Monday, September 23, 2013

मनुष्य सच्चा नेता कैसे बनता हैं?


आज कल सभी को एक बुखार चढ़ा हैं, वो हैं नेता बनने का। पर सच्चा नेता कोई विरला ही बन पाता हैं।
आर्य समाज के इतिहास में कई बड़े और सच्चे नेता अपने जीवन से, अपने तप से, अपनी दिनचर्या से न केवल अपने जीवन का उद्धार कर चुके हैं अपितु अन्यों के जीवन में भी क्रांति का सूत्रपात करते रहे हैं।

स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, महात्मा नारायण स्वामी, स्वामी स्वतंत्रानन्द जी महाराज उन महान आत्माओं में से हैं जिनके जीवन चरित हमें आज भी प्रेरणा दे रहे हैं। स्वामी श्रद्धानन्द जी के जीवन को निकट से देखने से हमें मालूम चलता हैं की उनके बड़े नेता बनने का सबसे बड़ा कारण था ईश्वर में उनका विश्वास एवं संकट ग्रस्त किसी भी आर्य सज्जन को यथा संभव सहायता पहुँचाना।
चाहे कहीं भी हो स्वामी जी कभी आर्यसमाज का विरोध कर रहे लोगो से शास्त्रार्थ करते, कभी अदालत में गोपीनाथ ढोंगी की पोल खोलते दीखते, कभी विधवा विवाह के समर्थन में विरोधी पंचायत को शक्तिहिन कर देते, कभी स्थान स्थान पर जाकर आर्य कार्यकर्ताओं के मुकदमों को अपना मुकदमा समझ कर लड़ते, कभी आर्ष शिक्षा पद्यति के उद्धार ले लिए गले में झोला टांग कर दान संग्रह करने निकल पड़ते, कभी जंगलों में गुरुकुल की सहायता के लिए अपनी समस्त संपत्ति को दान करते दीखते, कभी अंग्रेजों के विरोध में चांदनी चौक में अपना सीना खोल कर खड़े हो जाते, कभी हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए जामा मस्जिद के मिम्बर से व्याख्यान देते, कभी शुद्धि के रण में महारथी बन विकट से विकट संकटों का सामना करते थे। 

स्वामी जी के जीवन के कुछ प्रसंगों को यहाँ पर देकर यह समझने का प्रयास किया जा सकता हैं की किस प्रकार जीवन में सच्चा नेता बना जाता हैं।

महात्मा मुंशीराम एवं कपूरथला का वैदिक संस्कार 

महात्मा मुंशीराम एवं कुछ अन्य सज्जनों के सहयोग से कपूरथला में १८९४ में आर्य समाज की स्थापना हुई। पहले पहल आर्यसमाज की कार्य वही लाला अमरनाथ सरना जी की दुकान पर होती थी। शहर का कोतवाल सैदेव लाला जी को तंग करने के मंशा से पीछे पड़ा रहता था और उन्हें धमकी तक दे डालता था की अगर प्रचार किया तो किसी न किसी दिन जेल जाना पड़ेगा। कुछ काल पश्चात सुल्तानपुर में आर्यसमाज किराये पर ले लिया गया एवं साप्ताहिक सत्संग वही लगने लगा। १९१० में आर्य समाज के मंदिर का भी निर्माण हो गया। १९२४ में इसी समाज मंदिर में स्वामी जी द्वारा सैकड़ों हरिजनों की शुद्धि की गई थी।

           १९०१ में लाला अमरनाथ सरना जी की माता जी का देहांत हो गया। उन्होंने अपनी माता जी का दाह संस्कार वैदिक रीती से करने की घोषणा कर दी। इस समाचार को सुनते ही नगर में हलचल मच गई। लाला जी के घर पर पुलिस आ गई और कहा की यदि आपने वैदिक रीति से संस्कार किया तो आपको जीवन भर कारागार में रहना पड़ेगा। यह समाचार जालंधर और लुधियाना के समाजों तक फैल गया। महात्मा मुंशीराम जी कई अन्य आर्यों के साथ सांय चार बजे लाला जी के यहाँ पर पहुँच गये। अर्थी उठाई गई और बाज़ार में लाई गई। कोतवाल ने अर्थी को रोक लिया। महात्मा जी ने झट कहा- आपने किस विधान से अर्थी को रोका हैं? क्या आपको यह नहीं मालूम की अर्थी को रोकना मना हैं? यह सुनकर कोतवाल पीछे हट गया। इतने में बाज़ार से लेकर शमशान भूमि तक पुलिस ने घेराबंदी कर दी। अर्थी के शमशान में पहुँचने के समय वहाँ पर पर्याप्त पुलिस की पलटन थी। रियासत के सब एहल कार लोग हाथियों पर चढ़कर इस संस्कार को देखने आये थे। दर्शक लोग वहाँ पर सैकड़ों की संख्या में उपस्थित थे। दाह संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न हो गया। संस्कार के पश्चात पौराणिक पंडितों ने आर्यसमाज के सदस्यों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। आर्यों के लिए खाने-पिने का सामान दो माह तक जालंधर से आता था।
                         महात्मा मुंशी राम जी के भागीरथ प्रयास से ही उत्तर भारत विशेष रूप से पंजाब में गली गली में आर्यों का निर्माण हुआ जिनकी सहयोग से ही महात्मा जी गुरुकुल कांगड़ी जैसी वैभव शाली क्रांतिकारी संस्था का निर्माण करने में सक्षम हुए थे।

स्वामी श्रद्धानंद एवं महाशय चिरंजीलाल का मुकदमा

 आर्यसमाज के अनन्य प्रचारक महाशय चिरंजीलाल जी पंडित लेखराम के समान वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार में अपना तन, मन, धन समर्पित करने वाले प्रचारक थे। १९ वर्ष की आयु में आपने १८७७ में स्वामी दयानंद के दर्शन लुधियाना में किये थे। बस तभी से आपने वैदिक धर्म का प्रचार करने की ठान ली थी। परन्तु एक तो आपका विवाह हो चूका था ऊपर से आपके पिताजी की मृत्यु होने से घर का सार बोझ आपके ककंधो पर आ चूका था। १०-१२ वर्ष तक आपने किसी प्रकार धैर्य किया और दुकानदारी से कुटुम्ब का भरण पोषण करने लगे। जब छोटा भाई कार्य भार सँभालने योग्य हो गया तो आप प्रचार कार्य में निकल पड़े। इनके प्रचार का साधन इन्ही की बनाई हुई पंजाबी की सी हर्फियाँ होती थी। उन्हें यह उर्दू में छपवा लेते और गा-गा कर उनका प्रचार करते थे। आप पर एक अभियोग भी चला जिसके कारण आपको ४ मास की सजा हुई और ५० रुपये का दंड मिला। आपके लिए महात्मा मुंशीराम ने अपील की जिससे आप छूट गए पर कुछ काल तक आपको जेल में रहना पड़ा था। कारावास की कहानी करुणाजनक हैं। इस कारावास ने आपके प्रचार को द्विगुणित कर दिया। संगठन निर्माणकर्ता वही बन सकता हैं जो अपने सहयोगियों के दुःख और दर्द में उनका साथ दे।

गढ़वाल में विरोध के बीच सहायता कार्य

सन १९१८ में जब गढ़वाल में अकाल पड़ा था तो स्वामी जी महाराज ने अकाल पीड़ितों की सहायता का विशाल आयोजन किया और अपने मानसिक पुत्रों (जिन मे हम सब गुरुकुल के विद्यार्थी सम्मिलित थे) को इस यज्ञ में अपनी अपनी आहुति देने के लिए निमंत्रित किया। इस आदेश के समय हम उस समय महा विद्यालय विभाग के प्राय : सब ब्रहमचारी सेवा कार्यार्थ वहा पहुच गए और श्रदेय स्वामी जी की अधीनता में कार्य करने लगे। मुझे क्यूंकि पूज्य आचार्य जी के साथ पौड़ी, रूद्रप्रयाग, उत्तर काशी, केदारनाथ आदि अनेक स्थानों में जाने और कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था अत: मैं जानता हूँ की उनका ह्रदय कितन सहानुभूति और संवेदन शील था, किस प्रकार पीड़ितों की अवस्था को देखकर उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे तथा उनके दुःख निवारणार्थ वे आतुर रहते थे। कई बार वे १८,२० मील तक हमारे साथ चलते थे। और अपने आराम की तनिक भी चिन्ता न करते थे। उन्हीं दिनों की बात हैं की गढ़वाल के एक स्थानीय पत्र में किसी आर्यसमाजी सज्जन ने वहा की सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक लेख लिखा जिससे गढ़ वाली जनता में खलबली मच गई और कुछ अविवेकी गढ़वालियों ने आर्यसमाज के सर्व मान्य नेता के रूप में स्वामी श्रद्धानन्द जी पर ही आक्रमण करने का निश्चय किया और इस उद्देश्य से पौड़ी (गढ़वाल की राजधानी में) एक सभा बुलवाई। इसकी सुचना अपने कुछ भक्तों द्वारा पाते ही (जिन्होंने जिन्होंने उनसे निवेदन किया की वे पौड़ी न जाये ताकि दुष्ट उन पर किसी प्रकार का आक्रमण उस उत्तेजित अवस्था में न कर बैठे). वीर केसरी स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज न केवल रूद्र प्रयाग से पौड़ी पहुचे बल्कि उस सभा में भी जा पहुचे जहाँ उनके विरुद्ध बड़ी भयंकर उत्तेजना फैलाई जा रही थी। वीर नर सिंह के उस सभा में पहुचते ही सारा वायु मंडल परिवर्तित हो गया और स्वामी जी के निंदासूचक प्रस्ताव के स्थान में चारों और से उनकी सेवाओं के लिए अभिनन्दन किया जाने लगा। यह था निर्भयता का आदर्श जो ईश्वर के सच्चे भगत उन वीर सन्यासी ने प्रत्येक समय दिखाया था और जिसके कारण सब विरोधिनी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने में वे सफल हुए थे।

छात्रों के प्रति उनकी उदारता

वे अपने लड़को का कितना ख्याल रखते थे इसका एक उदहारण मुझे याद आता हैं। हमारी क्लास में एक लड़का सत्यप्रिय था। उसको किसी अपराध पर उन्होंने गुरुकुल से निकाल दिया था। कुछ काल बाद रंगून से उनके किसी व्यापारी मित्र ने उन्हें लिखा की उसे एक लेखक की आवश्यकता हैं, वे किसी को भेज दे। उन्होंने सत्य प्रिय को लिखा की वे उनका पत्र लेकर रंगून चला जाये। उसकी नियुक्ति वहा ८० या १०० रुपये में कर दी हैं।
ऐसा ही एक विवरण स्वामी स्वतंत्रानन्द जी के जीवन से मिलता हैं। रामामंडी , पटियाला जिला में प्रारंभकाल में कार्यकारिणी पर सरकारी अभियोग चलाया गया जिसमें कार्यकारिणी के प्रधान महाशय गेंदाराम जी को जेल की सजा हुई। स्वामी स्वतंत्रानन्द जी की अगुवाई में बाबा अर्जुन देव बगाही वकील, हाई कोर्ट लाहौर जी ने पैरवी की और महाशय कृष्ण जी ने सहयोग दिया।

इस लेख का मुख्य उद्देश्य यह बताना हैं की कोई भी व्यक्ति सच्चा नेता अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के विपत्तिकाल में सहयोग से बनता हैं, उनके रक्षण से बनता हैं नाकि अपने नाम के आगे नेता लगाने से बनता हैं।
डॉ विवेक आर्य  
 

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