Wednesday, December 3, 2014

दिए तले अँधेरा



एक ईसाई प्रचारक बड़े जोश में पंजाब के देहात में जाकर प्रचार करने लगा। उसने सोचा की मसीह की शिक्षा को बढ़िया दिखाने के लिए हिन्दुओं के पुराणों की खिल्ली उड़ानी चाहिए जिससे की हिन्दू अपने ही पुराणों से घृणा करने लगे और मसीह की शिक्षा पर विश्वास लाये। मगर उसकी किस्मत ने उसे धोखा दिया और वह एक पेशावरी टोपी पहने आर्यसमाजी प्रचारक से टकरा गया।

पादरी- हिन्दुओं को पुराणों की शिक्षा को छोड़कर ईसा मसीह की शिक्षाओं को अपनाना चाहिए देखो विष्णु, मत्सय, लिंग आदि पुराणों में क्या लिखा हैं की हिन्दुओं का अराध्य देव ब्रह्मा मद्यपान करता था और एक दिन उन्मत होकर अपनी ही कन्या से कुकर्म किया।

आर्यसमाजी प्रचारक- एक कहावत हैं छाज तो बोले किन्तु छाननी क्या बोले जिसमें सहस्त्रों छेद हैं। पहली बात तो हम केवल वेद मुकद्दस में विश्वास रखते हैं। पुराण आदि पिछले ६००-७०० वर्षों में बने हैं जिनमें सैकड़ों ऐसी बातें भरी हुई हैं जो न तो स्वीकार्य हैं और न ही वेदानुकूल हैं। जिसे तुम इल्हामी बाइबिल कहते हो उसमें कभी ध्यान नहीं देते। देखो उत्पत्ति १९/३१-३६ में लिखा हैं नबी हजरत लूत ने शराब के नशे में अपनी दो पुत्रियों से व्यभिचार किया। इससे आगे सुनों गिनती ३१/३५-४० में हजरत मूसा ने ३२,००० कुंवारी लड़कियों से दुराचार करने की आज्ञा दी। बाइबिल में ऐसा पढ़कर आप लोगों को लज्जा नहीं आती। अप्रमाणिक पुराणों पर आक्षेप करते फिरते हो। तुम लोगों के बारे में तो एक कहावत प्रसिद्द हैं- तो आकाश के ऊपर क्या जानता हैं कि क्या हैं? जबकि तू नहीं जानता कि तेरे घर में कौन हैं?

पादरी- पद्यपुराण के अनुसार विष्णु ने जालंधर वैद्य का रूप धरा और उसकी पत्नी संग सहवास किया?

आर्यसमाजी प्रचारक-अपनी आँख में शहतीर नहीं सूझता, किन्तु दूसरे की आँख में तिनका भी भारी प्रतीत होता हैं। पद्य पुराण में किसी मुर्ख ने कुछ भी अनाप शनाप लिख दिया तो यह प्रामाणिक कैसे हो गया। वेदशास्त्र से प्रमाण होना चाहिए। किन्तु ऐसा प्रमाण वेदों में मिलना दुष्कर ही नहीं असंभव हैं। मगर आपको इंजील से प्रमाण देते हैं। २ शमूएल अध्याय ११ में लिखा हैं कि दाऊद ने ऊरिय्याह की पत्नी से दुराचार किया और ऊरिय्याह को युद्ध में चिट्ठी भेजकर मरवा दिया।  लोगो का नाक अपना कटा हुआ हैं मगर नक्क कटा दूसरों को बता रहे हैं। शोक!
पादरी- महादेव अपने विवाह में नग्न होकर बैल पर चढ़ा।

आर्यसमाजी प्रचारक- उत्पत्ति अध्याय ९ आयत २०-२३ में लिखा हैं नूंह शराब पीकर नंगा हो गया। यह बात आपकी इल्हामी पुस्तक कहती हैं।

पादरी- राम ने रावण ब्राह्मण को मारा और अपनी स्त्री सीताको  जो रावण के घर प्रविष्ट हुई थी को पुन: स्वीकार किया जबकि लोगों ने उसे अशुद्ध एवं अपवित्र ठहराया था।

आर्यसमाजी प्रचारक- श्री राम तो महापुरुष थे। उनकी जैसी वीरता तो देखने को भी नहीं मिलती। उस काल में बिना अपने पिता के राज्य की सहायता के श्री राम ने २५ कोस लम्बा पुल बनाया, रावण को यमलोक भेजा और सीता को जो बैरियों के मध्य रहकर भी पवित्र रही स्वीकार किया। जरा अपने घर को देखो। उत्पत्ति अध्याय ३४ में लिखा हैं कि  याकूब की बेटी दीना को हमोर के पुत्र शकेम ने भ्रष्ट कर अपवित्र कर दिया और बाद में विवाह का प्रस्ताव भेजने पर भी याकूब ने अपवित्र हुई अपनी लड़की को अपने घर में रख लिया। इन को देखकर कर तो एक ही कहावत स्मरण होती हैं "आँख के अंधे नाम नैनसुख"

पादरी- भागवत में लिखा हैं कि कृष्ण ने गोपियों संग दुष्कर्म किया।

आर्यसमाजी प्रचारक- बाइबिल के उत्पत्ति पुस्तक के ३८ अध्याय की आयत १७-१९ में लिखा हैं की यहूदा नबी ने अपनी विधवा पुत्रवधु तामार के संग व्यभिचार किया। ऐसी न जाने कितनी असभ्य बातें बाइबिल में भरी पड़ी हैं। श्री कृष्ण जी महाराज विद्वान, पुण्यात्मा, कर्मठ, साहसी महापुरुष थे। उन पर दोष लगाने वाली भागवत सर्वथा अप्रमाणिक एवं अस्वीकार्य हैं।

पादरी- ईसाईयों का ईश्वर दयावान हैं।

आर्यसमाजी प्रचारक-

वेदों में ईश्वर का वर्णन पवित्र, न्यायकारी, दयालु, सर्वज्ञ, सत्यधर्मा आदि गुणों वाला हैं जबकि बाइबिल का परमेश्वर अज्ञानी, छलि, कमजोर, क्रोधी, ईर्ष्यालु  एवं हिंसा में विश्वास रखने वाला हैं।

उत्पत्ति पुस्तक के अनुसार एक आदम के पाप के लिए सम्पूर्ण संसार के सभी मनुष्यों को पापी ठहराना कहाँ की दयालुता हैं?
एक के फांसी दिए जाने से सम्पूर्ण संसार के सभी मनुष्यों के पापों का क्षमा होना कहाँ का न्याय हैं?
१ शमूएल अध्याय ६ की १९ आयत के अनुसार पच्चास हजार सत्तर पुरुषों को मारने वाला खुदा दयावान कैसे हुआ?
१ शमूएल अध्याय १५ की ३ आयत के अनुसार क्या पुरूष, क्या स्त्री, क्या बच्चा, क्या दूधपिउवा, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, क्या ऊंट, क्या गदहा, सब को मार डालने की आज्ञा देने वाला खुदा दयावान कैसे हुआ?
गिनती अध्याय २५ की ९ आयत के अनुसार चौबीस हजार मनुष्यों को मार डालने की आज्ञा देने वाला खुदा दयावान कैसे हुआ?
होशे अध्याय १३ की १६ आयत के अनुसार बच्चों और गर्भवती स्त्रियों को मार डालने की आज्ञा देने वाला खुदा दयावान कैसे हुआ?

ऐसे ऐसे अनेक प्रमाण बाइबिल से दिए जा सकते हैं जिनसे स्पष्ट हैं की बाइबिल का ईश्वर हिंसा में विश्वास रखता हैं एवं उनका दयावान होना भ्रम मात्र हैं।

पादरी ने जब देखा कि उसकी हर बात का युक्ति एवं तर्क संगत सप्रमाण खंडन हो गया तो वह अपना बोरियां बिस्तर समेत कर वहां से नौ दो ग्यारह हो गया और हमारे आर्यसमाजी प्रचारक पंडित लेखराम जी सत्य का मंडन एवं असत्य का खंडन करने के लिए आगे बढ़ गए।


सभी पाठकों को अब यह निर्णय करना हैं की उन्हें सत्य ज्ञान वेद में विश्वास रखना हैं अथवा अविद्या के कूप बाइबिल में डूबना हैं।



(पंडित लेखराम के लेखों का संग्रह अमर ग्रन्थ "कुलयात आर्य मुसाफिर" से सभी प्रमाण लिए गए हैं।)

डॉ विवेक आर्य   

क्या आप जानते है की वेद की आज्ञाओ के उलंघन का कितना भयंकर परिणाम हो सकता है ?




क्या आप जानते है भारत की दुर्गति के पीछे वेद की आज्ञाओ का उलंघन ही था ?

1.) पहली आज्ञा

अक्षैर्मा दिव्य: ( ऋ 10/34/13 )
अर्थात जुआ मत खेलो ।

इस आज्ञा का उलंघन हुआ । इस आज्ञा का उलंघन धर्म राज कहेजाने वाले युधिष्टर ने किया ।

परिणाम :- एक स्त्री का भरी सभा में अपमान । महाभारत जैसा भयंकर युद्ध जिसमे करोड़ो सेना मारी गयी । लाखो योद्धा मारे गये । हजारो विद्वान मारे गये और आर्यावर्त पतन की ओर अग्रसर हुआ ।

2.) दूसरी आज्ञा

मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः । ( ऋ 8/48/14)

अर्थात आलस्य प्रमाद और बकवास हम पर शासन न करे ।

लेकिन इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । महाभारत के कुछ समय बाद भारत के राजा आलस्य प्रमाद में डूब गये ।

परिणाम :- विदेशियों के आक्रमण 
3.) तीसरी आज्ञा

सं गच्छध्वं सं वद्ध्वम । ( ऋ 10/191/2 )

अर्थात मिल कर चलो और मिलकर बोलो ।

वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । जब विदेशियों के आक्रमण हुए तो देश के राजा मिल कर नहीं चले । बल्कि कुछ ने आक्रमणकारियो का ही सहयोग किया ।

परिणाम :- लाखो लोगो का कत्ल लाखो स्त्रियों के साथ दुराचार अपार धन धान्य की लूटपाट गुलामी ।

4.) चौथी आज्ञा

कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहितः । ( अथर्व 7/50/8 )

अर्थात मेरे दाए हाथ में कर्म है और बाएं हाथ में विजय ।

वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ । लोगो ने कर्म को छोड़ कर ग्रहों फलित ज्योतिष आदि पर आश्रय पाया ।

परिणाम : अकर्मण्यता  भाग्य के भरोसे रह आक्रान्ताओ को मुह तोड़ जवाब न देना
धन धान्य का व्यय मनोबल की कमी और मानसिक दरिद्रता ।

5.) पांचवी आज्ञा

उतिष्ठत सं नह्यध्वमुदारा: केतुभिः सह ।
सर्पा इतरजना रक्षांस्य मित्राननु धावत ।। ( अथर्व 11/10/1)

अर्थात हे वीर योद्धाओ ! आप अपने झंडे को लेकर उठ खड़े होवो और कमर कसकर तैयार हो जाओ । हे सर्प के समान क्रुद्ध रक्षाकारी विशिष्ट पुरुषो ! अपने शत्रुओ पर धावा बोल दो ।

वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ जब लोगो के बिच बुद्ध ओर जैन मत के मिथ्या अहिंसावाद का प्रचार हुआ । लोग आक्रमणकरियो को मुह तोड़ जवाब देने की वजाय “ मन्युरसि मन्युं मयि धेहि “ यजु 19.9 को भूल कर मिथ्या  अहिंसावाद को मुख्य मानने लगे ।

परिणाम :- अशोक जैसा महान योद्धा का युद्ध न लड़ना । विदेशियों के द्वारा इसका फायदा उठा कर भारत पर आक्रमण करना आरम्भ हुवा ।

6.) छठी आज्ञा

मिथो विघ्राना उप यन्तु मृत्युम । ( अथर्व 6/32/3 )

अर्थात परस्पर लड़नेवाले मृत्यु का ग्रास बनते है और नष्ट भ्रष्ट हो जाते है ।

वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ ।

परिणाम - भारत के योद्धा आपस में ही लड़ लड़ कर मर गये और विदेशियों ने इसका फायदा उठाया ।

7.) सातवी आज्ञा

न तस्य प्रतिमा अस्ति

अर्थात ईश्वर का कोई प्रतिमान नहीं है ।

लेकिन इस आज्ञा का उलंघन हुआ और परिणाम आपके समक्ष है ।

परिणाम :- १.) ईश्वर के सत्य स्वरूप को छोड़ कर भिन्न स्वरूप की उपासना ।
२.) करोड़ो रूपये मंदिर में व्यय करके दरिद्र होते है और उसमे प्रमाद होता है ।
३.) स्त्री पुरुषो का मन्दिर में मेला होने से व्यभिचार ,लड़ाई बखेड़ा और रोगादि उत्पन्न होते है ।
४.)उसी को धर्म अर्थ काम और मुक्ति का साधन मान के पुरुषार्थ रहित होकर मनुष्य जन्म व्यर्थ गँवाते है ।
५.) नाना प्रकार की विरुद्ध स्वरूप नाम चरित्रयुक्त मूर्तियों के पुजारियो का एक मत नष्ट होके विरुद्ध मत में चल कर आपस में फूट बढ़ाके देश का नाश करते है ।
६.) उसी के भरोसे में शत्रु की पराजय और अपनी विजय मान के बैठे रहते है । उनकी पराजय होके राज्य स्वतन्त्रता और धन का सुख उनके शत्रुओ के अधीन हो जाता है ।
७.) परमेश्वर की उपासना के स्थान पर पत्थर की मूर्ति को पूजते है तो परमेश्वर उन दुष्ट बुद्धिवालो का सत्यनाश कर देता है ।
८.) भ्रमित होके मंदिर मंदिर देश देशान्तर में घूमते घूमते दुःख पाते धर्म संसार और परमार्थ का नष्ट करते और चोर आदि से पीड़ित होते है ।
९.) दुष्ट पुजारियो को धन देते है । वे उस धन को वेश्या मद्य मांसाहार लड़ाई बखेड़ो में व्यय करते है जिससे दाता के सुख का मूल नष्ट होकर दुःख होता है ।
१०) उन मूर्तियों को कोई तोड़ डालता है वा चोर ले जाता है तब हा हा करके रोते है ।
११.) पुजारी पर -स्त्रियों के संग और पुजारिन पर-पुरुषो के संग से दूषित होती है ।
साभार अनुज काम्बोज
संपादन- डॉ सुबोध जी 

Monday, December 1, 2014

गुरुडम और अन्धविश्वास



रामपाल, आशाराम बापू, डेरा सच्चा सौदा, साईं बाबा, आशुतोष महाराज वगैरह वगैरह इस प्रकार से कभी न ख़त्म होने वाली इस सूची में अनेक बाबा, अनेक स्वघोषित भगवान, अनेक कल्कि अवतार इस समय भारत देश में घूम रहे हैं। बहुत लोग यह सोचते हैं की इन गुरुओं ने इतने व्यापक स्तर पर पाखंड को फैला रखा हैं फिर भी लोग सब कुछ जानते हुए भी इन गुरुओं के चक्कर में क्यों फँस रहे हैं। इस रहस्य को जानने के लिए हमें यह जानना आवश्यक हैं कि इन गुरुओं से उनके भक्तों को क्या मिलता हैं जिसके कारण वे गुरु के डेरे पर खींचे चले जाते हैं। हम रामपाल के उदहारण से यह समझने का प्रयास करेंगे की कोई भी सवघोषित गुरु कैसे अपनी दुकानदारी चलाता हैं।

1. रामपाल हर सत्संग में प्रसाद में खीर खिलाता था :   रामपाल की खीर को लेकर कई कहावतें प्रचलित थी। सतलोक आश्रम में हर महीने की अमावस्या पर तीन दिन तक सत्संग होता था। तीनों दिन साधकों को खीर जरूर मिलती थी। दूसरे व्यंजन भी परोसे जाते थे। साधकों का मानना था कि बाबा की खीर की मिठास से जीवन में भी मिठास आती थी। गौरतलब यह हैं की यह खीर उस दूध से बनती थी जिस दूध से रामपाल  को नहलाया जाता था। पाठक स्वयं सोच सकते हैं की उस दूध में पसीना एवं शरीर से निकलने वाले अन्य मल भी होते थे।


2. रामपाल 10 हजार में आशीर्वाद देता था:  रामपाल कई लाइलाज बीमारियों का निदान महज आशीर्वाद से करने का दावा करता था। इसके लिए साधक को स्पेशल पाठ कराना पड़ता था । इस पाठ पर 10 हजार रुपए खर्च आता था। कैंसर जैसे अंतिम अवस्था के असाध्य रोग से पीड़ित कई लोग भी आश्रम में  आते थे। आश्रम के प्रबंधक पहले उन्हें गुरु दीक्षा लेने और फिर आशीर्वाद मिलने की बात करते थे।


3.रामपाल भूत-प्रेतों के साये से छुटकारा दिलाने का दावा करता था : ऐसा प्रचार किया गया कि रामपाल का सत्संग सुनने से भूत-प्रेत का साया चला जाता था।

4. मृतप्राय को जिंदा करने की ताकत :  रामपाल के आश्रम में कई ऐसे लोग भी आते हैं, जो मृत्यु शैया पर होते हैं। प्रबंधन कमेटी कई ऐसे किस्से सुनाती थी  जिसमें बाबा के दर्शन मात्र से मृत प्राय: व्यक्ति भी जिंदा हो उठा।



5.  स्वर्ग में सीट पक्की :  रामपाल अपने साधकों को दीक्षा देकर सतलोक यानी स्वर्ग की प्राप्ति का दावा करता था। पहले दीक्षा दिलाता , फिर चार महीने लगातार सत्संग में आने में सत्यनाम देन और अंत में सारनाम मिलता था। जिसे सारनाम मिल जाता उसकी स्वर्ग में सीट पक्की हो जाती थी।


6. गधा, कुत्ता, बिल्ली बनने से बचने का आशीर्वाद : रामपाल मोक्षप्राप्ति की भी गारंटी देता था। रामपाल कहता था कि गधे, कुत्ते बिल्ली नहीं बनना चाहते हो तो मेरा आशीर्वाद ले लो। इसके अलावा यह गारंटी दी जाती थी कि एक बार रामपाल का सत्संग जिसने सुन लिया, उसके सभी दुख दूर हो जाएंगे।

ले देकर सभी पाखंडी गुरुओं की यही सब बातें हैं जो अलग अलग रूप में  मुर्ख बनाने के लिए प्रचारित कर दी जाती हैं। प्राय: सभी पाखंडी गुरु यह प्रचलित कर देते हैं की जीवन में जितने भी दुःख, जितनी भी विपत्तियाँ, जितने भी कष्ट, जितनी भी कठिनाइयाँ, जितनी भी दिक्कते जैसे बीमारी, बेरोजगारी, घरेलु झगड़े, असफलता, व्यापार में घाटा, संतान उत्पन्न न होना आदि हैं उन सभी का निवारण गुरुओं की कृपा से हो सकता हैं।
        सबसे पहले तो यह जानने की आवश्यकता हैं की जीवन में दुःख का कारण मनुष्य द्वारा किये गए स्वयं के कर्म हैं। जो जैसा करेगा वो वैसा भरेगा के वैदिक सिद्धांत की अनदेखी कर मनुष्य न तो अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाने का प्रयत्न करना चाहता हैं, न ही पाप कर्मों में लिप्त होने से बचना चाहता हैं परन्तु उस पाप के फल को भोगने से बचने के लिए अनेक अनैतिक एवं असत्य मान्यताओं को स्वीकार कर लेता हैं जिन्हें हम अन्धविश्वास कहते हैं। जिस दिन हम यह जान लेंगे की प्रारब्ध (भाग्य) से बड़ा पुरुषार्थ हैं उस दिन हम भाग्यवादी के स्थान पर कर्मशील बन जायेंगे। जिस दिन हम यह जान लेंगे की कर्म करने से मनुष्य जीवन की समस्त समस्यायों को सुलझाया सकता हैं उस दिन हम चमत्कार जैसी मिथक अवधारणा का त्याग कर देंगे। जिस दिन मनुष्य निराकार एवं सर्वव्यापक ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखने लगेगा और यह मानने लगेगा की ईश्वर हमें हर कर्म करते हुए देख रहा हैं इसलिए पापकर्म करने से बचो उस दिन वह सुखी हो जायेगा। जिस दिन मनुष्य ईश्वरीय कर्मफल व्यवस्था में विश्वास रखने लगेगा उस दिन वह पापकर्म से विमुख हो जायेगा। पूर्व में किये हुए कर्म का फल भोगना निश्चित हैं मगर वर्तमान एवं  भविष्य के कर्मों को करना हमारे हाथ में हैं। मनुष्य के इसी कर्म से मिलने वाले फल की अनदेखी कर शॉर्टकट ढूंढने की आदत का फायदा रामपाल जैसे पाखंडी उठाते हैं। इसलिए अंधविश्वास का त्याग करे, ईश्वरीय कर्मफल व्यवस्था को समझे एवं पुरुषार्थी बने। इसी में मानव जाति का हित हैं।

डॉ विवेक आर्य

Sunday, November 30, 2014

शाकाहार vs मांसाहार


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श्रीमान मुहम्मद फारूख खान जी द्वारा लिखित "दयाभाव और मांसाहार " नामक १४ पृष्टीय लेख पढ़ने को मिला |

आपका कथन है-
"कुछ लोग कहते है की मांसाहारियों को ईश्वर ने दांत और पंजे दिये है जो की इस बात का प्रमाण है की वे शिकारी है परंतु मनुष्यों को नहीं दिये | इस प्रकार की बात करने वाला यह नहीं सोचता है की ईश्वर ने जो मनुष्य को चीरने और पकड़ने के लिये दांत और पंजे नहीं दिये मगर उसको बुद्धि दी है जिसके द्वारा वह अपने उपयोग के लिये अच्छे से अच्छा हथियार बन सकता है | ईश्वर ने पशुओं को ठंडी से बचने के लिये मोटी चमडी और बड़ी चमडी दी है , तब मनुष्य को उसने बुद्धि दी है जिससे काम लेकर वह अपने लिये अच्छी से अच्छी शाल और कंबल तैयार कर सकता है पशुओं के शरीर पर उन व बाल देखकर कोई भी मनुष्य यह परिणाम खोजने लगे की मनुष्य को उनी वस्त्रों का उपयोग नहीं करना चाहिये स्पष्ट है की इस प्रकार का विचार बड़ा हास्यास्पद है |"
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समीक्षा -
______ आपका यह तर्क निश्चित ही सुन्दर व प्रभावी है परंतु आप यह न सोचें की शाकाहारियों के पास यही एक रामबाण है | हमारे पास अन्य अनेकों अस्त्र शस्त्र तर्क है जिन से बचना (उत्तर देना ) मांसाहारियों के वश की बात नहीं |
1 सर्वप्रथम तो प्रकवर्णित तर्कों , वैज्ञानिक व आर्थिक तथ्यों का कोई उत्तर आपके पास है नहीं |

2 चलिये पंजों का काम हथियार ने कर लिया परंतु जो दांत रचना मांसाहारियों व शाकाहारियों की भिन्‍न है उसका क्या करेंगे ?दांत 3 श्रेणियों के होते है काटने वाले , पकड़ने या फाड़ने वाले , पीसने या चबाने वाले | मांसाहारियों में पकड़ने वाले दांत अति नुकीले व तीक्ष्ण होते है , वे हमारे पास नहीं है | मसाहारियों का जबड़ा अगल बगल नहीं हटता जिस से वे अपना आहार पीस नहीं सकते बल्कि चबा ही सकते है , जबकि हमारे दाढ पीसने का ही काम करते है |

3 मांसाहारी जानवरों का आमाशय लगभग गोल और आँतें मुह से पुच्छ मूल तक की लंबाई से 3 से 5 गुनी तक होती है जबकि हमारी आँतें पूरे शरीर से दस से बारह गुनी होती है और सिर से रीढ़ की अंतिम केशरूका से लगभग 24 गुनी | उधर घास खाने वाले पशुओं में लगभग 20 से 28 गुनी होती है | आप विचारें की हमारी आँतें मांसाहारी की अपेक्षा शाकाहारी पशुओं से ही समानता रखती है |

अब आपकी मांसाहार से निर्मित बुद्धि आंतों को छोटी तो नहीं कर पायेगी ? आमाशय को गोल तो नहीं किया जा सकेगा ?

4 जिस बच्चे ने पशुवध के विषय में कुछ नहीं सुना है , वह यदि मांस खाता भी हो तो भी किसी मोटे ताजे बकरे अथवा बैल को देखकर लालायित नहीं होगा जबकि मांसाहारी प्राणी लालायित ही होगा |

5 शाकाहारियों में पाचन मुह से प्रारंभ होता है जबकि मांसाहारियों का पाचन आमाशय से प्रारंभ होता है |

6 मांसाहारी जनवर मांस के साथ हड्डी भी खाते है परंतु मानव हड्डी नहीं खा सकता

7 शाकाहारियों की लार मे क्षारीय एंजाइम टाइलिन सोलाइवा एमाईलेस होता है जो स्टार्च को पछता है जबकि मांसाहारियों की लार अम्लीय होती है |

8 शाकाहारियों के नवजात शिशु को मांसाहार पर जीवित व स्वस्थ नहीं रखा जा सकता मांसाहारी पशु व महिलाओं में दूध भी कम उतरता है

9 मांसाहारी रात्रि में भी स्पष्ट देखते है | उनकी आँखें चमकीली व गोल होती है जबकि शाकाहारी की आँखें ऐसी नई होती |

10 शाकाहारी प्रायः होठ लगाकर पानी पीते है जबकि मांसाहारी जीभ से पानी पीते है |

11 फूल ,पत्ती, फल, गुलदस्तों से घरों को सजाकर ही मानव का चित्त प्रसन्न रहता है जबकि घोर मांसाहारी भी अपने घर द्वार फर्नीचर को मास चमड़ा खून हड्डी आदि से सजना नहीं चाहेगा | इस से सिद्ध होता है की मानव को इन पदार्थों से स्वभाविक घृणा है |

12 मांसाहारी जनवर को देखते ही उनके भक्ष्य जनवर भाग खड़े होते है और चीखते व चिल्लाते है जैसे बिल्ली को देखते ही पक्षी गिलहरी आदि भागकर चीखते व चिल्लाते है जबकि फारूख साहब आपको सहज स्थिति में देखकर बकरे मुर्गे गाय गधे भैंस भाग नहीं सकते और न भयभीत होकर चीखने लगेंगे

महाशय क्या यह 12 वर्णित भेद आपकी समझ में नहीं आते ?
किस कुदरत व खुदा पर यह आरोप लगा रहे है की उसने पशुओं को हमारे खाने के लिये बनाया तो वह खुदा कुरान का मनुष्‍यवत खुदा हो सकता है अथवा हजरत मुहम्मद का आदेश हो सकता है न की सृष्टि का सृजन करने हारा , पालनहार व नियंता परमात्मा | क्यूं की यदि ईश्वर को यही स्वीकार होता तो वा हमरी शरीर रचना भी मांसाहारियों के समान क्यूं नहीं बनाता?

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Chanakya's most popular quotes



Chanakya's most popular quotes

Chanakya on Lust

There is no disease so destructive as lust. There is no disease so destructive as lust. Chanakya described lust as the biggest barrier in a man's growth. Lusty individual would never be able to concentrate of other requisites of life. However, Chanakya was not against sex.

Chanakya on Self Improvement..

Before you start some work, always ask yourself three questions : 1. Why am I doing it. 2. What the results might be and 3. Will I be successful. Only when you think deeply and find satisfactory answers to these questions, go ahead.


Chanakya on Family

He who is overly attached to his family members experiences fear and sorrow, for the root of all grief is attachment. Thus one should discard attachment to be happy.

Chanakya on Kingdom

If the king is pious, the subjects become so; but if the king is vicious, the subjects become the same. If he be indifferent to both (virtue and vice), then they too bear the same character. In short, as is the king so are his subjects.


Chanakya on Failures

Once you start a working on something, don't be afraid of failure and don't abandon it. People who work sincerely are the happiest."

Chanakya on Education

Education is the best friend. An educated person is respected everywhere. Education beats the beauty and the youth

Chanakya on Good Person

The fragrance of flowers spreads only in the direction of the wind. But the goodness of a person spreads in all directions.

Chanakya on Parenting
For five years one’s son should be pampered, the next ten years he should be beaten (meaning he must be disciplined) and once he turns sixteen he should be treated as a friend.

Chanakya on Dharma
For one in an alien land learning is friend, for one staying at home mother is friend , for one suffering from illness medicine is friend and for the departed souls dharma is friend.

Chanakya on Kids
What is the purpose of having a son who is neither learned nor devoted to God? It is useless to have a blind eye which will only result in eye-ache.

Chanakya on Generations
Even as a single good tree with fragrant flowers can spread the fragrance in the entire forest, so also the entire family (or clan) shines by a son possessing good qualities.

Chanakya on Scholars
Scholarship and kingship can never be equated. A king is respected in his own kingdom whereas a scholar is respected everywhere.

Chanakya on Fool men
A wise man has all qualities in him, a fool has only faults. Therefore a single wise person is better than a thousand fools.

Saturday, November 29, 2014

गधे की मजार




एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्‍न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्‍न था गधे के साथ। अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर न ढोना पड़ता था। और गधा बड़ा स्‍वामीभक्‍त था।
लेकिन एक यात्रा पर गधा अचानक बीमार पडा और मर गया। दुःख में उसने उसकी कब्र बनायी, और कब्र के पास बैठकर रो रहा था कि एक राहगीर गुजरा। उस राहगीर ने सोचा कि जरूर किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी है। तो वह भी झुका कब्र के पास। इसके पहले कि बंजारा कुछ कहे, उसने कुछ रूपये कब्र पर चढ़ाये। बंजारे को हंसी भी आई आयी। लेकिन तब तक भले आदमी की श्रद्धा को तोड़ना भी ठीक मालुम न पडा। और उसे यह भी समझ में आ गया कि यह बड़ा उपयोगी व्‍यवसाय है।
फिर उसी कब्र के पास बैठकर रोता, यही उसका धंधा हो गया। लोग आते, गांव-गांव खबर फैल गयी कि किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी। और गधे की कब्र किसी पहूंचे हुए फकीर की समाधि बन गयी। ऐसे वर्ष बीते, वह बंजारा बहुत धनी हो गया।
फिर एक दिन जिस सूफी साधु ने उसे यह गधा भेंट किया था। वह भी यात्रा पर था और उस गांव के करीब से गुजरा। उसे भी लोगों ने कहा, "एक महान आत्‍मा की कब्र है यहां, दर्शन किये बिना मत चले जाना।"
वह गया देखा उसने इस बंजारे को बैठा, तो उसने कहा, "किसकी कब्र है यहा, और तू यहां बैठा क्‍यों रो रहा है ?"
उस बंजारे ने कहां, "अब आप से क्‍या छिपाना, जो गधा आप ने दिया था। उसी की कब्र है। जीते जी भी उसने बड़ा साथ दिया और मर कर और ज्‍यादा साथ दे रहा है।"
सुनते ही फकीर खिल खिलाकर हंसाने लगा। उस बंजारे ने पूछा - "आप हंसे क्‍यों ?"
फकीर ने कहां - "तुम्‍हें पता है। जिस गांव में मैं रहता हूं वहां भी एक पहूंचे हएं महात्‍मा की कब्र है। उसी से तो मेरा काम चलता है।"
बंजारे ने पूछा - "वह किस महात्‍मा की कब्र है ?"
फकीर ने जवाब दिया- "वह इसी गधे की मां की।
शिक्षा- जो लोग यह कहते हैं कि केवल आस्था से ही ईश्वर की भक्ति संभव हैं उन्हें यह नहीं मालूम की बिना ज्ञान के आस्था अन्धविश्वास कहलाती हैं।

संस्कृत भाषा की महता



आज संस्कृत एवं जर्मन भाषा को लेकर चर्चा जोरो पर हैं। तीसरी भाषा के रूप में केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन के स्थान पर संस्कृत भाषा को लागु करने के सरकार के फैसले का कुछ लोग जोर शोर से विरोध कर रहे हैं। उनका कहना हैं की जर्मन जैसी विदेशी भाषा को सीखने से रोजगार के नवीन अवसर मिलने की अधिक सम्भावना हैं जबकि संस्कृत सीखने का कोई लाभ नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति जो संस्कृत भाषा कि महता से अनभिज्ञ हैं इसी प्रकार की बात करेगा परन्तु जो संस्कृत भाषा सीखने के लाभ जानता हैं उसकी राय निश्चित रूप से संस्कृत के पक्ष में होगी। संस्कृत भाषा को जानने का सबसे बड़ा लाभ यह हैं कि हमारे धर्म ग्रन्थ जैसे वेद, दर्शन, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता इत्यादि में वर्णित नैतिक मूल्यों, सदाचार,चरित्रता, देश भक्ति, बौद्धिकता शुद्ध आचरण आदि गुणों को संस्कृत की सहायता से जाना जा सकता हैं। जो जीवन में हर कदम पर मार्गर्दर्शन करने में परम सहायक हैं। मनुष्य जीवन का उद्देश्य केवल आजीविका कमाना भर नहीं हैं। अगर ऐसा होता तो मनुष्य एवं पशु में कोई अंतर नहीं होता क्यूंकि पेट भरना, बच्चे पैदा करना और उनका लालन पोषण करना दोनों में एक समान हैं। मनुष्य के पास कर्म करने की स्वतंत्रता हैं एवं कर्म करते हुए आध्यात्मिक उन्नति करना उसके जीवन का लक्ष्य हैं। इस उन्नति में नैतिक मूल्यों का यथार्थ योगदान हैं। इन मार्गदर्शक मूल्यों को वेदादि धर्म ग्रंथों के माध्यम से प्रभावशाली रूप से सीखा जा सकता हैं।
              एक उदहारण से इस विषय को समझने का प्रयास करते हैं। एक सेठ की तीन पुत्र थे। वृद्ध होने पर उसने उन तीनों को आजीविका कमाने के लिए कहा और एक वर्ष पश्चात उनकी परीक्षा लेने का वचन दिया और कहा जो सबसे श्रेष्ठ होगा उसे ही संपत्ति मिलेगी। तीनों अलग अलग दिशा में चल दिए। सबसे बड़ा क्रोधी और दुष्ट स्वाभाव का था। उसने सोचा की मैं जितना शीघ्र धनी बन जाऊंगा उतना पिताजी मेरा मान करेंगे। उसने चोरी करना, डाके डालना जैसे कार्य आरम्भ कर दिए एवं एक वर्ष में बहुत धन एकत्र कर लिया। दूसरे पुत्र ने जंगल से लकड़ी काट कर, भूखे पेट रह कर धन जोड़ा मगर उससे उसका स्वास्थ्य बेहद कमजोर हो गया , तीसरे पुत्र ने कपड़े का व्यापार आरम्भ किया एवं ईमानदारी से कार्य करते हुए अपने आपको सफल व्यापारी के रूप में स्थापित किया। एक वर्ष के पश्चात पिता की तीनों से भेंट हुई।  पहले पुत्र को बोले तुम्हारा चरित्र और मान दोनों गया मगर धन रह गया इसलिए तुम्हारा सब कुछ गया क्यूंकि मान की भरपाई करना असंभव हैं, दूसरे पुत्र को बोले तुम्हारा तन गया मगर धन रह गया इसलिए तुम्हारा कुछ कुछ गया और जो स्वास्थ्य  का तुम्हें नुक्सान हुआ हैं उसकी भरपाई संभव हैं, तीसरे पुत्र को बोले तुम्हारा मान और धन दोनों बना रहा इसलिए तुम्हारा सब कुछ बना रहा। ध्यान रखो मान-सम्मान तन और धन में सबसे कीमती हैं।
              यह मान सम्मान, यह नैतिकता, यह विचारों की पवित्रता, यह श्रेष्ठ आचरण, यह चरित्रवान होना यह सब उस शिक्षा से ही मिलना संभव हैं जिसका आधार वैदिक हैं और जिस शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन हैं उससे इन गुणों की अपेक्षा रखना असंभव हैं। यह केवल उसी शिक्षा से संभव हैं जो मनुष्य का निर्माण करती हैं। मनुष्य निर्माण करने और सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान से प्रभावित करने की अपार क्षमता केवल हमारे वेदादि धर्म शास्त्रों में हैं और इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता हैं। एक साधारण से उदहारण से हम इस समझ सकते हैं कि जीवन यापन के लिए क्या क्या करना चाहिए यह आधुनिक शिक्षा से सीखा जा सकता हैं मगर जीवन जीने का क्या उद्देश्य हैं यह धार्मिक शिक्षा ही सिखाती हैं। समाज में शिक्षित वर्ग का समाज के अन्य वर्ग पर पर्याप्त प्रभाव होता हैं। अगर शिक्षित वर्ग सदाचारी एवं गुणवान होगा तो सम्पूर्ण समाज का नेतृत्व करेगा। अगर शिक्षित वर्ग मार्गदर्शक के स्थान पर पथभ्रष्टक होगा तो समाज को अन्धकार की और ले जायेगा।
     इसके अतिरिक्त जर्मन सीखने वाले कितने बच्चे भविष्य में जर्मनी जाकर आजीविका ग्रहण करेंगे यह तो केवल एक अनुमान मात्र हैं। मगर नैतिक शिक्षा ग्रहण कर समाज में आदर्श सदस्य बनने वाले समाज का निश्चित रूप से हित करेंगे। इसमें कोई दौराय नहीं हैं। इसलिए समाज का हित देखते हुए संस्कृत भाषा के माध्यम से नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर समाज का आदर्श नागरिक बनाना श्रेयकर हैं।

डॉ विवेक आर्य