Monday, May 22, 2023

How was Mizoram converted into Christianity ?


 


How was Mizoram converted into Christianity ?


Amit Aggarwal 


The Battle of Plassey in 1757 established the British firmly in India and they became undisputed rulers of the Bengal, one of the largest province in India. It was comprised of present Bihar, Orissa, Bengal, Bangladesh and Assam. They also got Chittagong, the south-eastern port of the province which did wonders to the British trade. This also brought them to the immediate vicinity of North-Eastern hill tribals like Lushai, Chakma and Kumi, to name a few. These tribes inhabited the area of present Tripura, Mizoram and Manipur.


These were aborigine tribes and occasionally raided the neighbouring tribes and collected the taxes and even heads of the people. In the process, they also used to loot the items which they could not afford. After the arrival of the British, people started paying taxes to the British, instead of them. This dried their revenues and brought on a collision course with the British. The latter named them headhunters but adopted the policy of leaving the tribes on their own. One day, however, everything changed.

During those times, the British also occupied the Cachar hills in southern Assam where the city of Silchar is located. With time, they established the tea gardens in the area which proved to be highly profitable. Soon a mania swept the region where tea planters begin to expand their gardens and encroach on the Lushai territory. One such tea garden was in Alexandrapur near Silchar which was owned by one George Seller. One day, he invited one of his close friends James Winchester and his 6 years old daughter Mary Winchester in 1870 as she was going to Britain for further studies. Mary was the illegitimate child of James and his Meitei (Manipuri) worker. Lushais got the wind of such celebration and swooped down on the tea garden in a pre-dawn raid. They killed a few people including James during confrontation. Seller, however, managed to escape while Mary was kidnapped and taken to Lushai headquarters. This created a media furore in London, a few days later. Mary was, however, treated like a queen by the tribal women. In one year of captivity, she became used to the Mizo lifestyle and forgot English completely.

On 8th October 1871, after more than a year passed, the British attacked the Lushai hamlet and killed everyone. Mary had to be dragged against her will by the British soldiers. She was then sent to Scotland to her grandparents.


However, the story has not finished for hapless Lushais and other tribes in North-East. The missionaries saw their chance and dubbed the kidnapping barbaric. It did not matter to them that they killed every unyielding tribal in retaliation. It also did not matter that they carried out much more barbarity during the crusades and during the first war of independence in 1857. Turks were even in the habit of making towers of heads. By 1898, the British captured the whole Lushai territory and missionaries started to have a field day. Arthington Mission and Welsh Presbyterian missionaries were the foremost in converting and within a decade they converted more than 1 lakh tribals.


A story was deliberately spread that tribals had fallen into a trance after converting and they saw remarkable visions, namely that two great lights would shine in the land, one in the north and the other in the south. This further propelled the conversion as they were made to be ashamed of their ancestors, however, it is another matter that they were now converted from head hunters to soul hunters and church planters. A plaque of James were made in the tea garden and they were taken to Alexanderpur on an annual yatra to remind them of their savage past and how they were now the civilized people. Mizoram is consequently now 87% Christian. Mary was deified as a Christian messiah and her photos with Jesus are in most households. Everyone was told that it was prophesied in the Christian texts like Isaiah 60:22 which elaborated ‘A little one shall become a thousand and a small one a strong nation.’


Mary was projected as a little one.


Wednesday, May 10, 2023

जाति और वर्ण

 



जाति और वर्ण

वर्णव्यवस्था जन्मना है या कर्मणा। यदि उसे जन्मना माना जाय तो वह जातिगत भेदभाव को निर्माण करने का एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध होती है। ऋषि दयानन्द कर्मणा वर्णव्यवस्था के पक्षधर हैं। उनकी यह धारणा थी कि जन्मना वर्णव्यवस्था तो पाँच-सात पीढ़ियों से शुरु हुई है, अतः उसे पुरातन या सनातन नहीं कहा जा सकता। अपने तार्किक प्रमाणों द्वारा उन्होंने जन्मना वर्णव्यवस्था का सशक्त खंड़न किया है। उनकी दृष्टि में जन्म से सब मनुष्य समान हैं, जो जैसे कर्तव्य-कर्म करता है, वह वैसे वर्ण का अधिकारी होता है।

अस्पृश्य अछूत-दलित शब्द का विवेचन प्रस्तुत करते हुए डा. कुशलदेव शास्त्री लिखते हैं कि दलितोद्धार से पूर्व दलितों के लिए सार्वजनिक सामाजिक क्षेत्र में अस्पृश्य और अछूत शब्द प्रचलित थे ,लेकिन जब समाज-सुधार के बाद समाज में यह धारणा बनने लगी कि कोई भी अस्पृश्य और अछूत नहीं है, तो धीरे-धीरे अस्पृश्य के स्थान पर दलित शब्द रुढ़ हो गया। स्वाभाविक रूप से अस्पृश्योद्धार वा अछूतोद्धार का स्थान भी दलितोद्धार ने ले लिया। मानसिक परिवर्तन ने पारिभाषिक संज्ञा को भी परिवर्तित कर दिया।

प्रदीर्घ समय तक सामाजिक, आर्थिक आदि दृष्टि से जिनका दलन किया गया, कालान्तर में उन्हें ही दलित कहा गया। पं. इन्द्र विद्यावाचस्पति के अनुसार जब यह महसूस किया जाने लगा कि शुद्धि और दलितोद्धार दोनों चीजें एक सी नहीं हैं, दलितों की हीन दशा के लिए सवर्ण समझे जाने वाले लोग ही जिम्मेदार हैं, जिन्होंने जाति के करोड़ों व्यक्तियों को अछूत बना रखा है। उन्हें मानवता का अधिकार देना सवर्णों का कर्तव्य है। इस विचार को सामने रखकर आर्य समाज के कार्यकर्ताओं ने अछूतों के लिए दलित और अछूतों के उद्धार कार्य के लिए दलितोद्धार की संज्ञा दे दी। तभी से अछूतों की शुद्धि के संदर्भ में दलितोद्धार संज्ञा प्रचलित हो गयी।

यह बात अविस्मरणीय है कि आर्य समाज के समाज सुधार आंदोलन ने ही दलित-आन्दोलन को दलित और दलितोद्धार जैसे सक्षम शब्द प्रदान किये हैं।
महर्षि दयानन्द अपने ही नहीं सबके मोक्ष की चिंता करने वाले थे। किसी जाति-सम्प्रदाय वर्ग विशेष के लिए नहीं, अपितु सारे संसार के उपकार के लिए उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की थी।

सन् 1880 में काशी में एक दिन एक मनुष्य ने वर्ण व्यवस्था को जन्मगत सिद्ध करने के उद्देश्य से महाभाष्य का निम्न श्लोक प्रस्तुत किया-

विद्या तपश्च योनिश्च एतद् ब्राह्मण कारकम्।
विद्या तपोभ्यां यो हीनो जाति ब्राह्मण एव सः।। 4/1/48।।

अर्थात् ब्राह्मणत्व के तीन कारक हैं –1) विद्या, 2) तप और 3) योनि। जो विद्या और तप से हीन है वह जात्या (जन्मना) ब्राह्मण तो है ही।

ऋषि दयानन्द ने प्रति खंडन में मनु का यह श्लोक प्रस्तुत किया-

यथा काष्ठमयो हस्ती, यश्चा चर्ममयो मृगः।
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति।।
मनु०(2,157)

अर्थात् जैसे काष्ठ का कटपुतला हाथी और चमड़े का बनाया मृग होता है, वैसे ही बिना पढ़ा हुआ ब्राह्मण होता है। उक्त हाथी, मृग और विप्र ये तीनों नाममात्र धारण करते हैं

ऋषि दयानन्द से पूर्व और विशेष रूप से मध्यकाल से ब्राह्मणों के अतिरिक्त सभी वर्णस्थ व्यक्तियों को शूद्र समझा गया था, अतः क्रमशः मुगल और आंग्ल काल में महाराष्ट्र केसरी छत्रपति शिवाजी महाराज, बड़ौदा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ और कोल्हापुर नरेश राजर्षि शाहू महाराज को उपनयन आदि वेदोक्त संस्कार कराने हेतु आनाकानी करने वाले ब्राह्मणों के कारण मानसिक यातनाओं के बीहड़ जंगल से गुजरना पड़ा था।

ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः अर्थात् ज्ञानी हुए बिना इनसान की मुक्ति संभव नहीं है। अतः ऋषि दयानन्द का दलितोद्धार की दृष्टि से भी सब से महान् कार्य यह था कि उन्होंने सबके साथ दलितों के लिए भी वेद-विद्या के दरवाजे खोल दिए। मध्यकाल में स्त्री-शूद्रों के वेदाध्ययन पर जो प्रतिबंध लगाये गए थे, आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने अपने मेधावी क्रांतिकारी चिंतन और व्यक्तित्व से उन सब प्रतिबंधों को अवैदिक सिद्ध कर दिया। ऋषि दयानन्द के दलितोद्धार के इस प्रधान साधन और उपाय में ही उनके द्वारा अपनाये गए अन्य सभी उपायों का समावेश हो जाता है, जैसे-

1) दलित स्त्री-शूद्रों को गायत्री मंत्र का उपदेश देना। 2) उनका उपनयन संस्कार करना। 3) उन्हें होम-हवन करने का अधिकार प्रदान करना। 4) उनके साथ सहभोज करना। 5) शैक्षिक संस्थाओं में शिक्षा वस्त्र और खान पान हेतु उन्हें समान अधिकार प्रदान करना। 6) गृहस्थ जीवन में पदार्पण हेतु युवक-युवतियों के अनुसार (अंतरजातीय) विवाह करने की प्रेरणा देना आदि।

डा. आंबेडकर ने भी स्वीकार किया है कि-‘‘स्वामी दयानन्द द्वारा प्रतिपादित वर्णव्यवस्था बुद्धि गम्य और निरूपद्रवी है।”
डा. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के उपकुलपति, महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध वक्ता प्राचार्य शिवाजीराव भोसले जी ने अपने एक लेख में लिखा है,‘राजपथ से सुदूर दुर्गम गांव में दलित पुत्र को गोदी में बिठाकर सामने बैठी हुई सुकन्या को गायत्री मंत्र पढ़ाता हुआ एकाध नागरिक आपको दिखाई देगा तो समझ लेना वह ऋषि दयानन्द प्रणीत का अनुयायी होगा।’

आर्यसमाजी न होते हुए भी ऋषि दयानन्द की जीवनी के अध्ययन और अनुसंधान में 15 से भी अधिक वर्ष समर्पित करने वाले बंगाली बाबू देवेंद्रनाथ ने दयानन्द की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए लिखा है,‘ वेदों के अनधिकार के प्रश्न ने तो स्त्री जाति और शूद्रों को सदा के लिए विद्या से वंचित किया था और इसी ने धर्म के महंतों और ठेकेदारों की गद्दियां स्थापित की थीं, जिन्होंने जनता के मस्तिष्क पर ताले लगाकर देश को रसातल में पहुंचा दिया था। दयानन्द तो आया ही इसलिए था कि वह इन तालों को तोड़कर मनुष्यों को मानसिक दासता से छुड़ाए।’ ऋषि दयानन्द के काशी शास्त्रार्थ में उपस्थित पं. सत्यव्रत सामश्रमी ने भी स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हुए लिखा है,‘‘शूद्रस्य वेदाधिकारे साक्षात् वेदवचनमपि प्रदर्शितं स्वामि दयानन्देन यथेमां वाचं ….. इति।”

डा. चन्द्रभानु सोनवणे ने लिखा है,‘ मध्यकाल में पौराणिकों ने वेदाध्ययन का अधिकार ब्राह्मण पुरुष तक ही सीमित कर दिया था, स्वामी दयानन्द ने यजुर्वेद के (26/2) मंत्र के आधार पर मानव मात्र को वेद की कल्याणी वाणी का अधिकार सिद्ध कर दिया। स्वामीजी इस यजुर्वेद मंत्र के सत्यार्थ द्रष्टा ऋषि हैं।’

ऋषि दयानन्द के बलिदान के ठीक 10 वर्ष बाद उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए दादा साहेब खापर्डे ने लिखा था,‘ स्वामीजी ने मंदिरों में दबा छिपाकर रखे गए वेद भंडार समस्त मानव मात्र के लिए खुले कर दिये। उन्होंने हिंदू धर्म के वृक्ष को महद् योग्यता से कलम करके उसे और भी अधिक फलदायक बनाया।’

‘वेद भाष्य पद्धति को दयानन्द सरस्वती की देन’ नामक शोध प्रबंध के लेखक डा. सुधीर कुमार गुप्त के अनुसार ‘स्वामी जी ने अपने वेद भाष्य का हिंदी अनुवाद करवाकर वेदज्ञान को सार्वजनिक संपत्ति बना दिया।’

पं. चमूपति जी के शब्दों में ‘दयानन्द की दृष्टि में कोई अछूत न था।उनकी दयाबल-बली भुजाओं ने उन्हें अस्पृश्यता की गहरी गुहा से उठाया और आर्यत्व के पुण्य शिखर पर बैठाया था।’

हिंदी के सुप्रसिद्ध छायावादी महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने लिखा है ‘‘देश में महिलाओं, पतितों तथा जाति-पाति के भेदभाव को मिटाने के लिए महर्षि दयानन्द तथा आर्य समाज से बढ़कर इस नवीन विचारों के युग में किसी भी समाज ने कार्य नहीं किया। आज जो जागरण भारत में दीख पड़ता है, उसका प्रायः सम्पूर्ण श्रेय आर्य समाज को है।’

महाराष्ट्र राज्य संस्कृति संवर्धन मंडल के अध्यक्ष मराठी विश्व कोश निर्माता तर्क-तीर्थ लक्ष्मण शास्त्री जोशी ऋषि दयानन्द की महत्ता लिखते हुए कहते हैं, ‘सैकड़ों वर्षों से हिंदुत्व के दुर्बल होने के कारण भारत बारंबार पराधीन हुआ। इसका प्रत्यक्ष अनुभव महर्षि स्वामी दयानन्द ने किया। इसलिए उन्होंने जन्मना जातिभेद और मूर्तिपूजा जैसी हानिकारक रूढ़ियों का निर्मूलन करने वाले विश्वव्यापी महत्वाकांक्षा युक्त आर्य धर्म का उपदेश किया। इस श्रेणी के दयानन्द यदि हजार वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए होते, तो इस देश को पराधीनता के दिन न देखने पड़ते। इतना ही नहीं, प्रत्युत विश्व के एक महान् राष्ट्र के रूप में भारतवर्ष देदीप्यमान होता।’

-रमेश आर्य

व्याकरण प्रश्नोत्तरी


 


व्याकरण प्रश्नोत्तरी 


प्रश्न :- व्याकरण किसे कहते हैं ?

उत्तर :- शब्दों और वाक्यों को नियमबद्ध कर प्रकृति व प्रत्यय का अर्थ निर्देश पूर्वक विभाग दिखाते हुए उनकी चिकित्सा (व्युत्पत्ति) करने वाले शास्त्र को व्याकरण कहते हैं ।


प्रश्न :- व्याकरण में कितने ग्रंथ हैं ?

उत्तर :- व्याकरण किसी एक शास्त्र का नाम नहीं बल्कि शास्त्रों का संग्रह है । इसमें पाणिनि मुनि के पाँच उपदेश ( अष्टाध्यायी, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिकोष, लिङ्गानुशासनम् ), कात्यायन के वार्तिक और पतंजलि मुनि द्वारा अष्टाध्यायी का भाष्य जिसे महाभाष्य कहा जाता है । ये व्याकरण के प्रसिद्ध ग्रंथ हैं ।


प्रश्न :- व्याकरण की रचना का प्रयोजन क्या है ?

उत्तर :- शब्दों के भ्रष्ट रूप हो जाने से भाषा बिगड़ जाती है और अर्थ भिन्न होने लगते हैं । इन्हीं व्यवधानों का समाधान करने के लिए व्याकरण शास्त्र रचा जाता है । 


प्रश्न :- व्याकरण की रचना किन किन के द्वारा हुई है ?

उत्तर :- समय समय पर व्याकरण की रचना मनुष्यों की बुद्धि के आधार पर ऋषियों द्वारा होती रही है । जिनमें शिव, गर्ग, ब्रह्मा, आग्रगायण, औपनमनव्य, उल्लूक, आपिशल, चन्द्रायण, शाकल्य, कश्यप, काशकृत्सन , पाणिनि, पतंजलि आदि मुनियों के नाम प्रसिद्ध हैं । व्याकरण की सम्पूर्णता केवल पाणिनि मुनि के व्याकरण में ही उपलब्ध है। पाणिनि मुनि के व्याकरण से पूर्व इन्द्र आदि के व्याकरण प्रचलित थे ।


प्रश्न :- अष्टाध्यायी किसे कहते हैं ? 

उत्तर :- आठ अध्यायों की पुस्तक को अष्टाध्यायी कहते हैं । जिनमें पाणिनीय सूत्र होते हैं ।


प्रश्न :- सूत्र किसे कहते हैं ?

उत्तर :- संक्षिप्त नियमों को सूत्र कहा जाता है ।


प्रश्न :- अष्टाध्यायी में कितने सूत्र हैं ?

उत्तर :- अष्टाध्यायी में 3980 के लगभग सूत्र हैं । 


प्रश्न :- सूत्रों से क्या प्रयोजन है ?

उत्तर :- सूत्रों से शब्दों और वाक्यों को आपसे में नियमबद्ध किया जाता है जिससे कि भाषा का मन्तव्य स्पष्ट हो ।


प्रश्न :- धातुपाठ आदि ग्रंथों के क्या प्रयोजन हैं ?

उत्तर :- ये सब अष्टाध्यायी के सहायक ग्रंथ हैं । जिनसे धातुरूप, प्रत्यय आदि के द्वारा शब्द बनाए जाते हैं । 


प्रश्न :- महाभाष्य किसे कहते हैं ?

उत्तर :- अष्टाध्यायी सूत्रों के भाष्य (विस्तृत व्याख्या) को महाभाष्य कहते हैं । जिनसे शब्दों का दार्शनिक, वैज्ञानिक पक्ष जाना जाता है ।


प्रश्न :- पूरे व्याकरण को पढ़ने के लिए कितना समय लगता है ?

उत्तर :- व्याकरण पढ़ने में बुद्धि के अनुसार ४-५ वर्ष तक समय लगता है । 


प्रश्न :- व्याकरण किस विधि से पढ़ा जाता है ?

उत्तर :- सबसे पहले वर्णोच्चारण शिक्षा से उच्चारण शुद्ध किया जाता है और फिर अष्टाध्यायी सूत्रों को कण्ठस्थ करवाया जाता है और बुद्धि अनुसार बाकी के उपदेश धातुपाठ आदि कण्ठस्थ करवाकर अष्टाध्यायी की प्रथमावृत्ति पढ़ाई जाती है जिसमें सूत्रों के अर्थ से लेकर शब्दों की सिद्धी करी जाती है, प्रथमावृत्ति में लगभग 1 से 1.5 वर्ष लगता है । फिर शंका समाधान के साथ अष्टाध्यायी को दूसरी बार पढ़ना द्वितीयानुवृत्ति कहलाता है । द्वितीयानुवृत्ति में लगभग 8 से 10 मास लगते हैं । द्वितीयानुवृत्ति के बाद 1.5 से 2 वर्ष में महाभाष्य पढ़ा जाता है । तब व्याकरण पूर्ण होता है ।


प्रश्न :- व्याकरण पढ़ने से क्या होता है ?

उत्तर :- व्याकरण से वेद की रक्षा होती है। व्याकरण में परिश्रम करने वाले मनुष्य की बुद्धि तीव्र हो जाती है, खरबों शब्दों या अनंत शब्दों के शब्दकोष का वह स्वामी हो जाता है, समस्त शास्त्रों पर उसका अधिकार हो जाता है, वेदार्थ करने में गति हो जाति है, उसकी जिह्वा की शुद्धता होती है और वह व्यवहार कुशल हो जाता है, निरुक्त शास्त्र पढ़ने का वह अधिकारी हो जाता है ऐसे ही कई लाभ होते हैं ।

Sunday, May 7, 2023

मौलाना कैसे बने आर्य प्रचारक



मौलाना कैसे बने आर्य प्रचारक

पंडित भोजदत्त आर्य मुसाफिर आगरा में पंडित लेखराम जी की स्मृति में आर्य मुसाफिर उपदेशक विद्यालय चलाते थे एवं 'आर्य मुसाफ़िर' के नाम से साप्ताहिक पत्र का संपादन भी करते थे। इस्लाम की मान्यताओं की तर्क पूर्ण समीक्षा इस पत्र में छपती रहती थी जिसे पढ़कर अनेक मुसलमान भाई बिना विचार आक्रोशित हो जाते थे। मौलाना गुलाम हैदर भी उत्तेजित होने वालों में से एक थे।
एक दिन उनके मन में विचार आया कि पंडित लेखराम की ही भांति इस्लाम का आलोचक होने के कारण पंडित भोजदत्त भी 'वाजिबुल क़त्ल' (मारे जाने योग्य) है। उन्होंने स्वयं पंडित जी को क़त्ल करने का मनसूबा बनाया और पंडित भोजदत्त के निकट गये। परन्तु जैसे ही पंडित भोजदत्त की दिव्य मूर्ति और भव्य व्यक्तित्व के दर्शन किए तो प्रभावित होकर उनसे इस्लाम सम्बन्धी अपनी विभिन्न शंकाओं का समाधान पूछा।
पंडित जी ने मौलाना जी की सभी शंकाओं का समाधान कर दिया और उन्हें अपने पास रहने का निमंत्रण दिया। पंडित जी की निर्भीकता, धर्माचरण से प्रभावित होकर गुलाम हैदर का हृदय परिवर्तन हो गया।
उन्होंने पंडित भोजदत्त जी को वह छुरा दिखाया, जिससे वे उनका वध करना चाहते थे। सम्पूर्ण भेद प्रकट हो जाने पर भी पंडित भोजदत्त की स्थितप्रज्ञता में कोई अंतर नहीं आया। उनकी आकृति पूर्व की भांति शांत, सौम्य तथा तेजस्विता पूर्ण बनी रही। मौलाना इस्लाम त्याग कर वैदिकधर्मी बन गये एवं अपना नाम पंडित सत्यदेव रख लिया। यह आर्यसमाज की बड़ी उपलब्धि थी।
इस्लाम के मर्मज्ञ विद्वान पंडित देवप्रकाश जी (जिनका जन्म भी इस्लामिक परिवार में हुआ था) ने मौलाना के पंडित सत्यदेव बनने पर एक नज्म लिखी जो 'आर्य मुसाफिर' में प्रकाशित हुई
"तुझे वैदिक धर्म में ए सज्जन आना मुबारिक हो
सच्चाई का जलवा ये दिखलाना मुबारिक हो।
अविद्या की घटनाओं और खिज़ा के तुन्द झोंकों से
निकल कर गुलशने बहदत में आजाना मुबारिक हो"
मौलाना हैदर ने पंडित सत्यदेव बनने के बाद अनेक पुस्तकें वैदिक धर्म प्रचारार्थ लिखी जैसे
1. अर्शसवार (मौलाना मुहम्मद अली ने अर्श की व्याख्या पर एक पुस्तक लिखी थी यह उसका प्रतिउत्तर था)
2. क़ुरान में परिवर्तन (मौलाना मुहम्मद अली की पुस्तक जमा क़ुरान का उत्तर था)
3. अफशाए राज
4. नाराए हैदरी
5. क़ुरान में तहरीफ़
6. क़ुरान में इख्तलाफात
7. इस्लाम का परिचय
8. इस्लामी धर्मानुसार सृष्टि उत्पत्ति
9. रहमत मसीह महाशय की वेदों की तादात नामक पुस्तक का प्रकाशन एवं उत्तराद्ध लेखन
10. शास्त्र परिचय
11. वेद तथा ब्राह्मण ग्रंथों में ओम। आदि
पंडित सत्यदेव आजीवन वैदिक धर्म का प्रचार करते रहे।
स्वामी दयानंद के सन्देश "सत्य को ग्रहण करने एवं असत्य के त्याग के लिए सर्वदा उद्यत रहना चाहिए " को पंडित सत्यदेव ने अपने जीवन में चरित्रार्थ किया।
(साभार- आर्य लेखक कोष- डॉ भवानी लाल भारतीय, पृष्ठ संख्या 308-309)

Monday, May 1, 2023

*समलैंगिकता: एक प्रसव-हीन 'सुप्रीम' बुद्धि विलास*




 


*समलैंगिकता: एक प्रसव-हीन 'सुप्रीम' बुद्धि विलास*

*वैदिक एवं अन्य धार्मिक वैवाहिक मान्यताएं*
आज हमारे देश में समलैंगिक सम्बन्धों को सामाजिक मान्यता देते देते, उन्हें विवाहित दंपति मानकर अधिकार सम्पन्न भी करने की एक दुर्भाग्यपूर्ण व्यग्रता दिखाई दे रही है। इस असंवैधानिक विषय पर सर्वोच्च न्यायालय तक की अप्रत्याशित रुचि, और इसको लगभग मान्यता देते हुए, मुख्य न्यायाधीश महोदय की व्यक्तिगत टिप्पणियां भी अत्यंत निराशाजनक व अशोभनीय प्रतीत हो रही हैं।
आइये, हम सभी, भारतीय वैदिक संस्कृति में विवाह संस्कार से जुड़ी शास्त्र सम्मत मान्यताओं एवम् व्यवस्थाओं का अवलोकन करें।
हमारी संस्कृति में, परम्परा से, वेद और स्मृतिशास्त्र समर्थित संस्कार मनुष्य को सभ्य, शिष्ट, सुसंस्कृत एवं भयमुक्त बनाते हैं। हिन्दू संस्कृति में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि पर्यंत सोलह संस्कारों का विधान है।
इन सोलह संस्कारों में से पंद्रहवां संस्कार है 'विवाह संस्कार ।'
विवाह संस्कार मानव जीवन का बहुत ही महत्त्वपूर्ण संस्कार है। यह सिर्फ दो शरीरों का ही नहीं, अपितु दो आत्माओं का पवित्र मिलन है। विवाह के साथ ही गृहस्थ जीवन प्रारंभ होता है।
यह गृहस्थाश्रम, चारों आश्रमों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि-
(1) बाकी तीन आश्रम-'ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यासाश्रम' इसी गृहस्थाश्रम पर निर्भर हैं।
ये तीनों आश्रमवासी गृहस्थियों से ही भिक्षा मांगकर एवम् विविध प्रकार की सहायता प्राप्त कर जीवन यापन करते हैं।
(2) मनुष्य अपने तीन ऋणों- पितृ ऋण, ऋषि ऋण और देव ऋण से इसी गृहस्थाश्रम में रहता हुआ उर्ऋण, हो पाता है।
(3) इतना ही नहीं, गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि पर्यंत सभी संस्कार विवाह संस्कार के कारण ही संभव हो पाते हैं। कारण स्पष्ट है, विवाह नहीं तो संतानोत्पत्ति नहीं। जब संतान ही उत्पन्न नहीं हो तो कोई भी आश्रम व्यवस्था चलने वाली नहीं है।
(4) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में से तीन पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, और काम की प्राप्ति का साधन भी विवाह ही है।
(5) हमारे शास्त्रों में पत्नी के बिना मनुष्य को यज्ञ तक करने का अधिकारी नहीं माना गया :
*अयज्ञो वा एषः योऽपत्नीकः* (तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.2.2.6)
(6) मनुष्य के मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास के लिए भी विवाह अत्यावश्यक है। विवाह से मनुष्य के दृष्टिकोण में परिवर्तन होता है। उसमें सहनशीलता, त्याग, क्षमा, दान, उदारता जैसे गुणों का विकास भी हो पाता है।
इन्हीं सभी कारणों से वेदों, गृह्यसूत्रों, स्मृति-ग्रंथों, आदि में विवाह संस्कार का विस्तृत वर्णन किया गया है।
'वि' उपसर्ग पूर्वक वह्-प्रापणे धातु से 'घन्' प्रत्यय करने पर 'विवाह' शब्द निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है-*विवाहःविशिष्टवहनम्* । विवाह को विशिष्ट वहन माना गया है क्योंकि विवाह के पश्चात् वर और वधू, दोनों की जिम्मेदारियां, उनके कर्तव्य बहुत ही बढ़ जाते हैं।
महर्षि दयानंद ने अपनी संस्कारविधि में 'विवाह' की परिभाषा इस प्रकार की है,
*सन्तानोत्पत्तये* *वर्णाश्रमानुकूलमुत्तमकार्यसिद्धये च स्त्रीपुरुषयोः सम्बन्धो विवाहः*, अर्थात्, संतान की उत्पत्ति के लिए, वर्णाश्रम के अनुकूल, उचित कार्य करने के लिए स्त्री और पुरुष का संबंध 'विवाह' कहा जाता है।
तैतरीयोपनिषद् (1.11.1) में भी *प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः* अर्थात् 'संतानोत्पत्ति रूपी वंश-परंपरा को विच्छिन्न मत करो'- यह कह कर विवाह की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसे शारीरिक अथवा सामाजिक बंधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे जीवन की निरन्तरता का रूप दिया गया है।
वर, वधू का पाणिग्रहण करते समय वधू से कहता है कि, सौभाग्य और आजीवन साथ रहने के लिए भग, अर्यमा, सविता, आदि देवताओं की कृपा से गृहस्थ धर्म का पालन करने के लिए मैंने तुम्हारा हाथ थामा है,
*गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः।*
*भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः।*
(ऋग्वेद 10.85.36)
इसी कारण विवाह संस्कार को पाणिग्रहण संस्कार भी कहा जाता है।
वधू से आशा की जाती है कि पतिगृह जाकर वह संतान को जन्म देगी, पति-पत्नी दोनों के प्रेम में वृद्धि होगी, गृहस्थाश्रम के कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों को अच्छे से निभाएगी, पति के साथ एक प्राण, एक मन वाली होकर रहेगी तथा बच्चों को अच्छे संस्कार देगी। उन्हें भविष्य के उत्तम नागरिक बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगी।
*इह प्रियं प्रजया समृध्यतामस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि ।*
*एना पत्या तन्वं सं सृजस्वाऽधा जिव्री विदथमा विदाथः ।*
(ऋग्वेद 10.85.27)
यहां ध्यान देने योग्य बात है कि सात फेरे और सप्तपदी, दोनों अलग अलग रस्में हैं। सात फेरों में वर और वधू अग्नि के चारों ओर सात फेरे लेते हैं। और हर फेरे के साथ एक एक वचन लेते हैं जबकि सप्तपदी सात फेरों के बाद होती है जिसमें वर वधू सात कदम साथ चलते हैं और परिवार को आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि अब हम पति-पत्नी के साथ साथ मित्र भी बन गए हैं, और हम आजीवन साथ रहेंगे।
विवाह संस्कार में होने वाली फेरों और वचनों की परम्परा में यह पांचवां फेरा और वचन, अत्यंत प्रासंगिक है:
*इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा।*
*बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ।*
(अथर्ववेद 14.1.54)
वर कहता है- इंद्र, अग्नि, द्यौ, पृथिवी, मातरिश्वा, मित्र, वरुण, भग, अश्विनी कुमार, बृहस्पति, मरुद्, वेद और सोम मेरी इस पत्नी के माध्यम से हमें हमारी संतान प्रदान करने की कृपा करें।
वधू भी यही वचन देती है कि वह भी अपने पति के प्रति प्रेमभाव रखेगी और संतानों को जन्म देकर, परिवार और समाज की भावी पीढ़ी के निर्माण में सहायक होगी ।
इन फेरों के बाद वर वधू सात कदम एक साथ चलते हैं और अन्न, बल, धन, सुख, संतान, और ऋतु के अनुसार व्यवहार करने की तथा परस्पर मित्रता की प्रार्थना करते हैं-
*ओं ईषे एकपदी भव, ओं ऊर्जे द्विपदी भव, ओं रायस्पोषाय त्रिपदी भव, ऊं मायोभव्याय चतुष्पदी भव, ओं प्रजाभ्यः पञ्चपदी भव, ओं ऋतुभ्यः षट्पदी भव, ओं सखे सप्तपदी भव ।* (आ. गृ. सू. 1.7.19)
यह सप्तपदी कहलाती है और इसके उपरांत ईश्वर, समाज और परिवार को साक्षी मानकर, उस दिन से दो अनजान युवक- युवती के बीच, पति-पत्नी के रुप में, मानों अटूट मित्रता हो जाती है *'मैत्री सप्तपदीनमुच्यते।'*
इस प्रकार वेदों के अनुसार विवाह एक आदर्श और सम्मानित सामाजिक प्रक्रिया है, एक मधुर बंधन है। गृहस्थ जैसे पवित्र आश्रम का आधार है जिसका लक्ष्य मात्र शारीरिक भोग विलास नहीं है अपितु यम, नियम, संयम से चलाने वाला यह एक मजबूत और अटूट रिश्ता है जो उत्तरदायित्वों से भरा होने पर भी अभीष्ट है।
स्पष्ट है कि सदियों से, विधर्मियों के सारे कुत्सित प्रयासों के वावजूद भी आज हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान यदि जीवित रह पाई है तो सिर्फ हमारी वैदिक संस्कृति में इसी वैवाहिक संबंध की पवित्रता, शालीनता और निरन्तरता के कारण ही रह पाई है।
यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि संसार के अन्य प्रमुख धर्मों जैसे ईसाई, मुस्लिम, यहूदी और अन्य सभी मतावलंबियों में भी इन प्रसव-हीन, अनुत्पादक (non productive) संबंधों की कोई मान्यता नहीं है। सभी धर्म और मत, पवित्र विवाह संबंधों के द्वारा मनुष्य जाति की निरन्तरता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया को ही स्वीकार करते हैं। प्रकृति भी पशु पक्षियों में नर-मादा के माध्यम से उन योनियों की निरंतरता को सुनिश्चित करती है।
इसीलिए प्रकृति और संस्कृति, दोनों की सभ्य, शिष्ट और शालीन मूल अवधारणाओं को अनावश्यक रूप से तोड़ने पर आमादा कुछ मुट्ठी भर बुद्धि-विलासियों के धूर्त प्रयासों से विचलित नहीं होते हुए, हमें और भी सजग होने, सक्रिय चेतना जगाने और पूरी शक्ति से इस निंदनीय प्रयास का प्रतिकार करने की आवश्यकता है ।
आज यही हम सभी का दायित्व है और यही आज का राष्ट्रधर्म है।
- विपिन मित्र गुप्ता, (सदस्य- Political Sub-committee) हिंद पुनरुत्थान संघ ट्रस्ट
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*समलैंगिकता: एक प्रसव-हीन 'सुप्रीम' बुद्धि विलास*
*वैदिक एवं अन्य धार्मिक वैवाहिक मान्यताएं*
आज हमारे देश में समलैंगिक सम्बन्धों को सामाजिक मान्यता देते देते, उन्हें विवाहित दंपति मानकर अधिकार सम्पन्न भी करने की एक दुर्भाग्यपूर्ण व्यग्रता दिखाई दे रही है। इस असंवैधानिक विषय पर सर्वोच्च न्यायालय तक की अप्रत्याशित रुचि, और इसको लगभग मान्यता देते हुए, मुख्य न्यायाधीश महोदय की व्यक्तिगत टिप्पणियां भी अत्यंत निराशाजनक व अशोभनीय प्रतीत हो रही हैं।
आइये, हम सभी, भारतीय वैदिक संस्कृति में विवाह संस्कार से जुड़ी शास्त्र सम्मत मान्यताओं एवम् व्यवस्थाओं का अवलोकन करें।
हमारी संस्कृति में, परम्परा से, वेद और स्मृतिशास्त्र समर्थित संस्कार मनुष्य को सभ्य, शिष्ट, सुसंस्कृत एवं भयमुक्त बनाते हैं। हिन्दू संस्कृति में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि पर्यंत सोलह संस्कारों का विधान है।
इन सोलह संस्कारों में से पंद्रहवां संस्कार है 'विवाह संस्कार ।'
विवाह संस्कार मानव जीवन का बहुत ही महत्त्वपूर्ण संस्कार है। यह सिर्फ दो शरीरों का ही नहीं, अपितु दो आत्माओं का पवित्र मिलन है। विवाह के साथ ही गृहस्थ जीवन प्रारंभ होता है।
यह गृहस्थाश्रम, चारों आश्रमों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि-
(1) बाकी तीन आश्रम-'ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यासाश्रम' इसी गृहस्थाश्रम पर निर्भर हैं।
ये तीनों आश्रमवासी गृहस्थियों से ही भिक्षा मांगकर एवम् विविध प्रकार की सहायता प्राप्त कर जीवन यापन करते हैं।
(2) मनुष्य अपने तीन ऋणों- पितृ ऋण, ऋषि ऋण और देव ऋण से इसी गृहस्थाश्रम में रहता हुआ उर्ऋण, हो पाता है।
(3) इतना ही नहीं, गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि पर्यंत सभी संस्कार विवाह संस्कार के कारण ही संभव हो पाते हैं। कारण स्पष्ट है, विवाह नहीं तो संतानोत्पत्ति नहीं। जब संतान ही उत्पन्न नहीं हो तो कोई भी आश्रम व्यवस्था चलने वाली नहीं है।
(4) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में से तीन पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, और काम की प्राप्ति का साधन भी विवाह ही है।
(5) हमारे शास्त्रों में पत्नी के बिना मनुष्य को यज्ञ तक करने का अधिकारी नहीं माना गया :
*अयज्ञो वा एषः योऽपत्नीकः* (तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.2.2.6)
(6) मनुष्य के मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास के लिए भी विवाह अत्यावश्यक है। विवाह से मनुष्य के दृष्टिकोण में परिवर्तन होता है। उसमें सहनशीलता, त्याग, क्षमा, दान, उदारता जैसे गुणों का विकास भी हो पाता है।
इन्हीं सभी कारणों से वेदों, गृह्यसूत्रों, स्मृति-ग्रंथों, आदि में विवाह संस्कार का विस्तृत वर्णन किया गया है।
'वि' उपसर्ग पूर्वक वह्-प्रापणे धातु से 'घन्' प्रत्यय करने पर 'विवाह' शब्द निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है-*विवाहःविशिष्टवहनम्* । विवाह को विशिष्ट वहन माना गया है क्योंकि विवाह के पश्चात् वर और वधू, दोनों की जिम्मेदारियां, उनके कर्तव्य बहुत ही बढ़ जाते हैं।
महर्षि दयानंद ने अपनी संस्कारविधि में 'विवाह' की परिभाषा इस प्रकार की है,
*सन्तानोत्पत्तये* *वर्णाश्रमानुकूलमुत्तमकार्यसिद्धये च स्त्रीपुरुषयोः सम्बन्धो विवाहः*, अर्थात्, संतान की उत्पत्ति के लिए, वर्णाश्रम के अनुकूल, उचित कार्य करने के लिए स्त्री और पुरुष का संबंध 'विवाह' कहा जाता है।
तैतरीयोपनिषद् (1.11.1) में भी *प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः* अर्थात् 'संतानोत्पत्ति रूपी वंश-परंपरा को विच्छिन्न मत करो'- यह कह कर विवाह की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसे शारीरिक अथवा सामाजिक बंधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे जीवन की निरन्तरता का रूप दिया गया है।
वर, वधू का पाणिग्रहण करते समय वधू से कहता है कि, सौभाग्य और आजीवन साथ रहने के लिए भग, अर्यमा, सविता, आदि देवताओं की कृपा से गृहस्थ धर्म का पालन करने के लिए मैंने तुम्हारा हाथ थामा है,
*गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः।*
*भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः।*
(ऋग्वेद 10.85.36)
इसी कारण विवाह संस्कार को पाणिग्रहण संस्कार भी कहा जाता है।
वधू से आशा की जाती है कि पतिगृह जाकर वह संतान को जन्म देगी, पति-पत्नी दोनों के प्रेम में वृद्धि होगी, गृहस्थाश्रम के कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों को अच्छे से निभाएगी, पति के साथ एक प्राण, एक मन वाली होकर रहेगी तथा बच्चों को अच्छे संस्कार देगी। उन्हें भविष्य के उत्तम नागरिक बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगी।
*इह प्रियं प्रजया समृध्यतामस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि ।*
*एना पत्या तन्वं सं सृजस्वाऽधा जिव्री विदथमा विदाथः ।*
(ऋग्वेद 10.85.27)
यहां ध्यान देने योग्य बात है कि सात फेरे और सप्तपदी, दोनों अलग अलग रस्में हैं। सात फेरों में वर और वधू अग्नि के चारों ओर सात फेरे लेते हैं। और हर फेरे के साथ एक एक वचन लेते हैं जबकि सप्तपदी सात फेरों के बाद होती है जिसमें वर वधू सात कदम साथ चलते हैं और परिवार को आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि अब हम पति-पत्नी के साथ साथ मित्र भी बन गए हैं, और हम आजीवन साथ रहेंगे।
विवाह संस्कार में होने वाली फेरों और वचनों की परम्परा में यह पांचवां फेरा और वचन, अत्यंत प्रासंगिक है:
*इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा।*
*बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ।*
(अथर्ववेद 14.1.54)
वर कहता है- इंद्र, अग्नि, द्यौ, पृथिवी, मातरिश्वा, मित्र, वरुण, भग, अश्विनी कुमार, बृहस्पति, मरुद्, वेद और सोम मेरी इस पत्नी के माध्यम से हमें हमारी संतान प्रदान करने की कृपा करें।
वधू भी यही वचन देती है कि वह भी अपने पति के प्रति प्रेमभाव रखेगी और संतानों को जन्म देकर, परिवार और समाज की भावी पीढ़ी के निर्माण में सहायक होगी ।
इन फेरों के बाद वर वधू सात कदम एक साथ चलते हैं और अन्न, बल, धन, सुख, संतान, और ऋतु के अनुसार व्यवहार करने की तथा परस्पर मित्रता की प्रार्थना करते हैं-
*ओं ईषे एकपदी भव, ओं ऊर्जे द्विपदी भव, ओं रायस्पोषाय त्रिपदी भव, ऊं मायोभव्याय चतुष्पदी भव, ओं प्रजाभ्यः पञ्चपदी भव, ओं ऋतुभ्यः षट्पदी भव, ओं सखे सप्तपदी भव ।* (आ. गृ. सू. 1.7.19)
यह सप्तपदी कहलाती है और इसके उपरांत ईश्वर, समाज और परिवार को साक्षी मानकर, उस दिन से दो अनजान युवक- युवती के बीच, पति-पत्नी के रुप में, मानों अटूट मित्रता हो जाती है *'मैत्री सप्तपदीनमुच्यते।'*
इस प्रकार वेदों के अनुसार विवाह एक आदर्श और सम्मानित सामाजिक प्रक्रिया है, एक मधुर बंधन है। गृहस्थ जैसे पवित्र आश्रम का आधार है जिसका लक्ष्य मात्र शारीरिक भोग विलास नहीं है अपितु यम, नियम, संयम से चलाने वाला यह एक मजबूत और अटूट रिश्ता है जो उत्तरदायित्वों से भरा होने पर भी अभीष्ट है।
स्पष्ट है कि सदियों से, विधर्मियों के सारे कुत्सित प्रयासों के वावजूद भी आज हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान यदि जीवित रह पाई है तो सिर्फ हमारी वैदिक संस्कृति में इसी वैवाहिक संबंध की पवित्रता, शालीनता और निरन्तरता के कारण ही रह पाई है।
यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि संसार के अन्य प्रमुख धर्मों जैसे ईसाई, मुस्लिम, यहूदी और अन्य सभी मतावलंबियों में भी इन प्रसव-हीन, अनुत्पादक (non productive) संबंधों की कोई मान्यता नहीं है। सभी धर्म और मत, पवित्र विवाह संबंधों के द्वारा मनुष्य जाति की निरन्तरता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया को ही स्वीकार करते हैं। प्रकृति भी पशु पक्षियों में नर-मादा के माध्यम से उन योनियों की निरंतरता को सुनिश्चित करती है।
इसीलिए प्रकृति और संस्कृति, दोनों की सभ्य, शिष्ट और शालीन मूल अवधारणाओं को अनावश्यक रूप से तोड़ने पर आमादा कुछ मुट्ठी भर बुद्धि-विलासियों के धूर्त प्रयासों से विचलित नहीं होते हुए, हमें और भी सजग होने, सक्रिय चेतना जगाने और पूरी शक्ति से इस निंदनीय प्रयास का प्रतिकार करने की आवश्यकता है ।
आज यही हम सभी का दायित्व है और यही आज का राष्ट्रधर्म है।
- विपिन मित्र गुप्ता