Monday, March 15, 2021

महात्मा गाँधी और गौ


 


महात्मा गाँधी और गौ 


#डॉ_विवेक_आर्य 

1947 के दौर की बात है।  देश में विभाजन की चर्चा आम हो गई थी। स्पष्ट था कि विभाजन का आधार धर्म बनाम मज़हब था। भारतीय विधान परिषद के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद के पास देश भर से गौवध निषेध आज्ञा का प्रस्ताव पारित करने के लिए पत्र और तार आने लगे। महात्मा गाँधी ने 25 जुलाई की प्रार्थना सभा में इसी इस विषय पर बोलते हुए कहा-

"आज राजेंद्र बाबू ने मुझ को बताया कि उनके यहाँ करीब 50 हज़ार पोस्ट कार्ड, 25-30 हज़ार पत्र और कई हज़ार तार आ गये हैं। इन में गौ हत्या बकानूनन बंद करने के लिये कहा गया है। आखिर इतने खत और तार क्यों आते हैं? इन का कोई असर तो हुआ ही नहीं है। हिंदुस्तान में गोहत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता। हिन्दुओं को गाय का वध करने की मनाही है इस में मुझे कोई शक नहीं हैं। मैंने गौ सेवा का व्रत बहुत पहले से ले रखा है। मगर जो मेरा धर्म है वही हिंदुस्तान में रहने वाले सब लोगों का भी हो यह कैसे हो सकता है? इस का मतलब तो जो लोग हिन्दू नहीं हैं उनके साथ जबरदस्ती करना होगा। हम चीख-चीख कर कहते आये हैं कि जबरदस्ती से कोई धर्म नहीं चलाना चाहिये। जो आदमी अपने आप गोकशी  रोकना चाहता उसके साथ में कैसे जबरदस्ती करूँ कि वह ऐसा करें? अगर हम धार्मिक आधार पर यहाँ गौहत्या रोक देते हैं और पाकिस्तान में इसका उलटा होता है तो क्या स्थिति रहेगी? मान लीजिये वे यह कहें कि तुम मूर्तिपूजा नहीं कर सकते क्योंकि यह शरीयत के अनुसार वर्जित है। ... इसलिए मैं तो यह कहूंगा कि तार और पत्र भेजने का सिलसिला बंद होना चाहिये।  इतना पैसा इन पर बेकार फैंक देना मुनासिब नहीं है। मैं तो आपकी मार्फ़त सरे हिन्दुस्तान को यह सुनाना चाहता हूँ कि वे सब तार और पत्र भेजना बंद कर दें। ( हिंदुस्तान 26 जुलाई, 1947)"

"हिन्दू धर्म में गोवध करने की जो मनाई की गई है वह हिन्दुओं के लिए है सारी दुनियाँ के लिए नहीं। ( हिंदुस्तान 10 अगस्त 1947)"

" अगर आप मज़हब के आधार पर हिंदुस्तान में गो कशी बंद कराते हैं तो फिर पाकिस्तान की सरकार इसी आधार पर मूर्तिपूजा क्यों नहीं बंद करा सकती! (हरिजन सेवक 10 अगस्त 1947) "

गाँधी जी के गौ वध निषेध सम्बंधित बयानों की समीक्षा आर्यसमाज के प्रसिद्द विद्वान पं धर्मदेव विद्यामार्तण्ड ने सार्वदेशिक पत्रिका के अगस्त 1947 के सम्पादकीय में इन शब्दों में की-

माहात्मा जी के उपर्युक्त वक्तव्य से हम नितांत असहमत हैं।  प्रजा जिस बात को देशहित के लिए अत्यावश्यक समझती है क्या अपने मान्य नेताओं से पत्र, तार आदि द्वारा उस विषयक निवेदन करने का भी उसे अधिकार नहीं है? क्या देश के मान्य नेताओं का जिन के हाथों स्वतन्त्र भारत के शासन की बागडोर आई है यह कहना कि प्रजा द्वारा प्रेषित हज़ारों तारों और पत्रों का कोई प्रभाव तो हुआ ही नहीं सचमुच आस्चर्यजनक है।  क्या प्रजा की माँग की ऐसी उपेक्षा करना देश के मान्य नेताओं को उचित है? हिंदुस्तान में गौहत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता। ऐसा महात्मा जी का कहना कैसे उचित हो सकता है? क्या विधान परिषद् की सारी शक्ति महात्माजी ने अपने हाथ में ले रक्खी है जो वे ऐसी घोषणा कर सकें? यह युक्ति देना कि ऐसा करने से हिन्दुओं के अतिरिक्त दूसरे लोगों पर जबर्दस्ती होगी सर्वथा अशुद्ध है। इसके आधार पर तो किसी भी विषय में कोई कानून नहीं बनना चाहिये क्योंकि बाल्यविवाह, अस्पृश्यता, मद्यपान निषेध, चोरी निषेध, व्यभिचार निषेध आदि विषयक किसी भी प्रकार के कानून बनाने से उन लोगों पर एक तरह से जबर्दस्ती होती है जो इन को मानने वा करने वाले हैं। जिस से समाज और देश को हानि पहुँचती है उसे कानून का आश्रय लेकर भी अवश्य बंद करना चाहिये। स्वयं महात्मा गांधीजी की अनुमति और समर्थन में गत वर्ष 11 फरवरी को वर्धा में जो गौरक्षा सम्मलेन हुआ था उसमें एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत किया गया था कि 'इस सम्मेलन का निश्चित विचार है कि भारत के राष्ट्रीय धन के दृष्टीकौन से गौओं, बैलों और बछड़ों का वध अत्यंत हानिकारक है इसलिए यह सम्मेलन आवश्यक समझता है कि गौओं, बछड़ों और बैलों का वध कानून द्वारा तुरंत बंद कर दिया जाए। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि जो पूज्य महात्माजी गत वर्ष तक गोवध को कानून द्वारा बन्द कराने के प्रबल समर्थक थे वही अब कहें कि इस विषय में कानून नहीं बनाना चाहिए। गोवध निषेध और मूर्तिपूजा निषेध की कोई तुलना नहीं हो सकती। गोवध निषेध की मांग धार्मिक दृष्टि से नहीं किन्तु आर्थिक और संपत्ति से भी की जा रही है क्योंकि गोवध के कारण गोवंश का नाश होने से दूध घी आदि उपयोगी पौष्टिक वस्तुओं की कमी से हिन्दू, मुसलमान,ईसाई, सिख और सभी को हानि उठानी पड़ती है।  बाबर, हुमायूँ, अकबर, शाह आलम आदि ने अपने राज्य में इसे बंद किया था।  गोवध निषेध  के समान कोई चीज पाकिस्तान सरकार कर सकती है तो वह सुअर के मांस के सेवन और बिक्री पर प्रतिबन्ध है। इससे कोई हानि न होगी यदि उसने ऐसा प्रतिबन्ध लगाना उचित समझा। गौवध निषेध विषयक प्रबल आंदोलन अवश्य जारी रखना चाहिए। 

इस लेख से यही सिद्ध होता है कि गाँधी जी सदा हिन्दू हितों की अनदेखी करते रहे। खेद जनक बात यह है कि उनकी तुष्टिकरण उनके बाद की सरकारें भी ऐसे हो लागु करती रही। नेहरू जी की सरकार ने और 1966 में प्रबल आंदोलन के बाद इंदिरा गाँधी ने भी गोवध निषेध कानून लागु नहीं किया। मोदी जी को भी 6 वर्ष हो गए है। यह कानून कब लागु होगा?  हिन्दुओं में एकता की कमी इस समस्या का मूल कारण है। 

Sunday, March 14, 2021

महात्मा गाँधी और वाल्मीकि मंदिर की घटना


 


महात्मा गाँधी और वाल्मीकि मंदिर की घटना 


#डॉ_विवेक_आर्य 


घटना 2 मई, 1947 की है।  दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर में प्रार्थना करने के लिए उपस्थित हुए महात्मा गाँधी ने क़ुरान की कुछ आयतों का पाठ किया। इस पर प्रस्तुत सज्जन ने आक्षेप किया तो उसे पुलिस ने पकड़ लिया। गाँधी जी ने प्रार्थना बंद कर दी और अपने भाषण में कहा कि ऐसी संकुचित ह्रदयता पर उन्हें बड़ा हुआ और उन्होंने कहा कि कुछ हिन्दू प्रार्थना में कुरान की आयतें पढ़ने पर क्यों आक्षेप करते हैं? इन वाक्यों में ईश्वर की स्तुति और प्रार्थना की गई है। इस से हिन्दू धर्म को क्या हानि पहुंच सकती है? 



1.   11 मई, 1947 के हरिजन अख़बार में इस प्रसंग के विषय में लिखा -


मुझे एक मित्र ने बताया है कि कुरान की आयतों का जो आशय है वो यजुर्वेद में भी मिलता है। जिन्होंने हिन्दू धर्म को पढ़ा है वे जानते है कि 108 उपनिषदों में से एक अल्लोपनिषद भी है।  क्या जिस व्यक्ति ने उसे लिखा उसे अपने धर्म का ज्ञान न था?


समीक्षा-


गाँधी जी के हरिजन अख़बार में छपी टिप्पणी का प्रतिउत्तर आर्यसमाज के दिग्गज विद्वान पं धर्मदेव विद्यामार्तण्ड ने सार्वदेशिक पत्रिका के मई 1947 के अंक में सम्पादकीय के रूप में दिया। पं जी लिखते है-गाँधी जी ने अल्लोपनिषद का वर्णन किया। वास्तविकता में ईश, केन, कठ आदि 11 उपनिषद् ही ऋषिकृत उपनिषदें हैं।  इसके अतिरिक्त 100 से ऊपर उपनिषदें सांप्रदायिक लोगों ने बना लिए थे जिनमें एक अल्लोपनिषद भी है। स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के 14वे समुल्लास के अंत में भंडाफोड़ करते हुए लिखा है- ' 


यह तो अकबरशाह के समय में अनुमान है कि किसी ने बनाई है। इस का बनाने वाला कुछ अर्बी और कुछ संस्कृत भी पढ़ा हुआ दीखता है क्योंकि इस में अरबी और संस्कृत के पद लिखे हुए दीखते हैं। देखो! (अस्माल्लां इल्ले मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते) इत्यादि में जो कि दश अंक में लिखा है, जैसे-इस में (अस्माल्लां और इल्ले) अर्बी और (मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते) यह संस्कृत पद लिखे हैं वैसे ही सर्वत्र देखने में आने से किसी संस्कृत और अर्बी के पढ़े हुए ने बनाई है। यदि इस का अर्थ देखा जाता है तो यह कृत्रिम अयुक्त वेद और व्याकरण रीति से विरुद्ध है। जैसी यह उपनिषद् बनाई है, वैसी बहुत सी उपनिषदें मतमतान्तर वाले पक्षपातियों ने बना ली हैं। जैसी कि स्वरोपनिषद्, नृसिहतापनी, रामतापनी, गोपालतापनी बहुत सी बना ली हैं। देखिये इसका नमूना-


अस्मांल्लां इल्ले मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते। इल्लल्ले वरुणो राजा पुनर्द्ददु । ह या मित्रे इल्लां इल्लल्ले इल्लां वरुणो मित्रस्तेजस्काम ।।१।। होतारमिन्द्रो होतारमिन्द्र महासुरिन्द्रा ।अल्लो ज्येष्ठं श्रेष्ठं परमं पूर्णं ब्रह्माणं अल्लाम्।।२।।अल्लोरसूलमहामदरकबरस्य अल्लो अल्लाम्।।३।। आदल्लाबूकमेककम्।। अल्लाबूक निखातकम्।।४।। अल्लो यज्ञेन हुतहुत्वा। अल्ला सूर्यचन्द्रसर्वनक्षत्र ।।५।। अल्ला ऋषीणां सर्वदिव्याँ इन्द्राय पूर्वं माया परममन्तरिक्षा ।।६। अल्ल पृथिव्या अन्तरिक्षं विश्वरूपम्।।७।। इल्लां कबर इल्लां कबर इल्लाँ इल्लल्लेति इल्लल्ला ।।८।। ओम् अल्ला इल्लल्ला अनादिस्वरूपाय अथर्वणा श्यामा हुं ह्रीं जनानपशूनसिद्धान् जलचरान् अदृष्टं कुरु कुरु फट्।।९।। असुरसंहारिणी हुं ह्रीं अल्लोरसूलमहमदरकबरस्य अल्लो अल्लाम् इल्लल्लेति इल्लल्ला ।।१०।।


इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि किसी ने मुस्लिम मत को वेद और उपनिषद् के अनुकूल दिखाकर हिन्दुओं को भ्रमित करने केलिए इसे रचा था। गाँधी जी का ऐसे विषयों में बिना प्रामाणिक जानकारी के कुछ बी लिखना गलत है। 

 


2.   हरिजन में गाँधी जी लिखते है-


'मैं एक सनातनी हिन्दू होने का दवा करता हूँ और चूकिं हिन्दू मज़हब और दूसरे सब मज़हबों का निचोड़ मज़हबी रवादारी या धार्मिक सहिष्णुता है, इसलिए मेरा दावा है कि अगर में एक अच्छा हिन्दू हूँ तो एक अच्छा मुसलमान और एक अच्छा ईसाई भी हूँ अपने मज़हब को दूसरे मज़हबों से बड़ा मानना सच्ची मज़हबी भावना के खिलाफ है। अहिंसा के लिए नम्रता जरुरी है।  क्या हिन्दू धर्म शास्त्रों में भगवान के हज़ारों नाम नहीं बतलाये गए हैं? रहीम भी उसमें से एक क्यों न हो? कलमे में तो सिर्फ भगवान की तारीफ़ की गई है और मुहम्मद साहिब को उनका पैगम्बर माना गया है।  जिस तरह में बुद्ध, ईसा और जरदुश्त को मानता हूँ उसी तरह मुझे खुदा की तारीफ़ करने मुहम्मद साहब को पैगम्बर मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती।'


समीक्षा-


पं जी लिखते है-धार्मिक सहिष्णुता का यह अर्थ है कि दूसरे मत वालों को सुनकर हम उन पर विचार करें और युक्तियों से ही उनके विचारों को बदलने का प्रयत्न करें न कि जबरदस्ती व तलवार के बल से। किन्तु इसका अर्थ उनकी बुद्धि विरुद्ध असंगत बातों को मानना नहीं है। क्या महात्मा जी कह सकते है कि अहिंसा, ब्रह्मचर्य, दयालुता आदि का जो आदर्श आर्यों के धर्म शास्त्रों में बतलाया गया है वही कुरान इत्यादि में भी पाया जाता है?  इसी प्रकार से कहाँ वेद का एक पत्नीव्रत आदर्श सिद्धांत और कहाँ अपनी सगी बहन को छोड़कर किसी से भी बहुविवाह। कहाँ निराकार वेद विदित ईश्वर और कहाँ आसमान में तख़्त पर बैठने वाला शरीरधारी खुदा। जहाँ तक कलमा की बात है उसकी दूसरी पंक्ति कि मुहम्मद उस खुदा का दूत है ऐसा कहना और जो मुहम्मद साहिब को पैगम्बर नहीं मानते चाहे वो कितने भी अच्छे क्यों न हो उनको दोजख अर्थात नर्क जाना पड़ेगा। यह सर्वदा अनुचित और युक्ति विरुद्ध है। 


3. क़ुरान की आयतों पर टिप्पणी करते हुए पं जी ने ख्वाजा हसन निज़ामी के क़ुरान भाष्य पृ. 2  से एक प्रमाण पं जी ने प्रस्तुत किया जिसमें लिखा है- जो मार्ग से भटके हुए है अल्लाह उन पर क्रोध करता है। पं जी इसकी तुलना यजुर्वेद 'अग्ने न्य सुपथा' मन्त्र से कि जिसका अर्थ है हे ज्ञान स्वरुप परमेश्वर! हमें सब प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए सदा उत्तम धर्ममार्ग पर चला।  आगे पं जी लिखते है कि गाँधी जी को सभी मतों की समानता पर अधिक बल देने के स्थान पर स्वामी दयानन्द के इस सन्देश को समझना चाहिए कि सभी मतों में कई सच्ची तथा अच्छी बातें है। हिन्दू मंदिरों में क़ुरान पढ़ना सही नहीं है। 


पं जी के सम्पादकीय के कुछ प्रमुख अंशों को हमने यहाँ प्रस्तुत किया है। वास्तव में मुझे अभी तक गाँधी जी द्वारा किसी मस्जिद में वेद मन्त्र को प्रार्थना रूप में पढ़ने का कोई प्रमाण देखने में नहीं आया है। मैं कई बार सोचता हूँ गाँधी जी के बारे में कुछ लेखकों ने विशेष पुस्तक लिखी हैं जैसे मौलाना गाँधी, काश गाँधी जी ने कुरान पढ़ी होती?,  गाँधी बेनकाब आदि। इन पुस्तक को लिखने वालों का प्रयोजन क्या था।  इस लेख को पढ़ने के पश्चात शायद पाठक इस विषय पर प्रकाश डाल सके। 


खिलाफत के दौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। मुसलमानों ने कांग्रेस के मंच से क़ुरान की आयतें पढ़ी। वो आयतें गैर मुसलमानों के विषय में सख्त थी।  स्वामी श्रद्धानन्द ने गाँधी को इस विषय में सचेत किया तो गाँधी जी ने उसे गंभीरता से नहीं लिया और कहां कि ये आयतें अंग्रेजों के लिए है। स्वामी जी फिर कहा कि कल को ये हिन्दुओं के विरोध में कहीं जाने लगे। तब आपका रवैया अभी भी ऐसा ही होगा क्या?  गाँधी जी मौन हो गए। 


कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में मंच से अली बंधू कहे जाने वाले मौलाना अली ने कहा कि देश में 6 करोड़ अछूत है। उन्हें आधा हिन्दुओं में और आधा मुसलमानों में बाँट देना चाहिये। स्वामी श्रद्धानन्द ने इस विषय पर रोष प्रकट किया पर गाँधी जी मौन रहे। 


कांग्रेस के ही मंच से इन्हीं मौलाना ने एक बार गाँधी जी पर आक्षेप करते हुए कहा कि गाँधी जी को कभी जन्नत में जगह नहीं मिलेगी चाहे उनके विचार कितने अच्छे हो, कितने पवित्र हो क्योंकि वे मुसलमान नहीं है। गाँधी जी मंच से कुछ न बोले।  अधिक दवाब पड़ने पर केवल यही बोले कि मौलाना मुझ वृद्ध से मज़ाक अच्छा कर लेते है। 


ये कुछ घटनाएं है। जो पाठकों को गाँधी जी के अनसुने जीवन का परिचय देती है। 

Saturday, March 13, 2021

सत्यार्थ प्रकाश और क़ुरान: इतिहास के दर्पण में

 




  सत्यार्थ प्रकाश और क़ुरान: इतिहास के दर्पण में 


#डॉ_विवेक_आर्य 


समाचार पत्र से ज्ञात हुआ। क़ुरान की 26 आयतों को बाद में मिलाई हुई आयतें करार देकर उन्हें क़ुरान से हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में सैय्यद वसिम रिजवी ने याचिका लगाई है। इस समाचार में ये कौन सी आयतें हैं। इस पर प्रकाश नहीं डाला गया। अनुमान से ये वो आयतें होनी चाहिये जो मुसलमानों को गैर मुसलमानों के प्रति हिंसा करने का सन्देश देती हैं। इस अनुमान का कारण निराधार नहीं है। क्योंकि क़ुरान की आयतों में समीक्षा करने का विचार आज से लगभग 140 वर्ष पुराना है। स्वामी दयानन्द ने  ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के 14वें सम्मुलास में क़ुरान की आयतों की समीक्षा ईश्वरीय ग्रन्थ होने की कसौटी पर की गई थीं। स्वामी जी इस समुल्लास की भूमिका में लिखा है कि- 'यह लेख हठ, दुराग्रह, ईर्ष्या, द्वेष, वाद-विवाद और विरोध घटाने के लिये किया गया है, न कि इन को बढ़ाने के अर्थ।' मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि अगर सम्पूर्ण मानव समाज इस कसौटी पर सत्य-असत्य का निर्णय करने लगे तो निश्चित रूप से संसार स्वर्ग बन जाये। 


सत्यार्थ प्रकाश में क़ुरान की आयतों की समीक्षा के कुछ उदहारण देखिये-


५४-और काफिरों पर हम को सहाय कर।। अल्लाह तुम्हारा उत्तम सहायक और कारसाज है।। जो तुम अल्लाह के मार्ग में मारे जाओ वा मर जाओ, अल्लाह की दया बहुत अच्छी है।। -मं० १। सि० ४। सू० ३। आ० १४७। १५०। १५८।।


(समीक्षक) अब देखिये मुसलमानों की भूल कि जो अपने मत से भिन्न हैं उन के मारने के लिये खुदा की प्रार्थना करते हैं। क्या परमेश्वर भोला है जो इन की बात मान लेवे? यदि मुसलमानों का कारसाज अल्लाह ही है तो फिर मुसलमानों के कार्य नष्ट क्यों होते हैं? और खुदा भी मुसलमानों के साथ मोह से फंसा हुआ दीख पड़ता है, जो ऐसा पक्षपाती खुदा है तो धर्मात्मा पुरुषों का उपासनीय कभी नहीं हो सकता।।५४।।


७९-और काटे जड़ काफिरों की।। मैं तुम को सहाय दूंगा। साथ सहस्र फरिश्तों के पीछे पीछे आने वाले।। अवश्य मैं काफिरों के दिलों में भय डालूंगा। बस मारो ऊपर गर्दनों के मारो उन में से प्रत्येक पोरी (सन्धि) पर।। -मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० ७। ९। १२।।


(समीक्षक) वाह जी वाह! कैसा खुदा और कैसे पैगम्बर दयाहीन। जो मुसलमानी मत से भिन्न काफिरों की जड़ कटवावे। और खुदा आज्ञा देवे उन की गर्दन पर मारो और हाथ पग के जोड़ों को काटने का सहाय और सम्मति देवे ऐसा खुदा लंकेश से क्या कुछ कम है? यह सब प्रपञ्च कुरान के कर्त्ता का है, खुदा का नहीं। यदि खुदा का हो तो ऐसा खुदा हम से दूर और हम उस से दूर रहें।।७९।।


८१-और लड़ो उन से यहां तक कि न रहे फितना अर्थात् बल काफिरों का और होवे दीन तमाम वास्ते अल्लाह के।। और जानो तुम यह कि जो कुछ तुम लूटो किसी वस्तु से निश्चय वास्ते अल्लाह के है पाँचवाँ हिस्सा उस का और वास्ते रसूल के।। -मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० ३९। ४१।।


(समीक्षक) ऐसे अन्याय से लड़ने लड़ाने वाला मुसलमानों के खुदा से भिन्न शान्तिभंगकर्ता दूसरा कौन होगा? अब देखिये यह मजहब कि अल्लाह और रसूल के वास्ते सब जगत् को लूटना लुटवाना लुटेरों का काम नहीं है? और लूट के माल में खुदा का हिस्सेदार बनना जानो डाकू बनना है और ऐसे लुटेरों का पक्षपाती बनना खुदा अपनी खुदाई में बट्टा लगाता है। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसा पुस्तक, ऐसा खुदा और ऐसा पैगम्बर संसार में ऐसी उपाधि और शान्तिभंग करके मनुष्यों को दुःख देने के लिये कहां से आया? जो ऐसे-ऐसे मत जगत् में प्रचलित न होते तो सब जगत् आनन्द में बना रहता।।८१।।


मुसलिम समाज ने स्वामी जी के उद्देश्य को समझने के स्थान पर उसका प्रतिरोध आरम्भ कर दिया। उनके लिए यह पहली बार था कि किसी गैर मुस्लिम ने क़ुरान की समीक्षा करने के लिए प्रेरित किया था। अनेक पुस्तकें 14वें समुल्लास के विरोध में प्रकाशित की गई थीं। आर्य विद्वानों ने उनका यथोचित उत्तर समय समय पर लिखा। पं लेखराम ने 1892 में जहाद के नाम से एक ट्रैक्ट प्रकाशित किया। इस ट्रैक्ट में क़ुरान और हदीस की आयतों के गैर मुसलमानों के साथ सख्त व्यवहार के प्रमाण थे और अरब से लेकर भारत में इस्लाम कैसे फैला इसका विवरण था। इस ट्रैक्ट का उद्देश्य भी क़ुरान की समीक्षा करने के लिए संवाद की स्थापना करना था। पर इसके भी विपरीत प्रतिक्रिया हुई थीं। इसके बाद के दौर में कई सौ पुस्तकें दोनों ओर से लिखी गई थीं। 1920 के दशक में देश में अनेक दंगे हुए जिनमें मोपला, मुलतान और कोहाट के दंगे सबसे प्रसिद्ध रहे। स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा हिन्दू संगठन और शुद्धि आंदोलन चलाने पर अनेक पुस्तकें पक्ष-विपक्ष में प्रकाशित हुई। स्वामी जी की हत्या के पश्चात जो साहित्य प्रकाशित हुआ उसमें उनकी हत्या का प्रमुख कारण क़ुरान की उत्तेजक आयतों का होना बताया गया था जिससे कट्टरवाद को बढ़ावा मिलता था। 



    


 इन सभी के मध्य रँगीला रसूल पुस्तक को लेकर उसके प्रकाशक महाशय राजपाल की हत्या का प्रसंग इंग्लैंड की संसद पर गया। इसी कड़ी में सिंध सरकार ने सत्यार्थ प्रकाश के 14वें समुल्लास पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस प्रतिबन्ध का आर्यसमाज ने प्रतिकार किया। सार्वदेशिक पत्रिका में आर्यसमाज के दिग्गज विद्वान जैसे पं धर्मदेव विद्यामार्तण्ड, पं गंगा प्रसाद उपाध्याय, पं सूर्यदेव ने इस्लाम के इतिहास, क़ुरान की आयतों की समीक्षा करते हुए अनेक लेख प्रकाशित किये थे। ये सभी लेख अत्यंत पठनीय थे।  20 फरवरी 1944 को दिल्ली में एक विशाल आर्य सम्मेलन ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबन्ध लगाने के प्रयास की कड़ी भर्त्सना की थीं। इसके अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। वायसराय को हजारों तार भेजकर इस अन्यायपूर्ण कदम का विरोध किया गया था। 


हिन्दू महासभा के नेता भाई परमानंद जी ने कहा – “ सिंध के मुस्लिम मंत्रिमंडल ने “सत्यार्थ प्रकाश” पर प्रतिबन्ध लगाकर सारी हिन्दू जाति को ही चुनौती दी है | यदि यह मान लिया जाये की चौदहवें समुल्लास को इस्लाम धर्म के खंडन के नाते प्रतिबंधित कर दिया जाये तो क़ुरान का प्रत्येक शब्द ही हिन्दुओं के विरुद्ध पड़ता है | समस्त कुरान को भी क्यों न जब्त किया जाये ?”


वीर सावरकर जी ने सार्वजनिक घोषणा की –“ जबतक सिंध में सत्यार्थ प्रकाश पर पाबंदी लगी है, तब तक कांग्रेस शासित प्रदेशों में कुरान पर प्रतिबन्ध लगाने की प्रबल मांग की जानी चाहिए |”  सावरकर जी ने भारत के वायसराय और सिंध के गवर्नर को तार देकर कहा –“ सिंध सरकार द्वारा “सत्यार्थ प्रकाश” पर प्रतिबन्ध लगाने से सांप्रदायिक वैमनस्य उत्पन्न होगा| यदि सत्यार्थ प्रकाश से प्रतिबन्ध नहीं हटाया गया तो हिन्दू कुरान पर प्रतिबंध लगाने के लिए आन्दोलन प्रारम्भ कर देंगे। अतः मैं केन्द्रीय सरकार से अनुरोध करता हूँ कि सत्यार्थ प्रकाश पर लगे प्रतिबन्ध को अविलंब रद्द करे।” इतना ही नहीं 27 नवम्बर 1944 को सावरकर जी ने स्वयं वायसराय से भेंट की और “सत्यार्थ प्रकाश’ से प्रतिबन्ध हटाने की मांग की थीं। सिंध सरकार ने आर्य नेताओं के खुले आम सत्यार्थ प्रकाश लेकर सिंध में भ्रमण करने पर कोई रोक टोक नहीं लगाई। इससे यह प्रतिबन्ध हवाई किला सिद्ध हुआ। सीहोर भूपाल मुस्लिम रियासत के अंतर्गत था। यहाँ भी सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिबन्ध लगाया गया था। सार्वदेशिक जून 1947 में यह समाचार मिलता है कि यहाँ पर आर्य समाज ने आचार्य द्विजेन्दरनाथ के सभापतित्व में आर्य महा सम्मेलन कर इसे धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप बताया। संभवत विभाजन के पश्चात यह प्रतिबन्ध स्वयमेव उठ गया। 


महात्मा गाँधी की भूमिका यहाँ पर वर्णन करे बिना यह लेख अधूरा है। सत्यार्थ प्रकाश के विषय में गाँधी जी ने नकारात्मक टिप्पणी लिखते हुए लिखा कि सत्यार्थ प्रकाश ने  हिंदुत्व को संकीर्ण बना दिया। स्वामी दयानन्द ने जैन, इस्लाम और हिन्दू धर्म की गलत व्याख्या की। यह भी दोष लगाया कि ऐसे सुधारवादी व्यक्तित्व की कृति देखकर उन्हें निराशा हुई। गाँधी जी को अनेक आर्य लेखकों ने उस समय यथोचित उत्तर दिया। पं चमूपति ने गाँधी जी के आरोपों का बड़ा सुन्दर प्रतिउत्तर दिया था। आजीवन गाँधी जी मुसलमानों को प्रसन्न करने के चक्कर में हिन्दू हितों की अनदेखी करते रहे। परिणाम देश के विभाजन के रूप में निकला। मोपला आदि दंगों, शुद्धि, हिन्दू संगठन, वेद, मूर्तिपूजा-कर्मकांड, क्षात्र धर्म और अति-अहिंसावाद मत-मतान्तर समीक्षा, गौरक्षा, मुस्लिम कट्टरता, स्वामी श्रद्धानन्द, रंगीला रसूल और महाशय राजपाल, हैदराबाद आंदोलन, सिंध सत्याग्रह, नोआखली और डायरेक्ट एक्शन डे, देश विभाजन आदि विषयों पर आर्यसमाज और महात्मा गाँधी के मतभेद जीवन पर्यन्त रहे।  2 मई 1947 को गाँधी जी  वाल्मीकि मंदिर नियमित प्रार्थना के पश्चात क़ुरान की कुछ आयतें पढ़वाई। कुछ लोगों ने आक्षेप किया तो गाँधी ने उनकी मानसिकता को संकीर्ण बताया। गाँधी ने आगे हरिजन अख़बार में यहाँ तक कह दिया कि 108 में से एक उपनिषद् अल्लोपनिषद भी है। साथ में लिखा कि- 'मुझे इस का कोई कारण नहीं दिखाई देता कि मैं कलमा क्यों न पढूं, अल्लाह की स्तुति क्यों न करूँ और मोहम्मद साहब को अपमा पैगम्बर मान कर उनकी इज्जत क्यों न करूँ? गाँधी जी के इस कृत्य की भारी आलोचना हुई और पं धर्मदेव विद्यामार्तण्ड ने गाँधी से से क़ुरान के आधार पर यही प्रश्न पूछ लिया कि क्या क़ुरान में गैर मुसलमानों के लिए बताई गई आयतों को भी गाँधी जी सही मानते है जिनके अनुसार अल्लाह उन पर कभी मेहरबान नहीं होता जो चाहे कितने अच्छे कर्म करते हो पर वो न पैगम्बर पर विश्वास रखते है और न ही क़ुरान में। वे दोज़ख में जायेंगे।  इन विषयों पर प्राय: गाँधी मौन ही रह जाते थे। अच्छा होता वो अपनी नीति स्पष्ट करते। 



 आर्यसमाज ने उस काल में क़ुरान के दिग्गज विशेषज्ञ पं रामचंद्र दहेलवी जी ने एक ट्रैक्ट हिंदी में लिखा। इस ट्रैक्ट का शीर्षक था 'सत्यार्थ प्रकाश चतुर्दश समुल्लास में उद्धृत  क़ुरान की आयतों का देवनागरी में  उल्था और अनुवाद' । इसमें मुसलमानों द्वारा इस समुल्लास पर लगाए गए आक्षेपों का प्रति उत्तर था। इस बीच देश का विभाजन हुआ। देश विभाजन के पश्चात 20 जुलाई,1984 को हिमांग्शु किशोर चक्रवर्ती ने कोलकाता में क़ुरान की उत्तेजक आयतों को हटाने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थीं। इस याचिका को कोर्ट ने निष्कासित कर दिया। इस याचिका के विरुद्ध मुसलमानों ने बांग्लादेश तक में प्रदर्शन किया। सीता राम गोयल ने इस याचिका को बाद में प्रकाशित किया। उनका कहना था कि इसे गैर मुसलमानों को अवश्य पढ़ना चाहिए कि क़ुरान उनके विषय में क्या कहती है।  कोलकाता में ही एक बार आर्यसमाज के उत्सव में रखी बंगला सत्यार्थ प्रकाश को पुलिस ने जब्त कर लिया था। आर्यसमाज ने उमाकांत जी उपाध्याय ने धरना कर इस कदम का विरोध किया। पुलिस ने ससम्मान सत्यार्थ प्रकाश की प्रतियां वापिस कर प्रकरण को निपटाया। कश्मीर में भी एक बार फारूक अब्दुल्लाह ने ऐसा ही दुस्साहस किया था। एक आर्य व्यक्ति को अरब में सत्यार्थ प्रकाश रखने पर जेल भेज दिया गया था। तत्कालीन आर्य नेताओं ने राजीव गाँधी तत्कालीन प्रधानमंत्री के सहयोग से उन्हें मुक्त करवाया था। 


अब इस याचिका का क्या हश्र होगा? क्या मुस्लिम समाज परिवर्तन के लिए मानसिक रूप से तैयार है? उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी? इन प्रश्नों का उत्तर भविष्य की गर्भ में है। 

Friday, March 12, 2021

हैदराबाद आंदोलन और आर्यसमाज




 


हैदराबाद आंदोलन और आर्यसमाज 

#डॉ_विवेक_आर्य 

आपको इतिहास की किसी भी इतिहास पुस्तक में आर्यसमाज द्वारा 1939 में चलाये गये हैदराबाद आंदोलन के विषय में कोई जानकारी नहीं मिलेगी। स्वतन्त्र भारत के पहले मदरसा पठित शिक्षा मंत्री अब्दुल कलाम को यह खास हिदायत मिली थीं कि इतिहास में हिन्दुओं पर जितने भी अत्याचार हुए हैं।  उनका किसी इतिहास पुस्तक में वर्णन मत करना। भारतीयों के प्राचीन इतिहास का जिस पर वो गौरव कर सके। उसका भी वर्णन मत करना। उसे सदा पराजित दर्शाना ताकि भारतीयों को यह लगने लगे कि तुम शासक बनने के कभी योग्य ही नहीं थे। इसलिए तुम पर विदेशी शासन करने के लिए आये। यही तुम्हारी नियति थी। 

24 फरवरी 1939 को हैदराबाद से निकलने वाले साप्ताहिक पत्र 'रहबरे दकिन' में  हैदराबाद के तत्कालीन निज़ाम मीर उस्मान अली की एक ग़ज़ल प्रकाशित हुई। जिसका एक पद्य यह था-

'बन्द नाकूस हुआ सुनके नदाये तकबीर। जलजला आ ही गया सिलसिले जुन्नार पै भी।।'

अर्थात मस्जिदों में मुसलमानों की अल्लाह अकबर की आवाज़ सुनकर हिन्दू लोगों के दिन दहल गये। उनके मंदिरों के शंख बंद हो गये और उनके (जुन्नार) जनेऊ शरीर की कंपकंपी के कारण हिल थे।  

पं गंगा प्रसाद उपाध्याय ने अपनी आत्मकथा में इस ग़ज़ल का उत्तर इस प्रकार से दिया था-

'तीन धागे थे फ़कत सूत के कच्चे लेकिन। बाजी जुन्नार ने ली हैदरी तलवार पै भी।।'

अर्थात तीन धागे थे सूत के कच्चे पर फिर भी हैदरी तलवार पर जनेऊ अर्थात यज्ञोपवीत भारी पड़ा। 

यह पद्य आर्यसमाज द्वारा सुदूर दक्षिण में हैदराबाद में निज़ाम द्वारा चलाये जा रहे दमन के विरोध अहिंसक आंदोलन की विजय का समाचार देता है।  हैदराबाद रियासत में प्रजा में 89% हिन्दू थे और 10% मुस्लिम। जबकि सरकारी नौकरियों में यह प्रतिशत विपरीत था।  शासक मतान्ध निजाम था जो दुनिया का सबसे धनी आदमी समझा जाता था। जिसके पुत्र का विवाह तुर्की के खलीफा की पुत्री से हुआ था। निजाम के लोगों को लगता था कि उनका पोता तुर्की का खलीफा बनेगा और मुसलमानी जगत की बागडोर आसफिया वंश के हाथों में होगी। अलीगढ में सर सैय्यद अहमद खान के लगाए हुए अलगाववादी वृष में निज़ाम मतान्धता की घुट्टी पीकर आया। तेलगू भाषी प्रदेश पर उर्दू लाद दी। हिन्दुओं को नए मंदिर बनाने, उत्सव बनाने, जुलूस निकालने, पुराने मंदिरों की मरम्मत करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस्लाम में मत परिवर्तन को प्रोत्साहन दिया। उसे अपनी मतान्ध नीति में आर्य समाज बाधा लगी तो उसने रियासत में आर्य प्रचारकों पर प्रतिबन्ध लगा दिया।  अंत में विवश होकर आर्यसमाज को 25 दिसंबर 1938 में शोलापुर में आंदोलन करने की घोषणा करनी पड़ी। यह काल था जब देश में गाँधी का सिक्का बोलता था। आर्यों का अहिंसक आंदोलन भी गाँधी को असहनीय था। गाँधी ने घोषणा कर दी कि कोई भी कांग्रेसी हैदराबाद आंदोलन में भाग ना ले। अगले कुछ दिनों में दिल्ली में कांग्रेस का दफ्तर त्यागपत्रों से भर गया। तब जाकर गाँधी की आँख खुली और आर्यसमाज की जमीनी ताकत का उन्हें अहसास हुआ। ऐसा ही गलत आकलन निज़ाम ने भी किया था। हज़ारों आर्यों ने निज़ाम की जेलें भर दी। आर्यों के जनेऊ ने निज़ाम की हैदरी तलवार कुंठित कर दी। निजाम सोचता था कि चींटी चींटी ही है। हाथी के एक पैर से कुचली जा सकती है। पर निज़ाम सृष्टि का नियम भूल गया था। जब समय आ जाता है तो ईश्वर चींटियों के द्वारा ही हाथी का विनाश भी कर देता है। हैदराबाद के सर अकबर हैदरी ने एक महंत के समक्ष कहा कि- यह हमारा क्या करेंगे? महंत ने उत्तर दिया कि आप क्या करने की बात कहते हैं। यह न सोवेंगे और न आपको सोने देंगे। वस्तुतः: ऐसा ही हुआ। 

 आर्यों के न परिवारों में लगातार कई महीनों तक न कोई सोया न ही निज़ाम को सोने दिया। सर्वप्रथम आर्य समाज के सार्वदेशिक सभा के प्रधान महात्मा नारायण स्वामी जी ने अपनी गिरफ़्तारी दी। पीछे जत्थे के जत्थे अपने अपने सर्वधिकारियों के संग जेल जाते रहे। जत्थों का जहाँ रेलवे स्टेशन पर आर्य जनता स्वागत करती थी। वही शहरों से निकलते हुए जत्थों के जुलूसों पर मस्जिदों से पथरबाजी होती थी। स्वामी स्वतंत्रानन्द जी शोलापुर में बैठे हुए फील्ड मार्शल के समान उनका नेतृत्व करते रहे। आखिर में निज़ाम की जेलों में स्थान नहीं रहा। इस आंदोलन की गूंज ब्रिटेन तक गई। निज़ाम ने यह भ्रम भी फैलाने का प्रयास किया कि आर्यों ने असत्य प्रचार उन्हें बदनाम करने के लिए फैला रखा है। आर्यों ने हैदराबाद में बहुत से पत्र, फरमान, आदेश-पत्र, पुराने हिन्दू मंदिरों पर मुसलमानी झंडों के चित्र, टूटे हुए हिन्दू मंदिरों के चित्र , भग्न मूर्तियों के चित्र एकत्र कर उनकी रिपोर्ट बनाकर ब्रिटेन की पार्लियामेंट को भेज दी। निज़ाम का पाँसा यहाँ भी उलट गया। अंत में विवश होकर निज़ाम ने घुटने टेक दिए। आर्यों की ऐतिहासिक विजय हुई। यही आर्यों की विजय बाद में जाकर सरदार पटेल के अनुसार आपरेशन पोलो द्वारा हैदराबाद को भारत में मिलाने के लिये कारगर सिद्ध हुई। 

कुछ लोग कहेंगे कि आज के सन्दर्भ में हैदराबाद आंदोलन की क्या प्रासंगिकता है? तो मैं उन्हें बताना चाहूंगा कि आज कल हैदराबाद से ही एक स्वयंभू नेता के नाम पर देश में भ्रामक बयान देता रहता है। उसकी मजलिस ने उस काल में भी आर्यों का पूरा विरोध करने में और रजाकारों के माध्यम से हिन्दुओं को प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।  हमारे पूर्वजों ने उसकी बीमारी की अहिंसात्मक तरीके से तब भी चिकित्सा की थी।

Monday, February 22, 2021

हम सब ऋणी जिनके: शास्त्रार्थ महारथी पं धर्मभिक्षु जी लखनवी






हम सब ऋणी जिनके: शास्त्रार्थ महारथी पं धर्मभिक्षु जी लखनवी 

#डॉ_विवेक_आर्य 

(20 जून को निर्वाण दिवस पर विशेष रूप से प्रकाशित)

आर्यसमाज के इस्लाम और बाइबिल के मर्मज्ञ विद्वानों में शास्त्रार्थ महारथी पं धर्मभिक्षु जी लखनवी का नाम अद्वितीय विद्वानों में शामिल रहा है। आपका जन्म 1901 की भ्राद्रमास कृष्ण पक्ष की षष्ठी को हुआ था। आप के चाचा बनारसी दास जी (स्वामी निर्भयानन्द) लखनऊ में श्रीमद्दयानन्द अनाथालय के संस्थापक थे । उनके संपर्क में आकर धर्मभिक्षु जी आर्य विचारधारा के बन गए। स्वामी जी ने आपके लिए संस्कृत पंडित और अरबी उर्दू के लिए एक मौलवी को निर्धारित कर दिया। जिससे आप वैदिक सिद्धांतों और क़ुरान के आधिकारिक विद्वान बन गए। आपने क़ुरान को समझने के लिए अरबी भी सीखी। बाइबिल का अध्ययन आपने अपने से लिया।  पं जी अब लखनऊ के चौराहों से भाषण देने लगे एवं मुसलमानों और ईसाईयों से शास्त्रार्थ करने लगे। आप बाद में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के उपदेशक बन गए। आपने पं लेखराम जी की स्मृति में नाटक लिखा। इसका जब सिटी आर्यसमाज लखनऊ में प्रदर्शन हुआ तो मुसलमानों ने ईंटें भी चलाई थी। 

एक बार आपको शहर के कोतवाल ने गिरफ्तार कर लिया। आपके पतले हाथों में हथकड़ियाँ नहीं आई तो आप हंसकर बोले-दोस्त इसे और भी छोटी करो यह लखनऊ की नाजुक कलाइयाँ हैं जहाँ वाजिद अली बादशाह छुन्नुक छइयां नाचते थे। आपको किसी प्रकार बेड़ियाँ पहनाकर ले जाने लगे तो आप विपक्षी बोले हथकड़ियां पहले हुए शर्म नहीं आती है। तब आपने हंस कर उत्तर दिया- लज्जा कायरों को आती है, जल्ला चूड़ी पहनंने वाले हिजड़ों को आती है, लज्जा अंध सेवकों को आती है।  धार्मिक और सत्य पर बलिदान होने वाले धार्मिक पुरुषों को लज्जा नहीं आती। अपितु आप लोगों को यह बेड़ियाँ दिखाई देती हैं। परन्तु सत्यपरायण, धर्मनिष्ठ सत्याग्रहियों के लिये यह सोने के कंगन हैं।  इसके साथ ही पं जी एक तराना गाने लगे-

क़दमों पै उस ऋषि के दीन सिर झुका मुसाफिर। और आर्य्या बने सब दिल में कहें मुनाजिर।   

आपको जेल में बंद कर दिया गया तो आप ने अन्न जल ग्रहण करने से मना कर दिया। कहाँ की जब तक मेरी बात को सिद्ध नहीं माना जायेगा और मैं बाहर आकर स्नान, संध्या , हवन नहीं कर लूंगा। तब तक अन्न जल ग्रहण नहीं करूँगा। तब आपने एक गीत रचा जिसकी पंक्तियाँ थी- बेड़ियाँ क्यों कर न पहिने हम धर्म के वास्ते। जान तक देते है आशिक जब सनम के वास्ते। 

पं जी ने अनेक पुस्तकें उर्दू में लिखी थी जैसे असली क़ुरान जिसमें 48 आयतें स्वयं बनाई थी, चश्मायें क़ुरान, मिर्जा कादियानी को हमल, आसमानी दुल्हन, कलामुल्लाह रहमान वेद या क़ुरान जो 400 पृष्ठ की पुस्तक थी जिसमें वेद का ईश्वरीय ज्ञान तथा क़ुरान का इंसानी कलाम होना सिद्ध किया था।  आप पं लेखराम की स्मृति में 'आर्य मुसाफिर' के नाम से पत्र का संपादन किया था जिसके मुख पृष्ठ पर पं लेखराम जी का बलिदान चित्र था और उसके साथ ये पंक्तियाँ लिखी थी-

'नगाड़ा धर्म का बजता है, आये जिसका जी चाहे। सदाकत वेद अक़दस है, आजमाये जिसका जी चाहे। 

ढिंढोरा हो जगत में बस, मुसाफिर आ गया इस जां। बहस शिरको वतालत पर, करवाले जिसका जी चाहे।।

पं लेखराम, पं गुरुदत्त के समान पं जी भी सदा वैदिक धर्म के प्रचार में निरंतर कार्यरत रहते थे। आप का विवाह श्रीमती सुभद्रा देवी से हुआ और आपको एक पुत्री भी हुई जिसका नाम लक्ष्मी रखा गया था। आप की पुत्री जब 6 माह की थी तो उसे चेचक निकल गया। पं जी 15 दिन के पश्चात आर्यसमाज के उत्सव से घर आये। दूसरे दिन आपको पुन: सीतापुर में शास्त्रार्थ करने जाना था। पत्नी ने लड़की की हालात गंभीर बताई। पं जी ने कहा कि तुम्हें ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वही रक्षा करेंगे और वो स्वस्थ हो जाएगी। मैं अगर नहीं गया तो जाने कितने लोग मुसलमान हो जायेंगे। यह संसार तो परीक्षा का स्थान है। आप गए और शास्त्रार्थ में विजयी हुए। पीछे आपकी पुत्री भी स्वस्थ हो गई। शास्त्रार्थ में ईंटें खूब बरसी पर आप सुरक्षित रहे। पं जी अनेक मुसलमानों को शुद्ध कर अपने घर भी ले आते थे। कुछ लोग ऐसा करने से रोकते और पं लेखराम की याद दिलाते। आप कहते मेरी तो प्रबल इच्छा है कि मैं वैदिक धर्म का प्रचार करते करते बलिदान हो जाऊँ। 

पं जी लखनऊ में जून 1930 में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करते हुए गिरफ्तार हुए। आपने बाजार से कुछ मंगवाकर खाया जिससे आपको हैजा हो गया। उससे आपका असमय देहांत 20 जून को हैजा से मेडिकल कॉलेज में उपचार के दौरान केवल 30 वर्ष की अल्पायु में हो गया। आर्य समाज से एक महान प्रचार, चिंतक, शास्त्रार्थ महारथी सड़ के लिए छीन गया। आपने सैकड़ों शास्त्रार्थ किये और मुल्ला मौलवियों-पादरियों की बोलती बंद कर दी। 

आपके शास्त्रार्थों और शंका समाधान के कुछ रोचक प्रसंग-

1. शास्त्रार्थ बदायुँ- यह शास्त्रार्थ एक संस्कृत जानने वाले कादियानी मौलवी से हुआ था। मौलवी ने ऋग्वेद का सूक्त प्रस्तुत कर कहा की इसका ऋषि जाल बाध्य मत्स्य है और हंसी उड़ाते हुये कहा कि वेद का पैगम्बर मछलियां भी थी। खुदा का आदेश मछलियों पर आया। पं जी ने कहा कि मत्स्य ऋषि का नाम था जैसे एक पैगम्बर थे अबूहुरैरा तो यह उनका नाम था न कि वह बिलौटे थे। इस  कहा यह गलत है। पं जी ने अरबी कोष लेकर दिखवा दिया जिसमें हुरैरा का अर्थ बिल्ली लिखा था। इस पर मौलवी ने क्षमा मांगी थी। 

2. एक बार एक मौलवी ने सत्यार्थ प्रकाश में से पढ़कर सुनाया कि जो प्रतिदिन हवन नहीं करता वह पापी है। और एक आहुति 6 माशे की होनी चाहिये अब बताओं कौन सा आर्य समाजी है जो रोजाना 8,9 तोले घी की आहुति देता है। अगर नहीं तो वह पापी है। पं जी ने कहा कि सत्यार्थ प्रकाश का एक शब्द आप छोड़ गये। यहाँ लिखा है घृतादि केवल घी नहीं। मौलवी ने कहा आदि से मतलब। पं जी ने कहा आदि का अर्थ है घी के अलावा यह चीजें-अब पं जी ने शतपथ ब्राह्मण की श्रुतियाँ बोलनी शुरू कर दी। जिसमें महाराज जनक और महर्षि याज्ञवल्क्य का संवाद है। 

वेन्सि अग्निहोत्रं  याज्ञवल्क्य?  अर्थात क्या याज्ञवल्क्य अग्निहोत्र जानते हो?  अग्निहोत्र क्या है? हे सम्राट मैं अग्निहोत्र को जानता हूँ? अर्थात जब दूध से घी बनेगा तब अग्निहोत्र होगा। महाराज जनक ने कहा- मुनिवर याज्ञवल्क्य यदि दूध न हो तो हवन किस प्रकार करोगे? महर्षि याज्ञवल्क्य बोले गेहूं और जौ से हवन कर देंगे। राजा ने कहा यदि गेहूं, जौ न हो तो कैसे हवन करोगे?  याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया जंगल की जड़ी बूटियों से हवन कर देंगे। जनक बोले जंगल की जड़ी-बूटियां न हो तो हवन कैसे करोगे? याज्ञवल्क्य ने कहा जल से हवन कर देंगे।  जनक बोले! यदि जल न ही तो हवन कैसे करेंगे? याज्ञवल्क्य ने कहा सत्य से श्रद्धा में हवन कर देंगे। पं जी बोले मौलवी साहिब हवन इस भावना को बनाने के लिये किया जाता है कि मनुष्य दूसरों के लिये त्याग करना सीखें। पं जी का समाधान सुनकर सभी श्रोता धन्य हुए। मौलवी पं जी के वचन सुनकर आपने सत्यार्थ प्रकाश की आदि शब्द की खूब व्याख्या की कहकर प्रशंसा करते हैं।  

3. लखनऊ में एक शास्त्रार्थ में एक मौलवी ने पूछा कि सनातन धर्मी कहते हैं कि वेद का जहूर (उद्भव) ब्रह्मा जी से हुआ, और आप आर्य कहते हैं कि अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा से। तो पहिले आप यह तय करिये कि वेद का इल्हाम हुआ किस पर? आप दोनों  दावेदार हो मगर यह पता न लगा पाये कि वेद का इल्हाम किस पर हुआ? पं जी ने उत्तर दिया कि हम दोनों की बात सही है आपके समझने में फेर है।  सनातन धर्मीपहली सृष्टि की बात कहते हैं।  ब्रह्मा नाम है सृष्टि रचने वाले भगवान का। उसी भगवान ने वेदों का प्रकाश किया। हम दूसरे स्टेज की बात कहते हैं- अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा ने वेदों  का मनुष्यों में किया।  पं जी को सुनकर सभी जय-जयकार करने लगे। 

4. गोरखपुर में शास्त्रार्थ का विषय ईश्वर का नाम था। मौलवी बोले कि ईश्वर का जाती नाम अल्लाह है। पंडित जी बोले ईश्वर का निज नाम ओ३म् है। पं जी ने कहा की ईश्वर का निज नाम वही हो सकता है जो बोलने में सुगम हो। जिसे बच्चे और प्रति देश के लोग बोल सकें।   ओ३म् नाम सरल सब देश के बोलने वालों के लिये एक सा है। अल्लाह नाम तो ऐसा है कि चिराग के सामने बैठकर अल्लाह कहो तो चिराग बुझ जायेगा। पैदा होने वाले बच्चे चाहे जिस मज़हब के हो अपने रोने में ओ३म् की ध्वनि बोलते हैं। इसी बीच समाज के मंत्री ने सोडा की बोतल लेकर मौलवी साहिब को पीने के लिए दे दी। पीते ही मौलवी जी के मुँह से डकार आई तो ओ३म् की ध्वनि उसमें भी मिली। पं जी मौलवी से पूछा की आपके मुँह से भी ओ३म् निकला अल्लाह नहीं निकला। इस पर सभी हंस पड़े। 

5. लखनऊ में पुनर्जन्म पर पं जी का एक मौलवी से शास्त्रार्थ हो रहा था। मौलवी बोले की यदि पुनर्जन्म होता तो कुछ बातें तो पिछले जन्म की याद रहनी चाहिए। परन्तु एक भी याद नहीं रहती। इसलिए पुनर्जन्म का मानना गलत है। पं जी ने उत्तर दिया कि यदि पुनर्जन्म की बातें याद रहें तो बैर विरोध और झगडे आरम्भ हो  जाये। कभी समाप्त न हो। इसलिए एक जन्म के कार्य-व्यवहार , वैर-विरोध , मोह सभी को भुला दिया जाता है।  हाँ संस्कार अवश्य जाते है और योगियों को याद रहता है जैसे गीता में श्री कृष्ण जी ने कहा है। 

इस पर मौलवी कुतर्क करते हुए बोले कि थोड़े बहुत मौलवी तो आप भी होंगे।  आपको एक आध बात तो याद होगी ही। पं जी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया हाँ एक बात याद है। पिछले जन्म में मैं ओका बाप था। आप छोटे से थे आपको खांसी आ रही थी। आप रेवड़ियां खाने के लिए मचलने लगे। तब मैंने काम मरोड़े थे। अपनी अम्मा से पूछ लेना। मौलवी बिगड़कर बोला तुम मेरी लुगाई हे और मैं तुम्हारा खसम था। मैंने तुम्हें कई बार पीटा था। इस पर पं जी ने घोषणा कर दी कि भाईयों मौलवी जी को पिछले जन्म की याद आ गई। इससे पुनर्जन्म सिद्ध हो गया। हिन्दुओं ने तालियां बजा दी और मौलवी का चेहरा देखने लायक था। 

6. लखनऊ में एक शास्त्रार्थ में पं जी ने दावा किया कि अजरुये कुरान खुदा शैतान है। उस पर हलचल मच गई कि पं जी ने खुदा को शैतान कहा। तब पं जी ने प्रमाण क़ुरान से दिया कि सूरये एराफ सातवीं सूरत और सूरत-स्वाद में साफ़ साफ़ लिखा है कि खुदा शैतान है। उस पर मुसलमानों ने क़ुरान में देखा तो उत्तर देने लायक नहीं रहे।  तब वे नमाज का बहाना बनाकर जाने लगे। तब पं जी ने फिर कहा कि शैतान काफिर से डरता ह।  क़ुरान में साफ़ लिखा है। अन्य में पं जी ने कहा कि खुदा शैतान हैं और शैतान खुदा है। किया गुमराह-दोनों ने जहाँ को, क़ुरान से यह वर मिला है। इस पर शास्त्रार्थ समाप्त हो गया। 

7.बाराबंकी आर्यसमाज के उत्सव पर शास्त्रार्थ हुआ। पं जी ने मौलवी से पूछा आपका कलमा (गुरु मन्त्र) क्या है? तब मौलवी ने कलमा लाइलाह इलल्लाह सुना दिया। तब पं जी ने पूछा कि यह कलमा आपकी क़ुरान शरीफ में कहीं दिया है? तो मौलवी ने कहा हाँ। तब पं जी ने खड़े होकर उत्तर दिया कि अगर मौलवी जी सारे क़ुरान में कलमा दिखा दे तो मैं मुसलमान बन जाऊँगा। मौलवी कई देर तक क़ुरान देखते रहे पर उन्हें नहीं मिला। इस पर शास्त्रार्थ समाप्त हो गया। 

8. गोरखपुर में आर्यसमाज में पं जी का मौलवी से शास्त्रार्थ हुआ। विषय वेद और क़ुरान में एकेश्वरवाद था। मौलवी बोले की क़ुरान में एकेश्वरवाद है। पं जी ने उत्तर दिया कि क़ुरान के खुदा तो पेशकार (हज़रत मुहम्मद) के बिना कोई निर्णय करने में असमर्थ थे। क़ुरान का खुदा तो हजरत के घरेलू झगड़ों का निपटारा कराने वाला तथा अपने मुस्लिम अनुयायियों को यह कहता है कि बिना हज़रत मुहम्मद के तुम उनकी बीवियों से बात न करो। न दावत खाने जाओ। क़ुरान का खुदा रूठी हुई हजरत की बीवियों को सांत्वना देता है कि तुम्हें जेवर आदि की चिंता नहीं करनी चाहिए इत्यादि। इस प्रकार से क़ुरान के अनेक प्रमाणों से पं जी ने यह सिद्ध कर दिया कि वेद ही एकेश्वरवाद का सन्देश देते है। 

यह पं धर्मभिक्षु जी के जीवन में हुए शास्त्रार्थों के कुछ प्रसंग हैं। जो उनकी स्मृति में उनकी पत्नी माता सुभद्रा देवी जी द्वारा लिखी उनकी छोटी सी जीवनी 'पंडित धर्म भिक्षु लखनवी का जीवन चरित्र' से लिए गए है। आज की वर्तमान पीढ़ी पं जी के नाम और कार्यों से परिचित नहीं है। उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक कलामुल्लाह रहमान वेद या क़ुरान उर्दू में थी। इस पुस्तक का उर्दू से हिंदी में अनुवाद होकर इसका दोबारा प्रकाशन होना चाहिए। आर्यसमाज की महान विभूति पं धर्मभिक्षु जी की स्मृति इसी प्रकार से चिरस्थायी होगी। 


इमाम-ए-हिन्द और इक़बाल


 


इमाम-ए-हिन्द और इक़बाल 


#डॉ_विवेक_आर्य 


राम मंदिर निर्माण निधि के लिए धन संग्रह करते हुए राष्ट्रीय मुस्लिम मंच द्वारा श्री राम जी के लिए 'इमाम-ए-हिन्द' का प्रयोग किया गया। हिन्दू समाज इस शब्द से प्राय: परिचित ही नहीं है। इतिहास में यह सम्बोधन अल्लामा इक़बाल द्वारा अपनी इस रचना में श्री राम जी के लिए प्रयोग किया गया था।   


लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द। सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।।

ये हिन्दियों के फिक्रे-फ़लक उसका है असर,रिफ़अत में आस्माँ से भी ऊँचा है बामे-हिन्द ।

इस देश में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त,मशहूर जिसके दम से है दुनिया में नामे-हिन्द ।

है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़,अहले-नज़र समझते हैं उसको 'इमामे-हिन्द '।

एजाज़ इस चिराग़े-हिदायत का है ,यहीरोशन तिराज़ सहर ज़माने में शामे-हिन्द ।

तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़र्द था,पाकीज़गी में, जोशे-मुहब्बत में फ़र्द था ।

-अल्लामा इकबाल

 

[शब्दार्थ :लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द । सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।।= हिन्द का प्याला सत्य की मदिरा से छलक रहा है। पूरब के सभी महान चिंतक इहंद के राम हैं; फिक्रे-फ़लक=महान चिंतन; रिफ़अत=ऊँचाई; बामे-हिन्द=हिन्दी का गौरव या ज्ञान; मलक=देवता; सरिश्त=ऊँचे आसन पर; एजाज़=चमत्कार; चिराग़े-हिदायत=ज्ञान का दीपक; सहर=भरपूर रोशनी वाला सवेरा; शुजाअत=वीरता; फ़र्द=एकमात्र, अद्वितीय; पाकीज़गी= पवित्रता]


अल्लामा इकबाल सियालकोट, पंजाब, ब्रिटिश भारत में पैदा हुआ था। एक कश्मीरी शेख परिवार में पाँच भाई बहन की सबसे बड़ी संतान इकबाल के पिता शेख नूर मुहम्मद एक समृद्ध दर्जी थे। उनका परिवार इस्लाम के प्रति कट्टरता के लिए जाना जाता था। इकबाल के दादा सहज राम सप्रू श्रीनगर से  थे। दवाब  के चलते उन्होंने अपने परिवार के साथ इस्लाम में मर परिवर्तित कर लिया था और अपना शेख मुहम्मद रफीक रख लिया था। वह पंजाब के सियालकोट पश्चिम में अपने परिवार के साथ चले गए। कुछ लोग कहते है कि अपने प्रारंभिक उम्र में इकबाल के विचार सेक्युलर थे। क्योंकि उन्होंने ही सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा गीत लिखा था। पाठक जरा इस तराने को गौर से पढ़े-


सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा। हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलसिताँ हमारा

परबत वह सबसे ऊँचा, हम्साया आसमाँ का वह संतरी हमारा, वह पासबाँ हमारा

गोदी में खेलती हैं इसकी हज़ारों नदियाँ गुल्शन है जिनके दम से रश्क-ए-जनाँ हमारा

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दोसिताँ हमारा। 


इस तराने की अंतिम पंक्ति की मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना पिछले 1200 वर्षों में हमारे महान पूर्वजों द्वारा दिए गए बलिदान का अपमान नहीं तो क्या है? जिन्होंने अपने धर्म, गौ, वेद,चोटी, जनेऊ मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिए। उनके बलिदानों को इतना सस्ते में कैसे लिया जा सकता है?  यह ऐतिहासिक सत्य है कि मज़हब के नाम पर, दीन के नाम पर, गैर मुस्लिम होने के नाम पर हमारे ऊपर अत्याचार हुए। आखिर क्या कारण था कि कोई हिन्दू अगर इस्लाम स्वीकार कर लेता तो उसे ऊँचा ओहदा, जजिया से मुक्ति, निक़ाह करने के लिए औरतें से लेकर पान खाकर थूकने के लिए हीरे जड़ित स्वर्ण पात्र मिलते थे। जो हिन्दू अस्वीकार कर लेता तो उसे वीर शिरोमणि शम्भाजी, गुरु तेग बहादुर, बंदा बैरागी, वीर गोकुला, हकीकत राय के समान वीरगति, जेल, तिरस्कार, गुलामी, बलात्कार, जजिया कर और मैला ढोने जैसे काम करने के लिए विवश किया जाता था। 


इसलिए यह तराने हमसे खिलाफत के दौर में हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर गवाए जाते थे। 1918 के बाद हमारे देश के राजनीतिक पटल में गाँधी जी का अकस्मात् आना और एकदम से अर्श छू जाना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उस समय गाँधी ने एक ऐतिहासिक गलती की। उन्होंने सोचा की देश की स्वतंत्रता के मुसलमानों का सहयोग आवश्यक है।  इसलिए उन्होंने तुर्की के खलीफा को हटाए जाने को लेकर चलाये जा रहे खिलाफत आंदोलन जो विशुद्ध रूप से मुसलमानों का विदेशी जमीन पर चल रहा धार्मिक आंदोलन था। उससे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन को नत्थी कर दिया। जो सेक्युलर नेता आज कहते है कि धर्म को राजनीति से दूर रखना चाहिए उन्हें यह स्मरण रहना चाहिए कि यह धर्म को राजनीति से नत्थी करने का काम सर्वप्रथम गाँधी ने ही किया था। देश की स्वतंत्रता का आंदोलन गाँधी के कहने पर अली बंधुओं जैसे मतान्ध नेताओं के हाथों सौंप दिया गया। धनी हिन्दुओं को ख़िलाफ़त के धन देने, जेल जाने और आंदोलन करने को प्रेरित किया गया। आंदोलन तो असफल होना ही था क्योंकि तुर्की  की जनता ही उसे नहीं चाहती थी। पर उत्तेजित हुई मोमिनों की भीड़ निहत्थे हिन्दुओं पर टूट पड़ी। 1921 में आज से ठीक 100 वर्ष पहले मोपला के नाम से केरल के मालाबार में दंगे प्रारम्भ हुए जो 1947 के देश विभाजन तक चले। इन दंगों में अंग्रेज मौन रहकर आनंद लेते रहे और हिन्दुओं को दंगाई प्रताड़ित करते रहे। 


इमाम इमाम-ए-हिन्द और मज़हब नहीं सिखाता का तराना गाने वाला इक़बाल अब अपने असली रूप में सामने आया। मुसलमानों के लिए अलग सरजमीन की  

मांग इक़बाल ने अपने प्यादे जिन्ना जिसका इस्लाम से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था रखवाई थी। अब इक़बाल उसी तर्ज पर मंच से गाता था।


चीन-और अरब हमारा। हिंदुस्तान हमारा। मुस्लिम है हम। वतन है सारा जहाँ हमारा। 


1930 में मुस्लिम लीग के मंच से अध्यक्षीय भाषण देते हुए इक़बाल ने ही कहा था कि मैं पंजाब, बलूचिस्तान, सिंध और फ्रंटियर को एक अलग देश के रूप में देखना चाहता हूँ। इक़बाल खुले आम यह घोषणा करता था कि मुसलमानों को जिन्ना के हाथ मजबूत करने चाहिए ताकि वो उन्हें पाकिस्तान बनाकर दे सके। इक़बाल ने हिन्दू मुस्लिम की भिन्न निर्वाचन प्रणाली के लिए मुसलमानों को प्रेरित किया था जिसके चलते पाकिस्तान का निर्माण हुआ। 


इक़बाल की कट्टरता के दो उदाहरण हम देना चाहेंगे।  शुद्धि एवं हिन्दू संगठन के आंदोलन चलाने वाले स्वामी श्रद्धानन्द के हत्यारे अब्दुल रशीद और महाशय राजपाल के हत्यारे इलमदीन की इक़बाल ने खुलेआम  वकालत की थी। इलमदीन को जब फांसी से न बचा पाए तो उसकी लाश पर इक़बाल ने एक वाक्या बोला था कि ' असि वेखदे रह गए, ए तरखना दा मुण्डा बाजी ले गया' अर्थात हम पढ़े लिखे देखते रह गए। यह बढ़ई का अनपढ़ लड़का बाजी मार गया। इक़बाल के इन दृष्टिकोण से हमें स्पष्ट ज्ञात होता है कि उसकी मनोवृति क्या थी। जो आदमी हिन्दुओं के हत्यारों का पक्ष लेने में कभी पीछे नहीं रहता था।  इक़बाल का देहांत 1938 में हो गया। वो पाकिस्तान बनते तो नहीं देख पाया। पर वो लाखों निरपराध वृद्धों, बच्चों, स्त्रियों की लाशों, अबलाओं के बलात्कारों, अबोध बालकों को अनाथ, धनिकों को निर्धन बनाने के बाद पाकिस्तान का राष्ट्र पिता बनने पर कैसा महसूस करता होगा। यह पाठक स्वयं सोच सकते है।

Wednesday, February 17, 2021

हम सब ऋणी


हम सब ऋणी

-डॉ० राजेन्द्रप्रसाद [भारत के प्रथम राष्ट्रपति]

स्वामी दयानन्द की सबसे बड़ी विशेषता उनकी दूरदर्शिता थी। यह देखकर आश्चर्य होता है कि विदेशी शासन के विरोध में सक्रिय संघर्ष के समय जिन बातों पर महात्मा गांधी ने अधिक बल दिया और उन्हें रचनात्मक कार्य की संज्ञा दी, प्रायः वे सभी काम स्वामी दयानन्द के कार्यक्रम में ५० वर्ष पूर्व शामिल थे।

देश भर के लिए एक सामान्य भाषा की आवश्यकता स्वामी दयानन्द ने महसूस की और हिन्दी को ही राष्ट्र अथवा आर्य भाषा होने के योग्य माना।
इसके अतिरिक्त अछूतोद्धार, स्त्री शिक्षा, हाथ के बने कपड़े अथवा स्वदेशी का प्रयोग इत्यादि बातों पर भी उन्होंने काफी बल दिया और वे स्वयं भी जीवन भर इन बातों पर पूरा अमल करते रहे।

उनकी कृतियों और उपदेशों से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि वे विचारों से राष्ट्रवादी थे और विदेशी शासन के स्थान पर स्वराज्य अथवा भारतीयों के ही राज्य का स्वप्न देखते थे।

समाज सेवा के क्षेत्र में स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज ने जो कार्य किया उसके महत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। उस कार्य के लिए और देश को जो उससे लाभ पहुंचा उसके लिए हम सब स्वामी दयानन्द के ऋणी हैं।

[स्त्रोत- 'सार्वदेशिक' (साप्ताहिक) : सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली का मुख पत्र का ३० अगस्त - ६ सितम्बर, १९६६ का वेद कथा विशेषांक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]