Friday, October 14, 2016

महर्षि दयानंद सरस्वती वचनामृत



|| ओ३म् ||

महर्षि दयानंद सरस्वती वचनामृत ||

महापुरुषों के वचन बड़े अमूल्य हुआ करते है | उन पर चलने से मनुष्य को बहुत सुख मिलता है और उसका लोक तथा परलोक दोनों सुधर जाते है |

1. ईश्वर ने मनुष्य को जितनी शक्ति दे रक्खी है उतना पुरषार्थ उसे अवश्य करना चाहिए | इसके बाद ईश्वर की सहायता की कामना करनी चाहिए |

2. ईश्वर की सहायता के बिना धर्म का पूरा ज्ञान और उसका पूर्ण अनुष्टान कभी नहीं हो सकता |

3. जो मनुष्य सच्चे प्रेम और भक्तिभाव से भगवान की उपासना करता है उस उपासक को अन्तर्यामी परमेश्वर मोक्ष का सुख देकर सदा के लिए आनन्द कर देता है |

4. जिन लोगों का मन विद्या में लगा रहता है, जो सदा सत्य बोलते है, जो अभिमान नहीं करते, जो सदा पवित्र रहते है, जो सत्य उपदेश और विद्यादान से संसारी लोगों का दुःख दूर करते है ऐसे परोपकारी नर-नारी धन्य है |

5. वेद सब सत्य विद्याओ की पुष्तक है | उसका पढना-पढाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है |

6. दयानन्द की आँखे वह दिन देखना चाहती है जब काश्मीर से कन्याकुमारी तक और अटक से कटक तक देवनागरी अक्षरों की ही प्रचार होगा | मैंने भारत भर में एक भाषा का प्रचार करने के लिए ही अपने सारे ग्रन्थ आर्य-भाषा में बनाये है |

7. दुसरे की भलाई करना धर्म और दुसरे की हानि करना अधर्म है |

8. वेश्या के पास जानेवाले मनुष्य की बहु-बेटियां और लड़के-बालो का आचार ठीक नहीं रहता |

9. सब लोग विद्वान तो नहीं बन सकते परन्तु धार्मिक अवश्य बन सकते है |

10. जो मनुष्य सबके ह्रदय की बात को जान्नेवाला और सब जगह मौजूद परमेश्वर से नहीं डरता,जो यह नहीं समझता की मेरा कोई भी काम ईश्वर से छिपा नहीं, जो इन्द्रियो के वश में रखकर ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करता वह कभी धर्मात्मा नहीं बन सकता |

11. जो मनुष्य राजा आदि से तो डरता है परन्तु परमात्मा-देव का भय नहीं मानता, जो प्रबलो से डरता और दुर्बलो को सताता है, वह कभी धर्मात्मा नहीं बन सकता |

12. दान उसी को कहते है जो विद्या-प्रचार, कला-कौशल की उन्नति, और रोगियों तथा अनाथों की सेवा में लगाया जाय |

13. सत्य से बड़ा और कोई धर्म का अंग नहीं |

14. जो लोग समझते है की झूट से काम सिद्ध हो जाता है वे अज्ञानी है |

15. मनुष्य का यह परमा कर्त्तव्य है की वह वाणी और लेखनी द्वारा सत्य का
प्रकाश और असत्य का नाश करे | ऐसा न करने से मनुष्यों की उन्नति नहीं हो सकती |

16. मनुष्य-जन्म का यही फल है की सच और झूट का निर्णय किया और कराया जाय, न की झगडा और वैर-विरोध बढाया जाय |

17. मेरा मतलब कोई नया मत चलाने का विलकुल नहीं | मैं तो सचाई को ही मानना और मनवाना चाहता हूँ | यदि मैं भी पक्षपाती होता तो आर्यावर्त के किसी एक पंथ को लेकर उस पर हठ करने लग जाता | परन्तु मैं तो जैसे दुसरे देशो की बुरी बातों को बुरा समझता हूँ, वैसे ही भारतवर्ष के बुरे कामों को भी पसंद नहीं करता |

18. मेरे विचार में सत्य बोलना, किसी को दुःख न देना. दया आदि शुभ गुण सब मतों में अच्छे है | बाकी लड़ाई-झगडा, इर्ष्या-द्वेष, और झुठ बोलना आदि कर्म सब मतों में बुरे है |

19. जो मनुष्य सत्य के पालन करने का पक्का इरादा कर लेता है, वाही उत्तम गुणों को धारण करता है |

20. पूजा के योग्य सबसे पहला देवता माता है | पुत्रो को चाहिए की माता की टहल-सेवा तन-मन-धन से करें | उसे सब तरह से प्रसन्न करें | उसका अपमान कभी न करें | दूसरा देव पिता होता है | उसका भी पूजन माता के समान होना चाहिए | तीसरा देव विद्या पढानेवाला गुरु है | चौथा देव वह अतिथि है जो विद्वान,धार्मिक,सरल और सबकी भलाई करनेवाला हो, जो स्थान पर घूम कर सच्चे उपदेश से लोगों को सुख देने का प्रयत्न करे | ऐसे संत और सज्जन मनुष्य की सेवा करना बड़ा भारी पुण्य है | पांचवां देव पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति है | परमेश्वर के पास पहुँचने की यही पांच सीढियां है |

21. सज्जन, विद्वान, धार्मिक और दुसरो की भलाई करनेवाले मनुष्य को संत कहते है | साधू उस मनुष्य को कहा जाता है जो धर्मी और उत्तम कर्म करनेवाला हो, जो सदा दुसरो की भलाई में लगा रहे, विद्वान और गुणवान हो, और सच्चा उपदेश देकर लोगो का दुःख दूर करे |

22. दान अच्छे आदमी को ही देना चाहिए |

23. मनुष्य को चाहिए की पहले अपने दोषों को देख-भाल कर निकाल दे, तब दुसरे के दोषों और दुर्गुणों पर दृष्टि डाले |

24. मित्रों को एक दुसरे के साथ अपनी आत्मा और प्राणों के समान बर्ताव करना चाहिए | अपने पड़ोसियों को अपनी देह के तुल्य जानना चाहिए | मालिक नौकर के साथ ऐसा बर्ताव करे जैसे वह अपने अंगो के साथ करता है |

25. कोई कितना ही करे, जो स्वदेशी राज्य होता है वह सबसे अच्छा होता है | मत-मतान्तर के झगडे से दूर,अपने-पराये की रियासत न करनेवाला, प्रजा पर माता-पिता के समान कृपा करनेवाला, न्याय और दया से युक्त भी विदेशियों का राज्य क्यों न हो , तो भी वह पूर्ण सुखदायक नहीं हो सकता |

26. यह आर्यावर्त देश ऐसा है की भूगोल भर में इसके सद्रश् दूसरा देश दिखाई नहीं देता | इस कारण भारत-भूमि का नाम स्वर्ण=भूमि है, क्योकि यही भूमि स्वर्ण आदि रत्नों को उत्पन्न करती है | सृष्टि के आदि में, आर्य जन इसी लिए इसमें आकर बसे थे | भूगोल में जितने भी देश है , उनके जितने भी निवासी है, वे सारे देश की प्रशंसा करते है, इसी से आशा रखते है | यह आर्यावर्त देश ही सच्चा पारस मणि है , जिसको लोहे के सद्र्श दरिद्र विदेशी छुते ही धनाढ्य हो जाते है |

27. सृष्टि के आदि से लेकार महाभारत तक सारी दुनिया पर राज्य करनेवाला सभी चक्रवर्ती राजा आर्यकुल ही में हुए थे | अब उनके सन्तानों का भाग्य फुट जाने से ये राज खोकर विदेशियों के पैरों तले रौंदे जा रहे है |

28. जब आर्यों का राज्य था तब गाय-बैल आदि उपकारी पशु नहीं मारे जाते थे | दूध-घी और अन्न आदि अधिक होने से लोगो को भूख और वे-वक्त मौत का शिकार नहीं बनना पड़ता था |

29. जब भाई से भाई लड़ने लग जाता है, तभी तीसरा विदेशी आकर पंच बन बैठता है |

30. जो मनुष्य स्वार्थी है ,अपने ही प्राणों को पुष्ट करनेवाले और छली-कपटी है, वे असुर है | और जो जन परोपकारी, दुसरे के दुःख का नाश करनेवाले, तथा धर्मात्मा है वे ‘देव’ कहलाती है |

31. गुण-कर्मानुसार वर्ण-व्यवस्था के विषय में यह आवश्यक है की वर्तमान जन्म-मूलक जाट-पात के बन्धनों को तोड़ कर विवाह हो | इस कार्य की सिद्धि के लिए प्रत्येक प्रान्त के समाज मिलकर यत्न करे |

32. जन्म-मूलक जात-पात जब तक कायम है देश तथा आर्यों की उन्नति नहीं हो सकेगी | जात-पात तोड़े बिना वर्ण-व्यवस्था का क्रम ठीक न हो सकेगा | आज-कल वर्ण-व्यवस्था तो आर्यों के लिए मरण-व्यवस्था बन गई है | देखो, इस डाकिन से आर्यों का पीछा कब छूटता है |

33. यदि आपका तन-मन-धन गाय आदि उपकारक पशुओ की रक्षा में न लगे तो ये किस काम के है |

34. ब्रह्मा से लेकर आज तक आर्य लोग पशुओ को मारना पाप और अधर्म समझते आये है |

35. गो आदि पशुओ की रक्षा करने से अन्न महंगा नहीं होने पाता और देश में निर्धन को भी दूध-दही मिल सकता है |

36. जीवन थोडा है और परमेश्वर महान है |

37. पूरी विध्या पाकर दुसरे लोगो को ज्ञान देना ऋषि-कर्म है |

38. परमात्मा की उपासना से ही आत्मा में आनन्द बढता है और पापो का नाश होता है |

39. सत्य मानना, सत्य बोलना, शुभ काम करना, इन्द्रियों को वश में रखना ताप कहलाता है |

40. जो मनुष्य धर्मात्मा नहीं, अविध्वान है, जिसकी इन्द्रियां उसके वश में नहीं, जिसमे प्रभु की भक्ति नहीं, उससे ईश्वर बहुत दूर है |

लेखक:- संतराम बी ए ||

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