Thursday, March 19, 2020

आर्य-जीवन



आर्य-जीवन

लेखक- पं० राजाराम प्रोफेसर
प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ

उठने का समय और पहला कर्तव्य

नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात् पुरोषस:।
यदज: प्रथमं संबभृव स ह तत् स्वराज्य मियाय यस्मान्नन्यत् परमस्ति भृतम्।। -अथर्व० १०/७/३१
सूर्य से पहले और उषा से पहले नाम नाम से उसे बार-बार पुकारे, जो अजन्मा है, (अतएव इस जगत् से) पहले प्रकट है, वह निःसन्देह जगत् प्रसिद्ध स्वराज्य को पाये हुए है, जिससे बढ़कर कोई सत्ता नहीं है।

उषा के फूटने का दृश्य
उषा के पहले उठे हो, तो अब उषा के दृश्य को वैदिक दृष्टि से देखो। वेद में जो दिव्य दृश्य वर्णन किये हैं, वे निरे दृश्य नहीं किन्तु उनमें परमेश्वर की महिमा और उस दृश्य के द्वारा हमारे ऊपर होने वाले उपकार दिखलाना अभिप्रेत होता है, सो तुम इसी रूप में वैदिक दृश्यों को देखो-

इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरागाच्चित्र: प्रकेतो अजनिष्ठ विभ्वा।
यथा प्रसूता सवितु: सवाय एवा रात्र्युषसे योनिमारैक्।। -ऋ० १/११३/१
यह ज्योतियों में श्रेष्ठ ज्योति आई है, यह रंगीला दृश्य (आकाश में) फैलता जा रहा है। जैसे उषा सूर्य की प्रवृत्ति के लिए स्थान छोड़ देती है, वैसे रात्रि ने उषा के लिए स्थान छोड़ दिया है।

इससे आर्यजीवन का यह अंग भी दिखला दिया है, कि एक आर्य को अपना निवास वहां रखना चाहिए, जहां दिव्य दृश्य उसके सम्मुख आते रहें। आजकल के शहरी पर जहां ये दृश्य देखने को नहीं मिलते, आर्यजीवन के विरुद्ध है। इन दृश्यों को देखने से प्रसन्नता बढ़ती है, स्वास्थ्य बढ़ता है, प्रसन्न वदन रहने का स्वभाव बनता है, और ईश्वर की महिमा से पूरित इन दृश्यों को देखने से आत्मबल बढ़ता है, और ये सभी बातें लोक में कार्यसिद्धि का मूल हुआ करती हैं।

पृथूरथो दक्षिणाया अयोज्यैनं देवासो अमृतासोअस्थु:।
कृष्णादुदस्थादर्या विहाया श्चिकित्सन्ती मानुषाय क्षयाय।। -ऋ० १/१२३/१
उषा का विशाल रथ जुड़ गया है, इस पर मरण रहित देवता (किरणें) सवार हुए हैं, रानी उषा मनुष्य समुदाय के लिए चिकित्सा करती हुई काले आकाश से उठ खड़ी है।

इससे बोधन किया है, कि सवेरे उठने वाले नीरोग रहते हैं, और यह, कि तमोमय स्थान रोग का मूल होते हैं, उनकी चिकित्सा यही है, कि वहां खुले प्रकाश के द्वार खोल दो।

गृहं गृहमहना यात्यच्छा दिवे दिवे अधिनामा दधाना।
सिषासन्ती द्योतना शश्वदागादग्र मग्रमित् भजते वसूनाम।। -ऋ० १/१२३/४
उषा दिन पर दिन सवाया रूप धरती हुई घर-घर की ओर जाती है, यह कुछ देना चाहती हुई चमकती हुई सदा आती है, और अपने कोषों में से आगे-आगे बांटती ही जाती है।

श्लाघनीय जीवन यह है, कि मनुष्य का मस्तक सदा खिला रहे, चेहरा चमकता रहे, दूसरों की भलाई की इच्छा उसमें बनी रहे, अपना ऐश्वर्य बढ़ाता रहे, और बांटता रहे।

सह वामेन न उषो व्युच्छा दुहितर्दिव:।
सह द्युम्नेन बृहतो विभावरि राया देवी दास्वती।। -ऋ० १/४८/१
हे उषा हे द्यौ की कन्या हमारे लिए सुहावने मनोरम दृश्य के साथ खिल, हे प्रकाश से भरी हुई बड़े यश, तेज और महत्व के साथ खिल, हे देवि दानशीला बनकर ऐश्वर्य के साथ खिल।

तेरा आगमन हमारे लिए यश, तेज, महत्त्व और ऐश्वर्य का लानेवाला हो, अर्थात् हम इस नए दिन को यश, तेज, महत्त्व और ऐश्वर्य की प्राप्ति से सफल बनावें। ऐसा चिन्तन करने से मनुष्य उद्योगी और धर्मशील बनता है।

उवासोषा उच्छाच्च नु देवी जीरा रथानाम्।
येअस्या आचरणेषु दध्रिरे समुद्रे न श्रवस्यव:।। -ऋ० १/४८/३
उषा अन्धकार को सदा मिटाती आई है, वह अब फिर खिले, यह वह देवी है, जो उनके रथों को आगे बढ़ाते है, जो इसके आने पर सन्नद्ध हो जाते हैं, जैसे धन और यश की कामना वाले समुद्र में (जहाज ले जाने को तैयार होते हैं)।

श्लाघ्य जीवन वह है, जो सदा अन्धकार के मिटाने में प्रवृत्त रहे। जो लोग उषा का प्रकाश आते ही काम करने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं, उनके रथ इस लोक में आगे बढ़ते हैं, अर्थात् जीवन की इस घुड़दौड़ में वही सबसे आगे रहते हैं और दूसरे उसकी पहुंच को नहीं पहुंच सकते, जो इस अमृत बेले सोए पड़े रहते हैं।
"जैसे धन और यश की कामना वाले समुद्र में" इस उपमा से यह दिखलाया है, कि उषा के समय जागने वालों में उत्साह और साहस बढ़ते हैं, उत्साही और साहसी ही धन और यश की कामना से समुद्रों के पार पहुंचते हैं। इससे समुद्र में से, वा समुद्र के पार से धन लाने और यश के झंडे गाड़ने को एक श्लाघ्य कर्म बतलाया है। अतएव यह निःसन्देह है, कि समुद्रयात्रा का निषेध जीवन की इस महिमा को भूल जाने पर हुआ है।
इस प्रकार पुरुष नेत्रों से परमेश्वर की महिमा देखता हुआ और मन में शुभ संकल्प लाता हुआ नए दिन का स्वागत करे।

आरोग्य, बल और आयु
हर एक आर्य का धर्म है, कि अपने शरीर और इन्द्रियों की रक्षा और पालन-पोषण ऐसी सावधानी से करे, कि सदा स्वस्थ रहे, बलवान् और आयुष्मान् हो, और अपने जीवन में इस वैदिक आदर्श को प्रत्यक्ष दिखला सके कि-

वाङम आसन् नसो: प्राणश्चक्षुरक्ष्णो: श्रोत्रं कर्णयो:।
अपलिता: केशा अशोणा दन्ता बहु बाव्होर्बलम्।।१।।
ऊर्वोरोजो जङ्घयोर्जव: पादयो: प्रतिष्ठा।
अरिष्टानि मे सर्वात्मना निश्रृष्ट:।।२।। -अथर्व० १९/६०
मेरे मुख में वाणी है (मुझमें अपने मन के भाव प्रकट करने की शक्ति है, और मुझे अपने भाव प्रकट करने में किसी का भय नहीं है) मेरे नथनों में प्राण है (मैं जीता जागता हूं, अतएव जीवन के लक्षण दिखला सकता हूं) मेरे नेत्रों में दृष्टि है और कानों में श्रुति है (मैं यथार्थ देखता हूं और यथार्थ सुनता हूं) मेरे बाल श्वेत नहीं हैं, मेरे दांत लाल नहीं हैं, (न उनसे रुधिर बहता है न मैले हैं) मेरी भुजाओं में बड़ा बल है।।
मेरी रानों में शक्ति है, और मेरी जंघों में वेग है, मेरे दोनों पाओं में दृढ़ खड़ा होने की शक्ति है (मैं इस जीवन संग्राम में अपने पाओं पर खड़ा हूं, और उठकर खड़ा हूं) मेरे सारे अंग पूर्ण और नीरोग है, मेरा आत्मा परिपक्व है (बलवान् और तेजस्वी) है।

तनूस्तन्वां मे भवेदन्त: सर्वमायु रशीय।
स्योन मासीद पुरु पृणस्व पवमान: स्वर्गे।। -अथर्व० १९/६१
मेरे शरीर के अन्दर फैलने वाली शक्ति हो, मैं पूर्ण आयु भोगूँ। (इसलिए हे मेरे आत्मा) तू स्वर्ग में अपने आपको पवित्र करता हुआ अनुकूल स्थान में बैठ और अपने आपको सर्वांग में पूर्ण बना।

आरोग्य बल और आयु के लिए प्रार्थनाएं (अर्थात् ईश्वर से सहायता मांगना)

तनूपा अग्नेसि तन्वं मे पाह्या युर्दा अग्ने स्यायुर्मे देहि वर्चोदा अग्नेसि वर्चो मे देहि।
अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपृण।। -यजु० ३/१७
हे अग्ने! तू शरीर का रक्षक है, मेरे शरीर की रक्षा कर हे अग्ने! तू आयु का देनेवाला है, मुझे आयु दे, हे अग्ने तू कान्ति का देनेवाला है, मुझे कान्ति दे, हे अग्ने जो मेरे शरीर की ऊनता है, वह मेरी पूर्ण कर दे।

तेजोसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्य मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेहि मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहो सि सहो मयि धेहि। -यजु० १९/९
तू तेज है, मुझमें तेज स्थापन कर। तू शक्ति है, मुझमें शक्ति स्थापन कर। तू बल है, मुझमें बल स्थापन कर। तू ओज (प्रयत्न शक्ति) है, मुझमें ओज स्थापन कर। तू मन्यु है, मुझमें मन्यु स्थापित कर। तू सहनशक्ति है, मुझमें सहनशक्ति स्थापित कर।

सो प्रत्येक आर्य का धर्म है, कि शौच-स्नान, रहन-सहन, खान-पान सब ऐसा रक्खें, जिससे उसका स्वास्थ्य शक्ति और आयु बढ़े। विशेषतः व्यायामशील हो क्योंकि-

लाघवं कर्मसामर्थ्यं विभक्तघनगात्रता।
दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते।।१।।
व्यायाम दृढ़ गात्रस्य व्याधिर्नास्तिकदाचन।
विरुद्धं वा विदग्धं वा भक्तं शीघ्रं विपच्यते।।२।।
भवन्ति शीघ्रं नैतस्य देहे शिथिलतादय:।
नचैनं सहसा क्रम्य जरा समधिरोहति।।३।।
व्यायाम से शरीर हल्का होता है काम करने की शक्ति बढ़ती है, अलग-अलग सारे अंग पीन (पीडे) हो जाते हैं, (कफ आदि) दोष दूर होते हैं, और जठारग्नि बढ़ता है।।१।।
व्यायाम से दृढ़ अंगों वाले को रोग नहीं दबाता, विरुद्ध वा अधकच्चा भोजन भी शीघ्र पच जाता है।।२।।
इससे शरीर में शिथिलता आदि जल्दी नहीं होते, और न बुढ़ापा उसको दबाकर सवार होता है।।३।।

व्यायाम से अभिप्राय शारीरिक परिश्रम के हर एक कार्य से है। निरा दण्ड आदि का ही नाम नहीं। व्यायाम सबसे उत्तम वही है, जो घर के काम काज में होता है, इसलिए घर के काम काज में लज्जा कभी नहीं करनी चाहिए।

बुद्धिबल

यां मेधां देवगणा: पितरश्चोपासते।
तया मामद्यमे धयाऽग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा।। -यजु० ३२/१४
जिस मेधा को देवगण और पितर सेवन करते हैं, उस मेधा से हे अग्ने मुझे मेधावी बना।

चरित्र बल

परिमाग्ने दुश्चरिताद् बाधस्वामा सुचरिते भज।
उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताँ अनु।। -यजु० ४/२८
हे अग्ने मुझे दुश्चरित से सदा बचाते रहो, और सुचरित में सदा चलाते रहो, जिससे कि मैं उच्च जीवन और पवित्र जीवन के साथ देवताओं की ओर उठूं।

[साभार- तपोभूमि मासिक]

राष्ट्रभाषा हिन्दी और देवनागरी लिपि



राष्ट्रभाषा हिन्दी और देवनागरी लिपि

लेखक- डॉ० भवानीलाल भारतीय
प्रस्तोता- प्रियांशु सेठ, डॉ० विवेक आर्य
सहयोगी- डॉ० ब्रजेश गौतमजी

अपने विचारों को दूसरे तक प्रेषित करने में हमें भाषा की आवश्यकता पड़ती है। स्वामी दयानन्द जब धर्म प्रचार के क्षेत्र में आये तब उनके सामने यही समस्या थी कि वे किस भाषा के द्वारा अपने विचारों को अन्यों तक सम्प्रेषित करें। उनकी मातृभाषा गुजराती थी किन्तु उत्तर भारत में उससे विचारों के सम्प्रेषण में सहायता नहीं मिल सकती थी। वे संस्कृत के विद्वान् थे और धारा प्रवाह, अस्खलित वाणी के द्वारा गीर्वाण वाणी में अपने विचारों को अन्यों तक पहुंचा सकते थे। अतः गंगा के तटवर्ती प्रान्तों में जब उन्होंने वैदिक धर्म का उपदेश देने का संकल्प किया तो यह निश्चय कर लिया कि वे संस्कृत में अपनी बात कहेंगे, कथा-प्रवचन सरल संस्कृत में ही किया करेंगे। व्यावहारिक वार्तालाप में भी वे संस्कृत का प्रयोग करते थे। जिन लोगों में उनकी संस्कृत वक्तृता सुनी है वे साक्षी देते रहे कि दयानन्द की संस्कृत इतनी सरल और प्रसाद युक्त होती थी कि सामान्य पठित व्यक्ति को भी उसे समझने में कभी कठिनाई अनुभव नहीं हुई।

भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता (आज का कोलकाता) में जब स्वामीजी लगभग साढ़े तीन मास तक रहे, वार्तालाप तथा व्याख्यान संस्कृत में ही देते रहे। यहां उन्हें नवविधान ब्रह्मसमाज के नेता बाबू केशवचन्द्र सेन ने परामर्श दिया कि अपने विचारों को अधिकतम जनता तक पहुंचाने के लिए हिन्दी में व्याख्यान देना अधिक समीचीन है क्योंकि यह भाषा भारत के जनसाधारण की भाषा है और सर्व सामान्य इसे भलीभांति समझा जाता है। सेन महाशय की यह बात स्वामीजी दयानन्द को औचित्यपूर्ण प्रतीत हुई और कलकत्ता से चल कर जब वे काशी आये तो उन्होंने यहां अपना व्याख्यान हिन्दी में दिया। भाषा को लेकर दयानन्द की दूरदर्शिता इस तथ्य को अनुभव करने में है कि उन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी में ही यह अनुभव कर लिया था कि यदि कोई धर्माचार्य तथा समाज सुधारक भारत के अधिकतम लोगों तक अपनी बात पहुंचाना चाहता है तो उसे हिन्दी का सहारा लेना होगा। स्वामीजी ने न केवल वार्तालाप में अपितु लेखन में हिन्दी को अपनाया। कुछ अपवादों को छोड़कर उनके अधिकांश ग्रन्थ साधु हिन्दी में लिखे गए हैं तथा उनका सुदीर्घ पत्राचार भी हिन्दी में ही है।

भाषा विचाराभिव्यक्ति का माध्यम तो है ही, उसके द्वारा शिक्षण का कार्य भी होता है। मुस्लिम शासन में राजभाषा फारसी रही और आभिजात्य वर्ग के बालक भी फारसी पढ़ते थे। साधारण जनता अपने बच्चों को ग्रामीण पाठशालाओं में भेजती जहां नागरी का अभ्यास कराया जाता। उस समय हिन्दी को उपहास में भाखा (भाषा) कहा जाता और वह पण्डिताऊ बोली, प्रायः अशिक्षित जनों की भाषा समझी जाती थी। स्वयं को रोशन खयाल मानने वाले लोगों में उर्दू-फ़ारसी का चलन था और शीन काफ से दुरुस्त उर्दू बोलने वाले सभ्य और तहजीब वाले माने जाते थे। अंग्रेजी राज्य के आ जाने के बाद राजकार्यों में तथा शिक्षण संस्थानों में अंग्रेजी का चलन बढ़ा और जो वर्ग या प्रदेश अंग्रेजी सीखने में जितना सक्षम सिद्ध हुआ उसे समाज में उतनी ही प्रतिष्ठा तथा शासन के गलियारों में उतना ही सम्मान प्राप्त होने लगा। अब राजकीय शिक्षणालयों में शिक्षण का माध्यम भी अंग्रेजी हो गया और हिन्दी का पठन-पाठन ग्रामीण पाठशालाओं तक सीमित रह गया। इस समय सरकार ने विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम निर्धारित करने के लिए जनता के विचार जानने चाहे और इसके लिए मि० (डाक्टर) हण्टर की अध्यक्षता में एक आयोग स्थापित किया। यह आयोग विभिन्न प्रान्तों में जाकर शिक्षा के माध्यम के विषय में लोगों के विचार जानने लगा जिसके आधार पर आगे चलकर शिक्षा में भाषा विषयक नीति का निर्धारित किया जाना था। जब स्वामीजी को हण्टर कमीशन की नियुक्ति की जानकारी मिली तो उन्होंने विभिन्न आर्यसमाजों को एक परिपत्र भेजकर कहा कि वे हण्टर आयोग के समक्ष गवाही दें तथा प्रार्थना पत्र भेजकर शिक्षा में हिन्दी को समुचित स्थान देने के लिए आग्रह करें। सम्बन्धित परिपत्र में कहा गया था-
"यह बात बहुत उत्तम है क्योंकि अभी कलकत्ते में इस विषय की सभा हो रही है। इसलिए जहां तक बने वहां शीघ्र संस्कृत और मध्यदेश की भाषा के प्रचार के वास्ते, बहुत प्रधान पुरुषों की सही कराके कलकत्ते की सभा में भेज दीजिये और भिजवा दीजिये। और मेरठ और देहरादून से पूर्व समाजों में पत्र इस विषय के शीघ्रतर भेज दीजिये।" दयानन्द सरस्वती (मुम्बई) (भाग २ पृ० ५४७)

शिक्षा के माध्यम के रूप में हिन्दी को स्वीकार कराने के साथ साथ स्वामीजी की यह भी चेष्टा थी कि राजकार्य में हिन्दी की प्रवृत्ति हो। उत्तर भारत की अदालतों में उर्दू-फ़ारसी में काम-काज होता था और सरकार के उच्च दफ्तरों में अंग्रेजी का बोलबाला था। हिन्दी में लिखी किसी अर्जी का अफसरों द्वारा स्वीकार किया जाना कठिन था। स्वामीजी की धारणा थी कि जब तक न्याय के दरवाजे तक पहुंचने में अंग्रेजी या फ़ारसी की अनिवार्यता रहेगी तब तक गरीब लोग तो न्याय से वंचित ही रहेंगे। अतः उन्होंने राजकार्य तथा सरकारी दफ्तरों में हिन्दी के प्रवेश के लिए प्रबल आन्दोलन किया। फर्रूखाबाद आर्यसमाज के लाला कालीचरण रामचरण को १४ अगस्त १८८२ को उदयपुर से लिखे अपने पत्र में वे कहते हैं- "गोरक्षार्थ और आर्य भाषा (हिन्दी) के राजकार्य में प्रवृत्त होने के अर्थ शीघ्र प्रयत्न कीजिये" (भाग २, ६०३)। फर्रुखाबाद के बाबू दुर्गाप्रसाद स्वामीजी के प्रीति पात्र व्यक्तियों में अन्यतम थे। १७ अगस्त १८८२ को उदयपुर से स्वामीजी ने इन्हें जो पत्र लिखा उसमें हिन्दी भषा के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों की चर्चा मुख्यतया की गई थी। स्वामीजी ने लिखा- "आजकल सर्वत्र अपनी आर्यभाषा के राजकार्य में प्रवृत्त होने के अर्थ (भाषा के प्रचारार्थ जो हण्टर कमीशन हुआ है) उसमें पंजाब हाथा आदि से मेमोरियल भेजे गये हैं। परन्तु  मध्य प्रान्त, फर्रूखाबाद, कानपुर, बनारस आदि स्थानों में नहीं भेजे गये, ऐसा ज्ञात हुआ है...इसलिए आपको अति उचित है कि मध्यप्रदेश में सर्वत्र पत्र भेजकर बनारस आदि स्थानों से और जहां जहां परिचय हो सब नगर व ग्रामों से मेमोरियल भिजवाइये। यह काम एक के करने का नहीं है।... जो यह कार्य हुआ तो आशा है कि मुख्य सुधार की नींव पड़ जाएगी।" (भाग २, पृ० ६०५)

रेखांकित वाक्य की महत्ता को समझना आवश्यक है। स्वामीजी की दूरगामी दृष्टि ने यह देख किया था कि यदि भारत की राजभाषा तथा राष्ट्रभाषा हिन्दी हो जाये और व्यवहार में भी सर्वत्र राष्ट्र की इस लोक भाषा का प्रयोग होने लगे तो देश में नवजागृति की लहर उत्पन्न होगी और इससे भविष्य में अनेक सुधार कार्य हो सकेंगे। अतः स्वामीजी ने राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता मिलने को मुख्य सुधार की नींव पड़ना माना है। राष्ट्रभाषा के रूप में आर्य भाषा हिन्दी को स्वीकृति तथा गौरक्षा-स्वामीजी की दृष्टि में "बड़े हर्ष के ये दोनों विषय प्रकाशित हुए हैं।" (उपर्युक्त पत्र में) अत्यन्त भावुक होकर स्वामीजी ने आगे लिखा -"बारम्बार ऐसा निश्चय होता है कि ये दो (आर्य भाषा तथा गौरक्षा) सौभाग्यकारक अंकुर आर्यों (भारतवासियों) के कल्याणार्थ उगे हैं। अब हाथ पसार न लेवें (उपर्युक्त कार्यक्रमों को पूरा न करें) तो इससे (बड़े) दौर्भाग्य (की) दूसरी बात क्या होगी?" (भाग २, पृ० ६०६)

स्वामी दयानन्द ने जहां हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए अपने अनुयायियों को अनेक निर्देश दिए वहां उनकी व्यावहारिक बुद्धि यह स्वीकार करती थी कि समय, सुविधा तथा उपयोगिता की दृष्टि से अन्य भाषाओं को भी सीखना उचित है। आज हम जहां राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा सूत्र (Three Language Formula) को स्वीकार करने की बात करते हैं, स्वामीजी ने तो बहुत पहले ही तीन भाषाओं के ज्ञान की आवश्यकता अनुभव की थी। वैदिक यंत्रालय में वे ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करना चाहते थे जो हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में कार्य कर सके (भाग १, पृ० ४२७)। वे स्वयं अंग्रेजी सीखना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने एक बंगाली बाबू बनमाली को अपने समीप रखा भी था। यह दूसरी बात है कि अपने बहु व्यस्त जीवन तथा विभिन्न कार्य योजनाओं में संलिप्त रहने के कारण वे इस कार्य को गति नहीं दे सके।

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता और सरलता को सभी लिपि-मर्मज्ञों ने स्वीकार किया है। भारत की भाषाओं में हिन्दी, संस्कृत तथा मराठी भाषाएं हिन्दी में लिखी जाती हैं। पड़ौसी देश नेपाल की भाषा ने भी नागरी लिपि को ही स्वीकार किया है। उत्तर भारत में नागरी लिपि का प्रचलन सदा से रहा है। स्वामीजी ने जब वेदभाष्य का लेखन आरम्भ किया तो उसके मुद्रण और ग्राहकों को भेजने की व्यवस्था का केन्द्र मुम्बई था। वहां पहले हरिश्चन्द्र चिन्तामणि और बाद में पं० श्यामजी कृष्ण वर्मा को वेदभाष्य के प्रकाशन तथा वितरण का कार्यभार सौंपा गया। ग्राहकों को वेदभाष्य भेजे जाने वाले लिफाफों पर पते अब तक अंग्रेजी में लिखे जाते थे। स्वामीजी का कहना था कि उत्तर भारत (विशेषतः उत्तरप्रदेश) के गांवों में अंग्रेजी में लिखे इन पतों को पढ़ने वाले पोस्टमेन भी नगण्य ही हैं, इसलिए यह उचित होगा कि लिफाफों पर ग्राहकों के पते देवनागरी में लिखे जायें। ६ अक्टूबर १८७८ को दिल्ली से लिखे गये और श्यामजी कृष्ण वर्मा को सम्बोधित पत्र में स्वामीजी ने उक्त निर्देश दिया- "अबकी बार भी वेद भाष्य के लिफाफे के ऊपर देवनागरी नहीं लिखी गई। जो कहीं ग्राम में अंग्रेजी पढ़ा न होगा तो अंक वहां कैसे पहुंचते होंगे और ग्रामों में देवनागरी पढ़े बहुत होते हैं इसलिए तुम बाबू हरिश्चन्द्र चिन्तामणि से कहो कि अभी इस पत्र को देखते ही देवनागरी जानने वाला मुन्शी रख लेवें" (भाग १, पृ० २३१)। वैदिक यंत्रालय के प्रसंग में हम यह बता चुके हैं कि स्वामीजी वेद भाष्य प्रकाशन के प्रभारी हरिश्चन्द्र चिन्तामणि के काम से सन्तुष्ट नहीं थे। उक्त पत्र लिखने के एक सप्ताह बाद १४ अक्टूबर १८७८ को उन्होंने एक अन्य पत्र पुनः श्यामजी को भेजा और ताकीद की कि "वेद भाष्य के काम का तुम ही प्रबन्ध करो...वा किसी देवनागरी वाले को वहां रखा दो क्योंकि बाबू हरिश्चन्द्र चिन्तामणि जी अंग्रेजी में भी लिखते हैं तो भी छेदीलाल को शादीलाल लिख देते हैं।" (भाग १, पृ० ३१५)

स्वामीजी के इस कथन से जाना जाता है कि हरिश्चन्द्र चिन्तामणि को अच्छी अंग्रेजी भी नहीं आती थी।
समग्रतः यह कहा जा सकता है कि दयानन्द की यह दूरदर्शिता और भविष्य को देखने की शक्ति ही थी जिसके कारण वे अनुभव कर सके कि राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपनाकर ही भारत को एकता के सूत्र में पिरोया जा सकता है। देशवासियों में एकात्मता बोध तथा राष्ट्रीय अस्मिता को जगाने में आर्यभाषा हिन्दी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है तथा देवनागरी लिपि की लोकप्रियता तथा वैज्ञानिकता किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं रखती, यह उनका दृढ़ विश्वास था।

स्वामी दयानन्द की भाषा विषयक व्यावहारिक दृष्टि
भारत की सांस्कृतिक भाषा संस्कृत तथा लोक भाषा हिन्दी के प्रचार के इच्छुक होने पर भी स्वामी दयानन्द ने व्यावहारिक उपयोगिता की दृष्टि से तत्कालीन राजभाषा अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओं को सीखने की संस्तुति की थी। जब लाहौर आर्यसमाज से एक अंग्रेजी समाचारपत्र निकालने का निश्चय हुआ तो स्वामीजी ने इसकी आवश्यकता बताते हुए फर्रूखाबाद के लाला कालीचरण रामचरण को १२ मई १८८१ के पत्र में अजमेर से लिखा- "आर्यसमाज लाहौर से एक अखबार अंग्रेजी भाषा में जारी होने वाला है। इससे यह अभिप्राय है कि उसके द्वारा वेदोक्त आर्य धर्म तथा आर्यसमाजों की कार्यवाही राज प्रधान अंग्रेजों को भी विदित होती रहेगी। वरन् विलायत वालों पर भी प्रकट होता रहेगा।...इससे तुम्हारे (अर्थात् आर्यों के) धर्म तथा आर्यसमाजों की कार्यवाही का ठीक-ठीक वृतान्त गवर्नमेन्ट तथा सम्पूर्ण अंग्रेजों को विदित भी होता रहेगा, जिससे अनेक अच्छे लाभों की आशा हो सकती है। और अनुमान होता है कि यह पत्र विलायत के बड़े-बड़े ठिकानों में पहुंचेगा।" (भाग २, पृ० ५००)

इसी प्रकार जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह को प्रेषित उपदेश पत्र में उन्होंने महाराज कुमार (सरदारसिंह) को देवनागरी (हिन्दी) तथा संस्कृत पढ़ाने का निर्देश देने के पश्चात् लिखा- यदि समय हो तो अंग्रेजी भी, जो कि ग्रामर और फिलासफी के ग्रन्थ हैं, पढ़ने चाहिए। (भाग २, पृ० ७८१)

खेद है कि दयानन्द द्वारा निर्दिष्ट राजभाषा-राष्ट्रभाषा विषयक नीति को सिद्धान्ततः तो देश ने स्वीकार किया किन्तु उसका अनुपालन नहीं हो सका।

पाद टिप्पणियां:
१. नगेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय लिखित बंगला पुस्तक 'महात्मा दयानन्द'। नेशनल लाइब्रेरी कोलकाता में इसकी एक दुर्लभ प्रति विद्यमान है।

२. द्रष्टव्य- नवजागरण के पुरोधा- दयानन्द सरस्वती पृ० २१० अभी तक हिन्दी में व्याख्यान देने का पूरा अभ्यास नहीं हो सका था इसलिए बोलते-बोलते वे अनेक वाक्य संस्कृत के बीच में बोल जाते थे।

३. स्वामी दयानन्द की हिन्दी को देन विषय पर द्रष्टव्य- महर्षि दयानन्द की हिन्दी भाषा और साहित्य को देन (शोध ग्रन्थ) डॉ० मंजुलता विद्यार्थी

४. पत्र में प्रयुक्त 'मध्यदेश' पर पं० युद्धिष्ठिर मीमांसक की निम्न टिप्पणी पठनीय है- "मध्यदेश से यहां यमुना के पूर्वी तट से लेकर वाराणसी तक का प्रदेश जानना चाहिए। प्राचीन परिभाषा के अनुसार सरस्वती नदी से प्रयाग तक तथा हिमालय और विन्ध्याचल के मध्य का देश 'मध्यदेश' कहलाता था।" द्रष्टव्य मनु० २/३४

५. स्वामीजी के आदेश की अनुपालना में लगभग दो सौ प्रार्थना पत्र (Memorial) उक्त हण्टर कमीशन को भेजे गये थे। आर्यसमाज मेरठ की ओर से जो मेमोरियल हण्टर साहब को दिया गया, उसकी प्रतिलिपि ऋषि दयानन्द के पत्र व्यवहार के परिशिष्ट (युद्धिष्ठिर मीमांसक द्वारा सम्पादित १९५८ में प्रकाशित) में पृ० २२-२६ पर छपी है। इसी प्रकार कानपुर निवासियों ने पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध (आज का उत्तरप्रदेश) के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एल्फ्रेड कामिन्स को हिन्दी एवं नागरी को अदालतों में स्थान देने विषयक जो निवेदन पत्र प्रेषित किया था उसकी प्रतिलिपि भी उक्त ग्रन्थ में (पृ० २७-३०) है।

६. लखनऊ के दूसरी बार के प्रवास में उन्होंने अंग्रेजी सीखने का प्रयास किया था। द्रष्टव्य- नवजागरण के पुरोधा : दयानन्द सरस्वती, पृ० २७५

[स्त्रोत- स्वामी दयानन्द सरस्वती के पत्र-व्यवहार का विश्लेषणात्मक अध्ययन]

ऋषि दयानन्द का भक्तिवाद



ऋषि दयानन्द का भक्तिवाद

-स्मृतिशेष डॉ० भवानीलाल भारतीय

ऋषि दयानन्द के धार्मिक तथा सामाजिक सुधार कार्य में अधिक समय रहने तथा उनके राष्ट्रीय जागरण के प्रथम पुरोधा होने के कारण अनेक लोगों में यही धारणा बन गई है कि भारत की आध्यात्मिक चेतना को जगाने तथा भगवत् भक्ति के प्रसार में उनका योगदान अल्प है। ऐसा विचार उन लोगों का है जिन्होंने दयानन्द का सूक्ष्म अध्ययन नहीं किया। गहराई से देखें तो पता चलता है कि दयानन्द का गृहत्याग और संन्यास ग्रहण जिस विशिष्ट लक्ष्य को ध्यान में रखकर हुआ था, उसके पीछे अध्यात्म ज्ञान को प्राप्त करने की उनकी तीव्र ललक ही थी। शिवरात्रि-प्रसंग से उन्होंने सीखा कि निखिल विश्व ब्रह्माण्ड का नियन्त्रण करने वाली सत्ता जड़ नहीं हो सकती। वह कल्याणकारी शिव कौन है? तथा कैसा है जिसकी वंदना वेदों में अनेकत्र मिलती है? अपने घर में घटित हुए मृत्यु प्रसंगों ने उन्हें जिन्दगी और मौत के रहस्य को जानने की प्रेरणा दी। संन्यास ग्रहण करने के पश्चात् उन्होंने अपने योग गुरुओं से उस 'राजयोग' का प्रशिक्षण प्राप्त किया जो समाधि सिद्धपूर्वक परमात्मा का साक्षात्कार कराता है। भावी जीवन में परम देव परमात्मा के प्रति उनका प्रणत भाव सदा रहा। अपने महान् कार्यों की पूर्ति में उन्होंने परमात्मा देव की सहायता की याचना की और आजीवन एक आस्तिक भक्ति का जीवन बिताकर अपने आराध्य के प्रति स्वयं को अपर्ण कर दिया। स्वामीजी की धारणा थी कि धर्म, समाज और राष्ट्र को समुन्नत करने का जो महद् अभियान उन्होंने चलाया है उसमें परमात्मा की प्रेरणा तथा सहायता ही सर्वोपरि रही है। वे परमात्मा के अनन्य उपासक थे। समर्पण भाव को लेकर जगन्नाथ के सूत्रधार के सम्मुख आने वाले से एक ऐसे विनम्र सेवक थे जिन्होंने अत्यन्त भाव प्रवण होकर अपने आराध्य देव से कहा था- "आपका तो स्वभाव ही है कि अंगीकृत को कभी नहीं छोड़ते।" शास्त्रार्थ समर में उतरने से पहले दयानन्द दीर्घकाल तक परमात्मा की उपासना करते थे, मानों अपने आराध्य से सत्य पक्ष की विजय दिलाने की प्रार्थना करते हो। लोकहित के अपने सभी कार्यों और अनुष्ठानों में वे परमात्मा को अपना परम सहायक मानते थे।

छः दर्शन शास्त्रों की तर्ज पर कालान्तर में नारद और शाण्डिल्य के नाम से भक्ति सूत्र रचे गए। उनमें सूत्र शैली से भक्ति तथा उसके आनुषंगिक प्रसंगों की विस्तृत मीमांसा प्रस्तुत की गई है। आचार्य शाण्डिल्य ने भक्ति को इस प्रकार परिभाषित किया है- या परा अनुरक्ति: ईश्वरे सा भक्ति:। अर्थात् परमात्मा के प्रति पराकोटि की अनुरक्ति (प्रेम) ही भक्ति है। इन ग्रन्थों में नवधा भक्ति का जो उल्लेख मिलता है उससे अनुमान होता है कि भक्ति सूत्रों की रचना उस युग में हुई थी जब पौराणिक मत का प्रचलन हो चुका था तथा जनता में प्रतिमा पूजन, अवतारवाद आदि की धारणाएं चल पड़ी थीं। इन ग्रन्थों में बृज गोपिकाओं के आदि के सन्दर्भ दिए गए हैं, वे इन्हें पुराणों के परवर्ती काल का होना बताते हैं।
ऋषि दयानन्द के परमात्मा की भक्ति और व्यक्ति का मनोनिवेश करने वाला एक ग्रन्थ लिखा था 'आर्याभिविनय' उनका विचार था चारों वेद संहिताओं में प्रत्येक से न्यून से न्यून पचास मन्त्रों को लेकर उनकी भगवत्भक्ति से ओतप्रोत भावपूर्ण व्याख्या की जाये। इस ग्रन्थ में प्रथम तथा द्वितीय प्रकाश (ऋग्वेद के ५३ तथा यजुर्वेद की ५५ मन्त्र युक्त) लिखे गए तथा छपे। अवशिष्ठ साम तथा अथर्ववेद के विनय प्रधान मन्त्रों की परमात्मा की स्तुति है या प्रार्थना, इसका संकेत वे मन्त्रारम्भ में कर देते हैं। ग्रन्थारम्भ के स्वरचित श्लोकों में दयानन्द ने परमात्मा की भावपूर्ण स्तुति की है।

सर्वात्मा सच्चिदानन्दोऽनन्तो यो न्यायकृच्छुचि:। भूयात्तमां सहायो नो दयालु: सर्वशक्तिमान्।
अर्थात् जो परमात्मा सबका आत्मा, सत्, चित्, आनन्दस्वरूप, अनन्त, अज, न्याय करनेवाला, निर्मल, सदा पवित्र, दयालु, सब सामर्थ्य वाला, हमारा इष्टदेव है, वह हमको सहाय नित्य होवे।

साथ ही इन श्लोकों में वे यह संकेत देते हैं कि समस्त लोगों के हित तथा परमात्मा के ज्ञान के लिए वे मूल मन्त्रों के साथ-साथ उनको लोक-भाषा में व्याख्यान जन साधारण को बोध कराने के लिए दे रहे हैं। दयानन्द की सम्मति में जो ब्रह्मविमल, सुखकारण, पूर्णकाम, तृप्त, जगत् में व्याप्त है वही वेदों से प्राप्य है। जिसके मन में इस ब्रह्म की प्रकटता (यथार्थ ज्ञान) है, वही मनुष्य ईश्वर का आनन्द का भागी है और वही सदैव सबसे अधिक सुखी है। ऐसे मनुष्य को धन्य मानना चाहिए। इन प्रास्वाविक श्लोकों से हमें दयानन्द के भक्तिवाद को समझने में सहायता मिलती है।

आर्याभिविनयम् की रचना केवल ईश्वर भक्ति में लोगों को नियोजन करने के लिए ही की गई हो, ऐसी बात नहीं है। दयानन्द मध्यकाल के अनेक भक्तों की भांति लोगों को भाग्यवाद तथा पुरुषार्थहीनता का पाठ पढ़ाने वाले नहीं थे। यही कारण है कि आर्याभिविनय में एक और प्रभुभक्ति तथा अपने आराध्य के प्रति समर्पण की भावना दिखाई पड़ती है। तो साथ ही उस- 'राजाधिराज परमात्मा' से स्वराज्य तथा आर्यों (सत्पुरुषों) के अखण्ड चक्रवर्ती साम्राज्य की याचना भी की गई है। परमात्मा के प्रति दयानन्द की अनन्य प्रीति को देखना चाहें तो इस ग्रन्थ में सर्वप्रथम व्याख्यात ऋग्वेद के मन्त्र 'शं नो मित्र: शं वरुण:' की व्याख्या के आरम्भ में परमात्मा के प्रति किए गए सम्बोधनों की छटा को देखें। यहां न्यूनातिन्यून २७ सम्बोधनों से दयानन्द ने अपने आराध्य परमात्मा देव को सम्बोधित किया है। इसमें से अनेक सम्बोधनों में अनुप्रास प्रधान शब्दों का सौन्दर्य दर्शनीय है। यथा- विश्वविनोदक, विनियविधीप्रद, विश्वासविलासक तथा निर्मल, निर्सह, निरामय, निरुप्रदव आदि एक ओर यदि परमात्मा को 'सज्जन सुखद' कहा तो साथ ही उसे 'दुष्ट सुताड़न' कहना भी वे नहीं भूले। दयानन्द की दृष्टि में परमात्मा चतुर्विध पुरुषार्थ के प्रदाता हैं- वे यदि धर्म सुप्रापक हैं तो अर्थ-सुधारक तथा सुकामवर्द्धक भी हैं। मोक्ष प्रदाता तो वे हैं ही- यदि वे 'राज्य विधायक' हैं तो 'शत्रु विनाशक' भी हैं। वस्तुतः इस ग्रन्थ को लिखकर दयानन्द ने भारत के भक्ति सिद्धान्तों में एक नूतन क्रान्ति की थी, अतः दयानन्द के भक्तिवाद का तात्त्विक अध्ययन अपेक्षित हैं।

इस ग्रन्थ के अन्य मन्त्रों के व्याख्यानों में उन्होंने परमात्मा के लिए जो सम्बोधन सूचक शब्द लिखे हैं, वे भी व्यंजनापूर्ण हैं। जब वे परमात्मा को 'महाराजाधिराज परमेश्वर' कहकर सम्बोधित करते हैं तो उनकी प्रार्थना होती है- 'हमको साम्राज्याधिकारी सद्द: कीजिए'। उनकी विनय है कि हम सुनीतियुक्त हों जिससे कि हमारा स्वराज्य अत्यन्त बढ़े (प्रार्थना सं० १७)। 'वय' जयेम त्वया युजा' (ऋ० १/१०२/४) मन्त्र की व्याख्या के आरम्भ में उन्होंने परमात्मा को 'महाधनेश्वर' (मधवन्) तथा 'महाराजा धिराजेश्वर' कहकर पुकारा तथा उसने चक्रवर्ती राज्य और साम्राज्य (रूपी) धन को प्राप्त कराने की प्रार्थना की। यह ईश्वरभक्त दयानन्द ही है जो परमात्मा से आर्यों के अखण्ड भी विनय करता है कि 'अन्य देशवासी' राजा हमारे देश में कभी न हों तथा हम लोग पराधीन कभी न हों। (यजुर्वेद के मन्त्र ३७/१४ 'इषे पिन्वस्व ऊर्जे पिन्वस्व' की व्याख्या में) सामान्यतया भक्त अपने आराध्य से सुख, सौभाग्य, आरोग्य, धन-धान्य, कीर्ति, ऐश्वर्य आदि की याचना करता है। दयानन्द ने अपने परमात्मा से देश के लिए स्वराज्य तथा शिष्टजनों (आर्यों) के साम्राज्य की याचना के प्रति जो सम्बोधन शब्द प्रयोग किये हैं वे भी विशिष्ट अर्थवता लिये हैं। शतक्रतों (अनन्त कार्येश्वर), महाराजाधिराज परमेश्वर, सौख्य-सौख्य-प्रदेश्वर, सर्वविद्ययम आदि। वस्तुतः अनन्त गुणों वाले परमात्मा के सम्बोधन भी अनन्त ही होंगे।

परमात्मा की भक्ति दिखाने की वस्तु नहीं है। मध्यकाल में मूर्तिपूजा, नाम जप, तिलक, कण्ठी-छाप आदि साम्प्रदायिक प्रतीकों के धारण को भक्ति का साधन माना गया था। दयानन्द की सम्मति में परमात्मा के विविध गुणों के वाचक शब्दों के उल्लेखपूर्वक उस परम सत्ता को नमन करना ही उसकी भक्ति का उत्कृष्ट रूप है। यदि हम उनके द्वारा रचित ग्रन्थों के आरम्भ के मंगलसूचक वाक्यों को देखें तो ज्ञान होगा कि स्वामीजी के लिए परमात्मा क्या है? और कैसा है? यहां कुछ ऐसे ही ग्रन्थारम्भ में लिखे गए नमस्कार विषयक वाक्य दिए जा रहे हैं। जो दयानन्द की दृष्टि में परमात्मा के स्वरूप तथा गुणों के ज्ञापक हैं-

१. ओ३म् सच्चिदानन्देश्वराय नमो नम: -सत्यार्थप्रकाश
२. ओ३म् तत्सत्परब्रह्मणे नम: -आर्याभिविनय
३. ओ३म् ब्रह्मात्मे नम: -वर्णोच्चारण शिक्षा
४. ओ३म् खम्ब्रह्मा -काशी शास्त्रार्थ
५. ओ३म् खम्ब्रह्मा -सत्यधर्म विचार
६. गोकरुणानिधि में परमात्मा का स्मरण इस प्रकार किया गया है। 'ओ३म् नमो विश्वम्भराय जगदीश्वराय' इसमें दयानन्द का भाव यह है कि जो विश्वभर में है वही तो गो आदि उपयोगी प्राणियों का भरण-पोषण करने का भी सामर्थ्य रखता है। जो ईश्वर सर्वशक्तिमान् है उसमें गौ आदि की रक्षा करने का भी सामर्थ्य है।
७. ओ३म् नमो निर्भ्रमाय जगदीश्वराय -अनुभ्रामोच्छेदन
वेद के निर्भ्रान्त ज्ञान को देनेवाला परमात्मा स्वयं निर्भ्रम है। ऐसे सार्थक नमस्कार वाक्य लेखन की परमात्मा के प्रति सच्ची भक्ति दर्शाते हैं।

[स्त्रोत- आर्य जगत् : आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा का साप्ताहिक पत्र का ८-१४ मार्च, २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Wednesday, March 18, 2020

द्वेषरूपी महानद से पार होवो



द्वेषरूपी महानद से पार होवो

लेखक- पं० युद्धिष्ठिर मीमांसक
प्रेषक- प्रियांशु सेठ

द्विषो नो विश्वतोमुखाति नावेव पारय।
अप न: शोशुचदघम्।। -अथर्व० ४/३३/७

हे (विश्वतोमुख) सब ओर मुखवाले परमात्मन्! (इव) जैसे नौका चलानेवाला नाविक (नावा) नौका द्वारा यात्रियों को सुखपूर्वक नदी के पार उतारता है, वैसे ही आप (न:) हमको (द्विष:) द्वेषरूपी महानद के (अति पारय) पार उतारिये। हे प्रभो! आपकी कृपा से (न:) हमारा (अघम्) पाप हमसे (अप) दूर होकर (शोशुचत्) नष्ट हो जावे।

इस मन्त्र में द्वेष-नद से पार उतरने और पापों से बचने का उपदेश किया है। परमात्मा को इस मन्त्र में 'विश्वतोमुख' (सब ओर मुखवाला) नाम से स्मरण किया गया है। मुख शब्द से यहां गर्दन के ऊपर का भाग अभिप्रेत है। इस भाग में मुख्यतया आंख, कान और जिह्वा ये तीन इन्द्रियां अपना कार्य करती हैं। इनका कार्य यथाक्रम देखना, सुनना और उपदेश देना है। अतः 'विश्वतोमुख' शब्द का अर्थ सब ओर देखनेवाला, सब ओर सुननेवाला, तथा सब ओर उपदेश देनेवाला है। अर्थात् परमेश्वर सर्वत्र एकरस व्याप्त होकर सब प्राणियों के शुभाशुभ कर्मों को जानता तथा उनको बुरे कर्मों से बचने का उपदेश देता है। जो व्यक्ति यह अनुभव करता है कि सर्वव्यापक प्रभु मेरे सब कर्मों को जानते हैं, उनसे छिपकर मैं कहीं कोई दुष्कर्म नहीं कर सकता, वह सब प्रकार के पापों से बच जाता है।

संसार में अनेक ऐसे अवसर आते हैं कि जिनमें कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्धारण करना अत्यन्त कठिन होता है। उस समय सबके अन्तर्यामी भगवान् प्रत्येक पुरुष के हृदयाकाश में उपदेश करते हैं कि तुझे यह कार्य करना चाहिए, और यह नहीं करना चाहिए। जो पुरुष प्रभु की इस अन्तर्ध्वनि पर ध्यान देकर तदनुसार आचरण करते हैं, वह सर्वदा पापों से बचे रहते हैं। अतः पापों से बचने के लिए इस मन्त्र में 'सर्वतोमुख' प्रभु से ही प्रार्थना की है।

द्वेष जहां स्वतन्त्र एक महापाप है, वहां यह अनेक महापापों का मूलकारण भी है। द्वेष के आधीन होकर मनुष्य इस संसार में अनेक प्रकार के अकर्तव्यों को कर डालता है। अतएव इस मन्त्र में मुख्यतया द्वेषरूपी महानद से पार होने के लिए प्रभु से प्रार्थना की है। जो पुरुष जगदीश्वर को वस्तुतः 'विश्वतोमुख' समझते हैं, वे कभी संसार में पाप कर्मों से युक्त नहीं होते।

Tuesday, March 17, 2020

आर्यो सावधान





आर्यो सावधान


प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु।

प्रियं सर्वस्य पश्यत उतशूद्र उतार्ये।। (अथर्ववेद 19-62-1)


मुझे ब्राह्मण का प्रिय कर, मुझे क्षत्रीय का प्रिय कर, मुझे सब का प्रिय कर, शूद्र, वैश्य तक का प्रिय कर।


पावमानी, कल्याणी वाणी वेद हमे सब के प्रिय होने की प्रेरणा देती है। वैदिक सिद्धान्त, राष्ट्र की अभिव्यक्ति के आधार आचार और विचार को ही मानते है। आचार का नियन्त्रक राजसत्ता को प्रतिपादित कर वेद ने विचार की स्वतन्त्रता का नियामक ब्राह्मण(विद्वान) को रखा है। अतः प्रत्येक मनुष्य विचार स्वतन्त्रता का केन्द्र होने पर विद्वत विमर्श के वृत से बाहिर नही जा सकता, तथा तर्क विनीमय की शास्त्र परम्परा से सिद्ध होने पर ही सर्वमान्य विचार के रूप मे स्वीकृत होता है। वेद का पुरूष सूक्त इस सामाजिक उत्कृष्टा के प्रयत्न और प्राप्ति का साधन है।

भारत भूमि सदैव इस आर्य परम्परा का निर्वाहन करती रही है। इस कारण भारत में विभिन्न मत, पंत, सम्प्रदाय और समुदायों का अस्तित्व आज पर्यन्त बना हुआ है। वो मज़हबी समूह जो अपनी पितृभूमि से तिरस्कृत हो निर्वासन की त्रासदी भोगने के अनन्तर लुप्त अवस्था को प्राप्त हुए थे, ने भी भारत को मातृभूमि के रुप मे स्वीकार किया ओर अपने मज़बही अस्तित्व के उन्मूलन से बचे रहे।

वो मत जिन्होने जड़ प्रकृति को सब कुछ माना व ब्रह्म को नकारा तथा वो मत जो केवल ब्रह्म को ही सत्य मानते है व प्रकृति को नकारते है, हजारों वर्षों से सहचरी है। चारवाक जैसा तामसी लिप्सा से पूरित विचार भी अपने मत को प्रचारित करने हेतु कभी भौतिक रूप से बाधित नही हुआ, केवल और केवल ऋषि प्रणीत तर्क तूला का आवलम्बन, शास्त्रार्थ विधि ही इन मतों के प्रचार में बाधक बनी। राजसत्ता ने कभी अपनी सीमा का अतिक्रमण नही किया।

किन्तु कालान्तर में, सम्भवतः बौद्ध मत के युगपत्, ब्राह्मण वृत्ति ह्रास की समयातित सीमा लांघ चुकी थी, और विचार की स्वतन्त्रता के रुप में जो शेष था वो केवल कोरे दर्शन के नाम पर प्रचलित शून्यभाव मिथक की एकाकि अतिवादिता, जिसने देश को अकर्मण्य जडता की अन्धी गली में छोड दिया। परिणामतः यदा देश पर सेमैटिक मतों से प्रेरित. विस्तारवादी राजसत्ता ने अपनी कुटिल, विभत्स प्रवर्तियों के साथ आक्रमण किया तदा हमारे तथाकथित मतवादी विद्वानों ने “घडे में थाली ढूढ़ने” के उपक्रम मे लग कर क्षत्रीय तेज को भी पराभूत होने पर विवश कर दिया।

ग्यारवीं सदी से आरम्भ होकर आज पर्यन्त इस अकर्मण्यता का रोग छुटाये नही छूट रहा। देश पुन: इस्लामी जेहाद, ईसाई मिश्नरीयों तथा इन सब के प्रेरक सुह्रद्, वामपंथी गठजोड़ की कुटिल नीति से विभाजन के मुहाने पर है।

जिस आर्य समाज ने अपना सर्वस्व स्वतन्त्रा आन्दोलन में स्वाहा कर दिया, हैदराबाद सत्याग्रह में जिसके गुरूकुलों के निह्त्थे ब्रह्मचारीयों ने राष्ट्र रक्षण में अपने जीवन को दांव पर लगा निजाम की चूले हिला दी, आज उसी आर्य समाज के बलीदान का मातम दिल्ली, अलीगढ़, मुम्बई आदी देश के मार्गों पर देखने को मिल रहा हे।

जब JNU, AMU, जामिया मिलिया आदि विश्विद्यालयों में तथा शाहीन बाग में, राम प्रसाद बिस्मिल की प्रतिकृति लिए छात्रों व प्रदर्शनकारीयों के समूह नारे लगाते हैं तब स्वामी स्वतन्त्रानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, प.लेखराम के त्यागमयी जीवन के अर्थ गौंण लगने लगते है। हिन्दु चेतना सुप्त प्राय है, प्रश्न कोई नहीं कर रहा किः-


 क्या तकिय(मुस्लिम टोपी) पहने जामिया के युवक, बुर्के में आजादी का संघर्ष करती युवतियाँ, इस पहेली को सुलझा सकती हैं, कि कैसे महर्षि दयानन्द के अनन्य भक्त, राम प्रसाद बिस्मिल इनके अनुप्रेरक हो गए हैं?

 क्या हिन्दु मुस्लिम-एकता के सूत्र रूप में दयानन्द प्रणीत “सत्यार्थ प्रकाश” उनके भविष्य के भारत की कल्पना का आधार है?

 क्या सत्यार्थ प्रकाश के चौदहवाँ सम्मुल्लास में महान् वैज्ञानिक महर्षि दयानन्द के द्वारा की गयी कुर्आन की सत्य समिक्षा इनका आदर्श है?


यदि नहीं तो, राम प्रसाद बिस्मिल के चित्रों को लेकर घूमना, क्या 1919-21 के तुर्की के ख़लीफ़ा के अपदस्थ होने पर, उस को पुनः स्थापित करने के लिए मुस्लिमों के द्वारा चलाए गए खिलाफत आंदोलन की पुनरुक्ति नहीं है?

आज जिस आन्दोलन की विषबेल को वामपंथ व तथाकथित विश्वविद्यालयों का कामपंथ संरक्षण दे रहा है, वैसे ही मोहन दास करमचन्द गांधी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन दे कर भारत विभाजन के इस्लामी उन्माद को जन्म दिया था। इस्लामी जेहाद की जिस कल्पना का स्वरुप 1883-1887 के कालखंड में, अलीगढ़ के संस्थापक सर सैय्यद अहमद ने निर्धारित किया था तथा हिन्दु ओर मुसलमान को दो अलग राष्ट्र माना था। उसी की परिणिती मोहन दास करमचन्द गांधी की हिन्दु मुस्लिम एकता की मृगमरिचिका ने खिलाफत के समर्थन के द्वारा साकार कर दी थी। इस मृगमरिचिका का मृग, हिन्दु मनस बना था।

वीर सावरकर, 1936 से अनवरत भारत को गांधी ओर नेहरु के प्रति सचेत करते रहे। अनेक अवसरों पर सावरकर ने सावधान किया कि गांधी व नेहरु भारत को बंटवा कर मानेंगे। आर्य मनिषा से उदिप्त प.चमूपति ने गांधी की पगे-पगे पोल खोल की.....

......परन्तु हाय दुर्दैव! हिन्दु मुस्लिम एकता की मरुभूमि में भटकता हिन्दु ह्रदय, हिरन बन गांधी रुपी सुखे कुएँ की आस में बैठा रह। 1946 में कलकत्ता के DIRECT ACTION DAY के जेहादी कुएँ की वेदी पर माताओं, बहनों और अवयस्क बेटियों की लुटती लाज भी, उसको कुर्आन की सूरे तौबा की आयातों के महफुम को न समझा सकी थी, तब प.चमूपति और सावरकर की योग्यता क्या थी .......?

जब भारत के वीर त्रास्ता, जवाहर लाल नेहरु, TRANSFER OF POWER के सोमपान से उन्मत्त, 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्री को TRYST WITH DESTINY की, आर्य माताओं की तार-तार हुयी आबरु मे डूबी, कविता गुन-गुना रहे थे, तब गांधी की हिन्दु-मुस्लिम एकता की मृगमरिचिका में प्यासा भटकता हिन्दु, मुस्लिमों के जेहादी कर्म का कृपा पात्र बन, अपने जिब़ाह किये जा रहे पुत्रों के रक्त व माले गनीमत बन कर लाहौर की सड़को पर छितरी माँ-बहनों की लाशों से मजहबी एकता की पिपासा को शान्त कर रहा था। पश्चिम पंजाब में आकाश को व्याप्त करता “लड़कर लिया है पाकिस्तान, हंस के लेगें हिन्दुस्तान” का उद्घोष गांधी-नेहरु के विजय पथ के पल्लवित सुमन थे।

..... भारत विभाजन जेहाद से जन्नत प्राप्ति का सुगम आदर्श था, गांधी-नेहरु द्वयम का पराक्रम उसकी स्तुती थी..............

किन्तु विचक्षण प्रतिभा के धनी नेहरु का अश्वमेघ कब थमने वाला था। पंचशील की, बईबल के आदर्शों के मधुदाख रस में आद्रित आयातों की किताब लिए, नेहरु साहेब मिश्र से लेकर कोरीया, चीन से लेकर रुस तक की सीमाओं पर याज्ञिक पुरूषार्थ की उन्नत अवस्था का मानदण्ड प्रतिस्थापित करने मे लगे थे। वीर सावरकर अपने संस्कारों के वशीभूत देश को चीन के प्रति सावधान करते है, देश रक्षण हेतु सैनिकीकरण की आवश्यकता बतातें हैं। परन्तु हिन्दु-सम-राख नेहरु नहीं रूकता। पंचशील के अश्वमेघ का घोड़ा, 1955 में तिब्बत में अपृहत् होता है और 1961 में चीन पंचशील के दाखरस से प्रेरित हो सैन्य अभियान कर, भारत की हजारों एकड़ भूमि का प्रसाद ले मदमाता चल देता है।

किन्तु, क्या हिन्दु कहलाने वाले मनस ने अपने इतिहास से कुछ सीखा..क्या हिन्दु रक्षक बने संगठनों ने सहस्राब्धी ले चली हो रही दुर्गति का अवलोकन कर निराकरणार्थ कुछ किया ?

उत्तर........नहीं....किया !

वर्तमान के राजनैतिक दृश्य, विचार और घटनाक्रम हमारे इस मन्तव्य की पुष्टी करते है।

जब बुर्के को सुशोभित करती मुहम्मदी प्रेरणा से संचारित, जामिया शिक्षित बलाओं के साथ कन्धे से कन्धा मिलाती हिन्दु पठित अबलाओं के हाथों में डा. अम्बेडकर के चित्र, नाराएँ तकबीर के साथ लहराये जाते है, तब समझ आता है, हिन्दुओं के कर्णधारों ने कुछ नहीं सीखा। क्योंकि डा.अम्बेडकर के THOUGHTS ON PAKISTAN, इनके विमर्श का कभी विषय ही नही रहा, अन्यथा स्वतन्त्र विचार की अवधारणा की पैरोकार हिन्दु बहनें जेहादी समूह का हिस्सा नहीं होती।

जे.एन.यू की मार्क्सवादी विथिकाओं से जब हिन्दु परिवारों से संस्कारित माणवकों का झुण्ड, बन्द गले की शेरवानी पहने इस्लामी जेहाद के चिरागों के हाथों में हाथ डाले, राम प्रसाद बिस्मिल, अश्फाक उल्ला ओर भगत सिंह के छाया चित्रों की परछाईयों में खड़े हो कर भारत के टुकड़े करने का प्रण करता है, तब पता चलता है हिन्दुओं के सूत्रधारों ने कुछ नहीं सीखा। यदि सीखा होता तो आर्य समाज जिनकी पारिवारिक, वैचारिक पृष्ठभूमि रही है वो व्यक्तित्व कभी भी इन देश भंजकों के छत्र की शोभा नहीं बढाते।

हिन्दुवादी क्षत्रपों की विफलता का दिग्दर्शन टी.वी के विभिन्न चैनलों पर चलती नुक्कड सभाओं मे गांधी और वीर सावरकर के वैचारिक सामंजस्य को स्थापित करने के प्रयास में दिखाई देती है। आज तक सावरकर के नाम की चाश्नी चाटनें वाले विचारक, देश विभाजक गांधी और राष्ट्र संरक्षक वीर सावरकर के एकीकरण की कोई प्रमेय नहीं सुझा पाए। यदि ये गांधी को पकडते है तो सावरकर छूटता है और अगर सावरकर को पकड़ते हैं, तो गांधी नाम की अतिवादी वैचारिक स्वतन्त्रता के सम्मान नहीं करने का आरोप इन पर लगता है। दही जमे इनके मुखारविन्दों से कभी भी इस तथ्य का प्रस्फुटन नही होता की गांधी नामी वैचारिक स्वतन्त्रता एकतरफा और इस्लामी जेहाद के वर्चस्व का आलेख मात्र है, जिसमें हिन्दु उत्पीड़क है और इस्लाम उत्पीडीत। गांधीवादी विमर्श में, दोष किसी का हो परन्तु मुहम्मदी विचार सदैव विजयी भाव में रहेगा और हिन्दु को अपने अस्तित्व के वैचारिक बोध के आभार स्वरुप, इस्लामी उच्छृंखलता की वैचारिक प्रभुता को मानना पड़ेगा।

तथाकथित वामी-कामी गुट जब हिन्दु असमंजस जनित प्रवाद को गांधीवादी वैचारिक स्वतन्त्रता का उल्लंघन कहते हैं, तब अपना सा मुँह लेकर खींसे निपोरने के अलावा डिग्रीधारी-पठित-वेदविद्याविहीन हिन्दुविद्वानों के पास कोई चारा नही होता। आर्य उत्कृष्टा की गंङ्गा वेद का मलिन होना भी इनके प्रश्न शून्य मुख की रेखाओं को संकुचित नही करता। आगे बड़ कर कोई नही कहता कि वेद वैचारिक स्वतन्त्रता को जीवन का आधार मानता है, वेद की ऋचा सामूहिकता तथा परस्पर सम्मान को विद्वत् विचार की नींव मानता है जहॉ हिंसा तथा पाश्विक वर्चस्व का कोई अवकाश नही है, भारतभूमि पर निवास करती संस्कृति वेद से अनुप्राणित है, अतः हमारे लिए गांधी या अन्य कोई विचार श्रेष्ठता का मानदण्ड या सूचक नही है।

इस अनिर्णय कि स्थिति भारत वंश को पुनः विभाजन की विभिषिका में धकेल रही है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एकवार फिर हिन्दु की कब्र खोदने की भूमिका में उतर चुका है। स्वतन्त्रता पूर्व गांधी-नेहरु इन को खाद पानी दे रहे थे तो वर्तमान में इनकी अपत्य परंपरा से उत्पन्न पौत्र-पौत्री राजनैतिक संबल प्रदान कर रहे है।

जो पीढ़ी 1921 के मोपला जैसे नरसंहार को भूल चुकी है, उनके वाद में ये घटनाएँ केवल राजनैतिक द्वेष की प्रतिक्रिया मात्र हो सकती है। परन्तु, रक्तसाक्षी लेखराम की परंपरा 1400 साल से चल रहे जेहाद के स्वरुप को जानती-पहचानती है।

राजधानी दिल्ली से लेकर देश के विभिन्न प्रान्तीय संभागों में गूजंयमान “नारएँ तकबीर-अल्लाहो-अकबर” की कर्कश ध्वनि, मुहम्मद के गुर्गों के द्वारा नखला की पहली लूट की चित्कार से तन के रोंगटे खडी कर जाती है। जिस पल विद्यालयों की प्रचीर को छेदती आवाज “तेरा मेरा रिश्ता क्या- ला-इल्हा-इल्-अल्लाह” का शोर सेक्युलर-वाद की पारदर्शी तल्प मे अवृत किया जाता, उस पल मदीना की गलियों में रात के अन्धेरे में दूध पिलाती कवियत्री आसँमा के सीनें मे, मुहम्मद के रक्तपिपासु अनुचरों के द्वारा उतारे जाते खंजर से उठी सिसकियाँ, गाँधीवादी विचार-स्वतन्त्रता की एकांगी सोच को नंगा कर जाती है।

हजरत मुहम्मद के आदेश पर मदीना में कवि अफाक और काब की हत्या, बनी कुनेका और बनी कुरेजा कबीलों के नरसंहार की अनुकृति आज की ISIS द्वारा गला रेत कर की गयी जन्नती उपाधि मे प्रदर्शित होती है। बनी कुरेजा की अबोध बालिकाँए, मुहम्मद के निर्देश पर किस प्रकार इस्लाम की मंडियों की शोभा बनी थी उस की सच्चाई, सीरीया में ISIS की यजिदी कुमारीयों की नग्न बोलियों से प्रमाणित होती है। मानवता को लज्जित करने वाली क्रूर, पाश्विक कृत्यों के विवरणों से इस्लामी हदीसें, कुर्आन की तफसीरें, अल्लाह के रसूल की सिरतें भरी पड़ी है।

सेक्युलर-वादी, गांधीवादी पैरोकार जब हिन्दु समाज के अंग्रजी अक्षर पठित को समझाते है कि कुर्आन मानव सौहार्द की उत्कृष्ट कृति है तब आर्य तेज से प्रदिप्त चमूपति सृजित चौहदवीं का चांद नाद करते हुए कहता है कि कुर्आन की आयते सैफ(तलवार की आयत) ने कुर्आनी मानवतावादी आयातों के आवरण को मनसूख कर दिया है। अतः तौहीद के छत्र तले जो घट रहा है वो इस्लाम की नंगी सच्चाई है। इस कारण इस्लाम के लिए पूरी जमींन तब तक जंग का मैदान है जब तक अल्लाह का दीन पूरे आलम में न फैल जाए। अल्लाह के नज़दीक केवल एक ही दीन है, वो है इस्लाम और एक ही प्यारा है, वो है मुहम्मद। जो इन्कार मे है वो दिम्मी(जिम्मी) है, वाजीवुल कत्ल है। हरेक मोंमिन के लिए फिसबीयीलुउल्लहा-(अल्लाह की राह में जेहाद) फर्ज है।

अतः इस्लामी जेहाद की परिधि में अमेरीका से लेकर यूरोप तक, सीरीया से लेकर श्रीलंका तक, भारत से लेकर न्यूजीलैंड तक आ जाते हैं। जेहादी फर्ज की जंग में तलवार के साथ, नखला की लूट में अविष्कृत अल-तअकिय्य रुपी झूठी कसमों का उपयोग स्वीकृत है। इस्लामी जेहाद की तुलना अन्य अराजक कृत्यों से करने वाले भूल जातें है कि जहाँ अन्य अराजक कुकृत्य किसी विशेष राजनैतिक सेगठन अथवा सांकृतिक गुट के प्रति होता है वहीं जेहाद समूचे गैर इस्लामी मानवीय समूहों के विरुध होता है। जहाँ अन्य संघर्षों का कुछ कालक्रम के बाद समझोते के रुप में सदैव के लिए निरकरण हो जाता है वहीं इस्लामी युद्धोन्माद शहीद होकर हुरों की आगोश में जाने तक की कल्पना से अथवा गाजी बनकर मालें गनीमत के परितोषिक के रुप में प्राप्त निरही महिलाओं के लिए आख़िरत के दिन(यौमे दिन) तक लडता रहने को प्रेरित रहेगा।

अजीब पहेली है, समझ से परे है, जिन इस्लामी जंगजुओं ने अपनी पहली मस्जिद तक भी कब्जा कर बनायी है ओर इस्लामी तारीख़ की शुरु के 100 वर्षों के अन्दर बनी मस्जिदों का मक्का विमुख किब्ला स्वयं प्रमाणित कर रहा हैं कि ये सारी मस्जिदें कब्जा की गईं है तो वो बर्बर समाज भारत में आकर ताज महल, कुतुबमिनार, लालकिले जैसे अनेक एतिहासिक स्थलों का निर्माण कर्ता कैसे हो गया? ताज़ महल के शिखर पर बना कलश, कुतुबमिनार के प्रकीर्ण पर टूटे मन्दिर, लालकिले में बने सूर्य के प्रतिक सिद्ध कर रहे है कि जो आरम्भ में अपनी मस्जिद तक नहीं बना सके उन की वास्तुकला में वो प्रताप नही जो महल बना सके। विचार योग्य तथ्य है ताज महल में महल शब्द उसके मकबरा नहीं होने को प्रमाणित कर रहा है।

हदीस कहती है कि जेहाद की शराह में मोमिनों को जन्नत में हूरें मिलेंगी परन्तु मोमिनिन(जेहादी महिलायें) को क्या मिलेगा, इन में किस संदर्भ प्रप्ति का उत्साह है, आश्चर्यजनक कौतूहल का विषय है, समझ से परे है? क्योंकि हजरत मुहम्मद ने कहा है कि उन्होने केवल चार औरतें जन्नत में देखी हैः- आयशा, खदीजा, मरियम(ईसा मसीही की माँ) ओर फिरौन की पत्नी। तो क्या ये माना जाये की बुर्के में आन्दोलित बहनें काफिरों को दोज़ख भेंज कर, बुजुर्ग अल्लाह की अनन्तता में काफिरों को शरीक होने का मौका देनें पर उत्साहित हें..! शायद किसी ने इनको नही बताया की अल्लह के गुणों में शिरकत ही शिर्क है जो इन्हें, मुशरिक बना इस्लाम से खारिज कर सकता है....मसला जो भी हो......सेक्युलरिज़म का प्रवर्तक हिन्दु प्रश्न नहीं पुछेगा........ये करणीय कार्य आर्यों के पल्ले ही रहेगा।

हिज़ाज़ से उठी जिस आँधी ने 1400 साल पहले मात्र 30 साल के अन्तराल में रुमी, पारसी साम्राज्य को धूलधुसरित कर दिया था, वो भारत वंशी शोर्य के आगे, गङगा के दाहने पर 800 वर्ष से निरन्तर संघर्ष कर रही है। बप्पा रावल जैसे शूरवीरों ने 500 साल तक सिन्ध से आगे बढ़ने नही दिया, ललितादित्य जैसे तेजस्वी वीर ने तुर्की तक इन्हे खदेड़ा। भारत पर कब्जें के बाद भी कभी केसरीया वीरों ने एक भी दिन जेहादीयों को चैन नही लेने दिया, महाराणा प्रताप, शिवाजी, छत्रसाल, गुरुगोविंद सिंह प्रभृति अनेक वीरों ने इनकी मुहम्मदी शम्शीरों को अपनी खड्ग की धार पर तोला, स्वयं वीर गति को प्राप्त हुए पर जाने कितने जेहादीयों का शहीद बनने का बुखार उतार गए।

कालक्रम मे दयानन्दी सेना ने इनसे लोहा लिया, ऐसी मार मारी कि कुर्आनी जनन्त बिलबिला उठी। चमूपति का ज़वाहिरे ज़ावेद, प.गङ्गा प्रसाद कि मिस्बाहुल इस्लाम, स्वामी दयानन्द की सत्यार्थ प्रकाश के छत्रछाया में मोमिनों के लहु में जाकर यूँ मिली की कुर्आन के मायने बदलने लगे। लेकिन तब भी गांधीवादी पोपों ने देश को धोखा दिया था ओर आज फिर, उन्हीं के दत्तक वंशजों के कारण हम पुनः विभाजन के मुहाने पर है।

अगर आर्य तेज निष्क्रिय रहा तो गङ्गा का दाहाना, ताज महल की तरह उनका का होगा, यमुना तो ज़मुनी तहजीब की भेंट चढ़ चुकी है........माँ बहनों के पास यज्ञाग्नि में आत्मोसर्ग का मार्ग भी न बचगें। लज्जा चाँदनी चौक की गलियों में कहाँ “माले गनिमत” होगी......क्या पता?

आर्यों ! ऋषि भक्त श्रद्धानन्द को याद करो, स्वतन्त्रानन्द का तेज भरो....उठो......एक हाथ में सत्यार्थ प्रकाश....दुसरे हाथ में चौहदँवी का चाँद...पृष्ठ पर प.गुरुदत्त के चिह्न.....जिह्वा पर प.लेखराम का बलिदानी गीत ले कर बढ़ चलो........और उच्च स्वर में बोलो .........

....आर्यों सावधान....देश नही बटने देंगे..एक बार धोखा खाया है, पर अब नहीं...आर्यों सावधान..!

विदुषामनुचरः
राज वीर आर्य

Monday, March 16, 2020

सन्ध्या



सन्ध्या

लेखक- आचार्य अभयदेव
प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ

अब मेरे चौके में कोई न आवे। अब मैं सब कूड़ा-करकट निकालकर, साफ चौक लगाकर आत्मिक भोजन पकाने के लिए बैठा हूँ।
यही निश्चय करके मैं प्रतिदिन सायं-प्रातः जब आत्मिक भूख लगती है, चौका लगाकर पवित्रता से रसोई करना शुरू करता हूँ। परन्तु मेरे यार दोस्त ऐसे बेतकल्लुफ (दोस्तों को इससे ज्यादा और क्या कहूं) हो गए हैं कि मुझे अपना भोजन भी नहीं करने देते। जिन किन्हीं से दिन भर में या रात में जरा क्षणिक भी परिचय हो गया होता है वे निःशंक बेखटके मेरे चौके में चले आते हैं और मुझसे बात करने लगते हैं। और मैं भी रसिक (अपने को 'निर्लज्ज' कहते तो लज्जा आती है) हूं कि मुझे कुछ खबर तक नहीं रहती। कभी-कभी तो मिनटों तक दोस्तों से गप्पे उड़ती रहती हैं। एकदम जब खयाल आता है तो चिल्ला उठता हूं "हाय रे! यह तो मेरा चौका छूत हो गया। निकलो, यहां से भागो! मैं भोजन के लिए बैठा था।" सबको हटाकर फिर से चौका देता हूँ और फिर से भोजन बनाने बैठता हूं। किन्तु फिर भी वही हाल है। भला दिनभर के साथी इस समय के लिए कैसे हट जाएं? फिर-फिर चौका छूत होता है और मैं फिर-फिर शुरू से चूल्हा सुलगाता और दाल चढ़ाता रहता हूं। बड़ा हैरान हूं क्या करूं? बहुत देर हो जाती है। क्या दिनभर यही करता रहूं? इतना तो धीरज नहीं है। या यह भोजन ही न खाऊं? यह भी इच्छा नहीं है। अन्त में तंग आकर छूत, जूठा, जैसा भी कच्चा-पक्का खाना होता है, खा लेता हूं और छुटकारा पाता हूं। पर इस दूषित भोजन से क्या लाभ होना है? यही कारण है कि मेरी आत्मिक पुष्टि नहीं होने पाती। प्रतिदिन दोनों सन्ध्या वेलाओं में भोजन खाता जाता हूँ तो भी दुबला ही हूं।

एक नदी है जिसे सब यात्रियों को कभी न कभी पार करना है। बहुत से लोग इस नदी के तट पर वर्षों से आये बैठे हैं- बहुत आ रहे हैं, कोई दूर है, कोई समीप पहुंच चला है- ऐसे भी बहुत हैं जिन्हें खबर नहीं कि हमें कभी इस नदी को पार भी करना है, परन्तु ये सब इस बात में समान हैं कि कोई भी पारंगत नहीं। सब इसी पार हैं।
तटवर्ती लोग दूर तक पानी में जाते हैं और घबराकर लौट आते हैं। बड़े-बड़े यत्न करते हैं। नई-नई तदबीरें पार होने के लिए सोचते हैं। इधर से जाकर देखते हैं, कभी उधर से जाते हैं। परन्तु जब तक पार नहीं हो जाते तब तक कुछ नहीं। वे वही हैं जो अन्य हैं। उनमें कोई सच्ची महत्ता नहीं, कोई वैशिष्ट्य नहीं।
यह कौन सी नदी है? यह वह नदी है जोकि व्युत्थानता के राज्य की सीमा है और जिसके कि पार एकाग्रता और निरोध की पुण्यभूमि का विस्तार प्रारम्भ होता है, जिस पर कि प्रसिद्ध धारण, ध्यान और समाधि नामक उत्तरोत्तर प्रकाशमान साम्राज्य है और जहां पर बने हुए विभूतियों के दिव्यभवन कई कई यात्रियों को इसी किनारे से दीखने लगते हैं। यह वह नदी है कि जिसके पार गये हुए मनुष्य को अपने आत्मिक भोजन बनाने में ये 'यार दोस्त' विघ्न नहीं डाल सकते और इसलिए वह वहां निर्विघ्न आत्मिक पुष्टि प्राप्त कर सकता है।

तो इस नदी के पार कैसे जाय? यह तो स्पष्ट है कि जिस यात्री पर संसार के नाना विषयों से बंधा हुआ 'राग' रूपी बोझ लदा हुआ है वह तो इस नदी को पार नहीं कर सकता। वह डूब जाएगा, पर पार नहीं पहुंचेगा। इसलिए पहले तो इस 'राग' के बड़े भारी बोझे को उतारकर हलका वैरागी बनना होगा। फिर जो वैरागी है, वह किसी न किसी तरह बार-बार यत्न (अभ्यास) करता हुआ इसे तर ही जायेगा। जिसने सचमुच इस पार की वस्तुओं का राग छोड़ दिया है, उसे तो उस पार का प्रबल आकर्षण ही खींचने लगता है। यह पार क्यों न होगा?

हां, कोई वैरागी पूछ सकता है कि 'बार-बार यत्न' किस प्रकार का करना चाहिए। इस पर सन्त लोग बतलाते हैं कि-
१. कोई तो निरन्तर निरवच्छिन्न जप-रूपी पुल पर से उस पार पहुंच जाते हैं। ये लोग प्रणव या किसी अन्य जाप को करते हैं।
२. कोई ज्ञानी भक्त अपनी विचार सिद्धि द्वारा इस नदी पर से ऐसे गुजर जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं लगता कि हमने कोई नदी पार की है। ये लोग प्रारम्भ में मन को कहते हैं 'अरे चंचल मन! तू जा, कहां जाता है। तू जहां भी जाएगा वहां वे ही भगवान् ही तो हैं।' इस प्रकार उनका मन हरएक वस्तु में भगवान् को ही देखने से एक ही रंग में रंग जाता है।
३. दूसरे कोई भक्त अपना सबकुछ समर्पण करते हुए मन:समर्पण रूपी विमान द्वारा ऊपर ही से पार हो जाते हैं। जब सचमुच मन अपना नहीं रहता, भगवान् का हो जाता है तो वह और किसका चिन्तन करे? स्वयं निरुद्ध हो जाता है।
४. कोई प्राण के अनुसार चलने वाले 'सोहं' भावना की युक्ति से ऐसे ठीक घाट उतर जाते हैं कि इन्हें वहां जल का कुछ भी कष्ट नहीं होता, बल्कि जलधारा सहायक होती है। ये लोग सतत चलने वाले प्राण में निरन्तर मन द्वारा सोहं या ओ३म् का श्रवण करते हैं।
५. कोई इच्छाशक्तिवाले अपनी प्रबल इच्छा की बाहुओं से इसे तर कर पार कर जाते हैं।
६. इनके अतिरिक्त गुरूपदेश से प्राप्तव्य बहुत सी नौकाएं, डोंगियां आदि भी हैं जो कि वैरागियों को पार ले जाती हैं।

इस प्रकार के उपाय तो सैकड़ों हैं जिनसे कि इस नदी के पार पहुंचा जा सकता है। आओ, हम भी किसी न किसी उपाय से इस नदी से पार उतर जाएं और निर्विघ्न आत्मिक पुष्टि प्राप्त करें।

[साभार- तरंगित हृदय]

Sunday, March 15, 2020

देव उद्योगी पुरुष को चाहते हैं



देव उद्योगी पुरुष को चाहते हैं

लेखक- पं० युद्धिष्ठिर मीमांसक
प्रेषक- प्रियांशु सेठ

इच्छन्ति देवा: सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति। यन्ति प्रमादमतन्द्रा:।। -ऋग्वेद ८/२/१८

(देवा:) विद्वान् लोग (सुन्वन्तम्) उत्तम कार्य करने वाले व्यक्ति को ही (इच्छन्ति) चाहते हैं। (स्वप्नाय) स्वप्नशील अर्थात् आलसी पुरुष को (न) नहीं (स्पृहयन्ति) चाहते। (अतन्द्रा:) आलस्यरहित = उद्योगी पुरुष (प्रमादम्) अत्यन्त हर्ष को (यन्ति) प्राप्त होते हैं।

इस मन्त्र में बताया है कि उद्योगी कर्मशील व्यक्ति ही संसार में सुख ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं। तथा संसार के श्रेष्ठ पुरुष भी कर्मशील व्यक्ति को ही चाहते हैं, और उसी की सहायता करते हैं, आलसी की नहीं। विश्व का इतिहास इस बात का साक्षी है कि साधारण परिस्थिति के व्यक्ति भी अपनी अनवरत कर्मशीलता से अन्ततः परम उत्कर्ष को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। आलसी पुरुष उद्योग न करके अपने भाग्य को ही कोसा करते हैं।

अतएव भर्तृहरि ने कहा है-
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपु:।
नास्त्युद्यमसमो बन्धु: कुर्वाणो नावसीदति।। नीतिशतक ८६

अर्थात्- आलस्य शरीर में बैठा हुआ मनुष्य का महान् शत्रु है। क्योंकि अन्य शत्रु तो बाहर से आक्रमण करते हैं, अतः उनसे बचा जा सकता है। परन्तु आलस्य तो शरीर में बैठा हुआ अन्दर से ही आक्रमण करता है, अतः उससे बचना बहुत कठिन है। उद्यम के समान मनुष्य का कोई मित्र नहीं है। क्योंकि उद्योगी मनुष्य को कभी पछताना नहीं पड़ता।

अतः जो व्यक्ति या समाज या जाति या देश अपना उत्कर्ष चाहते हों, और संसार में अपने सहयोगी बनाना चाहते हों, उनको उचित है कि शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक सब प्रकार के आलस्य को सर्वथा छोड़ देवें, और उद्योगी पुरुषार्थी बनने का प्रयत्न करें। संसार में प्रत्येक कार्य पुरुषार्थ से निष्पन्न होता है। इसीलिये शास्त्रकारों ने कहा है- उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी। धन सम्पत्ति की प्राप्ति सब मनोकामनाओं की पूर्ति उद्योग से ही होती है। अतएव कई पुरुषार्थी व्यक्तियों का कहना है कि 'असम्भव' शब्द ही भाषा में से निकाल देना चाहिए, क्योंकि उद्योगी पुरुष के लिए संसार में कुछ भी असम्भव नहीं है।