Tuesday, February 18, 2020

यजुर्वेद के पितर





यजुर्वेद के पितर

लेखक- प्रोफेसर विश्वनाथ विद्यालंकार, लाहौर भूतपूर्व वेदोपाध्याय गुरुकुल कांगड़ी
प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ

पंचमहायज्ञ प्रत्येक गृहस्थी को करने चाहियें- यह विधान मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में मिलता है। इन पञ्चमहायज्ञों में पितृयज्ञ भी है। पौराणिकों के मतानुसार पितृयज्ञ मृत-पितरों के सम्बंध में किया जाता है। परन्तु ऋषि दयानन्द का यह मन्तव्य है कि पितृयज्ञ का विधान जीवित पितरों के सम्बंध में है, नकि मृत पितरों के सम्बंध में। यजुर्वेद में पितरों का बहुत स्पष्ट रूप से वर्णन है। इस लिए इस लेख में "यजुर्वेद के पितरों" पर कुछ विचार किया जाएगा।

(१) पितर का अर्थ
'पितर' शब्द से केवल पिता-व्यक्तियों का अर्थात् केवल पुरुष-व्यक्तियों का ही ग्रहण नहीं होता, अपितु माता और पिता इन दोनों व्यक्तियों का अर्थात् पुरुष और स्त्री इन दोनों व्यक्तियों का ग्रहण होता है। व्याकरण की दृष्टि से पितृयज्ञ शब्द में "पितृ" शब्द का एक शेष मानना चाहिए। जैसे कि माता च पिता च = पितरौ; तथा मातरश्च पितरश्च = पितर:। इसलिए पितृयज्ञ का अर्थ हुआ "वह यज्ञ जो कि माता और पिता तथा इनके पूर्वजों के सम्बन्ध में किया जाय"।

(२) पितृयाण और पितर
पितरों के सम्बन्ध में "पितृयाण" शब्द का बहुत प्रयोग होता है। पितृयाण का अर्थ है "पितरों का याण", "पितरों का मार्ग" अर्थात् पितरों के जीवन का मार्ग। प्रश्नोपनिषद्, प्रथम प्रश्न ९वीं कण्डिका इस सम्बन्ध में निम्न प्रकार है-

"संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च। तद्दे ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते। त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते। एष ह वै रयिर्य: पितृयाण:।।"
अर्थात् "संवत्सर को प्रजापति कहते हैं। उस संवत्सर के दो अयन हैं। एक दक्षिण (अयन) और दूसरा उत्तर (अयन)। तो जो लोग इष्टकर्मों और + आपूर्त कर्मों को अपने कर्तव्यकर्म मानते हैं वे चन्द्रमा-सम्बन्धी लोक पर विजय पाते हैं। वे ही बार बार इस लोक की ओर आते हैं। इसलिए ये ऋषि जो कि प्रजा की कामना वाले हैं- वे दक्षिण मार्ग को (अपने जीवन मार्ग के रूप में) स्वीकार करते हैं। यह दक्षिण मार्ग ही रयि है, जिसे पितृयाण भी कहते हैं।"

इस उद्धरण में पितृयाण के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथन है-
(क) संवत्सर अर्थात् वर्ष प्रजापति है, प्रजाओं का पति है, रक्षक है।
(ख) संवत्सर के दो अयन होते हैं। एक दक्षिण अयन और दूसरा उत्तर अयन। संवत्सर इन दो अयनों के द्वारा प्रजाओं का पति अर्थात् रक्षक बना है। दक्षिण अयन शीत काल का समय है जबकि सूर्य दक्षिण की ओर अयन अर्थात् प्रयाण करता है, और उत्तर अयन ग्रीष्म काल का अयन है जबकि सूर्य उत्तर की ओर अयन अर्थात् प्रयाण करता है। संवत्सर अपने इन दोनों रूपों द्वारा प्रजाओं का पति बना हुआ है, प्रजाओं का रक्षक बना हुआ है। अर्थात् संवत्सर शीतकाल और ग्रीष्मकाल इन दो रूपों द्वारा प्रजाओं की रक्षा कर रहा है।
(ग) जो लोग "इष्ट" अर्थात् यज्ञयागों तथा होमादि कर्मों को अपना कर्तव्यकर्म समझते हैं, तथा साथ ही "आपूर्त्त" या "पूर्त्त" अर्थात् "सामाजिक उपकार के कर्मों को भी अपना कर्तव्य कर्म समझते हैं वे चन्द्रमालोक पर विजय पाते हैं।
(घ) इष्ट और आपूर्त कर्मों को अपने कर्तव्यकर्म समझने वाले लोग बार-बार गृहस्थ धर्म में आते हैं।
(ङ) ऋषि कोटि के लोग - प्रजा की कामना के कारण दक्षिण मार्ग को अपने जीवन का मार्ग मानते हैं और वे इस मार्ग पर चलते हैं।
(च) इस दक्षिण मार्ग को ही रयि भी कहते हैं और पितृयाण भी।
इन कथनों की व्याख्या यह है कि एक प्रकार के लोग तो वे होते हैं, जो कि ब्रह्मचर्य आश्रम समाप्त कर गृहस्थ धर्म में प्रवेश कर यज्ञ आदि कर्मों तथा नानाविध समाजोपकार कर्मों को करते हैं; तथा दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं जो कि ब्रह्मचर्याश्रम समाप्त कर सीधा संन्यासाश्रम में प्रवेश कर अध्यात्मचिन्तन में लगकर फिर संसार का उपकार करते हैं। इनमें से पहिले प्रकार के लोग "दक्षिणायन" मार्ग के अवलम्बी हैं, और दूसरे प्रकार के लोग उत्तरायण मार्ग के अवलम्बी हैं। संवत्सर जैसे अपने दोनों मार्गों द्वारा प्रजाओं की रक्षा करता है, केवल एक मार्ग से संवत्सर प्रजाओं की रक्षा नहीं कर सकता, इसी प्रकार मनुष्य समाज के दोनों प्रकार के व्यक्ति मिलकर ही दक्षिणायन मार्ग और उत्तरायण मार्ग का अवलम्बन कर समग्र प्रजाओं की रक्षा करते हैं, केवल एक मार्ग से अर्थात् केवल गृहस्थधर्म के मार्गों से या केवल आरम्भ से ही संन्यासधर्म के मार्ग से प्रजाओं की रक्षा नहीं हो सकती।
गृहस्थधर्मावलम्बी व्यक्तियों के जीवन मार्ग को "दक्षिण" मार्ग कहा गया है। संवत्सर का दक्षिण अयन ह्रास का अयन है। सूर्य दक्षिण दिशा में जाकर अपनी शक्ति और तेज की दृष्टि से ह्रास को प्राप्त होता है। परन्तु ह्रास को प्राप्त होकर शरत् काल में अन्नों तथा फल और फूलों और वनस्पतियों को उत्पन्न करता है। इसी प्रकार गृहस्थधर्मावलम्बी व्यक्ति गृहस्थमार्ग को प्राप्त कर अपनी शारीरिक शक्ति आदि का तो ह्रास करते हैं। परन्तु इस ह्रास के द्वारा वे संसार को नई-नई शक्तियों वाली नाना विध प्रजाओं, अर्थात् सन्तानों को देकर संसार का उपकार और भला करते हैं। बिना गृहस्थधर्म के कोई मनुष्य उत्पन्न ही नहीं हो सकता। मनुष्य कोटि के लोग भी गृहस्थधर्म के परिणाम हैं, ऋषि कोटि के लोग भी गृहस्थधर्म के परिणाम हैं, देव कोटि के लोग भी गृहस्थधर्म के परिणाम हैं। ज्ञानी, ध्यानी, विद्वान्, व्यापारी, योद्धा, देशभक्त, कलाकौशलविज्ञ, संन्यासी आदि सब व्यक्ति, गृहस्थधर्म के ही परिणाम हैं। इसलिए गृहस्थधर्म में अपनी शक्ति के ह्रास की उपेक्षा कर और इससे संसार की सत्ता और संसार के उपकार को लक्ष्य में स्थापित कर गृहस्थधर्म में प्रवेश करना चाहिए। गृहस्थधर्म का मार्ग इस ह्रास की दृष्टि से और उत्पादक की दृष्टि से दक्षिण है।

इसी प्रकार संवत्सर का उत्तर-अयन शक्ति का प्रतिनिधि है। सूर्य जब उत्तर-अयन की ओर गति करने लगता है तो इसकी शक्ति और तेज बढ़ने लगता है तो उत्तर-अयन की पूरी अवधि तक पहुंच कर सूर्य जून मास के तेज और प्रकाश से तपने और चमकने लगता है, इसका तेज शरीर को असह्य हो जाता है, प्रकाश आंखों को चुंधिया देता है। इस समय सूर्य अपने पूर्ण तेज में होता है। इस प्रकार उत्तर अयन - शक्ति संचार, शक्ति वृद्धि और शक्ति के पूर्ण यौवन का प्रतिनिधि है। यह मार्ग उन व्यक्तियों का मार्ग है जो कि ब्रह्मचर्य से ही संन्यास धर्म में चले जाते हैं और गृहस्थधर्म का अवलम्बन नहीं करते। यतिवर ऋषि दयानन्द उत्तर-अयन के व्यक्ति थे। ऐसे व्यक्तियों के बिना संसार में शक्ति और तेज का संचार नहीं होता। इस उत्तर-अयन के जीवनमार्ग का वर्णन किया जाएगा।

इसी प्रकार गृहस्थधर्मावलम्बी व्यक्तियों के जीवनमार्ग को "चन्द्रमस" कहा गया है और गृहों, शालाओं, कोठियों को चन्द्रमस लोक कहा गया है। गृहस्थों के रहने सहने के स्थान को भी "लोक" या "गृहस्थलोक" कहते हैं। विवाह हो चुकने पर पत्नी को अथर्ववेद ने "पतिलोक" में विराजने का अधिकार दिया है। पतिलोक वह स्थान है, घर है, जो कि पति का है, जहांकि पति रहता है। इसी पति लोक को चन्द्रमस लोक कहा गया है। चन्द्रमा स्पष्ट घटता, बढ़ता, नष्ट होता हुआ तथा उत्पन्न होता हुआ, पूर्णता में तथा पूर्णनाश रूप में दृष्टिगोचर होता है। पतिलोक में या गृहस्थधर्म में ये ही दृश्य दृष्टिगोचर होते रहते हैं। कोई रोग के कारण शक्ति की दृष्टि से घट रहा होता है, कोई स्वास्थ्य के कारण बढ़ रहा होता है, कोई संतान नष्ट हो जाती है, तो कोई उत्पन्न होती है, कई सन्तानों में पूर्णता दृष्टिगोचर होती है और कईयों का अमावस्या के चन्द्र की न्याय पूर्ण ह्रास दृष्टिगोचर होता है। इस साधर्म्य की दृष्टि से गृहस्थधर्म के जीवनमार्ग को "चन्द्रमस" कहा गया है और इसी दृष्टि के गृहस्थाश्रम को चन्द्रमस लोक कहा गया है। गृहस्थी यदि वेदोक्त संयम की विधि से गृहस्थ धर्म का पालन करें तो वे गृहस्थाश्रम पर विजय पा जाते हैं, नहीं तो वे गृहस्थी जो कि असंयमी हैं, विषयलोलुप हैं- वे गृहस्थ मार्ग में जाकर हार खा जाते हैं। उनके लिए जीना भी दूभर हो जाता है।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके वेदोक्त कर्मों को अपना कर्तव्य कर्म समझकर करना चाहिए। इन कर्मों में चित्त लगाकर श्रद्धा और भक्ति से कर्मों को करना चाहिए। जिन लोगों को गृहस्थाश्रम का धर्म रुचिकर है, जो कि गृहस्थाश्रम के कर्मों द्वारा अपने संस्कारों का संचय करते हैं ऐसे व्यक्ति अपने संस्कारों से प्रेरित होकर बार बार जन्म लेकर फिर गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर इस आश्रम द्वारा संसार का उपकार करते हैं। यह पुनरावर्त्तन है, अर्थात् गृहस्थधर्म में पुनः पुनः आना है।
परन्तु स्मरण रहे कि वेद ने इस सर्वोपकारी गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने का अधिकार केवल ऋषिकोटी के व्यक्तियों को दिया है। अनृषि गृहस्थी गृहस्थ की महिमा को गृहस्थ के उद्देश्य को नहीं समझ सकते। वे नहीं समझ सकते कि गृहस्थ धर्म का उद्देश्य है "प्रजोत्पादन" न कि भोग। प्रजोत्पादन का अभिप्राय है उत्तम सन्तानों को पैदा करना। अनृषियों की सन्तानें भोगवासना का परिणाम होती हैं, और ऋषियों की सन्तानें दिव्य भावनाओं का परिणाम होती हैं। ऊपर के प्रश्नोपनिषद् के उद्धरण में गृहस्थाश्रम का अधिकार केवल ऋषि कोटि के व्यक्तियों को दिया गया है।

यह दक्षिण मार्ग या चन्द्रमसलोक ही रयिमार्ग या रयिलोक है। इसको पितृयाण भी कहा गया है। इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् में गृहस्थाश्रम को दक्षिण मार्ग, चन्द्रमसलोक, रयिमार्ग और पितृयाण- इन शब्दों द्वारा कहा गया है।
इस व्याख्या द्वारा यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि "पितर" वे व्यक्ति हैं जो कि गृहस्थधर्म का जीवन व्यतीत करते हैं तथा वे भी जो कि इस गृहस्थ मार्ग से गुजर कर अगले आश्रमों में जाते हैं।

(३) देवयान
ऊपर के लेख में "पितृयाण" और "पितर"- इन शब्दों के अभिप्रायों की व्याख्या हो चुकी है। इन शब्दों के सम्बन्धी शब्द हैं "देवयान" और "देव" शब्द। इनके सम्बन्ध में प्रश्नोपनिषद्, प्रथम प्रश्न, कण्डिका १० इस प्रकार है-

"अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष् यादित्यमभिजयन्ते। एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृत मभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोध: तदेष श्लोक:।।"
अर्थात् "उत्तर मार्ग के द्वारा, तप द्वारा, ब्रह्मचर्य द्वारा, श्रद्धा द्वारा तथा विद्या द्वारा आत्म का अन्वेषण कर आदित्य पर विजय पाते हैं। यह उत्तरमार्ग प्राणों का घर है, यह अमृत है, अभय है, यह परम-अभय है, इसमें पुनरावर्त्तन नहीं होता, यह निरोध मार्ग है।"

यह वर्णन देवमार्ग का है। प्रश्नोपनिषद् के प्रथम प्रश्न की ९वीं कण्डिका में पितृयाण का वर्णन है और इस १०वीं कण्डिका में देवयान का वर्णन है। इसमें निम्नलिखित भाव दर्शाए गए हैं-
(क) देवयान के मार्ग का नाम "उत्तर मार्ग" भी है।
(ख) उत्तरमार्ग का अभिप्राय है तप का मार्ग, ब्रह्मचर्य का मार्ग, श्रद्धा का मार्ग और विद्या अर्थात् आत्मविद्या का मार्ग।
(ग) उत्तरमार्ग का उद्देश्य है "आत्मा का अन्वेषण", नकि गृहस्थ धर्म।
(घ) इस उत्तरमार्ग को आदित्यमार्ग भी कहते हैं। उत्तरमार्गगामी आदित्यमार्ग पर विजय पाते हैं।
(ङ) उत्तरमार्ग से प्राणों का या शक्ति का संचय होता है, शीघ्र मृत्यु नहीं होती अर्थात् मनुष्य दीर्घजीवी हो जाता है, तथा मनुष्य भय रहित हो जाता है।
(च) इसको पर-अयन भी कहते हैं।
(छ) इस मार्ग में जाकर पुनरावर्त्तन नहीं होता। पितृयाण मार्ग में जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति अपने संस्कारों के वश माता-पिता होने के मार्ग में फिर आता रहता है, परन्तु देवयान या उत्तरमार्ग में जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति माता पिता होने के मार्ग में कभी लौट कर नहीं आता। जब वह अपने वर्तमान जीवन में ज्ञानपूर्वक पितृयाण के मार्ग को त्याग चुका है और उसने अपने जीवन का उद्देश्य देवयान मार्ग बना लिया है, और इस वर्तमान जीवन में देवयान मार्ग सम्बन्धी संस्कार उसकी आत्मा में और भी दृढ़मूल हो चुके हैं तो वह अपने भावी जन्मजन्मान्तरों में किस प्रकार गृहस्थ मार्ग में अर्थात् पितृयाण मार्ग में पदार्पण कर सकता है। इसलिए "न पुनरावर्तन्ते" द्वारा देवयान मार्ग का वर्णन उचित ही प्रतीत होता है।
(ज) इस उत्तरमार्ग का नाम निरोधमार्ग भी है। इस मार्ग में सांसारिक वृत्तियों का निरोध कर आत्मान्वेषण के मार्ग में पदार्पण करना पड़ता है, इसलिए उत्तरमार्ग को निरोध का मार्ग कहा गया है।

(४) पितृयाण और देवयान में भेद
(१) "पितृयाण" मार्ग को दक्षिण का मार्ग कहा गया है और "देवयान" मार्ग को उत्तर का मार्ग कहा है। सूर्य जब दक्षिण मार्ग का पथिक बनता है तो वह "पितृयाण" मार्ग का प्रतिनिधि होता है, और सूर्य जब उत्तर मार्ग का पथिक बनता है तो वह "देवयान" मार्ग का प्रतिनिधि होता है। पहला मार्ग शक्तिक्षय और उत्पादकत्व का सूचक है, और दूसरा मार्ग शक्ति संचय और तेज का सूचक है।
(२) पितृयाण कर्म मार्ग है, और देवयान ज्ञानमार्ग है।
(३) पितृयाण को चन्द्रमस मार्ग कहते हैं और देवयान को आदित्यमार्ग।
(४) पितृयाण वाले बार बार गृहस्थ धर्म में आते हैं, परन्तु देवयानी लोग अपने निवृत्तिमार्ग के संस्कारों की प्रबलता के कारण बार-बार उत्पन्न होकर भी गृहस्थ में नहीं आते।
(५) पितृयाण वाले गृहस्थ में अपनी शक्ति का व्यय करते हैं परन्तु देवयान वाले इस शक्ति का संचय करते हैं, इस प्रकार देवयान मार्ग वाले दीर्घजीवी हो जाते हैं और निर्भय होकर विचरते हैं।
(६) पितृयाण "रयि मार्ग" है और देवयान "प्राण मार्ग" है।

इस प्रकार "पितर" और "देव" तथा पितृयाण और देवयान शब्दों द्वारा जीवित पितरों तथा जीवित देवों का ही वर्णन प्रतीत होता है, मृत पितर तथा मृत देवों का नहीं, यह सिद्धान्त हृदयंगत हो चुका होगा। जीवित पितरों के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रमाण उपस्थित किये जाते हैं-

(५) शतपथ ब्राह्मण और जीवित पितर
शतपथ ब्राह्मण २/४/२/२४ तथा २/६/१/४२ में लिखा है कि "गृहाणां ह पितर ईशत" अर्थात् पितर गृहों के अधीश्वर हैं, अधिपति हैं, स्वामी हैं। इस प्रमाण द्वारा ज्ञात होता है कि गृहस्थ धर्म के अवलम्बी जन पितर कहलाते हैं, और ये जीवित व्यक्ति सम्भव हैं, मृत नहीं।

(६) शांखायन श्रौतसूत्र और जीवित पितर
शांखायन श्रौतसूत्र १६/२/४-६; तथा शतपथब्राह्मण १३/४/३/६ में लिखा है कि-

यमो वैवस्वतो राजेत्याह तस्य पितरो विशस्तऽइमऽप्रासतऽइति स्थविराऽउपसमेना भवन्ति तानुपदिशति यजूँषि वेद:-
इसका अर्थ यह है कि "यम" अर्थात् प्रजाओं का नियन्त्रण करने वाला तथा स्व यमनियमों का पालन करने वाला, और "वैवस्वत" अर्थात् विवस्वान् के सदृश प्रतापी आदि ब्रह्मचारी व्यक्ति राजा होना चाहिए। उसके पितर हैं प्रजाजन, अर्थात् ये जो कि उसके सभी आसनों पर विराजते हैं, अर्थात् स्थविर व्यक्ति, जो कि वयोवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध व्यक्ति उन्हें राजा उपदेश में कहता है कि तुम्हारा वेद यजुर्वेद है।

इससे प्रतीत होता है कि राजा के सामने आसनों पर बैठे हुए, उसके सलाह स्थविर प्रजानन पितर कहलाते हैं। राजा के सम्मुख बैठे हुए स्थविर प्रजानन जीवित व्यक्ति ही हो सकते हैं, मृत व्यक्ति नहीं।
इस उद्धरण में यह भी कहा गया है कि राजा इन ज्ञानवृद्ध और वयोवृद्ध पितर को उपदेश रूप में कहता है कि तुम्हारा वेद यजुर्वेद है। इससे ज्ञात होता है कि यजुर्वेद में विशेषकर पितरों का वर्णन होगा। इसलिए यजुर्वेद के उन मन्त्रों के भी प्रमाण यहां दिए जाते हैं जिनसे कि सिद्ध होगा कि यजुर्वेद की दृष्टि से भी पितर जीवित व्यक्ति ही हैं; मृत व्यक्ति नहीं।

(७) यजुर्वेद और जीवित पितर
यजुर्वेद अध्याय २,२९ से ३४ तक के मन्त्र पिण्डपितृयज्ञपरक हैं। पौराणिक विद्वान् तो पिण्ड पितृयज्ञ में मृतपितरों के उपलक्ष में गुंदे आटे के पिण्ड का दान करते हैं और साथ ही वस्त्र दान की पद्धति को पूरा करने के लिए वस्त्रों का स्थान में धागा पिण्डों के साथ समर्पण में धर देते हैं। इन मन्त्रों में जीवित पितरों को घर बुलाकर उनके सत्कार का वर्णन है। इस सत्कार में पुत्र-पौत्र आदि अपने वानप्रस्थी तथा संन्यासी पितरों को घरों में लाकर उन्हें भोजन कराते हैं और साथ ही उनकी आवश्यकता के अनुसार उनको वस्त्रों का दान करते हैं। इस पक्ष की पुष्टि में कतिपय मन्त्र प्रमाण रूप में उद्धृत किये जाते हैं-

अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्। अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत। -यजु० २/३१
"हे पितरो! इस घर में अपने आप को आनन्दित तथा तृप्त करो तथा यथेच्छ भोजन करो। पितरों ने अपने आप को आनन्दित तथा तृप्त कर लिया है तथा यथेच्छ भोजन किया है।"

इस मन्त्र के प्रथमार्ध में गृहस्थी "पितरों" के प्रति कहते हैं कि आप हमारे घरों में पधारे हैं कृपा कर अपने आपको भोजन द्वारा तृप्त तथा आनन्दित कीजिये। मन्त्र के द्वितीयार्ध भाग में गृहस्थी परस्पर परामर्श कर रहे हैं कि पितरों ने यथेच्छ भोजन द्वारा अपने आपको आनन्दित तथा तृप्त कर लिया है। यह परामर्श उस समय होता है जबकि पितर अपना अपना भोजन समाप्त कर चुकते हैं।

इस मन्त्र का वर्णन केवल जीवित पितरों के सम्बन्ध में ही समुचित हो सकता है।

नमो व: पितरो रसाय, नमो व: पितर: शोषाय नमो व: पितरो जीवाय नमो व: पितर: स्वधायै नमो व: पितरो घोराय नमो व: पितरो मन्यवे नमो व: पितर: पितरो नमो वो गृहान्न: पितरो दत्त सतो व: पितरो देष्मैतद्व: पितरो वास:। -यजु० २/३२
"हे पितरो! तुम हमारी समाज के जीवन के लिए रस रूप हो हम तुम्हारे इस रस रूप के प्रति नमस्कार करते हैं; झुकते हैं, हे पितरो! तुम हमारे पापों और दुष्कर्मों का शोषण करने वाले हो तुम्हारे इस शोषणरूप के प्रति नमस्कार हो; हे पितरों! तुम हमें उपदेशों द्वारा जीवनदान करते हो तुम्हारे इस जीव रूप के प्रति नमस्कार हो; हे पितरो! तुम हमें सात्विक वस्त्रों का सेवन का उपदेश करते हो तुम्हारे स्वधारूप के प्रति नमस्कार हो; हे पितरो! दुष्टों और दुष्टभावों क प्रति तुम घोररूप हो तुम्हारे इस घोररूप के प्रति नमस्कार हो; हे पितरो! तुम सात्विक क्रोध करने वाले हो तुम्हारे इस मन्युरुप के प्रति नमस्कार हो; नमस्कार हो तुम्हें हे पितरो! हे पितरो! नमस्कार हो तुम्हें; हे पितरो! वानप्रस्थी हो जाने पर या संन्यासी हो जाने पर आप हमें घर दे दो, हमें घरों का उत्तराधिकारी बना दो, "मत:" अर्थात् जब तक तुम जीवित रहोगे तब तक तुमको हे पितरो! हम देते रहेंगे; हे पितरो! तुम्हारे प्रति वस्त्रों का यह समर्पण है, आप इन्हें पहनिये।"

इस मन्त्र में "पितर" समाज के प्रति कितने उपकारी हैं इसका वर्णन कर अन्य में पितरों से उनके पुत्र-पौत्र जायदाद का उत्तराधिकार मांगते हैं, और साथ ही  पितरों को आश्वासन देते हैं कि आप जब तक जीवित रहेंगे आपको हम सब जीवन सामग्री देते रहेंगे तथा वस्त्र आदि देते रहेंगे। वस्त्र देकर पुत्र-पौत्र पितरों के प्रति कहते हैं कि "आधत्त", इन वस्त्रों का आधान कर लीजिये, इन्हें पहन लीजिये। यह समग्र वर्णन मृत पितरों में कभी चरितार्थ नहीं हो सकता।

आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्त्रजम्। यथेह पुरुषोऽसत्।। यजु० २/३३
"हे गुरु पितरो! तुम इस कुमार को- जिसे कि हमने प्रसन्नता से कमल माला पहनाई है - अपने गुरुकुल में इस प्रकार रखो जैसे कि माता गर्भ को अपने उदर में रखते हैं, ताकि यह पौरुष शक्ति से सम्पन्न होकर गुरुकुल- माता से उत्पन्न हो।"

क्या मृत पितर गुरुकुलों के आचार्य हो सकते हैं और वे नवप्रविष्ट बालकों को ऐसी सुरक्षा कर सकते हैं जैसे कि माता अपने उदरस्थ बालक की सुरक्षा करती है।
यजुर्वेद के १९वें अध्याय में भी पितरों का वर्णन है। इस अध्याय के भी कतिपय उद्धरणों का यहां उल्लेख किया जाता है। यथा-

पितृभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम: प्रपितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम:। अक्षन् पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितर: पितर: शुन्धध्वम्। -यजु० १९/३६
"स्वधा अन्न का सेवन करने वाले पितरों के प्रति "स्वधा" अन्न हम देते हैं और नमस्कार करते हैं, स्वधा अन्न का सेवन करने वाले पितामहों के प्रति स्वधा अन्न हम देते हैं और नमस्कार करते हैं स्वधा अन्न का सेवन करने वाले प्रपितामहों के प्रति स्वधा अन्न हम देते हैं और नमस्कार करते हैं। पितरों ने भोजन कर लिया है, पितर प्रसन्न तथा सन्तुष्ट हो गए हैं, पितर तृप्त हो गए हैं, हे पितरों! (भोजन कर चुकने पर जल से हाथ आदि की शुद्धि द्वारा) शुद्ध होओ।"

पितरों के प्रति उनके सेवन योग्य सात्त्विक भोजन देकर उन्हें तृप्त करना तथा भोजन के उपरान्त जल द्वारा उनके हाथ आदि को शुद्ध कराना कभी भी मृत पितरों में सम्भव नहीं है।
साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि इस मन्त्र में केवल तीन पितरों का ही वर्णन है। पौराणिक पद्धति में भी तीन ही पितरों के सम्बन्ध में पितृयज्ञ के करने की परिपाटी है। ये तीन पितर हैं पिता, पितामह तथा प्रपितामह अर्थात् पिता, दादा, परदादा। यह क्यों? पितृयज्ञ जीवित पितरों के सम्बन्ध में होता है- इस सिद्धान्त में तो इस प्रश्न का हल सुलभ है, परन्तु मृत पितरों के सम्बन्ध में इस प्रश्न का कोई समुचित समाधान नहीं मिल सकता। मनुस्मृति में कहा है कि गृहस्थ पुरुष पंचमहायज्ञों का अधिकारी है। पंचमहायज्ञों में पितृयज्ञ का भी समावेश है। वैदिक विधि के अनुसार वसु ब्रह्मचर्य समाप्त करने पर जब ब्रह्मचारी गृहस्थ में प्रवेश करेगा तो उसकी आयु उस समय २४वें वर्ष की समाप्ति पर हो जाएगी। एक वर्ष के भीतर सन्तान का उत्पन्न होना भी सम्भव होगी। इस समय नव-गृहस्थी की आयु २५वें वर्ष की समाप्ति पर होगी। मनुस्मृति में लिखा है कि-

अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत्।
अर्थात् सन्तान की जब सन्तान हो जाय, तब वानप्रस्थ धारण करना चाहिए।

जब नवगृहस्थी की आयु २५ वर्षों की होगी, तब इसके पिता की आयु ५० वर्षों की होगी, और पितामह की ७५ वर्ष की और प्रपितामह की १०० वर्षों की। वेदों में मनुष्य की औसतन आयु १०० वर्षों की ही कही गई है। यथा- जीवेम शरद: शतम्।
इस प्रकार वैदिक प्रथा के अनुसार जब पुत्र पंचमहायज्ञों में पितृयज्ञ के करने का अधिकारी होता है तब वैदिक औसतन आयु के अनुसार नवगृहस्थी के पिता, पितामह और प्रपितामह का जीवित होना अधिक सम्भावित है। प्रपितामह के पूर्वजों का जीवित रहना अधिक सम्भावित नहीं। इसीलिए पितृयज्ञ में तीन पूर्वजों को ही अन्नदान की तथा उनकी सेवा की प्रथा रखी गई है। यदि पितृयज्ञ मृत पितरों के सम्बन्ध में करना वेद को अभीष्ट होता तो पितृयज्ञ में पिता, पितामह और प्रपितामह का नाम न लेकर इनके स्थान में इनके पूर्वजों का नाम लेना चाहिए था, जिनके कि मृत हो चुकने की सम्भावना अधिक है। परन्तु विधि भाग में ऐसा नहीं है। इससे स्पष्ट परिणाम निकलता है कि वैदिक विधि में केवल जीवित पितरों का ही पितृयज्ञ में यजन करने का विधान है।

उदीरतामवरऽउत्परासऽउन्मध्यमा: पितर: सोम्यास:। असुं यऽईयुरवृकाऽऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु।। -यजु० १९/४९
"अवर, पर और मध्यम पितर - जिन्होंने कि सोमव्रत लिया है, जिन्होंने अपने वीर्य की सुरक्षा का व्रत लिया है- वे हमें प्रवचन करें। जो कि सोमव्रत के कारण एक नई प्राण शक्ति को प्राप्त हुए हैं, जो वृक अर्थात् भेड़िये की न्याई क्रोध करने वाले नहीं हैं, जो सत्य के ज्ञाता हैं, वे पितर हमारे बुलाने पर हमारी रक्षा करें।"

ऊपर के तीन प्रकार के पितरों को अर्थात् पिता, पितामह और प्रपितामह को इस मन्त्र में अवर आदि शब्द द्वारा स्मरण किया गया है। अवर का अर्थ है छोटी उम्र वाले अर्थात् पिता, पर का अर्थ है बड़ी उम्र वाले अर्थात् प्रपितामह तथा मध्यम का अर्थ है मंझली उम्र वाले अर्थात् पितामह। ये तीनों गृहस्थ जीवन छोड़ने के पश्चात् पुनः ब्रह्मचर्य व्रत का धारण करते हैं- इसलिए इन्हें "सोम्यास:" कहा गया है। वेद की परिभाषा में सोम शब्द का अर्थ वीर्य भी होता है। अंग्रेजी का "semen" शब्द "सोम" शब्द का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है, वेद के सोम शब्द का पूर्वरूप "सोमन्" है जो कि "semen" के साथ अधिक सादृश्य रखता है। इस मन्त्र के अर्थ पर भी विचार करने से यही परिणाम निकलता है कि पितृयज्ञ में जीवित पितरों का ही सम्बन्ध है।
अपने पक्ष की पुष्टि में यजुर्वेद के निम्नलिखित प्रमाण और दिए जाते हैं। यथा-

बर्हिषद: पितरऽऊत्यर्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्। तऽआगतावसा शन्तमेनाथा न: शंयोररपो दधात।। -यजु० १९/५५
"वन में रहने वाले पितर हमारी रक्षा करने के लिए हमारी ओर आए हैं (हमारे घरों में आ रहे हैं), हे पितरों! तुम्हें हम ये खाने के पदार्थ देते हैं, प्रीति से इनका सेवन करो। वे पितर अपनी शान्तिमयी रक्षा के साथ आये हैं, तुम आकर हमें शान्ति दो, भावी दुःखों से हमारी रक्षा करो, और हमें निष्पाप बनाओ।"

उपहूता: पितर: सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिपु प्रियेषु। तऽआगमन्तु तऽइह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्।। -यजु० १९/५७
"सोमव्रती पितर- जो कि अपने वनस्थ के प्रिय खजानों (अर्थात् ज्ञान, ध्यान, तपस्या, विचार आदि) में विचरते हैं- श्रद्धा से बुलाए गए हैं। वे आवें, इस घर में आकर हमारे कथनों को सुनें, वे अधिकार पूर्वक हमें उपदेश दें वे हमारी रक्षा करें।"

आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभिगृणीत विश्वे। मा हिंसिष्ट पितर: केन चिन्नो यद्वऽआग: पुरुषता कराम।। -यजु० १९/६२
"हे पितरो! अपने घुटने टेक कर और दक्षिण दिशा में (बिछाए आसनों पर) बैठकर इस पितृयज्ञ में हमें उपदेश कीजिए। हे पितरों! किसी भी अपराध के कारण हमारी हिंसा न करो जिस अपराध को तुम्हारे प्रति हमने पुरुष सुलभ भ्रम के कारण किया है अर्थात् पितृयज्ञ में सत्कार आदि की न्यूनता आदि के कारण जो अपराध हमसे हो गया है।"

आसीनासोऽअरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय। पुत्रेभ्य: पितरस्तस्य वस्व: प्रयच्छत तऽइहोर्जं दधात।। -यजु० १९/६३
"हे पितरों! किरणों की गोद में अर्थात् वानप्रस्थ आश्रम आदि में खुली हवा और खुली किरण की गोद में बैठकर तुम लोग अपने दानी-भक्तों के प्रति अपने उपदेशरत्नों का प्रदान किया करो। हे पितरों! अपने पुत्रों के प्रति उनके उत्तराधिकार रूप में उन्हें जो धन मिलता है वह उन्हें दे दो।"

इदं पितृभ्यो नमोऽअस्त्वद्य ये पूर्वासो यऽउपरास ईयु:। ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु।। -यजु० १९/६८
"आज अर्थात् पितृयज्ञ में हम पितरों के प्रति नमस्कार करते हैं, उन पितरों के प्रति जो कि हमारे पूर्वज हैं अर्थात् अवर रूप पूर्वज हैं, तथा उनसे भी परे के पूर्वज अर्थात् मध्यम और पर पूर्वज हैं जो कि चले गए हैं, अर्थात् गृहस्थजीवन त्याग चुके हैं तथा जो इस पार्थिक लोक में ही अभी तक स्थित हैं, अर्थात् जीवित हैं और जो निश्चित रूप से अभी प्रजाजनों में ही विराजते हैं।"

ये मन्त्र स्पष्ट दर्शा रहे हैं कि पितृयज्ञ का वैदिक स्वरूप यही है कि जीवित पितरों की श्रद्धा से सेवा और शुश्रूषा करना, न कि मृत पितरों की।

पाद टिप्पणियां-
१. अग्निहोत्रं तप: सत्यं वेदानां चानुपालनम्। आथित्यं वैश्वदेवश्च इष्टमित्यभिधीयते।।
२. वापीकूपतडागादि देवतायतनानि च। अन्नप्रदानमारामा: पूर्त्तमित्यमिधीयते।
३. ब्रह्मापरं युज्यतां ब्रह्म पूर्वं ब्रह्मान्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वतः।
अनाव्याधां देवपुरां प्रपद्य शिवा स्योना पतिलोके वि राज।।१४/१/६४।।

-'आर्य' (साप्ताहिक) १९४४ के सिद्धान्त विशेषांक से साभार

Thursday, February 6, 2020

वेद और प्राचीन ऋषि-मुनियों की परम्परा




◼️वेद और प्राचीन ऋषि-मुनियों की परम्परा◼️
[वेद किसी पुरुष की कृति नहीं, अपितु अपौरुषेय है]
✍🏻 लेखक - पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’
वेदज्ञान के स्वरूप का हमने जो ऊपर निरूपण किया, इसमें वेद तथा अन्य ऋषि-मुनियों की दृष्टि से भी पर्यालोचन करना लाभकारी होगा । वेद से पुराना ज्ञान वा ग्रन्थ संसार के पुस्तकालय में नहीं है, इसमें संसार के प्रायः आधुनिक विद्वान् भी सहमत हैं।
◾️(१) इस विषय में स्वयं वेद क्या कहता है सो प्रथम दर्शाते हैं
🔥तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजस्तस्मादजायत॥
य० ३१।७
उस सर्वपूज्य, सर्वोपास्य, पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामनेद और अथर्ववेद उत्पन्न हुए, अर्थात् उस परमेश्वर ने ही वेदों को प्रकाश किया है । यहाँ यह ध्यान रहे कि ऋग्-यजुः-साम में भी तो छन्द हैं, फिर मन्त्र में "छन्दांसि" का ग्रहण किसलिये किया ? "व्यर्थं सज्ज्ञापयति" इस नियम से "अथर्व" का ग्रहण ज्ञापक से निकलता है, ऐसा समझना चाहिये।
🔥यामादृचो अपातक्षन् यजुर्यस्मादपाकषन्।
सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखं
स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः ॥ अथर्व० १०।७।२०
जिस सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर से ऋग्वेद उत्पन्न हुआ, जिस परब्रह्म से यजुर्वेद प्रादुर्भूत हुआ, सामवेद जिसके लोम के समान है और अथर्व जिसका मुखरूप है, अर्थात् जिससे सामवेद और अथर्ववेद प्रकाशित हुये, वह ब्रह्म कैसा है ? 🔥"बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रम्" (ऋ० १०।७१।१) इस मन्त्र के सम्बन्ध में हम प्रारम्भ में दर्शा चुके हैं कि वेदवाणी ही सृष्टि में सब से प्रथम वाणी होती है। संसार के सब पदार्थों के नाम कर्मादि का बोध उसी से होता है । वह श्रेष्ठ सर्वोत्कृष्ट होती है। सबके लिये समान परिश्रम-साध्य और प्रभु की प्रेरणा से ऋषियों की बुद्धि में निहित होकर प्रकाशित होती है। इसी सूक्त के तीसरे मन्त्र 🔥"यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्०" में यह बतलाया है कि वेद का ज्ञान पहले ऋषियों के हृदयों में प्रविष्ट होता है, तब पीछे मनुष्य उसको प्राप्त करते हैं। इस प्रकरण में ये दोनों मन्त्र स्पष्ट बतलाते हैं कि वेद में वेद का स्वरूप कैसे माना गया है । इन उपर्युक्त मन्त्रों पर विचार करने से स्पष्ट है कि वेद ज्ञान का प्रकाश तथा वाणी (भाषा) का प्रकाश उस परब्रह्म परमेश्वर से होता है। चारों वेदों का विभाग जगदीश्वर के द्वारा हुआ, तथा वह ज्ञान वा वाणी ऋषियों द्वारा ही मनुष्यों को प्राप्त होती है, यह वेद का सिद्धान्त है। यहाँ "अनु-अविन्दन्" पद विशेष ध्यान देने योग्य हैं। "ऋषिषु प्रविष्टाम्" से स्पष्ट है कि वह ऋषियों में प्रविष्ट हुआ ज्ञान वा वाणी है, ऋषियों की अपनी बनाई नहीं, अर्थात् उनका अपना ज्ञान नहीं।
🔥तस्मै नूनमभिद्यवे वाचा विरूपनित्याया।
वृष्ण चोदस्थ सुष्टुतिम् ॥ ऋ० ८७५॥६॥
इस मन्त्र में "वाचा विरूपनित्यया" इन पदों से वेदवाणी को नित्य कहा गया है। सायणाचार्य ने भी इसका ऐसा ही अर्थ किया है, यथा 🔥"नित्यया उत्पत्ति रहितया वाचा मन्त्ररूपया सुष्टुर्ति नूनमिदानी चोदस्व स्तुहि"- अर्थात् हे महर्षे ! उत्पत्तिरहित मन्त्ररूप वेदवाणी के द्वारा स्तुति किया कर।
◾️(२) शतपथ तथा ऐतरेयब्राह्मण -
वेद का प्रमाण उपस्थित करने के पश्चात् अब हम यह दर्शाना चाहते हैं कि परम्परा से ऋषि-मुनियों की दृष्टि में वेद का क्या स्वरूप है। शतपथब्राह्मण में याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी के संवाद में कहा है कि
▪️(क) 🔥"एवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य नि:श्वसितमेतद् यद् ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः" ॥ श० १४।५।४।१०॥
- अर्थात हे मैत्रेयि ! उस महान् परब्रह्म परमेश्वर से चारों वेद श्वासप्रश्वास की भाँति अनायास निःश्वसित अर्थात् प्रकाशित हुए।
▪️(ख) इसी शतपथब्राह्मण में आगे कहा है - 🔥"अग्ने ऋग्वेदो वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात् सामवेदः"। श० ११।५।८।३
अर्थात् (परमात्मा की प्रेरणा से) अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद और सूर्य से सामवेद का प्रादुर्भाव हुआ।
इसी प्रकार ऐतरेय ब्राह्मण २५७ में भी लिखा है -
🔥"ऋग्वेद एवाग्नेरजायत, यजुर्वेदो वायोः, सामवेद प्रादित्याव"।
◾️(३) निरुतकार यास्कमुनि -
▪️(क) 🔥“पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिमन्त्रो वेदे"। निरु० १।२
पुरुष की विद्या अनित्य होने से वेद ही सम्पूर्ण कर्मों का बोधक है।
▪️(ख) 🔥"नियतवाचो युक्तयो नियतानुपूर्व्या भवन्ति" । निरु० १।१६
वेदवाणी नित्य है, तथा उसकी आनुपूर्वी भी नित्य होती है, अर्थात् उसमें घटा बढ़ी नहीं हो सकती।
◾️(४) पाणिनि तथा पतञ्जलि -
ये दोनों आचार्य भी वेद को नित्य मानते हैं, अर्थात् इनकी आनुपूर्वी को नित्य बतलाते हैं । जहाँ पाणिनिमुनि ने 🔥“छन्दोब्राह्मणानि च तदक्वियाणि" (अ० ४।२।६६) इस सूत्र में तथा अन्य कई सूत्रों में ब्राह्मणों की वेद से भिन्नता स्वीकार की, वहाँ 'कृते ग्रन्थे' (अ० ४।३।११६) और "तेन प्रोक्तम्" (अ० ४।३।१०१) इन दोनों सूत्रों को पृथक्-पृथक् बना कर कृति और प्रवचन का भेद दर्शाया । "तेन प्रोक्तम्" सूत्र में भाष्यकार पतञ्जलिमुनि कहते हैं
🔥या स्वसौ वर्णानुपूर्वी साऽनित्या। तभेदाच्चैतद् भवति काठकं कालापकं मोदकं पप्पलादक मिति ॥ अ० ४।३।१०१ भाष्ये ॥
इस में कठ-कलाप-पप्पलादादि शाखा-ग्रन्थों की आनुपूर्वी को महाभाष्यकार अनित्य मानते हैं, उधर वेद की आनुपूर्वी को नित्य मानते हैं, जैसा कि -
🔥"स्वरो नियत आम्नायेऽस्यवामशब्दस्य।
वर्णानुपूर्वी खत्वप्याम्नाये नियतास्यवामशब्दस्य"॥ महाभा० ५।२।५६
आम्नाय अर्थात् वेद की आनुपूर्वी तथा स्वर नित्य होते हैं, यह स्पष्ट यहाँ कहा गया है। यह स्वरूप है वेद का, पाणिनि और पतञ्जलि के मत में। पतञ्जलि का तो यह वचन ही है, वह जिस सूत्र की व्याख्या करता है, वा जिस सूत्र का यह भाष्य है, वह सूत्र पाणिनि का है, अत एव हम कहते हैं कि यह मत उपयुक्त दोनों आचार्यों का है। उस उप युक्त वचन से वेद की नित्यता सूर्य के प्रकाश की भाँति सिद्ध है।
◾️(५) मानवधर्मशास्त्र -
अब हम मनु महाराज की वेद के विषय में क्या धारणा है, सो दर्शाते -
🔥पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् ।
अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥१॥ मनु० १२।९४
वेद ज्ञानी, विद्वान् और मनुष्यों का सनातन चक्षु है, इसको कोई व्यक्ति बना नहीं सकता। यह (अङ्गोपाङ्गों के विना) जाना नहीं जा सकता।
🔥चातुर्वर्ण्य त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्व वेदात प्रसिध्यति ॥२॥ मनु० १२।९७
चारों वर्ण, तीनों लोक, चारों आश्रम तथा भूत, वर्तमान और भविष्य की सब व्यवस्थायें, वेद से ही संसार में प्रचलित होती हैं, अर्थात् वेद ही इनका उद्गम स्थान है।
🔥बिभर्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् ।
तस्मादेतत् परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥३॥ मनु० १२।९९
सर्वकाल से वर्तमान वेदशास्त्र द्वारा सम्पूर्ण जीवों का धारण वा पोषण होता है। प्राणिमात्र के लिये वेद को मैं (मनु) परमसाधन मानता हूं। 🔥"धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुति:" (मनु० २।१३) इसमें भी वेद को ही परम प्रमाण माना है।
🔥सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥४॥ मनु० १२।१००
सेनापत्य, राज्य तथा दण्डादि की सब व्यवस्था और सब लोकों पर आधिपत्य राज्य करने के लिये वेदशास्त्र का ज्ञाता सब से मुख्य अधिकारी होता है।
वेद का कैसा उत्तम स्वरूप भगवान मनु ने बतलाया ! इन उपयुक्त श्लोको में बार-बार वेद को नित्य. सनातन, सब विद्यानों का भण्डार और परमप्रमाण कहा गया है। "वेद सब सत्य विद्यायों का पुस्तक है", इस पर कई प्राशङ्का किया करते हैं; पाठक देख इस विषय में मनु महाराज क्या कहते हैं
🔥स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥५॥ मनु० २।७
वेद में सब धर्म अर्थात नियमों का प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि वेद सर्वज्ञान का स्रोत है। दूसरे शब्दों में समस्त विद्यायें वा विज्ञान वेद में हैं। 'सर्वज्ञानमय' वेद को तभी कहा जा सकता है।
🔥उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित् ।
तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनतानि च ॥६।। मनु० १२।९६
वेद से भिन्न (विपरीत) अनेक ग्रन्थ बनते रहते हैं, और नष्ट होते रहते हैं। वे सब प्राचीन-परम्परा के अनुसार न होने से निष्फल और असत्यपूर्ण होते हैं।
वेद के विषय में कितने उत्कृष्ट विचारों से भरा यह वर्णन है, जो मनु महाराज के उपर्युक्त श्लोकों में हमें मिलता है। यह है वेद का स्वरूप जो ऋषियों ने समझा।
वेद किनके द्वारा प्रकाशित हुए, यह भी मनु महाराज ने बतलाया-
🔥अग्निवायुरविम्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् ।
दुदोह यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजुःसामलक्षणम् ॥७॥ मनु० १।२३
ऋग, यजः आदि अग्नि, वायु आदि ऋषियों के द्वारा प्रकाशित हुए। इसी श्लोक की टीका में कुल्लूकभट्ट ने भी लिखा है
🔥"वेदापौरुषेयत्वपक्ष एव मनोरभिमतः। पूर्वकल्पे ये वेदास्त एव परमात्ममूर्तब्रह्मणः सर्वज्ञस्य स्मृत्यारूढाः। तानेव कल्पादौ अग्निवायुरविभ्य आचकर्ष......" । मनु० १।२३ टीका ॥
अर्थात् मनु महाराज वेदों को अपौरुषेय मानते हैं। जो वेद पूर्व कल्प में थे, वे ही अब भी वर्तमान हैं।
◾️(६) महाभारत -
🔥अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा।
आदौ वेदमयो दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः॥
महाभारत शान्तिपर्व प० २३२॥२४॥
सृष्टि के प्रारम्भ में स्वयम्भू परमात्मा से ऐसी वाणी (वेद) का प्रादुर्भाव हुआ, जिसका आदि वा अन्त नहीं, जो नित्य है, और जिसका कभी नाश नहीं होता, जो दिव्य है, उसी से संसार में सब प्रवृत्तियाँ चलती हैं। "अनादिनिधना" से यहाँ पर अक्रमारूढ़ ज्ञान समझना चाहिये, जिसके विषय में हम प्रारम्भ में पर्याप्त कह चुके हैं।
अब हम दर्शनकार ऋषियों के मत में वेद का क्या स्वरूप है, वे वेद को कैसा समझते हैं, इसका दिग्दर्शन अति संक्षेप से कराते हैं
◾️(७) वैशेषिक -
▪️(क) [१]🔥तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ॥ वै० ११।३
ईश्वर का वचन होने से वेद की प्रामाणिकता सिद्ध है।
वेद ईश्वरोक्त हैं, इनमें सत्यविद्या और पक्षपातरहित धर्म का ही प्रतिपादन है । इससे चारों वेद नित्य हैं, ऐसा ही सब मनुष्यों को मानना उचित है, क्योंकि ईश्वर नित्य है, उसका वचन (विद्या) भी नित्य होने से प्रमाण है, यह कणादमुनि का मत है।
उदयनाचार्य ने भी इस सूत्र में "तत्' शब्द से ईश्वर का ग्रहण करते हुए कहा कि वेद ईश्वरोक्त होने से प्रमाण हैं, इसलिये वेदप्रमाणक धर्म के निरूपण की प्रतिज्ञा करने में कोई दोष नहीं।
⚠️- - ध्यान दें❗️- -⚠️
💎१. यहाँ, इस सूत्र का अर्थ करनेवालों ने 'तद्' शब्द से प्रायः 'धर्म' का ग्रहण किया है ? ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पृ० ३२ में -
🔥"तवचनात् तयोर्धर्मेश्वरवचनाद् धर्मस्यैव कर्तव्यतया प्रतिपादनादीश्वरस्य वोक्तत्वादाम्नायस्य वेदचतुष्टयस्य प्रामाण्यं सर्वैनित्यत्वेन स्वीकार्यम्"।
विदित रहे कि वैशेषिक के टीकाकार शङ्करमिश्र ने अपने उपस्कार में 'तद्' शब्द से ईश्वर का ही ग्रहण किया है, जिसका उल्लेख हमने आगे किया है।
⚠️- - - - - - - -⚠️
▪️(ख) वैशेषिकदर्शन का टीकाकार शङ्कर मिश्र अपने उपस्कार में लिखता है
🔥तद्वचनादिति । तदित्यनुपक्रान्तमपि प्रसिद्धिसिद्धतयेश्वरं परामृशति, यथा "तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः” (न्या० २।१।५६) इति गौतमीयसूत्रे तच्छब्देनानुपक्रान्तोऽपि वेदः परामृश्यते। तथा च तवच नात तेनेश्वरेण प्रणयनादाम्नायस्य वेदस्य प्रामाण्यम्"॥
वै० १११३ उपस्कार पृ० ७
अर्थात् वैशेषिक के इस सूत्र में 'तद्' शब्द से ईश्वर का ग्रहण होता है । ईश्वर का वचन होने से वेद की प्रामाणिकता है।
▪️(ग) उदयनाचार्य कृत किरणावली (पृ० १३) में उद्धृत 🔥'तद्वचना दाम्नायस्य प्रामाण्यम्' सूत्र के विषय में “किरणावलीप्रकाश" में लिखा है- 🔥'तद्वचनादिति । तेनेश्वरेण वचनात् प्रणयनादाम्नायस्य प्रामाण्य मित्यर्थः'।
अर्थात् तद्वचन= ईश्वर का वचन होने या उसकी कृति होने से वेद का प्रामाण्य है।
▪️(घ) प्रशस्तपादभाष्य की व्याख्या किरणावली में उदयनाचार्य कहते
🔥"अविच्छेदे तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यमिति व्याकुप्येत।
लोकसन्तत्यविच्छेदे वेदसम्प्रदायस्याप्यविच्छेदात् ।" पृ० ८६ ॥
अर्थात्-यदि सृष्टि का प्रारम्भ नहीं मानें तो कणाद मुनि का 'ईश्वर वचन होने से वेद का प्रामाण्य है' कथन युक्तिसङ्गत नहीं ठहरता। क्यों कि यदि सृष्टि का प्रारम्भ और अन्त नहीं हो तो वेद का भी प्रारम्भ और अन्त न होगा, अतः सूत्रकार के मत में सृष्टि का प्रारम्भ है और उसी समय ऋषियों के अन्त:करण में ईश्वर वेद का ज्ञान देता है।

◾️(८) न्यायशास्त्र -
🔥मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात् ॥ न्या. २०।१।६७
गौतममुनि कहते हैं- आप्तों द्वारा सदा से प्रामाण्य स्वीकार करते आने के कारण वेद का प्रामाण्य मानना चाहिये, जैसा कि मन्त्र (विचार) और आयुर्वेद का प्रमाणत्व स्वीकार करना ही पड़ता है।
न्यायभाष्यकार कहते हैं- 🔥“य एवाप्ता वेदार्थानां द्रष्टारःप्रवक्तारमच त एवायुर्वेदप्रभृतीनाम् ।" न्या० भा० २।१।६७॥ पृ० १६७
अर्थात्-आप्त (ऋषि) लोग वेद के प्रवक्ता (प्रवचन करनेवाले) तथा द्रष्टा हुए, न कि कर्ता।
आगे फिर लिखते हैं – 🔥'मन्वन्तरयुगान्तरेषु चातीतानागतेषु सम्प्रदायाभ्यासप्रयोगाविच्छेदो वेदानां नित्यत्वम् । प्राप्तप्रामाण्याच्च प्रामाण्यं लौकिकेषु शब्देषु चैतत् समानमिति' । पृ० १६८
अतीत वा अनागत मन्वन्तर वा युगान्तरों से वेद अविच्छिन्न चले आयरहे हैं, अतः नित्य हैं।
◾️(९) सांख्य -
सांख्यशास्त्र के पञ्चमाध्याय में वेद के नित्यत्व तथा अपौरुषेयत्व विषय में कई एक सूत्र दिये हैं। जिनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं
🔥न नित्यत्वं वेदानां कार्यत्वश्रुतेः । सां० ५।४५
वेद नित्य नहीं, क्योंकि उनके विषय में "उत्पन्न हुये" आदि शब्दों का व्यवहार अर्थात् उनके कार्य होने का उपदेश स्वयं वेद में पाया जाता है, जैसा कि 🔥"तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे" (यजुः ३१।७) इत्यादि।
इस पूर्वपक्ष का उत्तर अगले ही सूत्र में देते हैं
🔥न पौरुषेयत्वं तर्त्कु: पुरुषस्याभावात् ।। सां० ५।४६
वेद किसी पुरुष के बनाये नहीं, क्योंकि उनका बनानेवाला आज तक दृष्टिगोचर नहीं हुआ।
अतः वेद की उत्पत्ति को प्रवाह से अनादि मानने में कोई दोष नहीं आता।
यही बात मीमांसाभाष्य की व्याख्या में भट्टकुमारिल ने भी कही है 🔥"कर्त्तुः स्मरणाभावादपौरुषेया वेदा इति"।(तन्त्रवात्तिक पृ० १०१)।
यदि कहो कि मुक्त पुरुष बना लेंगे, सो भी ठीक नहीं।
🔥मुक्तामुक्तयोरयोग्यत्वात् । सां० ५।४७
मुक्त और अमुक्त दोनों ही वेद का निर्माण नहीं कर सकते, क्योंकि मुक्त तो आनन्द भोगने में रहता है, वह उस समय करता कुछ नहीं, अमुक्त अज्ञानी होने से नहीं बना सकता।
अन्त में कहते हैं-
🔥निजशक्त्यभिव्यक्तेः स्वतःप्रामाण्यम् ॥ सां० ५।५१
ईश्वर की स्वाभाविक शक्ति द्वारा प्रकाशित होने से वेद स्वत:प्रमाण है।
◾️(१०) योगशास्त्र -
🔥क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामुष्ट: पुरुषविशेष ईश्वरः। यो० १।२४
क्लेश, कर्म, विपाक, आशय इनसे रहित जो पुरुषविशेष है, उसको ईश्वर कहते हैं।
इस सूत्र पर व्यासभाष्य में लिखा है -
🔥"तस्य शास्त्रं निमित्तम् । शास्त्रं पुनः किनिमित्तम् ? प्रकृष्टसत्त्वनि मित्तम् । एतयोः शास्त्रोत्कर्षयोरीश्वरसत्त्वे वर्तमानयोरनादिसम्बन्धः । एतस्मादेतद् भवति सदैवेश्वरः सदैव मुक्त इति"।
योगभाष्य १।२४, पृ० २८, २९
उस उत्कर्ष (उत्कृष्टता) का निमित्त शास्त्र है। शास्त्र का निमित्त क्या है ? इस पर कहते हैं कि प्रकृष्ट सत्त्व अर्थात् सर्वोत्कृष्ट ज्ञान शास्त्र का निमित्त है। ईश्वर के ज्ञान में वर्तमान इस शास्त्र और सर्वोत्कृष्ट ज्ञान का सम्बन्ध अनादि है । इस कारण से वह सदा ऐश्वर्यवाला तथा सदैव मुक्त कहा जाता है ।
यहाँ वाचस्पति मिश्र भी यही कहते हैं
🔥"तथा चाभ्युदयनिःश्रेयसोपदेशपरोऽपि वेदराशिरीश्वरप्रणीतस्तद् बुद्धिसत्त्वप्रकर्षादेव भवितुमर्हतितत्सिद्ध प्रकृष्ट सत्त्वनिमित्तं शास्त्र मिति" ॥
लौकिक और पारलौकिक सुख के साधनों का उपदेश करनेवाला ईश्वर का रचा हुआ वेद भी उसके उत्कृष्ट ज्ञान से ही उत्पन्न हो सकता है।… इससे सिद्ध हुआ कि वेद का निमित्त ईश्वर का उत्कृष्ट ज्ञान ही है।
◾️(११) वेदान्त
▪️(१) 🔥शास्त्रयोनित्वात् ।। वेदा० १।१।३
ऋग्वेदादि-शास्त्र का कारण होने से ब्रह्म सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान है। इसी सूत्र के भाष्य में श्री स्वामी शङ्कराचार्यजी महाराज लिखते हैं
🔥"महत ऋग्वेदादेः शास्त्रस्यानेकविद्यास्थानोपबृंहितस्य प्रदीपवत् सर्वार्थावद्योतिनः सर्वज्ञकल्पस्य योनिः कारणं ब्रह्म । नहीदृशस्य शास्त्रस्यर्वेदादिलक्षणस्य सर्वज्ञगुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः सम्भवोऽस्ति" ॥
वेदा० शां० भा० १।१।३
अर्थात अनेक विद्याओं से परिपूर्ण, प्रदीप के समान सब पदार्थों का प्रकाश करनेवाले महान् ऋग्वेदादिशास्त्र का कारण ब्रह्म ही है। सर्वज्ञ ब्रह्म को छोड़कर और कोन है जो ऐसे शास्त्र को बना सकता हो?
▪️(२) 🔥अत एव च नित्यत्वम् ॥ वेदा० १।३।२९
परब्रह्म परमेश्वर से प्रकाशित होने से वेद नित्य हैं ।
इसी सूत्र के शाङ्कर भाष्य में लिखा है
🔥"यज्ञेन वाचः पदवीयमायन् तामन्वविन्दन्न षिष प्रविष्टाम् (ऋ० १०।७१।३) इति स्थितामेव वाचमनुविन्नां दर्शयति । वेदव्यासश्च वमेव स्मरति -
🔥युगान्तेऽन्तहिंतान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।
लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयंभुवा॥इति" (महाभारत)
अर्थात् नित्य वेदवाणी को जो ऋषियों में प्रविष्ट होती है, पश्चात् अन्य मनुष्य प्राप्त करते हैं। व्यासजी भी यही कहते हैं कि वेद स्वयम्भ परमात्मा से प्रकाशित होते हैं।
नित्य प्रभु से प्रकाशित होने वाला वेद भी नित्य है, इतना दर्शाना यहाँ अभिप्रेत है।
◾️(१२) मीमांसा -
जैमिनि मुनि भी अपने मीमांसाशास्त्र के प्रथमाध्यायस्थ प्रथम पाद के पञ्चमाधिकरण में वेद का प्रामाण्य सिद्ध करके षष्ठाधिकरण में शब्द की नित्यता का प्रतिपादन करते हुए -
▪️(१) 🔥नित्यस्तु स्याद् दर्शनस्य परार्थत्वात्। मी० १।१।१८
इस सूत्र में शब्द का नित्यत्व स्वीकार करते हैं। जब लौकिक शब्द तक नित्य हैं, तो भला वैदिक शब्दों का तो कहना ही क्या !
आगे पाठवें अधिकरण में वेदापौरुषेयत्व विषय का निरूपण करते -
▪️(२) 🔥वेदांश्चैके सन्निकर्ष पुरुषाख्या । मी० १।१।२७
जैमिनि मुनि इस सूत्र में पूर्वपक्ष उठाते हैं, कि वेदों के साथ पुरुष का सम्बन्ध अर्थात् समाख्या (नाम) देखा जाता है (जैसे शाकलादि), अत: वेद अनित्य हैं।
इसका उत्तर स्वयं देते हैं-
🔥उक्तं तु शब्दपूर्वत्वात् ॥ मी० १।१।२९
इसका उत्तर हम पहले (शब्द नित्यताधिकरण में) दे चुके हैं। यहाँ समाख्यामात्र का परिहार करते हैं -
🔥आख्या प्रवचनात् ।। मी० १।१।३०
आख्या (समाख्या) प्रवचन के कारण से है। पदपाठादि के प्रवचन द्वारा भी इनकी समाख्या पुरुष के सम्बन्ध को लेकर चली है।
▪️(३) इस विषय में मीमांसा के प्राचार्य कुमारिलभट्ट आदि ने भी वेद की नित्यता को स्वीकार किया है । वह मीमांसा १।१।२९ की व्याख्या 'तन्त्रवात्तिक' में लिखते हैं
🔥"सर्वे हि यथैव गुरुणाधोतं तथवाधिजिगांसन्ते, न पुनः स्वातन्त्र्येण कश्चिदपि प्रथमोऽध्येता वेदानामस्ति, यः कर्ता स्यात् । तस्मात् कत. स्मरणाभावादपौरुषेया वेदा इति भावः । एवं च पूर्वमेव वेदापौरुषेयत्वस्य सिद्धत्वात् तद्विषये पुनः प्रयत्नो न करणीय इति केवलं समाख्याद्यवलम्बनेन कृतस्याक्षेपस्य परिहारो वक्तव्योऽभिधीयते"।
अर्थात् विना अध्ययन के वेदों का ज्ञान हो नहीं सकता। वेद किसी ने बनाये, यह किसी ने आज तक नहीं कहा। अतः स्पष्ट है कि वेद अपौरुषेय हैं। यहां यह भी बतलाया कि पूर्वसूत्र 🔥'वेदांश्चके सन्निकर्ष पुरुषाख्या' (मी० १।१।२९) में जो पूर्वपक्ष उठाया गया है, वह केवल समाख्या (संज्ञा, शाकलादि नाम) को लेकर ही उठाया गया है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि वेद की अपौरुषेयता पहले ही सिद्ध की जा चुकी है। इससे सिद्ध है कि कुमारिल भट्ट भी यहाँ पूर्वपक्ष तथा उत्तरपक्ष के सूत्रों से जैमिनि के मत में वेद की अपौरुषेयता मानकर केवल शाकलादि समाख्या (संज्ञा) को लक्ष्य में रखकर ही पूर्व पक्ष उठाया गया है, ऐसा मानते हैं।
◾️(१३) शाङ्ख्यायन-श्रौतसूत्र-भाष्य -
🔥"कथं वेदस्य प्रामाण्यम् ? अपौरुषेयत्वाद, अर्थप्रत्यायकत्वात्, बाधकप्रत्ययाभावात्"। (आनर्त्तीय भा० पृ० १)।
इसी प्रकार अन्य श्रौतसूत्रों के भाष्यकारों ने भी वेद को अपौरुषेय माना है।
इसी प्रकार निरुक्त के टीकाकार स्कन्दस्वामी, दुर्गाचार्य तथा अन्य, भर्तृहरि, उदयनाचार्य, विज्ञान भिक्षु, वाचस्पति मिश्रादि प्रायः सभी विद्वान् वेद को अपौरुषेय तथा नित्य मानते हैं। प्रायः सभी श्रोत-गृह्य तथा धर्मसूत्रकार और उनके टीकाकार भी मानते हैं, यहाँ इतना ही पर्याप्त होगा।
ये सब प्रमाण उपस्थित करने का हमारा अभिप्राय इतना ही है कि वेद परमपिता परमात्मा की वाणी है, वेद किसी पुरुष की कृति नहीं, अपितु अपौरुषेय है, नित्य प्रभु का नित्य प्रकाश (ज्ञान) है। 'वेदनित्यत्व' विषय की विशेष विवेचना पाठकों को ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में अवश्य देखनी चाहिये।
✍🏻 लेखक - पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
(जन्म- १४ अक्तूबर १८९२, मृत्यु- २२ दिसम्बर १९६४)
प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’
॥ओ३म्॥