Wednesday, April 15, 2020

"लाला लाजपतराय की शिमला में स्थापित प्रतिमा" एवं "आर्य स्वराज्य सभा" का इतिहास




"लाला लाजपतराय की शिमला में स्थापित प्रतिमा" एवं "आर्य स्वराज्य सभा" का इतिहास

डॉ विवेक आर्य, प्रियांशु सेठ

आप सभी शिमला रिज की सैर करने जाते है, तो आपको लाला लाजपतराय की प्रतिमा के दर्शन होते है। लाला जी की प्रतिमा के नीचे लिखे पट्ट पर आपको आर्य स्वराज्य सभा द्वारा स्थापित लिखा मिलता हैं। यह आर्य स्वराज्य सभा क्या थी? इसकी स्थापना किसने की थी?

"आर्य स्वराज्य सभा" की स्थापना - क्यों और कार्य"

1947 से पहले लाहौर आर्यसमाज का गढ़ था। आर्यसमाज के अनेक मंदिर, DAV संस्थाएं, पंडित गुरुदत्त भवन, विरजानन्द आश्रम, दयानन्द ब्रह्म विद्यालय, हज़ारों कार्यकर्ता आदि लाहौर में थे। आर्यसमाज के अनेक कार्यकर्ताओं में एक थे पंडित रामगोपाल जी शास्त्री वैद्य। आप पहले डीएवी में शिक्षक, शोध विभाग आदि में कार्यरत थे। आपने भगत सिंह को कभी नेशनल कॉलेज में पढ़ाया भी था।  कुशल और सफल चिकित्सक होने के अतिरिक्त श्री पं० रामगोपालजी शास्त्री वैद्य एक आस्थाशील दृढ़ आर्यसमाजी, ऋषि दयानन्द के अटूट भक्त और रक्त की अन्तिम बूंद तक हिन्दुत्व के सजग प्रहरी तथा अडिग राष्ट्रसेवक थे। देश में जब गांधीजी और कांग्रेस के नेतृत्व में इस सदी के दूसरे दशक में- जलियांवाला बाग, अमृतसर हत्याकाण्ड के बाद स्वराज्य का तीव्र आन्दोलन चल रहा था, उस समय गांधीजी ने स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य के साथ मुसलमानों को खुश करने के लिए खिलाफत का मसला भी जोड़ दिया था, यद्यपि विश्व के समस्त मुसलमानों का -केवल भारत के मुसलमानों का नहीं- खलीफा टर्की में रहता था और उसे पदच्युत टर्की के राष्ट्रपति कमाल पाशा ने ही किया था। भारत की स्वतन्त्रता का इस प्रश्न के साथ दूर का भी सरोकार नहीं था। गांधीजी की इस अदूरदर्शिता का परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस हर कीमत पर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को अपनाकर भारत की बहुसंख्यक हिन्दु-जाति को पद दलित करने लगी। फलतः मुसलमानों में मजहबी जोश इतना भड़क गया कि उनके द्वारा कोहाट, सहारनपुर, मुलतान, बरेली, शाहजहांपुर इत्यादि उत्तर भारत के नगरों में भयंकर दङ्गे हुए, सैकड़ों हिन्दु मारे गये, लाखों-करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हुई, हिन्दु अबलाओं पर नृशंस और रोमांचकारी अत्याचार, बलात् धर्मपरिवर्तन, नारी-अपहरण, स्वामी श्रद्धानन्दजी सहित दर्जनों आर्य हिन्दु नेताओं की हत्या इत्यादि अनेक अमानुषिक अत्याचार हुए। मलाबार का मोपला काण्ड तो औरंगजेब के अत्याचारों को भी मात कर गया था। मुसलमान स्वराज्य का अभिप्राय इस्लामी सल्तनत समझने लग गये थे।

1922  में "आर्य स्वराज्य सभा" की स्थापना वैद्य पं० रामगोपालजी शास्त्री तथा उनके अन्य  सहयोगियों ने की थी। आप यद्यपि कट्टर देशभक्त, राष्ट्रप्रेमी स्वराज्य प्राप्ति के लिये अधिक से अधिक त्याग करने में अग्रगण्य थे पर उनका यह कथन था कि मुसलमानों के विपरीत हिन्दू ही एक ऐसा सुदृढ़ वर्ग है जो बहुसंख्यक होता हुआ इस भारत भूमि को ही लाखों-करोड़ों वर्षों से अपनी मातृभूमि और पितृभूमि समझता रहा है और अब भी समझता है। उसे दूसरे स्तर का नागरिक बना, उसके अधिकारों को कुचल कर अल्पसंख्यक बना देना सर्वथा असह्य, अमान्य और सतत संघर्ष के बीज का वपन करना है। "आर्य स्वराज्य सभा" ने शुद्धि, नारी-रक्षा, हरिजन-सेवा, अस्पृश्यता-निवारण सर्वजातीय प्रीति-भोज, कूंओं पर से हरिजनों को जल लेने देना इत्यादि उपायों द्वारा लाहौर और पंजाब में प्रशंसनीय कार्य किया। आर्य स्वराज्य सभा की ओर से एक केन्द्रीय आश्रम (रामकृष्ण सेवा आश्रम) लाहौर में रावी मार्ग पर स्थित था, जहां प्रतिदिन यज्ञ, सत्संग, शिक्षण इत्यादि कार्यों के अतिरिक्त हिन्दुत्वरक्षक और हिन्दुत्वप्रवर्धक विविध प्रवृत्तियां निरन्तर चलती रहती थीं।

सभा की ओर से लाला लाजपतराय की प्रतिमा का अनावरण

1929 दिसम्बर में पं० जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुए कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर कई कांग्रेसी नेताओं के विरोध के बावजूद आर्य स्वराज्य सभा की ओर से लाहौर के गोल बाग में स्थापित ला० लाजपतराय की प्रतिमा का अनावरण केन्द्रीय धारा सभा के अध्यक्ष श्री विट्ठल भाई पटेल (सरदार पटेल के बड़े भाई) द्वारा कराया गया। यह समारोह अत्यन्त सफल और प्रभावी था। विभाजन के बाद यह प्रतिमा लाहौर से शिमला में स्थानांतरित कर दी गई।  इसी प्रतिमा के आपको रिज पर दर्शन होते है।

रामगोपाल शास्त्री जी विभाजन के उपरांत लाहौर से करोलबाग दिल्ली में बस गए। आपकी स्मृति में आर्यसमाज करोलबाग में प्रतिवर्ष वैदिक स्मृति व्याख्यान होता हैं।


Tuesday, April 14, 2020

वेदों का दार्शनिक महत्त्व



वेदों का दार्शनिक महत्त्व

लेखक- स्वामी दर्शनानन्द जी
प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ

प्यारे मित्रों! आप एक और भी ध्यान रखें कि जिस समय संसार में सूर्य की किरणें आनी आरम्भ होती हैं तो अन्धेरा एकदम से उड़ जाता है लेकिन दीपकों के प्रकाश से अन्धेरा बहुत कम उड़ता है और उसका प्रकाश दूर तक नहीं पहुंचता, इसलिये जिस पुस्तक से संसार की सम्पूर्ण मूर्खता नष्ट हो जाय और मनुष्यों में से द्वेष भाव हटकर एकता पैदा हो जाय वही ईश्वरकृत पुस्तक है। अब हम वेद में इन्हीं बातों की ढूंढ (खोज) करेंगे। यदि इस समय देश में देखा जाय कि कितनी बातें ऐसी हैं कि जिनके कारण मनुष्य आपस में भाई-भाई होने पर भी और बुद्धिमान् हो करके भी एक दूसरे के दुःखदाई शत्रु बन रहे हैं, जब हम भले प्रकार सोचते हैं तो ज्ञात होता है कि पहिली बात जिसने संसार को टुकड़ा-टुकड़ा किया ईश्वर के न मानने का है। जो लोग नास्तिक हैं वे ईश्वर का होना नहीं मानते। दूसरी बात ईश्वर की गणना की है अर्थात् ईश्वर एक है या अनेक? क्योंकि ईसाई तीन मानते हैं बाप, बेटा और पवित्र आत्मा। यवन एक मानते हैं। हिन्दू तीन मानते हैं, अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, शिव। जैनी २४ मानते हैं, वरन् इससे भी अधिक, और आर्य एक मानते हैं। सारांश यह है कि इस बात में भिन्नता है।

तीसरा झगड़ा ईश्वर के स्थान का है अर्थात् ईश्वर कहाँ है? कोई सातवें आकाश पर मानता है अर्थात् यवन। ईसाई चौथे आकाश पर मानते हैं। जैनी मोक्षशिला (सिद्ध शिला) पर मानते हैं। हिन्दू वैकुण्ठ में मानते हैं। कोई क्षीर सागर में मानता है, कोई गोलोक में मानता है, शैवी कैलाश पर मानते हैं, सारांश यह कि इस बात में बड़ी-बड़ी भिन्नता विद्यमान हैं। चौथा झगड़ा इस बात का है कि ईश्वर कर्मों का फल किस प्रकार देता है? जैनी तो ईश्वर को फलदाता मानते ही नहीं। यवन कहते हैं कि "मुनकिर और नकीर" फरिश्ते कबर (समाधि) पर आकर मृतक से प्रश्न करते हैं और कयामत के दिन उनका हिसाब होता है। ईसाई भी कयामत के मानने वाले हैं। और हिन्दुओं का यह मत है कि यमदूत उसको यम लोक में ले जाते हैं। वहां चित्रगुप्त यमराज का मीर मुन्शी बही-खाता लिखता रहता है और उसके अनुसार हिसाब होकर कर्म फल दिया जाता है। तात्पर्य यह है कि इस बात में और भी बहुत-सी भिन्नतायें हैं। पांचवां झगड़ा इस बात का है कि ईश्वर ने संसार को किस वस्तु से पैदा किया। यवन कहते हैं कि अवस्तु से वस्तु को उत्पन्न किया अर्थात् 'कुन', कहते ही सब सृष्टि उत्पन्न हो गई। ईसाई भी अवस्तु से वस्तु मानने वालों के साथी हैं। जैनी तो उसकी उत्पत्ति मानते ही नहीं। हिन्दुओं में भी इस बात में बड़ी भिन्नता है। कोई तो अविद्या से जगत् की उत्पत्ति मानता है, कोई पंच भूतों से। तात्पर्य यह है कि यह बात भी झगड़े में पड़ी हुई है। छठा झगड़ा इस बात का है कि जीव और ईश्वर में भेद है या नहीं? यवन तो हमेओस्त (सर्वव्यापक) के मानने वाले हैं, हिन्दुओं में विशिष्टाद्वैत, अद्वैत, शुद्धाद्वैत इत्यादि बहुत प्रकार की भिन्नता है। सातवां झगड़ा इस बात का है कि अनादि पदार्थ कितने हैं। यवन एक, हिन्दू भिन्न-भिन्न, ईसाई तीन, जैनी सब संसार को अनादि मानते हैं। आठवां झगड़ा वह है जो इन सब झगड़ों की जड़ है। वह है कि मुक्ति किस प्रकार हो सकती है? जैनी कर्म से, यवन प्रार्थना से, ईसाई कुफारा से, हिन्दू उपासना-ज्ञान-कर्म इत्यादि भिन्न-भिन्न नियमों से मुक्ति मानते हैं।

प्यारे पाठकगण! ये आठ झगड़े हैं जिसके कारण इस समय संसार में आत्मिक और शारीरिक दोनों प्रकार की लड़ाई हो रही है। अब देखना यह है कि वैदिक शिक्षा इन आठ झगड़ों को दूर कर सकती है या नहीं? मैं इस समय केवल उपनिषद् का एक वाक्य जो ऋग्वेद के एक मन्त्र का स्पष्ट अनुवाद है प्रस्तुत करता हूं-

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा य: करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतन्नेतरेषाम्।।१२।।
पहिला प्रश्न यह था कि ईश्वर है या नहीं। दूसरा यह था कि ईश्वर एक है या अनेक। उसका उत्तर मिला कि एक है, क्योंकि नहीं का उत्तर 'है' कहने से और बहुत का उत्तर 'एक' कहने से आ गया। अब प्रश्न उत्पन्न हुआ कि एक क्यों है! और वह कहां है? उसका उत्तर मिला कि सर्वव्यापक है, क्योंकि जहां दो होंगे वहां बीच की दूरी अवश्य होगी और जहां दूरी हो वह परिमित होगा, इसलिये जो परमात्मा अनन्त है वह एक ही है और उसमें झगड़ा भी मिट गया कि वह कहां है, क्योंकि चौथे-सातवें आकाश या वैकुण्ठ, क्षीर सागर इत्यादि में मानने से परिमित हो जाता है। फिर प्रश्न उत्पन्न हुआ कि कहां व्यापक है। उसका उत्तर मिला कि (सर्वभूतान्तरात्मा) अर्थात् कुल जीवों और पदार्थों के भीतर विद्यमान है और ऐसा कहने से इस प्रश्न का उत्तर ही मिल गया कि ईश्वर कर्मों का फल किस प्रकार देते हैं अर्थात् वह प्रत्येक जीवात्मा के भीतर सब के कर्मों का साक्षी होकर देखता है और स्वयं ही उनका फल देता है। बहुत-से मित्र कहेंगे कि हिन्दुओं के यमलोक का सिद्धान्त क्यों न माना जाय लेकिन याद रहे कि एजेण्ट, पैगम्बर या दूत का मानना परिमित होने के रोग का निदान है, चूंकि परमेश्वर को यह रोग नहीं इसलिये उसके एजेण्ट या कारिन्दा, दूत इत्यादि कोई नहीं है। और न उसके दूत माने जा सकते हैं, क्योंकि जहां परमात्मा स्वयं विद्यमान न हो वहां पर उसके पैगम्बर, एजेण्ट और दूत काम करते हैं। इसलिये ऐसा कहने से सिवाय परमात्मा की अप्रतिष्ठा करने के और कोई लाभ नहीं। बही-खाते का रखना यह भूल के रोग की चिकित्सा है। क्योंकि परमात्मा को भूल का रोग नहीं है इसलिये उसके दरबार में लिखने का कोई काम नहीं। यह केवल सांसारिक राजाओं की जो थोड़े ज्ञान और थोड़ी शक्ति वाले हैं आवश्यकता है। कुछ मित्र यह कहेंगे कि 'मुनकिर' 'नकीर' के प्रश्नोत्तर को क्यों न मान लिया जाय? प्रथम तो यह वाक्य इस बात से मिथ्या है कि जब जीव शरीर से निकल जाता है तब उसको कबर में गाड़ते हैं। उस समय जो प्रश्न कबर पर किये जावेंगे वे शरीर से होंगे न कि जीव से। दूसरे, प्रश्न वह मनुष्य करता है जिसको उत्तर मिलने से पहले उसका ज्ञान नहीं होता, चूंकि ईश्वर सबका जानने वाला है इसलिये उस पर प्रश्न तथा उत्तर का अभियोग लगाना भी ठीक नहीं। तीसरे कयामत का सिद्धान्त तो सर्वांश में मिथ्या है, क्योंकि प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जीव मर कर कुल एक स्थान पर जाते हैं या अलग-अलग स्थानों पर? यदि कहो कि एक स्थान पर तो भलों को बुरों के साथ में बन्दीगृह में रखना ईश्वर के न्याय पर धब्बा है। यदि कहो कि नेकों को अच्छे स्थान पर भेजा जाता है और बुरों को दूसरे स्थान पर, तो बस समझो कि न्याय यहीं हो चुका, कयामत की आवश्यकता ही नहीं रही। यह सिद्धान्त तो केवल मूर्ख लोगों ने संसारी बादशाहों के बन्दीगृहों और कारागार को देखकर गढ़ लिया है, क्योंकि दुनिया में न्याय तिथि तक अपराधी बन्दीगृह में रहता है और उसके पश्चात् या तो वह छूट जाता है या कारागार में भेजा जाता है। पांचवां झगड़ा यह है कि ईश्वर ने संसार को किस वस्तु से बनाया? कुछ तो यह कहते हैं कि ईश्वर ने संसार को उत्पन्न ही नहीं किया, जैसा कि जैनी और बौद्ध, परन्तु उनका यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि बदलने वाली वस्तु अनादि नहीं हो सकती और यह दुनिया बदलने वाली है, इसलिये यह अनादि तो नहीं हो सकती। अब यवन कहते हैं कि असत् से सत् में आ गये परन्तु उनका यह कहना भी मिथ्या है, क्योंकि अवस्तु से वस्तु की उत्पत्ति या आग से सर्दी की उत्पत्ति मानना बुद्धि और ज्ञान के विरुद्ध है, परन्तु हमारे यवन भाई कहते हैं कि जब ईश्वर ने 'कुन' कहा तो दुनिया उत्पन्न हो गई। यहां पर सोचना चाहिए कि 'कुन' किसको कहा, क्योंकि 'कुन' विधि है और आज्ञा दूसरे पर होती है। जब दूसरा है ही नहीं तो 'कुन' कहना नितान्त झूठ हो गया। बहुत से हिन्दू कहते हैं कि अविद्या से जगत् बन गया परन्तु यह सिवाय ईश्वर के किसी दूसरी वस्तु को मानते ही नहीं, अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि तुम्हारी अविद्या कोई वस्तु है या नहीं। यदि कहें कोई वस्तु है तो स्वयं उनका सिद्धान्त मिथ्या हो गया क्योंकि वस्तु नहीं तो अवस्तु से वस्तु की उत्पत्ति हो नहीं सकती। इन सारी अशुद्धियों को देखकर वेद ने उनके दूर करने के लिए उत्तर दिया कि 'जो एक सूक्ष्म प्रकृति से अर्थात् वस्तुओं के परमाणुओं से बहुत प्रकार की स्थूल वस्तुएं बनाता है।'

छठा झगड़ा संसार में यह पड़ा हुआ है कि जीव और ब्रह्म एक हैं या अलग-अलग? इसका उत्तर दिया गया कि उस आत्मा में रहने वाले को, अर्थात् जीव और ईश्वर का आधार-आधेयभाव सम्बन्ध है, सम्बन्ध सदैव दो में होता है इसलिये जीव और ब्रह्म दो पदार्थ हैं।

सातवां झगड़ा यह था कि पदार्थ अनादि कितने हैं, उत्तर मिला जो उसके भीतर दीखते हैं अर्थात् देखने वाला जीव और देखने की वस्तु प्रकृति और उसके भीतर देखने के योग्य परमात्मा यह तीन पदार्थ ही अनादि हैं।

फिर प्रश्न यह था कि मुक्ति किस प्रकार हो सकती है? उत्तर मिला, जो ईश्वर एक सारे जगत् में व्याप्त रूप सब की आन्तरिक अवस्था को जानने वाला और अपने आप कर्म का फल देने वाला प्रकृति से जगत् का उत्पादक और जीव ब्रह्म का भेद, इन तीन पदार्थों को अनादि मानते हैं उन्हीं की मुक्ति हो सकती है दूसरों की नहीं। प्यारे पाठकगण! हमारे मित्र बहुधा कह उठेंगे कि तुम्हारी मुक्ति उसी तरह की है जिस तरह की ईसाई कहते हैं कि ईसामसीह पर विश्वास लाने से मुक्ति होती है। मुसलमान मुहम्मद के अनुग्रह से मुक्ति मानते हैं, लेकिन उनका यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि यह तो प्रत्येक मनुष्य जानता है कि जिस स्थान पर पुलिस अफसर मौजूद हो वहां पर कोई भी चोरी नहीं करता जबकि उसको विश्वास हो कि मैं घूंस देकर बच नहीं सकता। इसी तरह जो मनुष्य ईश्वर को सब स्थानों में और सब कर्मों का फल देने वाला मानता है वह कहीं भी पाप नहीं कर सकता, फिर उसे कष्ट किस तरह हो सकता है! और जो ईश्वर को परिमित मानते हैं उनके मत में तो ईश्वर का होना न होना बराबर है और प्रकृति से जगत् की उत्पत्ति मानने का तात्पर्य यह है कि जिससे ज्ञात रहे कि इस जगत् में आनन्द नहीं क्योंकि सत् प्रकृति है, सत्चित् जीव अर्थात् आत्मा और सत्चित् आनन्द परमात्मा है। जब प्रकृति सत् ठहरी और जगत् उसका कार्य है तो जगत् से आनन्द की इच्छा करना ठीक नहीं और तीन पदार्थों के नित्य मानने से यह लाभ है कि प्रकृति की उपासना से दुःख होता है और परमात्मा की उपासना से सुख होता है। और जीव, सुख-दुःख और बन्ध-मोक्ष दोनों से भिन्न साक्षीरूप है। और संसार के जितने मत हैं सब में इस बात के अज्ञान से सहस्त्रों त्रुटियां हो गईं कि पाप कौन कराता है, पुण्य कहां से होता है। परन्तु उचित उत्तर नहीं था, वैदिक धर्म ने उसका उत्तर ऐसा दिया कि अब कहने का अवकाश नहीं अर्थात् प्रकृति संसर्ग से मूर्खता और पाप उत्पन्न होता है जिसका फल दुःख है और परमात्मा के संसर्ग से पुण्य उत्पन्न होता है जिसका फल सुख है।

Monday, April 13, 2020

क्या द्रोपदी के पांच पति थे? क्या कहती है महाभारत?



क्या द्रोपदी के पांच पति थे? क्या कहती है महाभारत?

राकेश कुमार आर्य

द्रोपदी महाभारत की एक आदर्श पात्र है। लेकिन द्रोपदी जैसी विदुषी नारी के साथ हमने बहुत अन्याय किया है। सुनी-सुनाई बातों के आधार पर हमने उस पर कई ऐसे लांछन लगाये हैं, जिससे वह अत्यंत पथभ्रष्ट और धर्म भ्रष्ट नारी सिद्ध होती है। एक ओर धर्मराज युधिष्ठिर जैसा परमज्ञानी उसका पति है, जिसके गुणगान करने में हमने कमी नहीं छोड़ी। लेकिन द्रौपदी पर अतार्किक आरोप लगाने में भी हम पीछे नहीं रहे।

द्रौपदी पर एक आरोप है कि उसके पांच पति थे। हमने यह आरोप महाभारत की साक्षी के आधार पर नहीं बल्कि सुनी सुनाई कहानियों के आधार पर लगा दिया। बड़ा दु:ख होता है जब कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति भी इस आरोप को अपने लेख में या भाषण में दोहराता है। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि पर तरस आता है, और मैं सोचा करता हूं कि ये लोग अध्ययन के अभाव में ऐसा बोल रहे हैं, पर इन्हें यह नही पता कि ये भारतीय संस्कृति का कितना अहित कर रहे हैं।
आईए महाभारत की साक्षियों पर विचार करें! जिससे हमारी शंका का समाधान हो सके कि द्रौपदी के पांच पति थे या एक, और यदि एक था तो फिर वह कौन था?
जिस समय द्रौपदी का स्वयंवर हो रहा था। उस समय पांडव अपना वनवास काट रहे थे। ये लोग एक कुम्हार के घर में रह रहे थे और भिक्षाटन के माध्यम से अपना जीवन यापन करते थे। तभी द्रोपदी के स्वयंवर की सूचना उन्हें मिली। स्वयंवर की शर्त को अर्जुन ने पूर्ण किया। स्वयंवर की शर्त पूरी होने पर द्रौपदी को उसके पिता द्रुपद ने पांडवों को भारी मन से सौंप दिया। राजा द्रुपद की इच्छा थी कि उनकी पुत्री का विवाह किसी पांडु पुत्र के साथ हो, क्योंकि उनकी राजा पांडु से गहरी मित्रता रही थी। राजा द्रुपद पंडितों के भेष में छुपे हुए पांडवों को पहचान नही पाए।  इसलिए उन्हें यह चिंता सता रही थी कि आज बेटी का विवाह उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हो पाया। पांडव द्रौपदी के साथ अपनी माता कुंती के पास पहुंच गये।

माता कुंती ने क्या कहा-

पांडु पुत्र भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने प्रतिदिन की भांति अपनी भिक्षा को लाकर उस सायंकाल में भी अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठर को निवेदन की। तब उदार हृदया कुंती माता ने द्रौपदी से कहा-’भद्रे! तुम भोजन का प्रथम भाग लेकर उससे बलिवैश्वदेवयज्ञ करो तथा ब्राहमणों को भिक्षा दो। अपने आसपास जो दूसरे मनुष्य आश्रित भाव से रहते हैं, उन्हें भी अन्न परोसो। फिर जो शेष बचे उसका आधा हिस्सा भीमसेन के लिए रखो। पुन: शेष के छह भाग करके चार भाईयों के लिए चार भाग पृथक-पृथक रख दो, तत्पश्चात मेरे और अपने लिए भी एक-एक भाग अलग-अलग परोस दो। उनकी माता कहती है कि कल्याणि! ये जो गजराज के समान शरीर वाले, हष्ट-पुष्ट गोरे युवक बैठे हैं इनका नाम भीम है, इन्हें अन्न का आधा भाग दे दो क्योंकि यह वीर सदा से ही बहुत खाने वाले हैं।
महाभारत की इस साक्षी से स्पष्ट है कि माता कुंती से पांडवों ने ऐसा नही कहा था कि आज हम तुम्हारे लिए बहुत अच्छी भिक्षा लाए हैं और न ही माता कुंती ने उस भिक्षा को (द्रोपदी को) अनजाने में ही बांट कर खाने की बात कही थी। माता कुंती विदुषी महिला थीं।  उन्हें द्रौपदी को अपनी पुत्रवधु के रूप में पाकर पहले ही प्रसन्नता हो चुकी थी।

राजा द्रुपद के पुत्र धृष्टद्द्युम्न पांडवों के पीछे-पीछे उनका सही ठिकाना जानने और उन्हें सही प्रकार से समझने के लिए भेष बदलकर आ रहे थे। उन्होंने पांडवों की चर्चा सुनी उनका शिष्टाचार देखा। पांडवों के द्वारा दिव्यास्त्रों, रथों, हाथियों, तलवारों, गदाओं और फरसों के विषय में उनका वीरोचित संवाद सुना। जिससे उनका संशय दूर हो गया और वह समझ गये कि ये पांचों लोग पांडव ही हैं।  इसलिए वह खुशी-खुशी अपने पिता के पास दौड़ लिये। तब उन्होंने अपने पिता से जाकर कहा-’पिताश्री! जिस प्रकार वे युद्ध का वर्णन करते थे। उससे यह मान लेने में तनिक भी संदेह रह जाता कि वह लोग क्षत्रिय शिरोमणि हैं। हमने सुना है कि वे कुंती कुमार लाक्षागृह की अग्नि में जलने से बच गये थे। अत: हमारे मन में जो पांडवों से संबंध करने की अभिलाषा थी, निश्चय ही वह सफल हुई जान पड़ती है।

राजकुमार से इस सूचना को पाकर राजा को बहुत प्रसन्नता हुई। तब उन्होंने अपने पुरोहित को पांडवों के पास भेजा कि उनसे यह जानकारी ली जाए कि क्या वह महात्मा पांडु के पुत्र हैं? तब पुरोहित ने जाकर पांडवों से कहा –

‘वरदान पाने के योग्य वीर पुरूषो!

वर देने में समर्थ पांचाल देश के राजा द्रुपद आप लोगों का परिचय जानना चाहते हैं। इस वीर पुरूष को लक्ष्यभेद करते देखकर उनके हर्ष की सीमा न रही। राजा द्रुपद की इच्छा थी कि मैं अपनी इस पुत्री का विवाह पांडु कुमार से करूं। उनका कहना है कि यदि मेरा ये मनोरथ पूरा हो जाए तो मैं समझूंगा कि यह मेरे शुभकर्मों का फल प्राप्त हुआ है।

तब पुरोहित से धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा-पांचाल राज द्रुपद  ने यह कन्या अपनी इच्छा से नही दी है, उन्होंने लक्ष्यभेद की शर्त रखकर अपनी पुत्री देने का निश्चय किया था। उस वीर पुरूष ने उसी शर्त को पूर्ण करके यह कन्या प्राप्त की है, परंतु हे ब्राहमण! राजा द्रुपद की जो इच्छा थी वह भी पूर्ण होगी, (युधिष्ठर कह रहे हैं कि द्रोपदी का विवाह उसके पिता की इच्छानुसार पांडु पुत्र से ही होगा।) इस राज कन्या को मैं (यानि स्वयं अपने लिए, अर्जुन के लिए नहीं ) सर्वथा ग्रहण करने योग्य एवं उत्तम मानता हूं…पांचाल राज को अपनी पुत्री के लिए पश्चात्ताप करना उचित नहीं है।

तभी पांचाल राज के पास से एक व्यक्ति आता है, और कहता है-राजभवन में आप लोगों के लिए भोजन तैयार है। तब उन पांडवों को वीरोचित और राजोचित सम्मान देते हुए राजा द्रुपद के राज भवन में ले जाया जाता है।

महाभारत में आता है कि सिंह के समान पराक्रम सूचक चाल ढाल वाले पांडवों को राजभवन में पधारे हुए देखकर राजा द्रुपद, उनके सभी मंत्री, पुत्र, इष्टमित्र आद सबके सब अति प्रसन्न हुए। पांडव सब भोग विलास की सामग्रियों को छोड़कर पहले वहां गये जहां युद्ध की सामग्रियां रखी गयीं थीं। जिसे देखकर राजा द्रुपद और भी अधिक प्रसन्न हुए, अब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि ये राजकुमार पांडु पुत्र ही हैं।

तब युधिष्ठिर ने पांचाल राज से कहा कि राजन! आप प्रसन्न हों क्योंकि आपके मन में जो कामना थी वह पूर्ण हो गयी है। हम क्षत्रिय हैं और महात्मा पांडु के पुत्र हैं। मुझे कुंती का ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर समझिए तथा ये दोनों भीम और अर्जुन हैं। उधर वे दोनों नकुल और सहदेव हैं।

महाभारतकार का कहना है कि युधिष्ठिर के मुंह से ऐसा कथन सुनकर महाराज द्रुपद की आंखों में हर्ष के आंसू छलक पड़े। शत्रु संतापक द्रुपद ने बड़े यत्न से अपने हर्ष के आवेग को रोका, फिर युधिष्ठिर को उनके कथन के अनुरूप ही उत्तर दिया। सारी कुशलक्षेम और वारणाव्रत नगर की लाक्षागृह की घटना आदि पर विस्तार से चर्चा की। तब उन्होंने उन्हें अपने भाईयों सहित अपने राजभवन में ही ठहराने का प्रबंध किया। तब पांडव वही रहने लगे। उसके बाद महाराज दु्रपद ने अगले दिन अपने पुत्रों के साथ जाकर युधिष्ठिर से कहा-

‘कुरूकुल को आनंदित करने वाले ये महाबाहु अर्जुन आज के पुण्यमय दिवस में मेरी पुत्री का विधि पूर्वक पानी ग्रहण करें तथा अपने कुलोचित मंगलाचार का पालन करना आरंभ कर दें। तब धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर ने उनसे कहा-’राजन! विवाह तो मेरा भी करना होगा।

द्रुपद बोले-’हे वीर! तब आप ही विधि पूर्वक मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करें। अथवा आप अपने भाईयों में से जिसके साथ चाहें उसी के साथ मेरी पुत्री का विवाह करने की आज्ञा दें।
द्रुपद के ऐसा कहने पर पुरोहित धौम्य ने वेदी पर प्रज्वलित अग्नि की स्थापना करके उसमें मंत्रों की आहुति दी और युधिष्ठिर व कृष्णा (द्रौपदी) का विवाह संस्कार संपन्न कराया।

इस मांगलिक कार्यक्रम के संपन्न होने पर द्रोपदी ने सर्वप्रथम अपनी सास कुंती से आशीर्वाद लिया, तब माता कुंती ने कहा-’पुत्री! जैसे इंद्राणी इंद्र में, स्वाहा अग्नि में… भक्ति भाव एवं प्रेम रखती थीं उसी प्रकार तुम भी अपने पति में अनुरक्त रहो।’

इससे सिद्ध है कि द्रोपदी का विवाह अर्जुन से नहीं बल्कि युधिष्ठिर से हुआ इस सारी घटना का उल्लेख आदि पर्व में दिया गया है। उस साक्षी पर विश्वास करते हुए हमें इस दुष्प्रचार से बचना चाहिए कि द्रौपदी के पांच पति थे। माता कुंती भी जब द्रौपदी को आशीर्वाद दे रही हैं तो उन्होंने भी कहा है कि तुम अपने पति में अनुरक्त रहो, माता कुंती ने पति शब्द का प्रयोग किया है न कि पतियों का। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि द्रौपदी पांच पतियों की पत्नी नही थी।

माता कुंती आगे कहती हैं कि भद्रे! तुम अनंत सौख्य से संपन्न होकर दीर्घजीवी तथा वीरपुत्रों की जननी बनो। तुम सौभाग्यशालिनी, भोग्य सामग्री से संपन्न, पति के साथ यज्ञ में बैठने वाली तथा पतिव्रता हो।

माता कुंती यहां पर अपनी पुत्रवधू द्रौपदी को पतिव्रता होने का निर्देश भी कर रही हैं। यदि माता कुंती द्रौपदी को पांच पतियों की नारी बनाना चाहतीं तो यहां पर उनका ऐसा उपदेश उसके लिए नहीं होता।

 पाठकबृंद! उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि हमनें द्रौपदी के साथ अन्याय किया है। यह अन्याय हमसे उन लोगों ने कराया है जो नारी को पुरूष की भोग्या वस्तु मानते हैं, उन लम्पटों ने अपने पाप कर्मों को बचाने व छिपाने के लिए द्रौपदी जैसी नारी पर दोषारोपण किया। इस दोषारोपण से भारतीय संस्कृति का बड़ा अहित हुआ।

ईसाईयों व मुस्लिमों ने हमारी संस्कृति को अपयश का भागी बनाने में कोई कसर नही छोड़ी। जिससे वेदों की पावन संस्कृति अनावश्यक ही बदनाम हुई। आज हमें अपनी संस्कृति के बचाव के लिए इतिहास के सच उजागर करने चाहिए जिससे हम पुन: गौरव पूर्ण अतीत की गौरवमयी गाथा को लिख सकें और दुनिया को ये बता सकें कि क्या थे और कैसे थे?

Sunday, April 12, 2020

"महर्षि दयानन्द एवं ब्रह्मचर्य"



"महर्षि दयानन्द एवं ब्रह्मचर्य"

लेखक- ब्रह्मचारी इन्द्रदेव "मेधार्थी" (गुरुकुल झञ्जर)
प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ

समय-समय पर अनेक ऐसे लोकोत्तर महापुरुष हुये हैं जिन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा एवं कर्मशीलता से संसार में मानवता की स्थापना की है। और ब्रह्मचर्य को अपने जीवन में धारण के साथ साथ लोक में भी प्रचार करने का यत्न किया है। किन्तु इस विषय में जितना उत्कर्ष महर्षि दयानन्द जी महाराज को उपलब्ध हुआ ऐसा अन्य महापुरुषों के जीवन में प्रायः नहीं दीख पड़ता। ब्रह्मचर्य के सब प्राणियों का विकास उनके जीवन में अन्तिम सीमा तक पहुंचा हुआ था। उनको हम ब्रह्मचर्य की साक्षात् साकार प्रतिमा एवं आप्त पुरुष मान सकते हैं। ब्रह्मचर्य शब्द की संसार में जितनी व्याख्याएं विद्यमान हैं, उन सबके वे आदर्श उदाहरण स्वरूप हैं। उनके इस ब्रह्मचर्य के महान् गुण को सभी विरोधी एवं प्राणघाती शत्रुओं तक ने मुक्त-कण्ठ से स्वीकार किया है।
ब्रह्मचर्य का पालन सामान्य कार्य नहीं है। जिन लोगों को इस मार्ग पर चलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वही इसकी दुरूहता को अनुभव कर पाते हैं। वास्तव में यह कार्य तलवार की धार पर चलने से भी कठिनतम साधना है। मन या आचरण की क्षणिक असावधानी बहुत भयंकर परिणाम को लाकर उपस्थित कर सकती है। ब्रह्मचर्य रक्षा की चिन्ता योगियों की उन्निद्र आंखों में, ऋषियों के चेहरों की झुर्रियों में और ब्रह्मचारियों की नियमित नियन्त्रित दिनचर्या में किसे नहीं दीख पड़ती? वास्तव में यह एक कठिन परीक्षा है, तपस्या है। बिना ब्रह्मचारी बने कोई भी मनुष्य भगवान् को भी नहीं पा सकता। महर्षि दयानन्द एक निष्कलंक ब्रह्मचारी थे, जो मनुष्य अपने जीवन को जीवन रूप में देखना चाहते हैं, तथा मानव जीवन के आनन्द का उपभोग करना चाहते हैं, उन्हें इस ब्रह्मचर्य मार्ग का पथिक अवश्य बनना चाहिए। वर्तमान युग में लोग ब्रह्मचर्य पालन को असम्भव सा मान बैठे हैं। किन्तु निराश होने की आवश्यकता नहीं, मनुष्य पतन के गर्त में जाने के पश्चात् भी तथा कुसंस्कारों से परिवेष्टित होने पर भी यत्न करके अपने जीवन को पवित्र बना सकता है। हमारे समक्ष महर्षि दयानन्द जी जैसे दिव्य ब्रह्मचारियों के जीवन तथा आदेश प्रकाश-स्तम्भ के रूप में उपस्थित है। जिस मनुष्य को जीवन में ब्रह्मचर्य रक्षा के आनन्द का एक बार भी आस्वादन हो गया, बस फिर तो वह इस अमूल्य रत्न के लिए सर्वस्व वारने को भी उद्यत हो जाता है। महर्षि दयानन्द जी महाराज ने 'सब सुधारों के सुधार' ब्रह्मचर्य को ही माना है।

जिस आर्य जाति में किसी समय ब्रह्मचर्य को सर्वोपरि स्थान दिया जाता था, और जीवन का सारा कार्यक्रम ब्रह्मचर्य पालन को मुख्य मान कर निर्धारित होता था, आज वही जाति ब्रह्मचर्य से हीन होकर पद्दलित हो चुकी है। आज की कामज सन्तान और फिर ये नाच-गाने स्वाङ्ग-सिनेमे तथा श्रृंगार की प्रधानता ब्रह्मचर्य को समूल नष्ट करने पर तुले हुये हैं, किन्तु यह निश्चित ही सत्य सिद्धान्त है कि ब्रह्मचर्य की समाप्ति के साथ संसार की भी इतिश्री हो जावेगी। जो मनुष्य थोड़ी भी बुद्धि रखते हैं, उनका प्रधान कर्तव्य है कि वे अपने भोजन, दिनचर्या, वेशभूषा, पठन-पाठन तथा अन्य बाह्य एवं आन्तरिक व्यवहार को ब्रह्मचर्य के अनुकूल बनावें, और ब्रह्मचर्य का सन्देश को अपनी शक्ति अनुसार चारों दिशाओं में फैला दें। महर्षि दयानन्द जी ने किन मौलिक तत्त्वों को जीवन में धारण करके ब्रह्मचर्य में सिद्धि प्राप्त की थी यह तो पृथक् ही लेख का विषय है। हम लोग ब्रह्मचर्य के महत्त्व को समझ सकें, अतः महर्षि के ग्रन्थों से ब्रह्मचर्य विषयक वचनों का संग्रह मैं पाठकों के समक्ष उपस्थित कर रहा हूं। हमारा सभी का कर्तव्य है कि हम अपने आचार्य के दिव्य वचनों को धारण करके जीवन को पवित्र बनावें।

१. मनुष्य ब्रह्मचर्यादि उत्तम नियमों से त्रिगुण चतुर्गुण आयु कर सकता है, अर्थात् चार सौ वर्ष तक भी सुख से जी सकता है। (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदसंज्ञाविचार)

२. जिसके शरीर में वीर्य नहीं होता, वह नपुंसक, महाकुलक्षणी और जिसको प्रमेह रोग होता है, वह दुर्बल, निस्तेज-निर्बुद्धि और उत्साह-साहस-धैर्य-बल, पराक्रम आदि गुणों से रहित होकर नष्ट हो जाता है। (सत्यार्थप्रकाश, २ समुल्लास)

३. आयु वीर्यादि धातुओं की शुद्धि और रक्षा करना तथा युक्तिपूर्वक ही भोजन-वस्त्र आदि का जो धारण करना है, इन अच्छे नियमों से आयु को सदा बढ़ाओ। (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदोक्तधर्मविषय)

४. देखो, जिसके शरीर में सुरक्षित वीर्य रहता है, उसको आरोग्य, बुद्धि, बल और पराक्रम बढ़ कर बहुत सुख की प्राप्ति होती है। इसके रक्षण की यही रीति है कि विषयों की कथा, विषयी लोगों का सङ्ग, विषयों का ध्यान, स्त्री दर्शन, एकान्त सेवन, सम्भाषण और स्पर्श आदि कर्म से ब्रह्मचारी लोग सदा पृथक् रहकर उत्तम शिक्षा और पूर्ण विद्या को प्राप्त होवें। (सत्यार्थप्रकाश, २ समुल्लास)

५. जो तुम लोग सुशिक्षा और विद्या के ग्रहण और वीर्य की रक्षा करने में इस समय चूकोगे तो पुनः इस जन्म में तुमको यह अमूल्य समय प्राप्त नहीं हो सकेगा। जब तक हम लोग गृह कार्यों को करने वाले जीते हैं, तभी तक तुमको विद्या ग्रहण और शरीर का बल बढ़ाना चाहिये। (सत्यार्थप्रकाश, २ समुल्लास)

६. जो सदा सत्याचार में प्रवृत्त, जितेन्द्रिय और जिनका वीर्य अधःस्खलित कभी न हो उन्हीं का ब्रह्मचर्य सच्चा होता है। (सत्यार्थप्रकाश, ४ समुल्लास)

७. जिस देश में ब्रह्मचर्य विद्याभ्यास अधिक होता है, वही देश सुखी और जिस देश में ब्रह्मचर्य, विद्याग्रहणरहित बाल्यावस्था वाले अयोग्यों का विवाह होता है, वह देश दुःख में डूब जाता है। क्योंकि ब्रह्मचर्य विद्या के ग्रहणपूर्वक विवाह के सुधार ही से सब बातों का सुधार और बिगड़ने से बिगाड़ हो जाता है। (सत्यार्थप्रकाश, ४ समुल्लास)

८. जिस देश में यथायोग्य ब्रह्मचर्य विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार होता है, वही देश सौभाग्यवान् होता है। (सत्यार्थप्रकाश, ३ समुल्लास)

९. ब्रह्मचर्य जो कि सब आश्रमों का मूल है। उसके ठीक-ठीक सुधरने से सब आश्रम सुगम होते हैं और बिगड़ने से बिगड़ जाते हैं। (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वर्णाश्रमविषय)

१०. सर्वत्र एकाकी सोवे। वीर्य स्खलित कभी न करें। जो कामना से वीर्य स्खलित कर दे तो जानो कि अपने ब्रह्मचर्य व्रत का नाश कर दिया। (सत्यार्थप्रकाश, ३ समुल्लास)

११. ब्रह्मचर्य सेवन से यह बात होती है कि जब मनुष्य बाल्यावस्था में विवाह न करे, उपस्थेन्द्रिय का संयम रखे, वेदादिशास्त्रों को पढ़ते-पढ़ाते रहें। विवाह के पीछे भी ऋतुगामी बने रहें। तब दो प्रकार का वीर्य अर्थात् बल बढ़ता है, एक शरीर का और दूसरा बुद्धि का। उसके बढ़ने से मनुष्य अत्यन्त आनन्द में रहता है। (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, उपासनाविषय)

१२. अड़तालीस वर्ष के आगे पुरुष और चौबीस वर्ष के आगे स्त्री को ब्रह्मचर्य न रखना चाहिये। परन्तु यह नियम विवाह करने वाले पुरुष और स्त्रियों के लिए है। और जो विवाह करना ही न चाहें वे मरणपर्यन्त ब्रह्मचारी रह सकें तो भले ही रहें। परन्तु यह काम पूर्ण विद्या वाले, जितेन्द्रिय और निर्दोष योगी स्त्री और पुरुष का है। यह बड़ा कठिन कार्य है कि जो काम के वेग को थाम के इन्द्रियों को अपने वश में रख सके। (सत्यार्थप्रकाश, ३ समुल्लास)

१३. ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी मद्य, मांस, गन्ध, माला, रस, स्त्री और पुरुष का संग, सब खटाई, प्राणियों की हिंसा, अङ्गों का मर्दन, बिना निमित्त उपस्थेन्द्रिय का स्पर्श, आंखों में अञ्जन, जूतों और छत्रधारण, काम-क्रोध, लोभ-मोह-भय-शोक-ईर्ष्याद्वेष, नाच-गान और बाजा बजाना, द्यूत, जिस किसी की कथा, निन्दा, मिथ्याभाषण, स्त्रियों का दर्शन, आश्रय, दूसरों की हानि आदि कुकर्मों को छोड़ देवें। (सत्यार्थप्रकाश, ३ समुल्लास)

१४. पाठशाला से एक योजन अर्थात् चार कोश दूर ग्राम वा नगर रहे। (सत्यार्थप्रकाश, ३ समुल्लास)

१५. जहां विषयों वा अधर्म की चर्चा भी होती हो, वहां ब्रह्मचारी कभी खड़े भी न रहें। भोजन छादन ऐसी रीति से करें कि जिससे कभी रोग-वीर्य हानि, वा प्रमाद न बढ़े। जो बुद्धि का नाश करने हारे नशे के पदार्थ हों उनको ग्रहण कभी न करें। (व्यवहारभानु)

१६. जिससे विद्या, सभ्यता, धर्मात्मना, जितेन्द्रियता आदि की बढ़ती होवे और अविद्या आदि दोष छूटें उसको शिक्षा कहते हैं। (स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश)

१७. सब को तुल्य वस्त्र, खान-पान और तुल्य आसन दिया जावे। चाहे वे राजकुमार वा राजकुमारी हो, चाहे दरिद्र की सन्तान हों। सबको तपस्वी होना चाहिये। (सत्यार्थप्रकाश, ३ समुल्लास)

१८. उनके माता-पिता अपनी सन्तानों से वा सन्तान माता-पिता से न मिल सकें और न किसी प्रकार का पत्र-व्यवहार एक-दूसरे से कर सकें। जिससे संसारिक चिन्ता से रहित होकर केवल विद्या पढ़ने की चिन्ता रखें। जब भ्रमण की जावे, तब उनके साथ अध्यापक रहें। जिससे किसी प्रकार की कुचेष्टा न कर सकें और न आलस्य प्रमाद करें। (सत्यार्थप्रकाश, ३ समुल्लास)

१९. जो वहां अध्यापिका और अध्यापक पुरुष वा भृत्य अनुचर हों, वे कन्याओं की पाठशाला में सब स्त्री और पुरुषों की पाठशाला में पुरुष रहें। स्त्रियों की पाठशाला में पांच वर्ष का लड़का और पुरुषों की पाठशाला में पांच वर्ष की लड़की भी न जाने पावे। अर्थात् जब तक वे ब्रह्मचारी वा ब्रह्मचारिणी रहें, तब तक स्त्री वा पुरुष का दर्शन-स्पर्शन, एकान्तसेवन, भाषण, विषयकथा, परस्परक्रीड़ा, विषय का ध्यान और सङ्ग इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहें और अध्यापक लोग उनको इन बातों से बचावें। जिससे उत्तम विद्या, शिक्षाशील, स्वभाव, शरीर और आत्मा से बलयुक्त होके आनन्द को नित्य बढ़ा सकें। (सत्यार्थप्रकाश, ३ समुल्लास)

२०. यथावत् ब्रह्मचर्य में आचार्यानुकूल वर्तकर धर्म से चारों, तीन वा दो, अथवा एक वेद को साङ्गोपाङ्ग पढ़ के जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित न हुआ हो वह पुरुष वा स्त्री गृहाश्रम में प्रवेश करे। (सत्यार्थप्रकाश, ४ समुल्लास)

२१. स्त्रियां आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत धारण करती थीं, और साधारण स्त्रियों के भी उपनयन और गुरु गेह में वासादि संस्कार होते थे। (उपदेश मञ्जरी)

२२. ब्रह्मचर्य पूर्ण करके गृहस्थ और गृहस्थ होके वानप्रस्थ तथा वानप्रस्थ होके संन्यासी होवे। (संस्कार विधि, संन्यास संस्कार)

२३. परन्तु जो ब्रह्मचर्य से संन्यासी होकर जगत् को सत्यशिक्षा कर जितनी उन्नति कर सकता है, उतनी गृहस्थ वा वानप्रस्थ आश्रम करके संन्यास आश्रमी नहीं कर सकता। (सत्यार्थप्रकाश, ५ समुल्लास)

२४. जिस पुरुष ने विषय के दोष और वीर्य संरक्षण के गुण जाने हैं, वह विषयासक्त कभी नहीं होता, और उनका वीर्य विचार अग्नि का ईंधनवत् है अर्थात् उसी में व्यय हो जाता है। जैसे वैद्य और औषधियों की आवश्यकता रोगी के लिये होती है, वैसे निरोगी के लिये नहीं, इस प्रकार जिस पुरुष वा स्त्री को विद्या धर्म वृद्धि और सब संसार का उपकार करना ही प्रयोजन हो, वह विवाह न करे। (सत्यार्थप्रकाश, ५ समुल्लास)

२५. जो मनुष्य इस ब्रह्मचर्य को प्राप्त होकर लोप नहीं करते, वे सब प्रकार के रोगों से रहित होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त होते हैं। (सत्यार्थप्रकाश, ३ समुल्लास)

२६. सब आश्रमों के मूल, सब उत्तम कर्मों में उत्तम कर्म और सब के मुख्य कारण ब्रह्मचर्य को खण्डित करके महादुःख सागर में कभी नहीं डुबना। (संस्कार विधि, वेदारम्भ संस्कार)

२७. यदि कोई इस सर्वोत्तम धर्म से गिराना चाहे, उसको ब्रह्मचारी उत्तर देवे कि अरे छोकरों के छोकरे! मुझ से दूर रहो। तुम्हारे दुर्गन्ध रूप भ्रष्ट वचनों से मैं दूर रहता हूं। मैं इस उत्तम ब्रह्मचर्य का लोप कभी न करूंगा। (संस्कार विधि, वेदारम्भ संस्कार)

इस प्रकार महर्षि दयानन्द जी महाराज ने अपने ग्रन्थों एवं प्रवचनों में ब्रह्मचर्य को जीवन का मूल आधार बताया है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश पुनः अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त करे तो इसके लिए सब आर्यों को कटिबद्ध होना चाहिए।

Wednesday, April 8, 2020

भक्त की भावना



◼️भक्त की भावना◼️
✍🏻 लेखक - पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’

     धर्म, आचार और भक्ति इन शब्दों का दुरुपयोग संसार में जितना हो रहा है, उतना शायद ही किसी शब्द का हुआ होगा। धर्म आचार और भक्ति के ही नाम पर इतने बड़े-बड़े अत्याचार संसार में हुए हैं कि उनकी गणना नहीं हो सकती। संसार की प्रायः सभी जातियाँ तथा देशों के इतिहास इनसे भरे पड़े हैं। निष्पक्ष उदारभाव से विचारने पर बुद्धिमान् मनुष्य को यही निश्चय हो रहा है कि धर्म आचार और भक्ति के वास्तविक स्वरूप को न समझ कर ही ये सब अनर्थ भूमण्डल में हुए वा हो रहे हैं।
     'धर्म' (=धरति लोकं, धार्यते येन जगत्) नाम उन नियमों (Principal Laws of nature) का है, जिसके आधार=आश्रय पर यह संसार चल रहा है। 'आचार' उस व्यवहार का नाम है, जिस को करने से मनुष्यों का परस्पर कभी कुछ भी झगड़ा नहीं हो सकता। दूसरों के साथ वही वर्ताव करो जैसा कि तुम चाहते हो कि दूसरे तुम्हारे साथ करें। 🔥"आत्मवत् सर्वभूतेषु" "Do with others as you wish to be done by others" "हर चे बर खुद मपसन्दी बर दीगरां मपसन्द"। यह है धर्म और आचार का विशुद्ध स्वरूप। क्या कोई कह सकता है कि इस धर्म और आचार की विश्व में कभी किसी भी अवस्था में आवश्यकता नहीं? यह धर्म और आचार तो मानव समाज से तीन काल में भी लुप्त नहीं हो सकता। एक जैसा आवश्यक, नहीं-नहीं अन्तर्हृदय की सच्ची भावना से अपनाने योग्य है, और रहेगा।
     'भक्ति' भी अन्तरात्मा की हृदय के अन्तःपटल में वर्तमान रहने वाली उन गहरी भावनाओं तथा उद्गारों का नाम है, जो विना किसी विडम्बना के सम्पूर्ण विश्व के नियन्ता प्रभु की सत्ता का स्वयं अनुभव करते हुए उत्पन्न होती है। और जिन भावनाओं का बाह्य जगत् वा लोकाचार से कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता। पिता-पुत्र अथवा शिशु और माता की वह किलोले हैं, जो बिना किसी शब्द का उच्चारण किये स्नेह से परिपूर्ण अवस्था में होती हैं।
     इसके विपरीत लोक-समाज के विचार से लोकषणा की दृष्टि से किसी विशेष समुदाय को अपने पीछे चलाने के लिए ध्यान के नाम पर की हुई हमारी अनेक क्रियायें "भक्ति" की परिभाषा में नहीं आ सकतीं।
     इन मिथ्या भक्तियों से पृथक करने के विचार से ही परम तपस्वी, परम ईश्वर-भक्त महायोगी जितेन्द्रिय, निष्पक्षपात महात्मा ऋषि दयानन्द सरस्वती ने भक्तिमार्ग के इस ग्रन्थ ‘आर्याभिविनय’ की वेदमन्त्रों के आधार पर रचना की, अपनी कल्पनामात्र के आधार पर नहीं।
     संसार में प्रायः यही देखा जाता है कि यम नियमों का पालन किये विना ही हम लोग 'भक्त' बनाना चाहते हैं। ऐसे मार्ग पर चलनेवाले "कनफकवे" गुरुओं की ही आजकल दाल गलती है। यम नियमोंवाले (जैसे इस ग्रन्थ की) सीधे-सादे शब्दों की भक्ति को तो सूखी भक्ति के नाम से पुकारा जाता है। यह भ्रम कहीं-कहीं आर्य कहलानेवालों में भी देखा जाता है। वे कोई भड़कीली चमाचम भक्ति चाहते हैं। सो ये तो प्रकृति के गुण हैं। दोनों आत्मा और परमात्मा तो इससे पृथक् हैं। हां, जीव अज्ञानवश उसमें फँस जाता है, तभी उसको यत्न भी करना पड़ता है।
     पवित्र वेदवाणी में सूक्तों के सूक्त ऐसी भक्ति से परिपूर्ण हैं। जिनमें वही स्वाभाविक (Natural) भावों का ही संचार है। बनावटी बातों का उनमें लेश भी नहीं। यह इस ग्रन्थ के एक-एक मन्त्र का ध्यानपूर्वक पाठ करने से ज्ञान हो सकता है।
     अन्तर्ह्रदय की उपर्युक्त भावनाओं के कुछ अंश इस ग्रन्थ में से सहृदय पाठकों के सम्मुख उपस्थित किये जाते हैं
     "आपका तो स्वभाव ही है कि अङ्गीकृत को कभी नहीं छोड़ते। सो आप सदैव हम को सुख देंगे, यह हम लोगों को दृढ़ निश्चय है"। पृष्ठ १४।
     "हम सब लोग आपकी प्राप्ति की अत्यन्त इच्छा करते हैं। सो आप अब शीघ्र हमको प्राप्त होओ। जो प्राप्त होने में आप थोड़ा भी विलम्ब करेंगे, तो हमारा कुछ भी कभी ठिकाना न लगेगा"। पृष्ठ २१२।
     "हे मनुष्यों! उसको मत भूलो। विना उसके कोई सुख का ठिकाना नहीं है"। पृष्ठ २२०।
     "किञ्च हम लोग तो आपके प्रसन्न करने में कुछ भी समर्थ नहीं हैं। सर्वथा आपके अनुकूल वर्तमान नहीं कर सकते । परन्तु आप तो अधमोद्वारक हैं, इससे हमको स्वकृपाकटाक्ष से सुखी करें"। पृष्ठ १९६।
     "जैसे पुत्र लोग अपने पिता के घर आनन्दपूर्वक निवास करते हैं, वैसे ही जो परमात्मा के भक्त हैं, वे सदा सुखी ही रहते हैं........."। पृष्ठ ८८।
     यह है हृदयङ्गम-सच्ची भावना से परिपूर्ण श्रद्धायुक्त भक्त की भावना, जो एक साक्षात्कृतधर्मा परम ईश्वरभक्त के उद्गार हैं। जिनके एक-एक शब्द पर घण्टों विचार करने पर भी अधिक से अधिक आनन्द प्रतीत होता है। जिस दिन जिस घड़ी इस मार्ग पर चलने का दृढ निश्चय कर चुकेंगे, और हमें मार्ग की अनुकूल सामग्री की डटकर खोज होगी, तभी इन भोले-भोले सरल शब्दों का महत्त्व हमें समझ में आवेगा।
     आत्मरोग की ओषध के इस महाभण्डार में न जाने कब कौन सी ओषध उपयुक्त सिद्ध हो=कारगर साबित हो। यह तो निश्चय ही है -
     🔥"स हि दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः।" योग० १।१४॥
     इस भक्ति-मार्ग का निरन्तर उपासक ही अपने निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुंच सकता है। प्रभु कृपा करें हम इस पथ के अनुगामी बनें !!!

◼️भक्ति-मार्ग और कर्म-योग◾️
     वर्तमान समय में कर्मण्यता और भक्ति ये दोनों परस्पर विरुद्ध कहे जाते हैं। वैदिक भक्तिवाद इससे सर्वथा विपरीत है। वह तो 🔥'ईशा वास्यम्' के साथ 🔥'कुर्वन्नेवेह कर्माणि' = संसार में कर्मशील बनो, और कोई मार्ग नहीं, यही पुनः-पुनः पुकार कर कह रहा है । कर्म-मार्ग के प्रतिपादक अन्य भी ग्रन्थ हैं, परन्तु जितना निस्सन्देह विना किसी लाग-लपेट के कर्मण्यता का प्रतिपादन वेद करता है, उतना कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं करता। यह बात इस ग्रन्थ [आर्याभिविनय] को देखने से स्पष्ट विदित हो जाती है -

     ◾️(१)🔥पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तरराष्णः।
     पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठय॥
     ऋ॰ १।३६।१५
     हे सर्वशत्रुदाहकाग्ने परमेश्वर! राक्षस हिंसाशील दुष्ट स्वभाव देहधारियों से हमारी पालना करो। जो हमको मारने लगे तथा जो मारने की इच्छा करता है, हे महातेज बलवत्तम! उन सबसे हमारी रक्षा करो।" पृष्ठ ३२
     ◾️(२) "हे महाराजाधिराज परब्रह्मन्! (क्षत्राय) अखण्ड चक्रवर्ती राज्य के लिये शौर्य विनय पराक्रम और बलादि उत्तम गुणयुक्त कृपा से हम लोगों को यथावत् पुष्टकर। अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों, तथा हम लोग पराधीन कभी न हों।" पृष्ठ १८०-१८१
     ◾️(३) "अन्योन्य प्रीति से परम वीर्य पराक्रम से निष्कण्टक चक्रवर्ती राज्य भोगें। हममें नीतिमान् सज्जन पुरुष हों।" पृष्ठ ११२
     ◾️(४) "वीरों के चक्रकर्ती राज्य को प्राप्त हों।" पृष्ठ ८६
     ◾️(५) "हे कृपासिन्धो भगवन्! ... हमारा राज्य अत्यन्त बढ़े।" पृष्ठ ४४
     ◾️(६) “साम्राज्याधिकारी सद्यः कीजिये।" पृष्ठ ४३
     सच्चे ईश्वर-भक्त की भावना में कर्मण्यता कहाँ तक है, तथा ऐसी कर्मण्यतापूर्ण भक्ति कहाँ तक ग्राह्य है, यह सहृदय पाठक स्वयं समझ सकते हैं।
     आर्य और निष्कर्मण्य ये दोनों परस्पर विरोधी हैं। वैदिक कर्मवाद का सच्चा स्वरूप यही है।[आर्याभिविनय-भूमिका]

✍🏻 लेखक - पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु
प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥

ऋषियों का महत्त्वपूर्ण आदेश



◼️ऋषियों का महत्त्वपूर्ण आदेश- स्वाध्यायान्मा प्रमदः◼️
✍🏻 लेखक - महामहोपाध्याय पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक जी
प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’

      🔥स्वाध्यायान्मा प्रमदः
      🔥स्वाध्यायप्रवचनाम्यां न प्रमदितव्यम्

      वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
      आचार्य समावर्तन के समय स्नातक को जो उपदेश वा आदेश देता है, उसमें एक वचन है- 'स्वाध्यायान्मा प्रमदः' अर्थात् स्वाध्याय से प्रमाद मत कर । स्वाध्याय शन्द 'सु+आ+अध्याय' तथा 'स्व(स्य) अध्याय:' इस तरह दो प्रकार से निष्पन्न होता है । इन दोनों का अर्थ निम्न प्रकार है -
      ◾️१-अच्छा अध्ययन अर्थात् वेदादि सच्छास्त्रों का अध्ययन ।
      ◾️२-अपना अध्ययन, अर्थात् आत्मा तथा शरीर आदि के तत्त्वज्ञान के लिये प्रयत्न।
      ये स्वाध्याय शब्द के यौगिक अर्थ हैं, किन्तु जहां-जहां स्वाध्याय के लिये शास्त्रकारों ने आदेश दिया है, वहां-वहां केवल यौगिक अर्थ अभिप्रेत नहीं है। 'पङ्कज' आदि शब्दों की तरह वह भी विशेषार्य में नियत है। शतपथ के अथात स्वाध्यायप्रशंसा' नामक ब्राह्मण, तथा मीमांसकों की मीमांसानुसार यह पद केवल वेदाध्ययन के लिये प्रयुक्त होता है। अतः 🔥‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ वाक्य का विशिष्ट अर्थ यह हुआ कि 'वेदाध्ययन में प्रमाद मत कर'। इसी प्रकार 🔥'स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्' का अर्थ होगा- वेद के अध्ययन और अध्यापन में प्रमाद मत कर ।
      यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि ये दोनों आदेश एक गृहस्थ में प्रवेश करनेवाले स्नातक के लिए हैं। इसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक गृहस्थी को वेद के अध्ययन और अध्यापन करने का आदेश दिया जा रहा है। भगवान् मनु गृहस्थ धर्म प्रकरण में लिखते हैं -

      🔥नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान्।
      अर्थात् 'नित्यप्रति वेद और सत्यशास्त्रों का अवलोकन करना चाहिये। तत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली ९) में लिखा है -

      🔥'तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च, दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च,…प्रजननं च स्वाध्यायप्रवचने च, प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च'॥
      अर्थात् 'तप शम दम अग्निहोत्र आदि तथा धर्मपूर्वक सन्तानादि की उत्पत्ति करते हुए भी स्वाध्याय और प्रवचन करते रहना चाहिये'। स्वाध्याय अर्थात् स्वयं अध्ययन और प्रवचन अर्थात् दूसरे को पढ़ाना। इन वाक्यों का भी तात्पर्य यही है कि- वेद का पढ़ना पढ़ाना प्रत्येक अवस्था में अवश्य करना चाहिये, कभी छूटना नहीं चाहिये। इसीलिये स्वाध्याय और प्रवचन पद प्रत्येक वाक्य में पढ़े गये हैं। इनसे यह भी प्रतीत होता है कि वेद का पढ़ना पढ़ाना प्रतिदिन का आवश्यक कर्म है ।
      'स्वाध्याय' योग का एक अंग है - महर्षि पतञ्जलि ने स्वाध्याय को नियमों के अन्तर्गत माना है। और स्वाध्याय का फल स्वयं बतलाया है 🔥'स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः' (योग २।४४) । अर्थात् ‘स्वाध्याय से इष्टदेव परमात्मा की प्राप्ति होती है।’ महर्षि वेदव्यास ने योग १।२८ सूत्र की व्याख्या में लिखा है -

      🔥स्वाध्यायाद् योगमासीत योगात् स्वाध्यायमामनेत्।
      स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते॥
      स्वाध्याय से योग=चित्तवृत्तियों के निरोध की प्राप्ति करे, योग=चित्तवृत्तियों का निरोध करके स्वाध्याय=वेद का अध्ययन करे। स्वाध्याय और योग की सम्मिलित शक्ति से आत्मा में भगवान् स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं। यह है स्वाध्याय का महान् फल ।
      महर्षि याज्ञवल्क्य शतपथ के स्वाध्याय के प्रकरण में लिखते हैं-

      🔥‘यदि ह वाभ्यङ्क्तोऽलंकृतः सुखे शयने शयान: स्वाध्यायमधीते, आ हैव नखाग्रेभ्यस्तपस्तप्यते, य एवं विद्वान् स्वाध्यायमधीते।’ शत० ११।५।१।४
      अर्थात् 'जो पुरुष अच्छी प्रकार अलंकृत होकर सुखदायक पलङ्ग पर लेटा हुआ भी स्वाध्याय करता है. तो मानो वह चोटी से लेकर एडी पर्यन्त तपस्या कर रहा है । इसलिये स्वाध्याय करना चाहिये।'
      कई सज्जन कहते हैं कि वेद के स्वाध्याय में मन नहीं लगता। रूखा विषय है, सरस नहीं। यह कहना बहुत अंश में ठीक है, किन्तु इसमें भी दोष हमारा ही है । सरसता प्रत्येक पुरुष की अपनी-अपनी रुचि पर निर्भर होती है। बहुत लोग गणित को शुष्क विषय कहते हैं. किन्तु जो उसके वेत्ता है उन्हें वह विषय इतना प्रिय होता है कि उसमें वे अपनी सुध-बुध भी भूल जाते हैं। इस प्रतीत होता है कि जिन पुरुष की जिस विषय में प्रगति होती है उसके लिये वह विषय सरस है, अन्य के लिए रूक्ष। इस रूक्षता को हटाने का एक मात्र साधन है- निरन्तर अध्ययन। जो पुरुष दो चार दिन पढ़कर आनन्द उठाना चाहते हैं, उन्हें कभी भी लाभ नहीं हो सकता। उसके लिये निरन्तर स्वाध्याय की आवश्यकता है। अतएव प्राचीन महर्षियों ने स्वाध्याय को दैनिक कार्य मानकर नैत्यिक पञ्चमहायज्ञों के अन्तर्गत स्थान दिया है। और इसीलिये इसे संसार का सब से महान् तप कहा है। मनुजी (४।२०) कहते हैं -

      🔥यथा यथा हि पुरुषः, शास्त्राणि समधिगच्छति।
      तथा तथा विजानाति, विज्ञानं चास्य रोचते॥
      "पुरुष जैसे-जैसे अपने शास्त्राध्ययन को बढ़ाता जाता है, वैसे-वैसे उसका ज्ञान बढ़ता है, और उसमें उसे रुचि पैदा होती है, तत्काल नहीं।"
      महर्षि दयानन्द ने प्रत्येक आर्य के लिये दश आदेश दिये हैं, जिन्हें मानकर ही आर्य समाज का सदस्य बन सकता है। मानने का अभिप्राय सदा तदनुसार कर्म करना होता है। एक सामान्य नियम है कि-
      🔥‘यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति, यद् वाचा वदति तत् कर्मणा करोति, यत्कर्मणा करोति तदमिसम्पद्यते।’
      'पुरूष जिस बात को अपने मन से सोचता है, उसे वाणी द्वारा प्रकट करता है। जिसे वाणी द्वारा प्रकट करता है, उसे कर्म द्वारा करता है। जिसे कर्म द्वारा करता है, वैसा ही बन जाता है।'
      अब हमारे सामने प्रश्न आता है कि जिन नियमों को हम आर्य समाज का सदस्य बनते हुए स्वीकार करते हैं, क्या हमारी वह स्वीकृति हृदय से होती है वा दिखावटी? इसकी कसौटी हमारे कर्म हैं। यदि उन नियमों के अनुसार हमारे कर्म हैं। तो मानना होगा कि हम उन नियमों को हृदय से मानते हैं। अन्यथा यही कहा जाएगा कि सदस्य बनने के लिये दिखावटी स्वीकृति है। महर्षि दयानन्द ने आर्य-समाज के दस नियमों में तीसरा नियम यह लिखा-
      "वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।"
      ऋषि ने वेद का पढ़ना अर्थात् स्वाध्याय, पढ़ाना अर्थात् प्रवचन, ये दोनों बातें संगृहीत करते हुए 'सुनना' और 'सुनाना' पद विशेष रखे हैं। यदि ये पद न रखे होते, तो कोई पुरुष यह कह सकता था कि हमें पढ़ना नहीं आता, किन्तु यहां तो यह समस्या पहले ही हल कर दी गई है। जो पढ़ नहीं सकता वह सुने। जो सुनाने में समर्थ हो, उसका भी कर्तव्य है कि वह सुनावे। इस नियम में धर्म शब्द कर्तव्य का वाचक है।
      अब प्रश्न उठता है कि क्या आर्यसमाज के सदस्य इस नियम को हृदय से मान रहे हैं ? स्पष्टतया कहा जा सकता है कि नहीं। क्योंकि आर्यसमाज के सदस्यों में सम्प्रति स्वाध्याय की रुचि ही नहीं है।
      आर्य व्यक्तियों से कहते सुना जाता है कि आजकल समाज में पूर्व जैसा उत्साह नहीं। बात सोलह आने सत्य है। पर किसी ने इस बीमारी का निदान भी किया है ? इस बीमारी का कारण है वेद के स्वाध्याय का अभाव। वेद आर्यों का धार्मिक अर्थात् कर्तव्यबोधक ग्रन्थ है। यह आर्य जाति की संस्कृति का आदि-स्रोत तथा केन्द्र है। जब हम उस स्रोत तथा केन्द्र से विमुख हो जाते हैं, तभी हममें शिथिलता उत्पन्न होती है। मुसलमानों में अपने मत के प्रति कितना उत्साह है। उसका प्रमुख कारण कुरान का प्रतिदिन स्वाध्याय है । हिन्दुओं में इतनी हीनता और कुरीतियां क्यों उत्पन्न हुई ? इसका उत्तर भी यही है कि उन्होंने अपने मूलभूत वेदों को छोड़कर साम्प्रदायिक ग्रन्थों और पुराणों को ही अपनाना प्रारम्भ कर दिया। आर्य समाज के प्रारम्भिक आर्यों में जो महान् उत्साह था, उसका कारण धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन ही था। स्व० श्री पं० क्षेमकरणदासजी को कौन नहीं जानता। अपने राजकीय नौकरी से ५५ वर्ष की अवस्था के पश्चात् मुक्त होकर संस्कृतभाषा का अध्ययन प्रारम्भ किया। और बड़ौदा राज्य की तीन वेदों की राजकीय परीक्षाए उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् उस अथर्ववेद का भाष्य रचा, जिस पर सायण का भी पूर्ण भाष्य उपलब्ध नहीं होता। क्या अब भी कोई कह सकता है कि संस्कृत और वेद कठिन हैं ? संसार में कठिन कुछ नहीं, मन की पूरी लगन चाहिये, सब काम पूरे हो जाते हैं। कठिन कहना तो अपने आलस्य-दोष को छिपानेमात्र के लिये है।
      इसलिये आर्यों का परम कर्तव्य है कि यदि वे स्वामी दयानन्द सरस्वती, और उनसे प्राचीन मनु, याज्ञवल्क्य, पतञ्जलि, वेदव्यास आदि के कथन पर थोड़ी भी श्रद्धा रखते हों, तो वेद, उपनिषद्, गीता, षड्दर्शन आदि उत्तमोत्तम ग्रन्थों का नित्य स्वाध्याय करें। जो सज्जन केवलमात्र हिन्दी जानते हैं, वे उक्त ऋषियों के ग्रन्थों का हिन्दी के माध्यम 😊 अनुवाद) से स्वाध्याय कर सकते हैं। इससे उन्हें अपनी संस्कृति से प्रेम उत्पन्न होगा। जातीयता का उद्बोधन होगा, और उत्साह की वृद्धि होगी। यदि आर्य जाति संसार में जीवित जागृत रहना चाहती है, तो उसे वेद को आगे करके सब कार्य करने होंगे। यदि आर्यसमाज 🔥'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' की उक्ति चरितार्य करना चाहता है, तो उसे आचार्य द्रोण के शब्दों में घोषणा करनी होगी

      🔥अग्रतश्चतुरो वेदान् पृष्ठतः सशरं धनुः।
      उमाभ्यां हि समर्थोऽस्मि शापादपि शरादपि॥
      चारों वेदों को आगे (=हृदय) में, तथा पीठ पर शरयुक्त धनुष को धारण करके कहना चाहिये कि मैं शाप और शर (शास्त्रार्थ तथा शस्त्रार्थ) दोनों में समर्थ हूं, जिसका जी चाहे परीक्षा करलो। इसके विना न कभी 🔥'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' का लक्ष्य सफल हो सकता है, और न अपनी वा अपने देश की उन्नति हो सकती है। अतः प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है कि वह प्रति दिन (चाहे समय थोड़ा ही लगावे) वेद का स्वाध्याय अवश्य करे । अतः मेरी प्रत्येक वैदिक मतानुयायी से विनम्र प्रार्थना है कि अपने वा समाज के कल्याण के लिये वा देश के समुत्थान के लिये दैनिक स्वाध्याय का व्रत लें।

      🔥व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।
      दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ यजु॰ १९।३०

✍🏻 लेखक - महामहोपाध्याय पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक जी
प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥

Tuesday, April 7, 2020

Arya (Noble) Life



Arya (Noble) Life

Writer- Pandit Rajaram
Presented By- Priyanshu Seth
Translated In English By- Gaurav Singh

Time of awakening and first duty-
Before sunrise that is in the dawn chant the name of Almighty God who is omnipresent, who is immortal and whose presence in incomparable with anything. That almighty has got the highest reverence. -Atharvaved 10.7.31

At the time of scattering of sunlight-
Now see the scene of dawn with divine view. The divine revealings of almighty that have been described in Vedas are not only normal revelings but those show us the blessings of God, how it is showered upon us. So you look at them like that only.

Divine ray of light has come from the wide spectrum of lights, this colorful ray is scattering in the sky. Like night leaves the space for dawn, similarly dawn has done it for sunlight. -Rigved 1.113.1
This has shown that an Arya should face that aspect of life that shows this type of light. These divine scenes create happiness, health and maintain joyful life, these create self-power. There are foundation of success.

Gaint chariot of dawn is ready for departure divine lights are on it. Queen dawn has departured to treat humans travelling throught the dark night. -Rigved 1.123.1
This has seen revealed that people who wake up in the dawn remain healthy, stole minded and sinful places are home of sickness. Open door of divinity for them.

Dawn is heading towards the earth. It wants to give you something. It is heading towards mankind with showers of purity. -Rigved 1.123.4
Ideal life is that in which human mind is always pious, face must glow, benevolence must be priority, prosperity must flourish.

O dawn blossom with pleasant scene for us. O dawn blossom with ojas and spirituality. O Goddess blossom with chariot of prosperity. -Rigved 1.48.1
Your destination must be the provider of fame, ojas, prosperity and bliss, bless us with it. It makes human industrious and righteous.

Dawn has always vanished darkness, now bring it with chariot of love, bliss and knowledge. -Rigved 1.48.3
Ideal life is that which always present itself for the removal of darkness. Those people who wake up at this time remain front in their life and those who don't remain backward.
In this metaphor regarding dawn, it has been shown that people who gets up in the dawn remain healthy, blissful and prosperous. It has been metaphored as a voyage of salvation. Humans must start their day be oathing to start the day with auspicious thoughts.

Health, Power and Longevity-
It is duty of every noble person to control and protects his senses so that he remains healthy, powerful and blissful and to inculcate this vedic tradition in his life comfortably.

I can express myself through my voice in my throat, I have pranic energy, I have vision in my eyes, my hairs are not white, my teeth are not red, my arms are strong. I have velocity in my thoughts, my soul is very strong and illustrious. -Atharvaved 19.60.1-2
May God give me energy in my body so that I can live my whole life. So my soul, you keep yourself pious and spiritual. -Atharvaved 19.61

Prayers for health, Power and Longevity-
O digestive fire, you are the protector of my body, protect my body. You are the giver of long age, give me longevity, give me bliss, give me completeness. -Yajurved 3.17
You are glow, give me glow; you are power, give me energy. You are pranic energy. Give me strength and will power. So, it's duty of every Arya to keep routine, food, habits in such a way is that his health and longevity remains powerful. -Yajurved 19.9
Through exercise body becomes light, it gives energy. Organs work well, digestive fire becomes strong. Exercise strengthens organs and food easily gets digested. Thus it keeps us fit and rejuvenates our body. Household chores are also a kind of exercise.

Mind Power-
O Almighty bestow me with sharp mind and witness. -Yajurved 32.14

Character Power-
O Almighty, protect me from dirty aidings and obscenity so that I can upleft myself towards godliness. -Yajurved 4.28