Monday, January 5, 2015

हुतात्मा महाशय राजपाल की बलिदान-गाथा एवं रंगीला रसूल



हुतात्मा महाशय राजपाल की बलिदान-गाथा एवं रंगीला रसूल

डॉ विवेक आर्य


सन 1923 में मुसलमानों की ओर से दो पुस्तकें  "19 वीं सदी का महर्षि" और “कृष्ण,तेरी गीता जलानी पड़ेगी ” प्रकाशित हुई थीं।  पहली पुस्तक में आर्यसमाज का संस्थापक स्वामी दयानंद का सत्यार्थ प्रकाश के 14 वे सम्मुलास में कुरान की समीक्षा से खीज कर उनके विरुद्ध आपतिजनक एवं घिनोना चित्रण प्रकाशित किया था। जबकि दूसरी पुस्तक में श्री कृष्ण जी महाराज के पवित्र चरित्र पर कीचड़ उछाला गया था। उस दौर में विधर्मियों की ऐसी शरारतें चलती ही रहती थी पर धर्म प्रेमी सज्जन उनका प्रतिकार उन्हीं के तरीके से करते थे।  महाशय राजपाल ने स्वामी दयानंद और श्री कृष्ण जी महाराज के अपमान का प्रति उत्तर 1924 में "रंगीला रसूल" के नाम से पुस्तक छाप कर दिया।  जिसमें मुहम्मद साहिब की जीवनी व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत की गयी थी। यह पुस्तक उर्दू में थी और इसमें सभी घटनाएँ इतिहास सम्मत और प्रमाणिक थी।  पुस्तक में लेखक के नाम के स्थान पर “दूध का दूध और पानी का पानी "छपा था।  वास्तव में इस पुस्तक के लेखक पंडित चमूपति जी थे जो की आर्यसमाज के श्रेष्ठ विद्वान् थे।  वे महाशय राजपाल के अभिन्न मित्र थे। मुसलमानों के ओर से संभावित प्रतिक्रिया के कारण पंडित चमूपति जी इस पुस्तक में अपना नाम नहीं देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने महाशय राजपाल से वचन ले लिया की चाहे कुछ भी हो जाये,कितनी भी विकट स्थिति क्यूँ न आ जाये।  वे किसी को भी पुस्तक के लेखक का नाम नहीं बतायेगे। महाशय राजपाल ने अपने वचन की रक्षा अपने प्राणों की बलि देकर की पर पंडित चमूपति सरीखे विद्वान् पर आंच तक न आने दी। 1924 में छपी रंगीला रसूल बिकती रही पर किसी ने उसके विरुद्ध शोर न मचाया फिर महात्मा गाँधी ने अपनी मुस्लिम परस्त निति में इस पुस्तक के विरुद्ध एक लेख लिखा।  इस पर कट्टरवादी मुसलमानों ने महाशय राजपाल के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया।  सरकार ने उनके विरुद्ध 153ए धारा के अधीन अभियोग चला दिया। अभियोग चार वर्ष तक चला।  राजपाल जी को छोटे न्यायालय ने डेढ़ वर्ष का कारावास तथा 1000 रूपये का दंड सुनाया गया।  इस फैसले के विरुद्ध अपील करने पर सजा एक वर्ष तक कम कर दी गई।  इसके बाद मामला हाई कोर्ट में गया।  कँवर दिलीप सिंह की अदालत ने महाशय राजपाल को दोषमुक्त करार दे दिया। मुसलमान इस निर्णय से भड़क उठे। खुदाबख्स नामक एक पहलवान मुसलमान ने महाशय जी पर हमला कर दिया जब वे अपनी दुकान पर बैठे थे पर संयोग से आर्य सन्यासी स्वतंत्रानंद जी महाराज एवं स्वामी वेदानन्द जी महाराज वहां पर उपस्थित थे। उन्होंने घातक को ऐसा कसकर दबोचा की वह छुट न सका।  उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया गया, उसे सात साल की सजा हुई। रविवार 8 अक्टूबर 1927 को स्वामी सत्यानन्द जी महाराज को महाशय राजपाल समझ कर अब्दुल अज़ीज़ नमक एक मतान्ध मुसलमान ने एक हाथ में चाकू ,एक हाथ में उस्तरा लेकर हमला कर दिया।  स्वामी जी घायल कर वह भागना ही चाह रहा था कि पड़ोस के दूकानदार महाशय नानकचंद जी कपूर ने उसे पकड़ने का प्रयास किया। इस प्रयास में वे भी घायल हो गए तो उनके छोटे भाई लाला चूनीलाल जी जी उसकी ओर लपके। उन्हें भी घायल करते हुए हत्यारा भाग निकला पर उसे चौक अनारकली पर पकड़ लिया गया।  उसे 14 वर्ष की सजा हुई ओर तदन्तर तीन वर्ष के लिए शांति की गारंटी का दंड सुनाया गया। स्वामी सत्यानन्द जी के घाव ठीक होने में करीब डेढ़ महीना लगा। 6 अप्रैल 1929 को महाशय राजपाल अपनी दुकान पर आराम कर रहे थे। तभी इल्मदीन नामक एक मतान्ध मुसलमान ने महाशय जी की छाती में छुरा घोप दिया। जिससे महाशय जी का तत्काल प्राणांत हो गया। हत्यारा अपने जान बचाने के लिए भागा और महाशय सीताराम जी के लकड़ी के टाल में घुस गया।  महाशय जी के सुपुत्र विद्यारतन जी ने उसे कस कर पकड़ लिया। पुलिस हत्यारे को पकड़ कर ले गई।  देखते ही देखते हजारों लोगो का ताँता वहाँ पर लग गया। देवतास्वरूप भाई परमानन्द ने अपने सम्पादकीय में लिखा हैं की “आर्यसमाज के इतिहास में यह अपने दंग का तीसरा बलिदान हैं।  पहले धर्मवीर लेखराम का बलिदान इसलिए हुआ की वे वैदिक धर्म पर किया जाने वाले प्रत्येक आक्षेप का उत्तर देते थे। उन्होंने कभी भी किसी मत या पंथ के खंडन की कभी पहल नहीं की थी। सदैव उत्तर- प्रति उत्तर देते रहे।  दूसरा बड़ा बलिदान स्वामी श्रद्धानंद जी का था।  उनके बलिदान का कारण यह था की उन्होंने भुलावे में आकर मुसलमान हो गए भाई बहनों को, परिवारों को पुन: हिन्दू धर्म में सम्मिलित करने का आन्दोलन चलाया और इस ढंग से स्वागत किया की आर्य जाति में “शुद्धि” के लिए एक नया उत्साह पैदा हो गया।  विधर्मी इसे न सह सके।  तीसरा बड़ा बलिदान महाशय राजपाल जी का हैं। जिनका बलिदान इसलिए अद्वितीय है क्यूंकि उनका जीवन लेने के लिए लगातार तीन आक्रमण किये गए।  पहली बार 26 सितम्बर 1927 को एक व्यक्ति खुदाबक्श ने किया दूसरा आक्रमण 8  अक्टूबर को उनकी दुकान पर बैठे हुए स्वामी सत्यानन्द पर एक व्यक्ति अब्दुल अज़ीज़ ने किया। ये दोनों अपराधी अब कारागार में दंड भोग रहे हैं।  इसके पश्चात अब डेढ़ वर्ष बीत चूका हैं की एक युवक इल्मदीन, जो न जाने कब से महाशय राजपाल जी के पीछे पड़ा था, एक तीखे छुरे से उनकी हत्या करने में सफल हुआ हैं।  जिस छोटी सी पुस्तक लेकर महाशय राजपाल के विरुद्ध भावनायों को भड़काया गया था, उसे प्रकाशित हुए अब चार वर्ष से अधिक समय बीत चूका हैं”।  लाहौर के हिन्दुओं ने यह निर्णय किया की शव का संस्कार अगले दिन किया जाये।  पुलिस के मन में निराधार भूत का भय बैठ गया और डिप्टी कमिश्नर ने रातों रात धारा 144 लगाकर सरकारी अनुमति के बिना जुलुस निकालने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अगले दिन प्रात: सात बजे ही हजारों की संख्या में लोगो का ताँता लग गया।  सब शव यात्रा के जुलुस को शहर के बीच से निकल कर ले जाना चाहते थे,पर कमिश्नर इसकी अनुमति नहीं दे रहा था। इससे भीड़ में रोष फैल गया। अधिकारी चिढ गए।  अधिकारियों ने लाठी चार्ज की आज्ञा दे दी।  पच्चीस व्यक्ति घायल हो गए।  अधिकारियों से पुन: बातचीत हुई।  पुलिस ने कहाँ की लोगों को अपने घरों को जाने दे दिया जाये। इतने में पुलिस ने फिर से लाठी चार्ज कर दिया।  150  के करीब व्यक्ति घायल हो गए पर भीड़ तस से मस न हुई।  शव अस्पताल में ही रखा रहा। दुसरे दिन सरकार एवं आर्यसमाज के नेताओं के बीच एक समझोता हुआ जिसके तहत शव को मुख्य बाजारों से धूम धाम से ले जाया गया। हिंदुओं ने बड़ी श्रद्धा से अपने मकानों से पुष्प वर्षा कर अपनी श्रद्धांजलि दी थी।

ठीक पौने बारह बजे हुतात्मा की नश्वर देह को महात्मा हंसराज जी ने अग्नि दी। महाशय जी के ज्येष्ठ पुत्र प्राणनाथ जी तब केवल ११ वर्ष के थे पर आर्य नेताओं ने निर्णय लिया की समस्त आर्य हिन्दू समाज के प्रतिनिधि के रूप में महात्मा हंसराज मुखाग्नि दे।  जब दाहकर्म हो गया तो अपार समूह शांत होकर बैठ गया।  ईश्वर प्रार्थना श्री स्वामी स्वतंत्रानंद जी ने करवाई।  प्रार्थना की समाप्ति पर भीड़ में से एकदम एक देवी उठी। उनकी गोद में एक छोटा बालक था। यह देवी हुतात्मा राजपाल की धर्मनिष्ठा साध्वी धर्मपत्नी थी।  उन्होंने कहा की मुझे अपने पति के इस प्रकार मारे जाने का दुःख अवश्य हैं पर साथ ही उनके धर्म की बलिवेदी पर बलिदान देने का अभिमान भी हैं।  वे मारकर अपना नाम अमर कर गए।

पंजाब के सुप्रसिद्ध पत्रकार व कवि नानकचंद जी “नाज़” ने तब एक कविता महाशय राजपाल के बलिदान का यथार्थ चित्रण में लिखी थी-

फ़ख से सर उनके ऊँचे आसमान तक तक हो गए,हिंदुयों ने जब अर्थी उठाई राजपाल।

फूल बरसाए शहीदों ने तेरी अर्थी पे खूब, देवताओं ने तेरी जय जय बुलाई राजपाल।

हो हर इक हिन्दू को तेरी ही तरह दुनिया नसीब जिस तरह तूने छुरी सिने पै खाई राजपाल।

तेरे कातिल पर न क्यूँ इस्लाम भेजे लानतें, जब मुजम्मत कर रही हैं इक खुदाई राजपाल।

मैंने क्या देखा की लाखों राजपाल उठने लगे दोस्तों ने लाश तेरी जब जलाई राजपाल।

नास्तिकता भी एक अन्धविश्वास है




नास्तिकता भी एक अन्धविश्वास है!

डॉ विवेक आर्य


 हिंदुस्तान टाइम्स अखबार के 4 जनवरी, 2015 के अंक में "The Rise of Reason"  के नाम से लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख का आशय यह दिखाना था कि तर्क का युग का आरम्भ हो चूका है और लोग धर्म का त्याग कर अपने आपको नास्तिक कहलाने में गर्व महसूस करते है। इस लेख में इस भी दिखाया गया है कि सन 2005 में हमारे देश में 81 प्रतिशत लोग आस्तिक थे जो 2012 में  6 प्रतिशत की दर से घट कर 75 प्रतिशत हो गया है। यह भी दर्शाने का प्रयास किया गया है कि विश्व में तर्कवादी बड़ी संख्या में बढ़ रहे है और ये वह लोग है जिनके समक्ष धर्म तर्क की कसौटी पर खड़ा नहीं रह पा रहा है। इस लेख के माध्यम से हम सत्य को जानने का प्रयास करेंगे कि क्या धर्म को मानने वाले आस्तिकों का उद्देश्य ठीक है अथवा तर्क के द्वारा धर्म को न मानने वाले नास्तिकों का उद्देश्य ठीक है।

नास्तिक बनने के मुख्य क्या क्या कारण है?

 नास्तिक बनने के प्रमुख कारण है

1. ईश्वर के गुण,कर्म और स्वभाव से अनभिज्ञता।
2. धर्म के नाम पर अन्धविश्वास जिनका मूल मत मतान्तर की संकीर्ण सोच है।
3. विज्ञान द्वारा करी गई कुछ भौतिक प्रगति को देखकर अभिमान होना।
4. धर्म के नाम पर दंगे,युद्ध, उपद्रव आदि।

ईश्वर के नाम पर अत्याचार, अज्ञानता को बढ़ावा देना, चमत्कार आदि में विश्वास दिलाना, ईश्वर को एकदेशीय अर्थात एक स्थान जैसे मंदिर, मस्जिद आदि अथवा चौथे अथवा सातवें आसमान तक सिमित करना, ईश्वर द्वारा अवतार लेकर विभिन्न लीला करना, एक के स्थान पर अनेक ईश्वर होना, निराकार के स्थान पर साकार ईश्वर होना, ईश्वर द्वारा अज्ञानता का प्रदर्शन करना आदि कुछ कारण है। जो एक निष्पक्ष व्यक्ति को भी यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं की क्या ईश्वर का अस्तित्व है की नहीं अथवा ईश्वर मनुष्य के मस्तिष्क की कल्पना मात्र है। उदहारण के तौर पर हिन्दू समाज में शूद्रों को मंदिरों में प्रवेश की मनाही है एवं अगर कोई शूद्र मंदिर में प्रवेश कर भी जाये तो उसे दंड दिया जाता है और मंदिर को पवित्र करने का ढोंग किया जाता है। यह सब पाखंड किया तो ईश्वर के नाम पर जाता है मगर इसके पीछे मूल कारण मनुष्य का स्वार्थ है नाकि ईश्वर का अस्तित्व है।
                               ईश्वर गुण, कर्म और स्वाभाव से दयालु एवं न्यायकारी है इसलिए वह किसी भी प्राणिमात्र में कोई भेदभाव नहीं करते। ईश्वर गुणों से सर्वव्यापक एवं निराकार है अर्थात सभी स्थानों पर है और आकार रहित भी है। जब ईश्वर सभी स्थानों पर है तो फिर उन्हें केवल मंदिर में या क्षीर सागर पर या कैलाश पर या चौथे आसमान पर या सातवें आसमान पर ही क्यों माने। इससे यही सिद्ध होता हैं की मनुष्य ने अपनी कल्पना से पहले  ईश्वर को निराकार से साकार किया, उन्हें सर्वदेशीय अर्थात सभी स्थानों पर निवास करने वाला से एकदेशीय अर्थात एक स्थान पर सिमित कर दिया। फिर सिमित कर कुछ मनुष्यों ने अपने आपको ईश्वर का दूत, ईश्वर और आपके बीच मध्यस्थ, ईश्वर तक आपकी बात पहुँचने वाला बना डाला। यह जितना भी प्रपंच ईश्वर के नाम पर रचा गया यह इसीलिए हुआ क्यूंकि हम ईश्वर के निराकार गुण से परिचित नहीं है।  अपनी अंतरात्मा के भीतर निराकार एवं सर्वव्यापक ईश्वर को मानने से न मंदिर की, न मूर्ति की, न मध्यस्थ की, न दूत की, न अवतार की, न पैगम्बर की और न ही किसी मसीहा की आवश्यकता है।

                             ईश्वर के नाम पर सबसे अधिक भ्रांतियाँ मध्यस्थ बनने वाले लोगो ने फैलाई है चाहे वह छुआ छूत का समर्थन करने वाले एवं शूद्रों को मंदिरों में प्रवेश न देने वाले हिन्दू धर्म के पुजारी हो , चाहे इस्लाम से सम्बन्ध रखने वाले मौलवी-मौलाना हो जिनके उकसाने के कारण इतिहास में मुस्लिम हमलावरों ने मानव जाति पर धर्म के नाम पर ऐसा कोई भी अत्याचार नहीं था जो उन्होंने नहीं किया था , चाहे ईसाई समाज से सम्बंधित पोप आदि हो जिन्होंने चर्च के नाम पर हज़ारों लोगो को जिन्दा जला दिया एवं निरीह जनता पर अनेक अत्याचार किये। न यह मध्यस्थ होते न ईश्वर के नाम पर इतने अत्याचार होते और न ही इस अत्याचार के फलस्वरूप प्रतिक्रिया रूप में विश्व के एक बड़े समूह को ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार कर नास्तिकता का समर्थन करना पड़ता। सत्य यह हैं यह प्रतिक्रिया इस व्याधि का समाधान नहीं थी अपितु इसने रोग को और अधिक बढ़ा दिया। आस्तिक व्यक्ति यथार्थ में ईश्वर विश्वासी होने से पापकर्म में लीन होने से बचता था। दोष मध्यस्थों का था जो आस्तिकों का गलत मार्गदर्शन करते थे । मगर ईश्वर को त्याग देने से पाप-पुण्य का भेद मिट गया और पाप कर्म अधिक बढ़ता गया, नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया गया एवं इससे विश्व अशांति और अराजकता का घर बन गया।

                                       ईश्वर में अविश्वास का एक बड़ा कारण अन्धविश्वास है। सामान्य जन विभिन्न प्रकार के अंधविश्वासों में लिप्त हैं और उन अंधविश्वासों का नास्तिक लोग कारण ईश्वर को बताते है। सत्य यह हैं की ईश्वर ज्ञान के प्रदाता है अज्ञान को बढ़ावा देने का मुख्य कारण मनुष्य का स्वार्थ है। अपनी आजीविका, अपनी पदवी, अपने नाम को सिद्ध करने के लिए अनेक धर्म गुरु अपने अपने ढंग से अपनी अपनी दुकान चलाते है। कोई झाड़ फूंक से ,कोई गुरुमंत्र से, कोई गुरु के नाम स्मरण से ,कोई गुरु की आरती से, कोई गुरु की समाधी आदि से जीवन के सभी दुखों का दूर होना बताता है, कोई गंडा तावीज़ पहनने से आवश्यकताओं की पूर्ति बताता है, कुछ लोग और आगे बढ़कर अंधे हो जाते है और कोई कोई निस्संतान संतान प्राप्ति के लिए पड़ोसी के बच्चे की नरबलि देने तक से नहीं चूकता है। विडंबना यह हैं की इन मूर्खों के क्रियाकलापों को दिखा दिखा कर अपने आपको तर्कशील कहने वाले लोग नास्तिकता को बढ़ावा देते है। कोई भी अन्धविश्वास वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध नहीं हो सकता इसलिए  नास्तिकता को प्रोत्साहन वालो द्वारा विज्ञान का सहारा लेकर नास्तिकता का प्रचार करना भी एक प्रकार से अन्धविश्वास को मिटाने के स्थान पर एक और अन्धविश्वास को बढ़ावा देना ही है।
 
                                          चमत्कार में विश्वास अन्धविश्वास की उत्पत्ति का मूल है। आस्तिक समाज में मुस्लमान पैगम्बरों की चमत्कार की कहानियों में अधिक विश्वास रखते है, ईसाई समाज में ईसा मसीह और संतों के नाम पर चमत्कार की दुकानें चलाई जाती है। हिन्दू समाज में चमत्कार पुराणों में लिखी देवी-देवताओं की कहानियों से लेकर गुरुडम की दुकानों तक फल फूल रहा है। इन सभी का यह मानना हैं की ईश्वर सब कुछ कर सकता है। स्वामी दयानंद सत्यार्थ प्रकाश में इस दावें की परीक्षा करते हुए लिखते हैं की अगर ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो क्या ईश्वर अपने आपको मार भी सकता है? क्या ईश्वर अपने जैसा एक और ईश्वर बना सकता है जिसके गुण-कर्म और स्वाभाव उसी के समान हो। इसका उत्तर स्पष्ट है नहीं। फिर ईश्वर सब कुछ कैसे कर सकता है? इस शंका का समाधान यह है की जो जो कार्य ईश्वर के है जैसे सृष्टि की उत्पत्ति,पालन-पोषण,प्रलय, मनुष्य आदि का जन्म-मरण, पाप-पुण्य का फल देना आदि कार्य करने में ईश्वर स्वयं सक्षम है उन्हें किसी की आवश्यकता नहीं है। नास्तिक लोग आस्तिकों की चमत्कार के दावों की परीक्षा लेते हुए कहते है की  सृष्टि को नियमित मानते हो अथवा अनियमित। चमत्कार नियमों का उल्लंघन है। अगर ईश्वर की बनाई सृष्टि को अनियमित मानते हो तो उसे बनाने वाले ईश्वर को भी अनियमित मानना पड़ेगा। जोकि असंभव है। इसलिए चमत्कार को मनुष्य के मन की स्वार्थवश कल्पना मानना सत्य को मानने के समान है। न इससे ईश्वर का नियमित होने का खंडन होगा और न ही अन्धविश्वास को बढ़ावा मिलेगा।

                                        नास्तिकता को बढ़ावा देने में एक बड़ा दोष अभिमान का भी है। भौतिक जगत में मनुष्य ने जितनी भी वैज्ञानिक उन्नति की है उस पर वह अभिमान करने लगता है और इस अभिमान के कारण अपने आपको जगत के सबसे बड़ी सत्ता समझने लगता है। एक उदहारण लीजिये सभी यह मानते हैं की न्यूटन ने Gravitation अर्थात गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज की थी। क्या न्यूटन से पहले गुरुत्वाकर्षण की शक्ति नहीं थी? थी मगर मनुष्य को उसका ज्ञान नहीं था अर्थात न्यूटन ने केवल अपनी अल्पज्ञता को दूर किया था और इसी क्रिया को अविष्कार कहा जाता है। सत्य यह हैं की जितनी भी भौतिक वैज्ञानिक उन्नति हैं वह अपनी अलपज्ञता को दूर करना है। मनुष्य चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न कर ले वह ज्ञान की सीमा को कभी प्राप्त नहीं कर सकता क्यूंकि एक तो मनुष्य की शक्तियां सिमित है जबकि ज्ञान की असीमित है दूसरी असीमित ज्ञान का ज्ञाता केवल एक ही है और वो हैं ईश्वर जिनमें न केवल वो ज्ञान भी पूर्ण है जो केवल मानव के लिए है अपितु वह ज्ञान भी है जो मानव से परत केवल ईश्वर के लिए है।

स्वयं न्यूटन की इस सन्दर्भ में धारणा कितनी प्रासंगिक है --

“I do not know what I may appear to the world, but to myself I seem to have been only like a boy playing on the sea-shore, and diverting myself in now and then finding a smoother pebble or a prettier shell than ordinary, whilst the great ocean of truth lay all undiscovered before me.”

न्यूटन ने हमारी अवधारणा का समर्थन कर अपनी निष्पक्षता का परिचय दिया है।
               
                  अब प्रश्न यह है की धर्म और विज्ञान में क्या सम्बन्ध है और क्यूंकि नास्तिक लोगो का यह मत है की धर्म और विज्ञान एक दूसरे के शत्रु है। नास्तिक लोगो की इस सोच का  मुख्य कारण यूरोप के इतिहास में चर्च द्वारा बाइबिल के मान्यताओं पर वैज्ञानिकों द्वारा शंका करना और उनकी आवाज़ को सख्ती से दबा देना था। उदहारण के लिए गैलिलियो को इसलिए मार डाला गया क्यूंकि उसने कहा था की पृथ्वी सूर्य के चारों और भ्रमण करती हैं जबकि चर्च की मान्यता इसके विपरीत थी। चर्च ने वैज्ञानिकों का विरोध आरम्भ कर दिया और उन्हें सत्य को त्याग कर जो बाइबिल में लिखा था उसे मानने को मजबूर किया और न मानने वालो को दण्डित किया गया। इस विरोध का यह परिणाम निकला की यूरोप से निकलने वाले वैज्ञानिक चर्च को अर्थात धर्म को विज्ञान का शत्रु मानने लग गए और उन्होंने ईश्वर की सत्ता को नकार दिया। दोष चर्च के अधिकारीयों का था नाम ईश्वर का लगाया गया। यह विचार परम्परा रूप में चलता आ रहा हैं और इस कारण से वैज्ञानिक अपने आपको नास्तिक कहते हैं।

                         अब प्रश्न यह उठता है की धर्म और विज्ञान में क्या सम्बन्ध है? इसका उत्तर है की "Religion and Science are not against each other but they are allies to each other" अर्थात धर्म और एक दूसरे के विरोधी नहीं अपितु सहयोगी है। जैसे विज्ञान यह बताता है की जगत कैसे बना है जबकि धर्म यह बताता है की जगत क्यूँ बना है। जैसे मनुष्य का जन्म कैसे हुआ यह विज्ञान बताता है जबकि मनुष्य का जन्म क्यूँ हुआ यह धर्म बताता है।


                      भौतिक विज्ञान के लिए आध्यात्मिक शंकाओं का समाधान करना असंभव है मगर इनका समाधान धर्म द्वारा ही संभव है। धर्म और विज्ञान दोनों एक दूसरे के सहयोगी है और इसी तथ्य को आइंस्टीन ने सुन्दर शब्दों में इस प्रकार से कहा है –

 “Science without religion is a lame and religion without science is blind.”

विज्ञान धर्म के मार्गदर्शन के बिना अधूरा हैं और सत्य धर्म विज्ञान के अनुकूल है,  अन्धविश्वास अवैज्ञानिक होने के कारण त्याग करने योग्य है।

एक कुतर्क यह भी दिया जाता है की अगर ईश्वर है तो उन्हें वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध करके दिखाए।  इसका समाधान वायु के अतिरिक्त मन, बुद्धि, सुख, दुःख, गर्मी, सर्दी, काल, दिशा, आकाश ये सभी निराकार है।क्या ये सभी वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध होते है? नही। परन्तु फिर भी इनका अस्तित्व माना जाता है फिर केवल ईश्वर को लेकर यह शंका उठाना नास्तिकता का समर्थन करने वाले की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाता है।  सत्य यह हैं की वैज्ञानिक प्रयोगों से ईश्वर की सत्ता को सिद्ध न कर पाना आधुनिक विज्ञान की कमी है जबकि आध्यात्मिक वैज्ञानिक जिन्हे हम ऋषि कहते है चिरकाल से निराकार ईश्वर को न केवल अपनी अंतरात्मा में अनुभव करते आ रहे है अपितु जगत के कण कण में भी विद्यमान पाते है।

                             दंगे, युद्ध, उपद्रव आदि का दोष ईश्वर को देना एक और मूर्खता है। यह पहले ही स्पष्ट किया जा चूका है की दंगे, उपद्रव आदि मज़हब या मत-मतान्तर आदि को मानने वालो के स्वार्थ के कारण होता है नाकि धर्म के कारण होता है। एक उदहारण लीजिये 1947 से पहले हमारे देश में अनेक दंगे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच में हुए थे। इन दंगों का मुख्य कारण यह बताया जाता था की हिन्दुओं के धार्मिक जुलुस के मस्जिद के सामने से निकलने से मुसलमानों की नमाज़ में विघ्न पड़ गया जिसके कारण यह दंगे हुए।  मेरा स्पष्ट प्रश्न है कि जो व्यक्ति ईश्वर की उपासना या नमाज़ में लीन होगा उसके सामने चाहे बारात भी क्यों न निकल जाये। उसे मालूम ही नहीं चलेगा परन्तु जो व्यक्ति यह बांट जो रहा हो की कब हिन्दुओं का जुलुस आये कब हम नमाज़ आरम्भ करे और कब दंगा हो। तो इसका दोष ईश्वर को देना कहा तक उचित है? संसार में जितनी भी हिंसा ईश्वर के नाम पर होती है उसका मूल कारण स्वार्थ है नाकि धर्म है।

                    नास्तिक लोग धर्म की मुलभुत परिभाषा से अनभिज्ञ है और मत-मतान्तर की संकीर्ण सोच एवं अन्धविश्वास को धर्म समझकर उसकी तिलांजलि दे देते है। धर्म संस्कृत भाषा का शब्द है जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना है। "धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म है। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं की मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति है वह धर्म है। धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी का त्याग, शौच अर्थात पवित्रता , इन्द्रियों का निग्रह अर्थात उन्हें वश में करना , बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण है। सदाचार परम धर्म है।

           अन्धविश्वास मत मतान्तर की संकीर्ण सोच है। उसे धर्म समझना अन्धविश्वास है। धर्म का आचरण से सम्बन्ध है। मत का सम्बन्ध आचरण से नहीं अपितु मान्यता से है। मान्यता सही भी हो सकती है गलत भी हो सकती है। इसलिये मत को धर्म समझना गलत है।

 ईश्वर में विश्वास रखने के निम्नलिखित लाभ है।

1. आदर्श शक्ति में विश्वास से जीवन में दिशा निर्धारण होता है।
2. सर्वव्यापक एवं निराकार ईश्वर में विश्वास से पापों से मुक्ति मिलती है।
3. ज्ञान के उत्पत्तिकर्ता में विश्वास से ज्ञान प्राप्ति का संकल्प बना रहता है।
4. सृष्टि के रचनाकर्ता में विश्वास से ईश्वर की रचना से प्रेम बढ़ता है।
5. अभयता, आत्मबल में वृद्धि, सत्य पथ का अनुगामी बनना, मृत्यु के भय से मुक्ति, परमानन्द सुख की प्राप्ति, आध्यात्मिक उन्नति, आत्मिक शांति की प्राप्ति, सदाचारी जीवन आदि गुण की आस्तिकता से प्राप्ति होती है।
6. स्वार्थ, पापकर्म, अत्याचार, दुःख, राग, द्वेष, इर्ष्या, अहंकार आदि दुर्गुणों से मुक्ति मिलती है।


 तार्किक होना गलत नहीं है। ऋषि दयानंद 19 वीं सदी के सबसे बड़े तार्किक थे मगर वह पूर्णरूप से आस्तिक थे।  दर्शनों में तर्क को ऋषि कहा गया है। बशर्ते तर्क का प्रयोजन सत्य को ग्रहण करना एवं असत्य का त्याग हो। तर्क का नाम लेकर धर्म का बहिष्कार कर भोगवादी होने के बहाने बनाना अपने आपको अँधेरे में रखने के समान है। नास्तिकता अपने आप में अन्धविश्वास है। अगर किसी व्यक्ति के पैर में फोड़ा निकला हो तो उसका ईलाज करना चाहिये न कि पैर काट देना चाहिये। नास्तिकता इसी प्रकार का पाखण्ड है। धर्म के नाम पर किये जाने वाले पाखंड को देखकर पाखंड के त्याग के स्थान पर धर्म का बहिष्कार करना नास्तिकता रूपी अन्धविश्वास मात्र है।



Friday, January 2, 2015

Nizam was great and secular ruler says Telangana CM. Is it so?

                                                         Picture of Nizam of Hyderabad



Showering praise on the Nizam, the ruler of erstwhile Hyderabad State, Telangana chief minister K Chandrasekhar Rao described him as great and secular. I want to remind Mr. CM by this article that the Nizam of Hyderabad was nothing more than a religious bigot. The cruelties in Nizam regime reached to such level especially against the Hindus that Aryasamaj started a crusade against Nizam. This movement is History of Hyderabad state is remembered as The Hyderabad struggle of Aryasamaj.  It was a nonviolent movement where around eight thousand members of Aryasamaj including members of Hindu Mahasabha filled the jails of Nizam giving him sleepless nights. In this crusade of Aryasamaj around two dozen of campaigners from Aryasamaj sacrificed their lives. In the end Nizam honored the demands of Aryasamaj of social and religious equality for Hindus. Nizam was considered as the one of the richest persons in those days. The state of Nizam was resided by 95% Hindus but was administered by 95% Muslims statesmen. Lot of people advised Aryasamaj leaders that it’s not a wise decision to oppose Nizam who is so strong and powerful. The dedication of Aryasamaj and its leaders helped by workers of Hindu Mahasabha proved that the truth always wins.

 We in this article will briefly describe the atrocities done by Muslim rulers in Nizam state.

1.       Freedom of press and religious censorship in regime of Nizam was only for Muslims who were working for their agenda of Jihad. Muslim speakers could speak anything and can participate in any propaganda and with impunity. We shall substantiate our assertion by a few relevant quotations in this matter.

     a.       The salvation of the Untouchables lies in their acceptance of Islam…..Let them be saved from the latrine of idolatry and stone worship. (Rahbar-i-Deccan 20th April, 1933)
      b.      It is very necessary that the rascals of this place be not allowed any opportunity of going to the Districts. (Rahbar-i-Deccan 10th November, 1938 on the proceedings of a cow protection meeting held in Aurangabad)
      c.       These agitators having made an alliance with Namak-harams and iman-farmoshes (Sahifa, 4 Farwardi 1341 F.)
      d.      The late Maulvi Abdul Qayyum had no right to take the law in his own hands and kill the said Pandit. But as the Muhammadan Law prescribes capital punishment for a man who insults the Prophet, Maulvi Abdul Qayyum has given the proof of his love for the Prophet by killing Pandit (Rahbar-i-Decca22 Arde bahesht, 1344 F.)
       e.      Chan Biseshwar will strike the drum of the name of the Avatar (Nabi-Prophet)- a meeting will be held at Hampi in December….After this they will march to the temple of Vankat Ramna and take out a treasure of eighty crores. From there they will come back to Hampi and taking the treasure out, will unify one hundred and one castes. From that date will disappear the worship of stones and all idols will be thrown out of temples. (Notice in Urdu on behalf of Dindar Anjuman, Asafnagar, Hyderabad)
       f.        Few extracts from speech of Maulana Siddiq Dindar:- 

 - Our Quran has 500 verses which speak of conquering, overcoming and killing the enemy.
 -Why are you afraid of them? (26/12/1931)   
  - As many as heretics in the World, they are all the enemies of Mohomedans. Are they our friends?  They can never be friends unless they become Mohomedans. (25/12/1931)
-Whosoever are your opponents and whoever speak ill of your faith, kill such heretics. (24/12/1931)

                                    These are few examples of Secular media in Nizam’s Regime.

2.       Restrictions of religious and educational activities were only for Hindus while Muslims were given a free hand. Temples, schools or akhadas (wrestling place) of Hindus were subjected to police watch better to say under supervision of Muslim zealots. Any Hindu temple could not be repaired without the permission of Government officials. Any religious procession of Hindus was not allowed on Hindu festival day on name of peace and harmony while Muslims were allowed to openly carry their processions even in sensitive areas. Numbers of school run by Hindu institution were closed on name of Hygiene during inspection by Muslim officials leading to either promotion of students to enroll in Muslim madrasa or remain uneducated.


3.       Charges by Aryasamaj on religious persecution in state of Nizam published in a pamphlet Nizam Defense examined and exposed.

a.       Mr. Mohan Singh secretary of Aryasamaj was beaten by police inspector and was prosecuted for uttering abuse on public road.
b.      “AUM” flag from Aryasamaj temple was dislodged by order of Mr. Ikram Ali Taluqdar without any semblance of law.
c.       Stone were pelted as well as gun shots were fired on Aryasamaj while no action was taken by police against anyone.
d.      Mr. Gurulingappa, Mr. Shankarrao Ganpat Rao and Mr. Gundappa were beaten and his sacred thread was broken while no action was taken by police against anyone.
e.      Two Muslim gentleman who accepted Aryasamaj with their own will and consent were arrested and beaten by police and were forced to give false statements against Aryasamaj.
f.        In case of Murder of Nagappa, an Aryasamaj member the real facts were suppressed in enquiry. There are similar many instances where Aryasamaj dedicated workers were killed by Muslim goons while no action was taken against the culprits.
g.       False charges were framed against Aryasamaj branch in Kor Halli and Kal Mungli of Taluqa
Kalyani.
h. Killing of Ved Prakash an important member of Aryasamaj by Muslim goons and justice denied to him in spite of all efforts by Aryasamaj.

4.       Reports of Molestation of Hindu women by Muslim goons under the regime of Nizam. All evidences are from a pamphlet Nizam Defense examined and exposed published by The International Aryan League in 1939. All stories are same and reflect lack of interest of Police to deal with the culprits as the victims were Hindu women.

a.       Santayya Patri had to leave Humnabad as his daughter was being molested by Sharufu Amir.
b.      At Holsamudra the teacher molested a sangam girl and a Brahmin girl.
c.       Muslims at Klam molested the wife of Shamrao.
d.      At Udgir two Muslims molested a Hindu girl. She was secured by an Arya. Police demanded the women and got arrested the Arya.
e.      At Kalam a low caste Hindu women was dishonored by many Muslims at the instance of constable Bashir. They compelled her to accept Islam.
f.        A Muslim Mazkuri abducted the wife of Durgaji lime seller at Kalyani.

These are mere glimpses of discrimination against Hindus in Nizam’s Regime. Conversion of Hindus to Islam in jails, ban of Hindu newspapers and books, large donations to Muslims institutions, prefixed conviction of Hindus in case of any brawl with Muslims, change of name of Hindu cities to Islamic one for e.g. Bidar was renamed Mahmudabad, Large donations of public money gathered from majority Hindus of state was donated to Muslim institutions in whole country, publishing of names of Hindus who converted to Islam in newspapers at state expenses to promote others to convert, state sponsored Tabligh movement, appointment of Muslims on all major state posts in spite of lack of qualification, Lack of justice to Hindus in courts are few examples of discrimination in Nizam’s state.
This article is more than enough to prove that Nizam was nothing more than a religious bigot. It’s time that our politicians should grow up academically and refrain to issue such statements which are again a part of Muslims appeasing vote bank politics and entirely based on wrong facts. The History is never going to change by such statements. The Hyderabad Struggle Movement by Aryasamaj was against religious persecution in Nizam's state and today’s politicians are making jokes of themselves by calling them "SECULAR".

Dr Vivek Arya

Times of India Newspaper Link where this news was published in 2nd Jan, 2015


http://timesofindia.indiatimes.com/india/Nizam-was-great-secular-ruler-Telangana-CM/articleshow/45720082.cms


Picture - 1. Reports of Conversion of Hindus to Islam

 Picture 2- Dindar's Propaganda in favor of Tabligh or conversion of whole country to Islam


Monday, December 29, 2014

pk फ़िल्म पर मेरे विचार




pk फ़िल्म पर मेरे विचार

अधिकतर हिन्दू संगठन pk फ़िल्म का विरोध कर रहे है। किसी का कहना है की यह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचना है। किसी का कहना है कि इसमें शिव के वेश में एक व्यक्ति को भागते हुए दिखाना अशोभनीय है। किसी का कहना हैं की क्या आमिर खान में हिम्मत हैं की जैसे शिव को दिखाया है वैसे मुहम्मद साहिब को दिखाता तो मुसलमान उसका सर कलम कर देते। किसी का कहना हैं की हिन्दू लड़की का पाकिस्तानी लड़के से प्रेम दिखाना लव जिहाद को बढ़ावा देना है। किसी को आमिर खान के मुस्लिम होने और हज यात्रा करने पर आपत्ति हैं और किसी का कहना है की फ़िल्म में 80% से अधिक हिन्दुओं के विरुद्ध कहा गया हैं जबकि इस्लाम और ईसाईयत के विरुद्ध बहुत कम दिखाया गया है।

मेरे विचार इस विषय में कुछ भिन्न है। कुछ विषयों पर सहमति है और कुछ विषयों पर मतभेद है जिन्हें मैं यहाँ पर लिख रहा हूँ।

1. फिल्म में तर्क के माध्यम से धर्म के नाम पर किये जाने वाले कृत्यों की समीक्षा करने का सन्देश दिया गया है जोकि स्वागत योग्य है। न्याय दर्शन में तर्क को सबसे बड़ा ऋषि कहा गया है। तर्क सत्य और असत्य में भेद करने में सहायक है। संसार में किसी भी मत में धर्म के नाम पर अनेक अन्धविश्वास प्रचलित है। उनकी समीक्षा करने में कोई बुराई नहीं है। आधुनिक भारत में स्वामी दयानंद सर्वप्रथम ऐसे महापुरुष है जिन्होंने धर्म के नाम पर प्रचलित मान्यताओं को तर्क के तराजू में तोल कर ग्रहण करने का सन्देश दिया एवं सत्य के ग्रहण करने एवं असत्य के त्याग का उद्घोष दिया। अगर मान्यताएँ वैज्ञानिक है और सत्य पर आधारित है तो उनकी समीक्षा करने में कोई बुराई नहीं है। सोना तप कर कुंदन बनता है। सभी जानते हैं की जूठ के पाँव नहीं होते इसलिए धार्मिक कर्मकांडों एवं मान्यताओं की समीक्षा से उन्हीं को भय होगा जिनकी मान्यता या तो निराधार होगी अथवा असत्य पर टिकी होगी। इस फिल्म में यही सन्देश सरल शब्दों में दिया गया है। इस विषय को लेकर वही लोग असहज है जो यह मानते है की किसी भी अन्धविश्वास की समीक्षा नहीं करनी चाहिए और यह बहाना बनाते है कि इससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचती है। मगर पहले यह सोचिये की धार्मिक भावनायें है क्या? क्या वर्षा न होने पर कुत्ते के साथ कुँवारी लड़की का विवाह करना धार्मिक कृत्य है? क्या लड़का न होने पर किसी अन्य के लड़के की नरबलि देना धार्मिक कृत्य है? क्या भगवान को प्रसन्न करने के लिए निरीह पशुओं की बलि देना धार्मिक कृत्य है? क्या सकल जगत को अन्न प्रदान करने वाले ईश्वर की मूर्ति को दूध पिलाने के नाम पर सड़कों पर हज़ारों लीटर दूध को बहाना धार्मिक कृत्य है? क्या धर्म के नाम पर अपनी मान्यताओं में हाँ में हाँ मिलाने वाले को मित्र एवं ना करने वाले को शत्रु कहने वालो की समीक्षा करना गलत है? क्या ईश्वर के स्थान पर गुरुओं को बैठा कर उनकी पूजा करने जैसे पाखंड की समीक्षा करना क्या गलत हैं? धर्म के नाम पर लोभ, प्रलोभन, छल, बल आदि द्वारा धर्मान्तरण करने की समीक्षा करने को आप गलत कैसे कह सकते है। उत्तर स्पष्ट है नहीं। फिर ऐसे कृत्यों की समीक्षा करने वाले का विरोध करना गलत ही तो कहा जायेगा। इसलिए हमें तर्क के आधार पर समीक्षा का स्वागत करना चाहिये। तर्क का विरोध करना ठीक वैसा हैं जैसा मस्जिदों में सुना जाता है की मज़हब के मामले में अक्ल का दखल नहीं होना चाहिये।
2. यह फ़िल्म धर्म और मज़हब/मत या सम्प्रदाय में भेद करने में असफल रही है।  फ़िल्म क्या अपने आपको धार्मिक कहने वाले 99.9% लोग इस तथ्य से आज भी अनभिज्ञ है कि धर्म और सम्प्रदाय में अंतर क्या है? धर्म संस्कृत भाषा का शब्द है जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना है। "धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म है अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते है की मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति है वह धर्म है। मनु स्मृति में धर्म के दस लक्षण धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना,चोरी त्याग,शौच,इन्द्रिय निग्रह,बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध। स्वामी दयानंद के अनुसार धर्म जो पक्षपात रहित न्याय, सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार है। धर्म क्रियात्मक वस्तु है जबकि मत या मज़हब विश्वासात्मक वस्तु है। धर्मात्मा होने के लिये सदाचारी होना अनिवार्य है जबकि मज़हबी होने के लिए किसी विशेष मत की मान्यताओं का पालन करना अनिवार्य है उसका सदाचार से सम्बन्ध होना अथवा न होना अनिवार्य नियम नहीं है। धर्म में बाहर के चिन्हों का कोई स्थान नहीं है जबकि मजहब में उससे सम्बंधित चिन्हों को धारण करना अनिवार्य है। धर्म मनुष्य को पुरुषार्थी बनाता है क्यूंकि वह ज्ञानपूर्वक सत्य आचरण से ही अभ्युदय और मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा देता है जबकि मज़हब मनुष्य को आलस्य का पाठ सिखाता है क्यूंकि मज़हब के मंतव्यों मात्र को मानने भर से ही मुक्ति का होना उसमें सिखाया जाता है। धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़कर मनुष्य को स्वतंत्र और आत्म स्वालंबी बनाता है क्यूंकि वह ईश्वर और मनुष्य के बीच में किसी भी मध्यस्थ या एजेंट की आवश्यकता नहीं बताता परन्तु मज़हब मनुष्य को परतंत्र और दूसरों पर आश्रित बनाता है क्यूंकि वह मज़हब के प्रवर्तक की सिफारिश के बिना मुक्ति का मिलना नहीं मानता, किसी गुरु या मध्यस्थ की कृपा के बिना मुक्ति का मिलना नहीं मानता। धर्म दूसरों के हितों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना सिखाता है जबकि मज़हब अपने हित के लिए अन्य मनुष्यों और पशुयों की प्राण हरने के लिए हिंसा का सन्देश देता है। धर्म मनुष्य को सभी प्राणी मात्र से प्रेम करना सिखाता है जबकि मज़हब मनुष्य को प्राणियों का माँसाहार एवं अन्य  मतवालों से द्वेष और घृणा करना सिखाता है। धर्म मनुष्य जाति को मनुष्यत्व के नाते से एक प्रकार के सार्वजानिक आचारों और विचारों द्वारा एक केंद्र पर केन्द्रित करके भेदभाव और विरोध को मिटाता है जिसका उद्देश्य एकता का पाठ पढ़ाना होता है जबकि मत/मज़हब अपने भिन्न भिन्न मंतव्यों और कर्तव्यों के कारण अपने पृथक पृथक जत्थे बनाकर भेदभाव और विरोध को बढ़ाते है और एकता को मिटाते है। धर्म एक मात्र ईश्वर की पूजा बतलाता है जबकि मज़हब ईश्वर से भिन्न मत प्रवर्तक/गुरु/मनुष्य आदि की पूजा बतलाकर अन्धविश्वास फैलाते है। धर्म और मज़हब के अंतर को ठीक प्रकार से समझ लेने पर मनुष्य श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी कार्यों को करने में पुरुषार्थ करेगा तो उसमें सभी का कल्याण होगा। आज संसार में जितना भी कट्टरवाद है, जितना भी पाखंड है और जितनी भी अज्ञानता है उसका कारण मत/मज़हब में विश्वास करना है न की धर्म का पालन है। इस फ़िल्म के माध्यम से इस महत्वपूर्ण तथ्य को बताना चाहिए था। फिल्म बनाने वालो ने यह तो बता दिया की असत्य क्या हैं मगर यह नहीं बता पाया की सत्य क्या है। सत्य धर्म हैं और असत्य मत.मतान्तर की संकीर्ण धारणा है।
3 . जब अक्षय कुमार कि  ओ माई गॉड (OMG) फ़िल्म आई थी तब विषय एक ही होने के बाद भी उसका इतना विरोध नहीं हुआ था क्यूंकि उसके अभिनेता अक्षय कुमार हिन्दू धर्म से सम्बंधित है। इस फ़िल्म का विरोध आमिर खान से सम्बंधित होने के कारण ज्यादा हो रहा है। इस मानसिकता से हमें बचना चाहिए।
4. फ़िल्म आस्था और श्रद्धा पर प्रश्न तो करती है मगर भटके हुओं को रास्ता दिखाने में असफल हो जाती है जब आमिर खान यह कहता हैं कि मुझे ईश्वर के विषय में नहीं मालूम। इस प्रकार से यह फ़िल्म अन्धविश्वास से छुड़वाने का सन्देश तो देती हैं मगर जिज्ञासु प्रवृति के व्यक्ति को असंतुष्ट कर नास्तिक बनने की प्रेरणा देती है। यह इस फ़िल्म की महत्वपूर्ण कमी हैं जिसका समाधान अवश्य होना चाहिये था।

जिस दिन धार्मिक कहलाने वाले सभी लोग अपनी मान्यताओं में से अन्धविश्वास को निकाल कर विशुद्ध धर्म का पालन करना आरम्भ कर देंगे उस दिन pk जैसी फिल्में अपने आप बननी बंद हो जायेगी। इसलिए pk का विरोध समाधान नहीं है अपितु तर्क के आधार पर सत्य को ग्रहण करना एवं असत्य का त्याग करना उचित समाधान है और विरोध के चक्कर में जिस दिन मानव जाति ने तर्क का गला दबा दिया उस दिन से मानव की आध्यात्मिक उन्नति रुक जाएगी।

डॉ विवेक आर्य 

Sunday, December 28, 2014

"शुद्धि" प्राचीन आर्य विधान है



 "शुद्धि" प्राचीन आर्य विधान है


"घर वापसी", शुद्धि, परावर्तन अनेक नामों से हम लोग एक प्राचीन संस्कार से आज परिचित है। प्राचीन काल में अनार्यों को आर्य बनाने की प्रक्रिया को शुद्धि कहा जाता था। इस प्रक्रिया में आत्मचरित को पवित्र करना शुद्ध कहलाता था। आज विधर्मी जैसे मुस्लिम अथवा ईसाई हो चूके हमारे भाइयों को पुन: वैदिक सनातन धर्म में प्रविष्ट करने को “शुद्ध” करना कहा जाता है। 28 दिसंबर 2014 के Midday अख़बार में मुंबई के रहने वाले संस्कृत विद्वान श्री गुलाम दस्तगीर जी का बयान छपा कि हिन्दू धर्मग्रंथों में शुद्धि का विधान नहीं है। हम इस लेख के माध्यम से गुलाम साहिब जी की इस भ्रान्ति का निवारण करना चाहते हैं की शुद्धि का विधान न केवल प्राचीन हैं अपितु इसका वैदिक ग्रंथों में अनेक स्थलों पर वर्णन मिलता हैं जिससे न केवल उनकी भ्रान्ति दूर हो सके अपितु उनके निकष्ट सज्जन भी इस भ्रान्ति का शिकार न हो।

वेदों में "शुद्धि" का सन्देश

1. हे विद्वानों! जो गिरे हुए है उनको फिर से उठाओ। जिन्होंने पाप किया है अथवा जिनका जीवन मैला हो गया है उनको फिर से जीवन दो या "शुद्ध" करो।ऋग्वेद 10/137/1
2. हे इन्द्र! शत्रुओं के निवारणार्थ हमें शक्ति दीजिये जो हिंसारहित एवं कल्याणकारक है। जिससे तुम दासों (अनार्यों) को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाते हो, जो मनुष्य की वृद्धि का हेतु है।ऋग्वेद 6/22/10
3. परमेश्वर के नाम को आगे बढ़ाते हुए सब संसार को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाओ। ऋग्वेद 9/63/5

श्रोत्र-सूत्र ग्रंथों में शुद्धि का विधान

1. भ्रष्ट द्विजों की संतान को शुद्ध कर यज्ञोपवीत दे देना चाहिये। आपस्तम्भ 1/1/1
2. प्रायश्चित से प्रायश्चित्कर्ता शुद्ध होकर अपने असली वर्ण को प्राप्त करता है। आपस्तम्भ 1/1/2
3. उपद्रव, व्याधि, मुसीबत आदि में शरीर की रक्षार्थ जो विधर्मी बने वह शांति होने पर शुद्ध होने के लिए प्रायश्चित कर ले। पराशर स्मृति 7/41
4. देश में उपद्रव आदि के काल में जिनका यज्ञोपवीत उतारा गया वह मास भर दुग्ध पान का व्रत करे, गोपालन करे और पुन: यज्ञोपवीत धारण करे। हारीत स्मृति
5. जिनको मलेच्छों ने बलपूर्वक गोहत्या, मांसभक्षण आदि नीचकर्म किये हो वह वर्णानुसार कृच्छ व्रत कर शुद्ध हो जाये। देवल स्मृति श्लोक 9-11
6. गोवध आदि समतुल्य पातकियों की शुद्धि चान्द्रायण आदि व्रतों से होती हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति प्र -5

भविष्य पुराण में शुद्धि का वर्णन

 1.कण्व ऋषि द्वारा मलेच्छों की शुद्धि का वर्णन। भविष्य पुराण प्रतिसर्ग खंड 4 अध्याय 21 श्लोक 17-21
2. अग्निवंश के राजाओं द्वारा बौद्धों की शुद्धि का वर्णन। भविष्य पुराण प्रतिसर्ग खंड 4 अध्याय 21 श्लोक 31-35
3. कृष्ण चैतन्य के सेवक,रामानंद के शिष्य, निम्बादित्य, विष्णु स्वामी द्वारा मलेच्छों की शुद्धि का वर्णन। भविष्य पुराण प्रतिसर्ग खंड 4 अध्याय 21 श्लोक 48-59

इतिहास में शुद्धि के प्रमाण

1. कश्मीर के राजा द्वारा ब्राह्मणों के सहयोग से लिखवाया गया ग्रन्थ रणबीर सागर में शुद्धि का समर्थन इन शब्दों में किया गया है की सभी ब्राह्य जातियाँ प्रायश्चित कर शुद्ध हो सकती है। रणबीर सागर प्रायश्चित प्रा 12
2. इतिहास में शंकराचार्य एवं कुमारिलभट्ट द्वारा बुद्धों की शुद्धि।
3. इतिहास में हुण, काम्बोज आदि जातियाँ शुद्ध होकर आर्य हुई।
4. शिवाजी द्वारा नेताजी पालकर जैसे सरदारों को इस्लाम से वैदिक धर्म में दोबारा से शुद्ध कर लिया गया।
इस प्रकार के अनेक उदहारण प्राचीन ग्रंथों एवं इतिहास से दिए जा सकते है
जिससे यह सिद्ध होता है कि प्राचीनकाल में शुद्धि का विधान हमारे देश में प्रचलित था। आधुनिक भारत में शुद्धि के प्राचीन संस्कार को पुनर्जीवित करने का और खोये हुए भाइयों को वापिस से स्वधर्मी बनाने का सबसे प्रथम एवं क्रांतिकारी प्रयास स्वामी दयानंद द्वारा किया गया जिसके लिए समस्त हिन्दू समाज का उनका आभारी होना चाहिए।

डॉ विवेक आर्य

Link of News-

http://www.mid-day.com/articles/conversion-has-no-basis-in-hindu-scriptures/15871196

Wednesday, December 24, 2014

स्वामी दयानंद एवं चित्तोड़



(चित्र में चित्तोड़ के प्राचीन दुर्ग के अवशेष )

स्वामी दयानंद एवं चित्तोड़

स्वामी दयानंद अपने चित्तोड़ भ्रमण के समय चित्तोड़ के प्रसिद्द किले को देखने गए। किले की हालत एवं राजपूत क्षत्राणियों के जौहर के स्थान को देखकर उनके मुख से निकला की अगर ब्रह्मचर्य की मर्यादा का मान होता तो चित्तोड़ का यह हश्र नहीं होता। काश चित्तोड़ में गुरुकुल की स्थापना हो जिससे ब्रह्मचर्य धर्म का प्रचार हो सके।

स्वामी दयानंद के चित्तोड़ सम्बंधित चिंतन में ब्रह्मचर्य पालन से क्या सम्बन्ध था यह इतिहास के गर्भ में छिपा सत्य हैं। जिस समय चित्तोड़ का अकबर के हाथों विध्वंश हुआ उस समय चित्तोड़ पर वीर बप्पा रावल के वंशज, राणा सांगा के पुत्र उदय सिंह का राज था। समस्त राजपुताना में चित्तोड़ एक मात्र रियासत थी जिसने अपनी बेटी का डोलना मुगलों के हरम में नहीं भेजा था। अकबर के लिए यह असहनीय था की जब तक चित्तोड़ स्वतंत्र हैं तब तक भारत विजय का अकबर का स्वपन अधूरा हैं। राणा उदय सिंह वैसे तो वीर था मगर अपने पूर्वजों से महानता एवं दूरदृष्टि से विमुख था। उसमें भोग विलास की मात्र अधिक थी इसीलिए उसका जीवन उसकी दर्जनों रानियाँ और उनके अनेकों बच्चों में उलझा रहता था। यही कारण था की महाराणा प्रताप ने एक बार कहा था कि अगर दादा राणा सांगा जी के पश्चात मेवाड़ की गद्दी पर वह बैठते तो मुगलों को कभी इतना शक्तिशाली न होने देते। राजपुताना के बाकि राजपूतों की दशा भी कोई भिन्न न थी।
              जब अकबर ने चित्तोड़ पर आक्रमण किया तब उदय सिंह ने उसकी रक्षा करने के स्थान पर भाग जाना बेहतर समझा। अभागा हैं वह देश जिसमें आपत्ति काल में उसका मुखिया साथ छोड़ दे। बारूद से शून्य किला बच सकता हैं मगर किलेदार से शून्य किला नहीं बच सकता। यहाँ तक कि चित्तोड़ के घेराव के समय भी उदय सिंह ने बाहर बैठकर कुछ नहीं किया। मगर चित्तोड़ राजपूताने  मस्तक था, मान था। जयमल जैसे वीर सरदार अभी जीवित थे। एक ओर अकबर कि 25 हजार सेना, 3000 हाथी एवं 3 बड़े तोपखाने थे वही दूसरी ओर संसाधन रहित स्वाधीनता से प्रेम करने वाले 5000 वीर राजपूत थे। राजपूत एक ओर मुग़ल सेना से लड़ते जाते दूसरी ओर तोपों कि मार से दह रही दीवारों का निर्माण करते जाते। युद्ध 6 मास से अधिक हो चला था। एक दिन किले की दीवार के सुराख़ के छेद में से अकबर ने अपनी बन्दुक से एक तेजस्वी पुरुष को निशाना साधा। उस गोली से जयमल का स्वर्गवास हो गया। राजपूतों ने एक युवा पत्ता को अपना सरदार नियुक्त किया। पत्ता की मूछें भी ठीक से नहीं उगी थी मगर मातृभूमि पर प्राण न्यौछावर करने के लिए सभी राजपूत तैयार थे। आज अलग दिन था। सभी राजपूतों ने केसरिया बाना पहना, कमर पर तलवार बाँधी और युद्ध के लिए रवाना हो गए। राजपूतों ने जब देखा कि किले की रक्षा अब असंभव हैं तो उन्होंने अंतिम संग्राम का मन बनाया। किले के दरवाजे खोल दिए गए। मुग़ल सेना अंदर घुसते ही राजपूतों की फौलादी छाती से टकराई। उस अभेद्य दिवार को तोड़ने के अकबर ने मदमस्त हाथी राजपूतों पर छोड़ दिए। अनेक हाथियों को राजपूतों ने काट डाला, अनेक राजपूत स्वर्ग सिधार गए। अंत में पत्ता लड़ते लड़ते थक का बेहोश हो गया। एक हाथी ने उसे अपनी सूंड में उठा कर अकबर के सामने पेश किया। बहादुर पत्ता के प्राण थोड़ी देर में निकल गए मगर अकबर  उसकी बहादुरी और देशभक्ति का प्रशंसक बन गया। इस युद्ध में 30000 आदमी काम आये, जिनमें लड़ाकू राजपूतों के अतिरिक्त चित्तोड़ की आम जनता भी थी। युद्ध के पश्चात मृत बहादुरों के शरीर से उतरे जनेऊ  का तोल साढ़े सतावन मन था। उस दिन से राजपूताने में साढ़े सतावन का अंक अनिष्ट माना जाता हैं। किले के अंदर राजपूत क्षत्राणियों ने जौहर कर आत्मदाह कर लिया। अकबर ने यह युद्ध हाथियों कि दिवार के पीछे खड़े होकर जीता था। राजपूत चाहते तो आत्मसमर्पण कर देते मगर उनका लक्ष्य शहिद होकर सदा के लिए अमर होना था। युद्ध के इस परिणाम से महान आर्य रक्त की बड़ी हानि हुई।
                     यह हानि होने से बच सकती थी अगर राजपूतों की भोगवादी प्रवृति न होती। राजपूतों में न एकता थी और न ही दूरदृष्टी थी। अगर होती तो मान सिंह जैसे राजपूत अपनी सेनाओं के साथ अपने ही भाइयों से न लड़ते और अकबर के साम्राज्य की नीवों को मजबूत करने में जीवन भर प्रयत्न न करते। अगर होती तो उदय सिंह अपना ही राज्य छोड़कर जाने से अधिक लड़ते लड़ते मर जाना अधिक श्रेयकर समझता।  शराब, अफीम एवं अनेक स्त्रियों के संग ने राजपूतों के गर्म लहू को यहाँ तक जमा दिया था कि बात बात पर मूछों को तांव देने वाले राजपूत अपनी बहन और बेटियों को मुग़लों के हरम में भेजने में भी परहेज नहीं कर रहे थे।

 स्वामी दयानंद का चिंतन इसी दुर्दशा का ईशारा कर रहा था कि जहाँ पर भोग होगा, प्राचीन धार्मिक सिद्धांतों का अपमान होगा, ब्रह्मचर्य का अभाव होगा वहां पर नाश निश्चित हैं। इसीलिए चित्तोड़ के दुर्ग को देखकर सन 1567 में हुए विनाश का कारण स्वामी जी के मुख से निकला।आज हिन्दू समाज को अगर अपनी रक्षा करनी हैं तो उसे वेद विदित आर्य सिद्धातों का अपने जीवन में पालन अनिवार्य बनाना होगा अन्यता इतिहास अपने आपको दोहराने से पीछे नहीं हटेगा।

डॉ विवेक आर्य  
               
       

Tuesday, December 23, 2014

ईश्वर के संबंध में महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के विचार


चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा जिससे अनेक ईश्वर सिद्ध हों। किन्तु यह तो लिखा है कि ईश्वर एक है। देवता दिव्य गुणों के युक्त होने के कारण कहलाते हैं जैसा कि पृथ्वी, परन्तु इसको कहीं ईश्वर तथा उपासनीय नहीं माना है।जिसमें सब देवता स्थित हैं, वह जानने एवं उपासना करने योग्य देवों का देव होने से महादेव इसलिये कहलाता है कि वही सब जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्ता, न्यायाधीश, अधिष्ठाता है।
ईश्वर दयालु एवं न्यायकारी है। न्याय और दया में नाम मात्र ही भेद है, क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से।
दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंध होकर दुखों को प्राप्त न हो, वही दया कहलाती है। जिसने जैसा जितना बुरा कर्म किया है उसको उतना है दण्ड देना चाहिये , उसी का नाम न्याय है। जो अपराध का दण्ड न दिया जाय तो न्याय का नाश हो जाय। क्योंकि एक अपराधी को छोड़ देने से सहस्त्रों धर्मात्मा पुरुषों को दुख देना है। जब एक को छोड़ने से सहस्त्रों मनुष्यों को दुख प्राप्त होता हो तो वह दया किस प्रकार हो सकती है? दया वही है कि अपराधी को कारागार में रखकर पाप करने से बचाना। निरन्तर एवं जघन्य अपराध करने पर मृत्यु दण्ड देकर अन्य सहस्त्रों मनुष्यों पर दया प्रकाशित करना।
संसार में तो सच्चा झूठा दोनों सुनने में आते हैं। किन्तु उसका विचार से निश्चय करना अपना अपना काम है। ईश्वर की पूर्ण दया तो यह है कि जिसने जीवों के प्रयोजन सिद्ध होने के अर्थ जगत में सकल पदार्थ उत्पन्न करके दान दे रक्खे हैं। इससे भिन्न दूसरी बड़ी दया कौन सी है? अब न्याय का फल प्रत्यक्ष दीखता है कि सुख दुख की व्याख्या अधिक और न्यूनता से प्रकाशित कर रही है। इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सबको सुख होने और दुख छूटने की इच्छा और क्रिया करना है वह दया और ब्राह्य चेष्टा अर्थात बंधन छेदनादि यथावत दण्ड देना न्याय कहलाता है। दोनों का एक प्रयोजन यह है कि सब को पाप और दुख से प्रथक कर देना।
ईश्वर यदि साकार होता तो व्यापक नहीं हो सकता। जब व्यापक न होता तो सर्वाज्ञादि गुण भी ईश्वर में नहीं घट सकते। क्योंकि परिमित वस्तु में गुण, कर्म, स्वभाव भी परिमित रहते हैं तथा शीतोष्ण, क्षुधा, तृष्णा और रोग, दोष, छेदन, भेदन आदि से रहित नहीं हो सकता। अतः निश्चित है कि ईश्वर निराकार है। जो साकार हो तो उसके नाक, कान, आँख आदि अवयवों को बनाने वाला ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरा होना चाहिये। क्योंकि जो संयोग से उत्पन्न होता हो उसको संयुक्त करने वाला निराकार चेतन आवश्य होना चाहिये। कोई कहता है कि ईश्वर ने स्वैच्छा से आप ही आप अपना शरीर बना लिया। तो भी यही सिद्ध हुआ कि शरीर बनाने के पूर्व वह निराकार था। इसलिये परमात्मा कभी शरीर धारण नहीं करता। किन्तु निराकार होने से सब जगत को सूक्ष्म कारणों से स्थूलाकार बना देता है।
सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि ईश्वर अपने काम अर्थात उत्पत्ति, पालन, प्रलय आदि और सब जीवों के पाप पुण्य की यथा योग्य व्यवस्था करने में किंचित भी किसी की सहायता नहीं लेता अर्थात अपने अनंत सामर्थ्य से ही सब अपना काम पूर्ण कर लेता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है की परमेश्वर वह सब कर सकता है जो उसे नहीं करना चाहिये। जैसे- अपने आपको मारना, अनेक ईश्वर बनाना, स्वयं अविद्वान, चोरी, व्यभिचारादि पाप कर्म कर और दुखी भी हो सकना। ये काम ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव से विरूद्ध हैं।
ईश्वर आदि भी है और अनादि भी। ईश्वर सबकी भलाई एवं सबके लिये सुख चाहता है परन्तु स्वतंत्रता के साथ किसी को बिना पाप किये पराधीन नहीं करता।
ईश्वर की स्तुति प्रार्थना करने से लाभः- स्तुति से ईश्वर से प्रीति, उसके गुण, कर्म, स्वभाव से अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुधारना। प्रार्थना से निरभयता, उत्साह और सहाय का मिलना। उपासना से परब्रह्म से मेल और साक्षात्कार होना।
ईश्वर के हाथ नहीं किन्तु अपने शक्ति रूपी हाथ से सबका रचन, ग्रहण करता। पग नहीं परन्तु व्यापक होने से सबसे अधिक वेगवान। चक्षु का गोलक नहीं परन्तु सबको यथावत देखता। श्रोत नहीं तथाकथित सबकी बातें सुनता। अंतःकरण नहीं परन्तु सब जगत को जानता है और उसको अवधि सहित जानने वाला कोई भी नहीं। उसको सनातन, सबसे श्रेष्ठ, सबमें पूर्ण होने से पुरुष कहते हैं। वह इन्द्रियों और अंतःकरण के बिना अपने सब काम अपने सामर्थ्य से करता है।
न कोई उसके तुल्य है और न उससे अधिक। उसमें सर्वोत्तम शक्ति अर्थात जिसमें अनंत ज्ञान, अनंत बल और अनंत क्रिया है। यदि परमेश्वर निष्क्रिय होता तो जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय न कर सकता। इसलिये वह विभू तथापि चेतन होने से उस क्रिया में भी है।
ईश्वर जितने देश काल में क्रिया करना उचित समझता है उतने ही देशकाल में क्रिया करता है। न अधिक न न्यून क्योंकि वह विद्वान है।
परमात्मा पूर्ण ज्ञानी है, पूर्ण ज्ञान उसे कहते हैं जो पदार्थ जिस प्रकार का हो उसे उसी रूप में जानना।
परमेंश्वर अनंत है। तो उसको अनंत ही जानना ज्ञान, उसके विरुद्ध अज्ञान अर्थात अनंत को सांत और सांत को अनंत जानना भ्रम कहलाता है। यथार्थ दर्शन ज्ञानमिति, जिसका जैसा गुण, कर्म, स्वभाव हो उस पदार्थ को वैसा जानकर मानना ही ज्ञान और विज्ञान कहलाता है और उससे उल्टा अज्ञान।
ईश्वर जन्म नहीं लेता, यदुर्वेद में लिखा है ‘अज एकपात्’ सपथर्यगाच्छुक्रमकायम।
यदा यदा…………..सृजाम्यहम्।
यह बात वेद विरुद्ध प्रमाणित नहीं होती। ऐसा हो सकता है कि श्रीकृष्ण धर्मात्मा धर्म की रक्षा करना चाहते थे कि मैं युग युग में जन्म लेके श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों का नाश करूँ तो कुछ दोष नहीं। क्योंकि ‘परोपकाराय सतां विभूतयः’ परोपकार के लिये सत्पुरुषों का तन, मन, धन होता है। किन्तु इससे श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं हो सकते।
वेदार्थ को न जानने, सम्प्रदायी लोंगो के बहकावे और अपने आप अविद्वान होने से भ्रमजाल में फँसके ऐसी ऐसी अप्रमाणिक बातें करते और मानते हैं।
जो ईश्वर अवतार शरीर धारण किये बिना जगत की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करता है उसके लिये कंस और रावणादि एक कीड़ी के समान भी नहीं हैं। वह सर्वव्यापक होने से कंस रावणादि के शरीर में भी परिपूर्ण हो रहा है। जब चाहे उसी समय मर्मच्छेदन कर नाशकर सकता है। भला वह अनंत गुण, कर्म स्वभावयुक्त परमात्मा को एक शूद्र जीव को मारने के लिये जन्म मरण युक्त कहने वाले को मूर्खपन से अन्य कुछ विशेष उपमा मिल सकती है और जो कोई कहे कि भक्तजन के उद्धार करने के लिये जन्म लेता है तो भी सत्य नहीं है। क्योंकि जो भक्तजन ईश्वर की आज्ञानुकूल चलते हैं उसके उद्धार करने का पूरा सामर्थ्य ईश्वर में है। क्या ईश्वर पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रादि जगत के बनाने से कंस रावाणादि का वध और गोवर्धनादि का उठाना बड़े कार्य हैं।
जो कोई इस सृष्टि में परमेश्वर के कर्मों का विचार करे तो ‘न भूतो न भविष्यति’ ईश्वर के सद्श्य न कोई है न होगा। इस युक्ति से भी ईश्वर का जन्म सिद्ध नहीं होता। जैसे कोई अनंत आकाश को कहे कि गर्भ में आया और मुठ्ठी में भर लिया, ऐसा कहना कभी सच नहीं हो सकता। क्योंकि आकाश अनंत और सब में व्यापक है इससे न आकाश बाहर आता और न भीतर जाता, वैसे ही अनंत सर्वव्यापक परमात्मा के होने से उसका आना जाना कभी सिद्ध नहीं हो सकता। आना और जाना वहाँ हो सकता है जहाँ न हो। क्या परमेशवर गर्भ में व्यापक नहीं था जो कहीं से आया और बाहर नहीं था जो भीतर से निकला। ऐसा ईश्वर के विषय में कहना और मानना विद्याहीनों के सिवाय कौन कह और मान सकेगा। इसलिये परमेश्वर का आना जाना और जन्म-मरण कभी सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिये ईसा आदि को ईश्वर का अवतार नहीं समझना चाहिये। वे राग, द्वेष, क्षुधा, तृष्णा, भय, शोक, दुख, सुख, जन्म,मरण आदि गुणायुक्त होने से मनुष्य थे।
ईश्वर पाप क्षमा नहीं कर सकता। ऐसा करने से उसका न्याय नष्ट हो जाता है और मनुष्य क्षमा दान मिलने की आशा से महापापी बन सकता है। तथा वह निर्भय एवं उत्साह पूर्वक पाप कर्म करने में संलग्न हो जायगा।
जिस प्रकार अपराधी को यह भरोसा हो जाय कि कानून के द्वारा उसके अपराध करने पर कोई सजा नहीं मिल सकती तो वह निर्भय पूर्वक अपराध करता है।
सभी प्रणियों को कर्मानुसार फल देना ईश्वर का कार्य है, क्षमा करना नहीं। मनुष्य अपने कर्मों में स्वतंत्र एवं ईश्वर की व्यवस्था में परतंत्र है।
मजदूर ने पहाड़ से लोहा निकाला, दुकानदार ने खरीदा, लौहार ने तलवार बनाई, सिपाही ने तलवार ली, उसने किसी को मार दिया। अब अपराधी लोहे का निकालने वाला मजदूर, खरीदने वाला दुकानदार और बनाने वाला लौहार नहीं होगा। बल्कि केवल वह सिपाही होगा जिसने किसी की हत्या की। इसलिये शरीर आदि की उत्पत्ति करने वाला ईश्वर व्यक्ति के कार्यों का भोक्ता नहीं होगा। क्योंकि कर्म करने वाला परमेशवर नहीं होता। यदि ऐसा होता तो क्या किसी को पाप करने की प्रेरणा देता। अतः मनुष्य कार्य करने के लिये स्वतंत्र है। उसी तरह ईश्वर भी कर्मानुसार फल देने के लिये स्वतंत्र है।
जीव और ईश्वर दोंनो चेतन स्वरूप हैं। स्वभाव दोनों का पवित्र, अविनाशी एवं धार्मकिता आदि है। परन्तु परमेश्वर के सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, सबको नियम में रखना, जीवों का पाप पुण्य के फल देना आदि धर्मयुक्त कार्य हैं। और जीव में पदार्थों को पाने की अभिलाषा (इच्छा), द्वेष दुखादि की अनिच्छा, बैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, बल, (सुख) आनन्द, (दुख) विलाप, अप्रसन्नता, (ज्ञान) विवेक पहचानना ये तुल्य हैं। किन्तु वैशेषिक में प्राण वायु को बाहर निकालना, फिर उसे बाहर से भीतर लेना, (निमेष) आँख को मींचना, (उन्मेष) आँखों को खोलना, (जीवन) प्राण धारण करना, (मनन) निश्चय स्मरण अहंकार करना, (गति) चलना, (इन्दिय) सब इन्दियों को चलाना, (अंतर्विकार) भिन्न-भिन्न सुधा, तृष्णा, हर्ष, शोकादि युक्त होना, ये जीवात्मा के गुण परमात्मा से भिन्न हैं।
ईश्वर को त्रिकालदर्शी कहना मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं। क्योंकि जो ईश्वर होकर न रहे वह भविष्यकाल कहलाता है। क्या ईश्वर को कोई ज्ञान रहके नहीं रहता? तथा न होके होता है? इसलिये परमात्मा का ज्ञान एक रस अखण्डित वर्तमान रहता है। भूत, भविष्यत् जीवों के लिये है। जीवों के कर्म की अपेक्षा से त्रिकालज्ञाता ईश्वर में है, स्वतः नहीं। जैसा स्वतंत्रता से जीव करता है, वैसा ही सर्वज्ञता से ईश्वर जानता है और जैसा ईश्वर जानता है वैसा जीव करता है अर्थात् भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञान और फल देने में ईश्वर स्वतंत्र और जीव किंचित वर्तमान और कर्म करने में स्वतंत्र है। ईश्वर का अनादि ज्ञान होने से जैसा कर्म का ज्ञान है वैसा ही दण्ड देने का भी ज्ञान अनादि है। दोनों ज्ञान उसके सत्य हैं। क्या कर्म ज्ञान सच्चा और दण्ड ज्ञान मिथ्या कभी हो सकता है। इसलिये इसमें कोई भी दोष नहीं आता।
परमेश्वर सगुण एवं निर्गुण दोनों है। गुणों से सहित सगुण, गुणों से रहित निर्गुण। अपने अपने स्वाभाविक गुणों से सहित और दूसरे विरोधी के गुणों से रहित होने से सब पदार्थ सगुण और निर्गुण हैं। कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है जिसमें केुवल निर्गुणता या केवल सगुणता हो। किन्तु एक ही में निर्गुणता एवं सगुणता सदा रहती है। वैसे ही परमेश्वर अपने अनंत ज्ञान बलादि गुणों से सहित होने से सगुण रूपादि जड़ के तथा द्वेषादि के गुणों से प्रथक होने से निर्गुण कहलाता है। यह कहना अज्ञानता है कि निराकार निर्गुण और साकार सगुण है।
परमेश्वर न रागी है, न विरक्त। राग अपने से भिन्न प्रथक पदार्थों में होता है, सो परमेश्वर से कोई पदार्थ प्रथक तथा उत्तम नहीं है, अतः उसमें राग का होना संभव नहीं है। और जो प्राप्त को छोड़ देवे उसको विरक्त कहते हैं। ईश्वर व्यापक होने से किसी पदार्थ को छोड़ ही नहीं सकता। इसलिये विरक्त भी नहीं है।
ईश्वर में प्राणियों की तरह की इच्छा नहीं होती।
जो स्वयंभू, सर्वव्यापक, शुद्ध, सनातन, निराकार परमेश्वर है वह सनातन जीवरूपी प्रजा के कल्याणार्थ यथावत् रीतिपूर्वक वेद द्वारा सब विद्याओं का उपदेश करता है।
परमेश्वर के सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक होने से जीव को अपनी व्याप्ति से वेदविद्या के उपदेश करने में कुछ भी मुखादि की अपेक्षा नहीं है। क्योंकि मुख जिव्हा से वर्णोंच्चारण अपने से भिन्न को बोध होने के लिये किया जाता है, कुछ अपने लिये नहीं। क्योंकि मुख जिव्हा के व्यावहार करे बिना ही मन के अनेक व्यावहारों का विचार और शब्दोंच्चारण होता रहता है। कानों का उँगुलियों से मूँद कर देखो, सुनों कि बिना मुख जिव्हा ताल्वादि स्थानों के कैसे कैसे शब्द हो रहे हैं?
जब परमात्मा निराकार, सर्वव्यापक है तो अपनी अखिल वेद विद्या का उपदेश जीवस्थ स्वरूप से जीवात्मा में प्रकाशित कर देता है। फिर वह मनुष्य अपने मुख से उच्चारण करके दूसरे को सुनाता है। इसे ही वेद ज्ञान कहते हैं जो समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए ईश्वर द्वारा दिया गया हैं।