Sunday, July 1, 2018

रजनीश ओशो मत खण्डन



।।*रजनीश (ओशो ) मत खण्डन* ।।
लेखक - *हिमांशु आर्य*

*ओशो वैदिक धर्म और मत - सम्प्रदाय विषय को जानने में अक्षम रहा*

*ओशो सारी बुराइयों का जड़ धर्म , संस्कृति और ऋषियों को मानता है , और सेक्स की शक्ति को ही परमात्मा की शक्ति मानता है ।*

ओशो कहता है ,
" यह जो मनुष्य जाति इतनी कामुक दिखाई पड़ती है , इसके पीछे धर्म और संस्कृति का बुनियादी हाथ है । इसके पीछे बुरे लोगों की नही , सज्जनों और सन्तो का हाथ है । और जब तक मनुष्य जाति सज्जनों और सन्तो के अनाचार से मुक्त नही होगी तब तक प्रेम के विकास की कोई संभावना नही है । ( परमात्मा की सृजन ऊर्जा 3 पृष्ठ 6)
समीक्षा - ओशो ने वैदिक ऋषियों और आर्ष ग्रन्थों को अध्ययन के बिना ही गलत ठहराया दिया है ।
वैदिक ग्रन्थों और ऋषियों के अनुसार धर्म के निम्न लक्षण है ,
*धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।। (मनुस्मृति ६.९२)*
अर्थ – धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना उपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्मं में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मो से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना ) ।
अब कुछ प्रश्न उठते है , जिसपर बुद्धिजीवी विचार करे ।
(1) *क्या दया , क्षमा , पवित्रता , सत्य बोलना , अक्रोध आदि सद्गुण प्रेम और आनन्द में बाधक हो सकते है ?*
(2) *जो सत्यभाषण और सदाचार करने वाले ऋषियों, सन्तो और मत - सम्प्रदाय के पाखंडियों मे अंतर न कर पावे उसे अज्ञानी समझ कर अनुकरण ही क्यो किया जाये ।*
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*ओशो जीव , ईश्वर और प्रकृति की स्वतंत्रता और ईश्वर के निर्विकार और न्यायप्रिय गुणों के जानने में अक्षम रहा ।*
ओशो कहता है ,
" धर्म ने मनुष्य जाति के ऊपर दुर्भाग्य की भांति छाया हुआ है , उस धर्म ने मनुष्य के जीवन से प्रेम के सारे द्वार बंद कर दिए है । ( परमात्मा की सृजन पृष्ठ 3)
दस हज़ार वर्ष में संस्कृति के जो बीज बोए गए है , वह आदमी उसका फल है , और घृणा से भरा हुआ है । लेकिन उसी की दुहाई दिए चले जा रहे है ।" (परमात्मा सृजन पृष्ठ 4)

समीक्षा : - ऐसी बाते विद्वान के नही हो सकते क्योंकि सृष्टि आरम्भ में दयालु ईश्वर ने वेदो के रूप में ज्ञान दिया । ईश्वर मनुष्यो के कर्मो और व्यवहार में निरपेक्ष (absolute) रहता है ,ऐसा न होता तो ईश्वर में ही दोष आता । अतः ईश्वर मनुष्यो के कर्मो में उसको स्वतन्त्र रखता है , ऐसे निर्विकार ईश्वर केवल न्याय करता मनुष्य के कर्मों का , सृष्टि रचता इस प्रकार वह मनुष्यों के कार्यो में हस्तक्षेप नही करता ।
इस प्रकार ओशो साहब का कहना कि आज का इन्सान उस वृक्ष का फल है जो हज़ारो साल पहले बीज बोए गए , यह पूर्णरूपेण मिथ्या है । किसी फल (आज के दोषयुक्त मनुष्य) का परिणाम बीज ( परमेश्वर प्रदत्त व्यवस्था)की गुणवत्ता न होकर अन्य वातावरणीय व्यवस्थाएं पानी , खाद ,किट पतंगों से बचाव ( सत्य - सद्गुणों के ग्रहण और असत्य - अवगुण अन्य दोषादि से मुक़्ति ) जैसे कारक जिम्मेदार है ।

अतः ओशो साहब का यह कहना कि सैकड़ो वर्ष पूर्व परमात्मा और ऋषियों प्रदत्त ज्ञान ही घृणा का कारण है तो यह बात पूर्वाग्रह और तर्कहीन दिखती है ।
ओशो साहब का यह भी कहना मिथ्या है कि सज्जन और सन्त धर्म के की दुहाई देते है ,
दुहाई तो मत वाले लोग देते है , जो सत्य और तर्क के आभाव में दिन रात रमते है , चेला - चेली बनाते है ।
जो जीवन को परोपकार और मानवजाति के हित में स्वयम को होम कर देते है , जो स्वयं को अनादि जीव की समझते है , वे धर्म की दुहाई क्यो देते भला ? जबकि
धर्म तो श्रेष्ठ गुणों को धारण करने का नाम है ।
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*प्रेम और काम विषय की गूढ़ता को जानने में असफल रहेे ओशो*
ओशो कहता है ,
"सेक्स की शक्ति ही , काम की शक्ति ही प्रेम बनती है । काम से लड़ना नही काम से मैत्री स्थापित करना करना है , और काम की धारा को उचाईयो तक ले जाना है ।
काम का विरोध करना ही कामुकता का कारण है ।"
" जब तक काम के निसर्ग के परिपूर्ण आत्मा से स्वीकृति नही मिल जाती है , तब तक कोई किसी को प्रेम नही कर सकता । मैं 
आप से कहना चाहता हूँ , कि काम दिव्य है , डिवाइन है ।
*सेक्स की शक्ति ही परमात्मा की शक्ति है । ईश्वर की शक्ति है ।*
" मनुष्य की सारी संस्कृतियों ने सेक्स का , काम का वासना का विरोध किया है । इस विरोध ने मनुष्य के भीतर प्रेम के जन्म की संभावना तोड़ दी है नष्ट कर दी है , इस निषेध ने ... क्योकि सच्चाई ये है कि प्रेम की सारी यात्रा का प्राथमिक बिंदु काम है ।
समीक्षा - वैदिक ग्रन्थों के अनुसार ,
मनुष्य के लिये वेदों में चार पुरुषार्थों का नाम लिया गया है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
काम’ का मतलब सेक्स नही है , जैसा कि ओशो साहब सोचते है । काम का अर्थ है ,अपनी सम्यक आवश्यकताओं की पूर्ति करना। ‘धर्म’ है- वेद के अनुसार आचरण करना। ‘अर्थ’ है- वेदानुसार आचरण करके
धनादि प्राप्त करना यानि ईमानदारी और मेहनत से धन कमाना।’ और उससे खाना-पीना, रोटी-कपड़ा, मकान आदि का प्रबंध करना ‘काम’ है। जब धर्म, अर्थ और काम, ये तीनों चीजें सिद्ध ( हो जायेंगी, तब उसके बाद ही ‘मोक्ष’ मिलेगा। जो व्यक्ति ‘धर्म’ का आचरण नहीं करता, वो ‘अर्थ’ नहीं प्राप्त कर सकता, वो काम की पूर्ति भी नहीं कर सकता और उसको ‘मोक्ष’ भी नहीं मिल पायेगा। जो ये तीन ठीक कर लेगा, उसका मोक्ष भी हो जायेगा।

ओशो साहब के वचनों से यह बात तो सिद्ध है कि उन्होंने वेद , उपनिषद सहित अन्य आर्ष ग्रन्थों का तिनका भी अध्ययन न किया जीवनपर्यंत । केवल चेला - चेली बनाने और कहानियों में उलझाने के सिवाय उन्होंने कुछ भी न किया , इसमें वह काफी हद तक सफल भी हुए ।
वेदो ने काम का कभी विरोध नही किया क्योकि काम का सन्दर्भ प्रजा बढाने के निमित्त व्यवस्था के रूप में भी स्पष्ट आदेश भी वेदो ने किया है ,
*इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्रानाधेहि पतिमेकादशं कृधि॥*
—ऋ॰ मं॰ 10। सू॰ 85। मं॰ 45॥
हे (मीढ्व इन्द्र) वीर्य सेचन में समर्थ ऐश्वर्ययुक्त पुरुष! तू इस विवाहित स्त्री वा विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ सन्तान और सौभाग्ययुक्त कर। इस विवाहित स्त्री में दश सन्तान उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान! हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष वा नियुक्त पुरुषों से दश सन्तान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ। इस वेद की आज्ञा से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यवर्णस्थ स्त्री और पुरुष दश-दश सन्तान से अधिक उत्पन्न न करें। क्योंकि अधिक करने से सन्तान निर्बल, निर्बुद्धि, अल्पायु होते हैं और स्त्री तथा पुरुष भी निर्बल, अल्पायु और रोगी होकर वृद्धावस्था में बहुत से दुःख पाते हैं।
वैदिक व्यवस्था में काम प्रजा बढाने के सन्दर्भ में उचित है । लम्पटता , वासना , व्यभिचार के पशु प्रवृत्ति से दूर रहने का आदेश दिया है ।
पुरुषार्थ का सम्बन्ध चार आश्रमों से है। प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम, दूसरा गार्हस्थ्य आश्रम तीसरा वानप्रस्थ एवं चौथा सन्यास मोक्ष का अधिष्ठान है। इस तरह सदाचार और सत्यभाषण आदि सदगुणों वाली यह जीवन यात्रा एक बहते हुए नदी के समान है , जिससे इस व्यवस्था में दोष नही आता ।

*ओशो कहता है कि सेक्स (काम) को रोकना ही सेंसुअलिटी (कामवासना) का कारण है ।*

जबकि कामाग्नि कभी न बुझने वाली आग है । अतः इस वासना से बद्ध होकर पुनः कैसी स्वतंत्रता हो सकती है भला ?
ऐसे ओशो के विचारों में भी बड़े विरोधाभास दिखते एक तरफ तो वह सेक्स के निरोध को बन्धन कहता , और काम को परमेश्वर कहके स्वतंत्र यौनाचार के बंधन में लोगो को बांधने का उपदेश भी करता ??
क्या एक बार खूब मिष्ठान आदि खा लेने से पुनः मिष्ठान खाने की इच्छा जागृत नही होती ?

अतः योगियों के लिए यह आवश्यक है कि वह चित्त की इन वृत्तियों का निरोध करे ,वेद सम्मत अष्टांग पतजंलि सोपान के माध्यम से क्रमशः 8 सोपानों से होता हुआ योगी कैवल्य को प्राप्त हो ।

ऋषि पतंजलि ने कहा
*योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः* अर्थात
चित्त की वृत्तियो का निरोध (रोकना) को ही योग कहा जाता है ।
*तदा द्रष्टुः स्वरूप्येअवस्थानम् ।।*
(जब चित्त की वृत्तियों का निरोध हो जाता है तब द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है , अर्थात वह कैवल्य को प्राप्त हो जाता है ।)
चित्त की वृत्तियां - अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष , अभिनिवेश ।
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः॥1॥
अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्॥2॥
अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या॥3॥
दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता॥4॥
सुखानुशयी रागः॥5॥ दुःखानुशयी द्वेषः॥6॥
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः॥7॥
-अ॰ 1। पा॰ 2। सू॰ 3।4।5।6।7।8।9॥

इस प्रकार परमेश्वर की उपासना करके, अविद्या आदि क्लेश तथा अधर्म्माचरण आदि दुष्ट गुणों को निवारण करके, शुद्ध विज्ञान और धर्मादि शुभ गुणों के आचरण से आत्मा की उन्नति करके, जीव मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। अब इस विषय में प्रथम योगशास्त्र का प्रमाण लिखते हैं। पूर्व लिखी हुई चित्त की पांच वृत्तियों को यथावत् रोकने और मोक्ष के साधन में सब दिन प्रवृत्त रहने से, नीचे लिखे हुए पांच क्लेश नष्ट हो जाते हैं। वे क्लेश ये हैं-
(अविद्या॰) एक (अविद्या) दूसरा (अस्मिता) तीसरा (राग) चौथा (द्वेष) और पांचवां (अभिनिवेश)॥1॥
(अविद्याक्षेत्र॰) उन में से अस्मितादि चार क्लेशों और मिथ्याभाषणादि दोषों की माता अविद्या है, जो कि मूढ़ जीवों को अन्धकार में फंसा के जन्ममरणादि दुःखसागर में सदा डुबाती है। परन्तु जब विद्वान् और धर्मात्मा उपासकों की सत्यविद्या से अविद्या विच्छिन्न अर्थात् छिन्नभिन्न होके (प्रसुप्ततनु) नष्ट हो जाती है, तब वे जीव मुक्ति को प्राप्त हो जाते हैं॥2॥
अविद्या के लक्षण ये हैं-(अनित्या॰) अनित्य अर्थात् कार्य जो शरीर आदि स्थूल पदार्थ तथा लोकलोकान्तर में नित्यबुद्धि; तथा जो (नित्य) अर्थात् ईश्वर, जीव, जगत् का कारण, क्रिया क्रियावान्, गुण गुणी और धर्म धर्मी हैं, इन नित्य पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध है, इन में अनित्यबुद्धि का होना, यह अविद्या का प्रथम भाग है।
तथा (अशुचि) मल मूत्र आदि के समुदाय दुर्गन्धरूप मल से परिपूर्ण शरीर में पवित्रबुद्धि का करना तथा तलाब, बावरी, कुण्ड, कूंआ और नदी आदि में तीर्थ और पाप छुड़ाने की बुद्धि करना और उन का चरणामृत पीना; एकादशी आदि मिथ्या व्रतों में भूख प्यास आदि दुःखों का सहना; स्पर्श इन्द्रिय के भोग में अत्यन्त प्रीति करना इत्यादि अशुद्ध पदार्थों को शुद्ध मानना और सत्यविद्या, सत्यभाषण, धर्म, सत्सङ्ग, परमेश्वर की उपासना, जितेन्द्रियता, सर्वोपकार करना, सब से प्रेमभाव से वर्त्तना आदि शुद्धव्यवहार और पदार्थों में अपवित्र बुद्धि करना, यह अविद्या का दूसरा भाग है।
तथा दुःख में सुखबुद्धि अर्थात् विषयतृष्णा, काम, क्रोध, लोभ, मोह, शोक, ईर्ष्या, द्वेष आदि दुःखरूप व्यवहारों में सुख मिलने की आशा करना, जितेन्द्रियता, निष्काम, शम, सन्तोष, विवेक, प्रसन्नता, प्रेम, मित्रता आदि सुखरूप व्यवहारों में दुःखबुद्धि का करना, यह अविद्या का तीसरा भाग है।
इसी प्रकार अनात्मा में आत्मबुद्धि अर्थात् जड़ में चेतनभावना और चेतन में जड़भावना करना अविद्या का चतुर्थ भाग है। यह चार प्रकार की अविद्या संसार के अज्ञानी जीवों को बन्धन का हेतु होके उन को सदा नचाती रहती है। परन्तु विद्या अर्थात् पूर्वोक्त अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मा में अनित्य, अपवित्रता, दुःख और अनात्मबुद्धि का होना तथा नित्य, शुचि, सुख और आत्मा में नित्य, पवित्रता, सुख और आत्मबुद्धि करना यह चार प्रकार की विद्या है। जब विद्या से अविद्या की निवृत्ति होती है, तब बन्धन से छूट के जीव मुक्ति को प्राप्त होता है॥3॥
(दृग्दर्शन॰) दूसरा क्लेश अस्मिता कहाता है अर्थात् जीव और बुद्धि को मिले के समान देखना; अभिमान और अहङ्कार से अपने को बड़ा समझना इत्यादि व्यवहार को अस्मिता जानना। जब सम्यक् विज्ञान से अभिमान आदि के नाश होने से इस की निवृत्ति हो जाती है, तब गुणों के ग्रहण में रुचि होती है॥4॥
तीसरा (सुखानु॰) राग, अर्थात् जो जो सुख संसार में साक्षात् भोगने में आते हैं, उन के संस्कार की स्मृति से जो तृष्णा के लोभसागर में बहना है इस का नाम राग है। जब ऐसा ज्ञान मनुष्य को होता है कि सब संयोग, वियोग, संयोगवियोगान्त हैं अर्थात् वियोग के अन्त में संयोग और संयोग के अन्त में वियोग तथा वृद्धि के अन्त में क्षय और क्षय के अन्त में वृद्धि होती है, तब इस की निवृत्ति हो जाती है॥5॥
(दुःखानु॰) चौथा द्वेष कहाता है अर्थात् जिस अर्थ का पूर्व अनुभव किया गया हो उस पर और उसके साधनों पर सदा क्रोधबुद्धि होना। इस की निवृत्ति भी राग की निवृत्ति से ही होती है॥6॥
(स्वरसवा॰) पांचवां (अभिनिवेश) क्लेश है, जो सब प्राणियों को नित्य आशा होती है कि हम सदैव शरीर के साथ बने रहें अर्थात् कभी मरें नहीं, सो पूर्व जन्म के अनुभव से होती है। और इस से पूर्व जन्म भी सिद्ध होता है। क्योंकि छोटे-छोटे कृमि चींटी आदि जीवों को भी मरण का भय बराबर बना रहता है। इसी से इस क्लेश को अभिनिवेश कहते हैं। जो कि विद्वान् मूर्ख तथा क्षुद्रजन्तुओं में भी बराबर दीख पड़ता है। इस क्लेश की निवृत्ति उस समय होगी कि जब जीव, परमेश्वर और प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण को नित्य और कार्यद्रव्य के संयोग वियोग को अनित्य जान लेगा। इन क्लेशों की शान्ति से जीवों को मोक्षसुख की प्राप्ति होती है॥7॥
(तदभावात्॰) अर्थात् जब अविद्यादि क्लेश दूर होके विद्यादि शुभ गुण प्राप्त होते हैं, तब जीव सब बन्धनों और दुःखों से छूट के मुक्ति को प्राप्त हो जाता है॥8॥
(तद्वैराग्या॰) अर्थात् शोकरहित आदि सिद्धि से भी विरक्त होके सब क्लेशों और दोषों का बीज जो अविद्या है, उस के नाश करने के लिए यथावत् प्रयत्न करे, क्योंकि उस के नाश के विना मोक्ष कभी नहीं हो सकता॥9॥
तथा (सत्त्वपुरुष॰) अर्थात् सत्त्व जो बुद्धि, पुरुष जो जीव, इन दोनों की शुद्धि से मुक्ति होती है, अन्यथा नहीं॥10॥
(तदा विवेक॰) जब सब दोषों से अलग होके ज्ञान की ओर आत्मा झुकता है, तब कैवल्य मोक्ष धर्म के संस्कार से चित्त परिपूर्ण हो जाता है, तभी जीव को मोक्ष प्राप्त होता है। क्योंकि जब तक बन्धन के कामों में जीव फंसता जाता है, तब तक उस को मुक्ति प्राप्त होना असम्भव है॥11॥
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*ओशो सयंम , अनुशासन आदि वैज्ञानिक व्यवस्थाओं को समझने में असफल रहा*
*ओशो कहता है कि* ,
"सयंमी व्यक्ति बड़े खतरनाक होते है , क्योकि उनके भीतर ज्वालामुखी उबल रहा है , ऊपर से वह सयम साधे हुए है । क्योकि उसके विश्राम का वक्त आएगा । चौबीस घण्टे में कभी तो उसे शिथिल होना ही पड़ेगा । उसी बीच उसके मन मे दुनिया भर के पाप खड़े हो जाएंगे । नरक सामने आ जायेगा ।*
समीक्षा - देखिये ओशो साहब साहब की लीला जब सदाचारी और योगी न बन पाए तो साइकोलॉजिस्ट बन गए ।
संयमी व्यक्ति के भीतर किसी भी वृत्ति की ज्वालामुखी उबलना असम्भव है क्योकि वह क्रमशः सोपानों से चढ़ते (यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान ,समाधि ) है । वह एकदम से चित्त की वृत्ति नही कर लेते वह निरन्तर एकाग्रचित्त और शांत मन से निरन्तर अभ्यास करते है , ततपश्चात अगले सोपान की ओर बढ़ते है ।
पातंजलि सूत्र के अनुसार ,
*अभ्यास वैराग्याभ्याम तननिरोधः*
अर्थात चित्त की वृत्तियों का सर्वथा निरोध करने के लिए दो विधियां है , अभ्यास और वैराग्य ।।
इस तरह विभिन्न वृत्तियों को त्याग करते हुए वह अगले यौगिक सोपान पर चढ़ते है , और उस वृत्ति में पुनः नही रमते , जिस प्रकार मट्ठे को मथकर निकाला हुआ नवनीत पुनः मट्ठे में लाखों यत्नो के बाद भी नही मिल सकता ।
किसी विद्यालय में पढ़ने वाला छात्र विभिन्न विषयों में निपुणता हासिल करके ही अगले कक्षा को पहुचता , सफलता उपरांत वह अगली कक्षा से पुनः पूर्व की कक्षा में वापस नही आता ।
एक योगी इसी तरह ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ , सन्यास से होता हुआ योग के विभिन्न सोपानों से चढ़ता हुआ समाधि तक पहुचता है , उसका मानसिक विश्राम योग निद्रा कहा जाता है ।
जिस तरह से किसी शुभ कार्य के लिए उस स्थान विशेष की स्वक्षता अत्यंत आवश्यक है । उसी तरह मन से परमात्मा के ध्यान के लिए चित्त की वृत्तियों का निवारण अत्यंत आवश्यक है ।
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*प्रेम के उद्मगम को जानने मे असफल रहे ओशो*
ओशो के अनुसार ,
प्रेम की यात्रा का जन्म गंगोत्री जहाँ से गंगा पैदा होगी , वह सेक्स है , वह काम है , उसके सब दुश्मन है , वह काम है । सारी संस्कृतियां और सारे धर्म , सारे गुरु और महात्मा, तो गंगोत्री पर ही चोट कर दिया वहाँ रोक दिया । पाप है , जहर है , काम अधम है । ये काम की शक्ति ही प्रेम में परिवर्तित होती है , और रूपांतरित होती है , प्रेम का जो विकास है , वह काम की शक्ति का रूपांतरण transformation है ।
समीक्षा - कामपिपासु ओशो का कहना है , की सेक्स ही प्रेम की गंगोत्री है , जहाँ से प्रेम का उद्द्भव होता है ।
अब यहा प्रश्न उठते है :-
अगर सेक्स ही प्रेम का उद्भव है , तो ये भोगयोनि में रमण कर रहे जीव क्यो नही परमानन्द पा लेते , क्यो नही स्वभावतः पशु (भोग योनि प्राप्त) जीव परमानन्द नही प्राप्त कर लेते । क्यो नही वह वासना से मुक़्ति पा लेते ?
परन्तु विद्वानो का कथन है कि ईश्वर ही आनन्द का स्रोत सृष्टि का रचयिता है , जो परमानन्दस्वरूप है ।
संसार के सुख और वैभव आदि भौतिक क्षणिक आनन्द देने वाले है , इस भौतिक सुख को प्राप्त करके परमानन्द की इच्छा करने वाला उस पतिंगे (मानव) की भांति है जो दीपक की लौ (क्षणिक आनन्द) को प्राप्त करने का असफल प्रयास करता है , जब तक जल कर खाक (मृत्यु को प्राप्त) नही हो जाता और तब तक उस भौतिक आनन्द के पीछे भागता रहता है । अतः सुख की प्राप्ति स्वेच्छाचार में नही ईश्वर प्राणी ध्यान में है । असली आनन्द तो वेदविहित सत्य ज्ञान , सत्कर्म और ईश्वरोपासना में है ।
ईश्वर ध्यान एक विज्ञान है परमानंद में रमकर आनन्द प्राप्त करने का । ईश्वरीय आनन्द शाश्वत सुख का अनुभव है । परमेश्वर ने ही वेद ज्ञान देकर मुक़्ति और आनन्द का मार्ग दिखाकर मानव मात्र पर दया दिखाया अगर ऐसा न होता तो वनादि स्थानों पर रहने वाले लोग क्यो नही ज्ञान अथवा आनन्द प्राप्त कर लेते ?
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ओशो कहता है ,
*आधुनिक मनुष्य अभी तक अस्तित्व में नही आया है ,
दुनिया के सभी लोग बहुत पुरातन और बहुत प्राचीन हैं। किसी भी समकालीन व्यक्ति से भेंट कर पाना बहुत दुर्लभ है। कोई दस हजार वर्ष पूर्व स्थापित किए गए धर्म से संबंधित है, कोई दो हजार वर्ष पूर्व स्थापित किए गए धर्म से जुड़ा है--ये लोग समकालीन नहीं हैं। ये लोग आधुनिक युग में तो रह रहे हैं, पर ये आधुनिक हैं नहीं।
और इसी कारण एक बड़ी समस्या पैदा हो गई है: तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति की आवश्यकता है, जिससे कि आधुनिक मनुष्य इसका उपयोग करे और आधुनिक मनुष्य उपलब्ध है नहीं। टेक्नॉलजी, प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, विज्ञान उपलब्ध है, लेकिन वे व्यक्ति जो इसका रचनात्मक उपयोग कर सकें, उपलब्ध नहीं हैं।*
समीक्षा - विद्वान कहते है काम , क्रोध , लोभ में अंधे को कोई भय और लज़्ज़ा न होती इसके पूर्ति के लिए वह किसी के प्राण भी ले सकता है ।ओशो साहब जीवन , उसके उद्देश्यों और अनादि जीव की व्याख्या को समझने में असफल रहे । जीव तो अनादि काल से है स्वतन्त्र सत्ता की भांति है , केवल ईश्वर की सत्ता में परतंत्र है क्योकि वह ही उसके कर्मो का न्याय करने वाला है । एक मनुष्य अनादि काल से धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष का अभिलाषी रहा इसके सिवाय किसी भी 5 वी वस्तु की कल्पना उसके मन मे न आई और न ही निकट भविष्य या काल्पनिक भविष्य में सोची जा सकती है , यह कैसे मान लिया जाय कि पुरातन मानव वैज्ञानिक नही था कथित समकालीन मानव से । अगर आज योग , ध्यान , प्राणायाम , वैदिक सदाचार , आर्य ग्रन्थों और उनकी भाषाओं की श्रेष्ठता , विज्ञान और तर्को के मानदंडों पर उत्कृष्ट पाया गया है जिसे प्राचीन ऋषि मनीषीयो ने अपने अपने अनुसंधान से अपने अगले पीढ़ियों को प्रेषित किया तो ऐसा सोचना की प्राचीन मानव वैज्ञानिक नही था , मूर्खता है । हमे चाहिए कि उस काल्पनिक समकालीन जीव की जगह सदाचारी ,सत्यभाषण करने वाले और दुसरो का हित करने के निमित्त अनुसंधान करने वाले पुरातन ऋषियों की परंपराओं और ईश्वर प्रदत्त व्यवस्था की ओर बढ़े । ईश्वर सृष्टि निर्माण किया , जीव बन्धनों में फंसा (नाड़ियों में) अतः अज्ञानी ,अल्पज्ञ रहा , ईश्वर ने हमपर दया की हमे वेदो का ज्ञान ऋषियों के माध्यम से ज्ञान । जैसे किसी मोबाइल , टीवी , या अन्य मशीनरी उपकरण या दवाएं , वस्तुएं (सृष्टि ) बनाने वाली कम्पनियां (परमपिता) अपने वस्तुको क्रय के साथ एक पत्रिका या बुकलेट (वेदज्ञान) देते है जिससे कि उसके चालन की विधियों का पता चल सके ( आदर्श मानवीय आचार व्यवहार की विधि) ।
यहा ओशो के समकालीन मानव के विचार , कार्ल मार्क्स से प्रेरित लगते है जिसमे उस काल्पनिक साम्यवादी समाज स्थापित करने के लिए सर्वाहारा और बुर्जुआ के मध्य निरन्तर सँघर्ष चलते रहना है , जिसके बाद सामाजिक , आर्थिक साम्य स्थापित होगा ।
ओशो भी कुछ ऐसे ही समाज की कल्पना करता है , वह इस समाज को रुग्ण मानता है जिसका कारण प्राचीन समाज द्वारा स्थापित धर्म और संस्कृति है ।
ओशो के स्त्रियों पर जो विचार है , वह भी मार्क्स से प्रेरित है , ओशो भी मानवीय इतिहास को शोषण और असमानता का समाज मानता है ।
ओशो और मार्क्स के विचार चार्वाक और बृहस्पति आदि से प्रेरित है । लेकिन ओशो ने अपने शब्द जाल की धूर्त प्रवृत्ति से नास्तिकवाद को गलत कह दिया है , वह कहता है , नास्तिकवाद गलत है क्योकि यह आस्तिकों से लड़ने में ही जीवन का उद्देश्य जानते है ।
ओशो को पढ़ने वाला हर शख्श यही कहेगा कि ओशो काफी हद तक अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री मार्क्स , भारतीय वाम दर्शनशास्त्री बृहस्पति , और आस्ट्रेलियाआई सायकोलॉजिस्ट एंड सेक्सोलोजिस्ट सिगमंड फ्रॉयड से प्रेरित है । लेकिन ओशो , मार्क्स की भी यह कहकर आलोचना कर देता है कि पूंजीवाद ठीक से विकसित हो तो समाजवाद उसका सहज परिणाम है। नौ महीने का गर्भ हो तो बच्चा सहज और चुपचाप पैदा हो जाता है। पूंजीवाद ठीक से विकसित न हो तो समाजवाद की बात सुसाइडल है, आत्मघाती है। वह मार्क्स को यह कहकर गलत ठहरा देता है कि मार्क्स कभी आध्यात्मिक व्यक्ति से नही मिला इसलिये जीवन के मूल विचारो से दूर रह गया ।
ओशो , सेक्स को जिस तरह अपनी पुस्तक में विषय बनाया है , वे सिगमंड फ्रॉयड से भी प्रेरित है जैसा कि फ्रॉयड कहता था कि मनुष्य के अवचेतन मन मे सारी दबी हुई वृत्तियां होती है जो उसके मानसिक रोगों का कारण बनती है ।
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*विवाह की वैदिक मीमांसा भी समझने में असफल रहे ओशो*
*ओशो कहता है *
*विवाह तो एक बंधन है और प्रेम एक मुक्ति है। लेकिन जिनके जीवन में प्रेम आया है, वे भी साथ जीना चाहें, स्वाभाविक है। लेकिन साथ जीना उनके प्रेम की छाया ही हो। जिस दिन विवाह की संस्था नहीं होगी, उस दिन स्त्री और पुरुष साथ नहीं रहेंगे, ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं। सच तो मैं ऐसा कह रहा हूं कि उस दिन ही वे ठीक से साथ रह सकेंगे। अभी साथ दिखाई पड़ते हैं, साथ रहते नहीं। साथ होना ही संग होना नहीं है। पास-पास होना ही निकट होना नहीं है। जुड़े होना ही एक होना नहीं है। विवाह की संस्था को मैं अनैतिक कह रहा हूं। और विवाह की संस्था चाहेगी कि प्रेम दुनिया में न बचे। कोई भी संस्था सहज उदभावनाओं के विपरीत होती है। क्योंकि तब संस्थाएं नहीं टिक सकतीं। दो व्यक्ति जब प्रेम करते हैं, तब वह प्रेम अनूठा ही होता है। वैसा प्रेम किन्हीं दो व्यक्तियों ने कहीं किया होता है। लेकिन दो व्यक्ति जब विवाह करते हैं तब वह अनूठा नहीं होता। तब वैसा विवाह करोड़ों लोगों ने किया है। विवाह एक पुनरुक्ति है, प्रेम एक मौलिक घटना है।*
समीक्षा -
यह पशु पक्षियों का व्यवहार है, मनुष्यों का नहीं। जो मनुष्यों में विवाह का नियम न रहै तो गृहाश्रम के अच्छे-अच्छे व्यवहार सब नष्ट भ्रष्ट हो जायें। कोई किसी की सेवा भी न करे। और महाव्यभिचार बढ़ कर सब रोगी निर्बल और अल्पायु होकर शीघ्र-शीघ्र मर जायें। कोई किसी से भय वा लज्जा न करे। वृद्धावस्था में कोई किसी की सेवा भी नहीं करे और महाव्यभिचार बढ़ कर सब रोगी निर्बल और अल्पायु होकर कुलों के कुल नष्ट हो जायें। कोई किसी के पदार्थों का स्वामी वा दायभागी भी न हो सके और न किसी का किसी पदार्थ पर दीर्घकालपर्यन्त स्वत्व रहै। इत्यादि दोषों के निवारणार्थ विवाह ही होना सर्वथा योग्य है ।
वैदिक_रीति के अनुसार ,
""धर्मिक, विद्वान्, सदाचारी और ब्रह्मचारी व्यक्ति को ही विवाह करने का अधिकार है।""
【विद्या, विनय, शील, रूप, आयु, बल, कुल, शरीरादि का परिमाण यथायोग्य हो जिन युवक युवती का उनका आपस में सम्भाषण कर माता-पिता अनुमति से गृहस्थ धर्म प्रवेश है। अर्थात् पूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत विद्या बल को प्राप्त करके, सब प्रकार के शुभगुण-कर्म-स्वभावों में तुल्य, परस्पर प्रीतियुक्त हो, विधि अनुसार सन्तानोत्पत्ति और अपने वर्णाश्रमानुकूल उत्तम कर्म करने के लिए युवक युवती का स्वचयनाधारित परिवार से जो सम्बन्ध होता है उसे विवाह कहते हैं। 】
【पति-पत्नी की वैदिक संकल्पनानुसार पति ज्ञानी - पत्नी ज्ञानी, पति सामवेद - पत्नी ऋग्वेद, पति द्युलोक - पत्नी धरालोक। पति-पत्नी दुग्ध-दुग्धवत मिलें। प्रजा उत्पन्न करें। 】
विवाह का मूल उद्देश्य है ‘वेद-विज्ञ’ व्यक्ति ‘वेद-विद’ हो सके। वेद-विद होने का मतलब है वेद सत्ता के लिए, ज्ञान के लिए, लाभ के लिए, चेतना के लिए तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष सिद्धि के लिए जीवन में उपयोग। वैदिक जीवन ब्रह्मचर्य में चतुर्वेदी होकर गृहस्थ चतुर्वेद सिद्ध करते, वानप्रस्थ में श्रद्धामय होते, संन्यास अवस्था में इसी जीवन में ब्रह्मलयता सिद्ध ब्रह्मलयी होने का नाम है।
विवाह का अर्थ समाज में प्रचलित एवं स्वीकृत विधियों द्वारा स्थापित किया जानेवाला दांपत्य संबंध और पारिवारिक जीवन भी होता है। इस संबंध से पति-पत्नी को अनेक प्रकार के अधिकार और कर्तव्य प्राप्त होते हैं।
अतः ओशो साहब का यह सोचना की दाम्पत्य जीवन सेक्स आदि क्षणिक प्रेमो में है ,क्योकि ओशो कहता है कि प्रेम का उद्भव ही सेक्स है , अतः ऐसे प्रेम से भगवान ही बचाये ।
आज कई ऐसे प्रेम विवाह और लिव इन रिलेशन शिप हो रहे है जो आज होते है महीने भर में आफत आ जाती है , तलाक होने लगते है । इसका कारण मन में सयंम की कमी है । नश्वर छद्म सुदरता की ओर आकर्षित होना ही तो बन्धन है ।
इस प्रकार आनन्द , विवाह को बन्धन मानने में नही विवाह करने में है जिससे परिवार और समाज के प्रति दायित्वों के निर्वहन में मदद मिले । यह एक सोपान है , एक सफल जीवनचर्या का ।
प्रेम कही ढूढने की आवश्यकता नही प्रेम और आनन्द तो सर्वत्र व्याप्त है , ईश्वर के सर्वव्यापी होने से बस आवश्यकता है , उसमे ध्यान लगाने की ।
ओशो का मार्ग आपको पशु बनाता है , हर समय उसमे लिप्त होकर समाधि के पास पहुचने की कल्पना करना मूर्खता है , आपके पास विकल्प है या तो आप विवाह करके परिवार के साथ रहे और उनके साथ आनन्द में रहकर आनन्द में रहे अथवा ?? प्रेम की खोज में सेक्स का मार्ग अपना कर स्वेच्छाचारी बने । जब भी अवसर मिले तो सम्बन्धो का अतिक्रमण करके कथित प्रेम पथ पर चले , जिसका परिणाम रुग्णता , अशांति और विनाश है ।
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प्राचीन परमात्मा और वैदिक ऋषियों के ज्ञान और अनुसंधान के कारण हम जीवो को वैदिक ज्ञान और विज्ञान जानने का सुअवसर प्राप्त हुआ । प्राचीन वैदिक काल मे गार्गी , अपाला , भारती , मैत्रेयी , लोपामुद्रा , जैसी विदुषी और मन्त्रद्रष्टा ऋषिकाये हुई ।
वैदिक काल मे स्त्रियों का स्थान बहोत ही ऊंचा था । विवाह संस्कार के समय कुल वधु को सम्बोधन करके कहा जाता था :-
" साम्राज्येधि श्वशुरेषु समराज्युत देवेरिषुः ।
ननान्दू समाराज्यधेहि श्श्रुवाः ।।
(अर्थात , हे ! नववधू तू जिस नवीन घर मे जा रही है , वहां की तू साम्राज्ञी है , वहां तेरा राज्य है , तेरे श्वसुर , देवर , नन्द और सास ,तुझे साम्राज्ञी समझते हुए तेरे राज्य में आनन्दित रहे ")
इस तरह वैदिक समय मे समाज , अर्थ शास्त्र , ज्ञान - विज्ञान की उन्नत और उत्कृष्ट व्यवस्था युगों तक बनी रही । जीव , स्वयं को नश्वर सत्ता न मानकर अनादि स्वतन्त्र सत्ता के साथ न्यायप्रिय ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने वाला था । समय के साथ साथ उनमें विकृतियां आई , सुधारक आये , इसी भांति व्यवस्था आगे चलती गई ।
बाद में जब विद्वान जनों का आभाव हुआ वैसे वैसे शास्त्रार्थ और संवाद का स्तर नष्ट होता रहा । और इस तरह अज्ञानता के आभाव में नवीन मत सम्प्रदाय बने , जातियां , असमानता , संघर्ष अस्तित्व में आये । मतो का शास्त्र , शस्त्र ,धन - बल के द्वारा थोपा गया । धर्म की परिभाषा और व्याख्या बदलकर मत - सम्प्रदाय को धर्म की संज्ञा दी दी गई । और इस तरह अन्धविश्वास , पाखण्ड और कर्मकांडो का बोलबाला हो गया । सम्प्रदाय और मत के लोगो ने पहले वैदिक धर्म में विकृत ला कर लीला रची परिणाम स्वरूप समाज का पतन हुआ , विधर्मी आये हज़ारो सालो की गुलामी आई कितना तांडव झेला समाज ने ।
इन्ही मत संचालको में हमने *पोप ओशो* की शिक्षाओं की समीक्षा की ।
वैदिक ऋषियों ने ज्ञान , कर्म और उपासना से मुक़्ति की बात कही है । मुक़्ति अर्थात चित्त की वृत्तियां । वही ओशो का मुक़्ति 
मार्ग सेक्स से समाधि की ओर जाता है । ओशो सेक्स के निरोध को ही सब समस्याओं का कारण मानता है , क्योकि आनन्द बन्धन में नही स्वतंत्रता में है ।
अब आइये ओशो की बातों का पारम्परिक रुप से से परीक्षा करते है ।
जैसे आप के पास 100 रुपये है , आप बाजार में जाते है , वस्तुओं का क्रय करते है , बाजार में आकर्षक और मनभावन समानो का मेला है । आप क्या करेंगे , निश्चय ही आप निरोध (मन की वृत्तियों का ) करेंगे , क्योकि मन तो चंचल है यह सम्पूर्ण धन के व्यय के बाद भी किसी अन्य वस्तु के प्रति आकर्षित बना रहेगा । मन की दौड़ कभी पूर्ण नही होती ,सांसारिक भौतिक विषयो से । बुरा काम नही , बुरा है व्यभिचार , लम्पटता में रमण करना । क्योकि नियम पूर्वक काम तो प्रजा बढाने के सन्दर्भ में उचित होता है जिससे सकाम रहते हुए मनुष्य पुरुषार्थी बन कर अपने सभी मनोरथ पूर्ण करके सुख से रहता है ।
परन्तु ओशो स्वयम बन्धन और स्वतंत्रता का पाठ गढ़ता है ।उसका सारा चिंतन सेक्स से ही होकर जाता है । एक तरफ वह प्राचीन पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था से मुक्त होने को कहता जिससे प्रेम को पाया जा सके जिसका उद्भव सेक्स है , उसकी शत्रुता है सेक्स बन्धन से है , वह इसी के निरोध को एक ओर समस्याओ का कारण कहता वही दूसरी ओर फिर इसी सेक्स के द्वारा मनुष्यो को बांध कर यही से समाधि होती है , ऐसा ज्ञान देता ।
ओशो को उसके अबोध चेले चेलियो में मजबूत बनाती है , उसकी मनगढंत विनोदी कहानिया जिनमे परस्पर अंतर्विरोध भी है , दूसरा है माया (वासना ) के द्वारा समाधि का नवीन मार्ग जानने की अभिलाषा ।
क्योकि जो साधक (योगी) नही है उसके लिए भौतिक वस्तुओं और सुखों के प्रति होने वाला आकर्षण उद्दीपन उसे प्रभावित करने में पूर्ण सक्षम है ।
और वह चेला चेली बार - 2 उसके आश्रम में उस क्षणिक सुख को प्राप्त करने हेतु जाते , परन्तु कभी प्राप्त नही कर पाते , उनकी मनोधारणा उस पतिंगे की भांति हो जाती है जो दीपक की लौ (क्षणिक सुख ) की प्राप्ति का असफल प्रयास करते रहते है , लेकिन उन्हें कुछ भी हासिल नही होता , उल्टे रुग्णता मनोविकार होने के साथ इहलोक और परलोक दोनों ही जगह दुर्गति हो जाती है ।
वासना तो उस दीए के समान है जिसके बुझने के बाद तो सिर्फ अंधकार ही है , अगर सेक्स ही समाधि की सीढी होती तो सन्सार में नपुंसक तो मोक्ष से विहीन ही रह जाते ??
अतः ओशो की कपोल कल्पना मिथ्या है जो ईश्वर और प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था का विरोध करती है ।
कुछ लोग आश्रम व्यवस्था के कर्तव्य कर्मादि छोड़कर पोपजी पर सब लुटाकर ऐसे धूर्तो के चेला चेली बन जाते है । और जब भूख लगती है , तो पुनः गृहस्थ के सामने हाथ फैलाया करते है ।
विद्वानो का कहना है कि संगत एक अबोध , अज्ञानी मनुष्य को प्रभावित करने में पूर्ण सक्षम है । अगर यह सत्संग (विद्वानो और सदाचारियों) है तो कल्याण होगा अन्यथा विनाश होगा ।
एक वेश्या को वेश्यागमन में पाप नही दिखता , चोरों को चोर आदि कर्मो में पाप नही दिखता , व्यभिचारियों को व्यभिचार में पाप नही दिखता , वह प्रतिदिन अपने कार्यो का निष्पादन करते है ईश्वर आराधना भी करते है और उनसे मदद की अभिलाषा भी करते है ।
इसका कारण ज्ञान और सत्संग का आभाव है ।

घोड़े के संचालन के लिए लगाम , हाथी के संचालन के लिए अंकुश और योगियों के लिए चित्त के वृत्तियों का निरोध अत्यंत आवश्यक है ।

ओशो साहब निरोध का अर्थ दबाने के संदर्भ में लेते है , जबकि निरोध का अर्थ है त्यागना ।

सत्य बोलने के लिए असत्य का निरोध (त्याग) आवश्यक है , इस तरह सर्वप्रथम तो हर उस उद्गम का निरोध करना अत्यंत आवश्यक है जो मिथ्या के प्रचारक है । तत्पश्चात सब सत्य विद्याओं का पूर्वाग्रह छोड़कर ग्रहण करना है ।

अब एक वार्ता को माध्यम से समझे ,

ओशो भक्त , डायबिटिक रोगी को कहेगा कि मन का निरोध मत कर , इच्छानुसार सब खावो , क्योकि दमन करने से इच्छाएं बढ़ती है , इस प्रकार जिस दिन तुम्हारे संयम का अंत होगा , वह तुम्हारे लिए भयंकर होगा , मृत्यु का कारण भी होगा । जीवन को जी भरकर कर जियो प्रेम की प्राप्ति को प्राप्त करो , यह प्रेम के उद्मगम सेक्स , सेक्स ध्यान और मेडिटेशन करो ।
आर्य कहेगा कि मिष्ठान आदि का निरोध करो , योग , प्राणायाम और ध्यान , सदाचार आदि सद्गगुणो को विकसित कर 100 वर्ष तक जीवित रहने की जिजिविषा रखो ।

आप जब निष्पक्ष और प्रायोगिक मानदंडों पर बातो को रखेंगे तो पाएंगे कि ओशो भक्त की सलाह मानने वाला इहलोक में ही विभिन्न रोगादि से घिर गया है और प्राणांत के निकट है ।

वैदिक सामाजिक व्यवस्था ने पिता , भाई , पत्नी , पति , बहन , माँ हर किसी के लिए एक बन्धन रखा है एक well defined boundary ... जिससे जीवन के सम्पूर्ण कार्य सेवा , कर्तव्य आदि सामाजिक कार्य निष्पादित हो रहे है । अगर इन व्यवस्थाओं को तोड़ दिया जाय तो जीवन मे कुछ भी सुख न रह जावेगा सिवाय अशांति , विनाश और रुग्णता के ।
अब ओशो यहाँ नही रुकता आगे कहता है एक मनगढंत कहानी के माध्यम से ,
*एक साइकिल सीखने वाले व्यक्ति को यह कह दिया जाय कि उस मार्ग पर पत्थर है , उससे बचकर जाना , अब मार्ग कितना भी चौड़ा है , लेकिन उस व्यक्ति के दिमाग मे वह पत्थर है वह न चाह कर भी उस पत्थर की ओर हिप्नोटाइज़ होता है , अंततः जाकर उससे टकरा ही जाता है ।*
समीक्षा - अब इस मनगढ़ंत कहानी पर ध्यान दे , सम्पूर्ण कहानी में इस बात का ध्यान दे कि यह एक घटना घटित होने की प्रायिकता मात्र है , इसका परिणाम कुछ और भी हो सकता है ।
अब स्वयम से प्रश्न करे ,
(1) एक साइकिल सिखाने वाला गुरु अपने शिष्य को किसी पत्थर विशेष से ही क्यो मना करेगा , जबकि उसके लक्ष्य से भटकने के अन्य भी कई कारण मौजूद है क्योकि वह अभी नौसिखिया है । जैसे आगे से आरही वाहन , वातावरणीय शोर या अन्य कई अज्ञात कारक जो उसके मन मे आ सकती है ।
(2)वह नौसिखिया शिष्य भला कैसे पत्थर की ओर हिप्नोटाइज़ होगा ?? जबकि साइकिल चलाते समय कई बातें उसके दिमाग मे आएगी ? जैसे - गिरने से पूर्व कैसे बचा जाए , पैर नीचे रख कर रुका जाय या ब्रेक लगाकर ,या साइकिल से कूद जाया जाए । ऐसे एक बार में अज्ञात विचार उसके मन मे आएंगे अलग अलग बाधाएं और समस्याएं उसके समक्ष होगी ।

निष्कर्ष - एक गुरु (चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो) वह एक सत्य मार्गदर्शन शिष्य को दिखाता है । और उस सत्य दर्शन के आचरण में आने वाले अवरोधों का निषेध करने का आदेश देता है । गुरु शिष्य की कार्यकुशलता और कमियों पर ध्यान देकर , कमियों को दूर करने , दमन (निषेध) की तकनीकी सिखाता है ।
और शिष्य गुरु के मार्गदर्शन का पालन करता है , skills सीखता है और कमियों का दमन भी करता है । गुरु शिष्य के कमियों को उभारता नही उससे यह नही कहता कि खूब गलतिया करो क्योकि गलतियों से सफलता का मार्ग तुम जानोगे । क्योकि अगर गुरु ऐसा कहेगा तो शिष्य गलतियों का अभ्यस्त हो जाएगा ।
एक वैद्य , अपने रोगी से यह नही कहता कि शरीर के रोग को खूब उभर जाने दो , इसके बजाय वैद्य उसी समय उस रोग का निषेध उसी stage पर कर देता है ।
और वह रोगी स्वस्थ हो जाता है ।
इस तरह दमन करना , निषेध करना एक वैज्ञानिक व्यवस्था है सफल होने के लिए ।
गुरु का कार्य सत्य से पूर्ण ज्ञान देना है । जिससे शिष्य निपुण होकर भविष्य की सभी अज्ञात बाधाओं को पार कर ले ।
गुरु अपने शिष्य को ऐसे आज्ञा देगा , कि तू आसक्ति (फल विषय) को त्यागकर एकाग्रचित होकर अपने कर्म को कर । कर्म के परिणाम मे समान भाव वाला बन । ऐसे ही तू योगी बन जायेगा ।
ऐसा ही एक सायकिल सिखाने वाला अपने शिष्य को आदेश करेगा । इससे वह किसी भी अवरोधी कारक की ओर ध्यान न देता हुआ विभिन्न अवरोधी कारकों का दमन करता है , और आगे बढ़ता है वो भी बिना किसी परिणाम के भय के की वह पत्थर से टकराएगा की नही क्योकि उसका लक्ष्य पत्थर नही साइकिल सीखना है । और वह निश्चय ही परिणामो में निरपेक्ष रहता है , अंततः निरपेक्ष बना ऐसा साधक सफल होता है ।

मनोवैज्ञानिकों ने मन को दो बड़े भागों में विभक्त किया है।
1. चेतन मन – मस्तिष्क का वह भाग, जिससे हमे मन मे होने वाली क्रियाओं की जानकारी होती हैं , चेतन मस्तिष्क है। यह वस्तुनिष्ठ एवं तर्क पर आधारित होता है।
2. अवचेतन मन – जाग्रत मस्तिष्क के परे मस्तिष्क का हिस्सा अवचेतन मन होता है। हमें इसकी जानकारी नहीं होती। इसका अनुभव कम ही होता है।
उदाहरण के रूप में समझें तो इसकी स्थिति पानी में तैरते हीमखण्ड (Iceberg)की तरह है। हिमखण्ड का मात्र 10 प्रतिशत भाग पानी की सतह से ऊपर दिखाई देता है और शेष 90 प्रतिशत भाग सतह से नीचे रहता है। चेतन मस्तिष्क भी सम्पूर्ण मस्तिष्क का दस प्रतिशत ही होता है। मस्तिष्क का नब्बे प्रतिशत भाग साधारणतया अवचेतन मन होता है।

चेतन मन से वेद - शास्त्र आदि ज्ञानो से सद्गुणों का विकास और वृत्तियों का निरोध किया जाय । योग - प्राणायाम और परमेश्वर ध्यान से अवचेतन मन से सतोगुण का जागरण करके उसे चेतन मन मे अनुभव करना ही , आनन्द की प्राप्ति का साधन है , जिसका स्त्रोत वह आनंदमय परमेश्वर है ।
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अब उदाहरण के लिए एक काल्पनिक कहानी के माध्यम से समझे ,
" किसी देश मे एक राजा बड़े धर्म पूर्वक राज्य करता था , प्रजा में सभी खुश थे , राज्य धन धान्य आदि वैभवों से परिपूर्ण था । एक दिन एक अतिथि , राजा के राज्य में आया और राजा से बोला कि ये राज्य चलाना कितना सुगम है , सब ओर धन वैभव , स्वर्ण , नृत्यांगनाये और सम्पूर्ण सुविधाए यहा विद्यमान है । राजा उस दिन अतिथि की बाते सुनता रहा , अगले दिन दरबार लगा राजा ने यह आदेश जारी कर दिया कि नगर के प्रारम्भ से राजमहल तक उस अतिथि को शर्बत से भरे पात्र को पैदल लेकर आना है । अगर शर्बत की एक बूंद भी जमीन पर गिरती है तो उस अतिथि के सिर को धड़ से अलग कर दिया जाय ।
राजा ने पूरे मार्गो के दोनों ओर सुगन्धित इत्र का छिड़काव , सुंदर नृत्यांगनाओं की टोली और विभिन्न स्वादिष्ट पकवान और मिष्ठान की श्रेणी लगवा दी । विभिन्न प्रकार के वाद्य चालको के द्वारा मधुर संगीत की धुनें बजाने का आदेश दे दिया गया ।
अतिथि नगर से प्रारम्भ करता हुआ , शर्बत के गिलास को लेकर सीधे महल तक पहुच गया ।
पहुचते ही राजा ने उससे प्रश्न किया
तुमने नगर से राजमहल के मध्य के मार्ग में , क्या देखा ? क्या सुना ? , और क्या सुंघा ?
अतिथि बोला , राजन मैं अगर सच बताऊ तो मैने इस शर्बत के पात्र के सिवाय और किसी भी चीज को न तो देखा और न ही महसूस किया और न ही मुझे यह पता है कि क्या सूंघा ??
फिर राजा ने अतिथि से कहा , कि जैसा तुमने इस यात्रा में विभिन्न सुखों और वैभवों का निरोध किया वैसे ही मैं सभी सुख सुविधाओं के होते हुए भी इनका निषेध किया करता हूँ और राजकार्य , सदचार और श्रेष्ठ गुणों को धारण करने में यत्न करता हूँ । जिससे यह राज्य सुख , धन्यादि और न्याय आदि व्यवस्थाओं से परिपूर्ण है ।
अब इस कहानी को ओशो के संदर्भ से समझे ,
अब ऐसा समझे कि वह अतिथि सयंमी व्यक्तित्व वाला बनाया जाएगा ओशो के 3 फार्मूले से सेक्स , सेक्स ध्यान , और मेडिटेशन ।
अब वह सेक्स के माध्यम से उसमे प्रेम का संचार कराया जाएगा क्योकि ओशो सेक्स को प्राकृतिक कहता है , और प्रेम का उद्भव समझता है फिर वह ध्यान की ओर लाया जाएगा । अब ऐसे तो वह सयंमित बनने से रहा क्योकि वासना की भूख उसकी शांत होगी नही , क्योकि छद्म आकर्षण दुनिया मे एक से एक है , और विषयो के माध्यम से अन्य प्रपंचो में फँसेगा । इससे वह बन्धनों में पड़ता जाएगा ।
और जब इस स्तर की उसकी परीक्षा होगी तो वह पर्यावरण मे व्याप्त अन्य प्रपंचो में फस जाएगा और जैसे ही फँसेगा , प्राणों से भी मुक़्ति पा लेंगा ।

विद्वान जन इस बात को भली भांति समझते है ,
जब मन रूपी सरोवर में वासना (माया) रूपी पत्थर से चोट किया जाएगा तो वह सम्पूर्ण सरोवर को तरंगों से रोमांचित कर देता है ।

इस तरह मन के मंदिर में जहां ईश्वर ध्यान करके शाश्वत आनन्द में आना था वहां विषयो का वास हो गया । अब जब विषयो का आना हुआ तो साथ ही साथ लोभ , स्वार्थ और क्रोध आदि उसके मित्रो का आना भी हो गया ।
कहते है कि घाव को खुला छोड़ दे तो मक्खियां उस पर बैठ कर अन्य अज्ञात रोग भी ला देती है । उसी तरह काम के रास्ते लोभ , क्रोध आये जब ये भी आ गए काफी समय तक रहे तो और भी अज्ञात मानसिक वृत्तियों को ले आये । अगर पहले ही चरण में काम (वासना) का निरोध कर लिया होता तो काहे इतना कष्ट में पड़ना होता ।

विद्वानो को चाहिए कि ओशो जैसे कपटी , व्याभिचारी और धूर्त मतावलंबियों के चक्कर मे न पड़कर , वेद , शास्त्र , उपनिषद के अध्ययन के साथ सदाचार और सत्यभाषण के द्वारा सभी श्रेष्ठ गुणों को धारण करना चाहिए ।
निरोध , दमन न केवल एक वैज्ञानिक व्यवस्था है , अपितु यह प्राकृतिक भी है , जैसे ,
सूर्य में ऊष्मा , तपन और तेज है वह कड़ा धूप देता है , मनुष्य प्राकृतिक रूप से ही सिर को झुका चलता है , सूर्य का निरोध करता है , कोई सूर्य मे आँखे डाल कर नही देखता , इस तरह निरोध एक नीति सफल होने की ।
अब कोई ओशो साहब की थ्योरी लगाए तो वह इहलोक में ही अंधा बनकर घूमे ।
जीव एक अनादि सत्ता है । शरीर धारण करते ही जन्म से ही संघर्षों से भरी हुई व्यवस्था है , चलने बोलने ,पढ़ने , लिखने और समाज में रहने के लिए स्वयं को अनुकूलित करने में ।
परन्तु विद्वान इन संघर्षों से उलझते नही आगे बढ़ने के रास्ते खोजते है ,क्योकि इन प्रपंचो का कोई अंत नही अतः विद्वान श्रेष्ठ गुण ग्रहण करते रहते है , वृत्तियों का निरोध करते रहते है । जीवन की यात्रा के सुगमता से चलने का यही उत्तम मार्ग है ।
ओशो स्वयम् जो सम्भोग से समाधि का प्रयोग लाने वाला कभी भी न तो सयंमी बन पाया और न ही चेले चेलियों को बना पाया । ओशो की चेली और प्रेमिका रही माँ आनन्द शिला ने अपने अपने पुस्तक *Don't kill him! a member by Ma Anand Shila* ओशो के पास
आश्रम में अध्यात्म के नाम पर सेक्स की मंडी सजाई जाती थी , आश्रम में जो शिविर चलाये जाते थे उसमे सबसे ज्यादा चर्चा सेक्स की होती थी । ओशो खुद अपने शिष्यों को कहते थे कि सेक्स को स्वीकार करना सीखो , बीमार होने पर भी सेक्स प्रायोरिटी थी । किताब के अनुसार आश्रम का हर सन्यासी महीने में 90 लोगो के साथ सेक्स करता था । ओशो का आश्रम पूरा एक चकलाघर बन चुका था । एक समय में सर्वाधिक प्रसिद्ध और विवादित आध्यात्मिक नेता ओशो को 70 से 80 के दशक में 'भगवान श्री रजनीश' के नाम से जाने लगा था। इसके बाद उसने अपना नाम 'ओशो' रख लिया था,
शीला ने आगे किताब में जिक्र किया है कि मुझे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि सारा दिन काम करने के बाद भी संन्यासी सेक्स के लिए उर्जा और समय निकाल लेते ‌थे। शीला आगे लिखती हैं एक दिन उन्होंने एक संन्यासी से पूछा, तो उसका कहना था कि वो हर दिन ‌तीन अलग-अलग महिलाओं के साथ सेक्स करता है।
आनंद शीला के मुताबिक एक दिन ओशो ने उनसे एक महीने में 30 नई रॉल्स रॉयस गाड़ियों की मांग की। जबकि उनके पास पहले से ही 96 कारें थीं। ओशो को ये नई कारें बोरियत मिटाने के लिए चाहिए थीं। इन कारों को खरीदने के लिए करीब 3 से 4 मिलियन डॉलर चाहिए था। इतनी बड़ी रकम खर्च में कटौती करके जुटाई जा सकती थी। लेकिन भगवान ओशो ने पैसों के लिए 50-60 लोगों के नाम अपने शिष्या को दिए थे जो काफी धनी थे।
बुद्धिजीवियों को चाहिए कि वह जीवन को प्रयोगशाला न बनावे , क्योकि जिस मार्ग से ऋषियों , मनिषयो और महान आर्यो ने चित्त की मुक़्ति पाई उस वैज्ञानिक वैदिक विधि को अपनाए । पूर्वाग्रह छोड़कर सत्यासत्य का निर्णय करे । और सब श्रेष्ठ गुण धारण करने का प्रयास करे ।
*सत्य व असत्य की परीक्षा*
अब जो जो पढ़ना-पढ़ाना हो वह-वह अच्छी प्रकार परीक्षा करके होना योग्य है। परीक्षा पाँच प्रकार से होती है-
1- जो-जो ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव और वेदों से अनुकूल हो वह-वह सत्य और उससे विरुद्ध वह असत्य है।
2- जो जो सृष्टि क्रम से अनुकूल वह-वह सत्य और जो-जो सृष्टि क्रम से विरुद्ध है वह सब असत्य है। जैसे कोई कहे कि बिना माता पिता के योग से लड़का उत्पन्न हुआ ऐसा कथन सृष्टिक्रम से विरुद्ध होने के कारण सर्वथा असत्य है।
3- आप्त अर्थात् धार्मिक विद्धान्, सत्यवादी, निष्कपटियों का संग उपदेश के अनुकूल है वह-वह ग्राह्य और जो-जो विरुद्ध है वह अग्राह्य है।
4- अपने आत्मा की पवित्रता विद्या के अनुकूल अर्थात् जैसे अपने को सुख प्रिय और दुःख अप्रिय है वैसे ही सर्वत्र समझ लेना चाहिए कि मैं भी किसी को दुःख दूँगा तो वह भी अप्रसन्न और प्रसन्न होगा।
5- आठों प्रमाण अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव के द्वारा सत्य को जान लेवें।
प्रत्यक्ष - को तो सभी जान लेते हैं अर्थात् यदि कोई बात इंद्रियों से स्पष्ट पता चल रही हो तो वह प्रमाण होती है।
अनुमान - जो प्रत्यक्षपूर्वक अर्थात् जिसका कोई एक देश वा सम्पूर्ण द्रव्य किसी स्थान वा काल में प्रत्यक्ष हुआ हो उसका दूर देश में सहचारी एक देश के प्रत्यक्ष होने से अदृष्ट अवयवी का ज्ञान होने को अनुमान कहते हैं। जैसे बादलों को देख कर वर्षा का अनुमान होता है और जैसे दूर देश में धुंआ उठते देख अग्नि के जलने का ज्ञान होता है आदि आदि।
उपमान - जो प्रसिद्ध प्रत्यक्ष साधर्म्य से साध्य अर्थात् सिद्ध करने योग्य ज्ञान की सिद्धि करने का साधन हो उसको उपमान कहते हैं। जैसे किसी ने किसी भृत्य से कहा कि तू देवदत्त के सदृश विष्णुमित्र को बुला ला। वह बोला कि मैंने उसको कभी नहीं देखा है उसके स्वामी ने कहा कि जैसा यह देवदत्त है वैसा ही वह विष्णुमित्र है। जब वह वहां गया तो देवदत्त के सदृश उसको देख निश्चय कर लिया कि यहीं विष्णुमित्र है, उसको ले आया।
शब्द प्रमाण - जो आप्त अर्थात् पूर्ण विद्धान धर्मात्मा, परोपकार प्रिय, सत्यवादी, पुरुषार्थी, जितेंद्रिय पुरुष जैसा अपने आत्मा में जानता हो और जिससे सुख पाया हो उसी के कथन की इच्छा से प्रेरित सब मनुष्यों के कल्याणार्थ उपदेष्टा हो जिसने पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त ज्ञान प्राप्त होकर उपदेष्टा होता है। जो ऐसे पुरुष और पूर्ण आप्त परमेश्वर के उपदेश वेद हैं, उन्हीं को शब्द प्रमाण जानो।
एतिह्य - इतिहास
अर्थापत्ति - जैसे किसी ने किसी से कहा कि बद्दल के होने से वर्षा और कारण के होने से कार्य उत्पन्न होता है इससे बिना कहे यह दूसरी बात सिद्ध होती है कि बिना कारण कार्य कभी नहीं हो सकता।
संभव - सृष्टि क्रम केे अनुकूल होने वाली बातें ही संभव कहलाती हैं।
अभाव- जैसे किसी ने किसी से कहा कि हाथी ले आ। वह वहां हाथी का अभाव देखकर जहां हाथी था वहां से हाथी ले आया।
असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः
तास्ते प्रेत्यभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ।।3 ।
-ईशोपनिषद

अर्थात - जो जन इस पवित्र देह को पाकर भी भोगों में लीन हिकर अविद्या आदि दोषों से आत्मा के बिरुद्ध आचरण करते है , वे कपटी मरणोपरांत ऐसे योनियों को प्राप्त करते है जो
अंधकार से आच्छादित (असुर) है ।
【असु = इन्द्रिय भोगों में , र = लीन पुरुष 】

सृष्टि के निर्माण के समय उस विश्वकर्मा ईश्वर ने , मनुष्य की रचना की संकल्प - विकल्प वाले मन को उत्तपन्न किया और इसी मन से अहम् भाव को जन्म दिया , उसने
महत्त् तत्व ( सत्व , रज , तम प्रकृति ) की रचना की ।
सत्व , रज और तम - आत्मा की प्रकृति के गुण है । यह विशाल स्थावर व जंगम रूप सन्सार इन तीन गुणों से व्याप्त है । इन 3 गुणों में से प्राणी में जिस गुण की अधिकता पाई जाती है , वह उस गुण के लक्षण से युक्त होता है ।
वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा । नाशयन्त्याशु पापानि महापातकजान्यपि
प्रतिदिन वेद का अधिक-से-अधिक अध्ययन, प़ञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान, (क्षमा) तप-सहिष्णुता, ये क्रियाएं बड़े पापों से उत्पन्न पापभावनाओं या दुःसंस्कारों को भी नष्ट कर देती है ।
*सत्वगुणो के लक्षण* :- वेदाभ्यास , तप , ज्ञान , पवित्रता , अनुशासन ,इन्द्रिय निग्रह , धर्माचरण तथा आत्मा का चिंतन ।
*रजोगुण के लक्षण* :- नए कर्मो को आरम्भ करने में रुचि , कर्मो के फल प्राप्ति के लिए अधीरता , निषिद्ध कर्मो को करने की प्रवृत्ति एवं विषयो का लगातार भोग ।
*तमोगुण के लक्षण* :- लोभ ,आलस्य , क्रूरता ,अधैर्य , ईश्वर पर आस्था न होना , सदाचारी न होना ,प्रमाद एवं याचनावृत्ति ।।
सत्व , तम और रज तीनो ही मनुष्य के मन के भीतर है । विद्वान जन सत्व का विकास करते है और तम - रज का दमन करते है । इस तरह वह मानव जीवन मे सफल होते है । मन के भीतर संकल्प को दृढ़ करना है और विकल्पो का दमन करना है । संकल्प का लक्ष्य एक है ,और विकल्प का लक्ष्य अनेक है , यह दोनों ही बाते हमारे मन के भीतर परन्तु हमे विकल्पों का दमन और संकल्प का विकास करना होता है जो कि सफलता का मार्ग है ।
अगर कोई ओशो कहे कि मन का निरोध करना गलत है तो यह एक दिशाहीन संकल्पना होगी , क्योकि अगर साधक ऐसा नही करेगा तो विकल्प आदि प्रपंचो में ही फंसकर मर जायेगा ।
ओशो अपने चेले - चेलियों को रजोगुण की व्यवस्था से सतोगुण लाना चाहता है । जबकि रजोगुण सोपान है , तमोगुण का ।
ओशो अपने चेलो के भीतर छुपे हुए रजोगुण का दर्शन कराता है , क्योकि यह त्रिगुण व्यवस्था मन मे ही अवस्थित है , तो उसके चेले अपने रजोगुण के दर्शन पर ध्यान देते अपने मन मे रजोगुण का अन्वेषण करते है , और स्वयम के भीतर इन गुणों को पाते है तो यह विचार करते है कि गुरु जी तो हमे भीतरी रूप से उघाड़ दिया , मेरे मन की गुत्थियां सुलझ गई , जबकि सत्य यह है कि यह दर्शन तो उन्ही के मन मे पहले से ही था जिसका उपदेश करके उनके गुरु ने उस गुणों का दर्शन कराके उन्हें उस मार्ग में ठेल दिया । इस तरह अज्ञानता मे उनकी दुर्गति होती जाती है ।
अगर यही गुरु रजोगुण की जगह सतोगुण का दर्शन कराता तो यह , शिष्य अपने मन मे सतोगुण का अन्वेषण करते , और उस मार्ग की ओर अनुसरण करते , इनसे वह रजोगुण व तमोगुणो की जगह सतोगुण का विकास करते जिससे रजोगुण और तमोगुण का प्रादुर्भाव ही न होता मन मे उनका दमन रहता ।
सम्भोग से समाधि पाना कुछ ऐसा ही जैसा अंधकारमय कुएं में छलांग लगाकर आकाश में पहुचने की अभिलाषा ।
संसार के सभी जीवों में परमेश्वर ने मष्तिष्क ,सोचने समझने और तर्क करने की शक्ति केवल मनुष्यो को दी है । शेष जीवो को केवल मन दिया है , मष्तिष्क नही , क्यो ?
क्योकि मानव कर्मयोनि के लिए है और अन्य जीव भोग योनि के निमित्त बने है । ईश्वर ने मनुष्य को मष्तिष्क जैसा दुर्लभ उपकरण दिया है जिससे कि वह सत्यासत्य का निर्णय कर सके । मन व शरीर की वृत्तियों का निरोध कर सके । मन जैसा उपकरण (एक्सीलेटर) जो अत्यंत द्रुत गामी है , उसके निरोध के लिए मष्तिष्क (ब्रेक) बनाया है ।
अन्यथा मनुष्य और पशु मे कोई भी भिन्नता नही । जब मनुष्य मष्तिष्क से निरोध को छोड़कर मन का दास बन जाता है , तब वह पशु बन जाता है ।
अतः निरोध एक प्राकृतिक एवम वैज्ञानिक व्यवस्था है ।
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*ओशो तकनीकी के समर्थक होता हुआ भी तकनीकी की मूल संकल्पनाओं को समझने में असफल रहा*
ओशो कहता है ,
"आधुनिक तकनीक और विज्ञान ने आदमी को भ्रष्ट नहीं किया है। आदमी आधुनिक विज्ञान और टेक्नॉलजी को सही ढंग से उपयोग करने में समर्थ नहीं है। आधुनिक मनुष्य अभी पैदा ही नहीं हुआ है।
मुझे एच.जी.वेल्स का स्मरण आता है जिसकी गणना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ इतिहासविदों में की जाती है। जब उसकी पुस्तक प्रकाशित हुई, किसी इंटरव्यू लेने वाले ने उससे पूछा: 'सभ्यता के बारे में आपका क्या विचार है?'
एच.जी. वेल्स ने कहा: 'मेरा विचार? सभ्यता एक अच्छा विचार है, परंतु अभी तो यह होनी है। अभी तो यह एक विचार ही है, किसी को तो इसे वास्तविक बनाना ही चाहिए।'
टेक्नॉलजी और विज्ञान समस्याएं नहीं हैं। समस्या है अविकसित मनुष्य। मगर हम भी विचित्र लोग हैं। हम सदा विचित्र ढंग से सोचते हैं।
महात्मा गांधी सोचते थे कि यदि चरखे के बाद मनुष्य और उसकी बुद्धि द्वारा विकसित सारे विज्ञान और टेक्नॉलजी को समुद्र में डुबो दिया जाए, तब सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। और मजेदार बात इस देश ने उनका विश्वास कर लिया! और न केवल इस देश ने बल्कि दुनिया में लाखों लोगों ने उनका विश्वास कर लिया कि चरखा सारी समस्याओं का समाधान कर देगा।
रेलगाड़ियों को रोक दिया जाना चाहिए, हवाई जहाजों को रोक दिया जाना चाहिए, डाकघरों को बंद कर देना चाहिए, तार, टेलीफोन को नष्ट कर देना चाहिए--क्योंकि ये सभी चीजें चरखे के बाद आई हैं। सच तो यह है कि कोई नहीं जानता कि क्या बचाया जा सकता है।"
समीक्षा -
ओशो का ऐसा सोचना की सम्पूर्ण मानव जाति को एक प्रकार का कोई समकालीन मानव बनाया जा सकता है , जिसमे सभी के हाथ मे सारी टेक्नोलॉजी होगी और तकनीकी दासी बन जाएगी , एक कोरी कल्पना है , क्योकि तकनीकी का विकास ही इसीलिए किया गया कि जो मनुष्यों से न हो पाया वो तकनीकी कर दे । सन्सार के लोगो की बौधिक और शारीरिक क्षमता उनके कर्म भिन्न भिन्न है । अतः ऐसे किसी भी समकालीन मानव के विषय मे सोचना तर्कहीन है ।

ओशो तकनीकी की मूल संकल्पनाओं को समझने में भी असफल रहा । किसी भी तकनीकी के निर्माण के लिए मूल सिद्धांत (fundamantal rules) बनाये जाते है जो आदर्श सिद्धांत कहे जाते है (जैसे - आदर्श गैस , आदर्श द्रव , आदर्श ठोस) , जिसे कोई भी वास्तविक पदार्थ पा तो नही सकते लेकिन पाने का प्रयास अवश्य करते है । इसी तरह ऋषियों ने (वेद अध्ययन से ) मानव जीवन की गूढ़ और आदर्श fundamantal व्यवस्थाएं बनाई , जिसको हर मानव पाने का प्रयास करता है । क्योकि उनके द्वारा किये गए अच्छे और बुरे कार्यो की मात्रा नियत है , अतः भोग के पश्चात पुनः वापस आते है , जीव अनादि और स्वतन्त्र चेतन सत्ता है , मात्र ईश्वर की व्यवस्था में परतंत्र है ।
अब अंत मे ओशो के इस वचन की समीक्षा करेंगे ,
*'संभोग से समाधि की ओर' में ओशो कहते हैं कि सेक्स का विरोध नहीं है ब्रह्मचर्य, बल्कि सेक्स का ट्रांसफॉर्मेशन है। जो सेक्स का दुश्मन है, वह कभी ब्रह्मचर्य को उपलब्ध नहीं हो सकता।*
समीक्षा - इस विषय की समीक्षा के लिए हम कुछ प्रश्न को समझने का प्रयास करेंगे ।
(1) क्या चोरी करने से , झूठ बोलने से सदाचार का मार्ग पाया जा सकता है ?
(2) क्या अग्नि में जलकर शीतलता पाई जा सकती है ?
(3) क्या आत्महत्या करके श्रेष्ठ जीवन पाया जा सकता है ?
अगर नही , तो सेक्स से ब्रह्मचर्य कैसे पाई जा सकती है , भला ?
अगर कोई कहे कि सेक्स प्राकृतिक व्यवस्था है , इससे ही होकर ब्रह्मचर्य जाता है , तो इस तरह तो पृथ्वी के केंद्र की ओर भी एक आकर्षण शक्ति है , यह भी एक प्राकृतिक व्यवस्था है , लेकिन हम पृथ्वी केंद्र से जाकर कर तो चलना नही सीखते , हम दमन करते है उन सभी कारणों का जो बाधक है , हमारे अनुकूलन मे हम बार बार प्रयास संघर्ष (विरोध , दमन ) करते है कमियों का निवारण करते है , बिना परिणाम की इच्छा किये, अंततः चलने में सफल होते है । अतः
प्रकृति , ईश्वर , और जीव तीनो ही भिन्न और अनादि सत्ताएं है , उनकी तुलना नही हो सकती है ।
ओशो अपने हिसाब से तर्क गढता है , वह बुद्ध के वन जाने का कारण *दुख , दुख के कारण निवारण* के अन्वेषण का नही बताता । बल्कि वह बुद्ध के वन जाने का कारण सेक्स को खूब जी लेने का बताता है ।। जबकि सत्य यह है कि बुद्ध ने जब गृह त्याग किया उस समय भी वह अज्ञानी ही रहे वह ज्ञान के खोज के लिए निकले थे ।
स्वामी दयानन्द , जगद्गुरु शंकराचार्य न जाने कितने ऋषियों मुनियों ने बिना गृहस्थ का सुख पाएं ही , ज्ञान प्राप्त किया ।
अतः यह कोरी कल्पना करना कि ब्रह्मचर्य का मार्ग सेक्स से होकर जाता है ।
ईश्वर ने अभी मानव जीवो को मोक्ष के समान अवसर दिए है , अगर ऐसा होता की सेक्स से ही ब्रह्मचर्य मिलेगा , नपुंसक आदि तो मोक्ष पाने से रहे ।
और अगर मात्र ब्रह्मचर्य से ही मोक्ष मिलता तो नपुंसक आदि ही मोक्ष पा जाते ।
(शेष मोक्ष के लक्षणों और वृत्तियों के निवारण की विधियां ऊपर लिख दिए है । )
विद्वानो के विचार है , कि कभी भी अज्ञात जलाशय में स्नान नही करना चाहिए , पानी को छानकर पीना चाहिए , और ऐसे मार्ग पर ही केवल चलना चाहिए , जिस मार्ग पर महापुरुष चले हो ।
महृषि दयानन्द स्वामी , शंकराचार्य , परशुराम, हनुमान , राम , कृष्ण , और भीष्म इसी ब्रह्मचर्य व्रत के बल पर मुक्त हुए ।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थप्रकाश के तृतीय समुल्लास में आयु के अनुसार ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार लिखे हैं जिनके नाम हैं कनिष्ठ ब्रह्मचर्य, मध्यम ब्रह्मचर्य और उत्तम ब्रह्मचर्य।
महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि ब्रह्मचर्य तीन प्रकार का होता है। प्रथम कनिष्ठ जो पुरुष अन्न-रस-मय देह और देह में शयन करने वाला जीवात्मा, यज्ञ द्वारा अतीव शुभगुणों से संगत और सत्कर्तव्य है, इसको यह कर्तव्य अवश्य है कि 24 वर्ष पर्यन्त जितेन्द्रिय
अर्थात् ब्रह्मचारी रह कर वेदादि विद्या औरसुशिक्षा का ग्रहण करे और विवाह करके भी लम्पटता न करें तो उसके शरीर में प्राण बलवान् होकर सब शुभगुणों के वास कराने वाले होते हैं।
इस प्रथम वय में जो अपना सारा समय विद्याभ्यास में तपस्या करता हुआ लगाये और वह आचार्य ब्रह्मचारी को वैसा ही उपदेश
किया करे और ब्रह्मचारी ऐसा निश्चय रखे कि जो मैं प्रथम अवस्था में ठीक–ठीक ब्रह्मचर्यपूर्वक रहूंगा तो मेरा शरीर और आत्मा
आरोग्य बलवान् होके मेरे प्राण शुभगुणों को बसाने वाले होंगे। महर्षि दयानन्द गृहस्थियों को कहते है कि तुम इस प्रकार से अपने निजी भौतिक सुखों का विस्तार करो कि जिससे ब्रह्मचारी व विद्यार्थी ब्रह्मचर्य का लोप न करें अर्थात् वह भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर आकर्षित व कुप्रभावित न हों और वह 24 वर्ष तक तो ब्रह्मचर्य का पालन कर सके। आचार्य ब्रह्मचारी को उपदेश करते हुए विश्वास दिलाता है कि यदि तू 24 वर्ष के पश्चात् गृहाश्रम करेगा तो प्रसिद्ध है कि रोगरहित ररेगा और तेरी आयु भी 70 वा 80 वर्ष होगी।

दूसरा ब्रहमचर्य मध्यम ब्रह्मचर्य कहलाता है। जो मनुष्य 44 वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचारी रह कर वेदाभ्यास करता है उसके प्राण, इन्द्रियां,
अन्तःकरण और आत्मा बलयुक्त होकर सब दुष्टों को रुलाने और श्रेष्ठों का पालन करने वाले होते हैं। यदि कोई ब्रह्मचारी प्रथम वय में जैसा स्वामीजी ने कहा है, कुछ तपश्चर्या करे तो उसका यह रुद्ररूप प्राणयुक्त मध्यम ब्रह्मचर्य सिद्ध होगा। स्वामीजी कहते हैं कि हे ब्रह्मचारी लोगो ! तुम इस ब्रह्मचर्य को बढ़ाओं। जैसे इस ब्रह्मचर्य का लोप न करके ब्रह्मचारी यज्ञस्वरूप होता है, वह उसी आचार्यकुल से आता और रोगरहित होता है और जैसा यह ब्रह्चारी अच्छा काम करता है वैसा अन्य सभी को करना चाहिये। 
उत्तम ब्रह्मचर्य 48 वर्ष पर्यन्त का तीसरे प्रकार का होता है। जैसे 48 अक्षर का जगती छन्द होता है, वैसे ही जो 48 वर्ष पर्यन्त यथावत् ब्रह्मचर्य करता है उसके प्राण अनुकूल होकर सकल विद्याओं का ग्रहण करते हैं। आचार्य और माता-पिता अपने सन्तानों को प्रथम वय में विद्या और गुणग्रहण के लिये तपस्वी कर और उन्हें तपस्वी होने का उपदेश करें और वे सन्तान आप ही आप अखंडित ब्रह्मचर्य सेवन से तीसरे उत्तम ब्रह्मचर्य का सेवन करके पूर्ण अर्थात् चार सौ वर्ष पर्यन्त आयु को बढ़ावे वैसे अन्य भी बढ़ायें क्योंकि जो मनुष्य इस ब्रह्मचर्य को प्राप्त होकर इसका लोप नहीं करते वे सब प्रकार के रोगों से रहित होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
स्वामी दयानन्द जी ने ब्रह्मचर्य की उपर्युक्त तीन अवस्थाओं का वर्णन करने के बाद शरीर की अवस्थाओं का वर्णन करते हुए सुश्रुत के आधार पर बताया है कि इस शरीर की चार अवस्थायें हैं। एक (वृद्धि) जो 16 वें वर्ष से लेके 25 वें वर्ष पर्यन्त सब धातुओं की वृद्धि होती है। दूसरा (यौवन) जो 25 वें वर्ष के अन्त और 26 वें वर्ष के आदि में युवावस्था का आरम्भ होता है। तीसरी (सम्पूर्णता) जो पच्चीसवें वर्ष से लेके चालीसवें वर्ष पर्यन्त सब धातुओं की पुष्टि होती है। चैथी (किचिंत्परिहाणि) तब सब सांगोपांग शरीरस्थ सकल धातु पुष्ट होके पूर्णता को प्राप्त होते हैं। तदनन्तर जो धातु बढ़ता है वह शरीर में नहीं रहता किन्तु स्वप्न, प्रस्वेदादि द्वारा बाहर निकल जाता है। यही 40 वां वर्ष विवाह का उत्तम समय है। अड़तालीसवें वर्ष में विवाह करना उत्तमोत्तम होता है।

ब्रह्मचार्येति समिधा समिद्धः
कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः।
स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं
समुद्रं लोकान्त्संगृभ्य मुहुराचरिक्रत्॥4॥
ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो
लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्।
गर्भो भूत्वामृतस्य योनाविन्द्रो
ह भूत्वाऽसुरांस्ततर्ह॥5॥
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति।
आचार्यो ब्रह्मचर्य्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते॥6॥
ब्रह्मचर्य्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्।
अनड्वान् ब्रह्मचर्य्येणाश्वो घासं जिगीषति॥7॥
ब्रह्मचर्य्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत।
इन्द्रो ह ब्रह्मचर्य्येण देवेभ्यः स्वराभरत्॥8॥
-अथर्व॰ कां॰ 11। अनु॰ 3। मं॰ 6 , 7 , 17 , 18 , 19॥

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पदार्थों की प्राप्ति के लिए इन चार आश्रमों का सेवन करना सब मनुष्यों को उचित है। इनमें से प्रथम ब्रह्मचर्य्याश्रम जो कि सब आश्रमों का मूल है, उस के ठीक-ठीक सुधरने से सब आश्रम सुगम और बिगड़ने से नष्ट हो जाते हैं। इस आश्रम के विषय में वेदों के अनेक प्रमाण हैं, उन में से कुछ यहां भी लिखते हैं-
(आचार्य्य उ॰) अर्थात् जो गर्भ में बस के माता और पिता के सम्बन्ध से मनुष्य का जन्म होता है, वह प्रथम जन्म कहाता है। और दूसरा यह है कि जिस में आचार्य्य पिता और विद्या माता होती है, इस दूसरे जन्म के न होने से मनुष्य को मनुष्यपन नहीं प्राप्त होता। इसलिये उस को प्राप्त होना मनुष्यों को अवश्य चाहिए। जब आठवें वर्ष पाठशाला में जाकर आचार्य्य अर्थात् विद्या पढ़ानेवाले के समीप रहते हैं, तभी से उन का नाम ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारिणी हो जाता है। क्योंकि वे ब्रह्म वेद और परमेश्वर के विचार में तत्पर होते हैं। उन को आचार्य्य तीन रात्रिपर्य्यन्त गर्भ में रखता है। अर्थात् ईश्वर की उपासना, धर्म, परस्पर विद्या के पढ़ने और विचारने की युक्ति आदि जो मुख्य-मुख्य बातें हैं, वे सब तीन दिन में उन को सिखाई जाती हैं। तीन दिन के उपरान्त उन को देखने के लिये अध्यापक अर्थात् विद्वान् लोग आते हैं॥1॥
(ब्रह्मचार्येति॰) जो ब्रह्मचारी होता है, वही ज्ञान से प्रकाशित तप और बड़े बड़े केश श्मश्रुओं से युक्त दीक्षा को प्राप्त होके विद्या को प्राप्त होता है। तथा जो कि शीघ्र ही विद्या को ग्रहण करके पूर्व समुद्र जो ब्रह्मचर्याश्रम का अनुष्ठान है, उसके पार उतर के उत्तर समुद्रस्वरूप गृहाश्रम को प्राप्त होता है और अच्छी प्रकार विद्या का संग्रह करके विचारपूर्वक अपने उपदेश का सौभाग्य बढ़ाता है॥4॥
(ब्रह्मचारी ज॰) वह ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथार्थ जान के प्राणविद्या, लोकविद्या तथा प्रजापति परमेश्वर जो कि सब से बड़ा और सब का प्रकाशक है, उस का जानना, इन विद्याओं में गर्भरूप और इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त हो के असुर अर्थात् मूर्खों की अविद्या का छेदन कर देता है॥5॥
(ब्रह्मचर्येण त॰) पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के और सत्यधर्म के अनुष्ठान से राजा राज्य करने को और आचार्य विद्या पढ़ाने को समर्थ होता है। आचार्य उस को कहते हैं कि जो असत्याचार को छुड़ा के सत्याचार का और अनर्थों को छुड़ा के अर्थों का ग्रहण कराके ज्ञान को बढ़ा देता है॥6॥
(ब्रह्मचर्येण क॰) अर्थात् जब वह कन्या ब्रह्मचर्याश्रम से पूर्ण विद्या पढ़ चुके, तब अपनी युवावस्था में पूर्ण जवान पुरुष को अपना पति करे। इसी प्रकार पुरुष भी सुशील धर्मात्मा स्त्री के साथ प्रसन्नता से विवाह करके दोनों परस्पर सुख दुःख में सहायकारी हों। क्योंकि अनड्वान् अर्थात् पशु भी जो पूरी जवानी पर्यन्त ब्रह्मचर्य अर्थात् सुनियम में रक्खा जाय तो अत्यन्त बलवान् हो के निर्बल जीवों को जीत लेता है॥7॥
(ब्रह्मचर्य्येण त॰) ब्रह्मचर्य्य और धर्मानुष्ठान से ही विद्वान् लोग जन्म मरण को जीत के मोक्षसुख को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे इन्द्र अर्थात् सूर्य परमेश्वर के नियम में स्थित हो के सब लोकों का प्रकाश करने वाला हुआ है, वैसे ही मनुष्य का आत्मा ब्रह्मचर्य से प्रकाशित हो के सब को प्रकाशित कर देता है। इस से ब्रह्मचर्याश्रम ही सब आश्रमों से उत्तम है॥
(ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका)
ब्रह्मचर्य तीन प्रकार का होता है-
1. वसु नामक कनिष्ठ ब्रह्मचर्य 24 वर्ष पर्यन्त,
2. रुद्र नामक मध्यम ब्रह्मचर्य 44 वर्ष पर्यन्त और
3. आदित्य नामक उत्तम ब्रह्मचर्य 48 वर्ष पर्यन्त।
इस प्रकार वेद में ब्रह्मचर्य कि महिमा पर अनेक वेद मंत्रो द्वारा उपदेश दिया गया है |
आयुर्वेद के आदि ग्रन्थ ' चरक संहिता' में ब्रह्मचर्य को सांसारिक सुख का साधन ही नहीं, मोक्ष का दाता भी बताया गया हैः
सत्तामुपासनं सम्यगसतां परिवर्जनम्।
ब्रह्मचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः।।
' सज्जनों की सेवा, दुर्जनों का त्याग, ब्रह्मचर्य, उपवास, धर्मशास्त्र के नियमों का ज्ञान और अभ्यास आत्मकल्याण का मार्ग है। '
नेत्र व कपोल अंदर धंस जाना, कोई रोग न होने पर भी शरीर का जर्जर, ढीला सा रहना, गालों में झाँई-मुँहासे, काले चकते पड़ना, जोड़ों में दर्द, तलवे तथा हथेली पसीजना, अपच और कब्जियत, रीढ़ की हड्डी का झुक जाना, एकाएक आँखों के सामने अँधेरा छा जाना, मूर्छा आ जाना, छाती के मध्य भाग का अंदर धंस जाना, हड्डियाँ दिखना, आवाज का रूखा और अप्रिय बन जाना, सिर, कमर तथा छाती में दर्द उत्पन्न होना – ये वे शारीरिक विकार हैं जो वीर्य रक्षा न करने वाले युवकों में पाये जाते हैं।
वीर्य को नष्ट करने वाला जीवनभर रोगी, दुर्भाग्यशाली और दुःखी रहता है। उसका स्वभाव चिड़चिड़ा, क्रोधी और रूक्ष बन जाता है। उसके मन में कामी विचार हुड़दंग मचाते रहते हैं, मानसिक दुर्बलता बढ़ जाती है, स्मृति कमजोर हो जाती है।
जैसे सूर्य संसार को प्रकाश देता है, वैसे ही वीर्य मनुष्य और पशु-पक्षियों में अपना प्रभाव दिखाता है।
ऋषियों का कहना है ,
धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मिको लोकदम्भकः।
वैडालव्रतिको ज्ञेयो हिंस्रः सर्वाभिसन्धकः॥1॥
अधोदृष्टिर्नैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः।
शठो मिथ्याविनीतश्च वकव्रतचरो द्विजः॥2॥मनु॰॥
(धर्मध्वजी) धर्म कुछ भी न करे परन्तु धर्म के नाम से लोगों को ठगे (सदा लुब्धः) सर्वदा लोभ से युक्त (छाद्मिकः) कपटी (लोकदम्भकः) संसारी मनुष्यों के सामने अपनी बड़ाई के गपोड़े मारा करे (हिंस्रः) प्राणियों का घातक, अन्य से वैरबुद्धि रखनेवाला (सर्वाभिसन्धकः) सब अच्छे और बुरों से भी मेल रक्खे उस को वैडालव्रतिक अर्थात् विडाल के समान धूर्त्त और नीच समझो॥1॥
(अधोदृष्टिः) कीर्ति के लिये नीचे दृष्टि रक्खे (नैष्कृतिकः) ईर्ष्यक किसी ने उस का पैसा भर अपराध किया हो तो उसका बदला लेने को प्राण तक तत्पर रहै (स्वार्थसाधनतत्परः) चाहै कपट अधर्म विश्वासघात क्यों न हो अपना प्रयोजन साधने में चतुर (शठः) चाहै अपनी बातें झूठी क्यों न हों परन्तु हठ कभी न छोड़े (मिथ्याविनीतः) झूठ मूँठ ऊपर से शील सन्तोष और साधुता दिखलावे उस को (वकव्रत) बगुले के समान नीच समझो। ऐसे-ऐसे लक्षणों वाले पाखण्डी होते हैं, उन का विश्वास व सेवा कभी न करें॥2॥
पढ़ाने में अयोग्य और मूर्ख के लक्षण—
अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः।
अर्थांश्चाऽकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः॥1॥
अनाहूतः प्रविशति ह्यपृष्टो बहु भाषते।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः॥2॥
—ये श्लोक भी महाभारत उद्योग पर्व विदुरप्रजागर के हैं।
अर्थ— जिस ने कोई शास्त्र न पढ़ा न सुना अतीव घमण्डी, दरिद्र होकर बड़े-बड़े मनोरथ करनेहारा, विना कर्म से पदार्थों की प्राप्ति की इच्छा करने वाला हो, उसी को बुद्धिमान् लोग मूढ़ कहते हैं॥1॥
जो विना बुलाये सभा वा किसी के घर में प्रविष्ट हो उच्च आसन पर बैठना चाहै विना पूछे सभा में बहुत सा बके; विश्वास के अयोग्य वस्तु वा मनुष्य में विश्वास करे वही मूढ़ और सब मनुष्यों में नीच मनुष्य कहाता है॥2॥
जहां ऐसे पुरुष अध्यापक, उपदेशक, गुरु और माननीय होते हैं वहां अविद्या, अधर्म, असभ्यता, कलह, विरोध और फूट बढ़ के दुःख ही बढ़ता जाता है।
अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।
धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः॥मनु॰॥
जो पुरुष (अर्थ) सुवर्णादि रत्न और (काम) स्त्रीसेवनादि में नहीं फंसते हैं उन्हीं को धर्म का ज्ञान प्राप्त होता है जो धर्म के ज्ञान की इच्छा करें वे वेद द्वारा धर्म का निश्चय करें क्योंकि धर्माऽधर्म का निश्चय विना वेद के ठीक-ठीक नहीं होता।
🔥असतो मा सदगमय , तमसो मा ज्योतिर्गमय 🔥

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