Sunday, March 30, 2014

इतिहास का ठुकराया हीरा- वीर छत्रपति शम्भा जी


डॉ विवेक आर्य

(वीर शिवाजी के पुत्र वीर शम्भा जी को कोई अदूरदर्शी, कोई दुश्चरित्र, कोई राजा बनने के अयोग्य, कोई अपनी ही विमाता और भाई का वध करने वाला,कोई शराबी आदि आदि की संज्ञा देकर बदनाम करता हैं जबकि सत्य ये हैं की अगर वीर शम्भा जी कायर होते तो आसानी से औरंगजेब की दासता स्वीकार कर लेते और इस्लाम ग्रहण कर लेते तो न केवल अपने प्राणों की रक्षा कर लेते अपितु अपने राज्य को भी बचा लेते। . वीर शम्भा जी का जन्म १४ मई १६५७ को हुआ था। आप वीर शिवाजी के साथ अल्पायु में औरंगजेब की कैद में आगरे के किले में बंद भी रहे थे। आपने ११मार्च१६८९ को वीरगति प्राप्त की थी। उस दिन फाल्गुन कि अमावस्या थी। अगले दिन हिन्दू नववर्ष का प्रथम दिन। अनेक दिनों तक निर्मम अत्याचार करने के बाद औरंगज़ेब ने इस दिन को इसलिए चुना ताकि अगले दिन हिंदुओं के यहाँ त्योहार के स्थान पर मातम का माहौल रहे। इससे पाठक औरंगज़ेब कि कुटिल मानसिकता को समझ सकते हैं। इस वर्ष फाल्गुन अमावस्या 30 मार्च को पड़ेगी।  इस लेख के माध्यम से हम शम्भा जी के जीवन बलिदान की घटना से धर्म रक्षा की प्रेरणा ले सकते हैं।  इतिहास में ऐसे उदहारण विरले ही मिलते हैं)


औरंगजेब के जासूसों ने सुचना दी की शम्भा जी इस समय आपने पांच-दस सैनिकों के साथ वारद्वारी से रायगढ़ की ओर जा रहे हैं। बीजापुर और गोलकुंडा की विजय में औरंगजेब को शेख निजाम के नाम से एक सरदार भी मिला जिसे उसने मुकर्रब की उपाधि से नवाजा था।  मुकर्रब अत्यंत क्रूर और मतान्ध था।  शम्भा जी के विषय में सुचना मिलते ही उसकी बांछे खिल उठी।  वह दौड़ पड़ा रायगढ़ की और शम्भा जी आपने मित्र कवि कलश के साथ इस समय संगमेश्वर पहुँच चुके थे। वह एक बाड़ी में बैठे थे की उन्होंने देखा कवि कलश भागे चले आ रहे हैं और उनके हाथ से रक्त बह रहा हैं, कलश ने शम्भा जी से कुछ भी नहीं कहाँ बल्कि उनका हाथ पकड़कर उन्हें खींचते हुए बाड़ी के तलघर में ले गए परन्तु उन्हें तलघर में घुसते हुए मुकर्रब खान के पुत्र ने देख लिया था। शीघ्र ही मराठा रणबांकुरों को बंदी बना लिया गया।  शम्भा जी व कवि कलश को लोहे की जंजीरों में जकड़ कर मुकर्रब खान के सामने लाया गया।  वह उन्हें देखकर खुशी से नाच उठा।  दोनों वीरों को बोरों के समान हाथी पर लादकर मुस्लिम सेना बादशाह औरंगजेब की छावनी की और चल पड़ी थी।

औरंगजेब को जब यह समाचार मिला तो वह ख़ुशी से झूम उठा था। उसने चार मील की दूरी पर उन शाही कैदियों को रुकवाया था।  वहां शम्भा जी और कवि कलश को रंग बिरंगे कपडे और विदूषकों जैसी घुंघरूदार लम्बी टोपी पहनाई गई थी।  फिर उन्हें ऊंट पर बैठा कर गाजे बाजे के साथ औरंगजेब की छावनी पर लाया गया था।  औरंगजेब ने बड़े ही अपशब्द शब्दों में उनका स्वागत किया था।  शम्भा जी के नेत्रों से अग्नि निकल रही थी परन्तु वह शांत रहे थे। उन्हें बंदी ग्रह भेज दिया गया था।  औरंगजेब ने शम्भा जी का वध करने से पहले उन्हें इस्लाम काबुल करने का न्योता देने के लिए रूह्ल्ला खान को भेजा था।

नर केसरी लोहे के सींखचों में बंद था। कल तक जो मराठों का सम्राट था आज उसकी दशा देखकर करुणा को भी दया आ जाये।  फटे हुए चिथड़ों में लिप्त हुआ उनका शरीर मिटटी में पड़े हुए स्वर्ण के समान हो गया था।  उन्हें स्वर्ग में खड़े हुए छत्रपति शिवाजी टकटकी बंधे हुए देख रहे थे।  पिता जी पिता जी वे चिल्ला उठे- मैं आपका पुत्र हूँ, निश्चित रहिये,मैं मर जाऊँगा लेकिन…..

लेकिन क्या शम्भा जी …रूह्ल्ला खान ने एक और से प्रकट होते हुए कहाँ.

तुम मरने से बच सकते हो शम्भा जी परन्तु एक शर्त पर।

शम्भा जी ने उत्तर दिया में उन शर्तों को सुनना ही नहीं चाहता।  शिवाजी का पुत्र मरने से कब डरता हैं।

लेकिन जिस प्रकार तुम्हारी मौत यहाँ होगी उसे देखकर तो खुद मौत भी थर्रा उठेगी शम्भा जी- रुहल्ला खान ने कहाँ।

कोई चिंता नहीं , उस जैसी मौत भी हम हिंदुओं को नहीं डरा सकती।  संभव हैं की तुम जैसे कायर ही उससे डर जाते हो, शम्भा जी ने उत्तर दिया।

लेकिन… रुहल्ला खान बोला वह शर्त हैं बड़ी मामूली। तुझे बस इस्लाम कबूल करना हैं, तेरी जान बक्श दी जाएगी। शम्भा जी बोले बस रुहल्ला खान आगे एक भी शब्द मत निकालना मलेच्छ। रुहल्ला खान अट्टहास लगाते हुए वहाँ से चला गया।

उस रात लोहे की तपती हुई सलाखों से शम्भा जी की दोनों आँखे फोड़ दी गयी, उन्हें खाना और पानी भी देना बंद कर दिया गया।

आखिर ११ मार्च को वीर शम्भा जी के बलिदान  का दिन आ गया।  सबसे पहले शम्भा जी का एक हाथ काटा गया, फिर दूसरा, फिर एक पैर को काटा गया और फिर दूसरे पैर को काटा गया।  शम्भा जी कर पाद विहीन धड़  दिन भर खून की तल्य्या में तैरता रहा था।  फिर सायकाल में उनका सर कलम कर दिया गया और उनका शरीर कुत्तों के आगे डाल दिया गया था।  फिर भाले पर उनके सर को टांगकर सेना के सामने उसे घुमाया गया और बाद में कूड़े में फेंक दिया गया था।

मरहठों ने अपनी छातियों पर पत्थर रखकर आपने सम्राट के सर का इंद्रायणी और भीमा के संगम पर तुलापुर में दांह संस्कार कर दिया गया। आज भी उस स्थान पर शम्भा जी की समाधी हैं जो की पुकार पुकार कर वीर शम्भा जी की याद दिलाती हैं की हम सर कटा सकते हैं पर अपना प्यारे वैदिक धर्म कभी नहीं छोड़ सकते।

इस लेख को पढ़कर शायद ही कोई हिन्दू होगा जिसका मस्तक शम्भा जी के बलिदान को सुनकर नतमस्तक न होगा। भारत भूमि महान हैं जहाँ पर एक से बढ़कर एक महान वीर जन्म लेते हैं।


(तुलापुर स्मारक जहाँ पर वीर शम्भा जी का बलिदान हुआ था)

Saturday, March 22, 2014

भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों के प्रेरणास्रोत्- सरदार अर्जुन सिंह



डॉ विवेक आर्य
इस लेख को पड़ने वाले ज्यादातर वे पाठक हैं जिन्होंने आजाद भारत में जन्म लिया.यह हमारा सौभाग्य हैं की आज हम जिस देश में जन्मे हैं उसे आज कोई गुलाम भारत नहीं कहता, उपनिवेश नहीं कहता बल्कि संसार का एक मजबूत स्वतंत्र राष्ट्र के नाम से हमें जाना जाता हैं. इस महान भारत देश को आजाद करवाने में हजारों क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति आज़ादी के पवित्र यज्ञ में डाली तब कहीं जाकर हम आजाद हुए. भगत सिंह का नाम भारत देश की आज़ादी के आन्दोलन में एक विशेष महत्व रखता हैं. प्रथम तो भगत सिंह नौजवानों के लिए जिन्हें अंग्रेजों से भीख में आज़ादी मांगने में कोई रूची नहीं थी उनके लिए प्रेरणास्रोत्र बने दूसरे १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के असफल हो जाने के बाद अंग्रेजी सरकार द्वारा बड़ी निर्दयता से आज़ादी के दीवानों पर प्रहार किया था, उनका उद्देश्य था की भारत देश की प्रजा के मन में अंग्रेज जाति की श्रेष्ठता और अपराजय होने के भय को बैठा देना जिससे वे दोबारा आज़ादी प्राप्त करने का प्रयास सशत्र न करे इस भय को मिटने में भी भगत सिंह की क़ुरबानी सदा याद रखी जाएगी. किसी भी व्यक्ति का महान बनने के लिए महान कर्म यानि की तप करना पड़ता हैं और उस तप की प्रेरणा उसके विचार होते हैं. किसी भी व्यक्ति के विचार उसे ऊपर उठा भी सकते हैं उसे नीचे गिरा भी सकते हैं.भगत सिंह के जीवन में उन्हें कई महान आत्माओं ने प्रेरित किया जैसे करतार सिंह सराभा, भाई परमानन्द , सरदार अर्जुन सिंह, सरदार किशन सिंह आदि. सरदार अर्जुन सिंह भगत सिंह के दादा थे और स्वामी दयानंद के उपदेश सुनने के बाद वैदिक विचारधारा से प्रभावित हुए थे.सरदार अर्जुन सिंह उन महान व्यक्तियों में से थे जिन्हें न केवल स्वामी दयानंद के उपदेश सुनने का साक्षात् अवसर मिला अपितु वे आगे चलकर स्वामी जी की वैचारिक क्रांति के क्रियात्मक रूप से भागिदार भी बने. स्वामी दयानंद के हाथों से उन्हें यज्ञोपवित प्राप्त हुआ और उन्होंने आजीवन वैदिक आदर्शों का पालन करने का व्रत लिया. उन्होंने तत्काल मांस खाना छोड़ दिया और शराब की पीर जीवन भर मुहँ नहीं लगाया. अब नित्य हवन उनका साथी और वैदिक संध्या उनके प्रहरी बन गए. समाज में फैले अन्धविश्वास जैसे मृतक श्राद्ध, पाखंड आदि के खिलाफ उन्होंने न केवल प्रचार किया अपितु अनेक शास्त्रार्थ भी किये.१८९७ में अज्ञानी सिखों में अलगाववाद की एक लहर चल पड़ी. काहन सिंह के नाम से एक सिख लेखक ने “हम हिन्दू नहीं”  के नाम से पुस्तक लिखकर सिख पंथ को हिन्दू समाज से अलग दिखने का प्रयास किया तो सरदार अर्जुन सिंह ने “हमारे गुरु वेदों के पैरो (अनुयायी) थे” शीर्षक से उत्तर लिखा था. इस पुस्तक में उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब में दिए गए श्लोकों को प्रस्तुत लिया जो वेदों की शिक्षाओं से मेल खाते थे और इससे यह सिद्ध किया की गुरु ग्रन्थ साहिब की शिक्षाएँ वेदों पर आधारित हैं.

सरदार अर्जुन सिंह का धार्मिक दृष्टिकौन

सरदार अर्जुन ने अपने ग्राम बंगा जिला लायलपुर (पाकिस्तान) में गुरूद्वारे को बनाने में तो सहयोग किया और वे गुरुद्वारा में तो जाते थे पर कभी गुरु ग्रन्थ साहिब के आगे माथा नहीं टेकते थे. वे कहते थे की गुरु साहिबान की शिक्षा पर चलना ही सही हैं, वे कहते थे की मूर्ति पूजा की भांति ही यह पुस्तक पूजा हैं. वे ग्राम के बड़े जमींदार थे, ग्राम के विकास के लिए उन्होंने कुएँ और धर्मशालाभी बनवाई. हर वर्ष अपने ग्राम में आर्यसमाज के प्रचारकों को बुला कर हवन और उपदेशकों के प्रवचन आदि करवाते थे जिससे ग्राम में छुआछुत, अंधविश्वास और नशे आदि का कलंक सदा के लिए मिट जाये.
सन १९०९ में पटियाला रियासत में आर्यसमाज पर राजद्रोह का अभियोग अंग्रेज सरकार ने चलाया. निर्दोष आर्यसमाज के अधिकारीयों और सदस्यों को बिना कारण जेल में बंद कर दिया गया.इस कदम का उद्देश्य सिखों और आर्यों में आपसी वैमनस्य को पैदा करना था व देसी रियासतों में से आर्यसमाज की जागरण क्रांति की मशाल को मिटा देना था.स्वामी श्रधानंद ने इस संकट की घड़ी में जब कोई भी वकील आर्यसमाज का केस लड़ने को तैयार न हुआ तो खुद ही आर्यसमाज के वकील के केस की पैरवी करी और कोर्ट में सिद्ध किया की आर्यसमाज का उद्देश्य समाज का कल्याण करना हैं न की राज द्रोह करना. इस मामले में अर्जुन सिंह भी सक्रिय हुए. अन्य आर्यों के साथ मिलकर उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब के ७०० ऐसे श्लोक प्रस्तुत करे जो की वेदों की शिक्षा से मेल खाते थे.इस प्रकार सिख समाज और आर्य समाज में आपसी मधुर सम्बन्ध को बनाने में आप मील के पत्थर साबित हुए.
सत्य मार्ग के तपस्वी
एक बार वे एक विवाह उत्सव में शामिल हुए जहाँ एक सिख पुरोहित स्वामी दयानंद रचित सत्यार्थ प्रकाश की आलोचना कर रहा था. अपने उसे चुनौती दी की वह जिस कथन के आधार पर आलोचना कर रहा हैं वह कथन ही सत्यार्थ प्रकाश में नहीं हैं. उस पुरोहित ने कहाँ की यदि सत्यार्थ प्रकाश लाओंगे तो में प्रमाण दिखा दूंगा. अर्जुन सिंह जी को उस पूरे गाँव में सत्यार्थ प्रकाश न मिला. आप तत्काल अपने गाँव वापस गए और अगले दिन सत्यार्थ प्रकाश लेकर वापिस आ गए.आलोचक उन्हें सत्यार्थ प्रकाश में कोई भी गलत प्रमाण न दिखा सका और माफ़ी मांगकर पिण्ड छुड़ाया.ध्यान दीजिये अर्जुन सिंह जी गाँव उस गाँव से करीब ६० मील की दूरी पर था. सत्य मार्ग पर चलते हुए जो कष्ट होता हैं उसे ही असली तप कहते हैं.
पूरा कुटुंब क्रांति के मार्ग पर
स्वामी दयानंद १८५७ के पश्चात पहले गुरु थे जिन्होंने स्वदेशी राज्य का समर्थन किया और विदेशी शाषण का बहिष्कार करने का आवाहन किया. उनके इस जन चेतना के आह्वान का सरदार अर्जुन सिंह पर इतना  प्रभाव पड़ा की न केवल वे खुद आज़ादी की दीवानों की फौज में शामिल हुए बल्कि उनका समस्त कुटुंब भी इसी रास्ते पर चल पड़ा था.जब भगत सिंह और जगत सिंह आठ वर्ष के हुए तो अर्जुन सिंह जी ने अपने दोनों पोतों का यज्ञोपवित पंडित लोकनाथ तर्कवाचस्पति (भारत के पहले अन्तरिक्ष यात्री राकेश शर्मा के दादा) के हाथों से करवाया और एक पोतें को दायीं भुजा पर और दुसरे पोतें को बायीं भुजा में भरकर यह संकल्प लिया- मैं इन दोनों पोतों को राष्ट्र की बलिवेदी के लिए दान करता हूँ. अर्जुन सिंह जी के तीनों लड़के पहले से ही देश के लिए समर्पित थे. उनके सबसे बड़े पुत्र और भगत सिंह के पिता किशन सिंह सदा हथकड़ियों की चौसर और बेड़ियों की शतरंज से खेलते रहे, उनके मंजले पुत्र अजित सिंह को तो देश निकला देकर मांडले भेज दिया गया , बाद में वे विदेश जाकर ग़दर पार्टी के साथ जुड़कर कार्य करते रहे. उनके सबसे छोटे पुत्र स्वर्ण सिंह का जेल में तपेदिक  से युवावस्था में ही देहांत हो गया था. अपने दादा द्वारा देश हित में लिए गए संकल्प को पूरा करने के लिए, अपने पिता और चाचा द्वारा अपनाये गए कंटक भरे मार्ग पर चलते हुए भगत सिंह भी वीरों की भांति देश के लिए २३ मार्च १९३१ को २३ वर्ष की अल्पायु में फाँसी पर चढ़ कर अमर हो गए.
भगत सिंह के मन में उनके दादा  सरदार अर्जुन सिंह जी द्वारा बोएं गए क्रांति बीज आर्य क्रांतिकारियों भाई परमानन्द, करतार सिंह सराभा ,सूफी अम्बा प्रसाद और लाला लाजपत राय जैसे क्रांतिकारियों द्वारा दी गयी खाद से पल्लवित होकर जवान होते होते देश को आजाद करवाने की विशाल बरगद रुपी प्रतिज्ञा बन गए.यह पूरा परिवार आर्यसमाज की प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित था जिसका श्रेया सरदार अर्जुन सिंह को जाता हैं.
साम्यवादी लेखों द्वारा अन्याय
“मैं नास्तिक क्यूँ हूँ ” भगत सिंह की ये छोटी सी पुस्तक साम्यवादी लाबी द्वारा आज के नौजवानों में खासी प्रचारित करी जाती हैं जिसका उद्देश्य भगत सिंह के जैसा महान बनाना नहीं अपितु नास्तिकता को बढावा देना हैं. कुछ लोग इसे कन्धा भगत सिंह का और निशाना कोई और भी कह सकते हैं. मेरा एक प्रश्न उनसे यह हैं की क्या भगत सिंह इसलिए महान थे की वे नास्तिक थे ? अथवा इसलिए कि वे देश भक्त थे. सभी कहेगे की इसलिए कि वे देशभगत थे.फिर क्या यह नास्तिकता का प्रोपगंडा अनजान नौजवानों को सत्य से अनभिज्ञ रखने के समान नहीं हैं तो और क्या हैं. अगर किसी भी क्रांतिकारी की अध्यात्मिक विचारधारा हमारे लिए आदर्श हैं तो भगत सिंह के अग्रज पंडित राम प्रसाद बिस्मिल जो न केवल कट्टर आर्यसमाजी थे , ब्रहमचर्य के पालन के क्या क्या फायदे होते हैं उसके साक्षात् प्रमाण थे, जिनका जीवन सत्यार्थ प्रकाश को पढने से परिवर्तित हुआ था क्यूँ हमारे लिए आदर्श और वरण करने योग्य नहीं हो सकते. आर्यसमाज मेरी माता के समान हैं और  वैदिक धर्म मेरे लिए पिता तुल्य हैं ऐसा उद्घोष करने वाले लाला लाजपतराय क्यूँ हमारे लिए वरणीय नहीं हो सकते?
मेरा इस विषय को यहाँ उठाने का मंतव्य वीर भगत सिंह के बलिदान को कम आंकने का नहीं हैं बल्कि यह स्पष्ट करना हैं कि भारत माँ के चरणों में आहुति देने वाला हर क्रांतिकारी हमारे लिए महान हैं. उनकी वीरता और देश सेवा हमारे लिए वरणीय हैं. पहले तो भगत सिंह कि क्रांतिकारी विचारधारा और देशभक्ति का श्रेय नास्तिकता को नहीं अपितु उनके पूर्वजों द्वारा माँ के दूध में पिलाई गयी देश भक्ति कि लोरियां हैं जिनका श्रेय स्वामी दयानंद को जाता हैं.दुसरे आज़ादी कि लड़ाई में अधिकांश गर्म दल और ८०% के करीब नर्म दल आर्यसमाज कि धार्मिक विचारधारा से प्रेरित था इसलिए स्वामी दयानंद को भारत देश को आजाद करवाने के उद्घोष वाहक मानना चाहिए.
शहीद की मां को प्रणाम कर गयी
पैदा तुझे उस कोख का एहसान है
सैनिकों के रक्त से आबाद हिन्दुस्तान है
तिलक किया मस्तक चूमा बोली ये ले
कफन तुम्हारा मैं मां हूं पर बाद में,
पहले बेटा वतन तुम्हारा …
धन्य है मैया तुम्हारी भेंट में बलिदान में झुक गया है
देश उसके दूध के सम्मान में दे दिया है लाल
जिसने पुत्र मोह छोड़कर चाहता हूं
आंसुओं से पांव वो पखार दूं
ए शहीद की मां आ तेरी मैं आरती उतार लूं

    
sardar kishan singh sardar arjun singh sardar kishan singh

Wednesday, March 5, 2014

शूरता की मिसाल – पंडित लेखराम आर्य मुसाफिर




डॉ विवेक आर्य
पंडित लेखराम इतिहास की उन महान हस्तियों में शामिल हैं जिन्होंने धर्म की बलिवेदी पर प्राण न्योछावर कर दिए. जीवन के अंतिम क्षण तक आप वैदिक धर्म की रक्षा में लगे रहे.. आपके पूर्वज महाराजा रंजित सिंह की फौज में थे इसलिए वीरता आपको विरासत में मिली थी. बचपन से ही आप स्वाभिमानी और दृढ विचारो के थे. एक बार आपको पाठशाला में प्यास लगी. मौलवी से घर जाकर पानी पीने की इजाजत मांगी. मौलवी ने जूठे मटके से पानी पीने को कहाँ. आपने न दोबारा मौलवी से घर जाने की इजाजत मांगी और न ही जूठा पानी पिया. सारा दिन प्यासा ही बिता दिया. पढने का आपको बहुत शोक था. मुंशी कन्हयालाल अलाख्धारी की पुस्तकों से आपको स्वामी दयानंद जी का पता चला. अब लेखराम जी ने ऋषि दयानंद के सभी ग्रंथो का स्वाध्याय आरंभ कर दिया. पेशावर से चलकर अजमेर स्वामी दयानंद के दर्शनों के लिए पंडित जी पहुँच गए. जयपुर में एक बंगाली सज्जन ने पंडित जी से एक प्रश्न किया था की आकाश भी व्यापक हैं और ब्रह्मा भी , दो व्यापक किस प्रकार एक साथ रह सकते हैं ? पंडित जी से उसका उत्तर नहीं बन पाया था. पंडित जी ने स्वामी दयानंद से वही प्रश्न पुछा. स्वामी जी ने एक पत्थर उठाकर कहा की इसमें अग्नि व्यापक हैं या नहीं? मैंने कहाँ की व्यापक हैं, फिर कहाँ की क्या मिटटी व्यापक हैं? मैंने कहाँ की व्यापक हैं, फिर कहाँ की क्या जल व्यापक हैं? मैंने कहाँ की व्यापक हैं. फिर कहाँ की क्या आकाश और वायु ? मैंने कहाँ की व्यापक हैं, फिर कहाँ की क्या परमात्मा व्यापक हैं? मैंने कहाँ की व्यापक हैं.फिर स्वामी जी बोले कहाँ की देखो. कितनी चीजें हैं परन्तु सभी इसमें व्यापक हैं. वास्तव में बात यहीं हैं की जो जिससे सूक्षम होती हैं वह उसमे व्यापक हो जाती हैं. ब्रह्मा चूँकि सबसे अति सूक्षम हैं इसलिए वह सर्वव्यापक हैं. यह उत्तर सुन कर पंडित जी की जिज्ञासा शांत हो गयी. आगे पंडित जी ने पुछा जीव ब्रह्मा की भिन्नता में कोई वेद प्रमाण बताएँ. स्वामी जी ने कहाँ यजुर्वेद का ४० वां अध्याय सारा जीव ब्रह्मा का भेद बतलाता हैं. इस प्रकार अपनी शंकाओ का समाधान कर पंडित जी वापस आकार वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार में लग गए.
शुद्धि के रण में
कोट छुट्टा डेरा गाजी खान (अब पाकिस्तान ) में कुछ हिन्दू युवक मुस्लमान बनने जा रहे थे. पंडित जी के व्याखान सुनने पर ऐसा रंग चड़ा की आर्य बन गए और इस्लाम को तिलांजलि दे दी.इनके नाम थे महाशय चोखानंद, श्री छबीलदास व महाशय खूबचंद जी ,जब तीनो आर्य बन गए तो हिन्दुओं ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया.कुछ समय के बाद महाशय छबीलदास की माता का देहांत हो गया. उनकी अर्थी को उठाने वाले केवल ये तीन ही थे. महाशय खूबचंद की माता उन्हें वापस ले गयी. आप कमरे का ताला तोड़ कर वापिस संस्कार में आ मिले. तीनो युवको ने वैदिक संस्कार से दाह कर्म किया. पौराणिको ने एक चल चली यह प्रसिद्ध कर दिया की आर्यों ने माता के शव को भुन कर खा लिया हैं. यह तीनो युवक मुसलमान बन जाये तो हिन्दुओं को कोई फरक नहीं पड़ता था परन्तु पंडित लेखराम की कृपा से वैदिक धर्मी बन गए तो दुश्मन बन गए. इस प्रकार की मानसिकता के कारण तो हिन्दू आज भी गुलामी की मानसिकता में जी रहे हैं.
जम्मू के श्री ठाकुरदास मुस्लमान होने जा रहे थे. पंडित जी उनसे जम्मू जाकर मिले और उन्हें मुसलमान होने से बचा लिया.
१८९१ में हैदराबाद सिंध के श्रीमंत सूर्यमल की संतान ने इस्लाम मत स्वीकार करने का मन बना लिया. पंडित पूर्णानंद जी को लेकर आप हैदराबाद पहुंचे. उस धनी परिवार के लड़के पंडित जी से मिलने के लिए तैयार नहीं थे. पर आप कहाँ मानने वाले थे. चार बार सेठ जी के पुत्र मेवाराम जी से मिलकर यह आग्रह किया की मौल्वियो से उनका शास्त्राथ करवा दे. मौलवी सय्यद मुहम्मद अली शाह को तो प्रथम बार में ही निरुत्तर कर दिया.उसके बाद चार और मौल्वियो से पत्रों से विचार किया. आपने उनके सम्मूख मुस्लमान मौल्वियो को हराकर उनकी धर्म रक्षा की.
वही सिंध में पंडित जी को पता चला की कुछ युवक ईसाई बनने वाले हैं. आप वहा पहुच गए और अपने भाषण से वैदिक धर्म के विषय में प्रकाश डाला. एक पुस्तक आदम और इव पर लिख कर बांटी जिससे कई युवक ईसाई होने से बच गए.
गंगोह जिला सहारनपुर की आर्यसमाज की स्थापना पंडित जी से दीक्षा लेकर कुछ आर्यों ने १८८५ में करी थी.कुछ वर्ष पहले तीन अग्रवाल भाई पतित होकर मुस्लमान बन गए थे. आर्य समाज ने १८९४ में उन्हें शुद्ध करके वापिस वैदिक धर्मी बना दिया. आर्य समाज के विरुद्ध गंगोह में तूफान ही आ गया. श्री रेह्तूलाल जी भी आर्यसमाज के सदस्य थे. उनके पिता ने उनके शुद्धि में शामिल होने से मन किया पर वे नहीं माने. पिता ने बिरादरी का साथ दिया. उनकी पुत्र से बातचीत बंद हो गयी. पर रेह्तुलाल जी कहाँ मानने वाले थे उनका कहना था गृह त्याग कर सकता हु पर आर्यसमाज नहीं छोड़ सकता हूँ. इस प्रकार पंडित लेखराम के तप का प्रभाव था की उनके शिष्यों में भी वैदिक सिद्धांत की रक्षा हेतु भावना कूट-कूट कर भरी थी.
घासीपुर जिला मुज्जफरनगर में कुछ चौधरी मुस्लमान बनने जा रहे थे. पंडित जी वह एक तय की गयी तिथि को पहुँच गए. उनकी दाड़ी बढ़ी हुई थी और साथ में मुछे भी थी. एक मौलाना ने उन्हें मुस्लमान समझा और पूछा क्यों जी यह दाढ़ी तो ठीक हैं पर इन मुछो का क्या राज हैं. पंडित जी बोले दाढ़ी तो बकरे की होती हैं मुछे तो शेर की होती हैं. मौलाना समाज गया की यह व्यक्ति मुस्लमान नहीं हैं. तब पंडित जी ने अपना परिचय देकर शास्त्रार्थ के लिए ललकारा. सभी मौलानाओ को परास्त करने के बाद पंडित जी ने वैदिक धर्म पर भाषण देकर सभी चौधरियो को मुस्लमान बन्ने से बचा लिया.
१८९६ की एक घटना पंडित लेखराम के जीवन से हमें सर्वदा प्रेरणा देने वाली बनी रहेगी. पंडित जी प्रचार से वापिस आये तो उन्हें पता चला की उनका पुत्र बीमार हैं. तभी उन्हें पता चला की मुस्तफाबाद में पांच हिन्दू मुस्लमान होने वाले हैं. आप घर जाकर दो घंटे में वापिस आ गए और मुस्तफाबाद के लिए निकल गए. अपने कहाँ की मुझे अपने एक पुत्र से जाति के पांच पुत्र अधिक प्यारे हैं. पीछे से आपका सवा साल का इकलोता पुत्र चल बसा. पंडित जी के पास शोक करने का समय कहाँ था. आप वापिस आकार वेद प्रचार के लिए वजीराबाद चले गए.
पंडित जी की तर्क शक्ति गज़ब थी. आपसे एक बार किसी ने प्रश्न किया की हिन्दू इतनी बड़ी संख्या में मुस्लमान कैसे हो गए. अपने सात कारण बताये. १. मुस्लमान आक्रमण में बलातपूर्वक मुसलमान बनाया गया २. मुसलमानी राज में जर, जोरू व जमीन देकर कई प्रतिष्ठित हिन्दुओ को मुस्लमान बनाया गया ३. इस्लामी कल में उर्दू, फारसी की शिक्षा एवं संस्कृत की दुर्गति के कारण बने ४. हिन्दुओं में पुनर्विवाह न होने के कारण व सती प्रथा पर रोक लगने के बाद हिन्दू औरतो ने मुस्लमान के घर की शोभा बढाई तथा अगर किसी हिन्दू युवक का मुस्लमान स्त्री से सम्बन्ध हुआ तो उसे जाति से निकल कर मुस्लमान बना दिया गया. ५. मूर्तिपूजा की कुरीति के कारण कई हिन्दू विधर्मी बने ६. मुसलमानी वेशयायो ने कई हिन्दुओं को फंसा कर मुस्लमान बना दिया ७. वैदिक धर्म का प्रचार न होने के कारण मुस्लमान बने.
अगर गहराई से सोचा जाये तो पंडित जी ने हिन्दुओं को जाति रक्षा के लिए उपाय बता दिए हैं, अगर अब भी नहीं सुधरे तो हिन्दू कब सुधरेगे.
पंडित जी और गुलाम मिर्जा अहमद

पंडित जी के काल में कादियान , जिला गुरुदासपुर पंजाब में इस्लाम के एक नए मत की वृद्धि हुई जिसकी स्थापना मिर्जा गुलाम अहमद ने करी थी. इस्लाम के मानने वाले मुहम्मद साहिब को आखिरी पैगम्बर मानते हैं, मिर्जा ने अपने आपको कभी कृष्ण, कभी नानक, कभी ईसा मसीह कभी इस्लाम का आखिरी पैगम्बर घोषित कर दिया तथा अपने नवीन मत को चलने के लिए नई नई भविष्यवानिया और इल्हामो का ढोल पीटने लगा.

एक उदहारण मिर्जा द्वारा लिखित पुस्तक “वही हमारा कृष्ण ” से लेते हैं इस पुस्तक में लिखा हैं – उसने (ईश्वर ने) हिन्दुओं की उन्नति और सुधर के लिए निश्कलंकी अवतार को भेज दिया हैं जो ठीक उस युग में आया हैं जिस युग की कृष्ण जी ने पाहिले से सुचना दे रखी हैं. उस निष्कलंक अवतार का नाम मिर्जा गुलाम अहमद हैं जो कादियान जिला गुरुदासपुर में प्रकट हुए हैं. खुदा ने उनके हाथ पर सहस्त्रो निशान दिखये हैं. जो लोग उन पर इमान लेट हैं उनको खुदा ताला बड़ा नूर बख्शता हैं. उनकी प्रार्थनाए सुनता हैं और उनकी सिफारिश पर लोगो के कास्ट दूर करता हैं. प्रतिष्ठा देता हैं. आपको चाहिए की उनकी शिक्षाओ को पढ़ कर नूर प्राप्त करे. यदि कोई संदेह हो तो परमात्मा से प्रार्थना करे की हे परमेश्वर? यदि यह व्यक्ति जो तेरी और से होने की घोषणा करता हैं और अपने आपको निष्कलंक अवतार कहता हैं. अपनी घोषणा में सच्चा हैं तो उसके मानने की हमे शक्ति प्रदान कर और हमारे मन को इस पर इमान लेन को खोल दे. पुन आप देखेगे की परमात्मा अवश्य आपको परोक्ष निशानों से उसकी सत्यता पर निश्चय दिलवाएगा. तो आप सत्य हृदय से मेरी और प्रेरित हो और अपनी कठिनाइयों के लिए प्रार्थना करावे अल्लाह ताला आपकी कठिनाइयों को दूर करेगा और मुराद पूरी करेगा. अल्लाह आपके साथ हो. पृष्ठ ६,७.८ वही हमारा कृष्ण.

पाठकगन स्वयं समझ गए होंगे की किस प्रकार मिर्जा अपनी कुटिल नीतिओ से मासूम हिन्दुओं को बेवकूफ बनाने की चेष्ठा कर रहा था पर पंडित लेखराम जैसे रणवीर के रहते उसकी दाल नहीं गली.

पंडित जी सत्य असत्य का निर्णय करने के लिए मिर्जा के आगे तीन प्रश्न रखे.

१. पहले मिर्जा जी अपने इल्हामी खुदा से धारावाही संस्कृत बोलना सीख कर आर्यसमाज के दो सुयोग्य विद्वानों पंडित देवदत शास्त्री व पंडित श्याम जी कृष्ण वर्मा का संस्कृत वार्तालाप में नाक में दम कर दे.

२. ६ दर्शनों में से सिर्फ तीन के आर्ष भाष्य मिलते हैं. शेष तीन के अनुवाद मिर्जा जी अपने खुदा से मंगवा ले तो मैं मिर्जा के मत को स्वीकार कर लूँगा.

३. मुझे २० वर्ष से बवासीर का रोग हैं . यदि तीन मास में मिर्जा अपनी प्रार्थना शक्ति से उन्हें ठीक कर दे तो में मिर्जा के पक्ष को स्वीकार कर लूँगा.

पंडित जी ने उससे पत्र लिखना जारी रखा. तंग आकर मिर्जा ने लिखा की यहीं कादियान आकार क्यों नहीं चमत्कार देख लेते. सोचा था की न पंडित जी का कादियान आना होगा और बला भी टल जाएगी.पर पंडित जी अपनी धुन के पक्के थे मिर्जा गुलाम अहमद की कोठी पर कादियान पहुँच गए. दो मास तक पंडित जी क़दियन में रहे पर मिर्जा गुलाम अहमद कोई भी चमत्कार नहीं दिखा सका.

इस खीज से आर्यसमाज और पंडित लेखराम को अपना कट्टर दुश्मन मानकर मिर्जा ने आर्यसमाज के विरुद्ध दुष्प्रचार आरंभ कर दिया.

मिर्जा ने ब्राहिने अहमदिया नामक पुस्तक चंदा मांग कर छपवाई. पंडित जी ने उसका उत्तर तकज़ीब ब्राहिने अहमदिया लिखकर दिया.

मिर्जा ने सुरमाये चश्मे आर्या (आर्यों की आंख का सुरमा) लिखा जिसका पंडित जी ने उत्तर नुस्खाये खब्ते अहमदिया (अहमदी खब्त का ईलाज) लिख कर दिया. मिर्जा ने सुरमाये चश्मे आर्या में यह भविष्यवाणी करी की एक वर्ष के भीतर पंडित जी की मौत हो जाएगी. मिर्जा की यह भविष्यवाणी गलत निकली और पंडित इस बात के ११ वर्ष बाद तक जीवित रहे.

पंडित जी की तपस्या से लाखों हिन्दू युवक मुस्लमान होने से बच गए. उनका हिन्दू जाती पर सदा उपकार रहेगा.

पंडित जी का अमर बलिदान

मार्च १८९७ में एक व्यक्ति पंडित लेखराम के पास आया. उसका कहना था की वो पहले हिन्दू था बाद में मुस्लमान हो गया अब फिर से शुद्ध होकर हिन्दू बनना चाहता हैं. वह पंडित जी के घर में ही रहने लगा और वही भोजन करने लगा. ६ मार्च १८९७ को पंडित जी घर में स्वामी दयानंद के जीवन चरित्र पर कार्य कर रहे थे . तभी उन्होंने एक अंगराई ली की उस दुष्ट ने पंडित जी को छुरा मर दिया और भाग गया. पंडित जी को हस्पताल लेकर जाया गया जहाँ रात को दो बजे उन्होंने प्राण त्याग दिए. पंडित जी को अपने प्राणों की चिंता नहीं थी उन्हें चिंता थी तो वैदिक धर्म की. उनका आखिरी सन्देश भी यही थे की “तहरीर (लेखन) और तकरीर (शास्त्रार्थ) का काम बंद नहीं होना चाहिए ” .पंडित जी का जीवन आज के हिन्दू युवको के लिए प्रेरणा दायक हैं की कभी विधर्मियो से डरे नहीं और जो निशक्त हैं उनका सदा साथ देवे.

- डॉ विवेक आर्य