Wednesday, September 4, 2013

आशाराम बापू ,मीडिया एवं संतों-सन्यासियों के कर्तव्य


मीडिया में आशाराम बापू और एक लड़की द्वारा उन पर लगाये गये आरोपों को पिछले एक हफ्ते से प्राइम टाइम/ ब्रेकिंग न्यूज़/ विशेष/ हेडलाइंस और न जाने किस किस रूप में दिखाया जा रहा हैं जिसे देख कर ऐसा लगता हैं की सारे भारत देश में और किसी भी प्रकार की कोई गतिविधि नहीं हो रही केवल और केवल आशाराम बापू की ही खबर मीडिया वालो को मिली हैं।
आश्रम बापू पर लगाये गये आरोप सही हैं या गलत हैं, यह सिद्ध करना कोर्ट का कार्य हैं, मीडिया का नहीं मगर यहाँ पर मीडिया की ख़बरों को देखकर ऐसा लगता हैं की TRP की होड़ लगी हुई हैं। आशाराम बापू ने अगर कोई अपराध नहीं किया हैं तो वे निष्पक्ष रूप से छुट जाने चाहिए और अगर उन्होंने कोई गलत कार्य किया हैं, तो उसकी सजा अवश्य मिलनी चाहिये, जिससे दूसरो को सबक अवश्य मिले। मगर यह दूसरे कौन हैं?
इन दूसरों में हिन्दू समाज के अलावा मुस्लिम, ईसाई वह अन्य सभी मत-पन्थ के तथाकथित धर्मगुरु या प्रचारक भी आते हैं। हमारा प्रश्न बिलकुल स्पष्ट हैं की ऐसी गतिविधियाँ जहाँ कहीं भी हो रही हैं मीडिया को उन सभी की पोल खोलनी चाहिए। फिर केवल आशाराम बापू की खबर को प्राथमिकता देना मीडिया की निष्पक्ष भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाता हैं।
बेटी चाहे हिन्दू की हो, मुस्लमान की हो या ईसाई की हो, बेटी तो सभी की एक ही जैसी हैं फिर मीडिया बार बार आशाराम बापू का नाम क्यूँ ले रहा हैं ? एक धर्म विशेष की बेटी के लिए गुहार लगाना , अन्यों का ठीक प्रकार से नाम तक न लेना अशोभनीय होने के साथ साथ गैर लोकतान्त्रिक भी हैं।
उदहारण के तौर पर

१. Times of India (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) के मई २३, २०१३ के संस्करण में सलीम पंडित नाम के रिपोर्टर द्वारा सूफी दरवेश गुलज़ार अहमद भट्ट नाम के एक मौलवी के विषय में लेख छपा हैं जिस पर इलज़ाम लगा था की उसने अपने धार्मिक मदरसे में पढ़ने वाली छोटी छोटी अनेक बच्चियों का बलात्कार किया था। उसकी पोल जब खुली जब उसे व्यभिचार करते हुए उसी के एक सहयोगी ने देख लिया।
अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करे
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-05-23/india/39474551_1_four-girls-dervish-godman

२.  The Hindu (द हिन्दू) अख़बार के ७ मार्च, २०१३ के संस्करण में हैदराबाद की खबर छपी हैं जिसमें गरीबी की मार छेल रहे मुस्लिम परिवार अपनी बेटियों को अरब देश के उन शेखों को बेच डालते हैं जिनकी उम्र उनके पति की नहीं अपितु उनके पिता बनने की होती हैं। बिचोलियों का एक पूरा नेटवर्क ही इस कार्य में लगा हुआ हैं। निकाह कराने वाला क़ाज़ी, रिश्ता करवाने वाले बिचोलिये से लेकर होटल आदि की व्यवस्था तक करवाने वालो की मिलीभगत होती हैं।  सबसे गौर करने की हैं की यह कार्य इस्लाम के नाम पर शरियत के नियमों की मन मुताबिक व्याख्या  निकाल कर किया जाता हैं।
अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करे
http://www.thehindu.com/news/cities/Hyderabad/the-marriage-trap/article4484790.ece

३. Times of India (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) के मई ६, २०१० के संस्करण में केरल प्रान्त के एक ईसाई पादरी के जी जोज़फ नाम के पादरी के विषय में छापी हैं जिस पर आरोप हैं की उसने दो छात्र ईसाई नन को चर्च के हॉस्टल में मानसिक एवं शारीरिक रूप दोनों से शोषण किया जिसके कारण एक नन की तो मृत्यु भी हो चुकी हैं।

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करे
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-03-06/india/28135390_1_anu-sexual-abuse-priest

४. Indian Express (इंडियन एक्सप्रेस) में जयपुर की इसाई संस्था "ग्रेस होम" की खबर छपी हैं जहाँ से 15 मणिपुरी लडकियाँ छुड़ाई गई हैं ।इन सबके साथ यौन शोषण हुआ है। लड़कियों की उम्र सिर्फ 7 से 15 के बीच है। जब लड़कियों का मेडिकल करवाया गया तो पता चला कि 15 में से 13 का कौमार्य भंग किया जा चुका है और 13 में से 9 लड़कियों को ल्यूकोरिया नामक रोग से ग्रसित पाया गया जो कि सेक्स की अधिकता या सेक्स वर्करोँ में होता है । एक डॉक्टर ने जो इनकी देखभाल कर रही है उसने बताया इन लड़कियों को अँधेरे कमरे में रखा गया था जिससे इनमें विटामिन डी की कमी हो गई है जब इन्हे बाहर निकाला गया तो हाथ पैर कांप रहे थे । अभी इनको विटामिन डी की गोलियाँ दी जा रही हैं । पुलिस की गिरफ्त में संस्था का मालिक पॉस्टर जैकब जॉन आया है जो कि एक पादरी है ।

यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में इस लिंक पर छपी है
http://www.indianexpress.com/news/test-confirms-manipuri-girls-rescued-from-jaipur-home-were-sexually-abused/1140369/

चर्च की इस प्रकार की अंदरूनी गतिविधियों का कच्चा चिठ्ठा एक भूतपूर्व नन जेसमे राफेल ( Jesme Raphael) ने कुछ वर्षों पहले अपनी पुस्तक Amen: An Autobiography of a Nun में लिख कर किया था। इस पुस्तक ने भारत के सम्पूर्ण चर्च को हिल दिया था। Outlook सरीखी पत्रिका ने अपने यहाँ से चर्च में हो रही इस प्रकार की गतिविधियों पर एक पूरा अंक २३ जुलाई २०१२ में छापा था।
इस प्रकार के सैकड़ों उदहारण दिए जा सकते हैं।

मीडिया की भूमिका यहाँ तक भी स्पष्ट नहीं हुई थी की उसके प्रतिनिधियों ने इस रोग के निदान की भी आलोचना करनी आरंभ कर दी।
योगगुरु स्वामी रामदेव द्वारा दिया गया बयान की "हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार किसी भी साधू-संत को किसी भी महिला को चाहे वो माता, बेटी आदि हो उसके एकांत में कभी दर्शन नहीं करने चाहिए। जो धर्म गुरु इस नियम की अनदेखी करते हैं वही विवादों को आमंत्रण देते हैं" को मीडिया दकियानूसी, गैर व्यवहारिक आदि कहकर आलोचना कर रहा हैं।
सत्य यह हैं की देशभर में बढ़ रहे बलात्कार, नारी जाति के शोषण, पशुव्रत आचरण की समस्या का अगर कोई हल हैं तो वही हल हैं जिसे स्वामी रामदेव ने बताया हैं और जो हमारे ऋषि मुनियों ने लाखों वर्ष पहले स्थापित कर दिया था।
हमेशा जब भी कोई बलात्कारी पकड़ा जाता हैं तो उसकी दिनचर्या में शराब, माँसाहार, अश्लील साहित्य एवं फिल्में प्राय: शामिल ही होती हैं। ऐसा दिल्ली गैंग रैप, मंबई शक्ति मिल रैप आदि में पाया गया हैं जिसके विरुद्ध देश भर में हाहाकार अभी तक मच रहा हैं। मीडिया इस पशु तुल्य भोगवाद को बढ़ाने की अपनी अहम भूमिका को कैसे भूल रहा हैं। स्वामी रामदेव के बयान का विरोध भी मीडिया की उसी दूषित मनोवृति का परिचायक हैं। 
हमारे देश संतों-साधुयों का देश हैं जिन्होंने लाखों वर्षों से अपने पवित्र आचरण से , अपने आदर्शों से, अपने संयमित जीवन से,अपने ज्ञान से, अपनी धार्मिकता से सामान्य जन के जीवन को मार्ग दर्शन दिया हैं।
स्वामी दयानंद के जीवन को हम कैसे भूल सकते हैं जिनकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था।

स्वामी दयानंद के जीवन के अनेक प्रसंगों में से एक प्रसंग जब स्वामी जी एक बाग में ध्यानलीन थे तो कुछ मूर्खों द्वारा एक वेश्या को उनके समीप भेजा गया हैं। योगी दयानंद के मुख के तेज को देख कर वह महिला मूर्तिव्रत बन गई। स्वामी जी जब ध्यान समाप्त कर आँखें खोलते हैं तो उनके तेज के भय से सारे षडयन्त्र का वह पर्दाफाश कर देती हैं। धन्य हैं नैष्ठिक ब्रह्मचारी दयानंद जिनके मन के द्वारा कामदेव कभी फटकने का प्रयास तक करने के गलती नहीं करते।
ऐसा ही एक प्रसंग मथुरा में शिक्षण काल का मिलता हैं जब ध्यान में लीन स्वामी दयानंद के पैरों को स्त्री द्वारा स्पर्श कर दिया जाता हैं तब स्वामी जी तीन दिन तक भूखे रहकर उसका पश्चाताप करते हैं।
एक स्त्री द्वारा जब यह इच्छा की जाती हैं की मुझे आपके समान पुत्र चाहिये तब दिग्विजयी दयानंद विनम्रता पूर्वक कहते नहैं की "मैं हूँ न आपका पुत्र दयानंद"
छोटी सी निवस्त्र बच्ची जब स्वामी जी के समक्ष आ जाती हैं तब स्वामी जी अपना सर झुका लेते हैं। साथ चल रहे मूर्तिपूजक समझते हैं की स्वामी जी ने समीप स्थित मंदिर की मूर्ति को नमन किया हैं पर धैर्यवान स्वामी जी उत्तर देते हैं की यह सम्मान मातृशक्ति रुपी उस बच्ची के लिए था तो सभी निरुत्तर हो जाते हैं।

सत्यार्थ प्रकाश के पंचम समुल्लास में स्वामी जी ने मनु स्मृति के आधार पर ब्रहमचारी,गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासियों को धर्म रुपी दस लक्षण का नित्य सेवन करने का निर्देश इस प्रकार किया हैं।

धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ६/९
धृति-सदा धैर्य रखना
क्षमा- जोकि निंदा-स्तुति, मान-अपमान, हानि-लाभ आदि  दुखों में भी सहनशील रहना
दम- मन को सदा धर्म में प्रवृत कर अधर्म से रोक देना
शौच- राग द्वेष पक्ष पात छोड़ के भीतर और जल मृतिका आदि से बाहर की पवित्रता रखनी
इन्द्रिय निग्रह-अधर्म आचरणों से रोक के इन्द्रियों को धर्म ही में सदा चलाना
धी:- मादक द्रव्य बुद्धि नाशक अन्य पदार्थ दुष्टों का संग आलस्य प्रमाद आदि को छोड़ के श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन ,  सत्पुरुषों का संग, योगाभ्यास, धर्माचरण, ब्रहमचर्य आदि शुभ कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना
विद्या- पृथ्वी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त पदार्थ यथार्थज्ञान और उनसे यथा योग्य उपकार लेना। इसके विपरीत अविद्या हैं।
सत्य- जैसा आत्मा में वैसा मन में, जैसा मन में वैसा वाणी में, जैसा वाणी में वैसा कर्म में वर्तना सत्य अर्थात जो पदार्थ जैसा हो उसको वैसा ही समझना , वैसा ही बोलना और वैसा ही करना भी।
अक्रोध- क्रोध आदि दोषों को छोड़ के शांति आदि गुणों का ग्रहण करना धर्म का लक्षण हैं।
इस दश लक्षण युक्त पक्षपातरहित न्यायाचरण धर्म का सेवन चारों धर्मों वाले करे और इसी वेदोक्त धर्म ही में

आप चलना और दूसरों को समझा कर चलाना सन्यासियों का विशेष धर्म हैं।
अटल सत्य यही हैं की संसार का कोई भी व्यक्ति साधू-संत कोटि का तभी बन सकता हैं जब वह धर्म के इन दस लक्षणों का पालन करे।
हिन्दू समाज के सभी संतों के साथ साथ अन्य मत मतान्तरों के मार्ग दर्शकों को अपने एवं समाज के सुधार के लिए इस नियमों का पालन अनिवार्य हैं। इस नियमों को गैर व्यवहारिक, पुराने, आदिम सोच का कहना मीडिया के सबसे बड़ी गलती हैं क्यूंकि यही एक मात्र विकल्प हैं।
मीडिया को भी अपनी भूमिका पर ध्यान देना चाहिए और यह न भूलना चाहिए की जो भोगवादी राक्षस आज अगर किसी और की बेटी का शोषण कर रहा हैं कल उनके द्वार पर भी इसी प्रकार से दस्तक देने में देर नहीं लगायेगा।

डॉ विवेक आर्य

No comments:

Post a Comment