Tuesday, June 16, 2020

वैदिक सन्ध्या व पद्यानुवाद


◼️वैदिक सन्ध्या व पद्यानुवाद◼️
✍🏻 लेखक - पंडित चमूपति एम॰ए॰

◾️गुरु मन्त्र◾️
🔥ओ३म् भूर्भव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो 
देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥

प्रेरक प्रभु प्रेरणा करिए (टेक) 
प्राणपति जग के रखवारे 
जगजीवन (औ) जग से न्यारे 
सुखस्वरूप सब संकट हरिए। 
तेजरुप तव ध्यान धरें हम 
बुद्धि प्रेरिए जीवन भरिए। 

◾️आचमन◾️
🔥ओं शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। 
शंयोरभि स्रवन्तु नः॥ (यजु० ३६/१२) 

विश्व व्यापिनी देवी सुख बरसाना। 
प्रेम प्यास है चहूँ दिश इसे बुझाना॥ 

◾️इन्द्रिय स्पर्श◾️
🔥ओं वाक् वाक्। ओं प्राणः प्राणः। ओं चक्षुश्चक्षुः। 
ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्। ओं नाभिः। ओं हृदयम्। ओं कण्ठः। 
ओं शिरः। ओं बाहुभ्यां यशोबलम्। ओं करतल करपृष्ठे।

वाणी मम यथार्थ वाणी हो।
प्राण-प्राण गुण अभिमानी हो॥ 
आँख-आँख सुभ कान-कान सुभ। 
नाभि शक्ति का हो निधान सुभ॥ 
हृदय हृष्ट हो कण्ठ शुद्ध हो। 
शीर्ष शक्ति सम्पन्न बुद्ध हो॥ 
सबल बाहु शुभ यश फैलायें। 
हाथ चुस्त हो कर्म कमायें॥ 

◾️मार्जन◾️
🔥ओ३म् भूः पुनातु शिरसि। ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः। 
ओं स्वः पुनातु कण्ठे। ओं महः पुनातु हृदये। 
ओं जनः पुनातु नाभ्याम्। ओं तपः पुनातु पादयोः। 
ओं सत्यं पुनातु पुनश्शिरसि। ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र। 

मम चित्त शोधो शोधन हारे। (टेक) 
शीर्ष शुद्ध कर ज्ञान बढ़ाओ॥
नेत्र स्वच्छ कर सुपथ दिखाओ।
मल नाशो मल नाशन हारे॥
कोमल कण्ठ सरस स्वरमय हो।
महा प्रभो मम माहा हृदय हो 
शीश शुद्ध हो सत्य विचारे 
तपोनिधे मम पग-पग प्रेरो 
नाभि स्वच्छ कर शिशु मुख हेरो 
जनक जगज्जन सरजन हारे॥ 
रहे स्वच्छता निज शरीर में 
अंग अंग में चीर चीर में  
घट-घट व्यापो व्यापनहारे॥ 

◾️प्राणायाम◾️
🔥ओ३म् भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। 
ओं तपः। ओं सत्यम्॥ (तैत्ति० प्रपा० १ अनु० २७) 

प्रिय प्रभु तुम हो प्राण हमारे। 
प्यारे-प्यारे न्यारे-न्यारे॥ 
व्यापक सुख हो जगत जनक हो। 
तप: स्वस्वरूप सत्य साधक हो॥ 

◾️अघमर्षन◾️
🔥ओ३म् ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽअध्यजायत। 
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥१॥ 
समुद्रादर्णवादधि संवत्सरोऽअजायत। 
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी॥२॥ 
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वकल्पयत्। 
दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥३॥ 
(ऋग्वेद १०/१९/१-३)

अचरज महिमा प्रभु रचना की। 
चहूँ दिश तपी सदा भव भट्टी॥ 
निशिदिन चलते नियम निरन्तर। 
सखलन होता नही कहीं बाल भर॥
अभी सृष्टि थी अभी प्रलय हैं। 
लो फिर सागर विप्लवमय है॥ 
ऋतु ऋतु की फिर बारी आयो। 
समय शृंखला सारी आयो॥
विश्ववशी ने निजस्वभाव से। 
रचे रैन दिन सहज भाव से॥ 
सूर्य चन्द्र पृथिवी औ तारे। 
अन्तरिक्ष के गोलक सारे॥ 
विधि-विधि फिर अनादि से रचता। 
न्याय नियम से अणु नहीं बचता॥

◾️आचमन (दूसरी बार)◾️
🔥ओं शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। 
शंयोरभि स्रवन्तु नः॥ (यजु० ३६/१२) 

विश्व व्यापिनी देवी सुख बरसाना। 
प्रेम प्यास है चहूँ दिश इसे बुझाना॥ 

◾️गुरु मन्त्र (दूसरी बार)◾️
🔥ओ३म् भूर्भव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो 
देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥

प्रेरक प्रभु प्रेरणा करिए (टेक) 
प्राणपति जग के रखवारे 
जगजीवन (औ) जग से न्यारे 
सुखस्वरूप सब संकट हरिए। 
तेजरुप तव ध्यान धरें हम 
बुद्धि प्रेरिए जीवन भरिए। 

◾️मनसा परिक्रमा◾️
🔥ओ३म् प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः। 
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।
यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥१॥ 
🔥ओ३म् दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः। 
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नर्मो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। 
यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥२॥ 
🔥ओ३म् प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षिताऽन्नमिषवः। 
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। 
यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥३॥ 
🔥ओ३म् उदीची दिक्सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताऽशनिरिषवः। 
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। 
यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भै दध्मः॥४॥ 
🔥ओ३म् ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः। 
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। 
यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भै दध्मः॥५॥ 
🔥ओ३म् ऊर्ध्वा दिग् बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः। 
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। 
यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥६॥ 
(अथर्ववेद ३।२७।१-६) 

आगे आगे अग्रि अग्रणी 
किरण बाण धर तिमिर हरधनी 
सदा मुक्त, प्रभु राज तुम्हारा 
नम्र नमस्ते लहो हमारा 
अहो महेश्वर नमो नमस्ते 
अहो वाणधर नमो नमस्ते 
जो जन हमसे द्वेष कर रहे 
या जिनपर हम दोष धर रहे 
न्याय नेत्र के सब समक्ष हों 
दण्ड जम्भ के दुष्ट भख भक्ष हों॥ 
दाएँ हाथ तुम इन्द्र दयानिधे 
निज वाण धर वक्र वेधते 
सकल विश्व पर राज तुम्हारा 
पृष्ठ भाग में वरुण वरेश्वर 
हिंस्र शत्रु हर अन्न बाण धर 
सकल विश्व प्रभु राज तुम्हारा 
बाए हाथ तुम सोम सुधाकर 
सुखद स्वयं भू अशनि बाण धर 
सकल विश्व प्रभु राज तुम्हारा॥ 
विष्णु तुम हो ध्रुव रखवारे 
बेलें बूटे बाण तुम्हारे 
हरा भरा निज राज तुम्हारा॥
तुम्हीं बृहस्पति छत्र हमारे 
वृष्टि बाण धर रोग संहारे 
विमल विभो सब राज तुम्हारा॥ 

◾️उपस्थान◾️
🔥ओम् उद्वयन्तमस॒स्परि स्वः पश्यन्त ऽउत्तरम्। 
देवं देवत्रा सूर्यमर्गन्म ज्योति॑रुत्तमम्॥१॥ 
(यजुर्वेद ३५/१४) 
🔥ओम् उदु त्यजातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। 
दृशे विश्वाय सूर्य्यम्॥२॥ 
(यजुर्वेद ३३/३१) 
🔥ओम् चित्रं देवानामुदगादीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। 
आप्रा द्यावापृथिवीऽअन्तरिक्षं सूर्यऽआत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥३॥ 
(यजुर्वेद ७/४२) 
🔥ओम् तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं। 
शृणुयाम शरदः शतं प्रव्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥४॥ 
(यजुर्वेद ३६/२४) 

अन्धकार से वृत्ति मोड़कर 
तामस तम का मार्ग छोडकर 
चलो देव के दर्शन करने 
लख छवि सुखस्वरूप जी भरने 
देवराज देवों में उत्तम 
सुगम सुदर्शन अद्भुत अनुपम 
भवन-भवन झण्डे फहराते 
प्रभु छवि कर संकेत दिखाते 
देव विश्ववत् विश्व विकाशी 
कर दर्शन-दर्शन अभिलाषी 
देव संग मङ्गल मना रहे 
मित्र वरुण और अग्रि गा रहे 
सजग ज्योति से ज्योति पा रहे 
विश्वचक्षु शुभ द्युति धारी है। 
आत्मकाम कर सफल भुवन को 
अंतरिक्ष को धरा गगन को 
सकल सृष्टि प्रभु हिय प्यारी है॥ 
चक्षु समान देव हितकारी 
सर्व समक्ष अनादि बिहारी 
दर्शन हो सौ वर्ष तुम्हारा 
जीवन हो कृतकार्य हमारा 
सौ वर्ष तक सुनें सुनावें 
सौ वर्ष तक प्रभु गुण गावें 
रहें स्वतन्त्र न दीन कभी हों 
शुद्ध रक्त यों शत्त रहें हम 
सौ वर्ष से अधिक जियें हम

◾️गुरु मन्त्र (तीसरी बार)◾️
🔥ओ३म् भूर्भव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो 
देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥

प्रेरक प्रभु प्रेरणा करिए (टेक) 
प्राणपति जग के रखवारे 
जगजीवन (औ) जग से न्यारे 
सुखस्वरूप सब संकट हरिए। 
तेजरुप तव ध्यान धरें हम 
बुद्धि प्रेरिए जीवन भरिए। 

◾️समर्पण◾️
🔥ओ३म् नमः शम्भवाय च मयोभवाय च। 
नमः शङ्कराय च मयस्कराय च। 
नमः शिवाय च शिवतराय च॥ (यजुर्वेद १६/४१) 

सुखस्वरूप प्रभो नमो नमस्ते
शांतिरूप प्रभु नमो नमस्ते
नमो नमस्ते मंगलकारी
नमो नमस्ते सुख संचारी
सुखकर अनुपम नमो नमस्ते 
शंकर शिवतम नमो नमस्ते 

॥ ओ३म् ॥
✍🏻 लेखक - पंडित चमूपति एम॰ए॰

प्रस्तुति - 🌺 ‘अवत्सार’
॥ ओ३म् ॥

Monday, June 15, 2020

कुरान और गोवध



कुरान और गोवध

लेखक- आचार्य डॉ० श्रीराम आर्य, कासगंज, उ०प०

[अनेक मुस्लिम विद्वान् गोबध को कुरान सम्मत बताकर गौहत्या जैसे घोर पाप का समर्थन करते हैं तथा हिन्दुओं की गौ के प्रति आस्था पर चोट पहुंचाते हैं। इस्लाम के होनहार विद्वानों ने अपने इस मूर्खतापूर्ण हरकतों के पीछे अल्लाह को कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। इन्होंने अल्लाह को इस प्रश्न से कलंकित कर दिया कि अल्लाह निर्दयी वा करुणा शून्य है। अल्लाह पशुओं का संरक्षक नहीं बल्कि दुश्मन है। यदि वास्तव में कुरान का खुदा पशुओं का रक्षक होता तो वह मनुष्यों को पशुओं की हत्या करने के बजाय उनपर दया और प्रेम करने की शिक्षा देता। साथ ही कुरान में मूसा और इब्राहीम द्वारा गोबध का समर्थन अल्लाह के ईश्वरीय वाणी पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि अल्लाह दयालु न होने के कारण ईश्वर नहीं हो सकता। खण्डन-मण्डन साहित्य के प्रणेता और समीक्षक आचार्य डॉ० श्रीराम आर्य जी की लेखनी से अल्लाह के पैग़म्बरों के काले कारनामे पढ़िए, जो सार्वदेशिक (साप्ताहिक) के अप्रैल १९६६ के अंक में प्रकाशित हुआ था। -प्रियांशु सेठ]

इस्लाम के धर्म ग्रन्थ 'कुरान शरीफ़' का हमने अनेक बार परायण किया है उसमें हमको एक भी ऐसा स्थल नहीं मिला है जिस में गोवध का आदेश दिया गया हो। कुछ स्थल ऐसे तो हैं जिनमें गोवध की घटना का उल्लेख है, पर उनसे इस कर्म की व्यवस्था सिद्ध नहीं होती है। हम वे सभी स्थल नीचे उद्धृत करते हैं-

"फिर तुमने उनके पीछे (पूजने के लिए) बछड़ा बना लिया, और तुम जुल्म कर रहे थे।५१। जब मूसा ने अपनी जाति से कहा कि तुमने बछड़े की पूजा करके अपने ऊपर जुल्म किया तो अपने सृष्टिकर्ता के सामने तौबा करो...।५४। मूसा ने अपनी कौम से कहा कि अल्लाह तुम से फर्माता है कि एक गाय हलाल करो। वह कहने लगे कि क्या तुम हम से हसी करते हो। (मूसा ने) कहा कि खुदा मुझ को अपनी पनाह में रखे कि मैं ऐसा नादान न बनूं।६७। वह बोले अपने परवरदिगार से हमारे लिए दरख़्वास्त करो कि हमें भली भांति समझा दे कि वह कैसी हो। (मूसा ने) कहा कि खुदा फ़र्माता है कि वह गाय न बूढ़ी हो और न बछिया हो, दोनों के बीच की रास, पस तुम को जो हुक्म दिया गया है उस को पूरा करो।६८। ...मूसा ने कहा कि उस का रंग खूब गहरा ज़र्द हो कि देखने वालों को भला लगे।६९। वह न तो कमेरी हो कि जमीन जोतती हो और न खेतों को पानी देती हो, सही सालिम उसमें किसी तरह का दाग (धब्बा) न हो। वह बोले, हां! अब तुम ठीक पता लाये। ग़रज़ उन्होंने गाय हलाल की, और उनसे उम्मीद न थी कि ऐसा करेंगे।७१। (और ऐ याकूब के बेटों) जब तुमने एक शख्स को मार डाला और झगड़ने लगे...।७२। पस हमने कहा कि गाय का कोई टुकड़ा मुर्दे को चढ़ा दो इसी तरह खुदा कयामत में मुर्दों को जिलायगा। वह तुमको अपनी कुदरत का चमत्कार दिखाता है ताकि तुम समझो।७३।" कु० सूरे बक़र पारा १।।
"इब्राहीम ने देर न की और भुना हुआ बछेड़ा ले आया।१९।" कु० सूरे हूद पा० १२।। "इब्राहीम अपने घर को दौड़ा और एक बछेड़ा घी में तला हुआ ले आया।२६। फिर उनके सामने रखा और (महमानों से) पूछा क्या तुम नहीं खाते?" कु० सूरे धारियात पारा २७।।

समीक्षा- ऊपर की आयतों से स्पष्ट है कि अरब में उस युग में गौ की पूजा हुआ करती थी। लोग उस का बड़ा आदर किया करते थे। कुरान शरीफ में गाय या बछड़े की ही पूजा होने का उल्लेख मिलता है, अन्य किसी भी पशु के सत्कार का उसमें उल्लेख नहीं है। यह दूसरी बात है कि मांसाहारी होने से अरब के मूसा व इब्राहीम परिवार के लोग अन्य ऊंट आदि पशुओं के समान गौ व बछड़े को भी मार खा जाते थे। समस्त कुरान में ऊपर की एक घटना के उल्लेख के अतिरिक्त गौ वध की कोई व्यवस्था वा आदेश नहीं मिलता है। गौ वध के लिए मूसा ने गौ भक्त लोगों के हृदय में से गौ पूजा की भावना निकालने के लिए खुदा के नाम पर उन भोले लोगों को बहका कर गौहत्या करा दी थी, यह बात उक्त वर्णन से स्पष्ट है। क्योंकि लोगों ने पहिले मूसा की बात को मजाक समझा था। वे हत्या को तैयार नहीं थे। खुदा को भी कुरान में कहना पड़ा था कि 'अगर्चे' उनसे यह उम्मीद नहीं थी कि वे गौवध कर डालेंगे। कुरान के अनुसार लोग मूसा के झांसे में आ गये थे।

इसके बाद कुरान बताता है कि गाय के गोश्त के स्पर्श से ही मुर्दा जिन्दा हो गया था। इसका अर्थ यह हुआ कि गाय के दूध-रक्त-गोश्त सभी की उपयोगिता कुरान को स्वीकार है। ऐसी दशा में गौ की हत्या करके उसे समाप्त करने की मूर्खता न करके उसके दुग्ध से प्राणियों का कल्याण किया जाये यही सर्वोत्तम बात होगी।
कुरान सूरे अध धारियात के ऊपर के उदाहरणों से केवल इब्राहीम के गौ भक्षक होने का प्रमाण मिलता है। साथ ही इब्राहीम के महमानों से यह पूछने से कि 'क्या तुम (गौ मांस) को नहीं खाते हो' यह प्रगट है कि अरब के उस युग के लोग भारत के आर्यों के समान ही गौ पूजक (गौ भक्त) थे। वे गौवध को पाप मानते थे। इब्राहीम और मूसा ने शरारत करके गौवध की प्रथा अरब में चालू कराकर जनता में से गौ भक्ति की भावना को मिटाने का पाप किया था।

कुरान या किसी भी पुस्तक में किसी अच्छी या बुरी ऐतिहासिक घटना का अथवा कपोलकल्पित वर्णन हो जाने से कोई बात व्यवस्था अथवा सर्वमान्य तथा अनुकरणीय नहीं बन सकती है जब तक कि उस बात के आचरण की स्पष्ट व्यवस्था न हो। अतः सिद्ध है कि गौवध कुरान सम्मत नहीं है।

साई बाबा की पूजा के लाभ



साई बाबा की पूजा के लाभ-

1- यदि आप मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी को अपना आदर्श मानोगे तो अपने भाई से संपत्ति के लिए नहीं लड़ोगे परंतु यदि आप साई बाबा को अपना आदर्श मानोगे तो 10 गज जमीन के लिए भी अपने भाई का कत्ल कर दोगे और आपको कोई शर्म नहीं आएगी। क्योकि रामायण आपको सदाचार सिखाती है परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

2- यदि आप रामायण पढ़ोगे तो आप भी हनुमान जी की तरह मुश्किल मे पड़े हुए सदाचारी व्यक्ति की मदद करोगे भले ही आपका उसमे कोई स्वार्थ न हो। परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

3- यदि आप गीता पढ़ोगे तो आपको कर्मयोगी होने की प्रेरणा मिलेगी परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

4- यदि आप उपनिषद पढ़ोगे तो आपको आत्मा व परमात्मा का ज्ञान मिलेगा परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

5- यदि आप चाणक्य को पढ़ोगे तो आपमे देशभक्ति व समाज के बारे मे समझ आएगी परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

6- यदि आप विदुर नीति पढ़ोगे तो आपको पता चलेगा कि सत्य कहने मे महात्मा विदुर जी ने एक राजा का भी लिहाज नहीं किया परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

7- यदि आप क्रांतिकारी संत कबीर जी को पढ़ोगे तो आप भी निर्भय होकर हिन्दू व मुसलमान सब के अंधविश्वास व पाप के विरुद्ध बोलोगे परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

8- यदि आप गुरु नानक देव जी के उपदेश पर चलेगे तो आप मे भी पाखंड के विरुद्ध लड़ने की सीख मिलेगी परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

9- यदि आप महान संत रविदास जी के आदर्शो को अपनाएगे तो आपको भी सीख मिलेगी कि मुस्लिम शासक के राज मे भी इस्लाम कि सच्चाई सबके सामने रखो परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

10- यदि आप गुरु गोविंद सिंह जी को आदर्श मानोगे तो धर्म पर सब कुछ बलिदान की प्रेरणा मिलेगी परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

11- यदि आप बेजोड़ धनुर्धारी श्री बंदा  बैरागी जी से प्रेरणा लोगे तो आप कम साधनो से भी लक्ष्य प्राप्ति कि ओर बढ़ोगे क्योकि विशेष आदरणीय श्री बांदा बैरागी जी धनुष बाण से मुल्लोंके तोपचियों को मार कर युद्ध का परिणाम ही बदल देते थे परंतु साई बाबा की कब्र तो कुछ सिखाती ही नहीं।

दादू दुनिया बावरी कबरे पूजे उत।
जिनको कीड़े खा चुके उनसे मांगे पुत्त ।
इसलिए साई कब्र पूजा की मूर्खता छोड़िए । 
सनातन धर्म का पालन कीजिए। जय श्री राम

Saturday, June 13, 2020

वैदिक धर्म अतुलनीय



वैदिक धर्म अतुलनीय

-स्व० चौधरी चरण सिंह (भू० पूर्व प्रधानमन्त्री, भारत सरकार)

मैं जहां राजनीतिक क्षेत्र में महात्मा गांधी को अपना गुरु या प्रेरक मानता हूं, वहां धार्मिक व सामाजिक क्षेत्र में मुझे सबसे अधिक प्रेरणा महर्षि दयानन्द सरस्वती ने दी। इन दोनों विभूतियों से प्रेरणा प्राप्त कर मैंने धार्मिक व राजनीतिक क्षेत्र में पदार्पण किया था। एक ओर आर्य समाज के मंच से हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध मैं सक्रिय रहा, वहीं कांग्रेसी कार्यकर्ता के रूप में भारत की स्वाधीनता के यज्ञ में मैंने यथाशक्ति आहुतियां डालने का प्रयास किया।

मंगलाचरण स्वदेशी, स्वभाषा व स्वधर्म का गौरव

छात्र जीवन में, लगभग १९-२० वर्ष की आयु में स्वामी सत्यानन्द लिखित महर्षि दयानन्द सरस्वती की जीवनी पढ़ी। मुझे लगा कि बहुत समय बाद भारत में सम्पूर्ण मानव गुणों से युक्त एक तेजस्वी विभूति महर्षि के रूप में प्रकट हुई है। उनके जीवन की एक-एक घटना ने मुझे प्रभावित किया, प्रेरणा दी। स्वधर्म (वैदिक धर्म), स्वभाषा, स्वराष्ट्र, सादगी, सभी भावनाओं से ओत-प्रोत था महर्षि का जीवन। राष्ट्रीयता की भावनाएं तो जैसे उनकी रग-रग में ही समायी हुई थी। इन सब गुणों के साथ तेजस्विता उनके जीवन का विशेष गुण था। इसीलिए आर्य समाज के नियमों में सत्य के ग्रहण करने एवं असत्य को तत्काल त्याग देने को उन्होंने प्राथमिकता दी थी।
महर्षि दयानन्द की एक विशेषता यह थी कि वे किसी के कन्धे पर चढ़कर आगे नहीं बढ़े थे। अंग्रेजी का एक शब्द भी न जानने के बावजूद हीन-भावना ने आजकल के नेताओं की तरह, उन्हें ग्रसित नहीं किया। अपनी हिन्दी भाषा, सरल व आम जनता की भाषा में उन्होंने 'सत्यार्थप्रकाश' जैसा महान् ग्रन्थ लिखा। इस महान् ग्रन्थ में उन्होंने सबसे पहले अपने हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों पर कड़े से कड़ा प्रहार किया। बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, महिलाओं की शिक्षा की उपेक्षा, अस्पृश्यता, धर्म के नाम पर पनपे पाखण्ड आदि पर जितने जोरदार ढंग से प्रहार स्वामी जी ने किया, उतना अन्य किसी धार्मिक नेता या आचार्य ने नहीं किया। अपने समाज में व्याप्त गली-सड़ी कुरीतियों पर प्रहार करने के बावजूद स्वामी जी ने राजा राममोहनराय आदि पश्चिम से प्रभावित नेताओं की तरह, वैदिक-धर्म को उन दोषों के लिए दोषी नहीं ठहराया, वरन् स्पष्ट किया कि वैदिक, हिन्दू धर्म सभी प्रकार की बुराइयों व कुरीतियों से ऊपर है, वैदिक धर्म वैज्ञानिक व दोष-मुक्त धर्म है, तथा उसकी तुलना अन्य कोई नहीं कर सकता।

स्वामी जी ने अपने वैदिक धर्म के पुरुरुद्धार के उद्देश्य से आर्य-समाज की स्थापना की। उन्होंने नाम भी आकर्षक व प्रेरक चुना। 'आर्य' अर्थात् श्रेष्ठ समाज इसमें न किसी जाति की संकीर्णता है, न किसी समुदाय की। जो भी आर्य-समाज के व्यापक व मानवमात्र के लिए हितकारी नियमों में विश्वास रखें वहीं आर्यसमाजी 'आर्य-समाज' नाम से दूरदर्शी, व्यापक व संकीर्णता से सर्वथा मुक्त दृष्टि का ही आभास होता है।
स्वामी जी ने स्वदेशी व स्वभाषा पर अभिमान करने की भी देशवासियों को प्रेरणा दी। अंग्रेजी को वे विदेशी अपनी भाषा तथा अपनी वेश-भूषा अपनाने पर बल देते थे। जिन परिवारों में वे ठहरते थे, उनके बच्चों की वेशभूषा पर ध्यान देते थे तथा प्रेरणा भी देते थे कि हमें विदेशों की नकल छोड़कर अपने देश के बने कपड़े पहनने चाहिए, अपना काम-काज 'संस्कृत व हिंदी' में करना चाहिए। गाय को स्वामी जी भारतीय कृषि व्यवस्था का प्रमुख आधार मानते थे। इसीलिए उन्होंने 'गोकरुणानिधि' लिखी तथा गोरक्षा के लिए हस्ताक्षर कराये। वे ग्रामों के उत्थान, किसानों की शिक्षा की ओर ध्यान देना बहुत जरूरी मानते थे।

जाति प्रथा के विरुद्ध चेतावनी

स्वामी जी दूरदर्शी थे। उन्होंने इतिहास का गहन अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला था कि जब तक हिन्दू समाज जन्मना जाति प्रथा की कुरीति में ग्रस्त रहेगा, वह बराबर पिछड़ता जायेगा। इसीलिए उन्होंने 'सत्यार्थप्रकाश' में तथा अपने प्रवचनों में जाति-प्रथा व अस्पृश्यता पर कड़े से कड़ा प्रहार किया। वे दूरदर्शी थे अतः उन्होंने पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि यदि हिन्दू समाज ने जाति-प्रथा व अस्पृश्यता के कारण अपने भाईयों से घृणा नहीं छोड़ी, तो समाज तेजी से बिखरता चला जायेगा जिसका लाभ विधर्मी स्वतः उठायेंगे। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि अस्पृश्यता का कलंक हिन्दू धर्म के साथ-साथ देश के लिए भी घातक होगा।
महर्षि की प्रेरणा पर आर्य समाज के नेताओं लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द आदि ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान चलाया। आर्य समाज ने जन्मना जाति-प्रथा की हानियों से लोगों को समझाने का प्रयास किया। किन्तु आज तो जाति-पाति की भावनाएं धर्म के नाम पर नहीं, 'राजनीतिक मठाधीशों' द्वारा राजनीतिक लाभ की दृष्टि से अपनायी जा रही हैं। आज तो आर्य समाज को इस दिशा में और भी तेजी से सक्रिय होने की जरूरत है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों अथवा आर्य समाज के दस नियमों का पूरी तरह पालन तो बहुत ही निर्भीक, संयमी व तेजस्वी व्यक्ति कर सकता है, परन्तु इस दिशा में मैंने यथासम्भव कुछ-कुछ पालन करने का प्रयास अवश्य किया है।
मैंने सात वर्षों तक निरन्तर गाजियाबाद में वकालत करते समय एक हरिजन को रसोईया रखकर व्यक्तिगत जीवन में जातिगत भावना को जड़-मूल से मिटाने का प्रयास किया। इसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री के रूप में प्रदेश की शिक्षा-संस्थाओं के साथ लगने वाले ब्राह्मण, जाट, अग्रवाल, कायस्था आदि जातिवाचक नामों को हटाने का दृढ़ता के साथ कानून बनवाया। मेरे अनेक साथियों ने उस समय कहा कि इससे बहुत लोग नाराज हो जायेंगे। मैंने स्पष्ट उत्तर दिया कि 'नाराज हो जायें, मैं शिक्षा क्षेत्र में जातिगत संकीर्णता कदापि सहन नहीं कर सकता।' जिस दिन मेरे क्षेत्र बड़ौत के 'जाट इण्टर कॉलेज' का नाम बदलकर जाट की जगह 'वैदिक' शब्द जुड़ा, उस दिन मुझे सन्तोष हुआ कि चलो महर्षि के आदेश के पालन करने में मैं कुछ योगदान कर सका। इसी प्रकार अपनी पुत्री तथा धेवती का अन्तर्जातीय विवाह कर मुझे आत्म-सन्तोष तो हुआ ही।

मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि भारत में महर्षि दयानन्द तथा गाँधी के आदर्शों पर चलकर ही सच्चा गौरव प्राप्त किया जा सकता है। दोनों महापुरुष भारत को प्राचीन ऋषियों के समय की सादगी, सच्चाई, न्याय व नैतिकता के गुणों से युक्त भारत बनाने के आकांक्षी थे, 'महर्षि' व 'महात्मा' दोनों ने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्राचीन संस्कृति व धर्म को जीवन में महत्त्व दिया। धर्म के नाम पर किसी भी तरह घुस आयी कुरीतियों पर प्रहार किया। उनका स्पष्ट मत था कि हम विदेशियों का अन्धानुकरण करके भारत का उत्थान कदापि नहीं कर सकते। आज हमें उनसे दिशा ग्रहण कर इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बढ़ना चाहिए।

दीपावली ज्योति पर्व है। इस दिन हम अन्धकार अर्थात् अस्पृश्यता, अनैतिकता, भ्रष्टाचार आदि से ऊपर उठकर प्रकाश के मार्ग पर चलने की प्रेरणा ले सकते हैं। ईमानदारी तथा नैतिकता को अपनाये बिना हम संसार में सम्मान कदापि प्राप्त नहीं कर सकते।

[स्त्रोत- आत्म-शुद्धि-पथ मासिक का मार्च २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Wednesday, June 3, 2020

हैदराबाद संग्राम काल में आर्य समाज ने उभारा था प्रखर आन्दोलन


हैदराबाद संग्राम काल में आर्य समाज ने उभारा था प्रखर आंदोलन

-स्व० वसंत ब० पोतदार

महर्षि दयानंद सरस्वती ने 1875 में आर्य समाज की स्थापना की। उनकी मातृभाषा गुजराती थी, पर उन्होंने हिंदी भाषा का बहुत अध्ययन किया और आर्य समाज का भारत भर में विस्तार किया। हिंदू समाज की दुर्बलताओं को देखकर महर्षि दयानंद सरस्वती बहुत परेशान रहते थे। हिंदुओं की दीनहीन अवस्था देखकर वे बेचैन हो उठते थे। उन्होंने इस श्रद्धा के साथ अपना
काम शुरू किया कि सत्य का प्रभावी प्रकाश देने वाले वैदिक दर्शन के कार्यान्वयन के बिना देश जीवित नहीं रह सकता है। आर्य समाज के कई अनुयायियों और कार्यकर्ताओं को तैयार किया। वैदिक धर्म के प्रचार के लिए, हिंदुओं के मृतप्राय मन को पुनर्जीवित करने के लिए, पूरे भारत में बुद्धिमान, विचारशील और प्रभावी वक्ताओं का एक बहुत बड़ा समूह तैयार किया जो जो सब कुछ बलिदान करने और असीमित कष्ट झेलने के लिए तैयार था। आगे चलकर, इन्हीं तेजस्वी अनुयायियों ने गुरुकुल की स्थापना की। इस संस्था के स्कूलों से, एक आदर्श युवा पीढ़ी का गठन किया गया था। गुरुकुल में शिक्षित एक छात्र पाँच से दस हजार लोगों में अलग और तेजस्वी नजर आता था। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि वे अपने मजबूत गठीला शरीर, तेजस्वी चेहरा, वाणी में तेज और सामर्थ्य, और देश और वैदिक धर्म के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव के साथ वे समाज को आसानी से प्रभावित कर पाते थे। गुरुकुल शिक्षा में असामान्य ओजस्वी वक्तृत्व को प्राप्त करना एक बहुत बड़ी विशेषता थी।

आर्य समाज के प्रचार के लिए, गुरुकुल में ज्ञान प्राप्त करने के बाद बाहर निकलने वाले वक्ता अपनी तेजस्वी वाणी से हजारों लोगों को मंत्रमुग्ध करने लगे। इसी कारण से, वैदिक धर्म पूरे भारत में तेजी से फैलने लगा। हैदराबाद राज्य में सन् 1920 में आर्य समाज की स्थापना हुई। अगले दो-तीन सालों में ही व्यवस्थित ढंग से काम करने वाली लगभग दो सौ शाखाएँ खुल गईं। निज़ामी राज्य में हैदराबाद के बै० विनायकराव कोरटकर आर्य समाज के अध्यक्ष थे। बंसीलालजी मुख्यमंत्री थे। उन्होंने उदगीर में अपना मुख्य कार्यालय खोला। उन्होंने “वैदिक संदेश” नामक वृत्तपत्र सोलापुर से प्रकाशित करना शुरू किया। “वैदिक संदेश” को निज़ाम स्टेट में सभी दूर पहुँचाने की व्यवस्था की। यह अत्यंत अनुशासनप्रिय और ध्येयवादी संगठन था। मातृभूमि के प्रति निश्चल प्रेम और अपने धर्म पर प्रगाढ़ निष्ठा, इन दो मानबिंदुओं के लिए हर आर्य समाजी अपनी जान की भी बाजी लगाने को तैयार रहता था। हैदराबाद राज्य के बहुसंख्यक समाज का कोई रखवाला नहीं था। उलटे हिंदुओं को समाप्त करने के लिए खाकसार पार्टी, निज़ाम सेना, इत्तेहादुल संगठन, दीनदार सिद्दीक़ के धर्मप्रचारक अनुयायी, सबने कोहराम मचा रखा था। सब समझ चुके थे कि इन सबका प्रतिकार करने वाला, हिंदुओ का एकमात्र संगठन आर्य समाज ही है। उत्तर भारत से सैंकड़ों आर्य समाजी कार्यकर्ता अपनी जान की परवाह किये बिना, निजाम राज्य में चले आये। विशेषकर मराठवाड़ा में कई आर्य समाजी नेता और कार्यकर्ता निजाम के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार हो गए।

2/9/1929 को “दीनदार सिद्दीक़ पार्टी” नामक इस्लाम धर्म प्रसारक संस्था की स्थापना हैदराबाद राज्य में हुई। दीनदार सिद्दीक़ स्वयं को चन्न बसवेश्वर का अवतार बताते थे, और कहते थे कि भगवान् बसवेश्वर के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए ही इस्लाम धर्म है। इस प्रकार गुमराह करके दीनदार सिद्दीक़ और उनके अनुयायियों ने हिंदुओं को इस्लाम धर्म में परिवर्तित करना शुरू किया। अपने प्रचार-प्रसार में वे राम और कृष्ण जैसे हिंदुओं के भगवानों का अपमान करते और इस्लाम को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म बताते। 1929 में आर्य समाजी आंदोलन में भी तेज़ी आयी। 1930 में हैदराबाद राज्य के प्रत्येक जिले में आर्य समाज का संगठन खड़ा होने लगा। उद्गीर के भाई बंसीलाल और श्यामलाल, इन दोनों बंधुओं ने राज्य में भरपूर कार्य किया। हिंदु समाज में फैली कमजोरी और हीनभावना को नष्ट कर, उसे पूरे स्वाभिमान और गर्व से जीना आर्य समाज के कार्यकर्ताओं, बै० विनायकरावजी विद्यालंकार, पं० नरेंद्र जी आर्य आदि ने सिखाया। अपने राज्य में आर्य समाज के बढ़ते प्रभाव को देख कर निजाम की वक्रदृष्टि आर्य समाज पर पड़ी। 1935 में निलंगा में सरकार ने अपने गुंडों के माध्यम से एक हवनकुंड और एक आर्य समाज मंदिर ध्वस्त कर दिया। किसी के हाथ में “सत्यार्थ प्रकाश” पुस्तक देखते ही निजामी पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती। निलंगा की घटना से शेषरावजी वाघमारे (पिताजी – आनंद मुनिजी) और उनके सहयोगी कार्यकर्ताओं के क्रोध की सीमा न रही। शेषरावजी निर्भीक, साहसी, संगठन-कुशल और बुद्धिमान नेता थे। उन्होंने इस अत्याचार का बदला लेने के लिए हजारों लोगों को गाँव-गाँव में, शस्त्रों से सुसज्जित आर्य समाज
का संगठन स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। भाई बंसीलाल जी, श्याम लाल जी, शेषराव जी, दत्तात्रेय प्रसाद, गोपाल देव शास्त्री आदि आर्य समाजी कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव घूम कर हिंदुओं को वैदिक धर्म के ध्वज तले हथियारों समेत एकत्रित किया। अनगिनत गांवों में आर्य समाज मंदिर स्थापित हुए। इत्तेहादुल पार्टी या रजाकार की ओर से आक्रमण होने का कोई भी अंदेशा होता, तो आर्य समाज मंदिर की घंटियां बजने लगती। घंटियों की आवाज सुन घर-घर से पुरुष और 18-20 साल के लड़के लाठियां, कुल्हाड़ी, भाले, बरछियाँ, तलवारें, बंदूके आदि लेकर आर्य समाज मंदिर की ओर दौड़ पड़ते। 5-10 मिनट में ही सभी, पूरे अनुशासित तरीके से मुकाबले के लिए तैयार हो जाते। खाकसार पार्टी, दीनदार सिद्दीक़ पार्टी, इत्तेहादुल संगठन और रज़ाकार के पीछे सरकार थी। इसलिए वे सभी हिंदुओं के खिलाफ बेरोकटोक हिंसा कर रहे थे। हिंदू व्यक्ति यदि किसी रोहिले या पठान को गलती से भी कुछ कह दे तो वे तुरंत पिस्तौल निकाल लेते और जान से मार डालने की धमकी देते।

हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण का काम पूरे ज़ोरों से चल रहा था। इस काम को सरकार का पूरा प्रोत्साहन और सहायता थी। सरकार की ओर से इसी काम के लिए तीन सौ से ज्यादा मौलवी वेतन पर रखे गए थे। इस मुहीम को “तबलीत” या “तंज़ीम” कहा जाता था। निजाम ने वेतनभोगी मौलवियों को नियुक्त किया था और हिंदू-मुसलमानों में शांति बनाये रखने के लिए “अमन कमिटियाँ” बनाई थी। ये मौलवी उन कमिटियों में काम करते थे। ये अमन कमिटियाँ सिर्फ दिखावे के लिए थी। ये वेतनभोगी मौलवी अस्पृश्यों की बस्तियों में घूम-घूम कर उन्हें हिंदुओं के खिलाफ बगावत करने के लिए भड़काते थे। ये मौलवी मुस्लिम गुंडों को भी भड़काते। ये गुंडे खुराफात कर के दंगे भड़काते और सरकारी नौकर उनको बचाते। उदाहरण के लिए, तालुका कलंब में अंदुर गाँव में एक खटीक, गाय को काटकर उसका माँस बेचने के लिए बाजार में सड़क पर ही बैठ गया। हिंदुओं ने इस पर आपत्ति ली। उससे कहा – “चाहो तो अपने घर में तुम गोमाँस बेचो, लेकिन यहाँ बीच सड़क पर मत बैठो।” पुलिस हवलदार ने ही फौजदार से उसकी तकरार की। लेकिन फौजदार साहब ने तो हद ही कर दी!! वे खुद उस गाँव में पहुँचे और उस खटीक को सड़क से उठाकर हनुमान मंदिर की चौपाल पर बैठा दिया। हिंदू और क्रोधित हो गए और दंगा भड़कने के आसार नज़र आने लगे। तब फौजदार साहब ने उसे चौपाल से उठाकर मंदिर के सामने बैठा दिया। ऐसे थे वहाँ के सरकारी अधिकारी!!

ऐसी घटनाओं से आर्य समाज के लोग और संगठित होते गए। साथ ही इत्तेहादुल पार्टी और मुस्लिम गुंडे और भी भड़क उठे। 1938 में गुंजोटी में वेदप्रकाश का खून हो गया। वेदप्रकाश की हत्या का समाचार पाते ही भाई बंसीलाल और वीरभद्र जी आर्य तुरंत गुंजोटी पहुँचे। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वेदप्रकाश का खून हैदराबाद मुक्ति संग्राम का पहला बलिदान था। उसके बाद भाई श्यामलाल जी को ख़राब खाना और पानी देकर प्रताड़ित किया गया। बीमार होने के बाद भी दवाखाने में नहीं ले जाया गया। अंततः जेल में ही उन्हें जहर देकर मार दिया गया। हैदराबाद राज्य में 1938-39, इन दो सालों में शहर में हजारों की संख्या में आर्य समाजी लोगों ने सत्याग्रह किया। सोलापुर में माधवराव अणे की अध्यक्षता में एक परिषद् आयोजित की गई ताकी इस सत्याग्रह को हिंदुस्तान की जनता का भी समर्थन मिल सके। इस परिषद् में “हैदराबाद विरोध दिवस” मनाने का प्रस्ताव पारित किया गया। सारे हिंदुस्थान भर में “हैदराबाद विरोध दिवस” का माहौल बनने लगा। भारत भर से कई आर्य समाजी सत्याग्रह में भाग लेने के लिए हैदराबाद स्टेट पहुँचने लगे। सोलापुर, राजस्थान, दिल्ली, नागपुर, उत्तर प्रदेश, रावलपिंडी से हजारों कार्यकर्ता हैदराबाद में दाखिल हुए। अनगिनत सत्याग्रहियों को जेलों में ठूंस दिया गया। कईयों को पीटा गया। ख़राब खाना और पानी देने के कारण कई सत्याग्रही बीमार पड़ गए। उसमें भी हद तो तब हो गई, जब इत्तेहादुल संगठन के गुंडे जेलों में घुस कर पुलिस के सामने, सत्याग्रहियों को बेरहमी से मारने-पीटने लगे। इस अत्याचार में एक कार्यकर्ता सदाशिव विश्वनाथ पाठक की 12-08-1939 को हैदराबाद जेल में मृत्यु हो गई। राजस्थान के स्वामी ब्रह्मानंद जी का भी चंचलगुडा जेल में निधन हो गया। दिल्ली के शांति प्रकाश जी की भी हैदराबाद जेल में 27-07-1939 को मृत्यु हो गई। नागपुर के पुरुषोत्तम प्रभाकर की 16-12-1938 को हैदराबाद जेल में, उत्तर प्रदेश के माखन सिंह की 01-07-1939 को हैदराबाद जेल में, रावलपिंडी के पंडित परमानंद जी की 05-04-1939 को हैदराबाद जेल में, उत्तर प्रदेश के स्वामी कल्याणानंद जी की 08-07-1939 को गुलबर्गा जेल में, बैंगलोर के स्वामी सत्यानंद जी को चंचलगुडा जेल में, विष्णु भगवंत अंदुरकर की 02-05-1939 को चंचलगुडा जेल में, व्यंकटराव कंधारकर की 09-04-1939 को निजामाबाद जेल में मृत्यु हुई। कुल 23 लोगों ने इस आंदोलन के दौरान जेल में अपने प्राणों की आहुति दी। उमरी, जिला नांदेड में गणपतराव, गंगाराम और दत्तात्रेय इन तीन आर्य समाजी प्रचारकों को पठानों ने पत्थरों से पीट-पीट कर मार डाला।
1942 में उद्गीर में बै० विनायकराव जी विद्यालंकार की अध्यक्षता में एक परिषद् हुई। इस परिषद् में निजामी पुलिस, रज़ाकारों और अमानवीय अत्याचार करने वाले सभी घटकों को चेतावनी दी गई। तब पुलिस और मुस्लिम संगठनों की ओर से हिंदुओं के घरों और दुकानों पर ज़ोरदार हमले किये गए। हुमनाबाद में एक जुलुस पर पुलिस ने गोलियाँ चलाई जिससे 5 लोग मारे गए। 1943 में निज़ामाबाद में फिर एक बार आर्य समाज की परिषद हुई। आर्य समाज के लिए काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की देश, धर्म और ध्येय पर निष्ठा और व्यवहार पूरी तरह से अनुशासनपूर्ण था। इस परिषद् में पच्चीस हज़ार सैनिकों का एक दल स्थापित करने का निर्णय हुआ। साथ ही, यह भी निर्णय हुआ कि कई स्थानों पर पाठशालाएँ खोलकर देश से प्रेम करने वाले, निष्ठावान, ऊर्जावान और अनुशासनपूर्ण युवाओं का निर्माण किया जाये। निज़ाम सरकार ने आर्य समाज की दीक्षा ले चुके सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों को निकाल देने का फरमान जारी किया। इतना ही नहीं, यहां तक कि अगर कोई सरकारी कर्मचारी किसी आर्य समाजी से बात करता हुआ दिख जाए, तब भी उसे नौकरी से निकाल देने के आदेश जारी कर दिए गए थे। कुल मिलाकर निजाम सरकार का आर्य समाज के लोगों के बारे में अत्यंत सख्त रवैया हो चुका था। लातूर के एक नवविवाहित जोड़े को बार-बार पुलिस थाने में बुलाया जाता था। यह युगल पूरी तरह से त्रस्त हो चुका था। पुलिस की परेशानी से मुक्ति के लिए कोई उनकी मदद करने की स्थिति में नहीं था। ऐसे में किसी ने उन्हें “आर्य समाजी” हो जाने की सलाह दी। वे आर्य समाजी बन गए। आश्चर्य की बात यह कि, सचमुच ही उस दिन के बाद से किसी भी पुलिस वाले ने उन्हें कभी परेशान नहीं किया। उन्हें बुलाने कोई पुलिस का जवान उसके बाद कभी नहीं आया। 1924 में उस्मानाबाद जिले में आर्य समाज की स्थापना की गई। केशवराव कोरटकर,
अघोरनाथ चट्टोपाध्याय, श्रीपादराव सातवलेकर आदि के नेतृत्व में उस्मानाबाद जिले में कई स्थानों पर आर्य समाज का संगठन खड़ा होने लगा। कई स्थानों पर आर्य समाज मंदिर खोले गए। बापूराव मास्टर, रामभाऊ मैंदरकर, तुलजाराम सुरवसे ने मिलकर उस्मानाबाद जिले में आर्य समाज के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक कामों में अच्छी तेजी लायी। इनके साथ सन्मित्र समाज के दत्तोपंत जिंतूरकर, बलभीमराव हिंगे, ज्ञानराव सालुंके, डांगे, देवीदास मुरूमकर, पुरुषोत्तमराव माशालकर आदि कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्रता संग्राम की तैयारी की दृष्टि से एक व्यायामशाला प्रारंभ कर बल की उपासना की शुरु की। महाराष्ट्र समाज के कार्यकर्ता द०या० गणेश, न०प० मालखरे, शंकर नायगांवकर, चंदूलाल गांधी, सुपेकर, जिंतुरकर, आदियों ने गांव-गांव जाकर जनजागृति का कार्य किया और स्वयं सत्याग्रह में भाग लिया। उन्हें सजा भी हुई। इसी दौरान सोलापुर में दयानंद कॉलेज की स्थापना हुई। मराठवाड़ा के लोगों के
लिए सोलापुर, हैदराबाद की तुलना में शिक्षा और आर्थिक दृष्टि से ज्यादा सुलभ था। इसलिए दयानंद कॉलेज में छात्रों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। अंग्रेजों और निजामशाही के खिलाफ शुरू किए गए स्वतंत्रता संग्राम के लिए युवकों को प्रेरणा देने का कार्य इसी कॉलेज ने किया। यह बात एक खुल्ला सत्य है। कॉलेज के विद्यार्थी आर्य समाज के विचारों से प्रभावित होकर निजाम के विरुद्ध सत्याग्रह और वंदे मातरम सत्याग्रह में पूरे जोर-शोर से भाग लेने लगे। दयानंद कॉलेज में मराठवाड़ा से आए हुए विद्यार्थियों ने हैदराबाद स्टूडेंट यूनियन की स्थापना की। इस यूनियन के तत्वावधान में कॉलेज प्रांगण में विनायकराव जी विद्यालंकार, पंडित नरेंद्र जी, भाई बंसीलाल जी जैसे आर्य समाज के नेताओं के भाषण होने लगे। गांधी जी के कहने पर “कॉलेज छोड़ो आंदोलन” को उग्र रूप प्राप्त हुआ और विद्यार्थी तेज़ी से कॉलेज छोड़कर जाने लगे। उस्मानाबाद जिले की सीमा पर लगे हर शिविर में दयानंद कॉलेज के विद्यार्थी हर काम में आगे थे। “पहले स्वराज फिर शिक्षा” के अपने ध्येय को हैदराबाद राज्य में फैलाने और हैदराबाद शहर तक पहुंचाने के लिए, दयानंद कॉलेज के विद्यार्थी पहुंचे। कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य श्रीराम शर्मा जी, जो एक विख्यात इतिहासकार थे, ने विद्यार्थियों को देशप्रेम और धर्मप्रेम की शिक्षा तो दी ही, साथ ही अन्याय के विरुद्ध लड़ने की शक्ति भी दी। विद्यार्थियों को निर्भय बनाया। दयानंद कॉलेज क्रांति के लिए शस्त्र और प्रेरणा प्रदान वाला एक असीमित भंडार बन गया था।
हर छोटे-बड़े गांव में आर्य समाज की स्थापना हो चुकी थी और उसका काम बढ़ रहा था। इसके कारण दीनदार सिद्दिक संगठन का प्रभाव कम होने लगा। मुरूम (तालुका उमरगा) में आर्य समाज की स्थापना हुई, तब निजाम ने वहां 200 फौजी जवानों की एक टुकड़ी भेजी तैनात की। फ़ौज की मदद से दीनदार सिद्दीक पार्टी और खाकसार पार्टी अपना कार्य करने लगी। आष्टा (कासार) में सिद्दीकी के भाषण से लोग भड़क उठे, क्योंकि भाषण के पहले सिद्दीक पार्टी के लोग मस्जिद में एक गाय लेकर आये थे। श्याम लाल जी को यह समाचार मिलते ही वे आष्टा (कासार) में पहुंचे। उन्होंने आष्टा (कासार), मुरूम आदि गांव में भाषण देकर हिंदुओं को आर्य समाज की दीक्षा दी और उन्हें यज्ञोपवीत पहनाया। आर्य समाज का आंदोलन हैदराबाद स्टेट की सीमा तक पहुंचा हुआ देखकर निजाम ने फौज का खर्चा भी हिंदुओं पर लाद दिया। इससे असंतोष और भी बढ़ने लगा। सर अकबर हैदरी उस समय निजाम के प्रधान थे। अनंतराव काका (आष्टा कासार), राम पांढरे, और करबसप्पा ब्याले, यह सभी लोग हैदराबाद जाकर हैदरी साहब से मिले। सभी ने मिलकर हैदरी साहब को अनुरोध किया कि यह सारा खर्च हिंदू प्रजा पर लादना अन्यायपूर्ण है और उसे हटा दिया जाए। तब हैदरी साहब ने यह खर्च हिंदुओं और मुसलमानों पर एक समान कर दिया। लेकिन प्रजा के द्वारा फ़ौज का खर्च उठाना अन्यायपूर्ण ही था और यह चलता रहा। सोलापुर से प्रकाशित होने वाले “वैदिक संदेश” और “सुदर्शन”, इन दो आर्य समाजी मुखपत्रों के माध्यम से, संग्राम की सारी जानकारी, आगामी कार्यक्रम और सूचनाएं लोगों तक पहुंचने लगे। “वैदिक संदेश” ने तो “निजाम सरकार के काले कानून” नामक पुस्तक भी प्रकाशित की। हैदराबाद स्टेट में उस्मानाबाद जिले के कुल 13 लोगों पर भाषण और लेख लिखने पर प्रतिबंध लगाया गया था। इन 13 लोगों के नाम पूरे राज्य में जारी किए गए थे। इस सूची में राम पांढरे (मुरुम) का भी नाम था। इन 13 व्यक्तियों को “नागवार बागी” करार दे कर निज़ाम सरकार ने नोटिस भेजी थी। हुतात्मा रामा मांग तावशी, ता० लोहारा (पायगा) में रामा मांग नामक व्यक्ति ने आर्य समाज की दीक्षा ली थी।

1932 में तावशी में एक हिंदू मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने की कोशिश की जा रही थी, तब क्रोधित आर्य समाजी लोगों ने मस्जिद के चबूतरे को तोड़ दिया। फिर तावशी के रज़ाकार, आसपास के गांव में जाकर दो ट्रक भरकर सशस्त्र पठान और अरबी लोगों को बुलाकर लाये। ये सभी – “अब देखते हैं, किसमें हिम्मत है हमें रोकने की?” और “अल्ला हू अकबर” चिल्लाते हुए मंदिर को तोड़ने के लिए निकले। इतने सारे सशस्त्र पठानों और अरबों को देखकर सभी हिंदू चुपचाप खड़े रहे। लेकिन तभी जोर से आवाज आयी – “मैं तैयार हूं.... तुम लोगों से मुकाबला करने के लिए!! मंदिर की एक ईट को भी किसी ने हाथ लगाया, तो एक-एक के सर काट दूंगा!!” यह आवाज़ थी, रामा मांग की!! वह अकेला ही था, लेकिन बहुत बलशाली था। रामा को आगे आते हुए देखकर एक पठान ने उस पर गोली चलाई। गोली उसकी जांघ में घुस गई। उसी अवस्था में रामा मांग अरबों और पठानों की भीड़ पर टूट पड़ा। पहले ही झटके में उसने चार पठान और एक अरब को नरक पहुँचा दिया। एक पठान के हाथ से बंदूक छीन कर उसने चार और पठानों और एक अरब के सर फोड़ दिए। एक पठान के हाथ का तमंचा उसने छीन लिया। रामा मांग का वो आवेश देखकर, पठानों और अरबों ने वहाँ से भाग जाने में ही अपनी भलाई समझी। लोग रामा मांग को तुलजापुर ले गए और फिर वहां से उसे उस्मानाबाद ले जाया गया। जांघ में लगी गोली के कारण अत्यधिक रक्त बह गया था और वह बेहोश हो गया था। अंततः उस्मानाबाद के अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई।

आर्य समाज की एक शाखा के अध्यक्ष माणिकराव पर गुंडों ने हमला कर उन्हें जख्मी कर दिया। 27 अक्टूबर 1938 को अस्पताल में उनका निधन हो गया। पुलिस ने उनके शव को उनके घरवालों को देने से इंकार कर दिया। तब आर्य समाजी युवकों ने इसके विरोध में जुलूस निकाला। पुलिस ने पं० देवीलाल और अन्य 20 आर्य समाजी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया।

इस प्रकार निजाम ने हर तरह से आर्य समाजी कार्यकर्ताओं पर अत्याचार किए। आर्य समाज पर निजाम को अत्यंत क्रोध था। हिंदुओं का संगठन करने वाले आर्य समाज के आंदोलन को कुचलने के लिए उसने हर संभव मार्ग अपनाया। लेकिन उसकी प्रतिक्रिया आर्य समाज की शाखाएं दुगनी होने में नजर आने लगी। आर्य समाज ने न केवल हिंदुओं का संगठन किया, बल्कि जन्मजात मुसलमानों को भी वैदिक पद्धति से दीक्षा देकर उनका शुद्धिकरण का कार्य अत्यंत द्रुतगति से जारी रखा। अनेक अस्पृश्यों को आर्य समाज में स्थान देकर उनके मन में हिंदूधर्म और हिंदूराष्ट्र के प्रति प्रेम और स्वाभिमान पैदा किया। आर्य समाज द्वारा हैदराबाद स्टेट में किया गया यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुमूल्य है। आर्य समाज संगठन के कारण ही हैदराबाद स्टेट कांग्रेस मजबूती से खड़ी हो सकी।

[मराठी ग्रंथ- “हैदराबाद स्वातंत्र्य संग्राम” से साभार]
[हिंदी अनुवाद- अमोल दामले, पुणे]

Thursday, May 28, 2020

आत्मा के साकार-निराकार विषयक पक्ष का निर्णय



आत्मा के साकार-निराकार विषयक पक्ष का निर्णय

लेखक- प्रियांशु सेठ

[इस लेख में प्रमाण-संग्रह में स्वाध्यायशील विद्वान् श्री भावेश मेरजा जी ने मेरी पर्याप्त सहायता की है। अतः उनको सहर्ष धन्यवाद देता हूं।]

अनेक दार्शनिक विद्वानों का आत्मा के साकार-निराकार विषयक पक्ष में विचार भेद है। एक पक्ष आत्मा के निराकार होने का दावा करता है, तो दूसरा पक्ष आत्मा के साकार होने का दावा करता है। दर्शन का सिद्धान्त है कि जिस पक्ष का प्रतिषेध हो गया, वह निवृत्त हो जाता है; जो अवस्थित रह गया, निर्णय का स्वरूप उसी से अभिव्यक्त होता है। न्यायदर्शन में कहा है कि जिन हेतुओं से अपने पक्ष की सिद्ध का प्रमाण और दूसरे के पक्ष का खण्डन करना है, वह निर्णय कहलाता है। इस सैद्धान्तिक दृष्टि से हम दोनों पक्षों को तर्क और प्रमाण की कोटि में रखकर सत्याऽसत्य का निर्णय करेंगे।

पूर्वपक्षी- आत्मा एकदेशी होने से साकार है।
उत्तरपक्षी- यह आवश्यक नहीं है कि यदि एकदेशी वस्तुएं साकार होती हैं, तो व्यापक वस्तुएं साकार नहीं होती हैं। प्रकृति पूरे ब्रह्माण्ड में व्यापक है फिर भी वे साकार है; अतः आपका पक्ष हेत्वाभास के होने से अग्राह्य है।

पूर्वपक्षी- आत्मा परिच्छिन्न (अणु) होने से एकदेशी है इसलिए वह साकार है। सत्यार्थप्रकाश, सप्तम समुल्लास में स्वामी दयानन्द जी लिखते हैं-
प्रश्न- जीव शरीर में भिन्न विभु है वा परिच्छिन्न?
उत्तर- परिच्छिन्न। जो विभु होता तो जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मरण, जन्म, संयोग, वियोग, जाना, आना कभी नहीं हो सकता। इसलिए जीव का स्वरूप अल्पज्ञ, अल्प अर्थात् सूक्ष्म है और परमेश्वर अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर, अनन्त सर्वज्ञ और सर्वव्यापक स्वरूप है।
उत्तरपक्षी- महर्षि ने यहां परिमाण की दृष्टि से परिच्छिन्न कहा है, रूप की दृष्टि से नहीं। परिमाण तीन होते हैं- विभु, मध्यम, अणु। इसलिए यह सत्य सिद्धान्त है कि आत्मा अणु होने से एकदेशी है, लेकिन आप परिमाण गुण को रूप गुण समझने की भूल कर रहे हैं। महर्षि कणाद ने इन दोनों गुणों को अलग-अलग बताया है [देखो- वैशेषिकदर्शन, सातवां अध्याय, पहला आह्निक]। यदि आपने दर्शनशास्त्रों का अध्ययन किया होता तो यह भ्रान्ति न होती। परिमाण गुण साकार और निराकार दोनों में होते हैं। आत्मा और परमात्मा में भी परिमाण गुण है। इसमें शास्त्रीय प्रमाण है; देखो- कठ० १/२/२०, श्वेता० ३/२०, मुण्डक० ३/१/९, छान्दोग्य० ६/८/७, ६/१५/३ तथा वैशेषिक० ७/१/२२]। इन प्रमाणों के आधार पर ईश्वर को एकदेशी और साकार मानना क्या आपको वांछनीय है? इसका उत्तर यही है कि यहां आपको परिमाण गुण ही मानना होगा। पैंगल उपनिषद् में आया है-
आकाशवत् सूक्ष्मशरीर: आत्मा न दृश्यते वायुवत्।। -४/१२
अर्थात् आत्मा का सूक्ष्म शरीर आकाशवत् है और वायु के समान अदृश्य है।

पूर्वपक्षी- निर् और आङ्-पूर्वक (डुकृञ् करणे) इस धातु से ‘निराकार’ शब्द सिद्ध होता है। ‘निर्गत आकारात् स निराकारः’ जिस का आकार कोई भी नहीं और न कभी शरीर-धारण करता है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘निराकार’ है। यह स्वामी दयानन्दजी का मत है। महर्षि द्वारा प्रतिपादित निराकार की इस परिभाषा को आत्मा पर घटित करने पर उसे साकार नहीं मान सकते।
उत्तरपक्षी- इसका उत्तर ध्यानपूर्वक सुनिये। 'य इन्दति परमैश्वर्यवान् भवति स इन्द्रः परमेश्वरः’ जो अखिल ऐश्वर्ययुक्त है, इस से उस परमात्मा का नाम ‘इन्द्र’ है। जबकि अष्टाध्यायी (अध्याय ५, पाद ३, सूत्र ९३) में आत्मा को भी इन्द्र कहा गया है [इन्द्र आत्मा 'इति काशिकायाम्']। अब आप मेरे इन प्रश्नों के उत्तर दीजिये-
• क्या आप इन्द्र (परमेश्वर) के अखिल ऐश्वर्ययुक्त गुण-स्वभाव को आत्मा पर घटित करने का साहस करेंगे? कदापि नहीं। क्योंकि ऐसा करने से आपके सिद्धान्त खण्डित होंगे। ठीक इसी प्रकार परमात्मा के 'निराकार' नाम की जो व्याख्या है, आपने उसको आत्मा पर घटित कर दिया।
• क्या आप आत्मा और परमात्मा में अन्तर जानते हैं? स्वामी दयानन्दजी अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की भूमिका में लिखते हैं- "प्रथम समुल्लास में ईश्वर के ओङ्काराऽऽदि नामों की व्याख्या।" महर्षि के इस वचन से यह सिद्ध होता है कि उन्हें प्रथम समुल्लास में ईश्वर के अनेक नामों की व्याख्या अभीष्ट है, फिर आपका ईश्वर विषयक प्रकरण आत्मा पर घटित करना कहाँ की ईमानदारी है? अतः आपकी पोल खुल चुकी है। यहां आप इस कहावत "कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा", को चरितार्थ कर रहे हैं।

पूर्वपक्षी- ईश्वर निराकार होने से सर्वव्यापक है। यदि आप आत्मा को निराकार मानते हैं तो उसे सर्वव्यापक भी मानना होगा।
उत्तरपक्षी- क्या आप परमात्मा की तुलना आत्मा से कर रहे हैं? परमात्मा अनन्त गुण-कर्म-स्वभाव वाला है। वेदादि शास्त्रों में कहा है कि उस (जगदीश्वर) के तुल्य अन्य कोई नहीं है। आत्मा का गुण-कर्म-स्वभाव सीमित है। वह सर्व गुण-कर्म-स्वभाव से रहित है। यदि आप आत्मा को सर्वशक्तिशाली मानेंगे तो आपको परमात्मा के अस्तित्व को नकारना होगा। परमात्मा के अस्तित्व को नकारते ही आपके सिद्धान्त खण्डित होंगे और नास्तिकों के सारे दोष आपके पक्ष में होंगे। इसलिए आत्मा निराकार तो है लेकिन सर्वव्यापी नहीं।

पूर्वपक्षी- आत्मा और परमात्मा दोनों चेतन सत्ता है। अगर आत्मा निराकार होती तो फिर भारत में बैठे हुए मुझे अमेरिका की भी खबर आत्मा के द्वारा होती।
उत्तरपक्षी- यदि आप आत्मा को साकार मानेंगे तो उसे जड़ पदार्थ मानना होगा। यह शाश्वत सिद्धान्त है कि जड़ पदार्थ के अतिरिक्त अन्य कोई पदार्थ साकार नहीं होता। आत्मा चेतन और अप्राकृतिक पदार्थ है; अतः आपका तर्क कि भारत में बैठकर अमेरिका की खबर आत्मा द्वारा पाना चूँ-चूँ का मुरब्बा है।

ऊपर सिद्ध है, पूर्वपक्षी आत्मा के साकार होने के पक्ष में कोई प्रमाण न दे सका। अब हम आत्मा के निराकारत्व के पक्ष में कतिपय दार्शनिक विद्वानों की सम्मति प्रस्तुत करते हैं। यथा-

१. महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में जीवात्मा निराकार है। यथा-
• 'उपदेश मञ्जरी' (पूना प्रवचन) के चतुर्थ प्रवचन में महर्षि दयानन्द जी ने कहा है- "जीव का आकार नहीं तो भी जीव का ध्यान होता है वा नहीं?"
• "...तथा वह (जीव) भी निराकार और नाश से रहित रहता है।" [महर्षि दयानन्द सरस्वती का पत्र-व्यवहार, भाग १, पृष्ठ २१७]

२. स्वामी दर्शनानन्द जी ने आत्मा को निराकार माना है- "जीवात्मा भी निराकार है।" [दर्शनानंद ग्रंथ संग्रह; पृ० २६; १९९७ संस्करण]

३. सुप्रसिद्ध शास्त्रार्थ महारथी पण्डित बिहारीलाल शास्त्री अपनी पुस्तक 'निराकार साकार निर्णय' (प्रकाशन वर्ष १९६५; प्रकाशक- डॉ० राजेन्द्र कुमार) में जीवात्मा को मुक्तकण्ठ से निराकार बतलाते हैं-
• "निराकार जीवात्मा शरीर में गति करता है तो शरीर के कारण वह साकार नहीं कहलायेगा।" [पृ० ८]
• "आपका शरीर साकार है। आप (आत्मा) निराकार है।" [पृ० २६]

४. महान् दार्शनिक विद्वान् लेखक श्री पण्डित गंगाप्रसाद जी उपाध्याय का पक्ष भी जीवात्मा के निराकारत्व में है।
• "कुछ निराकार वस्तुयें भी एक देशी हो सकती हैं, परन्तु कोई स्थूल या साकार वस्तु सर्वदेशी नहीं हो सकती।" [आस्तिकवाद; पृष्ठ १८६; प्रथम संस्करण]
• उन्होंने अपनी 'धर्म सार' नामक हिन्दी पुस्तक में जीवात्मा को निराकार लिखा है- "जीवात्मा निराकार है। उसको मोटा, पतला, काला, पीला नहीं कह सकते।" [पृष्ठ ३४]
[टिप्पणी- प्रा० राजेन्द्र जी जिज्ञासु द्वारा संपादित 'गंगा ज्ञान सागर' (प्रकाशन वर्ष २००० ई०) के दूसरे खण्ड में उपाध्याय जी रचित 'धर्म-सार' पुस्तक का समावेश किया गया है। अत: जीवात्मा को निराकार बताने वाला यह उद्धरण 'गंगा ज्ञान सागर' (दूसरा खण्ड) के पृष्ठ ७३ पर भी पढ़ा जा सकता है।]

५. स्वामी सत्यप्रकाश जी ने १९३८ में महर्षि दयानन्द सरस्वती के दार्शनिक चिन्तन पर एक महान् ग्रन्थ अंग्रेज़ी में लिखा है जिसका शीर्षक है- A Critical Study of the Philosophy of Dayananda. इसी ग्रन्थ को बाद में अन्य प्रकाशकों ने Dayananda's outline of Vedic Philosophy आदि अन्य शीर्षकों से प्रकाशित किया है। स्वामी सत्यप्रकाश जी के उपर्युक्त अंग्रेज़ी ग्रन्थ के छठे प्रकरण का शीर्षक है- The Ego अर्थात् जीवात्मा। इस प्रकरण में स्वामी सत्यप्रकाश जी ने जीवात्मा के सम्बन्ध में लिखा है-
1. "Living matter need not be cellular. Take the case of an ultramicroscopic virus which can pass through even a filter efficient to stop bacteria. Who can say, these ultramicroscopic filtrable viruses which cause many diseases in animals and plants may be particular kind of bacteria, almost approaching molecular dimensions. But the living life within them is still of a finer dimension. We say that it is a point with no dimensions. It is a reality in itself. It exhausts no space while it is in space." [P.136, 3rd edition 1984]
2. "According to Dayananda, souls are dimensionless units while the Absolute Brahman is the dimensionless unity." [Ibid, P.136]
3. "Just as God is a dimensionless unity, all-pervading and active (chetan), similarly, the souls are dimensionless units pervaded by God." [Ibid, p. 139]

स्वामी सत्यप्रकाश जी ने यहां जीवात्मा को लंबाई, चौड़ाई आदि परिमाणों से रहित वर्णित किया है। उनकी दृष्टि में जीवात्मा उस बिन्दु जैसा है जिसके कोई परिमाण नहीं। उनका मन्तव्य है कि आकाश में अवस्थित होते हुए भी जीवात्मा कोई स्थान नहीं घेरता है। स्वामी सत्यप्रकाश जी ने यहां यह भी लिखा है कि महर्षि दयानन्द जी भी जीवात्मा को ऐसा ही- लंबाई, चौड़ाई आदि परिमाणों से रहित मानते हैं।

६. प्रसिद्ध विद्वान् स्वामी वेदानन्द तीर्थ अपने 'वैदिक धर्म' नामक पुस्तक में वेद का प्रमाण देते हुए जीवात्मा को "निराकार" बताया है-
अपादिन्द्रो अपादग्निर्विश्वे देवा अमत्सत।
वरुण इदिह क्षयत्तमापो अभ्यनूषत वत्सं संशिश्वरीरिव।। -ऋग्वेद ८/६९/११
अर्थ- (इन्द्र:) अखिलैश्वर्य सम्पन्न प्रभु (अपात्) चिह्न रहित=निराकार है (अग्नि:) चेतन जीव (अपात्) निराकार है (विश्वे देवा: अमत्सत) सब इन्द्रियां या सूर्य-चन्द्र आदि सुख के साधन हैं अथवा आत्मा और परमात्मा के स्वरूप को जानकर (विश्वे देवाः अमत्सत) सब विद्वान् मोक्षानन्द पाते हैं। (वरुणः इत् इह क्षयत्) वरुण=सर्व श्रेष्ठ भगवान् ही इस संसार में वास करते हैं। अथवा (वरुण: इह इत् क्षयत्) सर्व श्रेष्ठ भगवान् इसी संसार में=इसी देह में ही रहते हैं। (इव शिश्वरी: वत्सं सम् ) जिस प्रकार वर्धक शक्तियां बच्चे को प्राप्त होती हैं उसी प्रकार (आपः तम् अभिअनूषत्) सब स्तुतिएं उसको प्राप्त होती हैं।

ईश्वर और जीव दोनों निराकार हैं। ईश्वर सर्वव्यापक भी है। उसे खोजने के लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं। वह हमारे अन्दर वास करता है। जिस प्रकार अवस्था के कारण वर्धक शक्तियां बालक ही को विशेष रूप से बढ़ाती हैं, उसी प्रकार सारी स्तुतियां भी परमेश्वर की ही होती हैं, क्योंकि वही सकलगुणनिधान है। [पृष्ठ २०-२१; प्रकाशक- गोविन्दराम हासानन्द; १९६२ संस्करण]

७. श्री आचार्य आनन्द प्रकाश जी (आर्ष शोध संस्थान अलियाबाद, तेलंगाना), स्वामी श्री सत्यपति जी परिव्राजक के शिष्य हैं। आपने सांख्य, वैशेषिक आदि दर्शन शास्त्रों के हिन्दी में सरल सुगम भाष्य लिखे हैं। आपने सांख्य दर्शन के प्रथम अध्याय के २० से लेकर ५४ तक के ३५ सूत्रों को वैसे तो प्रक्षिप्त बताया है, पुनरपि ये सूत्र के प्रक्षिप्त होने के हेतु देते हुए उन पर अपनी महत्त्वपूर्ण टिप्पणियां भी दी हैं, जो पठनीय हैं। ५१वें सूत्र की समीक्षा में आप लिखते हैं-
"सांख्य के अनुसार प्रत्येक क्रियावान् पदार्थ मूर्त्त नहीं होता, अपितु व्यक्त क्रियावान् पदार्थ ही मूर्त्त होता है। अव्यक्त आत्मा क्रियावान् होते हुए भी मूर्त्त नहीं होता। इसलिए मूर्त्त पदार्थों के अन्य धर्मों की आत्मा में आशंका करना अनुचित है।" [पृ० ३५; प्रथम संस्करण]

८. सत्यार्थप्रकाश का विस्तृत भाष्य करने वाले सुप्रसिद्ध विद्वान् लेखक श्री स्वामी विद्यानन्द जी सरस्वती अपने ग्रन्थ 'सत्यार्थ भास्कर' के प्रथम भाग के पृष्ठ ८४६-८४७ पर ईश्वर का निराकारत्व तथा निराकार ईश्वर के द्वारा सृष्टि रचना - सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित इन दार्शनिक विषयों पर लिखे गए अपने विवरण में स्वामी विद्यानन्द जी ने जीवात्मा को स्पष्टतः निराकार लिखा है।

९. षड्दर्शन आदि आर्ष शास्त्रों के सुविख्यात विद्वान् श्री स्वामी विवेकानन्द जी परिव्राजक (निदेशक- दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़) ने अपने लेख "आत्मा साकार है, या निराकार" में आत्मा को निराकार सिद्ध किया है।

१०. आत्मा परमात्मा दोनों निराकार हैं।" -पण्डित बुद्धदेव मीरपुरी [मीरपुरी-सर्वस्व; पृ० १८१]

११. प्रसिद्ध वैदिक विद्वान् स्व० आचार्य ज्ञानेश्वर आर्य 'दर्शनाचार्य' अपनी पुस्तक ईश्वर-जीव-प्रकृति में लिखते हैं-
• ईश्वर और आत्मा में यह समानता है कि दोनों ही चेतन, पवित्र, अविनाशी, अनादि, निराकार हैं। [पृष्ठ ४]
• जीवात्मा में कोई भार, रूप, आकार आदि गुण नहीं होते। [पृष्ठ १६]
• जैसे बिजली बड़े-बड़े यंत्रों को चला देती है ऐसे ही निराकार होते हुए भी जीवात्मा अपनी प्रयत्न रूपी चुंबकीय शक्ति से शरीरों को चला देता है। [पृष्ठ १९]

१२. स्वामी शान्तानन्द सरस्वती (एम०ए० दर्शनाचार्य) परमात्मा एवं जीवात्मा में समानता बतलाते हुए लिखते हैं-
"जीवात्मा का भी कोई आकार नहीं है। यह भी ईश्वर समान निराकार है। अर्थात् शरीर के समान किसी भी रूप से रहित है।" [परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति; पृष्ठ ३१; प्रथम संस्करण]

१२. 'वैदिक-पथ' (मासिक पत्रिका) के प्रधान सम्पादक डॉ० ज्वलन्तकुमार जी शास्त्री ने 'दयानन्द दर्शन' के पृष्ठ १६ पर आत्मा को "निराकार" लिखा है।

इस प्रकार ऐसे कई विद्वानों ने मुक्तकण्ठ से आत्मा के निराकारत्व का समर्थन किया है। उपरोक्त तर्क और प्रमाणों की दृष्टि से आत्मा का निराकारत्व पक्ष स्थापित होता है। अतः शास्त्रों का निर्णय यही है कि आत्मा निराकार है, ऐसा सबको निश्चय जानना चाहिए।

Sunday, May 24, 2020

यह विद्या का समय है



यह विद्या का समय है

【राजर्षि शाहू महाराज का दि० १९ अप्रैल १९१९ में उत्तर प्रदेश के कानपुर में अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय १३वीं समाजिक परिषद् का ऐतिहासिक भाषण】

हिंदी अनुवाद [मूल मराठी से]- महेश आर्य
सम्पादक- प्रियांशु सेठ

प्रिय क्षत्रिय बंधुओं!
मैं आपमें से ही एक हूं। मुझे मजदूर समझो या किसान समझो, हमारे पूर्वज यही काम करते थे। जो काम मेरे पूर्वज करते थे वही काम करने वाले लोगों का अध्यक्ष बनने के लिए मुझे आमंत्रित किया, उसके लिए मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं कोई ज्ञानी या विद्वान् नहीं, मेरे से ज्यादा विद्वान् लोग हैं। मेरी गुणवत्ता की तरफ ध्यान न देते हुए मैं केवल किसान और पराक्रमी छत्रपति शिवाजी महाराज और उनकी स्नुषा ताराबाई महारानी साहिबा उनके वंश का हूं, इसलिए अध्यक्ष पद का बड़ा सम्मान मुझे आपने दिया है। जिस समय आपकी आज्ञा मुझे मिली उस समय मुंबई में मुझे बहुत तेज बुखार था। लेकिन आप सबके आशीर्वाद से मैं जल्द ही ठीक हो गया। उसके साथ मेरे सामने पहाड़ जितनी आपत्ति आ खड़ी हुई। वह आपत्ति कौन-सी है, आपको लगता है, तो वह थी हिन्दी में भाषण करने की। तीन दिनों तक रेलगाड़ी में स्वाध्याय करके आपके सामने भाषण करने का निश्चय किया। मेरी मातृभाषा यह नहीं है और लिपी भी अपरिचित होने के कारण हमारे परमपूज्य स्वामी परमानंद जी मेरा भाषण पढ़कर सुनाएंगे। जो मेरे बिरादरी के भी हैं और मैं उनको पिता समान, गुरू समान मानता हूं। मेरे परमपूज्य खासेराव जाधव वह भी यहां तक आए हुये हैं, यह देखकर मुझे दोगुना आनंद हो रहा है। आपकी सेवा करने की मुझे शक्ति मिली है उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं। आगे आपकी जैसी आज्ञा मिले वैसी सेवा करने के लिए मैं तैयार हूं।
मैं और एक विषय पर बात करने वाला हूं। इस विषय पर बात करने का यह स्थान नहीं है, परन्तु आपको आसपास क्या चल रहा है, उसपर आंखों पर पट्टी बांध लेना नहीं है। आजकल जो बखेड़ा चल रहा है वो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। अंग्रेज सरकार ने हमें विद्या का दान नहीं दिया होता तो यह झगड़ा कभी होता ही नहीं। सरकार विद्यारूपी ज्ञान हमें दे और उसके बदले हम उन्हें जहर खिलाएं, यह विसंगतपूर्ण व्यवहार नहीं है क्या? जिसने हमें विद्या का अमृत पिलाया, वो हमें परतंत्रता की बेड़ी से निसंदेह रिहा करेंगे; आपको जो चाहिए वह जिस प्रकार बच्चा अपने माता-पिता से मांग लेता है, उस प्रकार प्रेम से और जोर से सरकार से मांगो, वह जरूर देंगे। मुझे पूरा विश्वास है जो काम प्यार से होगा वह जोर-जबरदस्ती से कभी नहीं होता।
भारतवर्ष के प्रत्येक प्रांत में प्रगति होते हुए दिखाई दे रही है, यह बड़ी खुशी की बात है। हिंदुस्तान के प्रत्येक प्रांत में दिनों-दिन जाति सभा और धार्मिक समारोह अधिकाधिक होने लगी है। आजकल जितनी धार्मिक समारोह और जाति सभायें हैं, उसकी तरफ मैं बहुत ही आशावादी दृष्टिकोण से देख रहा हूं, उसकी उत्तरोत्तर प्रगति हो ऐसी मन से आशा कर रहा हूं। क्योंकि उसके द्वारा शिक्षण, सामाजिक सुधार, धर्म प्रचार, इस प्रकार की परोपकारी बातें हो गई हैं, हो रही हैं। आगे भी इन सभाओं का ध्येय ऊंचा रहा तो और भी उन्नति हो सकती है, ऐसा मुझे विश्वास है। इस जागृति का कारण क्या? इस प्रश्न‌ पर विचार करने से तीन महत्त्वपूर्ण कारण सामने दिखाई देगे; पहला और महत्त्वपूर्ण कारण यह कि ब्रिटिश सरकार राज्य, दूसरा अंग्रेजी शिक्षण और तीसरा धार्मिक आचार्यों का धर्म प्रचार।

भारतवासियों को यह याद रखना चाहिए कि इस ब्रिटिश सरकार के उपकार को न भूलते हुए आपको सदैव राजनिष्ठ रहना चाहिए। उसी प्रकार धार्मिक आचार्यों के उपकार भी नहीं भूलने चाहिए। विशेषकर जिन्होंने धार्मिक स्वराज्य देकर प्रजा को धार्मिक दासत्व से मुक्त कर दिया है, उस महर्षि दयानंद सरस्वती को भूलना मत।

अंग्रेजी शिक्षा से भारतीयों को तीसरी आंख आ गई है। यह कितना बड़ा फायदा है देखो! पहले हम कौन थे, हमारी क्या स्थिति थी, अब क्या स्थिति है, आगे क्या स्थिति होगी; ऐसी बातों का ज्ञान हो रहा है, यह बड़ी खुशी की बात है। भारतवर्ष में जो सभा, देश, जाति, धर्म, समाज-सुधारना आदि कार्य कर रहे हैं उसके लिए मेरी तहे दिल से सहानुभूति है। इन सब कार्य में मैं भाग लेता हूं इसी भावना से मैं इस सभा में आया हूं। अब विशेष कुछ न बोलते हुए अपने मुख्य विषय की तरफ आता हूं। हम जिस देश में रह रहे हैं उसका नाम आर्यावर्त्त है। इसे आर्यावर्त्त बोलने का कारण यह है कि पहले यहां आर्य लोग बसते थे। इस देश में रहने वाले लोगों को आर्य कहा जाता था। आर्यों का मूलस्थान तिबेट (त्रिविष्टप, तिब्बत) था। आर्य प्रथम दो वर्ण के थे; एक आर्यवर्ण, दूसरा दस्युवर्ण। यह सब एक ही माता-पिता की संतान थे।
आर्यों का गुण-कर्म-स्वभाव स्वीकार करते हुए कोई भी आर्य बन सकता था। और दस्यु के गुण-कर्म-स्वभाव स्वीकार करते हुए कोई भी दस्यु बन सकता था। आर्यो के कार्यों का विस्तार जिस प्रकार बढ़ने लगा वैसे कार्य करने के लिए चार वर्णों की स्थापना हुई। 'निरुक्त' में वर्ण का अर्थ इस प्रकार दिया है- 'वर्णो वृणोति'। "धर्माचरण से निचला वर्ण ऊपर के वर्ण में जा सकता है, वैसे ही ऊपर का वर्ण अधर्म के आचरण से नीचे के वर्ण में जाता है। वैदिक काल से महाभारत काल तक यही मर्यादा रही है।"

सभी वेदों को समझने के बाद अध्ययन करना; दूसरे को सिखाना; यज्ञ करना और कराना; दान देना और दान लेना यह ब्राह्मण का कर्म है। "शांति, तप, अंदर और बाहर से स्वच्छ रहना, क्षमा, ज्ञान, विज्ञान (ईश्वर, जीव, प्रकृति का ज्ञान), आस्तिक भाव यह ब्राह्मण का कर्म है।"
"प्रजा की रक्षा करना, प्रजा की रक्षा के लिए दान देना, यज्ञ करना, वेदों का पठन करना, युद्ध करना, युद्ध में चतुर रहना, न फंसना, युद्ध में पीठ न दिखाना, निर्भय होकर रहना, धैर्यवान् होना, विषयों में नहीं रमण होना, प्रजा के हित के लिए सर्वस्व न्यौछावर करना, ईश्वर पर विश्वास रखना यह क्षत्रिय का स्वाभाविक कर्तव्य है।"
"जानवरों को पालना और उसकी रक्षा करना, दान देना, यज्ञ कर्म करना, वेदों का सांगोपांग अध्ययन करना, देश-विदेश जाकर व्यापार करना, खेती करना यह वैश्य का कर्त्तव्य है।"
"शिल्प कला का ज्ञान अर्जित करना और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इनके काम में मदद करना यह शूद्र का कर्त्तव्य है।"

वैदिक काल में इस प्रकार स्वतंत्रता थी की जो कोई जिस वर्ण का काम करेगा उस वर्ण में उसे शामिल किया जाता था। वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन करना प्रत्येक स्त्री-पुरुष का अधिकार रहता था। वैदिक काल में हर वर्ग के ऋषि हुए है। जब तक स्त्रियां मंत्र पठन किया करती थीं, तब तक यह आर्यावर्त्त एक स्वर्ग के समान था। 'स्त्रियां और शूद्रों को वेद को पढ़ना नहीं है' ऐसी कपोलकल्पित श्रुति का आवाज आकाश से नहीं आता था। उस समय शूद्रों ने वेद सुने तो उसके कान में सीसा पिघला कर डाला नहीं जाता था। जिस समय से वर्ण व्यवस्था वंश परंपरागत पंजीकृत हुई तब से एक वर्ण के मनुष्य को दूसरे वर्ण के मनुष्य का काम करना कठिन होने लगा और अपने वर्ण का कर्त्तव्य करने से धीरे-धीरे विमुख होने लगे। समाज की व्यवस्था बिगड़ने लगी। आखिर में जो वर्ण व्यवस्था गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित थी वह जन्म पर होकर रह गई। इस प्रकार इन नियमों के विरुद्ध कोई आवाज उठाने की हिम्मत न करें इसलिए श्रुति में मिलावट की गई। यानी वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित है यानि मां-बाप ब्राह्मण हैं तो उसे ही ब्राह्मण कहे। दूसरे किसी को बिल्कुल ब्राह्मण समझना नहीं है। वैसे ही जिसके मां-बाप क्षत्रिय हैं वही क्षत्रिय, फिर उसमें वह क्षत्रिय गुण हो या न हो। जिसके मां-बाप वैश्य वही वैश्य। जिसके मां-बाप शूद्र वही शूद्र, फिर उसमें कितनी भी उच्च गुणवत्ता हो‌। जो पुराने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य गुण-कर्म-स्वभाव से श्रेष्ठ बनकर जन्म अभिमान से ग्रसित होने लगे वैसे-वैसे दूसरे मनुष्य का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होना समाप्त हो गया। इस प्रकार हिंदू की अधोगति हो गई। वह इतिहास पाठक पूरी तरह जानते हैं। इस समय वह चार वर्ण से पांच हजार जातियों में बदल गया। इसके कारण हिंदू बलहीन होने लगा। हर एक जाति दूसरे जाति से खाना-पीना करते नहीं है, विवाह संबंध भी नहीं करते। एक जाति पर जुल्म होने लगा तो दूसरे जाति वाले सिर्फ देखते रहते हैं, उनको जरा भी दया नहीं आती। सच कहूं तो मनुष्य प्राणी की एक ही जाति है। जाति के लक्षण शास्त्रकारों ने इस प्रकार लिखे हैं- "जिसमें समान भाव, समान आकृति और समान उत्पत्ति है; उसे ही एक जाति समझना चाहिए।" इसी प्रकार व्याकरण शास्त्र में भी लिखा हुआ है कि जिसकी आकृति समान उसकी जाति एक; जैसे गाय, घोड़ा, हाथी, पिप्पल इत्यादि।
आज हिंदू लोगों की धारणा है कि हिंदुस्तान के अलावा और कहीं वर्णव्यवस्था नहीं है। यह हमारा भ्रम है। ऐतिहासिक जगत इसके बिल्कुल उल्टा है। हमारी तरह ही दूसरे भी आर्य वंशज हैं। हमारी तरह ही दूसरे देशों में भी वर्ण व्यवस्था है। हमारे और उनमें फर्क सिर्फ इतना है कि दूसरे देशों में वर्ण व्यवस्था गुण-कर्म पर आधारित है, पर हमारे यहां वह जन्म पर आधारित है। उनके यहां वर्णों का परिवर्तन इसी जन्म में होता है, पर हमारे यहां जन्म-जन्मान्तरों बाद भी परिवर्तन नहीं होता। यह सिर्फ रूढ़िवाद के कारण हुआ है। वेदादि शास्त्र तो इससे बिल्कुल उलट हैं। मनुस्मृति में लिखा है कि "क्षत्रियों के वंश में उपनयन संस्कार का लोप होने के कारण और ब्राह्मणों में सिर्फ देखने भर से संस्कारहीन हो जाता है, उनको क्या दोष देना?"
पौण्ड्र, चौण्ड्र, द्रविड़, कंबोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीना, किरात, दाद इत्यादि का ब्राह्मणादि वर्ण संस्कार का लोप होने के कारण वह संस्कारहीन हो गये। दूसरे देशों में दूसरे जाति के नाम से पहचाने जाने लगे। इनमें से कुछ म्लेच्छ और कुछ आर्य भाषा बोलते थे। उन सबको दस्यु कहने लगे। केवल अन्य जातियों में वेदोक्त संस्कार का लोप होने के कारण ही नहीं, ब्राह्मणों की अज्ञानता और अत्याचार के कारण भी म्लेच्छ जाति उत्पन्न हो गई।
विष्णु पुराण के चौथे अध्याय में लिखा है कि त्रिशंकु के वंश में बाहु नाम का राजा हो कर गया। वो हह्य, ताल, जंघादि क्षत्रियों से हार कर अपने रानी के साथ जंगल में चला गया । आगे कुछ दिन बाद वह मर गया। तब वह रानी उसी के साथ सती जाने लगी। वह गर्भवती होने के कारण ऋषि ने उसे सती जाने से रोक दिया और कहा "हे रानी तेरे पेट से पराक्रमी पुत्र जन्म लेगा, वह सब क्षत्रियों का नाश करेगा।" रानी ने सती जाने का इरादा छोड़ वह ऋषि के आश्रम में रहने लगी। उस ऋषि का नाम था वशिष्ठ। आगे उसे पुत्र हुआ। उसका नाम सगर रखा। ऋषि ने उसे शस्त्र विद्या सिखाई। सगर बड़ा होने के बाद मां से उसे पूरी हकीकत पता चली। तब वह क्षत्रियों से युद्ध करने के लिए निकल पड़ा, और क्षत्रियों को जर्जर करके छोड़ा। उसके कारण सब क्षत्रिय वशिष्ठ जी को शरण गये। तब ऋषि वशिष्ठ जी ने सगर से कहा 'हे पुत्र, अब इन क्षत्रियों को मत मारो। मैंने इन क्षत्रियों को द्विजत्व से और धर्म से अलग कर दिया है। इनके जीते जी मार दिया हूँ। यह अब जीवित मुर्दे हैं, और सगर ने इन क्षत्रियों का वंश (वर्ण) परिवर्तन कर दिया। बहुत से लोगों की शिखा काट दी इनको 'यवन ' यह नाम दिया। इसके साथ ही वेदादि शास्त्र को पढ़ने का अधिकार भी छीन लिया। क्षत्रिय धर्म से उनको निकाल बाहर कर दिया। इसी प्रकार परशुराम के अत्याचार के कारण भी बहुत से क्षत्रिय, क्षत्रिय वर्ण से पृथक होकर दूसरी जातियां बन गईं।
हमारे इस देश में हजारों जातियां बन गई। वैसे ही किसी प्रकार की समय हमारी भी जाति क्षत्रिय से पृथक हो गई होगी। इस प्रकार इस जगत में ऐतिहासिक काल में कितनी बार परिवर्तन हो गया है, हो रहा है और आगे भी होता रहेगा। यह नैसर्गिक नियम है। महाभारत काल तक यहां के क्षत्रियों का विवाह दूसरे देश के क्षत्रियों से होते रहते थे। 'महाभारत' ग्रंथ में यह दिखाई देता है। अर्जुन का विवाह उलूपी के साथ, धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी के साथ ऐसे हो चुके हैं। महाभारत के पूर्व भी कई राजाओं का विवाह सम्बंध दूसरे देश के राजाओं के साथ हुआ है, ऐसा इतिहास बताता है।

अब आगे विशेष कुछ न कहते हुए अपने विषय के संबंध में दो शब्द कहने हैं। अगर तुम अपने दिल से क्षत्रिय धर्म स्वीकार करना चाहते हैं तो आपका मैं तहे दिल से स्वागत करता हूं। आप क्षत्रिय बन चुके हैं। क्षत्रिय गुण-कर्म-स्वभाव का स्वीकार कीजिये। अपने देश के दुःखी प्रजा के रक्षा के लिए तैयार हों। आपको क्षत्रिय होने से वेदादि शास्त्रों की तरफ से अधिकार है। परमेश्वर ने आपको साधन भी उपलब्ध करवा दिए हैं। मुझे लगता है हर एक मनुष्य चार वर्ण की योग्यता प्राप्त कर लेगा तब देश में सुधार होगा। परंतु हमें एक बात याद रखनी चाहिए, वो वह कि यह विद्या का समय है। सबके अंतःकरण में ज्ञान का प्रकाश पड़ा है। सिर्फ जन्म से क्षत्रिय और ब्राह्मण हुए लोगों का अब कोई अदर नहीं करेगा। आप गुण-कर्म से क्षत्रिय बनो। सिर्फ नाम के क्षत्रिय की कतार में आपका नाम लगवाकर क्षत्रियों का भरना मत करना। इसी तरह हम क्षत्रिय थे, हमने अमुक वंश में जन्म लिया वगैरा-वगैरा ऐसे वितंडावाद में मत पड़ना। आपका किसी के साथ संबंध हो या न हो यह कोई उन्नति करने का मार्ग नहीं है। जनगणना रिपोर्ट के अधिकारी और दूसरे कोई भी आपको कुछ भी कहें, उसकी चिंता मत करना। आपकी जाति में वेदोक्त संस्कार, वेदोक्त कर्म का प्रसार और सदाचार की वृद्धि करना। अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दो, असहाय और गरीब भाई-बन्धु की मदद करो। 
कुर्मी क्षत्रिय समाज में विधवा विवाह प्रचलित हुआ देख मुझे बहुत ही खुशी हो रही है। हमारी क्षत्रिय जाति भ्रूणहत्या, व्यभिचार इन पापों से सुरक्षित रहेगा ऐसा मेरा विश्वास है। यह हमारा अपना धर्म है। मनुष्य समाज को निर्दोष करने के लिए है। वेदादि शास्त्रों का हमें आधार है। हमारी सरकार ने भी विधवा विवाह का कायदा पास कर दिया है। जिस जाति में धर्म का प्रचार नहीं उस जाति में भ्रूणहत्या, व्यभिचार आदि पाप हो रहे हैं। हजारों बच्चे प्रत्येक वर्ष मर रहे हैं। यह कितनी दुःख की बात है!
भारतवासी लोक उन्नति के तीन मुख्य साधन समझते हैं। पहला परदा , दूसरा विवाह निषेध और तीसरा किसी के साथ मिलकर भोजन न करना।
क्या आश्चर्य है! कोल्हापुर राज्य संस्थापक महारानी ताराबाई, महारानी सती अहिल्याबाई, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, महारानी कमलाबाई आदि क्षत्रिय स्त्रियों ने राज्य का रथ चलाया है। युद्ध के मैदान में जाकर शत्रुओं के साथ लड़ाई की है। यह सब काम परदे के पीछे रहकर केवल असंभव होता। आज भी परदा कि प्रथा सब देश में नहीं है। महाराष्ट्र, मद्रास, गुजरात वगैरा प्रांत में परदा बिल्कुल नहीं है। दूसरे प्रांत में कुछ थोड़े जातियों में ही परदा है। परदा प्रथा के कारण स्त्रियों में वीरता के गुणों का सर्वथा नाश हो जाता है। हमारी आजीविका विशेषकर कृषि कर्म पर आधारित थी, यह सुनकर मुझे बड़ा आनन्द हो रहा है। कृषि कर्म इतना पवित्र है कि वैदिक काल में, साल में एक बार चक्रवर्ती राजा और उनके मंत्री कृषि कर्म को प्रोत्साहित करने के लिए खुद हल चलाते थे। जिस कार्य में भूमी में एक दाना बोने से हजारों दाने मिलते हैं और जिस कृषि कर्म पर सारी मनुष्य जाति अपनी जीविका करती है, तो कृषि कर्महीन अथवा बुरा है ऐसा मैं बिल्कुल नहीं मानता। मैं मेरे युवराज को कृषि विद्या पढ़ाने के लिए विलायत और अलाहाबाद के कृषि स्कूल में भेजा था। आप तो जानते ही हैं कि कृषि कर्म से दोहरा उत्पन्न मिलता है। मनुष्य खुद सुखी होकर सभी मनुष्य जाति को भी सुख देता है। कृषि कर्म का संबंध पशुपालन और उनकी रक्षा से भी आता है। इसके लिए पशुपालन के संबंध में बहुत-से काम करना बाकी हैं। दूध, घी वगैरह से यह देश समृद्ध होना चाहिए।
कृषि कर्म करके क्षत्रियों के तेज को बाधा उत्पन्न होती है ऐसी कोई बात नहीं। जिस कर्म से मनुष्य समाज सुव्यवस्था और उन्नति की ओर बढ़ती हो वह कर्म नीच है यह समझना मुझे बिल्कुल रास नहीं आता। यूरोप में किसानों को प्रतिष्ठित समझा जाता है। वहां के किसान राज्य सरकार के उच्च स्तर पर नौकरी करते हैं। वैसे ही उधर शिल्पकला करने वाले लोगों की बड़ी प्रतिष्ठा है। जो आज चर्मकार या भंगी है उनको नीच ऐसा कहने का साहस किसी में नहीं है। उसका कारण यह है कि शिल्पकला सर्वथा उनके ही हाथों में होती है। यहां निर्धन और अज्ञानी लोग के रहते शिल्पकला का सुधार कैसे होगा? सुशिक्षित बी०ए०, एम०ए० हुए लोग यह काम डर के कारण हाथ में लेते नहीं है, क्योंकि हमको शूद्र कहा जाएगा, हमें निची जाति का समझा जाएगा। इस प्रकार से देश का ऐश्वर्य कैसे बढ़ेगा? ऐश्वर्य के बिना देश की उन्नति कैसे होगी?

हे परमेश्वर! हमारे देश के लोगों को सद्बुद्धि देकर उनके अंतःकरण में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न हो, हम सब मनुष्य सद्गुणी, चिरायु होकर भाईचारे से रहें। दूसरे का दुःख वह अपना दुःख, दूसरे का सुख वही हमारा सुख ऐसा विचार मन में उमड़े। सब लोग मिलकर शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति कर सारे संसार को स्वर्ग बनायेंगे। अंत में कुर्मी क्षत्रियों को धन्यवाद देकर हमारी मनोकामना पूरी करो और हमारी जाति की सभा की दिनों-दिन बढ़ती होवे, ऐसी ईश्वर से प्रार्थना करता हूं।

____________________

[1] राजर्षि शाहू महाराज [जन्म- २६ जून १८७४ ; मृत्यु- ६ मई १९२२] कोल्हापुर नरेश थे। आप वीर छत्रपति शिवाजी के वंशज थे। आप पहले सत्यशोधक समाज के समर्थक थे, लेकिन आर्यसमाज के विचारों से आप इतने प्रभावित हुए कि सन् १९१८ में आपने कोल्हापुर में एक आर्यसमाज मन्दिर भी बनवाया था। आर्यसमाज के प्रचार में आप सदा अग्रणी रहते थे। आपने अपना प्रेरणास्त्रोत स्वामी दयानन्द सरस्वती जी को बताया है। आपके भाषण विचारोत्तेजक होते थे, जिसे सुन श्रोताओं में एक नई ऊर्जा का संचार होता था। निचली जातियों को रोजगार प्रदान करने के लिए सन् १९०६ में आपने 'शाहू छत्रपति बुनाई' और 'स्पिनिंग मिल' शुरू की। डॉ० अम्बेडकर के जीवन-निर्माण में आपका अप्रतिम योगदान है।

[2] निरुक्तकार ने 'वर्णो वृणोति' [२/१/४] के सिद्धान्त की घोषणा करके मनुष्यों को उसके गुण-कर्मानुसार चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र में यथायोग्य वरण होने का अधिकार दिया। इन चार वर्णों में तप, शौच, सत्य, दान, पवित्र, वेदाध्ययन से युक्त, यज्ञकर्त्ता, ज्ञान-विज्ञान में रुचि और निष्कलंक व्यक्ति को ब्राह्मण [ऋ० ७/५६/८, ता० १५/४/८, गीता १८/४२]; बलशाली, यज्ञकर्त्ता, राज्य-व्यवस्था व प्रजा की रक्षा, दिव्यगुण-युक्त, पराक्रमी और दानी व्यक्ति को क्षत्रिय [ऋ० १०/६६/८, महाभारत शांति० १८९/५, गीता १८/४३]; कृषि, पशुपालन, व्यापार, वेदाध्ययन से युक्त और दानी को वैश्य [यजु० ९/४०, मनु० १/९०]; सर्वकर्मपरायण, वेदज्ञान-रहित, अनाचारी, मिथ्यावादी, लोभी, शिल्पकला और परिश्रम करके जीविका चलाने वाले को शूद्र [शतपथ० ३/६/२/१०, महाभारत शांति १८९/८, मनु० १०/१२०] कहा है। वर्ण-व्यवस्था में धर्म-आचरण करने वाला मनुष्य शूद्र से ब्राह्मण तक के वर्ण को और अधर्म-आचरण करने वाला मनुष्य ब्राह्मण से शूद्र तक के वर्ण को प्राप्त होता है [शूद्रो ब्राह्मणतामेति... मनु० ]। ऋषियों का यह पूर्ण विश्वास था कि मानव समाज के लिए इससे सुन्दर और न्यायपूर्ण व्यस्वथा अन्य नहीं हो सकती।

[3] महर्षि दयानन्द सरस्वती जी अपने पाखण्ड-खण्डिनी ग्रन्थ 'सत्यार्थप्रकाश' में लिखते हैं- "वेद पढ़ने-सुनने का अधिकार सब को है। देखो! गार्गी आदि स्त्रियां और छान्दोग्य में जनश्रुति शूद्र ने भी वेद 'रैक्यमुनि' के पास पढ़ा था और यजुर्वेद के २६वें अध्याय के दूसरे मन्त्र में स्पष्ट लिखा है कि वेदों के पढ़ने और सुनने का अधिकार मनुष्यमात्र को है।" [एकादश समुल्लास]
यहां ध्यातव्य है कि ऋग्वेद के ब्राह्मण 'ऐतरेय-ब्राह्मण' के रचयिता 'ऐतरेय' दासीपुत्र थे। कवष, ऐलूष आदि भी दासीपुत्र होने के बावजूद वेदमन्त्रों के प्रचारक हुए। इन प्रमाणों के विरुद्ध जाकर यह प्रचारित करना कि स्त्री या शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है, मनुष्यजाति के पतन का कारण बना।

[4] न्यायदर्शन में आया है- “आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या” [२/२/६७]। इसका अर्थ है कि जिससे जाति के चिन्ह प्रकट होते हैं, वह आकृति है अर्थात् आकृति ही जाति को बतलाती है; जैसे मनुष्य की आकृति को देखकर मनुष्य जाति का ज्ञान होता है और वह व्यक्ति के अंगों की बनावट और उसके स्वरूप से पहचानी जाती है।
जाति का लक्षण बतलाते हुए आगे सूत्रकार कहते हैं- “समानप्रसवात्मिका जाति:”।।६८।। अर्थात् जो भिन्न-भिन्न पदार्थों में समता का भाव है या जिनकी उत्पत्ति (बनावट) एक जैसी हो, वह जाति है और वह आकृति और बनावट की समता जानी जाती है।

•महर्षि पतञ्जलि ने अपने ग्रन्थ 'महाभाष्य' के चतुर्थ अध्याय, प्रथम पाद में जाति का लक्षण विस्तार से बताया है।

[5] महाभारत में पौण्ड्र, पह्लव, शक आदि जातियों के सम्बन्ध में वर्णन मिलता है कि ये लोग ब्राह्मणों के क्रोध से शूद्र हो गए।