Wednesday, October 10, 2018

अपरिग्रही स्वामी ईशानंद



अपरिग्रही स्वामी ईशानंद

लेखक- डॉ सत्यबन्धु आर्य, सहलेखक- डॉ विवेक आर्य 

(25 अक्टूबर,पुण्य तिथि के अवसर पर विशेष रूप से प्रकाशित)

वैदिक संस्कृति के अनुसार जीवन का मूल मंत्र है

तेन तक्त्येन भुंजीथा अर्थात जीवन केवल संग्रह के लिए नहीं है। शास्त्रों में धन की तीन गति इसीलिए बनाई गई हैं। दान, भोग और नाश। जो धन का सदुपयोग नहीं करके केवल संचय में प्रवृत रहता हैं। उसकी तृतीया गति अर्थात  नाश होता है। अत: धन का अपनी आवश्यकता से अधिक संग्रह पतन की ओर ही ले जाता है। वर्तमान युग में चारों ओर धर्माधिकारियों के पतन के समाचार केवल और केवल अति संग्रह के कारण ही आ रहे हैं। मनुस्मृति में तो इसीलिए सन्यासी के लिए "सन्यसेत् सर्व कर्माणि" का आदेश दिया है। इन आदेशों का पालन करने वाला अपरिग्रही ही हिरण्मयपात्र से ढके हुए सत्य के मुख को अनावृत करके जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम होता हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों से संघर्ष करता हुआ एक परम पिता में विश्वास रखकर परम पद को प्राप्त करने के लिए निरंतर अग्रसर होता रहता है और विजय को प्राप्त करता हैं।
     स्वामी ईशानंद का पूरा जीवन पूर्णत अपरिग्रही का जीवन रहा है। कई बार तो वे करपात्री बनकर रह जाते थे। घर छोड़ते समय अपने हिस्से का सारा सामान जिसमें चारपाई और दीवार घड़ी भी थी। आर्यसमाज, नरेला, दिल्ली को देकर घर छोड़ दिया और कहा कि आज से इस घर के साथ मेरा कोई नाता नहीं हैं। आर्य महाविद्यालय किरठल (मेरठ) में पढ़ते हुए जालंधर के बिस्कुट फैक्ट्री के मालिक लाला लब्धुराम से मासिक खर्चा मंगवाते थे। जब विद्यालय छोड़ा तो उनके द्वारा भेजा गया मनीऑर्डर यह कहकर वापिस कर दिया कि अब मुझे इसकी आवश्यकता नहीं हैं। एक बार राजस्थान के मंत्री और विधायक श्री कुम्भाराम आर्य को पत्र लिखकर शीत ऋतु के वस्त्रों के लिए आग्रह किया। विधायक महोदय किसी कार्यवश बाहर गए हुए थे। एक माह बाद वापिस आने पर उन्होंने तुरंत पैसे भिजवाए। स्वामी जी ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया कि अब मुझे इसकी आवश्यकता नहीं हैं। 1970-1975 में सिंघोला ग्राम, दिल्ली में रहते हुए जब भी किसी से पैसे लेते तब कार्य समाप्त होने पर एक एक बचा हुआ पैसा ससम्मान उसे ही वापिस कर देते। नरेला के वैद्य कर्मवीर ने वृद्धावस्था पेंशन के सभी कागज़ात तैयार करके स्वामी जी को लोहारु से हस्ताक्षर करने के लिए बुलाया। दूसरे दिन सुबह उठकर नरेला से प्रात: 4 बजे सिंघोला आये और यह कहकर चले गए कि वैद्य जी को कह देना मुझे पेंशन नहीं चाहिए। इसी प्रकार भारत सरकार द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन निर्धारित करने पर इनके साथी स्वामी ओमानंद, पंडित टेकचंद, स्वामी धर्मानंद तथा जयलाल सुनार आदि द्वारा इनको पेंशन लेने के लिए बाध्य करने पर स्वामी जी का उत्तर था - मैं इस मजिस्ट्रेट को अपना मजिस्ट्रेट ही नहीं मानता। मेरा मजिस्ट्रेट तो परमपिता परमात्मा है। (नोट-उनदिनों पेंशन के लिए मजिस्ट्रेट के सामने शपथपत्र देना होता था)  जब उनसे कहा गया कि आप सरकार से धन लेकर कन्या गुरुकुल नरेला को दे दिया करना। तो बोले दान हमेशा अपनी कमाई में से दिया जाता हैं। मैं एक ओर तो याचक बनकर लूँ और दूसरी ओर दानी बनकर दिखाऊ। यह ढोंग मेरे से नहीं होगा। साथियों ने फिर कहा चलो वृद्धावस्था के लिए लेकर जोड़ लीजिये। स्वामी जी ने उत्तर दिया- मुझे परम पिता परमात्मा पर पूरा विश्वास हैं। वह मेरे सत्कर्मों का फल अवश्य देगा। जिससे मेरी सभी आवश्यकताएं पूरी होती रहेगी। इसलिए मैं संग्रह क्यों करूँ। वर्ष 1955 में स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी के निधन के पश्चात दयानन्द मठ दीनानगर में इनसे कोषाध्यक्ष का पद सँभालने के लिए सभी ने आग्रह किया और कहा -आप जैसा अपरिग्रही अन्य कोई नहीं हैं। अत:आप इस पद को सम्भालियें। स्वामी जी ने विनम्रता पूर्वक पद अस्वीकार करते हुए कहा - यदि इन पचड़ों में पड़ना होता तो मैं घर पर ही रहता। अधिक आग्रह करने पर चुपके से आप लोहारू चले गए। और वहां जाकर पत्र भेज दिया कि मेरा बिस्तर तथा पुस्तकें पार्सल द्वारा लोहारू भेज देवें । इस प्रकार स्वामी जी ने उत्तर भारत के सबसे प्रबुद्ध मठ के पद को अस्वीकार कर दिया। छानी बड़ी ग्राम, तहसील भादरा, जिला श्री गंगानगर , राजस्थान में भवन निर्माण करवाते हुए एक बार पैसे की कमी रह गई। दिल्ली निवासी गांव के संपन्न व्यक्तियों ने उन्हें दिल्ली आने के लिए कहा। स्वामी जी दिल्ली पहुंचे। भाई रमेश गोयल ने 40,000 रुपये एकत्र कर स्वामी जी को दे दिए। स्वामी जी छानी के लिए चल पड़े। हिसार से बस बदलनी थी। टिकट के लिए जेब में पैसे कम रह गए। स्वामी जी पैदल ही छानी के लिए चल पड़े। हिसार से 3-4 मील निकलने पर पीछे से एक ट्रक आया। सरदार जी ट्रक ड्राइवर स्वामी जी से परिचित थे। उसने ट्रक रोककर स्वामी जी से पूछा। आप कहां जायेंगे और पैदल क्यों जा रहे हो? स्वामी जी ने उत्तर दिया मुझे छानी जाना है पर किराया कम होने के कारण पैदल जा रहा हूँ। सरदार जी बोले-मैं छानी होकर भादरा जाऊंगा। आप मेरे ट्रक में बैठ जाये। आपको छानी उतार दूंगा। स्वामी जी के ट्रक में बैठने पर सरदार जी ने पूछा। स्वामी जी इस थैले में क्या है? स्वामी जी ने उत्तर दिया इसमें 40 हज़ार रुपये है। सरदार जी बोले आप तो कहते थे कि मेरे पास किराये के लिए पैसे नहीं थे। स्वामी जी का उत्तर था- भाई यह पैसा तो समाज का है। मैं अपने लिए तो इसमें से एक पैसा भी खर्च नहीं कर सकता। स्वामी जी ने लोहारू में आर्यसमाज मंदिर के निर्माण के लिए स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी द्वारा दिए गए दान के 3000 रुपये, गोरक्षा आंदोलन में दिए गए 2710 रुपये, हिंदी आंदोलन में 3150 रुपये, बीकानेर महाराजा के क्रूर व्यवहार के विरुद्ध किसान आंदोलन और  हरियाणा प्रांतीय सप्तम आर्य महासम्मेलन आदि में अनेक जत्थे तैयार करके भेजे और स्वयं भी जेल में गए।  इन सभी के लिए धन संग्रह आवश्यक था। किन्तु कार्य सम्पूर्ण होने पर सभी सम्बंधित व्यक्तियों को इकठ्ठा करके एक एक पैसे का लिखित हिसाब देना उनका स्वभाव बन गया था। जो आज भी लोहारू आर्यसमाज में सुरक्षित हैं। अपनी आवश्यकताओं वस्त्र , पुस्तकें, दवा आदि के लिए पैसा न लेकर सामान लाने के लिए योग्य व्यक्ति को कह देते और वह सामान उन्हें मिल जाता। पैसे की तरह स्वामी जी पद और प्रतिष्ठा से दूर रहते थे। इसीलिए हिंदी आंदोलन के बाद नरेला वासियों द्वारा किये जाने वाले स्वागत समारोह तथा गुरुदत्त जन्म शताब्दी पर चरखी दादरी हरियाणा वासियों द्वारा सम्मानित किये जाने के अनुरोध को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। ऐसी ही और भी अनेक घटनाएं उनके जीवन की हैं जिनमें उनके मितव्ययी तथा अपरिग्रही स्वरुप के दर्शन होते हैं। वास्तव में देखा जाये तो गीता के निष्काम कर्म योग का जीता जगता उदहारण उनका जीवन हैं। 

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