Saturday, June 12, 2021

गौरक्षक आचार्य बलदेव जी महाराज


गौरक्षक 
आचार्य बलदेव जी महाराज   

लेखक :- श्री स्वामी वेदरक्षानंद जी 
आर्ष गुरुकुल कालवा जींद हरयाणा 

            
            जिसकी कीर्ति है वह मरता नहीं। वेद - वेदांग , व्याकरण के पण्डित , कर्मयोगी , तपस्वी , वयोवृद्ध विद्वान् , आदर्श चरित्र के धनी , नैष्ठिक ब्रह्मचारी आचार्य बलदेव जी अब नहीं रहे। 28 जनवरी 2016 को लगभग 85 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। महात्मा आचार्य बलदेव जी ने अपने जीवन में विद्युत् विभाग की अच्छी खासी नौकरी छोड़कर युवावस्था में संस्कृत की आर्ष प्रणाली के अध्ययन को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाया था और इसमें कृतकार्य तो हुए ही अपितु एक दीपक की भान्ति अपनी विद्या के प्रकाश से अनेक प्रमुख विद्वानों व संन्यासियों का जीवन निर्माण कर उन्हें वेदों के प्रकाश से आलोकित किया था। 

          आर्यजगत् के प्रसिद्ध गुरुकुल कालवा हरयाणा की आपने स्थापना की थी जो आपका सच्चा स्मारक है। भारत ही नहीं अपितु विश्व की कई प्रमुख हस्तियों रामदेव जी को आपके शिष्य होने का सौभाग्य व गौरव प्राप्त है । आदर्श जीवन व चरित्र के धनी आचार्य बलदेव जी का जीवन देश की युवा पीढ़ी के लिए आदर्श है। जीवन की सार्थकता शरीर को स्वस्थ , निरोगी और दीर्घायु बनाने सहित विद्या के क्षेत्र में व्याकरण व वेद - वेदांग का अध्ययन कर व उसका प्रचार कर जीवन को सफल बनाने में है। इसी पथ पर आचार्य बलदेव जी चले थे और यही जीवन शैली मनुष्य जीवन की सर्वोत्तम उन्नति का आधार व साधन रही है व आज भी है। 

          सभी मानवीय गुणों से पूर्ण व आदर्श आचार्य बलदेव जी का जन्म हरयाणा राज्य के सोनीपत जिले के अन्तर्गत सरगथल गांव में सन् 1930 में एक धार्मिक माता पिता के यहां हुआ था। आपकी अल्पायु में माता जी का देहान्त हो जाने पर पिता ने दूसरा विवाह किया। आपकी दूसरी माता जी का भी आपके प्रति अत्यधिक प्रेम व स्नेह था। ग्रामीण वातावरण के अनुसार आपने बी0 ए0 तक की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद विद्युत् विभाग में आपकी नौकरी लग गई। आपका कार्यालय झज्जर में था। अत: जब भी आर्य समाज के प्रसिद्ध गुरुकुल झज्जर में विद्युत् सम्बन्धी कोई समस्या आती थी तो आप वहां प्रायः आया करते थे। गुरुकुल में आर्यजगत् शिरोमणी विद्वान् व संन्यासी स्वामी ओमानन्द सरस्वती जी आचार्य हुआ करते थे। बच्चों को संस्कृत पढ़ते देखकर बलदेव जी में भी इसके प्रति अनुराग उत्पन्न हो गया। गुरुकुल में ब्रह्मचर्य सहित सत्यार्थ प्रकाश आदि पुस्तकें लेकर आपने इनका अध्ययन किया। 

          स्वामी ओमानन्द जी के प्रवचनों का भी चमत्कारी प्रभाव आप पर होता था। स्वामी ओमानन्द जी ने भी आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया और अनेक गुरुकुलों की स्थापना की थी जिसमें गुरुकुल झज्जर सहित कन्या गुरुकुल नरेला भी सम्मिलित हैं। बलदेव जी कई बार रात्रि में भी गुरुकुल में ही निवास करते थे। गुरुकुलीय शिक्षा के प्रति आपका प्रेम इस सीमा तक बढ़ा कि आपने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूर्ण कालिक ब्रह्मचारी वा विद्यार्थी बन गये। प्रचलित स्वभाव के अनुसार उनके परिवार को उनका नौकरी छोड़ना और घर न आना पसन्द नहीं था और वह उन्हें घर ले जाना चाहते थे। इन विघ्नों को देखते हुये आपने स्वामी ओमानन्द जी की प्रेरणा से महर्षि दयानन्द के भक्त श्री देवस्वामी जी के गुरुकुल सिरसागंज के लिए अध्ययनार्थ प्रस्थान किया और वहां संस्कृत व्याकरण के आचार्य पण्डित शंकरदेव जी में अध्ययन किया। अध्ययन में कोई विघ्न उपस्थित न हो इसलिए आपने इस गुरुकुल में अध्ययन की जानकारी अपने परिवार को नहीं दी। इसका ज्ञान केवल स्वामी ओमानन्द सरस्वती जी को ही था। गुरुकुल सिरसागंज में अध्ययन के दिनों में आर्यजगत् के प्रसिद्ध विद्वान् संन्यासी और नेता स्वामी इन्द्रवेश जी आपके साथी व मित्र हुआ करते थे। दोनों ने एक ही गुरु से शिक्षा प्राप्त की थी। आचार्य बलदेव और स्वामी इन्द्रवेश , इन दोनों ब्रहाचारियों ने माता - पिता की अनुमति मिलने की आशा न होने के कारण घर से भागकर गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की थी। महात्मा बलदेव जी नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। संस्कृत का सम्पूर्ण आर्ष व्याकरण आपको मृत्यु के समय तक कण्ठ था। संस्कृत व्याकरण के आप विलक्षण आचार्य थे। 

           आर्य समाज के क्षेत्र में गुरुकुल प्रभात आश्रम मेरठ एक प्रसिद्ध गुरुकुल है जहां के ब्रह्मचारी विद्यार्थियों ने खेलकूद में राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अनेक पुरस्कार प्राप्त कर देश और गुरुकुल को गौरवान्वित किया है। इस गुरुकुल के आचार्य स्वामी विवेकानन्द सरस्वती ने आचार्य बलदेव जी से अध्ययन किया है। जिन दिनों गुरुकुल में उन्होंने संस्कृत व्याकरण के अध्ययन से सन्तुष्टी न होने के कारण आपने गुरुकुल छोड़ने का निश्चय कर लिया था। आचार्य बलदेव जी को इस बात का पता लगने पर उन्होंने विवेकानन्द जी से बात की तो उन्होंने बताया कि वह अपने गुरुजनों द्वारा संस्कृत के अध्ययन से संतुष्ट नहीं हैं। इस पर महात्मा बलदेव जी ने कहा कि कल से मैं तुम्हें संस्कृत पढ़ाऊंगा मैं चार बजे या इससे पहले सोकर उठ जाता हूँ यदि तुम मुझसे पहले उठ जाओ तो मुझे जगा देना अन्यथा में तुम्हें जगाऊंगा। 

             इस प्रकार से प्रतिदिन चार बजे से पहले ही आचार्य बलदेवजी शिष्य विवेकानन्द जी को संस्कृत व्याकरण पढ़ाने लगे। यह क्रम चार से पांच वर्षों तक चला। इससे न केवल विवेकानन्द जी को पूर्ण संतोष हुआ अपितु उन्होंने संस्कृत के व्याकरण में पूर्ण अधिकार प्राप्त किया और गुरुकुल प्रभात आश्रम , मेरठ का संचालन कर वैदिक धर्म व संस्कृति सहित आर्य समाज के गौरव को भी देश देशान्तर में स्थापित किया। देश भर में विभिन्न स्थानों पर 8 गुरुकुलों का संचालन कर रहे आर्यसमाज के सुप्रसिद्ध विद्वान् व संन्यासी स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती आचार्य बलदेव जी के ही शिष्य हैं। आचार्य बलदेव जी ने सन् 1971 से अंतिम सांस तक हरयाणा के जींद जिले में स्थित आर्ष गुरुकुल कालवा तथा राष्ट्रिय गौशाला धड़ौली में संरक्षक की भूमिका निभाई। गुरुकुल कालवा में उपनिषद , दर्शन व वेद आदि की योग्यता प्राप्त करने के लिए संस्कृत के आर्ष व्याकरण सहित प्रायः सभी शास्त्रों का अध्ययन कराया जाता रहा है। 

         आज के विश्व प्रसिद्ध योग प्रचारक और पतंजलि के योग पीठ के संस्थापक स्वामी रामदेव आपके ही गुरुकुल में आपसे सन् 1985 से 1990 के मध्य पढ़े हैं। आपके अन्य प्रमुख शिष्यों में स्वामी डॉ0 देवव्रत जी , आचार्य डॉ० रघुवीर वेदालंकार , आचार्य डॉ० यज्ञवीर जी , स्वामी विवेकानन्द सरस्वती जी , आचार्य सत्यपति जी , आचार्य अखिलेश्वर जी , स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती जी , आचार्य विजयपाल जी , स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी आदि प्रमुख शिष्य हैं। अध्यापन का आपका प्रिय विषय संस्कृत का व्याकरण ही था। आपके प्रमुख गुरुओं में स्वामी ओमानन्द जी , देव स्वामी जी , पण्डित शंकरदेव जी , पं0 राजवीर शास्त्री व डॉ0 महाबीर मीमासंक जी आदि सम्मिलित हैं।

Friday, June 11, 2021

स्वामी इन्द्रवेश महाराज


एक व्यक्ति एक मिशन 
स्वामी इन्द्रवेश महाराज  (पुण्यतिथि पर विशेष) 

लेखक :- श्री सुरेन्द्र सिंह कादियान 
प्रस्तुति :- अमित सिवाहा 

जितने विकट संकटों में है, जिनका जीवन-सुमन खिला ।
गौरव-गन्ध उन्हें उतना ही, यत्र-तत्र-सर्वत्र मिला ॥

           मैथिलीशरण गुप्त जी की ये पंक्तियां स्वामी इन्द्रवेश जी के भव्य व्यक्तित्व और कृतित्व पर जितनी सटीक बैठती हैं, शायद ही आर्यसमाज के गत पचास वर्षों के काल-खण्ड में सक्रिय रहे किसी अन्य आर्य नेता पर सटीक बैठती हों । आर्यसमाज में निश्चय ही उनसे अधिक विद्वान, मनीषी, वाक्चातुर्य में निपुण, साहित्य रचयिता, वेदभाष्यकार, शास्त्रार्थ महारथी, कुशल राजनीतिज्ञ, महावक्ता, संगठन में वर्चस्वी नायक कोई भले रहा हो जिसने आर्यसमाज के कीर्तिध्वज को व्योम या क्षितिज पर लहराया हो और लोकैषणा के अन्तिम छोर को जा छूआ हो । लेकिन स्वामी इन्द्रवेश जी को इस दृष्टि से मूर्धन्य माना जायेगा । तपस्वी, वचस्वी, तेजस्वी, मनस्वी और यशस्वी माना जायेगा कि उन्होंने जीवन-भर चुनौतियों का सामुख्य किया, आँधियों को झेला, काँटों भरा रास्ता चुना, खुद को संघर्ष का पर्याय बनाकर जीवन में चरैवेति-चरैवेति के आदर्श को मूर्तिमत किया ।

          ऐसी महान् आत्मा का मूल्यांकन उनकी उपलब्धियों को दृष्टिगत करके नहीं किया जाता बल्कि गतिविधियों क आधार पर, जीवट के आधार पर, जिजीविषा के आधार पर, मौलिकता के आधार पर और पहल करने के सोत्साह पर किया जाता है । इस सोच का विरला ही कोई सुमन सदियों बाद चमन में खिलता है जो वातावरण को अपनी महक से सुवासित रखता है, अतः वर्तमान उसके होने का मूल्यांकन इतना नहीं कर पाता जितना कि भविष्य उसके जाने का मूल्यांकन और उसके न होने का गम महसूस करता है । निश्चय ही ऐसी वीरात्मा को परमात्मा फुर्सत के वक्त गढ़ कर ही इस संसार में भेजता होगा । ऐसे संघर्षशील व्यक्ति का भले ही दौर-ए-जमाना दुश्मन रहा हो लेकिन वह खुद किसी का दुश्मन न होकर जमाने से दोस्ती निभाता है । ऐसे अजातशत्रु रहे स्वामी इन्द्रवेश जी वस्तुतः खुद में एक व्यक्ति न रह कर एक मिशन बन गये थे । एक ऐसा मिशन जिसमें सबकी भलाई, सबका कल्याण, सबकी शान्ति निहित हो ।

         अपने जीवन की संध्याबेला में उन्होंने सात पुष्प खिलाकर अपने जीवन का मकसद स्पष्ट कर दिया था । ये सात फूल थे सप्त-क्रान्ति के सात सूत्र जिनके बिना हमारा वैयक्तिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन निरुद्देश्य है, निरर्थक है, अधूरा है । साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार, नशाखोरी, पाखण्ड, शोषण और नारी-उत्पीड़न की दीमक जब तक हमारी प्रवृत्ति को, हमारी वाणी व लेखनी को, हमारे आचरण को चाटती रहेगी तब तक इस जीवन का न कोई अर्थ है और न ही कोई औचित्य । इसी सोच को लेकर स्वामी इन्द्रवेश जी जिये और मरे । इन बुराइयों के विरुद्ध एक सतत संघर्ष के रूप में, एक अनवरत मिशन के रूप में वे हमारे बीच रहे । इस संघर्ष और मिशन को दृष्टिगत रखते हुए उनका मूल्यांकन आज किया जा सकता है, भले ही उनका जीवन ऐसे आकलन को चाहे सदा ही क्यों न नकारता रहा हो । वस्तुतः दीपशिखा की भाँति अहरह जलती मशाल बनकर वह अपनी पीढी को रास्ता दिखाते रहे, लोकचेतना के संवाहक बनकर एक पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाते रहे और अध्यात्म की अन्तःसलिला धारा के स्नातक होकर असंख्य आत्माओं को प्रकाशित करते रहे लेकिन फिर भी इसका श्रेय लेने की कभी इच्छा नहीं रखी । यदि उनकी अपनी कोई इच्छा थी, अपनी कोई ऐषणा थी, अपना कोई निहितार्थ था तो यही था कि जिस मिशन को लेकर वे उठे हैं उसी मिशन के प्रति सजग, सक्रिय और समर्पित होकर जियें व मरें । उनके समूचे जीवन का सिंहावकोकन करते हुए यदि हम किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास करें तो जयशंकर प्रसाद के इन शब्दों से ही उनका एक रेखाचित्र तैयार होता है –

      मत कर पसार, निज पैरों पर चल
     चलने की जिसको रहे झोंक,
     उसको कब कोई सका रोक

      आर्यसमाज के शीर्ष नेतृत्व ने जिसे एक बार नहीं, तीन बार फांसी चढ़ाया हो लेकिन जो फिर भी जीवित रहकर अपने मिशन पर अडिग ही चलता रहा हो, अपने डगर पर बढ़ता रहा हो, अपनी मंजिले-मकसूद को सदैव याद रखता रहा हो, भला उसे क्या कभी मारा जा सकता था ? निश्चय ही उसकी पीढी की यह भूल रही है, खामख्याली रही है जिसे कल का इतिहास क्षमा नहीं करेगा । कल का इतिहासकार किस कलम से उनका मूल्यांकन करेगा आज भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी क्योंकि उनसे प्रेरित, उनका सानिध्य प्राप्त किये, उनके साथ कदम से कदम बढ़ाकर चलने वाले जीवनदानियों की पीढ़ी अभी इतिहास न बनकर इतिहास का निर्माण कर रही है । इतिहास के इस अध्याय का समापन होने पर ही स्वामी इन्द्रवेश जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का मूल्यांकन अधिक तटस्थता, निष्पक्षता और ईमानदारी से कल का इतिहासकार कर सकेगा । अतः अपने सहयोगियों, आत्मीयों, स्वजनों के समक्ष स्वामी इन्द्रवेश जी खुद एक चुनौति, एक कसौटी बनकर आ खड़े हुए हैं । इस चुनौति को कितना समझा व स्वीकारा जायेगा और इस कसौटी पर अपने को कितना खरा व खोटा सिद्ध किया जायेगा, यह प्रश्न अनुत्तरित है । इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए उनके जीवन के कुछ पड़ावों का अवलोकन करते हुए हम स्वामी इन्द्रवेश जी, उनकी सोच व उनकी योजना का आकलन यहाँ करेंगे ।

माँ का सानिध्य

13 मार्च 1937 को ग्राम सुण्डाना, जिला रोहतक (हरयाणा) में माता पतोरी देवी की कोख से जन्मे एक शिशु ने जब चौ. प्रभुदयाल के घर में पहली किल्कारी भरी तो सबने आनन्दित होकर ईश्वर का उपकार माना । कुल छह भाई-बहनों में यह शिशु चूँकि ज्येष्ठ था अतः माता-पिता के इस आनन्द की सहज कल्पना की जा सकती है । इस ज्येष्ठता में ही इस शिशु की अग्रता, नेतृत्व क्षमता, पहल आगे चलकर देखने को मिलती है । प्रथम सन्तान होने के कारण माता-पिता का लाड़-प्यार सबसे अधिक उनको ही मिला । माँ के प्रति उनकी आसक्ति, आत्मीयता, श्रद्धा और सम्मान की भावना अधिक थी । बचपन से ही जब से उन्होंने होश संभाला यद्यपि वे सहज रहते थे लेकिन उनका गम्भीर व अन्तर्मुखी रहना प्रायः पिताजी को आशंकित किये रहता था । पढ़ाई के प्रति प्रारम्भ से ही उनकी रुचि थी । वे छरहरे शरीर के थे अतः तगड़ा होने के उपाय अपने ही गांव के परमा पहलवान से पूछा करते थे । शरीर को स्वस्थ, परिपुष्ठ और आकर्षक बनाने का यह शौक उनका बाद में इतना बढ़ गया कि एक-एक हजार दण्ड-बैठक लगाने लगे थे और सर्दियों में भी उनके शरीर से पसीना बहने लगता था । स्वाभाविक है कि उनकी यह लगन उनको बाद में ब्रह्मचर्य और योग के प्रशस्त पथ पर भी ले गई । शिक्षा के प्रति भी उनकी रुचि इतनी अधिक थी कि रात को वे स्कूल में ही सोया करते थे । उस युग के स्कूलों में एक अघोषित प्रतियोगिता चला करती थी कि परिणाम में अव्वल रहना है । क्लास टीचर्स भी अपनी क्लास का अच्छा से अच्छा रिजल्ट लाने के प्रति गम्भीर रहते थे । तब ट्यूशन का रिवाज बहुत की कम, न के बराबर था, लेकिन अध्यापक अतिरिक्त क्लास लेकर या रात्रि में विद्यार्थियों से अपने ही संरक्षण में अच्छी तैयारी कराया करते थे । अध्यापकों को पैसे की नहीं अपने विद्यार्थियों के बहतर परीक्षा परिणाम की चिन्ता रहती थी जिससे कि उनका यश, लोकप्रियता और विश्वसनीयता में इजाफा हो । ऐसे अध्यापकों का संरक्षण प्राप्त कर इन्द्रसिंह नाम का यह बालक आठवीं तक पढ़ गया । आठवीं में उसका वजीफा आ गया था । आगे पढ़ने के उसके मंसूबे बढ़े-चढ़े थे लेकिन घर की आर्थिक स्थिति आड़े आ गई । इन्द्रसिंह का जैसे ही आठवीं का परीक्षा परिणाम घोषित हुआ, उनके ताऊ जी ने कहा - इन्द्र ! कल से खेत में जाना शुरू कर दो ।

संयुक्त परिवार में ताऊजी के ऐसे आदेश का अर्थ इन्द्र जी भली-भाँति समझते थे । यह आदेश उनके मंसूबों पर वज्रपात था लेकिन उस जमाने में बच्चा अपने से बड़ों के सामने न तो सिर ऊँचा करके खड़ा हो सकता था और न ही जुबान लड़ा सकता था । यह हरयाणा की ग्रामीण पृष्ठभूमि के संस्कार थे जो बच्चे को जन्म-घुट्टी में ही पिला दिये जाते थे । इन्द्र जी बचपन में वैसे ही संकोची, शर्मीले व गम्भीर स्वभाव के थे अतः ताऊजी को जवाब कैसे दे सकते थे । लेकिन माँ उसके दर्द को समझ सकती थी, उसने समझा भी और जेठ के इस आदेश का विरोध किया । आर्यसमाज के प्रचार प्रसार के कारण सुदूर देहात में भी शिक्षा का महत्व समझा जाने लगा था । पुत्र जब वजीफा लेकर अपनी प्रतिभा का परिचय दे तो माता-पिता कैसे उसकी पढ़ाई पर प्रतिबन्ध लगा सकते थे । माता जी का यह विरोध इतना तूल पकड़ गया कि ताऊ जी भी अपनी मूँछ झुकाने को तैयार न हुए । परिणाम यह निकला कि नौबत घर के बँटवारे की आ गई और वह होकर रहा । अपने पुत्र के हित के लिए एक माँ कहाँ तक आगे जा सकती है यह इन्द्र जी ने पहली बार महसूस किया । लेकिन इस बँटवारे को भी वह सहजता से न ले सके । इस तरह के चलते विरोध से वे खिन्न अवश्य हुए । लेकिन उनकी माँ ने जिस साहस से अपने जेठ का विरोध किया उससे उनके बाल मन पर यह प्रभाव भी अंकित हुआ कि गलत बात के आगे मनुष्य को झुकना नहीं चाहिए और एक शुभ कार्य में विरोध चाहे किसी का भी हो उसका सामना साहस के साथ करना चाहिए । माँ के इस हृदय और साहस को उन्होंने अपने संस्कारों की पोटली में बाँधकर रख लिया ।

गुरुकुल झज्जर में प्रवेश

गृहकन्या जैसे एक दिन वियोग की व्यथा तथा संयोग की सुखद अनुभूति का मिश्रित भाव लेकर बाबुल का घर छोड़कर ससुराल जाती है वैसे ही भाव-भावना के साथ इन्द्र जी अपने ही परिवार के हरके मास्टर के साथ माता-पिता से विदाई लेकर गुरुकुल झज्जर गये । इस बार का छूटा घर कभी फिर स्थायी निवास से लिए उन्हें नसीब नहीं होगा, इसका अनुमान सिवाय नियति के और कौन उस समय लगा सकता था । गुरुकुल में रहते हुए इन्द्र जी को दिन भर दवाइयाँ कूटनी पड़ती थीं जिसके लिए उन्हें कुछ वेतन भी मिलता था । प्रायः वे रविवार को माता-पिता से मिलने आते रहते थे । माता का दामन (घाघरा) उन्हें पसन्द नहीं था अतः सलवार पहनने और हिन्दी सीखने के लिए वे उनसे बराबर आग्रह करते रहते थे । घर जाते ही पिता जी के कार्य में हाथ बँटाना शुरू कर देते थे, घर-परिवार की जिम्मेदारी समझने व निभाने में वे अब भी कोई कोताही नहीं दिखाते थे । छोटे भाई ईश्वर सिंह को भी गुरुकुल की फार्मेसी में ले गये । उनके जहन में आयुर्वेद की एक बड़ी फार्मेसी लगाने का विचार उठ रहा था जिसके लिए वे ईश्वर सिंह को तैयार करना चाहते थे । गुरुकुलीय वातावरण का उन पर यथेष्ठ प्रभाव पड़ा । वे जब भी गाँव आते तो पूरे गाँव का चक्कर लगाकर बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते और बच्चों पर स्नेह लुटाते । समवयस्कों को अच्छे संस्कार ग्रहण कर आर्यसमाज के लिए काम करने को प्रेरित करते । शुरू में इनके पिताजी हुक्का पिया करते थे । इन्द्र जी ने अपने पिताजी को भी धूम्रपान से होने वाली शारीरिक व्याधियों का उल्लेख इस ढ़ंग से किया कि उन्होंने भी हुक्का पीना छोड़ दिया । आज तो हालत यह है कि बाप और बेटा एक ही मेज पर बैठकर शराब की बोतल खोलते हुए नहीं लजाते । माता के साथ बैठकर अन्तरंग बातें करना, परिवार की समस्याओं का समाधान ढूंढना व भविष्य की योजना बनाना इन सबमें उनकी रुचि अभी तक बनी हुई थी जिससे कि इनकी माता परिवार में उनकी अनुपस्थिति को लेकर विचलित न हो । गुरुकुल फार्मेसी में कार्यरत रहते हुए ही उन्होंने आयुर्वेद की सभी परीक्षायें दिल्ली से उत्तीर्ण कीं, जिससे उनकी लगन, कुशाग्रबुद्धि व परिश्रमी स्वभाव का अनुमान लगाया जा सकता है । भविष्य के प्रति एक सार्थक आर्थिक दृष्टिकोण लेकर वे आगे बढ़ रहे थे । अपनी बहन राममूर्ति की सगाई उन्होंने ही की । इसी बीच इन्द्र जी का विवाह भी हो गया लेकिन गौपों की रस्म अभी नहीं हुई थी । तब अचानक एक ऐसी घटना घटी कि उनके भावी जीवन का काँटा ही बदल गया ।

मौत का साक्षात्कार - वैराग्य का प्रादुर्भाव

अपने जीवन को मोड़ देने वाली इस घटना का उल्लेख स्वामी इन्द्रवेश जी अन्तरंग भेंट में यदा-कदा अपने आत्मीय जनों से कर दिया करते थे, अतः उनके ही शब्दों में इस घटना का उल्लेख करना अधिक सार्थक लगता है । उनके अपने शब्दों में -

"एक दिन जब मैं औषधालय का कार्य निपटाकर गुरुकुलीय निवास पर शयन के लिए पहुँचा तो अचानक मेरा एक रूम-पार्टनर तख्त से नीचे गिर गया । उसके मुख से रक्त की अविरल धारा बहने लगी । हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि तख्त से गिरने मात्र से किसी की ऐसी दयनीय अवस्था कैसे हो सकती है । उस समय जो भी सम्भव था उसे प्राथमिक उपचार दिया गया लेकिन खून का बहना बन्द नहीं हुआ । शायद उसके दोनों फेफड़े अन्दर से फट गये थे । तड़प-तड़प कर लगभग दो-ढ़ाई घण्टे में उसी कमरे में उसने प्रिय प्राण त्याग दिये । यह बीभत्स दृश्य देखकर मैं विचलित हो उठा । मेरे चित्त पर अंकित यह दृश्य मुझे गहराई तक साल गया । सचमुच मैं मृत्यु से भयभीत रहने लगा । मौत को लेकर न जाने कितने प्रश्न, शंकाएँ व जिज्ञासायें मुझे भीतर ही भीतर कुरेदने लगीं । मेरा उद्वेलित मन मौत पर गहन चिन्तन करने लगा । मनुष्य कहाँ से आता है, मत्यु क्यों आती है ? मृत्यु उपरान्त व्यक्ति कहाँ जाता है - इस तरह के ढ़ेर सारे प्रश्न मुझ पर दबाव बनाने लगे । इसे लेकर मानसिक रूप से अस्वस्थ रहने लगा ।"

इन्द्र जी की इस समस्या को लेकर जब मनोचिकित्सकों का परामर्श लिया गया तो उन्होंने यह राय दी कि अधिक से अधिक मौत के दृश्य, अर्थी या चिता के दर्शन उन्हें कराये जायें । गुरुकुल झज्जर के निकटवर्ती क्षेत्र में जब भी कोई मौत होती तो इन्द्र जी को तत्काल सूचित किया जाता । उन दिनों सैंकड़ों मौतों के द्रष्टा इन्द्र जी रहे । मौत का दर्शन सहज होने के बजाय विवेक में परिवर्तित होता चला गया । प्रारब्ध एवं संचित कर्मों की श्रंखला ने इस घटना को उनके अन्तर मन में वैराग्य प्रादुर्भाव का ठोस आधार बना दिया । विचार उठा कि एक दिन मुझे भी मौत के इसी माध्यम से इस दुनिया से विदा होना होगा । यह भाव प्रबल होकर जीवन का लक्ष्य सामने आकर खड़ा हो गया । उन्हीं दिनों उनको कुछ विचित्र अनुभूतियाँ भी होने लगीं थीं जिसका उल्लेख करते हुए वे बताते थे कि इस घटना से कुछ पूर्व ही मुझे पूर्व जन्मों की झलक महसूस होने लगी थी, अतः इस घटना ने उन्हें और तीव्र एवं प्रभावी बनाने की भूमिका निभाई ।

इन्द्र जी इस सम्बन्ध में अपने स्थिति स्पष्ट करते हुए बतलाते हुए कहते थे - "मुझे ऐसा आभास होने लगा था कि ये सारी धरती, जमीन अब अपनी है । क्यों लोग अलग-अलग इसके बँटवारे में पड़े हुए हैं । मेरे कुछ साथी हैं ये बिछुड़ गये हैं लेकिन कहां गये मालूम नहीं । ये दो बातें यों तो मुझे बचपन से ही महसूस होती आ रही थीं लेकिन रूम पार्टनर की आकस्मिक मृत्यु ने उनका रंग और गहरा कर दिया था । मैं अब और अधिक स्पष्टता से समझने लगा था कि दुनिया का यह झमेला, रिश्ते-नाते, उठा-पटक सब व्यक्ति को उलझाये रखने के हेतु हैं । यह जीवन क्षणभंगुर है, नश्वर है, पानी का बुलबुला है और कहाँ, कब फट जाये कोई नहीं जानता । जीवन की डोर भले ही कितनी लम्बी हो लेकिन उसमें अनिश्चितता की गाँठें इतनी अधिक हैं कि कौन सी गाँठ कब खुल कर हमें मौत की नींद सुला दे, कुछ नहीं कहा जा सकता ।"

उनके इन विचारों की आध्यात्मिक व्याख्या अथवा दार्शनिक मीमांसा करना भले ही सामान्य पाठक के लिए कठिन हो लेकिन इतना तो साफ है कि उनके रूम पार्टनर की यह नैमित्तिक घटना उनके पूर्वजन्म की पृष्ठभूमि को अवश्य दर्शाती है । जीवन में घटित मामूली-सी घटनाएँ जब व्यक्ति के जीवन का काँटा ही बदलकर रख दें तो निश्चय ही वे अदृश्य रूप में, अप्रत्यक्ष रूप में अवचेतन मन अथवा आत्मा पर पड़े पूर्वजन्मों के संस्कारों की भूमिका को दर्शाती हैं । सामान्य सी घटना का क्रान्तिकारी प्रभाव निश्चय ही पूर्वजन्मों के संचित कर्मों का आभास दिलाता है । रूम-पार्टनर की मौत के बाद इन्द्र जी ने सैंकड़ों लोगों को मरते देखा तब रूम पार्टनर की मौत ही उनकी मन-स्थिति को, उनके दृष्टिकोण को, उनकी सोच को ऐसे कैसे बदल गई कि परिवार के प्रति उनकी लगन, माता-पिता के प्रति उनका मोह, भाई-बहनों के प्रति उनकी जिम्मेदारी - इन सबके प्रति वे अनासक्ति भाव से एक ओतप्रोत कैसे हो गए? गुरुकुल में अन्य ब्रह्मचारियों की तरह वे भी वेद और उपनिषद् पढ़ते थे लेकिन विवेक-वैराग्य का उदय अचानक उनमें ही क्यों हुआ ? निश्चय ही प्रारब्ध और पूर्वजन्मों के संस्कार उन्हें एक जानी-पहचानी राह पर ले रहे थे और वे बिना किसी प्रतिरोध के कागज की नाव की तरह इस प्रवाह में बहते जा रहे थे ।

नैष्ठिक दीक्षा से पूर्व वैराग्य जगने पर इन्द्र जी अपने एक अभिन्न मित्र बलदेव के साथ एक दिन बिना किसी से बताये गुरुकुल से विलुप्त हो गए । घरवालों ने इधर-उधर काफी तलाश किया लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला । चूँकि तब तक इन्द्र जी की शादी हो चुकी थी इसलिए पारिवारिक-जनों की चिन्ता स्वाभाविक थी । मां के प्रति उनका लगाव गहरा था, मां का न तो वे कहना टालते थे और न कभी उसे दुःखी देख सकते थे । लेकिन वैराग्य भावना, विवेक और अध्यात्म ने उनका यह आसक्ति भाव ही नष्ट कर दिया था । शायद जानबूझकर उन्होंने खुद को इस अग्नि-परीक्षा में डाला था जो उनके भवितव्य का संकेत देती है । इन्द्र जी ने बलदेव जी के साथ यह गुप्त अवधि बेरी के एक मन्दिर में एक विद्वान ब्राह्मण के पास विद्या अध्ययन और संस्कृत व्याकरण के निमित्त व्यतीत की थी ।

कुछ काल उपरान्त जब बलदेव जी इन्द्र जी के साथ गुरुकुल झज्जर लौट आये तो उनके लौटने की सूचना पिता जी को मिली । उनके लौटने से परिवार में भी खुशी लौट आई और उनके बारे में उठी शंकायें शनैः-शनैः स्वतः ही नष्ट होने लगीं । एक दिन जब इन्द्र जी गुरुकुल झज्जर की यज्ञशाला के निकट बैठे संध्या कर रहे थे तो उनके पिताजी ने उन्हें जा दबोचा और गृहस्थी का कर्त्तव्य बोध कराया । उन्होंने पुत्र को समझाया - इन्द्र ! तेरी शादी हो चुकी है, बहू का गौणा होने वाला है, घर लौट चलो । उन्होंने यहाँ तक कहा कि तुम्हारी बहू भी किसी की बेटी या बहन है और ऐसा वय्वहार कोई हमारी बेटी या बहन के साथ करे तो हमें कैसा लगेगा । अपने को या हमें इस धर्मसंकट में न डालो और घर लौट चलो । पिता और पुत्र के बीच पैदा हुए दुविधा के इन कठिन क्षणों की याद ताजा करते हुए एक बार स्वामी इन्द्रवेश जी ने बताया था -

"मैं पिताजी का हृदय से सम्मान करता था । जब भी मिलते उनके चरण-स्पर्श करता था । आज भी संध्या से उठते ही उनके चरण स्पर्श किये । उनकी परेशानी को मैं समझ सकता था लेकिन मैं बहुत दूर निकल आया था अतः उनकी बातों को स्मित मुस्कान के साथ सुनता रहा, सहता रहा । मेरी दुविधा यही थी कि जो निर्णय मैं अपने भावी जीवन को लेकर ले चुका था उस निर्णय को सुनकर पिताजी को कष्ट होगा क्योंकि मैं उनका ज्येष्ठ पुत्र था और गृहस्थी की गाड़ी को खींचने के लिए उन्होंने मुझसे कई अपेक्षाएं रखी हुई थीं । उन अपेक्षाओं पर वज्राघात होते देख उनके दिल पर क्या बीतेगी इसी बात को लेकर मेरी चिन्ता बढ़ गई थी । यही कारण था कि उनका सामुख्य करने का साहस मैं नहीं बटोर पा रहा था । गौतम बुद्ध ने अपने पारिवारिक जनों का परित्याग तब किया था जब वे गहन निद्रा में सो रहे थे और आर्थिक रूप से सम्पन्न थे । लेकिन मेरे सामने एक लाचार पिता साक्षात् रूप में खड़ा था और निराश करने का मुझे अधिकार नहीं था लेकिन फिर न जाने साहस का झोंका मन के किस कोने से उठा और मैं पहली बार पिताजी के सामने तन कर खड़ा हो गया और यह कहते हुए मुझे तनिक भी संकोच या लज्जा का अनुभव न हुआ - पिताजी ! गृहस्थ का परित्याग कर नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का जीवन जीने का मैंने जो फैसला लिया है वह मेरा अपना फैसला है जिसमें प्रारब्ध की अथवा पूर्व जन्म के संस्कारों की कोई भूमिका हो या नहीं लेकिन किसी अन्य व्यक्ति के कहने-सुनने या प्रेरित करने से मैंने यह फैसला नहीं लिया है । न जाने क्यों मुझे यह अहसास होता रहा है कि गृहस्थ-जीवन की कारागार में रहकर मैं वह सब कुछ नहीं कर सकता जो मुझे करना है । मुझे क्या करना है यद्यपि मुझे इसका कोई परिज्ञान नहीं है लेकिन जो राह मैने पकड़ी है वही मेरे जीवन को सार्थक बना सकती है इसकी गवाही मेरा दिल मुझे बार-बार दे रहा है । जिस अवस्था को मैं पार कर आया हूँ उसमें मुझे धकेलने से न आपको इष्ट की उपलब्धि होगी न मुझे । अतः जो आशा आप मुझसे रखे हुए हैं वह शेष भाईयों से पूरी कर सकते हैं । देश और समाज की सेवा के लिए यदि आप मेरा मोह छोड़ दें तो मुझे जन्म देने के बाद आपका यह मुझ पर दूसरा बड़ा ऋण होगा । पिताजी ! मैं यह कहने को विवश हूँ कि भले ही आप चाहें तो मेरी गरदन उतार कर ले जा सकते है लेकिन आपके साथ अब मेरा घर लौटना असम्भव है ।"

स्वामी जी बतलाते हैं - "एक पुत्र का ऐसा कठोर उत्तर सुनकर पिताजी को पहली बार मैंने निराश व आशाहीन देखा । यह सब भ्रम और आसक्ति का ही परिणाम था । इससे मुझे एक प्रेरणा मिली कि यदि हम आध्यात्मिक जीवन जीना चाहते हैं तो हमें अपने किसी अभिन्न और आत्मीय जन से इतनी उपेक्षायें न रखनी चाहियें जिनके पूरा न होने पर हम भग्न-हृदय हो जायें और हमारी स्थिति बीच भंवर में फंसी बिना चप्पुओं वाली नाव जैसी हो जाये । पिताजी की स्थिति को मैं समझ सकता था कि उनकी मनोदशा युवा-पुत्र को शमशान की चिता पर छोड़ आये एक पिता तुल्य थी लेकिन मुझे इस बात पर सन्तोष था कि यह संसार में अपने ढ़ंग की पहली घटना नहीं थी । इससे पूर्व ऐसी असंख्य घटनाओं का साक्षी हमारा इतिहास रहा है । उस रात मैंने ऐसा महसूस किया कि जैसे मैं आकाश में स्वछंद उड़ रहा हूँ क्योंकि सत्य की राह पर चलने का संकल्प पहली बार जमीनी असलीयत बन सका था ।"

पिताजी के इस प्रकार निराश लौटने से घर में शोक सा छा गया था । घर के किसी भी सदस्य ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी कि परिवार पर हमेशा अपनी छत्रछाया रखने वाला इन्द्र इतना निर्मोही और उदासीन होकर इस प्रकार अपने पिताजी को निराश करेगा । इन्द्र में आये इस परिवर्तन को मां भी नहीं समझ पा रही थी अतः उसे अब भी यह विश्वास था कि वह घर लौट आयेगा । इसी ऊहापोह में उनके ताऊजी ने खुद गुरुकुल जाकर उसे घर लिवा लाने का प्रयास किया लेकिन दृढ़ता ने उन्हें भी बैरंग लौटा दिया । इस प्रकार ब्रह्मचारी इन्द्रसिंह ने पुत्रैषणा एवं वित्तैषणा का पथ प्रशस्त कर नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का जीवन जीने का फैसला लिया ।

महाशय प्रभुदयाल जी जब इतने अस्वस्थ हो गये कि उनके अधिक दिन जीवित रहने की कोई आशा नहीं रही तो इन्द्र सिंह को, जो आचार्य भगवानदेव से नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा लेकर इन्द्रदेव मेधार्थी कहलाने लगे थे, उनके मरणासन्न होने का समाचार दिया गया । मेधार्थी जी ने तुरन्त साईकिल उठाई और सांझ होते-होते गुरुकुल झज्जर से अपने गांव सुण्डाना पहुँचे । पिताजी ने गर्वोन्मत्त होकर अपने पुत्र को नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में देखा और बोले - "बेटा ! अब तूने यह लाइन पकड़ ही ली है तो अब इसको दृढ़मना होकर निभाना है । हमें कहीं तू बदनाम मत कर देना ।" मेधार्थी जी ने अपने पिताजी को आश्वस्त करते हुए कहा - "नहीं पिताजी, आप निश्चिन्त होकर प्रस्थान करें । मैंने यह रास्ता स्वेच्छा से, दृढ़ संकल्प होकर अपनी आत्मा की आवाज से चुना है किसी के कहने से अथवा किसी लोभ से प्रेरित होकर नहीं चुना । मैं आपको कभी बदनाम नहीं होने दूँगा ।"

पिता और पुत्र की यह अन्तिम भेंट थी । उसी रात महाशय प्रभुदयाल जी ब्रह्मलीन होकर इस संसार से विदा हो गये । यह अन्तिम भेंट भी शायद किसी निहितार्थ का संकेत कर रही थी जिसे मेधार्थी जी ने समझने का प्रयास किया । यज्ञ वेदी पर दीक्षा लेते हुए भले ही उन्होंने कुछ संकल्प लिये होंगे, इस अन्तिम भेंट में पिताजी को जो आश्वस्ति उन्होंने दी उसका एक अलग ही महत्त्व था । पिता-पुत्र की इस अन्तिम भेंट की वचनबद्धता इन्द्र की को आजीवन स्मरण रही और वे दृढ़ता से अपने पथ पर आरूढ़ रहे ।

नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा लेने के पश्चात् इन्द्रदेव मेधार्थी गुरुकुल झज्जर में ही अध्यापन कार्य कराने लगे थे । आचार्य भगवानदेव के प्रिय व विश्वासपात्र शिष्यों में एक वह भी थे अतः गुरुकुल के प्रधानाचार्य का पद भी उन्हें सौंप दिया गया था । सन् 1964-66 की यह अवधि रही थी । पारिवारिक सदस्य वर्ष में दो बार उनसे मिलने गुरुकुल में अवश्य आते थे । इनमें माता जी के साथ उनके छोटे भाई-बहन भी होते थे । स्वामी जी इस तरह की मुलाकात को स्वभावतः पसन्द नहीं करते थे लेकिन माँ विधवा हो चुकी थी और भाई-बहन छोटे थे इसलिए यह सोचते हुए कि मुझसे मिलकर उन्हें कुछ उत्साह, ऊर्जा और सन्तुष्टि मिलती है, उन्होंने नापसन्दगी कभी जाहिर नहीं होने दी । उस समय गुरुकुल के वार्षिकोत्सव पर मेधार्थी जी गज मोड़ना, गाड़ी रोकना, शीशे हाथों से रगड़ना आदि व्यायाम प्रदर्शन भी किया करते थे जिन्हें देखकर सैंकड़ों दर्शकों के साथ-साथ उनके पारिवारिक जन भी आल्हादित होते थे ।

ऐसे ही किसी अवसर पर माता जी अपने पुत्र के लिए गुलगुले और सुहाली बनाकर लाई जो उनकी विशेष पसन्द थी । हमेशा की तरह रात को जब मेधार्थी जी माता जी से मिलने अतिथिशाला में पहुँचे तो मां ने अपनी पोटली खोलकर बेटे के सामने रख दी । मां के इस प्यार पर तो वे मुग्ध हुए लेकिन उन्होंने इन व्यंजनों को मात्र चख कर पोटली बांध कर वापस लौटा दी । मां ने पूछा - क्या स्वाद नहीं है ? मेधार्थी ने उत्तर दिया - मां के हाथ की बनी चीज अच्छी न बने ये तो कभी हो ही नहीं सकता । लेकिन मां ! गुरुकुल के नियमानुसार मैं इन्हें खा तो नहीं सकता । फिर मां, तू रोजाना तो यहां आयेगी नहीं और फिर जीभ दोबारा गुलगुले मांगेगी तो मुश्किल होगा । माता को इतने प्यार से समझाकर भी उन्होंने उसे निराश नहीं किया और वह पोटली पाकशाला में ले गये जिससे ब्रह्मचारी इकटठे बैठकर इनका रसास्वादन कर सकें ।

इस स्नेहमयी माता का वरदहस्त हमेशा इन्द्र जी के सिर पर रहा भले ही उन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली हो या फिर संन्यस्त जीवन की दीक्षा । पुत्र का रूप चाहे जो हो मां की ममता तो उसे एक ही पैमाने से नापती है । माता जी जब अन्तिम बार बीमार पड़ी तो उसने पुत्र से मिलने की इच्छा प्रकट की । तब इन्द्र जी रोहतक जेल में थे । बहन वीरमति और भाई राजपाल माता जी को लेकर जेल पहुँचे । रास्ते में उसे समझाते रहे कि भाई से मिलकर रोना नहीं, हमें भी कष्ट होगा और उनको भी । देश और समाज के लिए वे बढ़िया काम कर रहे हैं, बड़े-बड़े नेताओं के बीच बैठते हैं, अखबारों में खूब नाम आता है । पुत्र से मां की जब मुलाकात हुई तो मां और बेटे दोनों के नेत्र बरबस सजल हो उठे । मां बोली - इन्द्र ! पता नहीं अब जीऊंगी या नहीं इसलिए मिलने चली आई । तेरा बड़ा नाम है बेटे, यह सुनकर मेरी छाती सवाई हो जाती है । तेरे काम को अब मैंने समझ लिया है, तू दूसरों के लिए जी रहा है और अच्छा काम कर रहा है । मैं बहुत खुश हूँ और चाहती हूँ तू मेरे मन से इस काम को करता रह ।" मां के इन बोलों से इन्द्र जी भी गदगद हो गये और मां से लिपट कर उन्हें ऊपर गोद में उठा लिया और कहा - 'देख मेरी मां, आज तूने कितनी बड़ी बात कह दी, बहुत बढ़िया मां, बहुत बढ़िया । आज मैं दुनिया का सबसे खुशनसीब आदमी हूँ ।'

मां और बेटे की यह भेंट अन्तिम सिद्ध हुई जैसी कि मां ने आशंका प्रकट की थी । कुछ समय पश्चात् उनका निधन हो गया । मां के निधन की सूचना देने उनका भाई राजपाल ही रोहतक आया था । उस समय स्वामी इन्द्रवेश जी सुभाष नगर कार्यालय रोहतक में अग्निवेश जी, आदित्यवेश जी, शक्तिवेश जी आदि के साथ अन्तरंग बैठक में बैठे थे । स्वामी इन्द्रवेश जी को जगवीर जी के द्वारा बाहर बुलाया गया तो भाई राजपाल ने रोते हुए सूचना दी - माता जी चल बसी है । स्वामी जी ने भाई को ढ़ांढस बंधाते हुए कहा - 'जाना तो एक दिन हम सबने है । माता जी भरा-पूरा परिवार छोड़कर गई है । अरे तुम तो बहुत बहादुर हो । अपनी पढ़ाई में मन लगाना । माता जी बहुत बड़ी आत्मा थी । मेहनती और समझदार थी । बीमारी की वजह से अब उनका समय आ गया था ।' इतना कहकर स्वामी इन्द्रवेश जी तुरन्त भीतर जाकर बैठक में जा बैठे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था ।

स्वामी इन्द्रवेश जी की इस उदासीनता और बेरुखी ने भाई राजपाल को निराश नहीं किया क्योंकि वे पहले भी इसके भुक्तभोगी रह चुके थे । तब वे गुरुकुल झज्जर के ब्रह्मचारी थे । आचार्य बलदेव जी प्रायः इन्द्र जी के परिवार में जाते रहते थे और एक-एक महीना भी वहां रह आया करते थे । उनके माध्यम से ही पारिवारिक जनों की इन्द्र जी से भेंट हुआ करती थी । उनकी प्रेरणा से भाई राजपाल गुरुकुल झज्जर में पढ़ने आये थे । तब इन्द्र जी गुरुकुल छोड़ चुके थे । हाँ, वे प्रायः गुरुकुल में आया करते थे । उस समय उनके पास जीप-गाड़ी नहीं थी । पैदल ही पीठ पर खाखी रंग का थैला लटकाये वे गुरुकुल आया करते थे । उनके आते ही रौनक सी लौट आती थी । ब्र. राजपाल नया-नया गुरुकुल में आया था । जब वह इन्द्र जी से मिलता तो वे तपाक से कहा करते थे - ब्रह्मचारी जी का क्या हाल है, और जोर से हँसते थे । एक दिन प्रातः ही जब अन्तेवासियों से विदा होकर वे मुख्य द्वार पर पहुँचे तो बालक राजपाल को, जब उनकी आयु 10-11 वर्ष की रही होगी, न जाने क्या सूझी कि वह शोर मचाते मुख्य द्वार की ओर भागने लगा । उसके पीछे गुरुकुल के मुख्याध्यापक आचार्य यशपाल जी भागे । इन्द्र जी को पकड़ कर राजपाल ने कहा - मैं भी आपके साथ चलूंगा । यह भ्रातृभाव की आसक्ति थी अथवा खून का रिश्ता, कोई भी समझ नहीं पा रहा था । इन्द्र जी ने पांच मिनट अपने अनुज से संवाद किया और कहा - 'मुझे तो खुद नहीं मालूम मैं आज कहाँ जाऊँगा । मैं घर थोड़े ही जा रहा हूँ ।' फिर उन्होंने पूछा - मां कब-कब आती है और घर से और कौन-कौन आते हैं । प्यार से उन्होंने अपने अनुज को ऐसा समझाया कि उसका मन गुरुकुल में रम गया । समझाने की उनकी शैली में इतनी सरलता, स्निग्घता और सात्विकता थी कि उसी साल राजपाल ने अष्टाध्यायी को कण्ठस्थ कर सुनाया जो कठिन कार्य था । इन्द्र जी के इस बल का लोहा परिवार वाले भी मानते थे कि सरलता और आत्मीयता से वह इंसान का पानी बना देते थे लेकिन अगले ही क्षण वे उदासीन भाव लिये, विरक्ति लिये अपने को झट से विलग कर लिया करते थे और उनकी आंखें दूर क्षितिज में कुछ ढूंढने का प्रयास करतीं दिखने लगती थीं ।

गुरुकुल झज्जर में प्रो. श्यामराव

इन्द्रदेव मेधार्थी जी के जीवन में एक नया मोड़ तब आया जब प्रो. श्यामराव जी व उनकी भेंट गुरुकुल झज्जर के परिसर में सन् 1966 में पहली बार हुई । प्रो. श्यामराव कलकत्ता के जेवियर कालेज में कामर्स एवं बिजनेस मैनेजमैन्ट के प्राध्यापक थे । मेधार्थी जी उन दिनों गुरुकुल झज्जर के प्रधानाचार्य थे । यह भेंट पूर्व निर्धारित नहीं थी और न ही इन दोनों में पहले कभी पत्राचार ही हुआ था । इन दोनों की भेंट मणि-कांचन का संयोग अथवा सोने पर सुहागा इस लोकोक्ति को सिद्ध कर गया । यदि यह भेंट न होती तो प्रो. श्यामराव और इन्द्रदेव मेधार्थी हजारों गुमनाम आर्यसमाजी बुद्धिजीवियों की तरह गुमनामी के अंधेरे में पड़े इस संसार से विदा हो जाते । इस भेंट के कारण न केवल इन दोनों के जीवन का काँटा बदल गया बल्कि आर्य समाज के इतिहास में आगे चलकर एक नया अध्याय ही रच गया । जिस तरह से यह भेंट हुई उसे जान कर ऐसा लगता है कि यह सब परमात्मा और नियति का ही रचा हुआ एक खेल था अन्यथा कहाँ कलकत्ता और कहां झज्जर, कहां कलकत्ता का कालेज और कहां गुरुकुल झज्जर, कहाँ एक अंग्रेजी में धाराप्रवाह बोलने वाला प्रोफेसर और कहाँ एक गुरुकुल का आचार्य, कहां कोट-पैंट और कहां कटि-वस्त्र, न भाषा का मेल और न संस्कारों का मेल । तब यह कैसे सम्भव हुआ कि इन दोनों में इतनी प्रगाढ़ मैत्री हो गई कि आग और पानी इकट्ठा हो गये, गांव और शहर में एका हो गया, पैंट और कटि वस्त्रों का भेद मिट गया । अंग्रेजी और संस्कृत का राम-भरत मिलन हो गया । न जाने कितनी भविष्यवाणी, जो इन दोनों को लेकर की जाती रहीं, एक-एक कर झूठी सिद्ध होती रही लेकिन फिर भी ये दो आत्माएं जुदा न हुईं, कभी दोनों में खटास पैदा नहीं हुई, दो रेलवे लाइनों की तरह समानान्तर भूमिका में रहते हुए भी कभी एक-दूसरे से दूर नहीं हुए बल्कि एक-दूसरे का पूरक बनकर एक ने दूसरे से बढ़कर आर्यसमाज के इस नये अध्याय का सूत्रपात किया । निश्चय ही यह कहानी न केवल रोचक है बल्कि प्रेरणा-दायक और अनुकरणीय भी है । विशेषतः उन लोगों के लिए, उन नेताओं के लिए, उन सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के लिए जो छोटे-छोटे स्वार्थों को लेकर, नेतागिरि को लेकर, पदों को लेकर, वर्चस्व को लेकर न केवल रातों-रात पाला बदल लेते हैं, न केवल एक-दूसरे के विरोध में आमने-सामने आ खड़े होते हैं, बल्कि एक-दूसरे की कड़ी भर्त्सना करने और एक-दूसरे का अस्तित्व तक मिटा देने तक की स्थिति में भी आ जाते हैं । इन दोनों के स्वभाव में, प्रकृति में, इतना अन्तर था कि एक तेजाब में बुझा हुआ था तो दूसरा गोमुख से निकली जलधारा के समान शीतल । लेकिन फिर भी इनमें मैत्री हो सकी, मधुर पारस्परिक सम्बन्ध आजीवन बने रह सके, लम्बे सार्वजनिक जीवन में कभी दरार या कटुता न आ सकी तो इसे नियति के विचित्र खेल की संज्ञा ही दी जा सकती है, पूर्व जन्म के संस्कारों का उदय होना भी माना जा सकता है । इन दोनों के संबन्धों की तह में जाकर यदि अध्ययन किया जाये तो निष्कर्ष यह निकलता है कि इस अटूट रिश्ते की बुनियाद समान ध्येय पर टिकी हुई थी और वह ध्येय था आर्यसमाज के यश व कीर्ति को बढ़ाना, उसे यथायस्थितिवाद से मुक्त कराना, उसे चारदीवारी की कैद से मुक्त कराकर समाज से जोड़ना, उसे बजाय एक जीवन-शैली बनाने के चहुँमुखी क्रान्ति का आधार बनाना, उसे बजाय सम्प्रदाय बनाये रखने के एक सजीव आन्दोलन का स्वरूप प्रदान करना, उसे बजाय यज्ञ-संध्या तक सीमित रखने के एक ऐसी समग्रता प्रदान करना, एक ऐसी पूर्णता प्रदान करना जिससे देश-विदेश का हर नागरिक न केवल प्रभावित हो बल्कि उसे आत्मसात भी कर सके । प्रश्न यह नहीं उठता कि इस दिशा में वे सफल कितने हुए बल्कि देखना यह है कि इस दिशा में वे कहीं भटके तो नहीं, उनकी ईमानदारी व निष्ठा में कहीं कोई कमी तो नहीं आई, उनके स्वार्थ कहीं आपस में टकरे तो नहीं । इस प्रश्न का उत्तर हमें तब मिला जब 12 जून 2006 को स्वामी इन्द्रवेश जी का अंत्येष्टि संस्कार खुद स्वामी अग्निवेश जी ने भरे मन और सजल नेत्रों से उनकी चिता को मुखाग्नि देते हुए स्वयं कराया । चालीस वर्षों के सार्वजनिक जीवन यह सुखद अंत निश्चय ही निराला था, विरल था, आदरणीय था, गौरवशाली था । आर्यसमाज के इतिहास का यह ऐसा अध्याय है जो न केवल सदियों तक याद रखा जायेगा । बल्कि आने वाली पीढ़ियाँ उनसे सबक भी लेती रहेंगी । इसलिए इस अध्याय का अध्ययन पाठकों को तटस्थ रह कर करना होगा । ईमानदारी से करना होगा, नीर-क्षीर विवेक से करना होगा जिससे कि आर्य समाज की नींव को मजबूती मिल सके, उसकी कमजोर दीवारों को सहारा मिल सके, उसके धूल खाये कलश को चमक मिल सके ।

स्वामी इन्द्रवेश और स्वामी अग्निवेश की जोड़ी को जिन लोगों ने आलोचक भाव से जानने या समझने का प्रयास किया, उन्होंने निश्चय ही न केवल खुद धोखा खाया है बल्कि दूसरों को भी धोखा देने की कौशिश की है । इन आलोचक महानुभावों ने उनके भीतर झांकने का कभी प्रयास नहीं किया क्योंकि वे खुद इस योग्य कभी रहे नहीं कि तटस्थ रह कर ऐसा कर सकें । उन्होंने उस पृष्ठभूमि को भी समझने का प्रयास नहीं किया जिन्होंने इन दो शरीरों को एक आत्मा बनाये रखा । उनके मंसूबों को समझने का ईमानदाराना प्रयास वे नहीं कर सके । आर्यसमाज के माध्यम से जिस समग्र क्रान्ति का स्वप्न संजोकर उन्होंने संकल्प लिया था वह संकल्प यदि पूरा न हो सका तो इसमें दोष उनका नहीं है बल्कि उनका है जो जीवन भर उनसे विरोध जताते रहे, उनके रास्ते में काँटे बिछाते रहे, उनके सामने दीवार बनकर खड़े होते रहे महज इस कारण कि उनकी नेतागिरी पर आँच न आये, उनके नीचे से कहीं उनकी कुर्सी न खिसक जाये, उनकी गुटबन्दी का कहीं शिराजा न बिखर जाये । जिन उद्देश्यों को लेकर वे आर्यसमाज में आये हैं वे कहीं धराशायी न हो सकें । जो पाठक इस औंधी सोच के कभी शिकार नहीं रहे वे निश्चय ही उस अध्याय पर गर्व कर सकेंगे जो इन दो तेजस्वी आत्माओं ने अपने खून और पसीने से लिखा है ।

सामाजिक जीवन की शुरुआत

दोनों ही नेताओं ने एक दूसरे का पूरक बनकर अपने सामाजिक दायित्व को निभाया । सन् 1967 में सार्वदेशिक आर्य युवक परिषद के नाम से युवकों का संगठन बनाकर कार्य प्रारम्भ किया । उनके साथ उसी समय स्वामी आदित्यवेश (पूर्व नाम आचार्य रामानन्द), स्वामी शक्तिवेश (पूर्व डॉ. कृष्णदत्त), ब्र. कर्मपाल, प्रो. उमेदसिंह, प्रो. बलजीत सिंह आर्य, मा. धर्मपाल आर्य, ओमप्रकाश पत्रकार, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी योगानन्द, मनुदेव आर्य, राजसिंह आर्य आदि अनेक युवक कार्यक्षेत्र में उतरे तथा आर्य जगत में युवक क्रान्ति अभियान के नाम से एक नया अध्याय शुरू हो गया । फिर 1968 में आपने युवक क्रान्ति अभियान के शंखनाद के रूप में राजधर्म नाम से पाक्षिक पत्र भी उसी समय प्रारम्भ कर दिया जो अभी तक निरन्तर निकल रहा है । युवकों को संगठित करने एवं जनसामान्य तक अपनी बात पहुँचाने के लिए 1967 में गुरुकुल झज्जर को छोड़ दिया तथा कुरुक्षेत्र से दिल्ली तक की पदयात्रा का ऐतिहासिक आयोजन किया । यह यात्रा सैंकड़ों गांवों, कस्बों व नगरों से होती हुई पन्द्रह दिन बाद दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले के समक्ष जलती मशाल हाथों में लेकर आर्य राष्ट्र की स्थापना के संकल्प के साथ सम्पन्न हुई । सन् 1969 में हरयाणा की जनता के द्वारा छेड़े गए चण्डीगढ़ आन्दोलन में युवावर्ग का नेतृत्व करते हुये स्वामी इन्द्रवेश व उनके साथी जेल गये । रोहतक सेन्ट्रल जेल में ही उन्होंने अपने अभिन्न साथी स्वामी अग्निवेश के साथ सन्यास लेने का संकल्प लिया ।

7 अप्रैल 1970 को दयानन्द मठ रोहतक में स्वामी इन्द्रवेश जी ने स्वामी अग्निवेश एवं स्वामी सत्यपति के साथ वेदों के प्रकाण्ड विद्वान स्वामी ब्रह्ममुनि जी से सन्यास की दीक्षा ली । उसी दिन स्वामीद्वय ने आर्य राष्ट्र के निर्माण का संकल्प लेते हुए आर्यसभा नाम से राजनैतिक पार्टी की भी स्थापना कर ली तथा सक्रिय राजनीति में उतर गये ।

1972 में विधानसभा के चुनावों में आर्यसभा के दो विधायक चुने गये तथा आर्यसभा हरयाणा की सर्वाधिक वोट प्राप्त करने वाली विपक्षी पार्टी बन गई ।

सन् 1973 में किसान संघर्ष समिति का गठन करके गेहूँ के भाव को लेकर जबरदस्त आन्दोलन शुरू किया । गेहूँ का भाव बढ़वाने के लिये दिल्ली के बोट क्लब पर संसद के समक्ष आमरण अनशन किया तथा गेहूँ का भाव 76 रुपये से 105 रुपये करवाने में सफलता प्राप्त की ।

सन् 1974 में आर्यसमाज की सर्वाधिक सशक्त सभा आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब जिसमें दिल्ली, हरयाणा, पंजाब की आर्य समाजें, शिक्षण संस्थायें व गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, कन्या गुरुकुल देहरादून, गुरुकुल काँगड़ी फार्मेसी आदि सम्मिलित थीं, के चुनाव में प्रधान चुने गये तथा गुरुकुल कांगड़ी के कुलाधिपति बने । यह चुनाव हाईकोर्ट की देखरेख में संपन्न हुआ था ।

सन् 1975 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा छेड़े गये आन्दोलन में हरयाणा जनसंघर्ष समिति के अध्यक्ष के रूप में जे. पी. ने स्वामी जी को आन्दोलन की बागडोर सौंपी । इस समिति में चौ. देवीलाल, स्वामी अग्निवेश, डा. मंगलसेन, मनीराम बागड़ी, चौ. शिवराम वर्मा, बलवन्तराय तायल, पं. श्रीराम शर्मा, चौ. चाँदराम, चौ. मुखत्यारसिंह, चौ. धर्मसिंह राठी आदि हरयाणा के समस्त दिग्गज नेता सदस्य थे ।

सन् 1975 में आपातकाल के दौरान मीसा के अन्तर्गत नजरबंद किये गये । इमरजेंसी के बाद आर्यसभा का अन्य सभी पार्टियों की तरह जनता पार्टी में विलय कर दिया गया तथा सन् 1980 के लोकसभा चुनाव में आप रोहतक से लोकदल के टिकट पर सांसद चुने गये ।

सन् 1986 में राजीव-लोंगोवाल समझौते एवं पंजाब में फैल रहे उग्रवाद के खिलाफ छोटूराम पार्क रोहतक में आपने 21 दिन की भूख हड़ताल की । अनशन समाप्ति पर तत्कालीन आर्यनेता लाला रामगोपाल शालवाले जूस पिलाने के लिए पधारे ।

सन् 1992 में शराबबन्दी आन्दोलन की शुरुअत की तथा पूर्ण शराबबन्दी लागू होने तक सफलता के साथ नेतृत्व किया । सन् 1993 में दिल्ली से हिसार की शराबबन्दी पदयात्रा का नेतृत्व किया । इस यात्रा में लगभग पांच हजार स्त्री-पुरुष सम्मिलित हुये जो सूदूर महाराष्ट्र व गुजरात तक से आये थे । यात्रा के विराट रूप को भांप कर हरयाणा सरकार कांप उठी थी ।

सन् 2001 में आर्य प्रतिनिधि सभा हरयाणा के प्रधान निर्वाचित हुये । वर्तमान में आप आर्य विद्यासभा गुरुकुल कांगड़ी के प्रधान पद को सुशोभित कर रहे थे ।

विविध गतिविधियाँ

1. अपने जीवन की विशेष योजना को मूर्तरूप देते हुए स्वामी जी ने सैंकड़ों लोगों को सन्यास, वानप्रस्थ एवं नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षायें दीं तथा हजारों योग्य एवं शिक्षित युवकों को आर्यसमाज में दीक्षित किया ।

2. ब्रह्मचर्य, व्यायाम प्रशिक्षण एवं युवानिर्माण शिविरों के माध्यम से पूरे देश में युवक क्रान्ति अभियान चलाया त्था आर्यसमाज में नया जीवन फूँका । शिविरों के माध्यम से लाखों युवकों को आर्यसमाज से जोड़ा ।

3. पदयात्राओं, शिविरों, व्यायाम-प्रदर्शनों व जनचेतना यात्राओं के माध्यम से आर्य समाज का प्रचार करने की परम्परा उन्होंने ही प्रारम्भ की ।

4. गुरुकुल मटिण्डू (सोनीपत) के वे बहुत लम्बे समय तक प्रधान रहे तथा आचार्य यशपाल प्रधानाचार्य रहे । इसी प्रकार सन् 1978 से 1985 तक गुरुकुल सिंहपुरा-सुन्दरपुर जिला रोहतक का संचालन कर संस्था को चार चाँद लगाये जो हरयाणा की समस्त आर्यसामाजिक गतिविधियों का केन्द्र बना हुआ था । गुरुकुल सिंहपुरा-सुन्दरपुर (रोहतक) में महर्षि दयानन्द साधु आश्रम एवं गोशाला के भवन का निर्माण कराया एवं गुरुकुल को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया । उस समय गुरुकुल के आचार्य स्वामी चन्द्रवेश जी, व्यवस्थापक श्री जगवीर सिंह तथा प्रधान चौ. रघुवीर सिंह सिंहपुरा थे ।

5. उत्तरप्रदेश के केवलानन्द निगमाश्रम गंज बिजनौर में छह सौ बीघा भूमि एवं विशाल आश्रम है । आश्रम के अन्तर्गत संस्कृत महाविद्यालय, बी. एड. तथा नर्सिंग कालेज, विशाल गऊशाला एवं खेल स्टेडियम आदि संस्थान संचालित हो रहे हैं । यह आश्रम स्वामी सुखानन्द जी महाराज ने सन् 1986 में स्वामी इन्द्रवेश जी को सौंप दिया था, जिसका संचालन पूज्य स्वामी इन्द्रवेश जी अभी तक कर रहे थे । इसी आश्रम की एक शाखा गंगा डेरा छींटावाला (पटियाला) पंजाब में स्थित है जो आपके निर्देशन में स्वामी ब्रह्मवेश चला रहे हैं । केवलानन्द निगमाश्रम के विशाल संस्थान का संचालन आपके कर्मठ एवं सुयोग्य शिष्य स्वामी ओमवेश जी कुशलता के साथ कर रहे हैं ।

6. महर्षि दयानन्द धाम अमृतसर (पंजाब), महर्षि दयानन्द धाम मिर्जापुर (फरीदाबाद), महर्षि दयानन्द प्राकृतिक एवं योग चिकित्सा आश्रम जीन्द, महर्षि दयानन्द धाम बरगड़ (उड़ीसा) आदि केन्द्र स्वामी इन्द्रवेश जी की प्रेरणा से अपने अपने क्षेत्र में वेद प्रचार एवं सेवा का ठोस कार्य कर रहे हैं ।

7. स्वामी जी की अध्यक्षता में गठित वेदप्रचार आयोजन समिति के तत्वाधान में वर्ष 1986 में कुम्भमेला हरद्वार में चालीस दिन का वेदप्रचार शिविर लगाया गया जिसमें गाय के घी से चतुर्वेद पारायण यज्ञ, विभिन्न सम्मेलन, योग शिविर, ऐतिहासिक शोभायात्रा एवं शास्त्रार्थ की चुनौति देकर पौराणिक जगत् में हलचल पैदा की, 1986 के वेदप्रचार शिविर से पूर्व कुम्भ मेले में आर्य समाज का शिविर लगभग 60 साल पहले लगा था । स्वामी जी द्वारा प्रारम्भ किये गये उक्त क्रान्तिकारी कार्यक्रम को अभी तक प्रत्येक कुम्भ मेले में चलाया जा रहा है । सन् 1986 के कुम्भ मेले पर स्वामी प्रकाशानन्द व स्वामी योगानन्द सहित दस सन्यासी बने थे ।

8. हरयाणा में आर्यसमाज की छावनी के रूप में विख्यात दयानन्द मठ रोहतक के प्रधान बनाये जाने के बाद आपने 1999 से मासिक सत्संग का अनोखा कार्यक्रम प्रारम्भ किया तथा जीवन के अन्तिम क्षण तक बखूबी निभाया । आखिरी सत्संग 4 जून 2006 को हुआ जो 81वां था । उनकी प्रेरणा से श्री सन्तराम आर्य उक्त सत्संग का संयोजन सफलता के साथ कर रहे हैं ।

9. वैदिक धर्म के प्रचारार्थ स्वामी जी देश एवं विदेश में निरन्तर भ्रमण करते थे । सन् 1983 में महर्षि दयानन्द बलिदान शताब्दी समारोह दिल्ली की तैयारी हेतु आप व स्वामी अग्निवेश जी हालैंड, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों में आर्यजनों को प्रेरित करने पहुँचे । इसी तरह सन् 1997 में स्वामी जी श्री विरजानन्द जी महामन्त्री सार्वदेशिक आर्य युवक परिषद को साथ लेकर अमेरिका गये, जहां उन्होंने अनेक शहरों में वेदप्रचार के लिए व्याख्यान दिये । उसी दौरान वे हालैण्ड आदि देशों में भी गये । वर्ष 2000 में पुनः परिषद के प्रधान श्री जगवीर सिंह को सथ लेकर पहले अमरीका व कनाडा गये तथा बाद में हालैंड, जर्मनी व इंग्लैंड भी गये । इसी वर्ष आर्य समाज नैरोबी (केनिया) में आर्यसमाज के कार्यक्रम के लिए लगभग पन्द्रह दिन लगाकर आये । इस साल जुलाई 2006 में भी उनका कार्यक्रम अमेरिका जाने का बना हुआ था किन्तु 12 जून 2006 को उनका देहावसान हो गया । अमेरिका में उनकी प्रेरणा से एक आश्रम के निर्माण की तैयारी थी । अमेरिका में स्वामी जी के बहुत सारे सहयोगी हैं जिनसे सम्पर्क का माध्यम श्री चन्द्रभान आर्य एवं लक्ष्मी आर्य हैं । सन् 1983 में अन्तर्राष्ट्रीय महर्षि दयानन्द बलिदान शताब्दी समारोह रामलीला मैदान, नई दिल्ली में आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता स्वामी इन्द्रवेश जी ने की । इस अवसर पर स्वामी ओमवेश व स्वामी दिव्यानन्द सहित लगभग चौदह लोगों ने वानप्रस्थ एवं सन्यास की दीक्षा ली थी । पांच अन्तर्जातीय शादियाँ भी सम्पन्न कराई गई थी जिन्हें पूर्व प्रधानमन्त्री चौ. चरणसिंह जी ने प्रमाणपत्र एवं सम्मान प्रदान किया था ।

सन् 1987 में रूपकंवर को जबरन सती करने के विरुद्ध दिल्ली से देवराला की ऐतिहासिक पदयात्रा जो स्वामी अग्निवेश जी के नेतृत्व में निकाली गई थी, में भी स्वामी इन्द्रवेश जी की विशेष प्रेरणा रही ।

सन् 1987 में ही दिल्ली से पुरा महादेव (मेरठ) तक आयोजित पदयात्रा का संरक्षण स्वामी इन्द्रवेश जी ने किया । यह यात्रा भी पुरी के शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ को सती के सवाल पर शास्त्रार्थ की चुनौति देने के लिए आयोजित की गई थी । इस कार्य में पूरे आर्य जगत में नई ऊर्जा पैदा हुई थी ।

बागपत में मायात्यागी काण्ड के बाद ग्यारह सौ सत्याग्रहियों के साथ सत्याग्रह करके एक महीने तक बरेली जेल में रहे तथा बाद में हरयाणा लोक संघर्ष समिति के माध्यम से हरयाणा में जोरदार जेल भरो आन्दोलन चलाया । विदित हो कि मायात्यागी को पुलिस ने भरे बाजार में नंगा करके घुमाया तथा अपमानित किया था जो महिलाओं पर किये जाने वाले अत्याचार का ज्वलन्त उदाहरण था ।

10. स्वामीजी के स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट आने के बावजूद वे आर्यसमाज के समस्त कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी करते थे । सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा का प्रधान चुने जाने के पशचात् स्वामी अग्निवेश जी को सभा मुख्यालय, दयानन्द भवन, रामलीला मैदान नई दिल्ली में ले जाने का अभियान स्वामी जी महाराज के नेतृत्व में ही सम्पन्न हुआ ।

11. उनकी प्रेरणा से जिन महानुभावों ने सन्यास अथवा नैष्ठिक की दीक्षा ली तथा अपने आपको सामाजिक कार्य में लगाया उनमें मुख्यतया पूज्य स्वामी अग्निवेश जी, स्वामी आदित्यवेश जी, स्वामी शक्तिवेश जी, स्वामी वरुणवेश जी, स्वामी चन्द्रवेश जी, स्वामी ओमवेश जी, स्वामी क्रान्तिवेश जी, स्वामी ब्रह्मवेश, स्वामी रुद्रवेश, स्वामी कर्मपाल, स्वामी देवव्रत, स्वामी धर्ममुनि (बहादुरगढ़), स्वामी सोमवेश (उड़ीसा), स्वामी सूर्यवेश (उत्तर प्रदेश), स्वामी आनन्दवेश (शुक्रताल), स्वामी कर्मवेश (मुजफ्फनगर), स्वामी श्रद्धानन्द (उत्तर प्रदेश), स्वामी महानन्द (शुक्रताल), स्वामी योगानन्द (मीरापुर), स्वामी महेशानन्द (बिजनौर), स्वामी धर्मवेश (अलवर), स्वामी शिवानन्द (धरारी), स्वामी प्रकाशानन्द (पिपराली), स्वामी सिंहमुनि (पलवल), स्वामी सत्यवेश (गाजियाबाद), स्वामी दिव्यानन्द (हरद्वार) आदि सन्यासियों एवं श्री रामधारी शास्त्री, आचार्य जयवीर आर्य, आचार्या कलावती, जगवीर सिंह, आचार्य हरिदेव, ब्र. विनय नैष्ठिक, प्रो. विट्ठलराव (आन्ध्रप्रदेश), सुधीर कुमार शास्त्री (उड़ीसा), प्रेमपाल शास्त्री (दिल्ली), शिवराम विद्यावाचस्पति (पलवल), सन्तराम आर्य (रोहतक), ब्र. सहन्सरपाल (मु. नगर), कु. पूनम आर्या, कु. प्रवेश आर्या (रोहतक) आदि नैष्ठिकों के नाम उल्लेखनीय हैं ।

12. स्वामी जी की प्रेरणा से ही जिन महानुभावों ने राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया तथा ख्याति अर्जित की उनमें सर्वश्री स्वामी अग्निवेश पूर्व शिक्षामन्त्री, स्वामी आदित्यवेश पूर्व विधायक एवं चेयरमैन एग्रो., स्वामी ओमवेश गन्ना विकास मंत्री उत्तर प्रदेश, प्रो. उमेदसिंह पूर्व विधायक (महम), मा. श्यामलाल पूर्व विधायक (पलवल), श्री राजेन्द्रसिंह बीसला पूर्व विधायक (बल्लभगढ़), श्री भवानीसिंह पूर्व विधायक (राजस्थान), श्री गंगाराम पूर्व विधायक (गोहाना), डॉ. महासिंह पूर्व मन्त्री (सोनीपत), श्री रोशनलाल आर्य पूर्व विधायक (यमुना नगर), चौ. वीरेन्द्रसिंह पूर्वमन्त्री (नारनौद), चौ. टेकचन्द नैन पूर्व विधायक (नरवाना), चौ. अजीतसिंह पूर्व विधायक (बेरी), श्री विरजानन्द आदि के नाम उल्लेखनीय हैं ।

स्वामी इन्द्रवेश जी ने अपने जीवन का एक-एक क्षण समाज परिवर्तन के लिए लगाया । उनके तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अनेक लोगों ने अपना जीवन समाज सेवा में अर्पित किया । उनकी पुण्यतिथि पर हमें एक ही संकल्प लेना चाहिये कि जिस पवित्र निष्ठा के साथ स्वामी जी ने महर्षि दयानन्द के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए अपने जीवन की आखिरी सांस तक संघर्ष किया उसी प्रकार हम सब सप्तक्रान्ति अर्थात् जातिमुक्त, साम्प्रदायिकतामुक्त, नशामुक्त, पाखण्डमुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त, नारी उत्पीड़नमुक्त एवं शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए कृतसंकल्प रहेंगे । हम आपस के सभी भेदभाव मिटाकर इस मिशन में जुटें, यही स्वामी जी की अन्तिम इच्छा थी ।

स्वामी इन्द्रवेश जी का जीवन विशद एवं खुली किताब है जिस पर विहंगम दृष्टिपात करने से निम्न तथ्य उभर कर सामने आये हैं -

आर्यसमाज में एकता के प्रयास

स्वामी इन्द्रवेश जी ने सन् 1969, 1974, 1995, 1998, 2001, 2005 तथा 12 जून 2006 को जीवन के अन्तिम दिन भी जारी रखे ।

पंचायतों में स्वामी इन्द्रवेश

समय-समय पर विभिन्न पंचायतों में स्वामी जी को ससम्मान बुलाया गया जिनका विवरण निम्न प्रकार है ।

1. महम चौबीसी की पंचायत - 1967, 1972, 1975

2. दहिया खाप की पंचायत – 2005

3. विनायन खाप की पंचायत

4. सर्वखाप पंचायत

5. सर्वखाप 360 पंचायत पालम

संघर्ष एवं आन्दोलन

स्वामी जी ने जिन आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई वे इस प्रकार हैं -

1. शराबबन्दी आन्दोलन - 1968

2. हिन्दी सत्याग्रह – 1957

3. गौरक्षा आन्दोलन – 1966

4. चण्डीगढ़ आन्दोलन – 1969

5. किसान आन्दोलन – 1973

6. अध्यापक आन्दोलन – 1973

7. बीड़छूछक हरिजन आन्दोलन – 1972

8. जे.पी. आन्दोलन – 1975

9. मायात्यागी काण्ड आन्दोलन – 1984

10. आतंकवाद विरोधी आन्दोलन - 1983-84 एवं 1986

11. शराबबन्दी आन्दोलन – 1992

12. शंकराचार्य के विरुद्ध सतीप्रथा विषयक आन्दोलन – 1987

13. कन्याभ्रूर्ण हत्या विरोधी आन्दोलन - 2005

संस्थाओं का संचालन

स्वामी जी ने निम्नलिखित संस्थाओं के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई - गुरुकुल झज्जर, गुरुकुल मटिण्डू, गुरुकुल सिंहपुरा, शहीद स्मारक गुलकनी, केवलानन्द आश्रम गंज बिजनौर, महर्षि दयानन्दधाम अमृतसर, गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ, गुरुकुल कुरुक्षेत्र, गुरुकुल कांगड़ी, गुरुकुल खेड़ा खुर्द और गुरुकुल टटेसर ।

सहयोग एवं मार्गदर्शन

जिन संस्थाओं के संचालन में तथा मार्गदर्शन में स्वामी जी की विशेष भूमिका रही वे इस प्रकार हैं - गुरुकुल ततारपुर, गुरुकुल धीरणवास, गुरुकुल खरल, गुरुकुल थुम्भाखेड़ा, गुरुकुल कालवा, गुरुकुल सिरसागंज, गुरुकुल शुक्रताल, कन्या गुरुकुल लोवाकलां, गुरुकुल गौतमनगर ।

आर्यसमाज के आश्रम

निम्नलिखित आश्रमों के संचालन में स्वामी जी का सकारात्मक सहयोग रहा - (1) योगधाम ज्वालापुर (2) प्रेमानन्द वैदिक आश्रम हस्तिनापुर (3) शम्भुदयाल आर्य सन्यास एवं वानप्रस्थ आश्रम गाजियाबाद (4) महर्षि दयानन्द योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा आश्रम, जीन्द (5) प्रभु भक्ति आश्रम गोड़भगा, सम्भलपुर, उड़ीसा ।

उदघाटन

निम्नलिखित संस्थाओं का उदघाटन स्वामी जी के करकमलों द्वारा हुआ ।

(1) पं. नरेन्द्र भवन हैदराबाद - 2004 (2) महर्षि दयानन्द धाम अमृतसर - 1994 (3) आर्य विद्यापीठ गंगाना - 2002 (4) महर्षि दयानन्द योग चिकित्सा आश्रम जीन्द - 1990 ।

जनान्दोलन एवं अभियान

1. शराबबन्दी - युवक क्रान्ति अभियान – 1968

2. कुरुक्षेत्र से दिल्ली पदयात्रा – 1968

3. कुण्डली बूचड़खाना – 1969

4. हिसार से सोनीपत की शराबबन्दी पद यात्रा -1981

5. आतंकवाद के विरुद्ध मोटरसाइकिल यात्रा 1982

6. शराबबन्दी अभियान (हरयाणा, उत्तरप्रदेश) एवं शराबबन्दी पदयात्रा - 1992, 1994

7. कन्या भ्रूर्णहत्या विरोधी यात्रा (2005), टंकारा से अमृतसर, नरवाना से रोहतक (2006)

8. दिल्ली से पुरामहादेव सती प्रथा विरोधी यात्रा – 1987

महासम्मेलन

1. आर्यसभा महासम्मेलन, [[Jind}जीन्द]] - 22 नवम्बर 1970

2. किसान सम्मेलन रोहतक – 1973

3. आर्यसमाज शताब्दी सम्मेलन (रोहतक, मुजफ्फरनगर, जयपुर) – 1976

4. महर्षि दयानन्द बलिदान शताब्दी सम्मेलन – 1983

5. राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन, नई दिल्ली - 1994

6. आर्य महासम्मेलन अमृतसर – 1987

7. आर्य महासम्मेलन सासरौली – 1998

8. आर्य महासम्मेलन रोहतक – 1969

9. सन्यास दीक्षा सम्मेलन – 1970

10. आर्य महासम्मेलन न्यूयार्क – 2000

11. राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन जोधपुर – 1998

12. राष्ट्रीय कार्यकर्त्ता सम्मेलन तालकटोरा स्टेडियम, नई दिल्ली – 2005

विदेशों में स्वामी जी के प्रमुख सहयोगी

अमेरिका - डा. भूपेन्द्र गुप्‍त, श्री चन्द्रभान आर्य व लक्ष्मी आर्या, राज एवं मंजू मल्होत्रा, डा. विजय आर्य, श्री नारी टंडन, श्री सुशील मड़िया, श्री बालेन्द्र कुण्डू, श्री बलदेव नारायण, श्री वेदश्रवा, श्री यशपाल आर्य, श्रीमती आशा चौहान, श्री वीरसेन मुखी, डा. सतीश प्रकाश, श्री सुभाष सहगल, श्री सुभाष अरोड़ा, डा. वीरेन्द्र सिंह, डा. राजेन्द्र गांधी, पूर्णिमा देसाई आदि न्यूयार्क में । श्री विपिन गुप्‍ता, डा. देवकेतु, डा. रमेश चन्द्रा, चौ. फूलसिंह, श्री वीरेश्वरसिंह, श्री देव डबास, श्री चक्रधारी, श्री धर्मजित जिज्ञासु आदि न्यूजर्सी में । श्री राजपाल दलाल, श्री राजेन्द्र दहिया, डा. सुखदेव सोनी, डा. महिपाल पोरिया, डा. दिलीप वेदालंकार आदि शिकागो, तथा डा. शंकरलाल गर्ग बोस्टन, डा. राम उपाध्याय आदि ।

हालैंड - श्री गंगाराम कल्पू, डा. आनन्द कुमार बिरजा, श्री नरदेव यजुर्वेदी, श्री भगवान देव आर्य ।

इसी तरह श्री अनिल कपिला व डा. राजेन्द्र सैनी, देवेन्द्र भल्ला, श्री रमेश राणा, श्री रामकृष्ण शर्मा व श्री यशपाल अंगिरा, श्री ओ.पी नारंग केनिया में मुख्य सहयोगी एवं शुभचिन्तक हैं ।

आर्य विद्वानों में - श्री वेदप्रकाश श्रोत्रीय, डा. वेदप्रताप वैदिक, श्री शिवकुमार शास्त्री, प्रो. जयदेव वेदालंकार, प्रो. अनूप सिंह, प्रो. उमाकान्त उपाध्याय, श्री रामनारायण शास्त्री पटना, वेदप्रकाश शास्त्री बिजनौर, विश्वबन्धु शास्त्री, प्रि. कृष्ण सिंह आर्य, डा. जोगेन्द्र सिंह यादव, प्रो. रामविचार, प्रि. एन. डी. ग्रोवर, डा. सुदर्शन देव, प्रो. चन्द्र प्रकाश सत्यार्थी, प्रो. जयदेव आर्य, आचार्य भद्रसेन, डा. धर्मवीर शास्त्री, डा. सोमदेव शास्त्री, पं. गोपदेव शास्त्री, डा. के. सी. यादव, डा. सत्यकेतु विद्यालंकार, डा. तुलसीराम, डा. धर्मपाल पूर्व कुलपति ।

भजनोपदेशकों में - सर्वश्री पृथ्वी सिंह बेधड़क, श्री वीरेन्द्र सिंह वीर, श्री शोभाराम प्रेमी, श्री बेगराज आर्य, श्री खेमचन्द आर्य, महाशय प्यारेलाल, महाशय नरसिंह, पं. प्रभुदयाल आर्य, पं. ताराचन्द वैदिक तोप, महाशय फतहसिंह महाशय रत्‍न सिंह, महाशय जोहरी सिंह, महाशय नत्था सिंह, श्री ओमप्रकाश वर्मा, पं. चिरन्जीलाल, पं. चन्द्रभान, स्वामी रुद्रवेश, श्री लक्षमणसिंह बेमोल, श्री बृजपाल कर्मठ, श्री अभयराम शर्मा, श्री मामचन्द पथिक, श्री सहदेव बेधड़क, श्री राम निवास आर्य, श्री कुलदीप आर्य, श्री रामरिख आर्य, श्री सुमेरसिंह आर्य, श्री जयपाल आर्य, श्री खेमसिंह आर्य, श्री भजनलाल आर्य, श्री चूनीलाल आर्य, श्री दूलीचन्द आर्य, श्री नारायण सिंह आर्य, श्री बनवारी लाल हितैषी, श्री नरदेव आर्य, श्री तेजवीर आर्य, श्री जगदीश आर्य, श्री रामकुमार आर्य, कंवर सुखपाल ।

कर्मठ कार्यकर्ताओं में - सर्वश्री ओमप्रकाश आर्य, प्रेमपाल शास्त्री, डा. नरेन्द्र वेदालंकार, डा. जयेन्द्र आचार्य, श्री शिवराज शास्त्री, आचार्य अजीत कुमार शास्त्री, श्री जगवीर सिंह शास्त्री, श्री ओम सपरा, श्री अनिल आर्य, डा. श्री वत्स, श्री देव शर्मा, आचार्य सुभाष, श्री रमेश आर्य, श्री विजय चौधरी, श्रीमती प्रवीण सिंह, श्रीमती वेदकुमारी, श्री मेघश्याम शास्त्री, श्री रामनिवास एडवोकेट, श्री सुरेश गोयल, श्री मधुरप्रकाश, श्री अभयदेव शास्त्री, श्री रमेशचन्द शास्त्री, श्री भूदेव आर्य, श्री नरेन्द्र गुप्‍ता, श्री बृजमोहन शंगारी, श्री वेदपाल शास्त्री, श्री विजय आर्य, मा. पूर्ण सिंह आर्य, डा. मथुरा सिंह, श्री विजय कुमार आर्य अमृतसर, श्री प्रवीण आर्य अमृतसर, श्री तरसेमलाल आर्य बरनाला, श्री बृजेन्द्र भण्डारी लुधियाना, श्री सन्तकुमार आर्य लुधियाना, श्री सुदेश कुमार आर्य लुधियाना, श्री रूपलाल आर्य लुधियाना, श्री सुरेन्द्रमोहन शर्मा अमृतसर, श्री यशवन्त राय साथी, श्री अजयसूद मोगा, श्री बलदेव कृष्ण आर्य रामामण्डी, श्री श्यामलाल आर्य कैथल, श्री इन्द्रपाल आर्य अमृतसर, डा. नवीन आर्य एवं डा. मंजू आर्या अमृतसर, सोमदेव शास्त्री, मेजर विजय आर्य, राजकुमार गुप्‍ता, मनोहरलाल आर्य चण्डीगढ़ ।

स्वामी जी की प्रेरणा से जो सन्यासी बने - स्वामी वरुणवेश, स्वामी चन्द्रवेश, स्वामी रुद्रवेश, स्वामी धर्मानन्द उड़ीसा, स्वामी धर्मानन्द रोहतक, स्वामी शिवानन्द, स्वामी सिंहमुनि, स्वामी सत्यवेश जुलाना, स्वामी दिव्यानन्द हरद्वार ।

विदेश यात्रा - हालैंड, इंग्लैंड, अमेरिका (1983), अमेरिका हालैंड (1998), अमेरिका, कनाडा, हालैंड (2000), अमेरिका, इंग्लैंड (2003), नैरोबी, केनिया (2002)

पदाधिकारी के रूप में

सार्वदेशिक आर्य युवक परिषद के प्रधान

आर्य सभा के प्रधान (1970)

जनसंघर्ष समिति के प्रधान (1975)

भारतीय आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान (1990, 1992)

किसान संघर्ष समिति के प्रधान (1973)

लोक संघर्ष समिति के प्रधान (1982)

बंधुआ मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ उपप्रधान (1995 से 2005 तक)

महर्षि दयानन्द धाम अमृतसर के प्रधान (1994-2006)

केवलानन्द निगमाश्रम गंज बिजनौर के प्रधान (1986-2006)

गुरुकुल मटिण्डू के प्रधान (1972-78)

आत्मशुद्धि आश्रम के प्रधान संस्थापक (1967)

आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के प्रधान (1973)

आर्य प्रतिनिधि सभा हरयाणा (2001)

दयानन्द मठ रोहतक के प्रधान (1998-2006)

साहित्य लेखन

1. प्रकाशक व मुद्रक राजधर्म पत्रिका

2. सम्पादक, सुधारक (गुरुकुल झज्जर) - 1965 से 1967

3. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

4. आर्य राष्ट्र

5. आर्य समाज और राजनीति

6. प्राणायाम (ब्रह्मचर्य के साधन)

7. आसन-प्राणायाम

8. पुनर्जन्म मीमांसा

सानिध्य

स्वामी इन्द्रवेश जी को जिन महान आत्माओं का विशेष सानिध्य मिला उनमें उल्लेखनीय नाम निम्न प्रकार से हैं –

धार्मिक नेता - 1. पूज्य स्वामी ओमानन्द जी महाराज 2. स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज 3. स्वामी आत्मानन्द जी 4. स्वामी समर्पणानन्द जी 5. स्वामी भीष्म जी 6. स्वामी ब्रह्ममुनि जी 7. स्वामी सच्चिदानन्द जी योगी 8. स्वामी नित्यानन्द जी 9. महात्मा आनन्द भिक्षु जी 10. स्वामी रामेश्वरानन्द सरस्वती 11. स्वामी सुखानन्द जी 12. पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु 13. डा. सत्यकेतु विद्यालंकार 14. डा. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार 15. श्री जगदेव सिंह सिद्धान्ती 16. पं. शंकरदेव जी 17. पं. युधिष्ठिर मीमांसक 18. डा. गोवर्धन लाल दत्त 19. आचार्य रामप्रसाद 20. आचार्य सुदर्शन देव 21. पण्डित राजवीर शास्त्री 22. डा. महावीर मीमांसक

Wednesday, June 9, 2021

स्व० पंडित भूराराम आर्योपदेशक


स्व. पंडित भूराराम आर्योपदेशक            (चिड़ी रोहतक)

45वीं पुण्यतिथि पर शत शत नमन 

--अमित सिवाहा 

      उस तन की कौन बडाई करे जिस तन से हुआ शुभ काज नहीं। वो नारी निंदा के योग्य सदा जिसकी आंखो में लाज नहीं। उस देश की शौभा है फिकी जहां राज स्वराज नहीं। उस घर की क्या दशा जहां आर्य समाज नही। 

      उपरोक्त पंक्तियों की अंतिम लाइन में आया है उस घर की क्या दशा जहां आर्य समाज नहीं। एक समय था जब आर्य समाज हरियाणा के साथ साथ उत्तर भारत में खूब फल फुल रहा था।  अनेकों विशेषताएं हैं महर्षि दयानंद के लगाए इस विद्या रुपी बाग में, हरियाणा प्रदेश में आर्य समाज का प्रचार ही नहीं अपितु समूचा प्रदेश आर्याणा बन गया था। हरियाणा में आर्य समाज के प्रचार प्रसार की बागडोर यहां के उपदेशकों के कंधो पर थी।  जिन्होने इसको निभाया ही नहीं बल्कि हरियाणा पृथक राज्य बनाने में भी अहम भूमिका निभाई।  इन्हीं शूरवीर उपदेशकों में पंडित भूरा राम जी का नाम आता है। उन्हीं के जीवन के पड़ावों का थोड़ा सा जिक्र करते हैं। 

🔥जन्म 🔥

             पंडित भूराराम जी का जन्म रोहतक जिले के चिड़ी गांव में चौधरी गूगन राम जी के घर पर सन् 1887 ई० में हुआ।  चौधरी गूगन राम जी के तीन पुत्र थे। सबसे बड़े श्री कन्हैया लाल, पंडित भूराराम जी, श्री हरिसिंह वैद्य जी। पंडित भूराराम जी शिक्षा व्यवस्था न होने कारण वंचित रहे लेकिन कृषि कार्य में निपुण थे। दुर्भाग्यवश ये जब बाल्यावस्था में ही थे, इनकी माता जी भगवान को प्यारी हो गई। इनकी माता जी के जाने के बाद श्री हरिसिंह जी ने गांव छोड़ कर पंजाब के मोगा में रहने लग गए। वहां पर इन्होने आठ नो वर्ष आयुर्वेद पर अध्ययन किया।  वहां से शिक्षा प्राप्त करने के बाद ये गांव लौट आए।  ये लगभग सन् 1911/12 की बात है। इन्होने गांव में ही अपनी आजीविका के लिए वैद्य का कार्य प्रांरभ कर दिया।  ओर अपने बड़े भाई पंडित भूराराम जी को भजनोपदेशक बनने के लिए प्रेरित कर देते हैं।  भूराराम जी ने भी यही उचित समझा। 

🔥प्रचार कार्य 🔥

            वैद्य हरिसिंह जी के द्वारा भूराराम जी ने महर्षि दयानंद सरस्वती जी के ग्रंथो का गहन अध्ययन कर भजन बनाए।  ओर प्रचार क्षेत्र में निकल पड़े।  भूराराम जी उत्तरी हरियाणा प्रदेश तथा पंजाब राज्य, लाहौर सुदूर क्षेत्रों में आर्य समाज का प्रचार करते थे। भूराराम जी के सुपुत्र श्री पंडित गोपाल आर्य विद्यावाचस्पति, तथा वैद्य हरिसिंह जी के सुपुत्र श्री सूर्यभानु डी. ए. वी कॉलेज लाहौर में पढ़ते थे। ये वही समय था जब इसी कॉलेज में वीर भगत सिंह तथा अन्य क्रांतिकारी शिक्षा प्राप्त करते थे। श्री गोपाल आर्य विद्यावाचस्पति व श्री सूर्यभानु जी भी अन्य क्रांतिकारियों की तरह देश की आजादी में क्रांतिकारियों का साथ दिया करते थे। यहां से शिक्षा प्राप्ती के बाद श्री गोपाल जी ने यहीं पढ़ाना शुरु कर दिया था।  पंडित भूराराम जी ने गांवो में जाकर के आर्य समाजों की स्थापना की।  पंडित भूराराम जी ने दो से तीन हजार ग्रामीण आर्य समाजों की स्थापनों की। सहस्त्रों यज्ञ कराए अनेकों आर्य पाठशालाएं स्थापित कर वैदिक धर्म के प्रचार को स्थायी कर दिया।  कई जगह तो मुस्लिम बहुल इलाकों में वेद पताका फहरा दी थी। उसी समय हैदराबाद सत्याग्रह का बिगुल बज गया। पंडित भूराराम जी ने यहां भी अपनी भूमिका बखूबी निभाई। 

🔥हैदराबाद सत्याग्रह🔥 

          पंडित भूराराम जी इनके बेटे, वैद्य हरिसिंह व इनके बेटे अपने पूरे परिवार सहित हैदराबाद सत्याग्रह में कूच कर गए।  इनको हैदराबाद की जेलों में बंदी बनाकर रखा गया।  भूराराम जी स्वयं का जत्था लेकर रोहतक से रवाना हुए थे।  इनको हैदराबाद के निजाम ने सीमेंट मिली आटे की रोटी मिलती।  निजाम की क्रूरता आर्य समाजियों के प्रति ज्यादा थी। हैदराबाद सत्याग्रह समाप्त होने के बाद ये गांव लौेटे। हैदराबाद सत्याग्रह की पैंशन भी लेने से मना कर दिया था। इसके थोड़े दिन बाद लोहारु कांड में भी भूराराम जी की भागीदारी रही। आजादी के बाद भूराराम जी जालंधर प्रतिनिधि सभा के उपदेशक रहे।   

🔥हिंदी आंदोलन 🔥

            वर्ष 1957 के हिंदी आंदोलन में पंडित भूराराम जी का योगदान चिर स्मरणीय है। पंडित भूराराम जी व पंडित प्रभुदयाल आर्य पौली वाले ने सभी के आदेशानुसार हजारों लोगों को सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया तथा अंतत: खूद भी गिरफ्तारी दी।  इनको हिसार जेल में लगभग 6 मास तक रखा गया। जेल में इनके अनेकों विशिष्ट सहयोगी थे :-श्री रामचन्द्र खरकड़ा, श्री सुबे सिंह खरकड़ा, श्री भीमसिंह जी, वुनी सिंह, बाजेराम,  श्री धर्मचंद, श्री टेकराम, इत्यादि को पंडित भूराराम जी ने ही सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया तथा ये अमर सिंह के जत्थे में हिसार जेल में रहे।  पंडित भूराराम जी पर लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काने के आरोप लगे। इनको भी जेल में बंद कर दिया। इनके साथ जगदेव सिंह सिद्धांति जी, पं0  बुद्धदेव जी रहे। सत्याग्रह समाप्त होने के उपरांत भूराराम जी घर लौटे।

🔥पंडित का शिष्य 🔥

       लगभग सत्तर वर्ष पुरानी घटना है। पंडित भूराराम जी अपनी भजन मंडली के साथ प्रचार करने जा रहे थे। बीच रास्ते में दो पुलिसकर्मी आए। ओर उनकी भजन मंडली को परेशान करने लग गए। आरोप लगाते हुए बोले की आप नशे का सामान बेचते हो। पंडित श्री भूराराम जी ने उनको बहुत समझाया, की भाई हम तो आर्य समाज के प्रचारी हैं। भजन गाकर लोगों को सत्य मार्ग पर चलने की प्ररेणा देते हैं। वैदिक धर्म का प्रचार करते हैं। आर्य समाज के सिद्धांत लोगों को बताते हैं। हमारा ओर नशे का तो दूर तक कोई संबंध नहीं हैं। 

 पंडित जी ने पुलिस वालों को बहुत समझाया पर ना समझो ने पंडित जी एक न सुनी। उनको भजन मंडली सहीत थाने में ले गए। उन्होनें थानेदार को एक की दो बातें लगाकर सुनाई। थानेदार ने कहा चलो देखते हैं। 

 सज्जनों ये आर्य समाज की शिक्षा का प्रभाव ही कहो की जैसे ही थानेदार साहब ने पंडित भूराराम जी को देखा तो उनके पैरों में जा पड़े। नमस्ते प्रणाम् दोनों की हुई। अब ये दृश्य देखकर वो दोनो सिपाही सन्न रह गए। ये क्या हो रहा है।  सज्जनों ये थानेदार कोई ओर नहीं बल्कि पंडित भूराराम जी का विद्यार्थी था। पंडित जी की पाठशाला में पढ़ता था।  गुरु ओर शिष्य दोनों ने एक दुसरे को पहचाना। थानेदार ने पंडित जी का अतिथि सत्कार किया। 

इस घटिया हरकत के लिए थानेदार ने उन सिपाहियों को कड़ी फटकार लगाई। उनको नौकरी से बर्खास्त करने तक की बात कह दी। ऐसे में वो सिपाही थानेदार से माफी के लिए गिड़गिड़ाने लगे। थानेदार बोले तुम्हारी इस नीच हरकत के लिए मैं माफी का हकदार नहीं, अपितु गुरु जी से माफी मांगो। माफ करने का हक उन्हीं को है।  सिपाहियों ने नम आंखो से पंडित जी के पैर पकड़ कर माफी मांगी। पंडित जी ने कहा एक शर्त पर तुम्हें माफ कर सकता हूं, सिपाहियों ने हामी कर दी। 

  पंडित जी ने उनको एक महिने तक गांवो में हमारी प्रचार की मुनियादी करने को कहा। सिपाहियों ने भी ऐसा ठीक समझा। लम्बी बात क्या है वो सिपाही घोड़ो पर जाते, पंडित जी उनको पहले की सूचित करते आज प्रचार इस गांव में होगा कल उसमें, गांव में भजन पार्टी के लिए रहने खाने की सारी व्यवस्था करके वे सिपाही वापिस पंडित जी को सूचित करते। 

जब महिना पुरा होने वाला था तब पंडित भूराराम जी ने उनको कहा, तुम्हें ये दंड देने का मेरा कोई प्रायोजन नहीं था, बल्कि मैने ऐसा इस लिए किया ताकि ये हरकत तुम ओर तुम्हारे साथी आर्य समाज के किसी भजनोपदेशक के साथ न करो। 

 सज्जनों ऐसी ऐसी अनेकों घटनाएं हैं, जो प्रचार में हमारे भजनोपदेशकों के साथ घटित होती रहती थी। पंडित भूराराम जी जैसे उपदेशक विरले ही जन्म लेते हैं। यें भजनोपदेशक तूजर्बे वाले थे। जनता के मन को भांप कर उपदेश करते। 90 वर्ष की आयु तक आर्य समाज का प्रचार करके पुन्य कमाया। आर्य समाज को समर्पित पंडित जी तथा इनके भाई वैद्य हरिसिंह जी ने लगभग 30हजार पुस्तकों को संग्रह करके आर्य समाज को दान कर दिया। 

🔥देह त्याग 🔥

       हिंदी आंदोलन के सफल सत्याग्रह के पश्चात पंडित भूराराम जी ने वानप्रस्थ की दीक्षा ले ली। इसके पश्चात भूराराम जी ने विधिवत सन्यास की दीक्षा तो नहीं ली अपितु एक सन्यासी की तरह जीवन व्यतीत किया। इतना ही नहीं उसके बाद गोरक्षा आंदोलन के लिए भी सत्याग्रही तैयार किये। गो माता के लिए भी भूराराम जी ने विशेष कार्य किये। जीवन के अंतिम समय में भूराराम जी भजन लिखने का कार्य करते। लगभग 1200 के करीब पुस्तकों को सम्पादन किया व हिन्दी के प्रचार हेतु सैंकड़ो वैदिक भजनो की पुस्तकें स्वयं लिखी। 1 जून 1977 को पंडित श्री भूराराम जी अपनी जीवन लीला समाप्त कर गए थे। भूराराम जी द्वारा लिखे गए गीत आज समाज के लिए प्रेरणा देते हैं। भूराराम जी द्वारा रचित पुस्तक वैदिक प्रार्थना भजनावली पुन: प्रकाशित होने जा रही। समस्त आर्य समाज पंडित भूराराम जी को नमन करता है।  वैदिक धर्म की जय।

आर्यसमाज के हिन्दी आन्दोलन की देन है हरियाणा


आर्यसमाज के हिन्दी आन्दोलन की देन है हरियाणा

(पढ़ने में थोड़ा समय तो लगेगा, पर अपने इतिहास को जानना बहुत आवश्यक है।
जो पेड़-- अपनी जड़ों से कट जाता है- - वह जीवित नहीं रह सकता।)

          हरियाणा प्रदेश को अस्तित्व में आये 52 साल हो रहे हैं। बहुत से लोग अपने अपने नेता के नाम के आगे हरियाणा केसरी, हरियाणा का जन्मदाता तथा हरियाणा का निर्माता आदि विशेषणों का प्रयोग करते हैं। कुछेक बुजुर्गों को छोड़कर आज की युवा पीढ़ी के लोग कम ही जानते हैं कि वेदों की ऋचाओं व गीता उपदेश के लिये प्रसिद्ध इस हरि के प्रदेश को पिछले डेढ़ सौ साल से विदेशियों की ज्यादतियों के साथ-2 यहाँ के राजनेताओं की संकीर्ण सोच का शिकार भी होना पड़ा। आजादी से पहले यहाँ पर उर्दू व फारसी लादी गई थी तथा आजाद होने के बाद यहाँ के लोगों को गुरमुखी का स्वाद भी चखना पड़ा। भाषा की गुलामी से बचाने के लिये इस प्रदेश की जनता का आर्यसमाज ने डटकर साथ दिया है। इसने अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार को अपना मुख्य मिशन बनाया। इस राष्ट्र भक्त संस्था के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपनी मातृभाषा गुजराती को छोड़ अपने सब ग्रंथ हिन्दी और संस्कृत में तैयार किये। पंजाब के हरियाणा क्षेत्र में आर्यसमाज का सबसे अधिक प्रचार हुआ। इसलिए यहाँ पर हिन्दी का आम जनता की जुबान से जुड़ना एक स्वाभाविक बात थी। अंग्रेजों के राज में सारा सरकारी कामकाज उर्दू में होता था, परन्तु आर्यसमाजी सज्जन पुरुष व संस्थायें सब काम हिन्दी में ही करती थीं। आर्यसमाज के प्रभाव के कारण ही पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी रत्न, भूषण तथा प्रभाकर की परीक्षायें होती थीं। 

            स्वतन्त्रता प्राप्ति तथा विभाजनोपरांत वर्तमान हरियाणा के इलाके की जनता तत्कालीन पंजाब की राजसत्ता की भाषा नीति से बिल्कुल ही नाराज थी। सबसे पहले अलग हरियाणा का विचार सन् 1923 में स्वामी सत्यानंद के मन में लाहौर प्रवास के दौरान आया था। उन्होंने इसके लिये लाहौर काॅलेज में पढ़ रहे सोनीपत के चै0 शादीलाल व चै0 सूरजमल को तैयार किया। इसके बाद कृषि मंत्री चै0 छोटूराम ने अलग हरियाणा का प्रस्ताव आॅल इंण्डिया जाट स्टूडेंट कान्फ्रेंस में पास कराया था। भाषायी आधार पर पुनर्गठन की मांग कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में 1930 में उठायी गयी थी।
 इस तरह आजादी के बाद भी भाषा का विवाद उठ खड़ा हुआ। भाषा के इस विवाद को हल करने के लिये सर्वमान्य सूत्र तैयार किया गया, जिसे सच्चर फार्मूले के नाम से जाना जाता है। इस फार्मूले के अनुसार पंजाब को हिन्दी, पंजाबी तथा द्विभाषी- तीन भाषाई क्षेत्रों में बांट दिया गया। जो द्विभाषी क्षेत्र निश्चित किये गये थे, वे मूलतः हिन्दी भाषी ही थे। फार्मूले के अनुसार अंबाला डिवीजन का अद्दिकतर भाग हिन्दी भाषी, जालंधर डिवीजन को पंजाबी भाषी के रूप में एक भाषी रखा गया तथा अबोहर फाजिल्का व अंबाला मण्डल के कुछ भागों को द्विभाषी श्रेणी में रखा गया। इस फार्मूले का सबसे पहले विरोध जांलधर मंडल के हिन्दुओं ने किया क्योकि उन पर पंजाबी भाषा सरकार द्वारा थोंप दी गई थी। नवम्बर 1949 में सच्चर सरकार गिर गई।
 सच्चर फार्मूले का विरोध करने तथा पंजाब में हिन्दी को न्यायोचित स्थान दिलाने के लिए आर्यसमाज उस समय आंदोलनरत था। इसी आंदोलन की कड़ी में ही 13 सितम्बर 1953 को अंबाला में पंजाब प्रांतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन हुआ। जब प्रोफेसर शेरसिंह तथा चै0 देवीलाल ने सच्चर फार्मूले का विरोद्द किया तो पंजाब के राजनेताओं ने रीजनल फार्मूले के नाम पर हिन्दी भाषी जनता को फंसाने का नया जाल बिछाया। रिजनल फार्मूला जब लोकसभा में पारित हो गया तो हिन्दी प्रेमी जनता को बड़ी चिन्ता हुई। रीजनल बनाने के लिये हिन्दी तथा पंजाबी इलाकों की पहचान के परिसीमन की आवश्यकता नये सिरे से महसूस हुई। पण्डित गोविन्द वल्लभ पन्त के निर्देशानुसार इन क्षेत्रों की पहचान के लिए प्रताप सिंह कैरों, ज्ञानी करतार सिंह, पंजाबी हिन्दुओं के प्रतिनिधि के रूप में प्रताप समाचार पत्र के संपादक वीरेन्द्र, हरियाणा की ओर से प्रोफेसर शेर सिंह, चै0 देवीलाल और पण्डित मौलीचन्द्र शर्मा की उपसमिति बनाई गई।

           इस उपसमिति ने अपनी सिफारिश में कहा कि अबोहर फाजिल्का के 105 गांव हिन्दी क्षेत्र में होने चाहिएँ। इस प्रकार रीजनल फार्मूला हिन्दी भाषियों के लिये चुनौती बनकर आया। हरियाणा के लोगों की जुबान पर पंजाबी को जबरन थोंप दिया गया। जनता ने आर्यसमाज के नेतृत्व में आंदोलन व प्रदर्शनों से अपना रोष प्रकट किया परन्तु पंजाब सरकार मानने वाली नहीं थी। इस स्थिति का मुकाबला करने के लिये 1956 में जालंधर के साईदास काॅलेज में पंजाब भर के आर्य नेताओं की बैठक हुई थी। इस बैठक में स्वामी आत्मानन्द जी प्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, आनन्द स्वामी, आचार्य भगवान देव, जगदेव सिंह सिंद्धान्ती, आचार्य रामदेव, यश संपादक मिलाप अखबार, वीरेन्द्र संपादक प्रताप, लाला जगत नारायण संपादक हिन्द केसरी, प्रिसिंपल सूरजभान, प्रिंसिपल भगवान दास, कैप्टन केशवचन्द्र तथा नारायण दास ग्रोवर आदि नेताओं ने भाग लिया। यहीं पर हिन्दी रक्षा समिति का स्वामी आत्मानन्द की अध्यक्षता में गठन हुआ तथा प्रिंसिपल सूरजभान तथा जगदेव सिंह सिद्धांती को उपप्रधान व मंत्री बनाया गया।

           हिन्दी रक्षा समिति का शिष्टमंडल प्रताप सिंह कैरों से मिला, परन्तु वहाँ से कोरे आश्वासन ही मिले। प्रताप सिंह कैरों अपने वचनों से फिरते रहे। सन् 1957 के चुनाव के समय कैरों ने आंदोलन खत्म करने की अपील की तथा उसके बाद हिन्दी भाषियों के ऊपर से पंजाबी भाषा की जबरदस्ती हटाने का आश्वासन दिया परन्तु पुनः मुख्यमंत्री बनने पर पंजाबी हटाने से स्पष्ट इन्कार कर दिया गया। केैरों की वादाखिलाफी से प्रोफेसर शेरसिंह को भारी धक्का लगा क्योंकि उन्हीं के कहने से आर्यसमाज ने हिन्दी आंदोलन स्थगित किया था। जब सरकार रास्ते पर आती नहीं दिखाई दी तो सन् 1957 के अप्रैल महीने में आंदोलन का बिगुल बजा दिया गया। मई मास में आंदोलन के रास्ते से हटने के लिये तरह-2 के प्रलोभन दिये गये। पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल सीएन सिंह ने उन्हें कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का उपकुलपति बनाने का प्रस्ताव किया परन्तु प्रोफेसर शेरसिंह ने वाइस चांसलर के पद को हिन्दी भाषा के आगे बिल्कुल गौण माना तथा हिन्दी आंदोलन में कूदने का संकल्प राज्यपाल के समक्ष पुनः दोहराया।

           हिन्दी आंदोलन के बढ़िया तौर-तरीकों के कारण इसका द्दरातल राष्ट्रीय स्तर पर विस्तृत होता जा रहा था। आंदोलन में जनसंघ, हिन्दू महासभा, कांग्रेसी कार्यकर्ताओं तथा नेताओं ने राजनैतिक सीमा लांघकर भाग लेना शुरू कर दिया। कैरों ने तत्कालीन कांग्रेसी विधायकांे पर दबाव बनाने के लिये केन्द्रीय कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई को बुलाया। मोरारजी भाई ने पंजाब के तत्कालीन विधायकों की बैठक चण्डीगढ़ में बुलाई तथा प्रताप सिंह कैरों का साथ देने की अपील की। उस बैठक में प्रोफेसर शेरसिंह ने आंदोलन को समय की जरूरत बताते हुये कहा था कि कांग्रेस पार्टी के संविधान में द्विभाषी राज्यों की भाषा नीति नहीं है।

           बैठक में पंजाबी के विरोधी होने से इंकार किया गया, पर पंजाबी को जबरन थोंपे जाने को नाकाबिले बर्दाश्त कहा गया। प्रोफेसर शेरसिंह ने बंबई की मिसाल पेश करते हुये कहा कि बंबई व पंजाब दो द्विभाषी राज्य हैं, परन्तु मुम्बई में मराठी व गुजराती दोनों को समान महत्व दिया जाता है। इस पर मोरारजी देसाई को निरुत्तर होना पड़ा था।
          हिन्दी आन्दोलन में फिरोजपुर जेल में हिन्दी सत्याग्रहियों पर लाठी चार्ज हुआ। इस सुनियोजित वारदात में सुमेरसिंह का स्वर्गवास हो गया। फिरोजपुर जेल में पंजाब के कैदियों से हिन्दी सत्याग्रहियों पर कातिलाना हमला करवाया गया था। इस घटना से समूचे भारतवर्ष के हिन्दी प्रेमियों का कलेजा हिल गया। इसका रोहतक की जनता पर जादुई प्रभाव पड़ा। सरकार ने हिन्दी आंदोलन में अगुआ नेताओं के गिरफ्तारी वारंट जारी करवा दिये। रोहतक के पं0 श्रीराम शर्मा तथा उदय सिंह मान को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रोफेसर शेरसिंह के गिरफ्तारी वांरट जारी किये गये। प्रोफेसर शेर सिंह ने गिरफ्तारी के लिये पुलिस को भी इत्तला दे दी थी परन्तु सरकार ने आंदोलन के उग्र होने के भय से उनकी गिरफ्तारी नहीं की।

          उस समय दयानन्द मठ रोहतक हिन्दी आंदोलन के सत्याग्रह का प्रमुख केन्द्र था। बहु अकबरपुर गांव तो पुलिस छावनी बना रहता था। रोहतक जिले के गांवों में तो सरकार का शासन न होकर दयानन्द मठ रोहतक से जनता आदेश लेकर अपना कार्य करती थी। हिन्दी सत्याग्रह के व्यापक स्वरूप को देखते हुये कांग्रेस सरकार भयभीत हो गई। अतः पुरुषोत्तम दास टंडन ने केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में हस्तक्षेप करके समझौता कराने का प्रयास किया लेकिन जब वार्ता सिरे नहीं चढ़ी तो प्रोफेसर शेरसिंह के गिरफ्तारी वारंट पुनः जारी हो गये। वे दिल्ली चले गये। अब उन्होंने भी पुलिस के साथ आंखमिचैली का खेल छोड़ करके गिरफ्तारी देने के फैसले को ही उचित समझा। अतः उन्होंने 15 नवम्बर 1957 को सत्याग्रह करके गिरफ्तारी देने की घोषणा की। वे वेश बदलकर दीवान हाल में पहुंच गये तथा हजारों हिन्दी सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तारी दी। शेरसिंह की रहनुमाई में गिरफ्तार हुये सत्याग्रहियों को नाभा जेल भेज दिया गया। नाभा जेल में पहले से ही उदय मान सिंह अपने साथियों सहित गिरफ्तार थे। प्रोफेसर शेर सिंह को नाभा से पटियाला जेल में लाया गया। यहाँ पर पहले से ही वीरेन्द्र (संपादक प्रताप), पं0 श्रीराम शर्मा, लाला जगतनारायण, चै0 बदलूराम, स्वामी रामेश्वरानन्द, स्वामी भीष्म तथा महाशय भरतसिंह आदि बंद थे।
 इस आंदोलन में हरियाणा के आचार्य भगवानदेव ने बड़े सुनियोजित ढंग से काम किया। इन्हें इस आंदोलन का फील्ड मार्शल कहा जाता था। उन्होंने वैद्य बलवंत सिंह के साथ मोटरसाईकिल पर सवार होकर गांव -2 पहुंचकर सत्याग्रहियों के जत्थे तैयार किये तथा हिन्दी सत्याग्रह को त्वरित गति देने में अहम भूमिका अदा की। गुरुकुल झज्जर व गुरुकुल नरेला की कुड़की के भी आदेश हो गये थे।
 इस आंदोलन में सत्याग्रहियों ने घर-बार, मठ-मंदिर, खेत-खलिहान, गुरुकुल व गोकुल छोड़कर जेलों और जंगलों में कष्ट उठाये थे। उनके घर, भूमि, भैंस और बैलों की कुर्की के आदेश हुये थे। इस सत्याग्रह से लगभग 50000 सत्याग्रहियों ने कैरों की जेलों को भर दिया था। सत्याग्रहियों ने शारीरिक रूप से भयंकर यातनायें सहीं और लाखों रूपये जुर्माने के भी भरने पड़े। अंत में पंजाब सरकार को घुटने टेककर सत्याग्रहियों की मांग माननी पड़ी।
     प्रोफेसर शेर सिंह के नेतृत्व में हरियाणा लोक समिति पार्टी बनाई गई ताकि हिन्दी भाषा की लडाई जीतने के बाद हरियाणा बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाये रहे। सन् 1965 ई0 में रोहतक रैली में मुख्य अतिथि के रूप में कृपलानी जी ने शिरकत की थी। केन्द्र सरकार पर पूर्ण शिकंजा कसने के लिये चण्डीगढ़ में संयुक्त विधायक दल की बैठक बुलाई गई, जिसमें सभी विद्दायकों ने हरियाणा निर्माण के लिये सामूहिक इस्तीफे का प्रस्ताव पास किया, इस दबाव के कारण चण्डीगढ़ पंजाब को न देकर केन्द्र शासित प्रदेश ही रखा गया। इस आंदोलन की बैसाखियों पर प्रथम नवम्बर 1966 को हरियाणा राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।
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आर्यवीर भाई बंशीलाल जी


आर्यसमाज के महाधन 
आर्यवीर भाई बंशीलाल जी

पुस्तक :-  आर्यसमाज के बलिदान 
लेखक :- स्वामी ओमानन्द जी महाराज 
प्रस्तुति :- अमित सिवाहा 

            जिस समय हैदराबाद स्टेट में यवनराज्य का अत्याचार चरम सीमा पर था और वैदिक धर्म अपना अस्तित्व गवां रहा था उसी समय जिला बीदर के माणिकनगर नामक ग्राम में ब्राह्मण घराने में आपने जन्म लिया था। आपके पूज्य पिता जी का नाम भोलाप्रसाद व माता जी का नाम छट्टोबाई था। आपके एक भाई जिसका नाम श्यामलाल जी वकील तथा तीन बहनें थी। आप बाल्यकाल में अत्यन्त चञ्चल प्रकृति के थे। कहा जाता है ९मास में आप दौड़ने चलने लग गये थे। आप को पांच छः वर्ष को अवस्था में पढ़ने भेज दिया। आपने अपनी श्रेणी में कभी अनुत्तीर्ण होना न सीखा। श्राप के पिता जी कट्टर पौराणिक व पुजारी थे अतः आपको कभी कभी पूजा के लिये भेज दिया करते। परन्तु आप वहां मूर्ति पर चढ़ा हुआ नैवेद्य खाकर चले आते। आप की १५ वर्ष की आयु में पिता जी संसार से चल बसे। उनके कारण पढ़ाई में भी विघ्न आया किन्तु आपने साहस न छोड़ा। आप स्वयं भोजनादि पकाते रहे और घोर परिश्रम से वकालत पास की। वकील बनने से पूर्व ही पक्के आर्य व वैदिक धर्मी हो गये थे। 

        वकील होने के पश्चात् आर्यसमाज के प्रचार में जुट गये और स्थान - स्थान पर जाकर सत्यार्थ प्रकाश की कथा व व्याख्यानादि करने लगे। आप का २५ वर्ष की आयु में विवाह सम्पन्न हुआ। यह संस्कार आपने स्वयं वैदिक रीति से ही किया था। आपने स्थान स्थान पर उत्सवादि कराने प्रारम्भ कर दिये। आपकी माता जी आपको कहा करती थी , आप उपदेश कर जनता की सेवा करें , मैं कार्य कर जनता की सेवा करती हूँ। उत्सवों पर आपकी माता भोजनादि की व्यवस्था में सहयोगी देती थी। आपने अपनी माता जी को भी ४० वर्ष की आयु में पढ़ना सिखाया। माता जी के संसार से चल बसने पर अपनी पनपती हुई वकालत को , जो कि हाईकोर्ट की थी , तिलाञ्जलि दे दी। 

           आपने वकालत में कभी पराजय का मुख न देखा। अपने समय में आप वकीलों के सिरमोर थे। वकालत के बाद आप सर्वप्रयत्न से समाज के प्रचार में जुट गये। हैदराबाद से निकलने वाले ' वैदिक सन्देश ' के प्रकाशक भी रहे। आपको प्रचार को कितनी लगन थी यह निम्न उदाहरण से स्पष्ट हो जाती है। एक बार नीलंगा नामक ग्राम में आर्यसमाज के अन्दर जाकर एक सरकारी अधिकारी ने हवनकुण्ड को लात मारी और चारदीवारी आदि गिराकर समाज को मिटाने का असफल प्रयत्न किया। इसकी सूचना जब आपको मिली तब तत्काल वहां जाकर प्रतिज्ञा की कि जिस ने इसका अपमान किया है उसके धन से दुबारा बनवाकर इसमें यज्ञ करके यहां से जाऊंगा। इधर घर से तार आया कि आपकी पुत्री हैजे से आक्रान्त है। परन्तु आपने अपनी पुत्री की परवाह न की और उत्तर दिया मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी किये बिना यहाँ से नहीं आसकता। 

 
          आपने सरकार में अभियोग चलाया और उस में सफलता प्राप्त की। जिस अधिकारी ने यह कुकृत्य किया था उसके धन से आर्यसमाज व यज्ञवेदी बनवाकर उसमें यज्ञ करके ही लौटे। हैदराबाद राज्य में जहाँ कहीं धार्मिक कृत्यों पर पाबन्दी होती वहां जाकर आप उस कार्य को बड़ी शान से करवाते थे।

            राज्य में जहाँ उत्सव होता था वहाँ शंकासमाधान करने में आप अद्वितीय थे। आपने अनेक स्थानों पर शास्त्रार्थ भी किये थे। उदाहरणार्थ एक मनोरंजक व विचित्र से शास्त्रार्थ का दिग्दर्शन कराता हूं। एक दिन एक विद्वान् लिङ्गायती संन्यासी पधारे। आप भी अपने कुछ साथियों के साथ वहां पर जा धमके। कुछ देर तक वेदविषय पर शास्त्रार्थ होता रहा। अन्त में वह संन्यासी निरुत्तर व क्रोधित होकर कहने लगा- " क्या वेद में सब कुछ है ' ' आपने बलपूर्वक कहा " हाँ "। इस उत्तर को सुनकर साथियों का दम घुटने लगा और आपस में कानाफूसी करते हुए कहने लगे कि वेद में सब कुछ कहां है। एक ने आपके कान में भी कहा कि पण्डित जी आप अपने उत्तर को वापिस ले लें। परन्तु यह दयानन्द का अनन्यभक्त अपने वाक्य को वापिस किस प्रकार लेता। और बलपूर्वक कहा कि वेद में सब कुछ है। तब संन्यासी ने कहा तुम यहां बैठे हो यह वेद में है। आपने उत्तर हाँ में दिया। आपके साथी और भी घबरा गये। परन्तु आप में वेद की अगाध श्रद्धा व भक्ति थी। आपने कहा मैं यहां बैठा हूं यह वेद में है। संन्यासी ने कहा - कैसे ? आपने उत्तर में प्रश्न किया - क्या यह ठीक है मैं यहां बैठा हूं ? उसने उत्तर दिया हां सत्य है। तब आपने कहा कि सत्य को मानना ही वेदों में लिखा है। संन्यासी उत्तर पाकर नतमस्तक हो गया। इस प्रकार के अनेक शास्त्रार्थों में अपने विरोधियों से विजय प्राप्त की।

           जब आप कार्यक्षेत्र में उतरे थे उस समय केवल हैदराबाद में दो समाजें थीं। आपने अपने जीवन काल में अपने परिश्रम से ५०० समाजें स्थापित कीं। इनको एकसूत्र में बांधने के लिये एक प्रतिनिधि सभा की भी स्थापना की। जिसके प्रधान श्री केशवराम जी हाईकोर्ट के जज , और आप महामन्त्री बन गये थे। आदि में केवल तीन उपदेशक नियुक्त किये गये थे। प्रचार कार्य बढ़ता ही गया। परन्तु उपदेशकों को दक्षिणा देने के लिये धन न था। वास्तव में प्रार्यसमाज से प्रेम की परीक्षा का यही समय था। वीर ! धन्य है उस माता को जिसने तुझे जन्म दिया। आपने अपनी धर्मपत्नी की बनारसी साड़ियां बेचकर भी धन की कमी देख आभूषण गिरवी रखकर उपदेशकों का वेतन पूरा किया। इसे ही तो कहते है घर फूक तमाशा। आपके अन्दर एकमात्र धर्मप्रचार की ज्वाला जल रही थी। उसको शान्त करने के लिये ही यह आपका त्याग था। 

           आपने तीन वर्ष तक निशुल्क सभा की सेवा की। मित्र की सहायता से घर का कार्य चलता था। आप दोनों भाई तथा साथ में विनायकराव जी भी होते थे। कभी - कभी हंसी में कहते , राम - लक्ष्मण के बीच में हनुमान भी विद्यमान है। निजाम की नादिरशाही दिन प्रतिदिन बढती हुई देख आपने शिरोमणी सार्वेदेशिक सभा का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराया किन्तु आपको वहां से कोई विशेष सहायता न मिली। आपने अपने कौशल के बल पर सत्याग्रह प्रारम्भ कर दिया। आपके सहयोग के लिये महात्मा स्वामी नारायण तथा स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी आगये। आपको जेल जाने का अवसर नहीं दिया गया। इस कारण विरोधियों की ओर से आवाज आई - भाई बन्शीलाल बाहर क्यों ? जेल में क्यों नहीं जाते।

           इधर जब आप जेल जाने की आज्ञा मांगते तो स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी कहते कि आपके जेल जाते ही हम सत्याग्रह बन्द कर देंगे। विवश होकर आपको लोकापवाद सुनना पड़ा। सत्याग्रह विजय का अधिक श्रेय आपको ही है। सत्याग्रह विजय के बाद आप का जगह - जगह बुलावा होता और भव्य स्वागत होता था। आपके घर की दयनीय दशा देखकर नारायण स्वामी जी ने १०० ) रुपये की सहायता दी। परन्तु आपने इस धन को एकत्रित करके सभा के लिये एक प्रेस लेकर दिया। यह है निःस्वार्थ प्रचार का ज्वलन्त उदाहरण। आप के इस प्रकार के प्रचारकार्य को देखकर सरकारी कर्मचारी व विशेषतया यवन आप से जलने लगे। यहां तक कि आपको मारने का भी षड्यन्त्र रचा गया। एक दिन एक यवन वेष परिवर्तन कर आपके घर आया और कहने लगा मुझे धर्मोपदेश दो। आपने अतिथि सत्कार की दृष्टि से भोजनादि कराया। इतने में आपका मित्र आया उसको इस पर सन्देह होगया। उसने इससे नाम इत्यादि पूछा , जब जाति पूछी तब उत्तर में उसके मुख से अचानक मुसलमान निकल गया। तभी उसे घर से बाहर कर दिया। इस प्रकार आप बच गये। 

           आप में साहस भी कमाल का था। एक बार आर्यसमाज लातूर का उत्सव हो रहा था। दो दिन तो आनन्द से बीत गये। तीसरे दिन कुछ अधिकारी व यवनों ने आर्यसमाज पर धावा बोल दिया। आर्यसमाज बन्द कर दिया जिससे कि कोई अन्दर न आ सके। परन्तु वह नीच दीवारों पर चढ़ गये। इधर स्त्री जाति में भय के मारे कोलाहल मच गया। आपने स्त्रियों को आश्वासन दिया कि जब तक में हूं आप का बाल बांका न होगा। आपने अपनी पिस्तौल से एक अधिकारी को गोली मार दी। वह नीचे गिर पड़ा। फिर क्या था सबके सब गीदड़ की भांति भाग गये। जहां आप स्वयं पुरुषों में प्रचार करते थे वहां अपनी धर्मपत्नी को स्त्रियों में प्रचार करने के लिए तैयार किया। 

         अमरग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की शिक्षा पद्धति को पढ़कर आपके मन में गुरुकुल खोलने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई। अत: आपने अमर शहीद भाई श्यामलाल जी की पुण्य स्मृति में श्यामार्य गुरुकुल की स्थापना सं० १९९९ विजयादशमी तदनुसार १९४२ ई० में की। यह गुरुकुल परिस्थितियों के वशीभूत होकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवर्तित होता रहता था। अन्त में बार्शी शोलापुर में स्थिर हुआ। गुरुकुल का सारा भार आप पर ही था। गुरुकुल की कोई सभा न थी। कुछ दिन बाद श्री आचार्य भगवानदेव जी एवं प्राचार्य राजेन्द्रनाथ शास्त्री जी से आपका सम्पर्क हुआ। तब ही से यह कुल दयानन्द वेदविद्यालय की शाखारूप में चल रहा था। अध्यापन कार्य श्री रुद्रदेव जी व्याकरण शास्त्री कर रहे थे। अन्त समय में इन पंक्तियों के लेखक को भो आठ मास इस गुरुकुल में रहने का होभाग्य प्राप्त हुआ था। सन् ४८ में हैदराबाद की परिस्थितियां बहुत खराब थीं। अतः आपने दिल्ली आकर भारत के गृहमन्त्री लोहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल से मिलकर हैदराबाद की स्थिति का छान करवाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सारा मन्त्रिमण्डल विरोध में होते हुए भी लोहपुरुष ने पुलिस कार्यवाही कर हैदराबाद का भाग्य खोल दिया। परन्तु दुःख से लिखना पड़ता है कि उस स्वर्ग मान दिन के आने से पूर्व ही आप इस संसार से चल बसे। आप का जीवन प्रार्यसमाज के प्रचार और आर्ष शिक्षापद्धति के प्रसार के लिये बलिदान के रूप में पूरा होगया। वृद्ध अवस्था में आपने भी अष्टध्यायो पढ़नी प्रारम्भ की थी , आर्षग्रन्थों से आपको विशेष प्रेम था।

Sunday, June 6, 2021

ज्योतिष पर पौराणिक गुटर-गूँ


ज्योतिष पर पौराणिक गुटर-गूँ

-प्रियांशु सेठ (वाराणसी)

प्रसिद्ध योगगुरु बाबा रामदेव ने बयान दिया कि "ज्योतिष विद्या ने क्यों नहीं कोरोना काल के बारे में पहले जानकारी दी। सारे मुहूर्त भगवान ने बना रखे हैं। ज्योतिषी काल, घड़ी, मुहूर्त के नाम पर बहकाते रहते हैं। बैठे-बैठे ही किस्मत बनाते हैं। किसी ज्योतिष ने यह नहीं बताया कि कोरोना आने वाला है।..."
बाबा रामदेव के इस बयान से पौराणिक मण्डल में खलबली मच गई। एक ओर वैदिक एजुकेशनल रिसर्च सोसायटी के संस्थापक पं० शिवपूजन शास्त्री ने बाबा रामदेव को शास्त्रार्थ की चुनौती दे दी। दूसरी ओर काशी विद्वत परिषद के महामन्त्री डॉ० रामनारायण द्विवेदी ने कहा कि बाबा रामदेव अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं।

दरअसल पौराणिक मण्डल ने कभी ज्योतिष के यथार्थ स्वरूप को समझा ही नहीं। अनार्ष ग्रन्थों को पढ़कर उसने फलित ज्योतिष की भ्रामक अवधारणाओं को स्थापित किया और पूरे मनुष्य समाज को कर्महीन तथा फल मात्र का उपासक बना दिया। आधुनिक युग के सुविख्यात समाज सुधारक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ "सत्यार्थप्रकाश" में फलित ज्योतिष पर कुछ ऐसे विचार प्रकट किए जिसके सामने फलित ज्योतिष की समस्त अवधारणाएं धराशायी हो गईं।[i]

इसमें कोई सन्देह नहीं कि ज्योतिष का प्रतिपादन वेद से है। वेद के अनुसार ज्योतिष के अधिकार क्षेत्र में- बीजगणित, अंकगणित, खगोल विद्या (Astronomy), मौसम विज्ञान (Meteorology) और भूगर्भ विज्ञान (Geology) आते हैं। इस वैज्ञानिक ज्योतिष विद्या को यजुर्वेद २२/२८ में इस प्रकार स्थापित किया है-
नक्षत्र, उपग्रह, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतुएं, ऋतु-जन्य परिवर्तन, संवत्सर, द्यौ, अन्तरिक्ष, पृथिवी, चन्द्रमा, सूर्य, रश्मियाँ, ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, मरुत (१० प्राण, वायु, पवनादि) का उत्तम और यज्ञीय सुष्ठु क्रियाओं द्वारा सम्प्रयोग, जिससे विश्व के देव-देवियों (आप्त स्त्री-पुरुषों), मूल और शाखाओं, वनस्पतियों, फूलों, फलों और औषधियों के गुणों में वृद्धि हो तथा वे शुद्ध, पवित्र और यज्ञीय (श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी) सुहुत हों।[ii]

यहां फलित ग्रह, नक्षत्र, जन्मपत्र, राशि, मुहूर्त, शकुन, अपशकुन जैसी अवैदिक क्रिया का कोई विधान नहीं है; जैसा कि पौराणिक मण्डल समझता रहा है। अब वेदों में खगोलीय, मौसमी और भूगर्भीय विद्या का वर्णन पढ़िए-

•'एता उ त्या उषस: केतुमक्रत पूर्वे अर्धे रजसो भानुमञ्जते।' -ऋ० १/९२/१
अर्थात् जब उषायें (या उषा रश्मियां) अरुण वर्ण (लाल रंग) के प्रकाश का क्षेपण करती हैं, तब ये पृथ्वी के पूर्वी आधे भाग और ग्रहों का निर्माण करती हैं। प्रकाश शब्द से यहां दिन के प्रकाश से अर्थ है। ऐसा तभी सम्भव होता है जब पृथ्वी गोल हो।[iii]
वेद ने यहां स्पष्ट रूप से पृथ्वी की गोलाकार आकृति को प्रतिपादित किया है। प्रसिद्ध ज्योतिषी आर्यभट्ट ने भी वेद के उपर्युक्त कथन का समर्थन किया है-
भूग्रहमाना गोलार्धानि स्वछाययानि वर्णानि।
अर्धानि यथा सारं सूर्याभिमुखानि दीव्यते।। -आर्यभट्ट ४/५
यह पृथ्वी गोल है अतः प्रत्येक मनुष्य स्वयं यह सोचता है कि वह स्वयं ऊपर की ओर है और पृथ्वी के दूसरी ओर का भाग मानो उसके अधीन है।

•पृथिवी एक वर्ष (३६५-३६६ दिनों) में प्रत्येक राशि से सीधी गुजरती हुई अपने पूर्व स्थान पर आती है। इसी वर्ष को सूर्य की गति के आधार पर यजुर्वेद ने १२ मास और ६ ऋतुओं में प्रतिपादित किया है-
१. बसन्त (ऋतु) - मधु, माधव (मास) - यजुर्वेद १३/२५
२. ग्रीष्म (ऋतु) - शुक्र, शुचि (मास) - यजुर्वेद १४/६
३. वर्षा (ऋतु) - नभ, नभस्य - यजुर्वेद १४/१५
४. शरद् (ऋतु) - इष, ऊर्ज - यजुर्वेद १४/१६
५. हेमन्त (ऋतु) - सह, सहस्य - यजुर्वेद १४/२७
६. शिशिर (ऋतु) - तप, तपस्य - यजुर्वेद १५/५७

•अहोरात्रे पृथिवी नो दुहाताम्। -अथर्ववेद १२/१/३६
अर्थात् वायु की गैसों का प्रवाह पृथ्वी को भ्रमण कराता है।
यहां स्पष्टतः वात सूत्र और सूर्य सिद्धान्त के परिधि मण्डन का वर्णन है।

•तिस्रो भूमीरूपरा: षड्विधाना:। -ऋग्वेद ७/८७/५
यहां पृथ्वी के छ: महाद्वीपों की ओर संकेत किया गया है। ये ही छ: महाद्वीप महाभाष्य व्याकरण १/११/११ में सात महाप्रदेश (द्वीप) हैं। १. जम्बू २. प्लक्ष ३. शाल्मल ४. कुश ५. क्रौंच ६. शोक और सातवां पुष्कर।

फलित ज्योतिष के पाखण्ड पर कट्टर पौराणिक विद्वानों की सम्मति-
१. सुप्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलविद जनार्दन जोशी ने अपनी पुस्तक "ज्योतिष चमत्कार" (पृष्ठ १६१; लक्ष्मी नारायण प्रेस, मुरादाबाद; प्रथम संस्करण) में फलित ज्योतिष पर बनारस के प्रसिद्ध ज्योतिषी पं० सुधाकर द्विवेदी का २२ मई, १९०६ को लिखा एक पत्र उद्धृत किया है, जो संलग्न है-

"I have belief in astrology. I regard it as mere play as it has been written in the Vishva Gunadarsh that astrologers rob the people of their money by means of verbal jugglery."
अर्थात्- मेरा विश्वास फलित ज्योतिष में नहीं है। मैं इसे एक प्रकार का खेल समझता हूं। जैसे कि विश्वगुणादर्श में लिखा है कि ज्योतिषी लोग अपने वाग्जाल से लोगों का धन व्यर्थ लूटा करते हैं।

२. पौराणिक विद्वान् विद्यासागर, तपोमूर्ति आचार्य श्रीराम शर्मा के आश्रम में ज्योतिष पर गूढ़ अनुसन्धान के बाद यह निष्कर्ष निकला-
"गणित और फलित ज्योतिष में बहुत दिनों से विवाद चल रहा है पर ग्रहगणित वस्तुतः विज्ञानसम्मत एक पूर्ण विद्या है। उसके साथ फलित ज्योतिष का जंजाल जुड़ जाने से यह असमंजस उठ खड़ा हुआ है।...
मुहूर्त जनमानस में गहराई से घुसे हैं। मुहूर्तवाद ने इतना अनर्थ किया है और कर रहा है कि उससे हुई हानियों को गिना नहीं जा सकता।" -ब्रह्मवर्चस् पंचांग की भूमिका

३. श्री सीताराम झा अपने गीतापंचांग में फलित ज्योतिष पर लिखते हैं-
"मैं पंचांग में राशिफल नहीं लिखता क्योंकि वह अनुचित है।... एक राशि में कई करोड़ लोग होते हैं, उनकी स्थितियां भिन्न-भिन्न होती हैं और जन्मपत्रियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं तो फिर राशिफल कैसे लिखा जा एकता है और वह सत्य क्यों हो सकता है?..."

४. बनारस के सुप्रसिद्ध पौराणिक और प्रकाण्ड ज्योतिष विद्वान् आचार्य हरिहर पाण्डेय की एक पुस्तक है- "हमारा ज्योतिष और धर्मशास्त्र"।[iv] इस पुस्तक में आचार्य हरिहर ने फलित ज्योतिष की धज्जियां उड़ा कर रख दी है। आजतक कोई ज्योतिषाचार्य इस पुस्तक का खण्डन न कर सका। हम उस पुस्तक से एक स्थल का वाक्य उद्धृत करते हैं-
"महर्षि दयानन्द ने बहुत सोच समझ कर और परमात्मा की कृपा प्राप्त कर पृथ्वी को चला कहा, सूर्य और पूरे सौर परिवार को गतिमान कहा, गणित और वैज्ञानिक ज्योतिष को ग्राह्य कहा, फलित ज्योतिष्ज्ञ के दोषों की व्याख्या की, पाश्चात्य ज्ञान का अन्धानुकरण नहीं किया, अंग्रेजों के दुःस्वार्थ और अनाचार को तथा पाश्चात्य संस्कृति के दोषों को पहचाना, उनसे घृणा की और उन्हें यहां से हटाने की प्रेरणा दी। श्रीमती ऐनी बेसेंट ने लिखा है कि स्वामी दयानन्द वह प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होंने कहा कि भारत भारतीयों का है।..." -हमारा ज्योतिष और धर्मशास्त्र; पृष्ठ सं० २८०; द्वितीय संस्करण; सन् २००६ में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

५. F.W. Westaway ने फलित ज्योतिष की ठठोली निम्न शब्दों में की है-
"The gods are always especially favourable to those who pay the astrologer a handsome fee". -Obsessions and Convictions of the Human Intellect; Pg. 4
अर्थात्- भगवान् विशेष रूप से उन लोगों के लिए हमेशा अनुकूल होते हैं जो ज्योतिषी को एक सुन्दर शुल्क का भुगतान करता है।

फलित ज्योतिष पर पौराणिक मण्डली से ५ सामान्य प्रश्न-

प्रश्न १. पौराणिक पण्डित ग्रह आदि पूजा कराकर ग्रह-दोषों को शान्त कराते हैं। इसके बावजूद खगोलीय घटना सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण आदि से बहुत डरते हैं। क्या वो उन्हें शान्त नहीं करा सकते? यदि राहु, केतु आदि को पोप-पण्डे नियन्त्रित कर सकते हैं तो उन्हें देशद्रोहियों पर क्यूँ नहीं बिठाते?

प्रश्न २. आगामी प्राकृतिक आपदा से होने वाली हानियों की सूची क्या विश्व का कोई ज्योतिषी दे सकता है?

प्रश्न ३. एक ही राशि लाखों व्यक्ति की होती है। क्या उस राशि का फल सभी व्यक्तियों पर घटित होता है? यदि नहीं तो राशिफल झूठा है।

प्रश्न ४. क्या विश्व का कोई भी ज्योतिषी हस्तरेखा, मस्तकरेखा, तालुरेखा आदि देखकर किसी जानवर का भविष्य बतला सकता हैं?

प्रश्न ५. रामायण के अनुसार श्रीराम को राजगद्दी पर बैठाने का मुहूर्त वशिष्ठ ऋषि ने निकाला था। यदि शुभाऽशुभ मुहूर्त सत्य होता तो श्रीराम को चौदह वर्ष के लिये वन में क्यों भटकना पड़ा? दशरथ की पुत्र वियोग में मृत्यु क्यों हो गई? तीनों रानियां विधवा हो गयीं। सीता का हरण हुआ। अतः वशिष्ठ की शुभ मुहूर्त शुभकार्य हेतु व्यर्थ गया।

ज्योतिषों का दावा है कि वह भविष्य देखते हैं, लेकिन वह खुद का भविष्य तक नहीं बता पाते। अतः सिद्ध है कि पौराणिक ज्योतिषी कर्महीनता और ठगी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। फलित ज्योतिष, मुहूर्त शास्त्र, ग्रह-नक्षत्र की पूजा, शकुन-अपशकुन, राशिफल, जन्मपत्री आदि जाली हैं।

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[i] सत्यार्थप्रकाश, एकादश समुलास
[ii] ज्योतिष कितनी सच्ची? कितनी झूठी; लेखक- महात्मा गोपाल स्वामी सरस्वती (वैदिक मिशनरी); मातुश्री धनदेवी, केशवराम धर्मार्थ वैदिक ट्रस्ट "धन कुटीर", बरेली से प्रकाशित; पृष्ठ ३
[iii] मासिक पत्रिका सत्यार्थ सौरभ के जून २०१९ का लेख "वेद, वैदिक और भारतीय साहित्य में पृथ्वी"
[iv] इस पुस्तक का प्रथम संस्करण सन् १९८९ में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा दया प्रकाश सिन्हा के निर्देशन में छपा था।