Sunday, September 8, 2013

How Hindus Survived 1000 Years of Islamic Rule in India?



I found Muslims on Internet boasting that if Islam was so cruel to Hindus than how did Hindus survived despite of 1000 years of Islamic rule in India? If Islam would have spread by sword than all Hindus would have been forcibly converted and there would have been no more Hindus in this country today. This proves that Islam is Religion of mercy.

I am replying my Muslims friends in brief the causes of Survival of Hindus. It was not due to attitude and behavior of Islam but due to opposition by Hindus. Barbaric Muslim invaders tried their best but it was resistance by Hindus who saved them.

Following are the reasons for savior of Hindu race.

1. Brave hearts like Shiva Ji and other Maratha leaders in Deccan, Maharana Pratap in Rajasthan, Jats of Bharatpur and Mathura, Durga Das Rathod of Rajputana, Veer Chatrasal of Bundelkhand, Raja Krishandev of Vijayanagra, Sikh gurus in North India, Banda Bairagi, Hari Singh Nalwa and Maharaj Ranjit Singh in North India and many others resisted cruel Islamic rule in India and saved Hindus from conversion in masses.Truth is that Muslims were never rulers of complete country. In different ages different known and unknown warriors raised from Hindus and saved them from atrocities of Muslim invaders.

2. Moral Conduct of Hindus- Social practice of not to cooperate or even watch face of a Muslim by naming them as mallech (inferior) in middle ages lead to social distance in the society which was like a sort of boycott of Muslims in the main stream Hindu society. It leads to low level of penetration of Islam in masses thus leading to low number of conversion.It was a adopted view in order to make safer distance from Muslims.The main reason in development of this attitude also developed among Hindus due to plundering of Hindu temples by Muslims and converting them to Mosque, Destruction of Hindu idols which were sacred for Hindus, Cow sacrifice in Hindu Temple in front of Hindus to demoralize them. We even get references that Muslim invaders frequently abducted Hindu girls for filling their harams. So, Hindus decided to maintain a safer distance from them. Due to vast unoccupied tracts of lands all over country Hindus migrated frequently and developed new areas of living away from Muslim rule for e.g. Bhagel raja of saurashtra migrated to Rewa/Jhansi when Muslim attacked their territory in Gujarat, Chitpawan Brahmins of Goa migrated from northern parts of country to the kingdom of Shiva ji in Maharashtra. Also there are various similar instances in Rajputana.

3. Accepted Jaziya but did not left Janau (Yagyopavit or sacred thread) Hindus were given incentives in form of Money/lucrative posts/marriage with Muslim lady for conversion to Islam but rarely few only accepted these offers. Most of them paid Islamic tax but did not left Hinduism. In spite of second level treatment by Muslim invaders Hindus rejected idea of conversion to Islam. This saved them from conversion in Masses. Aurangzeb issued fatwa of gift of Rs/- 5 to Hindu man who converted to Islam and Rs/- 2 to Hindu women who converted to Islam.

4. Bhakti movement- Different saints of their times propagated the message of Hindu dharma leading to healing touch to the wounds inflicted by Muslims. They saved Hindus in large number from forced conversion. They even brought back many birth Muslims to Hindu fold for e.g.Raskhan became disciple of Hindu guru.

5. Suddhi movement- Suddhi or better say reclamation of lost brother was a system of bringing back for those Hindus who were converted to Islam forcibly.  For e.g. Neta ji Palkar suddhi by Shiva Ji, Harihra-Bukka of Vijayanagra kingdom were purified and brought back to folds of Hinduism. Suddhi ceremony is well mentioned in the Gobhil sutras as well as incidents of Suddhi are well documented in Bhavishya puran shows that the Hindu used to check number of converted Muslims.

6. The purity of thoughts- We find that most of Islamic kings were either drug addicts or slaves of sensual pleasures.For e.g. Baber was fond of boys thus homosexual, Jahangir was always busy in filling harams, Shahjahan was always busy in emptying glasses of liquor and eating sacks of opium.
Such moral of Islamic conduct failed to impress the minds of common Hindus. Contrary to this Hindus considered twice bathing and worship of deity as regular religious duty and considered adultery, animal killing for meat and drinking alcohol as grave sins. The immoral life style of Muslims was unable to impress religious minds of Hindus. Opposite to that Hindus developed hatred feeling for such Muslim practices. Such high level of thinking, intellectual progress, Vedic wisdom saved Hindus from mass conversion of Hindus.

Thus its a myth that Muslims invaders tried their best Hindus survived due to their resistance and attempt to survive.

(This is a brief write up. This article can be expanded with Historical References.)

Dr Vivek Arya

जम्मू के शहीद दलितौद्धारक वीर रामचन्द्र आर्य


 स्वामी दयानंद जी के दलितौद्धार की शिक्षा को जीवन का उद्देश्य बनाकर अनेक आर्य वीर दलित भाइयों पर  रहे अत्याचार, शोषण आदि से उन्हें मुक्त करवाने के लिए निकल पड़े। उनका उद्देश्य शिक्षा, जागरूकता, व्यवसायिक जैसे आर्थिक सहायता के साथ साथ सामाजिक एवं धार्मिक उन्नति भी करना था। उस काल में कुछ मूर्खों की अज्ञानता के कारण  एक वर्ग विशेष के लोगों को अस्पृश्य कहकर उनका मंदिरों में प्रवेश वर्जित था, उन्हें सार्वजानिक कुओं से पानी भरने पर पाबन्दी थी, उन्हें साथ बैठकर खाने पर पाबन्दी थी। आर्यसमाज द्वारा इस अत्याचार के विरुद्ध उस काल में संघर्ष करना एक प्रकार से उलटी गंगा बहाने के समान था। आर्यों को न केवल ईसाई और मुसलमानों का विद्रोह सहना पड़ता था क्यूंकि उनके लिए दलित खेती के समान थे जिन्हें हर कोई अपने गोदाम में भरना चाहता था अपितु स्वजातीय हिन्दू समाज का भी विरोध सहन करना पड़ता था। यह विरोध पंचायत द्वारा हुक्का-पानी बंद करना, रोटी, बेटी का व्यवहार बंद करने से लेकर शारीरिक हानि तक भी सीमित नहीं था। कई बार अत्याचारियों ने आर्यों के प्राण तक दलितौद्धार के पीछे हर तक लिए थे। ऐसे ही एक आर्यवीर थे, जम्मू के महाशय रामचंद्र जी आर्य।
अपनी जाति में पैदा होकर, अपनी जाति के हित अथवा कल्याण की बात करने में ऐसा कुछ भी बड़डपन नहीं हैं जैसा डॉ अम्बेडकर अथवा ज्योति बा फुले ने किया था। बड़डपन तो अपनि जाति से विभिन्न आर्थिक रूप से निर्धन, समाजिक रूप से शोषित एवं कमजोर जातियों के उत्थान में हैं। आधुनिक भारत में यह बड़डपन अगर किसी में आज तक हुआ हैं तो वह स्वामी दयानंद के शिष्यों में देखा गया हैं।  
 जम्मू रियासत के कटुआ जिला की तहसील हीरानगर के लाला खोजूशाह महाजन नामक खजान्ची जी के यहां पर दिनांक १९ आषाढ़ संवत १९५३ को जन्मे बालक रामचंद्र ने जम्मू ,सिआलकोट आदि में वास करने वाली मेघ जाति के उद्धार के लिए अपने जीवन का बलिदान तक कर दिया था ।
 बालक रामचन्द्र के आठ भाई और एक बहिन थी । भाई बहिनों में सबसे बडे रामचन्द्र ने मिडिल तक की शिक्षा सदा अपनी कक्षा में प्रथम रहते हुए उत्रीर्ण की थी। जब सरकार के कार्यालयों में सब कार्य डोगरी भाषा के स्थान पर होने लगा तो पिता के स्थान पर खजान्ची का कार्य इस बालक को दिया गया ।
 राम चन्द्र को आरम्भ से ही समाचार पत्र पढ़ने व धर्मकार्य करने में अत्यधिक रुचि थी । जब वह आर्य समाज के सत्संगों में जाने लगे तो आर्य समाज के कार्यों में इन्हें खूब आनन्द आने लगा तथा शीघ्र ही प्रमुख आर्यों में सम्मिलित हो गये । जब आप की बदली बसोहली स्थान पर हुई तो इस स्थान पर आप ने आर्य समाज की निरन्तर दो वर्ष तक खूब सेवा की । तदन्तर आप स्थानारित होकर कटुआ आ गये । यह वह स्थान था कि जहां आर्य समाज का काम करना मौत को निमन्त्रण देने से कम न था, किन्तु आप ने इस सब की चिन्ता किए बिना आर्य समाज का काम जारी रखा तथा अछूतोद्धार के कार्य व शुद्धि में भी लग गए । जब विरोध जोर से होने लगा तो आप को बदल कर १९१८ इस्वी को साम्बना भेज दिया गया । यहां पर जाते ही ,आपके यत्न से आर्य समाज की स्थापना हो गई तथा जब देश भर में एन्फ़्ल्यूऎन्जा का रोग फ़ैला तो आप ने सेवा समिति खोलकर रोगियों की खूब सेवा की । आप ने आर्य समाज के लिए बड़े से बड़े खतरों का भी सामना किया । आर्य समाज के प्रचार के कारण आपको वहाँ के राजपूतों और ब्राह्मणों के विरोध का सामना करना पड़ा किन्तु आर्य समाज के उत्सव में आपने किसी प्रकार की कमी न आने दी तथा इसे उत्तम प्रकार से सफ़ल किया ।
 रामचन्द्र जी कांग्रेस के कार्यों के प्रति भी अत्यधिक स्नेह रखते थे । इस के वार्षिक समारोह में लगभग एक दशाब्दि तक निरन्तर जाते रहे ।जब पंजाब में मार्शल ला लगा हुआ था तो सरकारी कर्मचारी होते हुए भी यहां के समाचार आप गुप्त रुप से अन्य प्रान्तों में भेजते रहे । आप अपनी नौकरी को भी देश से उपर न मानते थे । यह ही कारण था कि १९१७ में जब आप को अमृतसर जाने की सरकार ने सरकारी कर्मचारी होने के कारण अनुमति न दी तो आप ने तत्काल अपनी सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया किन्तु उनकी उत्तम सेवा को देखते हुए तहसीलदार उन्हें छोडना नहीं चाहते थे , इस कारण उन्हें अम्रतसर जाने की अनुमति दे दी गई । साम्बा के क्षेत्र के लोग तो आप को देश सेवक के रुप मे ही जानते थे तथा इस नाम से ही आप को पुकारते थे ।
 जब १९२२ में आप की नियुक्ति अखनूर में हुई तो वहां जा कर आप ने पाया कि यहां के लोग छूतछात को मानने वाले थे । यहां के लोग मेघ जाति के लोगों को अत्यधिक घृणा से देखते थे । रामचन्द्र जी मेघों का उत्थान करने का  निश्चय किया तथा उनकी शिक्षा के लिए एक पाठशाला भी आरम्भ कर दी । अब आप अपनी सरकारी सेवा के अतिरिक्त अपना पूरा समय इन पहाड़ों में घूम घूम कर मेघों के दु:ख , दर्द के साथी बन उनकी सेवा, सहायता तथा उन्हें पढ़ाने व उनकी बीमारी आदि में उनकी हर संभव सहायता करने लगे थे।
इस सब का परिणाम यह हुआ कि जो लोग दलितों को उन्नति करता हुआ न देख सकते थे , उन्होंने सरकार के पास आप की शिकायते भेजनी आरम्भ कर दीं , मुसलमानों को आप के विरोध के लिए उकसाने लगे , आप के व्याख्यानों का भी विरोध आरम्भ कर दिया । इतने से ही सब्र न हुआ तो कुछ लोग लाठियाँ लेकर आप पर आक्र्मण करने के लिए आप के घर पर जा चढ़े, किन्तु पुलिस ने उनका गन्दा इरादा सफ़ल न होने दिया । परिणाम स्वरुप १९२२ इस्वी में इन अज्ञानियों लोगों ने आर्य समाजियों का बाइकाट कर दिया। एक दिन जब रामचन्द्र जी कहीं अन्यत्र गये हुए थे तो पीछे से सरकारी अधिकारियों के दबाब में आकर वहां के आर्य जन झुक गये तथा यह बात स्वीकार कर ली कि मेघों की पाठशाला को गांव से कहीं दूर ले जायेगे । लौटने पर रमचन्द्र जी ने इस समझौते के सम्बन्ध सुना तो उन्होंने इसे स्वीकार करने से साफ़ इन्कार कर दिया । इस सम्बन्ध में लम्बे समय तक गवर्नर , वजीर आदि से पत्र व्यवहार होता रहा ।
 रामचन्द्र जी ने जिस प्रकार मेघों की नि:स्वार्थ भाव से सेवा की , इस कारण मेघ लोग उन पर अपनी जान न्योछावर करने लगे । इधर रामचन्द्र जी भी अपने आप को मेघ कहने लगे, चाहे आप महाजन जाति से थे । पाठशाला का निजी भवन बनाने की प्रेरणा से मेघ पण्डित रूपा तथा भाई मौली ने अपनी जमीन दान कर दी । मुसलमानों व सरकारी अधिकारियों के विरोध की चिन्ता न करते हुए आप ने इस के भवन निर्माण के लिए अपील की निर्माण के पश्चात १९२२ में ही इस वेद मन्दिर का प्रवेश संस्कार सम्पन्न हो गया । इस पाठशाला के खुलने से मेघ अत्यधिक उत्साहित हुए । यह एक सफ़लता थी , जिसने दूसरी उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त कर दिया । अब रामचन्द्र जी को अन्य स्थानों से भी पाठशाला खोलने के लिए आमन्त्रण आने लगे कि इस मध्य ही आपको जम्मू स्थानन्तरित कर दिया गया । किन्तु अभी यहां की पाठशाला का कार्य प्रगति पर था इसलिए आपने चार महीने का अवैतनिक अवकाश ले लिया।
 बटोहड़ा  से मेघ लोगों ने इन्हें निमन्त्रित किया । यह स्थान अखनूर से मात्र चार मील दूर है आप अपने आर्य बन्धुओं तथा विद्यार्थियों सहित हाथ् में औ३म की पताकाएं लेकर, भजन गाते तथा जय घोष लगाते हुए चल पड़े किन्तु इस शोभायात्रा के बारे में सुन व देख विरोधी भड़क उठे । आप को गालियां देते हुए अपमानित किया गया झण्डे छीन लिये तथा हवन कुण्ड भी तोड़ डाला गया। इस कारण उस दिन कोई कार्यक्रम नहीं हो सका। किन्तु आप ने शीघ्र ही ४ जनवरी १९२३ को यहां बड़े ही समारोह पूर्वक पाठशाला आरम्भ करने की योजना बना डाली । इसके लिए लाहौर से उपदेशक भी आ गए । यह सब देख राजपूतों ने आपके जीवन का अन्त करने का निर्णय लिया । इस निमित उन्होंने गांव में एक दंगल का आयोजन कर लिया ।
इधर जम्मू से रामचन्द्र जी भी अपने आर्य बन्धुओं व विद्वानों सहित बटौहड़ा  के लिए रवाना हो गए । इनके साथ लाला भगतराम,लाला दीनानाथ, लाला अनन्तराम, ओ३मप्रकाश तथा सत्यार्थी जी आदि थे । मार्ग में ही आर्योपदेशक सावनमल जी भी अपने दल के साथ आ कर मिल गए । इस मध्य ही पता चला कि गांव में विरोधियों ने भारी षडयन्त्र रच रखा है तथ हालात बेहद खराब हैं । इस कारण लौट जाने का निर्णय लेकर यह सब वापिस चल पडे किन्तु इस की सूचना भी तत्काल गांव में राजपूतों को मिल गई । वह तो भड़के ही हुए थे अत: भगतू नामक एक व्यक्ति के नेतृत्व  में मुसलमान, गुर्जरों के डेढ़ सौ के लगभग राजपूतों के सवारों व पैदल लोगों ने पीछे से इन पर आक्रमण कर दिया । सब पर लाठियाँ बरसाईं गई । सब और से एक ही आवाज आ रही थी कि खजान्ची को बचने नहीं देना । इस को मारो । यह सुन भगतराम जी उन्हें बचाने के लिए आगे आए किन्तु उन पर भी भारी मात्रा में लाठियों की मार पडी । अन्त में रामचन्द्र जी उनके हाथ आ गये तथा उन पर लोहे की छडों से प्रहार किया गया । वह जब बुरी तरह से घायल व बेहोश हो गये तो यह आक्रमणकारी इन्हें मरा समझ कर लौट गए ।
 घायल व बेहोश वीर रामचन्द्र जी को अस्पताल में भर्ती किया गया । यहां निरन्तर छ: दिन तक बेहोश रहते हुए मौत से युद्ध करते रहे किन्तु अन्त में प्रभु की व्यवस्था ही विजयी हुई तथा मात्र २३ वर्ष की आयु में यह योद्धा आर्य समाज को अपना जीवन समझते हुए तथा दलितों को ऊंचा उठाने का यत्न करते हुए अन्त में दिनांक २० जनवरी १९२३ इस्वी तदानुसार ८ माघ १९७० को रात्रि के ११ बजे वीरगति को प्राप्त हुआ ।
 इस वीर योद्धा तथा आर्य समाज के इस धुरन्धर प्रचारक की स्मृति में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब ने विभिन्न प्रकल्प आरम्भ किये । इन प्रकल्पों के अन्तर्गत वीर रामचन्द्र जी की स्मृति को बनाए रखने के लिए एक स्मारक बनाया गया । इस स्मारक के चार प्रमुख कार्य निर्धारित किये गए । जो इस प्रकार थे :-
 १. दलितो को उन्नत कर उन्हें स्वर्णों के समक्ष लाना।
 २. दलितों के लिए नि:शुल्क शिक्षा की सुचारू रूप से व्यवस्था करना ।
 ३. दलितों में धर्म प्रचार करने की व्यवस्था करना ।
 ४. दलितों में आत्म सम्मान की भावना पैदा करना ।

आपकी शहादत का यह परिणाम निकला की आपके विरोधी लोग आपकी मृत्यु से प्रेरणा पाकर आपकी दलितौद्धार की भावना को समझकर जाति-पाति का भेद भूल कर दलितों के उद्धार में लग गये।


आज का दलित समाज अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए वीर शिरोमणि श्री रामचंद्र जी आर्य का नाम तक स्मरण करना पाप समझता हैं। इससे बढ़कर कृतघ्नता का उदहारण आपको अन्यत्र देखने को नहीं मिलेगा।

डॉ विवेक आर्य

Friday, September 6, 2013

वेद, विवाह व्यवस्था और यम यमी सूक्त




डॉ विवेक आर्य

वेदों के विषय में अपने विचार प्रकट करते समय पाश्चात्य एवं अनेक भारतीय विद्वानों ने पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण वेदों के सत्य ज्ञान को प्रचारित करने के स्थान पर अनेक भ्रामक तथ्यों को प्रचारित करने में अपना सारा श्रम व्यर्थ कर दिया. यम यमी सूक्त के विषय में इन्ही तथाकथित विद्वानों की मान्यताये इसी भ्रामक प्रचार का नतीजा हैं. दरअसल विकासवाद की विचारधारा को सिद्ध करने के प्रयासों ने इन लेखकों को यह कहने पर मजबूर किया की आदि काल में मानव अत्यन्य अशिक्षित एवं जंगली था. विवाह सम्बन्ध, परिवार, रिश्ते नाते आदि का प्रचलन बाद के काल में हुआ.

श्रीपाद अमृत डांगे अपनी पुस्तक “Origin of Marriage”में लिखते हैं

“इस प्रकार के गुणों में परस्पर भिन्न नातों तथा स्त्री पुरुष संबंधों की जानकारी न होना स्वाभाविक ही था. परन्तु इस प्रकार का अनियंत्रित सम्बन्ध संतति विकसन के लिए हानिकारक होने के कारण सर्व्रथम माता-पिता एवं उनके बाल बच्चों का बीच सम्भोग पर नियंत्रण उपस्थित किया गया और इस प्रकार कुटुंब व्यस्था की नींव रखी गयी. यहाँ विवाह की व्यवस्था कुटुंब के अनुसार होनी थी, अर्थात समस्त दादा दादी परस्पर एक दुसरे के पति पत्नी हो सकते थे. उसी प्रकार उनके लड़के लड़कियां अर्थात समस्त माता पिता एक दूसरे के पति पत्नी हो सकते थे. सगे व चचेरे भाई-बहिन सब सुविधानुसार एक दूसरे के पति पत्नी हो सकते थे.

आगे चलकर भाई और बहिन के बीच निषेध उत्पन्न किया गया. परन्तु उस नविन सम्बन्ध का विकास बहुत ही मंदगति से हुआ और उसमें अड़चन भी बहुत हुई, क्यूंकि समान वय के स्त्री पुरुषों के बीच यह एक अपरिचित सम्बन्ध था. एक ही माँ के पेट से उत्पन्न हुई सगी बहिन से प्रारंभ कर इस सम्बन्ध का धीरे धीरे विकास किया गया. परन्तु इसमें कितनी कठिनाई हुई होगी, इसकी कल्पना ऋग्वेद के यम-यमी सूक्त से स्पष्ट हो जाती हैं.

यम की बहिन यमी अपने भाई से प्रेम एवं संतति की याचना करती हैं. परन्तु यम यह कहते हुए उसके प्रस्ताव को अस्वीकृत कर देता हैं की देवताओं के श्रेष्ठ पहरेदार वरुण देख लेंगे एवं क्रुद्ध हो जायेंगे. इसके विपरीत यमी कहती हैं की वे इसके लिए अपना आशीर्वाद देंगे. इस संवाद का अंत कैसे हुआ, यह प्रसंग तो ऋग्वेद में नहीं हैं, परन्तु यदि यह मान लिया जाये की अंत में यम ने यह प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया तो भी यह स्पष्ट हैं की प्राचीन परिपाटी को तोड़ने में कितनी कठिनाई का अनुभव हुआ होगा”

यम यमी सूक्त का निष्कर्ष

यम यमी सूक्त ऋग्वेद १०/१० और अथर्ववेद १८/१ में आता हैं. ये यम यमी दिन और रात हैं. दोनों जड़ हैं. इन्ही दोनों जड़ों को भाई बहन मानकर वेद ने एक धर्म विशेष का उपदेश किया हैं. अलंकार के रूपक से दोनों में बातचीत कराइ गई हैं. यमी यम से कहती हैं की आप मेरे साथ विवाह कीजिये.पर यम कहता हैं की-

बहिन के साथ कुत्सित व्यवहार करने से पाप होता हैं.पुराकाल में कभी भाई बहिन का विवाह नहीं हुआ, इसलिए तू दुसरे पुरुष को पति बना.

परमात्मा ने जड़ प्रकृति का उदहारण देकर लोगों को यह सूचित करा दिया हैं की एक जड़ स्त्री के कहने पर भी पाप के दर से परम्परा की शिक्षा से प्रेरित होकर एक जड़ पुरुष जब इस प्रकार के पाप कर्म को करने से इंकार करता हैं, तब चेतन ज्ञानवान मनुष्य को भी चाहिए की वह भी इस प्रकार का कर्म कभी न करे.

वेदों में बहिन भाई के व्यभिचार का कितना कठोर दंड हैं तो श्रीपाद डांगे का यह कथन की यम यमी सूक्त में बहन भाई के व्यभिचार का वर्णन हैं अज्ञानता मात्र हैं. देखें-

ऋग्वेद १०/१६२/५ और अथर्ववेद २०/१६/१५ में आता हैं जो तेरा भाई तेरा पति होकर जार कर्म करता हैं और तेरी संतान को मरता हैं, उसका हम नाश करते हैं.

अथर्ववेद ८/६/७ में आता हैं यदि तुझे सोते समय तेरा भाई अथवा तेरा पिता भूलकर भी प्राप्त हो तो वे दोनों गुप्त पापी औषधि प्रयोग से नपुंसक करके मार डाले जाएँ.

आगे श्रीपाद डांगे का यह कथन की विवाह, रिश्ते आदि से मनुष्य जाती वैदिक काल में अनभिज्ञ थी भी अज्ञानता मात्र हैं-

ऋग्वेद के विवाह सूक्त १०/८५ , अथर्ववेद में १४/१ , ७/३७ एवं ७/३८ सूक्त में पाणिग्रहण अर्थात विवाह विधि, वैवाहिक प्रतिज्ञाएँ, पति पत्नी सम्बन्ध, योग्य संतान का निर्माण, दाम्पत्य जीवन, गृह प्रबंध एवं गृहस्थ धर्म का स्वरुप देखने को मिलता हैं, जो विश्व की किसी अन्य सभ्यता में अन्यंत्र ही मिले. जैसे

अथर्ववेद १४/१/५१- ऐश्वर्यवान और सकल जगातुत्पदक प्रभु ने मुझे तेरा हाथ पकड़ाया हैं. इसलिए आब तू धर्म से मेरी पत्नी हैं और में धर्म से तेरा पति हूँ.

ऋग्वेद १०/८५/४४- पत्नी कैसी हो- पति का अहित चिंतन करने वाली न हो, पति के प्रति कोप्मायी दृष्टि रखने वाली न हो, गृह का कल्याण करने वाली हो, सोम्य भाव से संपन्न, निर्मल अन्तकरण और सदा प्रसन्न चित रहने वाली हो, शुभ गुण-कर्म-स्वभाव तथा सुंदर विद्या से विभूषिता हो, उत्तम वीर संतानों को उत्पन्न करने वाली हो, घर के सभी जनों के लिए सुख देने वाली हों.

अथर्ववेद ७/३८/४- मैं (पत्नी) प्रतिज्ञा कर रही हूँ की तुम्हारे अतिरिक्त मेरा कोई पति नहीं हैं ऐसे ही तुम भी सभा में प्रतिज्ञा कर की तुम केवल मेरे ही हो और अन्य स्त्रियों की कभी चर्चा न करे.

ऋग्वेद १०/८५/२७- हे वधु! तुझे संतति प्राप्त हो और वह तेरा प्रिय हो.सदैव जागरूक रहकर इस घर का संरक्षण करना तेरा कर्तव्य हैं. इस पति के साथ तू शरीर से एक हो. तुम दोनों वृद्ध अवस्था में भी घर में परस्पर मिलकर रहो व प्रेम से व्यवहार करो.

अथर्ववेद ३/३०/१- माता-पिता, संतान, स्त्री पुरुष, भृत्य,मित्र, पड़ोसी और सभी से सहृदय भाव से व्यवहार करो जैसे एक गौ अपने बछड़े से करती हैं.

इस प्रकार वेद में अनेक मंत्र गृहस्थ आश्रम में पति-पत्नी के कर्तव्यों पर प्रकाश डालते हैं.

वैदिक काल के आर्यों के गृहस्थ विज्ञान की विशेषता को जानकार श्रीमति एनी बेसंत ने लिखा हैं-

Nowhere in the whole world, nowhere in any religion, a nobler, a more beautiful, a more perfect ideal of marriage than you can find in the early writings of Hindus- Annie Besant

अर्थात भूमंडल के किसी भी देश में, संसार की किसी भी जाति में, किसी भी धर्म में विवाह का महत्व ऐसा गंभीर एवं ऐसा पवित्र नहीं हैं, जैसे प्राचीन आर्ष ग्रंथों में पाया जाता हैं. वेद में विवाह सामाजिक आश्रम के लिए इतने महान सन्देश को होना किसी जंगली अथवा अशिक्षित जाति का कार्य नहीं हैं जैसा पश्चिमी विद्वानों का मन्ना हैं अपितु संसार के सबसे बुद्धिजीवी और महान जाति का कार्य हैं.

इसलिए वेद के उचित अर्थों को न समझ कर उसके स्थान पर भ्रामक बातों का प्रचार करना अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण कार्य हैं. यम यमी सूक्त अश्लीलता नहीं अपितु मानव को सम्बन्ध आदि में नियंत्रित करने का सन्देश हैं .

चित्तौडग़ढ़ में हुआ था विश्व का सबसे पहला कत्ले-आम !





मेवाड़ राज्य की राजधानी चित्तौडग़ढ़ का राजप्रासाद।

मेड़तिया राठौड़ जयमल्ल वीरमदेवोत,चूंडावत सरदार रावत साईदास, बल्लू सोलंकी, ईसरदास चहुवान, राज राणा सुलतान सहित दुर्ग के सभी प्रमुख रण बांकुरे सरदारों के तेजस्वी वेहरों पर चिन्ताभरी उत्सुकता दिखाई दे रही थी। सभी की निगाहें बादशाह अकबर के पास समझौता प्रस्ताव लेकर गए रावत साहिब खान चहुवान और डोडिया ठाकुर सांडा पर टिकी थी। अकबर के शिविर से लौटे दोनों ठाकुरों का मौन अच्छी खबर का परिचायक न होने के बावज़ूद भी वे युद्ध टलने की आशा न छोड़ पा रहे थे। वातावरण की निस्तब्धता भंग की जयमल्ल ने। उसने पूछा- ''क्या बात है सरदारों आपके चेहरों पर खिन्नता क्यों है? क्या बादशाह ने हमारी समझौते की पेशकश ठुकरा दी? अथवा उसमें कोई असंभव सी शर्त लगाई है?''
डोडिया ठाकुर ने मातृभूमि के लिये सर कटाने को तैयार बैठे जुझारू सरदारों की ओर देखा ''आप ठीक समझे। बादशाह चित्तौड़ विजय के साथ महाराणा उदयसिंह का समर्पण भी चाहता है। उसने कहा है कि महाराणा के हाजिर हुए बगैर किसी भी तरह संधि संभव नहीं है। बादशाह के अमीरों और सलाहकारों ने भी उसे समझौता कर लेने की राय दी थी। लेकिन वह तो राणा के समर्पण के बगैर बात करने को भी तैयार नहीं है। शायद उन्हें कुँवर शक्तिसिंह का बिना आज्ञा शिविर से चले आना अपमान जनक लगा है। खैर बादशाह के मन में चाहे जो टीस हो। लेकिन महाराणा के समर्पण का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वे मेवाड़ी सम्मान, आन-बान के प्रतीक हैं। हमारे रहते मेवाड़ी आन पर आंच नहीं आ सकती। हम रहें या न रहें, लेकिन महाराणा के सुरक्षित रहने पर वे कभी न कभी हमलावरों को मेवाड़ से खदेडऩे में सफल हो जाएंगे। महाराणा के समर्पण के बाद तो शेष क्या रह जाएगा?'' रावत पत्ता सारंगदेवोत ने कहा। युद्ध के प्रश्न पर सभी सरदार एकमत थे। अपनी निश्चत पराजय से भिज्ञ होने पर भी लड़े बगैर, प्राण रहते मेवाड़ी गौरव चित्तौडग़ढ़ बादशाह को सौंप देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। प्राण रहते युद्ध करने के संकल्प के साथ सरदारों की मंत्रणा समाप्त हुई। सन् 1567 में मेवाड़ की राजधानी चित्तौडग़ढ़ पर हुए मुगलिया हमले का वास्तविक कारण अकबर की सम्पूर्ण भारत पर प्रभुत्व पाने की लालसा थी। किन्तु प्रत्यक्ष कारण एक छोटी सी घटना थी। मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह का छोटा पुत्र शक्तिसिंह पिता से नाराज़ हो कर अकबर के पास चला गया था। 31 अगस्त 1567 को मालवा पर फौजकशी के लिये आगरा से रवाना हुए अकबर का पहला पड़ाव धौलपुर के पास लगा। दरबार में शक्तिसिंह को देख कर अकबर को दिल्लगी सूझी। उसने कहा, शक्ति सिंह हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े राजा हमारे दरबार में आकर हाजिर हुए। लेकिन राणा उदयसिंह अभी तक नहीं आया। इसलिये हम उस पर चढ़ाई करना चाहते हैं। इस हमले में तुम भी हमारी मदद करना। अकबर के कथन की परीक्षा किये बिना ही वह इसे सच समझ बैठा। पिता के प्रति नाराजग़ी होने पर भी उनके विरूद्ध सैनिक अभियान में भाग लेने की वह कल्पना भी नहीं कर सकता था। पिता को समय रहते बादशाही इरादे से अवगत कराने के लिये उसने अपने साथियों के साथ बिना अनुमति लिये बादशाही शिविर छोड़, चित्तौड़ की ओर प्रस्थान कर दिया। शक्तिसिंह की इस हरकत से बादशाह को बहुत क्रोध आया और उसने मेवाड़ पर चढ़ाई का पक्का इरादा बना कर कूच कर दिया। रणथम्भौर के जिले का शिवपुर किला बिना लड़े हाथ आ जाने को अच्छा शगुन मान कर वह कूच करता हुआ कोटा जा पहुँचा। वहाँ के किले और प्रदेश को शाह मुहम्मद कंधारी के सिपुर्द करग् उसने गागरोन को जा घेरा। अकबर ने शाह बदाग खाँ, मुराद खाँ और हाजी मोहम्मद खाँ को माँडलगढ़ विजय के लिये रवाना कर स्वयं चित्तौड़ की ओर कूच किया। उधर शक्तिसिंह ने चित्तौड़ पहुँच कर महाराणा उदयसिंह को अकबर के इरादों की सूचना दी। महाराणा ने मेड़ता के राव वीरम देव के पुत्र जयमल्ल राठौड़, रावत साईंदास चूंडावत, राजराणा सुल्तान, ईसरदास चहुवान, पत्ता चूंडावत, राव बल्लू सोलंखी और डोडीया सांडा के अतिरिक्त महाराज कुमार और प्रतापसिंह और राजकुमार शक्तिसिंह आदि के साथ युद्ध मंत्रणा के दौरान सरदारों ने कहा कि गुजराती बादशाहों के साथ हुए युद्धों के कारण राज्य की सैन्य और आर्थिक स्थिति काफी कम हो गई है, इस कमज़ोर स्थिति में बादशाह अकबर से मुकाबला करने में पराजय निश्चित है। ऐसे में यही उचित होगा कि महाराणा राजकुमारों और रनिवास सहित पहाड़ों में सुरक्षित चले जाएं और हम सभी सरदार यहाँ रह कर मुगलों से मुकाबला करें। थोड़े से बहस, दबाव के बाद महाराणा अपनी 18 रानियों और 24 राजकुमारों के परिवार और कुछ सामंतों के साथ अरावली की दुर्गम श्रृंखलाओं में चले गए। वहाँ से गुजरात की ओर रेवा कांठा पर गोडिल राजपूतों की राजधानी राज पीपलां पहुँच गए जहाँ राजा भैरव सिंह ने उनकी बड़ी खातिरदारी की। महाराणा वहाँ चार माह तक रहे। 23 अक्टूबर 1567 को अकबर ने चित्तौड़ से तीन कोस उत्तर में पांडोली, काबरा और नगरी गाँवों के बीच विशाल मैदान में अपना सैन्य शिविर लगाया। पैमायश वालों से किले की लम्बाई-चौड़ाई नपवा कर, अनेक बाधाओं के बावज़ूद उसने मोर्चाबन्दी पूरी कर डाली। किले के उत्तरी लाखोटा दरवाजे पर अकबर ने स्वयं मोर्चा संभाला । यहाँ किले के अन्दर मेड़तिया राठौड़ जयमल मुकाबले के लिये तैयार खड़ा था। पूर्वी सूरजपोल दरवाजे पर उसने राजा टोडरमल, शुजात खां और कासिम खां को तैनात किया, जिनका मुकाबला चूंडावतों के मुख्य सरदार रावत सांईदास से था। दक्षिण दिशा में चित्तौड़ी बुर्ज के सामने मोर्चे का इन्तजाम आसिफ खां और वज़ीर खां को सौंपा गया, जहाँ किले के अन्दर बल्लू सोलंखी आदि की चौकी थी। इसी प्रकार किले के अंदर पश्चिम में राम पोल, जोड़ला पोल, गणेश पोल, हनुमान पोल और भैरव पोल पर तैनात डोडिया ठाकुर सांडा, चहुवान ईसर दास, रावत साहिब खान और राजराणा सुल्तान आदि से मुकाबला करने के लिये अकबर ने अपनी सेना के अनेक बहादुर सेनानायकों को नियुक्त किया था। दुर्ग में युद्धरत राजपूतों को बाहरी सैनिक सहायता समाप्त करने के लिये अकबर ने आसिफ खाँ को रामपुरा की ओर रवाना किया। रामपुरा के अच्छे योद्धा तो चित्तौड़ दुर्ग में आ गए, जबकि राव दुर्गभाण महाराणा के साथ चला गया था। रामपुरा की रक्षा के लिये छोड़े गए मुठ्ठी भर राजपूत अपने प्राण देकर भी निश्चित पराजय को रोकने में सफल नहीं हो सके। रामपुरा विजय के के बाद थोड़ी सी सेना छोडक़र आसिफ खाँ चित्तौड़ लौट आया। इसी प्रकार उदयपुर और कुंभलगढ़ पहाड़ों की और भेजा गया हुसैन कुली खाँ भी इस क्षेत्र में लूटपाट करता हुआ चित्तौड़ आ गया। दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं, सघन वनों और सुदृढ़ प्राचीरों से घिरे दस वर्ग मील क्षेत्रफल वाले विशाल चित्तौडग़ढ़ पर आक्रमण यद्यपि आसान न था लेकिन अकबर की एक लाख सेना दुर्ग की घेराबंदी करने में सक्षम थी। बाहर के सभी रास्ते बन्द हो जाने से राजपूत जैसे चूहेदानी में फँस कर रह गए थे। लेकिन एक लाख शाही सेना के मुकाबले में खड़े आठ हजार राजपूतों के हौसलों में कोई कमी नहीं थी। संख्या के अनुपात का विषम अन्तर साधनों के मामले में तो तुलना करने जैसा ही नहीं था। अकबर की तोपों बंदूकों के मुकाबले में उनके पास तीर और पत्थर फेंकने वाली गोफनें ही थीं। तलवार, भाले, ढाल, कटार आदि परम्परागत अस्त्र तो आमने-सामने के युद्ध में ही काम आ सकते थे। फिर भी साधनविहीन जुझारू राजपूतों के जवाबी हमलों से शाही सेना को हर बार भारी नुकसान उठाना पड़ता था। किले से होने वाली बक्सरिया मुसलमानों के एक हजार बन्दूकचियों की अचूक निशानेबाजी शाही सेना के नुकसान को और बढ़ा कर राजपूतों की हौसला अफजाई करती। किले की उँचाई और विशालता के कारण शाही तोपखाना भी बेअसर सिद्ध हो रहा था।
दो माह गुजऱ जाने पर भी शाही सेना के भारी जानमाल के नुकसान के कारण चित्तौड़ विजय असंभव प्रतीत होने लगी थी। किन्तु युवा अकबर का मनोबल काफी ऊँचा था। उसने बारूदी सुरंगों के द्वारा किले की दीवारें तोडऩे का निर्णय लिया। किले से आने वाले तीरों, पत्थरों और गोलियों की बौछारों के बीच दक्षिण में चित्तौड़ी की बुर्ज के नीचे सुरंगे खोदने का काम आरंभ हुआ। शाही सेना किले से होने वाले हमले का जवाब देती थी, जबकि गोलियों और तीरों की बौछारों के नीचे मजदूर सुरंगें खोदते थे। एक के मर जाने पर दूसरा स्थान लेता था। मजदूरी भी स्वर्ण मुद्राओं में दी जा रही थी। अन्ततः सुरंगें तैयार हुईं। एक में 120 मन और दूसरी में 80 मन बारूद भरा गया. बारूद विस्फोट से दीवार उड़ते ही शाही सेना को जबरदस्त हमले का आदेश था। 17 दिसम्बर 1967 को एक सुरंग में किये विस्फोट से किले का बुर्ज, उस पर तैनात 90 सैनिकों के साथ उड़ गया। उसके पत्थर कई मील दूर जा गिरे। विस्फोट की आवाज पाँच कोस तक सुनी गई थी। बुर्ज उड़ते ही शाही सेना ने हमला कर दिया। किन्तु उनके किले की दीवार के पास पहुँचते ही दूसरी सुरंग में विस्फोट हो गयाग् किले की प्राचीर को जो क्षति पहुँची सो पहुँची लेकिन आक्रमण के लिये आगे बढ़ी शाही सेना के सैंकड़ों सैनिक इस विस्फोट की भेंट चढ़ गए। इनमें बरार के सैयद अहमद का पुत्र जमालुद्दीन, मीर खाँ का बेटा मीरक बहादुर, मुहम्मद सालिह हयात, सुलतान शाह अली एशक आगा, याजदां कुली, मिर्जा बिल्लोच, जान बेग, यार बेग सहित अकबर के बीस महत्वपूर्ण सरदार मारे गए थे। उनके अंग कई मील दूर जा गिरे। विस्फोट में मारे गए सैनिकों की संख्या अकबर नामा में दो सौ बताई गई है और तबकात अकबरी में पाँच सौ बताई है। इस भारी नुकसान से शाही सेना के हौसले पस्त हो गए और वह दुबारा हमला करने का साहस नहीं कर सकी। दूसरी ओर राजपूतों ने रातों रात मरम्मत करके किले को पुनः अजेय बना दिया। इस जबरदस्त दुर्घटना के बावजूद अकबर का मनोबल नहीं टूटा। किले के अन्दर तक तोपों की मार करने के लिये पहाड़ी जैसे किसी ऊंचे स्थान की आवश्यकता थी। किले के आसपास कोई उपयुक्त स्थान न देख उसने कृत्रिम पहाड़ी बनाने का निर्णय लिया। किले के पश्चिमी ओर मजदूरों से मिट्टी डलवाने का काम शुरू हुआ। तीरों और गोलियों की बौछारें मिट्टी डालने वालों को भी मिट्टी में मिला रही थी। प्राणों का डर होने से मजदूर न मिलने पर अकबर ने मिट्टी की टोकरी की मजदूरी एक रूपया कर दी और बाद में तो उसने एक सोने की मोहर प्रति टोकरी भी दी। लालच में आकर सैंकड़ों मजदूर मारे गए। लेकिन अंत में पहाड़ी बन कर तैयार हो गई। मोहरों में मजदूरी दिये जाने के कारण इसका नाम मोहरमगरी पड़ा। इस पहाड़ी पर तोपें चढ़ाने का सिलसिला आरम्भ हुआ। एक तोप के लुढक़ जाने से बीस सैनिक मारे गए। अन्ततः पहाड़ी पर तोपें चढ़ा कर किले में गोले बरसाए गए। शाही सेना के कुशल गोलन्दाज़ों ने अचूक निशाने लगा कर किले की दीवार को कई स्थानों से तोड़ दिया। इन टूटे स्थानों से हल्ला मचाती प्रवेश करने बढ़ती शाही सेना को राजपूत तीरों गोलियों के अतिरिक्त गरम तेल और जलते हुए रूई और कपड़ों के गोले फेंक कर रोक रहे थे।

घमासान युद्ध आरंभ हो चुका था। दो रात और एक दिन तो युद्ध के कारण दोनों पक्षों के सैनिक खाना-सोना तक भूल गए थे। किले के नागरिकों से राजपूतों को भरपूर सहायता मिल रही थी। वे अपने घरों से ज्वलनशील सामग्री ला लाकर मोर्चों पर पहुँचा रहे थे। शस्त्रों का अनवरत निर्माण कर रहे थे। प्राचीरों पर पत्थरों का ढेर लगा था, यदा कदा स्वयं भी शाही सेना पर पथराव के द्वारा प्रत्यक्ष युद्ध में भाग ले रहे । राजपूताने के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब युद्ध विधा से अपरिचत नागरिकों, स्त्रियों और बालकों तक ने मातृभूमि की रक्षा के लिये युद्ध में भाग लिया था। चारों ओर रण मद छाया था। अपनी कमज़ोर स्थिति के बावज़ूद उनका उत्साह भंग नहीं हो रहा था। नागरिकों का मनोबल देख सैनिकों व सरदारों का हौसला भी दुगुना हुआ जाता था। यह देख रनिवासों की राजपूतानियाँ भी घूँघट उलट युद्ध में आ कूदीं। उनका मनोबल देख कर किसी भी सरदार कोउन्हें रोकने का साहस नहीं हुआ। जयमल्ल द्वारा उन्हें महलों में रह कर ही युद्ध का परिणाम देखने की बात सुनते ही पत्ता चूंडावत की माँ सज्जन बाई सोनगरी बिफर उठी। सिंहनी की गर्जना के साथ उन्होंने पूछाग् क्या यह हमारी मातृभूमि नहीं है? क्या इसकी रक्षा की जिम्मेदारी हमारी नहीं है? क्या इससे पूर्व इसी किले में जवाहर बाईके नेतृत्व में राजपूत स्त्रियों ने युद्ध नहीं लडा.? यदि यह सच है तो हमें युद्ध में भाग लेने से कैसे रोका जा सकता है? इसके बाद किसीने उन्हें रोकने का साहस नहीं किया। युद्ध में अकबर चकिया नामक हाथी पर सवार हो कर न केवल सभी मोर्चों को सँभालता था, अपितु सैनिकों के साथ खड़ा हो बंदूकें भी चलाने लगता था। लाखोटा दरवाजे के पास मोर्चे के निरीक्षण के समय किले से आई गोली उसके कान के पास से निकल गई। अकबर ने फुर्ती से दीवार की आड़ ले अपनी जान बचाई। फिर उसने बन्दूक लेकर तरकश की तरफ गोली चलाईग, जिससे किले के बन्दूकचियों का सरदार इस्माईल खाँ मारा गया. कालपी से लाए एक हजार बक्सरिया मुसलमानों की सेना इस्माईल खाँ के नेतृत्व में राजपूतों की ओर से लड़ रही थी। इस सेना के कुशल बन्दूकचियों ने शाही सेना के सैंकड़ों सैनिकों को मारा था। घमासान युद्ध के दौरान अकबर को एक तीरकश से हजारमेखी सिलह पहने एक सरदार दिखाई दिया। उसे महत्वपूर्ण सरदार जान अकबर ने अपनी संग्राम नामक बंदूक से गोली चला दी। गोली जयमल्ल के घुटने में लगी। पैर टूट जाने पर उसने सभी सरदारों को एकत्र कर मंत्रणा की। किले की दीवारें कई जगह से टूट-फूट जाने के अतिरिक्त भारी संख्या में सैनिक मारे जा चुके थे। उधर कड़ी घेराबंदी के कारण किले में खाद्य सामग्री का भी अभाव हो चला था। ऐसे में रनिवासों में शेष रही राजपूत स्त्रियों, कन्याओं और बालकों को जौहर की प्रचण्ड ज्वालाओं में भस्म करने के बाद, शेष राजपूतों को केसरिया बाना धारण कर शत्रुओं पर टूट पडऩे का अंतिम निर्णय ले लिया गया। 25 फरवरी 1568 को अर्धरात्रि में हज़ारों राजपूत वीरांगनाओं ने भीमलत कुण्ड में स्नान कर सौभाग्य चिन्ह धारण किये। हर हर महा देव के अनवरत जयघोषों और ढोल-नगाड़ों की ध्वनियों के बीच समिधेश्वर महादेव के दर्शन कर वे जौहर स्थल पर एकत्रित हो गईं। इनका नेतृत्व जयमल्ल राठौड़ और पत्ता चूण्डावत की पत्नियाँ कर रही थीं। समिधेश्वर महादेव और भीमलत के बीच विशाल मैदान में लकडिय़ों का विशाल ढेर एकत्रित था। ब्रह्म मुहूर्त में वेद मंत्र ध्वनियों के साथ अग्नि प्रज्वलित की गई । केसरिया वस्त्र पहने राजपूत रक्तिम नेत्रों से अपनी पत्नियों, बालक पुत्रों तथा पुत्रियों को अन्तिम विदा दे रहे थे। विकराल अग्नि शिखाएं आकाश स्पर्श की स्पर्धा में लपलपाने लगीं। मातृभूमि को अन्तिम प्रणाम कर पत्ता की बड़ी रानी जीवाबाई सोलंकी ने पति की ओर देखा, आँखों से ही पति को अन्तिम प्रणाम कर, हर हर महादेव के गगनभेदी जयघोषों के बीच वह अग्निकुण्ड में कूद गई। इसके साथ ही पत्ता की अन्य रानियाँ मदालसा बाई कछवाही, भगवती बाई चहुवान, पद्मावती झाली,रतन बाई राठौड, बालेसा बाई चहुवान, आसाबाई बागड़ेची अपने दो पुत्रों तथा पाँच पुत्रियों के साथ लपलपाती ज्वाला में समा गई। कुछ वर्ष पूर्व गुजरात के बादशाह बहादुर शाह के चित्तौड़ आक्रमण में अपने पति को न्यौछावर करने वाली पत्ता की माँ सज्जन बाई सोनगरी ने पुत्र को केसरिया तिलक लगा कर जौहर किया। विजयी मुगलों सेअपना सतीत्व और बच्चों को मुसलमान बनाने से बचाने के लिये हज़ारों राजपूत वीरांगनाओं ने पत्ता, साहिब खान, ईसरदास की हवेलियों के पास धधक रही चिताओं में अग्निस्नान कर दूसरे लोक में प्रस्थान किया। अंधकार में धधकती ज्वालाएं मीलों दूर तक दिखाई दे रहीथी। आशंकित अकबर को आम्बेर के राजा भगवान दास ने बताया कि अपने स्त्री-बच्चों को अग्नि की भेंट कर महाकाल बने राजपूतों का अन्तिम ओर प्रचण्ड आक्रमण होने वाला है। केसरिया बाना धारण करने के बाद राजपूत स्वयं महाकाल बन जाता है। सुन कर अकबर ने समय नष्ट नहीं किया और फौरन सेना की व्यूह रचना सुदृढ़ कर,राजपूती आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगा।
भोर की प्रथम किरण के साथ किले के द्वार खुल गए। हर हर महादेव के जयघोषों के साथ रण बांकुरे राजपूत मुगल सेना पर टूट पड़े। अकबर की गोली से घुटना टूट जाने के कारण जयमल्ल को घोड़े पर बैठने में असमर्थ देख उसके भाई कल्ला राठौड़ ने अपने कन्धें पर बिठा लिया। दोनों भाई तलवार चलाते हुए शाही सेना में घुस गए। महाकाल बने दोनों भाई दो घड़ी घण्टे तक युद्ध करने के बाद हनुमान पोल और भैरव पोल के बीच मारे गए। उधर डोडिया सांडा भी गम्भीरी नदी के पश्चिम में घमासान युद्ध करते हुए मारा गया। राजपूतों के प्रचण्ड आक्रमण का सामना करने के लिये अकबर ने पचास प्रशिक्षित हाथियों की सूंडों में दुधारे खांडे पकड़ा कर आगे बढ़ाया। इनके पीछे तीन सौ हाथियों की एक और रक्षा पंक्ति सूंडों में दुधारे खांडे पकड़ आगे बढ़ी। इनमें मधुकर, जांगिया, सबदलिया, कदीरा आदि कई विख्यात और कई युद्धों में आजमाये गजराज भी शामिल थे। अकबर स्वयं मधुकर पर सवार होकर युद्ध संचालन कर रहा था। इनके मुकाबले राजपूत सरदार घोड़ों पर शेष सब पैदल थे। लेकिन शौर्य साधनों का मोहताज नहीं होता। एक राजपूत ने उछल कर वार किया तो अजमत खां के हाथी की सूंड कट कर दूर जा गिरी। घबराया हाथी अपनी ही सेना को कुचलता हुआ भागा। भागते हाथी से गिर कर अजमत खां ने भी दम तोड़ दिया। इसी प्रकार सबदलिया हाथी ने भी सूंड कट जाने पर अपनी ही सेना के पचासों सैनिकों को कुचल डाला। राजपूतों के कड़े प्रतिरोध के बाद भी शाही सेना हाथियों और बंदूकों के बल पर धीरे-धीरे किले में प्रवेश करती जा रही थी। यह देख राजपूतों की ओर से लड़ रहे बक्सरिया मुसलमानों की बन्दूक सेना ने भाग निकलने में ही कुशल समझी। वे अपनी स्त्रियों और बच्चों को कैदियों की तरह घेर कर शाही सेना के बीच से निकले। उन्हें अपना सैनिक समझ शाही सेना ने रोक-टोक नहीं की। सूरजपोल पर रावत साईं दास बहादुरी के साथ लड़ते हुए मारा गया। उसकी मदद को पहुँचे राजराणा जैता सज्जावत और राजराणा सुल्तान आसावत भी वहीं काम आ गए। समिधेश्वर महादेव मन्दिर के पास और रामपोल पर पत्ता चूंडावत के नेतृत्व में युद्ध हो रहा था। रणबांकुरा पत्ता चपलता के पूर्वक घोड़ा दौड़ाता हुआ हाथियों की सूंडे काट रहा था। रक्त के धारे बहाते ये शुण्ड विहीन गजराज अपनी ही सेना को कुचलते हुए भाग रहे थे। एक गजराज की सूंड में पकड़े खांडे से घोड़े का पैर कट जाने पर पत्ता जमीन पर कूद पड़ा और पैदल ही मारकाट करता हुआ गम्भीर रूप से घायल हो गया। महावत उसे महत्वपूर्ण सरदार समझ जिन्दा गिरफ्तार करने के लिये हाथी की सूंड में लपेट अकबर की ओर चला। पत्ता की वीरता से प्रभावित बादशाह द्वारा प्राण बचाने के प्रयास करने से पूर्व ही उसने दम तोड़ दिया। किले के चप्पे-चप्पे पर हुए घमासान युद्ध में रणबांकुरे राजपूत तिल-तिल कट मरे। एक ओर जौहर की चिताएं अब भी धधक रही थीं, दूसरी ओर रामपोल से समिधेश्वर तक की जमीन लाशों से ढँक गई थी। किले पर शाही झंडा फहराने के बाद अकबर के चेहरे पर विजय का उल्लास अभी ठीक से फैल भी न सका था कि एक अप्रत्याशित दृश्य ने स्तंभित कर दिया, वह समझ नहीं पा रहा था कि यह दृश्य वास्तव में हकीकत है या फिर कोई सपना देख रहा है। ऐसा दृश्य किसी युद्ध में देखना तो दूर सुना तक न था। युद्ध में आम नागरिक सेना की सहायता तो करते हैं किन्तु स्वयं मैदान में नहीं उतरते। लेकिन यहाँ तो अघट ही घट रहा था। किले की घेराबंदी से पूर्व आस-पास के गाँवों से किले में आ गए ग्रामीणों ने किले के निवासियों के साथ मिल कर शाही सेना पर हल्ला बोल दिया था। इनके पास न शस्त्र थे और न ही लडऩे का कौशल। जिसके हाथ जो आया उसी से सैनिकों को मारने लगा। ब्राह्मणों ने वेदपाठ छोड़ लाठियाँ उठा लीं। वैश्य-वणिकों ने तौलने के बांटों से ही कइयों के सर फोड़ डाले। भील, लोहार, धोबी, रंगरेज, जुलाहे, मोची, राज मिस्त्री कोई भी तो पीछे न रहा। लाठी, डंडा, गोफन, पत्थर आदि ही उनके अस्त्र थे। यह विश्व का अनूठा युद्ध था। जहाँ प्रशिक्षित अस्त्र-शस्त्र से सज्जित सेना से शस्त्रविहीन देहाती भिड़ रहे थे। मुश्किल से हासिल विजय में खलल पड़ता देख तैमूर के वंशज अकबर की आँखों में खून उतर आया। मातृभूमि के प्रति प्रेम से उत्पन्न इस छोटे से प्रतिरोध को बिना खून-खराबे के शान्त करना आसान था किन्तु अकबर ने नृशंस निर्णय लिया। शाही सेना पर हमले के अपराध में उसने कत्ल-ए-आम का आदेश दे दिया। विजय के नशे में चूर मुगल निहत्थे नागरिकों पर टूट पड़े। चारों ओर कोहराम मच गया। खूंखार सैनिकों के सामने जो पड़ा, नृशंसता पूर्वक कत्ल कर दिया गया। स्त्रियों और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। चित्तौड़ की आवासीय गलियाँ लाशों से भर गईं। मध्यान्ह से तीसरे प्रहर तक चला कत्ल-ए-आम अन्तिम व्यक्ति को भी तलवार की भेंट चढाने के बाद ही बन्द हुआ। विश्व के इस सबसे बड़े हत्याकाण्ड में चालीस हज़ार से अधिक नागरिक स्त्री, पुरूष, बालक मारे गए किन्तु इस युद्ध में मारे गए राजपूतों और जौहर की स्त्रियों को भी शामिल करने पर यह संख्या सत्तर हज़ार से अधिक हो जाती है। जबकि 12 मार्च1739 को नादिरशाह द्वारा दिल्ली में किये कत्ल-ए-आम् में लगभग तीस हज़ार लोग दरिन्दगी की भेंट चढ़े थे। यह महान कहे जाने वाले अकबर की नृसंसता का घृणित प्रदर्शन ही था कि अपनी सफलता का आकलन करने के लिये उसने मारे गए लोंगों के यज्ञोपवीतों को तुलवाया, उनका वजन 7411निकला। उन दिनों मेवाड़ी मन चार सेर का होता था। इससे है हत्या की भयावहता का अनुमान हो जाता है। कार्थाज़ वालों ने भी केना के युद्ध में मारे गए रोमनों की अगूठियाँ तुलवा कर अपनी सफलता का परिणाम आंका था। चित्तौड़ दुर्ग के निवासियों ने ही नहीं वहाँ के भवनों, मन्दिरों, महलों ने भी अकबरी प्रकोप झेला था। अनेकों भवनों, मन्दिरों, महलों को नष्ट कर ख्वाजा अब्दुल मजीद आसिफ खाँ को किले का शासन सौंप कर अकबर आगरा लौटा था। जयमल और पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर उसने आगरा के किले में इनकी पत्थर की मूर्तियाँ लगवा कर इनके शौर्य का सम्मान अवश्य किया था।

Wednesday, September 4, 2013

आशाराम बापू ,मीडिया एवं संतों-सन्यासियों के कर्तव्य


मीडिया में आशाराम बापू और एक लड़की द्वारा उन पर लगाये गये आरोपों को पिछले एक हफ्ते से प्राइम टाइम/ ब्रेकिंग न्यूज़/ विशेष/ हेडलाइंस और न जाने किस किस रूप में दिखाया जा रहा हैं जिसे देख कर ऐसा लगता हैं की सारे भारत देश में और किसी भी प्रकार की कोई गतिविधि नहीं हो रही केवल और केवल आशाराम बापू की ही खबर मीडिया वालो को मिली हैं।
आश्रम बापू पर लगाये गये आरोप सही हैं या गलत हैं, यह सिद्ध करना कोर्ट का कार्य हैं, मीडिया का नहीं मगर यहाँ पर मीडिया की ख़बरों को देखकर ऐसा लगता हैं की TRP की होड़ लगी हुई हैं। आशाराम बापू ने अगर कोई अपराध नहीं किया हैं तो वे निष्पक्ष रूप से छुट जाने चाहिए और अगर उन्होंने कोई गलत कार्य किया हैं, तो उसकी सजा अवश्य मिलनी चाहिये, जिससे दूसरो को सबक अवश्य मिले। मगर यह दूसरे कौन हैं?
इन दूसरों में हिन्दू समाज के अलावा मुस्लिम, ईसाई वह अन्य सभी मत-पन्थ के तथाकथित धर्मगुरु या प्रचारक भी आते हैं। हमारा प्रश्न बिलकुल स्पष्ट हैं की ऐसी गतिविधियाँ जहाँ कहीं भी हो रही हैं मीडिया को उन सभी की पोल खोलनी चाहिए। फिर केवल आशाराम बापू की खबर को प्राथमिकता देना मीडिया की निष्पक्ष भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाता हैं।
बेटी चाहे हिन्दू की हो, मुस्लमान की हो या ईसाई की हो, बेटी तो सभी की एक ही जैसी हैं फिर मीडिया बार बार आशाराम बापू का नाम क्यूँ ले रहा हैं ? एक धर्म विशेष की बेटी के लिए गुहार लगाना , अन्यों का ठीक प्रकार से नाम तक न लेना अशोभनीय होने के साथ साथ गैर लोकतान्त्रिक भी हैं।
उदहारण के तौर पर

१. Times of India (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) के मई २३, २०१३ के संस्करण में सलीम पंडित नाम के रिपोर्टर द्वारा सूफी दरवेश गुलज़ार अहमद भट्ट नाम के एक मौलवी के विषय में लेख छपा हैं जिस पर इलज़ाम लगा था की उसने अपने धार्मिक मदरसे में पढ़ने वाली छोटी छोटी अनेक बच्चियों का बलात्कार किया था। उसकी पोल जब खुली जब उसे व्यभिचार करते हुए उसी के एक सहयोगी ने देख लिया।
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http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-05-23/india/39474551_1_four-girls-dervish-godman

२.  The Hindu (द हिन्दू) अख़बार के ७ मार्च, २०१३ के संस्करण में हैदराबाद की खबर छपी हैं जिसमें गरीबी की मार छेल रहे मुस्लिम परिवार अपनी बेटियों को अरब देश के उन शेखों को बेच डालते हैं जिनकी उम्र उनके पति की नहीं अपितु उनके पिता बनने की होती हैं। बिचोलियों का एक पूरा नेटवर्क ही इस कार्य में लगा हुआ हैं। निकाह कराने वाला क़ाज़ी, रिश्ता करवाने वाले बिचोलिये से लेकर होटल आदि की व्यवस्था तक करवाने वालो की मिलीभगत होती हैं।  सबसे गौर करने की हैं की यह कार्य इस्लाम के नाम पर शरियत के नियमों की मन मुताबिक व्याख्या  निकाल कर किया जाता हैं।
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http://www.thehindu.com/news/cities/Hyderabad/the-marriage-trap/article4484790.ece

३. Times of India (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) के मई ६, २०१० के संस्करण में केरल प्रान्त के एक ईसाई पादरी के जी जोज़फ नाम के पादरी के विषय में छापी हैं जिस पर आरोप हैं की उसने दो छात्र ईसाई नन को चर्च के हॉस्टल में मानसिक एवं शारीरिक रूप दोनों से शोषण किया जिसके कारण एक नन की तो मृत्यु भी हो चुकी हैं।

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करे
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-03-06/india/28135390_1_anu-sexual-abuse-priest

४. Indian Express (इंडियन एक्सप्रेस) में जयपुर की इसाई संस्था "ग्रेस होम" की खबर छपी हैं जहाँ से 15 मणिपुरी लडकियाँ छुड़ाई गई हैं ।इन सबके साथ यौन शोषण हुआ है। लड़कियों की उम्र सिर्फ 7 से 15 के बीच है। जब लड़कियों का मेडिकल करवाया गया तो पता चला कि 15 में से 13 का कौमार्य भंग किया जा चुका है और 13 में से 9 लड़कियों को ल्यूकोरिया नामक रोग से ग्रसित पाया गया जो कि सेक्स की अधिकता या सेक्स वर्करोँ में होता है । एक डॉक्टर ने जो इनकी देखभाल कर रही है उसने बताया इन लड़कियों को अँधेरे कमरे में रखा गया था जिससे इनमें विटामिन डी की कमी हो गई है जब इन्हे बाहर निकाला गया तो हाथ पैर कांप रहे थे । अभी इनको विटामिन डी की गोलियाँ दी जा रही हैं । पुलिस की गिरफ्त में संस्था का मालिक पॉस्टर जैकब जॉन आया है जो कि एक पादरी है ।

यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में इस लिंक पर छपी है
http://www.indianexpress.com/news/test-confirms-manipuri-girls-rescued-from-jaipur-home-were-sexually-abused/1140369/

चर्च की इस प्रकार की अंदरूनी गतिविधियों का कच्चा चिठ्ठा एक भूतपूर्व नन जेसमे राफेल ( Jesme Raphael) ने कुछ वर्षों पहले अपनी पुस्तक Amen: An Autobiography of a Nun में लिख कर किया था। इस पुस्तक ने भारत के सम्पूर्ण चर्च को हिल दिया था। Outlook सरीखी पत्रिका ने अपने यहाँ से चर्च में हो रही इस प्रकार की गतिविधियों पर एक पूरा अंक २३ जुलाई २०१२ में छापा था।
इस प्रकार के सैकड़ों उदहारण दिए जा सकते हैं।

मीडिया की भूमिका यहाँ तक भी स्पष्ट नहीं हुई थी की उसके प्रतिनिधियों ने इस रोग के निदान की भी आलोचना करनी आरंभ कर दी।
योगगुरु स्वामी रामदेव द्वारा दिया गया बयान की "हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार किसी भी साधू-संत को किसी भी महिला को चाहे वो माता, बेटी आदि हो उसके एकांत में कभी दर्शन नहीं करने चाहिए। जो धर्म गुरु इस नियम की अनदेखी करते हैं वही विवादों को आमंत्रण देते हैं" को मीडिया दकियानूसी, गैर व्यवहारिक आदि कहकर आलोचना कर रहा हैं।
सत्य यह हैं की देशभर में बढ़ रहे बलात्कार, नारी जाति के शोषण, पशुव्रत आचरण की समस्या का अगर कोई हल हैं तो वही हल हैं जिसे स्वामी रामदेव ने बताया हैं और जो हमारे ऋषि मुनियों ने लाखों वर्ष पहले स्थापित कर दिया था।
हमेशा जब भी कोई बलात्कारी पकड़ा जाता हैं तो उसकी दिनचर्या में शराब, माँसाहार, अश्लील साहित्य एवं फिल्में प्राय: शामिल ही होती हैं। ऐसा दिल्ली गैंग रैप, मंबई शक्ति मिल रैप आदि में पाया गया हैं जिसके विरुद्ध देश भर में हाहाकार अभी तक मच रहा हैं। मीडिया इस पशु तुल्य भोगवाद को बढ़ाने की अपनी अहम भूमिका को कैसे भूल रहा हैं। स्वामी रामदेव के बयान का विरोध भी मीडिया की उसी दूषित मनोवृति का परिचायक हैं। 
हमारे देश संतों-साधुयों का देश हैं जिन्होंने लाखों वर्षों से अपने पवित्र आचरण से , अपने आदर्शों से, अपने संयमित जीवन से,अपने ज्ञान से, अपनी धार्मिकता से सामान्य जन के जीवन को मार्ग दर्शन दिया हैं।
स्वामी दयानंद के जीवन को हम कैसे भूल सकते हैं जिनकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था।

स्वामी दयानंद के जीवन के अनेक प्रसंगों में से एक प्रसंग जब स्वामी जी एक बाग में ध्यानलीन थे तो कुछ मूर्खों द्वारा एक वेश्या को उनके समीप भेजा गया हैं। योगी दयानंद के मुख के तेज को देख कर वह महिला मूर्तिव्रत बन गई। स्वामी जी जब ध्यान समाप्त कर आँखें खोलते हैं तो उनके तेज के भय से सारे षडयन्त्र का वह पर्दाफाश कर देती हैं। धन्य हैं नैष्ठिक ब्रह्मचारी दयानंद जिनके मन के द्वारा कामदेव कभी फटकने का प्रयास तक करने के गलती नहीं करते।
ऐसा ही एक प्रसंग मथुरा में शिक्षण काल का मिलता हैं जब ध्यान में लीन स्वामी दयानंद के पैरों को स्त्री द्वारा स्पर्श कर दिया जाता हैं तब स्वामी जी तीन दिन तक भूखे रहकर उसका पश्चाताप करते हैं।
एक स्त्री द्वारा जब यह इच्छा की जाती हैं की मुझे आपके समान पुत्र चाहिये तब दिग्विजयी दयानंद विनम्रता पूर्वक कहते नहैं की "मैं हूँ न आपका पुत्र दयानंद"
छोटी सी निवस्त्र बच्ची जब स्वामी जी के समक्ष आ जाती हैं तब स्वामी जी अपना सर झुका लेते हैं। साथ चल रहे मूर्तिपूजक समझते हैं की स्वामी जी ने समीप स्थित मंदिर की मूर्ति को नमन किया हैं पर धैर्यवान स्वामी जी उत्तर देते हैं की यह सम्मान मातृशक्ति रुपी उस बच्ची के लिए था तो सभी निरुत्तर हो जाते हैं।

सत्यार्थ प्रकाश के पंचम समुल्लास में स्वामी जी ने मनु स्मृति के आधार पर ब्रहमचारी,गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासियों को धर्म रुपी दस लक्षण का नित्य सेवन करने का निर्देश इस प्रकार किया हैं।

धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ६/९
धृति-सदा धैर्य रखना
क्षमा- जोकि निंदा-स्तुति, मान-अपमान, हानि-लाभ आदि  दुखों में भी सहनशील रहना
दम- मन को सदा धर्म में प्रवृत कर अधर्म से रोक देना
शौच- राग द्वेष पक्ष पात छोड़ के भीतर और जल मृतिका आदि से बाहर की पवित्रता रखनी
इन्द्रिय निग्रह-अधर्म आचरणों से रोक के इन्द्रियों को धर्म ही में सदा चलाना
धी:- मादक द्रव्य बुद्धि नाशक अन्य पदार्थ दुष्टों का संग आलस्य प्रमाद आदि को छोड़ के श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन ,  सत्पुरुषों का संग, योगाभ्यास, धर्माचरण, ब्रहमचर्य आदि शुभ कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना
विद्या- पृथ्वी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त पदार्थ यथार्थज्ञान और उनसे यथा योग्य उपकार लेना। इसके विपरीत अविद्या हैं।
सत्य- जैसा आत्मा में वैसा मन में, जैसा मन में वैसा वाणी में, जैसा वाणी में वैसा कर्म में वर्तना सत्य अर्थात जो पदार्थ जैसा हो उसको वैसा ही समझना , वैसा ही बोलना और वैसा ही करना भी।
अक्रोध- क्रोध आदि दोषों को छोड़ के शांति आदि गुणों का ग्रहण करना धर्म का लक्षण हैं।
इस दश लक्षण युक्त पक्षपातरहित न्यायाचरण धर्म का सेवन चारों धर्मों वाले करे और इसी वेदोक्त धर्म ही में

आप चलना और दूसरों को समझा कर चलाना सन्यासियों का विशेष धर्म हैं।
अटल सत्य यही हैं की संसार का कोई भी व्यक्ति साधू-संत कोटि का तभी बन सकता हैं जब वह धर्म के इन दस लक्षणों का पालन करे।
हिन्दू समाज के सभी संतों के साथ साथ अन्य मत मतान्तरों के मार्ग दर्शकों को अपने एवं समाज के सुधार के लिए इस नियमों का पालन अनिवार्य हैं। इस नियमों को गैर व्यवहारिक, पुराने, आदिम सोच का कहना मीडिया के सबसे बड़ी गलती हैं क्यूंकि यही एक मात्र विकल्प हैं।
मीडिया को भी अपनी भूमिका पर ध्यान देना चाहिए और यह न भूलना चाहिए की जो भोगवादी राक्षस आज अगर किसी और की बेटी का शोषण कर रहा हैं कल उनके द्वार पर भी इसी प्रकार से दस्तक देने में देर नहीं लगायेगा।

डॉ विवेक आर्य

Tuesday, September 3, 2013

Famous Quotes by Albert Einstein


 

 

True religion is real living; living with all one’s soul, with all one’s goodness and righteousness.


The real problem is in the hearts and minds of men. It is easier to denature plutonium than to denature the evil spirit of man.

The important thing is not to stop questioning. Curiosity has its own reason for existing. One cannot help but be in awe when he contemplates the mysteries of eternity, of life, of the marvelous structure of reality. It is enough if one tries merely to comprehend a little of this mystery every day. Never lose a holy curiosity.

Only a life lived for others is a life worthwhile.

Peace cannot be kept by force. It can only be achieved by understanding.

The man who regards his own life and that of his fellow creatures as meaningless is not merely unfortunate but almost disqualified for life.

Nothing will benefit human health and increase the chances for survival of life on Earth as much as the evolution to a vegetarian diet.

God is subtle but he is not malicious.

God does not play dice with the universe.

When the solution is simple, God is answering.

Whoever undertakes to set himself up as a judge of Truth and Knowledge is shipwrecked by the laughter of the Gods.

The further the spiritual evolution of mankind advances, the more certain it seems to me that the path to genuine religiosity does not lie through the fear of life, and the fear of death, and blind faith, but through striving after rational knowledge.

My religion consists of a humble admiration of the illimitable superior spirit who reveals himself in the slight details we are able to perceive with our frail and feeble mind.

Science without religion is lame. Religion without science is blind.