Friday, December 18, 2015

संसार में सभी कुछ में ईश्वर बसा हुआ है।



संसार में सभी कुछ में ईश्वर बसा हुआ है।

एक धनी सेठ थे। बड़े उदार और परपकारी थे।  जो भी संत उनके शहर में आता था। वे उनकी सेवा-सुश्रुता करने से पीछे नहीं हटते थे। सेठ जी के दान-पुण्य की ख्याति दूर दूर तक फैल गई थी। उनके कार्यों की जब चारों और प्रशंसा होने लगी तो सेठ जी को अपने सद्गुणों और प्रतिष्ठा का धीरे धीरे अहंकार भी होने लगा। एक बार एक संत उनके शहर में पधारे। सेठ जी ने उन्हें अपने आवास पर पधार कर कृतार्थ करने की प्रार्थना करी।  संत निश्चित समय पर सेठ जी के बंगले पर पहुंच गए। सेठ जी संत को अपना भव्य बंगला दिखाने लगे। संत अलमस्त थे परन्तु सेठ जी अपने बड़प्पन की डींगे हाकनें में व्यस्त थे। आखिर में संत ने सेठ जी को उपदेश देने का मन बनाया। संत ने सेठ जी से दिवार पर टंगे हुए मानचित्र पर ईशारा  करते हुए पूछा ,"सेठ जी इस मानचित्र में आपका शहर कौन सा हैं?" सेठ ने मानचित्र पर एक बिंदु पर उंगली टिकाई। संत ने हैरानी करते हुए कहा,"इतने बड़े मानचित्र पर तुम्हारा शहर बस इतना सा ही हैं? क्या तुम इस नक़्शे पर अपना बंगला दिखा सकते हो?" सेठ ने उत्तर दिया,"इतने बड़े नक़्शे में मेरा बंगला कहां दिखेगा? वह तो ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है।" संत ने पूछा, "सेठ जी तो फिर इस धन-सम्पदा का इतना अभिमान किस बात का?" शर्म के मारे सेठ जी का सर झुक गया। वे समझ गए कि दुनिया और ब्रह्माण्ड की बात क्या करना, इस छोटे से नक़्शे में उनका नामो निशान तक नहीं है। अपनी अज्ञानता के कारण वह बेवजह स्वयं को अति महत्वपूर्ण मान अपने पर अभिमान कर रहे हैं। आज मनुष्य तुच्छ सांसारिक साधनों को एकत्र कर अभिमानी बन जाता हैं। वह भूल जाता है कि इस जगत में जो कुछ भी दिखनेवाला है उस सब में ईश्वर बसा हुआ हैं।

यजुर्वेद 40/1 में इसी सन्देश को सुन्दर शब्दों में बखान करते हुए लिखा है कि  इस संसार में जो कुछ भी दिखनेवाला हैं। यह सभी कुछ ईश्वर से व्याप्त है अर्थात ईश्वर सब में बसा हुआ है। अत: इस संसार के समस्त ऐश्वर्य और धन आदि को तो त्याग की इच्छा से भोग कर। किसी दूसरे के धन की कभी इच्छा मत कर। मनुष्य जो कुछ भोगता है उससे उसकी शारीरिक, आत्मिक और मानसिक पुष्टि हो। वह ईश्वर के कार्यों और ईश्वर की सेवा के लिए हो। यही इस संसार में भोग करने का सर्व श्रेष्ठ नियम है।

डॉ विवेक आर्य  

Thursday, December 17, 2015

क्या वेदों में जादू-टोना आदि अन्धविश्वास का वर्णन हैं?



क्या वेदों में जादू-टोना आदि अन्धविश्वास का वर्णन हैं?



वेदों के विषय में एक भ्रान्ति प्रचलित हो गई है कि वेदों में जादू-टोने आदि अन्धविश्वास का वर्णन हैं। इसका मुख्य कारण सायणाचार्य, महीधर आदि द्वारा वेदों के कुछ प्रकरणों में जादू-टोना को अन्धविश्वास के रूप में अपने भाष्य में वर्णन हैं। विदेशी लेखकों जैसे ब्लूमफील्ड[i] आदि भी इस मान्यता का समर्थन करते दीखते हैं। अनेक भारतीय लेखक भी उन्हीं का अनुसरण कर इसी मान्यता का समर्थन करते प्रतीत होते हैं[ii]। वैदिक विद्वान श्री प्रियरत्न आर्ष[iii] के अनुसार जादू शब्द वेद के "यातु" शब्द का रूपान्तर या अपभ्रश है। यातु शब्द का अर्थ निघण्टु 2/19 के अनुसार हिंसा है। अथर्ववेद 8/8/6/18 में जादू, इंद्रजाल आदि का प्रयोग शत्रु सेना को नष्ट करने के लिए हुआ हैं जो पूर्ण रूप से वैज्ञानिक एवं सत्य है। जबकि तांत्रिक ग्रंथों में जादू-टोने के नाम पर कल्पित और अवैज्ञानिक वर्णन मिलते हैं। इस विषय में रामदास गौड़ की हिंदुत्व नामक पुस्तक में लिखते है कि "तंत्रोक्त, मरणोच्चाटन, वशीकरण, अभिचारिक क्रिया का प्रसंग अथर्ववेद संहिता में पाया जाता है सही, किन्तु तन्त्र के अन्यान्य प्रधान लक्षण नहीं मिलते। ऐसी दशा में तंत्र को हम अथर्व संहितामूलक नहीं कह सकते"। अथर्ववेद के विभिन्न मन्त्रों में शारीरिक और मानसिक रोगों का उपचार , शत्रु घात,अपने अंदर के रोगों और दोषों को हटाकर स्वास्थ्य एवं अच्छे गुणों को ग्रहण करने का सन्देश दिया गया हैं। इन मन्त्रों के मूल सन्देश को न समझ पाने के कारण इस भ्रान्ति का प्रचलन हुआ।

हम यहाँ अथर्ववेद के कुछ सूक्तो एवं मंत्रो पर विचार कर यह सिद्ध करेगे की वेदों में जादू टोना या अश्लीलता नहीं है। अथर्ववेद के सूक्तों में मणि शब्द का प्रयोग कई स्थानों पर हुआ है। सायण आदि भाष्यकारों ने मणि का अर्थ वह पदार्थ किया हैं जिसे शरीर के किसी अंग पर बांधकर मंत्र का पाठ करने से अभिष्ट फल के प्राप्ति अथवा किसी अनिष्ट का निवारण किया जादू टोने से किया जा सकता हैं। मणि अथवा रत्न शब्द किसी भी अत्यंत उपयोगी अथवा मूल्यवान वस्तु के लिए प्रयोग हुआ हैं। उस वस्तु को अर्थात मणि को शरीर से बांधने का अर्थ है उसे वश में कर लेना, उसका उपयोग लेना, उसका सेवन करना आदि।

कुछ मणि सूक्त इस प्रकार हैं



1. पर्णमणि- अथर्ववेद 3/5 सूक्त का अर्थ करते हुए सायण आचार्य लिखते हैं “जो व्यक्ति तेज, बल, आयु और धन आदि को प्राप्त करना चाहता हो, वह पर्ण अर्थात दाक के वृक्ष की बनी हुई मणि को त्रयोदशी के दिन दही और सहद में भिगोकर तीन दिन रखे और चौथे दिन निकलकर उस मणि को इस सूक्त के मंत्रो का पाठ करके बांध ले और दही और शहद को खा ले। इसी सूक्त में सायण लिखते हैं की यदि किसी राजा का राज्य छीन जाये तो काम्पील नमक वृक्ष की टहनियों से चावल पकाकर मंत्र का पाठ कर ग्रहण करे तो उसे राज्य की प्राप्ति हो जाएगी।”

सायण का अर्थ अगर इतना कारगर होता तो भारत के लोग जो की वेदों के ज्ञान से परिचित थे कभी भी पराधीन नहीं बनते, अगर बनते तो जादू टोना करके अपने आपको फिर से स्वतंत्र कर लेते। पर्ण का अर्थ होता हैं पत्र और मणि का बहुमूल्य इससे पर्णमणि का अर्थ हुआ बहुमूल्य पत्र। अगर कोई व्यक्ति राज्य का राजा बनना चाहता है तो राज्य के नागरिको का समर्थन (vote or veto) जो की बहुमूल्य है, उसे प्राप्त हो जाये तभी वह राजा बन सकता हैं। इसी सूक्त के दुसरे मंत्र में प्रार्थना हैं की राज्य के क्षत्रियो को मेरे अनुकूल कर, तीसरे मंत्र में राज्य के देव अर्थात विद्वानों को अनुकूल कर, छठे में राज्य के धीवर, रथकार लोग, कारीगर लोग, मनीषी लोग हैं उनके मेरे अनुकूल बनाने की प्रार्थना करी गई हैं। इस प्रकार इस सूक्त में एक अभ्यर्थी की राष्ट्र के नेता बनने की प्रार्थना काव्यमय शैली में पर्ण-मणि द्वारा व्यक्त करी गयी हैं। जादू टोने का तो कहीं पर नामो निशान ही नहीं है।



2. जांगिडमणि

अथर्ववेद 2/4 सूक्त तथा 19/34-35 सूक्तों में जांगिडमणि की महिमा बताते हुए सायण लिखते हैं “जो व्यक्ति कृत्या (हिंसा) से बचना चाहता हो, अपनी रक्षा चाहता हो तथा विघ्नों की शांति चाहता हो, वह जांगिड पेड़ से बनी विशेष प्रकार की मणि को शण (सन) के धागे में पिरोकर मणि बांधने की विधि से इस सूक्त के मंत्रो को पड़कर बांध ले।” उसका मंतव्य पूर्ण हो जायेगा।

अथर्ववेद के इन सूक्तों का ध्यान से विश्लेषण करने पर पता चलते हैं की जांगिड किसी प्रकार की मणि नहीं हैं, जिसको बांधने से हिंसा से रक्षा हो सके अपितु एक औषधि है जो भूमि से उत्पन्न होने वाली वनस्पति हैं , जो रोगों का निवारण करने वाली है। (अथर्व 19/34/9) रोगों की चिकित्सा करने वाली हैं (अथर्व 19/35/1,अथर्व 19/35/5, अथर्व 2/4/3) इस सूक्त में जो राक्षसों को मारने की बात कहीं गयी हैं। वो रोगजनक कृमिरूप (Microbes) शत्रु हैं जो रोगी बनाते हैं।

यहाँ भी कहीं जादू टोने का नहीं अपितु आयुर्वेद का वर्णन हैं

3. शंखमणि

अथर्ववेद 4/10 सूक्त में शंखमणि का वर्णन हैं. सायण के अनुसार उपनयन संस्कार के पश्चात बालक की दीर्घ आयु के लिए शंख को इस सूक्त के मंत्रो के साथ बांध दे तथा यह भी लिखा हैं बाढ़ आ जाने पर रक्षा करने के लिए भी शंख बांध लेने से डूबने का भय दूर हो जाता हैं।

सायण का मंतव्य विधान रूप से असंभव हैं अगर शंख बांधने से आयु बढ़ सकती हैं तो सायण ने स्वयं अपनी आयु क्यों नहीं बढाकर 100 वर्ष से ऊपर कर ली होती। अगर शंख बांधने से डूबने का खतरा नहीं रहता, तब तो किसी की भी डूबने से मृत्यु ही नहीं होती। सत्य यह है शंख को अथर्ववेद 4/10/3 में विश्व भेसज अर्थात अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 4/10/1 में रोगों को दुर्बल करने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 4/10/2 में शंख को कृमि राक्षस को मरने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 4/10/4 में शंख को आयु बढाने वाली औषधि बताया गया है। आयुर्वेद में शंख को बारीक़ पिस कर शंख भस्म बनाए का वर्णन हैं जिससे अनेक रोगों से मुक्ति मिलती हैं।

4. शतवारमणि

अथर्ववेद 19/36 सूक्त का भाष्य करते हुए सायण लिखते हैं “जिस व्यक्ति की संताने मर जाती हो और इस प्रकार उसके कुल का क्षय हो रहा हो , वह इस सूक्त के मंत्रो को पढकर शतवारमणि को बांध ले तो उसका यह संकट दूर हो जाता है। ”

शतवारमणि कोई जादू टोने करने वाली वस्तु नहीं हैं अपितु एक औषधी है जिससे शरीर को बल मिलता है और रोगों का नाश होता हैं।

ऊपर की पंक्तियो में हमने चार मणियो की समीक्षा पाठको के सम्मुख दी गई है। इनमे किसी में भी जादू टोने का उल्लेख नहीं है। प्रत्युत चार गुणकारी औषधियो का वर्णन हैं। जिनसे रोगनिवारण में बहुत उपयोगी होने के कारण मूल्यवान मणि कह दिया गया हैं।

5. कृत्या और अभिचार

अथर्ववेद में बहुत से स्थलों (19/34/4,2/4/6,8/5/2) पर कृत्या-अभिचार के प्रयागों का वर्णन मिलता है। सायण के भाष्य को पढ़ कर लगता हैं की अभिचार शब्द का अर्थ हैं किसी शत्रु को पीड़ा पहुचाने के लिए, उसे रोगी बनाने के लिए अथवा उसकी मृत्यु के लिए कोई विशेष हवन अथवा कर्म काण्ड का करना। कृत्या का अर्थ हैं ऐसे यज्ञ आदि अनुष्ठान द्वारा किसी की हिंसा कर उसे मार डालना।

अभिचार का अर्थ बनता हैं विरोधी द्वारा शास्त्रों से प्रहार अथवा आक्रमण तथा कृत्या का अर्थ बनता हैं उस प्रहार से हुए घाव बनता हैं। मणि सूक्त की औषधियो से उस घाव की पीड़ा को दूर किया जा सकता हैं। यही इन मन्त्रों का मूल सन्देश हैं।

इस प्रकार जहाँ भी वेदों में मणि आदि का उल्लेख हैं। वह किसी भी प्रकार जादू टोने से सम्बंधित नहीं हैं। आयुर्वेद के साथ अथर्ववेद का सम्बन्ध कर के विभिन्न औषधियो को अगर देखे तो मणि शब्द से औषधी का अर्थ स्पष्ट हो जाता हैं।

अथर्ववेद को विनियोगो की छाया से मुक्त कर स्वंत्र रूप से देखे तो वेद मंत्र बड़ी सुंदर और जीवन उपयोगी शिक्षा देने वाले दिखने लगेगे और अथर्ववेद में जादू टोना होने के मिथक की भ्रान्ति दूर होगी।

डॉ विवेक आर्य


[i] Hymns of the Atharva Veda translated by Maurice Bloomfield Sacred Books of the East, Vol. 42,1897


[ii] The Atharva Veda is the chief source of our knowledge of popular magic, hypnotism, black magic etc. P.6 Hinduism: Analytical Study by Amulya Mohapatra, Bijaya Mohapatra


[iii] अथर्ववेदीय मन्त्रविद्या पृष्ठ 2

Tuesday, December 15, 2015

विभिन्न धर्मों में पाप-पुण्य को लेकर मान्यताओं की तुलना



विभिन्न धर्मों में पाप-पुण्य को लेकर मान्यताओं की तुलना

1. ईसाइयत- हर व्यक्ति जन्म से पापी हैं क्यूंकि सृष्टि के आदि में हव्वा (Eve) और आदम (Adam) ने बाइबिल के ईश्वर के आदेश की अवमानना की थी। इसलिए ईश्वर ने हव्वा को शाप देकर पापी करार दिया था। इस पाप से बचाने वाला केवल एक मात्र ईसा मसीह है क्यूंकि वह पापों को क्षमा करने वाला है। इसलिए केवल ईसा मसीह पर विश्वास लाने वाला ही स्वर्ग का अधिकारी होगा। इसलिए ईसा मसीह को मानो और अपने पाप से मुक्ति प्राप्त करो। क्यूंकि केवल ईसा मसीह ही मुक्ति प्रदाता है।पापों को करने से रोकने के स्थान पर ईसा मसीह पर विश्वास को अधिक महत्व दिया गया हैं। यह मान्यता एक पाखंड के समान दिखती हैं कि अगर कोई व्यक्ति कोई भी पाप कर्म न करे मगर ईसा मसीह पर विश्वास न करे तो भी वह नरक में जायेगा क्यूंकि वह जन्म से पापी हैं।

2. इस्लाम- पाप न करने के लिए कुछ आयतों के माध्यम से सन्देश अवश्य दिया गया है। मगर पाप को न करने से अधिक महत्व इस्लाम की मान्यताओं को दिया गया हैं। मुस्लिम समाज के लिए आचरण से अधिक महत्वपूर्ण मान्यताएं हैं। जैसे ईद की दिन निर्दोष पशुओं की हत्या करना उनके लिए पाप नहीं हैं क्यूंकि यह इस्लामिक मान्यता हैं। जैसे जिहाद के नाम पर निर्दोषों को मारना भी पाप नहीं हैं, अपितु पुण्य का कार्य हैं क्यूंकि इसके परिणाम स्वरुप जन्नत और हूरों के भोग की प्राप्ति होगी। क़ुरान के ईश्वर अल्लाह से अधिक महत्वपूर्ण पैगम्बर मुहम्मद साहिब प्रतीत होते हैं। यह मान्यता है, यह विश्वास है। इस्लाम में पाप-पुण्य कर्म से अधिक मान्यताओं को महत्व उसे धर्म नहीं अपितु मत सिद्ध करता हैं।

3. वेदों में मनुष्य और ईश्वर के मध्य न कोई मुक्तिदाता हैं, न कोई मध्यस्थ हैं। मनुष्य और ईश्वर का सीधा सम्बन्ध हैं। मान्यता या विश्वास से अधिक सत्यता एवं यथार्थ को महत्व दिया गया हैं। सम्पूर्ण वेदों में अनेक मंत्र मनुष्य को पाप कर्म न करने एवं केवल पुण्य कर्म करे का सन्देश देते हैं। वेद पाप क्षमा होना नहीं मानता। क्यूंकि कर्मफल सिद्धांत के अनुसार जो जैसा कर्म करेगा वैसा फल प्राप्त करेगा। पाप क्षमा होने से मनुष्य कभी पाप क्षमा करना नहीं छोड़ेगा अपितु भय मुक्त होकर ओर अधिक पापी बनेगा। वेद मनुष्य को पाप कर्मों का त्याग करने के लिए संकल्प करने का सन्देश देते हैं। संकल्प को प्रबल बनाने के लिए वेद ईश्वर कि स्तुति प्रार्थना एवं उपासना कर आध्यात्मिक उन्नति करने का विधान बताते हैं। जितना जितना मनुष्य उन्नति करता जायेगा, पाप आचरण से विमुख होता जायेगा। उतना उतना उसके कर्म पुण्य मार्ग को प्रशस्त करेंगे। वैदिक विचारधारा में मनुष्य के कर्म सर्वोपरि है न की मान्यता, विश्वास अथवा मध्यस्ता। व्यवहारिक, क्रियात्मक एवं प्रयोगात्मक दृष्टि से केवल वेदों की कर्मफल व्यवस्था सत्य के सबसे निकट हैं।

वेद में पाप निवारण के लिए अनेक मंत्र दिए गए हैं जिनमें मनुष्य ईश्वर से ऐसी मति, ऐसी बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना करता हैं जिससे वह केवल और केवल सत्य मार्ग पर चलता रहे और पाप कर्म से सर्वथा दूर रहे। मनुष्य इन मन्त्रों का अनुष्ठान करते हुए यह संकल्प लेता हैं की वह पाप कर्म से सदा दूर रहेगा।

आइये इन मन्त्रों को ग्रहण कर, उनका चिंतन मनन कर, उन्हें अपने जीवन में शाश्वत करे जिससे हमारा जीवन सफल हो जाये।

१.प्राणी जगत का रक्षक, प्रकृष्ट ज्ञान वाला प्रभु हमें पाप से छुडाये- अथर्वेद ४/२३/१

२.हे सर्वव्यापक प्रभु जैसे मनुष्य नौका द्वारा नदी को पार कर जाते हैं, वैसे ही आप हमें द्वेष रुपी नदी से पार कीजिये. हमारा पाप हमसे पृथक होकर दग्ध हो जाये- अथर्ववेद ४/३३/७

३.हे ज्ञान स्वरुप परमेश्वर हम विद्वान तेरे ही बन जाएँ. हमारा पाप तेरी कृपा से सर्वथा नष्ट कर दे- ऋग्वेद १/९७/४

४. हे मित्रावरुणो अर्थात अध्यापकों उपदेशकों आपके नेतृत्व में अर्थात आपकी कृपा से गड्डे की तरह गिराने वाले पापों से में सर्वथा दूर हो जाऊ- ऋग्वेद २/२७/५

५.हे ज्ञानस्वरूप प्रभु आप हमे अज्ञान को दूर रख पाप को दूर करों- ऋग्वेद ४/११/६

६.इस शुद्ध बुद्धि से हम भगवान के भक्त बनें और पाप से बिलकुल परे चले जाएँ- ऋग्वेद ७/१५/१३

७.हे प्रभु तू पाप से हमारी रक्षा कर , पाप की कामना करने वाले व्यक्ति से भी दिन रात निरंतर हमारी रक्षा कर – ऋग्वेद ७/१५/१५

८.हे मित्रा वरुणो आपके बताये हुए सत्य मार्ग से चलकर नौका से नदी की तरह पापरूपी नदी को तैर जाएँ- ऋग्वेद ७/६५/३

९.हे सर्वज्ञ प्रभु आप मेरी सदा रक्षा करे मुझे कभी पाप की इच्छा रखने वाले दुष्ट बुद्धि वाले मनुष्य की संगती में मत पड़ने दे.- ऋग्वेद ८/७१/७

१०.निष्पापता की उत्सुकता इस सभी मन्त्रों में प्रकट की गयी हैं. प्रभु का सर्वव्यापकता तथा सर्वज्ञान गुण पाप दूर करने में सहायक होता हैं. सर्वव्यापक प्रभु हमारे द्वारा कहीं भी किये गए पाप कर्म को जान लेते हैं और यह प्रभु की न्याय व्यस्था ही हैं की किसी भी मनुष्य द्वारा किया गया पाप कर्म उसे दण्डित करने का हेतु बनता हैं. जो जैसा करेगा वैसा भरेगा का सिद्धांत स्पष्ट रूप से ईश्वर की कर्म फल व्यस्था को सिद्ध करता हैं. मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं और उसका फल पाने के लिए परतंत्र हैं, परतंत्रता का अर्थ ईश्वर का गुलाम अथवा मनुष्य द्वारा किये जाने वाले कर्मों में बध्यता नहीं हैं अपितु पुण्य कर्म का फल सुख और पाप कर्म का फल दुःख हैं. इसलिए वेद भगवान अपने सन्देश द्वारा समस्त मानव जाति को पाप कर्म से दूर रहने का सन्देश दे रहे हैं.

११.हे प्रभु! आप सर्वव्यापक और सर्वज्ञाता हैं .आपकी सर्वव्यापकता तथा सर्वज्ञता को जानकर हम कभी पाप में प्रवित न हो- ऋग्वेद १/१७/८

१२. हे ज्ञान के स्वामिन! जिसकी तुम रक्षा करते हो उसके पास कहीं से भी पाप नहीं फाटक सकता और न दुःख आ सकता हैं- ऋग्वेद २/२३/५

पाप निवारण के उपाय हैं

पाप वृति को वशीभूत करने से ,दृढ संकल्प से ,यज्ञ से , सत्य संकल्प करने से, पापों में दोष दर्शन से और पापों के त्याग की कामना पाप निवारण के उपाय हैं .

वेद भगवान बड़े ही आत्मीय शब्दों में पाप निवारण के उपाय बताते हैं.

१. पाप वृति को वशीभूत करना

हे पाप! मुझे छोड़ दे, हमारे वशीभूत होकर , हमको सुखी कर . कुटिलता से अलग करके हमे कल्याण और सुख के लोक में स्थापित कर. – अथर्ववेद ६/२६/१

सत्य हैं की जब मनुष्य पाप करने वाली वृतियों को वश में कर लेता हैं तब मनुष्य सुखी हो जाता हैं. मनुष्य का चित शांत और संतुष्ट हो जाता हैं. ऋग्वेद १/१८९/१ में कुटिलता को, उलटे कर्म को पाप कहा गया हैं. इसलिए जब तक कुटिलता रहती हैं तब तक मनुष्य भद्र नहीं बन सकता हैं. मनुष्य को अंतत अपने मन को स्वाभाविक सरल अवस्था में रखना भी पापों से छुटने का उपाय हैं. इसके लिखे मन को कुटिलता से पृथक करके पापवृति को वशीभूत करना होगा.

२. दृढ संकल्प से

हे पाप! जो तू हमें नहीं छोड़ता हैं तब हम ही तुझे छोड़ देते हैं- अथर्ववेद ६/२६/२

दृढ संकल्प के द्वारा हम अपने मन को पाप कर्म से दूर करे. अगर मन को पक्का कर सत्य मार्ग पार चलेगे तभी पाप से विमुख रहेगे.

३. यज्ञ से

मेरे जो किये हुए यज्ञ- देवपूजन, सत्संग और दान हैं , वे मुझे प्राप्त रहें. मेरे मन का संकल्प सत्य हो. मैं किसी भी पाप को न प्राप्त होऊं. इस विषय में सब देव मरी पूर्ण रक्षा करें- अथर्ववेद ५/३/४

वेद के इस मंत्र में स्पष्ट हैं की मनुष्य अपने सत्कर्मों में सदा लगा रहे और सत्य का संकल्प कर पाप कर्मों से दूर रहे.इसका अर्थ स्पष्ट हैं की मनुष्य अपने मन को श्रेष्ठ कर्मों इतना लीन कर ले की उसके पास पाप कर्म करने का समय ही न हो.

स्वामी दयानंद के जीवन में भी इस प्रकार का एक उदहारण हमें मिलता हैं किसी व्यक्ति ने उनसे पूछा की महाराज क्या आपको वासना नहीं सताती .स्वामी दयानंद ने उत्तर दिया की समय ही नहीं मिलता. स्वामी जी का सम्पूर्ण जीवन यज्ञमय और श्रेष्ठ कर्मों को पूर्ण करने में व्यस्त था इसलिए वे पाप कर्म से बचते गए और अंत में सर्वश्रेष्ठ सुख मोक्ष के भागी बने. इस मंत्र को स्वामी दयानंद ने साक्षात् रूप से अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था.

४. पापों में दोष दर्शन से और पापों की कामना का त्याग

हे मानसिक पाप ! दूर हट जा,तू क्यूँ अप्रस्त कामों की प्रशंसा करता हैं. दूर चला जा, मैं तुझे नहीं चाहता- अथर्ववेद ६/४५/१

पाप तीन प्रकार के होते हैं- मानसिक, शारीरिक और वाचिक. शारीरिक और वाचिक पापों की उत्पत्ति मानसिक पापों के द्वारा ही होती हैं. यदि मन में कोई पाप नहीं हैं तो वाणी और शरीर द्वारा भी कोई पाप नहीं होगा. दूर चला जा, मैं तुझे नहीं चाहता -इस प्रकार के वाक्यों से व्यक्त रूप में या मानसिक रूप में पाप के विरुद्ध दृढ भावना पैदा होती हैं. इस प्रकार यदि कोई व्यक्ति पापों के विरुद्ध लगातार वाचिक और मानसिक अभ्यास करेगा तो वह अवश्य ही उन पर विजय पा लेगा. इस प्रकार अभ्यासी के मन में पापों के लिए घृणा पैदा होती हैं.अत: प्रत्येक मनुष्य को इस प्रकार का अभ्यास कर पापों की कामना का त्याग करना चाहिए.

पाप निवारण का फल

वेद भगवान अथर्ववेद १६/६/१ में कहते हैं- हम आज ही पापरहित हो गए हैं. हम आज ही विजय कर लेंगे और सुख, शांति और आनंद का भोग करेंगे.

आइये अंग्रेजी भाषा में एक proverb हैं की prevention is always better than cure अर्थात बचाव ईलाज से हमेशा उत्तम हैं. दुःख, अशान्ति आदि से बचने के लिए एक मात्र उपाय ईश्वर प्रदित मार्ग पर चलते हुए पाप कर्मों से दूर रहना हैं. वेद भगवान का सन्देश अपने जीवन में आत्मसात कर ही ऐसा संभव हैं.

डॉ विवेक आर्य

Wednesday, December 9, 2015

मन के पाप को दूर करने का संकल्प



मन के पाप को दूर करने का संकल्प

एक साधु महात्मा थे। एक गांव के समीप वे अपनी झोपड़ी बनाकर रहते थे। नित्य सत्संग करना, ईश्वर का ध्यान करना एवं उपदेश से लोगों का आचरण पवित्र करना उनकी दिनचर्या का भाग था। उनका दैनिक नियम था कि वह भिक्षा लेने गांव के घरों में जाते थे। एक दिन भिक्षा देने वाली माता जी ने महात्मा जी से  भिक्षा के साथ उपदेश सुनाने का आग्रह किया। महात्मा जी ने अपने कमंडल में भिक्षा ग्रहण करते हुए कहा की आपको कल उपदेश सुनाएंगे। अगले दिन महात्मा जी अपने भिक्षा लेने हेतु उन्हीं माता जी के घर पहुंच गए। माता जी जैसे ही कमंडल में भिक्षा डालने लगी तो उन्होंने देखा की कमंडल पहले से ही मिटटी से भरा हुआ हैं। उन्होंने महात्मा जी से कहा कि यह कमंडल तो पहले से ही भरा हुआ और गन्दा है। इसमें भिक्षा कैसे डाले?  महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया। माता यही उपदेश तो मैं देना चाहता था। आज समाज के हर व्यक्ति के मन में पाप, परनिंदा, लोभ, मोह रूपी मैल भरी पड़ी हैं। जब तक वह मन कि मैल को दूर नहीं करेगा।  तब तक उसमें यथार्थ ज्ञान का प्रवेश कैसे होगा? जब तक यथार्थ ज्ञान नहीं होगा। तब तक श्रेष्ठ आचरण कैसे होगा? जब तक श्रेष्ठ आचरण नहीं होगा। तब तक सुख की प्राप्ति कैसे होगी? उन माता ने महात्मा जी का उत्तम उपदेश देने के लिए धन्यवाद दिया एवं उत्तम कार्यों को करने का संकल्प किया।
वेद में मन के मैल अर्थात पाप आदि को दूर हटाने का उपाय बताया गया हैं। अथर्ववेद 6/45/1 में प्रार्थना करने वाला व्यक्ति संकल्प लेते हुए लिखता है ओ मन के पाप ! तू परे चला जा क्यूंकि तू निन्दित बातों को पसंद करता है। तू मुझसे दूर चला जा। मैं तुझे नहीं चाहता हूँ। मैं तेरा एकांत जंगल में वृक्षों के मध्य त्याग करता हूँ। मेरा मन गृहस्थ आश्रम के कर्तव्य अर्थात परिवार के उचित पालन में स्थिर हो। इस मंत्र में मन में पाप आदि बुरे कार्यों को मन से निकालने के लिए पहले उनसे घृणा करने, फिर उनका त्याग करने और अंत में जीवन के कर्तव्यों का पालन करने का सन्देश दिया गया हैं।

डॉ विवेक आर्य  

क्या वेदों में इतिहास हैं?











क्या वेदों में इतिहास हैं?



वेदों के विषय में एक शंका सदा देखने को मिलती हैं कि क्या वेदों में इतिहास हैं? हिन्दू समाज श्री राम, कृष्ण, गणेश, विभिन्न देवी-देवता जैसे इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि से लेकर भौगोलिक पर्वत, राजाओं के राज्य आदि का वर्णन मानता हैं। जबकि विभिन्न मत-मतान्तर अपने अपने मत प्रवर्तक जैसे जैन मत वाले महावीर[i], कबीर पंथी वाले कबीर साहिब[ii] , इस्लामिक मत वाले मुहम्मद साहिब[iii], ईसाई मत वाले ईसा मसीह[iv] आदि का वेदों में वर्णन मानते हैं । कुछ लेखक वेदों में गंगा, सरस्वती[v] आदि नदियों का वर्णन होना मानते है।

शंका 1- वेदों में इतिहास मानने में क्या कठिनाई है?



समाधान- वेद शाश्वत हैं। वेद परमात्मा की नित्य वाणी है[vi]। वेदों में सृष्टि रचना, वेद रचना आदि नित्य इतिहास ही हो सकता है, किन्तु किसी व्यक्ति विशेष का इतिहास नहीं हो सकता[vii]। इस सृष्टि के आदि में चारों वेद ऋषियों के हृदय में प्रकाशित हुए। वेद ज्ञान का भी दूसरा नाम है। वेदों के माध्यम से ईश्वर द्वारा समस्त मानव जाति को ज्ञान प्रदान किया गया जिससे वह अपनी उत्पत्ति के लक्षय को प्राप्त कर सके। यह ज्ञान ईश्वर द्वारा जिस प्रकार से वर्तमान सृष्टि में प्रदान किया गया उसी प्रकार से पूर्व की सृष्टियों में भी दिया जाता रहा और आगे आने वाली सृष्टियों में भी दिया जायेगा। जिस ज्ञान का उपदेश परमात्मा द्वारा सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को दिया गया उसमें किसी भी प्रकार का इतिहास नहीं हो सकता। क्यूंकि इतिहास किसी रचना में उससे पूर्वकाल में उत्पन्न मनुष्यों का हुआ करता है। सृष्टि के आरम्भ में जब कोई मनुष्य ही नहीं था फिर उनका किसी भी प्रकार का इतिहास वेदों में पहले से ही वर्णित होना संभव ही नहीं है। मनुष्य का ऐतिहासिक क्रम वेदों की उत्पत्ति के पश्चात ही आरम्भ होता है।

जो लोग वेदों में श्री राम, कृष्ण आदि का इतिहास मानते है। क्या वे यह भी मानेगे की हर सृष्टि में श्री राम को वनवास का कष्ट भोगना पड़ा? क्या हर सृष्टि में सीता हरण हुआ? क्या हर सृष्टि में कृष्ण को कारागार में जन्म लेना पड़ा? क्या हर सृष्टि में यादवकुल का नाश हुआ? नहीं ऐसा कदापि संभव नहीं हैं। ईश्वर द्वारा सभी सांसारिक वस्तुओं के नाम वेद से लेकर रखे गए हैं, न कि इन नाम वाले व्यक्तियों या वस्तुओं के बाद वेदों की रचना हुई है। जैसे किसी पुस्तक में यदि इन पंक्तियों के लेखक का नाम आता है तो वह इस लेखक के बाद की पुस्तक होगी। इस विषय में मनुस्मृति की साक्षी भी है।

सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।

वेद शब्देभ्यः एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे।। मनुस्मृति[viii]

अर्थात ब्रह्मा ने सब शरीरधारी जीवों के नाम तथा अन्य पदार्थों के गुण, कर्म, स्वभाव नामों सहित वेद के अनुसार ही सृष्टि के प्रारम्भ में रखे और प्रसिद्ध किये और उनके निवासार्थ पृथक् पृथक् अधिष्ठान भी निर्मित किये।



शंका 2- वेदों में इतिहास होना कैसे प्रचलित हुआ?



समाधान- वेदों की सर्वानुक्रमणियों तथा बृहद्देवता आदि ग्रंथों में वेदमंत्रों और सूक्तों के छन्दों, ऋषियों और देवताओं आदि का परिगमन किया गया है। इन ग्रंथों में अनेक वेदमंत्रों और सूक्तों के साथ अनेक कथा और कहानियों का भी सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। सायणचार्य आदि भाष्यकारों ने अपने भाष्यों में उन्हीं कहानियों को आधार बनाकर वेदों में इतिहास प्रचलित कर दिया। जहाँ भी उन वेदमंत्रों में भारत के इतिहास में वर्णित किसी प्राचीन ऋषियों और राजाओं के नामों का उल्लेख मिलता, भाष्यकर्ता उन्हीं नामों को आधार बनाकर कहानियों की रचना कर देते थे। जैसे वेदमंत्र उनके जीवनवृतान्त का वर्णन कर रहे हो। इन कहानियों को पढ़कर न केवल अनेक भ्रांतियां उत्पन्न होती हैं। अपितु उससे वेद के प्रति अनादर एवं अश्रद्धा की भावना उपजती हैं। विदेशी विद्वानों जैसे मैक्समूलर, ग्रिफ्फिथ आदि की वेदों के प्रति तुच्छता और सारहीनता की भावना भी इन्हीं मनगढ़त एवं हास्यपद कहानियों के कारण हुई। वर्तमान के भारतीय लेखक भी उन्हीं का अनुसरण करते हुए वेदों के प्रति अनास्था का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं रहते। यह वेदों का दोष नहीं हैं अपितु उन भारतीय वेदभाष्यकारों और सर्वानुक्रमणियों के लेखकों का दोष हैं। जिनके अज्ञान से वेदों में इतिहास होना प्रचलित हुआ।

शंका 3- स्वामी दयानंद की वेदों में इतिहास के सम्बन्ध में क्या मान्यता है?


समाधान- आधुनिक भारत में स्वामी दयानंद प्रथम चिंतक है जो वेदों में इतिहास को नहीं मानते। सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी जी लिखते है- "इतिहास जिसका हो, उसके जन्म के पश्चात लिखा जाता है। वह ग्रन्थ भी उसके जन्में पश्चात होता है। वेदों में किसी का इतिहास नहीं। किन्तु जिस जिस शब्द से विद्या का बोध होवे, उस उस शब्द का प्रयोग किया हैं। किसी विशेष मनुष्य की संज्ञा या विशेष कथा का प्रसंग वेदों में नहीं है[ix]। "

ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका में भी स्वामी जी लिखते है- इससे यह सिद्ध हुआ कि वेदों में सत्य अर्थों के वाचक शब्दों से सत्य विद्याओं का प्रकाश किया है, लौकिक इतिहास का नहीं। इससे जो सायणाचार्य आदि लोगों ने अपनी अपनी बनायीं टीकाओं में वेदों में जहाँ-तहाँ इतिहास वर्णन किये हैं, वे सब मिथ्या हैं[x]

यजुर्वेद[xi] का उदहारण देकर स्वामी जी सिद्ध करते है कि वेदों की संज्ञाएँ यौगिक हैं, रूढ़ नहीं हैं। इस मंत्र में जमदग्नि, कश्यप मुनियों और इन्द्रादि देवों का उल्लेख मिलता है। दूसरे भाष्यकर्ता इस मंत्र में इतिहास की खोज करते हैं।जबकि स्वामी दयानंद जमदग्नि से चक्षु, कश्यप से प्राण एवं देव से विद्वान मनुष्यों का आशय प्रस्तुत करते हैं। स्वामी जी अर्थ करते हैं की हमारे चक्षु और प्राण तिगुनी आयु वाले हो और देव विद्वान लोग जैसे ब्रह्मचर्य आदि द्वारा दीर्घ आयु को प्राप्त करते है। वह हमें भी प्राप्त हो। इसी क्रम से स्वामी दयानंद ने सभी वेद मन्त्रों का भाष्य किया है, जिसमें इतिहास का कोई वर्णन नहीं मिलता हैं[xii]। स्वामी दयानंद ने पुरातन ऋषि-महर्षियों की पद्यति को अपनाया तथा व्याकरण,निरुक्त एवं ब्राह्मण ग्रन्थादि के आधार पर यौगिक प्रक्रिया को अपनाकर अपने वेदभाष्य में यह स्पष्ट कर दिया कि वेदों में व्यक्तिवाचक लगने वाले शब्द वस्तुत: विशेषणवाची हैं तथा किन्हीं गुण-विशेषों का बोध कराते हैं।

शंका 4- वेदों में इतिहास नहीं है कुछ उदहारण के माध्यम से अपनी मान्यता को सिद्ध कीजिये।

समाधान- वेदों में इतिहास सम्बन्धी भ्रान्ति के चलते पाठकों यह यह भ्रम भी हो जाता है कि वेदों में अनेक मन्त्रों में अश्लीलता का वर्णन मिलता हैं। जैसे प्रजापति का अपनी दुहिता (बेटी) से सम्बन्ध[xiii], इसी प्रकार से इन्द्र अहिल्या की कथा, मित्र-वरुण एवं उर्वशी अप्सरा[xiv] आदि की कथा का समाधान इसी पुस्तक में अन्य स्थान पर कर दिया गया हैं[xv]




वेदों में इतिहास सम्बंधित अनेक कथाएँ मन्त्रों में नहीं मिलती अपितु पुराण और दूसरे ग्रंथों में पायी जाती हैं। मंत्र में मिलने वाले एक आध शब्द को आधार बनाकर वेद के अनुक्रमणिकाकार और उनका अनुसरण करने वाले भाष्यकार कहानी बना लेते थे।




कुछ उदहारण देकर हम यह सिद्ध करेंगे कि वेदों में इतिहास मानना केवल भ्रान्ति हैं।


1.इन्द्र वृत्रासुर की कथा

ऋग्वेद[xvi] के मंत्रो में इन्द्र और वृत्रासुर की कथा का उल्लेख हैं जिसमें कहा गया हैं की तवष्टा का पुत्र वृत्रासुर ने देवों के राजा इन्द्र को युद्ध में निगल लिया। तब सब देवता भय से विष्णु के पास गए और विष्णु ने उसे मारने का उपाय बताया की मैं समुद्र के फेन में प्रविष्ट हो जाऊंगा। तुम लोग उस फेन को उठा कर वृत्रासुर को मारना, वह मर जायेगा।

स्वामी दयानंद इस मंत्र का उचित अर्थ करते हुए कहते हैं की इन्द्र सूर्य का नाम है और वृत्रासुर मेघ को कहते है। आकाश में मेघ कभी सूर्य को निगल लेते है कभी सूर्य अपनी किरणों से मेघों को हटा देता हैं। यह संग्राम तब तक चलता हैं जब तक मेघ वर्षा बनकर पृथ्वी पर बरस जाते है और फिर उस जल की नदियाँ बनकर सागर में जाकर मिल जाती हैं। स्वामी जी ने इंद्र तथा वृत्र, सूर्य तथा मेघ के दृष्टान्त से राजा के गुणों का उल्लेख किया हैं।

2.दधिची की हड्डियो से वृत्र हनन की कथा

ऋग्वेद[xvii] के आधार पर एक कथा प्रसिद्द हैं की एक बार वृत्र नामक राक्षस ने सारी त्रिलोकी में उपद्रव मचा रखा था। देवता भी उससे तंग आ गए थे। तब सभी देवता विष्णु जी की शरण में गए। उन्होंने बताया की दधीचि ऋषि की हड्डियों से बने वज्र से वृत्र को मारा जा सकता है। तब देवो की प्रार्थना पर दधीचि ने अपना शरीर त्याग दिया। इन्द्र ने उनकी हड्डियों से वज्र तैयार किया जिससे वृत्र मारा गया।


स्वामी दयानंद इस मंत्र का आधिदैविक अर्थ इस प्रकार हैं की दधीचि कहते है सूर्य को और उसकी हड्डिया उसकी किरणे हैं और वृत्र का अर्थ हैं मेघ। जब सब जगत में मेघ छा जाते हैं तब सूर्य अपनी किरणों से मेघो को छेद कर वर्षा कर देता हैं। इसका आध्यात्मिक अर्थ इस प्रकार हैं की इन्द्र का अर्थ है आत्मा, दधिची का अर्थ है मन, दधिची की हड्डिया है उच्च मनोवृतिया और वृत्र का अर्थ है पाप वासना रूपी विचार। आत्मा अपने मन के उच्च विचारों से पाप वासना आदि कुविचारों का नाश कर देता है।

3.देवापि-शन्तनु की कहानी

ऋग्वेद[xviii] के आधार पर एक कथा प्रचलित हैं की देवापि और शन्तनु दोनों भाई थे। शन्तनु छोटे थे पर राजा बन गए जिससे नाराज होकर देवापि वन जाकर तपस्या में लीन हो गए। राजा शन्तनु के राज्य में 12 वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। उन्होंने ब्राह्मणों से पूछा तो बताया की राज्य पर अधिकार देवापि का था जिस कारण वर्षा नहीं हुई। शन्तनु वन जाकर देवापि को बनाने की कोशिश करते है। वह मना कर देते पर यज्ञ का पुरोहित बनना स्वीकार करते है। जिससे वर्षा हो सके फिर शन्तनु ने देवापि को बुलाकर वृष्टि यज्ञ कराया।जिससे राज्य में पुष्कल वर्षा हुई।

निरुक्त[xix] के आधार पर शन्तनु शब्द का अर्थ होता है जो राजा ऐसा प्रयत्न करता हैं की उसके राज्य में सबको सुख प्राप्त हो, सब शरीर निरोग, प्रसन्न और सुखी रहे। उसी प्रकार प्रजा भी यह चाहती हो की हमारा राजा भी स्वस्थ, सुखी, निरोगी होता हुआ युगों युगों तक जीवित रहे, उस राजा को शन्तनु कहते है और देवापि अर्थात उस गुण वाले व्यक्ति को जिसमें देवता समान गुण हो उसे यज्ञ का पुरोहित बना कर वृष्टि यज्ञ करवाने से यज्ञ सफल होता हैं।

पंडित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु[xx] इसी मंत्र का विशिष्ट अर्थ लिखते है। देवापि को विद्युत जो मरुतों से उत्पन्न होता है का है। उसका भ्राता शन्तनु (शरीर को शान्ति देनेवाला) उदक-जल है। यहाँ पर वर्षा कराने में विद्युत के महत्व को प्रकाशित करना हैं। इसे ऐतिहासिक कथा से जोड़ने से वेदों के सही अर्थ का लोप हो गया और एक निरर्थक कहानी प्रचलित हो गयी।

वेदों के सही अर्थ को न जानकर उससे इतिहास की कहानियां गढ़ लेने से वेदों की उच्च शिक्षा से हम वंचित हो जाते है। यही वेदों में इतिहास मानने का सबसे बड़ा दोष हैं।

शंका 5- वेदों में सरस्वती, गंगा, यमुना आदि नदियों का वर्णन मिलता हैं। सरस्वती आदि नदियां भूगोल का विषय है न कि इतिहास का विषय है। वेदों में नदियों के अस्तित्व को मानने में क्या कठिनाई हैं।

समाधान- वेद में सरस्वती, गंगा, यमुना, कृष्ण आदि ऐतिहासिक शब्द आते हैं। पर ये ऐतिहासिक वस्तुओं या व्यक्तियों के नाम नहीं हैं। वेद में इनके अर्थ कुछ और हैं। वेद के अर्थ समझने के लिए हमारे पास प्राचीन ऋषियों के प्रमाण हैं। निघण्टु में वाणी के 57 नाम हैं, उनमें से एक सरस्वती भी है। अर्थात् सरस्वती का अर्थ वेदवाणी है। ब्राह्मण ग्रंथ वेद व्याख्या के प्राचीनतम ग्रंथ है। वहाँ सरस्वती के अनेक अर्थ बताए गए हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-



1- वाक् सरस्वती।। वाणी सरस्वती है[xxi]

2- वाग् वै सरस्वती पावीरवी।। पावीरवी वाग् सरस्वती है[xxii]

3- जिह्वा सरस्वती।। जिह्ना को सरस्वती कहते हैं[xxiii]

4- सरस्वती हि गौः।। वृषा पूषा। गौ सरस्वती है[xxiv] अर्थात् वाणी, रश्मि, पृथिवी, इन्द्रिय आदि। अमावस्या सरस्वती है। स्त्री, आदित्य आदि का नाम सरस्वती है।

5- अथ यत् अक्ष्योः कृष्णं तत् सारस्वतम्।। आंखों का काला अंश सरस्वती का रूप है[xxv]

6- अथ यत् स्फूर्जयन् वाचमिव वदन् दहति। अग्नि जब जलता हुआ आवाज करता है, वह अग्नि का सारस्वत रूप है[xxvi]

7- सरस्वती पुष्टिः, पुष्टिपत्नी। सरस्वती पुष्टि है और पुष्टि को बढ़ाने वाली है[xxvii]

8-एषां वै अपां पृष्ठं यत् सरस्वती। जल का पृष्ठ सरस्वती है[xxviii]

9-ऋक्सामे वै सारस्वतौ उत्सौ। ऋक् और साम सरस्वती के स्रोत हैं।

10-सरस्वतीति तद् द्वितीयं वज्ररूपम्। सरस्वती वज्र का दूसरा रूप है[xxix]

ऋग्वेद के 6/61 सूक्त का देवता सरस्वती है। स्वामी दयानन्द ने यहाँ सरस्वती के अर्थ विदुषी, वेगवती नदी, विद्यायुक्त स्त्री, विज्ञानयुक्त वाणी, विज्ञानयुक्ता भार्या आदि किये हैं।

सरस्वती शब्द को एक विशेष नदी मानकर भाष्यकार किस प्रकार भ्रम में पड़े हैं, जैसे एक झूठ को सिद्ध करने के लिए हजार झूठ बोले जा रहे हों, इसका एक उदाहरण ऋग्वेद के इस मंत्र से समझा जा सकता है-

एका चेतत् सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्यः आ समुद्रात्।

रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय[xxx]।।

सायणाचार्य ने यहाँ सरस्वती को एक विशेष नदी माना और कल्पना के घोड़े पर सवार हो गए। वे इसका अर्थ करते हैं- (नदीनां शुचिः) नदियों में शुद्ध (गिरिभ्यः आसमुद्रात् यती) पर्वतों से समुद्र तक जाती हुई (एका सरस्वती) एक सरस्वती नदी ने (अचेतत्) नाहुष की प्रार्थना जान ली और (भुवनस्य भूरेः रायः चेतन्ती) प्राणियों को बहुत से धर्म सिखाती हुई (नाहुषाय घृतं पयो दुदुहे) नाहुष राजा के एक हजार वर्ष के यज्ञ के लिए पर्याप्त घी दूध दिया।



यहाँ नहुष के अर्थ पर विचार न करने के कारण इस इतिहास की कल्पना करनी पड़ी। निघण्टु[xxxi] के अनुसार मनुष्य के 25 पर्याय हैं उनमें एक नहुष भी है। घृतं, पयः भी वेद विद्या है[xxxii]

आर्ष वेदार्थ शैली के अनुसार इस मंत्र का अर्थ इस प्रकार है[xxxiii]-

(एका नदी शुचिः गिरिभ्यः आसमुद्रात् यती) जैसे एक नदी गिरियों से शुद्ध पवित्र जल वाली समुद्र तक जाती हुई जानी जाती है। उसी प्रकार (सरस्वती एका) एक अद्वितीय सर्वश्रेष्ठ उत्तम ज्ञानवाली प्रभु वाणी (गिरिभ्यः ) ज्ञानोपदेष्टा गुरुओं से (आ समुद्रात्) जनसमूहरूप सागर तक प्राप्त होती हुई जानी जाती है। अर्थात् उससे लोग ज्ञान प्राप्त करें। वह (भुवनस्य भूरे चेतन्ती) संसार और जन्तु जगत् को प्रभूत ऐश्वर्य का ज्ञान कराती हुई (नाहुषाय) मनुष्य मात्र को (घृतं पयः दुदुहे) प्रकाशमय, पान करने योग्य रस के तुल्य ज्ञान रस को बढ़ाती है।

प्रकरणवश एक मंत्र पर और विचार करना उचित होगा, जिसमें गंगा आदि दस नदियों के नाम बताए गए हैं।

इमं मेे गंगे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या।

असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयार्जीकीये शृणुह्या सुषोमया[xxxiv]।।

स्वामी दयानन्द के अनुसार इडा, पिंगला , सुषुम्णा और कूर्मनाड़ी आदि की गंगा आदि संज्ञा है। योग में धारणा आदि की सिद्धि के लिए और चित्त को स्थिर करने के लिए इनकी उपयोगिता स्वीकार की गई है। इन नामों से परमेश्वर का भी ग्रहण होता है। उसका ध्यान दुःखों का नाशक और मुक्ति को देने वाला होता है। इस मंत्र के प्रकरण में पूर्व से भी ईश्वर की अनुवृत्ति है।

इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं कि

1- वेद में सरस्वती नाम अनेक स्थानों पर आया है।

2- वेद में सरस्वती का उल्लेख नदी के रूप में भी आया है।

3- वेद में सरस्वती का उल्लेख धरती के किसी स्थान विशेष पर बहने वाली नदी के रूप में नहीं आया है। न ही वेद में सरस्वती से संबंधित किन्हीं व्यक्तियों का इतिहास है।

4- सरस्वती नदी की ऐतिहासिकता को वेद से प्रमाणित करने का प्रयास वेद का अवमूल्यन करना है।

यही नियम वेद में वर्णित विभिन्न नामों, विभिन्न स्थलों, नदियां आदि पर भी लागु होता हैं जिससे कुछ लोग वेदों में इतिहास होने की कल्पना कर लेते हैं।








[i] ऋग्वेद 1/32/6 में महावीर शब्द आया हैं जिसका अर्थ इन्द्र हैं जबकि जैन मत का पालन करने वाले उससे महावीर तीर्थंकर को दर्शाने की कोशिश करते है।


[ii] यजुर्वेद ३२/११ मंत्र में कविर्मनीषी शब्द से कबीरपंथी साकार परमेश्वर को दिखाने का प्रयास करते है जबकि इसी मंत्र में ईश्वर को शुक्रम (सर्वशक्तिमान), अकायम (स्थूल, सूक्षम और कारण शरीर रहित), अवर्णम (छिद्र रहित और नहीं छेद सकने योग्य), अस्नाविरम (नाड़ी आदि बंधन से रहित), शुद्धम (अविद्या आदि दोषों से रहित), परिअगात (सब और से व्याप्त), स्वयंभू (जिसके माता-पिता, गर्भवास, जन्म, वृद्धि और मरण आदि नहीं होते), शाश्र्वतिभ्य (उत्पत्ति और विनाश रहित) कहा गया हैं।


[iii] अथर्ववेद 20/127/1-13 मन्त्रों में नराशंस शब्द से मुहम्मद साहिब की कल्पना कुछ इस्लाम अनुयायी मानते है।


[iv] यजुर्वेद के 40वें अध्याय के ईशावास्यम मंत्र में ईशा से ईसा मसीह की तुलना कुछ ईसाई मत को मानने वाले करते है


[v] ऋग्वेद के सप्तम मण्डल के 95-96 सूक्तों में सरस्वती का उल्लेख मिलता है।


[vi] ऋग्वेद 8/75/6


[vii] ऋग्वेद 10/90/9, यजुर्वेद 31/7


[viii] मनुस्मृति 2/87


[ix] सत्यार्थप्रकाश सप्तम समुल्लास


[x] ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका- वेद संज्ञा विचार प्रकरण


[xi] यजुर्वेद 3/62


[xii] एक अन्य उदहारण में स्वामी दयानंद विश्वामित्र का व्यक्ति विशेष के स्थान पर सबके मित्रत्व का अर्थ प्रचलित करते है।


[xiii] ऋग्वेद 1/164/33 और ऋग्वेद 3/3/11


[xiv] ऋग्वेद 7/33/11


[xv] क्या वेदों में अश्लीलता हैं?


[xvi] ऋग्वेद 1/32/1-7


[xvii] ऋग्वेद 1/84/13


[xviii] ऋग्वेद 10/98/7


[xix] निरुक्त 2/12


[xx] देवापि और शन्तनु के वैदिक आख्यान का वास्तविक स्वरुप


[xxi] शतपथ 7/5/1/31


[xxii] शतपथ 7/3/39


[xxiii] शतपथ 12/9/1/14


[xxiv] शतपथ 2/5/1/11


[xxv] शतपथ 12/9/1/12


[xxvi] ऐतरेय 3/4


[xxvii] तै0 2/5/7/4


[xxviii] तै0 1/7/5/5


[xxix] कौ0 12/2


[xxx] ऋग्वेद 7/95/2


[xxxi] नि0 2/3


[xxxii] शतपथ ब्राह्मण 11/5/7/5


[xxxiii] श्री पं0 जयदेव शर्मा विद्यालंकार


[xxxiv] ऋग्वेद 10/75/5

Thursday, December 3, 2015

क्या वेद आर्य-द्रविड़ युद्ध का वर्णन करते है?






क्या वेद आर्य-द्रविड़ युद्ध का वर्णन करते है?

डॉ विवेक आर्य




वेदों के विषय में एक अन्य भ्रान्ति फैलाई जा रही रही है कि आर्य लोग विदेशी (संभवत मध्य एशिया) थे और वे भारत भूमि पर आक्रमणकारी के रूप में आये। यहाँ के मूल निवासी काले रंग के लोगों पर जो द्रविड़ (दास) थे और जिन्हें आर्यों ने दास और दस्युओं का नाम दिया था पर आर्यों ने अनेक अत्याचार किये[i]।

सन्दर्भ -The Aryan invaders or immigrants found in India to groups of people, one of which they named the Dasas and Dasyu, and the other Nishadas. Vedic Age p.156 अर्थात आर्य आक्रान्ताओं ने भारत में दो प्रकार के वर्गों को पाया। एक वर्ग को उन्होंने दास और दस्यु का नाम दिया और दूसरे को निषादों का।
आर्य-द्रविड़ युद्ध की मान्यता के चलते यह भ्रान्ति उत्पन्न होती है कि दक्षिण भारत में रहने वाले एवं श्याम वर्ण वाले जो लोगों पर उत्तर भारत में रहने वाले श्वेत वर्ण वाले लोगों को प्रताड़ित एवं पीड़ित किया हैं। इस भ्रान्ति के निवारण के लिए कुछ प्रश्नों का उत्तर अपेक्षित हैं।










शंका 1. आर्य और द्रविड़ शब्द का क्या अर्थ हैं? आर्य कौन कहलाते हैं ? क्या आर्य और द्रविड़ या दास अलग अलग जातियां हैं?






समाधान- आर्य शब्द कोई जातिवाचक शब्द नहीं है, अपितु गुणवाचक शब्द है। ऋग्वेद 10/64/11 के अनुसार आर्य वे कहलाते हैं जो भूमि पर सत्य, अहिंसा,पवित्रता, परोपकार आदि व्रतों को विशेष रूप से धारण करते हैं। आर्य शब्द ‘ऋ’ धातु से बनता है जिसका अर्थ 'गति-प्रापणयो:' है अर्थात ज्ञान, गमन, प्राप्ति करने और प्राप्त कराने वाले को आर्य कहते हैं। अर्थात आर्य वे हैं जो ज्ञान-संपन्न हैं, जो सन्मार्ग की ओर सदा गति करने वाले पुरुषार्थी हैं और जो ईश्वर तथा परमानन्द को प्राप्त करने तथा तदर्थ-प्रयतनशील होते हैं। संस्कृत कोषशब्दकल्पद्रुम में आर्य का अर्थ पूज्य, श्रेष्ठ, धार्मिक, धर्मशील, मान्य, उदारचरित, शांतचित, न्याय-पथावलम्बी, सतत कर्त्तव्य कर्म अनुष्ठाता आदि मिलता हैं। आर्य शब्द का अर्थ होता हैं “श्रेष्ठ” अथवा बलवान, ईश्वर का पुत्र, ईश्वर के ऐश्वर्य का स्वामी, उत्तम गुणयुक्त, सद्गुण परिपूर्ण आदि।






वेद, रामायण, महाभारत, गीता आदि में "आर्य" शब्द का प्रयोग गुणवाची के रूप में ही हुआ हैं।






आर्य शब्द का प्रयोग वेदों में निम्नलिखित विशेषणों के लिए हुआ हैं।






श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए[ऋग्वेद 1/103/3], इन्द्र का विशेषण[ऋग्वेद 10/138/3], सोम का विशेषण[ऋग्वेद 9/63/5],ज्योति का विशेषण[ऋग्वेद 10/43/4], व्रत का विशेषण[ ऋग्वेद 10/65/11], प्रजा का विशेषण[ऋग्वेद 7/33/7], वर्ण के विशेषण[ऋग्वेद 3/34/9] के रूप में हुआ हैं.






निरुक्त में आर्य शब्द का अर्थ ईश्वर पुत्र: के रूप में हुआ है।






रामायण बालकाण्ड में आर्य शब्द आया है । श्री राम के उत्तम गुणों का वर्णन करते हुए वाल्मीकि रामायण में नारद मुनि ने कहा है – आर्य: सर्वसमश्चायमं, सोमवत् प्रियदर्शन:[रामायण बालकाण्ड 1/16] अर्थात् श्री राम आर्य – धर्मात्मा, सदाचारी, सबको समान दृष्टि से देखने वाले और चंद्र की तरह प्रिय दर्शन वाले थे।






किष्किन्धा काण्ड[किष्किन्धा काण्ड 19/27] में बालि की स्त्री पति के वध हो जाने पर उसे आर्य पुत्र कह कर रुधन करती है।






महाभारत में "आर्य" शब्द 8 गुणों से युक्त व्यक्ति के लिए हुआ हैं। जो ज्ञानी हो, सदा संतुष्ट रहनेवाला हो, मन को वश में रखनेवाला, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, दानी, दयालु और नम्र गुणवाला आर्य कहलाता हैं।





भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने जब देखा कि वीर अर्जुन अपने क्षात्र धर्म के आदर्श से च्युत होकर मोह में फँस रहा है तो उसे सम्बोधन करते हुए उन्होंने कहा – कुतस्त्वा कश्मलमिदं, विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम्, अकीर्ति करमर्जुन [गीता 2/3] अर्थात् हे अर्जुन, यह अनार्यो व दुर्जनों द्वारा सेवित, नरक में ले-जाने वाला, अपयश करने वाला पाप इस कठिन समय में तुझे कैसे प्राप्त हो गया ? यहा श्री कृष्ण ने अर्जुन को आर्य बनाने के लिए अनार्यत्व के त्याग को कहा है।






इस प्रकार से वैदिक वांग्मय में आर्य शब्द का प्रयोग गुणों से श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए हुआ हैं।






दास शब्द का अर्थ अनार्य, अज्ञानी, अकर्मा, मानवीय व्यवहार शुन्य, भृत्य, बल रहित शत्रु के लिए हुआ हैं न की किसी विशेष जाति के लोगों के लिए हुआ हैं।






दास शब्द का वेदों में विविध रूपों में प्रयोग –






मेघ विशेषण ऋग्वेद 5/30/7 में प्रयोग हुआ है। शीघ्र बनने वाले मेघ के रूप में ऋग्वेद 6/26/5 में प्रयोग हुआ है। बिना बरसने वाले मेघ के लिए ऋग्वेद 7/19/2 में प्रयोग हुआ है। बलरहित शत्रु के लिए ऋग्वेद 10/83/1 में प्रयोग हुआ है। अनार्य के लिए ऋग्वेद 10/83/19 में प्रयोग हुआ है। अज्ञानी ,अकर्मका ,मानवीय व्यवहार से शून्य व्यक्ति के लिए ऋग्वेद 10/22/8 में प्रयोग हुआ है। प्रजा के विशेषण में ऋग्वेद 6/25/2, 10/148/2 और 2/11/4 में प्रयोग हुआ है। वर्ण के विशेषण रूप में ऋग्वेद 3/34/9, 2/12/4 में हुआ है। उत्तम कर्महीन व्यक्ति के लिए ऋग्वेद 10/22/8 में दास शब्द का प्रयोग हुआ है अर्थात यदि ब्राह्मण भी कर्महीन हो जाय तो वो भी दास कहलायेगा। गूंगे या शब्दहीन के विशेषण में ऋग्वेद 5/29/10 में दास का प्रयोग हुआ है।








अष्टाध्यायी 3/3/19 में दास का अर्थ लिखा है -दस्यते उपक्षीयते इति दास: जो साधारण प्रयत्न से क्षीण किया जा सके ऐसा साधारण व्यक्ति व 3/1/134 में आया है ” दासति दासते वा य: स:” अर्थात दान करने वाला यहा दास का प्रयोग दान करने वाले के लिए हुआ है। अष्टाध्यायी 3/1/134 में दास्यति य स दास: अर्थात जो प्रजा को मारे वह दास ” यहा दास प्रजा को और उसके शत्रु दोनों को कहा है। अष्टाध्यायी 5/10 में हिंसा करने वाले ,गलत भाषण करने वाले को दास दस्यु (डाकू) कहा है।






निरुक्त 7/23 में कर्मो के नाश करने वाले को दास कहा है।






दस्यु शब्द का अर्थ उत्तम कर्म हीन व्यक्ति [ऋग्वेद 7/5/6] ,अज्ञानी, अव्रती[ऋग्वेद 10/22/8], मेघ[ऋग्वेद 1/59/6] आदि के लिए हुआ हैं न की किसी विशेष जाती अथवा स्थान के लोगों के लिए माना गया है।






वैदिक वांग्मय में और राष्ट्र के लिए सहायक व्यक्तियों को आर्य एवं घातक व्यक्तियों को दास या दस्युओं माना गया हैं। आर्य और द्रविड़ में भेद व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर बताये गए है। न की उत्तर दक्षिण भारतीय, श्याम-श्वेत वर्ण, बाहर से आये हुए एवं स्थानीय मूलनिवासी के आधार पर माना गया है। इस विषय को ठीक प्रकार से न समझ पाने के कारण पश्चिमी लेखकों ने आर्यों द्वारा भारत पर बाहर से आकर आक्रमण करने की निराधार कल्पना को जन्म दिया। इसी अधकचरे ज्ञान के आधार पर कुछ लोग अपनी छोटी राजनीती करते दीखते है। यह समाधान पढ़ लेने के पश्चात आर्य-द्रविड़ युद्ध की कल्पना त्यागने योग्य है।










शंका 2:- वेदों के मन्त्रों के आधार पर ऐसा प्रतीत होता हैं की आर्य और भारत के आदिवासी दो अलग अलग जातियां थी। आर्य और आदिवासीओ का स्वरुप और धार्मिक विश्वास भिन्न भिन्न था।






समाधान- पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों के अनुसार आदिवासीओ को काले वर्ण वाला, अनास यानि चपटी नाक वाला और लिंग देव अर्थात शीशनदेव की पूजा करने वाला लिखा हैं जबकि आर्यों को श्वेत वर्ण वाला सीधी नाक वाला और देवताओं की पूजा करने वाला लिखा हैं।






MacDonnell लिखते है the term Das, Dasyu properly the name of the dark aborigine’s अर्थात दास, दस्यु काले रंग के आदिवासी ही हैं।






Griffith Rigveda 1/10/1 – The dark aborigines who opposed the Aryans अर्थात काले वर्ण के आदिवासी जो आर्यों का विरोध करते थे।






Vedic mythology p. 151,152 में भी आर्यों द्वारा कृष्ण वर्ण वाले दस्युओ को हरा कर उनकी भूमि पर अधिकार करने की बात कही गयी हैं। ऋग्वेद के 1/101/1, 1/130/8, 2/20/7 और 4/16/13 मंत्रो का हवाला देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया हैं की भारत के मूल निवासी कृष्ण वर्ण के थे। ऋग्वेद 7/17/14 में सायण ने कृष्ण का अर्थ मेघ की काली घटा किया है।






अन्य सभी मंत्रो में इसी प्रकार इन्द्र के वज्र का मेघ रुपी बादलों से संघर्ष का वर्णन है। बादलों के कृष्ण वर्ण की आदिवासियो के कृष्ण वर्ण से तुलना कर बिजली (इन्द्र के वज्र) और बादल (मेघ) के संघर्ष के मूल अर्थ को छुपाकर उसे आर्य-दस्यु युद्ध की कल्पना करना कुटिलता नहीं तो और क्या हैं। वैदिक इंडेक्स के लेखक ने ऋग्वेद 5/29/10 में अनास शब्द की चपटी नाक वाले द्रविड़ आदिवासी की व्याख्या की है। ऋग्वेद 5/29/10 में दासो को द्वेषपूर्ण वाणी वाले या लड़ाई के बोल बोलने वाले कहाँ गया है।






ऋग्वेद 5/129/10 में अनास शब्द का अर्थ चपटी नाक वाला नहीं अपितु शब्द न करने वाला अर्थात मूक मेघ हैं जिसे इन्द्र अपने वज्र (बिजली) से छिन्न भिन्न कर देता हैं। यहाँ भी अपनी कुटिलता से द्रविड़ आदिवासियो को आर्यों से अलग दिखने का कुटिल प्रयास किया गया है।






वैदिक इंडेक्स के लेखक ने ऋग्वेद 7/21/5 और 10/99/3 के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया हैं की दस्यु लोगो की पूजा पद्यति विभिन्न थी और वे शिश्नपूजा अर्थात लिंग पूजा करते थे।






यास्काचार्य ने निरुक्त 4/19 में शिश्न पूजा का अर्थ किया हैं अब्रहमचर्य अर्थात जो कामी व्यभिचारी व्यक्ति हो किया हैं। ऋग्वेद के 7/21/5 और 10/99/3 में भी कहा गया हैं की लोगों को पीड़ा पहुचने वाले, कुटिल, तथा शिश्नदेव (व्यभिचारी) व्यक्ति हमारे यज्ञो को प्राप्त न हो अर्थात दुस्त व्यक्तियों का हमारे धार्मिक कार्यो में प्रवेश न हो।


वैदिक इंडेक्स के लेखक इन मंत्रो के गलत अर्थ को करके भ्रान्ति उत्पन्न कर रहे हैं की दस्यु लोग लिंग पूजा करते हैं एवं आर्य लोग उनसे विभिन्न पूजा पद्यति को मानने वाले हैं। सत्य अर्थ यह हैं की दस्यु शब्द किसी वर्ग या जाति विशेष का नाम नहीं हैं बल्कि जो भी व्यक्ति दुर्गुण युक्त हैं। वह दस्यु है और दुर्गुणी व्यक्ति किसी भी समुदाय में हो दूर करने योग्य है। वेद मन्त्रों के गलत अर्थ दिखाकर को भिन्न भिन्न जातियों के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया है। जिससे परस्पर अंतर्विरोध एवं द्वेष भावना को बल मिले।










शंका 3- आर्य-दस्यु युद्ध पर स्वामी दयानंद के क्या दृष्टिकोण है?






समाधान- स्वामी दयानंद आर्यों के बाहर से आने एवं स्थानियों को युद्ध में परास्त करने का स्पष्ट खंडन करते है। स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश 8 सम्मुलास में लिखते हैं-






“किसी संस्कृत ग्रन्थ में वा इतिहास में नहीं लिखा की आर्य लोग इरान से आये और यहाँ के जंगलियो को लरकर जय पा के निकाल के इस देश के राजा हुए।”






स्वामी जी आर्यों और दस्युओं का गुणों के आधार पर विभाजन मानते हैं। “जो आर्य श्रेष्ठ और दस्यु दुष्ट मनुष्यों को


कहते हैं वैसे ही मैं भी मानता हूँ”






स्वामी जी आर्यों के निवास स्थान को आर्यव्रत के रूप में सम्बोधित करते हुए उसे भारतवर्ष ही मानते है। स्वामी जी


लिखते है-






“आर्याव्रत देश इस भूमि का नाम इसलिए हैं की इसमें आदि सृष्टि से आर्य लोग निवास करते हैं परन्तु इसकी अवधि उत्तर में हिमालय दक्षिण में विन्ध्याचल पश्चिम में अटक और पूर्व में ब्रहमपुत्र नदी है, इन चारों के बीच में जितना प्रदेश हैं उसको आर्याव्रत कहते और जो इसमें सदा रहते हैं उनको भी आर्य कहते है।”-सव-मंतव्य-अमंतव्य-प्रकाश-स्वामी दयानंद








आर्य और दस्यु के मध्य संबंधों पर स्वामी दयानंद द्वारा विशेष व्याख्या करी गई है। स्वामी जी ऋग्वेद 10/64/11 मंत्र की व्याख्या करते हुए लिखते है-






हे यथायोग्य सबको जाननेवाले ईश्वर! आप 'आर्यान्' विद्या-धर्म आदि उत्कृष्ट स्वभाव आचरण युक्त आर्यों को जानो 'ये च दस्यव:' और जो नास्तिक, डाकू, चोर, विश्वासघाती, मुर्ख, विषय-लम्पट, हिंसा आदि दोषयुक्त, उत्तम कर्मों में विघ्न करनेवाले, स्वार्थी, स्वार्थ-साधन में तत्पर, वेद-विद्या-विरोधी अनार्य मनुष्य 'बहिर्ष्मते' सर्वोपकारक यज्ञ के विध्वंशक हैं। इन सब दुष्टों को आप (रन्धय) समुलान् विनाशय- मूलसहित नष्ट कर दीजिये। और (शासद व्रतान्) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास आदि धर्मानुष्ठान व्रतरहित, वेदमार्ग उच्छेदक अनाचारियों को यथायोग्य शासन कीजिये (शीघ्र उन पर दंड- निपातन करो)जिससे वे भी शिक्षायुक्त हो के शिष्ट हों अथवा उनका प्राणान्त हो जाय,किं वा हमारे वश में ही रहे (शाकी) तथा जीव को परम शक्तियुक्त, शक्ति देने और उत्तम कामों में प्रेरणा करनेवाले हों। आप हमारे दुष्ट कामों के विरोधक हो। मैं उत्कृष्ट स्थानों में निवास करता हुआ तुम्हारी अज्ञानुकूल सब उत्तम कर्मों की कामना करता हूंसो आप पूरी करें।- आर्याभिविनय 1/14






स्वामी दयानंद भी आर्य-दस्यु शब्दों को गुणात्मक मानते हैं न की किसी विशेष समूह अथवा जाति के आधार पर मानते हैं।






योगी अरविन्द भी स्वामी दयानंद के समान आर्य शब्द को गुणात्मक मानते है। अरविन्द जी के अनुसार आर्य शब्द में उदारता, नम्रता, श्रेष्ठता, सरलता, साहस, पवित्रता, दया, निर्बल संरक्षण, ज्ञान के लिए उत्सुकता, सामाजिक कर्तव्य पालनादि सब उत्तम गुणों का समावेश हो जाता है। मानवीय भाषा में इससे अधिक उत्तम और कोई शब्द नहीं। आर्य आत्मसंयमी और आंतरिक तथा बाह्य स्वराज्य -प्रेमी होता है। वह अज्ञान, बंधन तथा किसी प्रकार की दासता में रहना पसंद नहीं करता। उसकी इच्छा शक्ति दृढ़ होती है। प्रत्येक वस्तु में वह सत्य, उच्चता तथा स्वतंत्रता की खोज करता है। आर्य एक कार्यकर्ता और योद्धा होता है जो अपने अंदर और जगत में ईश्वर के राज्य को लाने के लिए अज्ञान, अन्याय तथा अत्याचारादि के विरुद्ध युद्ध करता है[आर्य पत्रिका प्रथम अंक 1914 ]।






शंका 4- क्या वेदों में आर्य-द्रविड़ युद्ध का वर्णन मिलता है?






समाधान- वैदिक इंडेक्स आदि के लेखको ने यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया हैं की वेद में आर्य और दस्युओ के युद्ध का वर्णन हैं। वेद में दासों के साथ युद्ध करने का वर्णन तो मिलता है पर यह मानवीय नहीं अपितु प्राकृतिक युद्ध हैं। जैसे इन्द्र और वृत्र का युद्ध। इन्द्र बिजली का नाम हैं जबकि वृत्र मेघ का नाम है। इन दोनों का परस्पर संघर्ष प्राकृतिक युद्ध के जैसा हैं। यास्काचार्य ने भी निरुक्त 2/16 में इन्द्र-वृत्र युद्ध को प्राकृतिक माना है। इसलिए वेद में जिन भी स्थलों पर आर्य-दस्यु युद्ध की कल्पना की गई है उन स्थलों को प्रकृति में होने वाली क्रियाओ को उपमा अलंकार से दर्शित किया गया हैं। उनके वास्तविक अर्थ को न समझ कर अज्ञानता से अथवा जान कर वेदों को बदनाम करने के लिए एवं आर्य द्रविड़ के विभाजन की निति को पोषित करने के लिए युद्ध की परिकल्पना कई गयी हैं जो की गलत हैं।






शंका 5- डॉ अम्बेडकर के आर्यों के बाहर से आकर यहाँ पर बसने सम्बंधित विषय पर क्या विचार थे?






समाधान-डॉ अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक शूद्र कौन?[Who were Shudras?] में स्पष्ट रूप से विदेशी लेखकों की आर्यों के बाहर से आकर यहाँ पर बसने सम्बंधित मान्यता का स्पष्ट खंडन किया हैं। डॉ अम्बेडकर लिखते है-






1. वेदों में आर्य जाति के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है।






2. वेद में ऐसा कोई प्रसंग उल्लेख नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि आर्यों ने भारत पर आक्रमण कर यहाँ के मूलनिवासी दासो-दस्युओं को विजय किया।






3. आर्य, दास और दस्यु जातियों के अलगाव को सिद्ध करने के लिये कोई साक्ष्य वेदों में उपलब्ध नहीं है।






4. वेदों में इस मत की पुष्टि नहीं की की गई की गयी कि आर्य, दासों और दस्युओं से भिन्न रंग थे।


डॉ अम्बेडकर ने स्पष्ट रूप से स्वामी दयानंद की मान्यता का अनुमोदन किया है। वे न तो आर्य शब्द को जातिसूचक मानते थे अपितु गुणवाचक ही मानते थे। इसी सन्दर्भ में उन्होंने शूद्र शब्द को इसी पुस्तक के पृष्ठ 80 पर "आर्य" ही माना है। वे किसी भी आर्यों के बाहरी आक्रमण का स्पष्ट खंडन करते हैं। न ही आर्य और दास को अलग मानते हैं। रंग, बनावट आदि के आधार पर आर्यों-दस्युओं में भेद को स्पष्ट ख़ारिज करते हैं।


इस प्रकार से यह सिद्ध हुआ कि वेद आर्य द्रविड़ युद्ध अथवा आर्यों के विदेशी होने की परिकल्पना का किसी भी प्रकार से समर्थन नहीं करते है।