Thursday, April 10, 2014

वेद और पाप निवारण




 वेदों में पाप निवारण के विषय में ईश्वर से सबसे अधिक प्रार्थना निष्पापता अर्थात कभी पाप न करने की गई हैं। पाप निवारण की प्रार्थना का अर्थ यह नहीं हैं समझना चाहिए की किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं, अपितु इसका तात्पर्य यह हैं की मनुष्य पाप कर्म से सदा दूर ही रहे।  वेद में पाप निवारण के लिए अनेक मंत्र दिए गए हैं जिनमें मनुष्य ईश्वर से ऐसी मति, ऐसी बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना करता हैं, जिससे वह केवल और केवल सत्य मार्ग पर चलता रहे और पाप कर्म से सर्वथा दूर रहे। मनुष्य इन मन्त्रों का अनुष्ठान करते हुए यह संकल्प लेता हैं की वह पाप कर्म से सदा दूर रहेगा।
                     आइये इन मन्त्रों को ग्रहण कर, उनका चिंतन मनन कर, उन्हें अपने जीवन में शाश्वत करे जिससे हमारा जीवन सफल हो जाये।

१.प्राणी जगत का रक्षक, प्रकृष्ट ज्ञान वाला प्रभु हमें पाप से छुडाये- अथर्वेद ४/२३/१

२. हे सर्वव्यापक प्रभु जैसे मनुष्य नौका द्वारा नदी को पार कर जाते हैं, वैसे ही आप हमें द्वेष रुपी नदी से पार कीजिये। हमारा पाप हमसे पृथक होकर दग्ध हो जाये- अथर्ववेद ४/३३/७

३.हे ज्ञान स्वरुप परमेश्वर हम विद्वान तेरे ही बन जाएँ।  हमारा पाप तेरी कृपा से सर्वथा नष्ट कर दे - ऋग्वेद १/९७/४

४. हे मित्रावरुणो अर्थात अध्यापकों उपदेशकों आपके नेतृत्व में अर्थात आपकी कृपा से गड्डे की तरह गिराने वाले पापों से में सर्वथा दूर हो जाऊ। ऋग्वेद २/२७/५

५.हे ज्ञानस्वरूप प्रभु आप हमे अज्ञान को दूर रख पाप को दूर करों। - ऋग्वेद ४/११/६

६.इस शुद्ध बुद्धि से हम भगवान के भक्त बनें और पाप से बिलकुल परे चले जाएँ। - ऋग्वेद ७/१५/१३

७.हे प्रभु तू पाप से हमारी रक्षा कर , पाप की कामना करने वाले व्यक्ति से भी दिन रात निरंतर हमारी रक्षा कर।  – ऋग्वेद ७/१५/१५

८.हे मित्रा वरुणो आपके बताये हुए सत्य मार्ग से चलकर नौका से नदी की तरह पापरूपी नदी को तैर जाएँ। - ऋग्वेद ७/६५/३

९.हे सर्वज्ञ प्रभु आप मेरी सदा रक्षा करे मुझे कभी पाप की इच्छा रखने वाले दुष्ट बुद्धि वाले मनुष्य की संगती में मत पड़ने दे। - ऋग्वेद ८/७१/७

१०.निष्पापता की उत्सुकता इस सभी मन्त्रों में प्रकट की गयी हैं, प्रभु का सर्वव्यापकता तथा सर्वज्ञान गुण पाप दूर करने में सहायक होता हैं, सर्वव्यापक प्रभु हमारे द्वारा कहीं भी किये गए पाप कर्म को जान लेते हैं और यह प्रभु की न्याय व्यस्था ही हैं की किसी भी मनुष्य द्वारा किया गया पाप कर्म उसे दण्डित करने का हेतु बनता हैं, जो जैसा करेगा वैसा भरेगा का सिद्धांत स्पष्ट रूप से ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था को सिद्ध करता हैं. मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं और उसका फल पाने के लिए परतंत्र हैं, परतंत्रता का अर्थ ईश्वर का गुलाम अथवा मनुष्य द्वारा किये जाने वाले कर्मों में बध्यता नहीं हैं अपितु पुण्य कर्म का फल सुख और पाप कर्म का फल दुःख हैं, इसलिए वेद भगवान अपने सन्देश द्वारा समस्त मानव जाति को पाप कर्म से दूर रहने का सन्देश दे रहे हैं।

११.हे प्रभु! आप सर्वव्यापक और सर्वज्ञाता हैं, आपकी सर्वव्यापकता तथा सर्वज्ञता को जानकर हम कभी पाप में प्रवित न हो। - ऋग्वेद १/१७/८

१२. हे ज्ञान के स्वामिन! जिसकी तुम रक्षा करते हो उसके पास कहीं से भी पाप नहीं फाटक सकता और न दुःख आ सकता हैं। - ऋग्वेद २/२३/५

पाप निवारण के उपाय-

पाप वृति को वशीभूत करने से ,दृढ संकल्प से ,यज्ञ से , सत्य संकल्प करने से, पापों में दोष दर्शन से और पापों के त्याग की कामना पाप निवारण के उपाय हैं।

वेद भगवान बड़े ही आत्मीय शब्दों में पाप निवारण के उपाय बताते है-

१. पाप वृति को वशीभूत करना

हे पाप! मुझे छोड़ दे, हमारे वशीभूत होकर , हमको सुखी कर ,कुटिलता से अलग करके हमे कल्याण और सुख के लोक में स्थापित कर।  – अथर्ववेद ६/२६/१
सत्य हैं की जब मनुष्य पाप करने वाली वृतियों को वश में कर लेता हैं तब मनुष्य सुखी हो जाता हैं। मनुष्य का चित शांत और संतुष्ट हो जाता हैं।  ऋग्वेद १/१८९/१ में कुटिलता को, उलटे कर्म को पाप कहा गया हैं, इसलिए जब तक कुटिलता रहती हैं तब तक मनुष्य भद्र नहीं बन सकता हैं।  मनुष्य को अंतत अपने मन को स्वाभाविक सरल अवस्था में रखना भी पापों से छुटने का उपाय हैं। इसके लिखे मन को कुटिलता से पृथक करके पापवृति को वशीभूत करना होगा।

२. दृढ संकल्प से

हे पाप! जो तू हमें नहीं छोड़ता हैं तब हम ही तुझे छोड़ देते हैं। - अथर्ववेद ६/२६/२
दृढ संकल्प के द्वारा हम अपने मन को पाप कर्म से दूर करे , अगर मन को पक्का कर सत्य मार्ग पार चलेगे तभी पाप से विमुख रहेगे। 

३. यज्ञ से

मेरे जो किये हुए यज्ञ- देवपूजन, सत्संग और दान हैं, वे मुझे प्राप्त रहें , मेरे मन का संकल्प सत्य हो , मैं किसी भी पाप को न प्राप्त होऊं। इस विषय में सब देव मरी पूर्ण रक्षा करें। - अथर्ववेद ५/३/४
वेद के इस मंत्र में स्पष्ट हैं की मनुष्य अपने सत्कर्मों में सदा लगा रहे और सत्य का संकल्प कर पाप कर्मों से दूर रहे। इसका अर्थ स्पष्ट हैं की मनुष्य अपने मन को श्रेष्ठ कर्मों इतना लीन कर ले की उसके पास पाप कर्म करने का समय ही न हो।  हैं

स्वामी दयानंद के जीवन में भी इस प्रकार का एक उदहारण हमें मिलता हैं किसी व्यक्ति ने उनसे पूछा की महाराज क्या आपको वासना नहीं सताती हैं। स्वामी दयानंद ने उत्तर दिया की समय ही नहीं मिलता, स्वामी जी का सम्पूर्ण जीवन यज्ञमय और श्रेष्ठ कर्मों को पूर्ण करने में व्यस्त था, इसलिए वे पाप कर्म से बचते गए और अंत में सर्वश्रेष्ठ सुख मोक्ष के भागी बने। इस मंत्र को स्वामी दयानंद ने साक्षात् रूप से अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था।

४. पापों में दोष दर्शन से और पापों की कामना का त्याग

हे मानसिक पाप ! दूर हट जा,तू क्यूँ अप्रस्त कामों की प्रशंसा करता हैं।  दूर चला जा, मैं तुझे नहीं चाहता। - अथर्ववेद ६/४५/१

पाप तीन प्रकार के होते हैं- मानसिक, शारीरिक और वाचिक।  शारीरिक और वाचिक पापों की उत्पत्ति मानसिक पापों के द्वारा ही होती हैं। यदि मन में कोई पाप नहीं हैं तो वाणी और शरीर द्वारा भी कोई पाप नहीं होगा।  दूर चला जा, मैं तुझे नहीं चाहता। इस प्रकार के वाक्यों से व्यक्त रूप में या मानसिक रूप में पाप के विरुद्ध दृढ भावना पैदा होती हैं  इस प्रकार यदि कोई व्यक्ति पापों के विरुद्ध लगातार वाचिक और मानसिक अभ्यास करेगा तो वह अवश्य ही उन पर विजय पा लेगा।  इस प्रकार अभ्यासी के मन में पापों के लिए घृणा पैदा होती हैं अत: प्रत्येक मनुष्य को इस प्रकार का अभ्यास कर पापों की कामना का त्याग करना चाहिए।

पाप निवारण का फल-

वेद भगवान अथर्ववेद १६/६/१ में कहते हैं- हम आज ही पापरहित हो गए हैं. हम आज ही विजय कर लेंगे और सुख, शांति और आनंद का भोग करेंगे।

आइये अंग्रेजी भाषा में एक मुहावरा हैं की Prevention is always better than cure अर्थात बचाव ईलाज से हमेशा उत्तम हैं। दुःख, अशान्ति आदि से बचने के लिए एक मात्र उपाय ईश्वर प्रदित मार्ग पर चलते हुए पाप कर्मों से दूर रहना हैं।  वेद भगवान का सन्देश अपने जीवन में आत्मसात कर ही ऐसा संभव है।

डॉ विवेक आर्य

1 comment:

  1. वेद और पाप निवारण

    वेद आदि शास्त्रों में ईश्वर को न्यायकारी बताया गया हैं अर्थात जैसे कर्म हैं वैसा फल देना. वेदों में ईश्वर को दयालु भी बताया गया हैं. अब कोई व्यक्ति यह आक्षेप करे की ईश्वर जब पाप कर्मों का दंड देते हैं तो वे दयालु कैसे हो सकते हैं? क्यूंकि दया का अर्थ हैं दंड दिए बिना क्षमा कर देना. इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले हमे कुछ पहलुओं पर विचार कर लेना चाहिए.
    पहले तो ईश्वर जो दंड दे रहे हैं इसका प्रयोजन क्या हैं ? क्या बदला लेना अथवा सुधार करना हैं ?
    दुसरे दंड देने से ईश्वर का कोई निजी लाभ नहीं हैं अथवा नहीं?
    तीसरे अगर कोई निजी लाभ नहीं हैं तो फिर ईनाम अथवा दंड किस प्रयोजन से दिया जाता हैं?
    चौथा क्या दंड देने से ईश्वर अन्यायकारी कहलाते हैं?
    परम सत्य हैं की ईश्वर के किसी भी दंड का प्रयोजन किसी से बदला लेना नहीं अपितु उसे सुधारना हैं.जब मनुष्य का मन दुष्कर्मों के करने में इतना प्रवित हो जाये की उसकी खरे- खोटे में विवेक करने की शक्ति शुन्य हो जाये तो ऐसी स्थिति में उसके समाज में रहने से सिवाय हानि के कोई और आशा नहीं करी जा सकती हैं. इसलिए उस मनुष्य को समाज की कुसंगति से पृथक कर सुधरने का मौका दिया जाये जिससे न केवल उसका भला हो अपितु दूसरों को भी उससे शिक्षा मिल सके. जब सुधरने की कोई आशा नहीं बचती तो उसे कठोर से कठोर दंड दिया जाता हैं. अब सभी पाठक इस बात से भी सहमत होंगे की ईश्वर का दंड देने में कोई निजी लाभ नहीं हैं तो ईश्वर के इस निस्स्वार्थ भाव से औरों को सुधारना महान दया नहीं तो और क्या हैं? यदि ईश्वर जीवो को कर्मों का फल देना छोड़ से तब तो यहीं कहाँ जायेगा की ईश्वर ने सुधार का कार्य बंद कर दिया हैं और यह ईश्वर की दयालुता के बिलकुल विपरीत हैं. किसी भी मत पंथ का व्यक्ति यह नहीं कह सकता की ईश्वर का कर्म-फल देने में कोई निजी स्वार्थ हैं तो फिर ईश्वर के इस न्याय को दया भाव कहना ही सही हैं. ईश्वर द्वारा कर्म-फल की व्यवस्था अपनी अनादी प्रजा यानि जीवों का सुधार करने के प्रयोजन से हैं परन्तु यह स्मरण रहे की जो सुख की इच्छा रखता हैं उसे ईश्वर के नियमों का पालन करना ही होगा.यह अत्यंत आवश्यक हैं. कुछ जिज्ञासु यह शंका भी कर सकते हैं की जो ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध आचरण करेगा तो उस जीव को दंड क्यूँ दिया जायेगा? इसका उत्तर स्पष्ट हैं की ईश्वर हमारे कल्याण के लिए ही सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहे हैं और अगर कोई भी उस कल्याण मार्ग के विपरीत चलेगा तो उसमे दोष उत्पन्न होंगे और यदि दोष उत्पन्न होगा तो पाप भी उत्पन्न होगे और यदि पाप उत्पन्न होगे तो दुःख और कलेश ही उनका फल होगा. इसलिए ईश्वर को पापी को फल देना आवश्यक हैं. यही कर्म-फल व्यवस्था हैं. ईश्वर पापों की सजा देने से अन्यायकारी नहीं अपितु न्यायकारी कहे जायेगे. किसी को बेवजह ही सुखों का पात्र और किसी को बेवजह ही दुखों का पात्रईश्वर नहीं बनाते. सब अपने इस जन्म अथवा पूर्व जन्मों में किये गए कर्मों का फल हैं.

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