Friday, March 13, 2020

महाभारतान्तर्गत चक्रवर्ती आर्य राजाओं का परिचय



महाभारतान्तर्गत चक्रवर्ती आर्य राजाओं का परिचय

प्रियांशु सेठ

आर्यजगत् के पुनरुद्धारक स्वामी दयानन्दजी सरस्वती अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के एकादश समुल्लास में चक्रवर्ती राजाओं के विषय में मैत्र्युपनिषद् का प्रमाण उद्धृत करते हुए लिखते हैं- "सृष्टि से लेकर महाभारतपर्यन्त चक्रवर्ती सार्वभौम राजा आर्यकुल में ही हुए थे। अब इनके सन्त्तानों का अभाग्योदय होने से राजभ्रष्ट होकर विदेशियों के पादाक्रान्त हो रहे हैं। जैसे यहां सुद्युम्न, भूरिद्युम्न, इन्द्रद्युम्न, कुवलयाश्व, यौवनाश्व, वद्ध्र्यश्व, अश्वपति, शशविन्दु, हरिश्चन्द्र, अम्बरीष, ननक्तु, शर्याति, ययाति, अनरण्य, अक्षसेन, मरुत्त और भरत सार्वभौम सब भूमि में प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजाओं के नाम लिखे हैं वैसे स्वायम्भुवादि चक्रवर्ती राजाओं के नाम स्पष्ट मनुस्मृति, महाभारतादि ग्रन्थों में लिखे हैं। इस को मिथ्या करना अज्ञानी और पक्षपातियों का काम है।" इन राजाओं का राज्य आर्यावर्त्त देश से लेकर समस्त भूमण्डल पर था। आर्यावर्त्त देश विद्या का आदिस्त्रोत होने हेतु आदिसभ्यता का प्रकाशक भी है। पश्चिमी विद्वानों में अत्यन्त प्रतिष्ठित मातृलिंग (Maeterlinck) अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'Secret Heart' में लिखते हैं-

"It is now hardly to be contested that the source (of knowledge) is to be found in India. Thence in all probability the sacred teaching spread in to Egypt, found its way to ancient Persia and Chaldia, permitted the Hebrew race and crept in Greece and the south of Europe, finally reaching China and even America." -Pg. 5
अर्थात्- अब इसपर विवाद की कोई गुंजायश नहीं कि (विद्या का) मूल स्थान भारतवर्ष में पाया जाता है। सम्भवतः वहां से यह शिक्षा मिश्र में फैली, मिश्र से प्राचीन ईरान तथा कालडिया (अरब देश) का मार्ग पकड़ा, यहूदी जाति को प्रभावित किया, फिर यूनान तथा यूरोप के दक्षिण भाग में प्रविष्ट हुई, अन्त में चीन और अमरीका में पहुंची।

फ्रांस के महान् सन्त एवं विचारक क्रूज़े (Cruiser) ने बलपूर्वक लिखा है-

"Is there is a country which can rightly claim the honour of being the cradle of human race or at least the scene of primitive civilisation, the successive developments of which carried in all parts of the ancient world, and even beyond, the blessings of knowledge which is the second life of man, that country assuredly is India." -J. beatie : Civilisation and Progress
अर्थात्- यदि कोई देश वास्तव में मनुष्य-जाति का पालक होने अथवा उस आदिसभ्यता का, जिसने विकसित होकर संसार के कोने-कोने में ज्ञान का प्रसार किया, स्त्रोत होने का दावा कर सकता है, तो निश्चय ही वह देश भारत है।

इसी आर्यावर्त्त का नाम ही ब्रह्मावर्त्त, ब्रह्मर्षि देश से भी प्रसिद्ध है (देखो- मनु० २/१७-२२ एवं पातंजल-व्याकरण-महाभाष्य २/४/१० व ६/३/१०९)। वैदिक शिक्षा के प्रभाव से इस देश के राजाओं में किसी प्रकार का कोई दुराचार विद्यमान नहीं था इसलिए इनकी प्रजा इनसे अत्यन्त प्रसन्न व सन्तुष्ट रहती थी। हम अपने पक्ष में पाठकों के समक्ष महाभारत (अनुशासन पर्व, अध्याय १६५) में आए चक्रवर्ती राजाओं के कुछ नामों व उनकी राज्य-व्यवस्था का उल्लेख करेंगे-

१. महाराजा मरुत्त- राजा मरुत्त जब इस पृथिवि का शासन करते थे उस समय यह पृथिवी बिना जोते-बोए ही अन्न पैदा करती थी और समस्त भूमण्डल में देवालयों की माला-सी दृष्टिगोचर होती थी जिससे इस पृथिवी की बड़ी शोभा बनी हुई थी। (द्रोणपर्व ५५/४४)

२. महाराजा सुहोत्र- राजा सुहोत्र को पाकर पृथिवी का वसुमती नाम सार्थक हो गया था। जिस समय वे जनपद के स्वामी थे उन दिनों वहां की नदियां अपने जल के साथ सुवर्ण बहाया करती थीं। (द्रोणपर्व ५६/६)

३. महाराजा शिवि- औशीनर के सुपुत्र शिवि ने इस सम्पूर्ण पृथिवी को चमड़े की भांति लपेट लिया था, अर्थात् सर्वथा अपने आधीन कर लिया था। वह अपने रथ की ध्वनि से पृथिवी को प्रतिध्वनित करते हए एकमात्र विजयशील रथ के द्वारा इस भूमण्डल को एकछत्र शासन करते थे। आज संसार में जंगली पशुओं सहित जितने गाय, बैल, और घोड़े हैं उतनी संख्या में उशीनर-पुत्र शिवि ने अपने यज्ञ में केवल गौओं का दान किया था। प्रजापति ब्रह्मा ने इन्द्र के तुल्य पराक्रमी उशीनर-पुत्र राजा शिवि के सिवाय सम्पूर्ण राजाओं में भूत या भविष्यकाल के किसी राजा को ऐसा सम्मान नहीं दिया जो शिवि का कार्यभार वहन कर सकता हो। (द्रोणपर्व ५८/१,२,६,७,८)

४. सम्राट् भरत- दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र महाधनी, महामनस्वी, महातेजस्वी भरत ने पूर्व-काल में देवताओं की प्रसन्नता के लिए यमुना के तट पर तीन सौ, सरस्वती के तट पर बीस और गंगा के तट पर चौदह अश्वमेध यज्ञ किए थे। जैसे मनुष्य दोनों भुजाओं से आकाश को तैर नहीं सकते, उसी प्रकार सम्पूर्ण राजाओं में भरत का जो महान् कर्म है उसका दूसरे राजा अनुकरण न कर सके। (द्रोणपर्व ६८/८,९)

५. पुरुषोत्तम राम- श्रीराम अपनी प्रजा पर वैसी ही कृपा रखते थे जैसे पिता अपने औरस पुत्रों पर रखता है। उनके राज्य में कोई भी स्त्री अनाथ, विधवा नहीं हुई। श्रीराम ने जब तक राज्य का शासन किया तब तक वे अपनी प्रजा के लिए सदा ही कृपालु बने रहे। मेघ समय पर वर्षा करके खेती को अच्छे ढंग से सम्पन्न करता था; उसे बढ़ने-फलने-फूलने का अवसर देता था। राम के राज्य-शासनकाल में सदा सुकाल ही रहता था, कभी अकाल नहीं पड़ता था। राम के राज्य-शासन करते समय कभी कोई प्राणी जल में नहीं डूबता था, आग अनुचितरूप से कभी किसी को नहीं जलाती थी तथा किसी को रोग का भय नहीं होता था। स्त्रियों में भी परस्पर विवाद नहीं होता था, फिर पुरुषों की तो कथा ही क्या! श्रीराम के राज्य-शासनकाल में समस्त प्रजाएँ सम-धर्म में तत्पर रहती थीं। श्री रामचन्द्र जी जब राज्य करते थे उस समय सभी मनुष्य सन्तुष्ट, पूर्णकाम, निर्भय, स्वाधीन और सत्यव्रती थे। सभी वृक्ष बिना किसी विघ्न-बाधा के सदा फले-फूले रहते थे और समस्त गौएँ एक-एक द्रोण दूध देती थीं। महातपस्वी श्रीराम ने चौदह वर्षों तक वन में निवास करके राज्य पाने के उपरान्त दस ऐसे अश्वमेध यज्ञ किये जो सर्वथा स्तुति के योग्य थे तथा जहां किसी भी याचक के लिए दरवाजा बन्द नहीं होता था। श्री राम नवयुवक और श्याम-वर्णवाले थे। उनकी आंखों में कुछ-कुछ लालिमा शोभा देती थी। वे यूथपति गजराज के समान शक्तिशाली थे। उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएं घुटनों तक लम्बी थीं। उनका मुख सुन्दर और कन्धे सिंह के समान थे। (द्रोणपर्व, अध्याय ५९)

६. महाराजा भगीरथ- महाराजा भगीरथ जिनके नाम पर गंगा को भागीरथी कहते हैं, तट के समीप निवास करते समय गंगाजी राजा भगीरथ के प्रताप से भारतवर्ष की ओर बहने लगी। विप्रपथगामिनी गंगा ने पुत्री-भाव को प्राप्त होकर पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले इक्ष्वाकु-वंशी यजमान भगीरथ को अपना पिता माना। (द्रोणपर्व ६०/१,६,८)

७. महाराजा दिलीप- एकाग्रचित हुए महाराजा दिलीप ने एक महायज्ञ में रत्न और धन से परिपूर्ण पृथिवी के बहुत बड़े भाग को ब्राह्मणों को दान कर दिया था। उनके यज्ञ में सोने का बना हुआ यूप शोभा पाता था। यज्ञ करते हुए इन्द्र आदि देवता सदा उसी यूप का आश्रय लेकर रहते थे। उनके यज्ञ में साक्षात् विश्वावसु बीच में बैठकर सात-स्वरों के अनुसार वीणा बजाया करते थे। उस समय सभी प्राणी यही समझते थे कि ये मेरे ही आगे बाजा बजा रहे हैं। (द्रोणपर्व ६१/२,३,५,७)

८. महाराजा मान्धाता- इसी प्रसङ्ग में महाराजा मान्धाता का वर्णन इस प्रकार है कि वे बड़े धर्मात्मा और मनस्वी थे। युद्ध में इन्द्र के समान शौर्य प्रकट करते थे। यह सारी पृथिवी एक ही दिन में उनके अधिकार में आ गई थी। मान्धाता ने समराङ्गण में राजा अङ्गार, मरुत्त, असित, गय तथा अङ्गराज बृहद्रथ को भी पराजित कर दिया था। मान्धाता ने रणभूमि में जिस समय राजा अङ्गार के साथ युद्ध किया था, उस समय देवताओं ने ऐसा समझा था कि उनके धनुष की टंकार से सारा आकाश ही फट गया है। (द्रोणपर्व ६२/९,१०) उनके राज्य के विस्तार में कहा गया-

यत्र सूर्य उदेति स्म यत्र च प्रतितिष्ठति।
सर्वं तद् यौवनाश्वस्य मान्धातु: क्षेत्रमुच्यते।। (द्रोणपर्व ६२/११)
जहां से सूर्य उदय होते हैं वहां से लेकर जहां अस्त होते हैं वहां तक का सारा क्षेत्र युवनाश्व-पुत्र मान्धाता का ही राज्य कहलाता था।

९. महाराजा ययाति- नहुष-पुत्र राजा ययाति ने समुद्रों-सहित सारी पृथिवी को जीतकर शम्यापात के द्वारा पृथिवी को नाप-नापकर यज्ञ की वेदियां बनाई, जिनसे भूतल की विचित्र शोभा होने लगी। उन वेदियों पर मुख्य-मुख्य यज्ञों का अनुष्ठान करते हुए सारी भारत-भूमि का परिक्रमण कर डाला। नहुष-पुत्र ययाति ने व्यूह-रचनायुक्त आसुर-युद्ध के द्वारा दैत्यों एवं असुरों का संहार करके यह सारी पृथिवी अपने पुत्रों को बांट दी थी। (द्रोणपर्व, अध्याय६३)

१०. महाराजा अम्बरीष- नृपश्रेष्ठ महाराज अम्बरीष को सारी प्रजा ने अपना पुण्यमय रक्षक माना था। ब्राह्मणों के प्रति अनुराग रखनेवाले राजा अम्बरीष ने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञ-मण्डप में शतशः राजाओं को उन ब्राह्मणों की सेवा में नियुक्त किया था, जो स्वयं भी हजारों यज्ञ कर चुके थे। उन यज्ञ-कुशल ब्राह्मणों ने नाभाग-पुत्र अम्बरीष की सराहना करते हुए कहा था कि ऐसा यज्ञ न तो पहले के राजाओं ने किया और न ही भविष्य में होनेवाले करेंगे। (द्रोणपर्व ६४/१२,१५,१६)

११. महाराजा शशबिन्दु- इसी प्रकार चित्ररथ के पुत्र शशबिन्दु, अमूर्त्तरथा के पुत्र राजा गय और संकृति के पुत्र राजा रन्तिदेव थे। शशबिन्दु के राज्यकाल में यह पृथ्वी हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरी थी। यहां कोई विघ्न बाधा और रोग-व्याधि नहीं थी (द्रोणपर्व ६५/११)। राजा गय ने अश्वमेध नामक महायज्ञ में मणिमय रेत वाली सोने की पृथ्वी बनवाकर ब्राह्मणों को दान की थी (द्रोणपर्व ६६/११)। राजा रन्तिदेव ब्राह्मणों को 'तुम्हारे लिए, तुम्हारे लिए' कहकर हजारों सोने के चमकीले निष्क दान किया करते थे (द्रोणपर्व ६७/४,५)।

१२. महाराजा पृथु- वेन के पुत्र महाराज पृथु का भी महर्षियों ने महान् वन में एकत्र होकर उनका राज्याभिषेक किया था। ऋषियों ने यह सोचकर कि सब लोकों में धर्म की मर्यादा प्रथित करेंगे, स्थापित करेंगे, उनका नाम पृथु रखा था। क्षत अर्थात् दुःख से सबका त्राण करते थे इसलिए क्षत्रिय कहलाए। वेन-नन्दन पृथु को देखकर समस्त प्रजाओं ने एक-साथ कहा कि हम इनमें अनुरक्त हैं। इस प्रकार प्रजा का रञ्जन करने के कारण ही उनका नाम राजा हुआ। पृथु के शासनकाल में पृथिवी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी। वृक्षों के पुट-पुट में मधु भरा था और सारी गौएँ एक-एक द्रोण दूध देती थीं। मनुष्य नीरोग थे, उनकी सारी कामनाएं सर्वथा परिपूर्ण थीं, उन्हें कभी किसी से कोई भय न था। सब लोग इच्छानुसार घरों में या खेतों में रह लेते थे। जब वे समुद्र की ओर यात्रा करते थे उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था, नदियों की बाढ़ समाप्त हो जाती थी, उनके रथ की ध्वजा कभी भग्न नहीं होती थी। (द्रोणपर्व ६९/२,३,४,६,७,८,९)

सन्दर्भ ग्रन्थ-सत्यार्थ भास्कर-स्वामी विद्यानन्द एवं महाभारत

Monday, March 9, 2020

क्रान्तिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा के पत्र की बानगी



क्रान्तिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा के पत्र की बानगी

प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ, डॉ० विवेक आर्य

यह कौन जानता था कि ४ अक्टूबर १८५७ को कच्छ रियासत के माण्डवी ग्राम के भंसाली परिवार में जन्मे श्यामजी कृष्ण वर्मा, १८५७ के संग्राम के बाद के पहले ऐसे क्रान्तिकारी बनेंगे जो बाद की पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्त्रोत तो होंगे ही, साथ ही साथ विदेशों में रहकर वहां अपने संस्कृत पाण्डित्य के ज्ञान को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से प्रस्फुटित कर वहां की जनता में अपना प्रभाव बढ़ाते हुए भारत में कार्यरत क्रान्तिकारियों के लिए उच्च कोटि के आदर्श सिद्ध होंगे। सन् १८७५ की १० अप्रैल को उनकी भेंट समाज सुधारक व वेदों आदि के ज्ञाता स्वामी दयानन्द सरस्वती से हुई। जिनसे मिलकर वे बहुत प्रभावित हुये व उनसे काफी प्रेरणा मिली। श्यामजी अपने विचारों व कार्यकलापों को यूरोप व विशेषकर भारत के अधिक से अधिक क्रान्तिकारियों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने जनवरी सन् १९०५ में 'इण्डियन सोशियोलॉजिस्ट' नामक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया। जिसकी प्रतियां किसी भी प्रकार भारत भी भेजी जाती थी तथा उन्हें बड़े ही चाव से पढ़ाया जाता था। इस पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर लिखा रहता था कि यह "स्वतन्त्र और राजनैतिक सामाजिक व धार्मिक सुधार का मुख पत्र है"। इस पत्र की व्यापक रूप से धूम मची तथा प्रशंसा हुई। इस पत्र में किस प्रकार की सामग्री प्रकाशित की जाती थी इसकी कुछ बानगी यहां प्रस्तुत है-

(क) डॉ० अविनाश भट्टाचार्य लिखते हैं कि हम लोग १९०५ में क्रान्तिकारी बने तो इण्डियन सोशियोलॉजिस्ट की प्रतियां पढ़ने लगे इन निबन्धों में स्पष्ट रूप से निरंकुश शासन के विरुद्ध लिखा था और मार्गदर्शन दिया गया था कि इससे निपटने का एक मात्र उपाय है- "पैसिव रजिस्टैंस यानी निष्क्रिय प्रतिरोध। १९०५ की दिसम्बर वाली प्रति में समानान्तर सरकार की स्थापना के पक्ष में भी तर्क दिया गया था।"

(ख) १८९९ के लगभग दक्षिण अफ्रीका में ट्रान्सवेल लोकतन्त्र के जोहन्सवर्ग के पास एक सोने की खान का पता लगा। तब ब्रिटेन के व्यापारियों ने इसे हड़पने के प्रयास में सहायता के लिए ब्रिटिश सरकार को भी उकसाया। इनके कुटिल प्रयासों को निष्फल करते हुए ट्रान्सवेल के शासक सेनापति कुनर ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई की घोषणा कर दी तथा उनकी जीत होने लगी। तभी नाटाल में रहकर गांधी जी बैरिस्टरी कर रहे थे। वे लोकप्रिय भी थे। उन्होंने एक स्वयंसेवी सेना का गठन किया व अंग्रेजों का युद्ध में साथ दिया। श्यामजी ने अपने पत्र में लिखा कि जिस जाति ने अन्यायपूर्वक भारत पर अधिकार कर रखा है और निर्लज्ज शोषण से भारत को गरीब बना दिया है, ऐसे राष्ट्र की सहायता कर गांधी जी ने जो काम शुरू किया है वह बिल्कुल नाजायज, औचित्यहीन व न्याई विरुद्ध है।
इस प्रकार वे उग्र विचारों की ओर जाने लगे। अमेरिका के आयरिस्ट प्रजातन्त्रीय मुख पत्र 'गेलिक अमेरिकन' ने लिखा कि नाटाल के भारतीयों का आचरण इतना निन्दनीय है कि उसका भाषा में वर्णन सम्भव नहीं।

(ग) उन्हीं दिनों कांग्रेस में १९०५ वाले अधिवेशन की अध्यक्षता कौन करे, इस पर वाद-विवाद चल रहा था। प्रश्न था 'गोखले तथा बालगंगाधर तिलक' के बीच। अपने पत्र में गोखले व तिलक की तुलना करते हुए श्याम जी ने लिखा कि एक ओर तो गोखले ने १८९७ में ताउन के बहाने भारतीयों पर अत्याचार के बारे में लिखा पर बाद में माफी मांगकर अंग्रेजों के कृपापात्र बन गए, पर तिलक माफी न मांगने के कारण जेल चले गए। गोखले पर कालान्तर में सरकारी कृपा होती रही पर तिलक अपने उग्र विचारों के कारण या तो आर्थिक कष्ट उठाते रहे या जेल जाते रहे। अन्त में गोखले को अध्यक्ष के लिए चुने जाने पर श्यामजी ने लिखा कि "देखिए किस प्रकार एक पेशेवर राजनीतिज्ञ (गोखले) तरक्की करता है तथा सच्चा देशभक्त (तिलक) मुसीबत में फंसता है।"

(घ) प्रसिद्ध क्रान्तिकारी खुदीरामबोस व प्रफुल्लचाकी ने बिहार के मुजफ्फरपुर में एक कुख्यात न्यायाधीश किंग्स फोर्ड को मारने की चेष्टा की पर धोखे से दूसरे गोरे मारे गये। खुदीरामबोस को १७ वर्ष की उम्र में ही फांसी हो गयी तथा उसे व उन्हीं जैसे कार्य करनेवाले क्रान्तिकारियों को 'आतंकवादी' कहा जाने लगा। श्यामजी इससे बहुत उत्तेजित हुये, वे आतंकवाद को भारतीय परिस्थितियों में न्याय संगत ठहराने के सम्बन्ध में कई लेख प्रकाशित किये। लीरायस्कर नामक एक प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार ने "आतंकवाद की मनोवृत्ति के बारे में एक निबन्ध प्रकाशित किया", उसी को श्यामजी ने अपने पत्र में प्रकाशित किया। उसमें एक रूसी आतंकवादी का हवाला था। वह युवक रसायन शास्त्र विशारद था। उस युवक ने अपने बयान में यह कहा था कि मैं क्यों आतंकवादी हूं, क्यों आतंकवाद को उचित मानता हूं, यह आपके लिए समझ पाना कठिन है। आपके देश में आतंकवाद के लिए कोई उचित कारण नहीं है पर हमारे देश जारशाही रूस में यही एक मात्र सही तरीका है। कितने सालों व पुश्तों से हम सरकार से कुछ स्वतन्त्रता की मांग कर रहे हैं पर हमें कुछ भी नहीं मिला। हम राजनैतिक रूप से बहुत कष्ट भोग रहे हैं। आप जानते हैं कि खुलकर क्रान्तिकारी कार्य करना असम्भव है। कैसे गुप्तचर पहरा देते हैं, किस तरह से हमारे नेताओं को फांसी पर चढ़ाया जाता है, कैसे घर-घर अस्त्र-शस्त्र के लिए तलाशी ली जाती है इसलिए सरकार ने स्वयं ही ऐसी परिस्थिति का स्त्रजन किया है कि हम आतंकवाद की ओर बढ़ने को मजबूर हैं...।

(ङ) सन् १९०८ में सितम्बर अन्त में एक लेख इस शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ- डाइनमाइट का नीति शास्त्र व भारत में ब्रिटिश तानाशाही। इसमें श्यामजी ने कहा कि यदि ब्रिटिश शासक व उसके बूढ़े सैनिक भारतीय स्वतन्त्रता व राष्ट्रीय सम्मान को जबर्दस्ती हरण करके करोड़ों लोगों को डेढ़ सौ वर्षों से मृत्यु के द्वार तक पहुंचाते रहे हैं तो क्या देश के लोग नीतिशास्त्र के अनुसार आत्मरक्षा के लिए शत्रु के आक्रमण को रोकने के लिए कोई रास्ता अख्तियार न करें। क्या यह उनका एकमात्र कर्त्तव्य नहीं है।

इसी प्रकार उन्होंने आयरलैण्ड व रूस के क्रान्तिकारियों के उदाहरण दे-देकर बहुत से लेख व वक्तव्य प्रकाशित कर भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए मार्गदर्शन व प्रेरणा देने का कार्य किया। इस प्रकार बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्यामजी एक तरफ तो संस्कृत के विद्वान् थे, दूसरे समाज सुधारक थे, तीसरे उनके द्वारा भारत की सभ्यता व संस्कृति का ज्ञान फैल रहा था तथा सर्वोपरि व क्रान्तिकारी विचारों के थे। भारत में १८५७ के बाद के इस प्रथम मनीषी चिन्तक व क्रान्तिकारी का सारा जीवन ही राष्ट्र की सेवा में अर्पित रहा तथा इनके कार्यकलापों से न जाने कितने क्रान्तिकारियों ने प्रेरणा लेकर अपना सर्वस्व मातृभूमि की बलिवेदी पर न्यौछावर कर दिया।

Sunday, March 8, 2020

भारतीय दर्शन और महर्षि दयानन्द का दृष्टिकोण



भारतीय दर्शन और महर्षि दयानन्द का दृष्टिकोण

लेखक- आचार्य श्री उदयवीर जी शास्त्री

भारतीय दर्शन साधारण रूप से दो भागों में विभक्त हैं- आस्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शन। आस्तिक दर्शनों में इन छह दर्शनों की गणना की जाती है- सांख्य, वैशेषिक, योग, न्याय, वेदान्त, मीमांसा। नास्तिक दर्शनों में चार्वाक दर्शन, बौद्ध दर्शन तथा जैन दर्शन माने जाते हैं। आस्तिक-नास्तिक दर्शनों का भेद वेदों की मान्यता एवं अमान्यता पर आधारित है। फलतः सभी आस्तिक दर्शन वेदों को न केवल प्रमाण, अपितु 'स्वतः प्रमाण' स्वीकार करते हैं; जबकि नास्तिक दर्शनों को वेदों का किसी प्रकार का प्रमाण तक भी स्वीकार नहीं। इसलिए आस्तिक-नास्तिक दर्शनों के प्रतिपाद्य सिद्धान्तों में अनेकत्र भेद का होना स्वाभाविक है; परन्तु जब आस्तिक दर्शनों में भी परस्पर भेदमूलक मान्यताएं सम्मुख आती हैं, तो यह बड़ा असमंजस-सा प्रतीत होता है।
महर्षि दयानन्द को अपने काल में सर्वसाधारण समाज की तथा समाज में मूर्द्धन्य समझे जाने वाले विशिष्ट अंगों की भी गिरती हुई दशा को सुधार की ओर परिवर्तित करने के लिए सभी तरह के व्यक्तियों के साथ जूझना पड़ा, उसने देखा, कि शास्त्रीय चर्चाओं में विद्वान् समझे जाने वाले व्यक्ति भी बाद आदि कथाओं में दार्शनिक पद्धति की कितनी उच्छृंखलता के साथ अवहेलना करते हैं। दार्शनिक तथ्यों को अपने निराधार मनघड़न्त विचारों के अनुसार तोड़-मरोड़ कर निर्लज्जता से जनता के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं। मूल दर्शनों की संस्थापना करने वालों को भी एक दूसरे का विरोधी बताते हैं, क्या साक्षात्कृतधर्मा ऋषि-मुनियों का कथन परस्पर विरुद्ध माना जा सकता है? सत्य सदा एक होता है, सत्य के दो रूप नहीं हो सकते, तब क्या दर्शनों में उन ऋषि-मुनियों ने सत्य का उत्पादन न कर असत्य को प्रस्तुत किया जाए? ऋषि ने दर्शनों की इस दुर्दशा को गहराई के साथ अन्तर्दृष्टि से देखा-परखा और एक सूत्र खोज निकाला, जिसमें सब दर्शन-माला में मोतियों के समान गुंथे हुए हैं।

सभी दर्शनों का मुख्य प्रतिपाद्य विषय सृष्टि प्रक्रिया का विवरण प्रस्तुत करना है। निश्चित है, सृष्टि (जगत्=विश्व) की रचना का प्रकार एक ही हो सकता है। ऐसी कल्पना सर्वथा निराधार होगी, सर्गादिकाल में अपने अव्यक्त कारणों से विश्व की रचना के प्रकार अनेक हों, और एक-दूसरे से भिन्न हों। इसलिए दर्शनों के जिन व्याख्याकारों ने दर्शनों में विश्व के विभिन्न उपादान कारणों का एवं उनसे उत्पाद्यमान विश्व की विभिन्न रचना-प्रक्रिया का उल्लेख उभारा है, वह संगत नहीं कहा जा सकता है। इसको वास्तविक रूप से समझने और इसके समन्वय के लिए ऋषि ने अपने अमर-ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में वह सूत्र इस प्रकार प्रस्तुत किया है-

"(पूर्वपक्ष) जैसे सत्यासत्य और दूसरे ग्रन्थों का परस्पर विरोध है वैसे अन्य शास्त्रों में भी है। जैसा सृष्टिविषय में छह शास्त्रों का विरोध है। मीमांसा कर्म, वैशेषिक काल, न्याय परमाणु, योग पुरुषार्थ, सांख्य प्रकृति और वेदान्त ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति मानता है; क्या यह विरोध नहीं है? (उत्तरपक्ष) प्रथम तो बिना सांख्य और वेदान्त के दूसरे शास्त्रों में सृष्टि की उत्पत्ति प्रसिद्ध नहीं लिखी और इनमें विरोध नहीं, क्योंकि तुमको विरोधाविरोध का ज्ञान नहीं। मैं तुमसे पूछता हूं कि विरोध किस स्थल में होता है? क्या एक विषय में अथवा भिन्न-भिन्न विषयों में? (पूर्वपक्ष) एक विषय में अनेकों का परस्पर विरुद्ध कथन हो, उसको विरोध कहते हैं, यहां भी सृष्टि का एक ही विषय है। (उत्तरपक्ष) क्या विद्या एक या दो? (पूर्वोपक्ष) एक है। (उत्तरपक्ष) जो एक है तो व्याकरण, वैद्यक, ज्योतिष आदि का भिन्न-भिन्न क्यों है? जैसा एक विद्या में अनेक अवयवों का एक-दूसरे से भिन्न प्रतिपादन होता है, वैसे ही सृष्टि विद्या के भिन्न-भिन्न छह अवयवों का शास्त्रों में प्रतिपादन करने से इनमें कुछ भी विरोध नहीं। जैसे घड़े के बनाने में कर्म, समय, मिट्टी, विचार, संयोग-वियोग आदि का पुरुषार्थ, प्रकृति के गुण और कुम्मार कारण है; वैसे ही सृष्टि का जो कर्म कारण है, उसकी व्याख्या मीमांसा में, समय की व्याख्या वैशेषिक में, उपादान कारण की व्याख्या न्याय में, पुरुषार्थ की व्याख्या योग में, तत्त्वों के अनुक्रम से परिगणन की व्याख्या सांख्य में और निमित्तकारण जो परमेश्वर है उसकी व्याख्या वेदान्त शास्त्र में है। इससे कुछ भी विरोध नहीं। जैसे वैद्यक शास्त्र में निदान, चिकित्सा, औषधिदान और पथ्य के प्रकरण भिन्न-भिन्न कथित हैं, परन्तु सबका सिद्धान्त रोग की निवृत्ति है, वैसे ही सृष्टि के छह कारण हैं। इनमें से एक-एक कारण की व्याख्या एक-एक शास्त्रकार ने की है। इसलिए इनमें कुछ भी विरोध नहीं। इसकी विशेष व्याख्या सृष्टि प्रकरण में कहेंगे।"

एवमेव पूर्व निर्देशानुसार इस विषय को अष्टम समुल्लास के सृष्टि प्रकरण-प्रसंग में इस प्रकार बताया है-

"(पूर्वपक्ष) सृष्टि विषय में वेदादि शास्त्रों का अवरोध है व विरोध? (उत्तरपक्ष) अविरोध है। (पूर्वपक्ष) जो अविरोधी है तो-
तस्माद्वा एत्तस्मादात्मन आकाश: सम्भूत:, आकाशाद्वायु:, वायोरग्नि:, अग्नेराप:, अद्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओषधयः, ओषधिभ्योऽन्नम्, अन्नाद्रेतः रेतसः पुरुषः स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः।।
यह तैत्तिरीय उपनिषद् (ब्रह्मानन्द वल्ली) का वचन है। उस परमेश्वर और प्रकृति से आकाश अवकाश अर्थात् जो कारणरूप द्रव्य सर्वत्र फैल रहा था उस को इकट्ठा करने से अवकाश उत्पन्न सा होता है। वास्तव में आकाश की उत्पत्ति नहीं होती क्योंकि विना आकाश के प्रकृति और परमाणु कहां ठहर सकें? आकाश के पश्चात् वायु, वायु के पश्चात् अग्नि, अग्नि के पश्चात् जल, जल के पश्चात् पृथिवी, पृथिवी से ओषधि, ओषधियों से अन्न, अन्न से वीर्य, वीर्य से पुरुष अर्थात् शरीर उत्पन्न होता है। यहां आकाशादि क्रम से और छान्दोग्य में अग्न्यादि; ऐतरेय में जलादि क्रम से सृष्टि हुई। वेदों में कहीं पुरुष, कहीं हिरण्यगर्भ आदि से मीमांसा में कर्म, वैशेषिक काल, न्याय में परमाणु, योग में पुरुषार्थ, सांख्य में प्रकृति और वेदान्त में ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति मानी है। अब किसको सच्चा और किसको झूठा मानें?
(उत्तरपक्ष) इसमें सब सच्चे, कोई झूठा नहीं। झूठा वह है जो विपरीत समझता है, क्योंकि परमेश्वर निमित्त और प्रकृति जगत् का उपादान कारण है।... छह शास्त्रों में अविरोध देखो इस प्रकार है। मीमांसा में- 'ऐसा कोई भी कार्य जगत् में नहीं होता कि जिस के बनाने में कर्मचेष्टा न की जाय।' वैशेषिक में- 'समय न लगे विना बने ही नहीं।' न्याय में- 'उपादान कारण न होने से कुछ भी नहीं बन सकता।' योग में- 'विद्या, ज्ञान, विचार न किया जाय तो नहीं बन सकता।' सांख्य में- 'तत्त्वों का मेल न होने से नहीं बन सकता।' और वेदान्त में- 'बनाने वाला न बनावे तो कोई भी पदार्थ उत्पन्न हो न सके।' इसलिये सृष्टि छह कारणों से बनती है; उन छह कारणों की व्याख्या एक-एक की एक-एक शास्त्र में है, इसलिए उनमें विरोध कुछ भी नहीं?"
[सत्यार्थप्रकाश, अष्टम समुल्लास; पृष्ठ १८९-१९०, उक्त संस्करण]

उक्त सन्दर्भों द्वारा भारतीय दर्शनों में अविरोध प्रकट करने के लिए ऋषि ने जो सूत्र सुझाया, उसका तात्पर्य केवल इतना है कि दर्शनों के मुख्य प्रतिपाद्य विषय-सृष्टि प्रक्रिया अर्थात् सर्ग रचना के विभिन्न कारण रूप अंगों का उत्पादन एक-एक दर्शन में हुआ है; इसलिए प्रत्येक दर्शन परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं। सर्ग रचना रूप एक ही अर्थ का विवरण प्रस्तुत करने में सबका तात्पर्य है। सर्ग रचना के प्रसंग से सर्ग के स्त्रष्टा परमात्मा का तथा भोक्ता जीवात्मा का विशद वर्णन भी दर्शनों के प्रतिपाद्य विषय में आ जाता है। इसी क्रम से भोक्ता जीवात्मा के भोग साधन देह इन्द्रिय आदि का विवरण प्रसंगानुसार दर्शनों में प्रस्तुत किया गया है।

मीमांसा- शास्त्र में कर्मों का वर्णन है। ये कर्म ऐहिक एवं पारलौकिक फलों के उत्पादक हैं। सामाजिक अथवा मानवीय दृष्टि से यह कर्म यज्ञा-अनुष्ठान रूप हैं और मानव के एवं प्राणिमात्र के अभ्युदय तथा सुख-सुविधा व अनुकूलता का साधन समझा जाता है। गहन शास्त्रीय दृष्टि से विचारने से प्रतीत होता है, यह कर्म समस्त विश्व में अनुस्यूत हैं; उस कर्म व क्रिया को प्रतीक रूप में प्राणी के अभ्युदय के लिए प्रस्तुत शास्त्र में संकलित किया गया। इससे पूर्व भी यह सब अनुष्ठान ऋषियों द्वारा बोधित मानव समाज में क्रमानुक्रमपूर्वक चले आते हैं। सृष्टि-रचना में इनके अनुषक्त होने की भावना शास्त्र द्वारा अनेक प्रकार से प्रकट हो गई है। इस रूप में जगत्स्त्रष्टा की भावना को उपनिषद् यह कहकर प्रकट करते हैं-
"आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्,
नान्यत् किञ्चन भिषत्।
स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति।
स इमांल्लोका नष्टजत।" [ऐतरेय उपनिषद्, प्रारम्भिक भाग]
सर्ग से पूर्व एक आत्मा ही था; अन्य कोई पदार्थ व्यापार या क्रिया करता हुआ न था। क्योंकि तब यह समस्त विश्व अपने मूल उपादान कारण में लीन था। उस ब्रह्म रूप आत्मा ने ईक्षण किया- मैं लोकों का निर्माण करूँ। उसने इन सब लोकों को बनाया। उसी को अन्यत्र 'स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया च' कहा है। उस जगत्स्त्रष्टा में अनन्त ज्ञान, बल, क्रिया सम्भव है। वह उपादान तत्त्वों को अपनी अनन्त शक्ति से ज्ञानपूर्वक प्रेरित कर जगत् की रचना करता है। परमात्मा के 'प्रेरणा रूप, कर्म अथवा क्रिया के प्रतीक रूप में मीमांसा शास्त्र द्वारा यज्ञादि कर्म का वर्णन किया गया है।'

वैशेषिक- के लिए कहा गया, वह कालरूप कारण का वर्णन करता है। प्रत्येक कार्य के होने में काल अवश्य कारण रहता है इस शास्त्र के व्याख्याकारों ने कहा है- 'जन्यानां जनक: कालो जगतामाश्रयो मत:।' समस्त उत्पन्न होने वाले पदार्थों का काल कारण होता है। इसी मान्यता को स्वीकार करते हुए महाभारत आदि में कहा गया है-
काल: सृजति भूतानि काल: संहरते प्रजा:।
वस्तुमात्र की उत्पत्ति और संहार आदि में सर्वत्र काल की कारणता निर्बाध स्वीकार की जाती है। इस आधार पर श्वेताश्वतर उपनिषद् की प्रारम्भिक दूसरी कण्डिका में विश्व के कारणों का विवरण देने की भावना से उपनिषद्कार 'काल' का सर्वप्रथम उल्लेख किया है। इस मान्यता का मूल आधार वैशेषिक का यह सूत्र है-
नित्येष्वभावादनित्येषु भावात् कारणे कालारख्येति। [२/२/९]
देर, जल्दी, एक साथ, पर, ऊपर, छोटा, बड़ा आदि व्यवहार नित्य पदार्थों में नहीं होता, अनित्यों में होता है, इससे सिद्ध है- कार्यमात्र के कारण रूप में 'काल' का नाम लिया जाता है। यह विवरण वैशेषिक दर्शन प्रस्तुत करता है।

न्याय शास्त्र- के विषय में कहा गया- वह उपादान कारण का दर्शन कराता है। विचारणीय है- न्यायदर्शन में जिस प्रकार तत्त्वों का निरूपण किया गया है, उसका उल्लेख दर्शन के प्रथम सूत्र में है; पर वहां परमाणु या किसी मूल कारण तत्त्व का नाम तक नहीं। सत्यार्थप्रकाश में यह बात न्याय-दर्शन के किस विवरण के आधार पर लिखी गई है, यह ऋषि के गम्भीर अध्ययन एवं तत्त्वविवेचन के सूक्ष्मेक्षण को अभिव्यक्त करता है। शरीरादि-उत्पत्ति के प्रसंगवश चौथे अध्याय के प्रथम आह्निक में इसका स्पष्ट विवरण उपलब्ध होता है। वहां तीन सूत्र [११ से १३] द्रष्टव्य है।
उनका संक्षिप्त सार केवल इतना है, कि परम सूक्ष्म पृथिव्यादि परमाणुओं से स्थूल पृथिव्यादि तथा देहादि की उत्पत्ति होती है। वे परमाणु अतीन्द्रिय होते हुए भी व्यक्त हैं। व्यक्त जगत् अपने समानजातीय व्यक्त परमाणुओं से उत्पन्न हो सकता है। परमाणु से जगदुत्पत्ति का इतना स्पष्ट निर्देश अन्य किसी दर्शन में नहीं है। यद्यपि यह तथ्य ऋषि की दृष्टि से ओझल नहीं था कि न्यायदर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य विषय जगत् के उपादान कारण का विवरण प्रस्तुत करना नहीं है; यह बात तृतीय समुल्लास के इस प्रसंग के प्रश्न का उत्तर देते हुए ऋषि ने लिखी है। वहां का लेख है-
"प्रथम तो बिना सांख्य और वेदान्त के दूसरे चार शास्त्रों में सृष्टि की उत्पत्ति प्रसिद्ध नहीं लिखी।"
इसका स्पष्ट तात्पर्य यही है, कि सृष्टि की उत्पत्ति के मुख्य कारण उपादान और निमित्त का केवल दो शास्त्रों में वर्णन किया गया है, सांख्य और वेदान्त में। सांख्य में उपादान कारण का विस्तृत विवरण है, तथा वेदान्त में निमित्त कारण का। जगत् का उपादान कारण प्रकृति और निमित्त कारण ब्रह्म है। शेष चार शास्त्रों में इन्हीं के अंगभूत तत्त्वों का विवेचन हुआ है; इसलिए इन सब में विरोध की आशंका सर्वथा निर्मूल है।

यह स्पष्ट है- ऋषि ने परमाणु को अनित्य माना है और उसे अव्यक्त नित्य प्रकृति से उत्पन्न हुआ बताया है। अष्टम समुल्लास के इस प्रसंग में ऋषि ने संस्कृत-सन्दर्भ इस प्रकार लिखा है-
"नित्यायाः सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्थायाः प्रकृतेरुत्पन्नानां परमसूक्ष्माणां पृथक् पृथग्वर्त्तमानानां तत्त्वपरमाणूनां प्रथमः संयोगारम्भः संयोगविशेषादवस्थान्तरस्य स्थूलाकारप्राप्तिः सृष्टिरुच्यते।।"
यह संस्कृत सन्दर्भ ऋषि का अपना लिखा प्रतीत होता है। परन्तु इसका मूल योगदर्शन [१/४४ सूत्र] के व्यासभाष्य की वाचस्पति मिश्रकृत टीका-तत्त्ववैशादी में उपलब्ध है।
ऋषि ने इन्हीं आधारों पर उपादान कारण के रूप में परमाणु के साथ प्रकृति का प्रायः सर्वत्र प्रथम निर्देश किया है। तात्पर्य यह है कार्यमात्र समस्त विश्व का मूल उपादान कारण प्रकृति है; तथा स्थूल जगत् की उत्पत्ति से पूर्व का कारण पृथिव्यादि परमाणु हैं। इसी कारण उक्त सन्दर्भ के अन्त में 'संयोगविशेषाद-वस्थान्तरस्य स्थूलाकार प्राप्ति:' पद दिए गए हैं।
इस प्रकार उक्त पंक्तियों द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि न्याय में उपादान कारण के विवरण की वास्तविकता क्या है और उसके रहते शास्त्र के अविरोध एवं समन्वय का स्वरूप क्या हो सकता है।

योग- में "पुरुषार्थ एवं विद्या, ज्ञान, विचार न किया जाये, तो नहीं बन सकता।" मानव द्वारा की गई प्रत्येक रचना में उक्त सभी बातों की आवश्यकता रहती है। इसी के अनुरूप सर्ग रचना में इनका अनुमान किया जाता है। योगशास्त्र आत्मज्ञान अथवा तत्त्वसाक्षात्कार एवं आत्माऽनात्मविवेक की प्रयोगात्मक पद्धति का विवरण प्रस्तुत करता है। अभ्यास अथवा प्रयोग के लिए आचरण में आने वाले विनिय अंगों का एक विशेष अनुक्रम रहता है। यदि उसी प्रकार अभ्यास या प्रयोग किया जाता है, तो सिद्धि रचना की सफलता सम्भावित रहती है। प्रयोगात्मक पद्धति की इसी विशेषता का निर्देशन योगशास्त्र करता है, जो रचनामात्र में अपेक्षित है। इसका विरोध किसी के साथ सम्भव नहीं, न इसकी उपेक्षा की कहीं सम्भावना है। सर्ग रचना के इसी अंश का अभिव्यञ्जन योगशास्त्र करता।

सांख्य- में "तत्वों का मेल न होने से नहीं बन सकता।" 'तत्वों का मेल' इन पदों से केवल संयोग मात्र अपेक्षित नहीं है। कार्य मात्र के मूलभूत तत्व सत्त्व, रजस्, तमस् का परस्पर एक दूसरे में मिथुनीभूत हो जाना 'मेल' का तात्पर्य है। इन गुणों का ऐसा मेल तत्त्वों की एक भिन्न अवस्था को अभिव्यक्त करने में समर्थ होता है। परस्पर नितान्त विजातीय इन गुणों (प्रकृति रूप मूल तत्त्वों) के मिथुनीभूत होने के प्रकार की कोई सीमा नहीं है, इसी कारण ये गुण मिथुनीभाव की प्रक्रिया से अनन्त प्रकारों में परिणत हो जाते हैं, जिसे विश्व के रूप में क्रान्तदर्शी मानव देखने का प्रयास करता रहता है। सत्त्व रजस्तमो रूप मूल प्रकृति के विविध परिणामों की प्रक्रिया का विवरण सांख्यदर्शन प्रस्तुत करता है। इस प्रकार वास्तविक तथ्य के रूप में विश्व का उपादान कारण त्रिगुणात्मक प्रकृति है। ऋषि ने इसी मान्यता को आदर दिया है, जैसा कि इसी लेख में प्रथम निर्देश किया गया है।

वेदान्त- में 'बनाने वाला न बनावे तो कोई भी पदार्थ उत्पन्न न हो सके।' यह अत्यन्त स्पष्ट एवं निर्विवाद तथ्य है, कि वेदान्त दर्शन जगत्स्त्रष्टा ब्रह्म का सर्वांग पूर्ण विवरण प्रस्तुत करता है।

इस प्रकार छहों दर्शन सृष्टि रचना सम्बन्धी अपेक्षित विविध साधनांगों का निरूपण करते हैं, जो एक-दूसरे के पूरक हैं।
यदि ऋषि के द्वारा सुझाये गये दार्शनिक समन्वय के इस सिद्धान्त को गम्भीरता एवं उदारतापूर्वक लिया जाये, तो तथाकथित नास्तिक दर्शनों के साथ भी समन्वय के मार्ग में कोई भारी अनिवार्य रुकावट दिखाई नहीं देती। तब ऐसा प्रतीत होता है, कि विभिन्न आचार्यों ने अपने काल में तत्त्व जिज्ञासा की पूर्ति के लिए जिस अंश व अंग का तात्कालिक अभ्युदय एवं अन्य सामाजिक सुविधाओं व अनुकूलताओं के लिए अधिक उपयोगी समझा, उसका सुझाव दिया, जिसकी कालान्त में स्वार्थी अखाड़ेबाजों ने अपनी संकुचित सिद्धि के लिए साधन बना डाला, मूल आचार्य का सद्भावना पूर्ण लक्ष्य सर्वथा तिरोहित कर दिया गया। आइये, इस पर विचार करें।

चार्वाक- दर्शन चेतन-अचेतन रूप में तत्त्वों का विवेचन प्रस्तुत करता है। चार्वाक दर्शन की इस मान्यता को जब विचार-कोटि में लाया जाता है, कि इस समस्त चर-अचर एवं जड़-चेतन जगत् का मूल आधार तत्त्व केवल जड़ है, तब उसका तात्पर्य केवल इतने अर्थ के प्रतिपादन में समझना चाहिए, कि इस लोक में मानव मात्र की सुख-सुविधा- और सब प्रकार के अभ्युदय के लिए सर्वप्रथम तथाकथित जड़तत्त्व की यथार्थता और उसकी प्राणि-कल्याणकारी उपयोगिता को जानना परम आवश्यक है। उसकी उपेक्षा कर संसार में हमारा सुखी रहना सम्भव न होगा।
चार्वाक दर्शन के सामने जब यह जिज्ञासा की जाती है कि क्या जड़ तत्त्व से अतिरिक्त चेतन तत्त्व का नित्य अस्तित्व नहीं माना जाना चाहिए? तब समाधान रूप में चार्वाक दर्शन का यही कहना है, कि चेतन के अस्तित्व से उसे कोई इन्कार नहीं है, पर वह नित्य है, या कैसा है, कहां से आता है, कहां जाता है? संसार को बनाने वाला कौन है? इत्यादि विचार-मन्थन उस समय तक अनपेक्षित है, जब तक उन तत्त्वों की यथार्थता व उपयोगिता को नहीं जान लिया जाता, जिन पर हमारा वर्तमान अस्तित्व निर्भर है। मरने के बाद क्या होगा? इसकी अपेक्षा यह अधिक आवश्यक है, कि हम जीवित कैसे रह सकते हैं।

जैनबौद्धदर्शन- ये दर्शन जड़ तत्त्व से अतिरिक्त चेतन तत्त्व के स्वतन्त्र अस्तित्व का उपदेश करते हैं। जैनदर्शन चेतन (आत्म) तत्त्व को जहां संकोच विकासशील बताता है, दूसरा उसे ज्ञानस्वरूप मानकर क्षणिक कहता है, और उसके निर्विकार भाव को अक्षुण्ण बनाये रखना चाहता है। बौद्ध-दर्शन में विभिन्न अधिकारी-स्तर की भावना से ज्ञान-रूप (अथवा विज्ञान रूप) चेतनतत्त्व का विवेचन उस स्थिति तक पहुंचा दिया गया है, जहां यह प्रतिपादन किया जाता है कि समस्त चराचर जड़-चेतन जगत् उस विज्ञान का ही आभास है। बाह्य का स्वतन्त्र अस्तित्व कुछ नहीं। ये सब तत्त्व विचार के विभिन्न स्तर हैं। फलतः चेतन-अचेतन के विभिन्न प्रकार के विवेचन में परस्पर विरोध की न होकर जिज्ञासु अधिकारी के कल्याण की भावना अधिक है।

इस प्रसंग में वस्तुभूत तथ्य यह ज्ञात होता है, कि तथाकथित नास्तिक दर्शन के मूल प्रवक्ताओं ने ईश्वर- अथवा ऐसी परमशक्ति, जो समस्त विश्व का नियन्त्रण करती है उसके अस्तित्व का निषेध नहीं किया। उन्होंने किन्हीं विशेष परिस्थितियों से बाधित होकर वैसा प्रवचन किया। वे परिस्थितियां चाहे जिज्ञासु जनों की योग्यता पर आधारित रही हों, प्रतीत होता है- उस-उस काल के लोक कर्त्ता व्यक्तियों ने ईश्वर या तत्सम्बन्धी मान्यताओं को अवाञ्छनीय सामाजिक संघर्ष का अनवेक्षित कारण समझकर लोगों को सुझाया हो, कि अरे भाई! इन अदृश्य तत्त्वों को थोड़े समय के लिए एक ओर रहने दो, अपने वर्तमान जीवन को सुधारो, सबके कल्याण के लिए, सदाचार पर ध्यान दो, परस्पर सहानुभूति से रहना सीखो, उससे हमारा यह लोक सुखमय होगा, और परलोक भी। ऐसे आचरणों से ईश्वर तक भी पहुंचा जा सकता है। उन्होंने समाज के सदाचार पर अधिक बल दिया। इसकी तब अपेक्षा रही होगी। वस्तुतः इसकी अपेक्षा सदा रहती है। उन प्रवक्ताओं का तात्पर्य ईश्वर के अस्तित्व तथा वेदों की मान्यता के नकार में नहीं समझना चाहिए तब ऐसे विरोध की भावना इन दर्शनों के मूल में कहां रह जाती है?

आदि प्रवक्ताओं के जन कल्याणकारी लक्ष्य विभिन्न विचारों की इन काली-पीली आंधियों में तिरोहित हो चुके हैं। तत्त्व की खोज में यही भावना जिज्ञासु को सच्चाई के अन्तिम लक्ष्य तक पहुंचा सकती है, कि सृष्टि के इस अनवरत प्रवाह में वे सब विचार अपने स्थान व अपने स्तर पर ठीक हैं, सत्य से अधिचारित हैं। उनमें छिपे यथार्थ को उभार लाने के लिए आज तक जो सफल प्रयास किये गए हैं, उनसे दार्शनिक तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप को समझने में पूरा सहयोग प्राप्त हुआ है।

इस लघुकाय लेख में, प्रकट किए विचार दिग्दर्शनमात्र हैं। आर्य विद्वान् इस पर गम्भीर विचार कर उपयुक्त सुझाव देंगे, तो बड़ा कार्य होगा।

[स्त्रोत- आर्य मर्यादा : आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का प्रमुख पत्र का मार्च २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

Saturday, March 7, 2020

शिवरात्रि पर्व और ऋषिबोधोत्सव



शिवरात्रि पर्व और ऋषिबोधोत्सव

लेखक- प्रा० श्री भद्रसेन (होशियारपुर)

पर्व शब्द का अर्थ है- मेल और इसका अभिप्राय है- संगठन प्रसन्नता। भारतीय पर्वों में महाशिवरात्रि का एक धार्मिक पर्व के रूप में एक विशेष गौरवपूर्ण स्थान है, आर्य समाज की दृष्टि से शिवरात्रि जहां धार्मिक पर्व है, वहां ऐतिहासिक पर्व भी है। इसीलिए ही इस पर्व को ऋषिबोधोत्सव के नाम से भी स्मरण किया जाता है। क्योंकि-

महर्षि दयानन्द सरस्वती के जीवन से परिचित पाठक जानते हैं, कि बालक मूलशंकर का १३ वर्ष तक का जीवन दूसरे बच्चों की तरह ही बीता और १४वें वर्ष मूल के पिता जी ने कहा- 'बेटा! कल शिवरात्रि का पर्व है; अतः आज कथा सुनने के लिए जायेंगे।' बालक मूल नई चीज की खुशी में पिता जी के साथ कथा सुनने के लिए गया। वहां बड़ी उत्सुकता, श्रद्धा से कथा को सुना, जिस में कथावाचक ने बड़े विस्तार से शिव देवता की वीरता की घटनायें सुनाई और ऐसे शिव के व्रत रखने की पद्धति और महिमा बताई। यह सब सुनकर घर लौटते हुए मूल ने पिता जी से कहा- इस बार मैं भी शिवरात्रि का व्रत रखूंगा।

एक धार्मिक पिता के लिए इससे अधिक बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि उसका पुत्र स्वयं कहे, कि मैं अपने धर्म की मर्यादा के अनुसार यह व्रत रखूंगा। अतः पिता जी ने बालक को व्रत रखने के लिए प्रोत्साहित किया। परन्तु जब मूल की माता को इस बात का पता लगा, तो उस ममतामयी मां ने व्रत के नियमों की कठिनता को अनुभव करते हुए ऐसी प्रतिज्ञा न करने की बात कही, पर मूलशंकर अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। पद्धति के अनुरूप बालक मूल ने सारा दिन निराहार व्रत बड़ी श्रद्धा से रखा और सायंकाल बड़ी निष्ठा के साथ पिता जी के साथ रात्रि जागरण के लिए टंकारा के शिव मन्दिर में गया। वहां पूजा, कीर्तन के साथ रात्रि जागरण प्रारम्भ हुआ।
कुछ समय पश्चात् कई भक्त घर चले गए और कई वहीं पर पीछे हटकर सो गए। मूल शिव के दर्शनों की उत्सुकता में जब जागने का जबरदस्ती प्रयास कर रहा था, तब उसने चूहों को शिव पर अर्पित मिठाई, फल खाते हुए देखा। आश्चर्य से भर कर मूल ने पिता जी को जगाकर पूछा, शिव जी इनको हटाते क्यों नहीं? इस प्रकार मूल ने प्रश्न पर प्रश्न किए। पिता जी ने मूल के प्रश्नों का उत्तर देते हुए प्रसंगवश कहा- सच्चे शिव तो कैलाश में रहते हैं। प्रश्नों के उत्तरों से सन्तुष्ट न होने पर मूल ने पिता जी से घर जाने की आज्ञा ली और अपने मन में सच्चे शिव के दर्शनों की प्रतिज्ञा करते हुए वह घर लौट गया।
इस घटना चक्र से मूलशंकर के मन में एक ऊहा-पोह, उपजा और विचार स्वातन्त्र्य, सच्चाई को समझने, कार्य-कारणभाव को जानने की ज्योति जगमगाई। इसके पश्चात् मूल से शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी और फिर दयानन्द संन्यासी बनकर सच्चे गुरु की खोज की और ब्रह्मर्षि गुरु विरजानन्द दण्डी से सम्पर्क किया तथा गुरु की आज्ञा के अनुसार आर्षज्ञान की ज्योति प्रकाशित करते हुए महर्षि दयानन्द ने जीवन के सच्चे शिव को स्पष्ट, सुनिश्चित करने का प्रयास किया। वस्तुतः यही ऋषि का वह बोध है, था, जिसका उत्सव आर्य समाज इस पर्व पर अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए आयोजित करता है।

१८३८ की शिवरात न केवल मूलशंकर के लिए कल्याण की रात बनी, अपितु मूल से बने महर्षि दयानन्द द्वारा करोड़ों के कल्याण का कारण सिद्ध हुई। शिव तथा शिव के जितने भी पर्यायवाची शब्द- शम्भु, शंकर, मयस्कर, मयोभव, मृड आदि हैं, उन सबका अर्थ कल्याण, सुख ही है। सारा भारतीय साहित्य-धर्म को ही सुख का आधार, मूलस्रोत मानता है और इसी आधार पर महर्षि ने अपनी रचनाओं में अनेक बार धर्म को ही सुख, कल्याण का सर्वस्व सिद्ध किया है। जैसे कि- 'धर्मजन्य सुखरूप फल-जो विद्या पढ़ के धर्माचरण करता है, वही सम्पूर्ण सुख को प्राप्त होता है (सत्यार्थप्रकाश ३,५२), निश्चय जानों कि वह अधर्माचरण धीरे-धीरे तुम्हारे सुख के मूल को काटता चला जाता है (सत्यार्थप्रकाश ४,९५), धर्म का फल सुख (सत्यार्थप्रकाश ४,९७), और इसी भावना से महर्षि ने यह मूलमन्तव्य निर्दिष्ट किया है, कि 'सब काम धर्मानुसार (आर्यसमाज नियम ५) अर्थात् हमारे जीवन के हर क्षेत्र का प्रत्येक कार्य धर्म के ही अनुसार हो। अतः इस शिव=कल्याण के महान पर्व पर कल्याणकारक धर्म के रूप को जानना, समझना, अपनाना प्रथम बात हो जाती है।'

वस्तुतः शिव का रहस्य, मर्म या मार्ग धर्म का आचरण ही है। धर्म शब्द धृ धातु से मनिन प्रत्यय होने से बनता है। जिसका अर्थ है- धारण अर्थात् जिसके धारण, पालन से सुख प्राप्त हो। जो धर्म का फल स्वर्ग, जन्नत मानते हैं, उनकी दृष्टि में स्वर्ग की कल्पना सुख रूप ही है। धर्म का ईश्वर भक्ति एक प्रमुख तत्त्व है, और ईश्वर- आनन्द, सुख, कल्याण का खजाना है। हां, परमात्मा का मुख्य स्वरूप कर्म फल देना ही है। शेष सारे गुण इसी के अन्दर आ जाते हैं। अतः अच्छा फल प्राप्त करने के लिए अच्छे कर्म-धर्म का आचरण ही एक मात्र सुख का आधार है। महर्षि ने इसी दृष्टि से जहां ईश्वर भक्ति का वर्णन किया है, वहां धर्म को बताने के कारण ही वेद को इतना अधिक महत्त्व दिया है। सारा भारतीय साहित्य इसका साक्षी है और तभी तो यह कहा जाता है, कि 'धर्म जिज्ञासमाननां प्रमाणं परमं श्रुति: (२,१३)= जो धर्म को समझना चाहते हैं, वे वेद द्वारा ही धर्म का निश्चय करें', 'क्योंकि धर्म अधर्म का निश्चय बिना वेद के ठीक-ठीक नहीं होता (सत्यार्थप्रकाश ३,५२)।'

मीमांसा दर्शन, मनुस्मृति आदि शास्त्र धर्म की पहचान हित के रूप में ही बताते हैं। तभी तो सन्त तुलसीदास जी ने लिखा है- 'परहित सरस धर्म नहीं भाई' और शिव का अर्थ भी कल्याण ही है, अतः इस शुभ पर्व पर कल्याण के आधार धर्म को समझना बहुत जरूरी हो जाता है, क्योंकि भारतीय शास्त्रों और हमारे व्यवहार में धर्म शब्द अनेक अर्थों में आता है, अतः उसके सही रूप और प्रसंग को समझने के लिए यह जानना बहुत जरूरी है, कहां किस का वाचक है? तभी तो मनुस्मृति में कहा है- 'आचार: परमो धर्म: (१/१०८)' अर्थात् आचरण सबसे बड़ा धर्म है और अन्य धर्म के अर्थ, रूप=धर्मग्रन्थ, स्थान, विश्वास, जप, तप, तीर्थ, यज्ञ, पूजापाठ, सत्संग आदि सड़क के बोर्डों की तरह रास्ता दिखाने वाले हैं, हृदय शुद्धि के लिए हैं।

जैसे कि धर्म= अच्छाई, भलाई ही है, इस पर पक्का रहने के लिए ही हम धर्मग्रन्थ पढ़ते हैं, सत्संग करते हैं। इसीलिए मनु जी ने धृति, क्षमा, संयम, सच्चाई आदि दश बातों को धर्म कहा है। जो कि आचरण, अच्छाई की ही बातें हैं। इनको पालने से ही जीवन, परिवार, समाज सुखी होता है। धर्म के जितने भी अर्थ मिलते हैं, उनका असली आधार, मूल जड़-आचार=आचरण, अच्छाई, भलाई ही है। इस मूल बात को न समझने के कारण अर्थात् जड़ को न सींचने के कारण आज धर्म के नाम पर ताण्डव नाच हो रहा है, जिससे परस्पर ईर्ष्या, द्वेष, विनाश ही सामने आ रहा है। हम जड़ को सींचने के स्थान पर पत्तों को पानी दे रहे हैं, फिर भी अच्छे फलों की आशा करते हैं।
यह मानी हुई बात है, कि कृषि या बागवानी में अच्छे फल या हरा-भरापन तभी प्राप्त होता है, जब मूल सजीव होता है, जड़ को सींचा जाता है। इसी स्थिति में ही फसल या पौधे, वृक्ष का विकास होता है। इसीलिए उपनिषद् के ऋषि ने सन्देश दिया है, कि 'सन्मूला: सोम्येभा: सर्वा: प्रजा: (छान्दोग्य० ६/८/४)' क्योंकि मूल के सजीव होने पर ही शाखा, पत्ते, फूल, फल पनपते हैं। पत्तों को पानी देने से फल हरा-भरापन, प्रगति नहीं आती। ठीक इसी प्रकार आर्यों! शिवरात्रि को मानने वालों! आओ सोचें, कि हम अपने जीवन, परिवार, समाज में जिस प्रगति, सफलता, हरे-भरेपन को चाहते हैं, क्या उसी की जड़ को सींच रहे हैं, या उसके पत्तों को पानी दे रहे हैं? जैसे कि धर्म का मूल- आचार=अच्छाई है और धर्म के नाम से पुकारे जाने वाले पूजा-पाठ, जप, तप, तीर्थ, ग्रन्थ, स्थल, स्नान, पत्ते हैं, पर जहां कहीं देखो।

आज सर्वत्र पत्तों को प्रमुखता दी जा रही है। इसीलिए पत्तों को पानी देने से धर्म का फल सुख, स्नेह, सद्भाव सामने लाने वाले आर्य समाज के कार्यकर्ताओं रूपी मूलों, जड़ों को सींचने के स्थान पर जो कभी भूलकर आर्य समाज में एक दिन आ जाते हैं, हम केवल उन्हीं का स्वागत, सत्कार, अभिनन्दन करते हैं, जबकि आर्य समाज का कार्य प्रतिदिन करने वाले उपेक्षित रहते हैं।
आर्य समाज (के प्रसार) का मूल स्थानीय आर्य समाजें हैं और आर्य समाज के प्रचार की जड़ आर्य समाज के सत्संग हैं, क्योंकि उनमें ही हम अपने सदस्यों के विचारों, भावनाओं को सुदृढ़ करते हैं। अतः वार्षिक उत्सवों, विशेष समारोहों की तरह उनकी ओर ध्यान देना चाहिए। उन पर भी विशेष व्यय करना चाहिए, उन सत्संगों में योग्य विद्वानों को उत्सव की तरह बुलाया जाए। उस समय अपने सदस्यों से आने वाले का परिचय हो, अपने सदस्यों की शंकाओं, जिज्ञासाओं, विचारों पर विचार हो। इससे वे आर्य समाज से अपमान अनुभव कर सकेंगे और सदस्य आर्य समाज के सुदृढ़ स्तम्भ सिद्ध होंगे। तब वे आर्य समाज की जड़ बनकर विकास में सहयोगी हो सकेंगे।

आर्यसमाज का इतिहास इस बात का साक्षी है, कि जब तक आर्य समाज के सत्संग सोत्साह, होते रहे, तभी तक आर्य समाज पनपता रहा। अतः आर्य समाज की शिवरात्रि=कल्याण की घड़ी की मांग है, कि हम अपनी स्थानीय आर्यसमाजों, छोटे समझे जाने वाले कार्यकर्त्ताओं, सदस्यों पर विशेष ध्यान दें। ये आर्य समाज की प्रगति की जड़ है, जिन 'जड़ों को सींचने से' आर्य समाज हरा-भरा हो सकता है।

[स्त्रोत- आर्य मर्यादा : आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का प्रमुख पत्र का मार्च २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

महर्षि के जीवन पर एक दृष्टि - ऋषि दर्शन



महर्षि के जीवन पर एक दृष्टि - ऋषि दर्शन

लेखक- स्व० श्री पं० चमूपति जी, एम०ए०

ऋषि दयानन्द की जन्मभूमि होने का गौरव गुजरात प्रान्त को है। पिता जन्म के ब्राह्मण थे, और भूमिहारी तथा जमीदारी का कार्य करते थे। शिव के बड़े भक्त थे। शिवरात्रि के दिन बालक को मन्दिर में ले गए और उसे उपवास करा जागरण का आदेश दिया। जब बड़े-बड़े शिव-भक्त सो गए, यह भावी ऋषि प्रयत्नपूर्वक जागता रहा। गीता के कथनानुसार-
"या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।"
इनके हृदय में भक्ति का नया उदय हुआ था। यह इसी रात में शिव को रिझा लेना चाहते थे। नींद आती पर पानी के छींटों से उसे दूर भगाते। इतने में एक चूहे ने सचेत किया! उस क्षुद्र पशु को महान् पशुपति के आगे उद्धत होता देखकर विचार आया- हो न हो यह शिव नहीं। दूसरों का व्रतभंग आलस्य ने किया था इनका तर्क ने। तर्क जीवन की भूमिका थी, आलस्य मौत की। शिवरात्रि बीत गई, परन्तु शिवरात्रि की घटना हृदय में गड़-सी गई।
मूलशंकर के बढ़ते यौवन को दूसरी चेतावनी उनके चाचा और भगिनी की मृत्यु से मिली। चाचा के लाडले थे, उनका वियोग सहा न जाता था, भगिनी को महामारी ने मारा। इन दो मौतों का प्रभाव एक-सा नहीं हुआ। प्रथम, मृत्यु पर आश्चर्य चकित रहे और पाषाण-हृदय की उपाधि पाई, दूसरी पर बिलख-बिलख कर रोए।

शिक्षा और गृहत्याग- मूलशंकर की शिक्षा का प्रबन्ध इनके बाल्यकाल में किया गया था। इन्हें यजुर्वेद कण्ठस्थ था और भी बहुत कुछ पढ़ा-लिखा करते थे। पिता को पता लगा कि बालक पर वैराग्य का भूत सवार है। महात्मा बुद्ध के पिता की तरह इन्हें विवाह की डोरों में फांसने की ठानी। परन्तु ठीक विवाह की रात्रि को मूलशंकर घर से लुप्त हो गए।

वन यात्रा- मूलशंकर की कथा बहुत लम्बी है। पहले तो किसी ने ठग लिया। इन्हें शुद्ध चेतन नाम देकर नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनाया। फिर यह संन्यासी हुए और दयानन्द नाम पाया। योगियों के पास योग साधना सीखते रहे। समाधि का आनन्द लाभ किया। गिरी-गुहाओं में घण्टों बिताए। पुस्तकें खोजीं और उनका अध्ययन किया। मैदानों में सोए, वृक्षों की शाखाओं में विश्राम किया। मूलकन्द खाकर भूख मिटाई। सार यह कि पूर्ण वनचर का-सा जीवन व्यतीत किया।

गुरु विरजानन्द के चरणों में- ३६ वर्ष से ऊपर के थे जब दण्डी विरजानन्द के द्वार पर विद्यावित्त के भिक्षु हुए। वहां पहली भेंट यह करनी पड़ी कि जो पुस्तक पढ़े हैं सब यमुना मय्या के अर्पण करो। हाथ लिखे पुस्तक बड़ी कठिनता से हाथ आए थे। पर गुरु-मुख का उपदेश भी तो सुलभ न था। जी कड़ा किया और गुरु की आज्ञा पालन की। आदर्श शिष्य आदर्श गुरु के चरणों में आदर्श शिक्षा प्राप्त कर रहा था। नित्य प्रति यमुना के जल से गुरु जी को स्नान कराते। कुटी में झाड़ू देते, गुरु की सेवा शुश्रुषा करते। गुरु ने एक दिन डण्ड से ताड़ना की, यतिवर ने गुरु-गौरव का प्रसाद मान स्वीकार की। अन्त में दीक्षान्त का समय आया। निर्धन ब्रह्मचारी गुरुदक्षिणार्थ लोगों की भीख मांग लाया। हां दैव! स्वीकार न हुई। 'क्या भेंट करूँ।' जो तुम्हारे पास हो। 'मेरे पास मेरे अपने सिवा कुछ नहीं।' 'तो अपने आप भेंट करो।' भेंट करी की। गुरु ने अंगीकार की। वही अपने आपकी भेंट मानो आर्य-समाज की स्थापना का प्रथम बीज थी। 'दयानन्द विरजानन्द का हुआ और विरजानन्द के हाथों सारे संसार का।'

पाखण्ड खण्डनी- अब पुष्कर के मेले में दयानन्द पहुंचता है, कुम्भ के महोत्सव सब में दयानन्द गरजता है। वेद से उलटे जाते वैदिकधर्मियों को वेद के पथ पर लाना चाहता है। एक ओर सारी भ्रान्त आर्य जाति है दूसरी ओर अकेला दण्डधारी दयानन्द। 'पाखण्ड खण्डिनी पताका' के नीचे खड़ा कौपीनधारी ब्रह्मचारी आते जाते के लिए अचम्भा था। लोग कहते थे, गंगा के प्रवाह को रोकने का सामर्थ्य इसमें कहाँ? स्वयं भगीरथ आएं तो न रोक सकें।

तपस्या की पराकाष्ठा- ऋषि गरज-गरज कर हार गए। गंगा बहती गई और उसके साथ हिन्दू भ्रान्तियों का प्रवाह भी बहता गया। ऋषि ने डेरा डण्डा उठाया और वनों की राह ली। पूर्ण वीतराग होने का व्रत किया कि कौपीन के अतिरिक्त कोई चीज पास न रखेंगे। महाभाष्य की एक प्रति पास थी, सो भी गुरुवर की सेवा में भेज दी। इसी कौपीन में दयानन्द सोते, इसी में फिरते। नहाकर इसे सूखने को डालते और स्वयं पद्मासन लगाकर बैठे रहते। हिमाच्छन्ल नालों में क्या और जलती रेतों पर क्या दयानन्द का यही पहरावा रहा।

शास्त्रार्थ- कोई दो वर्ष दयानन्द ने इसी प्रकार तितिक्षा में काटे। फिर प्रचार में प्रवृत्त हुए। शास्त्रार्थ पर शास्त्रार्थ करते चले गए। हीरावल्लभ नाम के एक प्रौढ़ पण्डित ने सप्ताह भर संस्कृत में शास्त्रार्थ किया। उनका संकल्प था कि ऋषि से मूर्ति को भोग लगवा कर उठूंगा। ऋषि का पक्ष सुना तो ठाकुर जी को उठाकर गंगा में प्रवाहित किया और मुक्त कण्ठ से माना कि मूर्ति-पूजा शास्त्र विरुद्ध है।
ऋषि के उपदेश में जादू था। कण्ठियां उतरवा दी, मूर्तियां फिंकवा दीं, तिलक छाप की रीति मिटा दी। गायत्री का प्रचार किया। सन्ध्या-लिख लिख बांटी। स्त्रियों को मन्त्र जाप का अधिकार दिया। जाटों, राजपूतों को यज्ञोपवीत पहनाए।

आर्य धर्म की जय- चान्दपुर के शास्त्रार्थ में ऋषि ने आर्य जाति के इतिहास में एक नए युग का बीजारोपण किया। आर्य-आर्य तो आपस में विवाद करते ही थे। मुसलमानों, ईसाइयों से इनकी कभी न ठनी थी। इससे पूर्व प्रथा यह थी कि अहिन्दू हिन्दुओं का खण्डन करे और हिन्दू चुप रहकर सहन करते जाएं। आर्य धर्म आटे का दीया था। कच्चा धागा था, इसने इस भ्रान्ति को मिटा दिया। तीन दिन शास्त्रार्थ होना था। जिसमें मौलवियों और पादरियों के विरुद्ध ऋषि ने आर्य धर्म का पक्ष लेना स्वीकार किया था। एक ही दिन में ऋषि ने आर्य धर्म की स्थापना ऐसी दृढ़ता से की कि दूसरे दिन वहां प्रतिपक्षियों का चिन्हमात्र भी शेष न था। आर्य धर्म की यह विजय धर्म के इतिहास में स्वराक्षरों में लिखने योग्य है।

अन्य मत वालों पर कृपा- ऋषि ने ईसाइयों को निमन्त्रण दिया कि आर्य धर्म को परखो और स्वीकार करो। इस निमन्त्रण में मोहिनी शक्ति थी। सर सैयद ऋषि के चरणों में आते। पादरी स्काट ऋषि के दर्शन करते। पादरी को ऋषि 'भक्त स्काट' कहते। भक्त की अनुपम उपाधि किसी आर्य-समाजी को न मिली, एक ईसाई ऋषि-भक्ति का यह अपूर्व प्रसाद ले गया। मुहम्मद उमर जन्म का मुसलमान था। उसे ऋषि ने अपने हाथों आर्य बनाया और अलखधारी नाम रखा। सारे संसार के लिए आर्य धर्म का द्वार खोलने का श्रेय वर्तमान युग में ऋषि दयानन्द ही को है। कर्नल अल्काट और मैडम ब्लवैटस्की अमेरिका से चलकर ऋषि दयानन्द के चरणों में आए। अपने पत्रों में ऋषि को 'गुरुदेव' कहकर सम्बोधित करते थे।

बन्धन काटने वाला- एक दिन एक ब्राह्मण ने पान का बीड़ा ला दिया। चबाने से प्रतीत हुआ कि इसमें विष है। ऋषि उठे, गंगा पास थी, उस पर जाकर न्योली कर्म किया और विष निकाल दिया। सैयद मुहम्मद तहसीलदार था। उसने दोषी को पकड़वाया और दयानन्द के दरबार में ले गया। ऋषि से यह सहा न गया कि किसी को उनके कारण बन्धन में डाला जाए। क्या दयापूर्ण उत्तर दिया- "मेरा काम तो बन्धन काटना है, बन्धन बढ़ाना नहीं।"

बाल ब्रह्मचारी का बल- ऋषि जिस धर्म का प्रचार करना चाहते थे वह उनके जीवन में मूर्तरूप में विद्यमान था। दयानन्द का सबसे बड़ा बल ब्रह्मचर्य बल था। बाल ब्रह्मचारी को अधिकार था कि व्यभिचारियों को डांटे। विक्रम सिंह ने ब्रह्मचर्य बल का प्रमाण चाहा तो उसकी दो घोड़े की गाड़ी एक हाथ से पकड़कर रोक दी। सांईस बल लगाता है, घोड़े यतन करते हैं, परन्तु गाड़ी हिलने में नहीं आती। पीछे की ओर देखा ऋषिवर गाड़ी रोके खड़े हैं। शरीर से तेज बरसता है। मुख कांति टकटकी लगाकर देखी नहीं जाती।

देवी पूजा- ब्रह्मचारी है और देवियों का आदर करता है। एक नन्ही लड़की बालकों के साथ खेल रही है। ऋषि देखते ही सिर झुका देते हैं। देखने वालों को धोखा है कि सामने खड़े वृक्ष को प्रणाम है, देवता-निन्दक को देवता की परोक्ष शक्ति ने देवता-पूजक बनाया है। ऋषि के मुख से सुनना ही था कि 'वह देखो! वह नन्ही बालिका मूर्त मातृ-शक्ति है।' बस! सभी के मुख से निकला 'धन्य! धन्य!! देवियों के सत्कार-स्वरूप बाल ब्रह्मचारी दयानन्द धन्य!' इस एक घटना में दयानन्द के देवियों के प्रति सम्पूर्ण भावों का मूर्त चित्र चित्रित है। देवियों की शिक्षा हो और शिक्षा के साथ पूजा हो- ये दो सूत्र ऋषि के देवी सम्बन्धी सिद्धान्त का सार है।

अछूत कोई नहीं- दयानन्द की दृष्टि में कोई अछूत न था। उमेदा नाई खाना लाया तो भरी सभा में स्वीकार किया। भक्त की भावना गेंहू के आटे में गुंधी थी, जो भक्त वत्सल की दृष्टि में लाख जन्माभिमानो की अपेक्षा अधिक सम्मान के योग्य थी। कसाई (मजहबी सिख) को किसी ने व्याख्यान सभा से हटाया। कहा- 'नहीं! मेरा व्याख्यान कसाइयों के लिए भी है।'
क्या आप जानते हैं कि सबसे पहला मलकाना रुस्तमसिंह किन शुभ कर-कमलों द्वारा पुनीत यज्ञोपवीत से अलंकृत हुआ था? ऋषि दयानन्द की दया बल-बली भुजाओं ने उसे अस्पृश्यता की गहरी गुहा से उठाया और आर्यत्व के पुण्ड शिखर पर बैठाया।

गोरक्षा- ऋषि का करुणाक्षेत्र मनुष्य जाति तक परमित नहीं था। प्राणिमात्र दयानन्द की दया के पात्र थे। ऋषि ने गोरक्षा के लिए भरसक प्रयत्न किया। एक निवेदन पत्र पर हिन्दू, मुसलमान, ईसाई- सबके हस्ताक्षर कराए कि गो-हत्या राजनियम से बन्द की जाए। ऋषि ने अपने नाम को सार्थक किया, जब दातारपुर के बाहर सड़क पर जाते हुए बैलगाड़ी कीचड़ में धंसी। गाड़ीवान का और बस न चलता था। बैलों पर सोटों की वर्षा करता चला जाता था। बैलों ने बहुतेरी गर्दनें हिलाई, कन्धों पर बहुतेरा दबाव डाला, पर गाड़ी न खींची। गाड़ीवान हारकर रह गया। ऋषि को अधिक दया गाड़ीवान पर आई या बैलों पर- यह कहना कठिन है। दोनों के हृदय कृतज्ञता भार से आभारी थे, जब राजों-महाराजों के गुरु लोकमान्य दयानन्द ने स्वयं कीचड़ में उतर बैलों का जुआ अपनी गर्दन पर डाला और जो भार दो बैलों से न खींचा गया था, अकेले अपने भुजाबल के जौहर से बाहर कर दिया।
ऋषि की लीला बाहुबली लीला है। जिस पक्ष पर दृष्टि डालो वही कहता है, मैं सबसे मीठा हूं। वस्तुतः गुड़ जहां से खाओ मीठा लगता है। इस लीला के अवसान में भी वह महत्त्व है जो और मनुष्यों के जीवन में नहीं।

प्रचार की धुन- ऋषि दयानन्द ने अन्तिम यात्रा जोधपुर की ओर की! इस समय तक ऋषि ने बीसियों आर्यसमाजों की स्थापना कर ली थी। पंजाब, पश्चिमोत्तर (वर्तमान संयुक्त प्रान्त), राजपूताना- ये सब प्रदेश चरणों में सिर झुका चुके थे। कितने राजपूत नरेश शिष्य बन चुके थे। जोधपुर में भी महाराज ने बुलाया था। चरण-सेवकों ने विनय की, "वहां के लोग क्रूर स्वभाव के पुरूष हैं, आपकी शिक्षा का गौरव नहीं समझेंगे। सम्भव है, प्राणो के बैरी हो जाएं।" दयावीर दयानन्द ने उत्तर दिया- "तभी तो जा रहा हूँ। बिगड़ों के सुधार की और अधिक आवश्यकता है। रही मेरे प्राण-घात की बात, सो तो यदि मेरी एक-एक उंगली से बत्ती का काम लिया जाए, और इसी से किसी को सीधा रास्ता सूझ जाए तो मेरे जीवन का प्रयोजन इसी बात में सिद्ध हो गया।" कहने की आवश्यकता नहीं कि ऋषि के पहुंचते ही राजा चरणों का भक्त हो गया, प्रजा अनुरागरक्त हो गई। प्रतिदिन आनन्द वर्षा होने लगी।

निर्भयता- एक दिन राजा ने महारजा को अपने डेरे पर निमन्त्रित किया। ऋषि बिना सूचना दिए जा पहुंचे। राजा के दरबार में उसकी प्यारी वेश्या नन्हीं जान आई हुई थी। राजा खिसियाने हुए। उसे पालकी में बैठाकर उठवा तो दिया परन्तु ऋषि से आंखें चार न हो सकीं। ऋषि यह कुत्सित दृश्य देखकर लाल हो गए। गरजकर कहा- "सिंह की गोद में कुतियों का क्या काम?"

दया आदर्श- यह निर्भयता ऋषि के लिए विष सिद्ध हुई। विरोधियों ने दल बना लिया। कुछ दिनों में ही जगन्नाथ रसोइए को घूस देकर वीतराग योगी-राज को विष दिलवा दिया। ऋषि ने उस समय भी अपनी स्वाभाविक दया से काम लिया। जगन्नाथ ने स्वयं माना, 'ऋषिवर! यह अपराध मुझसे हुआ है।' ऋषि ने उसे धन दिया और आग्रहपूर्वक कहा शीघ्र आंगल राज्य से बाहर हो जाओ। जिससे तुम्हारे प्राणों पर संकट न आए।
विष का प्रभाव धीरे-धीरे हुआ। दस्त आने लगे, पेट का शूल बढ़ता गया। बार-बार मूर्छा होने लगी। महीना भर यह क्लेश रहा। वैद्य चकित थे कि इस वेदना में ऋषि सन्तोषपूर्वक जी रहे हैं। यह ऋषि का चमत्कार था।

देहावसान- जोधपुर से आबू और आबू से अजमेर गए। दीवाली की सायंकाल को, जहां घर-बार गली-बाजार में दीपक जलाए गए, यह जाति-कुलदीप, संसार-समुद्र का ज्योति-स्तम्भ देखते-देखते जगमगाती चकाचोंध से चुंधियाती रात्रि में अन्तर्हित हो गया। देखने वालों ने देखा कि बुझते दीपक ने सम्भाल लिया। मृत्यु समय समीप आया देखकर ऋषि सचेत हुए। क्षीर कराया, शरीर पौंछवाया, चनों का रस लिया, प्रभु का भजन, मन्त्रों का पाठ करते रहे। अन्त में "परमेश्वर! तैने अच्छी लीला की, तेरी इच्छा पूर्ण हो।" यह शब्द कहे और अत्यन्त आह्लादपूर्वक प्राण त्याग दिए।
देह छोड़ते समय दयानन्द के मुख पर एक विचित्र क्रान्ति थी। पूर्ण किए कर्त्तव्यों का सन्तोष छाती को उभारे हुए था। जगज्जनक कि गोदी में परम पिता का प्यारा पुत्र लालायित हृदय साथ लिए लौट रहा था। पिता की आज्ञा का पालन किया है, यह आह्लाद था, शान्ति थी, सन्तोष था।

दृष्टि रसायन- जीवन प्रचार के अर्पण हुआ था, मरण भी प्रचार का साधन हुआ। गुरुदत्त एम०ए० पंजाब यूनिवर्सिटी में प्रथम रहे थे, उनकी यह ऋषि से प्रथम भेंट थी। बातचीत नहीं हुई, शंका-समाधान नहीं हुआ, प्रश्नोत्तर का अवसर नहीं मिला, परन्तु चंचल, शंका का अवतार, तर्क-मूर्ति, गुरुदत्त ऋषि पर आसक्त है। उसे कोई सन्देह नहीं रहा, क्षण मात्र में उसकी काया पलट हो गई है एक दृष्टि ने कुछ का कुछ कर दिया।
ऋषि की दृष्टि रसायन है। आओ, उस दृष्टि के दर्शन करो। खोटा सिक्का है? लाओ, खरा सोना हो जाएगा। ऋषि के जीवन के अध्ययन से शिक्षा लाभ करो। उनके ग्रन्थों को पढ़ो और उनके जीवन का मिलान उनके लेखों से करो। भर्तृहरि ने कहा है:
मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
यह वाक्य ऋषि दयानन्द के महत्त्व का सार है।

अमर दयानन्द- आज केवल भारत ही नहीं, सारे धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक संसार पर दयानन्द का सिक्का है। मतों के प्रचारकों ने अपने मन्तव्य बदल लिए हैं, धर्म पुस्तकों के अर्थों का संशोधन किया है। महापुरुषों की जीवनियों में परिवर्तन किया है। ऋषि का जीवन इन जीवनियों में बोलता है, ऋषि मरा नहीं करते, अपने भावों के रूप में जीते हैं। दलितोद्धार का प्राण कौन है? पतित पावन दयानन्द। समाज सुधार की जान कौन है? आदर्श सुधारक दयानन्द। शिक्षा प्रचार की प्रेरणा कहां से आती है? गुरुवर दयानन्द के आचरण से। वेद का जय-जयकार कौन पुकारता है? महर्षि दयानन्द। देवी सत्कार का मार्ग कौन दिखाता है? देवीपूजक दयानन्द। ब्रह्मचर्य का आदर्श कौन है? बाल-ब्रह्मचारी दयानन्द। गोरक्षा के मिष से प्राणिमात्र पर करुणा दिखाने का बीड़ा कौन उठाता है? करुणानिधि दयानन्द। आओ, हम अपने आपको ऋषि के रंग में रंगें। हमारा विचार ऋषि का विचार हो, हमारा आचार ऋषि का आचार हो, हमारा प्रचार ऋषि का प्रचार हो। हमारी प्रत्येक चेष्टा ऋषि की चेष्टा हो। नाड़ी-नाड़ी से ध्वनि उठे:- ऋषि दयानन्द की जय!

[स्त्रोत- आर्य मर्यादा : आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का प्रमुख पत्र का मार्च २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

मुक्ति का साधन इन्द्रिय-संयम



मुक्ति का साधन इन्द्रिय-संयम

प्रियांशु सेठ

[एक मित्र ने शंका रखी है कि क्या इन्द्रिय-संयम अर्थात् ब्रह्मचर्य का पालन जीवन में अनिवार्य है? इस लेख के द्वारा इस शंका का समाधान किया जा रहा है।]

वेदादि सत्य शास्त्रों ने मोक्ष-मार्ग के पथिक के लिए ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य बताया है। एक साधक के लिए इन्द्रिय-संयम उसी प्रकार आवश्यक है, जैसे किसी वृक्ष के लिए जल। यदि वृक्ष को जल न मिले तो वह सूखकर सड़ जाता है, उसी प्रकार यदि साधक इन्द्रिय-संयम न करे तो वह शारीरिक व मानसिक भोग-विलासों का भागी बनता है। मनु महाराज कहते हैं- "इन्द्रियों की दासता से, निश्चय ही, दोष को प्राप्त होता है। इन पर संयम करने से ही सफलता प्राप्त होती है (मनु० २/९३)"। इन्द्रियां मुक्ति तक नहीं पहुंचती बल्कि आत्मा को मुक्ति मिलती है। इन्द्रियां तो मात्र साधन हैं और आत्मा इनका स्वामी। कठ-उपनिषद् (१/३/३,४) में इसे एक सुन्दर अलंकार से समझाया गया है-
"यह शरीर एक रथ के सदृश है। इसका स्वामी आत्मा है, वह रथी है। बुद्धि आत्मा की सारथी है और मन लगाम है। इन्द्रियां घोड़े हैं और इन्द्रियों के विषय वे मार्ग हैं जिन पर इन्द्रियां रूपी घोड़े दौड़ते हैं। मनीषी व्यक्ति आत्मा, इन्द्रियां और मन इन्हें मिलाकर भोक्ता कहते हैं।"

पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और पांच कर्मेन्द्रियाँ और ग्यारहवां मन- ये सब आत्मा के वाहन हैं। इन सबको सांसारिक विषय में केन्द्रित करने पर साधक मुक्ति को कभी प्राप्त नहीं हो सकता। मुक्ति को प्राप्त करने के लिए उसे इन सबको स्वयं के अधीन करके ईश्वर-चिन्तन पर अपना लक्ष्य केन्द्रित करना होगा। यम ऋषि कहते हैं-
"शरीर में इन्द्रियों के विषय रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द- सूक्ष्म हैं। इन्द्रियां तो दिखाई देती हैं पर ये विषय दिखाई नहीं देते। इन विषयों की अपेक्षा मन सूक्ष्म है और मन की अपेक्षा बुद्धि सूक्ष्म है। बुद्धि की अपेक्षा यह आत्मा महान् है, दूर है और अति सूक्ष्म है।" -कठ० १/३/१०

इन इन्द्रियों को वश में कैसे करना चाहिए? महर्षि मनु कहते हैं-
"इन इन्द्रियों को विषयों की सेवा में केवल न लगाने से ही वश में नहीं किया जा सकता। निरन्तर ज्ञान प्राप्ति ही इसका सर्वोत्तम उपाय है।" -मनु० २/९६

मनु ने जितेन्द्रिय मनुष्य के लक्षण भी इस प्रकार बताए हैं-
"जो व्यक्ति सुनकर, छूकर, देखकर, खाकर, सूंघकर न हर्ष करता है और न शोक करता है, वही जितेन्द्रिय जानना चाहिए।" -मनु० २/९८

मनु घोड़े की उपमा से स्पष्ट करते हुए इन्द्रिय-संयम का उपाय बताते हैं-
"जैसे सारथि घोड़े को कुपथ में नहीं जाने देता वैसे विद्वान् ब्रह्मचारी आकर्षण करने वाले विषयों में जाते हुए इन्द्रियों के रोकने में सदा प्रयत्न किया करे।" -मनु० २/८८

महर्षि पतञ्जलि के शब्दों में- "अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:" अर्थात् अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चंचल मन को, चित्त की वृत्तियों को रोकना चाहिए (यो० द० समाधि० १२)।

इन्द्रिय-संयम के विषय में यम ऋषि के वचन बड़े ही मार्मिक हैं-
"जिसने रथ रूपी शरीर की इन्द्रियों के वास्तविक रूप को जान लिया है और जिसका मन सदा आत्मा के अधीन रहता है, इन्द्रियां उसी के वश में रहती हैं, जैसे अच्छे घोड़े सारथि के काबू में रहते हैं।" -कठ० १/३/६

आगे ऋषि कहते हैं-
"श्रेय मार्ग के पथिक को चाहिए कि वह अपने मन और वाणी को विषयों से रोके और फिर उनको अपनी बुद्धि में स्थिर करे, उस बुद्धि को महान् आत्मा में स्थित करे, इसके बाद आत्मा को शान्त परमात्मा के साथ जोड़े।" -कठ० १/३/१३

इस श्लोक में ऋषि ने आत्म-विकास के तीन क्रम बताए हैं- ज्ञानात्मा, महानात्मा और शान्तात्मा।
इन्द्रियों की इस सहज चंचलता को दृष्टि में रखते हुए वेद में भक्त बड़ी विनम्रता से प्रभु से प्रार्थना करता है-

ओ३म्। इमामि यानि पंचेन्द्रियाणि मन: षष्ठानि मे हृदि ब्रह्मणा संशितानि। यैरेव ससृजे घोरं तैरेव शान्तिरस्तु स:।। -अथर्व० १९/९/५
ये जो पांच इन्द्रियां हैं और जिनके साथ छठा मन है, ईश्वर कृपा से जिनका तीव्रता के साथ मेरे हृदय में स्थान है, जिनके द्वारा ही भयंकर कार्य किये जाते हैं, इन इन्द्रियों और मन के द्वारा ही हमें शान्ति प्राप्त हो।

यहां एक प्रश्न पैदा होता है कि जब इन इन्द्रियों द्वारा इतने भयंकर परिणामों की सम्भावना है और ये बारम्बार कुमार्ग की ओर प्रेरित करती है, तब क्यों न इसका नाश ही कर दिया जाए? "न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी"- कुछ लोग ऐसा ही कहते और मानते हैं। इतिहास में ऐसी कई घटनाएं मिलती हैं जहां इस भ्रान्त धारणा का शिकार हो व्यक्ति ने अपनी किसी इन्द्रिय का नाश ही कर दिया।

बौद्ध इतिहास की घटना है। एक युवक बौद्ध भिक्षु किसी गृहस्थ के घर भिक्षा मांगने गया। वहां एक रूपवती कन्या को देख मुग्ध हो गया और कन्या भी उस युवक की ओर विशेष आकृष्ट हो गयी। भिक्षु ने बिहार में वापस आ, अपनी इस मानसिक निर्बलता का वर्णन अपने गुरु से किया। उसने भिक्षु को आदेश दिया कि वह अपनी दोनों आंखें फोड़ दे। शिष्य ने गुरु के आदेश का तत्काल पालन किया। "पर क्या यह समुचित कहा जा सकता है? क्या आंख फोड़ देने मात्र से उस रूपवती कन्या का ध्यान उसके मन से निकल जाएगा? मानसिक वासना तो फिर भी रहेगी।"

सूरदास का पछतावा

हिन्दी के सुविख्यात कवि और लेखक श्री रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी पुस्तक "कविता कौमुदी" में सूरदास कवि का परिचय देते हुए लिखा है-
"सूरदास जन्म के अन्धे न थे। ऐसी कहावत है कि एक बार ये एक युवती को देखकर उस पर मुग्ध हो गए। उसकी ओर एकटक ताकते हुए ये बहुत देर तक खड़े रहे। अन्त में वह युवती इनके पास स्वयं आयी और कहने लगी- 'महाराज, क्या आज्ञा है?' सूरदास को उस समय अपनी स्थिति पर बड़ी लज्जा आयी। इन्होंने यह दोष आंखों का समझ कर उस युवती को कहा कि 'यदि तुम मेरी आज्ञा मानती हो तो सुई से मेरी दोनों आंखें फोड़ दो।' युवती ने आज्ञानुसार ऐसा ही किया। तब से सूरदास अन्धे हो गए। भक्तमाल में लिखा है कि सूरदास जन्म के अन्धे थे। परन्तु इस पर सहसा विश्वास नहीं होता, क्योंकि इन्होंने अपनी कविता में रंगों का, ज्योति का और अनेक प्रकार के हाव-भावों का ऐसा यथार्थ वर्णन किया है जो बिना आंखों से देखे, केवल सुनकर, नहीं किया जा सकता।" (पृ० १९२, १९५४ का आठवां संस्करण)

ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी आंखों का इस प्रकार विनाश कर सूरदास को जीवन में पछतावा भी हुआ। वे अपने एक पद में कहते हैं-
ऊधो! अँखियां अति अनुरागी।
इक टक मग जोवति उरु रोवति भूलेहु पलक न लागी।।

वैदिक धर्म में इन्द्रियों की श्रेष्ठता
वैदिक धर्म में इन्द्रियों को कहीं भी गर्हित नहीं माना गया है। स्वयं "इन्द्रिय" शब्द ही बड़ा अर्थपूर्ण है। इसकी धातु है "इदि परमैश्वर्य"। इस धातु से "रन्" प्रत्यय होकर "इन्द्र" शब्द सिद्ध होता है। इसका अर्थ है "य इन्दति परमैश्वर्यवान भवति स इन्द्र:"। जो अखिल ऐश्वर्य युक्त है, इससे परमात्मा का नाम "इन्द्र" है। इस "इन्द्र" शब्द से ही निपातनात् घञ् प्रत्यय होकर "इन्द्रिय" बनता है, जिसका अर्थ है कि जो ईश्वर प्राप्ति के लिए सहायक है। हलायुध कोश के अनुसार "इन्द्रियम्" का लक्षण है "इन्द्रस्यात्मनो लिगमनुमापकम्" "इन्द्रेण ईश्वरेण सृष्टम्" अर्थात् इन्द्र के (आत्मा) के चिह्नन का जो मापक साधन है वह इन्द्रिय और इन्द्र ईश्वर से जिसकी रचना हुई हो वह इन्द्रिय है।
उपनिषदों में इन्द्रियों को "ख" नाम से कहा गया है। कठोपनिषद् (२/४/१) में "ख" नाम से इन्द्रियों के कार्य का निम्न शब्दों में वर्णन किया गया है-
"स्वयंभू अर्थात् परमात्मा ने (खानि) इन्द्रियों को बाहर की ओर जाने वाला बनाया है, इसलिए मनुष्य बहिर्मुख ही रहता है, अन्तर्मुख, आत्ममुख, नहीं होता। अमृत की इच्छा करने वाला कोई अनोखा मनुष्य ही ऐसा होता है जो बाह्य विषयों से अपनी इन्द्रियों को हटाता और अमृत की इच्छा करता हुआ भीतर की ओर देखता है।"

इस "ख" के साथ जब "सु" उपसर्ग लग जाय तब वह "सुख" कहा जाता है, अर्थात् जो इन्द्रियों के अनुकूल हो। जब "दु:" उपसर्ग लग जाय, तब "दुःख" कहा जाता है अर्थात् जो इन्द्रियों के प्रतिकूल हो। फलतः "सुख" और "दुःख" की इकाई और मूल आधार इन्द्रियां ही हैं।

[सहायक ग्रन्थ-: 'मुक्ति का मार्ग'- महात्मा नारायण स्वामी]

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के जीवन के प्रमुख प्रेरणादायक प्रसंग



महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के जीवन के प्रमुख प्रेरणादायक प्रसंग

लेखक- पं० उम्मेद सिंह विशारद, वैदिक प्रचारक

धन्य है तुमको ए ऋषि तूने हमें जगा दिया।
सो सो के लुट रहे थे हम तूने हमें बचा लिया।।
तुझमें कुछ ऐसी बात थी कि तेरी बात पर ऋषि।
लाखों शहीद हो गए लाखों ने सर कटा दिया।।

अन्तिम सन्देश
ये वक्त है आखरी मेरा अब तो मैं यहां से जाता हूँ।
वेदों की शमां जलती रहे तुमसे आर्यों यह चाहता हूँ।।
इस घर के पहरेदार हो तुम अब आपकी जिम्मेदारी है।
अब तो हम यहां से जाते हैं हुई ड्यूटी खत्म हमारी है।
वेदों की शमां जलती रहे आर्यों तुमसे यह चाहता हूँ।।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की अद्भुत धारणा शक्ति
महर्षि दयानन्द जी की धारणा शक्ति अपूर्व थी, उन्होंने एक बार पं० भगवान वल्लभ से सुश्रुत संहिता जो हजारों पृष्ठ का ग्रन्थ था, मंगवाकर देखा, और एक दो दिन में ही उस पर इतना अधिकार कर लिया कि प्रश्न उठने पर प्रत्येक, प्रसंग का वाक्य उद्धत करने लगे।

महर्षि को वेद कंठस्थ थे
गुजरात में महाराज वेद भाष्य के कार्य में व्यस्त रहते थे, वह पंडितों को वेद भाष्य लिखाया करते थे। उनके हाथ में कोई पुस्तक नहीं रहती थी। फिर वह इतनी शीघ्रता से वेद भाष्य लिखाते थे कि लेखकों को लिखने का अवकाश नहीं मिलता था। उन्हें वेद कण्ठस्थ थे।

महर्षि से उपासना में मन लगाने की विधि पूछी
पं० आदित्य नारायण ने महर्षि से उपासना में मन लगाने की विधि पूछी। स्वामी जी ने उससे कहा, यम-नियम का पालन करो। उन्होंने द्वितीय, तृतीय बार यही प्रश्न पूछा, स्वामी जी ने हर बार यही उत्तर दिया। पण्डित जी इस पर चिढ़ गए कि हमारा आना व्यर्थ हुआ। फिर उन्होंने सोचा स्वामी जी के उत्तर का क्या कारण है। उन्हें स्पष्ट ज्ञात हो गया एक मुकदमें में झूठी साक्षी देकर आए थे। और फिर भी देने वाले थे। महर्षि दयानन्द यह वृत अपनी योग विभूति से जान गए थे।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी में अपूर्व ब्रह्मचर्य बल था
जोधपुर नगर में एक पहलवान रहता था जिसे अपने बल पर बहुत घमण्ड था। वह अकेला ही रहट चलाकर अपने स्नान के लिए हौज भरा करता था। लोग यही समझते थे कि इस हौज को कोई दूसरा नहीं भर सकता। महर्षि दयानन्द जी नगर में प्रातः काल भ्रमण के लिए जाया करते थे। एक दिन स्वामी जी ने उस हौज को भरते देख लिया। उस दिन वायु सेवन के लिए उधर से गुजरे तो उनके जी में आया कि हौज को भर देवें। और स्वामी जी ने उस हौज को भर दिया और वायु सेवन को चल पड़े। जब पहलवान आया तो उसने हौज भरा देखा तो आश्चर्य चकित रह गया। स्वामी जी जब उधर आये तो पहलवान ने कहा- बाबा! हौज तुमने भरा? स्वामी जी ने कहा- हां! मैंने भरा। फिर पूछा तुम थके नहीं, स्वामी जी ने कहा कि उससे भी व्यायाम पूरा नहीं हुआ। पहलवान हक्का-बक्का रह गया।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की शिष्टता व निर्भयता
कर्णवास में कर्ण सिंह बड़े गुर्जर क्षत्रीय थे व जमीदार रईस थे, महर्षि दयानन्द जी को प्रमाण करके बोले कि हम कहां बैठे? स्वामी जी ने कहा कि जहां आपकी इच्छा है। कर्ण सिंह घमण्ड से बोले जहां आप बैठे हैं हम तो वहां बैठेंगे। एक ओर हटकर स्वामी जी बोले आइए बैठिये। उसने स्वामी जी से पूछा आप गंगा को मानते हैं। उन्होंने उत्तर दिया गंगा जितनी है उतनी मानते हैं, वह कितनी है। फिर कहा हम संन्यासियों के लिए कमण्डल भर है। कर्ण सिंह गंगा स्तुति में कुछ श्लोक पढ़ता है। स्वामी जी ने कहा यह तुम्हारी गप्प, भ्रम है। यह तो जल है इससे मोक्ष नहीं होता, मोक्ष तो सत्य कर्मों से होता है। फिर कर्ण सिंह बोले हमारे यहां रामलीला होती है, वहां चलिए। स्वामी जी ने कहा तुम कैसे क्षत्रिय हो महापुरुषों का स्वांग बनाकर नाचते हो। यदि कोई तुम्हारे महापुरुषों का स्वांग बनाकर नाचे तो कैसा लगेगा। उसके ललाट पर चक्रांकित का तिलक देखकर कहा तुम कैसे क्षत्रिय हो, तूने अपने माथे पर भिखारियों का तिलक क्यों लगाया है और भुजाएं क्यों दुग्ध की हैं? कर्ण सिंह बोले यह हमारा परम मत है यदि तुमने खण्डन किया तो हम बुरी तरह पेश आयेंगे। किन्तु स्वामी जी शान्त मन से खण्डन करते रहे। फिर कर्ण सिंह को क्रोध आ गया। उसने म्यान से तलवार निकाल ली। स्वामी जी ने निर्भीकता से कहा यदि सत्य कहने से सिर कटता है तो काट लो, यदि लड़ना है तो राजाओं से लड़ो, शास्त्रार्थ करना है तो अपने गुरु रंगाचार्य को बुलाओ और प्रतिज्ञा लिख लो यदि हम हार गये तो अपना वेद मत छोड़ देंगे। कर्ण सिंह ने कहा उनके सामने तुम कुछ भी नहीं हो। स्वामी जी बोले रंगा स्वामी की मेरे सामने क्या गति है। क्रोधित कर्ण सिंह स्वामी जी को गाली देता रहा किन्तु स्वामी जी हंसते रहे। कर्ण सिंह ने तलवार चलाई, स्वामी जी ने तलवार छीन ली और कहा चाहूं तो तेरे शरीर में घुसा दूं और तलवार टेककर दो टुकड़े कर दिए और शान्त रहे। शिष्यों ने रिपोर्ट लिखने को कहा किन्तु स्वामी जी ने उसको माफ कर दिया और पूर्ववत् शान्त होकर उपदेश करने लगे।

अभ्यस्त अपराधी भी महर्षि दयानन्द योगी से डर भागे
कर्णवास में एक रात को कर्ण सिंह ने अपने तीन आदमियों को स्वामी जी का सिर काटने भेजा। किन्तु उन अपराधियों को कुटी में जाने का साहस न हुआ। स्वामी जी खटका सुनकर बैठ गये। राव साहब ने अपने आदमियों को पुनः धमकाकर भेजा और कहा स्वामी जी का सिर काट लाओ। स्वामी जी चौकी पर बैठ कर ध्यान मगन हो गए। वह जब स्वामी जी की हत्या करने दरवाजे पर आए तो स्वामी जी ने द्वार पर आकर भयंकर स्वर में ध्वनि की और वे लोग ध्वनि की आवाज सुनकर घबरा गए और चित्त होकर गिर पड़े, तलवारें छूट गईं और किसी प्रकार उठकर भाग गये। सत्य के पथिक में बड़ी आत्म शक्ति होती है।

सन् १८६७ में अनूप शहर में मूर्ति पूजा पर शास्त्रार्थ
स्वामी को अनूप शहर में आये। अध्यापक लाला बाबू ने स्वामी की से कुछ पूछने का आग्रह किया। स्वामी जी ने कहा कोई दूसरा व्यक्ति तुमको समझा देवे तो मैं तैयार हूं, मैं संस्कृत में ही बोलूंगा और वहां पर पण्डित अम्बादत्त से मूर्ति पूजा पर शास्त्रार्थ हुआ और अम्बादत्त हट गए। बहुतों ने उसी समय से मूर्ति पूजा छोड़ दी और मूर्तियों को पानी में विसर्जन कर दिया और अम्बादत्त दुबारा शास्त्रार्थ करने का साहस न कर सका।

दयालु महर्षि दयानन्द जी ने विष देने वाले को क्षमा किया
अनूप शहर की घटना है, कि एक दिन एक ब्राह्मण ने स्वामी जी को विष दे दिया क्योंकि वह स्वामी जी की मूर्ति पूजा खण्डन से तंग आ चुका था। स्वामी जी समझ गये और न्योली क्रिया से विष निकाल कर बच गये पर उस विष देने वाले को कुछ न कहा। सैय्यद मोहम्मद तहसीलदार ने उस ब्राह्मण को बन्दी बना लिया। वह स्वामी जी से बहुत प्रेम करते थे और दर्शनार्थ रोज आया करते थे। स्वामी जी ने तहसीलदार से बोलना बन्द कर दिया। उसने कारण पूछा तो स्वामी जी ने कहा- "मैं संसार को बन्दी बनाने नहीं आया हूँ परन्तु उनको छुड़ाने आया हूँ। यदि वह अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता तो मैं अपनी श्रेष्ठता क्यों छोड़ूं।" अन्त में तहसीलदार से कहकर उसको छुड़वा दिया।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की सेवा भाव की चरम सीमा एक बीमार कोढ़ी को उठाना
सोमनाथ मन्दिर में मेला लगा हुआ था और मेले के बाहर एक कोढ़ी बीमार पड़ा हुआ था और चलने की स्थिति में नहीं था, कोई कहता मर गया कोई कहता जिन्दा है। पता चला कि पुलिस वालों ने मारते-मारते उसको बाहर फैंक दिया था। कोई कहता पैरों पर रस्सी बांध के बाहर फैंक दो। उसके सारे शरीर में खून और पीप बह रहा था। स्वामी जी ने कपड़ा भिगाकर उसके मुंह में पानी डाला, तब उसने आंखें खोल दी थी और कातर दृष्टि से दया के भण्डार दयानन्द को देखने लगा। और उसको छोड़ना अच्छा न लगा और चिकित्सा केन्द्र का पता करके कोढ़ी को पीठ में उठाकर चिकित्सा केन्द्र में भर्ती करा दिया। विदाई के समय उसने कहा- बाबा! मुझे मरने का आशीर्वाद दो, और उसके कुछ देर में देह त्याग दिया। स्वामी जी नदी नहा करके योग गुरुओं की खोज में निकल पड़े।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी का ज्ञानत्व, व्यक्तित्व, कर्मत्व की एक रूपता संसार का कल्याण कर गई
श्रद्धेय पाठकगण- अनेकों पुस्तकों का पढ़ना मात्र ज्ञान नहीं है। वास्तव में ज्ञानी वह है, जिसके सिद्धान्त पवित्र हों तथा नियमपूर्वक सदा उत्तम कर्मों को करता हो। महर्षि दयानन्द जी ने वेदानुकूल मनुष्य मात्र को उपदेश देकर बतलाया कि ईश्वर सर्वत्र जो सर्वव्यापक, सर्व सामर्थ्य वाला समदर्शी है वह सब जीवों के कर्मों को जानता है। उसी के अनुकूल सबको यथोचित फल देता है। अठाहरवीं व उन्नीसवीं सदी के अन्धेरे युग में एक महाज्ञानी ईश्वर भक्त ही इतनी ऊंची बात कह सकता था। यह ईश्वर का नियम है कि अत्यन्त अन्धकार के पीछे प्रकाश और दु:ख के पीछे सुख आता है। उसी के अनुकूल जब भारत की सन्तानें अपार दुःखों में फंस गई तो ईश्वर ने अपने अनुग्रह से भारत का उद्धार करने ऋषि दयानन्द जी को भारत धरती पर भेजा। जिन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर वेदों के ज्ञान से प्रकाशित हो, अपनी विद्या गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती की आज्ञा सिर पर धर भारत की दुर्दशा को देख उसने भ्रमण कर वैदिक धर्म का उपदेश करना आरम्भ कर दिया और सारे संसार की आत्माओं को शान्ति मिलने का एक मात्र उपाय बतला दिया जिसके कारण अब और तबसे समस्त भूगोल में वेदों की महिमा फैलती जा रही है। महर्षि दयानन्द जी का सम्पूर्ण जीवन की गति एक विशाल ग्रन्थ बन सकता है, छोटे से प्रसंग लेख में नहीं समा सकता है।

[स्त्रोत- आर्य मर्यादा : आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का प्रमुख पत्र का मार्च २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]