Tuesday, June 11, 2019

जियो और जीने दो !



जियो और जीने दो !!!
नास्तिकों का यह नया तर्क है कि कोशिकाओं से ही पेड़ पौधे और जानवर बने हैं। इनका शरीर कुछ नहीं अपितु कोशिकाओं का सम्मिलित जोड़ है। नीचे दिया चित्र नास्तिकों का नया ब्रह्मास्त्र है जिसके माध्यम से वो साबित करना चाह रहे हैं कि कोशिकायें चाहें पादप जगत की हों या जंतुओं की,दोनों की संरचना समान होने के कारण मनुष्य केवल कोशिकायें ही खाता है। इसलिये मांसाहार और शाकाहार में कोई अंतर नहीं है। चाहे मांस खाओ या कंदमूल, खाई तो केवल कोशिकायें ही जा रही हैं। जिस चित्र को नास्तिक ने दिया वो ही स्पष्ट कर देता है कि दोनों प्रकार की कोशिकाओं में भिन्नता है। ये एकसमान नहीं हैं। इस तथ्य को वह चित्र में देख ही नहीं पाया। इस दावे को विज्ञान की सहायता से अमान्य करना इस पोस्ट का उद्देश्य है।
सर्वप्रथम तो पादप कोशिका और जंतु कोशिका एकसमान नहीं होतीं। दोनों में कई अर्थों में अंतर होता है। पादप कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली (Cell membrane) के ऊपर कठोर कोशिका भित्ति (Cell wall) होती है। जबकि जंतुओं की कोशिका में केवल कोशिका झिल्ली ही होती है। अत: कोशिका भित्ति के अभाव के चलते यह कठोर नहीं होती है।
दोनों प्रकार की कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया होता है परंतु केवल पादप कोशिका में ही क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast) होता है, जहां प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) से सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा शुगर में रूपांतरित की जाती है जो पौधों के लिये भोजन है। साथ ही यह उन समस्त जानवरों के लिये भी भोजन है जो वनस्पतियों को खाते हैं। पादप कोशिका में एक अकेली बड़ी रिक्तिका (Vacuole) होती है जिसका उपयोग भंडारण और कोशिका के आकार को बनाये रखने के लिये होता है। जबकि जंतु कोशिका में अनेक छोटे-छोटे वैकुओल होते हैं। इसलिये विज्ञान के हिसाब से दोनों प्रकार की कोशिकायें एक जैसी नहीं होती हैं। इनमें भिन्नता होती है। अब कथित नास्तिक के हास्यास्पद तर्क को ही आगे बढ़ाते हुये नास्तिक को सलाह है कि, चूंकि सूर्य ही इस धरा पर ऊर्जा का प्रथम स्त्रोत है, कोशिकाओं को छोड़ रोज सुबह नाश्ते, दोपहर भोजन के समय वो धूप में खड़ा होकर सूर्य की ऊर्जा खाये और जो भी अतिथि घर में आयें उन्हें भी धूप में खड़ा करवाकर यही खिलाये। ऐसा करने से शाकाहारी बनाम मांसाहारी विवाद का स्वत: अंत हो जायेगा।
यदि फिर भी नास्तिकों के लिये पादप कोशिका और जंतु कोशिका में कोई अंतर नहीं है, और व्यक्ति मांस या शाक सब्जी नहीं केवल कोशिकायें ही खाता है तो, जब उसके मां बाप, बेटा बेटी, पत्नी की मौत हो तो बजाय उनका शवदाह करने या कब्र में गाड़ने के शवों को ही खा ले। आखिर वो उसके सगे संबंधी ना होकर कोशिकाओं के समूह ही तो हैं। कोई पहाड़ थोड़ी ना टूट जायेगा। खा लेंं चाव से अपने सगे संबधियों के शवों को कोशिकायें मात्र समझकर। लेकिन वो नास्तिक कदापि ऐसा नहीं करेगा क्योंकि शरीर मात्र कोशिकाओं का समूह ही नहीं होता है बल्कि इनसे परे उसमें चेतना होती है। तभी जीवन आता है, चलता है और अंत में चला जाता है।
पौधों में तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क भी नहीं होता जैसा जानवरों में होता है। फिर भी जब कोई कीट पौधों की पत्ती खाना प्रारंभ करता है तो पौधा रासायनिक संकेत छोड़ता हुआ अन्य पत्तियां को अपने बचाव के लिये सावधान करता है। फलस्वरूप दूसरी पत्तियां अपने बचाव के लिये उपयुुुक कदम उठाते हुये स्वयं को कडुआ या विषैला बना कीट से बचने का प्रयास करती हैं। पौधों के रासायनिक संकेत जानवरों के संकेतों से भिन्न होते हैं। जानवरों में तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क होने के कारण ये पादप जगत से भिन्न हो जाती हैं। तंत्रिका तंत्र विद्युत से संचालित होने के कारण तीव्र गति से संकेतों को मस्तिष्क में भेजती और वापस लाती हैं। साथ ही ध्वनि और शारीरिक संकेत भी देती हैं। इसके विपरीत जब किसी पत्ती में यदि छेद किया जाये, काटा या नष्ट किया जाये तो यह कैल्सियम आयन की एक लहर चोटिल भाग से छोड़ती है जो, समुद्र की लहरों की भांति, पौधों के दूसरे हिस्सों में पहुंचती है। कैल्सियम आयन की इस लहर को उत्पन्न करने वाले अमीनो एसिड ग्लूटामेट (Glutamate) की पहचान वैज्ञानिकों द्वारा की जा चुकी है। इसके पूर्व पादप वैज्ञानिकों को मात्र इतना ही ज्ञात था कि पौधों के एक भाग में होने वाले परिवर्तनों को पौधे के दूसरे भाग अनुभव कर लेते हैं। उनको इस बात का कोई ज्ञान नहीं था कि यह सूचना पौधों के दूसरे अंगों तक पहुंचती कैसे है। अब जब अमीनो एसिड ग्लूटामेट की पहचान हो चुकी है वो दिन दूर नहीं जब पादप वैज्ञानिक पौधों के आंतरिक संवाद को अपने हिसाब से चला पायेंगे। यह शोध विज्ञान जगत के शीर्षस्थ जरनल साइंस में प्रकाशित हुआ है।
Toyota et al. Science 14 Sep 2018: Vol. 361, Issue 6407, pp. 1112-1115
क्या नास्तिक यह कहना चाहते हैं कि गाजर काटने और गाय की गर्दन काटने में कोई अंतर नहीं है ? पौधे भी अपने बचाव के लिये सजग रहते हैं। जब दोपहर में अल्ट्रावायलेट किरणें सबसे तीव्र होती हैं पत्तियां अपने क्लोरोप्लास्ट को बचाने के लिये इसे अपने निचले हिस्से में भेज देती हैं। यदि सूखे की स्थिति हो तो पत्तियां अपने स्टोमेटा को बंद कर लेती हैं ताकि वाष्पीकरण ना हो। यह सब रासायनिक संवाद के माध्यम से ही होता है। जानवरों में चूंकि तंत्रिका तंत्र होता है, यह सुख दुख अनुभव कर सकते हैं इसलिये अपना जीवन बचाने के लिये ये भरपूर संघर्ष करते हैं। गर्दन काटे जाने पर दर्द से चीखते हैं। बचने, भागने और पलटवार करने का प्रयास करते हैं। एक दूसरे की सहायता के लिये भी आते हैं। यदि इनका कोई साथी मर गया तो इसका शोक भी मनाते हैं।
- अरुण लवानिया

Friday, June 7, 2019

वैदिक पथानुगामी आर्य भरत और मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज का दर्शन



भ्रमोच्छेदन

वैदिक पथानुगामी आर्य भरत और मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज का दर्शन

लेखक- प्रियांशु सेठ, वाराणसी

[आर्यावर्त के स्थापित आदर्शों को कलंकित करने के कुत्सित प्रयासों के क्रम में महर्षि भरद्वाज द्वारा मांस परोसने के कुछ यूट्यूबर्स के अनर्गल प्रवाद का युवा गवेषक द्वारा मुंह तोड़ प्रामाणिक उत्तर दिया जा रहा है। -सम्पादक शांतिधर्मी]

महर्षि वाल्मीकि ने अपने काव्यग्रन्थ रामायण में वैदिक संस्कृति का वर्णन करते हुए एक अनुकरणीय जीवन पद्धति का चित्र प्रस्तुत किया है जो विभिन्न मतावलम्बियों के समक्ष एक आदर्श स्थापित करता है। साथ ही इससे यह भी सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण विश्व में वेद के तुल्य अन्य कोई धर्मग्रन्थ नहीं है। धर्म के स्वरूप को परिभाषित करने में उनका यह काव्य पूर्णतः सक्षम है। इस ग्रन्थ में पावन वेदों की आज्ञाओं का अनुसरण कर सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर को प्राप्त करने में तपोरत अनेक महान् आदर्श पात्रों का उल्लेख हमारी बुद्धि को प्रगल्भ, क्रियाशील, उदयशील और मोक्षमार्ग पर चलने के लिये सक्षम बनाता है। रामायण विश्व संस्कृति के इतिहास में प्रमुख स्थान रखता है। इस ग्रन्थ की महान् प्रतिष्ठा के लिए इससे बढ़कर दूसरा प्रमाण क्या होगा कि इसके रचयिता ‘महर्षि’, नायक ‘भगवान्’ और नायिका ‘देवी’ के पद से जाने जाते हैं।

रामायण काल में लोग पवित्र वेद सच्छास्त्रों के अनुसार अपनी जीवन का उत्कर्ष प्राप्त करते थे। एक सर्वव्यापक जगदीश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी मूर्ति की पूजोपासना नहीं जानते थे और पञ्च-महायज्ञ के अतिरिक्त किसी पीर परस्ती को नित्यकर्म नहीं मानते थे। षट्प्रज्ञ का भाव तो उनकी मानसिक चर्या में भी शामिल नहीं था और न मांसाहार का वहमो-गुमान था। (हिंसाभिरभिवर्जितः) अर्थात् अयोध्या हिंसा से पूर्ण मुक्त थी (-अयोध्या० १००/४४)। उस काल के देवता दिव्यगुणयुक्त, सत्वगुणी, शांतात्मा, काम, क्रोध, लोभ, मोहाहंकार इन पांच विकारों से सुरक्षित, भक्त और पुण्यवान् हुआ करते थे।

दुर्भाग्यवश अभिमान का पुतला लंकापति रावण जब वेदों से अपनी इच्छानुसारी घृणित कामना पूर्ण न कर सका तो वेद की आज्ञाओं का उल्लंघन करने लगा। वेद-वचनों के उल्लंघन के मार्ग ने उसे और उसकी राक्षसी प्रजातियों के समूह को हिंसा, अशिष्टता और व्यभिचार के दलदल में धकेल दिया। कालांतर में इन्हीं को अपना प्रेरणास्रोत मानकर वाममार्गियों ने दुर्व्यसन, मद्यपान, व्यभिचार, मांसाहार जैसी अनेक मिथ्या कल्पनाओं का इतिहास में प्रक्षेप करके विकृत करने का प्रयास किया। इसी के आधार पर पेरियार जैसे वाममार्गियों ने असत्य को सत्य का मुखौटा पहनाकर नफरत के सौदागरों को आमन्त्रण भेजे और अंततः विधर्मियों ने तरह-तरह के आक्षेप रामायण के आदर्श पात्रों पर लगाने आरम्भ कर दिए। अब तक जो श्रीराम पर भिन्न-भिन्न आरोप लगाकर खुद के मत को श्रेष्ठ सिद्ध करने का असफल प्रयास किया करते थे, अब वही कुत्सित प्रयास श्रीराम के अनुज भरतजी पर लगाकर कर रहे हैं। जब उन्होंने श्रीराम से मिलने वन को प्रस्थान किया, मार्ग में उन्हें भरद्वाज मुनि के दर्शन हुए। मुनि भरद्वाज ने उन्हें और उनकी सेना को भरपेट भोजन के लिये मांस दिया।
आइए, अपने आदर्श भरतजी और भरद्वाज मुनि पर लगे इस मिथ्या आरोप का निराकरण और इसके पोषकों का मुखमर्दन कर सत्य को पुनर्स्थापित करें।

धर्मात्मा आर्य भरत

आर्य मर्यादाओं के निष्पादक पुरुषोत्तम श्रीराम के अनुज निःस्पृह भरतजी का चरित्र बड़ा ही विशद, आदर्श, उज्ज्वल और निष्कलंक है। भरतजी धर्म और नीति के जानने वाले, सत्यप्रतिज्ञ, सदाचारी, विनय की मूर्ति, सद्गुणसम्पन्न और भक्ति-प्रधान कर्मयोगी थे। तितिक्षा, वात्सल्य, अमानिता, सौम्यता, सरलता, मधुरता, क्षमा, दया, वीरता, व्यवहार-कुशलता और सहृदयता आदि गुणों से वे लालित्य और जाज्वल्यमान थे। उनकी वेदों के अध्ययन के प्रति प्रगाढ़ रुचि को वाल्मीकिजी ने वर्णित किया है-

ते चापि मनुजव्याघ्रा वैदिकाध्य्यने रताः।
पितृशुश्रूषणरता धनुर्वेदे च निष्ठिताः।। -वाल्मीकि-रामायण, बालकाण्ड, सर्ग १८, श्लोक ३६-३७
अर्थात्- वे पुरुषसिंह राजकुमार प्रतिदिन वेदों के स्वाध्याय, पिता की सेवा तथा धनुर्वेद के अभ्यास में दत्तचित्त रहते थे।

भरतो वाक्यं धर्माभिजनवाञ्छुचिः। -वाल्मीकि-रामायण, अयोध्या० ७२/१६
अर्थात् भरत धार्मिक कुल में उत्पन्न हुए थे और उनका हृदय शुद्ध था।

अरण्यकाण्ड में, जब लक्ष्मण श्रीराम के समक्ष हेमन्त ऋतु का वर्णन करते हैं और भरत की प्रशंसा करते हैं, वे भरत को धर्मात्मा कहकर सम्बोधित करते हैं-

अस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्र काले दुःखसमन्वितः।
तपश्चरति धर्मात्मा त्वद्भक्त्या भरतः पुरे।। -वा० रा०, अरण्य० १६/२७

अर्थात् पुरुषसिंह श्रीराम! इस समय धर्मात्मा भरत आपके लिए बहुत दुःखी हैं और आप में भक्ति रखते हुए नगर में ही तपस्या कर रहे हैं।

भरत की पितृ-भक्ति-
विवाह पश्चात् दशरथजी की आज्ञा पाकर जब भरत शत्रुघ्नसहित अपने मामा केकयनरेश युधाजित् के साथ ननिहाल चले गए थे तो एक दिन इनको एक अप्रिय स्वप्न आया, जिसके कारण ये मन-ही-मन बहुत संतप्त हुए थे। मित्रों की गोष्ठी में हास्यविनोद करने पर भी प्रसन्न नहीं हुए। हृदय से स्वप्न का भय दूर न होने के कारण इन्होंने पिताजी के पास जाने का निश्चय किया तथा मार्ग में सात रातें व्यतीत करके आठवें दिन अयोध्यापुरी पहुंचे। माता कैकेयी से पिताश्री दशरथ के स्वर्गवास का समाचार पाने पर शोक के कारण भरतजी की जो दशा हुई तथा पिता के लिए जिस प्रकार से इन्होंने विलाप किया है, उससे इनके श्रद्धा-समन्वित सच्चे पितृ-प्रेम का पता चलता है। माता ने धैर्य धारण करने के लिए कहा, तब उत्तर में कहते हैं-

अभिषेक्ष्यति रामं तु राजा यज्ञं नु यक्ष्यते।
इत्यहं कृतसंकल्पो हृष्टो यात्रामयासिषम्।।२७।।
तदिदं ह्यन्यथाभूतं व्यवदीर्ण मनो मम।
पितरं यो न पश्यामि नित्यं प्रियहिते रतम्।।२८।।
क स पाणिः सुखस्पर्शस्तातस्याक्लिष्टकर्मणः।
यो हि मां रजसा ध्वस्तमभीक्ष्णं परिमार्जति।।३१।। -अयोध्या०, सर्ग ७२

अर्थात् मैंने तो यह सोचा था कि महाराज श्रीराम का राज्याभिषेक करेंगे और स्वयं यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे- यही सोचकर मैंने बड़े हर्ष के साथ वहां से यात्रा की थी।।२७।। किन्तु यहां आने पर सारी बातें मेरी आशा के विपरीत हो गयीं। मेरा हृदय फटा जा रहा है, क्योंकि सदा अपने प्रिय और हित में लगे रहने वाले पिताजी को मैं नहीं देख रहा हूं।।२८।। हाय! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे पिता का वह कोमल हाथ कहां है, जिसका स्पर्श मेरे लिए बहुत ही सुखदायक था? वे उसी हाथ से मेरे धूलिधूसर शरीर को बार-बार पोंछा करते थे।।३१।।

भरत की मातृ-भक्ति-
दशरथ-पुत्रों में अपनी माताओं के लिए अनुरक्ति और ममत्व का भाव विद्यमान था। ननिहाल में उस दुःस्वप्न के कारण भरत मानसिक अशान्ति व अस्थिरता से इतना व्याकुल हो गए थे कि वे वसिष्ठ द्वारा उन्हें अयोध्या ले जाने वाले दूतों (सिद्धार्थ, विजय, जयन्त अशोक और नन्दन -अयोध्या० ६८/५) से पूछते हैं-

आर्या च धर्मनिरता धर्मज्ञा धर्मवादिनी।
अरोगा चापि कौसल्या माता रामस्य धीमतः।।८।।
कञ्चित् सुमित्रा धर्मज्ञा जननी लक्ष्मणस्य या।
शत्रुघ्नस्य च वीरस्य अरोगा चापि मध्यमा।।९।।
आत्मकामा सदा चण्डी क्रोधना प्राज्ञमानिनी।
अरोगा चापि मे माता कैकेयी किमुवाच ह।।१०।। -अयोध्या, सर्ग ७०

अर्थात् धर्म को जानने और धर्म ही की चर्चा करनेवाली बुद्धिमान् श्रीराम की माता धर्मपरायणा आर्या कौसल्या को तो कोई रोग या कष्ट नहीं है?।।८।। क्या वीर लक्ष्मण और शत्रुघ्न की जननी मेरी मझली माता धर्मज्ञा सुमित्रा स्वस्थ और सुखी हैं?।।९।। जो सदा अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहती और अपने को बड़ी बुद्धिमती समझती है, उस उग्र स्वभाववाली कोपशीला मेरी माता कैकेयी को तो कोई कष्ट नहीं है? उसने क्या कहा है?।।१०।।

कैकेयी की इच्छानुसार राजा दशरथ द्वारा श्रीराम को वनवास भेजने पर माता कौसल्या के दुःख की अनुभूति भरत भलीभांति कर सकते थे। वे माता कैकेयी से कहते हैं-

तथा ज्येष्ठा हि मे माता कौसल्या दीर्घदर्शिनी।
त्वयि धर्मे समास्थाय भगिन्यामिववर्तते।। -अयोध्या०, ७३/१०
अर्थात् मेरी बड़ी माता कौसल्या भी बड़ी दूरदर्शिनी हैं। वे धर्म का ही आश्रय लेकर तेरे साथ बहिन का-सा बर्ताव करती हैं।

भरत का भ्रातृ-स्नेह-
वेद के उद्घोष ‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्’ (अथर्व० ३/३०/३) की सार्थकता अयोध्या राजकुमारों के जीवन-चरित्र में दृष्टिगोचर होती है। रामायण में इनके भ्रातृ-प्रेम के बहुशः वर्णन हैं, जो हृदय को आह्लादित कर देने के साथ व्यावहारिक शिक्षा को भी प्रकाशित कर देने वाले हैं-

पिता ही भवति ज्येष्ठो धर्ममार्यस्य जानतः। -अयोध्या० ७२/३३
अर्थात् धर्म के ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुष के लिए बड़ा भाई पिता के समान होता है।

राघवः स हि मे भ्राता ज्येष्ठः पितृसमो मतः।। -अयोध्या० ८५/९
अर्थात् श्रीरघुनाथजी मेरे बड़े भाई हैं। मैं उन्हें पिता के समान मानता हूं।

भरत अपने सभी भाइयों से बहुत प्रेम करते थे, लेकिन श्रीराम से उनका विशेष लगाव था। भ्राता श्रीराम के वनवास का समाचार सुनकर भरत के मुख से जो गद्गद वाणी निकल पड़ती है, वह रामायणकालीन संस्कृति की प्रेरणाप्रद श्रेष्ठता को प्रकट करती है-

निवर्तयित्वा रामं च तस्याहं दीप्ततेजसः।
दासभूतो भविष्यामि सुस्थितेनान्तरात्मना।। -अयोध्या० ७३/२७
अर्थात्- श्रीराम को लौटा कर उद्दीप्त तेजवाले उन्हीं महापुरुष का दास बनकर स्वस्थचित्त से जीवन व्यतीत करूँगा।

रामः पूर्वो हि नो भ्राता भविष्यति महीपतिः।
अहं त्वरण्ये वत्स्यामि वर्षाणि नव पञ्च च।। -अयोध्या० ७९/८
अर्थात् श्रीरामचन्द्रजी हम लोगों के बड़े भाई हैं, अतः वे ही राजा होंगे। उनके बदले मैं ही चौदह वर्ष तक वनवास करूँगा।

यदि त्वार्ये न शक्ष्यामि विनिवर्तयितुं वनात्।
वने तत्रैव वत्स्यामि यथार्यो लक्ष्मणस्तथा।। -अयोध्या० ८२/१८
अर्थात् यदि मैं आर्य श्रीराम को वन से न लौटा सकूंगा तो स्वयं भी नरश्रेष्ठ लक्ष्मण की भांति वहीं निवास करूँगा।

देखिए, कितनी उच्च भावना और भक्ति है! कितना पवित्र भाव है! कितनी निरभिमानता और कितना त्याग है!

मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज का दर्शन और आक्षेप का उत्तर

वाल्मीकिजी ने एक ओर जहाँ अयोध्या राजकुमारों के जीवन-वृत्तान्त को प्रकट किया है, वहीं अपने समकालीन अनेक महान् तपस्वियों का उल्लेख भी किया है। उन्होंने प्रतिपादित कर दिया है कि काव्य तभी विश्व-विश्रुति का कारण बनकर कुसुमित होता है, जब उसमें वर्णित पात्रों के साथ-साथ उनके मार्गदर्शक का भी उल्लेख हो। रामायण में मुनि भरद्वाज वाल्मीकिजी के शिष्य के रूप में वर्णित हैं (बाल० २/४,५)। भरद्वाज का आश्रम प्रयाग में स्थित था। वह नाना प्रकार के वृक्षों और फूलों से सुशोभित था (अयोध्या० ५४/४,५)। इन्हीं के परामर्श पर श्रीरामजी ने चित्रकूट में अपना आश्रम बनाया था (बाल० १/३१, अयोध्या० ५४/२८)। मुनि भरद्वाज इनका सत्कार नाना प्रकार के अन्न, रस और फल-मूल देकर करते हैं (अयोध्या० ५४/१८)। अग्निपुराण के इस श्लोक से भी यही सिद्ध है-
शृंगवेरं प्रयागं च भरद्वाजेन भोजितः।। -अध्याय ६, श्लोक ४६
अर्थ- शृंगवेरपुर के पश्चात् प्रयाग में भरद्वाज महर्षि ने उनको भोजन कराया।

निर्दोष जीवों के मांस के भूखे अधर्मी लोग अपने गले में हड्डी अटकाकर यह चीत्कार किया करते हैं कि मुनि भरद्वाज ने भरत और उनकी सेना के आतिथ्य-सत्कार में जो भोजन दिया था उसमें मांस विद्यमान था। इससे वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिन्दुओं के पूर्वज आर्य मांस का सेवन किया करते थे। अपने पैगम्बरों के पक्षधर्ताओं ने यह आक्षेप अपनी आंख में बालू भरकर बरजबान कर लिया है। जब हम इन मतावलम्बियों के ग्रन्थों से मांसभक्षण का हवाला देकर प्रश्न करते हैं तो इनकी सभा मातम-ए-कयामत से बख्शने की भीख मांगने पर मजबूर हो जाती है क्योंकि इनके ग्रन्थों के अनुसार मांसाहार की सम्मति न केवल इनके राक्षस कोटि के पूर्वज बल्कि स्वयं इनका खुदा देता है। इन्हीं का पक्ष लेने के लिए ये मतवादी हमारे ग्रन्थों पर मिथ्या दोषारोपण करके अपने मत की वकालत किया करते हैं।
भरत का मांस खाना सम्पूर्ण वाल्मीकि-रामायण में कहीं नहीं लिखा तथा भरद्वाज द्वारा सत्कार में मांस देनेवाला प्रकरण भी मुनि भरद्वाज के आचरण और सिद्धान्तों के बिल्कुल विपरीत है। यथा-

(१) जब मृत क्रौंच पक्षियों के जोड़े को देखकर वाल्मीकि के मुख से करुण वाणी काव्य (श्लोक) के रूप में प्रस्फुटित हुई, तब मुनि भरद्वाज वहां उपस्थित थे (बाल० २/७-२१)। वहाँ मरे पक्षी तक के मांस खाने का जिक्र नहीं है।

(२) हम यह सिद्ध कर चुके हैं कि जब राम, सीता और लक्ष्मणसहित भरद्वाज के आश्रम पहुंचते हैं तो मुनि उनका सत्कार अन्न और फल-मूल देकर करते हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि मुनिराज के चारों ओर मृग, पक्षी और मुनि लोग बैठे थे और श्रीराम का स्वागतपूर्वक सत्कार करने के बाद भरद्वाज जी धर्मयुक्त वचन रामचन्द्र से बोले (अयोध्या० ५४/१९,२०)। अर्थात् भरद्वाज के आश्रम के समीप मुनि-मण्डली भी थी। अब बताइये, जिसकी गणना मुनियों की कोटियों में हो रही हो और जिसे मुनि-मण्डली में उच्च स्थान प्राप्त हो, वह भला किसी धर्मात्मा या उसकी सेना के आतिथ्य-सत्कार में मांस दे सकता है?

(३) अयोध्या० ९१/३२ के अनुसार भरद्वाज मुनि भरत और उनकी सेना के पशुओं के लिए शालाएं बनवाते हैं। यह उदाहरण भरद्वाज की महानता को प्रकट करता है।

(४) धर्मज्ञ मुनि ने क्रमशः वसिष्ठ और भरत को अर्घ्य, पाद्य तथा फलादि निवेदन करके उन दोनों के कुल का कुशल समाचार पूछा। वसिष्ठ और भरत ने भी मुनि के शरीर, अग्नि, शिष्यवर्ग, वृक्ष तथा मृग-पक्षी आदि का कुशल समाचार पूछा (अयोध्या० ९०/६,८)। यहां मुनि के शिष्यवर्ग (शिष्येषु) का उल्लेख मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वहां कोई गुरुकुल था और भरद्वाज के पास विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे। इससे यह भी पता चलता है कि मुनि भरद्वाज की जीवों के प्रति अत्यन्त दयापूर्ण दृष्टि थी, अन्यथा भरत और वसिष्ठ जीवों का कुशल समाचार तो न पूछते।
भरत को आमिष भोजन बिल्कुल अभीष्ट नहीं था, अन्यथा वे उसी समय भरद्वाज से मांसयुक्त भोजन निवेदन कर सकते थे। भरत का संकल्प देखिए-
वीर रघुनन्दन! मैं भी चौदह वर्षों तक जटा और चीर धारण करके फल-मूल का भोजन करता हुआ आपके आगमन की प्रतीक्षा में नगर से बाहर ही रहूंगा। -अयोध्या० ११२/२३,२४

इन उदाहरणों से सिद्ध है कि भरद्वाज मुनि के मन के संसार में जीवों के प्रति करुणा व स्नेहयुक्त भाव भरे थे। उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में हमारे पूर्वजों, आर्य भरत और मुनि भरद्वाज आदि वैदिक पथानुगामियों पर मांसाहार का दोषारोपण करना अज्ञानता और अनर्गल प्रलाप ही है।

[स्त्रोत- शांतिधर्मी मासिक पत्रिका का मई २०१९ का अंक]

आर्यों ने सारी दुनिया बसाई



आर्यों ने सारी दुनिया बसाई
सहदेव समर्पित/राजेशार्य आट्टा
राखी गढ़ी सिविलायजेशन के एक भाग की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं के अध्ययन से प्राप्त रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह सिविलायजेशन विश्व इतिहास की सबसे प्राचीन ज्ञात सभ्यता है। रिपोर्ट्स के अनुसार हार्वर्ड युनिवर्सिटी, बीरबल साहनी इन्स्टीट्यूट, व हैदराबाद के सी सी एम डी की जांच को डेक्कन ने परिणाम तक पहुंचाया है। अब कथित हड़प्पा संस्कृति का काल 5000 की बजाय 8000 से 9500 साल तक पीछे चला गया है। यह पुरातात्त्विक प्रमाण है, जो लम्बे समय तक इतिहास से छल करने वाले कथित स्वयंभू ‘बुद्धिजीवियों’ के मुंह पर तमाचा है।
इस रिपोर्ट के परिणाम कहते हैं कि हमने ही विश्व को नगर बसाने सिखाए थे। इसके परिणाम बताते हैं कि आर्यों के आक्रमण की थ्यूरी बेहूदा, शरारतपूर्ण और 100 प्रतिशत झूठी है। हमारे लिखित इतिहास को मिथक कहकर कचरा घोषित करने वाले षडयंत्रकारी बेनकाब हो रहे हैं। महर्षि दयानन्द से लेकर डॉ0 भीमराव अम्बेडकर तक कहते हैं कि आर्यों के भारत से बाहर से आकर आक्रमण करने की थ्यूरी के कोई प्रमाण नहीं हैं। आर्यावर्त का प्रामाणिक लिखित इतिहास कहता है कि मनुष्य की उत्पत्ति त्रिविष्टप् (तिब्बत) में हुई और आर्यों ने ही आर्यावर्त बसाया। उससे पूर्व इस भूभाग में कोई नहीं रहता था। यहाँ अधिक संख्या होने पर आर्यों ने अन्य स्थानों पर प्रयाण किया और अन्य देशों को बसाया। इसके प्रमाण आर्यावर्त से भिन्न अनेक देशों में मिलते हैं कि उनका मूल आर्यावर्त ही है। यहाँ से प्रव्रजन कर गए लोगों का डीएनए मिलना भी स्वाभाविक ही है। इसलिये डीएनए वाली थ्योरी भी पाखण्ड के सिवा और कुछ नहीं है।
हमारे ही देश में रहने वाले मैकाले मानस के तथाकथित इतिहासकार-जिस प्रकार बन्दरिया अपने मरे हुए बच्चे को छाती से चिपकाए रखती है-उसी प्रकार राष्ट्रीय एकता को भंग करने वाली, राष्ट्र के साथ गद्दारी करने वाली गली-सड़ी, मुर्दा विचार धारा को लिये फिरते हैं। हमेशा ही विदेशियों की वैशाखियों के सहारे चलते रहोगे? देखिये-
1- आर्यों के किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में उनके मूलस्थान अर्थात् पहले स्थान और भारत पर विजय प्राप्त करने के बारे में कहीं वर्णन नहीं है।
2- यदि संख्या बढ़ जाने से या खाद्य सामग्री की कमी हो जाने से आर्यों की टोलियाँ बाहर निकलती तो कुछ तो घर में रह जाते। जबकि मैक्समूलर द्वारा बताया गया आर्यों का आदि देश तो सर्वथा आर्य-शून्य है।
3- चीन, यूनान, मध्य एशिया, मिस्र आदि देशों के इतिहासों में यह संकेत भी नहीं मिलता कि आर्य लोग मध्य एशिया में निवास करते थे और वहाँ से बाहर गए।
4- संस्कृत भाषा प्राचीन काल से ही आर्यों की साहित्यिक भाषा है और आर्यों का सारा साहित्य भी भारत से ही मिलता है, किसी अन्य देश से नहीं।
5- ईरान में यह पढ़ाया जाता है कि चन्द हजार साल पहले आर्य लोग हिमालय पर्वत से उतरकर वहाँ आए और यहाँ का जलवायु अनुकूल पाकर ईरान में बस गए।
6- अभी तक इस बात का कोई निश्चित प्रमाण नहीं दिया जा सका कि आर्य विदेशी थे। सब अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ा रहे हैं और आर्यों के विदेशी होने का कोई पुष्ट प्रमाण मिल भी कैसे सकता है। क्योंकि जब गुलदस्ता ही प्लास्टिक का है तो सुगन्ध कहाँ से आएगी। इसी प्रकार का यह सिद्धान्त है जो भारत शत्रु अंग्रेजों के विकृत मस्तिष्क की उपज है।
डॉ॰ बुद्धप्रकाश ने लिखा है कि आर्य लोग ही सिन्धु घाटी की सभ्यता के संस्थापक थे। उत्तरी धु्रव के सिद्धान्तकार लोकमान्य तिलक ने बाबू उमेशचन्द्र विद्यारत्न से कहा था कि हमने मूल वेद नहीं पढ़े, हमने तो केवल साहब लोगों के अनुवाद पढ़े हैं। प्रो॰ मैक्समूलर ने भी अपनी अन्तिम पुस्तक में ‘मध्य एशिया’ का ‘मध्य’ शब्द निकाल दिया था। आर्यों को विदेशी कहने वालों को फटकारते हुए स्वामी विवेकानन्द ने लिखा है-‘‘किस वेद अथवा सूक्त में तुमने पढ़ा है कि आर्य दूसरे देश से भारत में आये? इस बात का प्रमाण तुम्हें कहाँ मिला है कि उन लोगों ने जंगली जातियों को मार-काट कर यहाँ निवास किया?’’ (प्राच्य और पाश्चात्य पृष्ठ 102)
वर्तमान भारत को प्राचीन आर्यत्व प्रदान करने वाले महर्षि दयानन्द, बाबू अविनाशचन्द्र, डॉ॰ सम्पूर्णानन्द, डॉ॰ गंगानाथ झा जैसे कितने ही विद्वान् भारत को ही आर्यों की आदि भूमि मानते हैं। अब भी यदि विदेशी विद्वानों की जूठी पत्तलों का मोह नहीं छूटा तो लीजिए-
अमेरिकी मानव वैज्ञानिक और पुरातत्त्व वेत्ता डॉ॰ जे॰मार्क केनोयर का मत है कि ‘‘भारोपीय (इंडोयूरोपीयन) तथा भारतीय आर्य (इंडो आर्यन) की परिकल्पनाओं के पीछे यूरोपीय विद्वानों का उद्देश्य अपनी श्रेष्ठता-प्रतिपादन करना था।’’ आर्यों के सिन्धु घाटी पर किये हमलों तथा सिन्धु घाटी के लोगों को घोड़े तथा लोहे से अपरिचित बतानेवालों का खण्डन करते हुए डॉ॰ केनोयर ने कहा है-‘‘हड़प्पा सभ्यता से जुड़े विभिन्न स्थलों पर 3100 वर्ष से अधिक पुराने लोहे मिले हैं। ---इसी तरह सिन्धु घाटी में अश्वों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस तथ्य को झुठलाते हैं कि हड़प्पा वासी अश्वों से परिचित नहीं थे।’’ डाक्टर केनोयर का मानना है कि सिन्धु घाटी आर्यों की ही सभ्यता है और महाभारत का काल ईसा से 3102 वर्ष पूर्व माना है।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के अध्यापक डॉ॰ बेनीमाधव बरुआ ने विद्वानों की दृष्टि एक चित्र की ओर आकर्षित की। जिसमें वैदिक त्रैतवाद को दर्शाते हुए एक वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं। इसका सम्बन्ध ऋग्वेद के (1-164-20) मंत्र से है। डॉ॰ मैक्डानल्ड के आर्यों के समुद्र से अपरिचित होने का खण्डन करते हुए डॉ॰ फते सिंह ने लिखा है कि वेद में समुद्र का उल्लेख 289 बार हुआ है। ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ के सिद्धान्त का पालन करने वाले आर्यों की सभ्यता के अंश संसार के अन्य देशों में देखे जा सकते हैं। रामायण के उत्तर काण्ड, सर्ग 102 के अनुसार-
‘‘कारूपथ (कैरोपेथियन) लक्ष्मण-पुत्र अंगद को दिया गया। इसलिए इसे अंगदियापुरी कहते थे, द्वापर में यही अंगदेश और हरिवर्ष कहलाया और उसका एक भाग अंगेराई (हंगरी) हो गया। अंगदिया-पुरी के दक्षिण में राक्षसों के आक्रमण रोकने के लिए लक्ष्मण जी ने एक छावनी बनाई, जो अब आस्ट्रिया (क्षत्रिय) कही जाती है। उत्तरी भाग में शर्मा (ब्राह्मणों) की ब्रह्मपुरी बसाई थी, जो शर्माणी (जर्मनी) कही जाती है। इनके मध्य में लक्ष्मण जी का मुख्यालय लक्ष्मणबृज (लेक्षनवर्ग) है। भरत जी के ज्येष्ठ पुत्र तक्ष के नाम पर तक्ष खण्ड (ताशकन्द) और द्वितीय पुत्र पुष्कल के नाम पर पुष्कलावर्त (पेशावर) बना।’’
मुसलमानी आगमन पर अफगानिस्तान में जादो वंश का राज्य था, जो ‘यादव’ का अपभ्रंश है। इन्हीं यदुवंशियों से यहूदी बनें। माहकुल को अरबी में मुगल कहते हैं और चन्द्रकुल को फारसी में माहकुल कहते हैं। इसका तात्पर्य चन्द्रवंशियों से है। इसीलिए ये लोग अपना वर्ष चन्द्र गणनानुसारी 354 दिनों का अब तक मानते आ रहे हैं और इनका धार्मिक ध्वज भी ‘चाँद-तारे’ वाला है।
वैदिक सभ्यता का 10-15 हजार वर्ष पुराना होना भी सत्य नहीं है। तथाकथित कार्बन डेटिंग से तो उसी समय का पता चल सकता है जिस समय यह सभ्यता स्थापित थी और जिस समय के अवशेष अब प्राप्त हुए हैं। यह कब बसी थी, जब इसको जानने की प्रामाणिक विधियाँ मनुष्य को ज्ञात हो जाएँगी, तब ये रिसर्च सत्य के और अधिक निकट पहुंच पायेंगे। हमें तो उस दिन की प्रतीक्षा है जब मानव के 1960853119 वर्ष के इतिहास को जाना और माना जाएगा।

Thursday, June 6, 2019

वैदिक धर्म में राष्ट्र की उपासना भी धर्म का अंग है!



वैदिक धर्म में राष्ट्र की उपासना भी धर्म का अंग है!


-क्षितिश वेदालंकार

अब से 500 वर्ष पहले राष्ट्र के प्रत्येक प्रदेश में जो भक्तिकाल का युग आया और प्रत्येक प्रदेश में उस उस प्रदेश की भाषा में सन्त कवि पैदा हुए, वह देश की अद्भुत सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। यदि समग्र देश में सांस्कृतिक एकता का यह मणि-सूत्र न होता, तो यह कैसे सम्भव था कि प्रत्येक प्रान्त में लगभग एक साथ भक्त सन्त कवि पैदा होते। यह चमत्कार इतिहासकारों को आश्चर्य में डाल सकता है। दक्षिण भारत में अलवार सन्त, मध्वाचार्य, निम्बर्काचार्य और वल्लभाचार्य आदि आचार्य, महाराष्ट्र में सन्त, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, नामदेव और समर्थ गुरु रामदास, बंगाल में चैतन्य देव, जयदेव, हरिदास, असम में शंकरदेव, सुदूर केरल में स्वति तिरुमाल, गुजरात में नरसी मेहता, राजस्थान में मीरा और राजुल, उत्तर भारत में सूर, तुलसी और कबीर तथा पंजाब में गुरु नानक- इन सबका लगभग एक साथ एक ही काल में उदय जिस आन्तरिक अन्त:सलिला के समान उद्गम का परिचायक है, वह अद्भुत है। इस भक्तिकाल में, और तो और ऐसे लगभग ५० मुसलमान सन्त भक्त कवि हुए हैं जिनके विषय में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का कहना था-

इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिक हिन्दू वारिये।

यह भक्तियुग का व्यापक विस्फोट एक तरह से ज्ञान काण्ड के और कर्म काण्ड के युग के प्रति विद्रोह का सूचक है। ज्ञानमार्ग यदि राजतंत्र था, और कर्म मार्ग सामन्ततंत्र, तो भक्ति मार्ग विशुद्ध लोकतंत्र था जिसमें ज्ञान और कर्म दोनों की उपेक्षा करके केवल भक्ति पर बल दिया गया था- ऐसी भक्ति जिसमें सवर्ण अवर्ण, अमीर गरीब, शिक्षित अशिक्षित सभी को समान स्थान था। वहां तो 'ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय' की पूछ थी, वहां ज्ञान और कर्म की पूछ कहां। यह मुगलों की गुलामी के दौर में राष्ट्र के लिए एक ऐसा मदिर आसव था जिसमें सारा राष्ट्र आपादमस्तक डूब गया- देश में सैकड़ों-हजारों मन्दिर बन गए और दक्षिण से चली भक्ति की आंधी सारे देश में छा गई। इस भक्तियुग में आत्ममुग्धता और आत्महीनता की भावना थी, रेत में गर्दन छिपाने वाले शुतुमुर्ग कि तरह सारे देश ने गुलामी के उस दौर को सहज भाव से स्वीकार कर लिया और उसके प्रतिकार का कोई सामूहिक और राष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं अपनाया। इसीलिए जड़पूजा को अपना कर जाति ने येन केन प्रकारेण जीवित रहने का आधार तो तैयार कर लिया, पर उसका तेज नष्ट हो गया।
इस भक्तिकाल के मूल में आत्मचेतना के साथ जो राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना का तत्व छिपा था, उसे सर्वथा भुला दिया गया। उसके लिए फिर मैं विष्णु पुराण का श्लोक उद्धृत करूंगा-

गायन्ति देवा: किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारत भूमि भागे।
स्वर्गापवर्गस्य च हेतुभूते भवन्ति भूय: पुरुषा सुरत्वात्।।

देवता लोग भी उनके गीत गाते हैं जिन्होंने भारतभूमि में जन्म लिया है क्योंकि वे धन्य हैं। देवताओं के लिए केवल स्वर्ग निर्धारित है, अपवर्ग नहीं, पर भारतभूमि के निवासी स्वर्ग और अपवर्ग दोनों के अधिकारी हैं। यह स्मरण रखिए कि देवता स्वर्ग से बंधे रहने के लिए अभिशप्त हैं, अपवर्ग उनके लिए नहीं है।

पर मानव के लिए स्वर्ग और अपवर्ग दोनों है। यह 'फरिश्ते से बेहतर है इन्सान बनना', नहीं तो और क्या है? ज्ञानकाण्ड और याज्ञिक कर्मकाण्ड ने परलोक पर बल दिया था और भक्ति काण्ड ने इस लोक पर- इस सीमा तक कि स्वयं भगवान् को बैकुण्ठधाम छोड़ कर इस भारतभूमि में अवतार लेना पड़ा। क्या राष्ट्रीय चेतना का इससे अधिक सबल तत्व भी कुछ और हो सकता है? पर उस तत्व की जिस प्रकार उपेक्षा हो गई, उसने ऋषि दयानन्द को विचलित कर दिया। इस भक्तिकाल में जितना श्रृंगार-प्रधान काव्य रचा गया, वह रीतिकालीन काव्य की एक प्रमुख धारा ही बन गई। इस रीतिकालीन काव्य में नायिका भेद और उनके नख-शिख की चर्चा ही कवियों की उत्कृष्टता की कसौटी बन गई- और उस सबका आधार बनी कृष्ण और राधा के नाम पर जोड़ी गई पौराणिक कथाएं, जिनमें सत्य का कहीं लेश भी नहीं था।

जड़ता की पराकाष्ठा

हमारे ज्ञानमार्गी और भक्तिमार्गी किस प्रकार सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से हीन हो चुके थे, इसके लिए ऋषि के कलकत्ता-कथ्य के कुछ उद्धरण देना प्रासंगिक होगा। ऋषि सन् १८५५ में पहली बार कुम्भ के मेले पर गए थे और वहां उन्होंने साधुओं को १८५७ की राज्यक्रान्ति के लिए संगठित करने का प्रयत्न किया। इसी प्रसंग में वे कहते हैं-

"शंकराचार्य के चारों मठों से सम्बन्धित हजारों संन्यासी और ब्रह्मचारी कुम्भ मेले में उपस्थित हुए थे। मैंने उनके चारों शंकराचार्यों से और प्रधान प्रधान संन्यासियों से केवल साधु संगठन के लिए उपदेश, परामर्श और सहयोग मांगा था।" मेरी प्रार्थना थी- 'आप में से कई एक संन्यासी आ जाइये। हम लोग सारे भारतवर्ष में कम से कम एक हजार संन्यासी संगठित और मिलित हो जायें। हमारे उद्देश्य रहेंगे-

(१) वेदप्रतिपादित धर्म का उद्धार करना,
(२) सामाजिक आदर्श और मर्यादा को देशवासियों के सम्मुख स्थापित करना,
(३) देश को विदेश और विदेशियों के प्रभाव से मुक्त करना,
(४) देश के मंगल के लिए मन और जीवन समर्पित कर देना।

आप में से कोई न कोई इस कार्य के संचालक, कर्णधार बन जाइए।'

हमारी इस प्रार्थना पर चारों मठों के चारों शंकराचार्य और बड़े-बड़े संन्यासियों ने इस आशय पर अपने मनोभावों को इस प्रकार प्रकट कर दिया- 'हम ब्रह्मवादी संन्यासी हैं, अद्वैतवादी हैं। हमारे लिए ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। राष्ट्र, समाज, परिवार, जीवन, जगत् और ये सब स्वतन्त्रता-परतन्त्रता, वर्ण, आश्रम, हमारा तुम्हारा भाव सब कुछ मिथ्या है। मिथ्या के लिए हम कुछ भी करना व्यर्थ समझते हैं।'
हम उन्हें केवल यह कहकर चले आये थे- 'दुःख की बात है कि आपके भोजन के लिए अन्न, पीने के लिए पानी, रहने के लिए स्थान, सर्दी के लिए कम्बल, (गर्मी में) हवा के लिए पंखा और सेवा के लिए शिष्य ही एकमात्र सत्य स्पष्ट हो रहे हैं, शेष सभी कुछ मिथ्या मालूम होता है।'

इसके बाद निराश होकर मैं वैष्णव सम्प्रदाय के प्रधान प्रधान नेताओं के पास गया था। ये लोग भी कुम्भ में हजारों की संख्या में एकत्र हुए थे। ये लोग द्वैतवादी और वैष्णव-भक्त हैं।

वैष्णवों के अन्दर सम्प्रदाय बहुत हैं। इन सम्प्रदायों के बड़े-बड़े गोस्वामी, महन्त, गुरु और साधु-संन्यासी हरिद्वार के कुम्भ के मेले में सम्मिलित हुए थे। मैंने सभी की सेवा में उपस्थित होकर देश, राष्ट्र और समाज की शोचनीय दशा के प्रति दृष्टि आकर्षण करके अपनी दोनों प्रार्थनाओं को पूर्ववत् रखा था। इन्होंने भी दूसरे ढंग की भाषा का प्रयोग करके मुझको निराश कर दिया था।

उन सबके कहने में सारांश यह था- "हमारे ये शरीर श्रीराम या श्रीकृष्ण के भजन के लिए हैं, दूसरे कार्य के लिए नहीं हैं। दूसरे कार्य का करना, भगवान् के स्थान में देश, समाज और राष्ट्र की सेवा करना महापाप है। मानव शरीर व्यर्थ कार्य के लिए नहीं है। महाप्रभु की सेवा और चिन्तन से मुक्ति मिलेगी, देश-समाज-राष्ट्र की वैषयिक चिन्ता से भगवद्भक्ति ढीली हो जाएगी, मुक्तिलाभ या गोलोक वैकुण्ठ जाने के मार्ग में प्रबल बाधायें आ जाएंगी। मानव जीवन इतना सस्ता नहीं है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करके तब भक्ति-साधना के एक मात्र अवलम्बन भजन के लिए शरीर मिला है। इन शरीरों को देश-समाज-राष्ट्र की भजन-विरोधी सेवा के लिए समर्पण करना बुद्धिमानों का कार्य नहीं है।"

वैष्णव गुरुओं से निराश होकर लौटते समय मैंने केवल यह वाक्य कहा था- 'जिस देश में ऐसे भक्तों की संख्या अधिक है, उस देश का सर्वनाश निश्चित है।' (ऋषि दयानन्द सरस्वती का अपना जन्म चरित्र, सम्पादक- आदित्यपाल सिंह और डॉ. वेदव्रत आलोक)

मूर्तिपूजा का अभिशाप

जड़ मूर्ति की पूजा ने भक्तों को इस सीमा तक आलसी, निष्क्रिय और कायर बना दिया कि वे देश-समाज-राष्ट्र की सेवा को महापाप तक कहने लगे। इससे बढ़कर देश का दुर्भाग्य और क्या होगा? इस मूर्तिपूजा ने जहां लोगों को भाग्यवादी और कर्म-विमुख बनाया, वहां नाना सम्प्रदायों के परस्पर वैद-विरोध-विद्वेष की लहर भी चलाई। सभी पौराणिक मूर्ति पूजक सम्प्रदाय अपने अपने इष्टदेव को सबसे बड़ा देवता और अन्यों के इष्टदेव को उनका अनुचर और कृपाकांक्षी सेवक बताने लगे। शैव, वैष्णव, शाक्त आदि सम्प्रदाय परस्पर विद्वेष की आग में इस प्रकार जलने लगे कि दूसरे सम्प्रदाय वाले को देखते ही मुंह फेर लेते। माथे पर कितनी खड़ी या पड़ी रेखाएं लगती हैं, यही सबसे बड़ा कर्म काण्ड बन गया।

इकबाल ने ठीक ही लिखा था-

सच कह दूँ ऐ बिरहमन! गर तू बुरा न माने,
तेरे सनमकदों के बुत हो गये पुराने।
अपनों से बैर रखना तूने बुतों से सीखा-
जंगो जदल सिखाया वाइज को भी खुदा ने।

अपने से वैर और गैरों से मुकाबले के समय मूर्ति की सर्वशक्तिमत्ता पर भरोसा- यही तो देश की पराधीनता का मुख्य कारण था। प्रश्न वही है न- 'क्या यही सच्चा शिव है जो अपने सिर पर से चूहों को भी नहीं हटा सकता?' सिन्ध में जिस तरह राजा दाहर की पराजय हुई, सोमनाथ मन्दिर को जिस तरह निर्ममता पूर्वक लूटा गया, बख्तियार खिलजी ने जिस प्रकार बौद्ध मठों को और नालन्दा को भूमिसात् किया, थोड़ी सी घुड़सवार सेना के बल पर बिहार और बंगाल को पामाल किया और उसके विरोध में कोई संगठित प्रयास नहीं किया गया- इस राष्ट्रीय कलंक के मूल में मूर्तिपूजा के द्वारा उत्पन्न सामाजिक नपुंसकता ही सबसे बड़ा कारण है। इसलिए ऋषि दयानन्द जैसा राष्ट्रचेता मूर्तिपूजा के विरुद्ध खड्गहस्त न होता, तो क्या करता।' मूर्तिपूजा के इस प्रबल खण्डन में राष्ट्र-चेतना ही प्रमुख कारण है।

केवल वेद नहीं

मैं भी मानता हूं कि ऋषि दयानन्द यदि शरीर है तो वेद उसकी आत्मा है। महर्षि जैमिनी के पश्चात् ऋषि दयानन्द जैसा वेदोद्धारक पैदा नहीं हुआ। इसलिए जिस तरह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम 'धनुर्धारी' के नाम से विख्यात हैं, और श्रीकृष्ण 'बंसीवाले' या 'मुरलीधर' के नाम से, एवं गुरु गोविन्दसिंह 'कगली वाले' के नाम से, इसी तरह से कुछ लोग ऋषि दयानन्द को भी 'वेदांवाले संत, स्वामी दिगन्त, जग को जगा दिया तूने'- कहते हुए मस्त होकर गाते हैं। 'वेदां वाले संत' कहने में वही एकांगिता है जो श्रीकृष्ण को केवल 'बंसीवाला' कहने में। क्या श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्रधारी रूप की किस भी रूप में अवहेलना की जा सकती है? पर भक्त सम्प्रदाय ने कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र को भुला कर वृन्दावन को रस और रास की लीलास्थली बना दिया और श्रीकृष्ण को वहीं तक सीमित कर दिया। इसी तरह केवल वेद वेद का नारा लगाने वालों ने भी ऋषि दयानन्द के राष्ट्रीय चेतना वाले स्वरूप को ओझल कर दिया। तभी मुझे यह नारा लगाना पड़ा कि आर्य समाज की दो भुजाएं हैं- एक वेद और दूसरी राष्ट्र। जो केवल एक भुजा की बात करता है वह आर्य समाज को विकलांग बना देना चाहता है। अंग्रेजों के पिट्ठुओं ने और ब्रिटिश सेवा से ऐश्वर्य-सम्पन्न बने लोगों ने ही इस बात पर सबसे अधिक जोर दिया कि आर्यसमाज केवल वेद को मानने वाली एक धार्मिक संस्था है, उसका राष्ट्र या राजनीति से कोई वास्ता नहीं। जितना जितना उसके धार्मिक स्वरूप पर जोर दिया जाता है, उतना उतना मेरे मन में आक्रोश बढ़ता जाता है, क्योंकि राष्ट्रीयता से विहीन धर्म केवल एक सम्प्रदाय बन कर रह जाता है- जिस तरह ईसाईयत या इस्लाम। इसीलिए ईसाईयत या इस्लाम में राष्ट्रवाद का कोई स्थान नहीं है, जबकि वैदिक धर्म में राष्ट्र की उपासना भी धर्म का अंग है, क्योंकि राष्ट्रचेतना ही अन्त में विश्वचेतना का माध्यम बनती है। जिस तरह मैं आत्मचेतना को राष्ट्रचेतना का मूल मानता हूं उसी तरह राष्ट्रचेतना को विश्वचेतना का मूल मानता हूं। इसीलिए मैं 'जयहिन्द' की सीढ़ी के बिना 'जयजगत्' के नारे को हवाई और खोखला मानता हूं। पर आजकल के भक्तों और धार्मिक लोगों को राष्ट्रीय शान्ति की उतनी चिन्ता नहीं, जितनी विश्व शान्ति की है। इसीलिए जहां देखो वहां विश्वशान्ति के नाम पर यज्ञों, कीर्तनों और पूजापाठ की भरमार है। जो अपने सिर पर छत का इन्तजाम नहीं कर सकते, वे 'आकाश बांधूँ पाताल बांधूँ' के कुलाबे मिलाते रहे, इसमें पलायनवादी मानसिक विलास और भक्तजनों के आर्थिक शोषण की पौराणिक परम्परा नहीं तो और क्या है? एक खास बात यह भी ध्यान देने की है कि आर्यसमाज के स्वनामधन्य नेताओं ने जितना राष्ट्रीयता विहीन धार्मिक संस्थावाद पर जोर दिया, आर्य जनता ने उतना नहीं। आर्य जनता सदा राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत रही। और तो और, ये आर्यनेता अपने पुत्रों को भी इस राष्ट्रचेतना से नहीं बचा सके। स्वामी श्रद्धानन्द, महात्मा हंसराज, महाशय कृष्ण, महात्मा आनन्द स्वामी- चारों आर्य नेताओं के पुत्र क्रान्तिकारी बने।

मैं तो यहां तक कहता हूं कि जिस तरह ऋषि दयानन्द ने वेदमन्त्रों के अर्थ किए हैं और सब प्रकार के पाखण्डों, अन्धविश्वासों और सामाजिक कुरीतियों के जनक होने के पौराणिक वेदाभिमानी पण्डितों द्वारा लगाए गए कलंक से मुक्त किया है, उसके पीछे राष्ट्रीय चेतना ही प्रमुख कारण थी। यदि उनके मन में यह राष्ट्रचेतना न होती, तो हो सकता है कि वे वेदों को इस रूप में उपस्थित न करते। क्या ऋषि दयानन्द से पहले किसी भी पूर्ववर्ती भाष्यकार ने वेदमन्त्रों के राष्ट्रपरक औरा राजनीति-परक अर्थ करने का साहस किया है? इसका मूल कारण यही है कि पूर्ववर्ती भाष्यकारों में ऋषि जैसी राष्ट्रचेतना का विकास नहीं हुआ था, वे केवल आत्मचेतना के स्तर तक ही रह गए थे।

जब ऋषिवर सन् 1855 में पहली बार हरिद्वार में कुम्भ के मेले पर गए थे, उससे पहले वे लगभग दस वर्ष तक योगियों, साधुओं, तांत्रिकों और नाना मत मतान्तरों में फंसे सामान्य नागरिकों के सम्पर्क में आए थे और उन्होंने देश की दुर्दशा का निकट से अवलोकन किया था। इसी कारण उनकी आत्मचेतना राष्ट्र चेतना में विकसित होती जा रही थी। मेरे लिए यह प्रश्न गौण है कि सन् 1857 की प्रथम राज्यक्रान्ति में ऋषि ने कोई सक्रिय भाग लिया ही नहीं। मेरे लिए मुख्य यह है कि उनमें जिस सीमा तक राष्ट्रचेतना का परिपाक हुआ था, वह उनको शान्त नहीं बैठने दे सकती थी। उन्होंने 1857 के स्वातन्त्र्य समर में सक्रिय भाग लिया हो या न लिया हो, पर इस पर तो किसी को विवाद नहीं है कि उन्होंने उस राज्यक्रान्ति को अपनी आंखों से विफल होते देखा था और उनकी राष्ट्रचेतना भविष्य में वैसी पराजय के प्रतिकार के लिए उन्हें किसी रचनात्मक दिशा को सोचने के लिए विवश कर रही थी। उसी मानसिक उथल-पुथल के बीच वे सन् 1960 में गुरु विरजानन्द की शरण में मथुरा पहुंचे थे। ('आप्त राष्ट्रपुरुष-ऋषि दयानन्द- मेरी दृष्टि में' से सम्पादित अंश, साभार)

[स्त्रोत- आर्य्य लोक वार्ता : लखनऊ से प्रकाशित वैदिक विचारधारा का हिन्दी मासिक का फरवरी 2019 का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Tuesday, June 4, 2019

प्रस्थानत्रयी और अद्वैतवाद



*🌺प्रस्थानत्रयी और अद्वैतवाद🌺*
✍🏻 लेखक- अमर स्वामी शास्त्रार्थ केसरी
*प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’*

[प्रस्थानत्रयी = (उपनिषद्, वेदान्त दर्शन और गीता)]

श्री शंकराचार्यजी महाराज का मन्तव्य यह है कि ब्रह्म सत्य है। जगत मिथ्या है और ईश्वर तथा जीव एक ही हैं भिन्न-भिन्न नहीं हैं ।

ब्रह्म सत्य है, इस विषय में हमारा श्री शंकराचार्थ्यजी से कुछ भी मतभेद नहीं है, “जगत मिथ्या है'' ऐसा कहना तो प्रत्यक्ष ही मिथ्या है। सम्मुख दीखते हुए सूर्य को कहना कि यह है नहीं। ऐसा कहनेवाले को या तो आँखों का अन्धा कहा जा सकता है या बुद्धि का अन्धा। कोई भी मनुष्य ऐसा कहनेवाले को बुद्धिमान नहीं मानेगा। तो भी इस विषय पर कभी विचार किया जायेगा। इस समय तीसरा जो विषय है ईश्वर और जीव का एक होना। इस पर भी ऐसा विचार नहीं किया जायगा कि ये दोनों एक हैं या नहीं। वैसे 🔥“जीवो ब्रह्मैव नापरः'' जीव ब्रह्म ही है दूसरा नहीं है, यह वाक्य ही स्वयं यह सन्देह उत्पन्न करता है कि यह कुछ नई रचना प्रतीत होती है नहीं तो कहनेवाले को यह कहने की आवश्यकता क्यों नहीं हुई कि- 🔥'जीवो ब्रह्मैव नापर:'। ईश्वर ब्रह्म ही है भिन्न नहीं।

स्पष्ट है कि-सारा जगत यह मानता आ रहा है कि ईश्वर और जीव दो भिन्न-भिन्न सत्ता है, इसीलिये श्री शंकराचार्यजी को यह नया वाक्य अपने नये सिद्धान्त के लिये रचना पड़ा ।

ईश्वर और जीव दो भिन्न-भिन्न सत्ता हैं या दोनों एक ही हैं, इसपर भी कभी फिर विचार करेंगे । आज तो केवल विचार इस विषय पर करना है कि ईश्वर और जीव के एक होने का सिद्धान्त जिन ग्रन्थों के नाम पर पढ़ा गया है उनमें यह है भी कि नहीं। इस सिद्धान्त का नाम अद्वैतवाद है, यह नाम ही अपनी नवीनता का नाम स्वयं द्योतक है इसमें द्वैत का निषेध करनेवालों के विरुद्ध यह नया खण्डनात्मक नाम बनाया गया है।

श्री शंकराचार्यजी ने उपनिषद्, वेदान्त-दर्शन और गीता इनपर भाष्य लिखे हैं वेदो पर नहीं, इन्हीं तीनों के नाम पर इस नवीन मन्तव्य की रचना हुई । इन तीनों के समुदाय का नाम प्रस्थानत्रयी है। आचार्य शंकर ने प्रस्थानत्रयी के अर्थों को तोड़-मरोड़कर इस नवीन मत को जन्म दिया था । मेरा यह दावा है कि अद्वैतवाद का सिद्धान्त प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्, वेदान्त-दर्शन और गीता तीनो) में नहीं है । इसके विपरीत ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनों के भिन्न-भिन्न अस्तित्व का वर्णन है । इस विषय पर मैं एक छोटी-सी पुस्तक लिखूगा जिसमें इन तीनों ग्रंथों में से अनेकानेक प्रमाण इस विषय पर लिखूगा । इस समय इस लेख में थोड़े से प्रमाण नमूने के रूप में लिखता हूँ ।

◼️ *उपनिषद्* - ११ उपनिषदों पर श्री शंकराचार्यजी ने भाष्य किया है उनमें अन्तिम ग्याहरवीं उपनिषद श्वेताश्वतर है उस एक में से पहिले कुछ प्रमाण देता हूँ--

🔥‘‘पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति॥''
श्वेता० अ० १ मंत्र ६
इसमें कहा है कि अपने आप को और सर्व प्रेरक परमेश्वर को पृथक-पृथक जान और मानकर मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है

“पृथक् आत्मानं प्रेरितारं च मत्वा' स्पष्ट शब्द हैं आत्मा को=अपने आपको ‘‘च' और प्रेरिता=सर्वप्रेरक परमेश्वर को ‘‘मत्वा'' मानकर “अमृतत्वम् एति'' अमृतत्व=मुक्ति को ‘‘एति'' प्राप्त होता है।

🔥ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशावजा ह्येका भोक्तृ भोगार्थयुक्ता। अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत्॥
श्वेता० अ० १ मंत्र ९
१. ज्ञानयुक्त सर्वज्ञ है एक अल्पज्ञ है ये दो हैं, एक ईश है। सब का स्वामी है । एक अनीश अर्थात् सेवक है दोनों अजन्मा हैं । एक अजा है जो 🔥‘‘भोक्तृ भोगार्थ युक्ता'' भोगनेवाले जीवात्मा के भोग के अर्थ से युक्त है। इसमें ईश्वर, जीव, प्रकृति तीनों का स्पष्ट वर्णन है।

🔥‘‘क्षरं प्रधानं अमृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः॥''
श्वे० अ० १मं० १०
प्रकृति, जीव, परमात्मा तीन हैं। प्रकृति और आत्मा दोनों को एक देव शासन करता है।

🔥“भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा०'' श्वे० अ० १।१२
१ भोक्ता जीव, २ भोग्य प्रकृति, ३ प्रेरिता परमात्मा।

🔥अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णबह्ली: प्रजा: सृजमानां सरूपाः। अजोत्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनांभुक्तभोगामजोऽन्यः॥
श्वे० अ० ४ मंत्र ५
(लोहित शुक्ल कृष्ण) रजोगुण, सतोगुण, तमोगुण युक्त प्रकृति को अपने ही स्वरूपवाली प्रजा उत्पन्न करनेवाली को जीवात्मा भोगता है और उसमें हीं शयन करता है। परमेश्वर जीव से भोगी हुई को त्यागे रहता है। इसमें भी तीनों कहे हैं।

◼️ *अब वेदान्त दर्शन देखिये*
🔥गुहां प्रविष्टावात्मानौहितद्दर्शनात्। वेदान्त० १।२।१९
हृदय गुहा में दो आत्मा प्रविष्ट हैं, जीवात्मा और परमात्मा। यहां दोनों पृथक्- पृथक् कहे हैं।

◼️ *गीता*
🔥प्रकृति पुरुषं चैव विद्धयनादीउभावपि॥
गीता० १३।१९
प्रकृति और पुरुष इन दोनों को अनादि जान।

यहां प्रकृति और पुरुष दोनों को अनादि कहा, तो जगत मिथ्या न हुआ, क्योकि जगत का कारण प्रकृति अनादि है। पुरुष से अभिप्राय जीव और परमात्मा दोनो है। गीता में पुरुष शब्द का प्रयोग प्रकृति, जीव और परमेश्वर तीनों के लिये हुआ है और तीनों को भिन्न-भिन्न बताया गया है। यथा-गीता अ० १५ श्लोक १६-१७।

🔥द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षाराश्चाक्षर एव च।
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥
🔥उत्तमः पुरुषस्त्वन्य:परमात्मेति उदाहृतः।
यो लोक त्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः॥
इस लोक में दो तो क्षर और अक्षर पुरुष हैं क्षर तो पंचभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी ) अक्षर जीवात्मा है। उत्तम पुरुष जो परमात्मा कहा जाता है वह इन दोनों से अन्य है, तीनों लोकों में व्यापक अविनाशी है और सब का भरण-पोषण करता है। यहां तीनों का पृथक्-पृथक् स्पष्ट वर्णन है। जीवात्मा और परमात्मा दोनों चेतनत्व के कारण एक जाति हैं। अतः दोनों का आत्मा या पुरुष इस एक वचन में भी वर्णन होता है। जीवात्मा असंख्य हैं पर उनकी एक जाति होने से एक वचन में भी वर्णन किया जाता है । यथा-जीवात्मा बहुत हैं -

🔥शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्यपुत्राः। श्वेता० २।५
अमृत=अजर अमर परमेश्वर के सारे पुत्र सुनें। यहां जीवों के लिये बहुवचन का प्रयोग है।

🔥एतद्वितद्विदुरमृतास्ते भवन्ति। श्वे० ३।१
जो इस परमेश्वर को जानते हैं वे अमर हो जाते हैं। स्पष्ट है कि जीवात्मा बहुत हैं।

🔥ईशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति॥ श्वे० ३।७
उस ईश्वर को जानकर वे अमर हो जाते हैं। तीनों प्रमाणों में स्पष्ट है कि जीव बहुत हैं।

*एकवचन में वर्णन* -

🔥नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:॥ गीता २।२३
न इस (जीव) को शस्त्र काटते हैं न इसको सुखाता है। गीता २।२२-२४ भी इसके प्रमाण हैं।

इस छोटे से लेख में थोड़े से प्रमाणों से भलीभांति स्पष्ट और सिद्ध हो गया है कि प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्, वेदान्त दर्शन और गीता) में अद्वैतवाद नहीं है। प्रत्युत स्पष्ट रूप में ईश्वर और जीव दो भिन्न भिन्न सत्ता बताई गई हैं एवं प्रकृति तीसरी पृथक सत्ता कही गई है। इसी प्रकार वेदों में भी अद्वैतवाद (ईश्वर और जीव की एकता) नहीं है। पाठक पढ़े और विचार करें।

✍🏻 लेखक- अमर स्वामी शास्त्रार्थ केसरी (पूर्व नाम - ठाकुर अमर सिंह आर्यपथिक)
*प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’*

॥ ओ३म् ॥

Monday, June 3, 2019

सुधार के दो साधन- ब्रह्म शक्ति व क्षात्र शक्ति



सुधार के दो साधन- ब्रह्म शक्ति व क्षात्र शक्ति

लेखक- पं० गंगा प्रसाद उपाध्याय

हर सुधार के दो मुख्य कारण हैं। एक ब्रह्म-शक्ति और दूसरी क्षात्र शक्ति। अर्थात् जब ब्राह्मण विद्वान् बुरे आचार व्यवहार के दोषों का विस्तार से तथा स्पष्ट रूप से खण्डन करते हैं और उनके उपदेशों का लोगों पर प्रभाव पड़ता है तथा वे सामाजिक अनाचार को छोड़ने के लिए स्वयं उद्यत हो जाते हैं तो एक प्रकार का सामाजिक वातावरण उत्पन्न हो जाता है जिसमें लोगों का अनाचार करने का साहस ही नहीं होता। फिर भी कुछ ऐसे मनचले होते हैं जिनमें नियमोल्लंघन की प्रवृत्तियां होती हैं वे समाज मत की परवाह नहीं करते। उनकी लाठी किसी के माल को छीनने का लिए तैयार रहती है। वे कहा करते हैं कि हम किसी से नहीं डरते। देखें हमारा कोई क्या करेगा? ऐसे लोग बहुत दूषित प्रथाओं को जीवित रखने में सहायता देते हैं। इनके लिए क्षात्र शक्ति अर्थात् सुदृढ़ शासक (राजा) की आवश्यकता होती है कि वह दूसरे लोगों को ऐसे आततायियों के प्रभाव से बचा सकें। इस प्रकार ब्राह्मण और राजा दोनों मिलकर सुधार का काम करते हैं।

भारत के भीषण महायुद्ध के पश्चात् इन दोनों शक्तियों का लगभग नाश हो गया। जो ब्राह्मण शेष रहे वे राजाओं के मुंह ताकते रहते थे। राजे तो 'अन्नदाता' कहलाते थे। जो 'अन्न' के दाता थे वे 'मन' के भी दाता थे। जैसा खाये अन्न, वैसा बने 'मन'। दरिद्र के विचार भी दरिद्र हो जाते हैं। ब्राह्मण विद्वान् शास्त्रों की भी ऐसी व्याख्या कर देते थे कि राजे लोग खुश जो जायें। जब राजों में बहु-पत्नी विवाह की प्रथा पड़ी अर्थात् जब राजे अपनी इन्द्रियों को वश में न रख सकें तो ब्राह्मणों ने शास्त्रों के उपदेशों की भी वैसी ही व्याख्या कर दी, जिसमें राजा साहब को अपनी इच्छापूर्ति का अवसर मिल सके।
यहां हम एक वर्तमान युग के रजा साहब का उल्लेख करते हैं। राजा साहब को शराब पीने की बुरी लत थी। वे शराब के बिना दो घण्टे भी नहीं रह सकते थे। उनके मन में आया कि एकादशी का उपवास रखना चाहिए। परन्तु एकादशी का व्रत और मद्यपान यह तो दो परस्पर विरोधी काम थे। उनका समन्वय कैसे होगा? एक दिन राजा साहब ने पक्का इरादा कर लिया कि व्रत रखेंगे और शराब न पियेंगे। किसी प्रकार दोपहर तक तो काट लिया, जब तीसरा पहर आया तो शराब न पीना उनकी शक्ति से बाहर की बात हो गई, और वे घबराने लगे। अब किया भी क्या जाये? शराब पीते है। तो व्रत का फल नष्ट हो जाता है। नहीं पीते तो जान की जोखों है। अन्त में पुरोहित जी ने आते ही समस्या को सरल कर दिया।
"महाराज! थोड़ी से शराब पी लें परन्तु उसमें कुछ बूंदे गंगाजल की डाल लें।"
पण्डितों को ऐसे चुटकुले बहुत आते थे। यदि किसी राजा का मन किसी सुन्दरी पर लट्टू हो गया तो पण्डित जी कहते- "महाराज! यज्ञ के एक यूप में कई गायें बंध सकती हैं परन्तु एक गाय को कई यूपों में नहीं बांध सकते। इसलिए एक पुरूष कई पत्नियों से विवाह कर सकता है परन्तु एक स्त्री कई पति नहीं कर सकती।"

महाराजा दशरथ भी इसी प्रकार की किसी युक्ति का शिकार हुए होंगे अन्यथा वे कैकेयी से विवाह करके अपनी मृत्यु का स्वयं साधन न बनते।
हम दूसरे मतों तथा देशों में भी ऐसा ही पाते हैं।
इंग्लैंड का राजा था अष्टम हेनरी। उसका बड़ा भाई मर गया था। उसकी स्त्री थी हस्पानियां देश के आरगन प्रदेश के राजा की कन्या कैथरायन। ईसाई धर्म के विधान के अनुसार बड़े भाई की विधवा से विवाह करना निषिद्ध है। परन्तु जब हेनरी सप्तम ने यह इच्छा की कि उसके राजकुमार हेनरी का विवाह उसके बड़े भाई की विधवा से हो जाये तो रोम के पोप से आज्ञा मांगी गई। पोप ने आज्ञा दे दी और कैथरायन अपने देवर हेनरी की वैधानिक पत्नी बन गई, उसका पति (अष्टम हेनरी) के नाम से इंग्लैंड की गद्दी पर बैठ। कैथरायन से एक पुत्री भी उत्पन्न हुई जिसका नाम था मेरी या मेरी ट्यूर। परन्तु मनचले बादशाह का मन एक दिन महाराणी की एक अनुचरी पर आसक्त हो गया। बहुविवाह विधान के विरुद्ध था। किया जाये तो क्या? पादरियों की शरण ली गई। खुशामदी पण्डितों, खुशामदी मौलवियों और खुशामदी पादरियों की न तो हिन्दुओं में कमी है, न मुसलमानों में, न ईसाइयों में। पादरियों ने अकल दौड़ाई और यह निर्णय किया कि बादशाह की पहली शादी कानून के विरुद्ध थी। इसलिए पोप महोदय के हस्तक्षेप के होते हुए भी कैथरायन को तलाक दे दी गई और दूसरी महाराणी जी आ विराजमान हुई।
इसीलिए मैंने ऊपर कहा है कि सुधार के लिए सुदृढ़ ब्राह्मणों और सुदृढ़ क्षत्रियों को आवश्यकता है।

मैंने १९४५ में शहपुराधीश जी के पुस्तकालय में एक पुस्तिका देखी, जिसमें हिन्दू शास्त्रों से बहुत से श्लोक और सूत्र मांस-भक्षण के पक्ष में उद्धृत किये गए थे। पुस्तक बहुत छोटी थी और लेखक की योग्यता की भी परिचायक न थी परन्तु उस पर पांच सौ (५००) का पारितोषिक लेखक को दिया गया था। यह पुस्तक शायद आर्य समाज के उस युग में लिखी गई थी जब आर्य समाज की दो पार्टियां हो गई थीं।
महाभारत के बहुत दिनों बाद तक यद्यपि ब्राह्मण शक्ति और क्षत्रिय शक्ति बहुत निर्बल हो गई थीं और न कोई उपदेष्टा ब्राह्मण रहा न कोई दण्ड देने वाला क्षत्रिय तथापि राजा और प्रजा का धर्म तो एक ही था और उनके शास्त्र भी एक थे।
परन्तु जब ईसाई और मुसलमान आये तो सुधार का काम और कठिन हो गया। शासकों ने हिन्दू धर्म की कुप्रथाओं को धर्म परिवर्तन का एक साधन बना लिया और उन कुप्रथाओं को दूर करने की इसलिए कोशिश की कि लोग उन बुराइयों के दोषों को समझकर धर्म परिवर्तन कर लें (अर्थात् ईसाई या मुसलमान हो जायें।) प्रजा ने इसका विरोध किया कि किसी विधर्मी को हमारे धर्म में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

राजा राममोहन राय ने 'सती' की दूषित प्रथा को जो घोर निर्दयता पूर्ण थी, ईसाई मिशनरियों की सहायता से रुकवाया था, अतः ब्राह्मणों ने बहुत विरोध किया। उनका कहना था कि ईसाई शासकों को हिन्दू धर्म में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। इसके बहुत दिनों पश्चात् श्री रमेशचन्द्र दत्त (आर. सी. दत्त.) ने ऋग्वेद के अध्ययन से यह सिद्ध किया कि जिस वेद मन्त्र के आधार पर "सती प्रथा" (मृत पति के साथ जीवित पत्नी का दाह करना) वेद विहित बताई जाती है उसके पढ़ने में गलती हुई है। 'अग्रे' शब्द (एकार) के स्थान में 'अग्ने' (अकार) पढ़ लिया गया है, अस्तु। यह एक अलग विषय है।
हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि जब राजा और प्रजा के धर्म भिन्न-भिन्न होते हैं और धार्मिक संस्थाएं भी अलग-अलग होती हैं तो सुधार बहुत कठिन हो जाता है।

स्वामी दयानन्द के समय में यही कठिनाई थी। शासक ईसाई और प्रजा हिन्दू। जब बाल विवाह के विरुद्ध आवाज उठी तो पण्डित लोग चिल्लाये कि गवर्नमेंट को हमारे धर्म में हस्तक्षेप करने या हिन्दू ला (कानून) के बदलने का कोई अधिकार नहीं।
प्रायः छोटी लड़कियों का विवाह युवा (बड़ी आयु वालों) लोगों के साथ हो जाता था। दस या नौ साल की लड़की गृहस्थ धर्म पालन का भार नहीं उठा सकती थी। तब हिन्दू ललनाओं का जीवन संकट में था। उसके विरुद्ध सरकार की ओर से कानून बनाया गया, तब महात्मा तिलक जैसे सर्वोत्तम (संभ्रान्त) लोगों ने भी इसका विरोध किया। युक्ति वही थी कि ईसाई सरकार को हमारे धर्म में परिवर्तन करने का अधिकार नहीं।
स्वामी दयानन्द ने इस समस्या का एक नया समाधान निकाला, कि यदि कोई प्रथा वैदिक शास्त्रों के विरुद्ध है तो या तो पण्डित लोग इसका सुधार अपने हाथ में लें, अन्यथा हम इस दूषित प्रथा को बन्द करने में सरकार की सहायता लेने में संकोच न करेंगे।

सन् १८५६ ई. में ईसाई शासन की सहायता से श्री पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की कोशिश से विधवा पुनर्विवाह का कानून पास हो गया परन्तु यह कानून अलमारियों में पड़ा सड़ता रहा। जब इस प्रश्न को आर्य समाज ने अपने हाथ में लिया तो देश की काया पलट दी।
आर्यसमाजियों का कहना है कि हम यह स्वीकार करते हैं कि सुधार का मुख्य कर्त्तव्य तो ब्राह्मणों का है, सर्वसाधारण की मनोवृत्ति को यही बदल सकते हैं परन्तु यदि ब्राह्मण मन्द हो जायें या लकीर के फकीर हो जायें या स्वयं सुधार का उत्तरदायित्व अपने सिर पर न लें तो कुमार्ग पर चलती हुई पथभ्रष्ट जनता को उसके भाग्य पर नहीं छोड़ देना चाहिए। सरकार की सहायता भी लेनी चाहिए।
उद्देश्य है सुधार! सुधार में दोनों शक्तियों अर्थात् ब्रह्म-शक्ति और क्षात्रशक्ति की आवश्यकता है। आर्य समाज ने कई बार सुधार के विषय में सरकार से मदद ली है।

बाल-विवाह के विरुद्ध कानून पास कराने का श्रेय है श्री हरविलास शारदा को जो आर्य समाज के एक प्रतिष्ठित नेता थे, और जिनके नाम पर इस कानून को शारदा एक्ट कहते हैं।
जन्म-मूलक जाति-पांति तोड़कर विवाह करने के सम्बन्ध में जो एक्ट (कानून) पास हुआ और जिसको आर्य समाज विवाह एक्ट कहते हैं उसको पास कराने वाले श्री घनश्याम सिंह जी गुप्त थे जो ४० वर्ष से अधिक समय से अब तक आर्य समाज का नेतृत्व कर रहे हैं।

स्वामी दयानन्द का सुधार कार्य केवल भारतवर्ष तक सीमित नहीं है। आर्य समाज एक सार्वभौमिक संस्था है। संसार का उपकार करना अर्थात् आध्यात्मिक, शारीरिक, आचार तथा अर्थ सम्बन्धी उन्नति करना उसका ध्येय है।

महाभारत के पश्चात् इन पांच हजार सालों में जो बुराइयां भारतवर्ष या दूसरे देशों में फैल गईं और जिनके कारण समस्त मानव जाति असत्य मार्ग पर चल पड़ी उन बुराइयों को दूर करने का प्रोग्राम स्वामी दयानन्द ने संसार के समक्ष रखा है। यदि आर्य समाज के लोग श्रद्धा, सुदृढ़ गति और ऋजुता के साथ आगे बढ़ेंगे तो पक्की आशा है कि हम वैदिक धर्म के उस युग को ला सकें जो महाभारत से बहुत पूर्व विद्यमान था।

यही आस अटक्यो रहे, अलि गुलाब के मूल।
अयि है बहुरि वसन्त ऋतु, इन डारन बहु फूल।।

[स्त्रोत- वैदिक सार्वदेशिक : सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली का साप्ताहिक मुख-पत्र का ३० मई से ५ जून, २०१९ का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

भारत में प्रचलित सेक्युलरवाद के घातक परिणाम



भारत में प्रचलित सेक्युलरवाद के घातक परिणाम
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पिछले कुछ वर्षों से भारत के सार्वजनिक जीवन से अब प्रचलित सेक्यूलरिज्म खारिज होता जा रहा है। हिन्दू समाज के लिए घातक इस अवधारणा के परिणामों और अनुभवों को लोग समझने लगे हैं। वास्तव में सेक्यूलरिज्म तो यूरोप की विशिष्ट सामाजिक, राजनैतिक उपज थी, जो भारत के संदर्भ में एक मायने में अर्थहीन है, साथ ही नुकसानदेह भी। इसलिए जिन्हें सेक्युलरवाद और सेकुलरवादियों के कमजोर होने की समीक्षा करनी हो, उन्हें मुख्य मुद्दे पर आना चाहिए। 

वास्तविकता यह है कि हिन्दू धर्म-चिंतन-समाज अपने स्वभाव से ही लौकिक जीवन में सेक्यूलर है, जबकि ईसाईयत और इस्लाम अपनी बुनियाद में ही सेकुलरिज्म-विरोधी है। जहां तक इस्लाम का सवाल है, मुस्लिम देशों या समाजों में सेकुलरिज्म का कोई स्थान नहीं। उनके बीच सेक्युलर के लिए शब्द है: ला-दीनी, यानी मजहब विरूद्ध। तब यहां सेकुलरिज्म की फिक्र करने वाले या तो नाटक कर रहे या घोर अज्ञान में डूबे हैं। जिस तरह यहां दशकों से बड़े-बड़े लेखकों, पत्रकारों, एक्टिविस्टों, राजनीतिक दलों, आदि द्वारा सेकुलरिज्म के नाम पर ऊट-पटांग कारनामे होते रहे है, वह या तो नाटक है या अज्ञान। वे यह मोटी बात का जानबूझकर अनदेखा करते रहे कि भारतवर्ष में सनातन धर्म के लंबे इतिहास में धर्म के नाम पर कभी रक्तपात नहीं हुआ। किंतु जबसे हमने सेक्यूलरवाद की धारणा उधार ली तब से हमारी समस्याओं का अंत नहीं है।

इतिहासकार-चिंतक स्व. सीताराम गोयल ने बिल्कुील ठीक कहा था कि जिन धारणाओं की पृष्ठ‍भूमि और इतिहास नितांत भिन्न हैं, उन की अंधी नकल करके हमने अपनी संस्कृति को घायल और भ्रष्ट ही किया है। यहाँ प्रचलित सेकुलरिज्म हिन्दू समाज के लिए घातक रहा है। इसे अब आम जनता ने समझ लिया है, पर जब तक बुद्धिजीवी भी इसे नहीं समझते, भारत पर स्थाई संकट बना रहेगा।

भारत के लिए सेकुलरिज्म अनावश्यक नारा था, जिसका आसानी से दुरुपयोग हुआ है। यूरोप में चौथी शताब्दी‍ से लगभग हजार साल तक ईसाई चर्च और राज्य के बीच घनिष्ठ संबंध था। चर्च और राज्य मिलकर व्यक्ति के इहलोक और परलोक पर तानाशाही चलाते थे। चर्च के कुपित होने पर व्यक्ति को जिंदा जलाने तक की यंत्रणा दी जाती थी। यूरोपीय राजा मानते थे कि राज्य केवल चर्च की सेवा के लिए है। जब तक यूरोप में ऐसे लोग बचे रहे जिन्हें ईसाइयत में धर्मांतरित कराना शेष था, तब तक चर्च और राज्य का गठजोड़ चलता रहा। ईसाइयत फैलाने के नाम पर राजाओं को चर्च का समर्थन मिला रहा। किंतु पंद्रहवीं शताब्दी तक पूरा यूरोप ईसाई हो चुका था। राजाओं को अपनी सत्ता के लिए चर्च के सहयोग की विशेष आवश्याकता नहीं रही। उल्टे‍ राज्य में चर्च के हस्तहक्षेप से अब उन्हें और कठिनाई होने लगी। फिर सोलहवीं शताब्दी में चर्च की मनमानियों के विरुद्ध यूरोप में विद्रोह होने लगे और ईसाइयत कई गुटों में बंट गई। विभिन्न राजाओं ने एक गुट के साथ जुड़कर दूसरे गुटों को दबाना आरंभ किया। इस तरह रिलीजन के नाम पर विभिन्न देशों में लड़ाइयां शुरू हो गईं। किंतु सौभाग्य से तभी यूरोप के अनेक चिंतक ग्रीस, चीन और भारत जैसी संस्कृतियों की ज्ञान-संपदा के संपर्क में आए। इससे उन्हें मानवीयता और बौद्धिकता के नए सार्वभौमिक विचार मिले। उसी प्रभाव में उन्होंने ईसाई कट्टरता और जड़ मान्यताओं के विरुद्ध वैचारिक विद्रोह का सूत्रपात किया। युरोप में ‘रेनेसां’ (नवजागरण) का आंदोलन उसी की अभिव्यक्ति थीं। ईसाइ मत की अधिकांश मान्याताओं में स्वतंत्र बुद्धि-विवेक से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने की सामर्थ्य‍ कभी न थी। इसीलिए जल्द ही उसकी कट्टर मतवादिता को मैदान छोड़ना पड़ा। उन्नीसवीं शताब्दी तक वह स्थिति आ गई जब यूरोप के राज्य चर्च के दबदबे से मुक्त हो गए। अब राज्य का कार्य यह न रहा कि प्रजा के परलोक का भी जबरदस्ती  ध्यान रखे। यह व्यक्ति के निजी विश्वास में बदल गया। इसे ही राज्य का "सेक्यूलर" बन जाना कहा गया।

अब सरलता से समझ में आ सकता है कि स्वतंत्र भारत में "सेकुलरिज्म" का क्या अनर्थ किया गया है। स्वाधीनता आंदोलन के संपूर्ण काल में हमारे किसी चिंतक या नेता ही नहीं, वरन किसी सामाजिक, राजनीतिक संगठन के प्रस्ताव या लक्ष्य में भी ‘सेकुलरिज्मि’ शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। फिर कैसे एकाएक स्वतंत्र भारत में वही "सेकुलर" शब्द राष्ट्रीय संविधान के ऊपर भी एक तरह का सुपर-विधान बन बैठा? यह निश्चित रूप से भीतरघात था, भारतीय जनता पर एक अदृश्य व विदेशी शासन का औजार। इतिहासकार सीताराम गोयल ने चेतावनी दी थी कि इस घातक प्रक्रिया और इसके परिणामों का निहितार्थ हिन्दू  समाज अभी तक नहीं समझ पाया है। उनकी चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहि‍ए, वरना हम उस विषैले मकड़जाल से मुक्त नहीं हो सकते जो भारतीय सभ्यता के विनाश का लक्ष्य रखता है।

किंतु स्वतंत्र भारत के दुर्भाग्य से नितांत विपरीत घटित हुआ। उलेमा और मिशनरी वर्ग, जिन्होंने सदैव भारतीय धर्म, सभ्यता और संस्कृति के प्रति घोर शत्रुता दिखाई है, उन्होंंने अब दुष्प्रचार आरंभ किया कि स्वतंत्र भारत में ईसाई और इस्लामी समुदाय की संस्कृति को बहुसंख्यक हिन्‍दुओं से खतरा है। इसलिए राज्यों को उनकी रक्षा के उपाय, अर्थात विशेष सुविधाएं देनी चाहिए। यह "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" जैसी बात थी। जिस उलेमा और‍ मिशनरी वर्ग ने सदियों से हिन्दू जनता पर राज्यसत्ताओं के प्रयोग से हर तरह के अत्याचार किए, जिसका संपूर्ण रिकॉर्ड उनके अपने साहित्य में उपलब्ध है, वही अपने को "पीडि़त" बता रहा है।

यह छल कई कारणों से सफल हुआ, जिसमें नेहरूवाद का हिन्दू-विरोधी दुराग्रह मुख्य कारण था। दूसरे यह भी कि हिन्दु‍ओं ने बाहरी विस्तारवादी कट्टर विचारधाराओं, मजहबों का अध्ययन-मनन करके जनता को उनके प्रति सचेत करने का कर्तव्य नहीं किया। इसीलिए दुष्टतापूर्ण विचारों को भी आदरणीय समझने की भूल दुहराई जाती रही। इस प्रकार, मजहबी अत्याचारियों से सदियों संघर्ष करके भी हिन्दू समाज उन अत्याचारों के स्रोत से अनभिज्ञ पड़ा रहा। उसी अज्ञानता में स्वतंत्र भारत के नौसिखिये सत्ताधीश मुल्ले और मिशनरियों की हर एक बात मानते चले रहे। तबलीगियों और मिशनरियों को अपनी साम्राज्यवा‍दी विचारधारा का प्रचार करने की छूट और विशेष सुविधाएं तक दे दी गई, जबकि हिन्दुओं को वंचित कर, सनातन धर्म-चेतना से शिक्षा व रीति-नीति बनाने से रोक दिया गया। इसी नीति को "सेकुलरिज्म" का नाम दिया गया। होना यह चाहिए था कि उन स्वघोषित विस्तारवादी, छल-बल-प्रपंच से धर्मांतरण कराने वाली साम्राज्यवादी विचारधाराओं से हिन्दू समाज को अब सुरक्षा दी जाती जो सदियों बाद मुक्त हुआ था। किंतु इसके विपरीत, एक बार फिर भारत भूमि में, हिन्दू सत्ताधीशों के राज में, सनातन धर्म को ही उन शिकारी विचारधाराओं के समक्ष असहाय छोड़ दिया गया। यह कितनी बड़ी विडंबना और मूर्खता थी!!

एक ओर आक्रामक मजहब और दूसरी ओर सनातन धर्म के प्रति जो तटस्थ नीति स्वतंत्र भारत की सत्ता‍ ने अपनाई, वह सेकुलरिज्म भी न था। यह बाघ और गाय के बीच तटस्थता थी, जिसमें कश्मीरी हिन्दुओं का विनाश पहली बलि है।

भारत में प्रचलित इस सेक्युलरवाद के घातक अनुभवों और परिणामों के बावजूद भारत के हिन्दू नेताओं, चिंतकों ने सही निष्कर्ष नहीं निकाला। उन्होंने विस्तारवादी विचारधाराओं का चरित्र, स्वभाव ठीक से समझ कर अपने कर्तव्य निर्धारित नहीं किए। स्वधर्म में संतुष्ट रहते उन्होंने कभी पर-धर्म को गहराई से समझने का यत्न नहीं किया। कश्मीर से हिन्दुओं का विनाश और आज बंगाल, केरल, असम आदि में भी उसी दिशा की झलक इसी का परिणाम है। इसलिए भारत में प्रचलित सेकुलरवाद हिन्दू संस्कृति के प्रति स्थाई शत्रुभाव से भरी आक्रामक विचारधाराओं को प्रोत्साहन देने के सिवा कुछ नहीं कर रहा है। ऐसे सेकुलरवाद से छुटकारा पाना हिन्दू समाज का प्रधान कर्तव्य होना चाहिए।