Tuesday, July 14, 2020

महर्षि दयानन्दकृत ओंकार-अर्थ-अनुशीलन


महर्षि दयानन्दकृत ओंकार-अर्थ-अनुशीलन

लेखक- प्रियांशु सेठ (वाराणसी)

ईश्वर का निज नाम 'ओ३म्' है। इस नाम में ईश्वर के सम्पूर्ण स्वरूप का वर्णन है। यदि परमात्मा कहें तो इसके कहने से सब जीवों का अन्तर्यामी आत्मा इसी अर्थ का बोध होता है, न कि सर्वशक्ति, सर्वज्ञान आदि गुणों का। सर्वज्ञ कहने से सर्वज्ञानी, सर्वशक्तिमान् कहने से ईश्वर सर्वशक्तियुक्त है, इन्हीं गुणों का बोध होता है, शेष गुण-कर्म-स्वभाव का नहीं। 'ओ३म्' नाम में ईश्वर के सर्व गुण-कर्म-स्वभाव प्रकट हो जाते हैं। जैसे एक छोटे-से बीज में सम्पूर्ण वृक्ष समाया होता है, वैसे ही 'ओ३म्' में ईश्वर के सर्वगुण प्रकट हो जाते हैं। महर्षि दयानन्दजी महाराज अपने ग्रन्थ 'सत्यार्थप्रकाश' के प्रथम समुल्लास में ओ३म् को "अ, उ, म्" इन तीन अक्षरों का समुदाय मानते हैं। स्वामीजी को अ से अकार, उ से उकार तथा म् से मकार अर्थ अभीष्ट है। इन शब्दों से उन्होंने परमात्मा के अलग-अलग नामों का ग्रहण किया है- अकार से विराट, अग्नि और विश्वादि। उकार से हिरण्यगर्भ, वायु और तैजसादि। मकार से ईश्वर, आदित्य और प्राज्ञादि।
संस्कृत भाषा में पदान्तरों के अक्षर लेकर स्वतन्त्र शब्दों का प्रयोग होता है। इसपर शौनक ऋषि का मन्तव्य है- "शब्दों में धातु, उपसर्ग तथा अन्य शब्दों के अवयवों की भी ध्वनियां होती हैं। वे शब्द एक धातु के भी बने होते हैं और कुछ शब्द दो धातुओं से बनते हैं तथा कुछ शब्द बहुत धातुओं से बनते हैं। वे शब्द पांच प्रकार के होते हैं (बृहद्देवता २/१०३,१०४)।"
१. धातु से बने शब्द- अग्नि आदि।
२. धातुओं से बने शब्दों से बनाये हुए शब्द- रत्नधा + तमम्।
३. उपपद रखकर बने शब्द- यन् ज:= यज्ञ:।
४. वाक्य से बने शब्द- इति + ह + आस= इतिहास।
५. बिखरे हुए अवयवों से बने शब्द- अ उ म्= ओ३म्।

महाभाष्यकार ने भी स्पष्ट घोषणा की है- 'बह्वर्था अपि धातवो भवन्ति (१/३/१)'। जब एक-एक धातु के अनेक अर्थ होंगे तो उनसे निष्पन्न शब्द भी अनेकार्थवाची होंगे। अन्य भाषाओं में भी दूसरे शब्दों के अवयव लेकर एक स्वतन्त्र शब्द का निर्माण हुआ है। उदाहरण के लिए, जैसे अंग्रेजी भाषा में एक शब्द 'News' है, जिसका अर्थ है- समाचार-खबर अर्थात् चारों तरफ से जो बातें आती हैं उसको समाचार कहते हैं। लेकिन इनका आदि अक्षर अंग्रेजी भाषा में चारों दिशाओं के नामों को भी प्रकट करता है-
North- उत्तर दिशा
East- पूर्व दिशा
West- पश्चिम दिशा
South- दक्षिण दिशा

इसी तरह "अ, उ, म्" इन तीनों अक्षरों का समुदित रूप यह 'ओ३म्' है। यथा-
सोऽयमात्माऽध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा, अकार, उकार मकार इति।। -माण्डूक्यो० ८
अर्थात्- यह आत्मा (परमात्मा) अक्षर में अधिष्ठित है। वह अक्षर ओंकार=ओ३म् है। वह ओंकार मात्राओं में अधिष्ठित है और वे मात्राएं अकार, उकार, मकार हैं।

माण्डूक्योपनिद् का ऐसा सिद्धान्त प्रतीत होता है कि यह दो धातु और एक उपसर्ग से 'ओ३म्' शब्द की सिद्धि मानती हो। श्रुति ९,१०,११ में "अप" धातु से 'अ', "उत्" उपसर्ग से 'उ' और "मा" वा "मि" धातु से 'म्' लेकर "ओ३म्" शब्द की सिद्धि करती है। यथा-
"अकार: प्रथमा मात्रा-आप्ते:, आदिमत्वाद् वा।
उकारो द्वितीया मात्रा उत्कर्षात्, उभयत्वाद् वा।
मकारस्तृतीया मात्रा-मिते:, अपीतेर्वा।"
अर्थ- अकार प्रथम मात्रा है, अकार का अर्थ है- व्याप्ति और आदि। उकार दूसरी मात्रा है, उकार का अर्थ है- उत्कर्ष और उभयादि। मकार तीसरी मात्रा है, मकार का अर्थ है- मिति और अपीति आदि।
[आप् धातु या आदि शब्द का आ ह्रस्व करके- 'अ'। उत्कर्ष या उभय शब्द का- 'उ'। मिति अथवा अपीति- समाप्ति सूचक का प् 'म्' होकर- 'म्'।]

महर्षि के अर्थ पर विचार-
महर्षि दयानन्द द्वारा किए प्रत्येक शब्द का अर्थ उनके स्वाध्याय-चिन्तन को हमारे समक्ष प्रबलता से स्थापित करता है। आर्ष शास्त्रों के अनुसार अकार, उकार तथा मकार का महर्षिकृत अर्थ परस्पर सम्बन्ध रखनेवाला है। देखो-

१. शतपथब्राह्मण (६/२/२/३४, ६/३/१/२१, ६/८/२/१२, ९/१/१/३१) में 'विराडग्नि:' आया है; अतः विराट् अग्नि का नाम है। शतपथब्राह्मण (७/३/१/२२) ने 'इयं (पृथिवी) वाऽग्नि:' लिखकर घोषणा की है कि यह पृथ्वी अग्नि है। आगे पृथ्वी को विश्व बताते हुए शतपथब्राह्मण (९/३/१/३) में कहा है- 'स य: स वैश्वानर:। इमे स लोका ऽइयमेव पृथिवी विश्वं' अर्थात् ये लोक वैश्वानर है, यह पृथिवी विश्व है। शतपथब्राह्मण ने 'वैश्वानरो वै सर्वेऽग्नय: (६/२/१/३५, ६/६/१/५)' अर्थात् सब अग्निया वैश्वानर है लिखकर अग्नि को वैश्वानर स्वीकार किया है। विश्व और वैश्वानर शब्द का एक ही अर्थ है। इसकी पुष्टि करते हुए शतपथ० (१३/३/८/३) में कहा है- 'इयं (पृथिवी) वै वैश्वानर:' अर्थात् यह पृथिवी वैश्वानर है।
विश्व शब्द पर स्वामी दयानन्दजी का मन्तव्य है- "विशन्ति प्रविष्टानि सर्वाण्याकाशादीनि भूतानि यस्मिन्। यो वाऽऽकाशादिषु सर्वेषु भूतेषु प्रविष्टः स विश्व ईश्वरः (स०प्र०, प्रथम समुल्लास) अर्थात् जिसमें आकाशादि सब भूत प्रवेश कर रहे हैं अथवा जो इन में व्याप्त होके प्रविष्ट हो रहा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम 'विश्व' है।"
निरुक्तभाष्यकार दुर्गाचार्य का वैश्वानर शब्द पर भी यही मत है। यथा-
"प्रत्यृता सर्वाणि भूतानि" विश्वानि ह्यसौ भूतानि प्रति ऋत: प्रविष्ट इत्यर्थ:। "तस्य" विश्वानरस्य अपत्यं "वैश्वानर:"। -निरुक्त, दैवतकाण्ड ७/२१/१ पर दुर्गाचार्यकृत टीका, पृष्ठ ६०२, श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, मुम्बई, १९६९ से प्रकाशित
वैश्वानर शब्द का एक यह भी अर्थ है कि जो पूर्णरूप से सब भूतों में प्रविष्ट है, उसको वैश्वानर कहते हैं।
अतः अकार से विराट्, अग्नि और विश्वादि का ग्रहण शास्त्रसम्मत है।

२. शतपथब्राह्मण (६/२/२/५) में आता है- 'प्रजापतिर्वै हिरण्यगर्भ:' अर्थात् हिरण्यगर्भ प्रजापति है। शतपथ० ने 'स एष वायु: प्रजापति (८/३/४/१५)' प्रजापति को वायु स्वीकार किया है। ऐतरेय० (४/२६) में भी कहा है- 'वायुर्ह्योव प्रजापतिस्तदुक्तमृषिणा पवमान: प्रजापतिरीति।' तैत्तिरीय ब्राह्मण में वायु को तैजस बताया है '(तेजो वै वायु: -३/२/९/१)'।
इससे स्पष्ट है कि हिरण्यगर्भ, वायु और तैजस नामों का उकार से ग्रहण शास्त्रों के अनुकूल है।

३. माण्डूक्योपनिषद् की श्रुति ११ में मकार को 'माङ्' धातु का कहा है, अर्थात् जो मापनेवाला, न्याय व शासन करनेवाला है। न्याय वा शासन करनेवाला ईश वा ईश्वर है। अथर्ववेद (११/४/१) में उसे सबका स्वामी बताया है- 'यो भूत: सर्वस्येश्वरो यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम्'। दर्शनशास्त्र के अनुसार ईश्वर के बिना कर्मफल की व्यवस्था नहीं हो सकती, यथा- 'ईश्वर: कारणं पुरुषकर्माफल्यदर्शनात् (न्याय० ४/१/१९)'। इससे सिद्ध है कि ईश्वर ही शासनकर्त्ता व न्यायकर्त्ता है। शतपथब्राह्मण (६/१/३/१७) में आया है- 'आदित्यो वा ईशान: आदित्यो ह्यस्य सर्वस्येष्टे।' स्पष्ट है कि ईशान और आदित्य पर्यायवाची हैं। बृहदारण्यक० (४/३/२१) के अनुसार- 'अयं पुरुष प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तौ न बाह्यं किञ्चन् वेद नान्तरम्' अर्थात् यह पुरुष (जीवात्मा) प्राज्ञेनात्मना (परमात्मा) के साथ सम्पर्क में आया हुआ न कुछ बाहर जानता है, न अन्दर। इससे स्पष्ट हुआ कि जीवात्मा आप्तकाम, आत्मकाम और निष्काम होकर सभी दुःखों से छूट जाता है अर्थात् यह न्यायरूपी फल उसे ईश्वर देता है। सिद्ध है, प्राज्ञ और ईश्वर पर्यायवाची हैं।
अतः मकार से आदित्य, ईश्वर और प्राज्ञ का ग्रहण स्पष्ट है।

संस्कृत के प्रायः सभी शब्द आख्यातज हैं- प्रकृति-प्रत्यय के योग से निष्पन्न हैं। इसी कारण वे यौगिक कहाते हैं। आदि, उभय और अपिति के आधार पर महर्षि का किया अर्थ वेदादिशास्त्रों के अनुकूल है। गोपथब्राह्मण (१/५) में तो 'अ, उ, म्' को क्रमशः ब्रह्मा (उत्पत्तिकर्त्ता), विष्णु (पालनकर्त्ता) और शिव (संहारकर्त्ता) का वाचक बताया है। मैत्र्युपनिषद् (६/८) में आया है- 'एवं हि खल्वात्मेशान: शम्भुर्भवो रुद्र: प्रजापतिर्विश्वसृग्घिरण्यागर्भ:'। यहां आत्मा, ईशान, शम्भु, भव, रुद्र, प्रजापति, विश्वसृक् और हिरण्यगर्भ परमात्मा के नाम हैं। यजुर्वेद (३२/१) में परमात्मा के अग्नि, आदित्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, ब्रह्म, आप: और प्रजापति- ये नाम हैं। तात्पर्य यह है कि अ, उ, म् पृथक्-पृथक् ईश्वर के भिन्न-भिन्न नामों के वाचक अर्थात् परमात्मवाची हैं।

महर्षि के अर्थ में उपनिषद् का प्रमाण-
माण्डूक्योपनिषद् में अकार का सम्बन्ध विश्व, उकार का सम्बन्ध तैजस एवं मकार का सम्बन्ध प्राज्ञ से किया है। यथा-
१. जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकार: प्रथम मात्रा (माण्डूक्य० ९) अर्थात् ओ३म् की प्रथमा मात्रा अकार= 'अ' है। उसका सम्बन्ध जागरित स्थान से है और वह वैश्वानर= विश्वानर= विश्वसम्बन्ध है।
२. स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीय मात्रा (माण्डूक्य० १०) अर्थात् ओ३म् की द्वितीया मात्रा उकार= 'उ' है। उसका सम्बन्ध स्वप्नस्थान से है और वह तैजस् है।
३. सुषुप्तस्थान: प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा (माण्डूक्य० ११) अर्थात् ओ३म् की तृतीया मात्रा मकार= 'म्' है। उसका सम्बन्ध सुषुप्तस्थान से है और वह प्राज्ञ है।

माण्डूक्योपनिषद् की इस श्रुति में जीवात्मा के तीन अवस्थाओं का वर्णन है जिसका सम्बन्ध ईश्वर से है।
जागरितावस्था- सब पादों से पहला विश्वनामापाद तीनों पादों में व्यापक है अर्थात् जीव की स्वप्न, सुषुप्ति आदि सब अवस्थाओं में जाग्रतावस्था का प्रभाव रहता है।
स्वप्नावस्था- तैजस नाम का जो दूसरा पाद है यह विश्व पाद की अपेक्षा उत्कृष्ट और विश्व तथा प्राज्ञ दोनों के बीच में है। जो इस पाद को भलेप्रकार जानता है वह अपनी ज्ञान-सन्तति को नित्य बढ़ाता है।
सुषुप्तावस्था- तीसरा पाद प्राज्ञ अपिति का देनेहारा है। इसको जानने के बाद जीवात्मा लय हो जाती है।

यहां एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब यहां जीव की अवस्था का प्रकरण है तो अकार, उकार और मकार का सम्बन्ध ईश्वर से किस प्रकार है? इसका उत्तर यह है कि उन तीनों अवस्थाओं का मूल ईश्वर ही है। आदि (जागरित)= वह जीव शरीर में व्याप्त होने से कामनाओं को प्राप्त होता है और इस प्रकार वेद जानता है। उभय (स्वप्न)= वह परमात्मा से सम्बन्ध करता है जिससे बाह्य ज्ञान अल्प होता है और सुख की वृद्धि होती है। अपिति (सुषुप्ति)= बाहर का सम्बन्ध टूटने के बाद बाह्य ज्ञान बन्द हो गया (जीवात्मा के अस्तित्व की अनुभूति हो गयी) जिससे वह दुःखों से छूट गया और सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म में लीन हो गया।

ओंकारोत्पत्ति एवं सिद्धि (भ्रान्ति-निवारण)
ओ३म् परमात्मा का मुख्य नाम है, वेदादि सत्य शास्त्र ऐसा कथन करते हैं। 'ओ३म्' शब्द की सिद्धि शब्द-तत्त्वदित् पाणिनि ने 'अव' धातु से माना है। उन्होंने धातुपाठ में "अव" धातु के रक्षादि १९ अर्थ बताए हैं। उणादिकोष के सूत्र "अवतेष्टिलोपश्च (१/१४१)" के अनुसार अव धातु से 'मन्' प्रत्यय और प्रत्यय के 'टि' का लोप हो जाता है तब "अव+म्" ऐसी स्थिति होती है। तब ["ज्वरत्वरस्त्रिव्यविभवामुपधायाश्च" -शब्दानु० ६/४/२०] "अव" की जगह ऊठ् आदेश होकर 'उ+म्' स्थिति होती है और गुण होकर "ओ३म्" बनता है। गोपथब्राह्मण के प्रपाठक १ की २६वीं कण्डिका में "आप्लृ" धातु से "ओ३म्" शब्द की सिद्धि की है। यहां भिन्न-भिन्न धातुओं से 'ओ३म्' शब्द की सिद्धि में सन्देह नहीं करना चाहिए कि आचार्यों में परस्पर-विरोध है। देखिए, पाणिनि ने यह कहीं नहीं कहा है कि केवल 'अव' धातु से ही ओंकार की सिद्धि होती है। उनके व्याकरण के अनुसार अव, आप् आदि सब धातु से ओ३म् सिद्ध हो सकता है [द्रष्टव्य- अष्टाध्यायी ६/३/१०९]।
जैसे श्वास के बिना मनुष्य एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता, वैसे ही ओंकार की उपासना के बिना मनुष्य जीवित रहते हुए भी मृतक के समान है। यदि परमात्मा वेदज्ञान् का प्रकाश नहीं करता तो यह अल्पज्ञ जीव दुःख के बन्धन से कभी न छूट सकता। इसलिए परमात्मा ने वेदज्ञान का प्रकाश किया एवं इसमें 'ओ३म्' नाम को उपासनीय बताकर जीवात्मा के कैवल्यप्राप्ति का द्वार खोला है। यजुर्वेद (४०/१५) में आया है- "ओ३म् क्रतो स्मर" अर्थात् हे कर्मशील जीव! मरण समय में उसी ओ३म् का स्मरण कर। ऋग्वेद (१/१६४/३९) में कहा है- "ईश्वर की ओर चले बिना कोई व्यक्ति मृत्यु के पार नहीं होता।" माण्डूक्योपनिषद् की पहली श्रुति ही में "परमेश्वर का प्रधान और निज नाम 'ओ३म्' को कहा है, अन्य सबको गौणिक नाम बताया है।" छान्दोग्योपनिषद् (१/४/१) ने यहां तक कह दिया है कि "(ओ३म्) जिसका नाम है और जो कभी नष्ट नहीं होता, उसी की उपासना करनी योग्य है, अन्य की नहीं।" कठोपनिषद् का ऋषि कहता है- "सब वेद सब धर्मानुष्ठानरूप तपश्चरण जिसका कथन और मान्य करते और जिसकी प्राप्ति की इच्छा करके ब्रह्मचर्याश्रम करते हैं, उसका नाम 'ओ३म्' है (वल्ली २, मन्त्र१५)।" आगे कहा है- "इसका रूप (आँखों से) देखने के लिए नहीं है, न कोई आँखों से इसको देख सकता है। यह हृदय से, बुद्धि से, मन से प्रकाशित होता है। जो जानते हैं, वे अमृत हो जाते हैं (कठ० ६/९)।"

ओ३म् की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ऐतरेयब्राह्मण ५वीं पञ्चिका के ३२वें खण्ड में आता है-
"प्रजापतिरकामयत प्रजायेय भूयान् स्यामिति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा इमान् लोकान् असृजत पृथिवीम् अन्तरिक्षम् दिवम्। तान् लोकान् अभ्यतपत्। तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रीणि ज्योतींषि अजायन्त। अग्निरेव पृथिव्या अजायत। वायुरन्तरिक्षात्। आदित्यो दिव:। तानि ज्योतींषि अभ्यतपत्। तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्त। ऋग्वेद एव अग्नेरजायत। यजुर्वेदो वायो:। सामवेद आदित्यात्। तान् वेदान् अभ्यतपत्। तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रीणि शुक्राण्यजायन्त। भू: इत्येव ऋग्वेदादजायत। भुव इति यजुर्वेदात्। स्व: इति सामवेदात्। तानि शुक्राण्यभ्यतपत्। तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयो वर्णा अजायन्त। अकार: उकार: मकार: इति। तान् एकधा समभरत्। तत् ओम् इति।"

अर्थ- प्रजापति परमात्मा ने इच्छा की कि मैं प्रजा के द्वारा विस्तार को प्राप्त हो जाऊं। उसने ईक्षण किया। उसने ईक्षण करके इन लोकों को उत्पन्न किया- पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक को। उन लोकों का ईक्षण किया। ईक्षण किये गए उन लोकों से तीन ज्योति:स्वरूप ज्ञानी हुए। पृथिवी से अग्नि ही हुआ। वायु अन्तरिक्ष से। आदित्य द्यु लोक से। उन ज्योति:स्वरूपों का ईक्षण किया। उन ईक्षण किये हुए ज्योति:स्वरूपों से तीन वेद उत्पन्न हुए। अग्नि ऋषि से ऋग्वेद ही उत्पन्न हुआ। यजुर्वेद वायु ऋषि से। सामवेद आदित्य ऋषि से। उन वेदों का ईक्षण किया। उन ईक्षण किये हुए वेदों से तीन शक्तिशाली शब्द निकले। भू: यह ही ऋग्वेद से निकला। भुवः यह यजुर्वेद से। स्व: यह सामवेद से। उन शक्तिशाली शब्दों का ईक्षण किया। उन ईक्षण किये हुए शब्दों से तीन वर्ण निकले, अ उ म्। उन तीनों को एक प्रकार से एकत्र इकट्ठा किया। वह ओ३म् बन गया।

इस कण्डिका का सार यह है कि परमात्मा ने अपनी ईक्षण शक्ति से तीन लोकों को उत्पन्न किया। फिर उस लोक से उत्पन्न हुए ऋषियों को वेदों का प्रकाश किया। (त्रयोवेदा:) यहां तीन वेद से तात्पर्य त्रयी विद्या का जानना चाहिए। (त्रय:+वर्णा:) इन वेदों से ईश्वर के सर्वगुणों के वर्णन करनेवाले तीन शब्द उत्पन्न हुए। वर्ण शब्द विशेषणगर्भित पद है। इसका अर्थ अक्षर नहीं है किन्तु ब्रह्म का हम लोग जिस पद से वर्णन कर सकते हैं उसे वर्ण कहते हैं। (अकार:) अकार (उकार:) उकार (मकार:) मकार ये तीन पद हैं। उन तीनों पदों के मिलने पर 'ओ३म्' पद बना।

महाराज मनु कहते हैं-
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापति:।
वेदत्रयान् निरदुहत् भूर्भुवः स्वरितीति च।। -मनु० २/७६
अर्थ- प्रजापति ने अकार, उकार और मकार को ऋक् यजु साम इन्हीं वेदों से तथा भू: भुवः स्व: ये महाव्याहृतियों दुहीं - सार भूत निकाली।

ईक्षण शक्ति पर विचार
परमात्मा के ईक्षण शक्ति का वर्णन ऋग्वेद १०/१९०/१, वेदान्तदर्शन १/१/५, ऐतरेयोपनिषद् १/१, छान्दोग्योपनिषद् ६/२/३ इत्यादि स्थलों पर भी आया है। इस सम्बन्ध में महर्षि दयानन्दजी सत्यार्थप्रकाश के सातवें समुल्लास में प्रश्नोत्तर-रूप में बताते हैं-
(प्रश्न) ईश्वर में इच्छा है वा नहीं।
(उत्तर) वैसी इच्छा नहीं। क्योंकि इच्छा भी अप्राप्त, उत्तम और जिस की प्राप्ति से सुख विशेष होवे तो ईश्वर में इच्छा हो सके। न उससे कोई अप्राप्त पदार्थ, न कोई उससे उत्तम और पूर्ण सुखयुक्त होने से सुख की अभिलाषा भी नहीं है। इसलिये ईश्वर में इच्छा का तो सम्भव नहीं, किन्तु ईक्षण अर्थात् सब प्रकार की विद्या का दर्शन और सब सृष्टि का करना कहाता है वह ईक्षण है।

ब्रह्म चेतन सत्ता है। क्रिया करना चेतन सत्ता का स्वाभाविक गुण है। यदि वह क्रिया न करे तो इससे उसकी चेतनता पर प्रश्नचिह्न लगता है। क्योंकि परमात्मा चेतन होने के कारण क्रिया करता है इसलिए उसने अपनी ईक्षण शक्ति से लोकों को उत्पन्न किया और वेदों की उत्पत्ति की। वेदज्ञान के माध्यम से लोकों के पदार्थों को लोगों ने जाना, इसी को कहा है कि मैं (ब्रह्म) प्रजा के द्वारा विस्तार को प्राप्त हो जाऊं। ईश्वर की यह अद्भुत ईक्षण शक्ति से ही सब सृष्टि की उत्पत्ति होती है और वह वेदज्ञान का प्रकाश करता है। इससे ब्रह्म की चेतनता सिद्ध है।

अतः ओंकार के अर्थ पर स्वामी दयानन्दजी का गूढ़ चिन्तन वैदिक विचारधारा एकेश्वरवाद का पोषण करता है। मनुष्य जाति में फैले ईश्वर विषयक भ्रांतिपूर्ण विचारों जैसे अनेकेश्वरवाद आदि पर महर्षि ने सप्रमाण प्रहार किया और लोगों को ईश्वर के सत्य स्वरूप से परिचित कराया। ईश्वर विषयक स्वामीजी की निर्भ्रान्त धारण थी। स्वामीजी ने वेदादि सत्य शास्त्रों के पढ़ने का अधिकार सबको दिया एवं अपने तप और पुरुषार्थ के बल पर वेद को स्वतःप्रमाण (ईश्वरीय ज्ञान) सिद्ध कर मनुष्य जाति में फैले अन्धविश्वास को खुली चुनौती दी। वेदों के उद्धार में स्वामी दयानन्दजी महाराज का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा।

[Source- Navrang Times : Voice Of Arya Pratinidhi Sabha America, May-June 2020 issue & आर्ष क्रान्ति : आर्य लेखक परिषद् का मुख पत्र का जून २०२० का अंक]

Friday, July 10, 2020

ब्राह्मणों द्वारा सिक्खों के लिए दिए गए बलिदान



ब्राह्मणों द्वारा सिक्खों के लिए दिए गए बलिदान :-
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आमतौर पर सिख समाज के लोग और उनमें भी अलगाववादी खालिस्तानी जट्ट सिक्ख ब्राह्मणों के प्रति अति निंदनीय घृणास्पद शब्दों का प्रयोग करते हैं । एक गंगू नाम के ब्राह्मण की एक भूल को लेकर पूरे ब्राह्मण समाज को दोषी, कायर एवं ग़द्दार करार दे देते है, लेकिन इन पाकिस्तान परस्त लोगों को ये नहीं पता कि इनके गुरुओं की सेनाओं में सबसे ज़्यादा सैनिक ब्राह्मण समाज से ही होते है । सिख गुरुओं के लिए शहादत देने वाले ब्रह्मणो की एक सूचि बनाई गई है जिसमें सिक्ख गुरुओं के लिये अपना बलिदान देने वाले ब्राह्मण वीरों का उल्लेख है :-
1. पंडित प्रागा दास जी -
पिता का नाम एवं जन्मस्थान - इनके पिता जी का नाम पंडित माई दास जी था , इनका जन्म करीयाला झेलम में हुआ था जोकि वर्तमान पाकिस्तान में है ।
भूमिका - पंडित प्रागा जी एक छिबर ब्राह्मण थे । ये पाँचवे गुरु श्री अर्जुन देव जी के मुख्य सहयोगी रहे । इन्होंने छटे गुरु को युद्ध कला सीखाने का श्रेय प्राप्त है । 1621 में अब्दुलाखान के साथ हो रहे युद्ध में इनको वीरगति प्राप्त हुई ।
2. पंडित पेड़ा जी -
पिता का नाम एवं जन्मस्थान - इनके पिता जी का नाम पंडित माई दास जी था , इनका जन्म करीयाला झेलम में हुआ था जोकि वर्तमान पाकिस्तान में है । ये पंडित प्रागा दास जी के छोटे भाई थे ।
भूमिका - पंडित पेड़ा दास जी भी गुरु अर्जुन देव जी के मुख्य सहयोगी थे और ये गुरु हरगोविंद सिंह जी की सेना के मुख्यसेनापति थे । इन्होंने सभी लड़ाईयों में हिस्सा लिया और अंत में अमृतसर की लड़ाई में शहीद हुए ।
3. पंडित मुकुंदा राम जी -
जन्मस्थान - कराची , वर्तमान पाकिस्तान
भूमिका - पंडित मुकुंदा राम जी गुरु अर्जुन देव जी के मुख्य सेवक थे और बाद में उनकी सेना के मुख्य सेनापति के तौर पर भी नियुक्त हुए । पंडित मुकुंदा राम जी चार वेदों के ज्ञाता एवं युद्ध कला में निपुण थे । इनको भी युद्ध में शहीद होना का श्रेय प्राप्त है ।
4. पंडित जट्टू दास जी -
जन्मस्थान - लाहौर, पाकिस्तान
भूमिका - पंडित जट्टू दास जी एक तिवारी ब्राह्मण थे पंडित जट्टू राम जी गुरु हरगोविंद सिंह जी की सेना में सेनानी थे और बाद में इन्होंने सेना का कार्य भार भी संभाला । 1630 में मुहम्मद खान के साथ इन्होंने बड़ी लड़ाई लड़ी और मुहम्मद खान का वध करने का श्रेय इन्हें ही प्राप्त है । मुहमद खान के साथ लड़ाई में इनको बहुत शारीरिक नुक़सान पहुँचा और युद्ध क्षेत्र में ही वीर गति को प्राप्त हो गये ।
5 .पंडित सिंघा पुरोहित जी -
भूमिका - पंडित सिंघा पुरोहित जी गुरु अर्जुन देव जी के मुख्य सेवक थे जो छटवें गुरु की सेना में सिपाही भी रहे । श्री सिंघा जी अमृतसर के नज़दीक लड़ाई में शहीद हुए
6. पण्डित मालिक जी पुरोहित
पिता का नाम - पंडित सिंघा जी पुरोहित
भूमिका - पण्डित मलिक जी पंडित सिंघा जी के सुपुत्र थे ( पढ़े नम्बर 5 ) मुखलसखान के विरुद्ध इन्होंने धुआँधार लड़ाई लड़ी और अंत में विजयी भी हुई । पंडित मलिक जी गुरु हरगोविंद का दाहिना हाथ माना जाता है । इनको भंगाणी के युद्ध में शहादत प्राप्त हुई।
7. पंडित लाल चंद जी -
जन्मस्थान - कुरुक्षेत्र, हरियाणा
पंडित लाल जी एक महान विद्वान एवं योद्धा थे । श्री लाल चंद जी चमकौर की लड़ाई में शहीद हुए थे ।
8. पंडित किरपा राम जी
पिता का नाम - पंडित अड़ू राम जी
भूमिका - पंडित कृपा राम जी गुरु तेग़ बहादूर जी के प्रमुख सहयोगी थे ,इन्होंने ही गोबिंद राय जी को सारी शस्त्र विद्या सिखाई थी । कहा जाता है कि इनके जैसा वीर योद्धा पंजाब के इतिहास में नहीं हुआ । इनको चमकौर की लड़ाई में शहादत मिली । ये समकालीन सेना के सेनापति भी थे ।
9. पंडित सनमुखी जी
पिता का नाम - पंडित अड़ू राम जी
सनमुखी जी पंडित कृपा जी के भाई थे , और ये इनको दसवे गुरु द्वारा खालसा फ़ौज का सेनापति भी मनोनीत किया गया था , पंडित सनमुखी जी चमकौर की लड़ाई में शहीद हुए थे ।
10. पंडित चोपड़ राय जी -
पिता का नाम एवं जन्मस्थान - श्री पेड़ा राम जी , जेहलम
भूमिका - श्री चोपड़ राय जी एक बहुभाषी विद्वान थे । इन्होंने रहतनामें एवं अन्य आध्यात्मिक कृतियों की रचना की । श्री चोपड राय जी ने खालसा फ़ौज का नेतृत्व किया और ये भंगाणी के युद्ध में शहीद हुए ।
11. पण्डित मथुरा जी
पिता का नाम एवं जन्मस्थान - श्री भीखा राम जी , लाड़वा हरियाणा
श्री मथुरा राम जी एक महान विद्वान एवं योद्धा थे । श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में इनके चौदह अंक दर्ज है । इन्होंने मात्र अपने ४०० साथियों की सहायता से बैरम खान के साथ युद्ध किया एवं जीत भी हासिल की । इन्होंने बैरम खान को मौत की नींद सुला दिया था । श्री मथुरा जी 1634 में अमृतसर की लड़ाई में शहीद हुए ।
12. पण्डित किरत जी
जन्मस्थान एवं पिता का नाम - श्री भिखा राम जी , लाड़वा हरियाणा
पण्डित किरत जी एक महान विद्वान एवं योद्धा थे , इनके द्वारा रचित आठ अंक गुरु ग्रंथ साहिब में अंकित है । श्री किरत जी गुरु अमरदास के सहयोगी थे और 1634 ईसवी में गोविंदगढ़ की जंग में शहीद हुए ।
13. पण्डित बालू जी
पिता का नाम एवं जन्मस्थान - श्री मूलचंद जी , कश्मीर
पण्डित बालू जी भाई दयाल दास के पोते थे , पण्डित परागा दास के नेतृत्व में लड़ी गयी सिख इतिहास की पहली लड़ाई में शहीद हुए
14. पण्डित सती दास जी
15. पण्डित मति दास जी
( 14 & 15 के विषय में कुछ भी लिखना मेरे लिए सूरज को दीपक दिखाने के समान होगा ।
ये मुख्य मुख्य उन ब्राह्मणों की सूचि है जिन्होंने सिक्ख आंदोलन में भाग लिया और मुसलमान बादशाहों का जो सपना भारत को इस्लामी देश खुरासान बनाना था उसके विरुद्ध सिक्ख सेनाओं को मजबूत किया ।
source-
The Sikh Reference Book By Harajindara Siṅgha Dilagīra
History of Sikh by Hari ram Gupta.

Wednesday, June 24, 2020

मुलहिद और मुस्लिम नवजागरण



मुलहिद और मुस्लिम नवजागरण

शंकर सरन

यूरोप में पूर्व-कैथोलिक संज्ञा जानी-मानी है। यानी ऐसे लोग जो पहले क्रिश्चियन थे, पर अब उस में विश्वास नहीं रखते। वे अब स्वतंत्र बुद्धिवादी या नास्तिक हैं। तो क्या दुनिया के डेढ़ अरब मुस्लिमों में ऐसे लोग नहीं, जो इस्लाम में विश्वास छोड़ चुके? जो इस्लाम से अधिक अपने विवेक को और इस्लामी निर्देशों से ऊपर मानवीय नैतिकता को मानते हों? उत्तर है कि मुस्लिमों में भी ऐसे लोग शुरू से हैं, खुद प्रोफेट मुहम्मद के समय से। इतने कि उन पर मुहम्मद ने कई बार कहा है। उन के लिए दो नाम भी हैं, ‘मुनाफिक’, और ‘मुलहिद’। मुनाफिक, जो ऊपर से इस्लाम पर विश्वास जताते हैं पर दरअसल उन्हें विश्वास नहीं है। मुलहिद, जो खुल कर इस्लाम पर विश्वास छोड़ चुके हैं।

यहाँ दो बातें नोट करने की हैं। पहली, मुहम्मद ने ऐसे लोगों को खत्म कर डालने का हुक्म दिया था। इसीलिए शरीयत में इस्लाम छोड़ने की सजा मौत है। दूसरी, जैसे ही मुहम्मद की मृत्यु हुई, अनेक अरब कबीलों ने इस्लाम छोड़ने की घोषणा कर दी। इस्लाम छोड़ने वालों में मुहम्मद की आखिरी बीवी कुतैला बिन्त कैस भी थी! प्रथम खलीफा अबू बकर को साल भर तक अरब में युद्ध लड़ना पड़ा, ताकि इस्लाम छोड़ने की गति रोकी जा सके।

इस प्रकार, शुरू से ही इस्लाम मुसलमानों के लिए कैदखाने जैसा मतवाद बना और वैसा ही रहा है। जिस में जाने का रास्ता है, निकलने का बंद है। वह भी मार डालने की धमकी से। कहना चाहिए कि इस के सिवा इस्लाम को बनाए रखने का कोई उपाय नहीं है! इस में ऐसा कुछ नहीं जो मानवीय विवेक को स्वीकार हो सके। तब भी इस्लाम चौदह सौ वर्षों से क्यों बना हुआ है – यह एक अलग विषय है। जिस पर अलग से विचार करना चाहिए।

फिलहाल प्रसंग यह कि मार डालने के ‘कानून’ के बावजूद हालिया दशकों में मुलहिदों की संख्या बढ़ रही है। कनाडा के मौलवी बिलाल फिलिप्स के अनुसार उन की बाढ़, बल्कि ‘सुनामी’ आ सकती है। यह चिन्ता निराधार नहीं। एक आकलन के अनुसार अभी केवल पाकिस्तान में 28 हजार मुलहिद हैं। ईरान में और बाहर रहने वाले ईरानी मूल के मुस्लिमों में यह संख्या बहुत बड़ी है। अमेरिका में प्यू रिसर्च सेंटर ने एक सर्वे में पाया कि मुस्लिम परिवारों के लगभग एक चौथाई युवा अपने को इस्लाम से नहीं जोड़ते।

इस में आगे वृद्धि होना पक्की बात है। इस का सबसे बड़ा श्रेय इंटरनेट और उस पर उपलब्ध तमाम जानकारियों, पुस्तकों, विचार-विमर्श को है जिन्हें प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। यद्यपि सऊदी अऱब, ईरान, पाकिस्तान, मलेशिया, आदि कई देशों में स्वतंत्र नजरिए से लिखने-बोलने वाले मुस्लिमों के लिए जेल और मौत की सजा है। पर इस से बात बनने वाली नहीं। इस्लाम के सिद्धांत और वास्तविक इतिहास अब विश्लेषण, परख से बचाकर नहीं रखे जा सकते। इस्लामी मत मानने वाले मुसलमानों की निंदा बिलकुल नहीं होनी चाहिए। लेकिन उस मत, विचार को यह सुविधा नहीं है।

पिछले दशकों में इब्न वराक, अनवर शेख, अली सिना, जैसे कुछ ही जाने-माने मुलहिद थे। अब उन की संख्या लगातार बढ़ रही है। आज अमेरिका में अय्यान हिरसी अली, वफा सुलतान, मरवी सरमद, कनाडा में ताहिर असलम गोरा, अली अमजद रिजवी, इंग्लैंड में रिजवान इदेमीर, तथा पाकिस्तानी मूल के गालिब कमाल, और हैरिस सुलतान को पढ़ने, सुनने वाले असंख्य हैं। ईरानी मूल के रिजवान इदेमीर के कार्यक्रम ‘एपोस्टेट प्रोफेट’ के नियमित दर्शकों की संख्या 2 लाख से अधिक है। उन के कुछ वीडियो लाखों लोगों ने देखे हैं।

अनेक मुलहिदों के नियमित कार्यक्रम यू-ट्यूब पर आते हैं। उन में ‘स्पार्टाकस एक्स-मुस्लिम’, गालिब कमाल, और हैरिस सुलतान के हजारों नियमित दर्शक हैं। इन में अधिकांश मुसलमान ही होंगे। जो अब तक इस्लाम के प्रति आलोचनात्मक विचारों को सुनने से बचा कर रखे गए थे। उन के प्रश्न दबाए या झूठी बातों से ठंढे किये जाते थे। अब इंटरनेट के कारण वे बैठे-बैठे सारा सच-झूठ परख सकते हैं।

दूसरे, विविधता के आदर में वैचारिक विविधता का आदर भी है। इसलिए मुसलमानों में भी नास्तिकों, स्वतंत्र विचार के लोगों, और इस्लाम की आलोचना करने वालों का भी स्थान होना चाहिए। तभी मुसलमानों की उन्नति होगी। उन का समाज सहज, स्वस्थ, विकासशील बनेगा। जैसे मध्य युग में यूरोप में चर्च क्रश्चियनिटी की जकड़ से निकलने के बाद यूरोप की उन्नति हुई।

इसी प्रक्रिया का एक दस्तावेज पाकिस्तानी मूल के ऑस्टेलियाई लेखक हैरिस सुलतान की चर्चित पुस्तक ‘द कर्स ऑफ गॉड:  ह्वाय आई लेफ्ट इस्लाम’  (Xlibris.com.au, ऑस्टेलिया, 2018) है। इस की भूमिका में अली अमजद रिजवी ने लिखा है कि जैसे छापाखाने के आविष्कार ने बाइबिल के आलोचनात्मक विमर्श का रास्ता खोला, उसी तरह इंटरनेट ने कुरान को सबके समझने के लिए खोल दिया है। सन् 1980 के दशक तक स्थिति यह थी कि सभी पाकिस्तानी मुस्लिम घरों में कुरान रखा रहता था, पर किसी को मालूम न था कि उस में क्या है। अधिकांश कुछ उड़ती-उड़ती बातें ही जानते थे। उतना ही जितना मौलवी बताते थे। फिर, अरबी कुरान का अनुवाद भी गोल-मोल रहता था, ताकि कुछ बातें दबी रहें। जिसे जानकर किसी भले आदमी को धक्का लग सकता था। खासकर गैर-अरब देशों में, जहाँ मुसलमानों में अपने देशों की पंरपरा के कई मानवीय मूल्य प्रतिष्ठित थे।

रिजवी ध्यान दिलाते हैं कि जब यूरोप के मध्य युग में क्रिश्चियनिटी को चुनौती दी गई, तो उसे ‘नवजागरण’ का युग कहा गया। उस का लाभ नए चिंतन, और आविष्कारों के रूप में यूरोप और सारी दुनिया को मिला। अब वही चीज मुस्लिम समाज में हो सकने को कोई और नाम देना अनुचित है। हैरिस सुलतान ने इस्लामी सिद्धांतों की आलोचना नास्तिकवादी नजरिए से की है। वे सभी रिलीजनों को मनुष्य के विकास में बाधा मानते हैं। उन में वैज्ञानिकों वाली प्रश्नाकुलता है, जिस से वे बचपन से ही इस्लामी विश्वासों पर भी प्रश्न पूछते थे। जैसे, हर चीज को अल्लाह ने बनाया, तो अल्लाह को किस ने बनाया? इस के उत्तरों से उन्हें संतुष्टि नहीं होती थी। ज्यादा पूछने पर माँ उन्हें चुप रहने कहतीं, नहीं तो ‘कोई तुम्हें मार डालेगा।’

बड़े होने पर हैरिस ने इस्लामी किताबों को खुद पढ़ा तो एक अनोखी चीज पाई। अच्छे-अच्छे पाकिस्तानी अपने काम और जीवन-मूल्यों में अनेक बिन्दुओं पर वस्तुतः इस्लाम-विरोधी हैं। लेकिन अपने को विश्वासी मुसलमान समझते हैं। उन में नेता, व्यापारी, खिलाड़ी, कलाकार, किसान, आदि हर तरह के लोग हैं। वे ऐसे कई विचारों के हामी हैं, जो शरीयत विरुद्ध है। पर उन्हें पता नहीं कि वे विचार शरीयत यानी इस्लाम के विरुद्ध हैं।

हैरिस की दलील है कि ऐसे बीच-बीच के मुसलमानों को या तो इस्लाम से मुक्त होना चाहिए, या फिर तालिबान, इस्लामी स्टेट की तरह पक्का मुसलमान बनना चाहिए। अभी वे दोहरा जीवन जी रहे हैं। विश्वास में वे मुसलमान है, परन्तु रुचि में मानवतावादी हैं (इसी को तबलीगी, देवबंदी, वहाबी, आदि जमातें ‘काफिर’ प्रभाव कहकर उन्हें पक्का मुसलमान बनाने में लगी रही हैं)। हैरिस के अनुसार यदि कोई अल्लाह है, तो वह इस से तो खुश नहीं होगा कि आप उस की कुछ बात मानें और बाकी बातें छोड़ दें। इसलिए मुसलमानों को अंततः विवेक और इस्लाम के बीच चुनाव करना होगा। 

इस्लाम में स्वतंत्र चिंतन की मांग

हैरिस सुलतान की पुस्तक ‘द कर्स ऑफ गॉड:  ह्वाय आई लेफ्ट इस्लाम’  में वैज्ञानिक तर्कों से इस्लामी विचारों और परंपराओं की समालोचना है। उन की पड़ताल के बिन्दु हैं – 1. क्या अल्लाह के होने का कोई सबूत है?  2. क्या इस्लाम में बताई गई नैतिकता अच्छी है?  3. क्या इस्लाम में दी गई जानकारियाँ सही हैं ?

उन्होंने पाया कि अल्लाह की तमाम बातों से तो बच्चे जैसी वह मानसिकता मालूम होती है, जो मामूली बात पर भी रूठने, चिल्लाने, धमकी देने लगता हो: ‘मेरी पूजा करो, वरना मार डालूँगा’! उस में अपना अस्तित्व दिखा सकने की भी क्षमता या बुद्धि नहीं है। अल्लाह छिपा हुआ है, मगर शिकायत करता है कि हम उसे नहीं मानते। फिर इस गॉड, यहोवा या अल्लाह ने अपने संदेशवाहक (प्रॉफेट) को एक नामालूम से अरब क्षेत्र में ही क्यों भेजे? बड़े-बड़े इलाकों अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, चीन, आदि में रहने वाले करोड़ों लोगों को संदेश देना क्यों नहीं सूझा? इन महाद्वीपों ने तो सदियों तक मुहम्मद का नाम भी नहीं सुना। तब उन करोडों निर्दोष लोगों को अल्लाह ने अपने संदेश से वंचित, और इस प्रकार, इस्लाम न मानने से जहन्नुम का भागी क्यों बनाया? अतः या तो इस्लाम न मानने में कोई बुराई नहीं, न कोई जहन्नुम है, या फिर अल्लाह को ही दुनिया का पता नहीं है!

फिर, कुरान स्पष्ट नहीं है। सुन्नी और शिया अपना-अपना मतलब निकालते हैं। दोनों सही नहीं हो सकते। यह शुरू से चल रहा है। यानी कुरान आसानी से गलत समझी जा सकती है। यह कोई बढ़िया किताब होने का सबूत नहीं। इसे कमजोर तरीके से लिखा गया, या इस की बातें ही कमजोर हैं। तथ्यगत जानकारियों की दृष्टि से भी कुरान में कोई ऐसा ज्ञान नहीं जिससे वैज्ञानिक, चिंतक, आविष्कारक जैसे लोग बन सकें। एक ओर दावा है कि उस में सारी साइंटिफिक बातें हैं, दूसरी ओर सदियों से दुनिया में कभी कोई मुस्लिम साइंटिस्ट नहीं बना। जो इक्के-दुक्के हुए भी, वे काफिर देशों में, काफिरों की संस्थाओं में पढ़कर, काफिर साइंटिस्टों की सोहबत में ही हुए। यह दिखाता है कि इस्लामी किताबें दुनिया के बारे में भी सही जानकारियों से खाली हैं।

यह तथ्य उस दावे को भी काटता है कि सारी दुनिया, धन-संपत्ति, बढ़िया चीजें, अल्लाह ने मुसलमानों के लिए बनाई हैं। वास्तव में यह सब काफिरों को ही सदिय़ों से, इस्लाम से पहले से और आज भी हासिल हैं। अल्लाह के अनुसार चलते हुए मुसलमानों ने अपने बूते कभी कुछ नहीं बनाया, न आज बना पाते हैं। जबकि बिना अल्लाह की परवाह किए, स्वतंत्र चिंतन और वैज्ञानिक शोध से हर तरह के काफिरों ने सैकड़ों आविष्कार किए, नई तकनीकें और बेहतरीन चीजें बनाईं। इस्लाम से पहले भी और आज भी। काफिर सारी दुनिया में हर क्षेत्र में उपलब्धियाँ हासिल करते रहे हैं। मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर सके?

उलटे ठीक अरब, जहाँ अल्लाह के संदेश और संदेशवाहक मुहम्मद आए, जहाँ अरब को शत-प्रतिशत इस्लामी बनाकर वहाँ से यहूदियों, क्रिश्चियनों और पगानों (अनेक देवी-देवताओं को मानने वाले) को मार भगाया या खत्म किया गया – वही अरब सब से पिछड़े और कमजोर बने रहे! वह भी सदियों से लगातार। इस का संबंध इस्लामी विचार-व्यवहार से है, वरना दक्षिण कोरिया एक मामूली पिछड़े गाँव जैसी चीज से पचास वर्ष में विश्व का एक तकनीकी सुपरपावर बन गया! अब मुसलमान भी इसे समझने लगे हैं कि इस्लाम वैज्ञानिक, तकनीकी, आर्थिक, और सांस्कृतिक पिछड़ेपन का एक कारक है।

सो, कई कारणों से मुसलमानों में मुलहिद बढ़ रही है। एक आकलन से पाकिस्तान में 40 लाख, तुर्की में 48 लाख, मलेशिया में 18 लाख, और सऊदी अरब में 16 लाख लोग नास्तिक हैं। वे स्वतंत्र चिंतन की आजादी की माँग कर रहे हैं। यह सरासर अनुचित है कि कोई इस्लाम न माने, तो उसे मार डालें। यह इस्लाम की कुंठा, टैबू भी दिखाता है। वह सवालों को प्रतिबंधित रखना चाहता है। खुला विचार-विमर्श ही इस अटपटेपन का इलाज है।

हैरिस एक महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान दिलाते हैं। कई बर्बर प्रथाओं का मजाक उड़ाते रहने से ही अंततः उसे छोड़ा गया। सऊदी अरब में स्त्रियों को जो अधिकार मिल रहे हैं, वह दुनिया हँसी उड़ने से ही संभव हुआ कि स्त्री कार क्यों नहीं चला सकती? दफ्तरों में काम क्यों नहीं कर सकती? अकेले बाजार क्यों नहीं जा सकती? इसलिए व्यर्थ इस्लामी विचारों की आलोचना करना, उन का मजाक बनाना अच्छा है। इस से मुस्लिम शासकों पर मानवीयता का दबाव पड़ता है। इस्लाम के ‘सम्मान’ के नाम पर चुप्पी, या आलोचकों को दंडित करना, मुसलमानों की हानि ही करना है जो अनुचित बंधनों में जकड़े रखे गए हैं।  अपनी पुस्तक के औचित्य में हैरिस पूछते हैं कि मुसलमानों को क्या अधिकार है कि वे तो दूसरों को उपदेश देंगे, पर दूसरे उन्हें उपदेश नहीं दे सकते? यदि मुसलमान समझते हैं कि वे सही हैं, और दूसरे गलत, तो इस की जाँच-पड़ताल चलनी चाहिए। तब हो सकता है कि उलटा ही निष्कर्ष मिले।

हैरिस की पुस्तक का बड़ा हिस्सा कुरान में तथ्य जैसी बातों का वैज्ञानिक विश्लेषण है। अन्य हिस्से में सामाजिक, बौद्धिक दावों और इतिहास की समीक्षा है। जैसे, इस्लामी विद्वानों का यह कहना गलत है कि इस्लामी विचार बदले नहीं जा सकते क्योंकि वे ‘अल्लाह के शब्द’ हैं। लेकिन वही विद्वान इस्लामी किताबों में दी गई गुलामी, सेक्स-गुलामी, पत्नी को मारने-पीटने वाले निर्देश, आदि की आज भिन्न व्याख्या करने की कोशिश करते हैं। यह 150 साल पहले नहीं होता था। उन बातों को जस का तस रखा, बताया, समझाया जाता था। लेकिन अब उस से इंकार करते हुए घुमावदार बातें होती हैं। यहाँ तक कहा जाता जाता है कि प्रोफेट मुहम्मद ने ही गुलामी खत्म की! यह न केवल गलत है, बल्कि सौ साल पहले तक किसी इस्लामी व्य़ाख्या में नहीं कहा जाता था। यह एक उदाहरण भर है।

वस्तुतः कुरान और सुन्ना के अनेक कायदे कई मुस्लिम देशों में छोड़े जा चुके। पाकिस्तान या तुर्की के जीवन में संगीत और कला की आम स्वीकृति इस्लाम-विरुद्ध है। पर बदस्तूर चल रही है। यह साबित करता है कि इस्लामी विचार बदले जा रहे हैं, चाहे वे अल्लाह के निर्देश हों या न हों। इस्लाम में एक मात्र ईनाम या उपलब्धि है – मरने पर जन्नत जाना। अल्लाह या प्रोफेट ने यही कहा है। इस के अलावा इस दुनिया में काफिरों को हराकर उन का माल, और उन की स्त्रियों, बच्चों को गुलाम बना कर बेचने से मिला गनीमा। बस। लेकिन उस जन्नत के अस्तित्व का, या वह केवल मुसलमानों के लिए रिजर्व होने का सबूत क्या है? शून्य। तब इस्लाम के लिए सारी लड़ाई, छल-प्रपंच, आदि करते रहना कौन सी बुद्धिमानी है!

हैरिस मुसलमानों को कहते हैं कि उस काल्पनिक जन्नत के लिए इस्लाम द्वारा हराम ठहराई गई सभी चीजों: संगीत, कला, किसी से दोस्ती चाहे वह कोई भी धर्म माने या नास्तिक हो, मिल-जुल कर रहने, आदि से वंचित रहना बेतुकी बात है! अपने पिता और भाई को भी ठुकराएं, यदि वह इस्लाम न मानें (कुरान, 9-23)। इस तरह, आप दुनिया की आधी आबादी को सताने की ठाने रहें, ताकि आप को जन्नत मिले, बड़ी बेढ़ब सीख है। महान लेखक अनातोले फ्रांस को उद्धृत करते हैरिस कहते हैं, ‘‘यदि 5 करोड़ लोग भी कोई मूर्खतापूर्ण बात कह रहे हों, तब भी वह बात मूर्खतापूर्ण ही रहेगी।’’

प्रोफेट मुहम्मद की जीवनी अनुकरणीय नहीं

इस्लामी सीखों में बेढ़ब बातें अपवाद नहीं हैं। उन्हें सारी मानवजाति और ‘सदा के लिए’ एक मात्र ‘अनुकरणीय’ बताया जाता है! स्त्रियों के प्रति व्यवहार लें। कुरान के अनुसार स्त्रियों पुरुषों की मनमानी भोग्या, सेविका भर हैं, क्योंकि पुरुष ‘उन का खर्चा उठाता’ है। इसलिए लगे कि स्त्री सही व्यवहार नहीं कर रही, तो पुरुष उसे पीट सकता है (कुरान, 4-34)। हदीसों में मुहम्मद ने कहा है कि स्त्री को पीटने के लिए पुरुष से कारण नहीं पूछा जा सकता। फिर, स्त्रियों को बुर्का पहनना इसलिए जरूरी है, कि ‘उन्हें पहचान कर सताया न जाएगा।’ (कुरान, 33-59)। मानो बाकी को सताना ठीक हो!

स्त्री-संबंधी इस्लामी निर्देश बड़े हीन और वस्तुवाचक हैं। वह पुरुष के जूते, फर्नीचर, जैसी है जिसे इच्छानुसार रखा जा सकता है। जहाँ पसंद आ जाए उसे लाया, फेंका, बाँटा, भोगा जा सकता हैं। यह अल्लाह का कहना है! (कुरान 33-37, 4-24)। अपनी बीवी को इसलिए भी तलाक दे सकते हैं क्योंकि बाप को पसंद आ गई। ताकि बाप उससे शादी कर सके। बीवियों के साथ-साथ गुलामों, कब्जा की गई दूसरों की स्त्रियों को भी भोगने की मंजूरी है। यह सब ‘सदा के लिए अल्लाह के नियम’ कहना आज इस्लामी विद्वानों को भी संकोच में डलाता है। इसलिए वे इन की गोल-मोल व्याख्या करते हैं।

यह सब कायदे प्रोफेट मुहम्मद के अनुकरण पर आधारित हैं। कुरान में अधिकांश प्रसंग मुहम्मद के जीवन से जुड़े हैं। उन की जीवनी जानने वाले उसे अधिक समझ सकते हैं। पहली बीवी खदीजा के देहांत के बाद मुहम्मद ने जीवन के अगले 13 वर्षों में 23 स्त्रियों के साथ शादी की या भोग किया। सभी का सिलसिलेवार वर्णन हैरिस ने अपनी पुस्तक ‘द कर्स ऑफ गॉड:  ह्वाय आई लेफ्ट इस्लाम’  में किया है (पृ. 86-101)। कुछ संबंध ऐसे भी थे, जिन्हें सही ठहराने हेतु मुहम्मद को इलहाम हुआ, यानी अल्लाह ने आयत भेजी। ऐसी ही एक आयत (कुरान, 33-51) पर मुहम्मद की सब से पसंदीदा बीवी आएशा ने मानो तंज करते कहा कि ‘‘लगता है अल्लाह आपकी इच्छाओं, कामनाओं को पूरा करने के लिए अधीर रहता है।’’ (सहीह बुखारी, 6-60-311)। मुसलमानों में गोद न लेने की परंपरा भी मुहम्मद के एक प्रसंग से जुड़ी है। नतीजन मुस्लिम विश्व में लाखों बच्चे सदैव यतीम के यतीम बने रहते हैं। उन्हें कोई गोद नहीं ले सकता, क्योंकि इस्लाम में इस की मनाही है!

इस प्रकार, स्त्रियों, बच्चों, और परिवार का इस्लाम में बहुत नीचा स्थान है। इस के लिए दी गई दलीलें मुहम्मद के समय भी सबको ठीक नहीं लगती थी। गुलाम स्त्रियों, और कब्जा की गई काफिरों की स्त्रियों से किसी मुसलमान का संभोग करना जायज कहा गया। इस की मंजूरी हदीस में है, पर उस से पैदा होने वाले अवैध बच्चे पर कुछ नहीं मिलता, कि उन का क्या होना है? स्पष्टतः उन बलात्कारों से उत्पन्न अनिच्छित, बेपहचान बच्चों की कोई फिक्र अल्लाह या प्रोफेट को नहीं थी। स्त्रियों, बच्चों के प्रति ऐसा दृष्टिकोण कैसा धर्म है – यह पूछना क्या मनुष्य का अधिकार नहीं?

दूसरी ओर, कुरान की उस दलील को परख सकते हैं कि स्त्रियाँ न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि वे हजारों पुरुषों को नौकरी दे सकती हैं। अतः कुरान की बातें ‘सदा के लिए’ सही नहीं हैं। (इस्लाम से पहले भी स्वतंत्र कारोबार चलाने वाली स्त्रियाँ अरब में थीं। खुद मुहम्मद ऐसी ही एक स्त्री खदीजा के कर्मचारी थे, जिस ने बाद में उन से विवाह कर लिया। खदीजा का प्रभाव ही था कि प्रोफेट बन जाने के बाद भी खदीजा के जीवित रहते अगले 25 वर्षों तक मुहम्मद दूसरी बीवी नहीं लाए। जबकि उन के गुजरते ही कुछ ही वर्षों में अनेकानेक बीवियाँ आ गईं।)

इसी तरह, बुर्के का तर्क भी विचित्र है। किसी लोभी की नजर न पड़े, इसलिए मुसलमान स्त्रियाँ बुर्का पहनें कुछ ऐसा ही है मानो अपनी कार हमेशा ढँके रखें ताकि चोर न देखे। या धन नहीं कमाएं, ताकि लुटेरे छीन न लें। पर ऐसी ही विचित्र, और डराने वाली दलीलें ही इस्लाम में भरी हैं। अनेक निर्देशों के साथ केवल डर और धमकी का तर्क है।

गैर-मुसलमानों यानी काफिरों के लिए इस्लामी सिद्धांत-व्यवहार सबसे क्रूर हैं। उन के ‘गले में रस्सी’ व ‘जंजीर’ बाँधने, ‘खौलते पानी और आग में डालने’ की बातें हैं। (कुरान, 40-70, 71, 72)। सिर्फ इसलिए कि वे अन्य धर्म मानते हैं। यह ‘सदा के लिए अल्लाह का नियम’ तो दूर, उस समय भी अनुचित था, जब इसे अरबों पर लादा गया। असंख्य आयतें काफिरों पर हिंसा से भरी हुई हैं (कुरान, 22-19,20, 22)। हैरिस के अनुसार, ‘जहन्नुम की आग’ वाली धमकी और वर्णन लगभग 500 आयतों में हैं। लगभग 36 आयतों में काफिरों से लड़कर उन्हें मुसलमान बनाने के आवाहन हैं। (पृ. 74)

यह सब किसी सर्वशक्तिमान अल्लाह के नाम पर बैसिर-पैर की बातें लगती हैं। उपमा देते हुए हैरिस लिखते हैं कि यह ऐसा ही है कि कोई आदमी जाकर चींटियों की बाँबी में इसलिए आग लगा दे क्योंकि उस के पहुँचने पर चींटियों ने बाहर निकल कर उस की जयकार नहीं की। इस्लामी निर्देशों को अनुपयुक्त ठहराने वाले हैरिस के तर्क विश्वासी मुसलमानों के लिए भी विचारणीय हैं। (पृ. 79-81)।

प्रोफेट मुहम्मद को मानवता के लिए सर्वश्रेष्ठ अनुकरणीय व्यक्ति मानने को हैरिस ने अज्ञान से जोड़ा है। पाकिस्तान (भारत भी) में मुस्लिम बच्चों को मुहम्मद की उदारता के बारे में झूठी कहानियाँ सुनाई जाती हैं। जब हैरिस ने उन कहानियों की खोज की तो उलटा पाया, जिसे जानकर उन्हें बड़ा धक्का लगा। (पृ. 82-85)। दयालुता के बदले भयंकर क्रूरता, जिस में दूध-पीते बच्चे की माँ असमा बिन्त मरवान को सोते हुए में मार डालना भी था। बेचारी का कसूर सिर्फ यह था कि उस ने मुहम्मद की आलोचना में एक कविता लिखी थी! ऐसे सभी कवि, आलोचक चुन-चुन कर मुहम्मद के हुक्म से मार डाले गए। तब मृतकों के परिवार वाले मुसलमान बन गए। यह शुरु से ही आतंक द्वारा इस्लाम फैलाने का सबूत है।

ऐसे कई विवरण देकर हैरिस कहते हैं कि अनेक आधुनिक मुसलमान अज्ञान के कारण इस्लाम को ‘शान्ति का मजहब’ कहते हैं। वे इतिहास नहीं जानते। हैरिस ने अपने परिवार के लोगों, दोस्तों, आदि ने असमा बिन्त मरवान जैसे लोगों का नाम लेकर पूछा कि क्या वे उन के बारे में जानते हैं? सब ने इंकार किया। लेकिन मुहम्मद की दयालुता वाली वह झूठी कहानी सब जानते थे! हैरिस के अनुसार, ‘‘मुसलमानों को नियोजित रूप से झूठी बातें सिखाई जाती हैं। जब तक वे सचाई जानने में समर्थ होते हैं तब तक उन की दिलचस्पी खत्म हो चुकती है।’’(पृ. 86)

प्रोफेट मुहम्मद की जीवनी पढ़कर सामान्य मुसलमान को भी कहने में दो बार सोचना पड़ेगा कि वे पूरी मानवता के, सदैव अनुकरणीय, त्रुटिहीन मॉडल थे। आज के पैमाने से तो उन्हें अच्छा कहना भी मुश्किल है। सैन्य जीत, राज्य विस्तार, नरसंहार, बाद में भी मुहम्मदी अनुयाइयों द्वारा काफिरों पर हमले कर-करके बड़ी संख्या में उन की सभ्यता, संस्कृति, चर्च, मंदिर, पुस्तकालय, विश्वविद्यालय, आदि का नाश करके उन्हें मार डालना या जबरन मुसलमान बनाना, आदि सदियों के इतिहास में कुछ भी अनुकरणीय नहीं है। वैसी सीखें ठुकराने का हक मुसलमानों को होना चाहिए। यही हैरिस की माँग है।

कुरान और हैरिस के कई प्रश्न

हैरिस की रुचि वैज्ञानिक विश्लेषण में है। इसीलिए ‘द कर्स ऑफ गॉड:  ह्वाय आई लेफ्ट इस्लाम’  में इस पर केंद्रित अध्याय काफी मौलिक है। मुसलमानों को बताया गया है कि कुरान दुनिया की सर्वश्रेष्ठ किताब है, जिस में अल्लाह के शब्द हैं। इसलिए उस में न कोई गलती है, न उस में कुछ बदला या छोड़ा जा सकता है। इस दावे के मद्देनजर यदि कुरान में एक भी आयत में गलती या छोड़ने लायक चीज मिले – तो पूरा दावा गलत साबित होगा। इस परीक्षण में हैरिस कई प्रश्न उठाते हैं।

एक, दुनिया में अनेक अनूठी पुस्तकें कुरान से पहले और बाद भी लिखी गई। उन पुस्तकों में गुलामी, भिन्न विचार वालों को मारना, स्त्रियों पर जबरदस्ती, मनमानी हिंसा, अपशब्द, डरना-डराना, आदि कुछ नहीं है। इस के बदले ऐसी सुंदर दार्शनिक बातें हैं जो हजारों वर्ष बाद भी आज ऊँची समझ और आनन्द देती है। वह तनिक भी पुरानी नहीं लगती और उस में कुछ भी छोड़ने लायक नहीं मिलता। वे बातें बिल्कुल साफ हैं जिन्हें समझने में किसी पुनर्व्याख्या की जरूरत नहीं पड़ती। तो कौन सी पुस्तक श्रेष्ठ है?

दूसरे, यदि अल्लाह सर्वशक्तिमान है तो उस ने अपना संदेश देने के लिए एक छोटा, नामालूम सा अरब क्षेत्र और मनुष्य के माध्यम से मौखिक बोल-बोल कर व्यक्तियों को संदेश दिलवाने की पद्धति क्यों चुनी? आज कोई वीडियो बनाता है, जो एक दिन में दुनिया भर में लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। सो पहले तो अल्लाह ने अमेरिका, चीन, भारत, जैसे विशाल समाजों को छोड़ कर एक अत्यंत छोटे से अरब समूह को क्यों चुना। फिर, क्या उस के पास कोई तकनीक नहीं थी जो आज मामूली इंसानों के पास है, कि एक ही बार में संदेश सारी दुनिया में और सीधे पहुँच जाए? यदि अल्लाह भी मनुष्य की तकनीकी सीमा से बाधित और निर्भर है, तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है।

तीसरे, जिहाद वाली आयतों पर दोहरे-तिहरे अर्थ क्यों निकाले जाते हैं?  जैसे, ‘‘अल्लाह की राह में युद्ध करो, और जान लो कि अल्लाह सुनने वाला और जानने वाला है।’’ (कुरान, 2-244)। इस्लामी स्टेट वाले मौलाना इस का अर्थ काफिरों पर चढ़ाई करना, और कोई अन्य मौलाना अपनी रक्षा करना बताते हैं। अपनी-अपनी पसंद, या समय स्थान देख कर इस का अर्थ बदला जाता है। क्या अल्लाह टॉल्सटॉय या आइंस्टीन की तरह ऐसे वाक्य नहीं बोल सकता जिस के अर्थ पर कोई शक-शुबहा न हो?

चौथे, पृथ्वी और ग्रहों के निर्माण, सूरज के डूबने की जगह, धरती का आकार, मनुष्य के जन्म की प्रक्रिया, आदि संबंधी तथ्यगत गड़बड़ियाँ भी मिलती हैं। इस पर मौलाना और विश्वासी मुसलमान आज की दृष्टि से उस की सफाई देते हैं। यह तो अल्लाह के बदले, मनुष्य का विचार उस में डालने जैसा है।

पाँचवें, जिन आयतों को बाद में ‘शैतानी’ कह कर मुहम्मद ने खारिज किया था  (कुरान, 53-20,21 के बीच में वे आयतें थीं), वह मुहम्मद से गलती होने का खुला सबूत है। एक गलती प्रमाण है कि उस के अलावा भी गलतियाँ रही हो सकती हैं। फिर, बाद में मंसूख, निरस्त की गईं आयतें, एक ही विषय पर ‘उस से अच्छी’ आयतें, और अल्लाह की टिप्पणी (कुरान, 2-106), आदि खुद मानती हैं कि पहले वाली आयतें उतनी अच्छी नहीं थीं। तभी तो बाद वाली आयतों के ‘और अच्छे’ होने की दलील दी गई। जानकारों के अनुसार, कुरान में कुल 564 आयतें मंसूख की गई बताई जाती हैं (पृ. 170)। अतः अल्लाह का संदेश भेजना और / अथवा मुहम्मद का सुनना, कहना त्रुटिहीन नहीं था। तब कुरान और मुहम्मद को त्रुटिहीन कैसे कहा जा सकता है?

इन सब के मददेनजर भी अल्लाह के होने, और उस की सर्वशक्तिमानता पर संदेह होता है। हैरिस के हिसाब से अल्लाह सीधे मनुष्यों से संवाद नहीं कर सकता, सो अपना प्रोफेट भेजता है। वह प्रोफेट सदैव जिन्दा नहीं रहेगा, सो वह एक किताब छोड़ जाता है। वह किताब बार-बार विकृत या उस की नई-नई व्याख्या होती है। अतः अल्लाह के संदेश के कई अर्थ बन जाते हैं। विविध ईमाम, मौलाना अपनी-अपनी व्याख्या को ‘अल्लाह का असली संदेश’ कहते हैं। यह देखते हुए तो आज मनुष्यों ने बेहतर काम कर दिखाया जिन के बनाए सॉफ्टवेयर हू-ब-हू संदेश रिकॉर्ड करते हैं जो शायद ही विकृत होते हैं।

फिर, प्रोफेट मुहम्मद के क्रिया-कलापों के भंडार में अनेक बातों की लीपा-पोती की जाती है। इतिहास में किसी मनुष्य के बारे में इतनी जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हैं, जितनी मुहम्मद के बारे में। वे कैसे सोते थे, किस पैर में जूता पहले डालते थे, कैसे इत्र लगाते थे, किस चीज पर क्या राय रखते थे, आदि आदि। मुहम्मद के कार्यों में बहुतेरी ऐसी हैं जिन्हें उस समय भी सब ने उचित नहीं माना था। आज भी उन बातों को नजरअंदाज करने या औचित्य दिखाने के लिए तरह-तरह की बौद्धिक कलाबाजी होती है। जैसे, किसी के साथ समझौता मनमर्जी तोड़ देना; अपनी राह जा रहे काफिले को लूट लेना;  निःशस्त्र असहाय लोगों का सामूहिक कत्ल करना; किसी को क्रूर यातना देकर मारना; धोखे से किसी को खत्म करवाना; हराए गए लोगों की बीवियों के साथ उन के सामने ही बलात्कार को नजरअंदाज करना; ऐसे बलात्कारों से उत्पन्न अवैध सन्तानों के भवितव्य पर कुछ न कहना; काबा के शान्ति-क्षेत्र होने के पुराने पारंपरिक नियम का उल्लंघन करना; स्त्रियों पर पुरुषों के मनमाने वर्चस्व का कायदा बनाना; आदि। ये सब प्रोफेट मुहम्मद की जीवनी और सब से प्रमाणिक हदीसों में दर्ज हैं। कई बातें अनेक बार दुहराई मिलती हैं। इन में कितनी बातों से मानवता के लिए सदा-सर्वदा अनुकरणीय सर्वश्रेष्ठ पुरुष की छवि पुष्ट होती है?

पुस्तक का एक अत्यंत प्रासंगिक अध्याय ‘इस्लामोफोबिया’ पर है (पृ. 184-94)। यह शब्द आज पूरे लोकतांत्रिक विश्व में मंत्र-सा रटा जाता है, लेकिन पूर्णतः गलत है। ‘फोबिया’ ऐसे भय को कहते हैं जो किसी भ्रम से होता हो। जैसे, किसी को पानी से या अंधेरे से डर लगे। लेकिन इस्लाम से भय तो वास्तविक है! दुनिया के कोने-कोने में जिहादी कुरान का नाम ले-लेकर धोखे से हमला कर सैकड़ों, हजारों की जान लेते रहते हैं। किसी जाँच में अपवाद नहीं मिला कि इस्लामी विश्वास और कुरान केवल बहाना था, असली मकसद कुछ और था। बड़े-बड़े जिहादी नेताओं ने खुद चिट्ठी या दस्तावेज प्रकाशित करके केवल इस्लामी विश्वासों की बात की है। फिर, असंख्य इस्लामी संस्थाएं, संगठन दुनिया से काफिरों को मिटा कर खालिस इस्लामी राज बनाने की घोषणा करते हैं। यही शिक्षा अपने हजारों मदरसों में देते हैं। तालिबान और इस्लामी स्टेट ने आज भी पुरानी सांस्कृतिक धरोहरों को वैसे ही नष्ट किया, जैसे सदियों पहले गजनवियों, खिलजियों, मुगलों ने किया था। स्त्रियाँ उसी तरह वस्तु की तरह उठाई, रौंदी जातीं हैं, जो इस्लामी इतिहास में शुरू से मिलता है।

तब इस्लाम से भय को ‘फोबिया’ कैसे कहा जा सकता है? यह तो मानवता के लिए सचमुच डर का विषय है। कई मुस्लिम देशों में भी मुस्लिम ब्रदरहुड, अल कायदा, तबलीगी जमात, जैसे इस्लामी संगठन प्रतिबंधित हैं। किसी भी स्त्री को इस्लाम से डर लगेगा! मारने-पीटने के निर्देश और स्त्रियों के प्रति व्यवहार के विवरण मूल इस्लामी किताबों में हैं। उसे इस्लामी शासक या मौलाना आज भी लागू करते हैं। अतः किसी स्त्री को इस्लाम से डर न लगना ही अस्वभाविक बात होगी। बशर्ते, वह इस्लामी सिद्धांत और इतिहास जानती हो। इसी प्रकार, इस्लाम छोड़ने वाले मुलहिदों, और मुनाफिकों को भी डर लगेगा। क्योंकि इस्लाम उन्हें मार डालने का हुक्म देता है। काफिरों को तो डरना ही है क्योंकि इस्लाम का उद्देश्य ही उन्हें खत्म करना है। इसलिए, ‘इस्लामोफोबिया’ एक गलत दलील है, जिस की आड़ में इस्लाम पर विचार-विमर्श को बाधित किया जाता है।

असलियत के लिए मूल इस्लामी किताबे पढ़े

'इस्लामोफोबिया’ एक झूठा शब्द है, जिसे अनजान लोगों को बरगलाने के लिए गढ़ा गया। अनजान लोगों में असंख्य भले मुसलमान भी हैं जिन्हें झूठी बातों से गैर-मुसलमानों के विरुद्ध भड़काया जाता है। भारत-पाकिस्तान इस के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहाँ पिछले सौ साल से हिन्दुओं का भयावह संहार होता रहा है। पिछले 75 सालों में लगभग आधा भारतवर्ष हिन्दुओं से खाली कराया जा चुका। बचे भारत में भी निरंतर जिहाद चल रहा है। फिर भी, दोनों देशों में मुसलमानों को विविध प्रकार की झूठी बातों से हिन्दुओं के विरुद्ध शिकायतों से भरा जाता है। इस में सबसे बड़ा कारण वह अज्ञान है, जिस में आम मुसलमान डूबे हुए हैं।

इस का एक उदाहरण हैरिस की पुस्तक ‘द कर्स ऑफ गॉड:  ह्वाय आई लेफ्ट इस्लाम’ में है। (पृ. 187-88)। कुछ पहले प्यू रिसर्च सेंटर ने पाकिस्तानियों के सर्वे में पाया कि 84%  मुसलमान शरीयत के पक्ष में हैं। लेकिन जो पार्टियाँ शरीयत सचमुच लागू करना चाहती हैं, उन्हें 5 या 7 % से अधिक वोट नहीं मिलते। क्योंकि आम मुसलमानों ने शरीयत का अपना खयाली अर्थ बनाया हुआ है। जब पक्की इस्लामी पार्टियाँ उन्हें शरीयत बताती हैं, तो उन्हें ‘कट्टरपंथी’ कहकर अधिकांश पाकिस्तानी दूर रहते हैं। सर्वे में मात्र 9 %  पाकिस्तानी लोग इस्लामी स्टेट के समर्थक मिले, जो सचमुच इस्लाम को हू-ब-हू लागू कर रहा था। वह भी उसे अपने शब्दों में ‘प्रोफेट मेथडोलॉजी’ से। यानी जैसा प्रोफेट मुहम्मद ने किया था। लेकिन 28 %  पाकिस्तानी इस्लामी स्टेट के विरुद्ध थे, और 62 %  पाकिस्तानी इस से अनभिज्ञ थे कि इस्लामी स्टेट सचमुच इस्लामी है या नहीं। इसी प्रकार, 72 % पाकिस्तानी तालिबान के विरोधी मिले। जबकि तालिबान प्रोफेट मुहम्मद के पक्के इस्लाम की तुलना में नरम ही है। यही स्थिति इंडोनेशिया में मिली जहाँ 72 %  लोग शरीयत के पक्षधऱ हैं, मगर केवल 4 % ने इस्लामी स्टेट का समर्थन किया था।

यह विडंबना समझने की है। यदि आप इस्लाम के पक्के समर्थक हैं तो आपको इस्लामी स्टेट जैसी सरकार ही चुननी होगी। लेकिन आम मुसलमान, विशेषकर गैर-अरब देशों के मुसलमान पूरी तरह इस्लाम को नहीं जानते। मौलाना वर्ग उन्हें कटा-छँटा इस्लामी सिद्धांत, और झूठा इतिहास वर्तमान बताकर अपने बस में रखता है। झूठी बातों से उन में शिकायत, नाराजगी और लड़ाकूपन बनाए रखता है। यह सब इस्लामी राजनीति बढ़ाने की रेडीमेड पूँजी-सी इस्तेमाल होती है।

दूसरी ओर, इस्लाम से पूर्णतः अनजान गैर-मुस्लिम लोग उन शिकायतों, नाराजगी के दबाव और सहानुभूतिवश उन्हें सुविधाएं देते जाते हैं। इस तरह, अंततः अपने ही खात्मे का इंतजाम करते हैं। यह उन सभी लोकतांत्रिक देशों में देखा गया है, जहाँ मुस्लिम जनसंख्या एक खास सीमा पार कर गई। वहाँ राष्ट्रीय कानूनों को धता बताकर शरीयत लागू की जाती है। हिंसा, शिकायत और छल की तीन तकनीक से निरंतर इस्लामी दबदबा बढ़ाया जाता है। पश्चिमी देशों में कानून तोड़ने और हर तरह के अपराधों में मुसलमानों का अनुपात बेतरह ऊँचा है। विशेषकर घृणित अपराधों में। इस की प्रतिक्रिया स्वरूप लोगों में ‘मुस्लिमफोबिया’ बना है, जो अधिक सही शब्द है।

‘इस्लामोफोबिया’ के बदले ‘मुस्लिमफोबिया’ इसलिए सही शब्द है, क्योंकि सभी मुसलमान जिहादी या संपूर्ण शरीयत के समर्थक नहीं हैं। हैरिस ने चार प्रकार के मुसलमान पाए हैं: जिहादी, इस्लामी, बेपरवाह, और सेक्यूलर। इन में सबसे बड़ी संख्या बेपरवाहों की है, जो इस्लाम के समर्थक हैं मगर इस की बुरी बातों से लगभग अनजान हैं। सेक्यूलर मुसलमान बहुत कम हैं जो इस्लाम की सचाई जानते हैं और उसे पसंद नहीं करते।

इसलिए, हैरिस का सुझाव है कि बेपरवाह मुसलमानों को इस्लामी की सचाई पूरी तरह जाननी चाहिए, और पक्के इस्लामियों से बहस करनी चाहिए। तभी दुनिया में मिल-जुल कर रहने का माहौल बन सकेगा। ऐसे बहस-विमर्श की एक रूप-रेखा भी उन्होंने दी है (पृ. 195-207)। इस्लामियों की दलीलें लोगों के अज्ञान का फायदा उठाते हुए दी जाती हैं। ताकि संदेहों को किसी तरह खत्म कर उन्हें इस्लामियों का मुखर/मौन समर्थक बनाए रखें। उन से निपटने का उपाय यह है कि मूल इस्लामी किताबों को खुद पढ़ें। वे ज्यादा नहीं हैं। एक हाथ में सारी आ जाएंगी। उन की परख अपने विवेक और वास्तविक घटनाओं से करें। मुल्लों और मुस्लिम नेताओं पर निर्भर न रहें।

वैज्ञानिक विकास के युग में सही सिद्धांत वही है जिसे कसौटी पर कस सकें। ताकि यदि कुछ गलत हो तो दिख जाए। बिना कसौटी के महज ‘फेथ’ वाली बातों पर सच का सर्टिफिकेट नहीं लग सकता। इस्लाम के धार्मिक रिवाजों, जैसे नमाज, रोजा, हज, आदि पर किसी कसौटी की जरूरत नहीं। लेकिन राजनीतिक इस्लाम – यानी काफिरों या स्त्रियों के प्रति व्यवहार, जिहाद, शरीयत, कानून, भौतिक तथ्य और इतिहास – इन सब को कसौटी पर परखना होगा। क्योंकि इस्लाम का दावा उन के ‘स्थाई सच’ होने का है।

लेकिन सच (ट्रुथ) और विश्वास (फेथ) दो अलग-अलग चीजें हैं। धर्म के मामले में फेथ चल सकता है, मगर राजनीति में नहीं। इस के घाल-मेल से ही खुद इस्लामी समाजों में सदैव हिंसा रही है। प्रोफेट मुहम्मद के समय से ही। इसी नाम पर मुसलमान दूसरे मुसलमान को मारते हैं। अधिकांश खलीफा, ईमाम और मुहम्मद के वंश के लोगों की हत्याएं हुईं, जो मुसलमानों ने ही की। वही आज भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, यमन, तुर्की, नाइजारिया, आदि अनेकानेक मुस्लिम देशों में हो रहा है। क्योंकि राजनीति और धर्म, दोनों में इस्लामी एकाधिकार का दावा है। जबकि इस्लामी राजनीति शुरू से ही छल-प्रपंच-हिंसा से बनी है। उस में कोई सच नहीं है। केवल मनमानी है।

इसलिए, यह दोष इस्लामी मतवाद में है, जिसे ‘कर्स ऑफ गॉड’  या ‘अल्लाह का अभिशाप’ नाम देना गलत नहीं। पिछली 14 सदियों की इस्लामी हिंसा गलत प्रस्थापनाओं पर आधारित है। उस से मुसलमानों को मुक्त होना होगा। चूँकि इस्लाम का बड़ा हिस्सा (कम से कम 86 %) राजनीति ही है, इसलिए व्यवहारतः यह इस्लाम से ही मुक्त होने की बात हो जाती है। इस प्रकार, हैरिस सुलतान एक मुलहिद बनते हैं। उन के अनुसार, अभी मुलहिदों की छोटी संख्या से मायूसी नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तान के 19 करोड़ मुसलमानों में केवल 40 लाख सेक्यूलर, नास्तिक, आदि हैं। किन्तु संख्या बढ़ रही है। दूसरे, सच्ची बातों की अपनी ताकत है, जिस के सामने बम-बंदूकें कुछ नहीं कर सकतीं। इसीलिए एक इब्न वराक, एक सलमान रुशदी, तसलीमा नसरीन या वफा सुलतान से सारी दुनिया की मुस्लिम सत्ताएं परेशान हो जाती हैं। आखिर इन लेखकों ने कुछ शब्द ही तो लिखे हैं!

मगर ऐसे सच्चे शब्द, जिन की ताब तमाम मुस्लिम सरकारें और लाखों मदरसों पर शासन करने वाले हजारों आलिम-उलेमा नहीं झेल पाते। अर्थात् जैसे-जैसे सचाई अधिकाधिक मुसलमानों के सामने आएगी, वैसे-वैसे इस्लाम का प्रभाव सिकुड़ेगा। यह गणितीय सच, मैथेमेटिकल सर्टेनिटी, है। इस में काफिर नजरिए से एक बात और जोड़ सकते हैं। बिना किसी दावे, प्रचार या संस्थानों के दुनिया की असंख्य महान पुस्तकें – उपनिषद, महाभारत, रामायण, योगसूत्र, से लेकर बुद्ध, कन्फ्यूशियस, प्लेटो, शेक्सपीयर, टॉल्सटॉय, आइंस्टीन की बातें – दुनिया के लोगों पर स्वतः अपना प्रभाव रखती हैं। उन में अनेक पुस्तकें इस्लाम से सदियों पहले की हैं। उन्हें ‘मनवाने’ को लिए किसी जोर-जबर्दस्ती की जरूरत नहीं पड़ती! जबकि किसी सर्वशक्तिमान अल्लाह के स्थाई सच के रूप में कुरान, और मानवता के सर्वोच्च मॉडल के रूप में मुहम्मद को जबरन बनाए रखने के लिए अंतहीन हिंसा होती रही है। दूसरों पर भी और आपस में भी। एकदम शुरू से। कुरान और मुहम्मद की बातों को कभी छिपा कर, कभी झूठी बातें जोड़कर, तरह-तरह से बना-सँवार कर, नई-नई सफाइयाँ दी जाती हैं। क्या ऐसे मतवाद की असलियत हमेशा छिपी रह सकती है? 

साई बाबा की पूजा के लाभ




साई बाबा की पूजा के लाभ-
1- यदि आप मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी को अपना आदर्श मानोगे तो अपने भाई से संपत्ति के लिए नहीं लड़ोगे परंतु यदि आप साई बाबा को अपना आदर्श मानोगे तो 10 गज जमीन के लिए भी अपने भाई का कत्ल कर दोगे और आपको कोई शर्म नहीं आएगी। क्योकि रामायण आपको सदाचार सिखाती है परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
2- यदि आप रामायण पढ़ोगे तो आप भी हनुमान जी की तरह मुश्किल मे पड़े हुए सदाचारी व्यक्ति की मदद करोगे भले ही आपका उसमे कोई स्वार्थ न हो। परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
3- यदि आप गीता पढ़ोगे तो आपको कर्मयोगी होने की प्रेरणा मिलेगी परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
4- यदि आप उपनिषद पढ़ोगे तो आपको आत्मा व परमात्मा का ज्ञान मिलेगा परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
5- यदि आप चाणक्य को पढ़ोगे तो आपमे देशभक्ति व समाज के बारे मे समझ आएगी परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
6- यदि आप विदुर नीति पढ़ोगे तो आपको पता चलेगा कि सत्य कहने मे महात्मा विदुर जी ने एक राजा का भी लिहाज नहीं किया परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
7- यदि आप क्रांतिकारी संत कबीर जी को पढ़ोगे तो आप भी निर्भय होकर हिन्दू व मुसलमान सब के अंधविश्वास व पाप के विरुद्ध बोलोगे परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
8- यदि आप गुरु नानक देव जी के उपदेश पर चलेगे तो आप मे भी पाखंड के विरुद्ध लड़ने की सीख मिलेगी परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
9- यदि आप महान संत रविदास जी के आदर्शो को अपनाएगे तो आपको भी सीख मिलेगी कि मुस्लिम शासक के राज मे भी इस्लाम कि सच्चाई सबके सामने रखो परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
10- यदि आप गुरु गोविंद सिंह जी को आदर्श मानोगे तो धर्म पर सब कुछ बलिदान की प्रेरणा मिलेगी परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
11- यदि आप बेजोड़ धनुर्धारी श्री बंदा बैरागी जी से प्रेरणा लोगे तो आप कम साधनो से भी लक्ष्य प्राप्ति कि ओर बढ़ोगे क्योकि विशेष आदरणीय श्री बांदा बैरागी जी धनुष बाण से मुल्लोंके तोपचियों को मार कर युद्ध का परिणाम ही बदल देते थे परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।
दादू दुनिया बावरी कबरे पूजे उत।
जिनको कीड़े खा चुके उनसे मांगे पुत्त ।
इसलिए साई कब्र पूजा की मूर्खता छोड़िए ।
सनातन धर्म का पालन कीजिए। जय श्री राम

Saturday, June 20, 2020

भारत के महान् क्रान्तिकारी डॉ० गया प्रसाद कटियार


भारत के महान् क्रान्तिकारी डॉ० गया प्रसाद कटियार

(आज २० जून, क्रान्तिकारी डॉ० गया प्रसाद कटियार के जन्मदिवस पर प्रचारित)

डॉ० गया प्रसाद कटियार भारत के स्वतन्त्रता सेनानियों और क्रान्तिकारियों में एक विशेष भूमिका रखते हैं। आपका जन्म २० जून, सन् १९०० को उत्तरप्रदेश के कानपुर शहर में हुआ था। आप बचपन से ही कानपुर स्थित आर्यसमाज से जुड़े थे। सन् १९२१ के अहयोग आन्दोलन में भाग लेने के बाद आप हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (H.S.R.A) में सम्मिलित हुए। इस प्रकार आप भारत के महान् क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद और सरदार भगतसिंह आदि के सम्पर्क में आ गए। 
साण्डर्ष वध की योजना, सिक्ख भगतसिंह के केश व दाढ़ी काटने, H.S.R.A. के गुप्त केन्द्रीय कार्यालयों का संचालन करने सहित दिल्ली की पार्लियामेंट में फेंके गए बम निर्माण आदि क्रांतिकारी गतिविधियों में अपना सक्रिय रुप से योगदान देते हुए अन्ततः १५ मई १९२९ को सहारनपुर बम फैक्ट्री का संचालन करते हुए आपको गिरफ्तार कर लिया गया। और आपको देश के सुप्रसिद्ध लाहौर षड्यन्त्र केस में दिनांक ७ अकटूबर सन् १९३० को आजीवन कारावास की सजा हुई। लाहौर की जेल में आपने अन्य बन्दियों के साथ ६३ दिन की भूख हड़ताल की। बाद में आपको अण्डमान द्वीप की सेल्यूलर जेल [काला पानी] ले जाया गया। वहां भी आपने ४६ दिन भूख हड़ताल की। अन्तत: लगातार १७ वर्षों के लंबे जेल जीवन में कई अमानवीय यातनाओं को सहने के बाद वे २१ फरवरी १९४६ को आप बिना शर्त जेल से मुक्त किये गये। इसके अलावा आप शादीशुदा थे, घर पर पत्नी और बेटी भी थी, लेकिन ना तो आप झुके और ना ही मांफी मांगी। गुलाम भारत में आपकी जेल-यात्राओं १९२९-१९४६ अर्थात् १७ वर्ष तक का वर्णन इस प्रकार है-

• १५ मई १९२९ को सहारनपुर दवाखाना एवं पार्टी कार्यालय एवं बम फैक्ट्री से गिरफ्तार हुये थे।
• १५ मई से ३१ मई १९२९ ई० तक सहारनपुर कोतवाली (पुलिस रिमांड)।
• १ जून से १० जुलाई १९२९ तक लाहौर फोर्ट हवालात।
• १० जुलाई १९२९ से ७ अक्टूबर १९३० तक लाहौर बोर्सटल जेल में रहे। (यहीं पर लाहौर षडयन्त्र केस चला और आजीवन कालापानी की सजा मिली थी।)
• ७-१०-१९३० से नवम्बर १९३० तक लाहौर सेन्ट्रल जेल में रहे।
• १ दिसम्बर १९३० से ३१-१२-१९३० न्यू सेन्ट्रल जेल मुल्तान (अब पकिस्तान) में रहे।
• जनवरी १९३१ से अक्टूबर १९३२ तक बेलारी सेन्ट्रल जेल (कर्नाटक) में रहे।
• नवम्बर १९३२ से सितम्बर १९३७ तक सेल्यूलर जेल, अण्डमान निकोबार (काला पानी ) में रहे।
• सितम्बर १९३७ से नवम्बर १९३७ तक दमदम सेन्ट्रल जेल, कलकत्ता में रहे।
• दिसम्बर १९३७ लाहौर सेन्ट्रल जेल, में रहे।
• जनवरी १९३८, नैनी सेंट्रल जेल (इलाहबाद) में रहे।
• फरवरी १९३८ से जून १९४२ लखनऊ सेन्ट्रल जेल में रहे।
• जुलाई १९४२ से जनवरी १९४५ तक सुल्तानपुर जेल में रहे।
• जनवरी १९४५ से फरवरी १९४६ तक कानपुर सेन्ट्रल जेल में रहे।
• २१ फरवरी १९४६ को जेल से रिहा किये गये थे।

स्वतन्त्र भारत में जेल-यात्राओं का दौर-
१. सन् १९५८ में छह माह का जेल जीवन।
२. सन् १९६४ से १९६६ तक डेढ़ वर्ष का जेल जीवन।

यह आंकड़े डॉ० गया प्रसाद कटियार जी के सुपुत्र क्रान्ति कुमार कटियार ने एकत्र किए हैं। स्वतन्त्र भारत में भी डॉ० गया प्रसाद जी को शोषित-पीड़ित जनता के लिए संघर्षरत होने के कारण २ वर्षों तक जेल में रहना पड़ा था; अन्ततः १० फरवरी १९९३ को आपकी मृत्यु हो गई। स्वतन्त्र भारत में आपका योगदान सदा अविस्मरणीय रहेगा।

#ऐलान_ए_इंकलाब
#इंकलाब_जिंदाबाद

आर्यसमाज का सेवक 'श्री हाजी अल्ला रखीया रहीम तुल्ला'


आर्यसमाज का सेवक 'श्री हाजी अल्ला रखीया रहीम तुल्ला'

-प्रियांशु सेठ

आर्यसमाज ने विभिन्न सम्प्रदायों के अनुयायियों की शुद्धि कर उन्हें वैदिक धर्म में दीक्षित करके उनपर महान् उपकार किये हैं। ईश्वर के सत्य स्वरूप से परिचित कराकर उसको पाने का वेदोक्त मार्ग बतलाना आर्यसमाज का जन सामान्य पर सबसे बड़ा उपकार है। आर्यसमाज के वेदोक्त विचारों ने जहां अपना प्रभाव सत्यप्रेमी और निष्पक्ष जनों के हृदय में स्थापित किया, उन्हीं में इसके एक समर्थक और प्रशंसक श्री हाजी साहब थे।
हाजी साहब कच्छ के रहने वाले थे। पेशे से आप सोने का व्यापार किया करते थे। आप सर्वदा कहा करते थे कि संसार में धर्म वैदिक धर्म ही है। जब कोई आपसे कहता था कि आप शुद्ध क्यों नहीं होते तो आप उत्तर दिया करते थे कि मैं अशुद्ध नहीं हूं। आप आर्यसमाज के सत्संग में नियमपूर्वक जाया करते थे और आर्यसमाज के सिद्धान्तों से अभिज्ञ थे। आप सर्वदा विद्यार्थियों को पुस्तकें और छात्रवृत्ति दिया करते थे। निर्धनों को सहायता आपसे प्राप्त होती थी। आप आर्यसमाज में कई बार अपने पुत्रों को भी ले जाया करते थे। एक बार आपने एक स्नातक से कोई प्रश्न किया था, तो इसका उत्तर उसने गलत दिया। इसकी पुष्टि के लिए जब सत्यार्थप्रकाश मंगवाया और दिखाया तो आपका पक्ष सही सिद्ध हुआ और उस स्नातक ने अपनी गलती स्वीकार की। हाजी साहब ने कहा- आपने तप किया है, जंगल में रहे हैं, और गुरुओं के पास रहे हैं परन्तु आपने ऋषि दयानन्द लिखित वैदिक सिद्धान्तों का परिचय प्राप्त नहीं किया।

एक बार मुम्बई आर्यसमाज में तत्कालीन प्रधान श्री विजयशंकर जी ने साप्ताहिक सत्संग में कहा कि मन्दिर के पिछले भाग में मकान बनवाने में आर्यसमाज पर ऋण हो गया है। अब अन्य कार्यों के साथ-साथ आर्यसमाज को यह ऋण भी उतारना होगा। हाजी साहब ने उठकर पूछा कि आर्यसमाज पर ऋण कितना है? प्रधान जी ने कहा रु० ५००० है। हाजी साहब ने तुरन्त कहा कि मेरी दुकान से आकर ले लो। प्रधान जी के जाने पर उन्होंने शीघ्र ही उन्हें ५००० रु० का चैक दे दिया। उस मकान पर जो शिला लगाई गई थी जिस पर दानियों के नाम हैं, उसमें सबसे प्रथम हाजी जी का ही नाम है।

आपके नाम से प्रत्येक उनको वैदिक धर्मी समझने में संकोच करेगा लेकिन हाजी अल्लारखीया रहीमतुल्ला जी उतने ही वैदिक धर्मी थे जितना कि कोई वैदिक धर्मी हो सकता है।
-'सार्वदेशिक' १९४२ के अंक से साभार

Thursday, June 18, 2020

झांसी की अधीश्वरी वीरांगना लक्ष्मीबाई


झांसी की अधीश्वरी वीरांगना लक्ष्मीबाई

-प्रियांशु सेठ

स्वराज्य की रक्षा में अपना सर्वस्व निछावर कर देने वाली महारानी लक्ष्मीबाई के जीवन की स्मृतियों का स्मरण कर प्रत्येक देशप्रेमियों का मन पुलकित हो उठता है। उनकी जीवनी से हम इस बात की प्रेरणा ग्रहण करते हैं कि यदि स्वराज्य पर कभी आंच आये या उसका गौरव संकट में हो, तो हम अपना सर्वस्वार्पण करके उसकी रक्षा करें। महारानी लक्ष्मीबाई भारतीय इतिहास में उस वीरता और विश्वास की पहचान हैं, जिनका चरित्र पवित्रता और आत्मोत्सर्ग के पुण्यशील विचारों पर अवलम्बित हैं। उन्होंने निर्भयतापूर्वक राज्य का रथ चलाया और युद्ध क्रांति के क्षेत्र में उतरकर यह भी सिद्ध किया कि स्वराज्य के गौरव को बचाना केवल पुरुषों का ही नहीं अपितु स्त्रियों का भी कर्त्तव्य है। मृत्यु के समय उनकी अवस्था २२ वर्ष ७ महीने और २७ दिन की थी। यह अवस्था ऐसी है, जिसमें वह देश की आजादी, उसे स्वतन्त्र कराने और उसके लिए मर-मिटने की भावना से परे हटकर अपने सुख, ऐश्वर्य और मनोविनोद को प्रधानता देकर आराम से अपना जीवनयापन कर सकती थीं। लेकिन उस महान् साम्राज्ञी के सामने देश का वह मानचित्र और वे परिस्थितियां थीं, जिनमें भारतीयों को 'नेटिव' कहकर उनके साथ पशुत्वपूर्ण व्यवहार किया जाता था, उनकी धार्मिक भावनाओं को कुचला जाता था, उन्हें बौद्धिक तथा शारीरिक रूप में हीन व पंगु बनाकर निष्क्रिय और निस्तेज बना दिया जाता था।

वामपंथी इतिहाकारों के अभिमतानुसार सन् १८५७ की जनक्रांति अपने-अपने स्वार्थों की रक्षा का परिणाम था और कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों का तत्कालीन शासन के विरुद्ध षड्यन्त्र था। जबकि यदि ऐसा होता तो यह क्रान्ति देशव्यापी न होकर केवल कुछ क्षेत्रों एवं कुछ रियासतों तक ही सीमित रह जाती। लेकिन १८५७ की जनक्रांति में जनता अपनी शक्ति के बल पर मिटने को तैयार हुई और अपनी अखण्ड एकता तथा बल-पौरुष का परिचय अंग्रेजो को दिया। जहां जनता के लिए स्वाभिमान और स्वत्वों का प्रश्न था, वैसा ही उस समय के रजवाड़ों और पूर्व शासकों के सामने भी यही एक भाव था कि उनके साथ मानवीय व्यवहार किया जाए व शासक होने के नाते उनके अधिकारों के प्रति आंखें न मींच ली जाएं।

महारानी लक्ष्मीबाई युद्धशिक्षा में पारंगत, मन से दृढ़ और कर्म से तेजस्वी क्षत्रिया थीं। उनका जन्म काशी के अस्सीघाट मोहल्ले में २१ अक्टूबर, १८३५ को मोरोपंत तांबे के घर हुआ। आरम्भ से ही लक्ष्मीबाई को ऐसा वातावरण मिला, जिसने उन्हें स्वराज्य के प्रति निष्ठावान और उसकी स्वतन्त्रता के लिए निरत होने का लगन लगा दिया। अपने पति राजा गंगाधरराव के जीवनकाल में ही वह अपनी बुद्धिमत्ता और शासकीय क्षमता का परिचय देती रहती थीं। झांसी राज्य का शासनतन्त्र अंग्रेजों के इशारों पर चल रहा है, यह बात उन्हें जरा भी नहीं भाई। लेकिन उस समय शासनतन्त्र के सम्पर्क में न होने के कारण वह अपनी भावना को पी गईं। उसी समय लार्ड डलहौजी ने समस्त देशी रियासतों को अंग्रेजी शासन में मिलाने का एक षड्यन्त्र रचा। पुत्र गोद लेने की प्रचलित प्रथा को भी समाप्त कर दिया। उन्हीं दिनों राजा गंगाधर राव बीमार पड़े। उन्होंने झांसी के उस समय के अंग्रेजी प्रबंधक श्री एलिस को बुलाकर उनके सामने ही एक लड़का गोद लिया तथा श्री एलिस ने शपथबद्ध होकर कहा कि वह रानी और गोद लिए हुए बच्चे पर कभी अंग्रेजी हुकूमत की टेढ़ी दृष्टि नहीं पड़ने देंगे। लेकिन गंगाधर की मृत्यु के पश्चात् एलिस का यह वचन पानी के बुदबुदे की तरह समाप्त हो गया। एलिस ने रानी को दरबार में जाकर सरकारी फरमान सुनाया कि रानी का दत्तक पुत्र अस्वीकार किया गया और वह पांच हजार रुपये माहवार की पेंशन लेकर झांसी अंग्रेजों को सौंप दे। अंग्रेजों द्वारा यह अपमान और विश्वासघात महारानी के शरीर में विष की तरह बिंध गई। उन्होंने गरजकर कहा- "मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।"

महारानी की इस घोषणा में उस युग का प्रतिनिधित्व था, जिसमें अन्याय के जाल को बराबर अंग्रेजों द्वारा फैलाया जाता था और जिसके नीचे सर्व साधारण सिसक उठा था। बचपन के संस्कार ने रानी के मन में प्रेरणा दी और उन्होंने शासन की कमान को अपने हाथों में ले लिया। झांसी में जनता द्वारा अंग्रेजों का क़त्लेआम आरम्भ हो गया। हो सकता था कि यदि महारानी का जरा-सा भी संकेत जनता को मिल जाता तो अंग्रेज लोग मौत के घाट उतार दिए जाते। लेकिन महारानी का संघर्ष, उसका विद्रोह और उसका पराक्रम अन्याय के विरुद्ध था। शासन को अपने हाथ में लेने के बाद उन्होंने युद्ध की पूरी योजना तैयार की। उन्होंने दो बातों पर विशेष जोर दिया। एक तो यह कि सेना अनुशासित रहे, और दूसरा यह कि जनता को न्यायपूर्ण हक मिले। एक स्त्री के हाथ में राज्य की शासनसत्ता देखकर आसपास के रजवाड़ों ने एक मजाक-सा समझा। ओरछा के दीवान नत्थेखा ने ३० हजार का सैन्यबल लेकर झांसी पर हमला कर दिया, लेकिन रानी की तोपों ने उनका भुरकस निकाल दिया। दीवान साहब को जिन्दगी के लाले पड़ गए। अपना सारा गोलाबारूद छोड़कर उन्हें भागना पड़ा। राज्य में उस समय चोर-डाकुओं का भी बड़ा जोर था। महारानी ने साहस का परिचय देते हुए उन परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया। इस तरह एक निश्चिन्तता और सुरक्षा का भाव झांसी की जनता के मन में बना और वह महारानी के प्रति विश्वास और भावनामयी अवस्था के साथ देखने लगी।

अंग्रेजों ने इस जनक्रांति को गदर कहा और उसे मिटाने के लिए तत्पर हो गए। सर ह्यूरोज, भोपाल और हैदराबाद की मदद लेकर महारानी पर चढ़ दौड़ा। २३ मार्च १८५८ को सर ह्यूरोज ने झांसी पर आक्रमण किया। महारानी ने नीतिपूर्वक अन्न और फसल कटवा दिए थे जिससे कि विरोधियों को अन्न और छाया न मिल सके। लेकिन ग्वालियर से अंग्रेजी सेना को सहायता मिली और ३१ तारीख को झांसी की सैन्यशक्ति क्षीण पड़ने लगी। अपने ही लोगों ने उन्हें धोखा दिया। महारानी ने समझ लिया कि झांसी खाली करनी होगी। वह अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधकर कालपी की ओर भाग निकली। अंग्रेजों ने उसका पीछा किया। लेफ्टिनेंट बोकर रानी के बहुत पास तक पहुंच गया था। उसी समय रानी ने एक भरपूर हाथ तलवार का बोकर पर मारा और वह भूलुंठित हो गया। कालपी में राव साहब पेशवा की सेना में बड़ी अँधेरगर्दी थी। सैनिक अनुशासन का नाम नहीं था। महारानी ने सारी व्यवस्था की। सर ह्यूरोज झांसी से कालपी पर टूट पड़ा। महारानी ने अद्भुत प्रतिभा और रण-कौशल का परिचय दिया। लेकिन राव साहब की सेना में आत्मिक बल नहीं था और कालपी अंग्रेजों के सर कर दिया। महारानी और राव साहब अपने विश्वस्त साथियों सहित ग्वालियर की ओर दौड़ पड़े। महारानी ग्वालियर आईं और उन्होंने वहां की जनता को एकसूत्र में बांधा। उन्हें जनता तथा ग्वालियर की सेना का पर्याप्त सहयोग प्राप्त हुआ। ग्वालियर का किला महारानी के हाथों में था, लेकिन पेशवा के सैनिक आमोद-प्रमोद की बातें सोचते थे।

राव साहब पेशवा के राज्याभिषेक की बात दोहराई गई, लेकिन रानी तटस्थ रहीं। वह अच्छी तरह से जानती थीं कि अंग्रेज चैन से नहीं बैठने देंगे। वही हुआ भी। ११ जून १८५८ को जनरल रोज की सेनाओं से महारानी की मुठभेड़ हुई, लेकिन वह दिन अनिर्णीत होने के कारण १८ जून को पौ फटते ही लड़ाई शुरू हो गई। महारानी ने रोज की सेना पर दबाव डाला और अन्तिम समय तक अदम्य साहस के साथ अंग्रेजों की विशाल सेना को युद्धभूमि में धूल चटाती रहीं। लेकिन एक गोरे की पिस्तौल की गोली महारानी की जांघ में लगी। रानी ने पास आये हुए अंग्रेजों के तलवार से टुकड़े किये। महारानी ने भरसक यत्न किया कि वह सामने आए हुए नाले को पार कर जाए, लेकिन घोड़ा सहमा और बिदक गया। अंग्रेजों का दबाव बढ़ रहा था। एक और अंग्रेज सामने आया। वह भी महारानी की तलवार से मारा गया। महारानी क्षीण पड़ चलीं और घोड़े से गिर पड़ीं। उनके साथी उन्हें निकटवर्ती बाबा गंगादास की कुटी में ले गए लेकिन उन्होंने स्वराज्य की रक्षा में अपने प्राण त्याग दिए।

प्रत्येक वर्ष १८ जून को हम महारानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि मनाते हैं। महारानी आज न होते हुए भी प्रत्येक देशप्रेमियों के हृदय में निर्भीकता और कर्तव्यपरायणता की प्रेरणास्त्रोत बनकर प्रतिष्ठित हैं। वह एक अमरगाथा हैं जिसे आजादी के दीवानों ने आज तक गाया और भविष्य में भी गायेंगे।