Thursday, October 6, 2016

श्री पाण्डुरंग आठवले शास्त्री जी का वह पत्र जिसमें उन्होंने महर्षि दयानन्द को श्रद्धांजलि



● Tribute paid to Maharshi Dayananda by Late Sri Pandurang Shastri Athavale, the founder of 'Swadhyay Parivar' ●
'स्वाध्याय परिवार' के संस्थापक श्री पाण्डुरंग आठवले शास्त्री जी का वह पत्र जिसमें उन्होंने महर्षि दयानन्द को श्रद्धांजलि दी है -
आदरणीय सत्यकामजी,
सप्रेम नमस्ते !
आर्य समाज ने राष्ट्र के पुनरुत्थान और नवजागरण में जो महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उससे सभी सुपरिचित हैं । उसके संस्थापक प्रातः स्मरणीय स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा उनके कार्यों को आगे बढ़ाने में सर्वस्व स्वाहा करनेवाले पूज्य स्वामी श्रद्धानन्दजी के आप दौहित्र हैं, भला आप क्यों न वेद प्रचार-प्रसार के परम पुनीत कार्य में दत्तचित्त हो; इसका तो कहना ही क्या ?
स्वामी दयानन्द सरस्वती सोई हुई आर्य जाति को सदैव झकझोर कर जगाते ही रहें । जो जाति आत्म-गौरव को खोकर मृत-तुल्य बन गई थी, उसे उसके प्राचीन गौरव को दिखाकर जीवित और तेजवंत करने में उन्होंने अहर्निश प्रचंड पुरुषार्थ किया । धर्म जो कि मानवता का प्रेरक, पोषक तथा पालक है, अत्यन्त विकृत बनकर केवल अंधविश्वास और पाखंडों से भरपूर अतः सत्त्वहीन किंवा अर्थहीन-सा लगने लगा था, वेदशास्त्र के नाम पर अनेकतः अज्ञानता तथा भ्रान्ति फैली हुई थी, स्वामीजी ने लोगों को सद्धर्म का पुनर्दर्शन कराया । उन्हें सच्चे निर्दोष वैदिक धर्म का राजमार्ग दिखाया । ऋषिप्रणीत वैदिक प्रवृत्तिवादी पुरुषार्थी जीवन-पद्धति को लोगों के सामने रखा । आर्य जाति को जगाकर तेजस्वी और पुरुषार्थी बनाया । अपने बहुमूल्य जीवन को उन्होंने वैदिक धर्म की पुनः स्थापना में लगा दिया । संसार के सामने वेद-प्रतिष्ठा को सुस्थिर किया । लोगों को बहुविध सिद्ध करके दिखा दिया कि वैदिक धर्म ही सार्वभौमिक एवं युग्युगीन शाश्वत और सच्चा मानव धर्म है और इसी के द्वारा मानव का निश्चित कल्याण हो सकता है । समस्त आर्य जाति स्वामीजी के गौरवपूर्ण कार्यों के प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगी । मैं उनके प्रति श्रद्धान्वित हूं ।
आर्य समाज स्वामीजी के गौरवपूर्ण वैदिक एवं सांस्कृतिक कार्य को आगे बढ़ाने में सतत प्रयत्नशील रहेगा ऐसी मुझे पूर्ण आशा है ।
आपका ही,
पाण्डुरंग शास्त्री
[सन्दर्भ ग्रन्थ - गुजराती पुस्तक "नवजागृतिना अग्रदूत श्री नारायणजी रामजीभाई लींबाणीनो संदेशो", पृष्ठ १७४-१७५, लेखक और प्रकाशक - शिवगण कानजी वेलाणी, वेलाणी होस्पिटल, भूज, जि० कच्छ, गुजरात, प्रथम आवृत्ति, वि०स० २०४४, अक्टूबर १९८७ । इस पुस्तक में लिखा गया है कि श्री पाण्डुरंग शास्त्री ने महर्षि दयानन्द और आर्य समाज को अंजलि प्रदान करता हुआ यह पत्र पं० सत्यकामजी विद्यालंकार को लिखा था । यह पत्र आर्य समाज - सान्ताक्रूज के ३५वें वार्षिकोत्सव पर प्रकाशित "श्रद्धा" नामक पत्रिका में से उक्त पुस्तक में उद्धृत किया गया है ।]
प्रस्तुतकर्ता - भावेश मेरजा
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