Wednesday, June 9, 2021

आर्यसमाज के हिन्दी आन्दोलन की देन है हरियाणा


आर्यसमाज के हिन्दी आन्दोलन की देन है हरियाणा

(पढ़ने में थोड़ा समय तो लगेगा, पर अपने इतिहास को जानना बहुत आवश्यक है।
जो पेड़-- अपनी जड़ों से कट जाता है- - वह जीवित नहीं रह सकता।)

          हरियाणा प्रदेश को अस्तित्व में आये 52 साल हो रहे हैं। बहुत से लोग अपने अपने नेता के नाम के आगे हरियाणा केसरी, हरियाणा का जन्मदाता तथा हरियाणा का निर्माता आदि विशेषणों का प्रयोग करते हैं। कुछेक बुजुर्गों को छोड़कर आज की युवा पीढ़ी के लोग कम ही जानते हैं कि वेदों की ऋचाओं व गीता उपदेश के लिये प्रसिद्ध इस हरि के प्रदेश को पिछले डेढ़ सौ साल से विदेशियों की ज्यादतियों के साथ-2 यहाँ के राजनेताओं की संकीर्ण सोच का शिकार भी होना पड़ा। आजादी से पहले यहाँ पर उर्दू व फारसी लादी गई थी तथा आजाद होने के बाद यहाँ के लोगों को गुरमुखी का स्वाद भी चखना पड़ा। भाषा की गुलामी से बचाने के लिये इस प्रदेश की जनता का आर्यसमाज ने डटकर साथ दिया है। इसने अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार को अपना मुख्य मिशन बनाया। इस राष्ट्र भक्त संस्था के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपनी मातृभाषा गुजराती को छोड़ अपने सब ग्रंथ हिन्दी और संस्कृत में तैयार किये। पंजाब के हरियाणा क्षेत्र में आर्यसमाज का सबसे अधिक प्रचार हुआ। इसलिए यहाँ पर हिन्दी का आम जनता की जुबान से जुड़ना एक स्वाभाविक बात थी। अंग्रेजों के राज में सारा सरकारी कामकाज उर्दू में होता था, परन्तु आर्यसमाजी सज्जन पुरुष व संस्थायें सब काम हिन्दी में ही करती थीं। आर्यसमाज के प्रभाव के कारण ही पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी रत्न, भूषण तथा प्रभाकर की परीक्षायें होती थीं। 

            स्वतन्त्रता प्राप्ति तथा विभाजनोपरांत वर्तमान हरियाणा के इलाके की जनता तत्कालीन पंजाब की राजसत्ता की भाषा नीति से बिल्कुल ही नाराज थी। सबसे पहले अलग हरियाणा का विचार सन् 1923 में स्वामी सत्यानंद के मन में लाहौर प्रवास के दौरान आया था। उन्होंने इसके लिये लाहौर काॅलेज में पढ़ रहे सोनीपत के चै0 शादीलाल व चै0 सूरजमल को तैयार किया। इसके बाद कृषि मंत्री चै0 छोटूराम ने अलग हरियाणा का प्रस्ताव आॅल इंण्डिया जाट स्टूडेंट कान्फ्रेंस में पास कराया था। भाषायी आधार पर पुनर्गठन की मांग कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में 1930 में उठायी गयी थी।
 इस तरह आजादी के बाद भी भाषा का विवाद उठ खड़ा हुआ। भाषा के इस विवाद को हल करने के लिये सर्वमान्य सूत्र तैयार किया गया, जिसे सच्चर फार्मूले के नाम से जाना जाता है। इस फार्मूले के अनुसार पंजाब को हिन्दी, पंजाबी तथा द्विभाषी- तीन भाषाई क्षेत्रों में बांट दिया गया। जो द्विभाषी क्षेत्र निश्चित किये गये थे, वे मूलतः हिन्दी भाषी ही थे। फार्मूले के अनुसार अंबाला डिवीजन का अद्दिकतर भाग हिन्दी भाषी, जालंधर डिवीजन को पंजाबी भाषी के रूप में एक भाषी रखा गया तथा अबोहर फाजिल्का व अंबाला मण्डल के कुछ भागों को द्विभाषी श्रेणी में रखा गया। इस फार्मूले का सबसे पहले विरोध जांलधर मंडल के हिन्दुओं ने किया क्योकि उन पर पंजाबी भाषा सरकार द्वारा थोंप दी गई थी। नवम्बर 1949 में सच्चर सरकार गिर गई।
 सच्चर फार्मूले का विरोध करने तथा पंजाब में हिन्दी को न्यायोचित स्थान दिलाने के लिए आर्यसमाज उस समय आंदोलनरत था। इसी आंदोलन की कड़ी में ही 13 सितम्बर 1953 को अंबाला में पंजाब प्रांतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन हुआ। जब प्रोफेसर शेरसिंह तथा चै0 देवीलाल ने सच्चर फार्मूले का विरोद्द किया तो पंजाब के राजनेताओं ने रीजनल फार्मूले के नाम पर हिन्दी भाषी जनता को फंसाने का नया जाल बिछाया। रिजनल फार्मूला जब लोकसभा में पारित हो गया तो हिन्दी प्रेमी जनता को बड़ी चिन्ता हुई। रीजनल बनाने के लिये हिन्दी तथा पंजाबी इलाकों की पहचान के परिसीमन की आवश्यकता नये सिरे से महसूस हुई। पण्डित गोविन्द वल्लभ पन्त के निर्देशानुसार इन क्षेत्रों की पहचान के लिए प्रताप सिंह कैरों, ज्ञानी करतार सिंह, पंजाबी हिन्दुओं के प्रतिनिधि के रूप में प्रताप समाचार पत्र के संपादक वीरेन्द्र, हरियाणा की ओर से प्रोफेसर शेर सिंह, चै0 देवीलाल और पण्डित मौलीचन्द्र शर्मा की उपसमिति बनाई गई।

           इस उपसमिति ने अपनी सिफारिश में कहा कि अबोहर फाजिल्का के 105 गांव हिन्दी क्षेत्र में होने चाहिएँ। इस प्रकार रीजनल फार्मूला हिन्दी भाषियों के लिये चुनौती बनकर आया। हरियाणा के लोगों की जुबान पर पंजाबी को जबरन थोंप दिया गया। जनता ने आर्यसमाज के नेतृत्व में आंदोलन व प्रदर्शनों से अपना रोष प्रकट किया परन्तु पंजाब सरकार मानने वाली नहीं थी। इस स्थिति का मुकाबला करने के लिये 1956 में जालंधर के साईदास काॅलेज में पंजाब भर के आर्य नेताओं की बैठक हुई थी। इस बैठक में स्वामी आत्मानन्द जी प्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, आनन्द स्वामी, आचार्य भगवान देव, जगदेव सिंह सिंद्धान्ती, आचार्य रामदेव, यश संपादक मिलाप अखबार, वीरेन्द्र संपादक प्रताप, लाला जगत नारायण संपादक हिन्द केसरी, प्रिसिंपल सूरजभान, प्रिंसिपल भगवान दास, कैप्टन केशवचन्द्र तथा नारायण दास ग्रोवर आदि नेताओं ने भाग लिया। यहीं पर हिन्दी रक्षा समिति का स्वामी आत्मानन्द की अध्यक्षता में गठन हुआ तथा प्रिंसिपल सूरजभान तथा जगदेव सिंह सिद्धांती को उपप्रधान व मंत्री बनाया गया।

           हिन्दी रक्षा समिति का शिष्टमंडल प्रताप सिंह कैरों से मिला, परन्तु वहाँ से कोरे आश्वासन ही मिले। प्रताप सिंह कैरों अपने वचनों से फिरते रहे। सन् 1957 के चुनाव के समय कैरों ने आंदोलन खत्म करने की अपील की तथा उसके बाद हिन्दी भाषियों के ऊपर से पंजाबी भाषा की जबरदस्ती हटाने का आश्वासन दिया परन्तु पुनः मुख्यमंत्री बनने पर पंजाबी हटाने से स्पष्ट इन्कार कर दिया गया। केैरों की वादाखिलाफी से प्रोफेसर शेरसिंह को भारी धक्का लगा क्योंकि उन्हीं के कहने से आर्यसमाज ने हिन्दी आंदोलन स्थगित किया था। जब सरकार रास्ते पर आती नहीं दिखाई दी तो सन् 1957 के अप्रैल महीने में आंदोलन का बिगुल बजा दिया गया। मई मास में आंदोलन के रास्ते से हटने के लिये तरह-2 के प्रलोभन दिये गये। पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल सीएन सिंह ने उन्हें कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का उपकुलपति बनाने का प्रस्ताव किया परन्तु प्रोफेसर शेरसिंह ने वाइस चांसलर के पद को हिन्दी भाषा के आगे बिल्कुल गौण माना तथा हिन्दी आंदोलन में कूदने का संकल्प राज्यपाल के समक्ष पुनः दोहराया।

           हिन्दी आंदोलन के बढ़िया तौर-तरीकों के कारण इसका द्दरातल राष्ट्रीय स्तर पर विस्तृत होता जा रहा था। आंदोलन में जनसंघ, हिन्दू महासभा, कांग्रेसी कार्यकर्ताओं तथा नेताओं ने राजनैतिक सीमा लांघकर भाग लेना शुरू कर दिया। कैरों ने तत्कालीन कांग्रेसी विधायकांे पर दबाव बनाने के लिये केन्द्रीय कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई को बुलाया। मोरारजी भाई ने पंजाब के तत्कालीन विधायकों की बैठक चण्डीगढ़ में बुलाई तथा प्रताप सिंह कैरों का साथ देने की अपील की। उस बैठक में प्रोफेसर शेरसिंह ने आंदोलन को समय की जरूरत बताते हुये कहा था कि कांग्रेस पार्टी के संविधान में द्विभाषी राज्यों की भाषा नीति नहीं है।

           बैठक में पंजाबी के विरोधी होने से इंकार किया गया, पर पंजाबी को जबरन थोंपे जाने को नाकाबिले बर्दाश्त कहा गया। प्रोफेसर शेरसिंह ने बंबई की मिसाल पेश करते हुये कहा कि बंबई व पंजाब दो द्विभाषी राज्य हैं, परन्तु मुम्बई में मराठी व गुजराती दोनों को समान महत्व दिया जाता है। इस पर मोरारजी देसाई को निरुत्तर होना पड़ा था।
          हिन्दी आन्दोलन में फिरोजपुर जेल में हिन्दी सत्याग्रहियों पर लाठी चार्ज हुआ। इस सुनियोजित वारदात में सुमेरसिंह का स्वर्गवास हो गया। फिरोजपुर जेल में पंजाब के कैदियों से हिन्दी सत्याग्रहियों पर कातिलाना हमला करवाया गया था। इस घटना से समूचे भारतवर्ष के हिन्दी प्रेमियों का कलेजा हिल गया। इसका रोहतक की जनता पर जादुई प्रभाव पड़ा। सरकार ने हिन्दी आंदोलन में अगुआ नेताओं के गिरफ्तारी वारंट जारी करवा दिये। रोहतक के पं0 श्रीराम शर्मा तथा उदय सिंह मान को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रोफेसर शेरसिंह के गिरफ्तारी वांरट जारी किये गये। प्रोफेसर शेर सिंह ने गिरफ्तारी के लिये पुलिस को भी इत्तला दे दी थी परन्तु सरकार ने आंदोलन के उग्र होने के भय से उनकी गिरफ्तारी नहीं की।

          उस समय दयानन्द मठ रोहतक हिन्दी आंदोलन के सत्याग्रह का प्रमुख केन्द्र था। बहु अकबरपुर गांव तो पुलिस छावनी बना रहता था। रोहतक जिले के गांवों में तो सरकार का शासन न होकर दयानन्द मठ रोहतक से जनता आदेश लेकर अपना कार्य करती थी। हिन्दी सत्याग्रह के व्यापक स्वरूप को देखते हुये कांग्रेस सरकार भयभीत हो गई। अतः पुरुषोत्तम दास टंडन ने केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में हस्तक्षेप करके समझौता कराने का प्रयास किया लेकिन जब वार्ता सिरे नहीं चढ़ी तो प्रोफेसर शेरसिंह के गिरफ्तारी वारंट पुनः जारी हो गये। वे दिल्ली चले गये। अब उन्होंने भी पुलिस के साथ आंखमिचैली का खेल छोड़ करके गिरफ्तारी देने के फैसले को ही उचित समझा। अतः उन्होंने 15 नवम्बर 1957 को सत्याग्रह करके गिरफ्तारी देने की घोषणा की। वे वेश बदलकर दीवान हाल में पहुंच गये तथा हजारों हिन्दी सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तारी दी। शेरसिंह की रहनुमाई में गिरफ्तार हुये सत्याग्रहियों को नाभा जेल भेज दिया गया। नाभा जेल में पहले से ही उदय मान सिंह अपने साथियों सहित गिरफ्तार थे। प्रोफेसर शेर सिंह को नाभा से पटियाला जेल में लाया गया। यहाँ पर पहले से ही वीरेन्द्र (संपादक प्रताप), पं0 श्रीराम शर्मा, लाला जगतनारायण, चै0 बदलूराम, स्वामी रामेश्वरानन्द, स्वामी भीष्म तथा महाशय भरतसिंह आदि बंद थे।
 इस आंदोलन में हरियाणा के आचार्य भगवानदेव ने बड़े सुनियोजित ढंग से काम किया। इन्हें इस आंदोलन का फील्ड मार्शल कहा जाता था। उन्होंने वैद्य बलवंत सिंह के साथ मोटरसाईकिल पर सवार होकर गांव -2 पहुंचकर सत्याग्रहियों के जत्थे तैयार किये तथा हिन्दी सत्याग्रह को त्वरित गति देने में अहम भूमिका अदा की। गुरुकुल झज्जर व गुरुकुल नरेला की कुड़की के भी आदेश हो गये थे।
 इस आंदोलन में सत्याग्रहियों ने घर-बार, मठ-मंदिर, खेत-खलिहान, गुरुकुल व गोकुल छोड़कर जेलों और जंगलों में कष्ट उठाये थे। उनके घर, भूमि, भैंस और बैलों की कुर्की के आदेश हुये थे। इस सत्याग्रह से लगभग 50000 सत्याग्रहियों ने कैरों की जेलों को भर दिया था। सत्याग्रहियों ने शारीरिक रूप से भयंकर यातनायें सहीं और लाखों रूपये जुर्माने के भी भरने पड़े। अंत में पंजाब सरकार को घुटने टेककर सत्याग्रहियों की मांग माननी पड़ी।
     प्रोफेसर शेर सिंह के नेतृत्व में हरियाणा लोक समिति पार्टी बनाई गई ताकि हिन्दी भाषा की लडाई जीतने के बाद हरियाणा बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाये रहे। सन् 1965 ई0 में रोहतक रैली में मुख्य अतिथि के रूप में कृपलानी जी ने शिरकत की थी। केन्द्र सरकार पर पूर्ण शिकंजा कसने के लिये चण्डीगढ़ में संयुक्त विधायक दल की बैठक बुलाई गई, जिसमें सभी विद्दायकों ने हरियाणा निर्माण के लिये सामूहिक इस्तीफे का प्रस्ताव पास किया, इस दबाव के कारण चण्डीगढ़ पंजाब को न देकर केन्द्र शासित प्रदेश ही रखा गया। इस आंदोलन की बैसाखियों पर प्रथम नवम्बर 1966 को हरियाणा राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।
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आर्यवीर भाई बंशीलाल जी


आर्यसमाज के महाधन 
आर्यवीर भाई बंशीलाल जी

पुस्तक :-  आर्यसमाज के बलिदान 
लेखक :- स्वामी ओमानन्द जी महाराज 
प्रस्तुति :- अमित सिवाहा 

            जिस समय हैदराबाद स्टेट में यवनराज्य का अत्याचार चरम सीमा पर था और वैदिक धर्म अपना अस्तित्व गवां रहा था उसी समय जिला बीदर के माणिकनगर नामक ग्राम में ब्राह्मण घराने में आपने जन्म लिया था। आपके पूज्य पिता जी का नाम भोलाप्रसाद व माता जी का नाम छट्टोबाई था। आपके एक भाई जिसका नाम श्यामलाल जी वकील तथा तीन बहनें थी। आप बाल्यकाल में अत्यन्त चञ्चल प्रकृति के थे। कहा जाता है ९मास में आप दौड़ने चलने लग गये थे। आप को पांच छः वर्ष को अवस्था में पढ़ने भेज दिया। आपने अपनी श्रेणी में कभी अनुत्तीर्ण होना न सीखा। श्राप के पिता जी कट्टर पौराणिक व पुजारी थे अतः आपको कभी कभी पूजा के लिये भेज दिया करते। परन्तु आप वहां मूर्ति पर चढ़ा हुआ नैवेद्य खाकर चले आते। आप की १५ वर्ष की आयु में पिता जी संसार से चल बसे। उनके कारण पढ़ाई में भी विघ्न आया किन्तु आपने साहस न छोड़ा। आप स्वयं भोजनादि पकाते रहे और घोर परिश्रम से वकालत पास की। वकील बनने से पूर्व ही पक्के आर्य व वैदिक धर्मी हो गये थे। 

        वकील होने के पश्चात् आर्यसमाज के प्रचार में जुट गये और स्थान - स्थान पर जाकर सत्यार्थ प्रकाश की कथा व व्याख्यानादि करने लगे। आप का २५ वर्ष की आयु में विवाह सम्पन्न हुआ। यह संस्कार आपने स्वयं वैदिक रीति से ही किया था। आपने स्थान स्थान पर उत्सवादि कराने प्रारम्भ कर दिये। आपकी माता जी आपको कहा करती थी , आप उपदेश कर जनता की सेवा करें , मैं कार्य कर जनता की सेवा करती हूँ। उत्सवों पर आपकी माता भोजनादि की व्यवस्था में सहयोगी देती थी। आपने अपनी माता जी को भी ४० वर्ष की आयु में पढ़ना सिखाया। माता जी के संसार से चल बसने पर अपनी पनपती हुई वकालत को , जो कि हाईकोर्ट की थी , तिलाञ्जलि दे दी। 

           आपने वकालत में कभी पराजय का मुख न देखा। अपने समय में आप वकीलों के सिरमोर थे। वकालत के बाद आप सर्वप्रयत्न से समाज के प्रचार में जुट गये। हैदराबाद से निकलने वाले ' वैदिक सन्देश ' के प्रकाशक भी रहे। आपको प्रचार को कितनी लगन थी यह निम्न उदाहरण से स्पष्ट हो जाती है। एक बार नीलंगा नामक ग्राम में आर्यसमाज के अन्दर जाकर एक सरकारी अधिकारी ने हवनकुण्ड को लात मारी और चारदीवारी आदि गिराकर समाज को मिटाने का असफल प्रयत्न किया। इसकी सूचना जब आपको मिली तब तत्काल वहां जाकर प्रतिज्ञा की कि जिस ने इसका अपमान किया है उसके धन से दुबारा बनवाकर इसमें यज्ञ करके यहां से जाऊंगा। इधर घर से तार आया कि आपकी पुत्री हैजे से आक्रान्त है। परन्तु आपने अपनी पुत्री की परवाह न की और उत्तर दिया मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी किये बिना यहाँ से नहीं आसकता। 

 
          आपने सरकार में अभियोग चलाया और उस में सफलता प्राप्त की। जिस अधिकारी ने यह कुकृत्य किया था उसके धन से आर्यसमाज व यज्ञवेदी बनवाकर उसमें यज्ञ करके ही लौटे। हैदराबाद राज्य में जहाँ कहीं धार्मिक कृत्यों पर पाबन्दी होती वहां जाकर आप उस कार्य को बड़ी शान से करवाते थे।

            राज्य में जहाँ उत्सव होता था वहाँ शंकासमाधान करने में आप अद्वितीय थे। आपने अनेक स्थानों पर शास्त्रार्थ भी किये थे। उदाहरणार्थ एक मनोरंजक व विचित्र से शास्त्रार्थ का दिग्दर्शन कराता हूं। एक दिन एक विद्वान् लिङ्गायती संन्यासी पधारे। आप भी अपने कुछ साथियों के साथ वहां पर जा धमके। कुछ देर तक वेदविषय पर शास्त्रार्थ होता रहा। अन्त में वह संन्यासी निरुत्तर व क्रोधित होकर कहने लगा- " क्या वेद में सब कुछ है ' ' आपने बलपूर्वक कहा " हाँ "। इस उत्तर को सुनकर साथियों का दम घुटने लगा और आपस में कानाफूसी करते हुए कहने लगे कि वेद में सब कुछ कहां है। एक ने आपके कान में भी कहा कि पण्डित जी आप अपने उत्तर को वापिस ले लें। परन्तु यह दयानन्द का अनन्यभक्त अपने वाक्य को वापिस किस प्रकार लेता। और बलपूर्वक कहा कि वेद में सब कुछ है। तब संन्यासी ने कहा तुम यहां बैठे हो यह वेद में है। आपने उत्तर हाँ में दिया। आपके साथी और भी घबरा गये। परन्तु आप में वेद की अगाध श्रद्धा व भक्ति थी। आपने कहा मैं यहां बैठा हूं यह वेद में है। संन्यासी ने कहा - कैसे ? आपने उत्तर में प्रश्न किया - क्या यह ठीक है मैं यहां बैठा हूं ? उसने उत्तर दिया हां सत्य है। तब आपने कहा कि सत्य को मानना ही वेदों में लिखा है। संन्यासी उत्तर पाकर नतमस्तक हो गया। इस प्रकार के अनेक शास्त्रार्थों में अपने विरोधियों से विजय प्राप्त की।

           जब आप कार्यक्षेत्र में उतरे थे उस समय केवल हैदराबाद में दो समाजें थीं। आपने अपने जीवन काल में अपने परिश्रम से ५०० समाजें स्थापित कीं। इनको एकसूत्र में बांधने के लिये एक प्रतिनिधि सभा की भी स्थापना की। जिसके प्रधान श्री केशवराम जी हाईकोर्ट के जज , और आप महामन्त्री बन गये थे। आदि में केवल तीन उपदेशक नियुक्त किये गये थे। प्रचार कार्य बढ़ता ही गया। परन्तु उपदेशकों को दक्षिणा देने के लिये धन न था। वास्तव में प्रार्यसमाज से प्रेम की परीक्षा का यही समय था। वीर ! धन्य है उस माता को जिसने तुझे जन्म दिया। आपने अपनी धर्मपत्नी की बनारसी साड़ियां बेचकर भी धन की कमी देख आभूषण गिरवी रखकर उपदेशकों का वेतन पूरा किया। इसे ही तो कहते है घर फूक तमाशा। आपके अन्दर एकमात्र धर्मप्रचार की ज्वाला जल रही थी। उसको शान्त करने के लिये ही यह आपका त्याग था। 

           आपने तीन वर्ष तक निशुल्क सभा की सेवा की। मित्र की सहायता से घर का कार्य चलता था। आप दोनों भाई तथा साथ में विनायकराव जी भी होते थे। कभी - कभी हंसी में कहते , राम - लक्ष्मण के बीच में हनुमान भी विद्यमान है। निजाम की नादिरशाही दिन प्रतिदिन बढती हुई देख आपने शिरोमणी सार्वेदेशिक सभा का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराया किन्तु आपको वहां से कोई विशेष सहायता न मिली। आपने अपने कौशल के बल पर सत्याग्रह प्रारम्भ कर दिया। आपके सहयोग के लिये महात्मा स्वामी नारायण तथा स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी आगये। आपको जेल जाने का अवसर नहीं दिया गया। इस कारण विरोधियों की ओर से आवाज आई - भाई बन्शीलाल बाहर क्यों ? जेल में क्यों नहीं जाते।

           इधर जब आप जेल जाने की आज्ञा मांगते तो स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी कहते कि आपके जेल जाते ही हम सत्याग्रह बन्द कर देंगे। विवश होकर आपको लोकापवाद सुनना पड़ा। सत्याग्रह विजय का अधिक श्रेय आपको ही है। सत्याग्रह विजय के बाद आप का जगह - जगह बुलावा होता और भव्य स्वागत होता था। आपके घर की दयनीय दशा देखकर नारायण स्वामी जी ने १०० ) रुपये की सहायता दी। परन्तु आपने इस धन को एकत्रित करके सभा के लिये एक प्रेस लेकर दिया। यह है निःस्वार्थ प्रचार का ज्वलन्त उदाहरण। आप के इस प्रकार के प्रचारकार्य को देखकर सरकारी कर्मचारी व विशेषतया यवन आप से जलने लगे। यहां तक कि आपको मारने का भी षड्यन्त्र रचा गया। एक दिन एक यवन वेष परिवर्तन कर आपके घर आया और कहने लगा मुझे धर्मोपदेश दो। आपने अतिथि सत्कार की दृष्टि से भोजनादि कराया। इतने में आपका मित्र आया उसको इस पर सन्देह होगया। उसने इससे नाम इत्यादि पूछा , जब जाति पूछी तब उत्तर में उसके मुख से अचानक मुसलमान निकल गया। तभी उसे घर से बाहर कर दिया। इस प्रकार आप बच गये। 

           आप में साहस भी कमाल का था। एक बार आर्यसमाज लातूर का उत्सव हो रहा था। दो दिन तो आनन्द से बीत गये। तीसरे दिन कुछ अधिकारी व यवनों ने आर्यसमाज पर धावा बोल दिया। आर्यसमाज बन्द कर दिया जिससे कि कोई अन्दर न आ सके। परन्तु वह नीच दीवारों पर चढ़ गये। इधर स्त्री जाति में भय के मारे कोलाहल मच गया। आपने स्त्रियों को आश्वासन दिया कि जब तक में हूं आप का बाल बांका न होगा। आपने अपनी पिस्तौल से एक अधिकारी को गोली मार दी। वह नीचे गिर पड़ा। फिर क्या था सबके सब गीदड़ की भांति भाग गये। जहां आप स्वयं पुरुषों में प्रचार करते थे वहां अपनी धर्मपत्नी को स्त्रियों में प्रचार करने के लिए तैयार किया। 

         अमरग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की शिक्षा पद्धति को पढ़कर आपके मन में गुरुकुल खोलने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई। अत: आपने अमर शहीद भाई श्यामलाल जी की पुण्य स्मृति में श्यामार्य गुरुकुल की स्थापना सं० १९९९ विजयादशमी तदनुसार १९४२ ई० में की। यह गुरुकुल परिस्थितियों के वशीभूत होकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवर्तित होता रहता था। अन्त में बार्शी शोलापुर में स्थिर हुआ। गुरुकुल का सारा भार आप पर ही था। गुरुकुल की कोई सभा न थी। कुछ दिन बाद श्री आचार्य भगवानदेव जी एवं प्राचार्य राजेन्द्रनाथ शास्त्री जी से आपका सम्पर्क हुआ। तब ही से यह कुल दयानन्द वेदविद्यालय की शाखारूप में चल रहा था। अध्यापन कार्य श्री रुद्रदेव जी व्याकरण शास्त्री कर रहे थे। अन्त समय में इन पंक्तियों के लेखक को भो आठ मास इस गुरुकुल में रहने का होभाग्य प्राप्त हुआ था। सन् ४८ में हैदराबाद की परिस्थितियां बहुत खराब थीं। अतः आपने दिल्ली आकर भारत के गृहमन्त्री लोहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल से मिलकर हैदराबाद की स्थिति का छान करवाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सारा मन्त्रिमण्डल विरोध में होते हुए भी लोहपुरुष ने पुलिस कार्यवाही कर हैदराबाद का भाग्य खोल दिया। परन्तु दुःख से लिखना पड़ता है कि उस स्वर्ग मान दिन के आने से पूर्व ही आप इस संसार से चल बसे। आप का जीवन प्रार्यसमाज के प्रचार और आर्ष शिक्षापद्धति के प्रसार के लिये बलिदान के रूप में पूरा होगया। वृद्ध अवस्था में आपने भी अष्टध्यायो पढ़नी प्रारम्भ की थी , आर्षग्रन्थों से आपको विशेष प्रेम था।

Sunday, June 6, 2021

ज्योतिष पर पौराणिक गुटर-गूँ


ज्योतिष पर पौराणिक गुटर-गूँ

-प्रियांशु सेठ (वाराणसी)

प्रसिद्ध योगगुरु बाबा रामदेव ने बयान दिया कि "ज्योतिष विद्या ने क्यों नहीं कोरोना काल के बारे में पहले जानकारी दी। सारे मुहूर्त भगवान ने बना रखे हैं। ज्योतिषी काल, घड़ी, मुहूर्त के नाम पर बहकाते रहते हैं। बैठे-बैठे ही किस्मत बनाते हैं। किसी ज्योतिष ने यह नहीं बताया कि कोरोना आने वाला है।..."
बाबा रामदेव के इस बयान से पौराणिक मण्डल में खलबली मच गई। एक ओर वैदिक एजुकेशनल रिसर्च सोसायटी के संस्थापक पं० शिवपूजन शास्त्री ने बाबा रामदेव को शास्त्रार्थ की चुनौती दे दी। दूसरी ओर काशी विद्वत परिषद के महामन्त्री डॉ० रामनारायण द्विवेदी ने कहा कि बाबा रामदेव अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं।

दरअसल पौराणिक मण्डल ने कभी ज्योतिष के यथार्थ स्वरूप को समझा ही नहीं। अनार्ष ग्रन्थों को पढ़कर उसने फलित ज्योतिष की भ्रामक अवधारणाओं को स्थापित किया और पूरे मनुष्य समाज को कर्महीन तथा फल मात्र का उपासक बना दिया। आधुनिक युग के सुविख्यात समाज सुधारक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ "सत्यार्थप्रकाश" में फलित ज्योतिष पर कुछ ऐसे विचार प्रकट किए जिसके सामने फलित ज्योतिष की समस्त अवधारणाएं धराशायी हो गईं।[i]

इसमें कोई सन्देह नहीं कि ज्योतिष का प्रतिपादन वेद से है। वेद के अनुसार ज्योतिष के अधिकार क्षेत्र में- बीजगणित, अंकगणित, खगोल विद्या (Astronomy), मौसम विज्ञान (Meteorology) और भूगर्भ विज्ञान (Geology) आते हैं। इस वैज्ञानिक ज्योतिष विद्या को यजुर्वेद २२/२८ में इस प्रकार स्थापित किया है-
नक्षत्र, उपग्रह, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतुएं, ऋतु-जन्य परिवर्तन, संवत्सर, द्यौ, अन्तरिक्ष, पृथिवी, चन्द्रमा, सूर्य, रश्मियाँ, ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, मरुत (१० प्राण, वायु, पवनादि) का उत्तम और यज्ञीय सुष्ठु क्रियाओं द्वारा सम्प्रयोग, जिससे विश्व के देव-देवियों (आप्त स्त्री-पुरुषों), मूल और शाखाओं, वनस्पतियों, फूलों, फलों और औषधियों के गुणों में वृद्धि हो तथा वे शुद्ध, पवित्र और यज्ञीय (श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी) सुहुत हों।[ii]

यहां फलित ग्रह, नक्षत्र, जन्मपत्र, राशि, मुहूर्त, शकुन, अपशकुन जैसी अवैदिक क्रिया का कोई विधान नहीं है; जैसा कि पौराणिक मण्डल समझता रहा है। अब वेदों में खगोलीय, मौसमी और भूगर्भीय विद्या का वर्णन पढ़िए-

•'एता उ त्या उषस: केतुमक्रत पूर्वे अर्धे रजसो भानुमञ्जते।' -ऋ० १/९२/१
अर्थात् जब उषायें (या उषा रश्मियां) अरुण वर्ण (लाल रंग) के प्रकाश का क्षेपण करती हैं, तब ये पृथ्वी के पूर्वी आधे भाग और ग्रहों का निर्माण करती हैं। प्रकाश शब्द से यहां दिन के प्रकाश से अर्थ है। ऐसा तभी सम्भव होता है जब पृथ्वी गोल हो।[iii]
वेद ने यहां स्पष्ट रूप से पृथ्वी की गोलाकार आकृति को प्रतिपादित किया है। प्रसिद्ध ज्योतिषी आर्यभट्ट ने भी वेद के उपर्युक्त कथन का समर्थन किया है-
भूग्रहमाना गोलार्धानि स्वछाययानि वर्णानि।
अर्धानि यथा सारं सूर्याभिमुखानि दीव्यते।। -आर्यभट्ट ४/५
यह पृथ्वी गोल है अतः प्रत्येक मनुष्य स्वयं यह सोचता है कि वह स्वयं ऊपर की ओर है और पृथ्वी के दूसरी ओर का भाग मानो उसके अधीन है।

•पृथिवी एक वर्ष (३६५-३६६ दिनों) में प्रत्येक राशि से सीधी गुजरती हुई अपने पूर्व स्थान पर आती है। इसी वर्ष को सूर्य की गति के आधार पर यजुर्वेद ने १२ मास और ६ ऋतुओं में प्रतिपादित किया है-
१. बसन्त (ऋतु) - मधु, माधव (मास) - यजुर्वेद १३/२५
२. ग्रीष्म (ऋतु) - शुक्र, शुचि (मास) - यजुर्वेद १४/६
३. वर्षा (ऋतु) - नभ, नभस्य - यजुर्वेद १४/१५
४. शरद् (ऋतु) - इष, ऊर्ज - यजुर्वेद १४/१६
५. हेमन्त (ऋतु) - सह, सहस्य - यजुर्वेद १४/२७
६. शिशिर (ऋतु) - तप, तपस्य - यजुर्वेद १५/५७

•अहोरात्रे पृथिवी नो दुहाताम्। -अथर्ववेद १२/१/३६
अर्थात् वायु की गैसों का प्रवाह पृथ्वी को भ्रमण कराता है।
यहां स्पष्टतः वात सूत्र और सूर्य सिद्धान्त के परिधि मण्डन का वर्णन है।

•तिस्रो भूमीरूपरा: षड्विधाना:। -ऋग्वेद ७/८७/५
यहां पृथ्वी के छ: महाद्वीपों की ओर संकेत किया गया है। ये ही छ: महाद्वीप महाभाष्य व्याकरण १/११/११ में सात महाप्रदेश (द्वीप) हैं। १. जम्बू २. प्लक्ष ३. शाल्मल ४. कुश ५. क्रौंच ६. शोक और सातवां पुष्कर।

फलित ज्योतिष के पाखण्ड पर कट्टर पौराणिक विद्वानों की सम्मति-
१. सुप्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलविद जनार्दन जोशी ने अपनी पुस्तक "ज्योतिष चमत्कार" (पृष्ठ १६१; लक्ष्मी नारायण प्रेस, मुरादाबाद; प्रथम संस्करण) में फलित ज्योतिष पर बनारस के प्रसिद्ध ज्योतिषी पं० सुधाकर द्विवेदी का २२ मई, १९०६ को लिखा एक पत्र उद्धृत किया है, जो संलग्न है-

"I have belief in astrology. I regard it as mere play as it has been written in the Vishva Gunadarsh that astrologers rob the people of their money by means of verbal jugglery."
अर्थात्- मेरा विश्वास फलित ज्योतिष में नहीं है। मैं इसे एक प्रकार का खेल समझता हूं। जैसे कि विश्वगुणादर्श में लिखा है कि ज्योतिषी लोग अपने वाग्जाल से लोगों का धन व्यर्थ लूटा करते हैं।

२. पौराणिक विद्वान् विद्यासागर, तपोमूर्ति आचार्य श्रीराम शर्मा के आश्रम में ज्योतिष पर गूढ़ अनुसन्धान के बाद यह निष्कर्ष निकला-
"गणित और फलित ज्योतिष में बहुत दिनों से विवाद चल रहा है पर ग्रहगणित वस्तुतः विज्ञानसम्मत एक पूर्ण विद्या है। उसके साथ फलित ज्योतिष का जंजाल जुड़ जाने से यह असमंजस उठ खड़ा हुआ है।...
मुहूर्त जनमानस में गहराई से घुसे हैं। मुहूर्तवाद ने इतना अनर्थ किया है और कर रहा है कि उससे हुई हानियों को गिना नहीं जा सकता।" -ब्रह्मवर्चस् पंचांग की भूमिका

३. श्री सीताराम झा अपने गीतापंचांग में फलित ज्योतिष पर लिखते हैं-
"मैं पंचांग में राशिफल नहीं लिखता क्योंकि वह अनुचित है।... एक राशि में कई करोड़ लोग होते हैं, उनकी स्थितियां भिन्न-भिन्न होती हैं और जन्मपत्रियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं तो फिर राशिफल कैसे लिखा जा एकता है और वह सत्य क्यों हो सकता है?..."

४. बनारस के सुप्रसिद्ध पौराणिक और प्रकाण्ड ज्योतिष विद्वान् आचार्य हरिहर पाण्डेय की एक पुस्तक है- "हमारा ज्योतिष और धर्मशास्त्र"।[iv] इस पुस्तक में आचार्य हरिहर ने फलित ज्योतिष की धज्जियां उड़ा कर रख दी है। आजतक कोई ज्योतिषाचार्य इस पुस्तक का खण्डन न कर सका। हम उस पुस्तक से एक स्थल का वाक्य उद्धृत करते हैं-
"महर्षि दयानन्द ने बहुत सोच समझ कर और परमात्मा की कृपा प्राप्त कर पृथ्वी को चला कहा, सूर्य और पूरे सौर परिवार को गतिमान कहा, गणित और वैज्ञानिक ज्योतिष को ग्राह्य कहा, फलित ज्योतिष्ज्ञ के दोषों की व्याख्या की, पाश्चात्य ज्ञान का अन्धानुकरण नहीं किया, अंग्रेजों के दुःस्वार्थ और अनाचार को तथा पाश्चात्य संस्कृति के दोषों को पहचाना, उनसे घृणा की और उन्हें यहां से हटाने की प्रेरणा दी। श्रीमती ऐनी बेसेंट ने लिखा है कि स्वामी दयानन्द वह प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होंने कहा कि भारत भारतीयों का है।..." -हमारा ज्योतिष और धर्मशास्त्र; पृष्ठ सं० २८०; द्वितीय संस्करण; सन् २००६ में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

५. F.W. Westaway ने फलित ज्योतिष की ठठोली निम्न शब्दों में की है-
"The gods are always especially favourable to those who pay the astrologer a handsome fee". -Obsessions and Convictions of the Human Intellect; Pg. 4
अर्थात्- भगवान् विशेष रूप से उन लोगों के लिए हमेशा अनुकूल होते हैं जो ज्योतिषी को एक सुन्दर शुल्क का भुगतान करता है।

फलित ज्योतिष पर पौराणिक मण्डली से ५ सामान्य प्रश्न-

प्रश्न १. पौराणिक पण्डित ग्रह आदि पूजा कराकर ग्रह-दोषों को शान्त कराते हैं। इसके बावजूद खगोलीय घटना सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण आदि से बहुत डरते हैं। क्या वो उन्हें शान्त नहीं करा सकते? यदि राहु, केतु आदि को पोप-पण्डे नियन्त्रित कर सकते हैं तो उन्हें देशद्रोहियों पर क्यूँ नहीं बिठाते?

प्रश्न २. आगामी प्राकृतिक आपदा से होने वाली हानियों की सूची क्या विश्व का कोई ज्योतिषी दे सकता है?

प्रश्न ३. एक ही राशि लाखों व्यक्ति की होती है। क्या उस राशि का फल सभी व्यक्तियों पर घटित होता है? यदि नहीं तो राशिफल झूठा है।

प्रश्न ४. क्या विश्व का कोई भी ज्योतिषी हस्तरेखा, मस्तकरेखा, तालुरेखा आदि देखकर किसी जानवर का भविष्य बतला सकता हैं?

प्रश्न ५. रामायण के अनुसार श्रीराम को राजगद्दी पर बैठाने का मुहूर्त वशिष्ठ ऋषि ने निकाला था। यदि शुभाऽशुभ मुहूर्त सत्य होता तो श्रीराम को चौदह वर्ष के लिये वन में क्यों भटकना पड़ा? दशरथ की पुत्र वियोग में मृत्यु क्यों हो गई? तीनों रानियां विधवा हो गयीं। सीता का हरण हुआ। अतः वशिष्ठ की शुभ मुहूर्त शुभकार्य हेतु व्यर्थ गया।

ज्योतिषों का दावा है कि वह भविष्य देखते हैं, लेकिन वह खुद का भविष्य तक नहीं बता पाते। अतः सिद्ध है कि पौराणिक ज्योतिषी कर्महीनता और ठगी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। फलित ज्योतिष, मुहूर्त शास्त्र, ग्रह-नक्षत्र की पूजा, शकुन-अपशकुन, राशिफल, जन्मपत्री आदि जाली हैं।

___________________________
[i] सत्यार्थप्रकाश, एकादश समुलास
[ii] ज्योतिष कितनी सच्ची? कितनी झूठी; लेखक- महात्मा गोपाल स्वामी सरस्वती (वैदिक मिशनरी); मातुश्री धनदेवी, केशवराम धर्मार्थ वैदिक ट्रस्ट "धन कुटीर", बरेली से प्रकाशित; पृष्ठ ३
[iii] मासिक पत्रिका सत्यार्थ सौरभ के जून २०१९ का लेख "वेद, वैदिक और भारतीय साहित्य में पृथ्वी"
[iv] इस पुस्तक का प्रथम संस्करण सन् १९८९ में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा दया प्रकाश सिन्हा के निर्देशन में छपा था।

Friday, June 4, 2021

मैं आर्यसमाजी कैसे बना?


मैं आर्य समाजी कैसे बना?

-श्रीयुत ला० रामप्रसाद जी बी०ए०

मेरा आर्य समाजी होने पारिवारिक प्रभाव का पुण्य संस्कार है। मेरे स्वर्गीय भ्राता बाबू मदन सिंह जी आर्यसमाज लाहौर तथा आर्य प्रतिनिधि सभा के मन्त्री थे। जब डी०ए०वी० कालिज की स्थापना हुई तो इसके मन्त्री भी ये हो बने इस कारण हमारे गृह पर सामाजिक नेताओं का आना जाना रहता था। मैं भी पास बैठा हुआ वार्तालाप सुना करता था। इस प्रकार शनै-शनै सामाजिक बातों में मेरी रुचि हो गई।
मैं डी०ए०वी० हाई स्कूल का सबसे पुराना विद्यार्थी हूँ। जिस दिन स्कूल खुला था मैं भी उसी दिन प्रविष्ट हो गया था। श्री लाला छबीलदास जी रईस हिसार का शुभ नाम पहला था, मेरा सातवां था। क्योंकि प्रारम्भ से मैंने डी०ए०वी० स्कूल में शिक्षा ग्रहण की इसलिए इस शिक्षा का भी मेरे जीवन पर प्रभाव पड़ा। भाई मदनसिंह जी के प्रभाव से हमारा पारिवारिक धर्म ही वैदिक धर्म हो गया था। इसलिए हमारा सामाजिक बनना स्वाभाविक था।

मेरे पिता जी बड़े धर्मनिष्ठ थे परन्तु चूंकि उन दिनों में समाज का प्रारम्भ ही था इसलिए वे वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। मैं चूंकि लाहौर में अपने भाई के पास रहा करता था इसलिए मेरे जीवन पर भाई साहब का तथा डी०ए०वी० स्कूल की शिक्षा का ही प्रभाव पड़ा, पिता जी का नहीं।

[नोट- आर्यसमाज की विचारधारा सामाजिक कुरीतियों की नाशयित्री और बौद्धिक क्रान्ति की प्रकाशिका है। इसके वैदिक विचारों ने अनेकों के हृदय में सत्य का प्रकाश किया है। इस लेख के माध्यम से आप उन विद्वानों के बारे में पढ़ेंगे जिन्होंने आर्यसमाज को जानने के बाद आत्मोन्नति करते हुए समाज को उन्नतिशील कैसे बनायें, इसमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। ये लेख स्वामी जगदीश्वरानन्द द्वारा सम्पादित "वेद-प्रकाश" मासिक पत्रिका के १९५८ के अंकों में "मैं आर्यसमाजी कैसे बना?" नामक शीर्षक से प्रकाशित हुए थे। प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Wednesday, June 2, 2021

मैं आर्यसमाजी कैसे बना?


मैं आर्य समाजी कैसे बना?

-राज्यरत्न श्री मास्टर आत्माराम जी अमृतसरी

जब मैं अमृतसर के राजकीय हाई स्कूल में मैट्रिक में शिक्षा प्राप्त करता था, उन दिनों आंग्ल-भाषा में लीथर व्रज साहब का इतिहास कण्ठ करना पड़ता था। उसमें जब मैं महमूद गजनवी के आक्रमणों का वर्णन याद किया करता था, उस समय हृदय में यह बात आती कि यदि सोमनाथ के शिवजी महाराज में बदला लेने की शक्ति होती तो वह अवश्य दुष्ट महमूद को अन्धा करके अपना चमत्कार दिखा सकते थे, पर उन्होंने कुछ न किया। अतः वह केवल पत्थर ही प्रमाणित हुआ, दिव्य शक्ति सम्पन्न नहीं। जैसा कि हम सब हिन्दू भक्त उनको मानते थे।

सन् १८८६ में हमारी मैट्रिक कक्षा का एक घण्टा प्रतिदिन श्रीमान् पूज्य स्वर्गवासी पिता समान देवता स्वरूप श्री बाबू मुरलीधर साहब ड्राइंग मास्टर के पास होता था। मैं ईश्वर की कृपा से उनके विषय अर्थात् ड्राइंग, चित्रकारी आदि में अन्य सब मुसलमान और हिन्दू विद्यार्थियों से प्रथम रहा करता था। इसलिए जब वे मेरी कापी या चित्रकारी का कोई कागज देखकर नम्बर देते, या प्रशंसा करते, तब साथ ही आहिस्ता से कह देते कि-
"आत्माराम तुम बड़े प्रसिद्ध रईस परिवार से सम्बन्ध रखते हो। तुम्हारे पिता स्वर्गवासी लाला राधा किशन साहब तहसीलदार लुधियाना की प्रशंसा हम अमृतसर और लाहौर में श्रीमान् लाला जीवन दास जी जो लाहौर समाज के विख्यात संचालक हैं- से सुना करते हैं, कारण कि उस विभाग से सम्बन्धित है। तुम ऐसे योग्य और प्रसिद्ध पिता के सुपुत्र होने पर जब कक्षा में अन्य सब विषयों में और मेरे विषय में प्रथम रहते हो, तो तुम को धर्म पिता समान मैं यह उपदेश देना चाहता हूँ कि तुम अमृतसर में जो भाई सालू के कटड़ा में रविवार को आर्य समाज का सत्संग हुआ करता है उसमें अवश्य आया करो और परसों तो अवश्य आना, वहां हमारे एक सुप्रसिद्ध विद्वान् उपदेशक पं० लेखराम जी का उपदेश होगा। उसे सुनने के लिए अवश्य आना।"

जब तक श्री बाबू मुरलीधर जी जीवित रहे, मैं उनको धर्म-पिता समझकर उनसे व्यवहार आदि करना अपना सौभाग्य मानता था, यद्यपि वे कालिज पार्टी की प्रतिनिधि सभा के महामन्त्री थे पर जब कभी मैं गुरुदासपुर में, जहां वे बाद में बदल कर चले गए थे, उपदेश देने जाता तो उनके गृह पर ही भोजन करता और आशीर्वाद लेता। मरते समय तक उनको अपना धर्म पिता ही मानता रहा।

महमूद के आक्रमणों का वर्णन याद करके मन सदा मूर्तिपूजा और हिन्दुधर्म की इस कमजोरी के कारण अति दुखित रहा करता था। स्वर्गवासी पूज्य श्री बाबू मुरलीधर जी की कृपा से श्रीमान् पूज्य धर्मवीर पं० लेखराम जी का अमर भाषण अमृतसर आर्यसमाज में सुनकर कि मूर्ति-पूजा आर्य धर्म या हिन्दू धर्म के विरुद्ध है, उस दिन से समाज का सदस्य बन गया। जब अमर शहीद पं० लेखराम जी का उपदेश हुआ तब उन्होंने अन्य विद्यार्थियों के साथ मुझसे भी वार्तालाप किया। मैं कक्षा में कभी-कभी अंग्रेजी में कुछ मिनट लेक्चर देने का चाव रखता था अतः मैंने प्रार्थना की कि क्या हमें भी आपके समान उर्दू में लेक्चर देने के लिए समय मिल सकेगा? उन्होंने कहा- "अवश्य, निश्चित रूप से।"

उन्होंने आश्वासन ही नहीं दिया अपितु अपने कर-कमलों से एक "आर्य डिबेटिंग क्लब" अमृतसर में प्रारम्भ कर दी, जिसके संचालक पूज्य श्री पं० लेखराम जी स्वयं बने और मुझे उसका मन्त्री बनाया गया। उसके पश्चात् दूसरी बार श्री पं० लेखराम जी से यज्ञोपवीत लेकर अपने आप को उनका शिष्य सेवक बनाने का सौभाग्य प्राप्त किया।

[नोट- आर्यसमाज की विचारधारा सामाजिक कुरीतियों की नाशयित्री और बौद्धिक क्रान्ति की प्रकाशिका है। इसके वैदिक विचारों ने अनेकों के हृदय में सत्य का प्रकाश किया है। इस लेख के माध्यम से आप उन विद्वानों के बारे में पढ़ेंगे जिन्होंने आर्यसमाज को जानने के बाद आत्मोन्नति करते हुए समाज को उन्नतिशील कैसे बनायें, इसमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। ये लेख स्वामी जगदीश्वरानन्द द्वारा सम्पादित "वेद-प्रकाश" मासिक पत्रिका के १९५८ के अंकों में "मैं आर्यसमाजी कैसे बना?" नामक शीर्षक से प्रकाशित हुए थे। प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

मैं आर्यसमाजी कैसे बना?


मैं आर्य समाजी कैसे बना?

-पं० अमर सिंह जी आर्यमुसाफिर

मैं आर्य समाजी कैसे बना? पुराणों को पढ़ने से।
पेशावर से कलकत्ता तक लम्बी जाने वाली सड़क पर जिला बुलन्दशहर में खुरजा से नौ मील अलीगढ़ की ओर अरनियां नामक एक छोटा सा ग्राम है, उसमें हमारा जन्म हुआ। हमारे पिता ठाकुर टीकम सिंह जी ने अनूपशहर जिला बुलन्दशहर में गंगा स्नान के पर्व के अवसर पर महर्षि दयानन्द जी महाराज को व्याख्यान देते हुए देखा। कुछ गुण्डों ने महर्षि के ऊपर झोली में भरकर धूल फेंकी। महर्षि के भक्त राजपूतों ने उनको पकड़ कर मारना पीटना चाहा।

महर्षि ने कहा, "ये बच्चे हैं, मारो मत।" राजपूतों ने कहा, "महाराज ये सब दाढ़ी मूँछों वाले जवान और बूढ़े बूढ़े भी हैं, बच्चे नहीं हैं, हम इनको दण्ड देंगे।" ऋषिवर ने कहा, "चाहे बूढ़े हों, कम समझ होने से बालक ही हैं, इसलिए कदापि मत मारो।" पिताजी ने ये शब्द अपने कानों से सुने, पर स्वामी जी का उपदेश नहीं सुना था। उन्होंने लोगों से पूछा, "यह स्वामी कौन हैं और क्या प्रचार करते हैं?" तो कई लोगों ने कहा कि यह स्वामी दयानन्द हैं और ईसाइयों का प्रचार करते हैं, कहते हैं कि चारों वेदों में मूर्तियों और गंगा आदि की पूजा कहीं नहीं लिखी। स्वामी जी महाराज के कुछ शब्दों को सुनकर पिता जी को सुनने के लिए श्रद्धा उत्पन्न हुई परन्तु यह ठीक-ठीक पता न लगा कि उनका वास्तविक उद्देश्य क्या है?

चानौख ग्राम से हमारे यहां एक बारात आई। चानौख के ठाकुर अवैतनिक न्यायधीश श्री महावीर सिंह जी ऋषि के परम भक्त और कट्टर आर्य समाजी थे। उनके भतीजे श्री ठाकुर गुरुवर सिंह जी भी कट्टर आर्य थे। उन लोगों ने जिले भर में आर्य समाज का बड़ा प्रचार किया और उनके प्रयत्नों से समीपवर्ती जिलों में भी बहुत प्रचार हुआ। उन्हीं के कुल से बारात हमारे यहां आई थी और ये दोनों सज्जन इसमें विद्यमान थे। उन्होंने आर्य समाज के सिद्धान्तों पर व्याख्यान दिए। हमारे ग्राम के राजपूतों ने धावा बोल दिया और उनके सब हथियार छीन लिए। पीछे कठिनता से शान्ति हुई। फिर हमारे घर के वृद्ध पुरुष चानौख से बालखा में गये तो वहां से सत्यार्थप्रकाश, ठाकुर गुरुवर सिंह की बनाई दो पुस्तकें पाप प्रदीप और जगत् हितैषी, पं० मुरारी लाल शर्मा का भजन पचासा इन पुस्तकों को ले आये और पहले पहल गांव के पांच आदमी आर्य बने। एक मेरे पिता के सगे छोटे भाई मेरे चाचा मुंशी सादन सिंह जी, चचा ठाकुर चैतराम सिंह जी, चचा ठाकुर बलवन्त सिंह जी, पटवारी जहौरीमल जी, ला० बलवन्त राम जी जरगर पश्चात् दो और बने चचा नारायण सिंह जी और चचा ठाकुर चेतराम सिंह जी और हमारे पिता जी भी आर्य बने परन्तु वे दूसरे ग्राम रकनपुर में रहते थे। अरनियां में आर्य समाज स्थापित हो गया। वार्षिकोत्सव धूमधाम से होने लगे। कई शास्त्रार्थ भी हुए पं० मुरारी लाल जी शर्मा गुरुकुल सिकन्दराबाद ने प्रान्तभर में प्रचार की धूम मचा रखी थी। यहां उनका बहुत आना जाना था। उन्होंने हमारे यहाँ बहुत प्रचार किया। चचा मुंशी सावनसिंह जी सारे इलाके में प्रचार करते थे तथा ग्राम में सत्यार्थप्रकाशादि की कथा प्रतिदिन रात्रि को करते और कराते थे। शंका समाधान और वादविवाद भी कराया करते थे। भाई साहब ठाकुर सरदार अमर सिंह जी राजपूत सभा के उपदेशक हुए और भाई साहब कुंवर सुखलाल जी आर्य मुसाफिर गुरुकुल सिकन्दराबाद में कई वर्ष काम करने के पश्चात् आर्य मिशन आगरा का कार्य श्रीमान् पं० भोजदत्त जी के साथ करने लगे। इन दिनों हमारा सारा परिवार आर्य्यसमाजी बन चुका था और मैं अकेला सनातन धर्मी था। चचा सावन सिंह जी जो वादविवाद कराया करते थे मैं उसमें विशेष रूप से भाग लेता था और आर्य समाज के सारे सिद्धान्तों के विरुद्ध बोलता था। हमारे समाज के सभासद मुझे समझाते और हराने का अपार प्रयत्न करते पर मुझे न हरा सके न समझा सके। मुंशी वेद राम जी हमारे क्षेत्र में एक प्रसिद्ध आर्य थे उनसे भी वादविवाद हुआ परन्तु मैं वश में न आया। ठाकुर देवी सिंह जी रईस रकनपुर हमारे क्षेत्र के माने हुए और बड़े समझदार व्यक्ति थे। समस्त क्षेत्र में उनका बड़ा आदर था। वे ब्राह्मण थे परन्तु राजपूतों के इतिहास से उन्हें विशेष प्रेम था। स्वयं बड़े वीर थे इसलिए ब्राह्मण होते हुए भी ठाकुर कहाते थे। मेरे पिता के साथ उनका ऐसा प्रेम था कि दोनों सगे भाईयों से भी अधिक प्रेम से रहते थे। मैं उनको ताऊजी कहता था। उनको मेरा कट्टर सनातनी होना बहुत खटकता था। उन्होंने मुझे पं० मुरारी लाल जी शर्मा और आर्य प्रतिनिधि सभा यू०पी० के कई उपदेशकों को सौंपा परन्तु वे मुझे आर्य न बना सके। मैं अधिक पढ़ना चाहता था। भाई कुंवर सुखलाल जी आर्य मुसाफिर के साथ मैं आर्य मुसाफिर विद्यालय में पढ़ने के लिए इस विचार से चला गया कि वहां अधिक पढ़कर आर्य समाज का खण्डन किया जा सकेगा। मेरा विवाह १३-१४ वर्ष की आयु में हो चुका था। मुझे आगरा पहुंचकर यह पता लगा कि विद्यालय में विवाहित लड़के प्रविष्ट नहीं किये जाते। मैंने विद्यालय के उन कार्यों में भाग लेना आरम्भ किया जो प्रतिदिन वहां के विद्यार्थियों से कराई जाती थी। श्री पं० भोजदत्त जी के सुपुत्र श्री डा० लक्ष्मीदत्त जी आर्य मुसाफिर और पं० तारादत्त जी बी०ए०, एल०एल०बी० वकील आर्य मुसाफिर विद्यालय और मुसाफिर पत्र को चलाते थे। डा० महोदय शास्त्रार्थ महारथी थे। मेरी तर्कशक्ति उन्हें बहुत पसन्द आई। वहां वह तर्कशक्ति उस समय समाज के विरुद्ध प्रयुक्त होती थी परन्तु दूरदर्शी डाक्टर महोदय और वकील महोदय यह ताड़ गए कि इस शक्ति को अच्छे मार्ग में भी प्रयुक्त किया जा सकता है। उन्होंने मुझे विद्यालय में इस नियम पर प्रविष्ट कर लिया कि पाठ्यक्रम पूरा न होने तक घर नहीं जाऊंगा या ऐसे समय में जा सकूँगा जब धर्मपत्नी घर पर न होगी। मैं प्रसन्नतापूर्वक विद्यालय में प्रविष्ट हो गया। इन दिनों एक पौराणिक पण्डित हमें संस्कृत पढ़ाते थे। उनसे मैंने भागवत पुराण को पढ़ा। जैसे जैसे मैं उसे पढ़ता गया मुझे अपने पुराने पौराणिक विचारों से घृणा होने लगी। फिर पं० बिहारीलाल जी शास्त्री काव्यतीर्थ हमारे विद्यालय के अध्यापक और आचार्य बने। तब तो श्रीमद्भागवतादि पुराणों को पढ़कर मेरे विचार पौराणिकता से हटकर आर्य समाजिक बने। इसपर सान चढ़ने लगी और आर्य समाज के एक दो सिद्धान्त पर मेरा ऐसा विश्वास जमा जैसे दो और दो चार पर दृढ़ विश्वास होता है।

अब तो मैंने पुराणों की बहुत खोज कर ली है। कितने ही शास्त्रार्थ पुराणों पर पौराणिक दल के सेनापतियों, दिग्गजों से बड़े बड़े शास्त्रार्थ करके उन्हें परास्त किया और दावा है कि संसार भर का कोई बड़ा से बड़ा पौराणिक पण्डित पुराणों को प्रमाणिक सिद्ध नहीं कर सकता और मेरा खुला चैलेंज है कि जिस को हिम्मत हो वह मेरे सामने पुराणों को मानने योग्य सिद्ध करे।
मेरा दृढ़ विश्वास है कि जब तक हिन्दू इन अट्ठारह पुराणों को मानते रहेंगे तब तक कदापि उन्नति नहीं कर सकेंगे और किसी भी सभ्यमत के समक्ष हिन्दू खड़े नहीं हो सकते। इसलिए मैंने अपने उद्देश्यों में पुराणों का खण्डन करना भी विशेष उद्देश्य बना लिया है। मैं पुराणों को पढ़कर आर्य समाजी बना हूँ, जो भी पक्षपात छोड़कर पुराणों को पढ़ेंगे वे अवश्य आर्य समाजी बन जाएंगे। परमेश्वर पौराणिकों को सुबुद्धि दे जिससे उन्हें पढ़कर उनसे बचें।

[नोट- आर्यसमाज की विचारधारा सामाजिक कुरीतियों की नाशयित्री और बौद्धिक क्रान्ति की प्रकाशिका है। इसके वैदिक विचारों ने अनेकों के हृदय में सत्य का प्रकाश किया है। इस लेख के माध्यम से आप उन विद्वानों के बारे में पढ़ेंगे जिन्होंने आर्यसमाज को जानने के बाद आत्मोन्नति करते हुए समाज को उन्नतिशील कैसे बनायें, इसमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। ये लेख स्वामी जगदीश्वरानन्द द्वारा सम्पादित "वेद-प्रकाश" मासिक पत्रिका के १९५८ के अंकों में "मैं आर्यसमाजी कैसे बना?" नामक शीर्षक से प्रकाशित हुए थे। प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Tuesday, June 1, 2021

मैं आर्यसमाजी कैसे बना?


मैं आर्य समाजी कैसे बना?

-श्री पं० ठाकुरदत्त जी शर्मा

मैं एक छोटे से ग्राम फतहवाल में उत्पन्न हुआ। बलहडवाल में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। वहां मौलवी इब्राहीम साहब बड़े सज्जन अध्यापक थे। अपने सम्प्रदाय के बड़े भक्त थे। वे हिन्दुधर्म के व्रत और कृष्णलीला आदि की निन्दा करते और "रोजा" आदि की प्रशंसा किया करते थे। मेरे हृदय पर इन बातों का प्रभाव पड़ा। जब एक बार घर में मुझ से दुर्गाष्टमी का व्रत रखने के लिए कहा गया तो मैंने कहा दिया था कि दिन भर आहार न करूँगा। यह क्या व्रत है कि व्रत का नाम रखकर उत्तम उत्तम पदार्थों से पेट भर लिया जाय। उस समय यह विचार न था कि इस विचार से रोजा भी लाभदायक नहीं, क्योंकि दो बार दिन को न खाकर रात्रि को खा लिया। इसमें कमी तो कुछ भी नहीं हुई।

कुछ समय पश्चात् मैं हिन्दुसभा हाई स्कूल अमृतसर में पढ़ने के लिए आया। श्रीमान् मास्टर आत्माराम जी अमृतसरी हमें इतिहास पढ़ाया करते थे। जब इतिहास में यह वर्णन आया कि पुराने आर्य लोग गडरियों की भांति रहते थे। मांस सेवन करते थे। तब उन्होंने कहा कि ये बातें अशुद्ध हैं। वास्तव में वह युग इस समय से अच्छा था। फिर जब यह वर्णन आया कि ऋग्वेद सबसे पुरानी पुस्तक है और तीन सहस्र वर्ष हुए जब यह लिखी गई थी तब उन्होंने बतलाया कि वेद वास्तव में ईश्वरीय ज्ञान है और सृष्टि के आदि में इसका होना आवश्यक है। मैं अपने सहपाठी लाला धनीराम जी से अधिक मिलता था। क्योंकि वे हमारे ग्राम के समीप के रहने वाले थे। मैंने उनसे पूछा 'ये अध्यापक महोदय तो बड़ी अद्भुत बातें बताते हैं।' उन्होंने कहा, "ये आर्य समाजी हैं, आर्यसमाज में बड़ी अच्छी अच्छी बातें होती हैं, वहां प्रत्येक रविवार को चलना चाहिए।" मूर्तिपूजा से मुसलमान अध्यापक ने भी कुछ हटा दिया था। पता लगा कि आर्यसमाज मूर्तिपूजा भी नहीं करता है, वहां सन्ध्या की जाती है। प्राणायाम किया जाता है। प्राणायाम से स्वास्थ्य ठीक बनता है, बुद्धि और स्मरण शक्ति भी बढ़ती है और एकाग्रता प्राप्त होती है। फिर क्या था, जो मैं अन्तःकरण से ढूंढ रहा था वही मुझे मिल गया। मैंने आर्यसमाज में जाना आरम्भ किया, और उस दिन से आज तक आर्यसमाज के प्रवर्तक ऋषि दयानन्द को सच्चा मार्गदर्शक समझता हूं। जब तक अमृतसर में पढ़ता रहा, निरन्तर आर्य समाज का कार्य करता रहा। स्कूल में, आर्य समाजों में Debating Club वाद-विवाद सभा बनाई। बाहर उत्सवों में भी जाया करता। अध्यापक प्रायः आर्य विचारों के थे उनकी ओर से उत्साह मिलता था। सब प्रेम और आदर करते थे। मेरे आर्य समाजी बनने की कहानी अध्यापकों के शिष्यों पर प्रभाव का एक उदाहरण हैं।

[नोट- आर्यसमाज की विचारधारा सामाजिक कुरीतियों की नाशयित्री और बौद्धिक क्रान्ति की प्रकाशिका है। इसके वैदिक विचारों ने अनेकों के हृदय में सत्य का प्रकाश किया है। इस लेख के माध्यम से आप उन विद्वानों के बारे में पढ़ेंगे जिन्होंने आर्यसमाज को जानने के बाद आत्मोन्नति करते हुए समाज को उन्नतिशील कैसे बनायें, इसमें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। ये लेख स्वामी जगदीश्वरानन्द द्वारा सम्पादित "वेद-प्रकाश" मासिक पत्रिका के १९५८ के अंकों में "मैं आर्यसमाजी कैसे बना?" नामक शीर्षक से प्रकाशित हुए थे। प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]