Saturday, November 9, 2013

धर्म के विषय में भ्रांतियाँ और उनका निवारण




मेरे कुछ मुस्लिम मित्रों द्वारा धर्म विषय पर अनेक शंकाएँ प्रस्तुत कि गई हैं। जिनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक हैं क्यूंकि शंका का निवारण न होना अज्ञानता को जन्म देता हैं और अज्ञानता मनुष्य को पाप कर्म में सलिंप्त करती हैं। और पापी व्यक्ति देश, धर्म और जाति के लिए अहितकारक होता हैं।↤
उनकी शंकाएँ और उनका समाधान इस प्रकार हैं

शंका 1:-  धर्म का अर्थ क्या हैं?

उत्तर:-
१. धर्म संस्कृत भाषा का शब्द हैं जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना हैं। "धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म हैं। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म हैं। दूसरे शब्दों में यहभी कह सकते हैं की मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति हैं वह धर्म हैं।

२. जैमिनी मुनि के मीमांसा दर्शन के दूसरे सूत्र में धर्म का लक्षण हैं लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु गुणों और कर्मों में प्रवृति की प्रेरणा धर्म का लक्षण कहलाता हैं।

३. वैदिक साहित्य में धर्म वस्तु के स्वाभाविक गुण तथा कर्तव्यों के अर्थों में भी आया हैं। जैसे जलाना और प्रकाश करना अग्नि का धर्म हैं और प्रजा का पालन और रक्षण राजा का धर्म हैं।

४. मनु स्मृति में धर्म की परिभाषा

धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ६/९

अर्थात धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के दस लक्षण हैं।

दूसरे स्थान पर कहा हैं आचार:परमो धर्म १/१०८  अर्थात सदाचार परम धर्म हैं

५. महाभारत में भी लिखा हैं

धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा: अर्थात

जो धारण किया जाये और जिससे प्रजाएँ धारण  की हुई हैं वह धर्म हैं।
 ६. वैशेषिक दर्शन के कर्ता महा मुनि कणाद ने धर्म का लक्षण यह किया हैं
यतोअभयुद्य निश्रेयस सिद्धि: स धर्म:

अर्थात जिससे अभ्युदय(लोकोन्नति) और निश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि होती हैं, वह धर्म हैं।

शंका 2:- स्वामी दयानंद के अनुसार धर्म कि क्या परिभाषा हैं?

उत्तर:- जो पक्ष पात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार हैं उसी का नाम धर्म और उससे विपरीत का अधर्म हैं।-सत्यार्थ प्रकाश ३ सम्मुलास
पक्षपात रहित न्याय आचरण सत्य भाषण आदि युक्त जो ईश्वर आज्ञा वेदों से अविरुद्ध हैं, उसको धर्म मानता हूँ - सत्यार्थ प्रकाश मंतव्य

इस काम में चाहे कितना भी दारुण दुःख प्राप्त हो , चाहे प्राण भी चले ही जावें, परन्तु इस मनुष्य धर्म से पृथक कभी भी न होवें।- सत्यार्थ प्रकाश

शंका 3:- क्या हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्म सभी समान हैं अथवा भिन्न हैं? धर्म और मत अथवा पंथ में क्या अंतर हैं?

उत्तर: -हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्म नहीं अपितु मत अथवा पंथ हैं।  धर्म और मत में अनेक भेद हैं।

१.  धर्म ईश्वर प्रदत हैं और जिसे ऊपर बताया गया हैं, बाकि मत मतान्तर हैं जो मनुष्य कृत हैं।
२. धर्म लोगो को जोड़ता हैं जबकि मत विशेष लोगो में अन्तर को बढ़ाकर दूरियों को बढ़ावा देते हैं।
३. धर्म का पालन करने से समाज में प्रेम और सोहार्द बढ़ता हैं, मत विशेष का पालन करने से व्यक्ति अपने मत वाले को मित्र और दूसरे मत वाले को शत्रु मानने लगता हैं।
४. धर्म क्रियात्मक वस्तु हैं मत विश्वासात्मक वस्तु हैं। 
५. धर्म मनुष्य के स्वाभाव के अनुकूल अथवा मानवी प्रकृति का होने के कारण स्वाभाविक हैं और उसका आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम हैं परन्तु मत मनुष्य कृत होने से अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक हैं।
६. धर्म एक ही हो सकता हैं , मत अनेक होते हैं।
७. धर्म सदाचार रूप हैं अत: धर्मात्मा होने के लिये सदाचारी होना अनिवार्य हैं। परन्तु मत अथवा पंथ में सदाचारी होना अनिवार्य नहीं हैं।
८. धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं अथवा धर्म अर्थात धार्मिक गुणों और कर्मों के धारण करने से ही मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करके मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता हैं जबकि मत मनुष्य को केवल पन्थाई या मज़हबी अथवा अन्धविश्वासी बनाता हैं। दूसरे शब्दों में मत अथवा पंथ पर ईमान लाने से मनुष्य उस मत का अनुनायी बनता हैं नाकि सदाचारी या धर्मात्मा बनता हैं।
९. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़ता हैं और मोक्ष प्राप्ति निमित धर्मात्मा अथवा सदाचारी बनना अनिवार्य बतलाता हैं परन्तु मत मुक्ति के लिए व्यक्ति को पन्थाई अथवा मटी का मानने वाला बनना अनिवार्य बतलाता हैं। और मुक्ति के लिए सदाचार से ज्यादा आवश्यक उस मत की मान्यताओं का पालन बतलाता हैं।
१०. धर्म सुखदायक हैं मत दुखदायक हैं।
 ११. धर्म में बाहर के चिन्हों का कोई स्थान नहीं हैं क्यूंकि धर्म लिंगात्मक नहीं हैं -न लिंगम धर्मकारणं अर्थात लिंग (बाहरी चिन्ह) धर्म का कारण नहीं हैं परन्तु मत के लिए बाहरी चिन्हों का रखना अनिवार्य हैं जैसे एक मुस्लमान के लिए जालीदार टोपी और दाड़ी रखना अनिवार्य हैं।
१२. धर्म दूसरों के हितों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना सिखाता हैं जबकि मज़हब अपने हित के लिए अन्य मनुष्यों और पशुयों की प्राण हरने के लिए हिंसा रुपी क़ुरबानी का सन्देश देता हैं।
 धर्म और मत के अंतर को ठीक प्रकार से समझ लेने पर मनुष्य अपने चिंतन मनन से आसानी से यह स्वीकार करके के श्रेष्ठ कल्याणकारी कार्यों को करने में पुरुषार्थ करना धर्म कहलाता हैं इसलिए उसके पालन में सभी का कल्याण हैं।

शंका 4:- क़ुरान के समान वेदों में शत्रु का संहार करने का आदेश अनेक मन्त्रों में बताया गया हैं । आप लोग क़ुरान कि यह कहकर आलोचना करते हैं कि क़ुरान हिंसा का आदेश देता हैं, फिर वेद भी ऐसा ही सन्देश हैं तो फिर क़ुरान और वेद कि शिक्षा में क्या अंतर हैं?

उत्तर:- इस शंका का समाधान बहुत सरल हैं। वेद और क़ुरान दोनों शत्रु मारने आदेश देते हैं, मगर दोनों के अनुसार शत्रु भिन्न भिन्न हैं। क़ुरान के अनुसार जो इस्लाम को ना मानता हो और जो मुहम्मद साहिब को अंतिम पैगम्बर न मानता हो, वह शत्रु हैं अथवा जो आपके फिरके से अलग दूसरे फिरके का हो, वह शत्रु हैं जैसे एक शिया के लिए एक सुन्नी, एक वहाबी के लिए एक अहमदी, एक देवबंदी के लिए एक बरेलवी वगैरह वैगरह। रोजाना ईराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान , अफ़्रीकी देशों में यह बात सामान्य रूप से देखने को मिलती हैं कि इस्लाम को मानने वाले फिरके एक दूसरे के प्राण लेने में हिंसक रूप से आमदा हैं। जबकि वेदों के अनुसार शत्रु वह हैं जो धर्म मार्ग पर नहीं चलता, जिसके कर्म, आचार, विचार,व्यवहार उत्तम नहीं हैं, जो दुराचारी हैं, पापी हैं, दुष्ट हैं। इस्लाम के अनुसार शत्रु कि परिभाषा अत्यंत संकीर्ण हैं,  गैर मुस्लिम चाहे कितना भी श्रेष्ठ कार्य क्यूँ न हो, उसके विचार उत्तम से उत्तम हो, उसका आचार उत्तम से उत्तम चाहे क्यूँ न हो मगर वह इसलिए मारने योग्य हैं, क्यूंकि वह इस्लाम को नहीं मानता और मुहम्मद पर विश्वास नहीं लाता। दुनिया में इससे संकीर्ण मानसिकता आपको कही भी देखने को नहीं मिलती। जबकि वैदिक धर्म कि यह विशेषता हैं कि चाहे कोई हिन्दू हो, चाहे मुस्लिम हो ,चाहे ईसाई हो, चाहे नास्तिक ही क्यूँ न हो अगर वह धर्म मार्ग पर चलेगा तो उसका सर्वदा कल्याण होगा। सही मायनों में वेद कि शिक्षा सारभौमिक, व्यवहारिक एवं प्रासंगिक हैं।
वेद के अनुसार शत्रु धर्म मार्ग पर न चलने वाला दुष्ट हैं जबकि क़ुरान के अनुसार शत्रु क़ुरान कि मान्यताओं को न मानने वाला हैं। जिस दिन समाज वेदों में वर्णित शत्रु और क़ुरान में वर्णित शत्रु में भेद समझ जायेगा उस दिन विश्वभर में शांति का राज हो जायेगा क्यूंकि आज मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु वह स्वयं हैं, मनुष्य का दुराचार, उसका दुष्ट व्यवहार सबसे बड़ा शत्रु हैं इसीलिए वेद इस शत्रु समाप्त करने का आदेश देता हैं। आप सुधरोगे जग सुधरेगा, आप बिगड़ोगे जग बिगड़ेगा।

शंका 5:- अपने आपको विद्वान कहने वाला इस्लामिक प्रचारक डॉ ज़ाकिर नायक द्वारा इस विषय में एक तर्क इस प्रकार से देता हैं कि कक्षा आठ में पढ़ने वाले एक छात्र का उदहारण लीजिये। अगर वह पाँच विषय में से चार में १००/१०० और एक विषय में अनुतीर्ण हो जाये तो क्या आप उसे उतीर्ण कहेगे? नहीं ना, बस ऐसा ही इस्लाम को न मानने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ हैं, चाहे वह कितना भी उत्तम कर्म करता हो, चाहे कितना भी श्रेष्ठ उसका आचरण हो मगर वह इस्लाम को नहीं मानता और अंतिम पैगम्बर मुहम्मद साहिब पर विश्वास नहीं लाता इसलिए वह अनुतीर्ण कहलायेगा।

उत्तर:- डॉ ज़ाकिर नायक के कुतर्क पर मुझे हँसी आती हैं। यह कुछ ऐसा हैं कि मुदद्दई भी तुम और गवाह भी तुम। एक बात बताओ इस्लामिक मत कि स्थापना और मुहम्मद साहिब के जन्म लेने से पहले क्या कोई धार्मिक ही नहीं था या फिर ऐसा था कि तब आठवीं कक्षा के छात्र के लिए विषय ही चार होते थे पाँचवा विषय ही नहीं था। सत्य यह हैं कि धर्म यानि कि श्रेष्ठ आचरण तो तभी से हैं जबसे मनुष्य कि उत्पत्ति हुई हैं और ज़ाकिर नायक के साथ-साथ विश्व के सभी विद्वान यह स्पष्ट रूप से मानते हैं कि विश्व का सबसे प्रथम ईश्वरीय ज्ञान अथवा इल्हाम अगर कोई हैं तो वह वेद ही हैं और ईश्वरीय ज्ञान का विशेष गुण भी यही हैं कि वह अपने आप में पूर्ण होता हैं, सृष्टि के आदि से लेकर अंत तक वह एक समान रहता हैं, उसमें किसी भी प्रकार के परिवर्तन करने कि आवश्यकता नहीं हैं क्यूंकि उस ज्ञान को प्रदान करने वाला ईश्वर हैं। वेद स्पष्ट रूप से आचरण को परम धर्म कहता हैं जैसा ऊपर शंका में बताया गया हैं। इसलिए यह केवल एक भ्रान्ति भर हैं कि केवल इस्लाम को मानने वाला धार्मिक हैं, बाकि सब अधार्मिक। इस्लाम को मानने वाला जन्नत में जायेगा बाकि सब के सब दोजख़ में जायेगे। 

शंका 6:- क्या धर्म अफीम हैं जैसा कि कार्ल मार्क्स ने बताया हैं?
उत्तर:- कार्ल मार्क्स ने धर्म के स्थान पर मत को धर्म का स्वरुप समझ लिया। जैसा उन्होंने देखा और इतिहास में पढ़ा उसको देख कर तो हर कोई धर्म के विषय में इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा जैसा मार्क्स ने बतलाया। उन्होंने अपने चारों और क्या देखा?  मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा यूरोप, एशिया में इस्लाम के नाम पर भयानक तबाही, चर्च के अधिकारीयों द्वारा धर्म के नाम पर सामान्य जनता पर अत्याचार को देखने पर उनका धर्म से विश्वास उठ गया और उन्होंने धर्म को अफीम कि संज्ञा दे दी क्यूंकि अफीम ग्रहण करने के पश्चात जैसे मनुष्य को सुध-बुध नहीं रहती वैसा ही व्यवहार धर्म के नाम पर मत को मानने वाले करते हैं। धर्म अफीम नहीं हैं अपितु उत्तम आचरण हैं, इसलिये धर्म को अफीम कहना गलत हैं , मत को अफीम कहने में कोई बुराई नहीं हैं।

शंका 7:- वेद के अनेक मन्त्रों में स्वर्ग के विषय पर प्रकाश डाला गया हैं जबकि वैदिक मान्यता के अनुसार स्वर्ग नाम कि कोई भी भिन्न सत्ता नहीं हैं। ऐसा विरोधाभास क्यूँ हैं?

उत्तर:-  जितनी बड़ी यह शंका दिखती हैं उतना ही सरल इसका समाधान हैं । वेदों के अनुसार सरल शब्दों में स्वर्ग मनुष्य कि उस अवस्था को कहते हैं जिस अवस्था में वह सुखी हैं, प्रसन्न हैं और नरक मनुष्य कि उस अवस्था को कहते हैं जिसमें वह सबसे अधिक दुखी हैं, पीड़ित हैं, त्रस्त हैं। अब वैदिक कर्मव्यस्था के अनुसार जो जैसा करेगा वो पायेगा, यह अटल सिद्धांत हैं। मनुष्य अपने ही द्वारा किये गये कर्मों से सुखी हैं, मनुष्य अपने ही द्वारा किये गये कर्मों से दुखी हैं। मनुष्य अपने कर्म धरती पर करता हैं और उसका फल भी धरती पर ही भोगता हैं, इसलिए उसका सुखी या दुखी होना भी धरती पर होना चाहिए अर्थात स्वर्ग भी यही हैं और नरक भी यही हैं। वेदों में स्वर्ग प्राप्ति के लिए मन्त्रों में इसीलिए कामना कि गई हैं क्यूंकि उसका उद्देश्य मनुष्य को उत्तम कर्म करते हुए, धर्म मार्ग पर चलते हुए, सुख कि प्राप्त करने का सन्देश देना हैं । क़ुरान में स्वर्ग प्राप्ति के लिए कर्म के स्थान पर मत के संकीर्ण विश्वास  को प्राथमिकता दी गई हैं। एक ऐसे स्वर्ग कि कल्पना कि गई हैं , जहा पर भोग के लिए हूरें हो, मीठे पानी के चश्मे हो, शराब कि नदियाँ हो, वैसे इस्लामिक स्वर्ग कि कल्पना करने वाले लेखक और रेगिस्तान में रहने वाली चरवाहें कि इच्छा में कोई विशेष अंतर न होना क्या सन्देश देता हैं, पाठक समझ सकते हैं। इस्लामिक स्वर्ग कि प्राप्ति के लिए चाहे निरपराध कि हत्या क्यूँ न करनी पड़े, चाहे निरीह पशुओं कि गर्दन पर वार क्यूँ न करना पड़े परन्तु सब जायज हैं, जबकि वैदिक स्वर्ग उत्तम से उत्तम कर्म करने कि उच्च मर्यादा का सन्देश हैं। विश्व भर में होने वाले इस्लामिक आतंकवाद का उस दिन सफाया हो जायेगा जिस दिन वैदिक स्वर्ग और इस्लामिक बहिशत के मूलभूत अंतर का पाठ इस्लाम को मानने वालो को पढ़ाया जायेगा।

शंका 8:- हिन्दू समाज ईश्वर को कण कण में मानता फिर  मूर्ति में ईश्वर कि पूजा करने में आपत्ति हैं?

समाधान:- आर्यसमाज के यशस्वी दार्शनिक विद्वान् श्री पंडित गंगा प्रसाद जी उपाध्याय जी एक बार अपने उपदेश में ईश्वर की सर्वव्यापकता का मंडन व मूर्ति पूजा पर अपने विचार प्रकट कर रहे थे कि एक श्रोता ने खड़े होकर प्रश्न कर दिया
तुम वेद के ठेकेदारों से हैं, यह मेरा सवाल
कण-कण में खुदा हैं तो मूर्ति में क्यूँ नहीं?
श्री उपाध्याय जी ने प्रश्न सुनकर पूछा कि प्रश्न का उत्तर तुम्हारी तरह पद्य में दूँ या गद्य में? प्रश्नकर्ता ने कहा कि मजा तो इसी में हैं कि आप उत्तर भी मेरी तरह पद्य में ही दें.
तब पंडित जी ने उत्तर देते हुए कहाँ:-
तुम पुराण के ठेकेदारों को हैं यह मेरा जवाब,
मूर्ति में खुदा तो हैं पर तुम तो उसमें हो नहीं।
प्रश्नकर्ता पौराणिक था व उसका तात्पर्य यह था कि जब ईश्वर सर्वव्यापक हैं, तो वह मूर्ति में भी स्वत: सिद्ध होता हैं।  जब मूर्ति में ईश्वर का होना सिद्ध हो गया, तो मूर्ति कि पूजा, ईश्वर कि पूजा हो तो सिद्ध होती हैं।  फिर मूर्ति पूजा का विरोध या निषेध क्यूँ किया जाता हैं?
इस प्रश्न का उत्तर हैं कि ईश्वर अति सूक्षम हैं। वह दृश्यमान नहीं हैं , साकार नहीं है।  रंग, रूप व आकार आदि गुण प्रकृति से बनाए सृष्टि के दृश्यमान पदार्थों के हैं।  ईश्वर के नहीं हैं।
साकार मूर्ति ईश्वर ने नहीं बनाई. ईश्वर ने प्रकृति से पत्थर बनाए तथा मनुष्य ने पत्थर से मूर्ति बनाई. प्रकृति, पत्थर व मूर्ति में अपने अन्तर्यामी व सर्वव्यापक गुणों के कारण से ईश्वर तो विद्यमान हैं, यह सत्य हैं परन्तु इन सब में से कोई भी ईश्वर नहीं हैं, यह भी सत्य हैं. इसे इस प्रकार भी कहाँ जा सकता हैं कि मूर्ति में ईश्वर हैं, परन्तु मूर्ति- मूर्ति ही हैं, वह ईश्वर नहीं हैं। सर्वव्यापक निराकार ईश्वर कि मूर्ति बन भी नहीं सकती क्यूंकि एक मूर्ति में न सिमट सकने वाले ईश्वर को आप कैसे सीमित कर सकते हैं।
इसके विपरीत आत्मा ईश उपासना या भक्ति करना चाहता हैं।  वह ईश्वर कि तरह न तो अन्तर्यामी हैं तथा न ही सर्वव्यापक हैं। हमारे ह्रदय में आत्मा हैं,आत्मा ईश्वर के निकट विद्यमान हैं, आत्मा का ईश्वर से मिलना, योग व समाधी में अनुभूति द्वारा ही संभव हैं। ह्रदय से बाहर मूर्ति में विराजमान ईश्वर का मिलन विभिन्न स्थान होने से कैसे संभव हैं ? दो व्यक्तियों का मिलना पृथक- पृथक स्थानों पर होने से संभव ही नहीं हैं। जब दोनों व्यक्ति एक स्थान पर आये तो ही उनका मिलन होगा. प्रत्यक्ष: में भी हम यही देखते हैं.
मनुष्य में आत्मा केवल और केवल उसके ह्रदय में ही हैं और ह्रदय में ही रहेगी। आत्मा सर्वव्यापक नहीं हैं ,वह पत्थर कि मूर्ति में भी नहीं हैं और अन्यत्र कहीं नहीं जा सकती अत: आत्मा और परमात्मा का मिलन मूर्ति में नहीं हो सकता।  जब एक वस्तु हमारे निकटतम हो तो उसे प्राप्त करने के लिए दूर जाने कि आवश्यकता ही नहीं हैं।  अल्पज्ञों को यह बात समझ नहीं आती व वे मूर्ति को ही ईश्वर मानकर उसकी पूजा करते हैं.
गीता में १८/६१ में कहाँ भी गया हैं कि हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के ह्रदय में स्थित हैं।
यजुर्वेद ४०/५ में ईश्वर के विषय में कहाँ गया हैं- वह दूर भी हैं, वह समीप भी हैं, वह भीतर भी हैं, वह बाहर भी हैं।
अज्ञानी लोग ईश्वर को आत्मा से दूर मानते हैं इसीलिए ईश्वर को वे पत्थरों में, पेड़ों में, चित्रों में,नदियों में,तीर्थों में,चौथें आसमान पर, सातवें आसमान पर, कैलाश पर, क्षीर सागर पर, गोलोक में होना मानते हैं।
किन्तु सच्चे आस्तिकों, योगियों व विद्वानों के विचार में ईश्वर हमारे भीतर आत्मा में ही मिलते हैं।
हम उसमें हैं और वह हममें हैं. इससे अधिक निकटता- समीपता अन्य किसी भी दो वस्तुयों में नहीं हैं ,अत: ईश्वर को प्राप्त करने के लिए आत्मा से बाहर जाने कि आवश्यकता नहीं हैं, हमारा ईश्वर हमारी आत्मा में ही हैं, आत्मा बाहर मूर्ति में जा नहीं सकती, उपासना का सही अर्थ हैं निकट बैठना और हमारे ह्रदय में आत्मा ही ईश्वर के समीप बैठ सकती हैं।  मूर्ति कि आकृति को व्यक्त किया जा सकता हैं जबकि ईश्वर के निराकार होने के कारण उनके रूप को व्यक्त नहीं किया जा सकता।  वेदांत दर्शन के ३/२/२३ में और कठोपनिषद २/३/१२ में लिखा हैं कि ईश्वर वाणी, मन , नेत्रों से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
इस सम्बन्ध में सुप्रसिद्द शास्त्रथ महारथी पंडित राम चन्द्र दहेलवी का कथन कि “हम ईश्वर को मूर्ति के भीतर तो बाहर स्वीकार करते हैं ,हम मूर्ति का खंडन नहीं अपितु मूर्ति पूजा का खंडन करते हैं।  जब ईश्वर सर्वत्र हैं तो मूर्ति के भीतर वाले ईश्वर को ही आप क्यों पूजना चाहते हैं? मूर्ति के बाहर वाले ईश्वर को आप क्यों नहीं पूजना चाहते? मान लीजिये, आप मुझे मिलने आये हैं तथा मैं आपको अपने द्वार के बाहर ही मिल जाऊ तो मुझसे मिलने में आपको अधिक सुविधा होगी अथवा मेरे भीतर होने पर होगी।  भगवान् तो सब जगह हैं उससे बाहर ही मिल लीजिये, व्यर्थ में मूर्ति के अन्दर वाले के पीछे क्यों पड़े हैं? आप मूर्ति में दाखिल नहीं हो सकते और मूर्ति वाला ईश्वर बाहर नहीं आ सकता।  क्यों मुश्किल में पड़ते हो? सरल काम कीजिये और मूर्ति से बाहर वाले कि पूजा कर लीजिये।
मूर्ति में ईश्वर को व्यापक मानकर मूर्ति कि पूजा करने वालों से हमारा यह अनुरोध हैं कि ईश्वर मूर्ति से बाहर भी सर्वत्र हैं व हमारे ह्रदय में तो वह अन्तर्यामी होने से अत्यंत निकट हैं. ईश्वर को बाहर तलाशने वालों के लिए यह भजन कि पंक्तियाँ प्रेरणादायक हैं।
तेरे पूजन को भगवान बना मन मंदिर आलीशान
किसने देखी तेरी सूरत, कौन बनाए तेरी मूरत ?
तू ही निराकार भगवान् बना मन मंदिर आलीशान।।

शंका 9 :- वेद का ज्ञान ईश्वर ने कैसे दिया?

समाधान:- एक बार एक मेले में हिन्दू समूह के सामने एक मौलाना इस्लामिक प्रचार करते हुए जोर जोर से चिल्ला रहा था और कह रहा था कि क्या यहाँ कोई हिन्दू हैं जो मुझे यह बता सके कि वेदों का ज्ञान ऊपर वाले ने आदम जात को कैसे दिया क्यूंकि  वेद जब इस धरती पर आये तो न कोई आकाशवाणी हुई और न ही कोई पैगम्बर आया हिन्दू समाज में हुआ फिर यह ज्ञान आदम को कैसे नसीब हुआ था। इससे तो यही मालूम चलता हैं कि वेद भगवान का दिया ज्ञान नहीं हैं अपितु मानव कि स्वयं कि कल्पना हैं, इससे पाक तो अल्लाह का दिया क़ुरान हैं जिसे स्वयं अल्लाह ने मुहम्मद साहिब के माध्यम से दिया था।
श्रोताओं में गुरुकुल कांगड़ी का एक स्नातक भी था जो कुछ दूरी पर खड़ा था, उसने मौलाना से जोर से पूछा कि मौलाना कि क्या शंका हैं, मौलाना ने दोबारा अपनी शंका ऊँची आवाज़ में दोहरा दी, वह स्नातक अब मंच के कुछ समीप आ गया और उसने पहले से धीमी आवाज़ में दोबारा मौलाना से उसकी शंका पूछी, मौलाना ने वही शंका दोबारा से मगर पहले से धीमी आवाज़ में दोहरा दी, स्नातक अब मंच के और समीप आ गया और उसने पहले से भी धीमी आवाज़ में दोबारा मौलाना से उसकी शंका पूछी, मौलाना ने वही शंका दोबारा से मगर पहले से भी धीमी आवाज़ में दोहरा दी, स्नातक अब मंच पर आकर मौलाना के बिलकुल निकट खड़ा हो गया और फिर से उनकी शंका को पूछा , इस बार मौलाना ने सामान्य आवाज़ में अपनी शंका प्रस्तुत कर दी। अब स्नातक ने मौलाना से पूछा बताये मौलाना जी पहले आप जोर से चिल्ला कर अपनी बात कह रहे थे, अब आप अपनी बात उतने जोर से नहीं कह रहे ऐसा क्यूँ? मौलाना ने कहा कि पहले आप दूर थे इसलिए ज्यादा जोर से आवाज़ लगनी पड़ रही थी, अब आप पास हैं इसलिए सामान्य आवाज़ से कार्य सम्पन्न हो जाता हैं। स्नातक ने उत्तर दिया बस मौलाना जी यही तो आपको समझाना था चूँकि वैदिक ईश्वर हमारी आत्मा के भीतर ही वास करता हैं इसलिए हमारे अंतर्मन में ही ईश्वर ने ज्ञान को दे दिया था, इसलिए न कोई आकाशवाणी कि आवश्यकता पड़ी और न ही कोई पैगम्बर कि आवश्यकता पड़ी। मौलाना उसका कथन सुनकर चुप हो गये और उनका मज़हबी बुखार उतर गया।
पाठकों वैदिक सिद्धांतों के अनुसार ईश्वर एक देशीय अर्थात एक स्थान पर वास करने वाला अथवा किसी एक लोक में वास करने वाला नहीं हैं जैसा कि पौराणिक समाज गोलोक, क्षीर सागर, कैलाश पर मानता हैं अथवा सातवें या चौथे आसमान पर जैसा कि सैमितिक मतों का मानना हैं। वेदों के अनुसार ईश्वर सर्वव्यापक अर्थात सभी स्थानों पर हैं, ईश्वर अपनी बनाई सृष्टि में सभी स्थानों पर तभी हो सकता हैं जब वह निराकार हैं अर्थात जिसका कोई आकार नहीं हैं। मनुष्य के भीतर आत्मा जिसे रूह अथवा soul भी कुछ लोग कहते हैं, सभी मानते हैं। ईश्वर का वास सभी प्राणियों में उनके भीतर अर्थात उनकी आत्मा में होता हैं। जब ईश्वर हमारे भीतर ही हैं, तब तो ईश्वर हमें अपना ज्ञान अर्थात वेद भीतर से ही दे सकता हैं? सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा वेदों का ज्ञान चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा को इसी प्रकार से उनकी आत्मा में विराजमान ईश्वर द्वारा भीतर ही दिया गया था। इसलिये न किसी प्रकार कि आकाशवाणी कि, न किसी पैगम्बर कि ईश्वर को सहायता कि आवश्यकता हैं।  ईश्वर का एक गुण सर्वशक्तिमान भी हैं अर्थात जो जो कर्म ईश्वर के हैं , वो वो कर्म करने के लिए ईश्वर किसी अन्य पर आश्रित नहीं हैं, वह स्वयं से सक्षम एवं समर्थ हैं। इसलिए किसी पैगम्बर आदि से ज्ञान देने कि बात बनावटी सिद्ध होती हैं और ईश्वर द्वारा अन्तरात्मा में ज्ञान देना ज्यादा तर्क संगत सिद्ध होता हैं।
डॉ विवेक आर्य 

3 comments:

  1. आपके विचार हमें अति उत्तम लगे. लेकिन पूर्ण नहीं.

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  2. मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि संध्या का समय 12-15 मिनट का होता है या 1 मुहूर्त यानि 48 मिनट का । कयोंकि नित्य कर्म में संध्या जरूरी है तथा कुछ कर्म संध्या के समय निषिद्ध है ।

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