शिवाजी को पहाड़ी चूहा तक कह डाला मगर वीर शिवाजी छत्रपति शिवाजी बन हिन्दुओं के ह्रदय सम्राट बन गए।

शिवाजी का प्रयास आरम्भ में छोटा था मगर समय के साथ उनके महान पुरुषार्थ ने भारतीय इतिहास में अपनी विशेष पहचान बनाई।

जब सारा राजपुताना अकबर की आधीनता स्वीकार कर रहा था। तब स्वाभिमानी और वीर महाराणा प्रताप से यह अत्याचार सहा न गया। उन्होंने सोने के बर्तनों में पान की पिक थूकने वाले मुगलों के आधीनता और महलों के विश्राम को त्यागकर जंगल में पत्थर के बिस्तर और घास की रोटी खाना स्वीकार किया। ,महाराणा के पुरुषार्थ से चित्तौड़गढ़ एक बार फिर से स्वतंत्र हुआ।

महाराणा का प्रयास आरम्भ में छोटा था। मगर समय के साथ उनके महान पुरुषार्थ ने भारतीय इतिहास में अपनी विशेष पहचान बनाई।

वीर बन्दा बैरागी ने जब गुरु गोबिंद सिंह के मुख से हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को सुना तो उन्होंने महंत चोला छोड़ लौह कवच धारण कर लिया। अपनी तलवार से गुरु पुत्रों की हत्या का न केवल बदला लिया अपितु पूरे उत्तर भारत में इस्लामिक आतंक की लहर को रोक दिया। वीर बैरागी के पुरुषार्थ से हिन्दुओं को राहत की साँस मिली।

वीर बैरागी का प्रयास आरम्भ में छोटा था। मगर समय के साथ उनके महान पुरुषार्थ ने भारतीय इतिहास में अपनी विशेष पहचान बनाई।

1939 में आर्यसमाज ने हैदराबाद के निज़ाम के विरुद्ध सत्याग्रह किया। हैदराबाद रियासत में हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों का शरिया के नाम पर अतिक्रमण किया जा रहा था। हिन्दुओं को मंदिर बनाने, शोभा यात्रा निकालने, व्रत-त्यौहार, शादी करने पर प्रतिबन्ध था। ऐसे में आर्यसमाज द्वारा इस अत्याचार के विरुद्ध आंदोलन किया गया। सभी ने कहा आर्यसमाजियों का दिमाग ख़राब हो गया है जो संसार की सबसे धनी रियासत से टकरा रहे है। अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी ने भी आर्यसमाज एक आंदोलन का विरोध किया। अंत में विजय आर्यसमाज की हुई। आर्यसमाज के प्रयासों से हैदराबाद आगे चलकर भारत का भाग बना।

इतिहास में ऐसे अनेक उदहारण आपको मिल जायेंगे। जब एक छोटा सा प्रयास इतिहास की दिशा बदल देता है।

आज इस्लामिक आतंकवाद विश्व के समस्त देशों को चुनौती दे रहा है। भारत भी उन देशों में से एक है। भारत के कुछ युवा ISIS में शामिल हो चूके है। वह दिन दूर नहीं जब इसके दूरगामी परिणाम सामने आएंगे।

ऐसे में हर राष्ट्रवादी हिन्दू का प्रयास यही होना चाहिए कि इस आतंकवाद का सामना किया जाना चाहिए।  प्रयास चाहे वह छोटा ही क्यों न हो मगर उसकी अपनी महत्ता है।

 इंटरनेट, सोशल मीडिया, सामान्य चर्चा, स्कूल, कॉलेज, व्यवसाय स्थान, सफर करते जहाँ भी मौका मिले इस्लामिक आतंकवाद की भर्त्सना अवश्य करें। इससे न केवल जन चेतना का प्रचार होगा अपितु अनेकों का जीवन भी बदलेगा। वह दिन भी आयेगा जब देश के मुस्लिम भाई भी ISIS के विरुद्ध आवाज बुलंद करेंगे।

(जनहित में जारी)

डॉ विवेक आर्य

ज़ाकिर नाईक की आर्यसमाज द्वारा पोल-खोल



ज़ाकिर नाईक की आर्यसमाज द्वारा पोल-खोल

डॉ विवेक आर्य

विषय-वेद और क़ुरान में से ईश्वरीय ज्ञान कौन सा हैं?

डॉ ज़ाकिर नाईक ने अपने वीडियो में केवल क़ुरान को सभी के मानने के लायक धार्मिक पुस्तक बताता है। उसके अनुसार प्रत्येक काल में अल्लाह की ओर से धार्मिक पुस्तकें तौरेत, जबूर, इंजील एवं अंत में क़ुरान अवतरित करी गई। क़ुरान अंतिम एवं निर्णायक पुस्तक है। क्यूंकि वेदों का कोई भी वर्णन क़ुरान में नहीं मिलता। इसलिए वेदों को ईश्वरीय पुस्तक मानने या न मानने पर शंका है। हालाँकि जो बात क़ुरान कि वेदों में मिलती है, वह मान्य है। जो जो बात क़ुरान की वेदों में नहीं मिलती वह अमान्य है।

समीक्षा-

क़ुरान करीब 1400 वर्षों पहले इस धरती पर अवतरित हुई। इस्लामिक मान्यता अनुसार हज़रत मुहम्मद के पास खुदा के भेजे हुए खुदा का पैगाम लेकर फरिश्ते आते थे। रसूल उन्हें लिखवा देते। इस तरीके से समय समय पर क़ुरान की आयतें नाज़िल हुई। इस प्रकार से क़ुरान की उत्पत्ति हुई।

1. ईश्वरीय ज्ञान सृष्टी के आरंभ में आना चाहिये न की मानव की उत्पत्ति के करोड़ो वर्षों के बाद।

ज़ाकिर नाईक के अनुसार सबसे पहली आसमानी पुस्तक तौरेत थी। तौरेत मूसा नामक पैगम्बर पर नाजिल हुई थी। सैमेटिक मत अनुसार सबसे पहले आदम की उत्पत्ति हुई थी। आदम से लेकर मूसा तक करोड़ो लोगों का इस धरती पर जन्म हुआ। क्या क़ुरान का अल्लाह इतना अपरिपक्व है जो उन करोड़ो लोगों को अपने ज्ञान से वंचित रखता? उस काल में जन्में करोड़ों लोगों को कोई ज्ञान नहीं था और मनुष्य बिना कुछ सिखाये कुछ भी सीख नहीं सकता था। इसलिए मनुष्य की उत्पत्ति के तुरंत बाद उसे ईश्वरीय ज्ञान की आवश्यकता थी। सत्य के परिज्ञान न होने के कारण यदि सृष्टी के आदि काल में मनुष्य कोई अधर्म आचरण करता तो उसका फल उसे क्यूँ मिलता क्यूंकि इस अधर्माचरण में उसका कोई दोष नहीं होता, क्यूंकि अगर किसी का दोष होता भी हैं तो वह परमेश्वर का होता क्यूंकि उन्होंने मानव को आरंभ में ही सत्य का ज्ञान नहीं करवाया।

यह क़ुरान के अल्लाह की कमी दर्शाता है। ईश्वरीय ज्ञान या ईश्वर में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।
परमेश्वर सकल मानव जाति के परम पिता है और सभी मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं। वह मनुष्यों में कोई भेदभाव नहीं करता। केवल एक वेद ही हैं जो सृष्टी के आरंभ में ईश्वर द्वारा मानव जाति को प्रदान किया गया था।

2. क़ुरान का अल्लाह बार बार अपना ज्ञान क्यों परिवर्तन करता रहा? यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।

पहले तौरेत, फिर जबूर, फिर इंजील और अंत में क़ुरान नाजिल हुई। प्रश्न उठता है कि ऐसी क्या कमी क़ुरान के अल्लाह से रह जाती थी जो वह उसे बार बार दुरुस्त करता था। मुसलमान लोग क़ुरान को अंतिम एवं निर्णायक ज्ञान मानते है? अल्लाह ने क़ुरान के ज्ञान को पहले ही क्यों नहीं दे दिया। उसे न बार बार परिवर्तन की आवश्यकता होती। ज़ाकिर नाईक कहता है जो ज्ञान जिस काल में उपयोगी था उस उस ज्ञान को अल्लाह ने उपलब्ध करवाया। शंका उठती है कि फिर आप क़ुरान को अंतिम एवं निर्णायक किस आधार पर मानते है? क़ुरान के पश्चात क्या देश, काल और परिस्थिति नहीं बदलेगी। क़ुरान काल में तलवार, खंजर आदि चलते थे। आज बन्दुक, मिसाइल आदि युद्ध में प्रयोग होते है। इससे तो यही सिद्ध हुआ कि क़ुरान का ज्ञान तो आज भी अप्रासंगिक हो गया है। आगे यही पर समाप्त नहीं हो जाती। अंतिम पुस्तक क़ुरान की आयतों को भीअनेक बार गलत समझ कर मंसूख़ अर्थात रद्द भी किया गया। यह रद्द करना ठीक वैसे था जैसे पहले की आसमानी किताबों को रद्द किया गया था। क्या क़ुरान का अल्लाह एक नर्सरी के बालक के समान नासमझ है? एक नर्सरी का बालक क्या करता है? पहले स्लेट पर अक्षर बनाता है फिर उसे वह नहीं जचता तो उसे फिर मिटाता है। फिर दोबारा से बनाता है। वह कर्म तब तक चलता रहता है जब तक ठीक अक्षर नहीं बनता। क़ुरान का अल्लाह भी अपनी ही बताई आयतों को एक बालक के समान गलत-ठीक करता रहता है। ज़ाकिर नाईक अगर इस तर्क के उत्तर में यह शंका करें कि जैसे आप चिकित्सा विज्ञान कि पुस्तक का पुराना संस्करण क्यों नहीं पढ़ते आप नया क्यों पढ़ते हो। वैसे ही आप आज तौरेत, जबूर और इंजील के स्थान पर अंतिम क़ुरान को पढ़ते है। ज़ाकिर नाईक की बात सुनकर आप मुस्कुरा देंगे। ज़ाकिर भाई मेडिकल की पुस्तक का अगला संस्करण भी आएगा। आप तब क़ुरान को किस आधार पर अंतिम एवं निर्णायक कहेंगे?

इसके विपरीत वेदों का ज्ञान सृष्टि के आदि में आया और सृष्टि के अंत तक उसमें न कोई परिवर्तन होता है। वह श्रुति परम्परा से पूर्ण रूप से सुरक्षित है। कोई चाहे भी तो उसमें बदलाव नहीं कर सकता। वैदिक ईश्वर सर्वज्ञ अर्थात सब ज्ञान को जानने वाला है। इसलिए उन्हें किसी भी वेद मंत्र को कभी भी बदलने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

3. क़ुरान के ज्ञान को देने के लिए पैगम्बर और फरिश्तों की आवश्यकता क्यों हुई?

इस्लाम मान्यता के अनुसार हजरत पैगम्बर को पैगाम लेकर अल्लाह के फरिशते आते थे। कोई भी पैगाम किसी फासले अर्थात दूरी से आता है। ज़ाकिर नाईक से यह पहला प्रश्न है कि अल्लाह और पैगम्बर (मनुष्य) के मध्य का फासला बताये? दूसरा प्रश्न यह है कि क्या क़ुरान का अल्लाह असक्षम और असमर्थ है जो उसे अपना पैगाम देने के लिए फरिश्तों या संदेशवाहकों की आवश्यकता हुई? अधिकतर मुस्लिम विद्वान् इस प्रश्न पर मौन धारण कर लेते है।

इस विषय में वैदिक सिद्धांत है कि ईश्वर और मनुष्य में कोई दूरी नहीं है क्यूंकि परमात्मा आत्मा में विराजमान है एवं हमें सदा देख, सुन रहा हैं और प्रेरणा दे रहा है। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा ऋषियों के ह्रदय में ही वेदों का ज्ञान बिना किसी संदेशवाहक के सहज भाव से स्वयं प्रकाशित किया गया। इससे न केवल वैदिक ईश्वर सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है अपितु पूर्ण भी सिद्ध होता है।

4. क्या क़ुरान का अल्लाह कमजोर है?

इस्लाम मानने वाले शैतान की कहानी को मानते है। इस कहानी के अनुसार अल्लाह ने इबलीस को आदम को सजदा करने को कहा। इबलीस ने अल्लाह के हुकुम की अवमानना करते हुए आदम को सजदा करने से मना कर दिया। इससे क्रोधित होकर अल्लाह ने इबलीस को सजा दे दी। तब से इबलीस शैतान बनकर बहकाता फिरता है। क़ुरान के अल्लाह के हुकुम की अवमानना से यह सिद्ध हुआ कि क़ुरान का अल्लाह न केवल कमजोर है अपितु मनुष्यों एक समान क्रोधित होने वाला भी है।

सर्वप्रथम तो कोई ईश्वर की आज्ञा को कैसे नकार सकता है? इससे क़ुरान का अल्लाह अशक्त सिद्ध हुआ।

दूसरा क्या क़ुरान का अल्लाह अल्पज्ञ अर्थात कम ज्ञान वाला है, जो उसे यह भी नहीं मालूम कि जिस इबलीस को उसने बनाया है वह उसकी आज्ञा नहीं मानेगा?

तीसरा शाप देकर अल्लाह ने इबलीस को शैतान बना दिया जो मनुष्यों को बहकाकर काफ़िर बनाता है। काफ़िर बनने पर अल्लाह को काफ़िरों को मारने के लिए आयत उतारनी पड़ी। इसका परिणाम यह निकला कि यह धरती मुसलमानों और गैर मुसलमानों में विभाजित हो गई। मुसलमानों को अपने आपको सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के काफिरों को मारना नैतिक कर्त्तव्य बन गया। इसका अंतिम परिणाम यह निकला की 1400 वर्षों में इतनी मारकाट हुई कि यह स्वर्ग सी धरती दोज़ख अर्थात नरक बन गई। न क़ुरान का अल्लाह इबलीस को ऊटपटांग हुकुम देता, न वह अवमानना करता, न शैतान बनने का शाप दिया जाता, न काफ़िर बनते, न खून खराबा होता।

ऐसे अल्लाह को मुसलमान लोग खुदा मानते है। यह उनकी अज्ञानता है।

वेदों में वैदिक ईश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव के विपरीत कोई भी बात नहीं है। ईश्वर सत्यस्वरूप, न्यायकारी, दयालु, पवित्र, शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव, नियंता, सर्वज्ञ आदि गुणों वाला है। ईश्वरीय ज्ञान में ईश्वर के इन गुणों के विपरीत बातें नहीं लिखी है। कुरान में कई ऐसी बातें हैं जो की ईश्वर के गुणों के विपरीत है।
एक अन्य उदहारण लीजिए। इस्लाम मानने वालों की मान्यता है कि ईद के दिन निरीह पशु की क़ुरबानी देने से पुण्य की प्राप्ति होती है। यह कर्म ईश्वर के दयालु गुण के विपरीत कर्म है। इसलिए केवल वेद ही ईश्वरीय गुण-कर्म-स्वभाव के अनुकूल होने के कारण एक मात्र मान्य धर्म ग्रन्थ है।

इस प्रकार इस लेख में दिया गए तर्कों से यह सिद्ध होता हैं वेद ही ईश्वरीय ज्ञान मानने लायक है।

वेदों को लेकर ज़ाकिर नाईक केवल अपने जैसों को बरगला रहा है। ज़ाकिर नाईक के कुतर्क कि परीक्षा एक अन्य उदहारण से होती है। ज़ाकिर नाईक कहता है कि जो बात क़ुरान कि वेदों में मिलती है, वह मान्य है। जो जो बात क़ुरान की वेदों में नहीं मिलती वह अमान्य है।

मतलब बाप का होना तभी माना जायेगा जब बेटे के दर्शन होंगे। अगर बेटा नहीं है तो बाप पैदा ही नहीं हुआ। ज़ाकिर भाई आप इस धरती पर हो इससे यह केवल यह सिद्ध नहीं होता की आपके पूर्वज भी इस धरती पर थे। परन्तु अगर आपके पूर्वज ही नहीं होते तो आप आज होते ही नहीं।

वेदों का ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में आया तभी उसमें से कुछ बातें क़ुरान वालों ने उधारी ली। अब उन उधार ली गई बातों से वेद के सही या गलत होने की कसौटी स्थापित नहीं होती अपितु यह कसौटी क़ुरान के लिए सिद्ध होती है। जो जो बातें वेदों की क़ुरान में मिलती है वह ईश्वरकृत होने के कारण मान्य है और जो जो बातें क़ुरान में वेदों से भिन्न मिलती है वह मनुष्यकृत होने के कारण अमान्य एवं कपोलकल्पित है।

वेदों के ईश्वरीय ज्ञान होने की वेद स्वयं ही अंत साक्षी देते हैं। अनेक मन्त्रों से हम इस बात को सिद्ध करते हैं जैसे

1. सबके पूज्य,सृष्टीकाल में सब कुछ देने वाले और प्रलयकाल में सब कुछ नष्ट कर देने वाले उस परमात्मा से ऋग्वेद उत्पन्न हुआ, सामवेद उत्पन्न हुआ, उसी से अथर्ववेद उत्पन्न हुआ और उसी से यजुर्वेद उत्पन्न हुआ हैं- ऋग्वेद 10/90/9, यजुर्वेद 31/7, अथर्ववेद 19/6/13

2. सृष्टी के आरंभ में वेदवाणी के पति परमात्मा ने पवित्र ऋषियों की आत्मा में अपनी प्रेरणा से विभिन्न पदार्थों का नाम बताने वाली वेदवाणी को प्रकाशित किया- ऋग्वेद 10/71/1

3. वेदवाणी का पद और अर्थ के सम्बन्ध से प्राप्त होने वाला ज्ञान यज्ञ अर्थात सबके पूजनीय परमात्मा द्वारा प्राप्त होता हैं- ऋग्वेद 10/71/3

4. मैंने (ईश्वर) ने इस कल्याणकारी वेदवाणी को सब लोगों के कल्याण के लिए दिया हैं- यजुर्वेद 26/2

5. ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद स्कंभ अर्थात सर्वाधार परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं- अथर्ववेद 10/7/20

6. यथार्थ ज्ञान बताने वाली वेदवाणियों को अपूर्व गुणों वाले स्कंभ नामक परमात्मा ने ही अपनी प्रेरणा से दिया हैं- अथर्ववेद 10/8/33

7. हे मनुष्यों! तुम्हे सब प्रकार के वर देने वाली यह वेदरूपी माता मैंने प्रस्तुत कर दी हैं- अथर्ववेद 19/71/1

8. परमात्मा का नाम ही जातवेदा इसलिए हैं की उससे उसका वेदरूपी काव्य उत्पन्न हुआ हैं- अथर्ववेद- 5/11/2

आइये ईश्वरीय के सत्य सन्देश वेद को जाने

वेद के पवित्र संदेशों को अपने जीवन में ग्रहण कर अपने जीवन का उद्धार करे।

Wednesday, July 13, 2016

Why read Satyarth Prakash?


Why read Satyarth Prakash?


Vasudeva Rao




Satyarth Prakash is magnum opus work of Swami Dayanand which had saved millions of people from ignorance.







Everyone must read this book.







Our Motherland is the land of Vedas. Veritably this is a land of Gold. From the time of Ikshvaku to that Pandu of Mahabharatha fame Vedic Dharma guided the lives and activities of the people of Bharath. There was a peace, plenty and contenment everywhere. King Aswapathi proclaimed before the learned Brahmins who had come to discuss Brahm-vidya that there was thief, no miser, no drunkard, no man without fire of worship, none without knowledge of truth, none who was a debauch, and no women of unchaste character

[ Chandogya upanishad:5.11.5]

In this even changing world nothing can maintain itself in a high state. After a period of higher development in Science, art and
philosophy a period of decrepitude and decay always follows.

Nearly 1000 years before Mahabharata war the seeds of degeneration began to be sown. Gradually these seeds began to grow till in the fullness of time their fruits dropped a curtain on the great civilization of Bharath in the shape of epic Mahabharata war. In that war not only veteran Soldiers but also learned Brahmans got killed.

After this Great War learned Brahmans ceased to exist and their places were taken up by selfish people who began to play loose and fast game with the Vedic texts in order to sub serve their petty ends. Animals and even men began to be sacrificed in the Yagnas to propitiate false Gods and Goddess. People fell into a deep ditch of ignorance and indolence. This state of affairs continued for a very long time which was eventually protested by Gautam Bhuddha and Mahavir. They sang the song of Ahimsa and became responsible for founding of Faiths called Buddhism and Jainism in Bharath after their death. These Faiths landed up in Atheism leading to spread of atheism in whole country.

Hence, in order to drive away atheism Acharya Shankar came on the scene He was dazzlingly brilliant and demolished the Buddhist tenets by sheer logic in the Shastrathras [Religious debates] held with Buddhist Scholars. He preached Advaitha but soon his theory of Advaitha got corrupted in the form theory of Illusion called Mayavad. In order to remove these false theories on God and Soul Acharya Madhava rose in the South and he propounded the theory of dualism. This was followed by Acharya Ramanuja who propounded a theory which was called Vishistadwaitha. Thus number of new and newer faiths started taking roots. These men were followed by reformers like Nanak, Kabir, and Basaveshwar etc. These men propounded Bhakthi cult. It should be noted that from Acharya Shankara onward the faiths that were founded had no Veda content and they were all Non-Vedic cults even though these men of great understanding held Vedas high in their deliberations.

With the result of multi-city of faiths often opposed to each other, the Unity of people suffered greatly. With disunity ruling the roost, Bharath at last fell before the mighty force of Islam and became a slave country. In the middle of 19th Century the English who had originally come as traders to Bharath, snatched the political power and became rulers of the country. The country was thrown to sufferings again.

19th century is an important milestone in the history of our country. The 1857 war of independence failed and the Britishers took over the reins of power directly hitherto wielded by the East India company. The British who were Christians besides wielding political power had their own agenda of Christening the Bharath. It is at this of point of time attempts were made to undermine the the Culture and Dharma of India. Christian Missionaries descended on India with their own imagined stories of rights and wrongs of Hindu Dharma and attempted to rescue poor Indians to Christian heaven.

They tasted success in some parts of India because of peculiar Socio-economic conditions prevailing there. In order to lay firmly the feeling of Sanathana Dharma as being inferior vis-à-vis Christianity Lord Macaulay introduced modern English education which successfully created men dark in color but English in tastes and manners.

It is not that British had a runaway success in their attempt to proselytize India. Reform movements rose which sought to remove certain bad religious and social practices among the Hindus which checkmated the drive of Missionaries. Brahma samaj in Bengal, Satyashodak samaj and Prarthana samaj in Maharashtra were cases in point. But these reform movements although lofty in their aims and objectives had some inherent defects. In that they were carried away by the greatness of Bible and stood away from Vedas which is the loftiest and earliest treatise on Dharma for all times and ages. Because of their rejection of Vedas [which Hindus held sacred and as a word of God] these movements failed to reach the masses. Now these bodies are almost defunct. But the one movement which was started in 19th century to restore India's past pride and glory with Vedas as the guide was Aryasamaj founded by Swami Dayananda Saraswati [1824-1883] This Vedic movement heralded a new chapter in strengthening India and initiated steps for self Rule which culminated when the country became Independent in 1947.

Swami Dayanand was tutored by Virajananda who was an ascetic Sanyasi. Although blind, he was considered master Grammarian of his times. Dayanand learnt Veda, grammar etc, under his guidance for 3 years and while bidding adieu after the training was over Swami Virajananda took a promise from Dayananda that the latter would devote the rest of his of life for the propagation of Vedas only. Swami Dayananda vowed to his guru that he will devote his whole life to propagate Vedas and remove the ignorance from society.

A brief history of Sathyartha Prakash

In pursuance of his word given to his master Dayanand started giving lectures on Vedas and while so doing he mercilessly condemned many anti-Vedic practices like, Idolatry, Caste system, ceremonies for the dead etc. His speeches attracted both common and elite alike. His mother tongue was Gujarati but spoke mostly in Sanskrit and he switched over to Hindi as a medium of communication on the advice of Babu Keshavachandra Sen who was then the leader of Brahma samaj during his visit in Calcutta in 1872-73. He started preaching in there after wards. His book

“Satyartha Prakash” [Light on Truth] was therefore written in Hindi to reach masses.

It is said that next to Ramcharith Manas Satyartha prakash is the most popular book in Hindi language. One commentator has observed that Satyarth Prakash has made both Scholars and commoners think seriously just as the way Das capital written by Karl Marx has done in Global context. In fact Satyarth Prakash was not the first work of Swami Dayanand. He wrote Sandhya in 1863, Bhagavat Khandan in 1866 and Advaithmath Kandan in 1870. It is said by the Hindi Scholars that Satyarth prakash was the trend setter in Hindi prose. People often say that Satyarth Prakash is a Bible for Aryasamajists. This is wrong. Aryasamajists have only Vedas as the final authority and none else.

Sathyartha Prakash was written as per the request made by Raja Jayakrishna das who was an ardent admirer of Swami Dayanand. He was a District collector of Varanasi in those days. Rajaji insisted that Dayanand compile his ideas in book form so that those who had no privilege of listening to Dayanand could derive benefits. In order to help Dayanand to accomplish his task he provided the facility of a writer by name Chandrasekhara Shastri who was a Maharastrian Brahmin. Swami Dayanand therefore dictated and Shastri wrote down. This way the work started on 12th June 1874 and got concluded on September 1874. In other words the first issue of Sathyartha Prakash was not written by Swami Dayanand but contained his dictations. The first publisher of Sathyartha Prakash was Raja Jayakrishna Das. He got it published in 1874 in Varanasi. Since Swami Dayanand was away on tour he could not see even the proof. Taking advantage of his absence, certain passages which were opposed to Dayanand’s thinking were got inserted fradulently. For ex, conducting Sharaddah, taking bath during eclipses Meat eating etc. Further, since, Raja Jayakrishna Das was an employee of British and also remained a friend of Sir Syed Ahmed Khan [who was a founder of Aligarh MuslimUniversity] he lacked the courage to publish the last two chapters which were critical of Christianity and Islam. Hence the first issue of Sathyartha Prakash contained only 12 chapters. When the conflicting passages were brought to notice of Swami Dayanand he promptly clarified the issues. Hence, for these reasons, the 2nd publication of

Sathyartha Prakash is alone considered as authentic.

However, the first edition of Sathyartha Prakash is significant in more than one way. This contained the valuable views of Swamiji on Economics which for strange reasons were not included in the second edition. In the first edition of Sathyartha Prakash Swami Dayanand has adversely commented on tax being levied on Salt, commented on steep increase in stamp duty and the difficulties being experienced by the forest dwellers that collect forest wood. After 56 years of Sathyartha Prakash being published Mahatma Gandhi led successful Salt sathyagraha in 1930. The observations made by Dayanand are still relevant as the price of Salt is making the life of a common man still difficult.

In the second edition Swami Dayanand removed all portions that opposed to his thinking and got 13th and 14th chapters included. Besides this he also got included his Statement of Beliefs. Swami Dayanand revised the Second Edition in 1882 at Udaipur and this was given to printing but the work was over only 1884 by which time he was no more. It was therefore published after his death. In Sathyartha Prakash there are 377 book references and out of which authority has been quoted in 290 cases. 1542 Mantras have been quoted and the authority in full has quoted in 1882 times. Swami Dayanand believed 3000 books as authentic. The task involved in writing such a book in those days considering even in present times with all facilities of Library is really stupendous. Karl Marx sitting in London took 34 years to write the monumental book Das Capital which shook Europe. On the other hand Swami Dayanand, a ascetic Sanyasi devoid of all resources and facing opposition from all quarters of the society with his vision and firm belief in God authored the Sathyartha Prakash to shook the cultural, social and economic thinking of India. Sathyartha Prakash indicates the depth of Swami’s learning and memory power.

Our country is really blessed one. Like Vedas, Upanishads, Ramayan and Mahabharatha, Geetha, Sathyartha Prakash also had this land for its birth. Sathyartha Prakash is like the proverbial Nandini cow. It provides as much of Milk of knowledge as desired. It is the condensed knowledge of Veda and Vedic culture. The greatness of Sathyartha Prakash lies in the fact that it makes the reader to think independently and enhances his scope of Knowledge. As one reader puts it exaggeratedly that , “Sathyartha Prakash is a Gayathri Mantra among the Mantras. It is six darshans among Darshans. It is Upanishad among Ten Upanishads. It is Manava Dharma Shastra among Dharma Shastras”


Sathyartha Prakash has two parts. The first half has 10 chapters. The second half has 4 chapters. The first half is exposition in nature. The second half is chiefly condemnatory in nature. The chapters are called Samullahs meaning causing happiness by shedding Light.

Normally, a book would be having one introduction in which the author seeks to explain the object of writing the book.Viewing accordingly it surprises the reader that the Sathyartha Prakash has four introductions before the beginning of 11th ,12th 13th and 14th chapters besides the main introduction at the start of the Book. This has been followed by Statement of Beliefs which is acceptable to the author. It is always better to read the introduction and other introductions first before attempting to read the book as they enable the reader to understand the book better. The common refrain in all these introductions is that the author makes a passionate appeal to accept the truth and reject falsehood.

In the Global context, there are only four widely read books. They are Koran, Bible, Geetha and Sathyartha Prakash. But if you take into the account the time factor into consideration, Koran, Bible, have taken hundreds of years to reach their present state of popularity. Geetha is around 5000 yrs old as it is associated with Mahabharatha. Thanks to incessant efforts made by the Geetha press, Gorakpur, it has attained some measure of popularity. But Sathyartha Prakash in a brief period of 135 years has peaked in popularity amidst heavy odds and sacrifices and it could be said therefore that in terms of popularity it ranks number one.

The significance of Sathyartha Prakash

“This is not a book! It could instill martial spirit in any cold blooded Hindu” observed Veer Savarkar while making a speech during the Satyagraha launched for lifting the unjust ban imposed by the Muslim league Govt in Sindh [Now in Pakistan]. The statement is really pregnant with meaning. Sathyartha Prakash has Vedas and other true Scriptures as its basis and its object is to enunciate the principles contained in these truthful Scriptures.

The exposition of principles apart Sathyartha Prakash makes a scathing attack on all anti Vedic principles the intensity of which could be never come across in any other book. This is its greatness. The reason being the conformists who wrote books lacked the guts but Dayananda was a fire ball known for his non conformist approach.

High lights of the book.

The book is noted for its intense patriotism and rejection of foreign rule. This is first book which stressed the advantages of Self-Rule. No wonder, Lokamanya Tilak called Dayanand as the first person who first pronounced the word “Swarajya”. It should be noted that while Dayanand called upon the people to fight for Swarajaya in 1874 it is almost 50 years later Congress appealed for Poorna Swaraj from Britishers.

The first book which upheld the Rights of Women and Shudras to study Vedas duly supported with Vedic Mantras.

First book to denounce sacrifice of animals in yagnas and never compromised even a bit in this context.

The other Acharyas allowed the meat eating for ruling class [Kshatriyas].But Dayanand never allowed meat eating even for Kshatriyas but called upon them to rule with courage and defend the country with all vigour and valor.

Arya is not a name of Caste or race. But it is a term used to denote nobility. First book which exposed the fallacy of Aryan expedition against India.

The first book which exposed and condemned the black magic, spirits, and hoax called Astrology employing fraudulent methods aimed at satisfying the planets etc. The book has been an eye opener for those who strive to bring the scientific temper to the masses then and now. The book has done a remarkable job in educating the masses on the advantages of cherishing Scientific temper.

Renunciation {called Vairagya} is neither practical proposition nor to be encouraged. It should not be aim or object of life either. Every man through the medium of four purusharthas should strive for happiness, for the acquisition of wealth, and be charitable. He must strive to attain the Supreme Bliss called Moksha. The first book which glorified the household order [Grihastha Ashrama] as it is supported the rest of Ashrams.

The book exposes the evils of Idolatry, Superstition called Sharadda [a ceremony observed for the dead] Pilgrimages, and the evil practices obtaining in the so called holy places, birth based Caste system, and other innumerable practices that go with in the name of the puranic religion. The first book which upheld the Vedic Varna Ashrama Dharma based on Guna- Karma –Swabhava. As opposed to inhuman birth based Caste system.The first book which condemned the anti Vedic books. The first attempt to condemn the theory of Incarnation of God by wrong understanding of Bhagvad Geeta with tell tale examples. It provided an alternative Vedic system under which the country could become strong and valorous which would defeat/frustrate any enemy under all circumstances.


Lord Ram is a Maryada Purushothama. Men like Lord Krishna never did even one wrong in their entire lives. First book which shot down stories of Krishna being depicted as Radha vallabha etc.

Other features


1. Gives a terrible blow at the bottom of polytheism

2. Induces self-introspection among Educationists.

3. Exposes hoax called Astrology

4. Gives a lethal blow to superstitions.

5. An alchemy that turns atheist to theist.

6. A manifesto that shapes the personality.

7. A yardstick that distinguishes who is a real sanyasi and fake sanyasi

8. Vedic expositions of Nation, state polity and the art of real governance.

9. Provides scientific explanation to the origin of universe and explain natural laws.

10. A realistic explanation of the true nature and functions of Varna system.

11. A pure water which washes clean of obscene meanings given to Vedic mantras.

12. A bold declaration on gender equality.

13. A logical analysis of issues like Meat eating, Untouchability etc,

14. Mirroring the vested self interests of Casteist forces.

15. Rationalism that rattles our barren Vedantists.

16. A truthful exposition of secrets of inhuman faiths and sects.

17. Truths of Koran, Bible, and Purana texts unmasked.

18. A hand guide to seekers of truth and genuine revolution

19. A feast to seekers of Truth who do critical analysis.

Naturally when this book was brought out an era of scientific inquiry began unfolding itself. The Hindu Society started asserting itself after centuries of serfdom and weakness. The other Faiths stood baffled. It enabled Hindu to regain his radiance and put up the fight where required. The Shuddi and Sanghatan started by Swami rattled the leaders of Semitic faiths, while Hindus rejoiced. Attempts were made to see the Book was banned in Pre-independent India by the communal and obsurantist forces at Peshavar -1892, Allahabad-1902, Patiyala-1909, United Provinces—1910, Hyderabad Sindh—1943-44. In independent India Bhopal-1980, Jammu &Kashmir In 1986 appeals were made at Hyderabad and Calcutta to ban the Sathyartha Prakash. In 2007 in Delhi two communal and misguided Muslims moved the Delhi court to get the Sathyartha Prakash banned. But all these moves were got frustrated and the opponents were disappointed as Courts did not entertain their pleas and the Muslim league Govt at Hyderabad Sindh had to withdraw the proscribing order in the wake of Satyagraha launched by Aryasamaj.


As on today Sathyartha Prakash has been translated into 23 languages and even Braille copy is also made available for the benefit of blind. It is estimated that around 400 books either in favor or in opposition of Sathyartha Prakash has been printed. As Sathyartha Prakash is getting read by more and more, the opponents would bite the dust eventually. Seth J.D Birla a doyen among industrialists have therefore remarked that while Sathyartha Prakash reflects the true Arya sanathana Dharma, it also removes the superstitions and frauds associated with religions. It makes the reader to be more rational. The welfare of man is kept in view while writing the book. It has no hatred against anybody. If Christians and Muslims study the 13th and 14th chapters dispassionately they would understand the essence of Dharma.

The relevance of Sathyartha Prakash

This book acts like the famed Sudarshan Chakra for the defense of Aryan Dharma and Culture.

The 14 chapters are veritable 14 Bullets for the total annihilation religions which thrive on falsehood and deceit.

It is a path finder for those who intend to know the intricacies of Dharma.

Nectar for those seeking Moksha or bliss.

Encyclopedia of Dharma.

A true guide for Administrators.

A directory of Vedic principles.

It lays bare the hollow teachings about the Creation of the world.

It has changed the life of hundreds of men after reading.

Many objectionable portions found in the books of religions were expunged after this book was published.

A dullard becomes a Scholar.

Atheist becomes theist.

The weak becomes strong.

The arrogant becomes proud.

A traitor becomes a patriot.

The meat eater becomes vegetarian.

The slayer of Cow becomes its protector.

The absurd becomes logical

The lover of English becomes the lover of Bharath.

The prodigal son becomes a faithful son.

The seeds of thinking start growing in the otherwise barren head.

The slogans in favor of other countries become louder in favor of India.

These are not empty rhetoric. There are hundreds of live examples as proof.

Read Sathyartha Prakash and popularize it to the best of your capacity.