Saturday, January 10, 2015

क्या वेदों में पशुबलि, माँसाहार आदि का विधान है?




क्या वेदों में पशुबलि, माँसाहार आदि का विधान है?

डॉ विवेक आर्य

वेदों के विषय में सबसे अधिक प्रचलित अगर कोई शंका है तो वह हैं कि क्या वेदों में पशुबलि, माँसाहार आदि का विधान है?

इस भ्रान्ति के होने के मुख्य-मुख्य कुछ कारण है। सर्वप्रथम तो पाश्चात्य विद्वानों जैसे मैक्समुलर[i], ग्रिफ्फिथ[ii] आदि द्वारा यज्ञों में पशुबलि, माँसाहार आदि का विधान मानना, द्वितीय मध्य काल के आचार्यों जैसे सायण[iii], महीधर[iv] आदि का यज्ञों में पशुबलि का समर्थन करना, तीसरा ईसाईयों, मुसलमानों आदि द्वारा माँस भक्षण के समर्थन में वेदों कि साक्षी देना[v], चौथा साम्यवादी अथवा नास्तिक विचारधारा[vi] के समर्थकों द्वारा सुनी-सुनाई बातों को बिना जाँचें बार बार रटना।

किसी भी सिद्धांत अथवा किसी भी तथ्य को आँख बंद कर मान लेना बुद्धिमान लोगों का लक्षण नहीं है। हम वेदों के सिद्धांत कि परीक्षा वेदों कि साक्षी द्वारा करेगे जिससे हमारी भ्रान्ति का निराकरण हो सके।

शंका 1 क्या वेदों में मांस भक्षण का विधान हैं?

उत्तर:- वेदों में मांस भक्षण का स्पष्ट निषेध किया गया हैं। अनेक वेद मन्त्रों में स्पष्ट रूप से किसी भी प्राणि को मारकर खाने का स्पष्ट निषेध किया गया हैं। जैसे

हे मनुष्यों ! जो गौ आदि पशु हैं वे कभी भी हिंसा करने योग्य नहीं हैं - यजुर्वेद १।१

जो लोग परमात्मा के सहचरी प्राणी मात्र को अपनी आत्मा का तुल्य जानते हैं अर्थात जैसे अपना हित चाहते हैं वैसे ही अन्यों में भी व्रतते हैं-यजुर्वेद ४०। ७

हे दांतों तुम चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ। तुम्हारे लिए यही रमणीय भोज्य पदार्थों का भाग हैं । तुम किसी भी नर और मादा की कभी हिंसा मत करो।- अथर्ववेद ६।१४०।२

वह लोग जो नर और मादा, भ्रूण और अंड़ों के नाश से उपलब्ध हुए मांस को कच्चा या पकाकर खातें हैं, हमें उनका विरोध करना चाहिए- अथर्ववेद ८।६।२३

निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है, हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार। -अथर्ववेद १०।१।२९

इन मन्त्रों में स्पष्ट रूप से यह सन्देश दिया गया हैं कि वेदों के अनुसार मांस भक्षण निषेध हैं।

शंका २ क्या वेदों के अनुसार यज्ञों में पशु बलि का विधान है?

यज्ञ कि महता का गुणगान करते हुए वेद कहते है कि सत्यनिष्ठ विद्वान लोग यज्ञों द्वारा ही पूजनीय परमेश्वर की पूजा करते है।[ऋग्वेद 10/90/16 ]

यज्ञों में सब श्रेष्ठ धर्मों का समावेश होता है। यज्ञ शब्द जिस यज् धातु से बनता है उसके देवपूजा, संगतिकरण और दान है। इसलिए यज्ञों वै श्रेष्ठतमं कर्म[शतपथ 1/7/3/5 ] एवं यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म[तैतरीय संहिता 3/2/1/4 ] इत्यादि कथन मिलते है। यज्ञ न करने वाले के लिए वेद कहते है कि जो यज्ञ मयी नौका पर चढ़ने में समर्थ नहीं होते वे कुत्सित, अपवित्र आचरण वाले होकर यही इस लोक में नीचे-नीचे गिरते जाते है।[ऋग्वेद 10/44/6, अथर्ववेद 20/94/6 ]

एक और वेद यज्ञ कि महिमा को परमेश्वर कि प्राप्ति का साधन बताते है दूसरी और वैदिक यज्ञों में पशुबलि का विधान भ्रांत धारणा मात्र है।

यज्ञ में पशु बलि का विधान मध्य काल कि देन है। प्राचीन काल में यज्ञों में पशु बलि आदि प्रचलित नहीं थे। मध्यकाल में जब गिरावट का दौर आया तब मांसाहार, शराब आदि का प्रयोग प्रचलित हो गया। सायण, महीधर आदि के वेद भाष्य में मांसाहार, हवन में पशुबलि, गाय, अश्व, बैल आदि का वध करने की अनुमति थी जिसे देखकर मैक्समुलर , विल्सन [vii], ग्रिफ्फिथ आदि पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों से मांसाहार का भरपूर प्रचार कर न केवल पवित्र वेदों को कलंकित किया अपितु लाखों निर्दोष प्राणियो को मरवा कर मनुष्य जाति को पापी बना दिया। मध्य काल में हमारे देश में वाम मार्ग का प्रचार हो गया था जो मांस, मदिरा, मैथुन, मीन आदि से मोक्ष की प्राप्ति मानता था। आचार्य सायण आदि यूँ तो विद्वान थे पर वाम मार्ग से प्रभावित होने के कारण वेदों में मांस भक्षण एवं पशु बलि का विधान दर्शा बैठे। निरीह प्राणियों के इस तरह कत्लेआम एवं भोझिल कर्मकांड को देखकर ही महात्मा बुद्ध[viii] एवं महावीर ने वेदों को हिंसा से लिप्त मानकर उन्हें अमान्य घोषित कर दिया जिससे वेदों की बड़ी हानि हुई एवं अवैदिक मतों का प्रचार हुआ जिससे क्षत्रिय धर्म का नाश होने से देश को गुलामी सहनी पड़ी। इस प्रकार वेदों में मांसभक्षण के गलत प्रचार के कारण देश की कितनी हानि हुई इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। एक ओर वेदों में जीव रक्षा और निरामिष भोजन का आदेश है तो दूसरी ओर उसके विपरीत उन्हीं वेदों में पशु आदि कि यज्ञों में बलि तर्क संगत नहीं लगती है। स्वामी दयानंद ने वेदभाष्य में मांस भक्षण ,पशुबलि आदि को लेकर जो भ्रान्ति देश में फैली थी उसका निवारण कर साधारण जनमानस के मन में वेद के प्रति श्रद्दा भाव उत्पन्न किया। वेदों में यज्ञों में पशु बलि के विरोध में अनेक मन्त्रों का विधान है जैसे:-

यज्ञ के विषय में अध्वर शब्द का प्रयोग वेद मन्त्रों में हुआ है जिसका अर्थ निरुक्त [ix] के अनुसार हिंसा रहित कर्म है।

हे ज्ञान स्वरुप परमेश्वर, तू हिंसा रहित यज्ञों (अध्वर) में ही व्याप्त होता है और ऐसे ही यज्ञों को सत्य निष्ठ विद्वान लोग सदा स्वीकार करते है। -ऋग्वेद 1/1 /4

यज्ञ के लिए अध्वर शब्द का प्रयोग ऋग्वेद 1/1/8, ऋग्वेद 1/14/21,ऋग्वेद 1/128/4 ऋग्वेद 1/19/1, ऋग्वेद 3/21/1, सामवेद 2/4/2, अथर्ववेद 4/24/3, अथर्ववेद 1/4/2 इत्यादि मन्त्रों में इसी प्रकार से हुआ है। अध्वर शब्द का प्रयोग चारों वेदों में अनेक मन्त्रों में होना हिंसा रहित यज्ञ का उपदेश है।

हे प्रभु! मुझे सब प्राणी मित्र की दृष्टि से देखे, मैं सब प्राणियों को मित्र कि प्रेममय दृष्टि से देखूं , हम सब आपस में मित्र कि दृष्टि से देखें।- यजुर्वेद 36 /18

यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म के नाम से पुकारते हुए उपदेश है कि पशुओं कि रक्षा करे। - यजुर्वेद 1 /1

पति पत्नी के लिए उपदेश है कि पशुओं कि रक्षा करे। - यजुर्वेद 6/11

हे मनुष्य तुम दो पैर वाले अर्थात अन्य मनुष्यों एवं चार पैर वाले अर्थात पशुओं कि भी सदा रक्षा कर। - यजुर्वेद 14 /8

चारों वेदों में दिए अनेक मन्त्रों से यह सिद्ध होता है कि यज्ञों में हिंसा रहित कर्म करने का विधान है एवं मनुष्य का अन्य पशु पक्षियों कि रक्षा करने का स्पष्ट आदेश है।

शंका 3 क्या वेदों में वर्णित अश्वमेध, नरमेध, अजमेध, गोमेध में घोड़ा, मनुष्य, गौ कि यज्ञों में बलि देने का विधान नहीं है ? मेध का मतलब है मारना जिससे यह सिद्ध होता है?

उत्तर: मेध शब्द का अर्थ केवल हिंसा नहीं है. मेध शब्द के तीन अर्थ है १. मेधा अथवा शुद्ध बुद्धि को बढ़ाना २. लोगो में एकता अथवा प्रेम को बढ़ाना ३. हिंसा। इसलिए मेध से केवल हिंसा शब्द का अर्थ ग्रहण करना उचित नहीं है।

जब यज्ञ को अध्वर अर्थात ‘हिंसा रहित‘ कहा गया है, तो उस के सन्दर्भ में ‘ मेध‘ का अर्थ हिंसा क्यों लिया जाये? बुद्धिमान व्यक्ति ‘मेधावी‘ कहे जाते है और इसी तरह, लड़कियों का नाम मेधा, सुमेधा इत्यादि रखा जाता है, तो क्या ये नाम क्या उनके हिंसक होने के कारण रखे जाते है या बुद्धिमान होने के कारण?

अश्वमेध शब्द का अर्थ यज्ञ में अश्व कि बलि देना नहीं है अपितु शतपथ १३.१.६.३ और १३.२.२.३ के अनुसार राष्ट्र के गौरव, कल्याण और विकास के लिए किये जाने वाले सभी कार्य “अश्वमेध” है[x]।

गौ मेध का अर्थ यज्ञ में गौ कि बलि देना नहीं है अपितु अन्न को दूषित होने से बचाना, अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, सूर्य की किरणों से उचित उपयोग लेना, धरती को पवित्र या साफ़ रखना -‘गोमेध‘ यज्ञ है। ‘ गो’ शब्द का एक और अर्थ है पृथ्वी। पृथ्वी और उसके पर्यावरण को स्वच्छ रखना ‘गोमेध’ कहलाता है।[xi]

नरमेध का अर्थ है मनुष्य कि बलि देना नहीं है अपितु मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके शरीर का वैदिक रीति से दाह संस्कार करना नरमेध यज्ञ है। मनुष्यों को उत्तम कार्यों के लिए प्रशिक्षित एवं संगठित करना नरमेध या पुरुषमेध या नृमेध यज्ञ कहलाता है।

अजमेध का अर्थ बकरी आदि कि यज्ञ में बलि देना नहीं है अपितु अज कहते है बीज, अनाज या धान आदि कृषि की पैदावार बढ़ाना है। अजमेध का सिमित अर्थ अग्निहोत्र में धान आदि कि आहुति देना है।[xii]

शंका 4: यजुर्वेद मन्त्र 24/29 में हस्तिन आलभते अर्थात हाथियों को मारने का विधान है?

समाधान :- ’लभ्’ धातु से बनने वाला आलम्भ शब्द का अर्थ मारना नहीं अपितु अच्छी प्रकार से प्राप्त करना , स्पर्श करना या देना होता है। हस्तिन शब्द का अर्थ अगर हाथी ले तो इस मंत्र में राजा को अपने राज्य के विकास हेतु हाथी आदि को प्राप्त करना, अपनी सेनाओं को सुदृढ़ करना बताया गया है। यहाँ पर हिंसा का कोई विधान नहीं है।

पारस्कर सूत्र 2 /2 /16 में कहा गया है कि आचार्य ब्रह्मचारी का आलम्भ अर्थात ह्रदय का स्पर्श करता है। यहाँ पर आलम्भ का अर्थ स्पर्श आया है।

पारस्कर सूत्र 1 /8 /8 में ही आया है कि वर वधु के दक्षिण कंधे के ऊपर हाथ ले जाकर उसके ह्रदय का स्पर्श करे। यहाँ पर भी आलम्भ का अर्थ स्पर्श आया है।

अगर यहाँ पर आलम्बन शब्द का अर्थ मरना ग्रहण करे तो यह कैसे युक्तिसंगत एवं तर्क संगत सिद्ध होगा? इससे सिद्ध होता हैं कि आलम्भ शब्द का अर्थ ग्रहण करना, प्राप्त करना अथवा स्पर्श करना है।

शंका 5 : वेद, ब्राह्मण एवं सूत्र ग्रंथों में संज्ञपन शब्द आया है जिसका अर्थ पशु को मारना है ?

समाधान:- संज्ञपन शब्द का अर्थ है ज्ञान देना दिलाना तथा मेल कराना है।

अथर्ववेद 6/10/14-15 में लिखा है कि तुम्हारे मन का ज्ञानपूर्वक अच्छी प्रकार (संज्ञपन) मेल हो, तुम्हारे हृदयों का ज्ञान पूर्वक अच्छी प्रकार (संज्ञपन) मेल हो।

इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण 1/4 में एक आख्यानिका है जिसका अर्थ है- मैं वाणी तुझ मन से अधिक अच्छी हूँ, तू जो कुछ मन में चिंतन करता है मैं उसे प्रकट करती हूँ, मैं उसे अच्छी प्रकार से दूसरों को जतलाती हूँ (संज्ञपयामी)

संज्ञपन शब्द का मेल के स्थान पर हिंसापरक अर्थ करना अज्ञानता का परिचायक है।

शंका 6 : वेदों में गोघ्न अर्थात गायों के वध करने का आदेश है।

समाधान : गोघ्न शब्द में हन धातु का प्रयोग है जिसके दो अर्थ बनते है हिंसा और गति। गोघ्न में उसका गति अथवा ज्ञान, गमन, प्राप्ति विषयक अर्थ है। मुख्य भाव यहाँ प्राप्ति का है, अर्थात जिसे उत्तम गौ प्राप्त कराई जाये।

हिंसा के प्रकरण में वेद का उपदेश गौ कि हत्या करने वाले से दूर रहने का है।

ऋग्वेद 1 /114 /10 में लिखा है जो गोघ्न - गौ कि हत्या करनेवाला है अह नीच पुरुष है , वह तुमसे दूर रहे।

वेदों के कई उदाहरणों से पता चलता है कि ‘हन्’ का प्रयोग किसी के निकट जाने या पास पहुंचने के लिए भी किया जाता है उदहारण में अथर्ववेद 6 /101 /1 में पति को पत्नी के पास जाने का उपदेश है। इस मंत्र का यह अर्थ कि पति पत्नी के पास जाये उचित प्रतीत होता हैं नाकि पति द्वारा पत्नी को मारना उचित सिद्ध होता हैं। इसलिए हनन का केवल हिंसा अर्थ गलत परिपेक्ष में प्रयोग करना भ्रम फैलाने के समान है।

शंका 7 - वेदों में अतिथि को भोजन में गौ आदि का मांस पका कर खिलाने का आदेश है।

समाधान- ऋग्वेद के मंत्र 10 /68 /3 में अतिथिनीर्गा: का अर्थ अतिथियों के लिए गौए किया गया हैं जिसका तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के आने पर गौ को मारकर उसके मांस से उसे तृप्त किया जाता था।

यहाँ पर जो भ्रम हुआ है उसका मुख्य कारण अतिथिनी शब्द को समझने कि गलती के कारण हुआ है। यहाँ पर उचित अर्थ बनता है ऐसी गौएं जो अतिथियों के पास दानार्थ लाई जायें, उन्हें दान कि जायें। Monier Williams ने भी अपनी संस्कृत इंग्लिश शब्दकोश में अतिथिग्व का अर्थ "To whom guests should go " (P.14) अर्थात जिसके पास अतिथि प्रेम वश जायें ऐसा किया है। श्री Bloomfield ने भी इसका अर्थ "Presenting cows to guests" अर्थात अतिथियों को गौएं भेंट करनेवाला ही किया है। अतिथि को गौ मांस परोसना कपोलकल्पित है।[xiii]

शंका 8 - वेदों में बैल को मार कर खाने का आदेश है।

समाधान- यह भी एक भ्रान्ति है कि वेदों में बैल को खाने का आदेश है। वेदों में जैसे गौ के लिए अघन्या अर्थात न मारने योग्य शब्द का प्रयोग है उसी प्रकार से बैल के लिए अघ्न्य शब्द का प्रयोग है।
यजुर्वेद 12/73 में अघन्या शब्द का प्रयोग बैल के लिए हुआ है। इसकी पुष्टि सायणाचार्य ने काण्वसंहिता में भी कि है।

इसी प्रकार से अथर्ववेद 9/4/17 में लिखा है कि बैल सींगों से अपनी रक्षा स्वयं करता है, परन्तु मानव समाज को भी उसकी रक्षा में भाग लेना चाहिए।

अथर्ववेद 9/4/19 मंत्र में बैल के लिए अधन्य और गौ के लिए अधन्या शब्दों का वर्णन मिलता है। यहाँ पर लिखा है कि ब्राह्मणों को ऋषभ (बैल) का दान करके यह दाता अपने को स्वार्थ त्याग द्वारा श्रेष्ठ बनाता है। वह अपनी गोशाला में बैलों और गौओं कि पुष्टि देखता है।

अथर्ववेद 9/4/20 मंत्र में जो सत्पात्र में वृषभ (बैल) का दान करता है उसकी गौएं संतान आदि उत्तम रहती है।

इन उदहारणों से यह सिद्ध होता है कि गौ के साथ साथ बैल कि रक्षा का वेद सन्देश देते है।

शंका 9 - वेद में वशा / वंध्या अर्थात वृद्ध गौ अथवा बैल (उक्षा) को मारने का विधान है।

समाधान-

शंका का कारण ऋग्वेद 8/43/11 मंत्र के अनुसार वन्ध्या गौओं कि अग्नि में आहुति देने का विधान बताया गया है। यह सर्वथा अशुद्ध है।

इस मंत्र का वास्तविक अर्थ निघण्टु 3 /3 के अनुसार यह है कि जैसे महान सूर्य आदि भी जिसके प्रलयकाल में (वशा) अन्न व भोज्य के समान हो जाते है। इसका शतपथ 5/1/3 के अनुसार अर्थ है पृथ्वी भी जिसके (वशा) अन्न के समान भोज्य है ऐसे परमेश्वर कि नमस्कार पूर्वक स्तुतियों से सेवा करते है।

वेदों के विषय में इस भ्रान्ति के होने का मुख्य कारण वशा, उक्षा, ऋषभ आदि शब्दों के अर्थ न समझ पाना है।

यज्ञ प्रकरण में उक्षा और वशा दोनों शब्दों के औषधि परक अर्थ का ग्रहण करना चाहिए, जिन्हें अग्नि में डाला जाता है।

सायणाचार्य एवं मोनियर विलियम्स के अनुसार उक्षा शब्द के सोम, सूर्य, ऋषभ नामक औषधि है।

वशा शब्द के अन्य अर्थ अथर्ववेद 1/10/1 के अनुसार ईश्वरीय नियम वा नियामक शक्ति है। शतपथ 1/8/3/15 के अनुसार वशा का अर्थ पृथ्वी भी है / अथर्ववेद 20/103/15 के अनुसार वशा का अर्थ संतान को वश में रखने वाली उत्तम स्त्री भी है।

इस सत्यार्थ को न समझ कर वेद मन्त्रों का अनर्थ करना निंदनीय है।

शंका 10-वेदादि धर्म ग्रंथों में माष शब्द का उल्लेख हैं जिसका अर्थ मांस खाना है।

समाधान- माष शब्द का प्रयोग ‘माषौदनम्‘ के रूप में हुआ है। इसे बदल कर किसी मांसभक्षी ने मांसौदनम् अर्थ कर दिया है। यहाँ पर माष एक दाल के समान वर्णित है। इसलिए यहाँ मांस का तो प्रश्न ही नहीं उठता। आयुर्वेद (सुश्रुत संहिता शरीर अध्याय २) गर्भवती स्त्रियों के लिए मांसाहार को सख्त मना करता है और उत्तम संतान पाने के लिए माष सेवन को हितकारी कहता है। इससे क्या स्पष्ट होता है। यही कि माष शब्द का अर्थ मांसाहार नहीं अपितु दाल आदि को खाने का आदेश है। फिर भी अगर कोई माष को मांस ही कहना चाहे, तब भी मांस को निरुक्त 4/1/3 के अनुसार मनन साधक, बुद्धि वर्धक और मन को अच्छी लगने वाली वास्तु जैसे फलका गूदा , खीर आदि कहा गया है। प्राचीन ग्रंथों में मांस अर्थात गूदा खाने के अनेक प्रमाण मिलते है जैसे चरक संहिता देखे में आम्रमांसं (आम का गूदा) , खजूरमांसं (खजूर का गूदा), तैत्तरीय संहिता २.३२.८ (दही, शहद और धान) को मांस कहा गया है।

इससे यही सिद्ध होता है कि वेदादि शास्त्रों में जहाँ पर माष शब्द आता है अथवा मांस के रूप में भी जिसका प्रयोग हुआ है उसका अर्थ दाल अथवा फलों का मध्य भाग अर्थात गूदा है।

शंका 11- वेदों में यज्ञ में घोड़े कि बलि देने का और घोड़े का मांस पकाने का वेदों में आदेश है।

समाधान- यजुर्वेद के 25 अध्याय में सायण, महीधर, उव्वट, ग्रिफ्फिथ, मैक्समुलर आदि ने अश्व हिंसापरक अर्थ किये है। इसका मुख्य कारण वाजिनम् शब्द के अर्थ को न समझना है। वाजिनम् का अश्व के साथ साथ अन्य अर्थ है शूर, बलवान, गतिशील और तेज।

यजुर्वेद के 25/34 मंत्र का अर्थ करते हुए सायण लिखते है कि अग्नि से पकाए, मरे हुए तेरे अवयवों से जो मांस- रस उठता है वह वह भूमि या तृण पर न गिरे, वह चाहते हुए देवों को प्राप्त हो।

इस मंत्र का अर्थ स्वामी दयानंद वेद भाष्य में लिखते है - हे मनुष्य जो ज्वर आदि से पीड़ित अंग हो उन्हें वैद्य जनों से निरोग कराना चाहिए क्यूंकि उन वैद्य जनों द्वारा जो औषध दिया जाता है वह रोगीजन के लिए हितकारी होता है एवं मनुष्य को व्यर्थ वचनों का उच्चारण न करना चाहिए, किन्तु विद्वानों के प्रति उत्तम वचनों का ही सदा प्रयोग करना चाहिए।

अश्व कि हिंसा के विरुद्ध यजुर्वेद 13/47 मंत्र का शतपथकार ने पृष्ठ 668 पर अर्थ लिखा हैं कि अश्व कि हिंसा न कर।

यजुर्वेद 25/44 के यज्ञ में घोड़े कि बलि के समर्थन में अर्थ करते हुए सायण लिखते है कि हे अश्व ! तू अन्य अश्वों कि तरह मरता नहीं क्यूंकि तुझे देवत्व प्राप्ति होगी और न हिंसित होता है क्यूंकि व्यर्थ हिंसा का यहां अभाव है। प्रत्यक्ष रूप में अवयव नाश होते हुए ऐसा कैसे कहते हो? इसका उत्तर देते है कि सुंदर देवयान मार्गों से देवों को तू प्राप्त होता है, इसलिए यह हमारा कथन सत्य है।

इस मंत्र का स्वामी दयानंद अर्थ करते है कि जैसे विद्या से अच्छे प्रकार प्रयुक्त अग्नि, जल, वायु इत्यादि से युक्त रथ में स्थित हो के मार्गों से सुख से जाते है, वैसे ही आत्मज्ञान से अपने स्वरुप को नित्य जान के मरण और हिंसा के डर को छोड़कर दिव्य सुखों को प्राप्त हो।

पाठक स्वयं विचार करे कहाँ स्वामी दयानंद द्वारा किया गया सच्चा उत्तम अर्थ और कहा सायण आदि के हिंसापरक अर्थ। दोनों में आकाश-पाताल का भेद है। ऐसा ही भेद वेद के उन सभी मन्त्रों में है जिनका अर्थ हिंसापरक रूप में किया गया है अत: वे मानने योग्य नहीं है।

शंका 12 - क्या वेदों के अनुसार इंद्र देवता बैल खाता है?

समाधान - इंद्र द्वारा बैल खाने के समर्थन में ऋग्वेद 10/28/3 और 10/86/14 मंत्र का उदहारण दिया जाता है। यहाँ पर वृषभ और उक्षन् शब्दों के अर्थ से अनभिज्ञ लोग उनका अर्थ बैल कर देते है। ऋग्वेद में लगभग 20 स्थलों पर अग्नि को, 65 स्थलों पर इंद्र को, 11 स्थलों पर सोम को, 3 स्थलों पर पर्जन्य को, 5 स्थलों पर बृहस्पति को, 5 स्थलों पर रूद्र को वृषभ कहा गया है[xiv]। व्याख्याकारों के अनुसार वृषभ का अर्थ यज्ञ है।

उक्षन् शब्द का अर्थ ऋग्वेद में अग्नि, सोम, आदित्य, मरुत आदि के लिए प्रयोग हुआ है।

जब वृषभ और उक्षन् शब्दों के इतने सारे अर्थ वेदों में दिए गये है तब उनका व्यर्थ ही बैल अर्थ कर उसे इंद्र को खिलाना युक्तिसंगत एवं तर्कपूर्ण नहीं है।

इसी सन्दर्भ में ऋग्वेद में इंद्र के भोज्य पदार्थ निरामिष रुपी धान, करम्भ, पुरोडाश तथा पेय सोमरस है नाकि बैल को बताया गया हैं।[ऋग्वेद 3/52/1]

शंका 13 - वेदों में गौ का क्या स्थान है ?

समाधान- यजुर्वेद 8/43 में गाय का नाम इडा, रन्ता, हव्या, काम्या, चन्द्रा, ज्योति, अदिति, सरस्वती, महि, विश्रुति और अध्न्या[xv] कहा गया है। स्तुति कि पात्र होने से इडा, रमयित्री होने से रन्ता, इसके दूध कि यज्ञ में आहुति दी जाने से हव्या, चाहने योग्य होने से काम्या, ह्रदय को प्रसन्न करने से चन्द्रा, अखंडनीय होने से अदिति, दुग्ध वती होने से सरस्वती, महिमशालिनी होने से महि, विविध रूप में श्रुत होने से विश्रुति तथा न मारी जाने योग्य होने से अधन्या[xvi] कहलाती है[xvii]।

अघन्या शब्द में गाय का वध न करने का सन्देश इतना स्पष्ट है कि विदेशी लेखक भी उसे भली प्रकार से स्वीकार करते है।[xviii]

हे गौओ, तुम पूज्य हो, तुम्हारी पूज्यता मैं भी प्राप्त करूं। - यजुर्वेद 3/20

मैं समझदार मनुष्य को कहे देता हूं कि तू बेचारी बेकसूर गाय कि हत्या मत कर, वह अदिति हैं काटने-चीरने योग्य नहीं है। - ऋग्वेद 8/101/15

उस देवी गौ को मनुष्य अल्प बुद्धि होकर मारे-काटे नहीं। - ऋग्वेद 8/101/16

निरपराध कि हत्या बड़ी भयंकर होती है, अत: तू हमारे गाय,घोड़े और पुरुष को मर मार। - अथर्ववेद 10/1/29

गौएं वधशाला में न जाएं। - ऋग्वेद 6/28/4

गाय का वध मत कर। - यजुर्वेद 13/43

वे लोग मुर्ख है जो कुत्ते से या गाय के अंगों से यज्ञ करते है। - अथर्ववेद 7/5/5

इसके अतिरिक्त भी वेदों में अनेक मंत्र गौ रक्षा के लिए दिए गये है। पाठक विचार करे कि जब वेदों में गौ रक्षा कि इतनी स्पष्ट साक्षी है ,तब उन्हीं वेदों में यज्ञ में पशु हिंसा का सन्देश कैसे हो सकता है।

शंका 14 - वेदों में गौ हत्या करने वाले के लिए क्या विधान हैं?

समाधान- वेदों में गाय हत्यारे के लिए कठिन से कठिन दंड का विधान है।

जो गौ हत्या करने वाला हो उसे मृत्यु दंड दिया जाये। - यजुर्वेद 30/18

हे गौऔ ! तुम प्रजाओं से सम्पन्न होकर उत्तम घास वाले चरागाहों में विचरो। सुखपूर्वक जिनसे जल पिया जा सके ऐसे जलाशयों में से शुद्ध जल को पियो। चोर और घातक तुम्हारा स्वामी न बने, क्रूर पुरुष का शास्त्र भी तुम्हारे ऊपर न गिरे।- अथर्ववेद 4/21/7

गौ हत्या करने वाले के लिए स्पष्ट कहा गया है कि यदि तू हमारे गाय, घोड़े आदि पशुओं कि हत्या करेगा तो हम तुझे सीसे कि गोली से उड़ा देंगे। - अथर्ववेद 1/16/4

वेदों में गौ हत्या पर मृत्यु दंड का विधान होने के बाद भी मध्य काल में यज्ञों में पशु बलि का प्रचलित होने का कारण राजाओं द्वारा संस्कृत एवं वेद ज्ञान से अनभिज्ञ होना था। दंड देने का कर्त्तव्य राजाओं का है जब राजा को ही यह नहीं सिखलाया गया कि गौ हत्यारे को क्या दंड दे तो वह कैसे दंड देते? इसके विपरीत यह बताया गया कि होम में बलि दिया गया पशु स्वर्ग को जाता है।[xix]

इन प्रमाणों से यही सिद्ध होता हैं कि यज्ञ में किसी भी पशु कि बलि का कोई भी विधान वेदों के सत्य उपदेश के अनुकूल नहीं है एवं जो कुछ भी मध्य काल में प्रचलित हुआ वह वेदों के मनमाने अर्थ करने से हुआ हैं जोकि त्यागने योग्य है।

आधुनिक भारत में सायण, महीधर आदि भारतीय आचार्यों, मैक्समुलर, विल्सन, ग्रिफ्फिथ आदि के प्रचलित वेद भाष्यों को जब स्वामी दयानंद ने सत्य अर्थ कि दृष्टि से विश्लेषण किया तब उन्होंने पाया वेदों के भाष्यों में वेदों कि मूल भावना के विपरीत मनमाने अर्थ निकाले गये है। एक और भारतीय आचार्य वाममार्ग के प्रभाव में आकर वेदों को मांसभक्षण का समर्थक घोषित करने पर उतारू थे दूसरी और विदेशी चिंतक अपनी मतान्धता के जोश में वेदों के स्वार्थपूर्ति के लिए निंदक अर्थ निकाल रहे थे जिससे कि वेदों के प्रति भारतीय जनमानस में श्रद्धा समाप्त हो जाये और उनका मार्ग प्रशस्त हो सके। धन्य हैं स्वामी दयानंद जिन्होंने अपनी दूर दृष्टि से इस षडयन्त्र को न केवल पकड़ लिया अपितु निराकरण के लिए वेदों को उचित भाष्य भी किया। हम सभी को स्वामी जी के इस उपकार का आभारी होना चाहिए।

References

[i] Vedic Hymns - Maxmuller Part 1(1891) Part 2 (1897)

[ii] The Rig Vedas –Ralph T H Griffith 1896

[iii] ऋग्वेद भाष्य - सायणाचार्य

[iv] यजुर्वेद भाष्य- महीधर

[v] The Brahma Samaj and Arya samaj in the bearing of Christianity:- A study of Indian Theism by Frank Lillingston (1901), On the Religion and Philosophy of the Hindus by Henry Thomas Colebrooke (1858), Chips from a German Woodshop by Frederick Maxmuller (1875).

[vi] The Myth of the Holy Cow- D.N.Jha(2002)/ पवित्र गाय का मिथक डी.न.झा (2004)

[vii] Refer to Journal of the Asiatic society of Bengal and Indo Aryans by Rajender Lal Mitra 1891

[viii] Buddha, by denying the authority of the Veda, became a Heretic. Refer Page 300 ,Chips from a German Workshop, Volume 2 by Maxmuller

[ix] अध्वर इति यज्ञनाम ध्वरतीहिंसाकर्मा तत्प्रतिषेध:- निरुक्त 2/7 , 1/8

[x] अश्वमेध यज्ञ में पशु बलि निषेध के सम्बन्ध में महाभारत के प्रमाण

१. एक बार इंद्र ने एक विस्तृत यज्ञ रचाया। ऋत्विजों ने उस यज्ञ में पशु बलि के निमित पशुओं का संग्रह किया। पशुओं के आलम्बन के समय, ऋषियों ने पशुओं को दीन भाव युक्त देखकर इंद्र के समीप जाकर कहा कि हे इंद्र ! यज्ञ कि यह विधि शुभ नहीं है। आप महान धर्म करने के अभिलाषी हुए है, परन्तु आप इसे विशेष रूप से नहीं जानते। क्यूंकि पशुओं से यज्ञ करना विधि विहित नहीं है। जब हिंसा धर्म रूप से वर्णित ही नहीं है, तब आपका हिंसा मय यज्ञ धर्म युक्त कैसे होगा? इसलिए आपका यह समारम्भ धर्मोपघातक है। हे इंद्र, यदि आप धर्म कि अभिलाषा करते है तो ऋत्विगन, आगम (वेद और ब्राह्मण) के अनुसार आपका यज्ञ करे। आपको इस विधि द्वष्ट यज्ञ के द्वारा ही महान धर्म होगा। हे इंद्र! आप हिंसा त्याग कर, तीन वर्षों के पुराने बीजों से ही यज्ञ कीजिये। - महाभारत अश्वमेध पर्व 91 अध्याय।

२. लोभी, लालची और नास्तिक लोगों ने जोकि वेदों के अभिप्राय को नहीं जानते जूठ को सत्य रूप से वर्णित किया है। परन्तु जो सत्पुरुषों के मार्ग के अनुगामी है वे तो बिना हिंसा के ही यज्ञ करते है। वे वनस्पति, औषधि, फलों तथा मूलों से यज्ञ करते है। - महाभारत शांतिपर्व मोक्ष धर्म 264 अध्याय।

३. जिनकी कोई मर्यादा नहीं, जो स्वयं मूढ़, नास्तिक, संशयात्मा और छली कपटी है। उन्होंने स्वयं यज्ञ में हिंसा का वर्णन किया है। धर्मात्मा मनु ने तो सब कामों में अहिंसा धर्म कहा है। परन्तु मनुष्य व्यवहारों में तथा वेदों में अपने काम वश ही हिंसा करते है। - महाभारत शांतिपर्व मोक्ष धर्म 266 अध्याय।

४. यज्ञ और यूप के बहाने ने मनुष्य यदि वृथा मांस खाते है तो यह धर्म प्रशंसित नहीं है। सुरा, मछली, मांस, आसव और कृशरोधन- इनका खाना पीना धूर्तों ने चलाया है, वेदों में इनका जिक्र तक नहीं है। धूर्तों ने, गर्व, अज्ञान, लोभ तथा लालच से यह सब कल्पित कर लिया है। ब्राह्मण लोग सब यज्ञों में विष्णु कि पूजा करते है। और दूध, फल तथा वेदों में वर्णित वृक्षों द्वारा ही उस यज्ञ को करने का विधान है। - महाभारत शांतिपर्व मोक्ष धर्म 266 अध्याय।

इस प्रकार से अनेक उदहारण महाभारत में मिलता हैं जिनका विवरण जानने के लिए प्रसिद्द वैदिक विद्वान एवं अथर्ववेद भाष्यकार श्री विश्वनाथ जी विद्यालंकार जी द्वारा लिखित पुस्तक वैदिक पशु यज्ञ मीमांसा के 12 वें प्रकरण को देख सकते है।

[xi] सन्दर्भ - निघण्टू 1 /1, शतपथ 13/15/3

[xii] सन्दर्भ - महाभारत शांतिपर्व 337/4-5


[xiii] इस भ्रान्ति का कारण मैकडोनाल्ड (वैदिक माइथोलॉजी पृष्ठ 145 ) एवं कीथ (दी रिलिजन एंड दी फिलोसोफी ऑफ़ दी वेदास एंड उपनिषदस ) द्वारा अतिथिग्व शब्द का अर्थ अतिथियों के लिए गोवध करना बताया जाना हैं जिसका समर्थन काणे (हिस्ट्री ऑफ़ धर्म शास्त्र भाग 2 पृष्ठ 749-56 ) ने भी किया है।

[xiv] सन्दर्भ आर्ष ज्योति- रामनाथ वेदालंकार पृष्ठ 223

[xv] अघन्या शब्द के वेदों में सन्दर्भ -अथर्ववेद 7/73/11 अथवा अथर्ववेद 9/10/20, ऋग्वेद 4/1/6, ऋग्वेद 7/68/9

[xvi][xvii] अघन्य (अवध्य) शब्द का प्रयोग ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में बैल के 4 बार हुआ हैं एवं अघन्या (अवध्या) का प्रयोग गाय के अर्थ में 42 हुआ है। सन्दर्भ -अघन्या शब्द का उल्लेख करने वाले वैदिक अवतरणों के हवाले - काणे (हिस्ट्री ऑफ़ धर्म शास्त्र भाग 2 पृष्ठ 772-773 )

[xviii] वैदिक पर्यावाची कोष निघंटु में गाय की 21 संज्ञाएं दी गई है।

[xix] Rigveda 9/1/9 - Inviolable milch-kine round about him blend for Indra's drink,

The fresh young Soma with their milk-Rig Veda, tr. by Ralph T.H. Griffith [1896]

[xix] एक तर्क इस वाक्य के खंडन में प्रसिद्द है कि अगर होम में मारा गया पशु स्वर्ग को जाता है तब तो यजमान अपने पिता को मारकर क्यूँ न सीधे स्वर्ग भेज दे?

Thursday, January 8, 2015

True face of Sufism



Dr Vivek Arya

A. Conversion of Hindus by Sufis

Sufis are considered as  messengers of god who believed in peace, harmony and nonviolence. But contrary to this we read many evidences of Sufis using all measures to convert Hindus towards Islam. From debates, stipends, grants, higher official posts, life threat, pardoning of life to brutal killings were main tools for them.
1. Gisu Daraz famous Chisti Sufi (born 30 July 1321 in New Delhi) learnt Sanskrit and acquired a knowledge of the Hindu epics in an attempt to refute the religious beliefs in Hinduism. He indulged in debates with Brahmins on the condition that whoever was beaten should embrace the religion of the victor. Gisu Daraz claimed to have defeated many Brahman scholars.
(Ref. Gisu Daraz, jawanmi’u’l-kilam, British museum MS.or 252, ff.9a, 87a-90a)
2. Shahjahan ordered Mulla Muhibib “ali sindi, an alim, poet and Sufi whom he deeply respected to convert willing Hindus to Islam which would make them eligible for stipends and revenue grants”
(Ref. tabaqat-I-shahjahani, f.316b)
3. Sheikh dawud of chati converted fifty to a hundred Hindus each day would make the number of converts annually an impossible neat 15,000
(Ref. supra, p.63)
Sheikh dawud’s successor, shah abu’l-ma’ali, and Sufis in other qadiriyya khanqahs certainly never hesitated in their proselytizing mission and even Mulla shah converted a number of Hindus to Islam
(Ref. supra, p.119-120)
4. Shah ‘abdu’l-’aziz himself claimed to have converted hundreds of hindus, but was not successful in recruiting more than half a dozen shi’is to the ranks of sunnism.
(Ref.- malfuzat-I-shah ‘abdu’l-’aziz, p.22)5. A Hindu zamindar Birbar was arrested for fomenting a rebellion and was given the death sentence. He requested a Sufi Miran Bhikh to save his life and promising to become a Muslim if he did so. He was pardoned and was rewarded with a rode of honor. Sufi Miran converted him to Islam and also made him his disciple.
(Ref. HSI vol. 2 p.272-273)
5. According to Dara -Sukoh, Sheikh ‘Abdul-qadir converted a large number of Hindus to Islam, as well as causing many wayward Muslims to adopt a pious life
(Ref. Muhammad dara-shukoh, safinatu’l-auliya’, lucknow, 1872,p.69)
6. Sheikh Mahmud bin Abdullah gujrati was for several years deeply in love with the son of a Hindu dancer. The sheikh’s success in subsequently islamizing the boy was a matter of great satisfaction to the orthodox.
(Ref. Gulzar-i-abrar, f.247a.)
7. Nawahun, the Hindu darogha of Uch once visited Makhdum Jahaniyan (also known as Saiyid Jalalu’d-din Bukhari, eminent Suhrawardiyya Sufi) on his deathbed. He in his previous discourse had expressed that a formal recitation of kalima did not make the speaker a Muslim. The Saiyid concluded that Nawahun’s statement amounted to a protestation of faith. Nawahun was not willing to accept Islam. He even made an unsuccessful attempt to prevent his conversion from sultan of Delhi. But makhdum’s younger brother Saiyid Raju caught and executed him.
(Ref. HSI .by SAA Rizvi vol. 1 p. 279,280)
8. We know that the Suhrawardiyya, Shaikh lalalu’d-din tabrizi, Makhdum Jahaniyan and his brother, Raju Qattal, were active propagators of Islam. The Sufis trained in the khanqahs of Shaikh alaud-dala Simnani, Mir Saiyid Ali Hamadani and his son and successors, Mir Muhammad, considered the conversion of Hindus to Islam as one of their main objectives. Shaikh Jalal of Sylhet and his Turkistani disciples were similarly imbued with missionary fervour, as were Khwajgan and the Naqshbandiyyas of central Asia, some of whom would devote a few years of their lives fighting against the non-Islamic Turkic tribes before converting them to Islam. The Sufis of the Shattariyya, qadiriyya and the naqshbandiyyas orders who began establishing their khanqahs during the fifteenth century were deeply aware of the proselytizing traditions of their ancestors in Persia and central Asia, and brought their knowledge to bear upon Indian conditions in order to gain converts.
(Ref. HSI by SAA Rizvi, vol.2, pp.426)
PRIYANKA CHOPRA VISITING DARGAH
B. Influenced Muslim rulers to show hostile behaviors towards Hindus to enable them to denounce Hinduism and accept Islam.
1. Saiyid nur-ud-din Mubarak’s gave four principles for protection of Islam. He was a Suhrawardiyya khalifa appointed by Iltutmish and was called by people of the city as, Mir-I dilhi (lord of Delhi)
The first one is as follows:
They (rulers) should promote Islamic customs, promulgate the commands of the sharia, enforcing what is obtained and prohibiting what is forbidden by it, and uproot kufr (infidelity), shirk (polytheism) and idolatry. If they cannot fully uproot kufr and shirk they should make every effort to disgrace and humiliate Hindus, mushriks (polytheists) and idolaters, for they are inveterate enemies of god and the prophet Mohammad. They should not tolerate the sight of Hindus, and in particular they should exterminate the Brahmans, who are the leaders of heretics and disseminators of heresy. They should not allow kafirs (infidels) and mushriks to lead an honorable life or sassing to them high office.
(Ref. tarikh-I firuz shahi, pp. 41-44)
2. Shaikh Muzaffar (Firdawsiyya Sufi) reminded sultan of Bengal Ghiyasu’d-din Azam shah that high government posts should not be given to Hindus and wrote:
An infidel may be entrusted with some work but he should not be made wali (chief supervisor or governor) so that he may have control over and impose his authority on Muslims. God says “let not the believers take for friends or helpers unbelievers and neglect god: if any do that, in nothing will there be help from god expect by way of precaution, that ye may guard yourselves from them. There are severe warnings in the Quran, the Hadis and historical works against those who have given authority to the unbelievers over the believers. God grants opulence and provisions from unexpected sources, and he gives deliverance from them.” There is authoritative promise of provisions, victory and prosperity. The vanquished unbelievers with heads hanging downward, exercise their power and authority and administer the lands which belong to them. But they have also been appointed (executive) officers over the Muslims, in the lands of Islam, and they impose their orders on them. Such things should not happen.
(Ref. S.H.Askari- the correspondence of the fourteenth century Sufi saints of Bihar with the contemporary sovereigns of Delhi and Bengal, journal of the Bihar research society, march 1956,p.186-187)
3. Mir Saiyid Ali Hamadani (founder of Kubrawiyya Sufi order of Kashmir) emphasized a covenant to sultan of Kashmir on his relation with Hindus. Covenant is as follows:
1.      They (the hindus) will not bid new idol temples.
2.      They will not rebuild any existing temple which may have fallen into disrepair.
3.      Muslim travelers will not be prevented from staying in temples.
4.      Muslim travelers will be provided hospitality by Zimmis in their own houses for three days.
5.      Zimmis will neither act as spies nor give spies shelter in their houses.
6.      If any relation of a Zimmi is inclined towards Islam, he should not be prevented from doing so.
7.      Zimmis will respect Muslims.
8.      Zimmis will courteously receive a Muslim wishing to attend their meetings.
9.      Zimmis will not dress like Muslims.
10.  They will not take Muslim names.
11.  They will not ride horses with saddle and bridle.
12.  They will not possess swords, bows or arrows.
13.  They will not wear signet rings.
14.  They will not openly sell or drink intoxicating liquor.
15.  They will not abandon their traditional dress, which is a sign of their ignorance, in order that they may be distinguished from Muslims.
16.  They will not openly practice their traditional customs amongst Muslims.
17.  They will not build their houses in the neighbourhood of Muslims.
18.  They will not carry or bury their dead near Muslim graveyards.
19.  They will not mourn their dead loudly.
20.  They will not buy Muslim slaves.
(Ref. Zakhiratul-muluk, pp. 117-118)
(Saiyid Ali considered Hindus as Zimmis)
4. Shah Waliu’llah suggested Mughal emperor Ahmad shah regarding their administration:
Strict orders should be issued in all Islamic towns forbidding religious ceremonies, publicly practiced by infidels (such as the performance of Holi and ritual bathing in the ganges). On the tenth of Muharram Shi’is should not be allowed to go beyond the bounds of moderation, neither should they be rude nor repeat stupid things (that is, recite tabarra or condemn the first three successors of Muhammad) in the streets or bazaars.
(REF. Shah Waliu’llah dihlawi ke siyasi maktubat, aligarh, 1950, pp. 41-44, 2nd edition, Delhi 1969, p.5)
5. Under the influence of Mir (Mir Muhammad Sufi of Kubrawiyya order) and Suha Bhatta, the sultan’s  (Sultan Sikander of Kashmir 1389-1413) policy changed. Ancient temples in Pompur, Vijabror, Martand, Anantnag, Sopur and Baramula were desecrated and demolished; many puritanical and discriminatory laws were introduced and the jiziya or poll tax was imposed on hindus for the first time in Kashmir. The persecution of Brahmans, their exclusion from the top spheres of government and the ensuing replacement by Irani migrants, gave the administration a veneer of orthodoxy.
(Ref. HSI by SAA Rizvi, vol.1, pp.297)
SHILPA SHETTY , RAJ KUNDRA VISITING DARGAH
C. Sufis promoted or participated in destruction of Hindu temples.
1.Miyan Bayan supported Bahadur Shah of gujrat to invade Rajputs and destruct Hindu temple.
In Ajmer, there lived Bayan Majzub who spent most of his time in the vicinity of the tomb of Khwaja Mu’inu’d-din Chisti. It is said that before his accession to the throne, Bahadur shah of gujrat (1526-1537) visited Ajmer, which was then ruled by the Rajputs who had gone to the extent of converting the tomb into an idol temple. Bahadur took a vow that if he were to succeed to the throne; he would take revenge upon the infidels and reduce them to miserable circumstances. Miyan Bayan who was present at the time instantly ordered his slave girl to arrange for a high throne for the sea bird, meaning Bahadur. The prince’s claim to the gujrati throne were strongly contested by his rivals. However, considering bayan’s symbolic gesture as a prophecy of his success in acceding to the gujrat sultanate, he immediately returned to gujrati and soon became its ruler. Shortly he invaded the Rajputs and shattered their power.
(Ref. akhbaru’l-akhyar by Shaikh ‘abdu’l-haqq muhaddis dihlawi pp.291-292)
2. Shaikh Jalalu’d-din of Suhrawardiyya Sufi order demolished temple and constructed a khanqah in place of it.
Shaikh Jalalu’d-din had many disciples in Bengal. He first lived at lakhnauti, constructed a khanqah and attached a langer to it. He also bought some gardens and land to be attached to the monstry. He moved to Devatalla (Deva Mahal) near Pandua in northern Bengal. There a kafir (either a Hindu or a Buddhist) had erected a large temple and a well. The Shaikh demolished the temple and constructed a takiya (khanqah) and converted a large number of kafirs.
(Ref. jamali, p.171)
DEG FILLED WITH HINDU MONEY

D. Sufis appealed or helped Muslim invaders to invade Hindu kings

1.Shaikh Nur Qutb-i ‘ Alam and Saiyid Muhammad Ashraf Jahangir Simnani appealed Sultan Ibrahim Shah Sharqi to invade Bengal.
Shaikh Nur Qutb-i ‘ Alam believed in the traditional perso-islamic theory of kingship and taught his followers tom obey the sultan according to the prophet’s Hadis and the advice of leading Chisti saints. His relations with Sikander’s successor, Ghiyasu’d-din A’zam Shah, were cordial but he was distressed by the growing factionalism at court. A powerful party of Hindus and Muslims, led by Raja Ganesha, a local Hindu chief of Dinajpur in North Bengal began to dominate the government. After the death of Ghiyasu’d-din A’zam Shah, between 1410 and 1415, the Raja acted as king- maker and one after the other three puppets were elevated to the throne. During the reign of the last, Ala’u’d-Din Firuz Shah, Raja Ganesha was defacto ruler of Bengal. This prompted Nur Qutb-i ‘ Alam to write to Sultan Ibrahim Shah Sharqi of Jaunpur urging him to invade Bengal and in so doing restore the glory of Islam. Saiyid Muhammad Ashraf Jahangir Simnani also wrote a similar letter. In 1415 Sultan Ibrahim Shah Sharqi invaded Bengal but a peace was concluded in which Ganesha promised his son would convert to Islam before assuming the throne of Bengal.
(Ref. tabaqat-I-akbari, 3,p.265; gulshan-I ibrahimi, pp. 296-207; ghulam hussain salim, riyazu’s- salatin, Calcutta, 1890, pp.108-110, maktubat-I ashrafi (letter to sultan Ibrahim); mir’atu’l-asrar, ff.477b-79b; riyazu’s-salatin, pp.112-113)
2. Sheikh Ghaus of Shattariyya order of Sufis helped Babur to seize Gwalior fort.
For thirteen years and four months Shaikh Ghaus performed rigorous ascetic exercises in the caves of Chunar, near the Ganges in the modern district of Mirzapur in the U.P., and became known to the Muslim elite for his miraculous powers. He settled in Gwalior where he became very influential. In November 1526 he helped Babur’s army to seize the Gwalior fort, thereby winning the respect and confidence of the emperor.
(Ref. Beveridge, a.s.tr.Babur-nama, 2, reprint, New Delhi, 1970, pp. 539-540)
3. Saiyid Ahmad Shahid urged Muslims to help him in annihilation of Sikhs from northern India.
11 January 1827 he (Saiyid Ahmad Shahid) officiated at a ceremony of bay’a in which several thousand theologians, Sufis, leading citizens and common people in the northwest frontier pledged him their allegiance, after which they recited the khutba in his name. At the time Saiyid protested that as an Imam he was not commissioned to deprive the various sultans between Kabul and Bukhara of their states. They could continue to flourish in peace, he said, and would assert only his leadership in the question of bid’a (sinful innovations). However they were urged to offer him their military assistance in a jihad against the Sikhs.
(Ref. Muhammad ja’far thaneswari, ed. Maktubat-Saiyid Ahmad shahid, Karachi, 1969.no.14, 16)

E. Sufis unfriendly attitude towards Hindus

1.Shah waliu’llah advised Indian Muslims to live so far from Hindu towns that they would be unable to see the light from the fires in Hindu houses.
(Ref. shah waliu’llah, hujjat Allah al – baligha, 1, Karachi, n.d. pp.468)
2. He (Makhdum Jahaniyan or Saiyid Jalalu’d-din Bukhari of Suhrawardiyya order) also sternly disapproved of giving Allah such Hindi names as Thakur (lord), Dhani (rich) and Kartar (creator)
(Ref. siraju’l-hidaya, f.64b)
Sufis praised Muslim invaders who killed millions of Hindus, plundered thousands of temples, raped countless mothers and sisters and sold Hindus in slave market of Kabul.
It is not surprising that Shah Waliu’llah considered sultan Mahmud of Ghazna (998-1030) Islam’s greatest ruler as he launched and sustained the first read conquest of northern India. His fame had a natural qualification- Mahmud was the greatest ruler after the khilafat-I-khass. Shah waliu’llah argued that in reference to Mahmud historians failed to recognize that his horoscope had been identical to the prophet’s and that this fact had enabled him to obtain significant victories in wars to propagate Islam.
(Ref. shah waliu’llah, qurrat al-a’ynain fi tafzil al-shaykhyn, Delhi, 1893, p.324.)
Sufis didn’t hesitate to say lie for personal benefits
When mughal emperor aurangzib imprisoned his own son Shah Alam, his other son prince Azam shah believed that if Shah Alam were killed his accession to the throne would not prove too difficult. So Azam shah started hatching plots, using a Shaikh from Sirhind to whom the emperor was greatly attached. Azam deposited with a banker 900,000 rupees in name of the Sirhind Shaikh, on the condition that the latter incite the emperor to execute Shah Alam. The Shaikh informed the emperor that Shah Alam was an evil man who should receive the death penalty and that such knowledge had been given to him by the prophet. Owing to the seriousness of this accusation the emperor requested the Shaikh to mystically consult the prophet again, only to be told that the orders were final. The following morning the Shaikh called on the emperor, urging him against a delay in carrying out the express command of the prophet. Aurangzib summoned Sidi Faulad the kotwal, to whom he delegated complete responsibility in the handling of the matter. Sidi Faulad summoned every prominent banker in the imperial camp with their diaries and account books. The note about the plot hatched by Azam shah was found.
(Ref. HSI by SAA Rizvi, vol.2, pp.370-371)
NOW WITH THE ABOVE REFERENCES AND FACTS ITS VERY CLEAR THAT SUFIS ONLY MOTIVE WAS TO CONVERT HINDUS TO ISLAM AS FOR THEM HINDUS AREKAFIRS.ITS MASS MEDIA WHICH IS PROJECTING IMAGE OF SUFIS AS SECULAR BUT TRUTH IS TOTALLY OPPOSITE TO IT.

Monday, January 5, 2015

हुतात्मा महाशय राजपाल की बलिदान-गाथा एवं रंगीला रसूल



हुतात्मा महाशय राजपाल की बलिदान-गाथा एवं रंगीला रसूल

डॉ विवेक आर्य


सन 1923 में मुसलमानों की ओर से दो पुस्तकें  "19 वीं सदी का महर्षि" और “कृष्ण,तेरी गीता जलानी पड़ेगी ” प्रकाशित हुई थीं।  पहली पुस्तक में आर्यसमाज का संस्थापक स्वामी दयानंद का सत्यार्थ प्रकाश के 14 वे सम्मुलास में कुरान की समीक्षा से खीज कर उनके विरुद्ध आपतिजनक एवं घिनोना चित्रण प्रकाशित किया था। जबकि दूसरी पुस्तक में श्री कृष्ण जी महाराज के पवित्र चरित्र पर कीचड़ उछाला गया था। उस दौर में विधर्मियों की ऐसी शरारतें चलती ही रहती थी पर धर्म प्रेमी सज्जन उनका प्रतिकार उन्हीं के तरीके से करते थे।  महाशय राजपाल ने स्वामी दयानंद और श्री कृष्ण जी महाराज के अपमान का प्रति उत्तर 1924 में "रंगीला रसूल" के नाम से पुस्तक छाप कर दिया।  जिसमें मुहम्मद साहिब की जीवनी व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत की गयी थी। यह पुस्तक उर्दू में थी और इसमें सभी घटनाएँ इतिहास सम्मत और प्रमाणिक थी।  पुस्तक में लेखक के नाम के स्थान पर “दूध का दूध और पानी का पानी "छपा था।  वास्तव में इस पुस्तक के लेखक पंडित चमूपति जी थे जो की आर्यसमाज के श्रेष्ठ विद्वान् थे।  वे महाशय राजपाल के अभिन्न मित्र थे। मुसलमानों के ओर से संभावित प्रतिक्रिया के कारण पंडित चमूपति जी इस पुस्तक में अपना नाम नहीं देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने महाशय राजपाल से वचन ले लिया की चाहे कुछ भी हो जाये,कितनी भी विकट स्थिति क्यूँ न आ जाये।  वे किसी को भी पुस्तक के लेखक का नाम नहीं बतायेगे। महाशय राजपाल ने अपने वचन की रक्षा अपने प्राणों की बलि देकर की पर पंडित चमूपति सरीखे विद्वान् पर आंच तक न आने दी। 1924 में छपी रंगीला रसूल बिकती रही पर किसी ने उसके विरुद्ध शोर न मचाया फिर महात्मा गाँधी ने अपनी मुस्लिम परस्त निति में इस पुस्तक के विरुद्ध एक लेख लिखा।  इस पर कट्टरवादी मुसलमानों ने महाशय राजपाल के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया।  सरकार ने उनके विरुद्ध 153ए धारा के अधीन अभियोग चला दिया। अभियोग चार वर्ष तक चला।  राजपाल जी को छोटे न्यायालय ने डेढ़ वर्ष का कारावास तथा 1000 रूपये का दंड सुनाया गया।  इस फैसले के विरुद्ध अपील करने पर सजा एक वर्ष तक कम कर दी गई।  इसके बाद मामला हाई कोर्ट में गया।  कँवर दिलीप सिंह की अदालत ने महाशय राजपाल को दोषमुक्त करार दे दिया। मुसलमान इस निर्णय से भड़क उठे। खुदाबख्स नामक एक पहलवान मुसलमान ने महाशय जी पर हमला कर दिया जब वे अपनी दुकान पर बैठे थे पर संयोग से आर्य सन्यासी स्वतंत्रानंद जी महाराज एवं स्वामी वेदानन्द जी महाराज वहां पर उपस्थित थे। उन्होंने घातक को ऐसा कसकर दबोचा की वह छुट न सका।  उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया गया, उसे सात साल की सजा हुई। रविवार 8 अक्टूबर 1927 को स्वामी सत्यानन्द जी महाराज को महाशय राजपाल समझ कर अब्दुल अज़ीज़ नमक एक मतान्ध मुसलमान ने एक हाथ में चाकू ,एक हाथ में उस्तरा लेकर हमला कर दिया।  स्वामी जी घायल कर वह भागना ही चाह रहा था कि पड़ोस के दूकानदार महाशय नानकचंद जी कपूर ने उसे पकड़ने का प्रयास किया। इस प्रयास में वे भी घायल हो गए तो उनके छोटे भाई लाला चूनीलाल जी जी उसकी ओर लपके। उन्हें भी घायल करते हुए हत्यारा भाग निकला पर उसे चौक अनारकली पर पकड़ लिया गया।  उसे 14 वर्ष की सजा हुई ओर तदन्तर तीन वर्ष के लिए शांति की गारंटी का दंड सुनाया गया। स्वामी सत्यानन्द जी के घाव ठीक होने में करीब डेढ़ महीना लगा। 6 अप्रैल 1929 को महाशय राजपाल अपनी दुकान पर आराम कर रहे थे। तभी इल्मदीन नामक एक मतान्ध मुसलमान ने महाशय जी की छाती में छुरा घोप दिया। जिससे महाशय जी का तत्काल प्राणांत हो गया। हत्यारा अपने जान बचाने के लिए भागा और महाशय सीताराम जी के लकड़ी के टाल में घुस गया।  महाशय जी के सुपुत्र विद्यारतन जी ने उसे कस कर पकड़ लिया। पुलिस हत्यारे को पकड़ कर ले गई।  देखते ही देखते हजारों लोगो का ताँता वहाँ पर लग गया। देवतास्वरूप भाई परमानन्द ने अपने सम्पादकीय में लिखा हैं की “आर्यसमाज के इतिहास में यह अपने दंग का तीसरा बलिदान हैं।  पहले धर्मवीर लेखराम का बलिदान इसलिए हुआ की वे वैदिक धर्म पर किया जाने वाले प्रत्येक आक्षेप का उत्तर देते थे। उन्होंने कभी भी किसी मत या पंथ के खंडन की कभी पहल नहीं की थी। सदैव उत्तर- प्रति उत्तर देते रहे।  दूसरा बड़ा बलिदान स्वामी श्रद्धानंद जी का था।  उनके बलिदान का कारण यह था की उन्होंने भुलावे में आकर मुसलमान हो गए भाई बहनों को, परिवारों को पुन: हिन्दू धर्म में सम्मिलित करने का आन्दोलन चलाया और इस ढंग से स्वागत किया की आर्य जाति में “शुद्धि” के लिए एक नया उत्साह पैदा हो गया।  विधर्मी इसे न सह सके।  तीसरा बड़ा बलिदान महाशय राजपाल जी का हैं। जिनका बलिदान इसलिए अद्वितीय है क्यूंकि उनका जीवन लेने के लिए लगातार तीन आक्रमण किये गए।  पहली बार 26 सितम्बर 1927 को एक व्यक्ति खुदाबक्श ने किया दूसरा आक्रमण 8  अक्टूबर को उनकी दुकान पर बैठे हुए स्वामी सत्यानन्द पर एक व्यक्ति अब्दुल अज़ीज़ ने किया। ये दोनों अपराधी अब कारागार में दंड भोग रहे हैं।  इसके पश्चात अब डेढ़ वर्ष बीत चूका हैं की एक युवक इल्मदीन, जो न जाने कब से महाशय राजपाल जी के पीछे पड़ा था, एक तीखे छुरे से उनकी हत्या करने में सफल हुआ हैं।  जिस छोटी सी पुस्तक लेकर महाशय राजपाल के विरुद्ध भावनायों को भड़काया गया था, उसे प्रकाशित हुए अब चार वर्ष से अधिक समय बीत चूका हैं”।  लाहौर के हिन्दुओं ने यह निर्णय किया की शव का संस्कार अगले दिन किया जाये।  पुलिस के मन में निराधार भूत का भय बैठ गया और डिप्टी कमिश्नर ने रातों रात धारा 144 लगाकर सरकारी अनुमति के बिना जुलुस निकालने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अगले दिन प्रात: सात बजे ही हजारों की संख्या में लोगो का ताँता लग गया।  सब शव यात्रा के जुलुस को शहर के बीच से निकल कर ले जाना चाहते थे,पर कमिश्नर इसकी अनुमति नहीं दे रहा था। इससे भीड़ में रोष फैल गया। अधिकारी चिढ गए।  अधिकारियों ने लाठी चार्ज की आज्ञा दे दी।  पच्चीस व्यक्ति घायल हो गए।  अधिकारियों से पुन: बातचीत हुई।  पुलिस ने कहाँ की लोगों को अपने घरों को जाने दे दिया जाये। इतने में पुलिस ने फिर से लाठी चार्ज कर दिया।  150  के करीब व्यक्ति घायल हो गए पर भीड़ तस से मस न हुई।  शव अस्पताल में ही रखा रहा। दुसरे दिन सरकार एवं आर्यसमाज के नेताओं के बीच एक समझोता हुआ जिसके तहत शव को मुख्य बाजारों से धूम धाम से ले जाया गया। हिंदुओं ने बड़ी श्रद्धा से अपने मकानों से पुष्प वर्षा कर अपनी श्रद्धांजलि दी थी।

ठीक पौने बारह बजे हुतात्मा की नश्वर देह को महात्मा हंसराज जी ने अग्नि दी। महाशय जी के ज्येष्ठ पुत्र प्राणनाथ जी तब केवल ११ वर्ष के थे पर आर्य नेताओं ने निर्णय लिया की समस्त आर्य हिन्दू समाज के प्रतिनिधि के रूप में महात्मा हंसराज मुखाग्नि दे।  जब दाहकर्म हो गया तो अपार समूह शांत होकर बैठ गया।  ईश्वर प्रार्थना श्री स्वामी स्वतंत्रानंद जी ने करवाई।  प्रार्थना की समाप्ति पर भीड़ में से एकदम एक देवी उठी। उनकी गोद में एक छोटा बालक था। यह देवी हुतात्मा राजपाल की धर्मनिष्ठा साध्वी धर्मपत्नी थी।  उन्होंने कहा की मुझे अपने पति के इस प्रकार मारे जाने का दुःख अवश्य हैं पर साथ ही उनके धर्म की बलिवेदी पर बलिदान देने का अभिमान भी हैं।  वे मारकर अपना नाम अमर कर गए।

पंजाब के सुप्रसिद्ध पत्रकार व कवि नानकचंद जी “नाज़” ने तब एक कविता महाशय राजपाल के बलिदान का यथार्थ चित्रण में लिखी थी-

फ़ख से सर उनके ऊँचे आसमान तक तक हो गए,हिंदुयों ने जब अर्थी उठाई राजपाल।

फूल बरसाए शहीदों ने तेरी अर्थी पे खूब, देवताओं ने तेरी जय जय बुलाई राजपाल।

हो हर इक हिन्दू को तेरी ही तरह दुनिया नसीब जिस तरह तूने छुरी सिने पै खाई राजपाल।

तेरे कातिल पर न क्यूँ इस्लाम भेजे लानतें, जब मुजम्मत कर रही हैं इक खुदाई राजपाल।

मैंने क्या देखा की लाखों राजपाल उठने लगे दोस्तों ने लाश तेरी जब जलाई राजपाल।

नास्तिकता भी एक अन्धविश्वास है




नास्तिकता भी एक अन्धविश्वास है!

डॉ विवेक आर्य


 हिंदुस्तान टाइम्स अखबार के 4 जनवरी, 2015 के अंक में "The Rise of Reason"  के नाम से लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख का आशय यह दिखाना था कि तर्क का युग का आरम्भ हो चूका है और लोग धर्म का त्याग कर अपने आपको नास्तिक कहलाने में गर्व महसूस करते है। इस लेख में इस भी दिखाया गया है कि सन 2005 में हमारे देश में 81 प्रतिशत लोग आस्तिक थे जो 2012 में  6 प्रतिशत की दर से घट कर 75 प्रतिशत हो गया है। यह भी दर्शाने का प्रयास किया गया है कि विश्व में तर्कवादी बड़ी संख्या में बढ़ रहे है और ये वह लोग है जिनके समक्ष धर्म तर्क की कसौटी पर खड़ा नहीं रह पा रहा है। इस लेख के माध्यम से हम सत्य को जानने का प्रयास करेंगे कि क्या धर्म को मानने वाले आस्तिकों का उद्देश्य ठीक है अथवा तर्क के द्वारा धर्म को न मानने वाले नास्तिकों का उद्देश्य ठीक है।

नास्तिक बनने के मुख्य क्या क्या कारण है?

 नास्तिक बनने के प्रमुख कारण है

1. ईश्वर के गुण,कर्म और स्वभाव से अनभिज्ञता।
2. धर्म के नाम पर अन्धविश्वास जिनका मूल मत मतान्तर की संकीर्ण सोच है।
3. विज्ञान द्वारा करी गई कुछ भौतिक प्रगति को देखकर अभिमान होना।
4. धर्म के नाम पर दंगे,युद्ध, उपद्रव आदि।

ईश्वर के नाम पर अत्याचार, अज्ञानता को बढ़ावा देना, चमत्कार आदि में विश्वास दिलाना, ईश्वर को एकदेशीय अर्थात एक स्थान जैसे मंदिर, मस्जिद आदि अथवा चौथे अथवा सातवें आसमान तक सिमित करना, ईश्वर द्वारा अवतार लेकर विभिन्न लीला करना, एक के स्थान पर अनेक ईश्वर होना, निराकार के स्थान पर साकार ईश्वर होना, ईश्वर द्वारा अज्ञानता का प्रदर्शन करना आदि कुछ कारण है। जो एक निष्पक्ष व्यक्ति को भी यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं की क्या ईश्वर का अस्तित्व है की नहीं अथवा ईश्वर मनुष्य के मस्तिष्क की कल्पना मात्र है। उदहारण के तौर पर हिन्दू समाज में शूद्रों को मंदिरों में प्रवेश की मनाही है एवं अगर कोई शूद्र मंदिर में प्रवेश कर भी जाये तो उसे दंड दिया जाता है और मंदिर को पवित्र करने का ढोंग किया जाता है। यह सब पाखंड किया तो ईश्वर के नाम पर जाता है मगर इसके पीछे मूल कारण मनुष्य का स्वार्थ है नाकि ईश्वर का अस्तित्व है।
                               ईश्वर गुण, कर्म और स्वाभाव से दयालु एवं न्यायकारी है इसलिए वह किसी भी प्राणिमात्र में कोई भेदभाव नहीं करते। ईश्वर गुणों से सर्वव्यापक एवं निराकार है अर्थात सभी स्थानों पर है और आकार रहित भी है। जब ईश्वर सभी स्थानों पर है तो फिर उन्हें केवल मंदिर में या क्षीर सागर पर या कैलाश पर या चौथे आसमान पर या सातवें आसमान पर ही क्यों माने। इससे यही सिद्ध होता हैं की मनुष्य ने अपनी कल्पना से पहले  ईश्वर को निराकार से साकार किया, उन्हें सर्वदेशीय अर्थात सभी स्थानों पर निवास करने वाला से एकदेशीय अर्थात एक स्थान पर सिमित कर दिया। फिर सिमित कर कुछ मनुष्यों ने अपने आपको ईश्वर का दूत, ईश्वर और आपके बीच मध्यस्थ, ईश्वर तक आपकी बात पहुँचने वाला बना डाला। यह जितना भी प्रपंच ईश्वर के नाम पर रचा गया यह इसीलिए हुआ क्यूंकि हम ईश्वर के निराकार गुण से परिचित नहीं है।  अपनी अंतरात्मा के भीतर निराकार एवं सर्वव्यापक ईश्वर को मानने से न मंदिर की, न मूर्ति की, न मध्यस्थ की, न दूत की, न अवतार की, न पैगम्बर की और न ही किसी मसीहा की आवश्यकता है।

                             ईश्वर के नाम पर सबसे अधिक भ्रांतियाँ मध्यस्थ बनने वाले लोगो ने फैलाई है चाहे वह छुआ छूत का समर्थन करने वाले एवं शूद्रों को मंदिरों में प्रवेश न देने वाले हिन्दू धर्म के पुजारी हो , चाहे इस्लाम से सम्बन्ध रखने वाले मौलवी-मौलाना हो जिनके उकसाने के कारण इतिहास में मुस्लिम हमलावरों ने मानव जाति पर धर्म के नाम पर ऐसा कोई भी अत्याचार नहीं था जो उन्होंने नहीं किया था , चाहे ईसाई समाज से सम्बंधित पोप आदि हो जिन्होंने चर्च के नाम पर हज़ारों लोगो को जिन्दा जला दिया एवं निरीह जनता पर अनेक अत्याचार किये। न यह मध्यस्थ होते न ईश्वर के नाम पर इतने अत्याचार होते और न ही इस अत्याचार के फलस्वरूप प्रतिक्रिया रूप में विश्व के एक बड़े समूह को ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार कर नास्तिकता का समर्थन करना पड़ता। सत्य यह हैं यह प्रतिक्रिया इस व्याधि का समाधान नहीं थी अपितु इसने रोग को और अधिक बढ़ा दिया। आस्तिक व्यक्ति यथार्थ में ईश्वर विश्वासी होने से पापकर्म में लीन होने से बचता था। दोष मध्यस्थों का था जो आस्तिकों का गलत मार्गदर्शन करते थे । मगर ईश्वर को त्याग देने से पाप-पुण्य का भेद मिट गया और पाप कर्म अधिक बढ़ता गया, नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया गया एवं इससे विश्व अशांति और अराजकता का घर बन गया।

                                       ईश्वर में अविश्वास का एक बड़ा कारण अन्धविश्वास है। सामान्य जन विभिन्न प्रकार के अंधविश्वासों में लिप्त हैं और उन अंधविश्वासों का नास्तिक लोग कारण ईश्वर को बताते है। सत्य यह हैं की ईश्वर ज्ञान के प्रदाता है अज्ञान को बढ़ावा देने का मुख्य कारण मनुष्य का स्वार्थ है। अपनी आजीविका, अपनी पदवी, अपने नाम को सिद्ध करने के लिए अनेक धर्म गुरु अपने अपने ढंग से अपनी अपनी दुकान चलाते है। कोई झाड़ फूंक से ,कोई गुरुमंत्र से, कोई गुरु के नाम स्मरण से ,कोई गुरु की आरती से, कोई गुरु की समाधी आदि से जीवन के सभी दुखों का दूर होना बताता है, कोई गंडा तावीज़ पहनने से आवश्यकताओं की पूर्ति बताता है, कुछ लोग और आगे बढ़कर अंधे हो जाते है और कोई कोई निस्संतान संतान प्राप्ति के लिए पड़ोसी के बच्चे की नरबलि देने तक से नहीं चूकता है। विडंबना यह हैं की इन मूर्खों के क्रियाकलापों को दिखा दिखा कर अपने आपको तर्कशील कहने वाले लोग नास्तिकता को बढ़ावा देते है। कोई भी अन्धविश्वास वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध नहीं हो सकता इसलिए  नास्तिकता को प्रोत्साहन वालो द्वारा विज्ञान का सहारा लेकर नास्तिकता का प्रचार करना भी एक प्रकार से अन्धविश्वास को मिटाने के स्थान पर एक और अन्धविश्वास को बढ़ावा देना ही है।
 
                                          चमत्कार में विश्वास अन्धविश्वास की उत्पत्ति का मूल है। आस्तिक समाज में मुस्लमान पैगम्बरों की चमत्कार की कहानियों में अधिक विश्वास रखते है, ईसाई समाज में ईसा मसीह और संतों के नाम पर चमत्कार की दुकानें चलाई जाती है। हिन्दू समाज में चमत्कार पुराणों में लिखी देवी-देवताओं की कहानियों से लेकर गुरुडम की दुकानों तक फल फूल रहा है। इन सभी का यह मानना हैं की ईश्वर सब कुछ कर सकता है। स्वामी दयानंद सत्यार्थ प्रकाश में इस दावें की परीक्षा करते हुए लिखते हैं की अगर ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो क्या ईश्वर अपने आपको मार भी सकता है? क्या ईश्वर अपने जैसा एक और ईश्वर बना सकता है जिसके गुण-कर्म और स्वाभाव उसी के समान हो। इसका उत्तर स्पष्ट है नहीं। फिर ईश्वर सब कुछ कैसे कर सकता है? इस शंका का समाधान यह है की जो जो कार्य ईश्वर के है जैसे सृष्टि की उत्पत्ति,पालन-पोषण,प्रलय, मनुष्य आदि का जन्म-मरण, पाप-पुण्य का फल देना आदि कार्य करने में ईश्वर स्वयं सक्षम है उन्हें किसी की आवश्यकता नहीं है। नास्तिक लोग आस्तिकों की चमत्कार के दावों की परीक्षा लेते हुए कहते है की  सृष्टि को नियमित मानते हो अथवा अनियमित। चमत्कार नियमों का उल्लंघन है। अगर ईश्वर की बनाई सृष्टि को अनियमित मानते हो तो उसे बनाने वाले ईश्वर को भी अनियमित मानना पड़ेगा। जोकि असंभव है। इसलिए चमत्कार को मनुष्य के मन की स्वार्थवश कल्पना मानना सत्य को मानने के समान है। न इससे ईश्वर का नियमित होने का खंडन होगा और न ही अन्धविश्वास को बढ़ावा मिलेगा।

                                        नास्तिकता को बढ़ावा देने में एक बड़ा दोष अभिमान का भी है। भौतिक जगत में मनुष्य ने जितनी भी वैज्ञानिक उन्नति की है उस पर वह अभिमान करने लगता है और इस अभिमान के कारण अपने आपको जगत के सबसे बड़ी सत्ता समझने लगता है। एक उदहारण लीजिये सभी यह मानते हैं की न्यूटन ने Gravitation अर्थात गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज की थी। क्या न्यूटन से पहले गुरुत्वाकर्षण की शक्ति नहीं थी? थी मगर मनुष्य को उसका ज्ञान नहीं था अर्थात न्यूटन ने केवल अपनी अल्पज्ञता को दूर किया था और इसी क्रिया को अविष्कार कहा जाता है। सत्य यह हैं की जितनी भी भौतिक वैज्ञानिक उन्नति हैं वह अपनी अलपज्ञता को दूर करना है। मनुष्य चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न कर ले वह ज्ञान की सीमा को कभी प्राप्त नहीं कर सकता क्यूंकि एक तो मनुष्य की शक्तियां सिमित है जबकि ज्ञान की असीमित है दूसरी असीमित ज्ञान का ज्ञाता केवल एक ही है और वो हैं ईश्वर जिनमें न केवल वो ज्ञान भी पूर्ण है जो केवल मानव के लिए है अपितु वह ज्ञान भी है जो मानव से परत केवल ईश्वर के लिए है।

स्वयं न्यूटन की इस सन्दर्भ में धारणा कितनी प्रासंगिक है --

“I do not know what I may appear to the world, but to myself I seem to have been only like a boy playing on the sea-shore, and diverting myself in now and then finding a smoother pebble or a prettier shell than ordinary, whilst the great ocean of truth lay all undiscovered before me.”

न्यूटन ने हमारी अवधारणा का समर्थन कर अपनी निष्पक्षता का परिचय दिया है।
               
                  अब प्रश्न यह है की धर्म और विज्ञान में क्या सम्बन्ध है और क्यूंकि नास्तिक लोगो का यह मत है की धर्म और विज्ञान एक दूसरे के शत्रु है। नास्तिक लोगो की इस सोच का  मुख्य कारण यूरोप के इतिहास में चर्च द्वारा बाइबिल के मान्यताओं पर वैज्ञानिकों द्वारा शंका करना और उनकी आवाज़ को सख्ती से दबा देना था। उदहारण के लिए गैलिलियो को इसलिए मार डाला गया क्यूंकि उसने कहा था की पृथ्वी सूर्य के चारों और भ्रमण करती हैं जबकि चर्च की मान्यता इसके विपरीत थी। चर्च ने वैज्ञानिकों का विरोध आरम्भ कर दिया और उन्हें सत्य को त्याग कर जो बाइबिल में लिखा था उसे मानने को मजबूर किया और न मानने वालो को दण्डित किया गया। इस विरोध का यह परिणाम निकला की यूरोप से निकलने वाले वैज्ञानिक चर्च को अर्थात धर्म को विज्ञान का शत्रु मानने लग गए और उन्होंने ईश्वर की सत्ता को नकार दिया। दोष चर्च के अधिकारीयों का था नाम ईश्वर का लगाया गया। यह विचार परम्परा रूप में चलता आ रहा हैं और इस कारण से वैज्ञानिक अपने आपको नास्तिक कहते हैं।

                         अब प्रश्न यह उठता है की धर्म और विज्ञान में क्या सम्बन्ध है? इसका उत्तर है की "Religion and Science are not against each other but they are allies to each other" अर्थात धर्म और एक दूसरे के विरोधी नहीं अपितु सहयोगी है। जैसे विज्ञान यह बताता है की जगत कैसे बना है जबकि धर्म यह बताता है की जगत क्यूँ बना है। जैसे मनुष्य का जन्म कैसे हुआ यह विज्ञान बताता है जबकि मनुष्य का जन्म क्यूँ हुआ यह धर्म बताता है।


                      भौतिक विज्ञान के लिए आध्यात्मिक शंकाओं का समाधान करना असंभव है मगर इनका समाधान धर्म द्वारा ही संभव है। धर्म और विज्ञान दोनों एक दूसरे के सहयोगी है और इसी तथ्य को आइंस्टीन ने सुन्दर शब्दों में इस प्रकार से कहा है –

 “Science without religion is a lame and religion without science is blind.”

विज्ञान धर्म के मार्गदर्शन के बिना अधूरा हैं और सत्य धर्म विज्ञान के अनुकूल है,  अन्धविश्वास अवैज्ञानिक होने के कारण त्याग करने योग्य है।

एक कुतर्क यह भी दिया जाता है की अगर ईश्वर है तो उन्हें वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध करके दिखाए।  इसका समाधान वायु के अतिरिक्त मन, बुद्धि, सुख, दुःख, गर्मी, सर्दी, काल, दिशा, आकाश ये सभी निराकार है।क्या ये सभी वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध होते है? नही। परन्तु फिर भी इनका अस्तित्व माना जाता है फिर केवल ईश्वर को लेकर यह शंका उठाना नास्तिकता का समर्थन करने वाले की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाता है।  सत्य यह हैं की वैज्ञानिक प्रयोगों से ईश्वर की सत्ता को सिद्ध न कर पाना आधुनिक विज्ञान की कमी है जबकि आध्यात्मिक वैज्ञानिक जिन्हे हम ऋषि कहते है चिरकाल से निराकार ईश्वर को न केवल अपनी अंतरात्मा में अनुभव करते आ रहे है अपितु जगत के कण कण में भी विद्यमान पाते है।

                             दंगे, युद्ध, उपद्रव आदि का दोष ईश्वर को देना एक और मूर्खता है। यह पहले ही स्पष्ट किया जा चूका है की दंगे, उपद्रव आदि मज़हब या मत-मतान्तर आदि को मानने वालो के स्वार्थ के कारण होता है नाकि धर्म के कारण होता है। एक उदहारण लीजिये 1947 से पहले हमारे देश में अनेक दंगे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच में हुए थे। इन दंगों का मुख्य कारण यह बताया जाता था की हिन्दुओं के धार्मिक जुलुस के मस्जिद के सामने से निकलने से मुसलमानों की नमाज़ में विघ्न पड़ गया जिसके कारण यह दंगे हुए।  मेरा स्पष्ट प्रश्न है कि जो व्यक्ति ईश्वर की उपासना या नमाज़ में लीन होगा उसके सामने चाहे बारात भी क्यों न निकल जाये। उसे मालूम ही नहीं चलेगा परन्तु जो व्यक्ति यह बांट जो रहा हो की कब हिन्दुओं का जुलुस आये कब हम नमाज़ आरम्भ करे और कब दंगा हो। तो इसका दोष ईश्वर को देना कहा तक उचित है? संसार में जितनी भी हिंसा ईश्वर के नाम पर होती है उसका मूल कारण स्वार्थ है नाकि धर्म है।

                    नास्तिक लोग धर्म की मुलभुत परिभाषा से अनभिज्ञ है और मत-मतान्तर की संकीर्ण सोच एवं अन्धविश्वास को धर्म समझकर उसकी तिलांजलि दे देते है। धर्म संस्कृत भाषा का शब्द है जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना है। "धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म है। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं की मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति है वह धर्म है। धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी का त्याग, शौच अर्थात पवित्रता , इन्द्रियों का निग्रह अर्थात उन्हें वश में करना , बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण है। सदाचार परम धर्म है।

           अन्धविश्वास मत मतान्तर की संकीर्ण सोच है। उसे धर्म समझना अन्धविश्वास है। धर्म का आचरण से सम्बन्ध है। मत का सम्बन्ध आचरण से नहीं अपितु मान्यता से है। मान्यता सही भी हो सकती है गलत भी हो सकती है। इसलिये मत को धर्म समझना गलत है।

 ईश्वर में विश्वास रखने के निम्नलिखित लाभ है।

1. आदर्श शक्ति में विश्वास से जीवन में दिशा निर्धारण होता है।
2. सर्वव्यापक एवं निराकार ईश्वर में विश्वास से पापों से मुक्ति मिलती है।
3. ज्ञान के उत्पत्तिकर्ता में विश्वास से ज्ञान प्राप्ति का संकल्प बना रहता है।
4. सृष्टि के रचनाकर्ता में विश्वास से ईश्वर की रचना से प्रेम बढ़ता है।
5. अभयता, आत्मबल में वृद्धि, सत्य पथ का अनुगामी बनना, मृत्यु के भय से मुक्ति, परमानन्द सुख की प्राप्ति, आध्यात्मिक उन्नति, आत्मिक शांति की प्राप्ति, सदाचारी जीवन आदि गुण की आस्तिकता से प्राप्ति होती है।
6. स्वार्थ, पापकर्म, अत्याचार, दुःख, राग, द्वेष, इर्ष्या, अहंकार आदि दुर्गुणों से मुक्ति मिलती है।


 तार्किक होना गलत नहीं है। ऋषि दयानंद 19 वीं सदी के सबसे बड़े तार्किक थे मगर वह पूर्णरूप से आस्तिक थे।  दर्शनों में तर्क को ऋषि कहा गया है। बशर्ते तर्क का प्रयोजन सत्य को ग्रहण करना एवं असत्य का त्याग हो। तर्क का नाम लेकर धर्म का बहिष्कार कर भोगवादी होने के बहाने बनाना अपने आपको अँधेरे में रखने के समान है। नास्तिकता अपने आप में अन्धविश्वास है। अगर किसी व्यक्ति के पैर में फोड़ा निकला हो तो उसका ईलाज करना चाहिये न कि पैर काट देना चाहिये। नास्तिकता इसी प्रकार का पाखण्ड है। धर्म के नाम पर किये जाने वाले पाखंड को देखकर पाखंड के त्याग के स्थान पर धर्म का बहिष्कार करना नास्तिकता रूपी अन्धविश्वास मात्र है।



Friday, January 2, 2015

Nizam was great and secular ruler says Telangana CM. Is it so?

                                                         Picture of Nizam of Hyderabad



Showering praise on the Nizam, the ruler of erstwhile Hyderabad State, Telangana chief minister K Chandrasekhar Rao described him as great and secular. I want to remind Mr. CM by this article that the Nizam of Hyderabad was nothing more than a religious bigot. The cruelties in Nizam regime reached to such level especially against the Hindus that Aryasamaj started a crusade against Nizam. This movement is History of Hyderabad state is remembered as The Hyderabad struggle of Aryasamaj.  It was a nonviolent movement where around eight thousand members of Aryasamaj including members of Hindu Mahasabha filled the jails of Nizam giving him sleepless nights. In this crusade of Aryasamaj around two dozen of campaigners from Aryasamaj sacrificed their lives. In the end Nizam honored the demands of Aryasamaj of social and religious equality for Hindus. Nizam was considered as the one of the richest persons in those days. The state of Nizam was resided by 95% Hindus but was administered by 95% Muslims statesmen. Lot of people advised Aryasamaj leaders that it’s not a wise decision to oppose Nizam who is so strong and powerful. The dedication of Aryasamaj and its leaders helped by workers of Hindu Mahasabha proved that the truth always wins.

 We in this article will briefly describe the atrocities done by Muslim rulers in Nizam state.

1.       Freedom of press and religious censorship in regime of Nizam was only for Muslims who were working for their agenda of Jihad. Muslim speakers could speak anything and can participate in any propaganda and with impunity. We shall substantiate our assertion by a few relevant quotations in this matter.

     a.       The salvation of the Untouchables lies in their acceptance of Islam…..Let them be saved from the latrine of idolatry and stone worship. (Rahbar-i-Deccan 20th April, 1933)
      b.      It is very necessary that the rascals of this place be not allowed any opportunity of going to the Districts. (Rahbar-i-Deccan 10th November, 1938 on the proceedings of a cow protection meeting held in Aurangabad)
      c.       These agitators having made an alliance with Namak-harams and iman-farmoshes (Sahifa, 4 Farwardi 1341 F.)
      d.      The late Maulvi Abdul Qayyum had no right to take the law in his own hands and kill the said Pandit. But as the Muhammadan Law prescribes capital punishment for a man who insults the Prophet, Maulvi Abdul Qayyum has given the proof of his love for the Prophet by killing Pandit (Rahbar-i-Decca22 Arde bahesht, 1344 F.)
       e.      Chan Biseshwar will strike the drum of the name of the Avatar (Nabi-Prophet)- a meeting will be held at Hampi in December….After this they will march to the temple of Vankat Ramna and take out a treasure of eighty crores. From there they will come back to Hampi and taking the treasure out, will unify one hundred and one castes. From that date will disappear the worship of stones and all idols will be thrown out of temples. (Notice in Urdu on behalf of Dindar Anjuman, Asafnagar, Hyderabad)
       f.        Few extracts from speech of Maulana Siddiq Dindar:- 

 - Our Quran has 500 verses which speak of conquering, overcoming and killing the enemy.
 -Why are you afraid of them? (26/12/1931)   
  - As many as heretics in the World, they are all the enemies of Mohomedans. Are they our friends?  They can never be friends unless they become Mohomedans. (25/12/1931)
-Whosoever are your opponents and whoever speak ill of your faith, kill such heretics. (24/12/1931)

                                    These are few examples of Secular media in Nizam’s Regime.

2.       Restrictions of religious and educational activities were only for Hindus while Muslims were given a free hand. Temples, schools or akhadas (wrestling place) of Hindus were subjected to police watch better to say under supervision of Muslim zealots. Any Hindu temple could not be repaired without the permission of Government officials. Any religious procession of Hindus was not allowed on Hindu festival day on name of peace and harmony while Muslims were allowed to openly carry their processions even in sensitive areas. Numbers of school run by Hindu institution were closed on name of Hygiene during inspection by Muslim officials leading to either promotion of students to enroll in Muslim madrasa or remain uneducated.


3.       Charges by Aryasamaj on religious persecution in state of Nizam published in a pamphlet Nizam Defense examined and exposed.

a.       Mr. Mohan Singh secretary of Aryasamaj was beaten by police inspector and was prosecuted for uttering abuse on public road.
b.      “AUM” flag from Aryasamaj temple was dislodged by order of Mr. Ikram Ali Taluqdar without any semblance of law.
c.       Stone were pelted as well as gun shots were fired on Aryasamaj while no action was taken by police against anyone.
d.      Mr. Gurulingappa, Mr. Shankarrao Ganpat Rao and Mr. Gundappa were beaten and his sacred thread was broken while no action was taken by police against anyone.
e.      Two Muslim gentleman who accepted Aryasamaj with their own will and consent were arrested and beaten by police and were forced to give false statements against Aryasamaj.
f.        In case of Murder of Nagappa, an Aryasamaj member the real facts were suppressed in enquiry. There are similar many instances where Aryasamaj dedicated workers were killed by Muslim goons while no action was taken against the culprits.
g.       False charges were framed against Aryasamaj branch in Kor Halli and Kal Mungli of Taluqa
Kalyani.
h. Killing of Ved Prakash an important member of Aryasamaj by Muslim goons and justice denied to him in spite of all efforts by Aryasamaj.

4.       Reports of Molestation of Hindu women by Muslim goons under the regime of Nizam. All evidences are from a pamphlet Nizam Defense examined and exposed published by The International Aryan League in 1939. All stories are same and reflect lack of interest of Police to deal with the culprits as the victims were Hindu women.

a.       Santayya Patri had to leave Humnabad as his daughter was being molested by Sharufu Amir.
b.      At Holsamudra the teacher molested a sangam girl and a Brahmin girl.
c.       Muslims at Klam molested the wife of Shamrao.
d.      At Udgir two Muslims molested a Hindu girl. She was secured by an Arya. Police demanded the women and got arrested the Arya.
e.      At Kalam a low caste Hindu women was dishonored by many Muslims at the instance of constable Bashir. They compelled her to accept Islam.
f.        A Muslim Mazkuri abducted the wife of Durgaji lime seller at Kalyani.

These are mere glimpses of discrimination against Hindus in Nizam’s Regime. Conversion of Hindus to Islam in jails, ban of Hindu newspapers and books, large donations to Muslims institutions, prefixed conviction of Hindus in case of any brawl with Muslims, change of name of Hindu cities to Islamic one for e.g. Bidar was renamed Mahmudabad, Large donations of public money gathered from majority Hindus of state was donated to Muslim institutions in whole country, publishing of names of Hindus who converted to Islam in newspapers at state expenses to promote others to convert, state sponsored Tabligh movement, appointment of Muslims on all major state posts in spite of lack of qualification, Lack of justice to Hindus in courts are few examples of discrimination in Nizam’s state.
This article is more than enough to prove that Nizam was nothing more than a religious bigot. It’s time that our politicians should grow up academically and refrain to issue such statements which are again a part of Muslims appeasing vote bank politics and entirely based on wrong facts. The History is never going to change by such statements. The Hyderabad Struggle Movement by Aryasamaj was against religious persecution in Nizam's state and today’s politicians are making jokes of themselves by calling them "SECULAR".

Dr Vivek Arya

Times of India Newspaper Link where this news was published in 2nd Jan, 2015


http://timesofindia.indiatimes.com/india/Nizam-was-great-secular-ruler-Telangana-CM/articleshow/45720082.cms


Picture - 1. Reports of Conversion of Hindus to Islam

 Picture 2- Dindar's Propaganda in favor of Tabligh or conversion of whole country to Islam