Monday, June 19, 2017

*🌷निन्दा से विचलित न हों🌷*



*🌷निन्दा से विचलित न हों🌷*

सुभाषिनी आर्य

अपनी निन्दा, आलोचना, उपहास और अपमान को सुनकर सहन करना भी कोई सरल बात नहीं है। इसको वही सहन कर सकते हैं जिनका मस्तिष्क बहुत शान्त हो और जिनमें बहुत सहनशक्ति हो। ब्राह्मण के लिए तो मनु महाराज का स्पष्ट आदेश है कि―

*सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ।*
*अमृतस्येव चाकांक्ष्येदवमानस्य सर्वदा ।।*
―(मनु० 2/162)

*भावार्थ―*_ब्राह्मण सम्मान से सदा विष के समान व्याकुल रहे (डरे) और अपमान की इच्छा सदा अमृत के समान करता रहे।_

महाभारत में कहा है―

*जीवन्तु मे शत्रुगणाः सदैव, येषां प्रसादात्सुविचक्षणोऽहम् ।*
*यदा-यदा मे विकृतिं लभन्ते, तदा-तदा मां प्रतिबोधयन्ति ।।*

*भावार्थ―*_मेरे शत्रु सदा जीवित रहें जिनकी कृपा से मैं बहुत चतुर हो गया हूँ। जब-जब वे मेरी त्रुटियाँ देखते हैं, तब-तब मुझे जगाते हैं।_

सन्त कबीर ने कहा है―

*निन्दक नियरे राखिए, आसन कुटि छवाय ।*
*बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ।।*

_अपनी कुटिया को निन्दक के निकट बनाकर रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के ही व्यक्ति के स्वभाव को निर्मल बना देता है।_

यह स्थिति विशेष व्यक्तियों की है। सामान्य व्यक्ति इस स्थिति तक बहुत अभ्यास के पश्चात् पहुँच पाता है।स्वामी दयानन्द के जीवन में अनेक ऐसे प्रसंग मिलते है। एक बार वे गंगा तट पर कुटिया बनाकर साधना कर रहे थे। उनकी समीप ही एक अन्य बाबा अपनी कुटिया बनाकर बैठा था। वह रोज स्वामी जी के प्रति सुबह सुबह असभ्य भाषा का प्रयोग करता था। स्वामी जी उसकी बात का कोई उत्तर नहीं देते थे। एक दिन जब वह अपनी कुटिया से बहार नहीं निकला और स्वामी जी को कोई आवाज नहीं आई। तब स्वामी जी ने अपने एक शिष्य को फल आदि देकर उसके समीप भेजा। उसने जब पूछा कि यह फल किसने भेजे है। तब उस भक्त ने बताया कि आपके समीप रहने वाले स्वामी दयानन्द जी ने भेजे है और कहा की आज सम्भवत पड़ोस वाले बाबाजी की तबियत सही नहीं है। आज उनके उपदेश सुनने को नहीं मिले। यह सुनते ही वह बाबा अपने किये पर शर्मिंदा हुआ और स्वामी दयानन्द से आकर क्षमा याचना करने लगा। स्वामी दयानन्द ने उसे क्षमा कर दिया और आगे से सभ्य भाषा में वार्तालाप करने का उपदेश दिया।

आलोचना और निन्दा को सहन करने का एक और भी उपाय है कि व्यक्ति अपने सम्बन्ध में ऐसी बातें सुने तो विचार करे कि ये बातें सत्य हैं या मिथ्या? यदि ये बातें सत्य हैं तो सत्य का क्या बुरा मानना, क्योंकि सत्य को तो सदा स्वीकार करना ही चाहिए। यदि कही हुई बातें असत्य हैं तो उनका क्या बुरा मानना? क्योंकि वे तो हैं ही असत्य। झूठी बात का क्या बुरा मानना? परन्तु यह भी ऊँची स्थिति है, इस तक पहुँचना सरल नहीं है। पर्याप्त अभ्यास के पश्चात् ही इस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है।

*महापुरुष तो अपने प्रति की गई निन्दा, आलोचना और अपमान को मन में स्थान ही नहीं देते, परन्तु सामान्य व्यक्ति के लिए इसका सहन करना बहुत कठिन हो जाता है।*

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