Tuesday, March 31, 2015

वेद में वर्णित ईश्वर को जानिये


वेद में वर्णित ईश्वर को जानिये

डॉ विवेक आर्य

हमारे नवबौद्ध अम्बेडकरवादी मित्र प्रदीप नागदेव जी ने एक चित्र को बड़े जोश में आकर सोशल मीडिया में प्रचारित किया हैं जिसमें कूड़े के ढेर में पड़ी हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों और चित्रों पर कुत्तो को पिशाब करते हुए दिखाया गया हैं। उत्तेजित होने की इसमें कोई आवश्यकता नहीं हैं। वैसे यह दृश्य व्यापक रूप से किसी भी सार्वजानिक कूड़ेदान में देखा जा सकता हैं और चित्र भी सब तरह के दिखने को मिलते हैं हिन्दू देवी देवता, महात्मा बुद्ध, डॉ आंबेडकर, ईसा मसीह, क़ुरान की आयत, मक्का शरीफ का फोटो, अजमेर की दरगाह का फोटो,साईं बाबा का फोटो आदि। आपने शिवरात्रि पर शिवलिंग पर चूहे वाली कथा तो सुनी ही होगी जिसने मूलशंकर को स्वामी दयानंद बनने के लिए प्रेरित किया एवं उसका परिणाम यह निकला की स्वामी दयानंद ईश्वर की खोज में गृह त्याग कर निकले। स्वामी दयानंद को सच्चे शिव के दर्शन निराकार ईश्वर के रूप में मनुष्य की आत्मा में ही हुए न की मूर्ति अथवा प्रतीक पूजा के रूप में हुए। निराकार ईश्वर की उपासना में न किसी मंदिर, न किसी मध्यस्थ, न किसी सिफारिश, न किसी संसाधन की आवश्यकता हैं। निराकार ईश्वर को न कोई तोड़ सकता हैं। न कोई चुरा सकता हैं। न कोई अपमानित कर सकता हैं।  हम लोग इसीलिए वेद वर्णित सर्वव्यापक, अजन्मा  एवं निराकार ईश्वर की उपासन करते हैं। वेदों से ईश्वर के अजन्मा, सर्वव्यापक, अजर, निराकार होने के प्रमाण।

ईश्वर के अजन्मा होने के प्रमाण

१. न जन्म लेने वाला (अजन्मा) परमेश्वर न टूटने वाले विचारों से पृथ्वी को धारण करता हैं। ऋग्वेद १/६७/३

२. एकपात अजन्मा परमेश्वर हमारे लिए कल्याणकारी होवे। ऋग्वेद ७/३५/१३

३. अपने स्वरुप से उत्पन्न न होने वाला अजन्मा परमेश्वर गर्भस्थ जीवात्मा और सब के ह्रदय में विचरता हैं। यजुर्वेद ३१/१९

४. परमात्मा सर्वशक्तिमान, स्थूल, सूक्षम तथा कारण शरीर से रहित, छिद्र रहित, नाड़ी आदि के साथ सम्बन्ध रूप बंधन से रहित, शुद्ध, अविद्यादि दोषों से रहित, पाप से रहित सब तरफ से व्याप्त हैं। जो कवि तथा सब जीवों की मनोवृतिओं को जानने वाला और दुष्ट पापियों का तिरस्कार करने वाला हैं। अनादी स्वरुप जिसके संयोग से उत्पत्ति वियोग से विनाश, माता-पिता गर्भवास जन्म वृद्धि और मरण नहीं होते वह परमात्मा अपने सनातन प्रजा (जीवों) के लिए यथार्थ भाव से वेद द्वारा सब पदार्थों को बनाता हैं।- यजुर्वेद ४०/८

ईश्वर सर्वव्यापक हैं

१. अंत रहित ब्रह्मा सर्वत्र फैला हुआ हैं। अथर्ववेद १०/८/१२

२. धूलोक और पृथ्वीलोक जिसकी (ईश्वर की) व्यापकता नहीं पाते। ऋग्वेद १/५२/१४

३. हे प्रकाशमय देव! आप और से सबको देख रहे हैं। सब आपके सामने हैं। कोई भी आपके पीछे हैं देव आप सर्वत्र व्यापक हैं। ऋग्वेद १/९७/६

४. वह ब्रह्मा मूर्खों की दृष्टी में चलायमान होता हैं। परन्तु अपने स्वरुप से (व्यापक होने के कारण) चलायमान नहीं होता हैं। वह व्यापकता के कारण देश काल की दूरी से रहित होते हुए भी अज्ञान की दूरिवश दूर हैं और अज्ञान रहितों के समीप हैं। वह इस सब जगत वा जीवों के अन्दर और वही इस सब से बाहर भी विद्यमान हैं। यजुर्वेद ४०/५

५. सर्व उत्पादक परमात्मा पीछे की ओर और वही परमेश्वर आगे, वही प्रभु ऊपर, और वही सर्वप्रेरक नीचे भी हैं। वह सर्वव्यापक, सबको उत्पन्न करने वाला हमें इष्ट पदार्थ देवे और वही हमको दीर्घ जीवन देवे।ऋग्वेद १०/२६/१४

६. जो रूद्र रूप परमात्मा अग्नि में हैं जो जलों ओषधियों तथा तालाबों के अन्दर अपनी व्यापकता से प्रविष्ट हैं।- अथर्ववेद ७/८७/१

ईश्वर अजर (जिन्हें बुढ़ापा नहीं आता) हैं

१. हे अजर परमात्मा, आपके रक्षणों के द्वारा मन की कामना प्राप्त करें। ऋग्वेद ६/५/७

२. जो जरा रहित (अजर) सर्व ऐश्वर्य संपन्न भगवान को धारण करता हैं वह शीघ्र ही अत्यन्त बुद्धि को प्राप्त करता हैं। ऋग्वेद ६/१ ९/२

३. धीर ,अजर, अमर परमात्मा को जनता हुआ पुरुष मृत्यु या विपदा से नहीं घबराता हैं।- अथर्ववेद १०/८/४४

४. हम उसी महान श्रेष्ठ ज्ञानी अत्यंत उत्तम विचार शाली अजर परमात्मा की विशेष रूप से प्रार्थना करें।- ऋग्वेद ६/४९/१०

ईश्वर निराकार हैं

१. परमात्मा सर्वशक्तिमान, स्थूल, सूक्षम तथा कारण शरीर से रहित, छिद्र रहित, नाड़ी आदि के साथ सम्बन्ध रूप बंधन से रहित, शुद्ध, अविद्यादि दोषों से रहित, पाप से रहित सब तरफ से व्याप्त हैं। जो कवि तथा सब जीवों की मनोवृतिओं को जानने वाला और दुष्ट पापियों का तिरस्कार करने वाला हैं। अनादी स्वरुप जिसके संयोग से उत्पत्ति वियोग से विनाश, माता-पिता गर्भवास जन्म वृद्धि और मरण नहीं होते वह परमात्मा अपने सनातन प्रजा (जीवों) के लिए यथार्थ भाव से वेद द्वारा सब पदार्थों को बनाता हैं।-यजुर्वेद ४०/८

२. परमेश्वर की प्रतिमा, परिमाण उसके तुल्य अवधिका साधन प्रतिकृति आकृति नहीं हैं अर्थात परमेश्वर निराकार हैं। यजुर्वेद ३२/३

३. अखिल अखिल ऐशवर्य संपन्न प्रभु पाँव आदि से रहित निराकार हैं। ऋग्वेद ८/६९/११

४. ईश्वर सबमें हैं और सबसे पृथक हैं। (ऐसा गुण तो केवल निराकार में ही हो सकता हैं) यजुर्वेद ३१/१

५. जो परमात्मा प्राणियों को सब और से प्राप्त होकर, पृथ्वी आदि लोकों को सब ओर से व्याप्त होकर तथा ऊपर निचे सारी पूर्व आदि दिशाओं को व्याप्त होकर, सत्य के स्वरुप को सन्मुखता से सम्यक प्रवेश करता हैं, उसको हम कल्प के आदि में उत्पन्न हुई वेद वाणी को जान कर अपने शुद्ध अन्तकरण से प्राप्त करें। (ऐसा गुण तो केवल निराकार में ही हो सकता हैं) यजुर्वेद ३२/११

इनके अलावा और भी अनेक मंत्र से वेदों में ईश्वर का अजन्मा, निराकार, सर्वव्यापक, अजर आदि सिद्ध होता हैं। जिस दिन मनुष्य जाति वेद में वर्णित ईश्वर को मानने लगेगी उस दिन संसार से धर्म के नाम पर हो रहे सभी प्रकार के अन्धविश्वास एवं पापकर्म समाप्त हो जायेगे।


Monday, March 30, 2015

महात्मा बुद्ध एवं पुनर्जन्म


महात्मा बुद्ध एवं पुनर्जन्म


डॉ विवेक आर्य


महात्मा बुद्ध पुनर्जन्म को मानते थे। डॉ अम्बेडकर अपनी पुस्तक भगवान बुद्ध और उनका धम्म (पृष्ठ संख्या 296-301, संस्करण 2010) में महात्मा बुद्ध की पुनर्जन्म में आस्था को स्वीकार करते है। वह भौतिक शरीर का मृत्यु के पश्चात नाश होना एवं पुनर्जन्म में दोबारा संयोग होना भी स्वीकार करते है। आत्मा विषय के पुनर्जन्म को लेकर महात्मा बुद्ध अपनी स्थिति को स्पष्ट नहीं करते। इस प्रश्न के उत्तर में की मृत्यु के पश्चात क्या तथागत मरणान्तर रहते हैं महात्मा बुद्ध इस पर अव्याख्यायित अर्थात व्याख्या रहित रह जाते हैं। महात्मा बुद्ध के मौन धारण करने का रहस्य योगिराज श्री कृष्ण जी स्पष्ट करते हैं जब वह कहते हैं कि हे अर्जुन तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैंतुम उन्हें नहीं जानते, मैं जानता हूँ (गीता 4/5)। महात्मा बुद्ध ने अपने सत्यवादी गुण का अनुसरण करते हुए इस मौन धारण करना उचित समझा की पुनर्जन्म में हमारी क्या स्थिति होगी यह हमें नहीं ज्ञात मगर पुनर्जन्म अवश्य होता हैं।
धम्मपद में महात्मा बुद्ध पुनर्जन्म को मानते हुए लिखते हैं इस कायरूपी घर (शरीर) को बनाने वाले की खोज में (मैं) बिना रुके अनेक जन्मों तक (भव-) संसरण करता रहा, किन्तु बार बार दु:ख (मय) जीवन ही हाथ लगे। (सन्दर्भ -धम्मपद जरवग्गो 153)
   अगले ही सूत्र में महत्मा बुद्ध पुनर्जन्म से मुक्ति के कारण को स्पष्ट रूप से ईश्वर प्राप्ति बता रहे हैं - ऐ घर बनाने वाले! (अब) तू देख लिया गया है, (अब) फिर (तू) (नया) घर नहीं बना सकता। तेरी सारी कड़ियाँ टूट गई हैं और घर का शिखर भी विशृंखलित हो गया है। चित पूरी तरह संस्काररहित हो गया है और तृष्णाओं का क्षय (निर्वाण) हो गया है। (सन्दर्भ -धम्मपद जरवग्गो 154)
यही तथ्य महापरिनिर्वाण सूक्त में पाठ 10 में भी यही सन्देश मिलता है कि तथागत को जानने के पश्चात ही जन्म मरण से मुक्ति संभव हैं। जब तब यह ज्ञान नहीं होगा तब पुनर्जन्म से मुक्ति संभव नहीं हैं।
बुद्ध सुत्त में ख्यातिप्राप्त विद्वान रिस डेविड लिखते हैं कि महात्मा बुद्ध के अनुसार चार आर्य सत्य को जाने बिना मुक्ति संभव नहीं हैं। जब तक इन सत्यों का जाना नहीं जायेगा तब तक मुक्ति संभव नहीं हैं।
बुद्धबग्ग में चार आर्य सत्यों के विषय में लिखा हैं कि जो भली प्रकार से प्रज्ञा से देखता है- १. दुःख २. दुःख की उत्पत्ति ३. दुःख का विनाश ४. दुःख का उपशमन करने वाला आर्य अष्टांगिक मार्ग उसका यह शरण ग्रहण करके मनुष्य सब दुःख से मुक्त होता हैं।
स्वामी दयानंद जन्म-मरण रूपी बंधन से छूटना इस जीवन का उद्देश्य मानते है एवं जब तक मोक्ष प्राप्ति नहीं होती आत्मा को बार बार शरीर धारण करना पड़ता है और इसी को पुनर्जन्म कहते हैं। इन सभी प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं कि महात्मा बुद्ध द्वारा पुनर्जन्म को स्वीकार किया गया हैं।

   अब प्रश्न उठता है की पुनर्जन्म किसका होता हैं। मनुष्य जन्म का अर्थ पञ्च भूत भौतिक पदार्थों एवं आत्मा का संयोग हैं जबकि मृत्यु दोनों का वियोग हैं। प्रकृति के भौतिक पदार्थ जड़ हैं अर्थात स्वयं से संयुक्त नहीं हो सकते इसलिए किसी चेतन सत्ता द्वारा ही इस कार्य को संपन्न किया जा सकता हैं। सम्पूर्ण जगत में केवल दो चेतन सत्ता हैं एक ईश्वर एवं दूसरा आत्मा। आत्मा चेतन हैं मगर अल्पज्ञ, अल्पसामर्थ्य एवं अल्पशक्तिवान हैं जबकि ईश्वर सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान एवं न्यायकारी चेतन सत्ता हैं। अलपज्ञ आत्मा में यह सामर्थ्य नहीं हैं की वह अपने आपको एक शरीर से  दूसरे शरीर में प्रवेश कर सके, अपने किये हुए कर्म का यथोचित फल स्वयं को दे सके, अनंत जीवों के कार्यों की कर्मफल व्यवस्था को विधिवित चला सके, । अगर ऐसा होता तो कोई भी आत्मा पशु, दरिद्र आदि का शरीर धारण नहीं करना चाहता अपितु केवल और केवल श्रेष्ठ योनियों में जाना चाहता, न ही किसी अशुभ कर्म का फल भोगना चाहता।
                     ईश्वर के अतिरिक्त आत्माओं को दोबारा शरीर धारण कराने की क्षमता और किसी में नहीं है इसलिए पुनर्जन्म में विश्वास एक प्रकार से ईश्वर में विश्वास रखने के समान हैं। वेदादि शास्त्रों में ईश्वर को  अर्यमा(सब जीवों के पाप-पुण्य की यथावत व्यवस्था करने वाला), कर्माध्यक्ष (किस कर्म का फल कब, कहाँ, किसे।किन साधनों के द्वारा, किन परिस्तिथियों में यथावत भोगा जा रहा सकता है, इसे जानना वाला), यम (सभी प्राणियों के कर्मफल का नियमन करने वाला), असुनेता (प्राणों को एक शरीर से दूसरे से दूसरे शरीर में लेकर जाने वाला) कहा गया हैं। वेदादि शास्त्र पुनर्जन्म के सिद्धांत का अनेक स्थानों में वर्णन इस प्रकार से करते है-

 1. हे सुखदायक परमेश्वर! आप कृपा करे पुनर्जन्म में हमारे बीच में उत्तम नेत्र आदि सब इन्द्रिया स्थापित कीजिये। तथा प्राण अर्थात मन, बुद्धि, चित, अहंकार, बल, पराक्रम आदि युक्त शरीर पुनर्जन्म में कीजिये । (ऋग्वेद 8/1/23/1)
2. हे सर्वशक्तिमान! आपके अनुग्रह से हमारे लिए वारंवार पृथ्वी प्राण को, प्रकाश चक्षु को और अंतरिक्ष स्थानादि अवकाशों को देते रहें। पुनर्जन्म में सोम अर्थात औषधियों का रस हमको उत्तम शरीर देने में अनुकूल रहे तथा पुष्टि करनेवाला परमेश्वर कृपा करके सब जन्मों में हमको सब दुःख निवारण करनेवाली पथ्यरूप स्वस्ति को देवे । (ऋग्वेद 8/1/23/2)
3. हे सर्वज्ञ ईश्वर! जब जब हम जन्म लेवें, तब तब हमको शुद्ध मन. पूर्ण आयु, आरोग्यता, प्राण, कुशलतायुक्त जीवात्मा, उत्तम चक्षु और श्रोत्र प्राप्त हो। (यजुर्वेद 4/15)
4. हे जगदीश्वर! आप की कृपा से पुनर्जन्म में मन आदि ग्यारह इन्द्रिय मुझको प्राप्त हो अर्थात सर्वदा मनुष्य देह ही प्राप्त होता रहे । (अथर्ववेद 7/67/1)
5. जो मनुष्य पुनर्जन्म में धर्माचरण करता हैं, उस धर्माचरण के फल से अनेक उत्तम शरीरों को धारण करता और अधर्मात्मा मनुष्य नीच शरीर को प्राप्त होता हैं । (अथर्ववेद 5/1/1/2)
 6. जीवों को माता और पिता के शरीर में प्रवेश करके जन्मधारण करना, पुन: शरीर को छोड़ना, फिर जन्म को प्राप्त होना, वारंवार होता हैं । (यजुर्वेद 19/47)
7. तुम तुम शरीरधारी रूप में उत्पन्न होकर अनेक योनियों में अनेक प्रकार के मुखों वाले भी हो जाते हो । (अथर्ववेद 10/8/27)
8. यह जीवात्मा कभी किसी का पिता, कभी पुत्र, कभी बड़ा, कभी छोटा हो जाता हैं ।  (अथर्ववेद 10/8/28)
9. मैंने इन्द्रियों के रक्षक अमर इस आत्मा का साक्षात्कार किया जो जन्म-मरण के मार्गों से विचरण करता रहता हैं। वह अपने अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार और प्रीतीपूर्वक अनेक योनियों में संसार के अंदर भ्रमण करता रहता हैं । (ऋग्वेद 1/164/31)
10. हे जीवों! तुम जब शरीर को छोड़ो तब यह शरीर दाह के पीछे पृथ्वी, अग्नि आदि और जलों के बीच देह-धारण के कारण को प्राप्त हो और माताओं के उदरों में वास करके फिर शरीर को प्राप्त होता हैं । (यजुर्वेद 12/38)
11. जीव माता के गर्भ में बार बार प्रविष्ट होता हैं और अपने शुभ कर्मानुसार सत्यनिष्ठ विद्वानों के घर में जन्म लेता हैं।(अथर्ववेद 14/4/20)

इसी प्रकार से निरुक्त में यास्काचार्य ने पुनर्जन्म को माना हैं।
1. मैंने अनेक वार जन्ममरण को प्राप्त होकर नाना प्रकार के हज़ारों गर्भाशयों का सेवन किया। (निरुक्त 13/19/1)
2. अनेक प्रकार के भोजन किये, अनेक माताओं के स्तनों का दुग्ध पिया, अनेक माता-पिता और सुह्रदयों को देखा। (निरुक्त 13/19/2)
3. मैंने गर्भ में नीचे मुख ऊपर पग इत्यादि नाना प्रकार की पीड़ाओं से युक्त होके अनेक जन्म धारण किये।(निरुक्त 13/19/7)
 दर्शन ग्रन्थ भी पुनर्जन्म का समर्थन करते हैं
1. हर एक प्राणियों की यह इच्छा नित्य देखने में आती हैं कि मैं सदैव सुखी बना रहूँ। मरूं नहीं। यह इच्छा कोई भी नहीं करता कि मैं न होऊं। ऐसी इच्छा पुनर्जन्म के अभाव से कभी नहीं हो सकती। यह "अभिनिवेश" क्लेश कहलाता हैं, जोकि कृमि पर्यन्त को भी मरण का भय बराबर होता हैं। यह व्यवहार पुनर्जन्म की सिद्धि को जनाता हैं । (पतंजलि योगदर्शन 2/9)
2. जो उत्पन्न अर्थात शरीर को धारण करता हैं, वह मरण अर्थात शरीर को छोड़ के, पुनरुत्पन्न दूसरे शरीर को भी अवश्य प्राप्त होता हैं। इस प्रकार मर के पुनर्जन्म लेने को प्रेत्यभाव कहते हैं । (न्यायदर्शन 1/1/19)
गीता  में आता हैं की जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्रों को ग्रहण कर लेता हैं उसी प्रकार आत्मा पुराने व्यर्थ शरीरों को त्याग कर नवीन भौतिक शरीरों को धारण कर लेता हैं। (गीता 2/22)
 इस प्रकार से रामायण, महाभारत, उपनिषद, पुराण आदि ग्रन्थ भी पुनर्जन्म के सिद्धांत का पुरजोर समर्थन करते हैं।
पुनर्जन्म में विश्वास रखने वाले महात्मा बुद्ध इस आधार पर अनीश्वरवादी नहीं अपितु आस्तिक सिद्ध होते हैं।


सन्दर्भ ग्रन्थ-

1. बौद्धमत और वैदिक धर्म- स्वामी धर्मानन्द
2. Mahatma Buddha an Aryan reformer Dharamdev Vidyamartnand
3. गीता रहस्य- बाल गंगाधर तिलक
4. भूमिका भास्कर-स्वामी विद्यानंद सरस्वती
5. भगवान बुद्ध और उनका धम्म- डॉ अम्बेडकर
6. धम्मपद
7. वेद और उसकी वैज्ञानिकता- आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति
8. सत्यार्थ प्रकाश- स्वामी दयानंद सरस्वती
9. निरुक्त भाष्य- चन्द्रगुप्त वेदालंकार
10. कुलयात आर्य मुसाफिर- पंडित लेखराम आर्य मुसाफिर
11. ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका- स्वामी दयानंद सरस्वती
12. बौद्ध संस्कृति- राहुल सांकृत्यायन
13. बुद्धचर्यया- राहुल सांकृत्यायन
14. यजुर्वेद भाष्य- स्वामी दयानंद
15 ऋग्वेद भाष्य- स्वामी दयानंद

Friday, March 27, 2015

श्री रामचन्द्र जी के जन्मदिवस के अवसर उनके महान जीवन से प्रेरणा


 श्री रामचन्द्र जी के जन्मदिवस के अवसर उनके महान जीवन से प्रेरणा

                   आज आर्यकुलभूषण, क्षत्रिय कुलदीवाकर, वेदवित, वेदोक्त कर्मप्रचारक, देशरक्षक, शुर सिरताज, रघुकुलभानु, दशरथात्मज, महाराजाधिराज रामचन्द्रजी का जन्म दिवस है। सदियों से श्री राम जी का पावन चरित्र हमें प्रेरणा देता आ रहा हैं। यह कहने में हमें गर्व होता हैं की यदि मनुष्य रामचरित के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करें तो अवश्य मुक्ति पद को प्राप्त हो जाएँ।

                      श्री रामचन्द्र जी का जीवनकाल देखिये। जिस प्रकार माता कौशलया राजमहल में रहकर वेद का स्वाध्याय एवं अग्निहोत्र करती थी उन्हीं वेदों के स्वाध्याय के लिए श्री राम अपने अन्य भाइयों के साथ वसिष्ठ मुनि जी के आश्रम में गए। इससे यही शिक्षा मिलती हैं की बिना वेदों के स्वाध्याय, चिंतन, मनन एवं वेद की शिक्षाओं के अनुसार जीवन यापन करने से कोई भी व्यक्ति महान नहीं बन सकता। शिक्षा काल के पश्चात ब्रह्मचर्य, विद्या एवं धर्म का प्रताप देखिये की अभी रामचन्द्र जी युवा ही थे की उनके पिता महाराज दशरथ ने उन्हें वन में राक्षसों का अंत करने के लिए ऋषि विश्वामित्र के संग भेज दिया। यह ऋषि मुनियों के प्रताप एवं तपस्या का भी प्रभाव था जो राजा लोग उनकी सेवा में सत्संग एवं जीवन निर्माण हेतु अपनी संतानों को भेजते थे।
                     सीता स्वयंवर में शिव धनुष के तोड़ने से न केवल श्री राम जी की शूरवीरता सिद्ध होती हैं अपितु यह भी सिद्ध होता हैं की उस काल में वधु वर का चयन पूर्ण विद्या प्राप्ति के पश्चात, माता-पिता की आज्ञा से वर के गुण, कर्म और स्वभाव देखकर करती थी। इससे न केवल वर-वधु में प्रीति रहती थी अपितु उनकी संतान भी स्वस्थ एवं शुद्ध बुद्धि वाली उत्पन्न होती थी। आज के समाज में वासना में बहकर बेमेल विवाह करने के कारण ही कमजोर संतान उत्पन्न होती हैं और गृहस्थ जीवन भी क्लेशों के रूप में व्यतीत होता हैं।
                        कैकयी द्वारा राजा दशरथ के साथ युद्ध में भाग लेना यह सिद्ध करता हैं कि उस काल में स्त्रियां अबला नहीं अपितु क्षत्राणी होती थी जो अपनी वीरता के प्रताप से बड़े बड़े युद्धों में भाग लेती थी। वही कैकयी जो राजा दशरथ की प्रिय स्त्री थी पर बुरे संग का प्रभाव देखिये की दासी मंथरा की बातों में बहक कर तथा पुत्र मोह में आकर उसने श्री राम जी को वनवास दिलवाया।इससे यही सिद्ध होता है कि जैसे बुरी संगत से बुद्धि नष्ट होती है वैसे ही वेद के मंत्र का सन्देश कि एक से अधिक पत्नी रखने वाला ठीक उस प्रकार से पिसता है जिस प्रकार से पत्थर के चक्की के दो पाटों में गेहूँ पिसता हैं सिद्ध होता हैं। दशरथ ने न केवल पुत्र वियोग का दुःख सहा अपितु संसार में अपयश का भागी भी इसी कारण से बना।
                        श्री राम जी की पितृभक्ति भी हमारे लिए आदर्श हैं। केवल राज का ही त्याग नहीं किया अपितु वनवास भी स्वीकार किया। भाई लक्ष्मण का भ्रातृ प्रेम देखिये की  राज्य का सुख, माता पिता की शीतल छाया,पत्नी का संग त्याग कर केवल अपने भाई की सेवा सुश्रुता के लिए वन का आश्रय लिया और भाई भरत का भ्राति प्रेम देखिये की जिस सिंहासन के लिए भरत की माता कैकयी ने राम को वनवास दिया उसी सिंहासन का त्याग कर राम जी की चरण पादुका को प्रतीक रूप में रखकर राजमहल का त्याग कर कुटिया में रहकर 14 वर्ष त्यागी एवं तपस्वी समान जीवन व्यतीत किया। आज के समाज में दशरथ पुत्रों के समान अगर परिवार में भाइयों में प्रेम हो तो आदर्श समाज क्यों स्थापित नहीं हो सकता?
                    वन में प्रवास करते समय श्री राम एवं लक्ष्मण द्वारा शूर्पनखा के विवाह के प्रस्ताव को अस्वीकार करना उनके महान चरित्र के आदर्श को स्थापित करता है। एक ओर उदहारण लक्ष्मण जी के चरित्र को सुशोभित करता हैं। जब सुग्रीव ने राम जी को सीता द्वारा सर पर पहने जाने वाले आभूषण  चूड़ामणि को दिखाया तब श्री राम जी लक्ष्मण से उसे पहचानने के लिए पूछा तो लक्ष्मण जी के मुख से निकले शब्द कितने प्रेरणादायक हैं। लक्ष्मण जी कहते है भ्राता जी मैं केवल माता सीता द्वारा चरणों में पहनी जाने वाली पायल को पहचानता हूँ क्यूंकि मैंने आज तक उनका मुख नहीं देखा है और मैंने केवल उनके चरण स्पर्श करते हुए उनके चरणों को देखा हैं। समाज में व्यभिचार को जड़ से समाप्त करने के लिए ऐसे महान आदर्श की अत्यंत आवश्यकता हैं।
                     जटायु द्वारा मित्र दशरथ की पुत्र वधु रक्षणार्थ अपने प्राण दे देना मित्रता रूपी धर्म के पालन का श्रेष्ठ उदहारण हैं। राम द्वारा अत्याचारी बाली का वध कर सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बनाना भी मित्र धर्म का पालन है और सुग्रीव द्वारा रावण से युद्ध में श्री राम की सहायता करना भी उसी मित्र धर्म का पालन हैं। आज समाज के सभी सदस्य एक दूसरे की सहायता मित्र भाव से करे तो सभी का कल्याण होगा। रावण वध के पश्चात विभीषण को लंका का राजा बनाना भी श्री राम के नैतिक गुणों को दर्शाता हैं की दूसरे देश पर राज्य करना उनका उद्देश्य नहीं था अपितु उसे अपना मित्र बनाना उनका उद्देश्य था।
                  रावण एवं विभीषण का सम्बन्ध यही दर्शाता है की जब एक घर में दो विभिन्न मत हो जाये तो उस का नाश निश्चित हैं। आपस की फुट दो भाइयों में दूरियां ही पैदा कर देती है जिसका परिणाम केवल नाश हैं। इसीलिए वेद की आज्ञा हम एक जैसा सोचे, एक साथ मिलकर चले और हमारे मन एक दूसरे के अनुकूल हो अनुकरणीय हैं।संसार में सभी प्रकार के वैमनस्य का नाश अपने मनों को के अनुकूल बनाने से हो सकता हैं।
                  रावण द्वारा अपनी पत्नी द्वारा रोके जाने पर भी वासना से अभिभूत होकर परस्त्री का छलपूर्वक हरण करना एवं बंधक बनाना तथा श्री राम द्वारा क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए उसे मार डालना यही सन्देश देता हैं की पापी, अभिमानी, छलि, व्यभिचारी, बलात्कारी का अंत सदा नाश ही होता हैं। रावण शिव का भक्त था एवं वेदों का विद्वान था मगर वेदों की आज्ञा का उल्लंघन कर उसने सीता हरण जैसा महापाप किया। रावण की बुद्धि नष्ट होने का कारण भी मांसाहार, शराब एवं परस्त्री गमन आदि दोष थे। आज के सभ्य समाज में भी यही नियम मान्य हैं जो उस काल में था। जो भी व्यक्ति इन बुरी आदतों को अपनी दिनचर्या का भाग बना लेगा उसकी बुद्धि नष्ट होने से उसका नाश निश्चित हैं।  

                   आईये आज रामनवमी के दिवस पर हम यही प्रण ले की श्रीराम जी द्वारा स्थापित आदर्शों का जीवन में पालन कर अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति कर उसे यथार्थ सिद्ध करेंगे।

                                                                                                                   डॉ विवेक आर्य 

Saturday, March 21, 2015

अल्पसंख्यक के नाम पर आतंकवाद


अल्पसंख्यक के नाम पर आतंकवाद

                             गत एक माह में हमारे देश में कुछ घटनाएँ हुई हैं जिसमें यह दिखाने का प्रयास किया जा रहा हैं की भारत देश में ईसाई समाज आतंकित हैं, उसे प्रताड़ित किया जा रहा हैं।  मोदी सरकार के सत्ता में आने के पश्चात ही ईसाईयों पर अत्याचार आरम्भ हुआ हैं। यह घटनाएँ हैं दिल्ली के कुछ चर्चों में हुई चोरी एवं तोड़फोड़, संघ प्रमुख भागवत द्वारा मदर टेरेसा का सेवा की आड़ में धर्मान्तरण करने पर प्रश्न करना, हिसार के कैमरी गांव में निर्माणाधीन ईमारत में तोड़फोड़ एवं बंगाल में डकैतों द्वारा एक ईसाई संस्था में डाका डालते समय बुजुर्ग नन से बलात्कार की घटना शामिल हैं। हम सभी घटनाओं की एक एक कर समीक्षा कर यह जानने का प्रयास करेंगे की सत्य क्या हैं।
 1. दिल्ली के कुछ चर्चों में हुई चोरी एवं तोड़फोड़:- दिल्ली के कुछ चर्चों में सर्दी की धुंध में तोड़फोड़ एवं चोरी की घटनाएँ हुई जिसके विरोध ने ईसाई समाज सड़कों पर उतर कर धरना प्रदर्शन किया एवं केंद्र सरकार को उसके लिए जिम्मेदार बताया। गौरतलब हैं की इस तथ्य को छुपाया गया हैं की इसी काल में दिल्ली के मंदिरों में 206 और गुरुद्वारों में 30 चोरी की घटनाएँ हुई। एक मामले में दो युवकों की गिरफ़्तारी हुई जिन्होंने शराब के नशे में शर्त लगाकर चर्च में तोड़फोड़ की थी। जबकि बाकि मामले अनसुलझे है। प्रश्न यह हैं की मामूली चोरी की घटनाओं को बढ़ाचढ़ा कर उसे अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के रूप में क्यों दर्शाया जा रहा हैं और अगर चोरी ही प्रताड़ना करने की कसौटी हैं तब तो हिन्दुओं के मंदिरों में चोरी की कही अधिक घटनाएँ हुई हैं तो इससे तो यही अर्थ निकलता हैं की हिन्दुओं को ज्यादा प्रताड़ित किया गया हैं। यह महज अन्जान जनता की संवेदना एवं समर्थन को एकत्र करने की कवायद हैं जिससे समाज की यह धारणा बन जाये की बहुसंख्यक हिन्दू समाज अत्याचारी हैं एवं अल्पसंख्यक ईसाई समाज पर अत्याचार करता है।

2. संघ प्रमुख भागवत द्वारा मदर टेरेसा का सेवा की आड़ में धर्मान्तरण करने पर प्रश्न करना:- संघ प्रमुख मोहन भागवत का मदर टेरेसा पर दिया गया बयान की मदर टेरेसा द्वारा सेवा की आड़ में धर्मान्तरण करना सेवा के मूल उद्देश्य से भटकना है पर ईसाई समाज द्वारा प्रतिक्रिया तो स्वाभाविक रूप से होनी ही थी मगर तथाकथित सेक्युलर सोच वाले लोग भी संघ प्रमुख के बयान पर माफ़ी मांगने की वकालत कर रहे है एवं इस बयान को मदर टेरेसा का अपमान बता रहे है। निष्पक्ष रूप से यह विरोध चोरी तो चोरी सीनाजोरी भी है। मानवता की सच्ची सेवा में प्रलोभन, लोभ, लालच, भय, दबाव से लेकर धर्मान्तरण का कोई स्थान नहीं है। इससे तो यही सिद्ध हुआ की जो भी सेवा कार्य मिशनरी द्वारा किया जा रहा है उसका मूल उद्देश्य ईसा मसीह के लिए भेड़ों की संख्या बढ़ाना है। संत वही होता है जो पक्षपात रहित एवं जिसका उद्देश्य मानवता की भलाई है। ईसाई मिशनरीयों का पक्षपात इसी से समझ में आता है की वह केवल उन्हीं गरीबों की सेवा करना चाहती है जो ईसाई मत को ग्रहण कर ले। विडंबना यह है की ईसाईयों को पक्षपात रहित होकर सेवा करने का सन्देश देने के स्थान पर संघ प्रमुख की आलोचना अधिक प्रचारित कर रहा है। इस दोगले व्यवहार से समाज में यह भ्रान्ति पैदा होती हैं की ईसाई समाज सेवा कर ता हैं और हिन्दू समाज उसकी आलोचना कर रहा है। ध्यान दीजिये अनेक हिंदुत्ववादी संगठन जैसे वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, दयानंद सेवा आश्रम, रामकृष्ण मिशन आदि संगठन निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं फिर केवल ईसाई समाज का समर्थन सेवा कार्य के नाम पर करना बुद्धिजीवी वर्ग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह भी लगाता हैं।

3. हिसार के कैमरी गांव में निर्माणाधीन ईमारत में तोड़फोड़:-  हिसार में कैमरी गांव में एक निर्माणाधीन ईमारत के निर्माण का जब ग्रामीणों ने विरोध किया तो गांव के लोगों पर उसे तोड़ने का आरोप लगाकर उनके खिलाफ पुलिस में अपराधिक मामला दर्ज करवा दिया गया जबकि स्थानीय पंचायत जो जनता द्वारा चुनी गई संवैधानिक संस्था हैं द्वारा दिए गए प्रस्तावों को दरकिनार कर इस मामले को भी राजनितिक रूप से तुल दिया जा रहा है। पंचायत का कहना हैं की गांव के नौजवानों का नाम पुलिस थाने में दर्ज करवाकर उन्हें आतंकित किया जा रहा है क्यूंकि जिस दिन यह घटना हुई उस दिन पादरी सुभाष उस गांव में उपस्थित ही नहीं था फिर उसे कैसे मालूम की घटना में कौन शामिल था। न तो उस पुरे क्षेत्र में कोई ईसाई रहता हैं, न ही चर्च द्वारा खरीदी गई भूमि पर निर्माण आदि कार्य के लिए कोई पंचायत अथवा जिलाधिकारी से कोई स्वीकृति ली गई जो सरासर कानून का उल्लघंन हैं। इसके अतिरिक्त पादरी सुभाष पर गांव के लड़कों को शादी का प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करवाने का भी आरोप है। पंचायत के अनुसार उस पुरे इलाकें में कोई भी व्यक्ति ईसाई नहीं हैं। ऐसे में लोगों की भावनाओं का सम्मान न कर उन्हें जबरन अपराधी दर्शाकर मीडिया के माध्यम से सहानुभूति बटोरने का जो प्रयास किया जा रहा हैं वह ईसाईयों द्वारा बहुसंख्यक हिन्दुओं को बदनाम करने की साजिश प्रतीत होता है।

4.बंगाल में डकैतों द्वारा एक ईसाई संस्था में डाका डालते समय बुजुर्ग नन से बलात्कार की घटना:-  बंगाल में डकैतों द्वारा एक ईसाई संस्था में डाका डालते समय बुजुर्ग नन से बलात्कार की घटना को चोरी,डैकैती एवं बलात्कार की घटना के रूप में मानने के स्थान पर उसे धार्मिक रंग देकर राजनितिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। बिना अपराधी को पकड़े सम्पूर्ण हिन्दू समाज को कटघड़े में खड़ा कर देना कहा तक उचित है। इस मामले पर वैटिकन द्वारा बयान जारी किया जाना, संसद में विभिन्न पार्टियों के 25 के करीब ईसाई सांसदों का लामबंध होकर होकर केंद्र सरकार पर दवाब बनाना, समस्त हिन्दू समाज को कोसना कहाँ तक उचित है। अपराध को अपराध ही कहे और दोषी को पकड़ कर दण्डित करे।

इस दुष्प्रचार के अनेक दुष्परिणाम हैं जैसे-      
                    कुल मिलाकर यह सब एक सोची समझी साजिश हैं जिसका मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक के नाम पर हिन्दू समाज को आतंकित करना हैं जिसके  पीछे संभवत ईसाई समाज द्वारा किये जा रहे विभिन्न राष्ट्रद्रोही कार्यों जैसे धर्मान्तरण आदि का हिन्दू समाज प्रतिरोध न करे ऐसा माहौल तैयार करना जिससे ईसाई समाज अपनी मन मर्जी कर सम्पूर्ण भारत को ईसाई बनाने की अपनी रणनीति को पूरा कर सके। विडंबना यह हैं की अधिकतर हिन्दू समाज ईसाईयों के इस कुचक्र से न केवल अनभिज्ञ हैं अपितु इस विषैले प्रचार के प्रभाव से देखा देखी ईसाईयों की हाँ में हाँ मिलाने लगता हैं और हिन्दू समाज के प्रति अपने मन में गलत धारणा बना लेता हैं। भ्रमित हिन्दू अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारते हुए तन-मन-धन से ईसाईयों की सहायता करने लगता हैं एवं अपने हिन्दू भाइयों की निंदा करता है। इससे वह अपने आपको सभ्य, आधुनिक एवं सेक्युलर समझने लगता है और अपने ही भाइयों को पिछड़ा, दकियानूसी एवं कट्टर सोच वाला समझने लगता हैं। इस सुनियोजित षड़यंत्र को बौद्धिक आतंकवाद कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा।आशा हैं की हमारे पाठक इस लेख को पढ़कर ईसाईयों की इस षड़यंत्र का शिकार होने से बचेंगे।

डॉ विवेक आर्य 

Friday, March 20, 2015

हिन्दुओं का मानसिक दिवालियापन


अजमेर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर इतनी भीड़ थी कि वहाँ की कोई बैंच खाली नहीं थी। एक बैंच पर एक परिवार, जो पहनावे से हिन्दू लग रहा था, के साथ बुर्के में एक अधेड़ सुसभ्य महिला बैठी थी। उसने सभ्यता से पान की पीक थूक-2 कर प्लेटफार्म पर अपने आस-पास कई चित्र बना दिये थे। बहुत देर चुपचाप बैठने के बाद जब उससे चुप्पी बर्दाश्त न हुई तो उसने बगल में बैठे युवक से पूछा, "अजमेर के रहनेवाले हैँ या फिर यहाँ घूमने आये हैं?"
युवक ने बताया, "जी अपने माता पिता के साथ पुष्कर में ब्रह्मा जी के मंदिर के दर्शन करने आया था।"
महिला ने बुरा मुँह बनाते हुए फिर पूछा,"आप लोग अजमेर शरीफ की दरगाह पर नहीं गये?"
युवक ने उस महिला से प्रतिउत्तर कर दिया, "क्या आप ब्रह्मा जी के मंदिर गयी थीं?"
महिला अपने मुँह को और बुरा बनाते हुये बोली, "लाहौल विला कुव्वत। इस्लाम में बुतपरस्ती हराम है और आप पूछ रहे हैं कि ब्रह्मा के मंदिर में गयी थी।"
युवक झल्लाकर बोला, "जब आप ब्रह्मा जी के मंदिर में जाना हराम मानती हैं तो हम क्यों अजमेर शरीफ की दरगाह पर जाकर अपना माथा फोड़ें।"
महिला युवक की माँ से शिकायती लहजे में बोली, "देखिये बहन जी। आपका लड़का तो बड़ा बदतमीज है। ऐसी मजहबी कट्टरता की वजह से ही तो हमारी कौमी एकता में फूट पड़ती है।"
युवक की माँ मुस्काते हुये बोली, "ठीक कहा बहन जी। कौमी एकता का ठेका तो हम हिन्दुओं ने ही ले रखा है।
साभार- हर्षवर्धन आर्य

Wednesday, March 18, 2015

क्या देश को स्वतंत्रता गांधी जी/कांग्रेस ने दिलाई थी?


क्या देश को स्वतंत्रता गांधी जी/कांग्रेस ने दिलाई थी?

डॉ विवेक आर्य

साध्वी प्राची द्वारा गांधी जी पर एक टिप्पणी की गई जिसके विरोध में मीडिया लामबंध होकर साध्वी प्राची को चुप रहने की सलाह दे रहा है। इस लेख का विषय साध्वी जी की टिप्पणी की समीक्षा करना नहीं अपितु यह जानने का प्रयास करना हैं कि क्या वाकई देश को स्वतंत्रता गांधी जी/कांग्रेस ने दिलाई थी अथवा सत्य कुछ ओर हैं? यह सर्वज्ञात हैं की देश की आज़ादी के पश्चात देश पर कांग्रेस का शासनकाल मुख्य रूप से रहा जिस कारण से कांग्रेस को अपनी पार्टी से सम्बंधित नेताओं के योगदान को शिक्षा के माध्यम से पाठ्यकर्म में मुख्य रूप से सम्मिलित करने का किया गया जबकि जो क्रान्तिकारी कांग्रेस की विचारधारा से अलग रहकर कार्य कर रहे थे उनके योगदान की चर्चा कम ही सुनने को मिलती है। इस कारण से यह भ्रान्ति पैदा हो गई हैं कि देश को स्वतंत्रता गांधी जी/कांग्रेस ने दिलाई थी? सत्य यह हैं कि इस नये विकृत इतिहास में स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले, सर्वस्व समर्पित करने वाले असंख्य क्रांतिकारियों, अमर हुतात्माओं की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई हैं।
                            हमारे विचार की पुष्टि हमारे महान क्रांतिकारी करते है। पेशावर कांड के मुख्य क्रांतिकारी चन्द्र सिंह गढ़वाली भेंट वार्ता में कहते है।  इस आज़ादी का श्रेय कांग्रेस देना कोरा झूठ हैं। मैं पूछता हूँ की ग़दर पार्टी, अनुशीलन समिति, एम.एन.एच., रास बिहारी बोस, राजा महेंदर प्रताप, कामागाटागारू कांड, दिल्ली लाहौर के मामले, दक्शाई कोर्ट मार्शल के बलिदान क्या कांग्रेसियों ने दिए हैं, चोरा- चौरी कांड और नाविक विद्रोह क्या कांग्रेसियों ने दिए थे? लाहौर कांड, चटगांव शस्त्रागार कांड, मद्रास बम केस, ऊटी कांड, काकोरी कांड, दिल्ली असेम्बली बम कांड , क्या यह सब कांग्रेसियों ने किये थे? हमारे पेशावर कांड में क्या कहीं कांग्रेस की छाया थी? अत: कांग्रेस का यह कहना की स्वराज्य हमने लिया, एकदम गलत और झूठ हैं।  कहते कहते क्षोभ और आक्रोश से चन्द्र सिंह जी उत्तेजित हो उठे थे।  फिर बोले- कांग्रेस के इन नेताओं ने अंग्रेजों से एक गुप्त समझोता किया था। जिसके तहत भारत को ब्रिटेन की तरफ जो 18 अरब पौंड की पावती थी, उसे ब्रिटेन से वापिस लेने की बजाय ब्रिटिश फौजियों और नागरिकों के पेंशन के खातों में डाल दिया गया। साथ ही भारत को ब्रिटिश कुम्बे (commonwealth) में रखने को मंजूर किया गया और अगले 30 साल तक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद सेना को गैर क़ानूनी करार दे दिया गया।  मैं तो हमेशा कहता हूँ- कहता रहूँगा की अंग्रेज वायसराय की ट्रेन उड़ाने की कोशिश कभी कांग्रेस ने नहीं की तो क्रांतिकारियों ने ही। हार्डिंग पर बम भी वही डाल सकते थे न की कांग्रेसी नेता। सहारनपुर-मेरठ- बनारस- गवालियर- पूना-पेशावर सब कांड क्रांतिकारियों से ही सम्बन्ध थे, कांग्रेस से कभी नहीं।
                           (सन्दर्भ- श्री शैलन्द्र जी का पांचजन्य के स्वदेशी अंक 16 अगस्त 1992 में लेख)

वीर सावरकर का यह चिंतन भी गढ़वाली जी की टिप्पणी को सिद्ध करता हैं जब उन्होंने कहा था की आज़ादी केवल अहिंसा से मिली हैं उन हज़ारों गुमनाम शहीदों का अपमान हैं जिन्होंने अत्याचारी अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष लिया एवं अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। भारतीय स्वतंत्रता के लिये आरम्भ से ही समय-समय पर भारत के विभिन्न भागों में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विप्लव होते रहे। भारतीय स्वतंत्रता के लिये आरम्भ से ही समय-समय पर भारत के विभिन्न भागों में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विप्लव होते रहे। इसकी पुष्टि इस सूची को देखकर पता चलती हैं।

                                          1757 से अंग्रेजी राज द्वारा जारी लूट तथा भारतीय किसानों, मजदूरों, कारीगरों की बर्बादी, धार्मिक, सामाजिक भेदभाव ने जिस गति से जोर पकड़ा उसी गति से देश के विभिन्न हिस्सो मे विद्रोंह की चिंगारियाँ भी फूटने लगीं, जो 1857 में जंग-ए-आजादी के महासंग्राम के रूप में फूट पड़ी। 1757 के बाद शुरू हुआ सन्यासी विद्रोह (1763-1800), मिदनापुर विद्रोह (1766-1767), रगंपुर व जोरहट विद्रोह (1769-1799), चिटगाँव का चकमा आदिवासी विद्रोह (1776-1789), पहाड़िया सिरदार विद्रोह (1778), रंगपुर किसान विद्रोह (1783), रेशम कारिगर विद्रोह (1770-1800), वीरभूमि विद्रोह (1788-1789), मिदनापुर आदिवासी विद्रोह (1799), विजयानगरम विद्रोह (1794), केरल में कोट्टायम विद्रोह (1787-1800), त्रावणकोर का बेलूथम्बी विद्रोह (1808-1809), वैल्लोर सिपाही विद्रोह (1806), कारीगरों का विद्रोह (1795-1805), सिलहट विद्रोह (1787-1799), खासी विद्रोह (1788), भिवानी विद्रोह (1789), पलामू विद्रोह (1800-02), बुंदेलखण्ड में मुखियाओं का विद्रोह (1808-12), कटक पुरी विद्रोह (1817-18), खानदेश, धार व मालवा भील विद्रोह (1817-31,1846 व 1852), छोटा नागपुर, पलामू चाईबासा कोल विद्रोह (1820-37), बंगाल आर्मी बैरकपुर में पलाटून विद्रोह (1824), गूजर विद्रोह (1824), भिवानी हिसार व रोहतक विद्रोह (1824-26), काल्पी विद्रोह (1824), वहाबी आंदोलन (1830-61), 24 परगंना में तीतू मीर आंदोलन (1831), मैसूर में किसान विद्रोह (1830-31), विशाखापट्टनम का किसान विद्रोह (1830-33), मुंडा विद्रोह (1834), कोल विद्रोह (1831-32) संबलपुर का गौंड विद्रोह (1833), सूरत का नमक आंदोलन (1844), नागपुर विद्रोह (1848), नगा आंदोलन (1849-78), हजारा में सय्यद का विद्रोह (1853), गुजरात का भील विद्रोह (1809-28), संथाल विद्रोह (1855-56) तक सिलसिला जारी रहा। 1857 का संघर्ष संयुक्त भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। नील विद्रोह (सन् 1850 से 1860 तक),कूका विद्रोह (सन् 1872),वासुदेव बलवंत फड़के के मुक्ति प्रयास (सन् 1875 से 1879),चाफेकर संघ (सन् 1897 के आसपास),बंग-भंग आंदोलन (सन् 1905),यूरोप में भारतीय क्रांतिकारियों के मुक्ति प्रयास (सन् 1905 के आसपास),अमेरिका तथा कनाडा में गदर पार्टी (प्रथम विश्वयुद्ध के आगे-पीछे),रासबिहारी बोस की क्रांति चेष्टा, हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ (सन् 1915 के आसपास), दक्षिण-पूर्व एशिया में आजाद हिंद आंदोलन,नौसैनिक विद्रोह (सन् 1946) आदि अनेक संघर्षों में से कुछ संघर्ष हैं जिनमें कांग्रेस या गांधीजी का कोई योगदान नहीं हैं। इसलिए इस बात को स्वीकार करना चाहिए की देश को आज़ादी हमारे महान क्रांतिकारियों के कारण मिली हैं नाकि कांग्रेस के कारण मिली हैं।

              महात्मा गांधी जी निश्चित रूप से महान थे मगर अन्य का सहयोग भी कोई मन नहीं था। ,उनके योगदान को भुला देना कृतघ्नता है। उन क्रांतिकारियों को सम्मान पूर्वक श्रद्धांजलि देने का सबसे कारगर प्रयास यही होगा की निष्पक्ष रूप से इतिहास के पुनर्लेखन द्वारा उनके त्याग और समर्पण को आज की युवा पीढ़ी को अवगत करवाना चाहिए।जिन शहीदों के प्रयत्नों व त्याग से हमें स्वतंत्रता मिली, उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। अनेकों को स्वतंत्रता के बाद भी गुमनामी का अपमानजनक जीवन जीना पड़ा। ये शब्द उन्हीं पर लागू होते हैं-

उनकी तुरबत पर नहीं है एक भी दीया,जिनके खूँ से जलते हैं ये चिरागे वतन।
जगमगा रहे हैं मकबरे उनके, बेचा करते थे जो शहीदों के कफन।।

Tuesday, March 17, 2015

सर्वधर्म सम्मलेन एक नया पाखंड



सर्वधर्म सम्मलेन एक नया पाखंड

बुलंद शहर में सर्वधर्म सम्मलेन सम्पन्न हुआ। इससे पहले भी उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर ऐसे सम्मलेन हो चुके हैं।  इस सम्मलेन के माध्यम से यह सन्देश दिया जा रहा हैं कि हिन्दू, मुस्लिम,ईसाई आदि मान्यताएँ सब धर्म के अनुकूल है। यह हिन्दू समाज को भ्रमित करने के लिए प्रचारित किया जा रहा एक नया पाखंड हैं। धर्म संस्कृत भाषा का शब्द हैं जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना हैं। "धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म है अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म हैं। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते है की मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति हैं वह धर्म है। धर्म तो एक ही हैं सदाचार युक्त जीवन जीना धर्म कहलाता है। बाकि सब तो मत-मतान्तर है। धर्म और मत/मज़हब में भेद को इस लेख के माध्यम  से जानिए।

 1. धर्म और मज़हब समान अर्थ नहीं हैं और न ही धर्म ईमान या विश्वास का प्राय: हैं।

2. धर्म क्रियात्मक वस्तु हैं मज़हब विश्वासात्मक वस्तु हैं।

3. धर्म मनुष्य के स्वाभाव के अनुकूल अथवा मानवी प्रकृति का होने के कारण स्वाभाविक हैं और उसका आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम है। परन्तु मज़हब मनुष्य कृत होने से अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक हैं। मज़हबों का अनेक व भिन्न भिन्न होना तथा परस्पर विरोधी होना उनके मनुष्य कृत अथवा बनावती होने का प्रमाण हैं।

4. धर्म के जो लक्षण मनु महाराज ने बतलाये हैं वह सभी मानव जाति के लिए एक समान है और कोई भी सभ्य मनुष्य उसका विरोधी नहीं हो सकता। मज़हब अनेक हैं और केवल उसी मज़हब को मानने वालों द्वारा ही स्वीकार होते हैं। इसलिए वह सार्वजानिक और सार्वभौमिक नहीं हैं। कुछ बातें सभी मजहबों में धर्म के अंश के रूप में हैं इसलिए उन मजहबों का कुछ मान बना हुआ हैं।

5. धर्म सदाचार रूप हैं अत: धर्मात्मा होने के लिये सदाचारी होना अनिवार्य हैं। परन्तु मज़हबी अथवा पंथी होने के लिए सदाचारी होना अनिवार्य नहीं हैं। अर्थात जिस तरह तरह धर्म के साथ सदाचार का नित्य सम्बन्ध हैं उस तरह मजहब के साथ सदाचार का कोई सम्बन्ध नहीं हैं। क्यूंकि किसी भी मज़हब का अनुनायी न होने पर भी कोई भी व्यक्ति धर्मात्मा (सदाचारी) बन सकता हैं। परन्तु आचार सम्पन्न होने पर भी कोई भी मनुष्य उस वक्त तक मज़हबी अथवा पन्थाई नहीं बन सकता जब तक उस मज़हब के मंतव्यों पर ईमान अथवा विश्वास नहीं लाता। जैसे की कोई कितना ही सच्चा ईश्वर उपासक और उच्च कोटि का सदाचारी क्यूँ न हो वह जब तक हज़रात ईसा और बाइबिल अथवा हजरत मोहम्मद और कुरान शरीफ पर ईमान नहीं लाता तब तक ईसाई अथवा मुस्लमान नहीं बन सकता।

6. धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं अथवा धर्म अर्थात धार्मिक गुणों और कर्मों के धारण करने से ही मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करके मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता हैं। दूसरे शब्दों में धर्म और मनुष्यत्व पर्याय हैं। क्यूंकि धर्म को धारण करना ही मनुष्यत्व हैं। कहा भी गया हैं- खाना,पीना,सोना,संतान उत्पन्न करना जैसे कर्म मनुष्यों और पशुयों के एक समान हैं। केवल धर्म ही मनुष्यों में विशेष हैं जोकि मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं। धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान हैं। परन्तु मज़हब मनुष्य को केवल पन्थाई या मज़हबी और अन्धविश्वासी बनाता हैं। दूसरे शब्दों में मज़हब अथवा पंथ पर ईमान लेन से मनुष्य उस मज़हब का अनुनायी अथवा ईसाई अथवा मुस्लमान बनता हैं नाकि सदाचारी या धर्मात्मा बनता हैं।

7. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़ता हैं और मोक्ष प्राप्ति निमित धर्मात्मा अथवा सदाचारी बनना अनिवार्य बतलाता हैं परन्तु मज़हब मुक्ति के लिए व्यक्ति को पन्थाई अथवा मज़हबी बनना अनिवार्य बतलाता है। और मुक्ति के लिए सदाचार से ज्यादा आवश्यक उस मज़हब की मान्यताओं का पालन बतलाता हैं। जैसे अल्लाह और मुहम्मद साहिब को उनके अंतिम पैगम्बर मानने वाले जन्नत जायेगे चाहे वे कितने भी व्यभिचारी अथवा पापी हो जबकि गैर मुसलमान चाहे कितना भी धर्मात्मा अथवा सदाचारी क्यूँ न हो वह दोज़ख अर्थात नर्क की आग में अवश्य जलेगा क्यूंकि वह कुरान के ईश्वर अल्लाह और रसूल पर अपना विश्वास नहीं लाया हैं।

8. धर्म में बाहर के चिन्हों का कोई स्थान नहीं हैं क्यूंकि धर्म लिंगात्मक नहीं हैं -न लिंगम धर्मकारणं अर्थात लिंग (बाहरी चिन्ह) धर्म का कारण नहीं हैं। परन्तु मज़हब के लिए बाहरी चिन्हों का रखना अनिवार्य हैं जैसे एक मुस्लमान के लिए जालीदार टोपी और दाड़ी रखना अनिवार्य हैं।

9. धर्म मनुष्य को पुरुषार्थी बनाता हैं क्यूंकि वह ज्ञानपूर्वक सत्य आचरण से ही अभ्युदय और मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा देता हैं परन्तु मज़हब मनुष्य को आलस्य का पाठ सिखाता हैं क्यूंकि मज़हब के मंतव्यों मात्र को मानने भर से ही मुक्ति का होना उसमें सिखाया जाता हैं।

10. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़कर मनुष्य को स्वतंत्र और आत्म स्वालंबी बनाता हैं क्यूंकि वह ईश्वर और मनुष्य के बीच में किसी भी मध्यस्थ या एजेंट की आवश्यकता नहीं बताता। परन्तु मज़हब मनुष्य को परतंत्र और दूसरों पर आश्रित बनाता हैं क्यूंकि वह मज़हब के प्रवर्तक की सिफारिश के बिना मुक्ति का मिलना नहीं मानता।इस्लाम में मुहम्मद साहिब अल्लाह एवं मनुष्य के मध्य मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं।

11. धर्म दूसरों के हितों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना सिखाता हैं जबकि मज़हब अपने हित के लिए अन्य मनुष्यों और पशुयों की प्राण हरने के लिए हिंसा रुपी क़ुरबानी का सन्देश देता हैं। वैदिक धर्म के इतिहास में ऐसे अनेक उदहारण हैं जिसमें गौ माता की रक्षा के लिए हिन्दू वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

12. धर्म मनुष्य को सभी प्राणी मात्र से प्रेम करना सिखाता है जबकि मज़हब मनुष्य को प्राणियों का माँसाहार और दूसरे मज़हब वालों से द्वेष सिखाता हैं। जिहादी आतंकवादी इस बाद का सबसे प्रबल प्रमाण हैं।

13. धर्म मनुष्य जाति को मनुष्यत्व के नाते से एक प्रकार के सार्वजानिक आचारों और विचारों द्वारा एक केंद्र पर केन्द्रित करके भेदभाव और विरोध को मिटाता हैं तथा एकता का पाठ पढ़ाता हैं। परन्तु मज़हब अपने भिन्न भिन्न मंतव्यों और कर्तव्यों के कारण अपने पृथक पृथक जत्थे बनाकर भेदभाव और विरोध को बढ़ाते और एकता को मिटाते हैं।संसार में धर्म के नाम पर भेदभाव एवं फुट का यही कारण है।

14. धर्म एक मात्र ईश्वर की पूजा बतलाता हैं जबकि मज़हब ईश्वर से भिन्न मत प्रवर्तक/गुरु/मनुष्य आदि की पूजा बतलाकर अन्धविश्वास फैलाते हैं।

धर्म और मज़हब के अंतर को ठीक प्रकार से समझ लेने पर मनुष्य अपने चिंतन मनन से आसानी से यह स्वीकार करके के श्रेष्ठ कल्याणकारी कार्यों को करने में पुरुषार्थ करना धर्म कहलाता हैं इसलिए उसके पालन में सभी का कल्याण हैं।

डॉ विवेक आर्य

Sunday, March 15, 2015

गौहत्या पर प्रतिबन्ध के विरोध में दिए जा रहे कुतर्कों की समीक्षा



गौहत्या पर प्रतिबन्ध के विरोध में दिए जा रहे कुतर्कों की समीक्षा

डॉ विवेक आर्य

केंद्र सरकार द्वारा गौ हत्या पर पाबन्दी लगाने एवं कठोर सजा देने के निर्देश पर मानो सेक्युलर जमात की नींद ही उड़ गई है। एक से बढ़कर एक कुतर्क गौ हत्या के समर्थन में कुतर्की दे रहे है। केरल में कुछ कांग्रेसी नेताओं ने सरेआम गौ वध कर अपने आपको सेक्युलर सिद्ध करने का प्रयास किया। हमारे देश में एक जमात है. इसके अनेक मुखौटे है। कभी यह अपने आपको बुद्धिजीवी, कभी मानवाधिकार कार्यकर्ता, कभी एक्टिविस्ट, कभी समाज सेवी, कभी पुरस्कार वापसी गैंग आदि के रूप में सामने आता हैं। गौहत्या के पक्ष में एक से बढ़कर एक कुतर्क दिए जा रहे है।


इनके कुतर्कों की समीक्षा करने में मुझे बड़ा मजा आया। आप भी पढ़े।

कुतर्क नं 1. गौ हत्या पर पाबन्दी से देश में लाखों व्यक्ति बेरोजगार हो जायेगे जो मांस व्यापर से जुड़े है।

समीक्षा- गौ पालन भी अच्छा व्यवसाय है। इससे न केवल गौ का रक्षण होगा अपितु पीने के लिए जनता को लाभकारी दूध भी मिलेगा। ये व्यक्ति गौ पालन को अपना व्यवसाय बना सकते हैं। इससे न केवल धार्मिक सौहार्द बढ़ेगा अपितु सभी का कल्याण होगा।

कुतर्क नं 2. गौ मांस गरीबों का प्रोटीन है। प्रतिबन्ध से उनके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव होगा।

समीक्षा- एक किलो गौ मांस 150 से 200 रुपये में मिलता हैं जबकि इतने रुपये में 2 किलो दाल मिलती हैं। एक किलो गौमांस से केवल 4 व्यक्ति एक समय का भोजन कर सकते हैं जबकि 2 किलो दाल में कम से कम 16-20 आदमी एक साथ भोजन कर सकते हैं। मांस से मिलने वाले प्रोटीन से पेट के कैंसर से लेकर अनेक बीमारियां होने का खतरा हैं जबकि शाकाहारी भोजन प्राकृतिक होने के कारण स्वास्थ्य के अनुकूल हैं। ऐसा वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध हुआ है।

कुतर्क नं 3. गौ मांस पर प्रतिबन्ध अल्पसंख्यकों पर अत्याचार है क्यूंकि यह उनके भोजन का प्रमुख भाग है।

समीक्षा- मनुष्य स्वाभाव से मांसाहारी नहीं अपितु शाकाहारी है। वह मांस से अधिक गौ का दूध ग्रहण करता है। इसलिए यह कहना की गौ का मांस भोजन का प्रमुख भाग है एक कुतर्क ,मात्र है। एक गौ अपने जीवन में दूध द्वारा हज़ारों मनुष्यों की सेवा करती है, जबकि मनुष्य इतना बड़ा कृतघ्नी है कि उसे सम्मान देने के स्थान पर कसाइयों से कटवा डालता है।

कुतर्क नं 4. अगर गौ मांस पर प्रतिबन्ध लगाया गया तो बूढ़ी एवं दूध न देनी वाली गौ जमीन पर उगने वाली सारी घास को खा जाएगी जिससे लोगों को घास भी नसीब न होगी।

समीक्षा- गौ घास खाने के साथ साथ गोबर के रूप में प्राकृतिक खाद भी देती है। जिससे जमीन की न केवल उर्वरा शक्ति बढ़ती है। अपितु प्राकृतिक होने के कारण उसका कोई दुष्परिणाम नहीं है। प्राकृतिक गोबर की खाद डालने से न केवल धन बचता है। अपितु उससे जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है। साथ में ऐसी फसलों में कीड़ा भी कम लगता है, जिनमें प्राकृतिक खाद का प्रयोग होता है। इस कारण से महंगे कीटनाशकों की भी बचत होती है। साथ में विदेश से महंगी रासनायिक खाद का आयात भी नहीं करना पड़ता। बूढ़ी एवं दूध न देनी वाली गौ को प्राकृतिक खाद के स्रोत्र के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

कुतर्क नं 5. गौहत्या पर प्रतिबन्ध अल्पसंख्यकों के अधिकारों का अतिक्रमण है।

समीक्षा- बहुसंख्यक के अधिकारों का भी कभी ख्याल रखा जाना चाहिए। इस देश में बहुसंख्यक भी रहते है। गौहत्या से अगर बहुसंख्यक समाज प्रसन्न होता है तो उसमें बुराई क्या है।

कुतर्क नं 6. गौहत्या करने वाले को 10 वर्ष की सजा का प्रावधान है जबकि बलात्कारी को 7 वर्ष का दंड है। क्या गौ एक नारी के शील से अधिक महत्वपूर्ण हो गई?

समाधान- हम तो बलात्कारी को उम्रकैद से लेकर फांसी की सजा देने की बात करते है। आप लोग ही कटोरा लेकर उनके लिए मानव अधिकार के नाम पर माँफी देने की बात करते है। सबसे अधिक मानव अधिकार के नाम पर रोना एवं फांसी पर प्रतिबन्ध की मांग आप सेक्युलर लोगों का सबसे बड़ा ड्रामा है।

कुतर्क नं 7. गौहत्या के व्यापर में हिन्दू भी शामिल है।

समाधान- गौहत्या करने वाला हत्यारा है। वह हिन्दू या मुसलमान नहीं है। पैसो के लालच में अपनी माँ को जो मार डाले वह हत्यारा या कातिल कहलाता है नाकि हिन्दू या मुस्लमान। सबसे अधिक गोमांस का निर्यात मुस्लिम देशों को होता है। इससे हमारे देश के बच्चे तो दूध के लिए तरस जाते है और हमारे यहाँ का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है। इन कसाईयों की योजना हरे भरे भारत देश को रेगिस्तानी देश बनाना है।

कुतर्क नं 8. अगर गौ से इतना ही प्रेम है तो उसे सड़कों पर क्यों छोड़ देते है।

समाधान- प्राचीन काल में राजा लोग गौ को संरक्षण देने के लिए गौशाला आदि का प्रबंध करते थे जबकि आज की सरकारे सहयोग के स्थान पर गौ मांस के निर्यात पर सब्सिडी देती है। विडंबना देखिये मुर्दों के लिए बड़े बड़े कब्रिस्तान बनाने एवं उनकी चारदीवारी करने के लिए सरकार अनुदान देती है, जबकि जीवित गौ के लिए गौचर भूमि एवं चारा तक उपलब्ध नहीं करवाती। अगर हर शहर के समीप गौचर की भूमि एवं चारा उपलब्ध करवाया जाये तो कोई भी गौ सड़कों पर न घूमे। खेद हैं हमारे देश में अल्पसंख्यकों को लुभाने के चक्कर में मुर्दों की गौ माता से ज्यादा औकाद बना दी गई है। गावों आदि में पशुओं के चरने के लिए जो गोचर भूमि होती थी। या तो उस पर अवैध कब्ज़ा हो गया अथवा खेती की जाने लगी। उस भूमि को दबंगों से खाली करवाकर गौ के चरने के लिए प्रयोग किया जाता तो गौ सड़कों पर नहीं घूमती।

कुतर्क नं 9. गौ पालन से ग्रीन हाउस गैस निकलती है जिससे पर्यावरण की हानि होती हैं।

समाधान- यह वैज्ञानिक तथ्य है कि मांस भक्षण के लिए लाखों लीटर पानी बर्बाद होता है। जिससे पर्यावरण की हानि होती है। साथ में पशुओं को मांस के लिए मोटा करने के चक्कर में बड़ी मात्र में तिलहन खिलाया जाता है। जिससे खाद्य पदार्थों को अनुचित दोहन होता है। शाकाहार पर्यावरण के अनुकूल है और मांसाहार पर्यावरण के प्रतिकूल है। कभी पर्यावरण वैज्ञानिकों का कथन भी पढ़ लिया करो?

कुतर्क नं 10. गौमांस पर प्रतिबन्ध भोजन की स्वतंत्रता पर आघात है। हम क्या खाये क्या न खाये आप कौन होते है यह सुनिश्चित करने वाले?

समाधान- मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्रता है मगर सामाजिक नियम का पालन करने के लिए परतंत्र है। एक उदहारण लीजिये आप सड़क पर जब कार चलाते है। तब आप यातायात के सभी नियमों का पालन करते है अन्यथा दुर्घटना हो जाएगी। आप कभी कार को उलटी दिशा में नहीं चलाते और न ही कहीं पर भी रोक देते है अन्यथा यातायात रुक जायेगा। यह नियम पालन मनुष्य की स्वतंत्रता पर आघात नहीं है अपितु समाज के कल्याण का मार्ग है। इसी नियम से भोजन की स्वतंत्रता का अर्थ दूसरे व्यक्ति की मान्यताओं को समुचित सम्मान देते हुए भोजन ग्रहण करना है। जिस कार्य से समाज में दूरियां, मनमुटाव, तनाव आदि पैदा हो उस कार्य को समाज हित में न करना चाहिये। जो आप सोचे वह सदा ठीक हो ऐसा कभी नहीं होता।

कुतर्क नं 11- प्राचीन काल में गौ की यज्ञों में बलि दी जाती थी और वेदों में भी इसका वर्णन मिलता है।

समाधान- इस भ्रान्ति के होने के मुख्य-मुख्य कुछ कारण है। सर्वप्रथम तो पाश्चात्य विद्वानों जैसे मैक्समुलर, ग्रिफ्फिथ आदि द्वारा यज्ञों में पशुबलि, माँसाहार आदि का विधान मानना, द्वितीय मध्य काल के आचार्यों जैसे सायण, महीधर आदि का यज्ञों में पशुबलि का समर्थन करना, तीसरा ईसाईयों, मुसलमानों आदि द्वारा माँस भक्षण के समर्थन में वेदों कि साक्षी देना, चौथा साम्यवादी अथवा नास्तिक विचारधारा के समर्थकों द्वारा सुनी-सुनाई बातों को बिना जाँचें बार बार रटना।
वेदों में मांस भक्षण का स्पष्ट निषेध किया गया हैं। अनेक वेद मन्त्रों में स्पष्ट रूप से किसी भी प्राणि को मारकर खाने का स्पष्ट निषेध किया गया हैं। जैसे

हे मनुष्यों ! जो गौ आदि पशु हैं वे कभी भी हिंसा करने योग्य नहीं हैं - यजुर्वेद 1/1

जो लोग परमात्मा के सहचरी प्राणी मात्र को अपनी आत्मा का तुल्य जानते हैं अर्थात जैसे अपना हित चाहते हैं वैसे ही अन्यों में भी व्रतते हैं-यजुर्वेद 40/7

हे दांतों तुम चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ। तुम्हारे लिए यही रमणीय भोज्य पदार्थों का भाग हैं । तुम किसी भी नर और मादा की कभी हिंसा मत करो।- अथर्ववेद 6/140/2

वह लोग जो नर और मादा, भ्रूण और अंड़ों के नाश से उपलब्ध हुए मांस को कच्चा या पकाकर खातें हैं, हमें उनका विरोध करना चाहिए- अथर्ववेद 8/6/23

निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है, हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार। -अथर्ववेद 10/1/29

इन मन्त्रों में स्पष्ट रूप से यह सन्देश दिया गया है कि वेदों के अनुसार मांस भक्षण निषेध है।


इन कुतर्कों का मुख्य उद्देश्य युवा मस्तिष्कों को भ्रमित करना है। इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करके अपने मित्रों को बचाये।