Thursday, November 7, 2013

गौ रक्षा दिवस ७ नवंबर, १९६६ के शहीदों को नमन




 
(गौ हत्या के विरुद्ध ७ नवंबर १९६६ को संसद भवन के सामने प्रदर्शन करते नागा साधू )

आज ७ नवंबर के दिन सन १९६६ में गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगवाने के लिए हज़ारों हिंदुओं ने संसद भवन के आगे प्रदर्शन किया था। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व में निहत्थे हिंदुओं पर गोलियाँ चलवा दी थी जिसमें अनेक गौ भक्तों का बलिदान हुआ था।

गौ माता कि रक्षा में प्राण न्यौछावर करने वाले उन महान शहीदों को नमन। सबसे महत्वपूर्ण बात यह हैं कि समस्त हिन्दू वादी संगठनों, समस्त हिन्दू धर्म गुरुओं ने एक मत से संगठित होकर गौ माता कि बूचड़ खानों में हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने कि माँग कि थी। सबसे बड़ी विडंबना यह हैं कि अपने आपको हिन्दू बहुल देश कहलाने वाले भारत देश में गौ माता को हिंदुओं कि आँखों के सामने मारा जाता हैं और जो हिन्दू इसका प्रतिरोध करते हैं उन्हें सांप्रदायिक, कट्टरवादी, हिन्दू आतंकवादी, अल्पसंख्यक विरोधी और न जाने क्या क्या कहा जाता हैं। जो लोग यह कहते हैं कि गौ हत्या पर प्रतिबन्ध से हिन्दू मुस्लिम सम्बन्धों पर अंतर पड़ता हैं उनके लिए हम एक ही बात कहेगे कि इतिहास हमें बहुत कुछ सिखाता हैं। गौ हत्या पर रोक से हिन्दू मुस्लिम एकता स्थापित होती हैं नाकि वैमनस्य बढ़ता हैं। अकबर ने अपने राज्य कि नीवों को दृढ़ करने के लिए न केवल ईद के दिन गौ कि क़ुरबानी से मना किया था अपितु अपने राज्य में गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाया था। यह प्रतिबन्ध शाहजहाँ के काल तक लागु रहा था। धर्मान्ध औरंगज़ेब ने विकृत सोच के चलते इस प्रतिबन्ध को हटा दिया इससे हिन्दू जनमानस द्वारा उसे मिलने वाला सहयोग समाप्त हो गया जिसके स्वरुप उसकी राज्य कि नींव दक्कन में वीर शिवाजी, राजपूताने में दुर्गा दास राठोड, बुंदेलखंड में छत्रसाल, पंजाब में सिख गुरुओं ने हिला दी और उसके मृत्यु के पश्चात दुनिया का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य ताश के पत्तो के समान ढह गया। महाराज रणजीत सिंह के कार्यकाल में भी गौ हत्या पर रोक थी। १८५७ में जब बहादुर शाह जफ़र कि अस्थायी सरकार बनी तो उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता के गठजोड़ को मजबूती देने के लिए गौ हत्या पर पाबन्दी लगा दी थी । दरअसल पराधीन भारत में गौ हत्या को बढ़ावा देना अंग्रेजों का कार्य था। उन्हें मालूम था कि अगर हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में जब तक लड़ाया जाता रहेगा तब तक उनका राज कायम रहेगा। इसलिए उन्होंने गौ हत्या को बढ़ावा दिया। वीर कूकाओं का आंदोलन उसी अत्याचार के विरोध था जिसे अत्यंत विभित्स रूप में दबाया गया था। अंग्रेजों ने कसाइयों को उनकी करनी का दंड देने वाले कूका वीरो को तोप के मुख से बांध कर उड़ा दिया था। अंग्रेजों के ही राज में स्वामी दयानंद ने सर्वप्रथम गौ हत्या रोकने के लिए आंदोलन आरम्भ किया था। १८८१ में स्वामी जी ने गौकरूणानिधि के नाम से पुस्तक प्रकाशित कि थी जिसमें उन्होंने गौ माता से होने वाले लाभ के विषय में बताया था एवं गौ और कृषि कि रक्षा के एक सभा बनाने का विचार प्रस्तुत किया था। अपनी पहल को प्रभावशाली रूप से अंग्रेजों के समक्ष रखने के लिए उन्होंने भारतवासियों के एक करोड़ हस्ताक्षर करवाकर इंग्लैंड कि महारानी विक्टोरिया को भेजने का अभियान आरम्भ किया था. उन्होंने ३.५ लाख हस्ताक्षर एकत्र भी कर लिये थे परन्तु उनकी असमय मृत्यु के कारण यह अभियान रूक गया। इससे भी बढ़कर उन्होंने अंग्रेजों द्वारा पोषित कि जा रही भ्रान्ति का भी यथोचित उत्तर दिया जो वेदों में गौ माँस खाने का, यज्ञ में पशु बली देने के विधान का प्रसार कर रही थी। स्वामी दयानंद ने राष्ट्रपरक वेद भाष्य कर वेदों के मन्त्रों का सत्य अर्थ साधारण जनता के समक्ष प्रस्तुत किया जिससे गौ हत्या का समर्थन करने वाले सभी आलोचकों का मुँह बंद कर दिया। इसके अतिरिक्त स्वामी दयानंद द्वारा अहिरवाल नरेश राव युधिष्ठिर को प्रेरणा देकर भारत कि पहली गौशाला कि स्थापना १८७८ में हुई थी जिससे गौ माता का संरक्षण हो सके। परिणाम स्वरुप भारत भर में अनेक गौ शाला कि स्थापना हुई जिससे गौ माता का रक्षण हुआ। १९६६ में भी सरकार के समक्ष सायण या महीधर का नहीं अपितु स्वामी दयानंद द्वारा किये गये वेद भाष्य को गौ हत्या पर रोक लगाने के लिए प्रमाण रूप से प्रस्तुत किया गया था।

अंग्रेजी राज में अनेक दंगों का मूल कारण गौ हत्या था। अंग्रेज सरकार चाहती तो इन दंगों को रोक सकती थी। मुस्लिम समाज विशेष रूप से ईद के दिन क़ुरबानी करने के लिए गौ का जुलूस हिन्दू मोहल्लो से निकालता था जिससे शान्ति भंग होती अंत में दंगे हो जाते थे। हिन्दू समाज के अनेक वीरों ने गौ हत्या कि रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देकर स्वधर्म निभाया। १९४७ के पश्चात भारत देश में हिन्दू मान्यताओं को प्राथमिकता देने के नाम पर सेकुलरता के नाम पर मुसलमानों को रिझाने का कार्य यथावत चालू रखा गया जिसके स्वरुप गौ माता कि हत्या पर प्रतिबन्ध अल्पसंख्यक मुसलमानों कि धार्मिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात था। ध्यान दीजिये हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए गौरक्षा आवश्यक हैं। इतिहास इस बात का प्रमाण हैं। सभी ने अल्पसंख्यकों का ध्यान रखने में होड़ लगाई किसी ने बहुसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों कि चिंता नहीं करी। और जब जब गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने कि माँग कि गई उसे निर्दयता से कुचल दिया गया। यह कमी किसकी हैं। यह कमी हिंदुओं कि ही हैं क्यूंकि उनमें एकता का अभाव हैं। आइये आज गौ रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले महान शहीदों से प्रेरणा लेकर एक होने का संकल्प ले। तभी आर्य हिन्दू जाति का उद्धार हो सकेगा।

देख तेरे देश में बापू हो रहा गौ का कत्लेआम
उसे देख क्यूँ नहीं निकलता तेरे मुख से 'हे राम'
अपनी माता का कैसे तू देख पाता हैं प्राण घात
गौहत्या करने वाला हैं हर कोई हैं जाति घात
गौ हत्या पर इस देश के दो टुकड़े जब हैं हो चुके
फिर गौ पर तलवार चलाने वाले हाथ क्यूँ नहीं रुके
आज जोर से पूछ रही हैं ये भारत कि गौ प्रेमी जनता
क्यूँ देश के हर घर में गौपाष्टमी का दिन नहीं बनता
हर बात के लिए अगर देखा जायेगा शरीयत कि ओर
तब तो हम भी बोलेगे कि लौट चलो अपने वेदों कि ओर
आपको जानना होगा कि वेदों में गोहत्या कि क्या हैं सजा
गोघातक को गोली से उड़ा देना हैं उस मालिक कि रजा
देश कि शांति न हो भंग क्यूंकि हम हैं शांति के पुजारी
इसलिए हैं नेताओं सुन लो यह छोटी सी गुजारिश हमारी
गौ का मानता हैं हर हिन्दू माता के समान इस देश में
"विवेक" कहे कि हिंदुओं को मिले उनका हक हर वेश में
 
डॉ विवेक आर्य

Friday, November 1, 2013

Wake up! You all sleeping from 5000 years


                                  Message on Diwali - A Tribute to Swami Dayanand

“Wake up! You all sleeping from 5000 years.”

[This is a true story from a remote village of Uttar Pradesh which happened in 1890's]

A watchman on his night duty while taking routine rounds of the village used to raise alarm by saying-

“Wake up! You all sleeping from 5000 years.”

One night the local Jamindar asked him,

''why do you always say the above words for waking? '

He replied,' there is a secret behind these words’.

If you want to know the secret you need to spend two rupees and wait for few days.

Jamindar was anxious to know the answer so he handed him the money.

The watchman mailed the money at the postal address of Paropkarini Sabha, Ajmer to purchase a copy of Satyarth Prakash.

After few days he received the copy of Satyarth Prakash from Ajmer. The watch man handed that copy to the Jamindar and said that answer to your queries lies within this book.

Jamindar eager to know the answer started reading the book. It was first time he came across the scholarly work of Swami Dayanand.

After reading the book he learned the following answers

1. Why did the Hindu race surrendered to the invaders in last 1200 years?

2. What is the reason behind the downfall of the Hindus race. The same race which was once supreme teacher to the whole world?

3. What is the true definition of Dharma and its relation to the Vedas?

4. What should be done to revive the dying race?

He admired the wise motive of watchmen. He himself became instrumental in establishing new branch of Aryasamaj in his village. He himself started working as a active member of Aryasamaj.

We know this watchman as Nihal Singh. He was although of small social stature but with his dedication mind he created history. He established only eleven new Aryasamaj Branches in different villages of Bijnour area of Uttar Pradesh during his reign as watchmen.

Take Home Message

Today we have more number of resources, more number of facilities but we lack that wanted determination inside us for the mission of Swami Dayanand.


Awake! O Dear Brothers and make a pledge

To work for the mission of Swami Dayanand
To work for the Aryasamaj
To work for the truth of the Vedas.


Dr Vivek Arya

Thursday, October 31, 2013

आधुनिक भारत के चाणक्य लौह पुरुष सरदार पटेल





आज लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की 138  वीँ जयन्ती है।इस अवसर पर भारत को कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, कच्छ से लेकर कोहिमा तक भारतवर्ष को ५२९ छोटी बड़ी देसी रियासतों से एक महान राष्ट्र का स्वरुप देने वाले भारत माँ के सच्चे सपूत सरदार पटेल का नमन करते हैं। अगर सरदार पटेल को लोह पुरुष के साथ साथ आधुनिक भारत का चाणक्य कहाँ जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जिस प्रकार महान कूटनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य ने एक समय भारत देश पर हुए सिकंदर रुपी विदेशी आक्रमण को न केवल रोका अपितु अनेक खण्डों में बटें देश को चन्द्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में एकछत्र राज्य में परिवर्तित कर दिया था,उसी प्रकार सरदार पटेल ने भारत देश से न केवल अँगरेज़ रुपी विदेशी आक्रमणकारियों को भगाया बल्कि उसे एक सूत्र में पिरो कर विश्व के एक मजबूत राष्ट्र में परिवर्तित किया। जिस प्रकार आचार्य चाणक्य की अर्थ शुचिता प्रसिद्द थी उसी प्रकार सरदार पटेल की अर्थ शुचिता से आज के नेताओं को भी सीख लेने की आवश्यकता हैं। आचार्य चाणक्य से एक बार एक विदेशी मिलने आये। उन्होंने आचार्य चाणक्य का नाम तो बहुत सुना था पर उनसे मिलना पहली बार हुआ था। उन्होंने देखा की आचार्य ने कुछ कार्य करने के बाद एक दीपक को बुझा दिया और दूसरे दीपक को जला दिया। उन्होंने आचार्य चाणक्य से पुछा दीपक बुझाने का कारण पुछा। आचार्य बोले की मैं पहले राजकार्य कर रहा था अब मैं स्वयं का कार्य कर रहा हूँ। पहले वाले दीपक में राज्य द्वारा दिया गया तेल जल रहा था,जबकि अब वाले दीपक में मेरे स्वयं के पैसों से ख़रीदा हुआ तेल जल रहा हैं। वह व्यक्ति चक्रवर्ती सम्राट बनाने वाले आचार्य की अर्थ शुचिता और ईमानदारी से प्रभावित होकर बिना कोई शब्द कहे वह से चला गया उसे उसका उत्तर मिल गया था की आचार्य चाणक्य क्यूँ महान हैं। सरदार पटेल की लड़की का नाम मणिबेन था। एक बार एक पुराने क्रन्तिकारी सरदार पटेल से मिलने गए। तब सरदार पटेल केंद्र में गृह मंत्री थे तो उन्होंने देखा की मणिबेन चरखे पर सूत काट रही थी और उन्होंने जो साड़ी पहनी थी उसमे कई स्थानों पर टांके लगे हुए थे। उन्होंने इसका कारण पूछा। मणिबेन ने कहाँ की जब पिताजी की धोती पुरानी हो जाती हैं अथवा फट जाती हैं तब में उसमे टांके लगाकर उसे साड़ी के रूप में इस्तेमाल कर लेती हूँ। वे क्रांतिकारी मन ही मन आधुनिक भारत देश को चक्रवर्ती राज्य बनाने वाले सरदार पटेल की सादगी और ईमानदारी से प्रभावित होकर धन्य कहकर चले  गए। हमारे प्रधान मंत्री जी सरदार पटेल को कांग्रेसी बता रहे हैं क्या वे बता सकते हैं कि कांग्रेस का कोई एक नेता, सांसद अर्थ शुचिता में सरदार पटेल का अनुसरण करता हो? आज के राजनेताओं को बड़े से बड़े घोटालों को करने की बजाय सरदार पटेल की अर्थ शुचिता से प्रेरणा लेकर देश को लूटने की बजाय उसकी तरक्की करने की प्रेरणा लेनी चाहिए।

डॉ विवेक आर्य

रावण और बाली का वध – कितना सही कितना गलत

bali killing by ram


कुछ अज्ञानी लोग यह कहते देखे जाते हैं की प्रभु राम द्वारा रावण को मारना गलत था क्यूंकि रावण तो अपनी बहन शूर्पनखा का जो अपमान राम और लक्ष्मण ने किया था उसका बदला ले रहा था। रावण तो इस प्रकार से वीर कहलाया जायेगा जिसने अपनी बहन के लिए अपने प्राणों को आहुति दे दी।

सर्वप्रथम तो रावण की बहन का चरित्र संदेह वाला हैं जो वन में किसी अन्जान विवाहित पुरुषों पर डोरे डालती हैं। ऐसा महिला को सभ्य समाज में चरित्रहीन ही कहाँ जायेगा।

राम और लक्ष्मण आर्य राजकुमार थे जिनके लिये आर्य मर्यादा का पालन करना सर्वोपरि था इसलिए उन्होंने जब शूर्पनखा का आग्रह ठुकरा दिया तो शूर्पनखा ने उसे अपना अपमान समझा और प्रसिद्द हिंदी मुहावरा अपमान करने को नाक काटना भी कहते हैं।

यह भी गलत प्रचारित कर दिया गया की शूर्पनखा की शारीरिक हानि लक्ष्मण द्वारा की गयी थी।

शूर्पनखा राक्षसराज रावण की बहन होने के कारण अहंकारी और दंभी दोनों थी। उस किसी की भी न सुनने की आदत नहीं थी।

शूर्पनखा के बहकावे में आकार रावण ने सीता का अपहरण कर वेद विरुद्ध कार्य किया।

एक और रावण द्वारा सीता का अपहरण करना दूसरी और वेदों का विद्वान होने हमें यह सन्देश देता हैं की केवल विद्वान होने से ही सब कुछ नहीं होता। उसके लिए आचरण होना भी अत्यंत आवश्यक हैं इसीलिए श्री राम द्वारा रावण वध यह सन्देश भी देता हैं की केवल शाब्दिक ज्ञान ही सब कुछ नहीं हैं आचरण सर्वोपरि हैं।

हमारे इस कथन का समर्थन स्वयं महाभारत भी इस प्रकार से करती हैं।

चारों वेदों का विद्वान , किन्तु चरित्रहीन ब्राह्मण शुद्र से निकृष्ट होता हैं, अग्निहोत्र करने वाला जितेन्द्रिय ही ब्राह्मण कहलाता हैं- महाभारत वन पर्व 313/111

यही तर्क बाली पर भी लागु होता हैं। बाली सुग्रीव से ज्यादा बलशाली था और किष्किन्धा का राजा था। उसने अपने बल के अहंकार में आकर सुग्रीव को अपने राज्य से निकल दिया और सुग्रीव की पत्नी को अपने महल में बंधक बना लिया।

कहने को बलि वीर था बलशाली था पर अत्याचारी था। उसके अत्याचार को समाप्त करना आर्य व्यवहार था। जो लोग यह कह कर श्री रामचंद्र जी की निंदा करने का प्रयत्न करते हैं की श्री राम जी ने छुप कर बलि को नहीं मरना चाहिए था वे शास्त्रों ने “शठे साच्यं समाचरेत” के सिद्धान्त को भूल जाते हैं जिसका अर्थ हैं “जैसे को तैसा”। बालि ने सुग्रीव पर अत्याचार किया और परनारी को अपने पास जबरदस्ती रखने का पाप कर्म किया उसकी सजा निति निपुण श्री राम जी महाराज ने उसे दी।

कुछ अज्ञानी लोग जानकर श्री राम जी की निंदा करने का प्रयास करते रहते हैं पर उनके मनोरथ कभी भी सिद्ध नहीं होते।

डॉ विवेक आर्य

अहल्या उद्धार का रहस्य

yogini
एक कथा प्रचलित कर दी गयी हैं की त्रेता युग में श्री राम ने जब पत्थर बनी अहिल्या को अपने चरणों से छुआ तब वह पत्थर से मानव बन गई और उसका उद्धार हो गया।

प्रथम तो तर्क शास्त्र से किसी भी प्रकार से यह संभव ही नहीं हैं की मानव शरीर पहले पत्थर बन जाये और फिर चरण छूने से वापिस शरीर रूप में आ जाये।

दूसरा वाल्मीकि रामायण में अहिल्या का वन में गौतम ऋषि के साथ तप करने का वर्णन हैं कहीं भी वाल्मीकि मुनि ने पत्थर वाली कथा का वर्णन नहीं किया हैं। वाल्मीकि रामायण की रचना के बहुत बाद की रचना तुलसीदास रचित रामचरितमानस में इसका वर्णन हैं।

तीसरे दो विषयों पर विरोधाभास हैं एक की क्या अहिल्या इन्द्र द्वारा छली गयी थी अथवा दूसरा अहिल्या चरित्रवान नहीं थी?

इसका हल भी बालकाण्ड सर्ग 51 में गौतम के पुत्र शतानंद अपनी माता को यशस्विनी तथा देवों में आतिथ्य पाने योग्य कहा हैं।

49/19 में लिखा हैं की राम और लक्ष्मण ने अहिल्या के पैर छुए। यही नहीं राम और लक्ष्मण को अहिल्या ने अतिथि रूप में स्वीकार किया और पाद्य तथा अधर्य से उनका स्वागत किया। यदि अहिल्या का चरित्र सदिग्ध होता तो क्या राम और लक्ष्मण उनका आतिथ्य स्वीकार करते।

सत्य क्या हैं ।

विश्वामित्र ऋषि से तपोनिष्ठ अहिल्या का वर्णन सुनकर जब राम और लक्ष्मण ने गौतम मुनि के आश्रम में प्रवेश किया तब उन्होंने अहिल्या को जिस रूप में वर्णन किया हैं उसका वर्णन वाल्मीकि ऋषि ने बाल कांड 49/15-17 में इस प्रकार किया हैं

स तुषार आवृताम् स अभ्राम् पूर्ण चन्द्र प्रभाम् इव |
मध्ये अंभसो दुराधर्षाम् दीप्ताम् सूर्य प्रभाम् इव || ४९-१५

सस् हि गौतम वाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह |
त्रयाणाम् अपि लोकानाम् यावत् रामस्य दर्शनम् |४९-१६

तप से देदियमान रूप वाली, बादलों से मुक्त पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा के समान तथा प्रदीप्त अग्नि शिखा और सूर्य से तेज के समान अहिल्या तपस्या में लीन थी।

सत्य यह हैं की देवी अहिल्या महान तपस्वी थी जिनके तप की महिमा को सुनकर राम और लक्ष्मण उनके दर्शन करने गए थे। विश्वामित्र जैसे ऋषि राम और लक्ष्मण को शिक्षा देने के लिए और शत्रुयों का संहार करने के लिए वन जैसे कठिन प्रदेश में लाये थे।

किसी सामान्य महिला के दर्शन कराने हेतु नहीं लाये थे।

कालांतर में कुछ अज्ञानी लोगो ने ब्राह्मण ग्रंथों में इन्द्र के लिए प्रयुक्त शब्द “अहल्यायैजार” के रहस्य को न समझ कर इन्द्र द्वारा अहिल्या से व्यभिचार की कथा गढ़ ली। प्रथम इन्द्र को जिसे हम देवता कहते हैं व्यभिचारी बना दिया। भला जो व्यभिचारी होता हैं वह देवता कहाँ से हुआ?

द्वितीय अहिल्या को गौतम मुनि से शापित करवा कर उस पत्थर का बना दिया जो असंभव हैं।

तीसरे उस शाप से मुक्ति का साधन श्री राम जी के चरणों से उस शिला को छुना बना दिया।

मध्यकाल को पतन काल भी कहा जाता हैं क्यूंकि उससे पहले नारी जाति को जहाँ सर्वश्रेष्ठ और पूजा के योग्य समझा जाता था वही मध्यकाल में वही ताड़न की अधिकारी और अधम समझी जाने लगी।

इसी विकृत मानसिकता का परिणाम अहिल्या इन्द्र की कथा का विकृत रूप हैं।

सत्य रूप को स्वामी दयानंद ने ऋग्वेदादीभाष्य भूमिका में लिखा हैं की यहाँ इन्द्र सूर्य हैं, अहिल्या रात्रि हैं और गौतम चंद्रमा हैं. चंद्रमा रूपी गौतम रात्रि अहिल्या के साथ मिलकर प्राणियो को सुख पहुचातें हैं. इन्द्र यानि सूर्य के प्रकाश से रात्रि अहिल्या निवृत हो जाती हैं अर्थात गौतम और अहिल्या का सम्बन्ध समाप्त हो जाता हैं.

इन सब तर्कों और प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं की अहिल्या उद्धार की कथा काल्पनिक हैं। अहिल्या न तो व्यभिचारिणी थी न ही उसके साथ किसी ने छल किया था। सत्य यह हैं की वह महान तपस्विनी थी जिनके दर्शनों के लिए , जिनसे ज्ञान प्राप्ति के लिए ऋषि विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण को वन में गए थे।

डॉ विवेक आर्य

क्या विवाह के समय श्री राम चन्द्र जी की आयु 15 वर्ष और सीता जी की आयु 6 वर्ष थी?

ram breakaing dhanush



कुछ काल से श्री राम और सीता की विवाह के समय आयु पर एक शंका उठाई जाती रही हैं की क्या विवाह के समय श्री राम चन्द्र जी की आयु 15 वर्ष और सीता जी की आयु 6 वर्ष थी?

इस शंका को उठाने वालों में मुख्य रूप से वो लोग हैं जो मुहम्मद साहिब और आयशा के विवाह के समय आयशा की आयु जो उस समय केवल मात्र 6 वर्ष थी को सही मानने का प्रयास करते हैं।

हमारा उद्देश्य इस लेख में इस शंका का समाधान करना हैं की वास्तव में क्या विवाह के समय श्री राम चन्द्र जी की आयु 15 वर्ष और सीता जी की आयु 6 वर्ष थी?

प्रथम तो सीता जी की विवाह के समय 6 वर्ष आयु मानने का कारण वाल्मीकि रामायण में दिया गया एक श्लोक हैं जिसे अरण्य कांड 47/4,10 में सीता रावण को अपना परिचय देते हुए कहती हैं की मेरी आयु इस समय 18 वर्ष हैं , मैं 12 वर्ष ससुराल में रहकर, समस्त भोगों का उपभोग करके मैं राम-लक्ष्मण के साथ वन में आई हूँ। अर्थात विवाह के समय सीता जी की आयु केवल 18-12=6 वर्ष ही थी।

इस श्लोक को आधार बनाकर सीता जी की विवाह के समय आयु 6 वर्ष सिद्ध करने को हम रामायण आदि शास्त्रों से परीक्षा करेंगे।

1. जब ऋषि विश्वामित्र श्री राम और श्री लक्ष्मण को लेकर जनक राज के समक्ष पधारे तो उन्हें देखकर राजा जनक ने आश्चर्यचकित हो हाथ जोड़कर विश्वामित्र से पूछा – हे मुनिवर! गज और सिंह के समान चल वाले, देवताओं के समान पराक्रमी तथा अश्विनी कुमारों के समान सुन्दर, यौवन को प्राप्त कुमार कौन हैं।

सन्दर्भ – बालकाण्ड 50/17-19

इसी बालकाण्ड में सर्ग 48 राजा सुमति ने भी राम और लक्ष्मण को देखकर यौवन से भरपूर सुन्दर हथियार धारण किया हुआ कहा हैं।

(यहाँ श्री राम जी और श्री लक्ष्मण जी को कहाँ गया हैं। ऐसी अवस्था सुश्रत के अनुसार 25 वर्ष और की 16 वर्ष की आयु में ही होती हैं)

2. जब विश्वामित्र ने राजकुमारों की धनुष देखने की इच्छा व्यक्त की तो जनक ने सीता के विवाह के सन्दर्भ में धनुष भंग की चर्चा करते हुए कहा-

जब मेरी कन्या सीता वर्द्धमाना‘=प्राप्तयौवना हुई तो बहुत से राजा उसका हाथ माँगने आने लगे। पर सब असफल रहे।

सन्दर्भ – बालकाण्ड 66/15

(यहाँ सीता को यौवन प्राप्त युवती कहा गया हैं)

3. सीता ने अनसूया से कहा- पिता ने जब मेरी पति संयोग सुलभ अवस्था देखी तो उनको बड़ी चिंता हुई। मेरे पिता को वैसी ही चिंता हुई जैसा किसी दरिद्र के धन का नाश होने पर होती हैं।

सन्दर्भ- अयोध्या काण्ड118/34

(किसी भी पिता के मन में अपनी बेटी के विवाह की चिंता जब वह 6 वर्ष की होती हैं तब उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं हैं)

4. अयोध्या पहुँचने पर सबसे मिलने- जुलने के बाद चारों राजकुमार अपनी अपनी पत्नियों को लेकर अपने अपने महल में रमण करने लगे।-अयोध्या काण्ड- 7/52

(6 वर्ष की राजकुमारी महलों में खेलने लायक होती हैं, न की पति के साथ रमण करने लायक!)

5. बालकाण्ड 6/29-31 में सीता की शारीरिक अवस्था को सम्पूर्ण युवती वाला बताया गया हैं।

6. तुलसी कृत रामचरितमानस में भी कहीं पर भी सीता जी की विवाह के समय आयु 6 वर्ष नहीं लिखी हैं।

इन सब से सिद्ध होता हैं की यह श्लोक मिलावटी हैं और

विवाह के समय श्री राम चन्द्र जी की आयु 15 वर्ष और सीता जी की आयु 6 वर्ष नहीं थी?

डॉ विवेक आर्य

Tuesday, October 29, 2013

स्वामी दयानंद और मेक्समुलर के वेद भाष्यों का तुल्नात्मक अध्ययन



  वेद शब्द का वर्णन होते ही आज के नौजवान या तो विदेशी विद्वानों जैसे मेक्समुलर, ग्रिफ्फिथ आदि को वेद आदि धर्म शास्त्रों को उनके योगदान के लिए प्रशंसित करते पाते हैं अथवा वैदिक धर्म के दूषित रूप आधुनिक पौराणिक मत को आँखों के सामने रखकर हमारे बहुत से अंग्रेजी शिक्षित युवक वेद मन्त्रों से घृणा करने लग जाते हैं. इसमें उन युवाओं का कसूर केवल यह हैं की उन्होंने स्वयं वेदों का स्वाध्याय अथवा वेदों के अधिकारी विद्वानों से उनके वास्तविक सत्य का ग्रहण नहीं किया हैं अपितु पश्चिमी विद्वानों ने जो कुछ भी लिख दिया हैं उसका अँधादुंध अनुसरण किया हैं . वेद विषय पर आज प्राय: सभी विश्व विद्यालयों में पश्चिमी विद्वानों के द्वारा किये गए कार्य पर ही शोध होता देखा जाता हैं. कहीं कहीं राजा रमेश चन्द्र दत (RC Dutt) अथवा राजेन्दर लाल मित्र (Rajender Lal Mitra) जैसे भारतीय विद्वानों का वर्णन आता हैं जो पश्चिमी विद्वानों का ही अनुसरण करते हुए दिखाई देते हैं. आधुनिक काल में वेद भाष्य विषय में सबसे क्रांतिकारी कदम स्वामी दयानंद द्वारा प्राचीन ऋषियों द्वारा जिस पद्यति से वेद भाष्य किया जाता था उसी पद्यति का अनुसरण करते हुए नवीन भाष्य संस्कृत और हिंदी में किया गया जिससे सामान्य जन वेद के मूलअर्थ को समझ सके.स्वामी दयानंद द्वारा वेद भाष्य करते हुए न केवल सायण महीधर के भाष्य का अवलोकन किया बल्कि मेक्समुलर आदि के भाष्य का भी अवलोकन किया. स्वामी दयानंद के अनुसार वेदों पर भाष्य करने के लिए सत्य प्रमाण, सुतर्क, वेदों के शब्दों का पूर्वापर प्रकरणों, व्याकरण आदि वेदांगों, शतपथ आदि ब्राह्मणों, पूर्वमीमांसा आदि शास्त्रों और शास्त्रन्तरों का यथावत बोध न हो और परमेश्वर का अनुग्रह, उत्तम विद्वानों की शिक्षा,उनके संग से पक्षपात छोड़ के आत्मा की शुद्धि न हो तथा मह्रिषी लोगों के किये गए व्याख्यानों को न देखें हो तब तक वेदों के अर्थ का यथावत प्रकाश मनुष्य के ह्रदय में नहीं होता. अपने कठिन अनुसन्धान से स्वामी दयानंद ने मेक्स मुलर आदि पश्चिमी विद्वानों के विषय में एक ही वाक्य में की जिन देशों में कुछ भी नहीं उगता वहां अरंडी को भी फसल के रूप में गिना जाता हैं से उनके ज्ञान की उचित परीक्षा कर दी थी.पश्चमी देशों के विद्वान भी उसी प्रकार अविद्वानों के बीच में कम ज्ञान होते हुए भी श्रेष्ठ विद्वान गिने जाने लगे. सबसे बड़ी विडम्बना हमारे यहाँ के विद्वानों को नकार कर पश्चिमी विद्वानों का अँधा अनुसरण करने से न केवल वेद के ज्ञान का उचित प्रकाश होने से रह गया अपितु उसके स्थान पर अनेक भ्रांतियां पहला दी गयी जो पश्चिमी विद्वानों की ही देन थी. उदहारण स्वरुप मेक्स मुलर के अनुसार आर्य लोगों को बहुत काल के पीछे ईश्वर का ज्ञान हुआ था और वेदों के प्राचीन होने का एक भी प्रमाण नहीं मिलता किन्तु इसके नवीन होने के अनेक प्रमाण मिलते हैं.मेक्स मूलर के अनुसार ऋग्वेद के मन्त्रों को केवल भजनों का संग्रह मानते हैं जो की जंगली वैदिक ऋषियों ने अग्नि, वायु, जल, मेघ आदि की स्तुति में बनाये थे और जिन्हें गाकर वे जंगलियों की भांति नाचा भी करते थे.सत्य यह हैं की ईश्वर द्वारा वेद ज्ञान के माध्यम से प्राचीन काल में ही अपना ज्ञान मनुष्य जाति को करवा दिया था. इसी प्रकार एक अन्य भ्रान्ति यह हैं की प्राचीन आर्य लोग अनेक देवताओं और भूतों की पूजा करते थे जबकि सत्य यह हैं की अग्नि,वायु, इन्द्र आदि नामों से उपासना के लिए एक ही परमेश्वर का ही ग्रहण किया गया हैं. मेक्स मुलर आदि पश्चिमी विद्वानों के अंग्रेजी में वेदों पर कार्य करने से विश्वभर के गंवेष्कों का ध्यान वेदों की और आकर्षित तो हुआ पर इससे वेदों का हित होने के स्थान अहित हुआ क्यूंकि इससे वेद में वर्णित सत्य , विज्ञान, ईश्वर का स्वरुप, मानव समाज के कर्तव्य आदि पर परिश्रम करने की बजाय वेदों में कोन-कोन सी व्यर्थ और निरर्थक बाते हैं (जिनका अस्तित्व ही नहीं हैं) इस पर पूरा ध्यान लगा दिया गया.वेदों को सचमुच बालकों की बुलबुलाहट तथा असभ्यों की घुरघुराहट ही समझ लिया गया. आलोचना का बाज़ार गरम हो गया.एक तरफ हमारे देश में वेदों के सम्बन्ध में निरर्थक व मिथ्या प्रचार हो गया, ईसाई समाज की संकीर्णता व पूर्वाग्रह भरी निति सफल होने को थी, आर्यावर्त का दर्शन और ब्रह्मा विद्या के साहित्य लुप्त होने के कगार पर थी ,लाखों भारतीय वेदों पर अश्रद्धा उत्पन्न होने से नास्तिक अथवा ईसाई बन्ने को तत्पर हो उठे थे ईश कृपा से यास्क, पाणिनि, पतंजलि और व्यास जैसे ऋषियों की तपोभूमि पर वेद रुपी भंवर में फँसी हुई नौका को निकलने के लिए एक माँझी ने प्रतिज्ञा कर अपना वेद भाष्य करने का प्रण किया उस माँझी का नाम स्वामी दयानंद था.
आईये मेक्समूलर महाशय द्वारा किये गए ऋग्वेद के भाष्य की तुलना अब हम स्वामी दयानंद द्वारा किये गए भाष्य से करते हैं जिससे पक्षपात रहित होकर सत्य का ग्रहण किया जा सके.
ऋग्वेद मंडल एक सूक्त ६ मंत्र १
मेक्स मूलर- वे जो की उसके चारों ओर खड़े हैं जब की वह करता हैं. प्रकाशमान लाल घोड़े को कसते हैं, आसमान में ज्योति चमकती हैं.
स्वामी दयानंद- जो मनुष्य की उस महान परमेश्वर को , जो की हिंसा रहित, सुख देने वाला, सब जगत को जानने वाला तथा सब चराचर जगत में भरपूर हो रहा हैं, उपासना, योग द्वारा प्राप्त होते हैं. वे उस प्रकाश स्वरुप परमात्मा में ज्ञान से प्रकाशित होकर (आनंद धाम में) प्रकाशित होते हैं.
ऋग्वेद मंडल एक सूक्त ६ मंत्र २
मेक्स मूलर – वे जंगी रथ को जोड़ते हैं. दोनों ओर उसके (इन्द्र के) दोनों मन को भानेवाले घोड़े भूरा व वीर
स्वामी दयानंद – जो विद्वान सूर्य ओर अग्नि के सबके इच्छा करने योग्य अपने अपने वर्ण के प्रकाश करनेहारे वा गमन के हेतु दृद विविध कला ओर जल के चक्र घुमने वाले पंखरूप यंत्रों से युक्त अच्छी प्रकार सवारियों में जुड़े हुए मनुष्य आदि को देश देशांतर में पहुँचाने वाले आकर्षण और वेग तथा शुकल पक्ष और कृष्ण पक्ष रूप दो घोड़े जिनसे सबका हरण किया जाता हैं, इत्यादि श्रेष्ठ गुणों को पृथ्वी, जल और आकाश में जाने- आने के लिए अपने रथों में जोड़े.
ऋग्वेद मंडल एक सूक्त ६ मंत्र ३
मेक्स मूलर – तू जो प्रकाश करता हैं जहाँ पर की प्रकाश न था और रूप और मनुष्यों ! जहाँ की कोई रूप न था. उषाओं के साथ उत्पन्न हुआ हैं.
स्वामी दयानंद – हे मनुष्य लोगों! जो परमात्मा अज्ञानरुपी अंधकार के विनाश के लिए उत्तम ज्ञान तथा निर्धनता, दारिद्र्य तथा कुरूपता- विनाश के लिए सुवर्ण आदि धन और श्रेष्ठ रूप को उत्पन्न करता हैं, उसको तथा सब विद्याओं को जो ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल वरतने वाले हैं उनसे मिल मिल कर जान के प्रसिद्द कीजिये. तथा हे जानने की इच्छा रखने वाले मनुष्य! तू भी उस परमेश्वर के समागम से इस विद्या को अवश्य प्राप्त हो.
ऋग्वेद मंडल एक सूक्त ६ मंत्र ४
मेक्स मूलर- उसके पश्चात उन्होंने (मरुतों के) स्वाभाव के अनुसार स्वयं पुन: नवजात शिशुयों का रूप धारण किया अपना पवित्र नाम लेते हुए.
स्वामी दयानंद- जो जल सूर्य व अग्नि के संयोग से चोर छोटा हो जाता हैं, उसको धारण कर मेघ के आकार का बनके वायु ही उसे फिर फिर वर्षाता हैं, उसी से सबका पालन औए सबको सुख होता हैं.
ऋग्वेद मंडल एक सूक्त ६ मंत्र ५
मेक्स मूलर- तूने हे इन्द्र, शीघ्र चलने वाले मरुतों के, जो की गढ़ को तोड़कर भी निकल जाते हैं, उनके छुपने के स्थान में भी चमकीली गउओं को पाया हैं
स्वामी दयानंद- जैसे बलवान पवन अपने वेग से भारी भारी दृद वृक्षों को तोड़- फोड़ डालते हैं और उनको ऊपर-नीचे गिराते रहते हैं, वैसे ही सूर्य भी अपनी किरणों से उनका छेदन करता रहता हैं, इससे वे ऊपर नीचे गिरते रहते हैं. इसी प्रकार ईश्वर के नियम से सब पदार्थ उत्पत्ति और विनाश को भी प्राप्त होते रहते हैं.
इन ५ मन्त्रों का हिंदी भाष्य यहाँ प्रस्तुत किया गया हैं जिनसे पाठक यह निष्कर्ष आसानी से निकाल सकते हैं की मेक्स मूलर महोदय का भाष्य शुष्क, निरर्थक, शुद्ध अर्थ का बोध न करने वाला हैं अपितु भ्रामक भी हैं.
वेदों का पूर्वाग्रह एवं अज्ञानता के कारण अशुद्ध भाष्य करने के बावजूद भी मेक्स मुलर की आत्मा में वेदों में वर्णित सत्य विद्या का कुछ कुछ प्रकाश अपने जीवन के अंतिम वर्षों में हुआ था जिसका उदहारण उन्ही के द्वारा लिखे गए कुछ प्रसंग हैं-
१. “नहीं, प्रत्युत मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं हैं की उपनिषदों तथा प्राचीन वेदांत दर्शन में प्रकाश की कुछ ऐसे किरणें विद्यमान हैं जो की उन अनेक विषयों पर प्रकाश डालेंगी जो की हमारे ह्रदय के अत्यंत निकट हैं “- सन्दर्भ- Chips from a German Workshop- vol 1 page 55
२. “जिस प्रकार वर्तमान काल का इतिहास अधुरा हैं मध्य युग के इतिहास बिना, मध्यकालीन इतिहास अधुरा हैं बिना रोम के इतिहास के , अथवा रोमे का इतिहास अधुरा हैं बिना यूनान के इतिहास के, इसी प्रकार हम पता करते हैं की इतिहास अधुरा समझा जावेगा बिना आर्य मानवता के उस प्रथम अध्याय (ऋग्वेद) के, जो की हमारे लिए वैदिक साहित्य में सुरक्षित किया गया हैं”- सन्दर्भ- The origin of Religion- page 149
३. भारत के प्राचीन साहित्य की बात कुछ और ही प्रकार हैं…वह साहित्य हमारे लिए मनुष्य जाति की शिक्षा का अध्याय खोल देता हैं जिसका उदहारण हमें कहीं अन्यत्र नहीं मिलता. जो व्यक्ति की अपनी भाषा अर्थात विचारों की उन्नति का सम्मान करता हैं, जो व्यक्ति की धर्म तथा मानवों की सर्वप्रथम वैचारिक अभिव्यक्ति को मान देता हैं, जो व्यक्ति की इन विद्यायों की प्रथम नींव को जानने का प्रथम इच्छुक हैं, जिन्हें की अर्वाचीन काल में ज्योतिष विद्या,चंद, व्याकरण व धातु के नाम से पुकारते हैं, जो व्यक्ति के दार्शनिक विचारों की आरंभिक अभिव्यक्ति को जानना चाहता हैं और साथ ही गृहस्थ, ग्रामीण तथा राजनैतिक जीवन आदि को, धार्मिक रीतियों, पुराण (ब्राह्मण ग्रन्थ) तथा समय के अनुसार चलने के आरंभिक प्रयत्नों को ज्ञात करना चाहता हैं, उसे भविष्य के लिए वैदिक कल के साहित्य पर वही ध्यान केन्द्रित करना चाहिए जो की यूनान, रोम तथा जर्मनी के साहित्य पर किया जाता हैं.सन्दर्भ- India what it can teach us- Max Muller Page 79-80
४. धर्म के सम्बन्ध में भाषा की भांति कहा जा सकता हैं की इसमें प्रत्येक नई बात पुरानी तथा प्रत्येक पुरानी बात नई हैं और की सृष्टि के आदि से कोई भी धर्म सर्वथा नया नहीं निकला- सन्दर्भ- chips from a german workshop-preface page 4
५. आधुनिक युग के लिए केवल एक ही कुंजी हैं अर्थात अतीत काल -सन्दर्भ- chips from a german workshop-page 211
६. संसार का सच्चा इतिहास सदा कुछ व्यक्तियों का ही इतिहास हुआ करता हैं और जिस प्रकार हम हिमालय की ऊंचाई का अनुमान गौरीशंकर पर्वत (everest) से लगाते हैं, उसी प्रकार हमें इंडिया का सच्चा अनुमान वेदवक्ता कवियों, उपनिषदों के ऋषियों, वेदांत व सांख्य दर्शन के रचयिताओं तथा प्राचीन धर्म शास्त्रकारों से लेना चाहिए, न की उन करोरों व्यक्तियों से जो की अपने ग्राम में ही जन्म लेकर मर जाते हैं तथा जो की एक पल के लिए भी अपने ऊँघने से, जीवन के स्वप्न से कभी जागृत ही नहीं हुए- India what it can teach us- Max Muller पेज ७६.
आज संसार में भोग वाद का बोलबाला हो गया हैं , चारों तरफ अशांति,मत मतान्तर के झगडे, आतंकवाद, गरीबी, भूखमरी आदि फैल रहे हैं. इस अशांत मानव जाती को प्रभु के सत्य ज्ञान अर्थात वेद का सहारा मिल जाये तो समस्त मानव जाती का कल्याण हो जायेगा.

डॉ विवेक आर्य