Sunday, May 19, 2019

विचार स्वातन्त्र्य पर आघात सहन नहीं होगा



विचार स्वातन्त्र्य पर आघात सहन नहीं होगा

【पंचम आर्य महासम्मेलन, दिल्ली (२०-२२ फरवरी १९४४) के अवसर पर डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी का ऐतिहासिक अध्यक्षीय भाषण】

{दिल्ली में हुए पंचम अखिल भारतीय आर्य महासम्मेलन के अध्यक्ष सर्वसम्मति से डॉ० श्यामाप्रसाद मुखर्जी चुने गए थे। जब सिन्ध की मुस्लिम लीगी सरकार ने ऋषि दयानन्द के अमर ग्रन्थ 'सत्यार्थ प्रकाश' के चौदहवें समुल्लास (जिसमें मुस्लिम मजहब की तर्कसंगत आलोचना है) पर प्रतिबन्ध लगाया तो हैदराबाद के सत्याग्रह से लौटकर थकान भी न उतार पाये कि आर्यजन फिर फुरहरी ले उठे। हैदराबाद सत्याग्रह से पूर्व जिस प्रकार शोलापुर में श्री एम० एस० अणे की अध्यक्षता में एक अखिल भारतीय आर्य महासम्मेलन कर हैदराबाद की ओर प्रयाण का शंख फूंका गया था, ठीक उसी प्रकार का अवसर दोबारा आया, जब सिन्ध की ओर प्रयाण करना था और किसी भारतीय संस्कृति के उपासक का अध्यक्ष पद से आशीर्वाद लेकर कूच का नगाड़ा बजाना था। डॉ० मुखर्जी की अध्यक्षता से महासम्मेलन का वातावरण जहां एक ओर गम्भीर बना हुआ था, वहीं उनसे उत्प्रेरित आर्यों का जोश धधकता हुआ अंगार प्रतीत हो रहा था।
श्री मुखर्जी का अध्यक्षीय भाषण न केवल आर्यसमाज की, अपितु हिन्दूसमाज एवं भारतीयता के अभिमानियों की अनुपम निधि है। उन्होंने हिन्दुओं के प्रत्येक वर्ग को संगठित होकर जहां भारत की पुनीत संस्कृति और उसके 'सत्यार्थप्रकाश' जैसे अमर ग्रन्थों की रक्षा के लिए आह्वान किया, वहां सिर पर होकर उतरने का दुस्साहस करनेवाले मुस्लिमों को चेतावनी देते हुए कहा- "अब वह समय भी आ गया है जब उस अँगरेज़ी सत्ता को भी उखाड़ कर फेंका जायेगा जो इनकी पीठ पर बोल रही है।" श्री मुखर्जी का वह ऐतिहासिक भाषण ज्यों-का-त्यों नीचे दिया जा रहा है। -आचार्य विद्या प्रसाद मिश्र}

आप लोगों ने मुझे अखिल भारतवर्षीय आर्य सम्मेलन के पांचवें अधिवेशन का सभापति निर्वाचित करके जो सम्मान दिया है, उसे मैं हृदय से अनुभव करता हूं। आपका सम्मेलन, कार्यक्रम तथा कार्यों पर विचार करने के लिए नियमित रूप से होनेवाली सभाओं की भांति प्रतिवर्ष नहीं होता, प्रत्युत विशेष परिस्थितियों का सामना करने के लिए तथा भारतवर्ष के हित और विशेषरूप से हिन्दू जाति के अधिकारों से सम्बन्ध रखनेवाले महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के विषय में आर्यजनों का मत निर्धारण करने के लिए जगत् के आर्यमात्र की 'प्रतिनिधि सार्वदेशिक आर्यप्रतिनिधि सभा' द्वारा आमन्त्रित किया जाता है। यह अधिवेशन विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि यह हमारे देश के जीवन की बहुत ही पेचीदा घड़ी में हो रहा है। एक ओर विनाशकारी युद्ध मानवी सभ्यता की जड़ों को खोखला कर रहा है, और दूसरी ओर भारतवर्ष की आन्तरिक दशा को ऐसी अर्थव्यवस्था में डाल दिया गया है कि देश के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक अधिकार खतरे में पड़ गये हैं।
आज मुझे आर्य समाज द्वारा राष्ट्र की जागृति के लिए किये गए महान कार्यों के प्रति श्रद्धांजलि समर्पित करने का जो अवसर मिला है, उसका मैं स्वागत करता हूं। हमारी प्यारी मातृभूमि के घटनापूर्ण इतिहास में भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर बारम्बार आक्रमण होते रहे हैं। कई सदियों से हम राजनीतिक दृष्टिकोण से पराधीन हैं तो भी समय-समय पर देश में ऐसे महात्मा, ऋषि और आचार्य जन्म लेते रहे हैं जो अपने विचारों और कार्यों के प्रभाव से जाति को गिरावट से बचाते और उसके मन में नये जीवन और ओज का संचार करते रहे हैं। हमारी जाति के अनेक श्रेष्ठ पुरुष जन्म लेते रहे हैं, जो विचार और कार्य की दृष्टि से वीर कहलाने के अधिकारी थे। हिन्दू, बौद्ध और जैन राजा संरक्षक और धर्मगुरु, महान सिद्ध और भक्त, ईश्वरभक्ति के मद में मस्त सन्त और भक्त, ऐसे उद्भट विद्वान् आचार्य जिन्होंने अपने बुद्धिबल से धर्म राज्य की स्थापना का प्रयत्न किया, ऐसे सन्त, साधु और वैरागी जिन्होंने मुसलमानों द्वारा भारत की विजय के पश्चात् उत्पन्न होकर मुसलमान सूफियों और फकीरों का स्वागत किया और जिन्होंने भारतीय सभ्यता की जबर्दस्त भावना के अनुरूप त्याग, सेवा और भक्ति का सन्देश भारत को सुनाया। ऐसे सब महापुरुष समय-समय पर आकर जाति को नाश से बचाते और जीवन का मार्ग दिखाते रहे हैं।

भारतीय जागृति का नया युग
पूर्व और पश्चिम के सम्पर्क ने भारतीय जागृति का एक नया युग पैदा कर दिया। उन्नीसवीं सदी ने देश को कई ऐसे महान नेता दिये जिन्होंने अपने विचारों की शक्ति से देशवासियों के मन में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक क्रान्ति उत्पन्न कर दी। परन्तु भारत पर अँगरेज़ों के प्रभुत्व और पाश्चात्य शिक्षा के प्रवेश के कारण यह खतरा उत्पन्न हो गया कि एक दिन देश का जीवन और दृष्टिकोण राष्ट्रीयता से शून्य हो जायगा। यह भी भय हुआ कि प्रतिक्रिया के तौर पर पुरानी रूढ़ियों और पद्धतियों के प्रति उत्पन्न अन्धी श्रद्धा न बन जाय। जाति के जीवन की ऐसी नाजुक घड़ी में अनेक महापुरुष कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण हुए जिन्होंने देश को आत्मरक्षा का मार्ग दिखाया। महर्षि दयानन्द सरस्वती का स्थान उन महापुरुषों में बहुत ऊंचा है। महर्षि का मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्राचीन था।
परन्तु उस प्राचीनता में धर्म के रूप में प्रच्छन्न रूप से रहनेवाले खोखले रूढ़िवाद अथवा कुसंस्कारों का कोई स्थान नहीं था। महर्षि देशवासियों के सामने वेदों को हाथ में लेकर प्रगट हुए, और उन्होंने मत-मतान्तरों में बिखरे हुए मनुष्यों को मनुष्यमात्र की समानता के आधार पर बना हुआ वेदोक्त सामाजिक व्यवस्था का मार्ग दिखलाया।

परम सन्तोष की बात
निःसन्देह यह परम सन्तोष की बात है कि महर्षि दयानन्द के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी आर्यसमाजवालों ने इस ज्योति को किसी साम्प्रदायिक मन्दिर की अन्धकारमय कोठरियों में बन्द नहीं रखा। जिस शिक्षा को उन्होंने अपने लिए इतना अधिक जीवन-जागृतिपूर्ण समझा, उसे उन्होंने भारत की सभी भाषाओं में और आश्चर्यजनक बड़ी संख्या में पत्र तथा पुस्तक-पुस्तिकाओं को प्रकाशित करके अपने अन्य देशवासियों तक भी पहुंचा दिया। जिन देशभक्त कार्यकर्त्ताओं ने अपने महान आचार्य की परम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए भारत के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अभ्युत्थान के लिए आत्मबलिदान कर दिया, उन्होंने निःसन्देह एक समर्पित जीवन का यापन किया।

हिन्दुमात्र में एकता की स्थापना
आर्यसमाज की सबसे बड़ी सेवा यह है कि उसने जनता में वैयक्तिक तथा राष्ट्रीय आत्मसम्मान की गम्भीर भावना, मन की चेतनता और देश की सांस्कृतिक तथा सभ्यता के लिए प्रेम उत्पन्न करके हीनता की उस विषमय भावना का विनाश कर दिया जो कि मनुष्य को कायर बना देती है। इसी कारण से हम देखते हैं कि आर्यसमाज जनता को कर्म में प्रवृत्त करने के लिए निरे अपने प्राचीन गौरव के उपाख्यानों और वर्तमान कर्त्तव्य के सम्बन्ध में कोरे व्याख्यानों से ही सन्तुष्ट नहीं हो जाता, वह मानव जीवन के अंगभूत उन क्षेत्रों को भी बलिदान प्रदान करता है जिन पर के हमारे भविष्य की स्थिरता अवलम्बित है।
आर्यसमाज ने बालकों और युवकों की शिक्षा को ऐसा बनाने का अत्यन्त प्रशंसनीय प्रयत्न किया, जिससे वह भारतीय आदर्शों तथा परम्पराओं के अनुकूल बन सके। आर्यसमाज का एक प्रशंसनीय कार्यक्षेत्र अस्पृश्यता-निवारण रहा है, जिसकी हिन्दू जाति के संगठन के लिए उपेक्षा नहीं की जा सकती। हिन्दुमात्र में एकता की स्थापना, उनके शारीरिक तथा आध्यात्मिक बल की अभिवृद्धि, उनकी सामाजिक स्थिति की उन्नति, उनमें सत्य और धर्म के प्रति अपार श्रद्धा की जागृति और उनको अपने अधिकारों के रक्षार्थ मर मिटने के लिए प्रेरित करना आर्यसमाज का मुख्य भाग रहा है। धर्म के क्षेत्र में आर्यसमाज ने अपना दरवाजा सदा खुला रखा है और अपने धार्मिक दृष्टिकोण की उदारता की घोषणा करके उसने न केवल दूसरों के आक्रमणों से हिन्दू धर्म की रक्षा की है, अपितु जो लोग मतान्तरों अथवा धर्मान्तरों के फेर में पड़कर भटक गए थे उन्हें पुनः हिन्दू धर्म में लाने का साहस भी प्रकट किया।

स्वतन्त्रता संग्राम में अग्रणी सैनिक
आर्य समाज ने संगठित रूप से राजनीति में व्यावहारिक भाग कभी नहीं लिया, परन्तु उनके अनेक सदस्य देश की स्वतन्त्रता के संघर्ष में अग्रणी सैनिक रहे हैं। उसके माननीय संस्थापक ने अपने स्मरणीय ग्रन्थ 'सत्यार्थ प्रकाश' में वैयक्तिक तथा राष्ट्रीय जीवन के सभी पहलुओं पर विशेषतः भारतीय दृष्टि से विचार करते हुए, अपने देश की राजनीतिक दशा पर भी स्पष्टतम भाषा में अपना अभिमत प्रकट किया है। उन्होंने लिखा है-
"अब अभाग्योदय से और आर्यों के आलस्य, प्रमाद, परस्पर के विरोध से, अन्य देशों पर राज्य करने की तो कथा ही क्या कहनी किन्तु आर्यावर्त में भी आर्यों का अखण्ड, स्वतन्त्र, स्वाधीन, निर्भय राज्य इस समय नहीं है। जो कुछ है सो भी विदेशियों के पादाक्रान्त हो रहा है, दुर्दिन जब आता है तब देशवासियों को अनेक प्रकार का दुःख झेलना पड़ता है। कोई कितना ही करे, परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तरों के आग्रहरहित अपने और पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर पिता-माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ भी विदेशियों का राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं है।" क्या हमारी राजनीतिक दासता का इससे अधिक विवाद तथा साहसपूर्ण विश्लेषण सम्भव है? फ्रांस के महान तत्त्वदर्शी रोमांरोला का यह कथन सर्वथा सत्य है कि महर्षि दयानन्द ने भारत के शक्तिशून्य शरीर में अपनी दुर्द्धर्ष शक्ति, अविचलता तथा सिंह पराक्रम से प्राण फूंक दिए हैं। भाग्य के आगे सिर झुका देनेवाली तथा निष्क्रिय जनता को उसने सावधान कर दिया कि "आत्मा स्वाधीन है और कर्म ही भाग्य का निर्माता हैं।"

अविनश्वर वसीयत
उत्कृष्ट आध्यत्मिक अनुमति के प्रभाव से श्री अरविन्द ने ऋषि दयानन्द के विषय में यह उद्गार प्रकट किये हैं- "ऋषि ने अपने देश के निवासियों तथा समस्त विश्व को 'सत्यार्थ प्रकाश' के रूप में जो अविनश्वर वसीयत दी है, वह उनकी प्रखर प्रतिभा का प्रतीक है। इस ग्रन्थ में वह हमारे सम्मुख एक उत्पादक, कलाकर, समीक्षक, संहारक तथा निर्माता के रूप में प्रकट हुआ है। वेदों में प्रतिपादित स्वाधीनता, समानता था सत्य के शाश्वत सिद्धान्तों में उसकी अविचल निष्ठा थी। वे अज्ञान, हठधर्मिता और मिथ्या विश्वासों के दुर्ग पर अविश्रान्त प्रहार करते रहे।"
अपने प्रगतिशील विचारों का साथ देने में असमर्थ, अपने देशवासियों के प्रभावशाली वर्ग के विरोध का उन्हें सामना करना पड़ा था। परन्तु वे अपने विश्वासानुमोदित सत्य मार्ग पर सदा अविचलित रहे और उन्होंने लक्ष्य के प्रति अपनी विमल निष्ठा और अविश्वास के प्रति अप्रतिहत साहस के साथ घोषणा की- "सत्य को सत्य के रूप में और असत्य को असत्य के रूप में प्रतिपादित करना की सत्य का यथार्थ रूप है। असत्य को सत्य के तथा सत्य को असत्य के रूप में प्रकट करना सत्य का प्रकाशन नहीं है।"
ऋषि ने अपने महान दर्शन 'सत्यार्थ प्रकाश' में एक ऐसे पुनर्गठित समाज का रूप उपस्थित किया है जिससे स्वतन्त्र भारत वर्तमान परिस्थितियों तथा अवस्थाओं में स्वकीय संस्कृति तथा सभ्यता की अमूल्य परम्पराओं के साथ समस्वर करके ही निर्माण कर सकता है।

आज मुस्लिम लीग यह मांग कर रही है कि 'सत्यार्थ प्रकाश' को जब्त कर लिया जाय, क्योंकि इसके कुछ अंश कुछ मुसलमानों की दृष्टि में आपत्तिजनक हैं। अब यह सोचना आपका काम है कि ऐसी अनुचित और दुष्टतापूर्ण असहिष्णुता के प्रतिकार के लिए क्या उपाय किये जाँय, वस्तुतः यह आन्दोलन ही स्वयं सत्य, साहस और विवेक के विचारों से परिपूर्ण उस ग्रन्थ को आधिकारिक लोकप्रिय बनाने में सहायक होगा, जिसने लाखों आत्माओं को शक्ति व मुक्ति प्रदान की है और इस प्रकार इस ग्रन्थ में जीवन्मुक्ति के उस भारतीय महालक्ष्य की सिद्धि में सहायता दी है जिसके लिए उसके प्रणेता ने अपना जीवन लगाया और प्राणों की भी आहुति दी।
आर्यसमाज के अनुयायियों के दृढ़ निश्चय को जानते हुए ही मैं यह कहने का साहस करता हूं कि यदि हमारे धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप करने का कोई भी दुष्प्रयत्न किया गया तो उसे परिणाम की चिन्ता किये बिना साहस और संगठित प्रतिरोध के बल पर छिन्न-भिन्न कर दिया जायेगा। मैं तो यहां तक कहने को तैयार हूं कि सम्पूर्ण हिन्दू जाति और उनके सम्प्रदाय वस्तुतः धार्मिक मत-वादों के रहते हुए भी सभी विचार स्वातन्त्र्यप्रेमी ऐसे हमले को चुनौती के रूप में स्वीकार करेंगे। हमें मुस्लिम लीग द्वारा की गई ऐसी बेहूदी मांग के कारणों को नहीं भुला देना चाहिए, इसका कारण जहां एक ओर हमारे आपसी मतभेद और अपने पवित्र धर्मग्रन्थों आदि के प्रति उपेक्षा का भाव है, वहां दूसरी ओर भारतवर्ष को गुलाम बनाए रखने के लिए हमारे शासकों द्वारा प्रजा के एक भाग से पक्षपात करने की दुर्नीति भी है।

सबसे बड़ा सवाल
आज भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल देश की राजनीतिक स्वतन्त्रता-प्राप्ति का है। इसके बिना हमारे सिद्धान्तभूत अधिकारों और परम्पराओं पर आश्रित किसी भी सामाजिक और आर्थिक नवनिर्माण की व्यापक योजना को मूर्त्त रूप देना असम्भव है। मैं यहां क्षणभर के लिए भी हिन्दू जाति के सभी वर्गों और श्रेणियों में सामाजिक एकसूत्रता की आवश्यकताओं के महत्त्व कम नहीं करता। यह कार्य जनता का रहन-सहन और दृष्टिकोण ऊंचा उठाने तथा सम्पूर्ण कृत्रिम बाधाओं का समूलोच्छेद कर डालने के लिए बड़े कठोर व व्यवस्थित परिश्रम द्वारा ही हो सकता है। मैं यह भी कहूंगा कि हिन्दुओं में ऐसी एकता यथासम्भव इस देश में रहनेवाली सब जातियों के साथ न्याय व सम्मानपूर्ण सौहार्द भावना के साथ ही प्रकट होनी चाहिए, ऐसी वास्तविक और स्थायी सौहार्द भावना होने से पहले कुछ सैद्धान्तिक शर्तें पूरी हो जानी आवश्यक है। आज यह निर्विवादरूपेण सिद्ध हो गया है कि ब्रिटिश शासकों द्वारा उद्घोषित सिद्धान्त चाहे कुछ भी हो, वे वास्तविक शासन-सत्ता को भारतीयों के हाथों सौंपने और इस प्रकार अपने साम्राज्य के सबसे कीमती भाग को खोने के लिए तैयार नहीं है। इसीलिए उन्हें भारतीय जनता के विभिन्न दलों में फूट की प्रवृत्तियों को बढ़ाने और कृत्रिम रूप से ऊंचा उठाये हुए निहित स्वार्थों का महत्त्व जताने में अपना फायदा दीखता है। इसके साथ ही उन्हें कठोर दमन नीति का अनुसरण करने और अपने निरंकुश स्वेच्छाचारितापूर्ण शासन का वैध विरोध भी कुचल डालने में अपना अभीष्ट सिद्ध होता दीखता है।

एक भारत-अखण्ड भारत
नये विधान में भारत की एकता-अखण्डता का कायम रहना बड़ी आवश्यक बात होगी। पाकिस्तान योजना के आविष्कर्त्ता ही यह बात सबसे अधिक अच्छी तरह समझते हैं कि उनकी योजना तर्क और व्यवहार से कोसों दूर है। हिन्दुओं को, जो कि भारत की आबादी का तीन चौथाई भाग है, मुस्लिम लीग देश का विधान तैयार करने का हक देने को तैयार नहीं। वह तो यह भी नहीं चाहती कि भारतभर के हिन्दू और मुसलमान देश के विधान का संयुक्त रूप से निश्चय करें। दोनों ही अवस्थाओं में, उसका कहना है कि इस प्रकार अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों का अत्याचारपूर्ण शासन हो जायगा। इसके साथ ही उसका दावा है कि जिन प्रान्तों में मुसलमानों का प्रबल बहुमत है, वहां वे स्वयं करोड़ों अल्पसंख्यक हिन्दुओं के भाग्यविधायक बन जायेंगे और वहां के हिन्दू आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग न करने पायेंगे। उस अवस्था में यह अल्पसंख्यकों का अन्यायपूर्ण शासन नहीं होगा, अपितु यह मुसलमानों द्वारा पृथक् मातृभूमि पाने के सिद्धान्त व अधिकार का प्रयोग होगा। भारतवर्ष राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टियों से एक है और वह अखण्ड रहेगा। यदि कोई इस एकता में बाधा डालना चाहेगा तो वह देशद्रोह के महापराध का दोषी होगा और उसका कीतनी भी कीमत चुकाकर मुकाबला किया जाएगा। मुस्लिम लीग देशभक्त सन्तानों के बहुमत के संगठित प्रतिरोध के विरुद्ध अकेले ही भारतभूमि को खण्ड-खण्ड करने में सफल नहीं हो सकती। ब्रिटेन भी अपनी तलवार से भारतमाता का अंग-भंग करके उसके टुकड़े, देश का विभाजन करने के इच्छुकों के आगे, डालने की 'गारण्टी' नहीं दे सकता। किन्तु आज जिन प्रान्तों में हिन्दू अल्प संख्या में हैं और ब्रिटिश नीति प्रत्यक्षतः पाकिस्तानी राज को बढ़ावा देने की है, उन प्रान्तों में हिन्दुओं के अधिकारों और हितों को तुच्छ साम्प्रदायिकता और अवसरवादिता की बलिवेदी पर चढ़ाया जा रहा है।

वार्ता का मार्ग खुला है अब भी
भारतीय जनता की और मुसलमानों की ही भलाई के प्रति मुस्लिम लीग की चिन्ता-विषयक संजीदगी और निष्कपटता की परख के लिए हमने बारम्बार अपने मतभेद भुला डालने यानी विधान-सम्बन्धी सब विवादास्पद प्रश्नों को युद्ध के बाद तक स्थगित कर देने और भारतीय राष्ट्र की रक्षा तथा उसके पुनरुद्धार के लिए उसके अमित प्राकृतिक साधनों का उपयोग करने हेतु तत्काल शासन-सत्ता के सौंपे जाने के लिए संयुक्त मांग करने के प्रस्ताव पेश किये। बातचीत का मार्ग अब भी खुला है, पर हमारे शासकों द्वारा प्रतिक्रियावादियों को अपनी राष्ट्रविघाती और स्वार्थपूर्ण माँगों को प्रस्तुत करने में प्रोत्साहन देने के निर्लज्जतापूर्ण रवैये को देखते हुए ऐसे किसी मेलमिलाप की आशा बालू में से तेल निकालने के समान ही है।
आज इसका इलाज यह है कि भारत की आज़ादी की माँग से सहमत सब दलों और वर्गों का देशव्यापी प्रतिरोध गठित किया जाए। हमें उनलोगों या पार्टियों की खुशामद करने या उनके आगे-पीछे फिरने से कोई फायदा न होगा, जो कि भारत की प्रगति व स्वाधीनता की परवाह नहीं करते और देश को गुलाम बनाए रखने के लिए अपने शासकों के हाथों की कठपुतली बन रहे हैं। कुछ ऐसे भी दल और वर्ग हैं जो स्वतः छोटे व नगण्य होते हुए भी संयुक्त हो जाने पर मजबूत और ताकतवर हो सकेंगे, ये स्वतन्त्र भारत का विधान तैयार करने के आधारभूत सिद्धान्त के लिए देशव्यापी विरोधी मोर्चे में सम्मिलित होकर अच्छा काम कर सकेंगे। ऐसे संगठन का कर्त्तव्य होगा कि वह राष्ट्र के पुनर्निर्माण विषयक अधिकतम सहमति के प्रश्नों को महत्त्व दिलायें, सहिष्णुता व पारस्परिक सौहार्द भावना पर बल दें तथा हमारे नागरिक, आर्थिक व राजनीतिक अधिकारों के अपहरण करने के प्रयत्नों का निर्भीकतापूर्वक मुकाबला करें।

मतान्ध उत्साह के विरोध में
आज हमारे देश में अकर्मण्यता और निराशा का बोलबाला है। भारत में इस समय कानून का राज नहीं है। वर्तमान युद्ध-स्थिति का पूरा लाभ उठाकर विदेशी नौकरशाही की पाशविक प्रवृत्तियों ने राष्ट्रीय भावना का। गला घोंटने का काम विविध रूपों में किया हुआ है। दुर्भिक्ष और महामारियों ने ६ महीने से भी कम समय में २०-३० लाख से भी अधिक मनुष्यों को परलोक पहुंचा दिया है। ये लोग एक सभ्य सरकार के ही राज्य में भोजन, दवा और आश्रय के अभाव में प्राणों से हाथ धो बैठे। यदि मौजूदा दिवालिया, रिश्वतखोर और साम्प्रदायिक मन्त्रिमण्डल को अगले महीनों में शासन चलाने दिया गया तो मेरे प्रान्त (बंगाल) में ऐसा ही संकट १९४४ में फिर देखने का अवसर आ सकता है। यदि किसी दूसरे देश में ऐसी बदइन्तजामी होती तो वहां की जनता खुली बगावत करती। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि ब्रिटिश भारत के इतिहास में इतना अधिक असन्तोष कभी नहीं हुआ जितना कि आज विद्यमान है।
मैं निराशा की बात कहकर समाप्त करना नहीं चाहता। हमें हिन्दुओं में ही अनेक भेद-प्रवृत्तियों का अन्त करना है। हमें भारत के विभाजन की मांग के बाद निरन्तर बढ़ते हुए मतान्धतापूर्ण उत्साह के विरुद्ध लड़ना होगा। हमें हिन्दू शक्ति और देश के सार्वजनिक जीवन के राष्ट्रीय अंश का निरन्तर ह्रास करने में तत्पर शासक वर्ग के प्रत्याघाती से जाति की रक्षा करनी होगी।

स्व-शासन: भारत का पुरातन अधिकार
हमारे सामने जो काम है वह कठिनाइयों और निराशाओं से परिपूर्ण है। क्या इतिहास में तुच्छ भिखमंगों की दशा में सुख माननेवाली और थोड़ी-सी क्षणिक प्राप्ति के लोभ में अपनी मान-मर्यादा की बलि देनेवाली किसी गुलाम जाति ने कभी आज़ादी प्राप्त की है! भारतीय इतिहास में हमें ऐसे यथेष्ट प्रमाण उपलब्ध होते हैं कि यहां की प्रत्येक सन्तति (जाति) के मनुष्यों में ऐसे मानव हुए हैं, जिनकी तुलना किसी भी देश और स्थान के महान पुरुषों से सुगमतापूर्वक की जा सके। पर भारतीय जनता किसी मूल्य पर अपनी राजनीतिक स्वाधीनता की रक्षा के लिए तीव्र भावना से अनुप्राणित नहीं हुई। इसलिए भारत के राजनीतिक और अन्य दलों के नेताओं के आगे, राष्ट्रीय संगठन की उदात्त भावना के साथ, यह प्रमुख कार्य है कि वे स्वाधीनता के प्रेम को कोने-कोने तक फैला दें, जनता जान जाए कि स्व-शासन भारत का पुरातन अधिकार है और यह दृढ़ निश्चय उसमें घर कर जाए कि यदि आज़ादी नसीब नहीं होती तो जिन्दगी मौत के बराबर है।
हम जनता से मर्मस्पर्शी अपीलें करके अथवा अपने विरोधियों को गालियां देकर अपने लक्ष्य पर नहीं पहुंच सकते। इसके लिए तो हमें सामाजिक व आर्थिक उत्थान का कार्यक्रम अमल में लाते हुए धर्म को मानवीय सभ्यता के उत्कर्ष के लिए सच्चा संगठनात्मक तत्त्व बनाना होगा, इसी की मजबूत नींव पर भारत की स्वतन्त्रता का निर्माण हो सकेगा। हमें इस दृढ़ विश्वास से बल पाकर उत्साहपूर्वक कार्य करना चाहिए कि शक्ति, अधिकार, साम्राज्य और प्रभाव से शासित संसार में अपने प्राचीन गौरव के अनुरूप यह प्रतिष्ठा भारत को ही प्राप्त होगी कि वह न केवल एक पददलित और शोषित जाति के पुनरुद्धार के लिए उच्चतर और उत्कृष्टतर सभ्यता के विकास में हाथ बंटाये बल्कि तन, मन और आत्मा के सह-भाव की ओर प्रगति का भी बीड़ा उठाये। इसके बिना स्थायी शान्ति और स्वतन्त्रता सभ्य संसार के किसी भी कोने में स्थिर नहीं हो सकती। -साभार- 'कश्मीर की वेदी पर' पुस्तक से

[स्त्रोत- साप्ताहिक आर्य सन्देश : दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा का मुखपत्र का १३-१९ मई, २०१९ का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Friday, May 17, 2019

स्वामी दयानन्द सरस्वती



स्वामी दयानन्द सरस्वती
(ले० विनायक कोंडदेव ओक )
लेखक परिचय :
मराठी बाल साहित्य के जनक श्री विनायक कोंडदेव ओक (१८४०-१९१४) चरित्रकार और कवि के रूप में सुप्रसिद्ध थे। महाराष्ट्र के कोंकण विभागीय रत्नागिरि जनपद के गुहागर के सन्निकट स्थित हेदवी गांव में २५ फरवरी १८४० को उनका जन्म हुआ। बचपन में ही माता-पिता जी के देहान्त हो जाने के कारण उनकी शिक्षा सुचारु रूप से नहीं हो पायी। तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई होने के उपरान्त उन्होंने स्वाध्याय से अपने विद्याध्ययन को समृद्ध किया। शिक्षा विभाग में अध्यापक के रूप में सेवा प्रारम्भ की और एडीशनल डेप्यूटी एज्युकेशनल इंस्पैक्टर (अतिरिक्त विभागीय शिक्षाधिकारी) के रूप में सेवानिवृत्त हुए।
सन् १८६६ में 'लघु निबन्धमाला' नामक उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसे पुरस्कृत भी की गई। 'पीटर दी ग्रेट', 'अब्राहम लिंकन', 'ग्लैडस्टन' आदि पाश्चात्य महान् व्यक्तियों के आपने चरित्र लिखे। 'इतिहास तरंगिणी', 'हिन्दुस्तान का संक्षिप्त इतिहास', 'फ्रांस राज्य क्रांति का इतिहास' नामक आपके ऐतिह्य ग्रंथ भी प्रकाशित हुए। 'शिरस्तेदार' (न्यायालयीन अधिकारी) नामक सामाजिक उपन्यास व आंग्ल कथाओं पर आधारित 'आनन्दराव' नामक कथा संग्रह और 'पुष्प वाटिका' नामक दस विशिष्ट कविताओं का संग्रह भी आपका प्रकाशित हुआ है। कठिन शब्दों का प्रयोग करने की अपेक्षा सरल और लघु वाक्य लेखन शैली को उन्होंने विशेष रूप से अपनाया।
'बाल बोध' नामक मराठी मासिक प्रारम्भ कर उन्होंने मराठी बाल साहित्य का सूत्रपात किया। सन् १८८१ में 'बालबोध' का पहिला अंक प्रकाशित हुआ। जो बातें विद्यालयीन जीवन में मालूम नहीं होतीं, पर जिनकी उस जीवन में जानकारी होना जरूरी है, ऐसी अत्यावश्यक बातें उन्होंने उक्त मासिक में देने का निश्चय अपने प्रथमांक के संपादकीय में व्यक्त कर लगभग ३४ वर्ष तक उस मासिक का प्रकाशन किया। विशेष बात यह थी कि उस काल में बाल-किशोरों के साथ ज्येष्ठ नागरिक भी इस मासिक के पाठक बने। 'बालबोध' मासिक के माध्यम से ४०२ चरित्र, ४०२ कविता, ४०२ निबन्ध, ३७१ शास्त्रीय निबन्ध और अन्यान्य विषयों पर ८५० लेख स्वयं उन्होंने लिखे। उनका यह कार्य मराठी बाल साहित्य में अतिशय अनमोल योगदान देने वाला सिद्ध हुआ है।
९ अक्टूबर १९१४ को उनका देहावसान हुआ।
मराठी में लिखित श्री विनायक कोंडदेव ओक का यह लेख 'बालबोध' मराठी मासिक (जुलाई १८९५, पृष्ठ ७३-७९) से अनूदित किया गया है।
____________________________________
भगोने के ढ़क्कन को भांप के जोर से उठते-उड़ते हुए आज तक अनेक लोगों ने देखा, पर उससे वाष्प की शक्ति को मनुष्य मात्र की सुख-सुविधा और उपयोग में लाने की युक्ति अन्य किसी के अतिरिक्त केवल जेम्स वाट नामक एक व्यक्ति को ही सूझी। उसी प्रकार आकस्मिक मृत्यु को देखकर इस दुनिया की क्षणभंगुरता न जाने कितने लोगों के मन में आज तक आ चुकी होगी, पर उस क्षणभंगुरता की विशिष्ट छाप बुद्ध, लूथर जैसे महापुरुषों के अन्त:करण पर पड़ी और उन्होंने उससे परमार्थ साधन के विषय में एक तीव्र बेचैनी महसूस की। इन जैसे महापुरुष आज पर्यन्त बहुत ही कम हुए हैं, और ऐसे जो भी कोई महापुरुष हो गए हैं, वे सभी लोगों के लिए अभिनन्दन और अभिवंदन के पात्र रहे हैं। उन सबकी देवताओं के समान भक्ति की जा रही है। आधुनिक काल में ऐसे जो महापुरुष हुए हैं, उनमें स्वामी दयानन्द सरस्वती का विशेष रूप से समावेश है।
स्वामी जी की मूल पृष्ठभूमि में न जाते हुए हम उनके चरित्र की कुछ मुख्य-मुख्य घटनाएँ यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारे हमेशा के चरित्र पाठ से यह पर्याय थोड़ा-सा भिन्न है। इसका कारण यह है कि इस सत्पुरुष का चरित्र हमें यथासमय मिला नहीं। सुना है इनका विस्तृत चरित्र पं. लेखराम जी हिन्दी भाषा में लिख रहे हैं। [पं. लेखराम जी द्वारा उर्दू में लिखित जीवन चरित्र, मास्टर आत्माराम अमृतसरी जी ने संपादित किया, जो इस लेख के दो साल बाद सन् १८९७ में आर्य प्रतिनिधि सभा-पंजाब ने प्रकाशित किया। इसका हिन्दी अनुवाद पं. रघुनन्दनसिंह निर्मल ने किया जो पहली बार आर्यसमाज नया बांस दिल्ली द्वारा २०२८ विक्रमी में प्रकाशित हुआ।]
स्वयं स्वामी जी ने अपना आत्मचरित्र लिखा है। उसके प्रारम्भ में ही वे कहते हैं कि ''बिलकुल शुरुआत से ही मैंने अपने माता-पिता के नाम-गाँव आदि के सम्बन्ध में कुछ नहीं बतलाया, क्योंकि उन्हें गुप्त रहस्य के रूप में रखना ही मेरे संन्यस्त कर्त्तव्य-कर्म के लिए आवश्यक था।"
स्वामी जी का घराना औदीच्य ब्राह्मण कुलोत्पन्न और ऐश्वर्य संपन्न था। इनका जन्म सन् १८२४ में मोरवी रियासत के एक गांव में हुआ। इनके पिताजी बड़े कट्टर शैव भक्त थे और अपने इस बालक को भी कट्टर शैव भक्त ही बनाने की उनमें तीव्र अभिलाषा थी, परन्तु इस बालक की बुद्धि प्रारम्भ से ही अतिशय तीव्र थी। अत: उपनयन संस्कार के उपरान्त शिव-पूजादि के कर्मों को देखकर इनके मन में अनेक प्रकार के प्रश्न और संदेह उत्पन्न होने लगे। कैलाशपति-सब देवों के देव-महादेव का बैल की सवारी करना, डमरू बजाना और त्रिशूल आदि धारण करना कैसे संभव है? परमात्मा के सर्वशक्तिमान् आदि गुण इस मूर्ति में कहाँ हैं? ऐसे विचार जब उनके मन में घर किये बैठे थे, तभी उनकी एक बहिन किसी बीमारी के कारण पांच-छह घंटे में ही अकस्मात् चल बसी। यह सब देखकर उनका मन जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होने की दिशा में उन्मुख हो उठा। ऐसी स्थिति में ही उनके पिताजी ने अपने इकलौते पुत्र के विवाह करने की बात मन में ठान ली। परन्तु बालक की इच्छा विशेष ज्ञान प्राप्त करने की थी। अत: उन्होंने विवाह करने से इनकार कर दिया और अपने माता-पिता को बिना बतलाये ही अकस्मात् चुपचाप घर से निकल गए। वे संगति-सत्संगति करते हुए उत्कृष्ट विद्वान् बने, जिससे उनके अन्त:करण पर उत्तम कोटि के विद्या के संस्कार अंकित होते चले गए। कालान्तर में वे ही बड़े ज्ञानी और महान् धर्मनिष्ठ हो, दयानन्द सरस्वती के नाम से लोक में पहचाने-जाने लगे।
स्वामी जी को अपने देश-धर्म के प्रति बड़ा स्वाभिमान था। वे आग्रहपूर्वक कहते थे कि 'हिन्दू' इस शब्द के स्थान पर 'आर्य' इस शब्द का ही प्रयोग करना चाहिए।' तब से हम लोगों में आर्य शब्द लिखने की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है। उनका यह मत था कि 'वेद ईश्वर प्रणीत अपौरुषेय हैं और उसमें समस्त ज्ञान के बीज विद्यमान हैं। किसी भी प्रकार का एक भी दोष उसमें नहीं है, क्योंकि उसमें ईश्वर प्रदत्त ज्ञान और धर्म का ही वर्णन है।' अपनी इस धारण को वे उत्तम प्रकार से स्थापित और सिद्ध करते थे। इस बात के प्रतिपादन के लिए उहोंने 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका', 'ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य', 'सत्यार्थप्रकाश' आदि ग्रंथ संस्कृत और हिन्दी भाषा में लिखकर प्रकाशित किये। जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वामी जी का ज्ञानाधिकार बहुत बड़ा और वाद-विवाद का सामर्थ्य भी विलक्षण था। उनमें अलौकिक समय-सूचकता थी। उनके सामने कोई वाद-विवाद या शास्त्रार्थ करने के लिये उपस्थित होता तो वे उसके सामने शास्त्र प्रमाणों और दृष्टांतों की झड़ी-सी लगा देते थे। वेदोक्त धर्म के विशुद्ध सिद्धान्तों का पुनरुज्जीवन करने की कामना और उसको यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रसार करने की भावना लिए अनेक सद्धर्म सुधारक प्रिय सज्जनों के अतिशय आग्रह पर 'आर्यसमाज' नामक जो एक संस्था स्थापित हुई है उसकी स्थापना इन्हीं स्वामीजी ने की है। अब इसका अधिकाधिक प्रसार हो रहा है। उनका यह कहना था कि 'हमें परस्पर 'नमस्कार' न कहकर 'नमस्ते' कहना चाहिए।' उनकी यह परिपाटी आज भी आर्यसमाजी लोगों में विशेष रूप से प्रचलित है।
स्वामी जी धर्मोपदेशक थे। धार्मिक क्षेत्र में वे अत्यधिक लोकप्रिय और यशस्वी भी हुए। उसी समय के एक और धर्मोपदेशक बाबू केशवचन्द्र सेन जी भी थे। इन दोनों को भी ईस्वी सन् १८७७ में विशाल दिल्ली-दरबार में वायसराय लार्ड लिटन ने बुलाया था। वहाँ इन्होंने एक दूसरे का अंत:करण पूर्वक शानदार स्वागत-सम्मान किया।
स्वामी जी ने अत्यधिक प्रवास किया था। बहुत सारे व्याख्यान दिये और बहुत से शास्त्रार्थ भी किये थे। डॉ. रामकृष्ण गोपाल भांडारकर, स्व. पं. विष्णु परशुराम शास्त्री आदि विद्वज्जनों का और उनका घनिष्ठ परिचय था और विविध विषयों में मतभेद होने के कारण उनमें वाक्युद्ध भी हुए। उनका यह सुदृढ़ मत था कि 'मूर्ति पूजा वेद प्रतिपादित नहीं है' तथा पौराणिक काल से यह जो धारण प्रचलित थी कि 'वेदाध्ययन केवल ब्राह्मणों द्वारा ही किया जाना चाहिए, अन्यों द्वारा नहीं' इससे भी स्वामी जी पूर्णतया असहमत थे। उनका यह कहना था कि जिस किसी को भी ज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा हो, उस हर जिज्ञासु को वेदाध्ययन करना चाहिए, फिर चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो। इस विषय में मुंबई में बड़ी-बड़ी सभाओं का आयोजन हुआ, परन्तु प्रत्यक्ष वाद-विवाद या शास्त्रार्थ होने के उपरान्त भी कोई निश्चित निर्णय नहीं हो पाया। रामानुज मत के कमलनयन आचार्य व पं. रामलाल जी से 'मूर्तिपूजा' पर वाद-विवाद के एक-दो प्रत्यक्ष प्रसंग आये थे, पर उनमें भी यह सिद्ध न हो सका कि 'मूर्ति पूजा वेद प्रतिपादित है।'
स्वामी जी ईस्वी सन् १८७५ में पुणे गये थे तब उनका और प्रतिपक्षियों का जो झगड़ा हुआ, वह बहुचर्चित और सर्वत्र प्रसिद्ध है, अत: उस विषय में यहाँ कुछ लिखने की आवश्यकता हमें महसूस नहीं होती। सद्धर्म की स्थापना के लिए चांदपुर में १६ मार्च १८७७ को विभिन्न धर्म प्रसारकों की एक बृहत् सभा आयोजित की गई थी, उसमें स्वामीजी विराजमान थे। उस समय निम्नलिखित मुख्य पांच विषयों पर चर्चा हुई -
१. यह दुनिया परमेश्वर ने किससे, कब और किस कारण से उत्पन्न की? २. क्या परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है? ३. परमेश्वरीय न्याय व्यवस्था और दया का स्वरूप क्या है? ४. वेद, बाइबिल और कुर्आन के ईश्वर प्रणीत धर्मशास्त्र होने के ठोस प्रमाण क्या हैं? ५. मोक्ष प्राप्ति से क्या तात्पर्य है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
ये सभी विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इन सभी पर स्वामीजी के भाषण हुए। मुस्लिम धर्म और ईसाई धर्म के जानकार मौलवियों और पादरियों के भी भाषण हुए। पर इन सबमें आपसी सहमति नहीं हो पायी। इनमें स्वामीजी के भाषण चिंतनीय और विचारणीय हैं।
मोक्ष प्राप्ति के विषय में स्वामी जी ने कहा है, 'सब दु:खों से विमुक्त रहने का नाम ही केवल मोक्ष नहीं है, अपितु अनासक्त-विमुक्त रहकर परमेश्वर के वैभव, परमेश्वर विषय ज्ञान और चिरकाल तक अखंड आनन्द का उपभोग प्राप्त करना ही मोक्ष प्राप्ति है।' इसके अतिरिक्त उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के निम्नांकित मुख्य छह साधन बतलाए हैं-
१. सत्य ज्ञान और सत्याचरण। २. सत्य ज्ञान की प्राप्ति-जो केवल वेद से ही प्राप्त की जा सकती है। ३. साधुओं और दार्शनिकों का सत्संग। ४. इन्द्रिय दमन अर्थात् असत् कार्य पराङ्मुखता और सत्कार्य दक्षता। ५. परमेश्वर के सामर्थ्य का विचार-मनन और चिन्तन। ६. प्रार्थना, जो इस प्रकार की हो कि हे देव दयानिधि हमें जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त करो और अपनी कृपा की निरंतर हम पर अमृत वर्षा करो।
स्वामी जी ने छपरा, लखनऊ, इलाहाबाद, काशी, चांदपुर, पुणे, मुंबई आदि स्थानों पर अपना डेरा डालकर और प्राय: सारे हिन्दुस्तान का पर्यटन कर आर्य मत का प्रसार किया और विभिन्न स्थानों पर आर्यसमाजों की स्थापना की। संप्रति समस्त भारतवर्ष में इन आर्यसमाजों की संख्या ९०० के लगभग हो गई है। अधिकांश लोगों को यह आशा है कि इस धार्मिक उदारता के युग में उनके विचारों का अधिकाधिक प्रसार होता चला जायेगा।
गो-रक्षा यह धर्मशास्त्र की दृष्टि से जितनी अत्यावश्यक एवं मान्य है, उससे भी अधिक अर्थशास्त्र और आरोग्य की दृष्टि से भी अत्यन्त हितकारी है, अत: गो आदि प्राणियों की रक्षा अवश्य होनी चाहिए। यह गोरक्षा का अभियान भी सर्वप्रथम स्वामीजी ने ही प्रारम्भ किया था। जिससे प्रेरणा पाकर ही स्थान-स्थान पर गोरक्षा के केन्द्र खुले हुए हैं। [पं. गट्टूलाल शास्त्री ने स्वामी दयानन्द जी के देहावसान पर शोक-संवेदना व्यक्त करते हुए कहा था, "दयानन्द से हमारा अनेक विषयों पर मतभेद होते हुए भी हम यह बात मुक्तकण्ठ से स्वीकार करेंगे कि दयानन्द ने इस देश में वेद सम्बन्धी चर्चा और जिज्ञासा का उदय किया है और गोरक्षा के आन्दोलन का सूत्रपात करके सारे भारत को एकता के सूत्र में बांधने का उद्योग किया है।" - बाबू श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय - "महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन-चरित्र", प्रकाशक- गोविन्दराम हासानन्द, नई सड़क, दिल्ली-६, संस्करण २०५० विक्रमी, पृष्ठ-६२२] अस्तु, इनके अवतार कार्य का एक शक और युग ही मानो इस देश में स्थापित हो गया है। ऐसे श्रेष्ठ महापुरुष ने ईस्वी सन् १८८३ के अक्टूबर महीने की ३० तारीख को अजमेर में जयपुर महाराज की (भिनाय) कोठी में अपना नश्वर देह त्याग दिया। उससे आठ-दस दिन पहले उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ चुका था।
स्वामीजी के स्मारक के रूप में आर्यसमाजों ने लाहौर में 'दयानन्द एँग्लो वैदिक कॉलेज' नामक एक शिक्षा संस्था स्थापित की है। इस समय उसमें हजारों छात्र विद्याध्ययन कर रहे हैं और वहां की प्रबन्ध-व्यवस्था भी अत्युत्तम है।
स्वामी दयानन्द सरस्वती का यह अल्प एवं लघु चरित्र है। अत: मतभेदों के क्षेत्र में यहाँ प्रवेश करने की कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु सारांश रूप में देखा जाय तो ये महापुरुष बहुत ही बुद्धिमान्, महान् विद्वान्, विरक्त, आचरण की दृष्टि से अत्यन्त निर्मल और धार्मिक दृष्टि से जन-गण-मन के अन्त:करण में वेद-विद्या का प्रकाश आलोकित करने में अनवरत तत्पर और निरन्तर सन्नद्ध रहते थे। इस तथ्य को उनके प्रतिपक्षी भी नि:संकोच रूप से स्वीकार करते हैं। इस कारण उनका वन्दन-अभिनन्दन, गुणानुवाद और स्तुति पाठ करना मानो हमारे पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों का ही सुफल है यह भाग्य यत्किञ्चित् रूप में ही क्यों न हो, अब हमें प्राप्त हुआ है, अत: परमपिता परमेश्वर का हार्दिक आभार मानकर इस लघु चरित्रात्मक लेख पर हम पूर्ण विराम लगाते है।
स्रोत : "परोपकारी" (फरवरी- द्वितीय, २०११)

Don’t malign Savarkar for petty political gains



Don’t malign Savarkar for petty political gains


Vikram Sampath


Ironically those who castigate Savarkar for the petitions advocate human rights and mercy petitions of Ajmal Kasab, Yakub Memon, Afzal Guru, and the Maoists and their intellectual fountainheads. While “heat of the moment” comments amid political campaigning are understandable, repeatedly maligning those who have shed their sweat and blood for this country’s freedom is disgusting.




The 2019 election season has been acrimonious. But when national heroes are vilified for petty political gains, it is detestable. For example, Congress president, Rahul Gandhi, repeatedly mocked freedom fighter, Vinayak Damodar Savarkar, by saying that the freedom fighter had apologised to the British to get out of jail. This narrative of mocking Savarkar is a recent phenomenon and not grounded in historical truth. Rahul Gandhi’s grandmother, Indira Gandhi, in her message on Savarkar’s death in 1966 said: “It removes from our midst a great figure of contemporary India. His name was a byword for daring and patriotism. Mr Savarkar was cast in the mould of a classical revolutionary and countless people drew inspiration from him.”

So are Rahul Gandhi and the Congress blaming their former PM of endorsing a “coward”?

After five stormy years in London as a law student, Savarkar galvanised the Indian revolutionary movement across Europe. The British feared him and invoked the Fugitive and Offenders Act (FOA) of 1881 that did not apply to him, slapped an unfair trial where he had no jury or appeal. He was given two life imprisonments (50 years) at the dreaded Cellular Jail in Port Blair in 1911. Savarkar was meted out the worst and most inhuman punishment for nearly 11 long years inside the jail. He did not even get basic amenities such as food, medical care, and a toilet.

Following hunger strikes by him and other political prisoners and rumours of bomb manufacturing by Savarkar at the Andaman Settlement, home member of the Government of India, Reginald H Craddock, visited and interviewed political prisoners — Savarkar, Barin Ghose, Nand Gopal, Hrishikesh Kanjilal, and Sudhir Kumar Sarkar — in 1913 to ascertain their grievances. They were asked to submit petitions for their release, which was a legitimate tool available for political prisoners.


Being a barrister, Savarkar knew the law and obviously wanted to use every means available to free himself. He advised fellow revolutionary prisoners to promise whatever the British asked them to, gain freedom and then continue with their work after their release. Among those who followed Savarkar’s advice included the revolutionary, Sachindra Nath Sanyal, who too signed identical petitions to eschew political activity but restarted revolutionary activities after he was freed from jail. Sanyal was the brain in the Kakori case and the formation of the Hindustan Socialist Republican Association.

In fact, when Savarkar’s younger brother, Narayanrao, approached Mahatma Gandhi for his intervention in 1920, the latter advised him to submit a petition for release to the government and agreed to put in his recommendation.

In the petitions that he submitted from 1914 to 1924, Savarkar maintained that when common convicts of rape, theft or murder were let out into the Settlement for work after six months, he and other political prisoners were not allowed similar facility since they were “Special Class prisoners”. But when they asked for privileges befitting the status — such as meeting one’s family, writing regular letters or reading books — they were denied by the authorities, who termed them “ordinary convicts”.

This double disadvantage was unfair, he argued. In his 1914 petition, Savarkar wrote: “I am not asking for any preferential treatment, though I believe as a political prisoner even that could have been expected in any civilised administration in the Independent nations of the world.” The last line of this 1914 petition that gets quoted often is: “The mighty alone can afford to be merciful and therefore where else can the prodigal son return but to the parental doors of the Government?” Being a Biblical reference, one can argue that he was appealing to the religious sentiments of his incarcerators. Such selective and out-of-context quoting is intellectually disingenuous. Craddock, in his report after meeting Savarkar, stated that he was defiant in the interview and “cannot be said to express any regret or repentance” for his revolutionary acts.

In his 1917 petition, Savarkar states: “If the Government thinks that it is only to effect my own release that I pen this; or if my name constitutes the chief obstacle in the granting of such an amnesty; then let the Government omit my name in their amnesty and release all the rest; that would give me as great a satisfaction as my own release would do.”

Do these sound like words of a coward or a British stooge?

After the First World War and Emperor George V’s Royal Proclamation, political prisoners were granted unconditional amnesty, except Savarkar and his elder brother, Babarao. The government had categorised them as “D” (dangerous criminals) whose release would reignite the revolutionary movement in the Bombay Presidency.

After being shifted to Ratnagiri and Yerwada prisons, Savarkar was conditionally released on January 6, 1924. He was put under surveillance and had to abstain from politics for five years. This house arrest went on for 13 years and he could join mainstream politics again only in 1937 — 27 years after his first arrest in London in 1910.

Ironically, those who castigate Savarkar for the petitions advocate human rights and mercy petitions of Ajmal Kasab, Yakub Memon, Afzal Guru, and the Maoists and their intellectual fountainheads. While “heat of the moment” comments amid political campaigning are understandable, repeatedly maligning those who have shed their sweat and blood for this country’s freedom is disgusting.

One hopes our historical figures are not dragged into contemporary political mudslinging in this manner.



Thursday, May 16, 2019

थैंक यु, मि. गोडसे



थैंक यु, मि. गोडसे...
( ले० डॉ. शंकर शरण )
नाथूराम गोडसे के नाम और उनके एक काम के अतिरिक्त लोग उन के बारे में कुछ नहीं जानते। एक लोकतांत्रिक देश में यह कुछ रहस्यमय बात है। रहस्य का आरंभ 8 नवंबर 1948 को ही हो गया था, जब गाँधीजी की हत्या के लिए चले मुकदमे में गोडसे द्वारा दिए गए बयान को प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे का बयान लोग जानें, इस पर प्रतिबंध क्यों लगा?
इस का कुछ अनुमान जस्टिस जी.डी. खोसला, जो गोडसे मुकदमे की सुनवाई के एक जज थे, की टिप्पणी से मिल सकता है। अदालत में गोडसे ने अपनी बात पाँच घंटे लंबे वक्तव्य के रूप में रखी थी, जो 90 पृष्ठों का था। जब गोडसे ने बोलना समाप्त किया तब का दृश्य जस्टिस खोसला के शब्दों में... “सुनने वाले स्तब्ध और विचलित थे। एक गहरा सन्नाटा था, जब उसने बोलना बंद किया। महिलाओं की आँखों में आँसू थे और पुरुष भी खाँसते हुए रुमाल ढूँढ रहे थे।… मुझे कोई संदेह नहीं है, कि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित लोगों की जूरी बनाई जाती और गोडसे पर फैसला देने कहा जाता तो उन्होंने भारी बहुमत से गोडसे के ‘निर्दोष’ होने का फैसला दिया होता।” ("द मर्डर ऑफ महात्मा एन्ड अदर केसेज फ्रॉम ए जजेस नोटबुक, पृ. 305-06)
यही नहीं, तब देश के कानून मंत्री डॉ. अंबेडकर थे। उन्होंने गोडसे के वकील को संदेश भेजा कि यदि गोडसे चाहें तो वे उन की सजा आजीवन कारावास में बदलवा सकते हैं। गाँधीजी वाली अहिंसा दलील के सहारे यह करवाना सरल था। किंतु गोडसे ने आग्रह पूर्वक मना कर, उलटे डॉ. अंबेदकर को लौटती संदेश यह दिया, “कृपया सुनिश्चित करें कि मुझ पर कोई दया न की जाए। मैं अपने माध्यम से यह दिखाना चाहता हूँ कि गाँधी की अहिंसा को फाँसी पर लटकाया जा रहा है।”
गोडसे का यह कथन कितना लोमहर्षक सच साबित हुआ, यह भी यहाँ इतने निकट इतिहास का एक छिपाया गया तथ्य है!
गाँधीजी की हत्या के बाद गाँधी समर्थकों ने बड़े पैमाने पर गोडसे की जाति-समुदाय की हत्याएं की। गाँधी पर लिखी, छपी सैकड़ों जीवनियों में कहीं यह तथ्य नहीं मिलता कि कितने चितपावन ब्राह्मणों को गाँधीवीदियों ने मार डाला था।
31 दिसंबर 1948 के "न्यूयॉर्क टाइम्स" में प्रकाशित समाचार के अनुसार, केवल बंबई में गाँधीजी की हत्या वाले एक दिन में ही 15 लोगों को मार डाला गया था। पुणे के स्थानीय लोग आज भी जानते हैं कि वहाँ उस दिन कम से कम 50 लोगों को मार डाला गया था। कई जगह हिंदू महासभा के दफ्तरों को आग लगाई गई। चितपावन ब्राह्मणों पर शोध करने वाली अमेरिकी अध्येता मौरीन पैटरसन ने लिखा है कि सबसे अधिक हिंसा बंबई, पुणे, नागपुर आदि नहीं, बल्कि सतारा, बेलगाम और कोल्हापुर में हुई। तब भी सामुदायिक हिंसा की रिपोर्टिंग पर कड़ा नियंत्रण था। अतः, मौरीन के अनुसार, उन हत्याओं के दशकों बीत जाने बाद भी उन्हें उन पुलिस फाइलों को देखने नहीं दिया गया, जो 30 जनवरी 1948 के बाद चितपावन ब्राह्मणों की हत्याओं से संबंधित थीं।
इस प्रकार, उस ‘गाँधीवादी हिंसा’ का कोई हिसाब अब तक सामने नहीं आने दिया गया है, जिस में असंख्य निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को इसलिए मार डाला गया था क्योंकि गोडसे उसी जाति के थे। निस्संदेह, राजनीतिक जीवन में गाँधीजी के कथित अहिंसा सिद्धांत के भोंडेपन का यह एक व्यंग्यात्मक प्रमाण था! चाहे, कांग्रेसी शासन और वामपंथी बौद्धिकों ने इन तथ्यों को छिपाकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया।
कडवा सच तो यह है कि गोडसे ने गाँधीजी की हत्या करके उन्हें वह महानता प्रदान करने में केंद्रीय भूमिका निभाई, जो सामान्य मृत्यु से उन्हें मिलने वाली नहीं थी। स्वतंत्रता से ठीक पूर्व और बाद देश में गाँधी का आदर कितना कम हो गया था, यह 1946-48 के अखबारों के पन्नों को पलट कर सरलता से देख सकते हैं। नोआखली में गाँधी के रास्ते में पर लोगों ने टूटे काँच बिछा दिए थे। ऐसी वितृष्णा अकारण न थी। देश विभाजन रोकने के लिए गाँधी ने अनशन नहीं किया, और अपना वचन (‘विभाजन मेरी लाश पर होगा’) तोड़ा, यह तो केवल एक बात थी।
पश्चिमी पंजाब से आने वाले हजारों हिंदू-सिखों को उलटे जली-कटी सुनाकर गाँधी उनके घावों पर नमक छिड़कते रहते थे। दिल्ली की दैनिक प्रार्थना-सभा में गाँधी उन अभागों को ताने देते थे, कि वे जान बचाकर यहाँ क्यों चले आये, वहीं रहकर मर जाते तो अहिंसा की विजय होती, आदि। फिर, विभाजन रोकने या पाकिस्तान में हिंदू-सिखों की जान को तो गाँधीजी ने अनशन नहीं किया; किन्तु भारत पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये दे, इसके लिए गाँधीजी ने जनवरी 1948 में अनशन किया था! तब कश्मीर पर पाकिस्तानी हमला जारी था, और गाँधीजी के अनशन से झुककर भारत सरकार ने वह रकम पाकिस्तान को दी। यह विश्व-इतिहास में पहली घटना थी जब किसी आक्रमित देश ने आक्रमणकारी को, यानी अपने ही विरुद्ध युद्ध को वित्तीय सहायता दी!
गोडसे द्वारा गाँधीजी को दंड देने के निश्चय में उस अनशन ने निर्णायक भूमिका अदा की। तब देश में लाखों लोग गाँधीजी को नित्य कोस रहे थे। पाकिस्तान से जान बचाकर भागे हिन्दू-सिख गाँधी से घृणा करते थे। वही स्थिति कश्मीरी और बंगाली हिन्दुओं की थी। ‘हिंद पॉकेट बुक्स’ के यशस्वी संस्थापक दीनानाथ मल्होत्रा ने अपनी संस्मरण पुस्तक ‘भूली नहीं जो यादें’ (पृ. 168) में उल्लेख किया है कि जब गाँधीजी की हत्या की पहली खबर आई, तो सब ने स्वतः मान लिया कि किसी पंजाबी ने ही उन्हें मारा।
फिर, उन लाखों बेघरों, शरणार्थियों के सिवा पाकिस्तान में हिन्दुओ का जो कत्लेआम हुआ, और जबरन धर्मांतरण कराए गए, उस पर भारत में दुःख, आक्रोश और सहज सहानुभूति थी। यह सब गाँधीजी के प्रति क्षोभ में भी व्यक्त होता था। विशेषकर तब, जब वे पंजाबी हिन्दुओं, सिखों को सामूहिक रूप से मर जाने का उपदेश देते हुए यहाँ मुसलमानों (जो वैसे भी असंगठित, अरक्षित, भयाक्रांत नहीं थे जैसे पाकिस्तान में हिन्दू थे। नहीं तो वे यहीं रह न सके होते) और उनकी संपत्ति की रक्षा के लिए सरकार पर कठोर दबाव बनाए हुए थे।
इस तरह, दुर्बल को अपने हाल पर छोड़ कर गाँधी सबल की रक्षा में व्यस्त थे! यह पूरे देश के सामने तब आइने की तरह स्पष्ट था। अतः उस समय की संपूर्ण परिस्थिति का अवलोकन करते हुए यह बात वृथा नहीं कि, यदि गाँधीजी प्राकृतिक मृत्यु पाते, तो आज उन का स्थान भारतीय लोकस्मृति में बालगंगाधार तिलक, जयप्रकाश नारायण, आदि महापुरुषों जैसा ही कुछ रहा होता। तीन दशक तक गाँधी की भारतीय राजनीति में अनगिनत बड़ी-बड़ी विफलताएं जमा हो चुकी थीं। खलीफत-समर्थन से लेकर देश-विभाजन तक, मुस्लिमों को ‘ब्लैंक चेक’ देने जैसे नियमित सामुदायिक पक्षपात और अपने सत्य-अहिंसा-ब्रह्मचर्य सिद्धांतों के विचित्र, हैरत भरे, यहाँ तक कि अनेक निकट जनों को धक्का पहुँचाने वाले कार्यान्वयन से बड़ी संख्या में लोग गाँधीजी से वितृष्ण हो चुके थे। लेकिन गोडसे की गोली ने सब कुछ बदल कर रख दिया। इसलिए भक्त गाँधीवादियों को तो गोडसे का धन्यवाद करते हुए, बतर्ज अनिल बर्वे, “थैंक यू, मिस्टर गोडसे!” जैसी भावना रखनी चाहिए।
गोडसे ने चाहे गाँधी को दंड देने का लिए गोली मारी, लेकिन वस्तुतः उसी नाटकीय अवसान से गाँधीजी को वह महानता मिल सकी, जो वैसे संभवतः न मिली होती। भारत में नेहरूवादी और मार्क्सवादी इतिहासकारों द्वारा घोर इतिहास-मिथ्याकरण का एक अध्याय यह भी है कि लोग गोडसे के बारे में कुछ नहीं जानते! यहाँ तक कि गाँधी-आलोचकों की लिस्ट में भी गोडसे का उल्लेख नहीं होता। इसी विषय पर लिखी इतिहासकार बी. आर. नंदा की पुस्तक, "गाँधी एन्ड हिज क्रिटिक्स" (1985) में भी गोडसे का नाम नहीं, जबकि गोडसे का 90 पृष्ठों का वक्तव्य, जो 1977 के बाद पुस्तिका के रूप में प्रकाशित होता रहा है, गाँधीजी के सिद्धांतों और कार्यों की एक सधी आलोचना है। लेकिन 67 वर्ष बीत गए, गोडसे की उस आलोचना का किसी भारतीय ने उत्तर नहीं दिया। न उस की कोई समीक्षा की गई। यदि गोडसे की बातें प्रलाप, मूर्खतापूर्ण, अनर्गल, आदि होतीं, तो उन्हें प्रकाशित करने पर प्रतिबंध नहीं लगा होता! लोग उसे स्वयं देखते, समझते कि गाँधीजी की हत्या करने वाला कितना मूढ़, जुनूनी या सांप्रदायिक था। पर स्थिति यह है कि विगत 38 वर्ष से गोडसे का वक्तव्य उपलब्ध रहने पर भी एक यूरोपीय विद्वान (कोएनराड एल्स्ट, "गांधी एंड गोडसेः ए रिव्यू एंड ए क्रिटीक" 2001) के अतिरिक्त किसी भारतीय ने उस की समीक्षा नहीं की है। क्यों?
संभवतः इसीलिए, क्योंकि उसे उपेक्षित तहखाने में दबे रहना ही प्रभावी राजनीति के लिए सुविधाजनक था। गोडसे की अनेक बातें संपूर्ण समकालीन सेक्यूलर भारतीय राजनीति की भी आलोचना हो जाती है। इस अर्थ में वह आज भी प्रासंगिक है। यह भी कारण है कि यहाँ राजनीतिक रूप से प्रभावी इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों ने उसे मौन की सेंसरशिप से अस्तित्वहीन-सा बनाए रखा है। अन्यथा कोई कारण नहीं कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज का कहीं उल्लेख न हो। न इतिहास, न राजनीति में उस का अध्ययन, विश्लेषण किया जाए। यह चुप्पी सहज नहीं है। यह न्याय नहीं है।
इस सायास चुप्पी का कारण यही प्रतीत होता है कि किसी भी बहाने यदि गोडसे के वक्तव्य को नई पीढ़ी पढ़े, और परखे, तो आज भी भारी बहुमत से लोगों का निर्णय वही होगा, जो जस्टिस खोसला ने तब अदालत में उपस्थित नर-नारियों का पाया था। तब गोडसे को ‘हिन्दू सांप्रदायिक’ या ‘जुनूनी हत्यारा’ कहना संभव नहीं रह जाएगा।
वस्तुतः नाथूराम गोडसे के जीवन, चरित्र और विचारों का समग्र मूल्यांकन करने से उन का स्थान भगत सिंह और ऊधम सिंह की पंक्ति में चला जाएगा। तीनों देश-भक्त थे। तीनों को राजनीतिक हत्याओं के लिए फाँसी हुई। तीनों ने अपने-अपने शिकारों को करनी का ‘दंड’ दिया, जिस से सहमति रखना जरूरी नहीं। मगर तीनों की दृष्टि में एक समानता तो है ही। भगत सिंह ने पुलिस की लाठी से लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को अंग्रेज पुलिस अधीक्षक जॉन साउंडर्स की हत्या की। ऊधम सिंह ने जलियाँवाला नरसंहार करने वाले कर्नल माइकल डायर को 13 मार्च 1940 को गोली मार दी। उसी तरह, नाथूराम गोडसे ने भी गाँधी को देश का विभाजन, लाखों हिन्दुओं-सिखों के साथ विश्वासघात, उन के संहार व विध्वंस तथा हानिकारक सामुदायिक राजनीति करने का कारण मानकर उन्हें 30 जनवरी 1948 को गोली मारी थी।
आगे की तुलना में भी, जैसे अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह और ऊधम सिंह को हत्या का दोषी मानकर उन्हें फाँसी दी, उसी तरह भारत सरकार ने भी नाथूराम गोडसे को फाँसी दी। तीनों के कर्म, तीनों की भावनाएं, तीनों का जीवन-चरित्र मूलतः एक जैसा है। इस सचाई को छिपाया नहीं जाना चाहिए।
उक्त निष्कर्ष डॉ. लोहिया के विचारों से भी पुष्ट होता है। देश का विभाजन होने पर लाखों लोग मरेंगे, यह गाँधीजी जानते थे, फिर भी उन्होंने उसे नहीं रोका। बल्कि नेहरू की मदद करने के लिए खुद कांग्रेस कार्य-समिति को विभाजन स्वीकार करने पर विवश किया जो उस के लिए तैयार नहीं थी। इसे लोहिया ने गाँधी का ‘अक्षम्य’ अपराध माना है। तब इस अपराध का क्या दंड होता?
संभवतः सब से अच्छा दंड गाँधी को सामाजिक, राजनीतिक रूप से उपेक्षित करना, और अपनी सहज मृत्यु पाने देना होता। पर, अफसोस!
डॉ. लोहिया के शब्दों पर गंभीरता से विचार करें – विभाजन से दंगे होंगे, ऐसा तो गाँधीजी ने समझ लिया था, लेकिन “जिस जबर्दस्त पैमाने पर दंगे वास्तव में हुए, उसका उन्हें अनुमान न था, इस में मुझे शक है। अगर ऐसा था, तब तो उन का दोष अक्षम्य हो जाता है। दरअसल उन का दोष अभी भी अक्षम्य है। अगर बँटवारे के फलस्वरूप हुए हत्याकांड के विशाल पैमाने का अन्दाज उन्हें सचमुच था, तब तो उन के आचरण के लिए कुछ अन्य शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ेगा।” ("गाँधीजी के दोष")
ध्यान दें, सौजन्यवश लोहिया ने गाँधी के प्रति उन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जो उन के मन में आए होंगे। किंतु वह शब्द छल, अज्ञान, हिन्दुओं के प्रति विश्वासघात, बुद्धि का दिवालियापन, जैसे ही कुछ हो सकते हैं। इसलिए, जिस भावनावश गोडसे ने गाँधीजी को दंडित किया वह उसी श्रेणी का है जो भगतसिंह और ऊधम सिंह का था। इस कड़वे सत्य को भी लोहिया के सहारे वहीं देख सकते हैं। लोहिया के अनुसार, “देश का विभाजन और गाँधीजी की हत्या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक पहलू की जाँच किए बिना दूसरे की जाँच करना समय की मूर्खतापूर्ण बर्बादी है।” यह कथन क्या दर्शाता है? यही, कि वैसा न करके क्षुद्र राजनीतिक चतुराई की गई। तभी तो जिस किसी को ‘गाँधी के हत्यारे’ कहकर निंदित किया जाता है, जबकि विभाजन की विभीषिका से उस हत्या के संबंध की कभी जाँच नहीं होती। क्योंकि जैसे ही यह जाँच होगी, जिसे लोहिया ने जरूरी माना था, वैसे ही गोडसे का वही रूप सामने होगा जो उन्हें भगत सिंह और ऊधम सिंह के सिवा और किसी श्रेणी में रखने नहीं देगा। इस निष्कर्ष से गाँधी-नेहरूवादी तथा दूसरे भी मतभेद रख सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे असंख्य अंग्रेज लोग भगत सिंह और ऊधम सिंह से रखते ही रहे हैं। आखिर वे तो हमारे भगत सिंह और ऊधम सिंह को पूज्य नहीं मानते! लेकिन वे दोनों ही भारतवासियों के लिए पूज्य हैं। ठीक उसी तरह, यदि हिंदू महासभा या कोई भी हिन्दू नाथूराम गोडसे को सम्मान से देखता है और उन्हें सम्मानित करना चाहता है तो इसे सहजता से लेना चाहिए।
आखिर, भगत सिंह या ऊधम सिंह के प्रति भी हमारा सम्मान उन के द्वारा की गई हत्याओं का सम्मान नहीं है। वह एक भावना का सम्मान है, जो सम्मानजनक थी। अतः नाथूराम गोडसे के प्रति किसी का आदर भी देश-भक्ति, राष्ट्रीय आत्मसम्मान और न्याय भावना का ही आदर भी हो सकता है। जिन्हें इस संभावना पर संदेह हो, वे गोडसे का वक्तव्य एक बार आद्योपांत पढ़ने का कष्ट करें।

गोडसे और गाँधी





(गोडसे पर साध्वी प्रज्ञा के बयान से उपजे विवाद के पश्चात् वर्षों पूर्व लिखा लेख आज पुन: प्रासंगिक हो गया है। गोडसे ने गांधी वध किया जो असंवैधानिक कृत्य था जिसके लिये उन्हें फांसी हुयी। लेकिन क्यों वध किया यह जानने का प्रयास गोडसे को आतंकवादी बताने वाला गैंग कभी नहीं करता है। गांधी ने यदि पूना पैक्ट पर प्रशंसनीय किरदार निभाया तो विभाजन पर उनका किरदार निंदनीय था जिसके चलते लाखों निरपराध हिंदू और सिखों का कत्ल अल्लाह हू अकबर का दीनी घोष करते हुये किया गया। गोडसे को हत्यारा बता कर यह गैंग गांधी के विभाजन के समय के किरदार पर पाखंडी चुप्पी साध लेता है। हमें समस्या इस बात को लेकर भी है। निम्न पंक्तियों में पूर्व के लेख को पुन: पढ़ें।)

पाकिस्तान का विष- वृक्ष !

इस वृक्ष को बोया , सींचा और बड़ा किसने किया ? निसंदेह मोहनदास करमचंद गांधी और कांग्रेस ने ! और ऐसा खुलासा करने वाले कांग्रेसी विचारधारा के राजर्षि श्याम जी पाराशर थे जिन्होंने अपनी आंखों से विभाजन की पीड़ा देखी। लाखों हिंदू-सिखों का कत्ले आम , उनकी दुर्दशा और उनकी बहू-बेटियों से बलात्कार की घटनाओं से खिन्न होकर इन सारे पापों का जिम्मेदार कांग्रेस और इसके पुरोहित गांधी को माना । जिस व्यक्ति ने कभी गांधी की तारीफ में किताब लिखी उसकी चेतना ने विद्रोह किया और अपनी वाणी को 'पाकिस्तान का विष-वृक्ष' पुस्तक में उतारा। आजादी पूर्व गांधी को देवता मानकर उनकी तारीफ में ' जवाहर-दिग्विजय' लिखने वाले पाराशर ने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिखा -

" कांग्रेस ने पाकिस्तानी पिशाच के सामने नतमस्तक होकर राष्ट्र के मार्ग को कण्टकाकीर्ण बना दिया है।कांग्रेस का कहना है कि उसने झगड़ा समाप्त करने के लिये ही सब कुछ किया , वास्तव में इसने पाकिस्तान को स्वीकार कर नित्य का झगड़ा खड़ा कर दिया। प्रजातंत्र के गीत गाते हुये भी कांग्रेस के सामने ' जनता की भावना ' की कोई कदर नहीं।सच तो है यह है कि इंडियन नेशनल कांग्रेस ने ग्रैंड इंडियन फासिस्ट का रूप धारण कर लिया है।कांग्रेस को अब हुकूमत करनी है , देशसेवा का कोई प्रश्न नहीं है।कांग्रेस मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं जाने देती-अंबाला प्रांत के मुसलमानों को भी पाकिस्तान नहीं जाने देती क्योंकि उसे भय है कि यदि हिंदुस्तान में केवल हिंदू ही रह गये तो निश्चित ही यहां हिंदू सभा और संघ का प्राबल्य हो जायेगा।अत: केवल हिंदुओं के मुकाबले पर एक जबरदस्त मुसलमानों की जमात सरकार के सामने रहना जरूरी है।कांग्रेसी हुकूमत को दृढ़ करने के लिये इसके पुरोहित गांधी ने रास्ता सुझाया कि हिंदू मुसलमानों के शाश्वत बैर को अधिक से अधिक बढ़ाकर मुसलमानों के सहयोग से कांग्रेस हिंदुओं पर हुकूमत करती रहे।कांग्रेस के सामने देश की आजादी का प्रश्न न कभी था और न कभी रहेगा।यह तो उन स्वार्थी आदमियों का गुट है जो अग्रेजों के स्थान पर खुद हाकिम बनना चाहता था । इसीलिए पंजाब के शरणार्थियों को दुत्कारा गया और संघ के खिलाफ कानून लाया गया ।"

पाराशर गांधी का सही चरित्र उजागर करते हुये साबित करते हैं कि वह आत्मरक्षा में मुसलमानों के आक्रमण से बचने की हिंदुओं की चेष्टा को सांप्रदायिक दंगा कह देता था। गांधी ने दिल्ली के हिंदुओं को गिरफ्तार करवाया , शीतकाल में पंजाब के अभागे शरणार्थियों को मुसलमानों के परितक्त मकानों से निकाला , उनके स्थान पर उन्हीं पाकिस्तान परस्त मुसलमानों को ला लाकर बसाया।पाकिस्तान के हिंदू सिखों के मकानों पर मुसलमानों के कब्जे पर चुप रहा।उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बहुमत से पारित हिंदी के प्रस्ताव का खुली सभा में विरोध किया।सभी जगह हिंदुओं से दंगों के बाद जुर्माना वसूलने में उनकी खाटें तक नीलाम करवा दीं। किसलिये ? ताकि मुसलमानों को खुशकर कांग्रेस शासन कर सके। लेखक के शब्दों में-

" अब तो वह खुल्लमखुल्ला छाती ठोककर मुसलमानों का पक्ष लेता है।सभ्य संसार की दृष्टि में हिंदुओं को जलील करने का एक भी मौका हाथ से नही जानें देता है।जो काम मौलाना जफर अली , गुजनफर अली , जिन्ना को करना चाहिए था वह काम आज गांधी कर रहा है।उनकी प्रार्थना सभा तो आप देखते ही होंगे । प्रार्थना सभा क्या है एक प्रकार से मुसलमानों का हाईकोर्ट है जिसमें गांधी बाबा इस्लाम के तथा आचरण भ्रष्ट यवनों के ऐडवोकेट बन उनकी वकालत करते हैं।दिल्ली के मुसलमानों के लिये तो आपने जान की बाजी लगा दी।दिल्ली में आये हिंदू शरणार्थियों के खिलाफ आपने जी भर जहर उगला ।उन्हें आचार भ्रष्ट , शराबी , कबाबी , लुच्चे और लफंगे तक कहा । हिंदुओं का गला काटने के लिये आप अपनी बात मनवा कर छोड़ते हैं।पाकिस्तानी पजाब की लाखों विधवाओं के बारे में आपने एक शब्द नहीं कहा । दिल्ली की मुसलमान विधवा के नाम आपने भरी सभा में आंसू बहाये।पहाड़गंज के हिंदुओं पर आपने दस हजार रुपया जुर्माना लगवाया। हिंदू हितैशी अखबार संग्राम और हिंदू आउट लुक को आपने बंद करवा दिया। किदवई का भाई मसूरी में कैसे मरा आप प्रार्थना सभा में उसका किस्सा ले बैठे।आपने प्रार्थना सभा को जनरल मर्चेंट की दुकान बना रखा है।आपने प्रार्थना के शब्द को कलंकित कर दिया है।जब आप बोलते हैं तो हम स्वयं ईश्वर से प्रार्थना करते हैं दीनानाथ , इस पथ भ्रांत महात्मा को संमार्ग दिखा। जबतक आप बोलते रहते हैं हमारा मन बेचैन रहता है।अनेक बार तो हमें ऐसा प्रतीत होता है कि मानों गांधी के रूप में नादिर , तैमूर , चंगेज , और औरंगजेब की आत्मा बोल रही है।

आप अपनी सायं प्रार्थना में कुरान का पाठ करते हैं।आपको हजार बार रोका , हजार बार मना किया , सत्याग्रह भी किया , अनुनय विनय भी की , आप नहीं माने । हिंदू के घर में , हिदू मंदिर में शत प्रतिशत हिंदू जनता के सामने आपका कुरान पढ़ना कहांतक उचित है ? आपकी दृष्टि में औज विल्ला वाली आयत का अर्थ बहुत अच्छा है! परंतु क्या इन्हीं अर्थों वाला हमारे पास वेद मंत्र नहीं ? वेद माता की गोद का परित्याग कर इस्लामी डायन की गोद में बैठने में आपको कौन सा सुख मिलता है ? मस्जिद में बैठकर आपने एक बार भी हिंदुओं के गीत नहीं गाये।इससे बड़ी कायरता और क्या हो सकती है ? आप बुजदिल भी हैं।"

पाराशर ने अपनी आंखों से गांधी का आचरण लगातार देखा। कभी अपनी किताब में गांधी को देव बताने वाला उसकी हकीकत देख लिखने पर मजबूर हो गया :

" सेवा में ,

महात्मा गांधी : एडवोकेट जनरल औफ इस्लाम ऐंड दी सेवियर , दी प्रोटेक्टर औफ दी कौलम्निस्ट पाकिस्तानिस्टस इन इंडिया हालमुकीम - बिरला भवन,
नई दिल्ली ।

महोदय ,

मनुष्य ऊंचे से ऊंचे उठकर नीचे कहां तक गिर सकता है यही एक शिक्षा हमें आपके जीवन से मिलती है ।"

लेखक ने विभाजन के समय पाकिस्तान में हुये दंगों के अनेक उदाहरण देकर बताया है कि सभी जगह मुठ्ठी भर हिंदू सिखों ने मुसलमानों की भारी भीड़ को बहादुरी से लड़कर वापस जाने पर मजबूर किया। लेकिन वहाँ की सेना की मदद से बाद में इनका सभी जगह नरसंहार कर दिया गया।हजारों औरतों ने जौहर कर लिया।

पुरोहित मौन ही रहा ?

- अरुण लवानिया